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परमेश्वर बुराई करनेवालों को इच्छा देता है
अनुच्छेद XI।
(अर्थात् निन्दा XI।)
परमेश्वर बुराई करनेवालों को इच्छा देता है। वह भ्रष्ट और अनुचित कामनाएँ भी केवल अनुमति के रूप में नहीं, वरन् प्रभावकारी रूप से सुझाता है, और वह भी अपनी ही महिमा के लिए।
इस ग्यारहवें अनुच्छेद के विरुद्ध तेरे विरोधी यों तर्क करते हैं: कैल्विन वास्तव में परमेश्वर को वह बात सौंपता है जो स्पष्टतः शैतान की है, जैसा सारे पवित्रशास्त्र की संयुक्त साक्षी से प्रकट है। इसके अतिरिक्त, यदि परमेश्वर भ्रष्ट और अनुचित कामनाएँ सुझाता है, और फिर भी हमें भ्रष्ट कामनाओं का विरोध करने की आज्ञा देता है, तो उसे हमें निश्चय ही अपना ही विरोध करने की आज्ञा देनी होगी, और इसलिए वह अपने ही विरुद्ध ठहरता है। "हर एक अच्छा दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है" (पवित्रशास्त्र कहता है)। तो क्या भ्रष्ट कामनाएँ भी अच्छे दान माने जाएँ? क्या वे भी ज्योतियों के पिता की ओर से उतरती हैं? याकूब स्पष्ट कहता है कि "न तो कोई परमेश्वर से परीक्षा में पड़ता है, परन्तु हर एक अपनी ही अभिलाषा में खिंचकर और फँसकर परीक्षा में पड़ता है।" और जहाँ तू यह जोड़ता है कि परमेश्वर यह अपनी ही महिमा के लिए करता है, तेरे विरोधी कहते हैं कि ऐसा विचार बेतुका है। नबूकदनेस्सर ने सचमुच परमेश्वर के न्याय और सामर्थ्य का अनुभव किया, जब अपने ही घमण्ड के कारण वह पशु के स्वभाव और आदतों में बदल दिया गया; और उसने इसके लिए परमेश्वर की महिमा की, क्योंकि उसने समझा और स्पष्ट देखा कि परमेश्वर उसमें जितना सामर्थी था उतना ही न्यायी भी।
अनुच्छेद XI पर जॉन कैल्विन का उत्तर
और उस पर निन्दक के अवलोकनों, आदि पर,
यहाँ फिर तू पहले की ही तरह अपने मस्तिष्क से राक्षस गढ़ता और अपनी कल्पना में उनका वध करता चला जाता है, और अपने आप को एक बड़ी विजय पर बधाई देता है जो तू व्यर्थ ही सोचता है कि तूने परमेश्वर के एक निर्दोष सेवक पर पाई है। परन्तु जहाँ तक मेरी रचनाओं में उन स्थानों का सम्बन्ध है जहाँ मैंने इस अनुच्छेद में निहित शिक्षाएँ कही या सिखाई हैं, उन स्थानों को तू नहीं खोज सकता, और कभी नहीं खोज सकेगा। इसलिए, मेरे एक शब्द कहे बिना ही, तेरी निरर्थकता और तेरी ढिठाई दोनों साथ ही धूल में मिल जाती हैं। जहाँ तक हत्याओं, व्यभिचारों, लूटपाट और छल-कपट आदि का सम्बन्ध है, जिनसे दुष्ट लोग अपने आप को अशुद्ध करते हैं, मेरी शिक्षा यह है कि ये सब दुष्टताएँ उनकी अपनी प्रकृति की निराशाजनक बुराई से निकलती हैं; परन्तु मैं सिखाता हूँ कि परमेश्वर, जो अन्धकार में से ज्योति निकालता है, इन दुष्ट मनुष्यों में और उनके द्वारा इस प्रकार शासन करता है कि अपने गुप्त, अगम्य न्याय से वह इन मनुष्यों की दुष्टता के द्वारा अपनी अनन्त आज्ञाओं को पूरा करता है। अब यदि तू इन गम्भीर सत्यों से लड़ना चाहता है, तो तुरन्त स्वयं परमेश्वर से युद्ध करने की तैयारी कर। वह तेरे उन्मत्त आक्रमण को सहने के लिए पूरी तरह तैयार है।
यदि तुझमें नम्रता या सिखाए जाने की तत्परता की एक बूँद या चिनगारी भी होती, तो वह भेद जो मैं सदा करता हूँ, और जो मेरी रचनाओं में निरन्तर आता है, निश्चय ही तुरन्त तेरे मन को सन्तुष्ट कर देता। यदि दुष्ट लोग, जो सारी बुराई की जड़ अपने ही भीतर पाते हैं, अपने ही विवेक से पूछें कि सारा दोष कहाँ है, तो वे विवेक साक्षी देंगे कि उनकी सारी दुष्टता का पूरा दोष उनके भीतर की उस सब अधर्म की जड़ में पाया जाता है। और वे यह देखे बिना भी नहीं रह सकते कि परमेश्वर उनकी भ्रष्ट इच्छाओं को धार्मिकता से जिधर चाहता है उधर फेरकर उन बुरी कामनाओं को नाना प्रकार की भलाई के कार्य में लगाता है। जहाँ तक इससे झगड़ने का सम्बन्ध है, मैं तुझसे फिर कहता हूँ, तू मुझसे नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर से लड़ रहा है। काश तू मन से परमेश्वर को सचमुच ज्योतियों का पिता मान सकता! तब तू, जैसा पौलुस ने वर्णन करके कहा है, अपने दुस्साहस से अपने आप को "उस ज्योति में, जिस तक कोई मनुष्य नहीं पहुँच सकता," ज़बरदस्ती न घुसाता; तू अपनी अपवित्र ढिठाई से उस ज्योति को अन्धकार में न बदलता।
इसके अतिरिक्त, तू अपनी अज्ञानता और मूर्खता तब प्रकट करता है जब तू यह निष्कर्ष निकालता है कि चूँकि हर एक अच्छी वस्तु ज्योतियों के पिता की ओर से उतरती है, इसलिए धर्मी पलटा लेने के वे भयंकर कार्य, जिनसे दुष्ट लोग डरते और काँपते हैं, उसी महिमामय सत्ता से नहीं निकलते। तेरी मूर्खता और जड़ता और भी बड़ी है जब तू मुझसे पूछता है कि क्या मैं भ्रष्ट और कुटिल कामनाओं को उन अच्छे और सिद्ध दानों में गिनता हूँ जो ज्योतियों के पिता की ओर से उतरते हैं। अरे हाँ! तू स्वयं इस बात का गम्भीर प्रमाण है कि बुद्धि, न्याय और ज्ञान के आत्मा और नींद और भ्रम की आत्मा के बीच अद्भुत अन्तर है, यद्यपि दोनों परमेश्वर की ओर से भेजे जाते हैं; एक दया में, दूसरा न्याय में। हाँ! नया जन्म देनेवाले आत्मा के बीच, जो विश्वासियों को परमेश्वर के स्वरूप में फिर से रचता है, और परमेश्वर की ओर से आई उस दुष्ट आत्मा के बीच, जो ठुकराए हुओं को पागलपन की ओर हाँकती है, जैसा शाऊल के मामले में हुआ, अद्भुत अन्तर है।
उतनी ही ढिठाई से तू मुझ पर आक्रमण करता है जब मैं सिखाता हूँ कि परमेश्वर शैतान और ठुकराए हुओं के द्वारा अपनी आज्ञाओं को पूरा करता है, कि उसकी अपनी महिमा प्रकट हो। कि शैतान उसके क्रोध का एक साधन है, इसकी साक्षी परमेश्वर स्पष्ट रूप से अपने वचन में भी देता है और सर्वव्यापी अनुभव से भी। और हम यह किस उद्देश्य से कहते हैं कि परमेश्वर शैतान के हाथ से कार्य करता है, यदि हमारा अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर शैतान और उसकी दुष्टता और कामों के द्वारा अपनी ही महिमा और उसके प्रकट होने का काम करता है? शैतान के विषय में अपने इस चतुर कुतर्क से तू समझता है कि तू ईश्वरीय बात के जाल से बच निकला। अरे! तू परमेश्वर को सत्य के विरुद्ध अपने इन सब अधर्मी झगड़ों के द्वारा भी अपनी महिमा का काम करने से रोक नहीं सकता। नहीं! उतना ही नहीं जितना फ़िरौन अपने घमण्ड के उन्माद से परमेश्वर को अपनी महिमा का तेज प्रकट करने से रोक न सका, क्योंकि परमेश्वर ने "इसी काम के लिए उसे खड़ा किया," कि उसके द्वारा वह अपनी "सामर्थ्य" की महिमा प्रकट करे। तू मुझे यह कहकर उत्तर देना चाहेगा कि नबूकदनेस्सर ने परमेश्वर की महिमा की जब उसने परमेश्वर के भयंकर न्यायों में उसके न्याय को माना। परन्तु ताकि तू जाने कि मैं तेरे सब निरर्थक और निष्फल बाणों को कितना तुच्छ समझता हूँ, मैं स्वयं तेरे इस तर्क में स्वेच्छा से तेरी सहायता करूँगा, और वह बात तेरे मन में डालूँगा जो अन्यथा वहाँ कभी न आती। यहोशू ने आकान से परमेश्वर की महिमा करने को क्यों कहा? उसका उद्देश्य यह दिखाना था कि आकान की अपवित्र चोरी और झूठ के पकड़े जाने से परमेश्वर की महिमा होगी।
परन्तु मूल प्रश्न अब यह है कि क्या परमेश्वर के अपनी महिमा प्रकट करने की केवल एक ही रीति है। क्योंकि यदि परमेश्वर की महिमा मनुष्यों के झूठों में से, और उनकी अन्य दुष्टताओं में से, निरन्तर न चमकती, तो पौलुस व्यर्थ कहता है कि केवल परमेश्वर ही सच्चा है, परन्तु सब मनुष्य झूठे हैं; और वह उतना ही व्यर्थ कहता है जब तुरन्त जोड़ता है, "फिर यदि हमारा अधर्म परमेश्वर की धार्मिकता को प्रगट करता है, तो हम क्या कहें? क्या परमेश्वर अन्यायी है?" (रोमियों 3:5।)
जब तू यह तर्क करता है कि परमेश्वर की इच्छा है कि उसके दिए हुए आशीषों के लिए सब जातियाँ उसकी स्तुति करें, तो जो तू कहता है वह सत्य है, यदि तू यह भी माने कि परिस्थितियों का एक विशाल वन है जिसमें से परमेश्वर अपने अद्भुत कार्यों के द्वारा अपने लिए स्तुति और महिमा प्राप्त करता है। और इसकी अपनी अज्ञानता के कारण तू अपने घमण्ड का उचित दण्ड अपने ऊपर ले आता है। क्योंकि सब ठोस तर्कशास्त्र और वैध युक्ति पर प्रत्यक्ष हँसते हुए तू निरन्तर जाति से लेकर वर्ग तक नकारात्मक रूप में तर्क करता है।
और मैं तेरे इस अपवित्र और निन्दापूर्ण परिहास को, जब तू यह संकेत देता है कि परमेश्वर मनुष्यों को उन दाढ़ियों के लिए भी दण्ड दे सकता है जिन्हें उसी ने रचा है, किसी लम्बे उत्तर के योग्य नहीं समझूँगा। क्योंकि किसने कभी कहा कि अधर्म परमेश्वर का रचा हुआ है, यद्यपि यह सत्य है कि परमेश्वर अपने गुप्त और अगम्य उद्देश्य से उस अधर्म के कार्य को धर्मी, भले और महिमामय अन्त के लिए ठहराता और चलाता है? इसलिए अपनी इस मूर्ख और फीकी ढिठाई को दूर कर, जब तू अज्ञानता से मनुष्यों की दाढ़ी को, जो स्वाभाविक रूप से और अनजाने ही, उनके सोते हुए भी, बढ़ती है, उनके दुष्टता के कामों से, जो स्वेच्छा से, प्रत्यक्ष और जान-बूझकर किए जाते हैं, गडमड कर देता है। मुझ पर जितना उन्मत्त होकर चाहे क्रोध कर, मैं फिर भी इस पर दृढ़ रहता हूँ: कि यद्यपि परमेश्वर मनुष्यों की भ्रष्ट कामनाओं को अपने अनन्त उद्देश्यों की सिद्धि के लिए ठहराता और चलाता है, तथापि वह उन भ्रष्ट कर्ताओं और साधनों को स्वयं धार्मिकता से दण्ड देता है, और उन्हें उनके अपने विवेक में दोषी ठहराता है।
बस देख, तू फिर कैसे अपने ही रचे जाल में उलझता है, जब तू यह मानने का बहाना करता है कि परमेश्वर के भेद हमारे लिए अज्ञात हैं, और फिर भी यह मानना चाहता है कि उसका न्याय, मनुष्य के न्याय की तरह, हमारे लिए स्पष्ट बोधगम्य है। अब मान लो कोई तुझसे पूछे कि क्या परमेश्वर के भेदों में कोई न्याय निहित है, तो क्या तू इनकार करेगा कि है? तो क्या तू बहाना करेगा या दावा करेगा कि परमेश्वर का वह न्याय, उसके गुप्त कार्यों में, जिसे दाऊद और पौलुस चकित होकर और आराधना करते हुए देखते हैं, क्योंकि वह उनकी मानसिक समझ की अन्तिम सीमा से परे है, सहज बोधगम्य और स्पष्ट रूप से ज्ञात है? क्या परमेश्वर की बुद्धि की उसके अद्भुत न्यायों में गहराई की अथाहता और ऊँचाई का धन अपने में न्याय नहीं रखता? तो फिर जब कभी उसके कार्यों का कारण तेरी समझ से परे हो, तू क्यों इनकार करेगा कि परमेश्वर न्यायी है? अय्यूब की पुस्तक में परमेश्वर की उस बुद्धि के बीच, जो अगम्य है और जिसका तेज सारी मानव-प्रकृति को असीम दूरी पर रखता है, और उस बुद्धि के बीच जो हम पर उसकी प्रकट और लिखित व्यवस्था में प्रकट की गई है, एक ईश्वरीय और उल्लेखनीय भेद किया गया है। उसी प्रकार तुझे भी, यदि तू सब बातों को इस प्रकार गडमड न करता, परमेश्वर के उस अद्भुत और गहन न्याय के बीच, जिसे कोई मानवीय क्षमता नहीं समझ सकती, और न्याय की उस कसौटी के बीच, जो परमेश्वर ने मनुष्यों के जीवन को नियमित करने के लिए अपनी प्रकट व्यवस्था में ठहराई है, भेद करना चाहिए था। मैं तुरन्त मानता हूँ कि सुसमाचार की खुले रूप से प्रकट शिक्षा के द्वारा ही परमेश्वर निश्चय संसार का न्याय करेगा। परन्तु वह उसी निश्चय के साथ, उसी समय, अपनी गुप्त प्रबन्ध-व्यवस्था की धार्मिकता को सब अपवित्र झगड़ालुओं के विरुद्ध सही ठहराएगा!
वरन् यदि तू उस सुसमाचार से, जिसके विषय में तू यों व्यर्थ बकता है, थोड़ा-सा भी परिचित होता, तो तू सहज समझ लेता कि परमेश्वर उस धार्मिकता को, जो वह अपनी महिमामय व्यवस्था में प्रकट करता है, भरपूर प्रतिफल कैसे देता है, और जो मन से उसकी आज्ञाओं को मानते हैं उन्हें उनके प्रतिज्ञा किए हुए मुकुट से कभी वंचित नहीं करता, और फिर भी उन सब को धार्मिकता से दण्ड देता है जो आज्ञाकारिता से इनकार करते हैं। फिर भी इन पिछलों को वह अपने सेवक कहता है, क्योंकि वह अपने अनन्त उद्देश्यों की सिद्धि के लिए उनके मन अपने हाथों में रखता है। इसी कारण नबूकदनेस्सर, जातियों का वह उग्र लुटेरा और शैतान का दास, यिर्मयाह के द्वारा विशेष अर्थ के साथ परमेश्वर का "सेवक" कहा गया है। और यदि मैंने सिखाया है कि परमेश्वर, जैसा उसके चारों ओर के न्यायों से प्रकट है, अपने उद्देश्यों और आज्ञाओं को पूरा करने के लिए मनुष्यों के मन को इधर-उधर झुकाता है, जब परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता यही बातें इन्हीं शब्दों में कहते हैं, और जब मैं उन्हीं के शब्द उद्धृत करता हूँ, तो तू ऐसे उद्धरणों को मेरे किए हुए भयंकर अपराध क्यों ठहराता है? क्या ये ईश्वरीय इतिहास के ही शब्द नहीं हैं? "और यहोवा का कोप इस्राएलियों पर फिर भड़का, और उसने दाऊद को उनके विरुद्ध यह कहकर उभारा, कि जा, इस्राएल और यहूदा की गिनती ले" (2 शमूएल 24:1)।
