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वे सब अपराध जो किसी भी मनुष्य के द्वारा किए जाते हैं
अनुच्छेद IV.
(अर्थात् अपवाद IV.)
"वे सब अपराध जो किसी भी मनुष्य के द्वारा किए जाते हैं, परमेश्वर की क्रिया से भले और न्यायसंगत हैं।"
अपवादी की
टिप्पणियाँ और कथन
अनुच्छेद IV. पर
इस चौथे अनुच्छेद के विरुद्ध तेरे सब विरोधी यशायाह 5:20 का वह पद ऊँचे स्वर से सुनाते हैं: "हाय उन पर जो बुरे को भला और भले को बुरा कहते हैं।" अब यदि पाप परमेश्वर का भला और धर्ममय कार्य है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि धार्मिकता परमेश्वर का बुरा और अधर्ममय कार्य है, क्योंकि धार्मिकता पाप के सर्वथा विपरीत है। फिर, यदि पाप धर्ममय है, तो यह निकलता है कि अधर्म धर्ममय है, क्योंकि पाप अधर्म है। और आगे, यदि पाप परमेश्वर का कार्य है, तो (तेरे विरोधी तर्क करते हैं) यह भी मानना पड़ेगा कि परमेश्वर वही करता है जो पापमय है।
अनुच्छेद IV. का जॉन कैल्विन द्वारा उत्तर,
और अपवादी की टिप्पणियों और कथनों का भी,
इस चौथे अनुच्छेद के विषय में भी तू पहले की भाँति घोर झूठ बोलता चला जाता है; और इस बात की मैं आरम्भ में ही अपने पाठकों को सावधानी से चेतावनी देना चाहता हूँ, ताकि वे तेरी घृणित निन्दाओं के बदले मामले की वास्तविकता से अपना निर्णय करें। मैं तेरी आपत्तियों को स्वयं में उतना दोषी नहीं ठहराता, जितना इस बात की क्रोध के साथ शिकायत करता हूँ कि तू मेरे शब्दों को बदलकर और बिगाड़कर, मेरी शिक्षा के विरुद्ध घृणा की आग भड़काने के उद्देश्य से, मेरे कहे हुए को द्वेषपूर्वक तोड़-मरोड़ता है, जबकि मेरी शिक्षा तेरे उस मिथ्या चित्रण से बहुत भिन्न है। तू मुझसे ऐसा झगड़ा करता है मानो मैंने यह कहा हो कि "पाप परमेश्वर का न्यायसंगत, अथवा धर्ममय, कार्य है"; जबकि इस शिक्षा से, और इसके विचार तक से, मैं अपने सब लेखों में अत्यन्त घृणा रखता हूँ। इसलिए तू अपने आप में तर्क की जितनी अधिक चतुराई समझता है, तेरा बचपना वास्तव में उतना ही अधिक है। इस झूठे ढंग से बताए गए चौथे अनुच्छेद पर अपने तर्क में तू इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि धार्मिकता बुरी है और अधर्म भला है; और यह कि परमेश्वर, पाप का रचयिता और (जैसा तू भयानक रीति से कहता है) करनेवाला होकर, उस बात को दण्ड देने में अन्यायी है जो उसी का अपना कार्य है। जबकि ये सब राक्षसी अपवित्र बातें तेरे ही मस्तिष्क की गढ़ी हुई हैं! और ऐसी सब घोर अपवित्रताओं की मैंने अपने सब लेखों में सदा बड़ी सावधानी से, और घृणा के साथ, निन्दा और खण्डन किया है।
तो भी तू स्वयं किसी दिन अपने शोक के साथ जान लेगा कि परमेश्वर के गुप्त भेदों के विषय में इस प्रकार खिलवाड़ करना और झूठ बोलना कितना घृणित अपराध है! और ताकि तू भली-भाँति समझ ले कि सत्य के विरुद्ध अपने इस युद्ध में तेरा सामना मुझसे नहीं, वरन् स्वयं स्वर्ग के सर्वोच्च न्यायी से है, जिसके न्यायासन से तू निश्चय जान कि तू कभी बच नहीं सकता, सुन कि अय्यूब क्या गवाही देता है—और निश्चय ही पवित्र आत्मा की प्रेरणा के अतिरिक्त और किसी प्रभाव के अधीन नहीं—कि शैतान के, और उन लुटेरों के जिन्होंने उसे लूटा, कार्य स्वयं परमेश्वर के कार्य थे। फिर भी अय्यूब कभी, अत्यन्त दूर के विचार में भी, परमेश्वर पर पाप का दोष नहीं लगाता। उस कुलपति में ऐसा कोई दूर का संकेत भी नहीं मिलता। इसके विपरीत, जो कुछ परमेश्वर ने शैतान और उन लुटेरों के द्वारा किया उसके लिए वह परमेश्वर के पवित्र नाम को धन्य कहता है (अय्यूब 1:21)। वैसे ही जब निर्दोष यूसुफ के भाइयों ने उसे इश्माएलियों के हाथ बेच डाला, तब वह कार्य स्पष्टतः अत्यन्त दुष्ट था। परन्तु जब यूसुफ इसे परमेश्वर का कार्य ठहराता है, तो वह परमेश्वर पर पाप का आरोप लगाना तो दूर, उसकी असीम भलाई पर विचार करके उसकी स्तुति करता है, क्योंकि इसी उपाय से उसने उसके पिता के सारे घराने का पालन-पोषण किया (उत्पत्ति 45)। फिर, जब यशायाह घोषणा करता है कि अश्शूरी परमेश्वर के क्रोध की "लाठी" है, जो उसके धर्ममय हाथ में है, जिसके द्वारा वह उसी अश्शूरी के हाथों वह भयानक संहार करने पर था (यशायाह 10:15), तो भविष्यद्वक्ता उस भयंकर विनाश का रचयिता परमेश्वर को ठहराता है, फिर भी परमेश्वर पर पाप का तनिक भी आरोप लगाए बिना, या उसका दूर का विचार तक किए बिना। इसी प्रकार जब यिर्मयाह उन पर श्राप देता है जो परमेश्वर का कार्य ढिलाई से करते हैं (यिर्मयाह 48:10), तो भविष्यद्वक्ता "यहोवा के काम" से उस सारे क्रूर विनाश का अर्थ लेता है जो उनके शत्रुओं ने यहूदियों पर किया। तो जा, उस भविष्यद्वक्ता से विवाद कर, और उससे कह कि उसने परमेश्वर को पाप करनेवाला बना दिया। संक्षेप में, जो कोई पवित्रशास्त्र से थोड़ा भी परिचित है, वह भली-भाँति जानता है कि पवित्रशास्त्र के ऐसे ही स्थलों का एक पूरा ग्रन्थ बन सकता है, जहाँ परमेश्वर को मनुष्यों और जातियों के द्वारा किए गए बुरे और क्रूर कामों का रचयिता, अर्थात् आज्ञा देनेवाला, ठहराया गया है। परन्तु ऐसे सुविदित और स्वतःसिद्ध विषय पर और शब्द खर्च करना सर्वथा व्यर्थ है।
क्या यह परमेश्वर के अनुग्रह का स्पष्ट प्रकाशन नहीं था कि उसने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा? क्या यह मसीह में अनुग्रह का उतना ही आश्चर्यजनक प्रदर्शन नहीं था जब उसने अपने आप को सौंप दिया? तो अब क्या तू सचमुच अपने घृणित और अपवित्र मुँह से यह कहेगा कि परमेश्वर ने अपने पुत्र के क्रूस पर चढ़ाए जाने के इस कार्य को, और उन मनुष्यों को भी जो यह कार्य करते, ठहराकर पाप किया? (प्रेरितों के काम 4:28।) क्या अपने इकलौते पुत्र को सौंप देने का परमेश्वर का कार्य उसमें पाप था? कदापि नहीं! सब भक्त जन इस गाँठ को बड़ी सरलता से खोल लेते हैं, जैसा कि ऑगस्टीन निम्नलिखित स्पष्ट और प्रभावशाली रीति से खोलता है:—
"जब पिता ने पुत्र को सौंप दिया, जब प्रभु ने अपनी देह को सौंप दिया, जब यहूदा ने प्रभु को पकड़वाया, तो उसी एक 'सौंपने' में परमेश्वर धर्मी और मनुष्य दोषी कैसे हुआ? कारण यह था कि उसी एक कार्य में जो परमेश्वर और मनुष्य ने किया, वह अभिप्राय एक-सा नहीं था जिससे परमेश्वर और मनुष्य ने कार्य किया। इसीलिए पतरस बिना किसी झिझक के घोषणा करता है कि पुन्तियुस पीलातुस और यहूदा और यहूदियों के अन्य दुष्ट लोगों ने वही किया 'जो परमेश्वर के हाथ और उसकी युक्ति ने पहले से ठहरा दिया था कि वह हो' (प्रेरितों के काम 4:28), जैसा कि पतरस ने इससे ठीक पहले कहा था, 'वह परमेश्वर की ठहराई हुई युक्ति और पूर्वज्ञान के अनुसार पकड़वाया गया' (अध्याय 2:23)।" अब यदि तू "पूर्वज्ञान" शब्द से मुँह फेर ले, तो "ठहराई हुई युक्ति" शब्दों की निश्चितता तुझे तुरन्त पछाड़ देगी। और पहला पद भी तनिक भी सन्देह नहीं छोड़ता, अर्थात् यह कि पुन्तियुस पीलातुस और यहूदियों और दुष्ट लोगों ने "वही किया जो कुछ परमेश्वर के हाथ और उसकी युक्ति ने पहले से ठहरा दिया था कि वह हो।" अब यदि तेरी समझ ऐसे गहरे भेद और रहस्य को नहीं सँभाल सकती, तो तू प्रेरित पौलुस के साथ आश्चर्य करके यह क्यों नहीं पुकारता, "आहा! कैसी गहराई!" तू क्यों एक उन्मत्त पागल की नाईं उन्हें साहसपूर्वक रौंदता है? यदि तू सीखने का मन रखता, तो मेरे लेखों में इस गम्भीर विषय की ऐसी व्याख्याएँ पाता जो मैं यहाँ दोहरा सकूँ उससे कहीं अधिक विस्तृत हैं। मेरा वर्तमान उद्देश्य केवल तेरी ढिठाई की धार को कुन्द करना है, ताकि वह निर्बलों के मनों को विचलित न करे।
