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हम आवश्यकतावश पाप करते हैं (परमेश्वर के सम्बन्ध में)
अनुच्छेद XIII.
(अर्थात् निन्दा XIII.)
हम आवश्यकतावश (परमेश्वर के सम्बन्ध में) पाप करते हैं, चाहे हम अपने संकल्प से पाप करें
या संयोगवश।
अनुच्छेद XIV.
(अर्थात् निन्दा XIV.)
मनुष्य अपनी इच्छा से जो-जो दुष्टताएँ करते हैं, वे दुष्टताएँ परमेश्वर की
इच्छा से भी उत्पन्न होती हैं।
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निन्दक की
अनुच्छेद XIII. और XIV. पर
टिप्पणियाँ और कथन
इन दोनों अनुच्छेदों के विरुद्ध आपके विरोधी ये तर्क देते हैं: यदि हम आवश्यकतावश पाप करते हैं तो सारी चेतावनियाँ स्पष्टतः व्यर्थ हैं, और तब भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह ने लोगों से ये वचन व्यर्थ ही कहे, "यहोवा यों कहता है, देखो, मैं तुम्हारे सामने जीवन का मार्ग और मृत्यु का मार्ग रखता हूँ। जो इस नगर में रहेगा वह तलवार, अकाल और मरी से मरेगा; परन्तु जो निकलकर उन कसदियों के पास जा पड़ेगा जिन्होंने तुम्हें घेर रखा है, वह जीवित रहेगा, और उसका प्राण उसके लिये लूट की सम्पत्ति ठहरेगा" (यिर्मयाह 21:8, 9)। मैं फिर कहता हूँ, यह सारी चेतावनी और समझाइश सर्वथा व्यर्थ है, यदि वस्तुओं की स्थिति और आवश्यकता के कारण कसदियों की ओर भाग जाना उतना ही असम्भव था जितना किसी पहाड़ को निगल जाना।
यदि कैल्विन यहाँ यह उत्तर दे कि परमेश्वर की आज्ञाएँ मनुष्यों के सामने इसलिए रखी जाती हैं कि वे निरुत्तर ठहरें, तो हम प्रत्युत्तर में कहते हैं कि यह भी सर्वथा व्यर्थ है। क्योंकि यदि कोई पिता अपने पुत्र को आज्ञा दे कि वह एक पहाड़ खा जाए, और पुत्र उसे न करे, तो पिता की उस आज्ञा के बाद वह पुत्र उससे पहले की अपेक्षा किंचित् भी अधिक निरुत्तर नहीं ठहरता। ठीक इसी प्रकार, यदि परमेश्वर मुझे आज्ञा दे कि चोरी न कर, और फिर भी मुझे उसी की ओर से मुझ पर थोपी गई आवश्यकता के कारण चोरी करनी ही पड़े; और यदि उस आवश्यकता के कारण मैं चोरी से उतना ही नहीं रुक सकता जितना पहाड़ नहीं खा सकता; तो ऐसी आज्ञा के बाद मैं उससे पहले की अपेक्षा अधिक निरुत्तर नहीं हूँ, और न ही ऐसी आज्ञा से पहले मैं उसके बाद की अपेक्षा अधिक क्षम्य हूँ। संक्षेप में, कैल्विन के विरोधी यह तर्क देते हैं कि यदि उसका यह सिद्धान्त सचमुच सत्य है, तो मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा के उसके सामने रखे जाने से पहले ही निरुत्तर है। इससे यह परिणाम निकलेगा कि मनुष्य में यह निरुत्तरता उत्पन्न करने के उद्देश्य से दी गई सारी आज्ञा पूर्णतः अनावश्यक और व्यर्थ है।
इसके अतिरिक्त, यदि दुष्ट मनुष्य के दुष्ट बनने से पहले ही—अर्थात् उसके जन्म से भी पहले, अनन्त काल से—परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत ठहराया गया है, और यदि इसलिए वह आवश्यकतावश पाप करता है, तो वह उसे कोई आज्ञा दिए जाने से पहले ही निरुत्तर और दण्डित हो चुका है। और वह किसी भी बुरे कार्य के करने से पहले ही इस प्रकार दण्डित ठहरता है; जबकि मनुष्यों और परमेश्वर के सारे विधान मनुष्य को कर्म के बाद और कर्म के कारण दण्ड देते हैं।
जॉन कैल्विन का अनुच्छेद XIII. को उत्तर।
(अर्थात् निन्दा XIII.)
और उस पर निन्दक की टिप्पणियों आदि का उत्तर।
इस तेरहवें अनुच्छेद (अर्थात् निन्दा) में तुम वास्तव में क्या कहना या ठहराना चाहते हो, यह मैं किसी प्रकार पकड़ या समझ नहीं पाता। तुम मुझे उस मनुष्य के समान प्रतीत होते हो जो जादुई फुसफुसाहटों की भनभनाहट से मनुष्यों की इन्द्रियों को मोहित करने का प्रयत्न कर रहा हो। क्योंकि आकस्मिक पाप क्या हैं? तुम्हारे सिवा और किसने मानव मस्तिष्क की कार्यशाला में ऐसे अनसुने जीव गढ़े हैं? मैंने अन्यत्र अपने लेखों में सदा यही सिखाया है कि वे सब बातें जो संयोगवश घटती हुई दिखाई देती हैं, परमेश्वर के गुप्त विधान द्वारा शासित और नियन्त्रित हैं। किसने तुम्हें यह छूट दी कि वहाँ से आकस्मिक पाप का विचार निकाल लो? और क्या यह शिक्षा जो मैंने दी है मेरी अपनी थी और मेरी ही रची हुई? नहीं! इसका रचयिता स्वयं परमेश्वर है। यदि कोई मनुष्य वृक्ष की डालियाँ काट रहा हो और कुल्हाड़ी उसके हाथ से छूटकर पास से गुज़रते किसी के सिर पर जा गिरे, तो क्या तुम समझते हो कि यह संयोग है? परमेश्वर के दास मूसा ने ऐसा नहीं समझा। पवित्र आत्मा उसके द्वारा घोषित करता है कि जिस मनुष्य पर इस प्रकार चोट पड़ी, वह परमेश्वर के हाथ से मारा गया। तो क्या तुम यह कहने का साहस करोगे कि परमेश्वर अपने अस्त्र इधर-उधर फेंकता और प्रहार करता है, जैसे कोई मतवाला या पागल मनुष्य करता है? वास्तव में, यदि जैसा तुम कल्पना करते हो, मनुष्य परमेश्वर के संकल्प, समझ या मन के बिना पाप करते हैं, तो परमेश्वर संसार का न्यायी कैसे होगा? और यदि संसार में जो कुछ होता है वह परमेश्वर के संकल्प, समझ, मन और इच्छा के बिना होता है, तो परमेश्वर नश्वर मनुष्य से किस बात में बढ़कर है? आराधना के योग्य परमेश्वर मनुष्य से किस बात में ऊँचा और महान है?
इसलिए जब मैं यह दृढ़तापूर्वक कहता हूँ कि परमेश्वर मनुष्य के हर पाप को जानता है और उसमें उसका मन लगा रहता है, तो क्या तुम इसी कारण ऐसे उन्माद और इस शिक्षा के प्रति ऐसी घृणा में पड़ जाते हो कि मुझे झूठे परमेश्वर का गढ़नेवाला घोषित करो? अब मान लो कि मैं तुम्हें यह मान लेने दूँ कि मनुष्य परमेश्वर के ज्ञान के बिना और उसके मन के उसमें तनिक भी लगे बिना पाप करते थे, तो इस स्वीकृति से स्वर्ग या पृथ्वी में कौन-सा परमेश्वर शेष रह जाएगा? फिर भी तुम अपने आपको एक बड़ा लोकप्रिय शिक्षक समझते और उसका घमण्ड करते हो; जबकि इस प्रकार मनुष्य जो कुछ करते हैं, चाहे पाप हो या न हो, उस सब में परमेश्वर को मन लगाने से वंचित करके, और उसे केवल परमेश्वर की उपाधि से सम्मानित करके, जैसे लुक्रेशियस ने अपने स्वप्नों को किया था, तुम आराधना के योग्य परमेश्वर को एक निर्जीव, उदासीन मूर्ति से अधिक कुछ नहीं बना देते।
तुम्हारे इन तर्कों के विषय में कि यदि मनुष्य आवश्यकतावश पाप करते हैं तो सारी शिक्षा निरर्थक, सारी आज्ञाएँ व्यर्थ, सारी चेतावनियाँ बेकार, और सारी डाँट-फटकार और धमकियाँ बेतुकी हैं; यदि ऑगस्टीन की वह पुस्तक जो उसने वैलेंटीनस को "ताड़ना और अनुग्रह के विषय में" लिखी (जिस विषय की चर्चा के लिए ऑगस्टीन विशेष रूप से परमेश्वर की ओर से ठहराया गया था), तुम्हारे मस्तिष्क से इन तुच्छ आपत्तियों को धो देने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो तुम इस पवित्र विषय पर मुझसे एक शब्द और सुनने के भी योग्य नहीं हो। इसके अतिरिक्त, मैंने पिगियस को और तुम्हारे प्रिय गुरु सर्वेतुस को इस निन्दा पर से इतना खदेड़ दिया है कि सीखने को तैयार और निष्कपट पाठकों को मेरी साक्षी के इस विषय में मुझसे अब बचाव का एक और शब्द नहीं चाहिए। जिस महत्त्वपूर्ण सत्य-सिद्धान्त पर अभी विचार हो रहा है, उसके विषय में मेरे विरुद्ध की गई तुम्हारी डींग मारती निन्दाओं के उत्तर में मैं केवल यही एक संक्षिप्त बात कहूँगा। यदि तुम परमेश्वर को ऐसी कोई आज्ञा देने की अनुमति नहीं दोगे जो मनुष्यों की स्वाभाविक समझ से परे हो, तो जब परमेश्वर तुम्हें अपने न्यायासन के सामने खड़ा करेगा, तब वह तुम्हें भयावह स्पष्टता से वह दिखा देगा जो उसने अपने प्रेरित के मुख से व्यर्थ नहीं कहा; कि जो काम व्यवस्था से असम्भव था, उसे उसने अपने अनुग्रह से पूरा किया है (रोमियों 8:3)। यह स्पष्ट और निश्चित है कि व्यवस्था में वह सिद्ध धार्मिकता प्रस्तुत की गई है जिसकी परमेश्वर ने माँग की, ताकि यदि मनुष्यों में परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने की सामर्थ्य होती तो वह सब मनुष्यों की आँखों के सामने हाथ के पास और स्पष्ट रूप से उपस्थित रहती। परन्तु प्रेरित खुल्लमखुल्ला घोषित करता है कि व्यवस्था में आज्ञापित धार्मिकता को प्राप्त करना हमारी ओर से असम्भव है। तब परमेश्वर के इस विषय पर कैल्विन के सिद्धान्त के कारण उससे झगड़ने और उसे कोसने का तुम्हारे पास क्या आधार है?
यदि तुम (अपने ही तर्क के अनुसार) आवश्यकतावश चोरी करते हो, तो क्या तुम नहीं समझते कि व्यवस्था दिए जाने के बाद तुम उसके दिए जाने से पहले की अपेक्षा कम क्षम्य हो? प्रेरित पौलुस की अपने विषय में सम्मति कितनी भिन्न है, जहाँ वह मानता है कि वह "पाप के हाथ बिका हुआ" था, परन्तु साथ ही खुलकर और ऊँचे स्वर में गवाही देता है कि व्यवस्था "क्रोध उत्पन्न करती है"? इस प्रकार वह दिखाता है कि जब हर मनुष्य का अपना विवेक उसे स्वेच्छा से और जानबूझकर की गई दुष्टता का दोषी ठहराता है, तब अपनी रक्षा में आवश्यकता की ढाल आगे बढ़ाना व्यर्थ है।
अब मैं तुमसे बस यह प्रश्न पूछता हूँ: जब एक वर्ष पहले तुम्हारे हाथ में तुम्हारा अपना अंकुड़ा था, जिससे तुम अपने घर को गर्म रखने के लिए जलावन खींच सकते थे, तो क्या यह तुम्हारी अपनी इच्छा ही नहीं थी जिसने तुम्हें अपने पड़ोसी की लकड़ी चुराने को प्रेरित किया? तो यदि तुम्हारे अपने धर्मी दण्ड के लिए यही एक कार्य पर्याप्त है कि तुमने अपने पड़ोसी की हानि पर स्वेच्छा से नीच और दुष्टतापूर्ण लाभ कमाया, तो आवश्यकता के नाम पर तुम चाहे जितना शोर मचाओ, आवश्यकता ने उस अवसर पर तुम्हें निर्दोष नहीं ठहराया। और तुम्हारे आगे के शोर भरे तर्क के विषय में: कि किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं सिवाय उसके अपराध के कारण और अपराध के बाद; पहली बात के सम्बन्ध में मेरे और तुम्हारे बीच कोई झगड़ा या झगड़े का कारण नहीं है (या नहीं होना चाहिए), क्योंकि मैं सर्वत्र सिखाता हूँ कि कोई भी नाश नहीं होता सिवाय परमेश्वर के धर्मी न्याय के द्वारा। परन्तु मैं अपनी यह गवाही रोक नहीं सकता कि तुम्हारे शब्दों के नीचे विष की एक गहरी खाई छिपी है। क्योंकि यदि तुम्हारा इस ईश्वरीय विषय का कथन और तुम्हारी अलंकारिक उक्ति मान ली जाए, तो परमेश्वर अन्यायी ठहरेगा, जो अब्राहम की सारी जाति को आदि पाप के दोष के अधीन धार्मिकता से ठहराता है।
तुम इनकार करते हो कि परमेश्वर के लिए किसी भी नश्वर को दोषी ठहराना उचित और न्यायसंगत है, जब तक कि वह किए गए पाप के कारण न हो। परन्तु असंख्य नश्वर तो पूर्ण शिशु अवस्था में ही जीवन से उठा लिए जाते हैं। तब तुम्हारे लिए अच्छा होगा कि तुम स्वयं परमेश्वर से अपना विषैला युद्ध आरम्भ करो, जो अपनी माताओं के गर्भ से अभी-अभी निकले निर्दोष शिशुओं को आदि पाप के दोष के अधीन करता है, और उन्हें अपने क्रोध तथा अनन्त मृत्यु के योग्य ठहराता है। मैं पूछता हूँ, परमेश्वर के विरुद्ध इस प्रकार लड़ने की निन्दा से, जब वह सत्य की वाणी या लेखनी द्वारा प्रकट हो जाए, कौन घृणा न करेगा? जब तक चाहो मुझे कोसो, परन्तु आराधना के योग्य परमेश्वर की निन्दा मत करो। क्योंकि जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं उन लोगों की निन्दा से कभी मुक्त या बरी होने की आशा नहीं कर सकता जो सदा धन्य परमेश्वर तक को नहीं छोड़ते।
तुम्हारे तर्क के दूसरे अंग के विषय में, कि अपराध के बाद ही किसी को न्यायपूर्वक दोषी ठहराया जा सकता है, अपनी ही तराज़ू पर तौलकर देखो कि इसमें तुम्हारी वाचालता कितनी हल्की और खोखली है। अरे, तुम्हारे अपने गुरु पिगियस, सर्वेतुस और उन जैसे सब भौंकनेवाले अशुद्ध कुत्ते भी कम से कम यह तो मानेंगे कि जिन्हें परमेश्वर ने पहले से अनन्त विनाश के योग्य जाना था, वे जगत की उत्पत्ति से पहले उसके द्वारा दण्डित ठहराए गए थे; जबकि तुम परमेश्वर को किसी को अनन्त मृत्यु का दण्ड देने का अधिकार केवल उन्हीं के लिए देना चाहते हो जो पहले अपने वास्तव में किए गए अपराधों के लिए पार्थिव न्यायियों के सामने लाए गए हों। ऐसे तर्कों से पाठक तुरन्त जान सकते हैं कि तुम्हारा उन्माद कितना विस्मयकारी है, जो निरे खेल या ठट्ठे में ईश्वरीय न्याय की सारी गम्भीर व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने में नहीं हिचकिचाते!
निन्दक का
झूठे परमेश्वर का वर्णन।
झूठा परमेश्वर दया करने में धीमा और क्रोध करने में फुर्तीला है; जिसने संसार के अधिकांश भाग को विनाश के लिए सृजा है, और उन्हें न केवल दण्ड के लिए बल्कि उनके दण्ड के कारण के लिए भी पूर्वनियत किया है; और इसलिए अनन्त काल से उनके पापों को ठहराया है, और उन्हें चाहता और उत्पन्न करता है, जो पाप फलस्वरूप आवश्यकतावश होते हैं, ऐसे कि न चोरियाँ, न व्यभिचार, न हत्याएँ होती हैं, सिवाय उसकी इच्छा और प्रेरणा के। क्योंकि वह मनुष्यों में बिगड़ी और बुरी भावनाएँ केवल अनुमति के रूप में नहीं, वरन् प्रभावकारी रूप में डालता है, और मनुष्यों के हृदय कठोर करता है। इसलिए जब मनुष्य दुष्टता से जीवन बिताते हैं, तो वे अपना काम करने से अधिक परमेश्वर का काम कर रहे होते हैं, और अन्यथा कर नहीं सकते। यह परमेश्वर शैतान को झूठा बनाता है; ऐसे कि शैतान अपने झूठों का कारण स्वयं नहीं, वरन् कैल्विन का परमेश्वर है।
निन्दक का
सच्चे परमेश्वर का वर्णन।
परन्तु वह परमेश्वर जिसे प्रकृति, बुद्धि और पवित्रशास्त्र सिखाते हैं, कैल्विन के इस परमेश्वर से स्पष्टतः विपरीत है, क्योंकि वह दया की ओर झुका हुआ और क्रोध करने में धीमा है। और उसने पहले मनुष्य को, जिससे सब मनुष्य उत्पन्न हुए, अपने ही स्वरूप में सृजा, कि उसे वाटिका में रखे और उसे अनन्त जीवन प्रदान करे। यह परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, और एक भी मनुष्य नाश न हो। और इसी उद्देश्य से उसने अपने पुत्र को जगत में भेजा, कि जहाँ-जहाँ मनुष्य का पाप बढ़ा, वहाँ-वहाँ उसकी धार्मिकता बहुत हो। इस धार्मिकता की ज्योति "हर एक मनुष्य को जो जगत में आता है, प्रकाशित करती है," और परमेश्वर का यह पुत्र, जगत का उद्धारकर्ता, सब को पुकारकर कहता है, "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।" यह परमेश्वर भली और आदरणीय भावनाएँ सुझाता है, और मनुष्यों को पाप करने की उस आवश्यकता से छुड़ाता है (जिसमें वे अपनी अवज्ञा से स्वयं जा गिरते हैं); और वह लोगों में हर प्रकार की बीमारी और हर प्रकार की दुर्बलता को चंगा करता है। वरन् वह इतना दयालु है कि जो कोई उससे दया और सहायता की प्रार्थना करे, उसे वह कभी इनकार नहीं करता। वस्तुतः यह सच्चा परमेश्वर इसी उद्देश्य से आता है कि कैल्विन के उस परमेश्वर के कामों को नष्ट करे और उसे द्वार से बाहर निकाल दे।
अब ये दो परमेश्वर, जैसे स्वभाव से एक-दूसरे के विपरीत हैं, वैसे ही एक-दूसरे के सर्वथा विपरीत सन्तान भी उत्पन्न करते हैं। उस झूठे निर्दय परमेश्वर की सन्तान सदा घमण्डी, निर्दय, डाहकारी, खूनी, निन्दक, कपटी, मुख में कुछ और हृदय में कुछ और रखनेवाली, अधीर, उतावली, द्वेषी, उपद्रवी, झगड़ालू, महत्त्वाकांक्षी, लोभी, परमेश्वर के प्रेमी होने से अधिक सुख-विलास के प्रेमी होती है; सारांश यह कि उन बिगड़ी और बुरी भावनाओं से भरी होती है जो उनके परमेश्वर ने स्वयं उनमें फूँकी थीं। परन्तु दूसरा परमेश्वर ऐसे मनुष्य उत्पन्न करता है जो दयालु, नम्र, कोमल, उपकारी, भलाई करनेवाले, खून बहाने से घृणा करनेवाले, सीधे, निष्कपट, हृदय की बहुतायत से सत्य बोलनेवाले, दयावन्त, शान्त, मेल-मिलाप से रहनेवाले, झगड़ों और कलह से घृणा करनेवाले, मान-सम्मान को तुच्छ जाननेवाले, उदार, सुख-विलास के प्रेमी होने से अधिक परमेश्वर के प्रेमी होते हैं; सारांश यह कि सब शुद्ध और खरी भावनाओं से भरे हुए, जो उनके पिता की ओर से उनमें डाली गई हैं।
हे कैल्विन, तुम्हारे विरोधी तुम्हारी शिक्षा के विषय में ये मत और तर्क रखते हैं। और वे सब को सलाह देते हैं कि तुम्हारी शिक्षा को उसके फलों से परखें। वे यह भी कहते हैं कि तुम और तुम्हारे चेले दोनों अपने परमेश्वर के भरपूर फल लाते हैं; कि वे अधिकतर झगड़ालू, बदले के प्यासे, सहे हुए अपमान को सदा पकड़े रहनेवाले और उसे याद रखनेवाले, और अनगिनत अन्य दोषों से भरे हुए हैं, जिन्हें तुम्हारा परमेश्वर उनमें उत्पन्न करता है।
यदि कोई तुम्हारे विरोधियों के इन कथनों का उत्तर दे और यह कहे कि ये दोष तुम्हारी शिक्षा से उत्पन्न नहीं होते, तो तुम्हारे विरोधी प्रत्युत्तर देते हैं कि तुम्हारी शिक्षा स्पष्टतः ऐसे ही मनुष्य उत्पन्न करती है, और ऐसा ही है, यह इस बात से प्रकट है कि बहुत से लोग तुम्हारी शिक्षा को अपनाने और मानने के बाद ऐसे चरित्र के बन जाते हैं, जबकि पहले वे उस बुरे वर्णन के लोगों से बहुत दूर थे; जबकि दूसरी ओर, जिन्होंने मसीह की शिक्षा पर विश्वास किया है वे सदा बेहतर मनुष्य बनाए गए हैं, परन्तु वे दृढ़ता से कहते हैं कि तुम्हारी शिक्षा से मनुष्य सदा स्पष्टतः बदतर होते जाते हैं। वे यह भी कहते हैं कि जब तुम और तुम्हारे अनुयायी यह दावा करते हो कि तुम खरी शिक्षा पर हो, तब तुम्हारा विश्वास नहीं किया जाना चाहिए।
सच तो यह है कि मैं स्वयं भी कभी तुम्हारी शिक्षा का पक्षधर था, और उसका बचाव भी करता था, यद्यपि मैं उसे वास्तव में स्पष्ट रूप से नहीं समझता था। क्योंकि मैं तुम्हारे अधिकार के भार को इतना महत्त्व देता था कि उसके विरुद्ध एक विचार मन में लाना भी मैं अपराध समझता था। परन्तु अब तुम्हारे विरोधियों के तर्क सुनकर, उनके निष्कर्षों और प्रमाणों के उत्तर में मेरे पास कहने को कुछ नहीं है। तुम्हारे चेले अवश्य तुम्हारे बचाव में उत्तर देने का प्रयास करते हैं, और जिन्हें वे तुम्हारी शिक्षा के पक्षधर पाते हैं उनके बीच वे निडर होकर डींग मारते हैं कि सत्य उनकी ओर है। परन्तु जब वे तुम्हारे विरोधियों से निपटने आते हैं, तब डगमगाते हैं और तुम्हारी पुस्तकों की शरण में दौड़ते हैं; पर वहाँ जो उन्हें मिलता है वह उन्हें सँभालने के लिए बहुत दुर्बल है। क्योंकि तुम्हारे तर्क इतने दुर्बल और अधिकतर इतने अनुचित हैं कि जैसे ही तुम्हारी पुस्तक उनके हाथ से छूटती है, तुम्हारे तर्क उनकी स्मृति से छूट जाते हैं, और इसलिए वे तुम्हारे विरोधियों को कायल करने में असफल रहते हैं। दूसरी ओर, तुम्हारे विरोधियों के तर्क स्पष्ट, सशक्त और सरलता से कण्ठस्थ होनेवाले हैं, और इसलिए अनपढ़ लोग (जिनमें से अधिकांश वे थे जिन्होंने मसीह का अनुसरण किया) उन्हें तुरन्त समझ लेते हैं; इसका परिणाम यह है कि तुम्हारे अधिकांश चेले खरे तर्क से अधिक तुम्हारे अधिकार पर निर्भर रहते हैं; और यह देखकर कि वे तर्क से अपने विरोधियों को परास्त नहीं कर सकते, वे उन्हें पाखण्डी और कट्टर मानते हैं, उनकी संगति से दूर रहते हैं, और चारों ओर सब को ऐसा ही करने की चेतावनी देते हैं। इसके विपरीत, मैं, जो सदा यह मानता हूँ कि विचार का विषय वह बात होनी चाहिए जो कही जाती है, न कि कहनेवाला व्यक्ति, यह निर्णय करता हूँ कि सब मनुष्यों की सुनी जानी चाहिए, और जो कुछ कहा जाए उसकी यथोचित जाँच होनी चाहिए, और जो भला है उसे ग्रहण करके थामे रखना चाहिए।
इसलिए, कैल्विन, यदि तुम्हारे पास कोई ऐसे तर्क हैं जो सत्य, स्पष्ट और खरे हैं, और जिनसे तुम्हारे विरोधियों का खण्डन हो सके, तो मैं विनती करता हूँ कि उन्हें हम सब के सामने लाओ, और इस प्रकार वास्तव में अपने आपको सत्य का रक्षक प्रमाणित करो। तुम जानते हो कि क्या लिखा है, "मैं तुम्हें ऐसा मुँह और बुद्धि दूँगा जिसका सामना या खण्डन तुम्हारे सब विरोधी न कर सकेंगे" (लूका 21:15)। जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, जहाँ कहीं मुझे सत्य मिले, मैं उसका अनुसरण करने और दूसरों को भी यही मार्ग अपनाने का उपदेश देने को तैयार हूँ। यदि संयोग से तुमसे भूल हुई हो (क्योंकि हम सब मनुष्य हैं), तो हे कैल्विन, मैं तुमसे बिनती करता हूँ, पूर्ण स्वीकारोक्ति करके परमेश्वर की महिमा करो। ऐसा करना अधिक उदात्त होगा, और भूल पर डटे रहने से तुम्हें अधिक यश दिलाएगा। परन्तु मेरी इस पत्री के कारण मुझ पर क्रोध न करना। यदि तुम न्यायी और सच्चे हो, तो तुम्हें इससे कुछ भय नहीं। पहला, इसलिए कि इसके तर्कों से चिताया जाना तुम्हारे ही लाभ की बात है; और दूसरा, इसलिए कि जब तुम, जैसा कहते हो, मानते हो कि सब कुछ आवश्यकतावश होता है, तो तुम्हें यह भी मानना होगा कि यह पत्री भी मैंने आवश्यकतावश लिखी। विदा!
जॉन कैल्विन का अनुच्छेद XIII. और XIV. को उत्तर।
(अर्थात् निन्दाएँ XIII. और XIV.)
और उन पर निन्दक की टिप्पणियों आदि का उत्तर।
अब केवल इतना शेष है कि मैं सच्चे और अनन्त परमेश्वर की महिमा को तुम्हारे अपवित्र शापों और निन्दाओं से बचाऊँ।
तुम डींग के साथ कहते हो कि मैं मनुष्यों के सामने सच्चे परमेश्वर के स्थान पर शैतान को रखता हूँ। मेरे बचाव को केवल संक्षिप्त और सारगर्भित होना चाहिए, क्योंकि मेरे सब लेख खुलकर गवाही देते हैं कि मेरे सामने इसके सिवा कभी कोई उद्देश्य, अभिप्राय या प्रार्थना नहीं रही कि सारा संसार पूरे भय, श्रद्धा और पवित्रता के साथ अपने आपको परमेश्वर को समर्पित करे; कि सब मनुष्य परस्पर एक-दूसरे के साथ और एक-दूसरे के प्रति शुद्ध विवेक से न्याय का आचरण करें; और यह भी कि मेरा अपना जीवन मेरी शिक्षा के विपरीत न हो। मैं परमेश्वर के अनुग्रह की इतनी उपेक्षा और अनादर नहीं करूँगा कि अपनी तुलना तुमसे या तुम्हारे साथियों से करूँ, जिनके निर्दोष जीवन का दावा केवल बाहरी चापलूसी भरे दिखावे में है। मैं केवल इतना कहूँगा कि यदि कोई निष्पक्ष और खरा मध्यस्थ हमारे बीच न्याय करने बैठे, तो वह तुरन्त मान लेगा कि मेरी वाणी और मेरे जीवन के कामों दोनों में परमेश्वर के प्रति पवित्र श्रद्धा स्पष्ट दिखाई दी है; और वह उतनी ही तत्परता से स्वीकार करेगा कि तुमसे जो कुछ निकला उसमें भय और आतंक की साँस थी, जिसे सब भक्त जन तुच्छ जानते और उस पर हँसते हैं।
परन्तु तुम्हारी नीच निन्दाओं की यथासम्भव संक्षेप में जाँच करने के लिए—तुमसे अधिक अपवित्र कौन या क्या हो सकता है, जब तुम यह तर्क देते हो कि परमेश्वर संसार के बड़े भाग को अनन्त मृत्यु के लिए पूर्वनियत करने में अपने आपको दया में धीमा और क्रोध में फुर्तीला प्रमाणित करता है?—एक बात निश्चित है, कि तुम अपने लिए जैसा भी परमेश्वर गढ़ो या कल्पित करो, वही एक आराधना के योग्य परमेश्वर है जिसकी आराधना की जानी चाहिए और जिसकी आराधना सब भक्त जन करते हैं, जिसने 2,000 वर्ष से अधिक तक अब्राहम के एक परिवार को छोड़ सारी मानव जाति को घोर अन्धकार में, उनके प्राणों के विनाश के लिए, भटकने दिया। अब, यदि तुम परमेश्वर पर निर्दयता का दोष लगाने को तैयार हो, क्योंकि उसने पृथ्वी के केवल एक परिवार को जीवन की ज्योति से आशीष देना स्वीकार किया, जबकि उसने चाहा कि असंख्य जातियाँ उसी 2,000 वर्ष तक अपने प्राण की मृत्यु के अन्धकार में डूबी पड़ी रहें, तो इस गहरे भेद की हर जिज्ञासा का एक गम्भीर उत्तर यह प्रश्न देगा: ऐसा क्यों हुआ कि सारी जातियाँ प्रतिदिन पूर्णतः नष्ट न कर दी गईं, यहाँ तक कि कोई लोग शेष न रहे? ऐसा क्यों हुआ कि सारा संसार, यदि ऐसा सम्भव होता, वर्ष में सौ बार नष्ट न हो गया? ऐसा क्यों हुआ कि उन्हीं 2,000 वर्षों में मनुष्यों के प्रति परमेश्वर के धीरज और दया के इतने महिमामय प्रमाण प्रकट हुए? स्वयं प्रेरित पौलुस ने भी, यह कहने के बाद कि "क्रोध के पात्र" परमेश्वर की गुप्त और अनन्त आज्ञा से "विनाश के लिये तैयार किए गए" थे, उसके उस धीरज और सहनशीलता की स्तुति करना न भूलता है, न उसमें हिचकिचाता है। इसलिए यदि प्रेरित की गवाही से तुम सन्तुष्ट नहीं, तो मैं समझता हूँ कि मेरे जैसा दीन जन मेरी शिक्षा पर तुम्हारी सारी गुर्राहट को निश्चिन्त होकर तुच्छ जान सकता है।
परन्तु परमेश्वर को मेरे दुर्बल बचाव की आवश्यकता नहीं। वह अब भी है, और अन्तिम दिन में भी अपनी धार्मिकता का सामर्थी पलटा लेनेवाला होगा, चाहे सारे संसार की सब गन्दी जीभें उस धार्मिकता को अन्धकार और घबराहट से ढकने के लिए एक हो जाएँ। इसलिए तुम अपने समान आत्मावाले दल के साथ अपनी निन्दाओं को आकाश तक उछालते चलो। वे सब निश्चय ही तुम्हारे ही सिरों पर लौट आएँगी। तुम्हारी नीच गालियों को मैं धैर्य से और बिना कष्ट के सह सकता हूँ, बशर्ते वे सदा धन्य परमेश्वर को न छुएँ, जिसका मैं दास हूँ। मैं तुम्हें चुनौती देता हूँ कि उसके न्यायासन के सामने खड़े हो (जहाँ तुम्हें एक दिन खड़ा होना ही है), ताकि वह अपने आपको प्रकट करे, जैसा वह एक दिन प्रकट करेगा, अपनी उस शिक्षा के धर्मी पलटा लेनेवाले के रूप में, जिस शिक्षा पर तुम मुझ दुर्बल जन के द्वारा इतने क्रोध से आक्रमण करते हो।
सच्चे परमेश्वर के स्वभाव के तुम्हारे वर्णन के विषय में, कि तुम ईश्वरीय सत्ता के बारे में कितना उचित तर्क करते हो, इसका निर्णय पाठक इस बेतुकी बात से करें कि तुम उसके सब सच्चे ज्ञान का आरम्भ सामान्य बुद्धि से बताते हो: कि परमेश्वर है, यह सत्य सब जातियों और सब युगों की एकमत स्वीकृति से माना गया है, क्योंकि इस ज्ञान का बीज और सिद्धान्त प्रकृति ने हर मानव मन में डाला है। परन्तु परमेश्वर क्या है, इसे बुद्धि कैसे परिभाषित करेगी? जो अपनी दृष्टि की शक्ति से सत्य को झूठ में बदलने और सच्चे धर्म और विश्वास में जो कुछ ज्योति और समझ है उसमें मिलावट करने के सिवा कुछ नहीं कर सकती। पवित्र आत्मा हमें आज्ञा देता है कि यदि हम स्वर्गीय शिक्षा के सच्चे सीखनेवाले होना चाहें तो मूर्ख बनें, क्योंकि स्वाभाविक मनुष्य स्वयं ईश्वरीय बुद्धि की किसी बात को न ग्रहण कर सकता है, न उसका स्वाद ले सकता है । इसके सर्वथा विपरीत, तुम चाहते हो कि मानवीय बुद्धि और सामान्य विवेक महान और आराधना के योग्य परमेश्वर के विषय में निर्णय करें। और तुम केवल उस बुद्धि को खड़ा नहीं करोगे जो अपने अन्धेपन से अगुवा और पथ-प्रदर्शक के रूप में सदा परमेश्वर की महिमा को बुझा देती है, वरन् उस अन्धी बुद्धि को पवित्रशास्त्र से भी ऊपर उठाओगे। तब इसमें क्या आश्चर्य कि तुम सब प्रकार के सब धर्मों को निश्चिन्त होकर गड्डमड्ड होने दो? और तुम उस तुर्क को, जो मुहम्मद के प्रलापों में लिपटा है और जो अपना इष्ट देवता न जाने किसे मानकर पूजता है, उतना ही परमेश्वर का उपासक समझो जितना उसे जो अनन्त सुसमाचार के निश्चित वचन और विश्वास की शिक्षा पाकर हमारे छुड़ानेवाले मसीह के पिता को पुकारता है? यद्यपि यह कि तुम गम्भीरता से अविश्वासियों का पक्ष नहीं लेते, तुम्हारी उन व्यंग्यभरी मुस्कानों से ऊँचे स्वर में प्रकट है, जो हमारे विश्वास के हर अत्यन्त स्पष्ट और पवित्र अनुच्छेद पर तुम्हारे दाँत पीसने को दिखाती हैं, जबकि सब जातियों के अन्धविश्वासों के लिए तुम जो बहाने बनाते हो वे सिद्ध करते हैं कि तुम्हारा दुर्भावपूर्ण उद्देश्य उस पवित्र धर्म की हर शिक्षा को पृथ्वी पर से उखाड़ फेंकना है जिसे परमेश्वर के पवित्र वचन प्रकट करते और सिखाते हैं।
दूसरी ओर, उसी मानवीय बुद्धि से, जो सब भूलों की माता है, तुम अपना वह परमेश्वर गढ़ते हो जो अपने किसी चुनाव या पूर्वनियति के बिना चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो। तो क्या पवित्रशास्त्र में इतनी बार आनेवाले शब्द चुनाव का कोई अर्थ ही नहीं? क्या यह सर्वथा व्यर्थ और खोखला शब्द है? क्या व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं और सुसमाचार का कोई अर्थ ही नहीं, जब वे सर्वत्र ऊँचे स्वर में घोषित करते हैं कि वे सब, जो जगत की उत्पत्ति से पहले परमेश्वर की अनन्त युक्ति से चुने गए थे, उद्धार के लिए बुलाए और प्रकाशित किए जाते हैं? हम फिर पूछते हैं, क्या व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं और सुसमाचार की संयुक्त और सामंजस्यपूर्ण गवाही सर्वथा व्यर्थ है, जब वे बिना किसी अस्पष्टता के घोषित करते हैं कि अनन्त जीवन का स्रोत और कारण परमेश्वर का सेंतमेंत प्रेम है, जिससे उसने सारी मानव जाति को नहीं, वरन् मानव जाति में से उन्हीं को प्रेम किया और अपनाया जिन्हें उसने चाहा!
और मैं तुमसे पूछता हूँ, इस सत्य के विरुद्ध इस प्रकार सौ बार दहाड़ने से अन्त में तुम्हें क्या मिलेगा? तुम अज्ञानियों और अनुभवहीनों की आँखों के सामने चमकते बादल के समान यह अपनी शिक्षा रखकर, कि परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, उनकी दृष्टि चौंधिया देते हो। परन्तु यदि प्रेरित के ये शब्द उस चुनाव से पूर्ण सामंजस्य में नहीं हैं जिसके द्वारा परमेश्वर ने अपनी सन्तानों को अनन्त जीवन के लिए पूर्वनियत किया, तो मुझे तुमसे यह प्रश्न पूछने दो: यदि परमेश्वर चाहता था कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, तो उसने सब जातियों और सब मनुष्यों को उद्धार का मार्ग क्यों नहीं दिखाया? व्यवस्था में परमेश्वर का वह उल्लेखनीय वचन सर्वत्र और भली भाँति जाना हुआ है, "देख, मैं आज तेरे सामने जीवन का और मृत्यु का मार्ग रखता हूँ" (यिर्मयाह 21:8)। यदि इसलिए परमेश्वर बिना भेदभाव सब मनुष्यों को उद्धार के लिए इकट्ठा करना चाहता था, तो उसने जीवन और उद्धार का मार्ग सब मनुष्यों के सामने समान रूप से क्यों नहीं रखा? जबकि तथ्य यह था कि उसने केवल एक परिवार या जाति को इस उच्च विशेषाधिकार के योग्य समझा। और उसने उस एक परिवार को यह बड़ी आशीष किसी और कारण से नहीं दी, सिवाय इसके कि उसने उनसे प्रेम किया (यदि मूसा की गवाही मानी जाए), और इसलिए कि वह उन्हें "अपनी निज प्रजा होने के लिये चुन" लेना चाहता था।
तुम दृढ़ता से कहते हो कि मसीह स्वर्ग से इसलिए भेजा गया कि जहाँ-जहाँ पाप बढ़ा वहाँ-वहाँ उसकी धार्मिकता बहुत अधिक बढ़े; जबकि तुम्हारा यह एक ही वाक्य प्रमाणित करता है कि तुम शैतान के द्वारा नरक की आँतों से ही इस आत्मा और शिक्षा के साथ सज्जित होकर निकले हो, कि हर सम्भव धार्मिक झूठ को भक्ति और सत्य के आडम्बर के नीचे छिपा सको, जिससे तुम स्वयं मसीह और उसके सच्चे धर्म को उपहास का पात्र बना सको। क्योंकि यदि जहाँ पाप बढ़ा वहाँ परमेश्वर ने मसीह की धार्मिकता को अत्यधिक बढ़ाने का ठहराया था, तो पीलातुस की दशा उतनी ही अच्छी और सुरक्षित थी जितनी पतरस या पौलुस की। परन्तु पीलातुस की बात छोड़ो, पौलुस घोषित करता है कि मसीह की धार्मिकता और सुसमाचार का विश्वास कभी अलग नहीं किए जा सकते। और मैं तुमसे पूछता हूँ, जब मसीह पृथ्वी पर था तब फ्रांस में और अन्य दूर की अन्यजातीय जातियों में कौन-सा सुसमाचार था? क्या! क्या परमेश्वर अपने पुत्र के आने से पहले वही नहीं था जो वह तब था जब उसका पुत्र आया, और जो वह अब है और सदा रहेगा? तो फिर उसने पृथ्वी की जातियों से उद्धार का भण्डार रोके क्यों रखा, केवल "अब्राहम" के परिवार को छोड़कर, जब तक "समय पूरा न हुआ"? (गलातियों 4:4।)
इसलिए, क्रोध से अधिकतम फूल जाओ, और यदि चाहो और करना ही हो तो स्वयं प्रेरित पौलुस का उपहास करने लगो, क्योंकि वह घोषित करता है कि "वह भेद सुसमाचार के प्रचार से प्रकट किया गया, जो परमेश्वर में पहले से गुप्त था।" (इफिसियों 3:9)। और अब जब सुसमाचार की वाणी गूँज चुकी है, मसीह की धार्मिकता केवल उन्हीं के पास आती है जो उसे विश्वास से ग्रहण करते हैं। और यह विश्वास कहाँ से आता है? यदि तुम उत्तर दो, "सुनने से," तो तुम्हारा उत्तर सत्य है। परन्तु स्मरण रखो कि वह पवित्र आत्मा के विशेष प्रकाशन के बिना सुनने से नहीं आता। यशायाह स्वयं उन थोड़े लोगों पर ऊँचे स्वर में अपना आश्चर्य प्रकट करता है "जिन पर यहोवा का भुजबल प्रगट हुआ है" (यशायाह 53:1)। और पौलुस भविष्यद्वक्ता यशायाह के उन्हीं शब्दों का प्रयोग करता है जब वह विश्वास के वरदान को केवल चुने हुओं तक सीमित करता है। और क्या तुम मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की ओर से किसी भेद के किए जाने की अनुमति या स्वीकृति नहीं दोगे? मसीह सचमुच ऊँचे स्वर में कहता है, "हे सब बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ।" परन्तु मनुष्यों का वही छुड़ानेवाला अन्यत्र यह भी पुकारता है, "कोई मेरे पास नहीं आ सकता जब तक पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले।" और कोई असंगति या सत्य की एकता का अभाव नहीं है जब वही उद्धारकर्ता, जो अपनी बाहरी वाणी से सब मनुष्यों को बिना अपवाद अपने पास बुलाता है, फिर भी घोषित करता है कि "मनुष्य कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकता जब तक वह उसे ऊपर से न दिया जाए," और "कोई उसके पास नहीं आ सकता सिवाय उनके जिन्हें पिता की ओर से यह दिया गया है" (यूहन्ना 19:11; 6:65)।
एक और पवित्रशास्त्र-वचन भी है जिसे तुम अपनी सूअर जैसी गन्दगी से लीपते और अशुद्ध करते हो, जब तुम कहते हो "कि मसीह की धार्मिकता की ज्योति हर एक मनुष्य को जो जगत में आता है, प्रकाशित करती है" (यूहन्ना 1:9)। परन्तु क्या यूहन्ना ने ठीक पहले यह नहीं कहा था "कि ज्योति अन्धकार में चमकती है, और अन्धकार ने उसे ग्रहण नहीं किया"? (पद 5)। इन शब्दों से यूहन्ना यह संकेत करता है कि आरम्भ में मनुष्यों को जो कुछ मानवीय बुद्धि या समझ दी गई थी, वह सब पाप से दबा और बुझा दी गई, और अब मसीह के आत्मा द्वारा अन्धी आँखों के खोले जाने के सिवा कोई और उपाय नहीं रह गया। यह सच है कि मसीह ने कभी किसी माँगनेवाले को अपना अनुग्रह देने से इनकार नहीं किया। परन्तु इस बीच तुम भूल जाते हो कि सब सच्ची प्रार्थनाएँ और बिनतियाँ परमेश्वर के आत्मा की प्रेरणा और निर्देशन से होती हैं; और तुम इससे भी अनजान हो कि विश्वास, जो सेंतमेंत चुनाव का फल और परिणाम है, वह कुंजी है जो परमेश्वर के कान खोलती है और स्वर्ग के राज्य का द्वार खोलती है। अब, जब तुम मसीह की शिक्षा के इन प्रथम सिद्धान्तों से इस प्रकार स्पष्टतः अनजान हो (जिन्हें यदि तुम हटा दो, तो मसीह के सुसमाचार को तुरन्त प्रोसर्पीना या बाखुस के अन्धकारमय अन्यजातीय रहस्यों के स्तर पर उतार लाते हो), तब यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि ऐसी भारी भूलों और भ्रमों में फँसे हुए लोग मसीही मनुष्यों की संगति में कभी पहुँच भी पाते हैं।
तुम्हारे इस गन्दे कथन के विषय में कि मेरे चेले मेरे परमेश्वर के द्वारा मेरे ही समान बनाए जाते हैं—निर्दय, डाहकारी, घमण्डी, निन्दक, जीभ पर कुछ और हृदय में कुछ और रखनेवाले—मैं सामने आऊँगा और तुम्हारी इस ढिठाई भरी गाली का खण्डन करूँगा; इसके लिए तैयार होकर, शब्दों से उतना नहीं जितना तथ्यों से। क्योंकि मुझे बदले में गाली देने की कोई इच्छा नहीं, इसलिए जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है तुम्हारी सब नीच निन्दाएँ मेरे हाथों मरी और दबी रहें, केवल इतना छोड़कर कि मैं (पवित्र कर्तव्य से बँधे होने के कारण) यह छूट लेता हूँ कि परमेश्वर को साक्षी बनाकर एक गम्भीर घोषणा करूँ, कि जिस समय मैं तुम्हें अपने घर में खिलाता था, मैंने तुमसे अधिक घमण्डी, अधिक विश्वासघाती, या मानवीय दया से अधिक रहित मनुष्य कभी नहीं देखा। और मुझे निश्चय है कि जो यह स्वीकार नहीं करते कि तुम एक धोखेबाज़ हो, ढीठ दुस्साहस के आदमी हो, धर्म के मसखरे हो, जो सारी भक्ति को चिल्लाकर दबाने के लिए ही नियुक्त हुए हो; मैं कहता हूँ, जो इन्हें तुम्हारे वास्तविक सिद्धान्त नहीं मानते, उन्हें तुम्हारे चरित्र की सही परख नहीं है। क्योंकि मैंने किस विशेष कार्य में निर्दयता की, जिसका तुम मुझ पर दोष लगाते हो, यह जानने को मैं उत्सुक हूँ। मैं स्वयं ऐसा कोई कार्य नहीं जानता, सिवाय तुम्हारे बड़े गुरु सर्वेतुस की मृत्यु के सम्बन्ध में। परन्तु मैंने स्वयं गम्भीरता से बिनती की थी कि उसे मृत्युदण्ड न दिया जाए, इसके साक्षी उसके न्यायी स्वयं हैं, जिनमें से उस समय दो उसके पक्के पक्षधर और रक्षक थे। परन्तु अपने विषय में मैं बहुत कह चुका।
मेरी शिक्षा से इस नगर में और बहुत-सी जातियों में दूर-दूर तक जो वास्तविक फल उत्पन्न हुए हैं, उन्हें मैं सब मनुष्यों के विचार और मनन पर छोड़ता हूँ। इसी पाठशाला में से, जिस पर तुम इतनी क्रूरता से आक्रमण करते और जिसे निरन्तर टुकड़े-टुकड़े करते रहते हो, परमेश्वर प्रतिदिन अपने लिए उच्चतम सिद्धान्तों के और अपने सत्य की सबसे मधुर सुगन्ध के मनुष्यों को चुनता है, कि वे उसके सुसमाचार की शिक्षा को प्रकाशित करें और द्वेष और निर्दयता के शिकार बनें। वे सब जो सुसमाचार की शिक्षा में सचमुच बढ़ते और उन्नति करते हैं (जिनकी संख्या के कारण न संसार को, न कलीसिया को पछताना या लज्जित होना पड़ता है), अत्यन्त सीमित साधनों के सहारे, कठिनाई से तो अवश्य, परन्तु बड़े से बड़े धीरज और सब मनुष्यों के प्रति बड़ी से बड़ी कृपा के साथ जीवन बिताते हैं; या फिर सब प्रकार की विलासिता को स्वेच्छा से विदा कहकर शान्ति और स्वतन्त्रता से मितव्ययिता में लग जाते हैं; वे सब, एक मनुष्य की नाईं, संसार और आत्म-सुख को त्यागकर धन्य अमरता की आशा में लगे रहते हैं। अपने विषय में गर्व या घमण्ड करने से दूर रहकर, मैंने उसके अनुग्रह के इन उज्ज्वल उदाहरणों को साक्षी बनाया है, जिन्हें परमेश्वर इस प्रकार संसार के सामने रखता है कि उस शिक्षा की सत्यता प्रमाणित करे और उसकी रक्षा करे, जिसे तुम अपनी गन्दी गालियों से व्यर्थ ही चीर डालने का प्रयास करते हो।
परन्तु कृपया मुझे बताओ कि जिस समय तुम मेरी इस शिक्षा के पक्षधर थे, तब तुम क्या थे। उस समय तुम्हारे मन की दशा क्या थी? तुम कहते हो कि तुम उसे कभी स्पष्ट रूप से समझ नहीं सके क्योंकि मेरे अधिकार का भार तुम्हारे मार्ग में आड़े आता था, जो तुम्हें मेरे विचार के तनिक भी विपरीत कोई भी निर्णय मन में रखना पूरा अपराध मानने को प्रेरित करता था। अरे, यह तो आश्चर्य की बात है। तुम सचमुच बुद्धिहीन आदमी रहे होगे, यदि इतने वर्षों की परीक्षा के बाद भी तुम उसे समझ न सके जो मैंने तुम्हें अपने ही घर में अत्यन्त सरल रीति से सिखाया था, और जिसे मैंने सार्वजनिक सभा में तुम्हारे सुनते हुए इतनी बार समझाया था। फिर भी बहुत से विश्वसनीय साक्षी हैं कि यद्यपि मैंने बहुत समय तक, पर व्यर्थ, हर सम्भव उपाय से तुम्हारे स्वभाव की बिगड़ी दशा को सुधारने और चंगा करने का परिश्रम किया, फिर भी जितने समय तक तुम अपने आपको मेरे अनुयायियों में से एक कहते रहे, तुम कुछ प्रभावकारी लगाम से अपने बुरे मार्गों से रोके रहे। इसलिए मुझसे तुम्हारे अलग होने का वास्तविक कारण स्पष्टतः लगाम उतार फेंकने की तीव्र लालसा प्रतीत होता है, कि तुम निरंकुश स्वच्छन्दता से अपने इस वर्तमान अधर्मी मार्ग में फूट निकलो, जो तुम्हारा सच्चा आनन्द और घमण्ड है।
तुम कहते हो कि तुम्हारा सिद्धान्त है कि यह न देखा जाए कि कौन बोल रहा है, वरन् यह कि क्या कहा जा रहा है। काश यह बहुत पहले तुम्हारा वास्तविक सिद्धान्त रहा होता, ताकि तुम दूसरों के परिश्रम से लाभ उठाते, और इस प्रकार सीखने को तैयार आत्मा के अभ्यस्त हो जाते। जबकि अब, चूँकि ढिठाई और वाचालता ही तुम्हारी एकमात्र शक्तियाँ हैं, इसलिए बुरे मनवालों से तुम्हें जो भी कृपा मिलती है वह दूसरों को नीच तुच्छ जानने से ही मिलती है। मैं अपने लिए कुछ नहीं जताता। परन्तु मुझे वास्तव में लगता है कि मैंने कलीसिया की इतनी भलाई की है कि यदि वह मुझे परमेश्वर के विश्वासयोग्य दासों में स्थान दे, तो किसी को मेरे अधिकार को तिरस्कार का विषय बनाने का प्रयत्न करने का अधिकार नहीं। यदि तुमने यह कहा होता कि थोड़े-से अनपढ़ लोग मेरे संकेत की ओर देखते हैं, या मेरे निर्णय पर टिके रहते हैं, या मेरी ख्याति और अधिकार से प्रभावित हैं, तो तुम्हारी निन्दा को ढकने का कुछ बहाना हो सकता था। परन्तु अब जब तुम इसे मेरे लिए एक कुख्यात अपमान बना देते हो कि मेरी शिक्षा अनपढ़ मनुष्यों को सन्तुष्ट या प्रसन्न नहीं करती, तो यदि तुम कहो कि केवल विद्वान और प्रतिभाशाली मनुष्यों को ही मेरी पुस्तकों में रुचि है और वे अपनी बुद्धि उन्हीं से पाते हैं, तो तुम्हारा विश्वास, तुम्हारी समझ में, कौन करेगा? वरन् यह कि वे मेरे अधिकार से इतने दबे हुए हैं कि अपना कोई निर्णय करने का प्रयास भी नहीं करते? यदि ऐसा है, तो हम तुम्हारे ही अधिकार से सिद्ध कर देंगे कि कोई बात सच या ठीक नहीं ठहराई जा सकती सिवाय उसके जो अज्ञानी भीड़ को उचित प्रतीत हो।
हाँ! तुम सब मनुष्यों को उदार और उपयोगी कलाओं और विज्ञानों से दूर भगा दोगे, और अपने साथियों के बीच डींग मारोगे कि सारा अध्ययन और विद्या व्यर्थ है और दर्शनशास्त्र, व्याकरण, तर्कशास्त्र, यहाँ तक कि ईश्वरविज्ञान तक में लगाया गया सारा समय व्यर्थ गया। इस प्रकार तुम सब उपयोगी विद्या की निन्दा करोगे, मैं कहता हूँ, इसी कारण कि तुम अपने लिए अज्ञानी चेले पा सको, और उनके बीच अपने को बड़ा बना सको। और तुम कहते हो कि जिन्होंने मसीह का अनुसरण किया वे ऐसे ही थे। मानो मसीही विश्वास विद्या के विरुद्ध और उससे असंगत कोई वस्तु हो! परन्तु मसीही पाठक यहाँ वह भेद देखें जो तुम में और मुझ में है। मैं सदा दृढ़ता से कहता हूँ कि मनुष्यों में जो सबसे बुद्धिमान हैं, जब तक वे मूर्ख न बन जाएँ, और अपनी सारी बुद्धि को विदा कहकर अपने आपको दीनता और नम्रता से मसीह की आज्ञाकारिता में न सौंप दें, तब तक वे अपने ही घमण्ड से अन्धे बने रहते हैं और स्वर्गीय शिक्षा की एक बूँद का भी स्वाद लेने में सर्वथा असमर्थ रहते हैं। क्योंकि सारी मानवीय बुद्धि परमेश्वर के रहस्यों में स्वादहीन है, और सारी मानवीय सूक्ष्मदर्शिता अन्धी है। इसलिए मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि सारी ईश्वरीय बुद्धि का आरम्भ और सार दीनता है। यही हमें शरीर की सारी बुद्धि से नंगा करती है, और हमें श्रद्धा और विश्वास के साथ परमेश्वर के रहस्यों में प्रवेश करने को तैयार करती है। इसके विपरीत, तुम अज्ञानी और अशिक्षित मनुष्यों को सार्वजनिक रूप से सामने आने को कहते हो; ऐसे मनुष्य जो सारी विद्या को तुच्छ जानकर और केवल घमण्ड से फूलकर ईश्वरीय बातों पर अपना निर्णय देने का उतावला प्रयास करते हैं। और तुम ईश्वरीय बातों में किसी को वैध न्यायी नहीं मानोगे सिवाय उनके जो बुद्धि और सामान्य विवेक की सम्मति से सन्तुष्ट होकर, बिना संकोच उस सब को ठुकरा देते हैं जो उनके अपने मन और रुचि के अनुकूल नहीं।
उस दूसरी निन्दा के विषय में जो तुम मेरे दीन अनुयायियों पर लादते हो, कि वे पाखण्डी (विधर्मी) हैं, इस पर प्रेरित पौलुस की गवाही से वे पूर्णतः सन्तुष्ट हैं, जिसके अधिकार पर वे तुम्हारे और तुम्हारे अनुयायियों जैसे वास्तविक विधर्मियों से मुँह मोड़ लेना अधिक पसन्द करेंगे, बजाय इसके कि जानबूझकर उनकी निन्दाएँ सुनकर अपने कान अपवित्र करें। फिर भी तुम दृढ़ता से कहते हो कि तुम्हारे कार्य का ऐसा सिद्धान्त नहीं है। तुम मानते हो कि सब मनुष्यों की सुनी जानी चाहिए। तो क्या तुम समझते हो कि प्रेरित व्यर्थ ही कहता है, "किसी पाखण्डी को एक दो बार समझाने के बाद उससे अलग रह" (तीतुस 3:10)? अब यदि किसी ने तुम्हें सुने जाने के अधिकार से वंचित किया होता, तो तुम्हारे पास शिकायत का कारण होता। परन्तु जब तुम्हें लोगों की सार्वजनिक सभा में जैसा चाहो बकबक करने की स्वतन्त्रता सदा दी गई; वरन् जब तुम्हें बुलाकर और लगभग घसीटकर वहाँ लाए जाने के बाद तुम प्रायः हारकर और बिना कुछ कहने को बैठ गए हो; तब तुम और कौन-सी बोलने की स्वतन्त्रता चाहते हो, जब भक्त जनों के कान तुम्हारे लिए सदा खुले रहते हैं, यहाँ तक कि वे आराधना के योग्य परमेश्वर के विरुद्ध तुम्हारी निन्दाओं से तृप्त होकर घृणा से उबकाई लेने लगते हैं? जहाँ तक तुम्हारा प्रश्न है, तुम भक्ति के सब पहले महान सिद्धान्तों का उपहास करने में सन्तोष और आनन्द पा सकते हो। परन्तु क्या तुम इसलिए चाहते हो कि परमेश्वर की सब सन्तानें इतनी मूर्ख हों कि तुम्हारी दुस्साहसी ढिठाई पर हँसें, या बिना एक शब्द या भावना के तुम्हारी अपवित्र गालियाँ सहें?
इस पवित्र विषय के सम्बन्ध में मुझे विश्वास है कि मैंने इस प्रकार तुम्हें पर्याप्त उत्तर दे दिया है। ताकि सब स्वस्थ मनवाले पाठक सरलता से जान लें कि मैं उस धन्य आत्मा से सर्वथा रहित नहीं हूँ जो मुँह और बुद्धि देता है, जिस मुँह और बुद्धि का यदि तुम अब भी विरोध करने पर अड़े रहो, तो इससे तुम अपनी हठ के अनुरूप अपमान और घबराहट के सिवा और कुछ नहीं पाओगे। फिर भी मैं यह चाहना और प्रार्थना करना नहीं छोड़ूँगा कि तुम अब भी परमेश्वर के प्रकट सत्य के आगे झुक जाओ, यद्यपि ऐसी आशा करने का मुझे साहस कम ही होता है।
तुम्हारे शेष अपवित्र ठट्ठे पर एक अन्तिम बात: कि मेरे पास तुम्हारी गालियों पर क्रोधित होने का कोई आधार नहीं, क्योंकि मेरी अपनी शिक्षा के अनुसार वे आवश्यकतावश लिखी गई थीं। परन्तु यहाँ पवित्रशास्त्र ने मुझे सहनशीलता का एक गम्भीर और प्रभावशाली उपदेश दिया है; और मेरे इस मामले में इससे अधिक शिक्षाप्रद और उपयुक्त, और मेरे क्रोध को शान्त करने के लिए इससे अधिक अनुकूल कुछ नहीं हो सकता, जितना दाऊद की यह चितौनी, "उसे कोसने दो, क्योंकि यहोवा ने उससे कहा है" (2 शमूएल 16:11)। दाऊद जानता था कि उस अवसर पर शिमी उसी कोसने के क्रोध से प्रेरित था जिससे तुम अब उबल रहे हो। परन्तु वे शाप जो शिमी समझता था कि वह तत्कालीन परिस्थितियों के (उसके लिए) आकस्मिक संयोग में दाऊद पर फेंक रहा है, उन्हें दाऊद ने मनन करके जाना कि वे परमेश्वर के सर्वोपरि और गुप्त विधान द्वारा निर्देशित हैं, और इसलिए वह इन स्मरणीय शब्दों के उच्चारण से अपने आपको रोकता है। और वास्तव में कोई भी मनुष्य शैतान और दुष्ट मनुष्यों के आक्रमणों को शान्ति और संयम से तभी सहेगा जब वह उन आक्रमणों से अपना मन और विचार केवल परमेश्वर की ओर फेर सके, जिसने उन्हें ठहराया; और जो परमेश्वर के ही शब्दों में कह सके, "हे शैतान, यहोवा तुझे डाँटे" (जकर्याह 3:2)। आमीन।
जेनेवा, 5 जनवरी, 1558।
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