अध्याय 6

खण्ड III अनन्त पूर्वनियति

Calvin's Calvinism · John Calvin

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खण्ड III अनन्त पूर्वनियति

अनन्त पूर्वनियति - खण्ड 3

अब हम संक्षेप में पिगियस की उन आपत्तियों को एकत्र करेंगे जिनमें किसी प्रकार की कुछ आभा दिखाई देती है, ताकि हमारे पाठक समझ लें कि जिन हथियारों से हमारा विरोधी लड़ता है, वे उतने ही निकम्मे हैं जितना वह कारण जिसे वह इतने बड़े विवाद की ज्वाला भड़काने के लिए बताता है। वह दावा करता है कि सारा प्रश्न इसी पर टिका है कि मनुष्य किस उद्देश्य से सृजा गया। और सबसे पहले, वह इसे बड़ी बेतुकी बात मानता है कि कोई यह समझे कि परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि से कोई प्रतिफल चाहा, क्योंकि अपने आप में ही सन्तुष्ट होने के कारण उसे न किसी और की आवश्यकता हो सकती थी, न किसी और वस्तु की।

मैं भी मानता हूँ कि परमेश्वर को किसी बाहरी सहायता, टेक या वृद्धि की आवश्यकता नहीं है; परन्तु मैं इस निष्कर्ष के औचित्य को अस्वीकार करता हूँ कि इसलिए जब उसने मनुष्य को अपनी महिमा के लिए सृजा तब उसे अपना कोई ध्यान या विचार नहीं था। क्योंकि सुलैमान के इस वचन का क्या अर्थ है, "यहोवा ने सब वस्तुएँ अपने ही लिये बनाई हैं, वरन् दुष्ट को भी विपत्ति के दिन के लिये बनाया है"? (नीतिवचन 16:4।) इसलिए जब हम कहते हैं कि परमेश्वर ने, यद्यपि उसे अपने में कुछ जोड़ने की आवश्यकता नहीं थी, तौभी मनुष्यों की जाति को अपनी महिमा के लिए सृजा, तो इसमें हम कोई बेतुकी बात प्रमाणित नहीं करते। और मनुष्य की सृष्टि का यही महान और मुख्य उद्देश्य माना जाना चाहिए, और बहुत उचित रूप से। अतः पिगियस का कुतर्क और भी हास्यास्पद है जब वह यह तर्क देता है कि परमेश्वर को मनुष्य की सृष्टि में अपना कोई ध्यान नहीं हो सकता था क्योंकि वह स्वयं में असीम रूप से सिद्ध है। यह देखना बड़ा कौतुकपूर्ण है कि हमारा विरोधी सुलैमान के उपर्युक्त वचन के जिस जाल में फँसा है, उससे कैसे छटपटाकर निकलना चाहता है। वह कहता है, "परमेश्वर ने सब वस्तुएँ अपने ही लिये तो बनाईं, परन्तु अपनी महिमा के किसी ध्यान से नहीं, वरन् अपनी भलाई की असीमता के कारण।" और इस बेतुकी व्याख्या में वज़न की कमी न रहे, इसलिए वह दावा करता है कि कुछ घृणित विधर्मियों (जैसा कि वह उन्हें कहता है) को छोड़कर कोई भी टीकाकार मुझसे सहमत नहीं है। अब ऐसी निरर्थक बेतुकी बातों के खण्डन में मैं समय क्यों गँवाऊँ? जो इब्रानी शब्द LAMAAUIHU सुलैमान ने प्रयोग किया है, उसका वही अर्थ है जो हमारे इस कथन का है, "अपने ही निमित्त।" एक व्यक्ति अपनी अधकचरी लातीनी बकवास से फूलकर हमें propter क्रियाविशेषण का अर्थ समझाने को उतावला है; जबकि यदि उसमें स्वस्थ बुद्धि की एक चिनगारी भी होती, तो सन्दर्भ ही उसे स्पष्ट दिखा देता कि "दुष्ट विपत्ति के दिन के लिये बनाया गया" केवल इसीलिए कि परमेश्वर की इच्छा थी कि उनमें अपनी महिमा प्रकट करे; जैसे अन्यत्र परमेश्वर घोषणा करता है कि उसने फ़िरौन को इसी कारण खड़ा किया कि उसमें पृथ्वी की सब जातियों पर अपनी सामर्थ्य और अपना नाम प्रकट करे।

अपनी इस बेतुकी भूल को कुछ रंग देने के लिए पिगियस मूसा की साक्षी प्रस्तुत करता है, जहाँ वह यहूदियों से इन शब्दों में अपील करता है, "अब, हे इस्राएल, तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ से इसके सिवाय और क्या चाहता है कि तू उससे प्रेम रखे और उसकी उपासना करे?" मेरे पाठकों में ऐसा कौन निर्बुद्धि होगा जो तुरन्त न देख ले कि यहाँ हमारे सामने एक ऐसा मनुष्य है जो स्वस्थ बुद्धि से रहित होकर तनिक भी लज्जा के बिना बड़बड़ा रहा है? मुझे निश्चय है कि इन पन्नों का ऐसा कोई पाठक नहीं है। क्या! क्या परमेश्वर चाहता है कि हम उसकी उपासना अपने लिए अधिक करें, उसके अपने लिए कम? क्या उसे अपनी महिमा की चिन्ता उसकी दृष्टि से ऐसी ओझल हो गई है कि वह केवल हमारी ही चिन्ता करता है? तब पवित्रशास्त्र की उन सब साक्षियों का क्या होगा जो परमेश्वर की महिमा को मनुष्य के उद्धार का सर्वोच्च लक्ष्य और अन्तिम उद्देश्य ठहराती हैं? इसलिए आओ, हम इस महिमामय सत्य को दृढ़ता से थामे रहें कि हमारे उद्धार में परमेश्वर का मन ऐसा था कि वह अपने आप को न भूले, वरन् अपनी महिमा को प्रथम और सर्वोच्च स्थान दे; और यह कि उसने सारे जगत को इसी उद्देश्य से बनाया कि वह अपनी महिमा प्रकट करने के लिए एक विशाल रंगमंच हो। इसलिए नहीं कि वह अपने में सन्तुष्ट नहीं था, या उसे दूसरे स्रोतों से कुछ जोड़ने की आवश्यकता थी; परन्तु उसकी यह सुइच्छा थी कि अपनी सृष्टि को इतना सम्मान दे कि उन पर अपनी महान महिमा के उज्ज्वल चिह्न अंकित करे।

इतनी सफल शुरुआत के बाद (!), पिगियस मनुष्य की सृष्टि में परमेश्वर का एक और उद्देश्य जोड़ता है। वह कहता है कि अपनी भलाई के स्वभाव को ध्यान में रखकर परमेश्वर ने एक बुद्धिसम्पन्न प्राणी रचना चाहा जो उस भलाई को ग्रहण कर सके, और यह (वह जोड़ता है) तब तक नहीं हो सकता था जब तक वह उस प्राणी को इच्छा की स्वतंत्रता न देता। इसे मान लेने पर वह समझता है कि मेरी सारी शिक्षा तुरन्त धराशायी हो जाती है, जब मैं यह कहता हूँ कि परमेश्वर ने चुने हुओं और त्यागे हुओं के बीच भेद ठहराया। क्योंकि मनुष्य (वह तर्क देता है) अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपनी भावी दशा का निर्णायक बनाया जाकर, दोनों परिणाम, भला हो या बुरा (उद्धार पाना या नष्ट होना), अपने ही हाथ में रखता था।

अब, सबसे पहले, यहाँ पाठकों को चेताना और समझाना चाहिए कि वे अपने रचनेवाले और सृष्टिकर्ता परमेश्वर को सदा उस सर्वोच्च सम्मान में रखें जो उसे देय है, और मानव जाति की सृष्टि में उसके उद्देश्य पर विचार करते समय कभी ढीठ या उद्दण्ड दृष्टि न डालें, वरन् श्रद्धा और संयम के साथ तथा विश्वास की निर्मल आँख से उसे देखें। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि परमेश्वर की अनन्त पूर्वनियति का नाम लेते ही, पल भर में, मन में असंख्य अपवित्र और बेतुके विचार दौड़ आते हैं। इसी से ऐसे अनेक अतिसंकोची लोग पाए जाते हैं जो चाहते हैं कि पूर्वनियति के इस महिमामय सिद्धान्त का नाम ही कभी न लिया जाए, कि कहीं उच्छृंखल मनवालों को परमेश्वर के विरुद्ध अपने को ऊँचा करने का अवसर न मिल जाए। परन्तु मैं ऐसे सब अतिसावधान अटकलों को छोड़कर उन्हें औरों के लिए रहने देता हूँ, और मैं किसी मसीही मनुष्य के लिए यह अनुचित समझता हूँ कि वह इस प्रकार सावधानी से सत्य के सच्चे अंगीकार को रोक रखे, कि कहीं वह अधर्मियों की हँसी का पात्र न बने। क्योंकि पहली बात यह कि परमेश्वर की दृष्टि में उसके सत्य से बढ़कर कुछ अनमोल नहीं। दूसरी बात यह कि वह नहीं चाहता कि उसके न्याय की रक्षा हमारे छल-कपट से हो। और अन्त में, उसे ऐसी रक्षा की आवश्यकता भी नहीं। परन्तु इन बातों पर हम आगे और विस्तार से विचार करेंगे। अब मैं जो विषय विशेष रूप से विचाराधीन है, उस पर पिगियस को संक्षेप में उत्तर दूँगा।

पिगियस का तर्क है कि मनुष्य सीधे उद्धार के लिए ऐसे रचे गए थे कि उनकी सृष्टि से पहले विपरीत परिणाम, अर्थात् उसके विनाश, के विषय में परमेश्वर की कोई युक्ति पहले से थी ही नहीं। मानो प्रभु ने मनुष्य के सृजे जाने से पहले यह न देखा हो कि उसकी भावी दशा क्या होगी! और मानो उसने पहले से यह निश्चय न किया हो कि उसकी इच्छा में क्या होना चाहिए! मनुष्य, परमेश्वर का स्वरूप होने के लिए, आरम्भ से ही बुद्धि के प्रकाश और स्वभाव की सीधाई से सँवारा गया था। इसलिए (जैसा हमारा विरोधी तर्क करेगा) परमेश्वर (आदरपूर्वक कहें तो) अन्धा होकर सब घटनाओं को पहले से नहीं देख पाया, परन्तु उन घटनाओं के परिणाम की सन्देह और अनिश्चय में बाट जोहता रहा! पिगियस का धर्मशास्त्रीय तर्क ऐसा ही है! उसके तर्कशास्त्र के पूर्ववर्ती और परवर्ती ऐसे ही हैं! इसलिए मनुष्य की सृष्टि के उद्देश्य के अपने विचार से वह निडर होकर यह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर ने सब मनुष्यों की सृष्टि ऐसी ठहराई कि वे सब अपनी सृष्टि के समय (बिना भेद, अन्तर या पक्षपात के) उसकी भलाई और धन्यता के भागी बनाए जाएँ। परन्तु भक्त मन परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के चुनाव और त्याग को इस रीति से किसी भी प्रकार मेल नहीं करा सकते। वे ऐसे शारीरिक तर्क से मनुष्य के स्वैच्छिक पाप और परमेश्वर की अनन्त युक्ति का समन्वय नहीं कर सकते। वे इन मानवीय आँखों से नहीं देख सकते कि मनुष्य पहले-पहल सृजे जाने पर ऐसी दशा में कैसे रखा गया कि वह स्वयं अपनी इच्छा से गिरकर अपने ही विनाश का कारण बने; और फिर भी परमेश्वर की गुप्त और अनन्त युक्ति से ऐसा ठहराया गया था कि मानव जाति और आदम की सारी सन्तान का यह स्वैच्छिक विनाश इस बात का कारण हो कि पवित्र लोग परमेश्वर के सम्मुख दीन हों और सब बातों में उसकी अनन्त युक्ति की उपासना करें। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर को यह सब ऐसा ठहराना भाया, तौभी मनुष्य ने अपनी ओर से इस सिर के बल गिरनेवाले विनाश में स्वेच्छा से अपने को कुछ कम नहीं झोंका, जो फिर भी सीधे स्वभाव से सम्पन्न किया गया था और परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया था। परन्तु मैं फिर कहता हूँ कि मैं पूरी तरह जानता हूँ कि ये गूढ़ बातें अधर्मियों को कितनी बेतुकी और कितने अमेल विरोध से भरी प्रतीत होती हैं। तौभी हमारे लिए ऐसे हज़ार साक्षियों के स्थान पर एक ही विवेक पर्याप्त हो। उस विवेक की यदि हम ठीक से सुनें, तो हमें यह मानने में लज्जा आएगी कि मनुष्य न्याय से नष्ट हुआ, क्योंकि उसने परमेश्वर के बजाय शैतान के पीछे चलना चुना!

परन्तु अब आओ, पिगियस के उपर्युक्त विचारों, तर्कों और निष्कर्षों के उसके प्रमाण सुनें। इनमें वह यह दिखाने का परिश्रम करता है कि उद्धार सब मनुष्यों के लिए बिना भेद या अन्तर के ठहराया गया था। "यदि ऐसा न होता (वह कहता है), तो पवित्र आत्मा झूठ बोलता है जब वह घोषणा करता है कि परमेश्वर सब मनुष्यों का पिता है" (मलाकी 2:10)। भविष्यद्वक्ता वहाँ विवाह की चर्चा कर रहा है, जिसकी निष्ठा को उस समय बहुत से पति तोड़ रहे थे। मलाकी ऐसे उल्लंघन करनेवालों को स्मरण दिला रहा है कि परमेश्वर दाम्पत्य विश्वासघात का बदला लेनेवाला है। हमारे पाठक इससे समझ लें कि पवित्रशास्त्र के साथ व्यवहार में पिगियस में कितनी धार्मिकता और विवेक है! फिर वह भजन से जोड़ता है, "यहोवा सब का भला है" (145:9), जिससे वह निष्कर्ष निकालता है कि इसलिए सब अनन्त जीवन के लिए ठहराए गए। अब यदि यह सच है, तो स्वर्ग का राज्य कुत्तों और गधों के लिए भी खुला है! क्योंकि भजनकार परमेश्वर की केवल उस भलाई की महिमा नहीं कर रहा जो वह मनुष्य पर दिखाता है, वरन् उसकी भी जो वह अपनी सब कृतियों पर बढ़ाता है। परन्तु पिगियस अपने भाइयों के लिए ऐसे क्यों न लड़े?

फिर एक तीसरा प्रमाण आता है कि पौलुस के अनुसार, "यहूदी और अन्यजाति में कुछ भेद नहीं" (रोमियों 10:12)। यह सब मैं पूरी तरह स्वीकार करता हूँ, बशर्ते उसी प्रेरित की यह शिक्षा भी जोड़ दी जाए कि अन्यजातियाँ सुसमाचार में सहभागी होने के लिए इसीलिए बुलाई गईं कि वे परमेश्वर की अनन्त युक्ति से इसके लिए ठहराई गई थीं (रोमियों 16:26)। वह सभोपदेशक की पुस्तक (Ecclesiasticus) का वह अंश भी उद्धृत करता है, "परमेश्वर अपनी रची किसी वस्तु से घृणा नहीं करता।" मानो हमने सदा यह न माना हो कि परमेश्वर हममें अपनी किसी वस्तु से घृणा नहीं करता, सिवाय उस पतित स्वभाव के, जिसे प्रथम सृष्टि की विकृति कहना उचित है। परन्तु त्याग का बड़ा प्रश्न किसी भी प्रकार इस कब्ज़े पर नहीं घूमता कि परमेश्वर अपनी रची किसी वस्तु से घृणा करता है या नहीं। क्योंकि यद्यपि आदम के पतन से बहुत पहले परमेश्वर ने अपने ही गुप्त कारणों से यह ठहरा लिया था कि वह क्या करेगा, तौभी पवित्रशास्त्र में हम पढ़ते हैं कि उसके द्वारा पाप के सिवाय कुछ भी दोषी नहीं ठहराया गया था, न अब ठहराया जाता है।

इसलिए इन आधार-वाक्यों से यह स्पष्ट और ठोस निष्कर्ष निकलता है कि परमेश्वर के पास मानव जाति के एक भाग को त्यागने के उचित कारण थे—परन्तु ऐसे कारण जो हमसे छिपे हैं—किन्तु वह मनुष्य में उसके सिवाय किसी चीज़ से घृणा नहीं करता और उसे दोषी नहीं ठहराता जो उसके न्याय के विपरीत है। अगला पवित्रशास्त्र जिसे वह अपने तर्क में जोड़ता है वह पौलुस का है, जो (वह कहता है) घोषणा करता है कि परमेश्वर ने "सब को पाप के अधीन कर दिया, ताकि वह सब पर दया करे" (रोमियों 11:32)। मानो पौलुस इस स्थल में मनुष्यों की संख्या के विषय में विवाद कर रहा हो! जबकि वह तो उन सब पर, जो हम में से उद्धार पाते हैं, परमेश्वर के अनुग्रह की सामान्य रूप से स्तुति कर रहा है। निश्चय ही प्रेरित के मन में परमेश्वर की दया को सब मनुष्यों तक बढ़ाने की बात सबसे कम थी। उसका एकमात्र उद्देश्य शरीर के सब घमण्ड को धूल में मिलाना था, ताकि हम स्पष्ट समझ लें कि कोई भी मनुष्य कभी उद्धार न पाएगा सिवाय उसके जिसे परमेश्वर केवल अनुग्रह से बचाता है। देखो, तब, हमारा विरोधी कैसे महिमामय तर्कों से सिद्ध करता है कि ऊपर से दूसरों की अपेक्षा किसी को उद्धार के लिए नहीं चुना गया! और फिर भी यूक्लिड का यह बन्दर अपने सब अध्यायों के शीर्षकों में अपने आपको प्रथम श्रेणी का तर्कशास्त्री बताकर फूलता है।

मनुष्य की सृष्टि का वह तीसरा उद्देश्य, जो सुलैमान ने इतने स्पष्ट और सामर्थी रूप से कहा है, "यहोवा ने सब वस्तुएँ अपने ही लिये बनाई हैं, वरन् दुष्ट को भी विपत्ति के दिन के लिये" (नीतिवचन 16:4), उस पर पिगियस इस प्रकार आक्रमण करता है। त्यागे हुओं पर परमेश्वर की दण्डाज्ञा और पाप के दण्ड के विषय में वह तर्क देता है, "यदि हम कहें कि परमेश्वर ने अपनी अनन्त आज्ञाओं में प्रत्येक व्यक्ति की सृष्टि के बाद उसके साथ जो होगा उस पर कोई ध्यान रखा, तो हमें अवश्य मानना पड़ेगा कि चुने हुओं और त्यागे हुओं के बीच भेद ईश्वरीय मन में मनुष्य के पतन से पहले था। इससे यह निष्कर्ष निकलेगा कि त्यागे हुए इसलिए दोषी नहीं ठहराए गए कि वे आदम में नष्ट हुए, परन्तु इसलिए कि वे आदम के पतन से भी पहले ही विनाश के लिए ठहराए जा चुके थे।" इस निर्बुद्धि तर्क का मैं यह उत्तर देता हूँ कि इसमें आश्चर्य ही क्या कि पिगियस परमेश्वर के गहन न्यायों के विषय में सब बातों को (उसी के शब्द में) अन्धाधुन्ध गड्डमड्ड करे, जब वह दूरस्थ और निकटस्थ कारणों में तनिक भी भेद करना नहीं जानता! मनुष्य इधर-उधर चाहे जितना देख लें, ऐसा करके वे अपने विनाश के कारण पर, या उसे उत्पन्न करनेवाले दोष पर, कभी उँगली नहीं रख सकते। और क्यों? क्योंकि निकटस्थ दोष उन्हीं में है। और यदि वे शिकायत करें कि घाव उन्हें किसी और ओर से लगा है, तो उनके मन की भीतरी चेतना उन्हें इस निष्कर्ष में बाँध देगी कि बुराई पहले मनुष्य के स्वैच्छिक विचलन और पतन से उपजी। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि शारीरिक मन की ढिठाई को तुरन्त यह चिल्लाने से नहीं रोका जा सकता, "यदि परमेश्वर ने आदम के पतन को पहले से जाना, और फिर भी उपाय करना नहीं चाहा, तो हम अपने पाप का न्यायोचित दण्ड भोगने के बजाय उसकी नंगी बाहरी आज्ञा से अपनी निर्दोषता में नष्ट हो रहे हैं।" और मान लें कि हम यह स्वीकार कर लें कि परमेश्वर ने इस प्रकार कुछ पहले से नहीं देखा था, या उसकी दृष्टि में ऐसा नहीं था, तब भी मूल पाप के विषय में वही पुरानी शिकायत उठेगी, और पहले जितने ही ऊँचे स्वर में: "आदम को एक निजी व्यक्ति के रूप में अपने ही पाप के लिए क्यों न छोड़ दिया गया, कि वह अकेला उसके परिणाम भोगता? हमें, जो ऐसी विपत्ति के योग्य न थे, उसके साथ उसी विनाश में भागी क्यों बनाया गया? वरन् न्याय के किस बहाने से परमेश्वर हम पर दूसरे के दोष का दण्ड डालता है?" परन्तु इस विषय में जो कुछ कहा जा सकता है सब कह लेने पर भी प्रत्येक मनुष्य के हृदय की भीतरी अनुभूति अपनी प्रतीति दिलाती रहती है, और वह आदम की किसी सन्तान को (स्वयं अपना न्यायी होने पर भी) आदम के मूल अपराध के फलस्वरूप आए पाप, दोष या दण्ड से अपने को निर्दोष ठहराने नहीं देती! और वास्तव में कोई इस विषय में विवाद भी खड़ा नहीं कर सकता। क्योंकि जैसे एक मनुष्य के पाप के कारण सब मनुष्यों को घातक घाव लगा, वैसे ही सब मनुष्य तुरन्त मान लेते हैं कि उस पर परमेश्वर का न्याय धर्ममय है!

यदि, तब, कोई बात मनुष्य को यह स्वीकार करने से नहीं रोक सकती कि उसके विनाश का प्रथम मूल आदम से था, और यदि प्रत्येक मनुष्य अपने विनाश का निकटस्थ कारण अपने ही में पाता है, तो हमारे विश्वास को क्या रोक सकता है कि वह दूर से पूरे संयम के साथ परमेश्वर की उस दूरस्थ गुप्त युक्ति को स्वीकार करे और पूरी दीनता से उसकी आराधना करे जिससे मनुष्य का पतन इस प्रकार पहले से ठहराया गया था? और उसी विश्वास को साथ ही भीतर के निकटस्थ कारण को देखने से क्या रोक सकता है; कि सारी मानव जाति आदम के व्यक्तित्व से प्राप्त अनन्त मृत्यु के दोष और योग्यता से व्यक्तिगत रूप से बँधी है; और कि इसलिए सब अपने आप में मृत्यु के, और अनन्त मृत्यु के, अधीन हैं? अतः पिगियस ने उस सर्वश्रेष्ठ और अति सुन्दर संगति को, जिसमें ये निकटस्थ और दूरस्थ कारण दिव्य रीति से मेल खाते हैं, न तोड़ा, न हिलाया, न बदला (जैसा उसने सोचा था कि उसने किया है)!

अब हमारे पाठकों को स्मरण रखना चाहिए कि पिगियस निम्नलिखित दोनों प्रस्तावों की समान रूप से निन्दा करता है। वह या तो इससे इनकार करता है कि परमेश्वर ने आरम्भ से, मनुष्य के गिरने से पहले ही, यह ठहरा दिया था कि उसके पतन के बाद क्या होगा, या (दूसरे शब्दों में) कि वह पतित पिण्ड में से उन्हें चुनता है जिन्हें उसने ऐसे चुनना चाहा। वह अगस्तीन और उन जैसे सब पर हँसता है; अर्थात् उन सब भक्तों पर जो (जैसा वह कहता है) यह कल्पना करते हैं कि परमेश्वर ने आदम के व्यक्तित्व में मानव जाति के सार्वभौमिक विनाश को पहले से जानकर कुछ को अनन्त जीवन के लिए और कुछ को अनन्त विनाश के लिए ठहराया। क्योंकि वह इसे स्वीकृत तथ्य मानकर चलता है कि सब मनुष्यों को उद्धार के लिए सृजने की परमेश्वर की युक्ति आदम के पतन से पहले की थी, इसलिए वह निस्सन्देह मानता है कि परमेश्वर का वह उद्देश्य अब भी अटल और अपरिवर्तित बना है। नहीं तो (वह तर्क करता है) परमेश्वर स्वयं से संगत न रहता, और उसका अटल उद्देश्य मनुष्य के पाप से उलट दिया जाता। वह हमारे सिद्धान्त में सीधे विरोधाभास के उस रूप पर (जैसा वे कहते हैं) कठोर प्रहार करता है। वह मानता है कि चूँकि परमेश्वर ने (जैसा हम सिखाते हैं) आदम के सृजे जाने से पहले ठहरा दिया था कि स्वयं उसके और उसकी सन्तान के साथ क्या होगा, इसलिए त्यागे हुओं के विनाश का दोष अब, पतन के बाद किए गए पाप पर नहीं मढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि, वह कहता है, परिणाम को उसके कारण से पहले रखना बेतुका होगा। अब मैं कहता हूँ कि ये दोनों प्रस्ताव जिनसे पिगियस लड़ता है सच हैं। और जहाँ तक उसका हमारी आँखों के सामने दोनों मतों के बीच एक ढोंगी असहमति दिखाने का सवाल है, ऐसी कोई असंगति है ही नहीं।

हम यह मानते हैं कि मनुष्य ऐसे सृजा गया और ऐसी दशा में रखा गया कि अपने सृष्टिकर्ता के विरुद्ध उसे शिकायत का कोई कारण हो ही नहीं सकता था। परमेश्वर ने आदम के पतन को पहले से देखा, और निश्चय ही उसका उसे गिरने देना उसकी ईश्वरीय इच्छा के विपरीत नहीं, वरन् उसके अनुसार था। यहाँ बहानेबाज़ी या टालमटोल की गुंजाइश कहाँ है? और ऐसी बहानेबाज़ी से क्या लाभ या सिद्धि होती है? फिर भी पिगियस इस प्रस्ताव की सत्यता से इनकार करता है, क्योंकि (वह तर्क देता है) सब मनुष्यों के उद्धार के विषय में परमेश्वर की पहले से सोची हुई युक्ति अब भी अपरिवर्तित खड़ी है। मानो उसकी बनावटी कठिनाई का कोई समाधान मिल ही न सकता हो। सच्चाई यह है कि उद्धार सब मनुष्यों को इस शर्त के सिवाय किसी और आधार पर नहीं दिया गया था कि वे अपनी आदि निर्दोषता में बने रहें। क्योंकि कोई स्वस्थ बुद्धिवाला यह न मानेगा, न स्वीकार करेगा कि सब मनुष्यों के उद्धार की परमेश्वर की आज्ञा निर्णायक और निरपेक्ष थी। क्योंकि जब मनुष्य उद्धार के मार्ग में रखा गया, तब उसका स्वेच्छा से उससे गिर जाना उसकी न्यायोचित निन्दा के लिए पर्याप्त आधार था। परन्तु वह और किसी प्रकार हो नहीं सकता था। परमेश्वर के पूर्वज्ञान और इच्छा के अनुसार आदम गिरे बिना नहीं रह सकता था। तो क्या? क्या इसलिए आदम दोष से मुक्त है? निश्चय नहीं। वह अपनी ही पूर्ण स्वतंत्र इच्छा से, और अपने ही स्वैच्छिक कार्य से गिरा।

अब, यदि अगस्तीन ने कहा होता कि परमेश्वर का एक बार (या एक अवसर पर) सब मनुष्यों को बचाने का उद्देश्य था, तो पिगियस का चतुर तर्क ऐसे मत के खण्डन में कुछ वज़न रख सकता था। परन्तु जब वह अपना मन यह बताता है कि आदम अपनी प्रथम सृष्टि के समय ऐसा बनाया गया था कि उसका निकटस्थ, अर्थात् अपना ही, जीवन को ठुकराना परमेश्वर को भली-भाँति ज्ञात था; वरन् उसका उसे ठुकराना मानो परमेश्वर की गुप्त युक्ति में पहले से समाया हुआ था; तो अगस्तीन इन आधारों से सच्चाई और न्याय से यह निष्कर्ष निकालता है कि त्यागे हुए सार्वभौमिक आदि दोष में ऐसे उलझे और बँधे हैं कि इस प्रकार मृत्यु में छोड़े जाकर वे धर्म से परमेश्वर का वह न्याय भोगते हैं। मैं भी यही मानता हूँ। और मैं यह कहता हूँ कि जैसे आदम में सब मनुष्य खो गए, वैसे ही जो नष्ट होते हैं वे परमेश्वर के न्यायी निर्णय से नष्ट होते हैं; और फिर भी साथ ही मैं गम्भीर अंगीकार के रूप में साक्षी देता हूँ कि आदम के साथ जो कुछ हुआ या बीता, वह सब परमेश्वर की ओर से ऐसा ही ठहराया गया था।

और अब, आगे बढ़ते हुए, मेरा उद्देश्य इतना पिगियस की बातों पर, या उसके कहने के क्रम पर विचार करना नहीं होगा, जितना यह ध्यान रखना कि यह निकम्मा आदमी अपनी ही हताश ढिठाई के खण्डहरों के नीचे पछाड़ा और दफ़नाया जाए। और मेरी बड़ी चिन्ता यह होगी कि भक्त विवेकों को सन्तुष्ट करूँ, जो हमें प्रायः ऐसे लोगों से अपनी सादगी और अनुभवहीनता के कारण विचलित मिलते हैं। इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए मैं अपने विरोधी की अन्तहीन वाचालता की बहती धारा में से उसके वे अंश चुनूँगा जो सबसे आकर्षक और प्रमुख, या सबसे बनावटी और विश्वासोत्पादक लगते हैं, ताकि सब देख लें कि ऐसा आदमी कितना "कुछ भी कहे बिना बहुत कुछ कह" सकता है! उसका कहना है कि एक कारण जिससे वह विशेष और निजी चुनाव में विश्वास नहीं कर सकता यह है कि सारे जगत के छुड़ानेवाले मसीह ने आज्ञा दी कि सुसमाचार सब मनुष्यों को बिना भेद के, सामान्य रूप से और बिना अन्तर के सुनाया जाए। परन्तु सुसमाचार मेल-मिलाप का एक राजदूतीय सन्देश है, जिससे, जैसा पौलुस सिखाता है, जगत परमेश्वर से मेल-मिलाप करता है। और उसी पवित्र साक्षी के अनुसार, वह इसलिए सुनाया जाता है कि जो उसे सुनें वे उद्धार पाएँ। इसलिए पिगियस की इस बनावटी कठिनाई का मैं संक्षेप में यह उत्तर दूँगा कि मसीह इस रीति से सारे जगत का उद्धारकर्ता ठहराया गया, कि वह उन्हें बचाए जो पिता की ओर से सारे जगत में से उसे दिए गए; कि वह उनका अनन्त जीवन हो जिनका वह सिर है; कि वह उन सब को, जिन्हें परमेश्वर ने अपनी ही अकारण सुइच्छा से अपने उत्तराधिकारी होने के लिए गोद लिया, "उसमें की सब आशीषों" की सहभागिता में ग्रहण करे। अब इन गम्भीर बातों में से किसका हमारा विरोधी इनकार कर सकता है?

इसी से प्रेरित पौलुस यशायाह की इस भविष्यवाणी को मसीह में पूरी हुई बताता है: "देख, मैं और वे सन्तान जिन्हें यहोवा ने मुझे दिया," इत्यादि। इसी प्रकार मसीह स्वयं ऊँचे स्वर में घोषणा करता है, "जो कुछ पिता मुझे देता है वह सब मेरे पास आएगा; और जो मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा (यूहन्ना 6:37)। और फिर, "जिन्हें तू ने मुझे दिया उनकी मैं ने रक्षा की, और विनाश के पुत्र को छोड़ उनमें से कोई नष्ट न हुआ" (यूहन्ना 17:12)। इसी से हम सर्वत्र पढ़ते हैं कि मसीह अपनी देह के अंगों के सिवाय किसी में जीवन नहीं फैलाता। और जो यह नहीं मानता कि मसीह की देह में कलम लगाया जाना एक विशेष वरदान और विशेष दया है, उसने पौलुस की इफिसियों की पत्री को कभी आत्मिक ध्यान से नहीं पढ़ा। इससे एक तीसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य भी निकलता है, कि मसीह की सामर्थ्य और लाभ परमेश्वर की सन्तान के सिवाय किसी तक नहीं पहुँचते, न किसी के हैं। अब, कि मसीह के अनुग्रह की सार्वभौमिकता का निर्णय सुसमाचार के प्रचार के स्वरूप से बढ़कर किसी और रीति से नहीं हो सकता, इसे हर कोई तुरन्त मान लेगा। फिर भी इसी कब्ज़े पर सारा प्रश्न घूमता है। यदि हम उस सिद्धान्त को देखें और मानें जिस पर सुसमाचार की शिक्षा सब को उद्धार देने की बात करती है, तो सारा पवित्र विषय तुरन्त सुलझ जाता है। कि सुसमाचार अपने स्वभाव से सब को बचाने में समर्थ है, इससे मैं किसी भी प्रकार इनकार नहीं करता। परन्तु बड़ा प्रश्न यहाँ है: क्या प्रभु ने अपनी अनन्त युक्ति से सब मनुष्यों के लिए उद्धार ठहराया? यह बिल्कुल प्रकट है कि सब मनुष्य, बिना भेद या अन्तर के, बाहरी रीति से बुलाए जाते हैं, अर्थात् मन फिराव और विश्वास के लिए न्योते जाते हैं। यह भी उतना ही प्रकट है कि वही एक मध्यस्थ सब के सामने रखा जाता है, उसके रूप में जो अकेला उन्हें पिता से मेल-मिलाप करा सकता है। परन्तु यह भी उतना ही भली-भाँति ज्ञात है कि इनमें से कुछ भी विश्वास के सिवाय न समझा जा सकता है, न अनुभव किया जा सकता है, प्रेरित पौलुस की उस घोषणा के अनुसार कि "सुसमाचार हर एक विश्वास करनेवाले के लिए उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य है;" तो औरों के लिए वह "मृत्यु की गन्ध जो मृत्यु के लिए है" के सिवाय और क्या हो सकता है? जैसा वही प्रेरित अन्यत्र सामर्थ्य से कहता है।

और आगे, चूँकि यह अकाट्य रूप से प्रकट है कि उन भीड़ों में से जिन्हें परमेश्वर सुसमाचार में अपनी बाहरी वाणी से बुलाता है बहुत थोड़े विश्वास करते हैं, यदि मैं यह सिद्ध करूँ कि उन भीड़ों का बड़ा भाग अविश्वासी बना रहता है (क्योंकि परमेश्वर अपनी ज्योति के योग्य उसी को ठहराता है जिसे वह चाहता है), तो इससे मुझे अगला निष्कर्ष मिलता है कि परमेश्वर की दया विश्वास करनेवालों और विश्वास न करनेवालों को समान रूप से दी जाती है, ताकि जिन्हें भीतर से परमेश्वर ने नहीं सिखाया वे केवल निरुत्तर किए जाते हैं, उद्धार नहीं पाते। कुछ लोग यहाँ भेद करते हैं, यह मानकर कि सुसमाचार सब के लिए उद्धार देनेवाला है उसकी बचाने की सामर्थ्य के विचार से, परन्तु उसके बचाने के प्रभाव के विचार से नहीं। परन्तु वे इस आधे-अधूरे तर्क से गाँठ किसी प्रकार नहीं खोलते। हम फिर उसी बड़े प्रश्न पर लौटा दिए जाते हैं कि क्या विश्वास करने की वही सामर्थ्य सब मनुष्यों को दी गई है! अब पौलुस वह कारण बताता है कि सब सुसमाचार को क्यों नहीं मानते। वह हमें भविष्यद्वक्ता यशायाह की ओर ले जाता है: "हे प्रभु, किस ने हमारे समाचार की प्रतीति की है, और यहोवा का भुजबल किस पर प्रगट हुआ है?" (रोमियों 10:16।) भविष्यद्वक्ता यहाँ विश्वास करनेवालों की थोड़ी संख्या से चकित होकर मानो ऊँचे स्वर में पुकारता प्रतीत होता है, 'कि यह अत्यन्त लज्जा और निन्दा की बात थी कि जब परमेश्वर का वचन सब मनुष्यों के कानों में गूँज रहा था, तब मुश्किल से कोई हृदय उससे भीतर से छुआ गया!' परन्तु ताकि मनुष्य की ऐसी भयानक भ्रष्टता उसका विचार करनेवालों को भयभीत न करे, प्रेरित पौलुस आगे संकेत करता है कि यह सब को नहीं दिया गया कि इस प्रकार विश्वास करें, परन्तु केवल उन्हें जिन पर परमेश्वर अपने को प्रकट करता है (पद 20)। संक्षेप में, प्रेरित इस अध्याय में संकेत करता है कि मनुष्य की वाणी का कोई प्रयत्न या स्वर निष्फल होगा, जब तक परमेश्वर की गुप्त सामर्थ्य सुननेवालों के हृदयों में कार्य न करे। इस तथ्य का एक अविस्मरणीय प्रमाण लूका हमारी आँखों के सामने रखता है, जो पौलुस का दिया हुआ उपदेश लिखने के बाद (प्रेरितों के काम 13:48) कहता है, "और जितने अनन्त जीवन के लिये ठहराए गए थे, उन्होंने विश्वास किया।" अब, पौलुस की यही शिक्षा सब सुननेवालों ने उसी मन और हृदय से क्यों न ग्रहण की? लूका कारण बताता है और ग्रहण करनेवालों की संख्या निर्धारित करता है: "जितने अनन्त जीवन के लिये ठहराए गए थे उन्होंने विश्वास किया।" बाकी ने विश्वास इसलिए न किया कि वे अनन्त जीवन के लिये ठहराए नहीं गए थे। और हृदय की इस प्रवृत्ति को देनेवाला परमेश्वर के सिवाय और कौन है?

जो बेतुके ढंग से यह तर्क करते हैं कि ये लोग अपने हृदयों की स्वाभाविक प्रेरणा से विश्वास के लिए ठहराए गए थे, ऐसे मूर्ख लोग उन से अधिक खण्डन के योग्य नहीं जो यह कहें कि जगत अपने आप बन गया। सब का रहस्य सुसमाचार की गुप्त बुद्धि में है, जो मानवीय बुद्धि की किसी तीक्ष्णता से भेदी जा सकने से कहीं गहरी है। "शारीरिक मनुष्य (प्रेरित कहता है) परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता।" क्या इसलिए कि वह नहीं चाहता? यह तो सचमुच सच है; क्योंकि जितने उसके आत्मा से दबाए और दीन नहीं किए गए, वे सब परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही हैं। परन्तु प्रेरित बात को इससे कहीं गहरा और ऊँचा ले जाता है, मनुष्य के विषय में भी और परमेश्वर के विषय में भी, यह दिखाते हुए कि मनुष्य में वह "मूर्खता" और अज्ञान है कि वह आत्मा की बातों को समझ नहीं सकता, और कि परमेश्वर की बुद्धि और युक्ति ने यह सब ठहराया। क्योंकि (प्रेरित कहता है), "प्रभु का मन किस ने जाना, और उसका मंत्री कौन हुआ?" कोई नहीं (वह तर्क करता है) परमेश्वर के भेदों को उसके आत्मा के सिवाय जान सकता है। इससे वह पूरा निष्कर्ष निकालता है कि केवल वे ही परमेश्वर के शिष्य हैं जिन्हें इस जगत की आत्मा नहीं, वरन् उसकी अपनी स्वर्गीय आत्मा का वरदान मिला है, "कि हम उन बातों को जानें जो परमेश्वर ने हमें सेंत-मेंत दी हैं" (1 कुरिन्थियों 2:12)।

अब, "जगत की आत्मा" और "उस आत्मा जो परमेश्वर की ओर से है" के बीच यह तुलना करने से प्रेरित का क्या तात्पर्य है, सिवाय इसके कि मनुष्य नया जन्म पाने से पहले केवल अपनी ही रीति से बुद्धिमान हो सकते हैं और केवल पृथ्वी से चिपके रह सकते हैं, परन्तु परमेश्वर स्वर्गीय पिता के रूप में अपनी सन्तान को विशेष रीति से प्रकाशित करता है? और फिर भी पिगियस यहाँ हम पर यह बेतुकी धारणा थोपना चाहता है कि जहाँ परमेश्वर को भाता है वहाँ प्रत्येक मनुष्य अपनी ही स्वैच्छिक इच्छा और प्रयत्न से अपने को तैयार कर सकता है। मानो पौलुस कुरिन्थियों से बात नहीं कर रहा था, जिनका वह कुछ ही आगे वर्णन करता है कि वे चोर, पियक्कड़, निन्दक, व्यभिचारी और हर प्रकार की भयानक अधर्मिता से लदे थे, जब तक वे आत्मा के पवित्रीकरण से शुद्ध न किए गए। अब इन लोगों में, जिन्हें परमेश्वर ने नरक ही से घसीटकर निकाला था, ऐसा क्या हो सकता था? इन भयंकर पापियों में ऐसा क्या हो सकता था, मैं पूछता हूँ, जो मानो परमेश्वर से आधे रास्ते मिलने में उनकी सहायता करता, या उसकी आत्मा के प्रकाश के योग्य ठहराता? परन्तु शब्दों का चक्कर क्यों चलाऊँ? परमेश्वर का आत्मा, जो हम पर "स्वर्ग के राज्य के भेद" प्रकट करता है, गोद लेने का आत्मा है; और ईश्वरीय गोद लेना पूर्णतः मुफ़्त है, परमेश्वर का सेंत-मेंत वरदान। इसलिए आत्मा स्वयं जिस किसी को दिया जाता है उसे सेंत-मेंत दिया जाता है। अब, कि आत्मा सब मनुष्यों को इस प्रकार सेंत-मेंत नहीं दिया जाता, इसे सार्वभौमिक अनुभव निर्विवाद रूप से प्रमाणित करता है। इसलिए विश्वास परमेश्वर का विशेष वरदान है, और उस वरदान से चुनाव उस प्राण पर प्रकट और पक्का किया जाता है जो उसे पाता है।

पौलुस का यही तात्पर्य है जब वह कहता है कि मसीह, जो "यहूदियों के लिये ठोकर का कारण" और "यूनानियों के लिये मूर्खता" है, "बुलाए हुओं के लिये परमेश्वर की बुद्धि और परमेश्वर की सामर्थ्य" है। परन्तु अगला प्रश्न यह है कि बुलाहट कहाँ से आती है? परमेश्वर के सिवाय कहाँ से, जो अपने उद्देश्य के अनुसार उन्हें बुलाता है जिन्हें उसने चुना है? इस स्थिति से यह निष्कर्ष निकलता है (और इसे हम दृढ़ता से थामे हैं) कि सुसमाचार, जो अपने मूल स्वभाव से "जीवन के लिये जीवन की गन्ध" है, और उसके सब सुननेवालों के लिए ऐसा होना चाहिए, "नाश होनेवालों के लिये मृत्यु के लिये मृत्यु की गन्ध" बन जाता है, जो इस प्रकार अपने अन्धकार और अविश्वास में इसलिए पड़े रहते हैं कि "यहोवा का भुजबल" उन पर प्रकट नहीं हुआ। यदि, तब, हमारे स्वभाव की ऐसी सार्वभौमिक भ्रष्टता और बिगाड़ के बीच कुछ थोड़े लोग सुसमाचार पर विश्वास करते हैं, तो उनके विश्वास को उनकी अपनी भलाई का फल कहना पूरी तरह अधर्म होगा। नहीं! इसके विपरीत, प्रेरित की चेतावनी के अनुसार निरन्तर परमेश्वर का धन्यवाद किया जाए, "इसलिए कि उसने आदि से ऐसे विश्वासियों को आत्मा के पवित्रीकरण और सत्य की प्रतीति के द्वारा उद्धार के लिये चुन लिया," जिन शब्दों में प्रेरित विश्वास और पवित्रीकरण का स्रोत और कारण परमेश्वर के अनन्त चुनाव को ठहराता है। तो हम क्या कहें? क्या ये इसलिए चुने गए कि उन्होंने अपने आप को पवित्र किया और चुने जाने के योग्य ठहराया? प्रेरित अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में कहता है कि यह पवित्रीकरण परमेश्वर के आत्मा का कार्य था। और जैसे विश्वास का स्वभाव वही है, और वह भी समान रूप से परमेश्वर का वरदान और उसके आत्मा का कार्य है, इससे अकाट्य रूप से यह निकलता है कि जो विश्वास के लिए प्रकाशित किए जाते हैं वे इसलिए इस प्रकार प्रकाशित किए जाते और विश्वास का वरदान पाते हैं कि परमेश्वर द्वारा उनका चुनाव इन्हीं प्रभावों से प्रकट और पक्का किया जाए। और निश्चय ही, जब हम सुनते हैं कि कोई मसीह के पास नहीं आता सिवाय उसके जिसे पिता खींचता है, तो हम निडर होकर अगस्तीन की भाषा और तर्क अपना सकते हैं: "किसे खिंचा हुआ कहा जा सकता है जो पहले से जाने को इच्छुक है? और फिर भी कोई मसीह के पास नहीं आता सिवाय उसके जो इच्छुक है। इसलिए मसीह के पास आनेवाला प्रत्येक जन एक अद्भुत रीति से खींचा जाता है कि वह इच्छुक हो जाए, उसके द्वारा जो मनुष्यों के हृदयों पर भीतर से कार्य करना जानता है; और उनमें इस प्रकार कार्य करना, इसलिए नहीं कि वे अपनी इच्छा के विरुद्ध विश्वास करें (जो असम्भव होगा), परन्तु इसलिए कि वे जो पहले विश्वास करने को अनिच्छुक थे विश्वास करने को इच्छुक बनाए जाएँ।"

इस सब का पिगियस ऊँचे स्वर में इनकार करता है, और प्रेरित का वह अंश प्रस्तुत करता है (1 तीमुथियुस 2:4): "वह चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो;" और यहेजकेल 18:23 का हवाला देते हुए वह यों तर्क करता है, "कि परमेश्वर पापी की मृत्यु नहीं चाहता," यह उसकी अपनी शपथ पर माना जा सकता है, जहाँ वह उस भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहता है, "प्रभु यहोवा की यह वाणी है, मेरे जीवन की शपथ, मैं दुष्ट के मरने से कुछ भी प्रसन्न नहीं होता, परन्तु इससे कि दुष्ट अपने मार्ग से फिरकर जीवित रहे।" अब हम उत्तर देते हैं कि चूँकि यहाँ भविष्यद्वक्ता की भाषा मन फिराव की समझाइश है, इसलिए उसका यह घोषित करना कि परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, तनिक भी आश्चर्य की बात नहीं। क्योंकि धमकियों और प्रतिज्ञाओं का पारस्परिक सम्बन्ध दिखाता है कि ऐसी बोलियाँ सशर्त होती हैं। इसी रीति से परमेश्वर ने नीनवे के लोगों से; और गरार और मिस्र के राजाओं से घोषणा की कि वह वह करेगा जो वास्तव में उसका करने का इरादा नहीं था, क्योंकि उनके मन फिराव ने उस दण्ड को टाल दिया जो उसने उन पर डालने की धमकी दी थी। इससे प्रकट है कि दण्ड की घोषणा इस शर्त पर की गई थी कि वे हठीले और बिना पश्चाताप के बने रहें। और फिर भी दण्ड की घोषणा निश्चित थी, मानो वह अटल आज्ञा हो। परन्तु जब परमेश्वर उन्हें अपने क्रोध की आशंका से डरा चुका, और उन्हें ठीक से दीन कर चुका कि वे सर्वथा निराश न हों, तब वह उन्हें क्षमा की आशा से प्रोत्साहित करता है, ताकि वे अनुभव करें कि उपाय के लिए अब भी एक स्थान खुला है। परमेश्वर की सशर्त प्रतिज्ञाओं के विषय में ठीक ऐसा ही है, जो सब मनुष्यों को उद्धार के लिए न्योतती हैं। वे निश्चयात्मक रूप से उसे प्रमाणित नहीं करतीं जो परमेश्वर ने अपनी गुप्त युक्ति में ठहराया है, परन्तु केवल यह घोषित करती हैं कि जो विश्वास और मन फिराव तक पहुँचाए जाते हैं उन सब के प्रति परमेश्वर क्या करने को तैयार है।

परन्तु जिन्हें परमेश्वर ने नहीं सिखाया, वे इन बातों को न समझकर यह आरोप लगाते हैं कि हम इससे परमेश्वर की दोहरी या द्विविध इच्छा ठहराते हैं। जबकि परमेश्वर परिवर्तनशील होने से इतनी दूर है कि ऐसी परिवर्तनशीलता की छाया भी, अति दूर की मात्रा में भी, उससे सम्बन्ध नहीं रखती। इसलिए पिगियस, इन गूढ़ बातों की ईश्वरीय प्रकृति से अनजान होकर, यों तर्क करता है: "यह परमेश्वर को मनुष्यों का ठट्ठा करनेवाला बनाने के सिवाय और क्या है, यदि परमेश्वर यह दिखाया जाए कि वह वास्तव में उसे नहीं चाहता जिसे चाहने का वह दावा करता है, और जिसमें वह वास्तव में प्रसन्न है उसमें प्रसन्न नहीं है?" परन्तु यदि वाक्य के इन दोनों अंगों को साथ मिलाकर पढ़ा जाए, जैसा सदा पढ़ा जाना चाहिए—"मैं दुष्ट के मरने से कुछ प्रसन्न नहीं होता," और, "परन्तु इससे कि दुष्ट अपने मार्ग से फिरकर जीवित रहे"—इन दोनों प्रस्तावों को एक-दूसरे के सम्बन्ध में पढ़ा जाए, तो निन्दा तुरन्त धुल जाती है। परमेश्वर हमसे यह मन-परिवर्तन, या "अपनी अधर्मिता से फिरना," माँगता है, और जिस किसी में वह इसे पाता है उसे वह अनन्त जीवन के प्रतिज्ञात प्रतिफल से निराश नहीं करता। इसलिए परमेश्वर के विषय में उतना ही कहा जाता है कि वह इस अनन्त जीवन में प्रसन्न होता और उसे चाहता है, जितना कि मन फिराव में प्रसन्न होता है; और वह मन फिराव में इसलिए प्रसन्न होता है कि वह अपने वचन से सब मनुष्यों को उसके लिए बुलाता है। अब यह सब उसकी गुप्त और अनन्त युक्ति से पूर्ण सामंजस्य में है, जिससे उसने अपने चुने हुओं के सिवाय किसी का मन न फिराने का निश्चय किया। इसलिए परमेश्वर के चुने हुओं के सिवाय कोई कभी अपनी दुष्टता से नहीं फिरता। और फिर भी, इन कारणों से, उपासनीय परमेश्वर को परिवर्तनशील या बदलने में सक्षम नहीं समझना चाहिए, क्योंकि व्यवस्था देनेवाले के रूप में वह सब मनुष्यों को सशर्त जीवन की बाहरी शिक्षा से प्रकाशित करता है। इस प्रथम रीति से वह सब मनुष्यों को अनन्त जीवन के लिए बुलाता, या न्योतता है। परन्तु बाद की दशा में वह उन्हें अनन्त जीवन तक पहुँचाता है जिन्हें उसने अपने अनन्त उद्देश्य के अनुसार चाहा, अनन्त पिता के रूप में अपने आत्मा से केवल अपनी सन्तान को नया जन्म देकर।

यह निश्चित है कि मनुष्य अपनी इच्छा से, या स्वभाव की किसी प्रवृत्ति से, प्रभु की ओर "अपने बुरे मार्गों से नहीं फिरते।" उतना ही निश्चित है कि मन-परिवर्तन का वरदान सब मनुष्यों के लिए सामान्य नहीं है; क्योंकि यह उन दो वाचाओं में से वह है जिसके विषय में परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह उसे अपनी सन्तान और अपने चुने हुए लोगों के सिवाय किसी से नहीं बाँधेगा, जिनके विषय में उसने अपनी यह प्रतिज्ञा लिखवाई कि "वह अपनी व्यवस्था उनके हृदय पर लिखेगा" (यिर्मयाह 31:33)। अब, मनुष्य को पूरी तरह होश खोया हुआ होना चाहिए कि वह दावा करे कि यह प्रतिज्ञा सब मनुष्यों को सामान्य रूप से और बिना भेद के दी गई है। परमेश्वर पौलुस के द्वारा, जो भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह का हवाला देता है, स्पष्ट शब्दों में कहता है, "क्योंकि यह वह वाचा है जो मैं उनसे बाँधूँगा। उस वाचा के समान नहीं जो मैं ने उनके पूर्वजों से बाँधी थी: परन्तु मैं अपनी व्यवस्था उनके मन में डालूँगा, और उनके हृदय पर लिखूँगा" (इब्रानियों 8:9, 10)। निश्चय ही, इस प्रतिज्ञा को उन पर लागू करना जो इस नई वाचा के योग्य थे, या जिन्होंने अपने ही गुणों या प्रयत्नों से उसे पाने के लिए अपने आप को तैयार किया था, घोर से घोर अज्ञान और मूर्खता से भी बुरा होगा; और इसलिए और भी कि प्रभु भविष्यद्वक्ता के द्वारा उनसे बोल रहा है जिनके पहले "पत्थर के से हृदय" थे। यह सब भविष्यद्वक्ता यहेजकेल ने भी स्पष्ट कहा है और पूरी तरह समझाया है (अध्याय 36:26)।

कि हठ और बैर सब मनुष्यों में सामान्य हैं, इसे मैं पूरी तरह मानता हूँ, और मैं यह भी कहता हूँ कि किसी मनुष्य का हृदय तब तक कोमल नहीं किया जाता, न परमेश्वर की इच्छा के प्रति लचीला और आज्ञाकारी बनाया जाता है, जब तक परमेश्वर उसे वह करने की इच्छा और सामर्थ्य न दे जो वह आज्ञा देता है। क्योंकि हम "नई सृष्टि" क्यों कहलाते हैं, इसीलिए नहीं कि "हम उसकी बनाई हुई रचना हैं, जो भले कामों के लिये सृजे गए"? परन्तु मैं तुमसे पूछता हूँ, सारी स्तुति और महिमा का कैसा बँटवारा, और कितना अन्यायपूर्ण बँटवारा होगा, यदि परमेश्वर को हम मरणशील मनुष्यों का सृष्टिकर्ता बनाया जाए, और फिर हम में से प्रत्येक को धार्मिकता और अनन्त जीवन के लिए अपना ही सृष्टिकर्ता बनाया जाए? इस प्रकार परमेश्वर के हिस्से में केवल निष्प्रभावी और विफल अनुग्रह की प्रशंसा रह जाएगी। महिमा का जो भाग कहीं अधिक उत्कृष्ट है वह हमारे हिस्से में आएगा। परन्तु पवित्रशास्त्र निश्चयात्मक रूप से कहता है कि मनुष्यों के हृदयों का खतना करना केवल परमेश्वर का कार्य है, और नया जन्म परमेश्वर स्वयं के सिवाय किसी और का नहीं ठहराया गया। इसी से मनुष्य में जो कुछ परमेश्वर के स्वरूप में नया सृजा जाता है, उसे "आत्मा" कहा जाता है। "जो शरीर से जन्मा है वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है वह आत्मा है" (यूहन्ना 3:6)। परमेश्वर सचमुच हमें बार-बार मन फिराव के लिए बुलाता है, परन्तु उसे ही सर्वत्र मन-परिवर्तन का कर्ता कहा गया है; उसकी "व्यवस्था" के विषय में कहा गया है कि वह "प्राणों को फेर देती है।" इस मन-परिवर्तन का मध्यवर्ती साधन, तथापि, प्रायः वचन के सेवकों को सौंप दिया जाता है। परन्तु जब वे प्रार्थना करके, बोकर, सींचकर परिश्रम करते हैं, तब "बढ़ानेवाला" केवल परमेश्वर है, इसलिए यह कहा जाना तनिक आश्चर्य की बात नहीं कि अपनों के हृदय को खोलना कि वे सेवकों की "कही हुई बातों पर ध्यान दें," केवल उसी का कार्य है।

इसी से अगस्तीन, चुने हुओं का वर्णन करके और यह दिखाकर कि उनका उद्धार परमेश्वर की विश्वासयोग्य रखवाली में ऐसे सुरक्षित है कि उनमें से कोई नष्ट नहीं हो सकता, ये गम्भीर और धन्य बातें कहता है: "मानव जाति के शेष सब लोग, जो इस संख्या के नहीं हैं (वह कहता है), परन्तु उसी पतित पिण्ड के हैं, क्रोध के पात्र ठहराए जाकर, इन चुने हुओं के उपयोग और सेवा के लिए उत्पन्न होते हैं। क्योंकि परमेश्वर ने उनमें से भी किसी को संयोग से, या अकस्मात्, या व्यर्थ नहीं सृजा। न वह उन में, या उनके द्वारा, जो कुछ भला करता है वह अनजाने में करता है। क्योंकि उनमें मानव स्वभाव को रचना अपने आप में भली बात है। और उनके द्वारा इस वर्तमान जीवन की व्यवस्था को सँवारना भली बात है। परन्तु परमेश्वर इनमें से किसी को आत्मिक मन फिराव और अपने साथ मेल-मिलाप तक नहीं पहुँचाता! इसलिए, यद्यपि ये परमेश्वर के चुने हुओं के समान विनाश के उसी पिण्ड से उत्पन्न हुए हैं, तौभी अपनी कठोरता और हृदय की अपश्चातापी दशा से वे सब, जहाँ तक उनसे हो सके, 'अपने लिये क्रोध के दिन के लिये क्रोध कमा रहे हैं।' जबकि इसी पतित पिण्ड में से परमेश्वर कुछ को अपनी भलाई और दया से मन फिराव के लिए बुलाता है, और इन्हें, शेष को, न्यायी निर्णय में उनके अपने विनाश पर छोड़ देता है।" ऐसा अगस्तीन कहता है।

परन्तु ताकि कोई यह न समझे कि यहाँ ईश्वरीय अनुग्रह और हमारे परिश्रम के बीच कोई असंगति, भेद या विरोध है, पवित्र पिता के ये विचार उसकी रचनाओं में सर्वत्र मिलते हैं। "मनुष्य परिश्रम करते हैं (वह कहता है) कि हमारी अपनी स्वतंत्र इच्छा में वह कौन-सी भली वस्तु मिले जो हमारी अपनी है, और जो हमें परमेश्वर से नहीं मिली। मैं तो नहीं जानता कि हम में ऐसी कौन-सी भली वस्तुएँ मिल सकती हैं।" एक अन्य स्थान पर, इसी गहन विषय पर तर्क करते हुए, वह यह निष्कर्ष निकालता है: "इसलिए, जब तक हम इन दोनों बातों को दृढ़ता से न थामें, कि न केवल इच्छा की वह शक्ति जो इधर-उधर फिरने को स्वतंत्र है, और जो उन स्वाभाविक भली वस्तुओं में से एक है जिनका बुरा मनुष्य बुरा उपयोग कर सकता है, परमेश्वर का वरदान है; परन्तु वह भली इच्छा भी, जो उन आत्मिक भली वस्तुओं में से एक है जिनका बुरा उपयोग नहीं हो सकता, परमेश्वर की ओर से है; जब तक, मैं कहता हूँ, हम इन दोनों प्रस्तावों को दृढ़ता से न थामें, तब तक मैं नहीं जानता कि प्रेरित की उस पवित्र स्थिति का, जो उसके अविस्मरणीय प्रश्न में निहित है, 'तेरे पास क्या है जो तू ने पाया नहीं?', हम किस आधार पर बचाव करें। परन्तु यदि हम में परमेश्वर से पाई हुई एक प्रकार की स्वतंत्र इच्छा है, जो फिर भी भली या बुरी हो सकती है; और यदि हम में एक भली इच्छा भी है, जो हमारे ही द्वारा ऐसी बनाई गई है; तो जो हम से निकलता है वह उससे उत्तम है जो हम परमेश्वर से पाते हैं।" अगस्तीन उपर्युक्त आधार-वाक्यों से यह अन्तिम निष्कर्ष निकालता है: "जहाँ परमेश्वर (वह कहता है) अपनी आज्ञा मानने और मसीह के पास आने की यह इच्छा देना चाहता है, वहाँ यह उसकी सेंत-मेंत दया का कार्य है, उन के गुणों के अनुसार नहीं जिन्हें वह यह वरदान देता और जिन पर दया दिखाता है। जहाँ परमेश्वर वरदान देना, या दया दिखाना नहीं चाहता, वहाँ यह उसके क्रोध का प्रदर्शन है, जो घोषित करता है कि कोई मसीह के पास नहीं आ सकता जिसे आने की इच्छा न दी गई हो। और यद्यपि उसमें उन्हें खींचने की सामर्थ्य है, तौभी वह उन्हें नहीं खींचता; परन्तु वे नाश होने को छोड़ दिए जाते हैं, और इस प्रकार उसके वचन की सच्चाई प्रकट करते हैं कि 'कोई मसीह के पास नहीं आ सकता, जब तक पिता उसे न खींचे।'"

वह कठिनाई जो पिगियस के अनुसार पौलुस के उस दूसरे स्थल में है, जहाँ प्रेरित कहता है कि "परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, और वे सत्य की पहचान तक पहुँचें" (1 तीमुथियुस 2:4), एक ही क्षण में, और एक ही प्रश्न से, सुलझ जाती है, अर्थात्, कैसे परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्य सत्य की पहचान तक पहुँचें? क्योंकि पौलुस इस उद्धार और सत्य की पहचान तक पहुँचने को एक साथ जोड़ता है। अब मैं पूछता हूँ, क्या परमेश्वर की वही इच्छा जगत के आरम्भ से वैसी ही बनी रही या नहीं? क्योंकि यदि परमेश्वर चाहता, या इच्छा करता कि उसका सत्य सब मनुष्यों को ज्ञात हो, तो उसने अपनी व्यवस्था अन्यजातियों को भी क्यों न सुनाई और प्रकट की? उसने जीवन की ज्योति को यहूदिया की सँकरी सीमाओं में क्यों बन्द रखा? और मूसा का क्या तात्पर्य है जब वह कहता है, "क्योंकि ऐसी बड़ी जाति कौन है जिसका परमेश्वर उसके इतना निकट रहता है जितना हमारा परमेश्वर यहोवा, जब हम उसे पुकारते हैं? और ऐसी बड़ी जाति कौन है जिसके पास ऐसी धर्ममय विधियाँ और नियम हों जैसी यह सारी व्यवस्था है जिसे मैं आज तुम्हारे सामने रखता हूँ?" (व्यवस्थाविवरण 4:7, 8।) ईश्वरीय व्यवस्था-दाता का यहाँ निश्चय यही तात्पर्य है कि कोई और जाति नहीं थी जिसके पास उस जाति के समान विधियाँ और व्यवस्थाएँ हों, जिनसे वह शासित हो। और मूसा यहाँ अब्राहम के वंश के विशेष अधिकार की प्रशंसा के सिवाय और क्या करता है? इसी का उत्तर दाऊद की उस उच्च प्रशंसा से मिलता है जो उसने उसी जाति पर कही, "उसने किसी और जाति से ऐसा व्यवहार नहीं किया; और उसके नियमों को वे नहीं जानते" (भजन संहिता 147:20)। न हमें भजनकार द्वारा बताए गए स्पष्ट कारण की उपेक्षा करनी चाहिए: "इसलिए कि यहोवा ने तेरे पूर्वजों से प्रेम किया, इसी कारण उसने उनके पीछे उनके वंश को चुन लिया" (व्यवस्थाविवरण 4:37)। और परमेश्वर ने उन्हें ऐसे क्यों चुना? इसलिए नहीं कि वे अपने आप में दूसरों से उत्कृष्ट थे, परन्तु इसलिए कि परमेश्वर को भाया कि उन्हें "अपनी निज प्रजा" होने के लिए चुन ले। क्या? क्या हम यह मान लें कि प्रेरित नहीं जानता था कि स्वयं उसे पवित्र आत्मा ने आसिया में "वचन सुनाने" से और बिथुनिया में जाने से रोका था? परन्तु चूँकि इस तर्क को आगे बढ़ाना हमें बहुत विस्तार में ले जाएगा, हम एक और बात लेकर सन्तुष्ट रहेंगे: कि परमेश्वर ने, अनन्त जीवन का दीपक केवल यहूदियों के लिए जलाकर, अन्यजातियों को अनेक युगों तक अज्ञान के अन्धकार में भटकने दिया; और अन्त में यह विशेष वरदान और आशीष कलीसिया से प्रतिज्ञात किया गया: "परन्तु यहोवा तुझ पर उदय होगा; और उसकी महिमा तुझ पर प्रकट होगी" (यशायाह 60:2)। अब पिगियस, यदि कर सके, तो घमण्ड करे कि परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्य उद्धार पाएँ! पवित्रशास्त्र पर आधारित उपर्युक्त तर्क सिद्ध करते हैं कि उद्धार के सिद्धान्त का बाहरी प्रचार भी, जो आत्मा के प्रकाश से बहुत ही निम्न है, परमेश्वर की ओर से सब मनुष्यों के लिए सामान्य नहीं किया गया था।

प्रेरित के इस स्थल (1 तीमुथियुस 2:4) को पेलागियों ने बहुत पहले आगे बढ़ाया था, और अपनी सारी शक्ति से हमारे विरुद्ध प्रयोग किया था। इसके उत्तर में अगस्तीन ने अपनी रचनाओं के अनेक भागों में जो कहा, उसे वर्तमान अवसर पर आगे लाना मैं आवश्यक नहीं समझता। मैं केवल एक अंश उद्धृत करूँगा, जो स्पष्ट और संक्षेप में प्रमाणित करता है कि उसने अब विचाराधीन उनकी आपत्ति को कैसी निश्चिन्तता से तुच्छ जाना। "जब हमारा प्रभु शिकायत करता है (वह कहता है) कि यद्यपि वह यरूशलेम के बच्चों को ऐसे इकट्ठा करना चाहता था जैसे मुर्गी अपने चूज़ों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठा करती है, परन्तु उसने न चाहा, तो क्या हम यह समझें कि परमेश्वर की इच्छा कुछ दुर्बल मनुष्यों से हार गई, ऐसे कि वह जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर था वह नहीं कर सका जो उसने करना चाहा या इच्छा की? यदि ऐसा है, तो उस सर्वसामर्थ्य का क्या होगा जिससे उसने 'जो कुछ उसे स्वर्ग में और पृथ्वी पर भाया वही किया'? और फिर, ऐसा अपवित्र रूप से पागल कौन मिलेगा जो कहे कि परमेश्वर मनुष्यों की बुरी इच्छाओं को, जिसे वह चाहे, जब चाहे और जैसे चाहे, भली इच्छाओं में नहीं बदल सकता? अब, जब वह ऐसा करता है, तो दया से करता है; और जब नहीं करता, तो न्याय से नहीं करता।"

जो गाँठ ठीक हमारे सामने है, मैं मानता हूँ कि वह अभी खुली नहीं। फिर भी मैंने पिगियस से इतना तो निकलवा लिया है: कि सामान्य बोध और सामान्य विवेक से रहित मनुष्य के सिवाय कोई यह विश्वास नहीं कर सकता कि उद्धार परमेश्वर की गुप्त युक्ति से सब मनुष्यों के लिए समान रूप से और बिना भेद के ठहराया गया था। परन्तु विचाराधीन स्थल में पौलुस का सच्चा अर्थ हर उस व्यक्ति को पूर्णतः स्पष्ट और बोधगम्य है जो विवाद पर अड़ा नहीं है। प्रेरित समझा रहा है कि सब गम्भीर "विनती, प्रार्थना, निवेदन और धन्यवाद सब मनुष्यों के लिए किए जाएँ: राजाओं और सब ऊँचे पदवालों के लिये।" और क्योंकि उस युग में कलीसिया के ऐसे बहुत-से और इतने क्रोधी और कटु शत्रु थे, पौलुस, कि निराशा विश्वासियों की प्रार्थनाओं में बाधा न बने, उनके कष्टों से मिलने को शीघ्रता करता है और उनसे गम्भीरता से बिनती करता है कि "सब मनुष्यों" के लिए, और विशेषकर "सब ऊँचे पदवालों" के लिए प्रार्थना में लगे रहें। "क्योंकि (प्रेरित कहता है) परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो।" कौन नहीं देखता कि प्रेरित यहाँ व्यक्तियों के बजाय मनुष्यों के वर्गों की बात कर रहा है? वास्तव में, टीकाकार यहाँ जो भेद करते हैं वह बड़े कारण और सार के बिना नहीं है; कि पौलुस का तात्पर्य यहाँ व्यक्तियों की जातियों से है, जातियों के व्यक्तियों से नहीं। जो भी हो, कि यहाँ परमेश्वर की कोई और "इच्छा" नहीं समझी जानी चाहिए सिवाय उसके जो सुसमाचार के बाहरी प्रचार से प्रकट की गई है, यह सन्दर्भ से निर्विवाद रूप से प्रकट है। इसलिए प्रेरित का सीधा अर्थ यह है कि परमेश्वर सामान्य रूप से विचारे गए सब मनुष्यों का उद्धार "चाहता" है, जिन्हें वह इसलिए दया से वचन के खुले प्रचार द्वारा मसीह के पास बुलाता, या न्योतता है।

परन्तु पिगियस "व्यक्तियों के पक्षपात" के मैदान पर मुझसे फिर युद्ध छेड़ता है। और क्योंकि लिखा है कि परमेश्वर के यहाँ "व्यक्तियों का पक्षपात नहीं," वह तुरन्त इससे यह निष्कर्ष निकालता है कि सब मनुष्य परमेश्वर को समान रूप से प्रिय हैं। मैंने उसे उत्तर तो दिया था, यह तर्क करते हुए कि पवित्रशास्त्र में "व्यक्तियों" शब्द से मनुष्यों से जुड़ी वे सब बाहरी परिस्थितियाँ सूचित होती हैं, जो बाहरी परिस्थितियाँ सब का महान कारण नहीं समेटतीं, परन्तु कुछ मनुष्यों के लिए कृपा दिलाती हैं और औरों पर घृणा और तिरस्कार लादती हैं। पिगियस, तथापि, गरजता है कि शब्द की यह व्याख्या किसी भी कथन या कल्पना से परे बेतुकी है। परन्तु यदि इस विषय पर मत लिया जाए, तो मुझे पूरा सन्तोष है कि विचाराधीन शब्द की मेरी व्याख्या में कलीसिया के अत्यन्त प्रतिष्ठित अनेक पुरुष साथी और अगुवे दोनों के रूप में मेरे साथ होंगे। वर्तमान अवसर के लिए मेरी व्याख्या का एक आधार पर्याप्त हो। इब्रानी भाषा में संज्ञा PANIM है, जिसका वही अर्थ है जो लातीनी बहुवचन संज्ञा Facies का, जिसका अर्थ "चेहरे" या "रूप" है। इब्रानी संज्ञा PANIM का प्रयोग तब होता है जब न्यायियों को मना किया जाता है कि वे न्याय में "व्यक्तियों का पक्ष लें।" उसी शब्द का प्रयोग तब होता है जब मूसा साक्षी देता है कि "यहोवा किसी का पक्षपात नहीं करता, न घूस लेता है" (व्यवस्थाविवरण 1:17; 10:17)। यही संज्ञा अय्यूब के इतिहास में भी बार-बार प्रयुक्त है। अब मैं पूछता हूँ, इस शब्द से सब प्रकार के बाहरी रूपों (जैसा हम उन्हें प्रायः कहते हैं) के सिवाय और क्या समझा जा सकता है, जिनके द्वारा हम प्रायः उस वास्तविकता से, जिससे वे जुड़े हैं, भटक जाते हैं? इसी प्रकार प्रेरित, जब दासों और स्वामियों, यहूदियों और अन्यजातियों, कुलीनों और अनजानों, ऊँचे और नीचों की बात करते हैं, तो यूनानी शब्द provswpon का प्रयोग उस उत्कृष्टता के बाहरी रूप को सूचित करने के लिए करते हैं जो कुछ लोगों में दूसरों से बढ़कर होता है, और जो प्रायः ऐसे व्यक्तियों में या उनके प्रति जो उचित और ठीक है उसे स्पष्ट दिखने से रोकता है। इसी से मसीह o;yi;n (अर्थात् "रूप") के अनुसार न्याय करने को धर्ममय न्याय के विपरीत ठहराता है। मानो उसने कहा हो, जहाँ कहीं मनुष्यों की कृपा या घृणा का शासन है, वहाँ यह हो नहीं सकता कि ऐसा पक्षपात सब निष्पक्षता और धार्मिकता को बिगाड़ न दे।

इसलिए हर कोई तुरन्त देख लेगा कि पिगियस, सत्य के विरुद्ध घृणा की उन्मत्त ढिठाई में बहकर, परवाह नहीं करता था कि वह क्या कह रहा है। परन्तु अब आओ, हमारी व्याख्या के इस सुधारक की बात सुनें। वह "व्यक्तियों का पक्षपात" को ऐसा दोष घोषित करता है जो न्याय के प्रशासन में स्थान रखता है। इससे वह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर व्यक्तियों का पक्षपाती नहीं है, क्योंकि वह सब मनुष्यों के प्रति निष्पक्ष है, और क्योंकि जैसा सार्वजनिक न्याय और सार्वजनिक भलाई के वितरक को शोभा देता है, वह स्वाभाविक रूप से अपने को निष्पक्ष उदार और हितैषी दिखाता है। पिगियस ऐसे बकवास करता है, पवित्रशास्त्र की ज्योति पर बुझानेवाला ढक्कन डालता हुआ, और जो भी बात उसके अपने सत्यहीन सिर में सबसे पहले आए वही बड़बड़ाता हुआ। क्योंकि सारा पवित्रशास्त्र मेरी व्याख्या और दृष्टिकोण की पुष्टि करता है; न मेरा विरोधी अपनी बेतुकी गढ़न्त को प्रमाणित करने के लिए एक भी स्थल प्रस्तुत करता है। और आश्चर्य ही क्या, जब वह अपने उन्मत्त स्वप्नों को इतने विश्वास और निश्चिन्तता से प्रस्तुत कर सकता है, जबकि उसने उस शब्द के अर्थ को भी नहीं तौला जिस पर वह इतनी व्यर्थ बातें कर रहा है। और मैं समझता हूँ कि सारे व्याकरण और बुद्धि को तुच्छ जानकर इस प्रकार शब्दों को उँडेलना स्वयं को बड़ा धर्मशास्त्री दिखाने के लिए है! उसके लिए "व्यक्ति" (persona) का अर्थ "मनुष्य" के सिवाय न कम है न अधिक। जबकि यह हर समय स्पष्ट से भी अधिक स्पष्ट है कि "व्यक्ति" से एक बाहरी गुण सूचित होता है, जिसे धारण करके, या जिससे ढके होकर, मनुष्य कृपा और सम्मान के योग्य माने जाते हैं या न्यायपूर्वक तिरस्कार के पात्र ठहरते हैं। परन्तु परमेश्वर समान और निष्पक्ष वितरक है या नहीं, इस पर हम समझते हैं कि मसीह की साक्षी पिगियस की साक्षी से कहीं अधिक विश्वास के योग्य है। हमारा प्रभु तब धन्य परमेश्वर को घर के स्वामी के व्यक्ति या रूप में प्रस्तुत करके यों कहता है, "क्या मुझे अपनी वस्तुओं के साथ जो मैं चाहूँ वह करने का अधिकार नहीं? क्या तू इसलिए बुरी दृष्टि से देखता है कि मैं भला हूँ?" हमारे प्रभु के इसी तर्क के अनुसार, पौलुस, उपासनीय परमेश्वर को ऐसा दिखाने के लिए जो किसी के प्रति बँधा और उत्तरदायी नहीं, और जिसे कोई व्यक्ति या वस्तु "अपनी ही इच्छा के अनुसार" अनुग्रह बाँटने से नहीं रोकती, अपना तर्क इस प्रश्न से समाप्त करता है: "या किस ने पहले उसे दिया है जिसका बदला उसे दिया जाए?"

अब, पहली बात यह कि यदि इस मनुष्य पिगियस में परमेश्वर के भय का एक दाना भी होता, तो क्या वह कभी परमेश्वर को इस ढिठाई से व्यवस्था में बाँधने का साहस करता? क्योंकि वह परमप्रधान के लिए नियम के रूप में निश्चयपूर्वक ठहराता है कि उसे अपनी उदारता सब पर समान रूप से बढ़ानी चाहिए, जैसे सार्वजनिक कोष से। इस प्रकार परमेश्वर के पास अपनी स्वतंत्र हितैषिता चलाने के लिए कुछ नहीं छोड़ता। परमेश्वर (पिगियस कहता है) प्रत्येक व्यक्ति का न्याय उसकी योग्यता, गुण और कामों के अनुसार करता है, अपनी सुइच्छा के अनुसार नहीं। तो फिर परमेश्वर ने उनमें किस गुण के कारण अब्राहम के घराने को चुना? उसने उस वंश में कौन-सी योग्यता पाई जिसने उसे उन्हें शेष सारे जगत से ऊपर रखने को प्रेरित किया? परमेश्वर स्वयं इसके सिवाय कोई कारण नहीं बताता कि "उसने उनके पूर्वजों से प्रेम किया।" यह वह अन्यत्र और स्पष्ट शब्दों में कहता है: "देख, आकाश और आकाशों का आकाश, पृथ्वी भी और जो कुछ उसमें है, सब तेरे परमेश्वर यहोवा का है। तौभी यहोवा ने केवल तेरे पूर्वजों से स्नेह करके उनसे प्रेम किया, और उनके पीछे उनके वंश को, अर्थात् तुम को, सब जातियों से बढ़कर चुन लिया" (व्यवस्थाविवरण 10:14, 15)। एक और स्थान में, परमेश्वर अब्राहम और उसके सारे घराने को मूर्तिपूजक घोषित करके उनके सब गुणों को शून्य कर देता है: "और यहोशू ने लोगों से कहा, इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, तुम्हारे पूर्वज, अर्थात् अब्राहम और नाहोर का पिता तेरह, प्राचीन काल में महानद के उस पार रहते थे: और वे दूसरे देवताओं की उपासना करते थे। और मैं तुम्हारे पिता अब्राहम को महानद के उस पार से ले आया, और उसे कनान के सारे देश में फिराया, और उसका वंश बढ़ाया और उसे इसहाक दिया" (यहोशू 24:2, 3)। उपर्युक्त स्थलों से, जो भी हो, मुझे वह मिलता है जिसका पिगियस इनकार करता है: कि परमेश्वर की प्रभुता-सम्पन्न सुइच्छा का मूसा द्वारा स्पष्ट प्रचार किया गया था। परन्तु हमारा विरोधी इससे इनकार करता है कि एक के चुने जाने और दूसरे के छोड़े जाने का परमेश्वर की प्रभुता-सम्पन्न आज्ञा पर निर्भर होना, और दावा करता है कि वह मनुष्यों की प्रवृत्तियों पर निर्भर है। तब इसका क्या अर्थ है, "कि परमेश्वर की युक्ति जो चुनाव के अनुसार है, कर्मों के कारण नहीं, परन्तु बुलानेवाले के कारण बनी रहे, उस से कहा गया, बड़ा छोटे का दास होगा"? (रोमियों 9:11, 12।) परन्तु पिगियस आगे जो ईश-निन्दा उगलता है वह घृणित है: "परमेश्वर (वह दावा करता है) न केवल अन्यायी, परन्तु क्रूर बनाया जाता है, यदि उसे किसी भी मनुष्य को विनाश के लिए ठहराते हुए दिखाया जाए।" पिगियस, तथापि, एक दिन उस परमेश्वर के न्याय-आसन के सम्मुख खड़ा होगा जिसके विषय में पौलुस घोषित करता है, "कि वह क्रोध के पात्रों पर, जो विनाश के लिये तैयार हुए हैं, अपनी सामर्थ्य प्रगट करेगा।" वरन् हमारा विरोधी अब भी, उस अनन्त विनाश की अनुभूति में जो उसकी बाट जोहता है, अनुभव कर रहा है कि परमेश्वर मनुष्यों की धारणाओं या विचारों से गढ़ा गया कोई प्राणी नहीं है, परन्तु वह सारे जगत का अनन्त न्यायी था, है, और रहेगा। यह अभागा मरणशील (मैं कहता हूँ) अब भी अनुभव कर रहा है कि यह वचन कितना सच है, "कि जब तेरा न्याय किया जाए तब तू जीत जाए" (भजन संहिता 51:4)।

तथापि, मैं यह मानने को तैयार हूँ कि भक्तिपूर्ण और सीधा जीवन कभी-कभी "व्यक्ति" (persona) के विपरीत रखा जाता है, जैसे जब पतरस कहता है, "अब मुझे निश्चय हुआ कि परमेश्वर किसी का पक्ष नहीं करता (proswpolhvpth")परन्तु हर जाति में जो उससे डरता और धर्म के काम करता है, वह उसे भाता है" (प्रेरितों के काम 10:34, 35)। परन्तु जो इस पवित्रशास्त्र को हमारे विरुद्ध लाना चाहते हैं उन्हें उत्तर यह है कि परमेश्वर अपनी सन्तान को जो कुछ भी वरदान देता है उसे वह स्वीकार करता और उससे प्रसन्न होता है, जबकि मनुष्य के सारे नैतिक स्वभाव में वह ऐसा कुछ नहीं पाता जो उसकी धर्ममय घृणा के योग्य न हो। इसलिए, कि परमेश्वर के पास ऐसे उपासक हों जिनसे वह प्रेम करे, उसे, जब वे अभी सब भलाई से रहित हैं, पहले उन्हें उनकी अयोग्यता के बीच अपना सेंत-मेंत प्रेम देना होगा, और इस प्रकार उन्हें सेंत-मेंत वह देना होगा जिससे वह बाद में स्वयं प्रेम करे। "परन्तु यह पहला (या पूर्ववर्ती) अनुग्रह वह जिसे चाहता है देता है (अगस्तीन कहता है), क्योंकि वह दयालु है, और यदि वह यह अनुग्रह न दे, तो वह न्यायी है। और जहाँ वह इसे नहीं देता, वहाँ इसलिए कि वह इसे देना नहीं चाहता, ताकि वह दया के पात्रों पर अपनी महिमा का धन प्रकट करे।' और जब पतरस कहता है कि परमेश्वर 'किसी का पक्ष नहीं करता,' तो वह अध्याय के अन्त में दिखाता है कि इससे उसका क्या तात्पर्य है, अर्थात् कि परमेश्वर कभी-कभी उनकी सन्तान को छोड़कर जो उसकी उपासना करते हैं, त्यागे हुओं की सन्तान को विनाश से छुड़ाता है।" और अगस्तीन इस महान विषय पर आगे जो कहता है वह स्मरण रखने के पूरी तरह योग्य है: "पूर्वनियति को देखने के लिए इस धन्य मध्यस्थ से अधिक महिमामय दर्पण और कोई नहीं (वह कहता है), जिसने अपनी मानवीय प्रकृति के अनुसार, उस रूप में विचारे जाने पर, "परमेश्वर का इकलौता पुत्र" होने का सम्मान अपने किसी गुण के कारण नहीं पाया।" परन्तु परमेश्वर की यह सुइच्छा, जिसे परमेश्वर स्वयं कलीसिया के सिर मसीह में हमारे आश्चर्य के लिए हमारे सामने रखता है, पिगियस उसकी देह के अलग-अलग अंगों में भी स्वीकार या सहन नहीं करेगा। वरन् वह तर्क देता है कि मसीह की धन्य माता अपने ही गुण के कारण चुनी गई थी, जैसा (वह कहता है) उसके अपने गीत से प्रमाणित होता है, "उसने अपनी दासी की दीनता पर दृष्टि की है।" पिगियस के ये प्रमाण हैं कि परमेश्वर का चुनाव मनुष्यों के गुणों पर आधारित है, और वह प्रभुता-सम्पन्न और स्वतंत्र नहीं है, क्योंकि उसने मरियम के विषय में वह चुना जो तुच्छ और घृणित था!

इसी ईश्वरीय सिद्धान्त पर पिगियस की प्रस्तुत एक और आपत्ति भी बिखर जाती है: "जब मसीह (वह कहता है) अपने पिता के धन्य लोगों को राज्य के अधिकारी होने के लिए बुलाता है, तो वह उनके चुने जाने को उस विरासत पर उनके अधिकार का कारण नहीं बताता, परन्तु इसलिए कि उन्होंने दया के काम किए थे" (मत्ती 25:34-36)। अब मैं मनुष्यों को परमेश्वर के गुप्त चुनाव की ओर किसी भी प्रकार नहीं हाँकूँगा कि वे वहाँ से खुले मुँह उद्धार की बाट जोहें; परन्तु मैं उन्हें समझाऊँगा कि वे सीधे मसीह की ओर भागें, जिसमें उद्धार हमारी आँखों के सामने प्रस्तुत है, जो उद्धार, यदि मसीह में प्रकट न होता, तो सदा "परमेश्वर में छिपा" रहता। क्योंकि जो कोई विश्वास के सीधे मार्ग में नहीं चलता, उसके लिए परमेश्वर का चुनाव विनाश की भूलभुलैया के सिवाय कुछ नहीं हो सकता। इसलिए, यदि हम अपने पापों की निश्चित क्षमा का आनन्द लेना चाहें, यदि हमारे विवेक अनन्त जीवन के पक्के भरोसे में विश्राम पाएँ, यदि हम परमेश्वर को अपने स्वर्गीय पिता के रूप में निडर पुकारें, तो हमें किसी भी प्रकार अपना आरम्भ इस खोज से नहीं करना चाहिए कि जगत की उत्पत्ति से पहले परमेश्वर ने हमारे विषय में क्या ठहराया। हमारा चिन्तन यह होना चाहिए कि परमेश्वर ने अपने पितृ-प्रेम से हम पर मसीह में क्या प्रकट किया है, और मसीह स्वयं अपने सनातन सुसमाचार के द्वारा हमें प्रतिदिन क्या सुनाता है। हमारी सबसे गहरी खोज और सबसे ऊँचा लक्ष्य यह होना चाहिए कि हम परमेश्वर के पुत्र बनें, और जानें कि हम वैसे हैं। परन्तु सेंत-मेंत गोद लेने का दर्पण, जिसमें हम ऐसी ऊँची और अवर्णनीय आशीष को देख सकते हैं, पुत्र मसीह है, जो पिता की ओर से हमारे पास उतर आया, इसी उद्देश्य से कि हमें अपनी देह में कलम लगाकर हमें स्वर्ग के राज्य का उत्तराधिकारी बनाए, जिस राज्य का वह स्वयं बयाना और प्रतिभूति है। और जैसे यह विरासत एक बार हमारे लिए मसीह के लहू से प्राप्त की गई, और सनातन सुसमाचार के पवित्र पन्नों में हमें सौंपी हुई है; वैसे ही उसका ज्ञान और अधिकार विश्वास के सिवाय किसी और रीति से प्राप्त नहीं हो सकता।

संक्षेप में, मैं अब न केवल खुलकर मानता हूँ, परन्तु अपनी सब रचनाओं में सर्वत्र सिखाता हूँ कि मनुष्यों का उद्धार उनके विश्वास से अविभाज्य रूप से जुड़ा है, और कि मसीह ही एकमात्र द्वार है जिससे कोई मनुष्य स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है, और यह भी कि शान्त शान्ति सुसमाचार के सिवाय कहीं नहीं मिल सकती। मैंने, इसके अतिरिक्त, सदा सिखाया है कि जो कोई मसीह के सुसमाचार से, और उसमें विश्वास से, सबसे छोटा कदम भी हटेगा, वह सन्देहों, अनिश्चितताओं और उलझनों में खो जाने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता; और कि जो कोई सुसमाचार और उसमें विश्वास के बिना परमेश्वर की गुप्त युक्ति के उन गहन भेदों में जितने अधिक विश्वास से घुसने और भेदने का प्रयास करेगा, वह ऐसा करते हुए परमेश्वर से उतना ही दूर और दूर होता जाएगा। इसलिए, कि परमेश्वर की सन्तान, सब जगत से पहले परमेश्वर द्वारा चुने जाने के बावजूद, विश्वास से चलें, इसका मैं इनकार नहीं करता, वरन् निरन्तर पुष्टि करता हूँ।

इसलिए, इन्हीं सिद्धान्तों पर हमारे विरोधी का हमारे विरुद्ध खड़ा किया हुआ एक और तर्क दूर हो जाता है, जब वह कहता है "कि परमेश्वर अन्तिम दिन अपने आत्मा के उन वरदानों को मुकुट पहनाएगा जो उसने अपने चुने हुओं को इस वर्तमान जीवन में दिए होंगे।" परन्तु इससे उस सत्य और तथ्य में कोई अन्तर नहीं पड़ता कि परमेश्वर उन्हें, जिन्हें उसने मसीह में चुना है, विश्वास के द्वारा और अपने आत्मा के पवित्रीकरण के द्वारा अपनी देह में कलम लगाता है। न उस सत्य में अन्तर पड़ता है कि वह अपने ठीक समय पर उन्हें बुलाता और धर्मी ठहराता है जिन्हें उसने जगत की उत्पत्ति से पहले इन आशीषों के लिए पूर्वनियत किया था। इसलिए पौलुस परमेश्वर के इन दोनों कार्यों को अति सुन्दर रीति से जोड़ता है, जहाँ वह कहता है, "हम जानते हैं कि जो परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं;" जिसमें वह तुरन्त जोड़ता है, "अर्थात् उनके लिये जो उसकी युक्ति के अनुसार बुलाए हुए हैं" (रोमियों 8:28)। तो यही वह रीति है जिससे परमेश्वर अपनों को चलाता है। यही वह ढंग है जिससे वह उनमें अपने अनुग्रह का कार्य पूरा करता है। परन्तु वह उन्हें इस प्रकार हाथ क्यों थामता है, इसका एक और कहीं ऊँचा कारण है, अर्थात् उसका अनन्त उद्देश्य, जिससे उसने उन्हें अनन्त जीवन के लिए ठहराया। इसलिए पिगियस की ढिठाई और भी हास्यास्पद है; क्योंकि वह पवित्रशास्त्र की एक साक्षी को, जो इस प्रकार सीधे उसके विरुद्ध खड़ी है, अपने प्रयोजन के लिए अत्यन्त ढिठाई से हथियाने में नहीं झिझकता। क्योंकि पहली बात, वह बेतुके ढंग से हमें स्मरण दिलाएगा कि यह नहीं कहा गया कि सब बातें चुने हुओं या प्रियों के लिए "मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं।" परन्तु वह दावा करता है कि एक भिन्न कारण बताया गया है, अर्थात् कि इसलिए कि उन्होंने परमेश्वर से प्रेम किया। जबकि प्रेरित जानबूझकर इस विषय में सब सम्भव भूल का सुधार यह जोड़कर करता है कि "जो उसकी युक्ति के अनुसार बुलाए हुए हैं," ताकि कोई "सब बातों के अपनी भलाई के लिए कार्य करने" को अपने गुण का फल न ठहराए।

वास्तव में, इस स्थल में प्रेरित का मन पहले यह दिखाना है कि विश्वासियों को, जिनके लिए परमेश्वर "सब बातों को मिलकर भलाई" के लिए कार्य कराता है, उसके प्रति कैसा भाव रखना चाहिए—कि उन्हें "परमेश्वर से प्रेम" रखना चाहिए। और परमेश्वर से प्रेम सचमुच परमेश्वर द्वारा "बुलाए जाने" का एक विशेष पहला फल है। परन्तु ताकि जो इस प्रकार "बुलाए" गए हैं वे अपने आप से और अपने गुणों से न चिपकें, पौलुस उन्हें यह भी सिखाता है कि उनके उद्धार का, और "सब बातों के उनकी भलाई के लिए कार्य करने" का वास्तविक स्रोत उनसे कहीं ऊँचे स्थित है—स्वयं स्वर्ग में और परमेश्वर के अनन्त उद्देश्य में, अर्थात् इसलिए कि वे पहले परमेश्वर द्वारा चुने गए थे, और इसलिए "उसकी युक्ति के अनुसार बुलाए हुए" थे। इस गाँठ को भी पिगियस सोचता है कि वह एक ही वाक्य से खोलकर निपटा सकता है, जो निश्चय ही एक गम्भीर परिहास है। वह कहता है कि परमेश्वर सब मनुष्यों को पवित्रता के लिए "बुलाता" है। जबकि प्रेरित अत्यन्त स्पष्ट रूप से "बुलाहट" को परमेश्वर के निरपेक्ष "उद्देश्य" से ही प्रभावकारी ठहराता है: "जो उसकी युक्ति के अनुसार बुलाए हुए हैं (प्रेरित कहता है)।" इन सत्यों पर, जो इतने प्रमुख और उभरकर स्पष्ट हैं, पिगियस ऐसा घना अन्धकार फैलाना चाहेगा कि उनकी पारदर्शी स्पष्टता मुश्किल से दिखे। उदाहरण के लिए, पवित्रशास्त्र के इस स्थल से अधिक स्पष्ट और क्या हो सकता है? "फिर जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी" (रोमियों 8:30)। अब, हमारा विरोधी प्रेरित पौलुस के इस वाक्य को जितना चाहे चीरे और फाड़े, वह इसे कभी इतना नहीं खींच सकता कि यह सारी मानव जाति तक पहुँचे। इससे उन सब के तर्कों की चरम मूर्खता प्रकट है जो विश्वास और भले कामों को उसके स्थान पर रखकर परमेश्वर के चुनाव को उलटने का परिश्रम करते हैं। यह "बेटी को माँ को निगलवाना" (जैसा पुरानी कहावत है) बनाना, या बनाने का प्रयास करना है।

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