अध्याय 4

खण्ड I — अनन्त पूर्वनियति (भाग 1 / 2)

Calvin's Calvinism · John Calvin

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खण्ड I — अनन्त पूर्वनियति (भाग 1 / 2)

अनन्त पूर्वनियति — खण्ड 1

अब नौ वर्ष बीत चुके हैं जब कम्पानिया के निवासी अल्बर्टस पिघियस ने, जो स्पष्ट ही उन्मत्त दुस्साहस का मनुष्य था, एक ही समय और एक ही पुस्तक में मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा को स्थापित करने और परमेश्वर की उस गुप्त युक्ति को उलट देने का प्रयत्न किया था, जिसके द्वारा वह कुछ को उद्धार के लिए चुनता और दूसरों को अनन्त विनाश के लिए ठहराता है। परन्तु क्योंकि उसने नाम लेकर मुझ पर आक्रमण किया, ताकि मेरे पार्श्व से होकर पवित्र और खरे सिद्धान्त को बेध डाले, इसलिए मैंने उस मनुष्य के ईश-निन्दक पागलपन पर अंकुश लगाना आवश्यक समझा। उस समय, फिर भी, नाना कामों में उलझा होने के कारण मैं दोनों विषयों की चर्चा को एक ही छोटी अवधि में समेट न सका; परन्तु पहले विषय पर अपने विचार प्रकाशित करके मैंने प्रतिज्ञा की कि जब अवसर मिलेगा तब पूर्वनियति के सिद्धान्त पर विचार करूँगा। स्वतंत्र इच्छा पर मेरी पुस्तक के प्रकट होने के कुछ ही समय बाद पिघियस की मृत्यु हो गई। और इसलिए कि मैं एक मरे हुए कुत्ते का अपमान न करूँ, मैंने अपना ध्यान अन्य गम्भीर बातों की ओर लगाया। और उस समय से लेकर आज तक मुझे सदा बहुत काम मिलता रहा है। फिर, चूँकि मैं इस महान सिद्धान्त पर पहले ही विस्तार से लिख चुका था, और उसे स्पष्टता से प्रस्तुत कर चुका था, और पवित्रशास्त्र की ठोस साक्षियों से उसे पुष्ट भी कर चुका था, इसलिए इस पर यह नया परिश्रम इतना अनिवार्य नहीं लगा कि उसे कुछ समय के लिए निश्चिन्त विश्राम न दिया जा सकता।

परन्तु आज के दिन, क्योंकि कुछ उन्मत्त और उल्लसित आत्माएँ पिघियस के उदाहरण पर अपनी पूरी शक्ति से यह प्रयत्न कर रही हैं कि पवित्रशास्त्र में भक्तों के स्वतंत्र चुनाव और त्यागे हुओं के अनन्त न्याय के विषय में जो कुछ लिखा है उसे नष्ट कर दें, इसलिए मैंने अपना कर्तव्य समझा कि उन तुच्छ आपत्तियों को एकत्र करके और संक्षेप में खण्डन करके, जिनसे ऐसे लोग स्वयं को और दूसरों को भरमाते हैं, इस छूत को और आगे फैलने से रोकूँ। इन्हीं लोगों में इटली में एक जार्जियस, सिसली का रहनेवाला, उठ खड़ा हुआ — एक अनपढ़ मनुष्य, जो किसी भी रूप में सार्वजनिक ध्यान की अपेक्षा तिरस्कार के ही योग्य था, यदि छल और पाखण्ड से प्राप्त हुई कुख्याति ने उसे अनिष्ट करने की कुछ सामर्थ्य न दे दी होती। क्योंकि जब वह भिक्षु था तब अपनी कोठरी में अज्ञात पड़ा रहा, जब तक कि त्रेन्त के पिताओं में से एक, लूसियस अब्बास, ने झूठी प्रशंसा से उसे ऊँचा न उठा दिया, इस आशा से कि अपने इस कृपापात्र के कन्धों पर चढ़कर वह स्वयं स्वर्ग तक उड़ान भर सकेगा। इस भ्रष्ट मनुष्य ने झूठ-मूठ यह प्रचार करके कि मसीह ने उसे दर्शन दिया है और उसे सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र का व्याख्याता ठहराया है, बिना अधिक कठिनाई के बहुतों को मूर्खतापूर्ण, निर्लज्ज और व्यर्थता से भी बढ़कर मूढ़ता के साथ उस बात पर विश्वास करने के लिए मना लिया जो उसने इस प्रकार प्रकाशित की थी। और नाटक को अन्तिम अंक तक पहुँचाने के लिए उसने अपने पागलपन भरे दर्शनों का ऐसा ढिंढोरा पीटा कि अपने अनपढ़ अनुयायियों को, जो पूर्वाग्रह से पहले ही जकड़े हुए थे, पूरी तरह चकित कर दिया। और यह निश्चित है कि हमारे समय के अधिकांश मनुष्य ठीक ऐसे ही भविष्यवक्ताओं के योग्य हैं। क्योंकि उनमें से अधिकांश के हृदय, दुष्टता से कठोर और हठीले बनकर, कोई उपचार ग्रहण नहीं करेंगे; जबकि औरों के कान भ्रष्ट कल्पनाओं की अतृप्त लालसा से सदा खुजलाते रहते हैं। सम्भव है कुछ अपवाद भी हों, जिनका उल्लेख हम प्रसन्नतापूर्वक और शोभा के साथ कर सकते हैं; परन्तु हम उन्हें अनुल्लिखित छोड़ देंगे, और यह ठान लेंगे कि अपने सब पाठकों को दिखाएँ और समझाएँ कि सत्य के सब शत्रुओं की आपत्तियाँ कितनी तुच्छ और निकम्मी हैं।

अब मैं पिघियस और सिसली के जार्ज के साथ, जो अशुद्ध पशुओं की एक जोड़ी हैं (लैव्यव्यवस्था 11:3) और किसी प्रकार बेमेल नहीं हैं, पवित्र संग्राम में उतरने का प्रस्ताव करता हूँ। क्योंकि यद्यपि मैं मानता हूँ कि कुछ बातों में वे भिन्न हैं, तथापि घोर भ्रान्तियों को जन्म देने में, दुष्ट और उच्छृंखल दुस्साहस के साथ पवित्रशास्त्र में मिलावट करने में, सत्य के प्रति अभिमानपूर्ण तिरस्कार में, उद्दण्ड ढिठाई में और निर्लज्ज वाचालता में उन दोनों के बीच पूर्ण समानता और एकरूपता पाई जाएगी। अन्तर इतना ही है कि पिघियस अपनी वाग्मिता की गँदली फूली हुई शब्दाडम्बरी भाषा को फुलाकर बड़ी डींग और ठाठ के साथ चलता है; जबकि दूसरा व्यक्ति वे जूते, जिनसे वह स्वयं को ऊँचा उठाता है, अपने गढ़े हुए प्रकाशन से उधार लेता है। और यद्यपि दोनों आरम्भ में पूर्वनियति को उलटने के प्रयास में एकमत हैं, तथापि आगे चलकर वे अपनी गढ़ी हुई कल्पनाओं में भिन्न हो जाते हैं। दोनों की यह साझा कल्पना है कि गोद लिए जाने के अनुग्रह का भागी होना या न होना प्रत्येक मनुष्य की अपनी स्वतंत्रता में है; और यह परमेश्वर की युक्ति और आज्ञा पर निर्भर नहीं है कि कौन चुना हुआ है और कौन त्यागा हुआ; परन्तु प्रत्येक मनुष्य अपनी इच्छा से अपने लिए इनमें से एक दशा निश्चित करता है, और इस विषय में कि कुछ सुसमाचार पर विश्वास करते हैं जबकि दूसरे अविश्वास में बने रहते हैं, यह भेद परमेश्वर के स्वतंत्र चुनाव से, या उसकी गुप्त युक्ति से नहीं, परन्तु प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा से उत्पन्न होता है।

अब हमारे सामने के इस महान विषय पर पिघियस अपना मत इस प्रकार समझाता है: कि परमेश्वर ने अपनी अटल युक्ति से सब मनुष्यों को बिना किसी भेद के उद्धार के लिए सृजा; परन्तु जब उसने आदम के पतन को पहले से देख लिया, तो इसलिए कि उसका चुनाव फिर भी दृढ़ और अपरिवर्तित बना रहे, उसने एक उपचार निकाला जो इस कारण सबके लिए सामान्य हो सके, और वह उपचार था मसीह में सम्पूर्ण मानव-जाति के चुनाव की पुष्टि; ताकि कोई भी नाश न हो सके सिवाय उसके जो अपने ही हठ से अपना नाम जीवन की पुस्तक में से मिटा डालता है। और इस महान प्रश्न के दूसरे पक्ष पर उसका मत यह है कि चूँकि परमेश्वर ने पहले से देख लिया कि कुछ लोग अन्त तक दुष्टता और दैवी अनुग्रह के तिरस्कार में दृढ़ता से बने रहेंगे, इसलिए उसने अपने पूर्वज्ञान के द्वारा ऐसे लोगों को त्याग दिया, जब तक कि वे पश्चाताप न करें। उसके अनुसार यही त्याग का उद्गम है, जिसके द्वारा वह यह सिद्ध करना चाहता है कि दुष्ट लोग परमेश्वर की युक्ति और इच्छा की ओर से पूर्णतः निरपेक्ष और स्वतंत्र रहकर स्वयं को सार्वभौमिक चुनाव के लाभ से वंचित कर लेते हैं। और वह यह भी घोषित करता है कि जो लोग यह मानते और सिखाते हैं कि कुछ मनुष्य उद्धार के लिए निश्चित और निरपेक्ष रूप से चुने गए हैं जबकि दूसरे उतने ही निरपेक्ष रूप से विनाश के लिए ठहराए गए हैं, वे परमेश्वर के विषय में अनुचित विचार रखते हैं और उस पर ऐसी कठोरता का आरोप लगाते हैं जो उसके न्याय और उसकी भलाई से सर्वथा परे है। और हमारा यह मानवीय तर्कशास्त्री यहाँ अगस्तीन का नाम लेकर उसके मत की निन्दा करता है।

और यह दिखाने के लिए, जैसा कि वह सोचता है, कि परमेश्वर का पूर्वज्ञान हमारी अपनी इच्छा की स्वतंत्रता में से कुछ भी घटाता नहीं, हमारा यह छली कूसा के निकोलस की उस चतुर युक्ति की शरण लेता है, जो हमें विश्वास दिलाना चाहता था कि परमेश्वर ने उन बातों को, जो उसे अनादिकाल से ज्ञात थीं, उनके भावी रूप और यथार्थ में नहीं देखा, परन्तु उन्हें मानो तत्कालीन वर्तमान प्रकाश में देखा। और यहाँ वह अपने ही विशेष ढंग से भौंहें चढ़ाता है, मानो उसने कोई अत्यन्त गुप्त बात खोज निकाली हो; जबकि उसकी यह चाल हर स्कूली बालक के मुँह पर है। परन्तु जब वह देखता है कि अब भी सत्य ने उसे पैर से बाँध रखा है, तो परमेश्वर के दोहरे पूर्वज्ञान का प्रवेश कराके वह छूट निकलने का यत्न करता है। वह दावा करता है कि परमेश्वर ने मनुष्य के पतन को पहले से जानने से पूर्व ही उसे जीवन के लिए सृजने की योजना बनाई थी, और इसलिए परमेश्वर के अपने मन में मनुष्य के उद्धार का विचार, क्रम में, उसकी मृत्यु के पूर्वज्ञान से पहले आया। और जब वह इन विचारों को शब्दों की गँदली धारा में उँडेलता है, तो समझता है कि उससे वह अपने पाठकों की बुद्धि को ऐसा डुबो देता है कि वे कुछ भी स्पष्टता और निश्चय से नहीं देख पाते। फिर भी मुझे आशा है कि अपनी संक्षिप्तता से मैं शीघ्र ही इस मनुष्य की वाचालता के अन्धकार को छाँट दूँगा।

जार्जियस की कल्पना यह है कि कोई भी मनुष्य, न यह न वह, उद्धार के लिए पूर्वनियत नहीं है, परन्तु परमेश्वर ने एक समय पहले से ठहरा रखा था जिसमें वह सारे जगत का उद्धार करेगा। इसे सिद्ध करने के प्रयास में वह पौलुस के कुछ अंशों को तोड़-मरोड़ता है, जैसे यह: “अर्थात् उस भेद को जो समयों और पीढ़ियों से गुप्त रहा, परन्तु अब उसके पवित्र लोगों पर प्रगट हुआ है” (कुलुस्सियों 1:26)। प्रेरित के इस अंश को अपने प्रयोजन के अनुसार मरोड़कर वह निश्चिन्त खिसक जाता है और स्वयं को विजयी समझता है। मानो पवित्रशास्त्र की कोई साक्षी स्पष्ट रूप से यह घोषित ही न करती हो कि कुछ लोग परमेश्वर की ओर से उद्धार के लिए चुने गए हैं जबकि दूसरे छोड़ दिए गए हैं। संक्षेप में, चुनाव के विषय में यह मनुष्य नये नियम के समय के सिवा और कुछ नहीं देखता।

इस गम्भीर विषय पर मेरा मन क्या है, इसकी पूर्ण और प्रचुर साक्षी मेरी “संस्थापना” (Institutes) देती है, चाहे मैं अब और कुछ न जोड़ूँ। सबसे पहले मैं अपने पाठकों से विनती करूँगा कि वे उस चेतावनी को ध्यानपूर्वक स्मरण रखें जो मैं वहाँ देता हूँ: कि यह महान विषय, जैसा बहुतेरे कल्पना करते हैं, कोई केवल काँटेदार और कोलाहलपूर्ण वाद-विवाद नहीं है, न ही कोई ऐसी कल्पना जो बिना किसी लाभ के मनुष्यों के मन को थका दे; परन्तु एक ठोस चर्चा है जो भक्तों की सेवा के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है, क्योंकि यह हमें विश्वास में दृढ़ता से स्थापित करती है, हमें नम्रता का प्रशिक्षण देती है, और हमारे प्रति परमेश्वर की असीम भलाई पर आश्चर्य में हमें उठाती है, जबकि हमें उस भलाई की स्तुति अपने उच्चतम स्वरों में करने के लिए ऊपर ले जाती है। क्योंकि विश्वास को दृढ़ करने का परमेश्वर के चुनाव के प्रति खुले कान लगाने से अधिक प्रभावशाली कोई साधन नहीं है, जिसे पवित्र आत्मा हमारे सुनते समय हमारे हृदय पर मुहर लगाता है, हमें दिखाते हुए कि वह हमारे प्रति परमेश्वर की अनन्त और अटल सद्इच्छा में स्थित है; और इसलिए उसे संसार की किसी आँधी से, शैतान के किसी आक्रमण से, शरीर के किसी परिवर्तन से, या किसी डगमगाहट अथवा दुर्बलता से हिलाया या बदला नहीं जा सकता। क्योंकि हमारा उद्धार तभी हमारे लिए निश्चित होता है जब हम उसका कारण परमेश्वर के हृदय में पाते हैं। इस प्रकार, जब हम मसीह में जीवन को थामते हैं, जो हमारे विश्वास पर प्रकट किया गया है, तब वही विश्वास हमारा अगुवा और पथ-प्रदर्शक बना रहता है, और हमारी दृष्टि को बहुत आगे तक भेदने की अनुमति मिलती है, कि हम देखें कि वह जीवन किस स्रोत से निकला। उद्धार के विषय में हमारा भरोसा मसीह में जड़ पकड़े हुए है और सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं पर टिका है। परन्तु हमारे भरोसे के लिए यह कोई निर्बल सहारा नहीं है, जब मसीह में विश्वास करने के लिए हमें प्रेरित किया जाता है, यह सुनना कि सब कुछ मूल रूप में परमेश्वर की ओर से हमें दिया गया था, और यह कि हम जगत की उत्पत्ति से पहले मसीह में विश्वास के लिए उतने ही ठहराए गए थे जितने कि मसीह में अनन्त जीवन की मीरास के लिए चुने गए थे।

इसलिए यहीं से पवित्र लोगों की वह अभेद्य और अविचल सुरक्षा उत्पन्न होती है। पिता, जिसने हमें पुत्र को उसकी निज सम्पत्ति के रूप में दिया, उन सबसे अधिक बलवन्त है जो हमारा विरोध करते हैं; और वह हमें अपने हाथ से छीने जाने न देगा। तब परमेश्वर के पवित्र लोगों के लिए नम्रता का कैसा कारण है जब वे देखते हैं कि उन लोगों के बीच, जो स्वभाव से सब एक-से हैं, स्थिति का ऐसा भेद किया गया है! परमेश्वर के पुत्र जिधर भी आँखें फेरते हैं, उन्हें अन्धेपन, अज्ञान और संवेदनहीनता के ऐसे आश्चर्यजनक उदाहरण दिखाई देते हैं कि वे भय से भर जाते हैं; जबकि वे स्वयं ऐसे अन्धकार के बीच दैवी ज्योति पा चुके हैं, और जानते तथा अनुभव करते हैं कि ऐसा ही है। वे कहते हैं: ऐसा कैसे है कि कुछ लोग स्पष्ट ज्योति के नीचे भी अन्धकार और अन्धेपन में बने रहते हैं? यह भेद कौन करता है? एक बात वे अपने ही अनुभव से जानते हैं, कि जबकि उनकी आँखें भी कभी बन्द थीं, अब वे खुल गई हैं। एक और बात भी निश्चित है, कि जो लोग स्वेच्छा से अपने और दूसरों के बीच के किसी भी भेद से अनजान बने रहते हैं, उन्होंने अब तक वह महिमा परमेश्वर को देना नहीं सीखा जो उस भेद के लिए उसे देय है।

अब कोई सन्देह नहीं करता कि नम्रता सब सच्चे धर्म की नींव में है, और सब सद्गुणों की जननी है। परन्तु वह कैसे नम्र होगा जो उस मूल पाप और दुर्दशा के विषय में सुनना ही नहीं चाहता जिससे वह छुड़ाया गया है? और जो परमेश्वर की उद्धारकारी दया को बिना भेद के सब तक बढ़ाकर, जहाँ तक उससे हो सके, उस दया की महिमा को घटाता है? निश्चय ही वे लोग परमेश्वर के अनुग्रह की उसकी महानता के अनुसार महिमा करने से सबसे दूर हैं जो घोषणा करते हैं कि वह सब मनुष्यों के लिए सामान्य तो है; परन्तु वह उनमें प्रभावकारी रूप से इसलिए ठहरता है कि उन्होंने उसे विश्वास के द्वारा अपनाया है। परन्तु स्वयं विश्वास के कारण को वे इस सारे समय आँखों से ओझल गाड़े रखना चाहते हैं, जो यह है: कि परमेश्वर की वे सन्तान, जो पुत्र होने के लिए चुनी गई हैं, आगे चलकर लेपालकपन की आत्मा से आशीषित की जाती हैं। अब यदि मैं ऐसे सर्वोपरि लाभ से सम्पन्न होकर अपने को उससे अधिक ऋणी न समझूँ जिसने उसका सौवाँ भाग भी नहीं पाया, तो वह मेरी कैसी कृतज्ञता हुई? इसलिए यदि परमेश्वर की भलाई की योग्य रीति से स्तुति करने के लिए यह स्मरण रखना आवश्यक है कि हम उसके कितने ऋणी हैं, तो वे लोग उसके प्रति द्वेष रखनेवाले हैं और उसे उसकी महिमा से लूटते हैं जो अनन्त चुनाव के सिद्धान्त को अस्वीकार करते हैं और सहना नहीं चाहते, जिसके आँखों से ओझल गाड़ दिए जाने पर परमेश्वर के अनुग्रह का आधा भाग भी अनिवार्य रूप से उसके साथ लुप्त हो जाएगा।

जिसे चाहें वह हम पर गरजता रहे। हम अपनी भाषा की पूरी शक्ति से परमेश्वर के स्वतंत्र चुनाव के विषय में अपने सिद्धान्त को सदा प्रकाशित करते रहेंगे, क्योंकि केवल उसी के द्वारा विश्वासी समझ सकते हैं कि परमेश्वर की वह भलाई कितनी महान है जिसने उन्हें प्रभावकारी रूप से उद्धार के लिए बुलाया। मैं यहाँ चुनाव के इस महान सिद्धान्त को केवल हल्के से छू रहा हूँ, ऐसा न हो कि कोई, अपने लिए इतने आवश्यक विषय से कतराकर, आगे चलकर अनुभव करे कि उसकी उपेक्षा से उसकी कितनी हानि हुई। मैं यथासमय, उचित स्थान पर, इस दैवी विषय में पर्याप्त विस्तार से प्रवेश करूँगा। अब यदि हम वास्तव में सुसमाचार से लज्जित नहीं हैं, तो हमें अनिवार्य रूप से वह स्वीकार करना होगा जो उसमें खुलकर घोषित किया गया है: कि परमेश्वर ने अपनी अनन्त सद्इच्छा से (जिसके लिए उसके अपने उद्देश्य के सिवा कोई और कारण न था) जिन्हें उसने चाहा उन्हें उद्धार के लिए ठहराया, और शेष सबको त्याग दिया; और जिन्हें उसने इस स्वतंत्र लेपालकपन से अपने पुत्र होने के लिए आशीषित किया उन्हें वह अपने पवित्र आत्मा से प्रकाशित करता है, कि वे उस जीवन को ग्रहण करें जो मसीह में उन्हें दिया जाता है; जबकि दूसरे, अपनी ही इच्छा से अविश्वास में बने रहकर, विश्वास की ज्योति से वंचित, पूर्ण अन्धकार में छोड़ दिए जाते हैं।

परमेश्वर के इस अगम्य न्याय के विरुद्ध बहुत-से ढीठ कुत्ते उठकर भौंकते हैं। उनमें से कुछ तो परमेश्वर पर खुलकर आक्रमण करने में भी नहीं हिचकते, यह पूछते हुए कि आदम के पतन को पहले से देखकर उसने मनुष्यों के कामों का बेहतर प्रबन्ध क्यों नहीं किया? ऐसी आत्माओं पर अंकुश लगाने के लिए उन साधनों से उत्तम और कुछ खोजने की आवश्यकता नहीं जो पौलुस हमारे सामने रखता है। वह मान लेता है कि यह प्रश्न किसी अभक्त मनुष्य द्वारा पूछा गया है: परमेश्वर जिस पर चाहे दया करे और जिसे चाहे कठोर करे, तो वह न्यायी कैसे हो सकता है? मनुष्यों के ऐसे दुस्साहस को प्रेरित उत्तर के योग्य नहीं समझता। वह उन्हें परमेश्वर की सृष्टि में उनके क्रम और स्थान की याद दिलाने के सिवा और कुछ नहीं करता: “हे मनुष्य, तू कौन है जो परमेश्वर का सामना करता है?” (रोमियों 9:20)। अपवित्र लोग तो व्यर्थ बकबक करते हैं कि प्रेरित ने उत्तर के अभाव में बात की असंगति को चुप्पी से ढक दिया। परन्तु मामला इससे बिलकुल भिन्न है।

प्रेरित इस अपील में एक ऐसा स्वयंसिद्ध सत्य, अर्थात् सार्वभौमिक स्वीकृति, अपनाता है, जिसे न केवल सब भक्त मनों को दृढ़ता से थामे रहना चाहिए, परन्तु जो सामान्य बुद्धि के हृदय में भी गहराई से अंकित होना चाहिए; कि परमेश्वर का अगम्य न्याय इतना गहरा है कि मनुष्य उसकी थाह नहीं पा सकता। और मैं पूछता हूँ, ऐसा कौन मनुष्य होगा जो परमेश्वर के कामों के सब कारणों को अपनी निजी बुद्धि के सीमित नाप में समेटने से लज्जित न हो? फिर भी सारा प्रश्न इसी कब्जे पर घूमता है: क्या परमेश्वर का कोई न्याय उससे भिन्न नहीं जिसकी हम कल्पना करते हैं? अब यदि हम इसे एक प्रश्न के रूप में रखें — क्या परमेश्वर की सामर्थ्य को अपनी स्वाभाविक बुद्धि से नापना उचित है? — तो ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो तुरन्त यह उत्तर न दे कि सब मनुष्यों की सारी इन्द्रियाँ एक ही व्यक्ति में मिला दी जाएँ तो भी परमेश्वर की असीम सामर्थ्य को समझने के प्रयास में मूर्छित हो जाएँगी; और फिर भी, जैसे ही परमेश्वर के कुछ कामों का कारण तुरन्त दिखाई नहीं देता, मनुष्य किसी न किसी प्रकार तुरन्त उसके साथ न्याय में प्रवेश करने के लिए दिन ठहराने को तैयार हो जाते हैं। तब प्रेरित की इस अपील से अधिक उपयुक्त और संगत क्या हो सकता है: कि जो लोग अपने तर्कों में इस प्रकार स्वयं को आकाश से भी ऊपर उठाना चाहते हैं वे बिलकुल भूल जाते हैं कि वे कौन हैं और क्या हैं?

और मान लीजिए कि परमेश्वर अपने अधिकार को त्यागकर अपने कामों का कारण बताने को स्वयं प्रस्तुत हो जाए? जब बात उसकी उन गुप्त युक्तियों तक पहुँचे, जिनकी स्वर्गदूत काँपते हुए आराधना करते हैं, तो ऐसे तेजोमय प्रताप के सामने कौन अपनी सुध-बुध पूरी तरह न खो बैठेगा? सचमुच मनुष्य का पागलपन अद्भुत है! जो किसी अन्यजातीय न्यायी के साथ समान भूमि पर खड़े होने से अधिक ढिठाई से स्वयं को परमेश्वर से ऊपर ठहराएगा! तुम्हारे लिए यह असह्य और घृणित है कि परमेश्वर की सामर्थ्य और कर्म तुम्हारे अपने मन की क्षमता से बढ़कर हों; और फिर भी तुम अपने समान मनुष्य को उसके अपने मन और निर्णय का सुख भोगने दोगे। तो क्या अब तुम ऐसे पागलपन के साथ पूजनीय परमेश्वर का नाम लेने का साहस करोगे? परमेश्वर के महिमामय नाम के विषय में तुम वास्तव में क्या सोचते हो? और क्या तुम इस बात की डींग मारोगे कि प्रेरित सब तर्क से रहित है, क्योंकि वह परमेश्वर को उसके सिंहासन से घसीटकर तुम्हारे सामने प्रश्न पूछने और जाँच करने के लिए खड़ा नहीं करता?

फिर भी हम पूरी तरह निश्चित रहें कि प्रेरित, पहले तो, यहाँ उचित गम्भीरता के साथ उन मनुष्यों के उच्छृंखल पागलपन पर अंकुश लगाता है जो परमेश्वर के न्याय पर खुलकर आक्रमण करने को कुछ नहीं समझते; और फिर, परमेश्वर के उपासकों को वह संयम की ऐसी सलाह देता है जो इससे अधिक लाभदायक है कि वह उन्हें वर्जित बादलों के ऊपर उकाबों के पंखों पर उड़ना सिखाता। क्योंकि मन की वह संयमित अवस्था, जो परमेश्वर के भय से नियमित होकर स्वयं को उसकी ठहराई हुई समझ की सीमाओं के भीतर रखती है, सारी मानवीय बुद्धि से कहीं उत्तम है। अभिमानी लोग चाहें तो इस संयम की निन्दा करें और उसे अज्ञान कहें। परन्तु यह संयम सदा उसे थामे रहे जो सब सच्चे ज्ञान की पराकाष्ठा है: कि परमेश्वर की इच्छा को धार्मिकता का सर्वोच्च नियम मानकर हम उसे उसकी अपनी यथोचित और विशिष्ट महिमा देते हैं।

परन्तु पिघियस और उसके साथी इससे सन्तुष्ट नहीं होते। क्योंकि परमेश्वर के सम्मान की बड़ी चिन्ता का स्वाँग भरते हुए, वे हम पर भौंकते हैं कि हम उस पर ऐसी निर्दयता का आरोप लगाते हैं जो उसके स्वभाव से सर्वथा परे है। पिघियस इनकार करता है कि उसका परमेश्वर से कोई विवाद है। तब पौलुस किसका पक्ष, या किस कारण का पक्ष ले रहा है? उपर्युक्त स्वयंसिद्ध सत्य को अपनाने के बाद — कि परमेश्वर जिसे चाहता है कठोर करता है और जिस पर चाहता है दया करता है — वह एक दुष्ट तर्कशास्त्री का मान लिया गया ताना जोड़ता है: “तो वह फिर क्यों दोष लगाता है? क्योंकि उसकी इच्छा का सामना कौन करता है?” (रोमियों 9:19)। वह ऐसी निन्दा का सामना केवल परमेश्वर की सामर्थ्य को उसके विरुद्ध रखकर करता है। यदि वे लोग परमेश्वर को अत्याचारी का वस्त्र पहनाते हैं जो मनुष्यों के कठोर किए जाने को भी उसकी अनन्त युक्ति से जोड़ते हैं, तो निश्चय ही हम इस सिद्धान्त के प्रवर्तक नहीं हैं। यदि वे परमेश्वर की हानि करते हैं जो उसकी इच्छा को सब अन्य कारणों से ऊपर रखते हैं, तो पौलुस ने हमसे बहुत पहले यह सिद्धान्त सिखाया। तो परमेश्वर के ये शत्रु प्रेरित से ही इस विषय पर विवाद करें। क्योंकि इस वर्तमान चर्चा में मैं और कुछ नहीं कहता सिवाय उसके जो, मैं घोषित करता हूँ, उसी के द्वारा सिखाया गया है। फिर भी इन भौंकते कुत्तों के विषय में मुझे बहुत चिन्ता नहीं होगी। मैं तो कुछ अन्यथा भले मनुष्यों की चिन्ता से अधिक प्रेरित हूँ, जो इस भय से कि कहीं वे परमेश्वर पर उसकी भलाई के अयोग्य कुछ आरोपित न कर दें, वास्तव में उससे भयभीत प्रतीत होते हैं जो वह प्रेरित के द्वारा अपने विषय में घोषित करता है।

अब, हम इस सारे समय परमेश्वर के न्याय को सब निन्दा से बचाने के भक्तिपूर्ण उद्देश्य को थामे हुए हैं। और इन डरपोक लोगों की यह विनम्रता सब प्रशंसा के योग्य होती, यदि वह किसी गुप्त अभिमान से फूले हुए चिड़चिड़ेपन की सन्तान न होती। क्योंकि ऐसे मनुष्य अपनी ही स्वाभाविक बुद्धि और समझ के अनुसार बोलते हैं। परन्तु वे परमेश्वर की सामर्थ्य को वह बात मान लेने से क्यों डरते हैं जो उनके अपने मन की सामर्थ्य की समझ से परे है, कि कहीं उसके न्याय पर संकट न आ जाए? मैं पूछता हूँ, ऐसा क्यों है? इसलिए कि वे परमेश्वर के न्याय-आसन को अपने ही निर्णय के अधीन करने का साहस करते हैं। अब पौलुस हमें दिखाता है कि किसी भी मनुष्य का अपने भाई का न्याय अपने हाथ में ले लेना असह्य अभिमान का कार्य है, क्योंकि एक ही न्यायी है जिसके द्वारा हम सब स्थिर रहते या गिरते हैं, और जिसके आगे हर घुटना झुकेगा। तब मनुष्य का इसी एकमात्र न्यायी के विरुद्ध अपनी कलगी उठाना, और उसकी अनन्त सामर्थ्य को स्वाभाविक बुद्धि से नापने का साहस करना कैसा पागलपन है!

इसलिए जो लोग बहाने के रूप में यह कहते हैं कि विनम्रता उन्हें प्रेरित पौलुस की साक्षी को स्वीकार करने से रोकती है, उन्हें अनिवार्य रूप से, पहले तो, यह मानना होगा कि परमेश्वर के न्याय की जो भी प्रशंसा वे करते हैं वह उनकी अपनी स्वाभाविक समझ की सीमाओं तक ही सीमित है। और फिर, यदि वास्तव में हमसे सहमत होते हुए भी वे इस महान सिद्धान्त के इस भाग को दबा देना ही अच्छा समझते हैं, ताकि दुष्टों की ढिठाई को छूट न मिले, तो ऐसी सावधानी सर्वथा अनुचित है। मानो परमेश्वर का सम्मान हमारे झूठ से सुरक्षित रखा जा सके! परमेश्वर स्वयं ऐसी सुरक्षा को न केवल ठुकराता है, परन्तु अय्यूब की पुस्तक में घोषित करता है कि वह उसे घृणित है। ऐसे रक्षक सावधान रहें, कहीं ऐसा न हो कि प्रभु ने अपने वचन में जितनी सावधानी ठहराई है उससे अधिक सावधानी का दिखावा करके वे दोहरे पागलपन और मूर्खता के दोषी ठहरें।

जिस संयम और सावधानी की ये मनुष्य सिफारिश करते हैं, वह सचमुच अभक्तों की निन्दाओं को दबाने में लाभदायक है। परन्तु यदि ऐसे लोग यह मान लेते हैं कि वे अपने शब्दों से परमेश्वर और उसके सत्य के विद्रोहियों पर लगाम लगा सकेंगे, तो उनकी आशा और अपेक्षा हास्यास्पद है। प्रेरित पौलुस ने परमेश्वर की गुप्त युक्तियों पर, जितना आवश्यक था, उतना ठहरने के बाद, मानो हमें आगे जाने से रोकने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। फिर भी बेचैन आत्माएँ लात मारेंगी और सींग मारेंगी, और अस्थिर चपलता से अपने सामने खड़ी की गई बाड़ को फाँद जाएँगी। तो फिर तुम क्या सोचते हो कि वे इस या उस संयमी मन के संकेत पर रुक जाएँगे, जो उनकी अन्धाधुन्ध दौड़ पर और भी सँकरी सीमाएँ लगाना चाहता है? तुम उतना ही कर सकते हो जितना मकड़ी के जाले से उस उग्र स्वभाव के घोड़े को रोकने का यत्न करना, जिसने बाड़ तोड़ दी है और अपनी शक्ति में उछल रहा है। परन्तु तुम कहोगे कि ऐसे कठिन और गहरे विषय में संयम से सोचने से अच्छा कुछ नहीं। इसका इनकार कौन करता है? परन्तु साथ ही हमें यह परखना होगा कि वह संयम किस प्रकार और किस सीमा का है, कहीं ऐसा न हो कि हम पोपवादियों के सिद्धान्त में खिंच जाएँ, जो अपने चेलों को अपने प्रति आज्ञाकारी बनाए रखने के लिए उन्हें गूँगे और मूक पशुओं के समान बना देते हैं।

परन्तु क्या यह मसीही सरलता कहलाएगी कि उन बातों के ज्ञान को हानिकारक माना जाए जो परमेश्वर हमारे सामने रखता है? परन्तु (हमारे विरोधी कहते हैं) यह ऐसा विषय है जिससे अनजान बने रहने में न कोई हानि है न नुकसान। मानो हमारा स्वर्गीय शिक्षक इसका सर्वोत्तम निर्णायक न हो कि हमारे लिए क्या जानना लाभदायक है और किस सीमा तक जानना चाहिए! इसलिए कि हम लहरों के बीच संघर्ष न करें, न हवा में अस्थिर और अनिश्चित उड़ाए जाएँ, और न अपना पैर बहुत गहरे डालकर नीचे की खाड़ी में डूब जाएँ, हम अपने आप को परमेश्वर को ऐसा सौंप दें कि उसके द्वारा शासित और शिक्षित हों, ताकि उसके केवल वचन से सन्तुष्ट होकर हम उसमें जो पाते हैं उससे अधिक जानने की कभी इच्छा न करें। नहीं! चाहे ऐसा करने की सामर्थ्य हमें दी भी जाए। यह शिक्षा-ग्रहण की तत्परता, जिसमें हर भक्त मनुष्य अपने मन की सारी शक्तियों को परमेश्वर के वचन के अधिकार के अधीन रखेगा, ही ज्ञान का सच्चा और एकमात्र नियम है।

अब जहाँ कहीं और जहाँ तक भी वह, जो “मार्ग” है, अपने बढ़ाए हुए हाथ से हमें ले चलता है, जिसके आत्मा ने प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें कीं, हम बहुत सुरक्षित रूप से उसके पीछे चल सकते हैं। और उन सब बातों से अनजान बने रहना जो परमेश्वर की पाठशाला में सीखी नहीं जातीं, मानवीय बुद्धि की सारी पैठ से कहीं श्रेष्ठ है। इसीलिए मसीह अपनी भेड़ों से माँग करता है कि वे न केवल अपने कान उसकी वाणी के लिए खुले रखें, परन्तु अजनबियों की वाणी के लिए उन्हें बन्द भी रखें। और यह हो ही नहीं सकता कि भ्रम की व्यर्थ हवाएँ चारों ओर से उस प्राण में से होकर न बहें जो खरे सिद्धान्त से रहित है। इसके अतिरिक्त, मैं पूरी सच्चाई से मान सकता हूँ कि मैं इस विषय पर कभी न बोलता और न लिखता यदि मेरे अपने प्राण में परमेश्वर के वचन ने अगुवाई न की होती। सब भक्त पाठक मेरी पिछली रचनाओं से, और विशेषकर मेरी “संस्थापना” से, निश्चय ही यह जान लेंगे। परन्तु मेरे उन शत्रुओं का, जो मेरे विरोध में खड़े हैं, यह वर्तमान खण्डन सम्भवतः मेरे मित्रों को इस विषय पर कुछ नया प्रकाश देगा।

परन्तु चूँकि प्राचीन कलीसिया का अधिकार बड़े द्वेष के साथ मेरे मुँह पर मारा जाता है, इसलिए आरम्भ में ही यह विचार करना सम्भवतः लाभदायक होगा कि इस शत्रुता के नीचे, जिसका आधार एक अर्थ में झूठा और दूसरे अर्थ में तुच्छ है, मसीह का सत्य कितने अन्याय से दबाया जा रहा है। फिर भी इस आरोप को, जैसा भी वह है, मैं अपने शब्दों की अपेक्षा अगस्तीन के शब्दों से धोना अधिक पसन्द करूँगा; क्योंकि प्राचीन काल में पेलागियसवादी उसे इसी आरोप से सताते थे, यह कहते हुए कि कलीसिया के अन्य सब लेखक उसके विरोध में हैं। अपने उत्तर में वह कहता है कि पेलागियस के पाखण्ड से पहले आदिकालीन कलीसिया के पिताओं ने पूर्वनियति के विषय में अपने मत इतनी गहराई और सूक्ष्मता से प्रस्तुत नहीं किए, और यह उत्तर वास्तव में सत्य है। और वह जोड़ता है: “हमें उन लेखकों की रचनाओं में खोज करने की क्या आवश्यकता है जिन्होंने, पेलागियस के पाखण्ड के उठने से पहले, स्वयं को इस प्रश्न में, जिसका समाधान इतना कठिन है, लगाने की कोई आवश्यकता नहीं पाई? यदि ऐसी आवश्यकता उठती, और उन्हें पूर्वनियति के शत्रुओं को उत्तर देना पड़ता, तो उन्होंने निःसन्देह वैसा किया होता।” अगस्तीन का यह कथन विवेकपूर्ण और बुद्धिमानी का है। क्योंकि यदि परमेश्वर के अनुग्रह के शत्रुओं ने स्वयं अगस्तीन को न सताया होता, तो उसने परमेश्वर के चुनाव की चर्चा में (जैसा वह स्वयं मानता है) इतना परिश्रम कभी न किया होता।

इसी कारण, अपनी उस पुस्तक के विषय में, जिसका शीर्षक है “दृढ़ता की आशीष पर” (On the Blessing of Perseverance), वह स्पष्ट शब्दों में कहता है, “पवित्र लोगों की यह पूर्वनियति निश्चित और प्रकट है; जिसकी रक्षा मुझे आवश्यकता ने बाद में अधिक परिश्रम और यत्न से करने को विवश किया, जब मैं एक नये पन्थ के विरोध में इस विषय की चर्चा कर रहा था। क्योंकि मैंने जाना है कि हर पृथक् पाखण्ड कलीसिया में अपने विशेष प्रश्न ले आता है, जो पवित्र शास्त्र के उस रक्षण की माँग करते हैं जो अधिक परिश्रमी हो, उस स्थिति से जहाँ रक्षा की ऐसी कोई आवश्यकता उठी ही न होती। क्योंकि अपनी उस रचना में पवित्रशास्त्र के उन अंशों की, जिनमें पूर्वनियति हमारे सम्मुख रखी गई है, अधिक प्रचुरता और अधिक पूर्ण व्याख्या के साथ रक्षा करने के लिए मुझे किसने विवश किया? पेलागियसवादियों के उठ खड़े होने के सिवा और किसने, जो कहते हैं कि परमेश्वर का अनुग्रह हमें इस अनुपात में दिया जाता है जिस अनुपात में हम स्वयं को उसके योग्य ठहराते हैं?”

इसके अतिरिक्त, अगस्तीन ने इससे ठीक पहले इस बात का खण्डन किया था कि उसकी पुस्तकों के विरुद्ध प्राचीन कलीसिया के अधिकार के अभाव के कारण कोई पूर्वाग्रह उचित रूप से रखा जा सकता है। वह कहता है, “कोई भी निश्चय ही इतना अन्यायी या इतना द्वेषी नहीं हो सकता कि मुझे इस महत्त्वपूर्ण विषय से अपने लिए कुछ शिक्षा और लाभ प्राप्त करने की अनुमति न दे।” और आगे वह यह तर्क देता है कि प्राचीन पिताओं में से कुछ की साक्षियों से यह जाना जा सकता है कि उनके विचार और शिक्षा वही थीं जो उसकी अपनी हैं। अन्य प्रमाणों का, जिनका वह उल्लेख करता है, उल्लेख न भी करूँ, तो वह प्रमाण जो वह अम्ब्रोस से उद्धृत करता है, सन्तोष से अधिक है: “मसीह जिस पर दया करता है, उसे बुलाता है।” फिर, “जब वह चाहता है, तब असावधानों को भक्त बना देता है।” और फिर, “परन्तु परमेश्वर जिसे बुलाने की कृपा करता है, उसे बुलाता है; और जिसे वह चाहता है, उसे भक्त बनाता है।” अब कौन नहीं देखता कि सारे दैवी विषय का सार इन थोड़े-से शब्दों में समाया हुआ है? अम्ब्रोस यहाँ वह कारण या हेतु बताता है कि सब मनुष्य उद्धार पाने के लिए मसीह के पास क्यों नहीं आते। इसलिए कि परमेश्वर उनके हृदयों को प्रभावकारी रूप से नहीं छूता। वह पवित्र जन घोषित करता है कि पापी का मन-परिवर्तन परमेश्वर के स्वतंत्र चुनाव से निकलता है, और यह कि वह कुछ को क्यों बुलाता है जबकि दूसरे त्यागे हुए छोड़ दिए जाते हैं, इसका कारण केवल उसकी अपनी इच्छा में है। अम्ब्रोस यहाँ न हिचकिचाता है न छिपाता है। अब सामान्य से सामान्य विवेक रखनेवाला कौन है जो यह नहीं देखता कि सारे प्रश्न की स्थिति इन तीन सार-वाक्यों में निहित और परिभाषित है?

संक्षेप में, अगस्तीन पूर्णतः मेरे साथ है, इतना कि यदि मैं अपने विश्वास का अंगीकार लिखना चाहूँ तो उसकी रचनाओं में से ही पूर्ण रूप से और अपने सन्तोष के अनुसार लिख सकता हूँ। परन्तु इस अवसर पर अधिक लम्बा न होने के लिए मैं उसकी साक्षी के तीन-चार उदाहरणों से ही सन्तुष्ट रहूँगा, जिनसे प्रकट हो जाएगा कि वह मुझसे तिल-भर भी भिन्न नहीं है। और यह और भी स्पष्ट हो जाता, यदि उसके अंगीकार की सारी पंक्ति प्रस्तुत की जा सकती कि वह हर बात में मुझसे कितनी पूर्णता और दृढ़ता से सहमत है। अपनी पुस्तक “सन्तों की पूर्वनियति के विषय में” (Concerning the Predestination of the Saints) में वह ये शब्द कहता है: “कहीं कोई यह न कहे कि मेरा विश्वास, मेरी धार्मिकता (या ऐसी ही कोई बात) मुझे औरों से अलग करती है; ऐसे सब विचारों का सामना करते हुए अन्यजातियों का महान शिक्षक पूछता है, ‘तेरे पास क्या है जो तूने नहीं पाया?’ मानो प्रेरित ने कहा हो: तू उसके सिवा और किससे पा सकता था जो तुझे हर दूसरे से अलग करता है, जिसे उसने वह नहीं दिया जो उसने तुझे दिया है?” तब अगस्तीन जोड़ता है, “इसलिए विश्वास, अपने आरम्भ से लेकर सिद्धता तक, परमेश्वर का दान है। और यह दान कुछ को दिया जाता है और दूसरों को नहीं, इसका इनकार कौन करेगा सिवाय उसके जो पवित्रशास्त्र की अत्यन्त स्पष्ट साक्षियों से लड़ना चाहे? परन्तु विश्वास सब को क्यों नहीं दिया जाता, यह उस विश्वासी को चिन्तित नहीं करना चाहिए जो जानता है कि सब मनुष्य एक के पाप के कारण अत्यन्त न्यायोचित दण्ड-आज्ञा के अधीन आ गए। परन्तु परमेश्वर एक को इस दण्ड-आज्ञा से क्यों छुड़ाता है और दूसरे को नहीं, यह उसके अगम्य न्यायों का विषय है, और ‘उसके मार्ग अगम हैं।’ और यदि इसकी जाँच-पड़ताल की जाए कि विश्वास का प्रत्येक ग्रहण करनेवाला परमेश्वर की दृष्टि में ऐसा दान पाने के योग्य कैसे ठहरता है, तो ऐसे लोगों की कमी नहीं जो कहेंगे, यह उनकी मानवीय इच्छा से है। परन्तु हम कहते हैं कि यह अनुग्रह से, अर्थात् दैवी पूर्वनियति से है।”

तब वह पवित्र पिता ये सुन्दर और प्रभावशाली टिप्पणियाँ करता है: “सचमुच जगत का उद्धारकर्ता स्वयं, परमेश्वर का आराधना योग्य पुत्र, दैवी अनुग्रह और अनन्त पूर्वनियति का सबसे उज्ज्वल प्रकाशमान है, न केवल अपने दैवी स्वभाव के विषय में जो परमेश्वर का पुत्र है, परन्तु विशेष रूप से अपने मानवीय स्वभाव के सम्बन्ध में भी जो ‘मनुष्य’ है। क्योंकि मैं पूछता हूँ, ‘मनुष्य मसीह यीशु’ ने, मनुष्य के रूप में, इतनी बड़ी महिमा किस प्रकार अर्जित की कि सह-अनादि पिता के वचन के द्वारा पुत्र के दैवी व्यक्तित्व के साथ एकता में ले लिया जाकर वह ‘परमेश्वर का एकलौता पुत्र’ बन गया? इस महिमामय स्थिति में कौन-सा भला वचन या कर्म पहले आया? ‘उस मनुष्य’ ने कौन-सा भला कार्य किया? उसने विश्वास का कौन-सा कृत्य किया? उसने कौन-सी प्रार्थना की कि वह ऐसी सर्वोपरि प्रतिष्ठा तक उठाया जाए? अब यहाँ सम्भव है कोई अपवित्र और ढीठ प्राणी कहने को प्रवृत्त हो, ‘इस उत्कृष्ट महानता के लिए पूर्वनियत मैं क्यों न हुआ?’ यदि हम प्रेरित की गम्भीर अपील में उत्तर दें, ‘हे मनुष्य, तू कौन है जो परमेश्वर का सामना करता है?’ और यदि वह तब भी अपने दुस्साहसी मन पर अंकुश न रखे, बल्कि अपनी निन्दा को और छूट देकर कहे, ‘तुम मुझसे यह चेतावनी क्यों कहते हो, “हे मनुष्य, तू कौन है?” आदि। क्या मैं भी मनुष्य नहीं जैसा वह था जिसके विषय में तुम कहते हो? तब मैं अब वह क्यों नहीं हूँ जो वह है? वह तो, निस्सन्देह, जो है और जितना महान है, अनुग्रह से है। तब जहाँ स्वभाव एक ही है वहाँ अनुग्रह भिन्न क्यों है? क्योंकि परमेश्वर के यहाँ तो निश्चय ही किसी का पक्षपात नहीं।’ अब मैं गम्भीरता से पूछूँगा, कौन-सा मसीही मनुष्य, बल्कि कौन-सा पागल, ऐसा तर्क करेगा, कहेगा, या सोचेगा? तो हमारा महिमामय सिर स्वयं, जो सब अनुग्रह का सोता है, अनन्त पूर्वनियति का सदा चमकता प्रकाशमान और उसके सर्वाधिकारपूर्ण स्वरूप का दैवी उदाहरण हो। और उसी से चुनने वाले अनुग्रह की धारा उसके सब अंगों में, प्रत्येक में ‘दान के परिमाण के अनुसार’ बहे। यही सन्तों की अनन्त पूर्वनियति है, जो पवित्र जनों के उस पवित्र जन में ऐसे अनुपम तेज से चमकी! और जैसे केवल वही मनुष्य के रूप में हमारा सिर होने के लिए पूर्वनियत हुआ, वैसे ही हम में से बहुत लोग भी उसके अंग होने के लिए पूर्वनियत हुए हैं।”

अब, इसलिए कि कोई यह न माने कि एक का दूसरे से अधिक चुना जाना विश्वास के कारण है, अगस्तीन साक्षी देता है कि मनुष्य इसलिए नहीं चुने जाते कि वे विश्वास करते हैं, परन्तु इसके विपरीत इसलिए चुने जाते हैं कि वे विश्वास करें। इसी प्रकार, सेक्स्तुस को लिखते हुए वह कहता है, “उस महान गहराई के विषय में — क्यों एक मनुष्य विश्वास करता है और दूसरा नहीं, क्यों परमेश्वर एक मनुष्य को छुड़ाता है और दूसरे को नहीं — जो खोज सकता है वह उस गहरे अथाह कुण्ड में खोजे; परन्तु उस भयानक कगार से सावधान रहे।” फिर, एक और स्थान पर वह कहता है: “त्यागे हुओं को किसने रचा, परमेश्वर के सिवा? और क्यों? क्योंकि उसने चाहा। उसने क्यों चाहा? — ‘हे मनुष्य, तू कौन है जो परमेश्वर का सामना करता है?’” और फिर, अन्यत्र, यह सिद्ध करने के बाद कि परमेश्वर मनुष्यों को अपनी आज्ञाओं का आज्ञाकारी बनाने के लिए उनके किसी भी पुण्य से प्रेरित नहीं होता, परन्तु उन्हें बुराई के बदले भलाई देता है, और वह भी अपनी ही खातिर, उनकी खातिर नहीं, वह जोड़ता है, “यदि कोई पूछे कि परमेश्वर कुछ मनुष्यों को अपनी भेड़ें क्यों बनाता है और दूसरों को नहीं, तो प्रेरित इस प्रश्न से भयभीत होकर पुकार उठता है, ‘आहा! परमेश्वर का धन और बुद्धि और ज्ञान कैसा गम्भीर है! उसके विचार कैसे अथाह, और उसके मार्ग कैसे अगम हैं!’

और जैसे अगस्तीन, चुनाव का आरम्भ या उद्गम परमेश्वर की स्वतंत्र और निःशुल्क इच्छा में खोजकर, त्याग को भी उसकी केवल इच्छा में रखता है, वैसे ही वह सिखाता है कि हमारे उद्धार की सुरक्षा भी उसी इच्छा में स्थित है, और किसी अन्य बात में नहीं। क्योंकि पौलिनुस को लिखते हुए वह दृढ़तापूर्वक कहता है कि जो अन्त तक स्थिर नहीं रहते वे परमेश्वर की उस बुलाहट के नहीं हैं जो सदा प्रभावकारी है और जिसमें उसकी ओर से कोई पछतावा नहीं। और एक अन्य रचना में वह और अधिक पूर्णता से यह स्थापित करता है कि अन्त तक स्थिर रहना चुने हुओं को निःशुल्क दिया जाता है, जिससे वे कभी गिर नहीं सकते। वह कहता है, “इस प्रकार, जब मसीह ने पतरस के लिए प्रार्थना की कि उसका विश्वास जाता न रहे, तो उसने परमेश्वर से और क्या माँगा सिवाय इसके कि पतरस के विश्वास के साथ, या उसमें, एक पूर्णतः स्वतंत्र, पूर्णतः साहसी, पूर्णतः विजयी, पूर्णतः दृढ़ रहनेवाली इच्छा, या संकल्प, हो? और उसने इससे ठीक पहले कहा था, ‘परमेश्वर की नींव अटल है, और उस पर यह छाप है: प्रभु अपनों को जानता है।’ ऐसे लोगों का विश्वास, जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है, या तो बिलकुल जाता नहीं, या, यदि कोई ऐसे हैं जिनमें वह आंशिक रूप से जाता है, तो इस जीवन के समाप्त होने से पहले वह नया किया जाता और पुनः स्थापित हो जाता है। वह अधर्म, जिसने उसे रोक दिया था, दूर कर दिया जाता है, और विश्वास फिर अन्त तक बना रहता है। परन्तु वे जिन्हें परमेश्वर ने स्थिर रहने के लिए ठहराया नहीं है — यदि वे मसीही विश्वास से गिर जाएँ, और जीवन का अन्त उन्हें इसी गिरी हुई दशा में पाए — तो ऐसे लोग, निस्सन्देह, परमेश्वर के चुने हुओं की इस संख्या में नहीं हो सकते थे, तब भी जब वे सारे दिखावे में भले और धार्मिक जीवन बिता रहे थे। क्योंकि ऐसे लोग परमेश्वर के पूर्वज्ञान और पूर्वनियति के द्वारा विनाश के सामान्य पिण्ड से कभी अलग नहीं किए गए थे, और इसलिए ‘उसके उद्देश्य के अनुसार’ कभी ‘बुलाए’ नहीं गए थे।” और इसलिए कि जिन्हें परमेश्वर की सन्तान समझा गया था उनके कभी-कभी भटक जाने से किसी का मन विचलित न हो, वह ऐसे उलझे हुओं का सामना इस प्रकार करता है: “कोई यह न सोचे कि वे कभी गिरते हैं जो पूर्वनियति के विषय हैं, जो परमेश्वर के उद्देश्य के अनुसार बुलाए हुए हैं, और जो सचमुच प्रतिज्ञा की सन्तान हैं। जो दिखावे में भक्तिपूर्ण जीवन जीते हैं उन्हें मनुष्य तो परमेश्वर की सन्तान कहते हैं; परन्तु क्योंकि वे कभी न कभी अभक्ति का जीवन जीने और उसी अभक्ति में मरने के लिए ठहराए हैं, इसलिए परमेश्वर अपने पूर्वज्ञान में उन्हें अपनी सन्तान नहीं कहता। जो जीवन के लिए ठहराए गए हैं, उन्हें पवित्रशास्त्र में मसीह को दिए हुए माना गया है। ये पूर्वनियत और बुलाए हुए हैं, परमेश्वर के उद्देश्य के अनुसार। इनमें से कोई कभी नाश नहीं होता। और इस कारण इनमें से कोई भी, यद्यपि कुछ समय के लिए भले से बुरा बन गया हो, अपना जीवन ऐसे नहीं समाप्त करता, क्योंकि वह इसी उद्देश्य से परमेश्वर की ओर से ठहराया गया है, और इसी उद्देश्य से मसीह को दिया गया है, कि वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए।”

थोड़ा आगे वही अगस्तीन कहता है, “जो परमेश्वर की सर्वदर्शी ठहरावट के द्वारा पूर्वज्ञात, पूर्वनियत, बुलाए हुए, धर्मी ठहराए गए और महिमान्वित किए गए हैं, वे न केवल नया जन्म पाने से पहले, परन्तु स्त्री से जन्म लेने से पहले ही परमेश्वर की सन्तान हैं; और ऐसे लोग कभी नाश नहीं हो सकते।” तब वह कारण बताता है: “क्योंकि (वह कहता है) परमेश्वर ऐसे लोगों के लिए सब कुछ मिलाकर भलाई ही के लिए करता है; और वह सब बातों को उनकी भलाई के लिए इस प्रकार एक साथ कार्य कराता है कि यदि उनमें से कुछ मार्ग से भटक जाएँ और सब सीमाओं को भी लाँघ जाएँ, तो वह इसे भी उनकी भलाई और लाभ के लिए कार्य कराता है; क्योंकि वे पहले से अधिक नम्र और अधिक शिक्षा-ग्रहण करनेवाले होकर उसके पास लौट आते हैं।”

और यदि बात को और ऊँचे ले जाया जाए, और मनुष्य की प्रथम सृष्टि के विषय में प्रश्न उठाया जाए, तो अगस्तीन उस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार देता है: “हम उसे जो हम अत्यन्त उचित रूप से मानते हैं, अत्यन्त हितकारी रीति से अंगीकार करते हैं, कि परमेश्वर, सब वस्तुओं का प्रभु, जिसने सब कुछ ‘बहुत अच्छा’ रचा, उसने पहले से जान लिया कि इस भलाई में से बुराई उत्पन्न होगी; और वह यह भी जानता था कि बुराई को बिलकुल होने ही न देने की अपेक्षा बुराई में से भलाई निकालना उसकी सर्वशक्तिमान भलाई की अधिक महिमा के लिए है! और उसने स्वर्गदूतों और मनुष्यों के जीवन को इस प्रकार ठहराया कि वह पहले उनमें यह दिखाए कि स्वतंत्र इच्छा क्या कर सकती है, और फिर आगे यह दिखाए कि उसके अनुग्रह का निःशुल्क दान और उसके न्याय का निर्णय क्या कर सकते हैं।”

लौरेन्तियुस को लिखी अपनी “पुस्तिका” (Manual) में वह जो कुछ भी सन्देह शेष रह सकता था उसे और अधिक खुलकर और पूर्णता से समझाता है। “जब मसीह (वह कहता है) अन्तिम दिन जगत का न्याय करने को प्रकट होगा, तब ज्ञान के सबसे स्पष्ट प्रकाश में वह दिखाई देगा जिसे भक्तों का विश्वास अब थामे है, यद्यपि वह उनकी समझ पर अभी प्रकट नहीं हुआ है: कि परमेश्वर की इच्छा कितनी निश्चित, कितनी अपरिवर्तनीय, कितनी सर्वप्रभावी है; कितनी बातें वह कर सकता है, या करने की सामर्थ्य रखता है, जिन्हें वह करना नहीं चाहता (परन्तु वह ऐसा कुछ नहीं चाहता जिसे करने की सामर्थ्य उसमें न हो); और भजनकार का यह गीत कितना सच है, ‘यहोवा ने स्वर्ग में जो कुछ चाहा वही किया।’ परन्तु यह सच नहीं होता यदि उसने कुछ बातें चाहीं और उन्हें किया नहीं। इसलिए कुछ भी नहीं होता सिवाय उसके जिसे सर्वशक्तिमान ने होना चाहा, चाहे उसे होने देकर, चाहे स्वयं करके। और इस विषय में सन्देह नहीं रखा जाना चाहिए कि जो कुछ बुरी रीति से किया जाता है उस सब को होने देने में परमेश्वर धार्मिकता से करता है। क्योंकि वह इसकी अनुमति धर्ममय न्याय के बिना नहीं देता। इसलिए, यद्यपि जो बातें बुरी हैं वे, जहाँ तक वे बुरी हैं, अच्छी नहीं हैं, तथापि यह अच्छा है कि केवल अच्छी बातें ही नहीं, बुरी बातें भी हों। क्योंकि यदि यह भलाई न होती कि बुरी बातें भी अस्तित्व में रहें, तो उन बुरी बातों को उस महान और भले सर्वशक्तिमान के द्वारा अस्तित्व में रहने की अनुमति कभी न मिलती। क्योंकि वह निस्सन्देह उसे होने की अनुमति देने से इनकार कर सकता है जिसका होना वह नहीं चाहता, उतनी ही सरलता से जितनी सरलता से वह उसे कर सकता है जिसका होना वह चाहता है। जब तक हम इस बात पर पूर्ण विश्वास न करें, हमारे विश्वास का आरम्भ ही संकट में पड़ जाता है, जिसमें हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करने का अंगीकार करते हैं!”

तब अगस्तीन यह संक्षिप्त वाक्य जोड़ता है: “ये प्रभु के पराक्रम के कार्य हैं, जो उसकी इच्छा के प्रत्येक उदाहरण में सिद्धता से चमकते हैं; और बुद्धि में इतने सिद्ध हैं कि जब स्वर्गदूतीय और मानवीय स्वभाव ने पाप किया — अर्थात् वह नहीं किया जो परमेश्वर ने चाहा, परन्तु वह जो प्रत्येक स्वभाव ने स्वयं चाहा — तो ऐसा हुआ कि सृष्ट प्राणी की इसी इच्छा के द्वारा परमेश्वर ने, यद्यपि एक अर्थ में अनिच्छुक होकर, तथापि जो उसने चाहा वह धार्मिकता से और सारी बुद्धि की पराकाष्ठा के साथ पूरा किया, किए गए बुरे कामों को उनके विनाश की ओर मोड़ते हुए जिन्हें उसने न्यायपूर्वक दण्ड के लिए पूर्वनियत किया था, और उनके उद्धार की ओर जिन्हें उसने दया से अनुग्रह के लिए पूर्वनियत किया था। इसलिए, जहाँ तक इन स्वभावों का सम्बन्ध है, उन्होंने जो किया वह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध किया; परन्तु जहाँ तक परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता का सम्बन्ध है, उन्होंने उसकी इच्छा के अनुसार कार्य किया; और वे उसके विरुद्ध कार्य कर भी नहीं सकते थे। इसलिए, उनके परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध कार्य करने से ही उनके विषय में परमेश्वर की इच्छा पूरी हुई। इस प्रकार परमेश्वर के कार्य इतने पराक्रमी हैं, उसकी इच्छा के प्रत्येक उदाहरण में इतने महिमामय और उत्तम रीति से सिद्ध हैं, कि अपने में विशिष्ट, ‘सर्वबुद्धिमान परमेश्वर’ के रूप में, कार्य करने की एक अद्भुत और अवर्णनीय योजना के द्वारा, वह नहीं किया जा सकता जो उसकी इच्छा के बिना हो और जो उसकी इच्छा के विरुद्ध भी हो; क्योंकि वह उसकी अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता था, और वह अनुमति स्पष्टतः उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं, परन्तु उसकी इच्छा के अनुसार है।” अगस्तीन की रचनाओं में इसी प्रकार की अनेक बातों में से ये थोड़ी-सी बातें मैंने प्रसन्नतापूर्वक इसलिए उद्धृत की हैं कि मेरे पाठक स्पष्ट देख लें कि पिघियस कैसे अत्यन्त विनम्र मुख से उसे मुझसे भिन्न दिखाता है! और अपनी भूलों के समर्थन में उसका उपयोग करता है! वास्तव में मैं आगे इस चर्चा के क्रम में इसी पवित्र जन की साक्षियों का यथावसर उल्लेख करूँगा।

अब मैं इस वर्तमान उपक्रम के अधिक स्पष्ट विषय और उद्देश्य में प्रवेश करूँगा, जो यह सिद्ध करना है कि इस महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त के विषय में मेरे द्वारा वही सिखाया गया है जो परमेश्वर स्वयं हम सबको पवित्र वचनों में स्पष्टता से सिखाता है। उसका सार यह है: कि विश्वासियों का उद्धार परमेश्वर के अनन्त चुनाव पर निर्भर है, जिसका कोई कारण या हेतु उसकी अपनी निःशुल्क सुइच्छा के सिवा नहीं बताया जा सकता। इस विषय में प्रेरित पौलुस के शब्द, इफिसियों के नाम अपनी पत्री के प्रथम अध्याय में, अत्यन्त स्पष्ट और वाग्मितापूर्ण हैं: “हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो (वह कहता है), जिसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया।” अब मैं तत्क्षण पिघियस की बकबक सुनता हूँ कि सारी मानव-जाति मसीह में चुनी गई; कि जो कोई विश्वास के द्वारा उसे थाम ले वह उद्धार पाएगा। उसकी इस बेतुकी कल्पना में दो अत्यन्त स्थूल भूलें हैं, जिनका प्रेरित के शब्दों से तुरन्त खण्डन किया जा सकता है।

पहली बात यह कि चुने हुओं और त्यागे हुओं के बीच निश्चय ही और स्पष्ट रूप से एक अटूट सम्बन्ध है। इसलिए जिस चुनाव की चर्चा प्रेरित करता है, वह तब तक नहीं ठहर सकता जब तक हम यह न मानें कि परमेश्वर ने सब औरों से कुछ ऐसे व्यक्तियों को अलग किया जिन्हें इस प्रकार अलग करना उसे अच्छा लगा। अब परमेश्वर के इस कार्य को पूर्वनियत करना शब्द से व्यक्त किया गया है, जिसे प्रेरित आगे दो बार दोहराता है। इसके अतिरिक्त वह उन्हें “चुना हुआ” कहता है जो विश्वास के द्वारा मसीह की देह में कलम लगाए गए हैं; और यह कि यह आशीष किसी प्रकार भी सब मनुष्यों के लिए सामान्य नहीं है, यह खुला प्रकट है। इसलिए प्रेरित “चुने हुओं” से स्पष्टतः उन्हें समझता है जिन्हें मसीह, पिता द्वारा उसे दिए जाने के बाद, बुलाने की कृपा करता है। परन्तु विश्वास को चुनाव का कारण बनाना सर्वथा बेतुका है, और प्रेरित के शब्दों से पूरी तरह विपरीत है। “पौलुस यह घोषित नहीं करता (जैसा अगस्तीन बुद्धिमानी से देखता है) कि परमेश्वर की सन्तान इसलिए ‘चुनी गई’ कि उसने पहले से जान लिया कि वे विश्वास करेंगे, परन्तु इसलिए कि वे विश्वास करें। और न प्रेरित (वह कहता है) उन्हें इसलिए ‘चुना हुआ’ कहता है कि परमेश्वर ने देख लिया था कि वे पवित्र और निष्कलंक होंगे, परन्तु इसलिए कि वे ऐसे बनाए जाएँ।” फिर, “परमेश्वर ने हमें इसलिए नहीं चुना (वह कहता है) कि हम विश्वास करते थे, परन्तु इसलिए कि हम विश्वास करें, ऐसा न हो कि हम प्रतीत हों कि पहले हमने उसे चुना। पौलुस ऊँचे स्वर में घोषित करता है कि हमारा पवित्र होने का आरम्भ ही चुनाव का फल और परिणाम है। इसलिए जो चुनाव को विश्वास के बाद रखते हैं वे अत्यन्त उलटा काम करते हैं।” वह आगे यह भी कहता है, “जब पौलुस चुनाव का एकमात्र आधार वह सुइच्छा ठहराता है जो परमेश्वर में स्वयं थी, तो वह अन्य सब कारणों को, जो भी हों, बाहर कर देता है।” इसलिए अगस्तीन ठीक ही हमें चेताता है कि हम सदा चुनाव के उस प्रथम महान कारण तक लौटें, ऐसा न हो कि हम अपनी निज इच्छा की सुइच्छा पर घमण्ड करने लगें!

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