भाग VII

दुष्ट लोग अपनी दुष्टता के कामों से अपना नहीं, बल्कि परमेश्वर का काम करते हैं

Calvin's Calvinism · John Calvin

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दुष्ट लोग अपनी दुष्टता के कामों से अपना नहीं, बल्कि परमेश्वर का काम करते हैं

अनुच्छेद VII।

(अर्थात् निन्दा VII।)

मनुष्य पाप करते समय जो कुछ भी करते हैं, वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ही करते हैं,

क्योंकि परमेश्वर की इच्छा प्रायः उसकी आज्ञा के

विरुद्ध ठहरती है।

निन्दक के

अवलोकन और कथन।

इस सातवें अनुच्छेद पर आपके विरोधी आपसे यह प्रश्न पूछते हैं: यदि परमेश्वर की इच्छा प्रायः उसकी आज्ञा से भिन्न होती है, तो यह कैसे जाना जाए कि परमेश्वर जिस बात की आज्ञा देता है उसे वह कब चाहता है और कब नहीं चाहता? क्योंकि (वे कहते हैं) यदि कैल्विन यह दावा करता है कि परमेश्वर जिसकी आज्ञा देता है वह सदा किया जाना चाहिए, चाहे परमेश्वर उसे चाहे या न चाहे, तो इससे यह निष्कर्ष निकलेगा कि परमेश्वर इसलिए चाहता है कि उसकी इच्छा का कभी-कभी विरोध किया जाए। क्योंकि यदि परमेश्वर मुझे आज्ञा देता है कि मैं व्यभिचार न करूँ, और फिर भी चाहता है कि मैं व्यभिचार करूँ, और फिर भी मुझे व्यभिचार नहीं करना चाहिए, तो इससे यह निकलता है कि मुझे वही करना चाहिए जो उसकी इच्छा के विपरीत है। क्योंकि जब परमेश्वर इस्राएल की सारी प्रजा को आज्ञा देता है, "तू व्यभिचार न करना," तो क्या उसका अर्थ यह है कि उनमें से कोई भी व्यभिचार न करे, या यह कि कुछ व्यभिचार करें पर दूसरे न करें? हे कैल्विन, इस विषय में तेरे विरोधी तुझसे कोई सीधा उत्तर माँगते हैं। यदि तू उत्तर दे कि परमेश्वर चाहता है कि कुछ लोग व्यभिचार करें, पर साथ ही यह भी चाहता है कि दूसरे न करें, तो तू एक ही आज्ञा में परमेश्वर को अपने ही विरुद्ध ठहरा देगा।

यदि तू अपने विरोधियों के इन तर्कों का उत्तर यह कहकर दे कि परमेश्वर की इच्छा दो प्रकार की है—एक प्रकट और स्पष्ट, दूसरी गुप्त—तो वे आगे पूछते हैं: तब किसने कैल्विन को इस गुप्त इच्छा का ज्ञान कराया? क्योंकि यदि कैल्विन और उसके अनुयायी इस गुप्त इच्छा को जानते हैं, तो वह गुप्त नहीं हो सकती; और यदि वे उसे नहीं जानते, तो जिस बात को वे नहीं जानते उसका दावा करने का साहस वे कैसे करते हैं?

आपके विरोधी फिर पूछते हैं कि जब परमेश्वर अपने लोगों को प्रार्थना करने की आज्ञा देता है, "तेरी इच्छा पूरी हो," तब क्या वह अपनी इच्छा के अनुसार आज्ञा देता है; और जहाँ मसीह भी कहता है, "जो कोई मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और मेरी बहिन, और मेरी माता है" (मरकुस 3:35)? पौलुस का भी यह वचन है, "यदि तू अपने आप को यहूदी कहता है, और व्यवस्था पर भरोसा रखता है, और परमेश्वर के विषय में घमण्ड करता है, और उसकी इच्छा जानता है, और व्यवस्था की शिक्षा पाकर उत्तम से उत्तम बातों को प्रिय जानता है, और व्यवस्था का उपदेशक है" (रोमियों 2:17)। निश्चय ही यहाँ हमारे सामने परमेश्वर की इच्छा है, और वह है जिसकी आज्ञा व्यवस्था में दी गई है; और यदि वह इच्छा भली है (जो निश्चय ही है), तो अनिवार्य रूप से यह निकलता है कि जो उसके विपरीत है वह बुरा है; क्योंकि जो कुछ भले के विपरीत है वह बुरा ही होगा। फिर मसीह का वह स्मरणीय उद्गार भी है, "कितनी बार मैंने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्चों को इकट्ठे करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठे कर लूँ... पर तुम ने न चाहा।" मसीह यहाँ निश्चय ही परमेश्वर की खुली या प्रकट इच्छा की बात कर रहा है, अर्थात् उस इच्छा की जिसे उसने (मसीह ने) स्वयं अनेक प्रकार से समझाया था। अब यदि मसीह के मन में परमेश्वर की कोई और इच्छा थी जो इस इच्छा के विपरीत थी, तो उसका सारा जीवन ही एक विरोधाभास रहा होगा।

अनुच्छेद VII पर जॉन कैल्विन का उत्तर,

और निन्दक के अवलोकनों, कथनों,

आदि-आदि पर।

इस सातवें अनुच्छेद का मुझे कोई भी उत्तर देने की बिलकुल चिन्ता नहीं। मेरी लिखी रचनाओं में वह स्थान मुझे दिखाओ जहाँ मैंने यह कहा है कि "परमेश्वर की इच्छा प्रायः उसकी आज्ञा से भिन्न होती है, या उसकी आज्ञा के विरुद्ध ठहरती है।" ऐसा विचार मेरे मन में कभी आया ही नहीं; स्वप्न में भी नहीं। वरन् इसके ठीक विपरीत, अनेक अन्य समान व्याख्याओं के बीच मैंने ईमानदारी से समझाया और प्रकट किया है कि परमेश्वर की इच्छा कितनी सरल, एकरूप और एक है; यद्यपि परमेश्वर की गुप्त युक्ति और उसकी सामान्य शिक्षा के बीच अनजान और अनुभवहीन लोगों को पहली दृष्टि में कुछ भिन्नता का आभास होता है। परन्तु जो कोई नम्रता, संयम और श्रद्धा के साथ अपने आप को परमेश्वर और उसकी शिक्षा की इच्छा के अधीन कर देता है, वह क्षण भर में देख लेगा और मान लेगा (जहाँ तक मनुष्य की बुद्धि की सामर्थ्य देख और मान सकती है) कि परमेश्वर, जो व्यभिचार और लुचपन को मना करता है, कैसे अबशालोम के दाऊद की पत्नियों के साथ अनाचारपूर्ण संग द्वारा ऊरिय्याह की पत्नी के साथ किए गए दाऊद के व्यभिचार के पाप का दण्ड देता है। परमेश्वर सदा एक ही बात चाहता है, पर प्रायः भिन्न-भिन्न रूपों में। इसलिए, ताकि तुम्हारे झूठों की मलिनता मुझ पर या मेरी शिक्षा पर कोई कीचड़ न उछाले, मेरे पाठक एक ही वाक्य में यह गम्भीर घोषणा स्वीकार करें: कि परमेश्वर की दो इच्छाओं के विषय में जो बात तुम मेरे मुँह पर मढ़ते हो कि मैंने उसका प्रचार किया है, वह पूरी तरह तुम्हारी अपनी गढ़ी हुई कल्पना है। क्योंकि जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैंने सदा यही घोषित किया है कि परमेश्वर की गुप्त या छिपी हुई युक्ति और उसकी शिक्षा की खुले रूप से प्रकट वाणी के बीच परम सिद्ध, ईश्वरीय और पूर्ण सामंजस्य है।

अगस्तीन ने तो अपने विरोधियों को रियायत देने और समझाने के लिए परमेश्वर की दोहरी इच्छा, या भिन्न-भिन्न इच्छाओं का उल्लेख अवश्य किया—एक गुप्त इच्छा और एक खुली या प्रकट इच्छा—परन्तु उसने उस दोहरी इच्छा को इस प्रकार प्रस्तुत किया कि वे एक-दूसरे के साथ ऐसे पूर्ण सामंजस्य में दिखें कि "अन्तिम दिन" अत्यन्त महिमा के साथ यह प्रकट कर देगा कि परमेश्वर के कामों और कार्यों के इस बहुरूपी मार्ग में कभी कोई अन्तर, टकराव या विरोध न था, न है, वरन् सबसे ईश्वरीय और अनन्त सामंजस्य और एकता है।

यह गम्भीर सिद्धान्त स्थापित करके और यह अटल स्थिति लेकर, अब यदि तू यही चाहता है तो मैं सत्य के लिए तुझसे तलवार लेकर युद्ध करूँगा। तू इस प्रकार तर्क करता है: "यदि परमेश्वर किसी मनुष्य को वह करने से रोकता है जो वह वास्तव में सदा उससे करवाना चाहता है, या यदि वह मनुष्यों को वह करने की आज्ञा देता है जो वह वास्तव में नहीं चाहता, तो उसे इसी उद्देश्य से आज्ञा देनी चाहिए कि उसकी इच्छा का विरोध किया जाए।" अब तर्क-वितर्क की इस सारी गन्दगी से न मेरा और न मेरी शिक्षाओं का कोई सम्बन्ध है। जिन अपवित्र विचारों का इसमें उल्लेख है उनमें से किसी को भी मैं अपना नहीं मानता। इसके विपरीत, मेरी शिक्षा का सार यह है: परमेश्वर की वह इच्छा, जो उसकी व्यवस्था में प्रकट की गई है, स्पष्ट दिखाती है कि धार्मिकता उसे प्रिय है और अधर्म से उसे घृणा है; और यह भी अत्यन्त निश्चित है कि यदि बुराई करनेवालों के बुरे काम उसे भाते, तो वह उन पर दण्ड की घोषणा न करता। फिर भी इससे परमेश्वर का यह चाहना किसी प्रकार नहीं रुकता कि अपनी गुप्त और अकथनीय युक्ति से वे बातें किसी विशेष अर्थ और रीति से हों, जिन्हें वह फिर भी नहीं चाहता कि हों, और जिन्हें करने से वह मना करता है।

यदि तू यहाँ यह आपत्ति उठाए कि मैं परमेश्वर को अपने ही विरुद्ध ठहराता हूँ, तो मैं बदले में तुझसे पूछूँगा कि क्या यह तेरा अधिकार है कि तू परमेश्वर के लिए कोई विधि या सीमा ठहराए, कि जो कुछ तेरे विवेक और समझ से परे है उसे करने से वह रुका रहे? मूसा ऊँचे स्वर से घोषणा करता है कि "गुप्त बातें हमारे परमेश्वर यहोवा के बस में हैं; परन्तु जो प्रगट की गई हैं वे सदा के लिए हमारे और हमारे वंश के लिए हैं" (व्यवस्थाविवरण 29:29)—अर्थात् जो बातें मनुष्य के जानने के लिए उपयोगी हैं वे व्यवस्था में प्रकट की गई हैं। तो क्या तू परमेश्वर को इसके सिवा कुछ और करने का अधिकार नहीं देगा जिसका कारण तू पूरी तरह समझ और समझा सके? अय्यूब की पुस्तक में परमेश्वर की युक्ति की उस गहराई का, जो मनुष्य की समझने की सब क्षमताओं को निगल जाती है, पूरा वर्णन करने के पश्चात् वह उदात्त वर्णन इस सार्थक संकेत पर समाप्त होता है, "देखो, ये तो उसकी गति के किनारे ही हैं; और उसकी आहट हम कितनी धीमी सुनते हैं!" (अय्यूब 26:14)। पर तू तो परमेश्वर को ऐसी कोई युक्ति अपने पास रखने नहीं देगा जिसे तू वैसे साफ़ न देख सके जैसे अपनी स्वाभाविक आँखों से किसी वस्तु को देखता है। परन्तु यदि तू यह नहीं देख सकता कि जब परमेश्वर अपनी वाणी से तुझे व्यभिचार करने से मना करता है, तब उसकी इच्छा यह है कि तू व्यभिचारी न हो; और फिर भी वही महान परमेश्वर उन्हीं व्यभिचारों में, जिनकी वह निन्दा करता है, अपने धर्मी न्याय प्रकट करता है, और ये धर्मी न्याय वह निश्चय ही अपने पूरे ज्ञान और इच्छा के बिना नहीं करता, तो तू अन्धे से भी बढ़कर अन्धा है।

इस बात को और संक्षेप में यों समझ: परमेश्वर चाहता है कि व्यभिचार न किया जाए, क्योंकि वह विवाह के पवित्र बन्धन को अपवित्र और भंग करना और उसकी धर्मी व्यवस्था का बड़ा उल्लंघन है। परन्तु जहाँ तक परमेश्वर व्यभिचारों को, तथा मनुष्यों के अन्य दुष्ट कामों को, मनुष्यों के पापों पर अपना दण्ड देने के लिए काम में लाता है, वहाँ वह निश्चय ही न्यायी का पद और पवित्र कर्तव्य निभाता है, अनिच्छा से नहीं, वरन् इच्छा से! इसलिए जिन-जिन बातों में कसदियों या अश्शूरियों ने अपनी भयंकर विजयों और भयानक संहारों में क्रूरता की, उन भयावह बर्बरताओं के लिए हम किसी प्रकार उनकी प्रशंसा नहीं करते। वरन् इससे बढ़कर, परमेश्वर स्वयं घोषणा करता है कि वह पीड़ितों और निर्दयता से सताए हुओं का पलटा लेनेवाला होगा; और फिर भी वही धर्मी परमेश्वर अन्यत्र घोषणा करता है कि ये संहार वे बलिदान हैं जो उसने इस प्रकार अपने लिए तैयार किए हैं! (यशायाह 29; 34:6; यिर्मयाह 46:10; यहेजकेल 39।) और क्या तू इससे इनकार करेगा कि परमेश्वर उसे चाहता है जिसे उसने इस प्रकार "बलिदान" के सम्मानित नाम से ऊँचा ठहराया है? इसलिए अपनी नींद से जाग, अपने अन्धेपन से आँखें खोल, और अन्त में मान ले कि परमेश्वर गुप्त और अकथनीय मार्गों से अपने धर्मी न्यायों पर शासन करता और उन्हें चलाता है।

परन्तु तू तर्क की एक चतुराई से, जिसे तू आश्चर्यजनक रूप से बुद्धिमानी समझता है, पूछता है कि जब से परमेश्वर ने मनुष्यों को पहले-पहल व्यभिचार करने से मना किया, तब से उसकी इच्छा यह थी कि सब व्यभिचारी हों या केवल उनमें से कुछ। इसे निश्चित और पक्का उत्तर मान: परमेश्वर सब मनुष्यों से पवित्रता माँगता है, क्योंकि परमेश्वर सब मनुष्यों में पवित्रता से प्रेम रखता है। परन्तु अनुभव स्वयं प्रकट करता है (उन महत्त्वपूर्ण तथ्यों के प्रमाण या उल्लेख में पड़े बिना) कि परमेश्वर के चाहने के भिन्न-भिन्न कारण, हेतु और रीतियाँ हैं। क्योंकि यदि वह सब मनुष्यों के पवित्र होने को समान रूप से और प्रभावकारी ढंग से चाहता, तो वह निःसन्देह सब मनुष्यों को पवित्र बना देता। इसलिए, चूँकि पवित्रता परमेश्वर का एक विशेष दान है, इसलिए तुरन्त और स्पष्ट निष्कर्ष यह है कि जिसकी आज्ञा वह अपने वचन में देता है उसे वह उससे भिन्न रीति से चाहता है जिसे वह अपने नया जन्म देनेवाले आत्मा के द्वारा प्रभावकारी ढंग से करता और पूरा करता है। अतः तेरी अशुद्ध और अपवित्र जीभ के पास परमेश्वर पर असंगति का दोष लगाने का कोई आधार नहीं है। परमेश्वर जिसकी आज्ञा देता या जिससे मना करता है उसमें किसी बात में संदिग्ध या दुविधापूर्ण नहीं है, वरन् दोनों में वह अपने शुद्ध और पवित्र स्वभाव को स्पष्ट प्रकट करता है। और न तू उसकी उस गुप्त और छिपी हुई इच्छा में, जिससे वह मनुष्य के पुत्रों के सब कामों पर शासन करता और उन्हें चलाता है, उसकी इस शुद्धता, पवित्रता और धार्मिकता के विपरीत कुछ पाएगा।

सब पवित्रता के रचयिता परमेश्वर को व्यभिचार अत्यन्त अप्रिय है। फिर भी उसी पवित्र परमेश्वर की इच्छा थी कि दाऊद के व्यभिचार को अबशालोम की अनाचारपूर्ण कामवासना से दण्ड दे। परमेश्वर मनुष्य का लहू बहाने से मना करता है। क्योंकि जैसे वह अपने स्वरूप से अत्यन्त प्रेम रखता है, वैसे ही उसे अपनी सुरक्षा में रखता है। और फिर भी उसने दुष्ट जातियों में से एली के पुत्रों के घातक उठाए, क्योंकि उसकी इच्छा थी कि वे मारे जाएँ; क्योंकि पवित्र इतिहास हमें स्पष्ट और अक्षरशः यही सिखाता है। यदि तेरा अन्धापन तेरे मार्ग में पत्थर की दीवार के समान है, तो भी जिनके पास सचमुच आँखें हैं, वे सब परमेश्वर में पूर्ण पवित्र और सामंजस्यपूर्ण संगति देखते हैं, जब वही ईश्वरीय सत्ता, जो व्यभिचार और हत्या से जहाँ तक वे पाप हैं घृणा करती है, या (जो एक ही बात है) जो व्यभिचार और हत्या के पापों से इसलिए घृणा करती है कि वे उसकी धर्मी व्यवस्था का उल्लंघन हैं, फिर भी जातियों और मनुष्यों की दुष्टताओं को अन्य जातियों और अन्य मनुष्यों की क्रूरताओं और पापों के द्वारा धार्मिकता से दण्ड देने में अपने गुप्त और धर्मी न्याय प्रयोग में लाती है। और जहाँ तक तेरे अपने तीक्ष्ण बुद्धि होने के अभिमान की बात है, जब तू यह प्रश्न पूछता है, "यदि परमेश्वर की कोई गुप्त इच्छा है, तो वह मुझ पर कब और कैसे प्रकट की जाएगी?", तो तेरे इस अधर्मी प्रश्न के उत्तर में कोई कठिनाई नहीं होगी, यदि तू मेरे सामने यह मान ले कि हमें केवल पवित्र आत्मा को ही अपना शिक्षक मानकर चलना चाहिए। क्योंकि यदि पौलुस की साक्षी के अनुसार परमेश्वर "अगम्य ज्योति में रहता है, जिस तक कोई मनुष्य नहीं पहुँच सकता," और यदि वही प्रेरित श्रद्धापूर्वक घोषणा करता है कि "उसकी गतियाँ अगम्य हैं," तो मुझे उसकी उस गुप्त इच्छा पर, जो मेरी समझ से छिपी है, चकित होने और उसकी आराधना करने की स्वतन्त्रता क्यों न मिले? अय्यूब की पुस्तक में परमेश्वर की बुद्धि की सबसे ऊँची स्तुतियों से महिमा की गई है, ताकि नश्वर लोग जानें और मानें कि कोई मानवीय बुद्धि उसे माप नहीं सकती। तो क्या तेरा यह इरादा है कि ऐसे अत्यन्त गुप्त विषय के बारे में जो कुछ कहा जाता है उस सब पर हँसे? क्या तू दाऊद को मूर्खता का दोष लगाएगा कि उसने परमेश्वर के उन न्यायों की गम्भीरता से घोषणा और आराधना की जिन्हें उसने "बड़ा गहिरा सागर" माना? मैं सब भविष्यद्वक्ताओं और सब प्रेरितों से सुनता हूँ कि परमेश्वर की युक्तियाँ समझ से परे हैं। जो कुछ वे सब घोषित करते हैं उसे मैं दृढ़ और निःसंकोच विश्वास से ग्रहण करता हूँ, और जो मैं विश्वास करता हूँ उसे स्वतन्त्रता और निःसंकोच होकर मानता और सिखाता हूँ। फिर परमेश्वर की गुप्त इच्छा के प्रति मेरी यह श्रद्धा मुझ पर दोष और अपराध के रूप में क्यों लगाई जाती है?

और ताकि तू मुझ पर पलटकर यह न कहे कि मैं पवित्रशास्त्र से बिलकुल असंगत उदाहरण और प्रमाण देता हूँ, पौलुस का और मेरा मामला निश्चय ही एक ही है, जो परमेश्वर के गुप्त चुनाव या ठुकराए जाने की बात करते और उसकी बुद्धि के धन और गहराई की, उसके न्यायों की अगम्यता की और उसके मार्गों की अनखोज्यता की आराधना करते हुए भी यह खुलकर कहना नहीं छोड़ता कि परमेश्वर जिस पर चाहता है उस पर दया करता है, और जिसे चाहता है उसे अनन्त विनाश के हवाले करता है। एक शब्द में, मैं तुझसे विनती करता हूँ, उस अटूट असंगति पर अब और आनन्द मत मना जो तूने मेरी शिक्षाओं में खोज निकालने की कल्पना की है। क्योंकि परमेश्वर की गुप्त और छिपी हुई इच्छा के विषय में पवित्रशास्त्र प्रचुर साक्षियाँ देता है। जो कुछ मैंने उनसे सीखा है उसे मैं निर्भय होकर निश्चित और पक्की बात के रूप में कहता और उसकी चर्चा करता हूँ। परन्तु चूँकि मेरी मानवीय बुद्धि इतनी विशाल ऊँचाई तक नहीं उड़ सकती, इसलिए मैं उस भेद की श्रद्धा, भय और काँपते हुए आराधना करता हूँ जो इतना ऊँचा और इतना गहरा है कि स्वर्गदूत भी उसमें प्रवेश नहीं कर सकते। और इसी कारण मैं अपनी रचनाओं में बार-बार यह चेतावनी देता हूँ कि इन गम्भीर विषयों में बुद्धिमानी भरी अनजानता से अधिक अच्छा या सुरक्षित कुछ नहीं! क्योंकि उन लोगों की मूर्खता, जो परमेश्वर के लिखे या अनुमति दिए हुए से बढ़कर बुद्धिमान होने देते हैं या होना चाहते हैं, पागलों के उन्माद से भी बुरी है।

अब तक तुझे दिख गया होगा कि मैं परमेश्वर की उस इच्छा को कितनी निश्चित और पक्की मानता हूँ, जिसके विषय में पवित्रशास्त्र इतना स्पष्ट और पूरा साक्षी देता है, और जो फिर भी इस विषय में इतनी गुप्त और अगम्य है कि परमेश्वर यह या वह क्यों चाहता है, या कैसे चाहता है, इसकी समझ स्वर्गदूतों की बुद्धि भी नहीं पकड़ सकती। सच तो यह है कि तेरा और तुझ जैसे सब लोगों का घमण्ड और ढिठाई तुम सबको इतना उन्मत्त कर देती है कि जिसे तुम समझ नहीं सकते, वरन् अपनी क्षमता से परे जानकर छोड़ने को विवश होते हो, उसे तुम अपनी पूरी शक्ति लगाकर कुछ भी नहीं ठहराने का प्रयत्न करते हो! जहाँ तक तेरे मेरे मुँह पर असंगतियों, विरोधों और विरोधाभासों को मढ़ते रहने की बात है, उन सबका निपटारा मैं सौ बार कर चुका हूँ। और तेरी जो ठठोली मुझे दबा देने का प्रयत्न करती है, वह सब फीकी और निरर्थक होने के कारण मुझे भेद नहीं पाती। और तेरा मुझ पर यह आरोप कि मैं परमेश्वर का अनुकरण करनेवाला हूँ, इसके लिए तू परमेश्वर की बुद्धि का अपने ढीठ और शैतान-जैसे अनुकरण के कारण एक दिन अपनी अनन्त हानि पर जानेगा कि अपनी बुद्धि को ऊँचा करना और उसमें अपने आप को परमप्रधान के बराबर बना लेना क्या होता है। मुझे जो एकमात्र पीड़ा और व्यथा होती है वह तेरी उन्मत्त निन्दाओं से होती है, जिनसे तू परमेश्वर की पवित्र महिमा को अपवित्र करता है; इस अपवित्रीकरण का वह स्वयं अपने ठहराए हुए समय पर निश्चित और पक्का पलटा लेनेवाला होगा।

चूँकि परमेश्वर की इच्छा, जो उसने अपनी व्यवस्था में प्रकट की है, भली है, इसलिए जो कुछ उस व्यवस्था और उस इच्छा के विपरीत है उसे मैं बुरा मानता हूँ। परन्तु जब तू यह हल्ला मचाता है कि परमेश्वर की वह गुप्त और छिपी हुई इच्छा, जिससे वह अपनी "सुइच्छा" के अनुसार "दया के बरतनों" को "क्रोध के बरतनों" से अलग करता है, और जिससे वह दोनों "बरतनों" को जैसा चाहता है काम में लाता है, उसकी व्यवस्था के विपरीत है; जब तू यह कहता है, तब तू अपनी अज्ञानता के घिनौने नाले से अपने ही मस्तिष्क की एक घृणित कल्पना और भयानक झूठ उगलता है।

मैं स्वतन्त्रता से मानता हूँ कि मसीह परमेश्वर की प्रकट इच्छा की बात कर रहा है, जब वह कहता है, "हे यरूशलेम, हे यरूशलेम, कितनी बार मैंने चाहा कि तेरे बालकों को इकट्ठे करूँ, और तुम ने न चाहा।" क्योंकि वह यहूदियों को उसी कृतघ्नता और मन की कठोरता का उलाहना दे रहा है जो उसने पहले मूसा के गीत में दिया था (निर्गमन 15:17 आदि)। और हम भली-भाँति जानते हैं कि परमेश्वर ने सचमुच यहूदी जाति को वे सब आशीषें दीं जो उस गीत के शब्द प्रकट करते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी व्यवस्था देकर, अपनी आराधना की विधियों से, और उन अनेक उपकारों से जो उसने उस प्रजा पर किए और जिनसे उसने उन्हें अपने साथ बाँध लिया, उसने मानो अपने पंखों की छाया से उनकी रक्षा की; और वह आगे भी ऐसा ही करता रहता, यदि उनकी अदम्य हठ और कठोरता उन्हें उससे दूर न खींच ले जाती। इसलिए जब मसीह ने अपनी इच्छा इतनी बार और इतने भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रकट की, और एक हठी जाति को उसकी आज्ञाकारिता में जीतने के लिए बोला, पर सब व्यर्थ गया; तो वह उनकी कृतघ्नता का उलाहना अत्यन्त न्यायसंगत रूप से देता है। क्योंकि तू इन सब बातों को मसीह के जीवन-काल तक ही सीमित करता है, यह तू इन ईश्वरीय बातों के विषय में अपनी सामान्य अज्ञानता के साथ करता है। मानो मसीह सच्चा परमेश्वर नहीं, जिसने आदि से अपने चुने हुए लोगों पर अनुग्रह के पंख फैलाना नहीं छोड़ा था! परन्तु यहाँ तू क्षण भर में यह निष्कर्ष निकाल लेता है कि यदि मसीह में जब वह यरूशलेम को यों सम्बोधित कर रहा था, कोई और गुप्त इच्छा थी, तो मसीह का सारा जीवन असंगत रहा होगा। मानो वाणी और उपकारों से लुभाना, और फिर भी अपने गुप्त आत्मा की प्रेरणा से हृदय को अछूता छोड़ देना, मसीह में भिन्न और विपरीत कार्य थे!

परन्तु ताकि तेरी निन्दा की बेतुकी और व्यर्थता और अधिक स्पष्ट दिखाई दे, मुझे यह प्रश्न बता: मसीह कहाँ शिकायत करता है कि वह परिणाम से भ्रम या धोखे में पड़ा, कि जिस दाख की लता से उसने अंगूरों की आशा की थी, उसने जंगली अंगूर उपजाए? हे आदरणीय शिक्षक और कुशल वक्ता, तेरे पास क्या उत्तर है? क्या तू मसीह को अज्ञानी ठहराएगा, ताकि उसे झूठा न बोलना पड़े? क्या! क्या यहूदियों ने परमेश्वर के उद्देश्यों को पूरी तरह रोक और विफल कर दिया? अरे, तेरे अनुसार तो धन्य परमेश्वर सदा संशय में बैठा रहा कि परिणाम क्या होगा, और वह परिणाम अन्त में उसे पूरी तरह धोखा दे गया और चकित कर गया। नहीं! और यदि तू मसीह की उस बात को, जो वह यरूशलेम की दशा और तथ्य के विषय में कहता है, परमेश्वर के गुप्त पूर्वज्ञान से जोड़ दे, तो भी मामले की स्थिति में कुछ अन्तर नहीं पड़ेगा। परमेश्वर ने अन्यत्र कहा था, "निश्चय वे मेरे नाम का भय मानेंगे" (सपन्याह 3:7), पर वे और अधिक अपने आप को बिगाड़ने में लगे रहे। परमेश्वर ने अपने दिए हुए बड़े दण्डों से कुछ लाभ की आशा की थी, पर बाद में वह शिकायत करता है कि उसकी आशा टूट गई। तो क्या तू सत्य के इस ईश्वरीय जाल से और किसी रीति से नहीं छूट सकता, सिवा परमेश्वर को नियम में बाँधने, और अपने अनन्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसे मनुष्यों की स्वतन्त्र इच्छा पर निर्भर बनाने के? निश्चय ही यह छोटी से छोटी समझ को भी स्पष्ट और प्रत्यक्ष है कि परमेश्वर अपनी प्रजा की दुष्टता की गम्भीरता प्रकट करने के लिए मनुष्य के रूप में और मनुष्यों की रीति पर बोलता है, जब वे शिकायत करते हैं कि उनका सारा परिश्रम व्यर्थ गया, क्योंकि अपेक्षित सफलता में वे पूरी तरह निराश हुए।

यह अत्यन्त निश्चित है कि जिन्हें परमेश्वर प्रभावकारी ढंग से अपने पास इकट्ठा करना चाहता है उन्हें वह अपने आत्मा के द्वारा "खींचता" है, और जो कुछ करना उसके हाथ और उद्देश्य में है, उसे वह अपनी प्रतिज्ञाओं के अनुसार पूरा करेगा। इसलिए जब बहुत से बुलाए हुए उसके पीछे नहीं चलते, तो यह प्रत्यक्ष प्रकट है कि इकट्ठा करने की वह रीति, जिसके निष्फल और निष्प्रभावी होने की मसीह शिकायत करता है, उसके आत्मा के उस प्रभावकारी प्रभाव से युक्त नहीं थी, जिसका वह अन्यत्र बार-बार उल्लेख करता है, जैसे यशायाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा: "वह यहूदा के बिखरे हुओं को इकट्ठा करेगा" (यशायाह 11:12)। फिर, "यहोवा का तेज तुझे इकट्ठा करेगा" (यशायाह 58:8)। फिर, "मैं तेरे वंश को पूर्व से ले आऊँगा, और पश्चिम से तुझे इकट्ठा करूँगा" (यशायाह 43:5)। फिर, "तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारे पीछे-पीछे रक्षा करता चलेगा" (अर्थात् तुम्हें इकट्ठा करेगा) (यशायाह 52:12)। क्योंकि भविष्यद्वक्ता ने ठीक पहले कहा था, "यहोवा ने अपनी पवित्र भुजा को प्रगट किया है," ताकि उसकी सामर्थ्य "सब जातियों के देखते" प्रकट हो (यशायाह 52:10)। इसी कारण भविष्यद्वक्ता थोड़ी देर बाद दोहराता है, "मैंने क्षण भर के लिए तुझे छोड़ दिया था, परन्तु बड़ी दया से मैं तुझे इकट्ठा करूँगा" (यशायाह 54:7)। परन्तु परमेश्वर की आज्ञाओं के विषय में जो मैं पहले कह चुका हूँ, वह मुझे आशा है तेरी सब निन्दाओं का मुँह बन्द करने को पर्याप्त और प्रचुर है। इसलिए यद्यपि परमेश्वर कुछ भी कपट से, या दुविधा से, या बनावटी रूप से आज्ञा नहीं देता, वरन् स्पष्ट और गम्भीरता से घोषणा करता है कि वह क्या चाहता और स्वीकार करता है; फिर भी उसका मन और इच्छा यह है कि उसके चुने हुओं (जिन्हें वह प्रभावकारी ढंग से अपनी आज्ञाकारिता की ओर झुकाता और फेरता है) की ओर से उसे उस आज्ञाकारिता से भिन्न प्रकार की आज्ञाकारिता मिले जो ठुकराए हुए लोग उसे अर्पित करते हैं, जिन्हें वह बाहरी रीति से अपने वचन की वाणी द्वारा अपने पास बुलाता तो है, पर जिन्हें अपने आत्मा से प्रभावकारी ढंग से "खींचने" की कृपा नहीं करता।

सब मनुष्यों की स्वाभाविक हठ और भ्रष्टता एक-सी है; ऐसी कि कोई भी मनुष्य अपनी इच्छा से और स्वेच्छापूर्वक परमेश्वर की आज्ञाकारिता का जूआ अपने ऊपर नहीं लेगा। कुछ लोगों को परमेश्वर आज्ञाकारिता के आत्मा की प्रतिज्ञा देता है; दूसरों को वह उनकी भ्रष्टता में छोड़ देता है। क्योंकि इस विषय में तेरी सारी व्यर्थ बातों के होते हुए भी सच्चाई यह है कि "मांस का हृदय" और "नया हृदय" सब मनुष्यों को बिना भेद के नहीं, वरन् विशेष रूप से चुने हुओं को प्रतिज्ञा किए गए हैं, कि वे परमेश्वर की आज्ञाओं पर चलें। हे आदरणीय शिक्षक और सत्य के न्यायी, इन बातों का तेरे पास क्या उत्तर है? और यदि परमेश्वर मनुष्य-जाति के सारे समूह को अपने पास आने का निमन्त्रण देता है, फिर भी जानते-बूझते और अपनी इच्छा से अधिकांश को अपना आत्मा देने से इनकार करता है, और केवल थोड़ों को अपने आत्मा की गुप्त प्रेरणा और कार्य के द्वारा अपनी आज्ञाकारिता में "खींचता" है, तो क्या इस कारण आराधनीय परमेश्वर पर असंगति का दोष लगाया जाए?

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