अध्याय 7

खण्ड IV: अनन्त पूर्वनियति

Calvin's Calvinism · John Calvin

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खण्ड IV: अनन्त पूर्वनियति

अनन्त पूर्वनियति — खण्ड 4

हमारे सम्मुख के इस पवित्रशास्त्र-खण्ड के विषय में पिगियस की अन्तिम चाल यह है कि परमेश्वर ने किसी को उद्धार के लिए पूर्वनियत नहीं किया, बल्कि वे ही पूर्वनियत हुए जिन्हें उसने पहले से जाना था। परन्तु बचकर निकलने के इस मार्ग को मैं इन विरोधियों के लिए पहले ही बन्द कर चुका हूँ; वहाँ मैंने दिखाया है कि जब तक परमेश्वर स्वयं अपने आत्मा के द्वारा मनुष्य को नए सिरे से न रच ले, तब तक वह मनुष्य में अनन्त विनाश के योग्य बातों को छोड़ और कुछ भी पहले से नहीं देख सकता था। यदि किसी मनुष्य के पास कोई ऐसी भलाई नहीं जो उसने परमेश्वर से न पाई हो, तो एक मनुष्य परमेश्वर के सम्मुख दूसरे से अधिक ऐसा क्या ला सकता है जिसमें वह अपने संगी मनुष्य से बढ़ जाए? इसलिए परमेश्वर ने अपने लोगों को इस अर्थ में पहले से नहीं जाना कि उसने उनकी योग्यताओं को पहले से देखा—क्योंकि उनमें कोई योग्यता थी ही नहीं—परन्तु इसलिए कि उसने उन पर दया और कृपा की दृष्टि डाली, और इस प्रकार उन्हें औरों से अलग करके उनके सारे पाप और अयोग्यता के होते हुए भी अपनी सन्तानों में गिना; यह पौलुस के उस वचन के अनुसार है, “तुझ में और दूसरे में कौन भेद करता है?” परन्तु पिगियस का वह स्वतन्त्र पूर्वज्ञान, जिसे वह नंगा कहता है (अर्थात् जो परमेश्वर के मन में किसी भी प्राथमिकता से रहित है), कोई पूर्वज्ञान है ही नहीं। तब पिगियस अपने पूर्वदृष्ट और पूर्वनियत मनुष्य को योग्यता या ग्रहणयोग्यता के किन पंखों से सजाएगा, ताकि वह परमेश्वर के सम्मुख हर अंग से नंगा और कुरूप होकर आने से बच जाए? क्योंकि पवित्रशास्त्र ऊँचे स्वर से घोषणा करता है कि पतित और भ्रष्ट मनुष्य में स्वभाव से जो कुछ है वह परमेश्वर की दृष्टि में घृणित है। और वह उतने ही ऊँचे स्वर से यह भी कहता है कि परमेश्वर को कुछ भी ग्रहणयोग्य नहीं, सिवाय उसके अपने स्वरूप के, जो मसीह में नए सिरे से रचे गए लोगों में है।

इसके आगे पिगियस यों कहता है: जब हम चिन्तित होकर पूछते हैं कि दुष्ट लोग अनन्त काल के लिए दोषी क्यों ठहराए जाते हैं, तब पवित्रशास्त्र उत्तर में हमारे मुँह पर ऐसे निरंकुश वाक्य नहीं मारता: क्योंकि वे परमेश्वर की अनन्त युक्ति के द्वारा चुने हुओं से अलग किए गए थे, क्योंकि परमेश्वर को यही भाया कि उन्हें अनन्त विनाश के लिए ठहराए। मैं कहता हूँ, हमारी पूछताछ के उत्तर में पवित्रशास्त्र में ऐसे भयानक और कठोर उत्तर हमें नहीं मिलते। ये तो मनुष्यों के दिए हुए कारण मात्र हैं, जिनसे ऐसे वाक्य सच्चे प्रतीत हों—मेरी यही इच्छा है; मेरी आज्ञा है कि ऐसा ही हो; मेरी इच्छा ही पर्याप्त कारण है। नहीं! जो कारण हम स्वयं मसीह के मुख से सुनते हैं वे ये हैं: “मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को न दिया; मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी न पिलाया,” इत्यादि, इत्यादि। इसी के समान वह तर्क भी है जो पिगियस एक और स्थान पर देता है। वह कहता है कि मसीह अन्तिम दिन में दुष्टों से यह नहीं कहेगा कि वे अनन्त काल के लिए दोषी ठहराए गए हैं, “क्योंकि वे आदम के भ्रष्ट बीज से उत्पन्न हुए, क्योंकि उन्होंने उसके पाप से अनन्त मृत्यु का दण्ड विरासत में पाया, और क्योंकि यह न्यायसंगत और धर्मसंगत था कि वे उसके अपराध के कारण नाश हों।” पिगियस कहता है, नहीं; उस दिन मसीह स्वयं एकत्र हुए सब लोकों के सम्मुख जो कारण बताएगा वे ये होंगे: कि उन्होंने भूखों को रोटी नहीं दी, नंगों को कपड़े नहीं पहनाए, और दया के अन्य ऐसे ही कार्य नहीं किए।

परन्तु यदि पिगियस की दृष्टि में आदिपाप और दोष मनुष्यों को अनन्त काल के लिए दोषी ठहराने को पर्याप्त नहीं हैं, और यदि परमेश्वर का गुप्त न्याय उसके यहाँ कोई स्थान नहीं रख सकता, तो उन शिशुओं के विषय में वह क्या कहेगा जो इस जीवन से तब उठा लिए गए जब वे ऊपर बताए गए दया के कार्यों में से कोई भी कर ही नहीं सकते थे? जन्म और मृत्यु की स्वाभाविक दशा तो सदोम में मरनेवाले उन शिशुओं की भी वही थी जो यरूशलेम में मरनेवालों की थी, और उनके कर्म, या यों कहें कि अकर्म, बिलकुल एक-से थे। तब ऐसा क्यों है कि मसीह अन्तिम दिन में एक को दूसरे से अलग करेगा, एक को अपनी दाहिनी ओर और दूसरे को अपनी बाईं ओर खड़ा करेगा? यहाँ कौन परमेश्वर के महिमामय न्याय की आराधना नहीं करता, जिसने ठहराया कि इन बच्चों में से एक भाग यरूशलेम में जन्म ले, जहाँ से सत्य के ज्ञान के द्वारा वे आगे चलकर एक उत्तम जीवन में पहुँचाए जा सकें, जबकि दूसरे उस चौड़े प्रवेश-द्वार अर्थात् नरक में जन्में, जो सदोम है? इसलिए जैसे मैं सच्चाई से मानता हूँ कि मसीह अन्तिम दिन में चुने हुओं को धार्मिकता का प्रतिफल देगा, वैसे ही मैं यह कहकर कोई झूठ नहीं बोलता कि निकम्मे लोग उस दिन अपनी अधार्मिकता और अपने सब अधर्मों का दण्ड भोगेंगे। और यद्यपि मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि परमेश्वर ने अपनी अनन्त युक्ति में जिन्हें चाहा उन्हें अनन्त जीवन के लिए चुना और जिन्हें चाहा उन्हें अनन्त विनाश के लिए छोड़ दिया; फिर भी मेरी सारी शिक्षा में कहीं ऐसा कथन नहीं मिलेगा कि बुरे कर्मों के लिए कोई दण्ड नियत नहीं, या अच्छे कर्मों के लिए कोई प्रतिफल नियत नहीं। नहीं! “अवश्य है कि हम सब का हाल मसीह के न्याय आसन के सामने खुल जाए, कि हर एक व्यक्ति अपने भले बुरे कामों का, जो उसने देह के द्वारा किए हों, बदला पाए” (2 कुरिन्थियों 5:10)। परन्तु बड़ा प्रश्न यह है कि वह धार्मिकता और पवित्रता कहाँ से आती है जिसे उस दिन इस प्रकार मुकुट पहनाया जाएगा? परमेश्वर ही से, और कहाँ से, जिसने इन प्रतिफल पानेवालों को अपने आत्मा के द्वारा नए जीवन के लिए जन्म दिया? और नए जन्म का यह दान परमेश्वर के मुफ़्त गोद लेने के सिवाय और कहाँ से है?

पिगियस का तर्क ठीक उस मनुष्य के तर्क के समान है जो यह कहे कि दिन आदि में सृजे हुए प्रकाश से नहीं बना था, क्योंकि अब तो सूर्य का चमकना ही दिन को बनाता है। मैं मानता हूँ कि यह उपमा सब अंशों में पूरी तरह ठीक नहीं बैठती। क्योंकि जो प्रकाश “आदि में” सृजा गया उसका कर्ता यथार्थ में परमेश्वर है। जबकि हमारा अनन्त दण्ड पूरी तरह हम ही पर टिका है, इसलिए हमारे लिए यह उचित नहीं कि हम दूर से कोई पराया या प्रतिनिधि रंग ढूँढ़ लाएँ जो उसकी भयानक वास्तविकता को हमारी दृष्टि में किसी भी प्रकार घटा दे। इस उपमा को लेने में मेरा एकमात्र उद्देश्य संक्षेप में यह दिखाना था कि इन गम्भीर विषयों पर विचार करते समय पिगियस निकटतम कारण को हमारी आँखों के ठीक सामने रखकर उस महान दूरस्थ कारण को हमारी दृष्टि से कितने बेतुके ढंग से हटा देता है। वह दावा करता है कि दुष्ट लोग अनन्त काल के लिए इसलिए दोषी ठहराए जाएँगे कि उन्होंने अपने ही बुरे कामों से परमेश्वर का क्रोध अपने ऊपर बुलाया है। और इसी आधार पर वह निष्कर्ष निकालता है कि उनका अनन्त दण्ड परमेश्वर के आदेश से नहीं निकलता। जबकि मेरा कहना यह है कि उन्होंने जीवन भर बुराई पर बुराई का ढेर इसलिए लगाया क्योंकि पाप में जन्म लेने से स्वभावतः भ्रष्ट होने के कारण वे पाप के सिवाय और कुछ कर ही नहीं सकते थे। तथापि उन्होंने इस प्रकार पाप किसी बाहरी प्रेरणा या विवशता से नहीं, परन्तु जान-बूझकर और स्वेच्छा से, हृदय की अपनी ही गति से किया। और यह कि स्वभाव की भ्रष्टता और बिगाड़ ही वह स्रोत और सोता है जिससे सब प्रकार के पाप बहते हैं, इसका इनकार कोई नहीं कर सकता, सिवाय उसके जो सारी भक्ति के मूल तत्वों को ही उखाड़ फेंकना चाहे। परन्तु यदि तुम मुझसे पूछो कि परमेश्वर अपने चुने हुओं में पाप को क्यों सुधारता है और निकम्मों को उसी उपचार के योग्य क्यों नहीं ठहराता, तो मेरा उत्तर है कि कारण उसी में छिपा है।

प्रेरित पौलुस रोमियों की पत्री के 9वें अध्याय में इसी रीति से तर्क करता है। जब वह यह प्रमाणित कर चुका कि परमेश्वर ही अनन्त जीवन और अनन्त मृत्यु का महान ठहरानेवाला और नियुक्त करनेवाला है, और यह दिखा चुका कि अन्त में वे ही उद्धार पाएँगे जिन्हें वह अनन्त विनाश से छुड़ाता है; और जब वह ऊँचे स्वर से घोषणा कर चुका कि “यह न तो चाहनेवाले की, न दौड़नेवाले की, परन्तु दया करनेवाले परमेश्वर की बात है,” कि वह “जिस पर चाहता है उस पर दया करता है,” और “जिसे चाहता है उसे कठोर कर देता है”; तब इन घोषणाओं के पश्चात् प्रेरित अपनी ही जाति के अन्धेपन के प्रचुर और मानो स्पर्श करने योग्य कारण सामने लाता है, अर्थात् इसलिए कि उनमें से अधिकांश ने मसीह को ठुकराया, और इसलिए कि उन्होंने हठपूर्वक परमेश्वर का विरोध किया, जो (जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है) “दिन भर उनकी ओर हाथ फैलाए रहा।” इसलिए ये दो गम्भीर सिद्धान्त ईश्वरीय रीति से परस्पर मेल खाते हैं: कि हर मनुष्य अपने ही अनन्त दण्ड का स्वयं कारण है, और तथापि वे सब जो परमेश्वर के आत्मा से रहित हैं अन्धे होकर मसीह से टकराते हैं। इन्हीं ईश्वरीय सिद्धान्तों के अनुसार पौलुस यहूदियों को दोषी ठहराता है, क्योंकि “वे अपनी ही धार्मिकता स्थापित करने की खोज में रहे और परमेश्वर की धार्मिकता के अधीन न हुए,” और इसी कारण मसीह की कलीसिया से निकाल दिए गए; पौलुस, मैं फिर कहता हूँ, इन ईश्वरीय सिद्धान्तों पर इस प्रकार बल देकर भी स्पष्टता से सिखाता है कि शेष लोगों का सत्य और विश्वास में स्थिर रहना और इस प्रकार न गिरना पूर्णतः अनुग्रह से था, जैसा कि स्वयं परमेश्वर की उस उल्लेखनीय घोषणा के अनुसार है: “तौभी मैंने इस्राएलियों में सात हज़ार पुरुष बचा रखे हैं, जो सब घुटनों के बल बाल के आगे नहीं झुके, और न सब के मुँह ने उसको चूमा” (1 राजा 19:18)। क्योंकि अगस्तीन सावधानी से ध्यान दिलाता है: “ये सात हज़ार अपने बल से स्थिर नहीं रहे। यह परमेश्वर था जिसने उन्हें अपने लिए बचा रखा, कि वे एक बचा हुआ भाग हों। परन्तु पौलुस और भी स्पष्टता से घोषणा करता है कि अपने समय में मसीह के आने से जो बचा हुआ भाग इकट्ठा हुआ वह ‘अनुग्रह से चुने जाने के अनुसार बचा हुआ भाग’ था।

क्या तू ‘बचे हुए भाग’ शब्द सुनता है? इस कथन से सूचित होता है कि मनुष्यजाति के सामान्य समूह में से एक छोटी संख्या अलग की गई। और प्रेरित पुष्टि करता है कि ये अपनी इच्छा या शक्ति से नहीं, परन्तु परमेश्वर के मुफ़्त अनुग्रह और दया से बचाए गए। वह उनके उद्धार का मूल परमेश्वर के मुफ़्त चुनाव को बताता है, जिससे उसका स्पष्ट अर्थ यह है कि शेष मनुष्यजाति के साथ उनके नाश न होने का एकमात्र कारण यह था कि परमेश्वर ने उन्हें मुफ़्त में चुन लिया था। इससे यह साफ़ निष्कर्ष निकलता है कि यदि सब मनुष्य चुने जाते, तो कोई भी मनुष्य नाश न होता।”

अब यदि कोई मरणशील मनुष्य अपना “मैं चाहता हूँ” और अपना “मैं आज्ञा देता हूँ” कहे, और यह कहे कि उसकी इच्छा ही उसके कामों के लिए पर्याप्त कारण समझी जानी चाहिए, तो मैं मानता हूँ कि ऐसा “मैं चाहता हूँ” सचमुच निरंकुश होगा! परन्तु परमेश्वर के “मैं चाहता हूँ” और परमेश्वर के “मैं आज्ञा देता हूँ” को निरंकुश कहना अपवित्र बात, निन्दा और पागलपन है! क्योंकि कोई भी मरणशील परमेश्वर पर कोई अनुचित या अतिरेक आरोपित करने का साहस नहीं करता, मानो उसमें मनुष्यों के समान कोई अनियमित इच्छा, चाह या लालसा हो सकती है। इसके विपरीत, उसकी इच्छा का ऐसा आदर और श्रद्धा सदा उचित है कि वह इस योग्य है कि उसमें एक न्यायसंगत कारण की पूरी वैधता निहित मानी जाए, क्योंकि परमेश्वर की इच्छा ही सारी धार्मिकता का स्रोत और मानदण्ड है। क्योंकि जहाँ तक परमेश्वर की द्विविध इच्छा के विषय में पाठशालाओं में प्रचलित उस भेद का सम्बन्ध है, उसे हम किसी प्रकार स्वीकार नहीं करते। सोरबोन के कुतर्की परमेश्वर की एक व्यवस्थित इच्छा और एक निरपेक्ष इच्छा की बकवास करते हैं। परन्तु यह ऐसी निन्दा है जिसकी ध्वनि से हर भक्त के कान उचित ही घृणा करते हैं, किन्तु पिगियस और उसके सब साथियों के कानों को यह रुचिकर और मधुर लगती है। मैं तो इसके विपरीत यह मानता हूँ कि परमेश्वर में कुछ भी अव्यवस्थित होना तो दूर, स्वर्ग या पृथ्वी पर जो कुछ भी व्यवस्था है वह उसी से और उसकी इच्छा से बहती है। इसलिए जब कभी हम परमेश्वर की इच्छा को उसकी चरम ऊँचाई तक ले जाते हैं और दिखाते हैं कि वह सब तर्कों से ऊँची है, तब हम यह कल्पना करने से कोसों दूर रहें कि वह कभी कुछ भी चाहता है सिवाय सर्वोच्च तर्क के साथ। हम यह भी गहराई से अनुभव करते हैं कि सम्पूर्ण सामर्थ्य का सार उसके पास उसके अपने अधिकार के रूप में ऐसा है कि सब बातों में केवल उसकी इच्छा के संकेत पर सन्तुष्ट रहना हमारा पवित्र कर्त्तव्य है। क्योंकि यदि भजनकार का यह कथन सच है, “हे यहोवा, तेरे विचार बड़े गहरे सागर हैं” (भजन संहिता 36:6), तो जब मनुष्य का मन अभिमान की उस ऊँचाई पर जा चढ़े कि वह परमेश्वर की एकमात्र प्रसन्नता और इच्छा में विश्राम न कर सके, तब वह गम्भीरता से सावधान हो जाए कि कहीं वही “गहरा सागर” उसे निगल न ले! वस्तुतः ऐसा ही होना चाहिए, इससे भिन्न नहीं हो सकता, और ऐसा दण्ड महिमामय रीति से न्यायसंगत है!

इसलिए अगस्तीन की वह उदात्त और गम्भीर पुकार हमारी स्मृति से कभी न जाए: “सुन, परमेश्वर क्या है और तू क्या है। वह परमेश्वर है! तू मनुष्य है! यदि तुझे लगता है कि तू परमेश्वर के कामों और मार्गों में न्याय की बात कर रहा है, तो क्या तू समझता है कि सारे न्याय का सोता सूख गया है? तू मनुष्य होकर मुझसे उत्तर की आशा रखता है, जो मैं भी मनुष्य हूँ। इसलिए आओ, हम दोनों परमेश्वर से हर प्रकार की पूछताछ के विषय में प्रेरित को यह कहते सुनें, ‘हे मनुष्य, भला तू कौन है?’ विश्वास करनेवाली अज्ञानता दुस्साहसी ज्ञान से उत्तम है! योग्यता खोज, तो दण्ड के सिवाय कुछ न पाएगा! ‘आहा! कैसी गहराई!’ इत्यादि। पतरस इनकार करता है; एक डाकू विश्वास करता है!—‘आहा! कैसी गहराई!’ इत्यादि। तू कारण पूछता है? मैं तो ‘उस गहराई’ के सामने थरथराता हूँ! इत्यादि। तू तर्क कर—मैं चकित होकर आराधना करूँगा! तू विवाद कर—मैं विश्वास करूँगा! मैं ऊँचाई देखता हूँ; मैं ‘गहराई’ में नहीं कूदूँगा! पौलुस शान्ति से ठहर गया, क्योंकि उसे चकित होने और आराधना करने का कारण मिल गया। वह परमेश्वर के न्याय को ‘अगम’ कहता है; और तू जान-बूझकर ‘उन्हें खोजने’ आता है? पौलुस कहता है, ‘उसकी गति अगम है;’ और तू जान-बूझकर ‘उसे ढूँढ़ने’ आता है?” इन्हीं पवित्र भावनाओं के समान वह कथन भी है जो अगस्तीन एक और स्थान पर कहता है: “क्या तू मेरे साथ विवाद करेगा? नहीं, बल्कि मेरे साथ चकित होकर आराधना कर! बल्कि मेरे साथ यह पुकार, ‘आहा! कैसी गहराई!’ इत्यादि। आओ, हम मिलकर थरथराएँ, ऐसा न हो कि हम अहंकार में मिलकर नाश हो जाएँ!”

पिगियस अपनी दृष्टि में बड़ी तीक्ष्णता दिखाता है जब वह यह तर्क देता है: “यदि परमेश्वर की इच्छा को सब तर्कों में सर्वोच्च माना जाए, तो कोई गहरा गर्त होगा ही नहीं, क्योंकि यह कहना सबसे सरल होगा कि सब कुछ इसलिए किया गया कि परमेश्वर को यही भाया, जहाँ उसकी इच्छा ही अकेली और निरंकुश रूप से शासन करती है।” परन्तु इस प्रकार कुतर्क बकते हुए वह उसी बात को हास्यास्पद रीति से टाल जाता है जो विवाद का मुख्य प्रश्न है। यह तो स्पष्ट ही है कि सब कुछ इसलिए होता है कि परमेश्वर को यही भाया। परन्तु मुख्य प्रश्न यह है: परमेश्वर को क्यों भाया कि एक बात एक रीति से हो और दूसरी बात उससे बिलकुल उलटी रीति से? इसके बाद पिगियस उसी प्रकार के मूर्खतापूर्ण तर्क में आगे बढ़ता है। और यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर की सब युक्तियों में उसका एक कारण और एक हेतु होता है, वह प्रमाण में वह उत्तर देता है जो मसीह ने एक अन्धे मनुष्य के विषय में अपने चेलों को दिया: “वह जन्म से अन्धा इसलिए हुआ कि परमेश्वर के काम उसमें प्रगट हों।” इस प्रकार पिगियस एक छायायुद्ध खड़ा करता है और फिर उसे लड़कर यह मान लेता है कि उसने विजय पा ली। परन्तु मेरे मन में यह भयानक विचार कब और कहाँ आया कि परमेश्वर की कोई युक्ति परमेश्वर के कारण के बिना है? जब मैं निरन्तर परमेश्वर ही को समस्त संसार का मानदण्ड ठहराता हूँ, जो अपनी अगम्य और अद्भुत युक्ति से सब कुछ पर शासन करता और उसे चलाता है, तो क्या कोई कह सकता है कि वह मेरे शब्दों से यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि मैं परमेश्वर को इधर-उधर यों ही भटकता हुआ, या आँखों पर पट्टी बाँधकर अन्धे दुस्साहस से काम करनेवाला बनाता हूँ?

अब यह विचित्र बात है कि पिगियस मेरे कुछ शब्द उद्धृत करता है जिनसे, यदि मैं भूल नहीं करता, वह स्वयं सबसे स्पष्ट रीति से खण्डित होता है। जिन शब्दों की मैं चर्चा कर रहा हूँ वे वे हैं जिनमें मैं यह कहता हूँ कि परमेश्वर के सब मार्गों और कामों में, वे कितने ही छिपे क्यों न हों, उसका एक उद्देश्य है, और वह उद्देश्य यह है कि वह अपने नाम की महिमा फैलाए। परन्तु मेरा विरोधी अपने पाठकों की आँखों के सामने मेरे विचारों में विरोधाभास का रंग रखना चाहता है, क्योंकि मैं मानता हूँ कि परमेश्वर के किसी भी काम में उसकी सद्-इच्छा का कोई कारण माँगा या खोजा नहीं जाना चाहिए; और फिर भी मैं साथ ही बताता हूँ कि वह कारण क्या है। परन्तु ऐसी ठण्डी और स्वतःस्पष्ट बेतुकी बातों का भण्डाफोड़ करने में समय गँवाना व्यर्थ है। प्रभु के सब कामों का कारण उसकी अपनी महान महिमा है। उन सब में यही उसका परम उद्देश्य है। इसलिए पौलुस की गवाही के अनुसार परमेश्वर ने फ़िरौन को खड़ा किया, “कि मैं तुझ में अपनी सामर्थ्य दिखाऊँ, और मेरे नाम का समस्त पृथ्वी पर प्रचार हो” (रोमियों 9:17)। अब मैं पूछता हूँ, क्या प्रेरित पौलुस अपना ही खण्डन करता है जब वह इसके तुरन्त बाद पुकार उठता है कि परमेश्वर के न्याय “अगम” हैं? वही प्रेरित यह भी घोषणा करता है कि क्रोध के बर्तन, जिन्हें प्रभु ने “विनाश के लिए तैयार” किया था, उसके द्वारा “बड़े धीरज से सहे गए,” ताकि “वह अपना क्रोध दिखाए और अपनी सामर्थ्य प्रगट करे” (रोमियों 9:22)। अब मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या पौलुस का वह चकित आराधना-भाव जो तुरन्त आगे आता है, “आहा! कैसी गहराई!”, उसके इस कथन के विपरीत है? मुझे बताओ, मैं फिर कहता हूँ, क्या प्रेरित यहाँ अपना खण्डन करता है? यदि नहीं, तो मैं भी अपने ऐसे ही गम्भीर तर्क में अपना खण्डन नहीं करता!

परन्तु पिगियस अपने तर्क करने की रीति में और भी आगे बढ़कर भूल, बेतुकेपन और गड़बड़ी में जा पड़ता है। वह रूपगत कारण के स्थान पर अन्तिम कारण को रखकर कारण शब्द ही पर झूठा रंग चढ़ा देता है। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर अपने कामों में जिस उद्देश्य की ओर देखता है वह अस्पष्ट नहीं है, अर्थात् उसकी अपनी महान और व्यापक महिमा, तथापि उसे ऐसा करना क्यों भाता है, इसका कारण किसी प्रकार इतना पूर्णतः और तुरन्त स्पष्ट नहीं होता। तथापि इस सम्पूर्ण महान प्रश्न के वर्तमान बिन्दु का सार और निचोड़ यह है: यद्यपि परमेश्वर अपने सब कामों में अपनी धार्मिकता हमें स्पष्ट और सन्तोषजनक तर्कों से प्रमाणित नहीं करता, तौभी हमारा अनिवार्य कर्त्तव्य यह निश्चय रखना है कि वह जो कुछ करता है धार्मिकता से करता है। इसलिए हमारा कर्त्तव्य है कि हम केवल उसकी इच्छा में विश्राम करें। अतः वह जो कुछ भी करता है, उसमें उसकी इच्छा और प्रसन्नता का हमारा ज्ञान, चाहे उसके ऐसा करने का कारण हमारी समझ से परे हो, हमारे लिए हज़ार तर्कों से अधिक पर्याप्त होना चाहिए। इसीलिए पिगियस की मूर्खता है कि वह मुझसे झगड़ता है और मुझ पर असंगति का दोष लगाता है, क्योंकि मैं यह मानते हुए कि ईश्वरीय इच्छा के कारण की पूछताछ नहीं करनी चाहिए, यह भी ऊँचे स्वर से कहता हूँ कि परमेश्वर कुछ भी नहीं चाहता सिवाय उसके जिसका किया जाना वह न्यायसंगत और उचित ठहराता है। क्योंकि वह दावा करता है कि मेरे तर्क का यह पिछला अंग वास्तव में सबके कारण के रूप में परमेश्वर की इच्छा का कारण बताना है; और वह कहता है कि इस कारण का बताया जाना मैं अन्यत्र अपने लिए या किसी और के लिए असंगत बताता हूँ। परन्तु यदि मैं केवल यही मानता हूँ कि परमेश्वर जो करता है वह किसी महान योजना से और उसी बात को करता है जिसे वह उचित समझता है, और विशेषकर जब मैं साथ ही यह स्वीकार करता हूँ कि मैं ईश्वरीय कार्य और युक्ति के निश्चित और विशेष कारण को समझ नहीं सकता, तो मुझ पर कारण के ज्ञान का दावा करने का आरोप कैसे लगाया जा सकता है? इन सबके अतिरिक्त, मेरा विरोधी विश्वास की श्रद्धा और परमेश्वर की इच्छा की पूछताछ के दुस्साहस के बीच के भारी भेद को बिलकुल तुच्छ बात समझकर, जिसे मैं विश्वास की बात सिखाता हूँ उसे पकड़कर बेतुके ढंग से उस साधारण ज्ञान के घेरे में फेंक देता है जो मानवीय कल्पना की उपज है।

इस बेतुके सिद्धान्त के अनुसार, यदि कोई यह कहे कि परमेश्वर के हर कार्य में एक महिमामय उद्देश्य है, और थोड़ी ही देर बाद प्रेरित के साथ यह पुकार उठे कि परमेश्वर के “न्याय अगम” हैं और “उसकी गति अगम है,” तो ऐसी पुकार के क्षण में उसे अपना ही खण्डन करनेवाला मनुष्य ठहराया जाना चाहिए। परन्तु पिगियस सर्वथा भूल करता है। क्योंकि वह मुझे मेरे ही शब्द स्वीकार करने को बुलाता है, जबकि जिस अंश का वह हवाला देता है वह निश्चय ही वह है जिसे मैंने अगस्तीन से उद्धृत किया था। वह यह है: “जब लोग हमसे पूछें (वह पवित्र जन कहता है) कि परमेश्वर ने यह या वह क्यों किया, तो हमारा उत्तर यह हो, ‘क्योंकि यह उसकी इच्छा थी।’ यदि वे आगे पूछें, उसने ऐसा क्यों चाहा? तो हमारा उत्तर यह होना चाहिए, अब तू वह पूछता है जो परमेश्वर की इच्छा से भी बड़ा और ऊँचा है! तू वह पूछता है जिसे कोई खोज नहीं सकता!’ इसलिए मानवीय दुस्साहस अपनी सीमा में रहे। वह उसकी खोज न करे जो है ही नहीं, ऐसा न हो कि जो है उसे भी न पाए।” अगस्तीन इन शब्दों में अत्यन्त सच बोलता है, और मैं पूर्ण रूप से उससे सहमत हूँ। न मेरे ऊपर लिखे विचारों में ऐसा कुछ है जो इन पवित्र पिता के इन शब्दों से पूरी तरह मेल न खाता हो। मेरे विचार और तर्क ये हैं कि परमेश्वर की इच्छा उन सब वस्तुओं की, जिन्हें उसने बनाया और किया है, सर्वोत्तम और सर्वाधिक न्यायसंगत व्यवस्था है।

एक और आपत्ति उसी भूसी की है जिसे पिगियस मेरे निम्नलिखित प्रकाशित विचारों के विरुद्ध उठाता है: “मैं इनकार करता हूँ कि निकम्मे लोग चुने हुओं से इस कारण अलग और भिन्न किए गए कि परमेश्वर ने चुने हुओं की योग्यताओं का कोई विचार किया; क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह उन्हें अपने गोद लेने के योग्य बनाता है, उन्हें योग्य पाता नहीं” (जैसा अगस्तीन प्रायः कहता है)। एक और स्थान पर मैं यों कहता हूँ: “मैं इनकार करता हूँ कि निकम्मों के ठुकराए जाने से उनके साथ कोई अन्याय होता है, क्योंकि वे अनन्त विनाश के योग्य हैं।” यहाँ पिगियस कोलाहलपूर्ण उल्लास में अपने पंख फैलाता है, और शोर मचाकर पुकारता है कि न मैं अपने को समझता हूँ, न अपने विचारों को, और न मुझे वह कुछ स्मरण है जो मैं पहले स्वयं कह चुका हूँ। परन्तु मैं अपनी रक्षा में बहुत शब्द खर्च करना आवश्यक समझने से इतना दूर हूँ कि उस उद्देश्य के लिए थोड़े शब्द भी कठिनाई से कह पाता हूँ। इसलिए मैं इतना कहूँगा कि जब परमेश्वर कुछ को औरों पर प्राथमिकता देता है, जब वह कुछ को चुनता और औरों को छोड़ देता है, तब यह भेद न तो एक की और न दूसरे की योग्यता या अयोग्यता के आधार पर किया जाता है। इसलिए यह कहना झूठ है कि निकम्मे लोग अनन्त विनाश के योग्य हैं। अतः यदि पहली दशा में मनुष्यों की एक-दूसरे से कोई तुलना नहीं है, और न अनन्त जीवन के प्रतिफल के साथ योग्यता का कोई सम्बन्ध है; तो दूसरी दशा में निश्चय ही इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि परमेश्वर के चुनाव के सम्बन्ध में सब मनुष्यों की दशा एक-सी है। इसमें यह भी जोड़ो कि अगस्तीन ने अपनी रचनाओं के एक भाग में कहा था कि जो मनुष्य उद्धार के योग्य था वह कभी उससे वंचित नहीं रहा, परन्तु अपने बाद के पुनरावलोकनों में उसने इस कथन को संशोधित किया, कर्मों की सब धारणा को सावधानी से निकाल दिया और सब ग्रहणयोग्य योग्यता को परमेश्वर के मुफ़्त अनुग्रहपूर्ण बुलावे के अधीन बताया।

तथापि पिगियस अपने उग्र विरोध को आगे बढ़ाता ही जाता है, और यह दोष लगाता है कि यदि मेरी शिक्षा सच है कि जो नाश होते हैं वे परमेश्वर की अनन्त इच्छा से अनन्त मृत्यु के लिए ठहराए गए थे, जिसका कारण हमारे लिए अगोचर है, तो इस प्रकार ठहराए गए लोग अनन्त मृत्यु के योग्य बनाए जाते हैं, पाए नहीं जाते। मेरा उत्तर है कि यहाँ तीन बातों पर विचार करना है: 1. कि परमेश्वर की अनन्त पूर्वनियति, जिसके द्वारा उसने आदम के पतन से पहले ठहराया कि सारी मानवजाति में और उसके हर एक व्यक्ति में क्या होगा, अटल रूप से स्थिर और निश्चित की गई थी। 2. कि आदम स्वयं परमेश्वर से दूर हो जाने के कारण उचित रीति से अनन्त मृत्यु के लिए ठहराया गया। 3. और अन्त में, कि इस प्रकार पतित और खोए हुए आदम में उसकी सारी भावी सन्तान भी अनन्त काल के लिए दोषी ठहराई गई; परन्तु इस प्रकार अनन्त काल के लिए दोषी कि परमेश्वर उस भावी सन्तान में से जिन सब को उसने मुफ़्त में चुना उन्हें अपने गोद लेने के सम्मान के योग्य ठहराता है। इन महान बातों में से न कोई अंश मैंने स्वप्न में देखा है, न गढ़ा है। और न इस समय मुझे प्रत्येक बात को प्रमाणित करना है, क्योंकि मैं मानता हूँ कि यह मैं पहले ही अत्यन्त प्रभावी रीति से कर चुका हूँ। मैं केवल इतना करूँगा कि अपने ऊपर से वह निन्दा धो डालूँ जिससे मेरे विरोधी ने मुझे कलंकित किया है, जब वह कहता है कि इन बातों को किसी भी प्रकार एक-दूसरे से मेल खाता या संगत नहीं बनाया जा सकता। जबकि मैंने सदा एकरूप से जो सिखाया है और आज भी सिखाता हूँ वह यह है कि जब कभी चुनाव पर चर्चा हो, तो आदि से अन्त तक जो बात दृढ़ता से कही जानी चाहिए वह यह है कि सब निकम्मे लोग उचित रीति से अनन्त मृत्यु के अधीन छोड़े जाते हैं, क्योंकि वे आदम में मरे और अनन्त काल के लिए दोषी ठहरे; और यह भी कि वे उचित रीति से नाश होते हैं जो स्वभाव से क्रोध की सन्तान हैं; और अन्त में यह कि इसलिए किसी को परमेश्वर की अत्यधिक कठोरता की शिकायत करने का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि सब मनुष्य अपने आप में और अपने-अपने व्यक्तित्व में अनन्त मृत्यु का दोष और दण्ड-योग्यता धारण किए हुए हैं।

जब पूर्वनियति के सिद्धान्त की चर्चा में हम प्रथम मनुष्य के विषय में बोलने पर आते हैं, तो मेरी शिक्षा यह है कि हमें सदा इस गम्भीर बात पर विचार करना चाहिए: कि वह पूर्ण रूप से धर्मी सृजा गया था, पर अपनी ही इच्छा और स्वेच्छा से गिरा, और उस पतन के द्वारा उसने अपने ऊपर और अपनी सारी भावी जाति पर अनन्त विनाश ला दिया। और यद्यपि आदम न तो परमेश्वर के ज्ञान के बिना और न उसकी ठहरानेवाली इच्छा के बिना गिरा और न उसने अपना और अपनी सन्तान का नाश किया, तौभी इससे न उसका अपना दोष घटता है, न परमेश्वर पर किसी प्रकार का दोष आता है। क्योंकि हमें सदा सावधानी से स्मरण रखना चाहिए कि आदम ने अपनी ही इच्छा और स्वेच्छा से उस सिद्ध धार्मिकता को खो दिया जो उसने परमेश्वर से पाई थी; और अपनी ही स्वेच्छा से उसने अपने आप को पाप और शैतान की सेवा में सौंप दिया, और इस प्रकार अनन्त विनाश में जा गिरा। तथापि यहाँ लोग आदम के लिए निरन्तर एक ही बहाना प्रस्तुत करेंगे—कि जो परमेश्वर ने स्वयं ठहराया था उसे रोकना या उससे बचना उसके लिए सम्भव नहीं था। परन्तु आदम का दोष सदा के लिए स्थापित करने को उसका अपना स्वैच्छिक अपराध ही पर्याप्त, बल्कि पर्याप्त से अधिक है। और वास्तव में परमेश्वर की गुप्त युक्ति पाप का वास्तविक और प्रभावी कारण नहीं है, परन्तु स्पष्टतः मनुष्य की इच्छा और झुकाव है।

मेदेआ की शिकायत की मूर्खता का उपहास प्राचीन कवि ने भी उचित ही किया है, जब वह उसे वह प्रसिद्ध विलाप करते हुए दिखाता है, “काश कि वह जहाज़, जो पेलियन वन से कुल्हाड़ियों से काटे गए तख़्तों का बना था, एजिना से कोल्खिस, मेरी जन्मभूमि की ओर कभी न चलता!” मेदेआ ने एक परदेशी और सर्वथा अजनबी के प्रति उत्पन्न हताश प्रेम की उत्कट लालसा में बहकर अपने देश के साथ विश्वासघात किया था। और जब उसकी अन्तरात्मा उसे उसके विश्वासघात और बर्बर क्रूरता के लिए धिक्कारती है, जब अवैध भोग की लज्जा उसे दबोच लेती है, तब वह बेतुके ढंग से अपने पछतावे के विचारों को अपनी दुर्दशा के कारणों के रूप में अनेक दूरस्थ परिस्थितियों की ओर मोड़ देती है। परन्तु जब हर मनुष्य अपनी बुराइयों का कारण सदा अपने भीतर पा सकता है, तो चारों ओर देखने, या उस कारण को स्वर्ग में ढूँढ़ने से क्या लाभ? इस प्रकार मेदेआ का दोष स्पष्ट प्रकट है कि उसने स्वेच्छा से और जान-बूझकर पाप किया। तब वह स्वर्ग के रहस्यों में जा घुसकर अपने को खोए हुए विचारों की भूलभुलैया में क्यों डुबोती है? क्योंकि चाहे मरणशील मनुष्य अपने विचारों को कितने ही लम्बे और गहरे घुमावदार तर्कों में लगाएँ, वे अपने आप को इतना कभी नहीं छल या जड़ बना सकते कि यह न पाएँ और न अनुभव करें कि वे अपने सब पापों का मूल कारण अपने ही हृदय में गहराई से जमा हुआ लिए फिरते हैं। इसलिए अभक्त तर्क उस मनुष्य को पाप के दोष से मुक्त ठहराने का व्यर्थ प्रयत्न करेगा जो अपनी ही अन्तरात्मा से दोषी ठहरा है। और जहाँ तक इस बात का सम्बन्ध है कि परमेश्वर ने जानते-बूझते और स्वेच्छा से मनुष्य को गिरने दिया, ऐसा करने का उसका कारण छिपा हो सकता है!—पर अन्यायपूर्ण नहीं हो सकता! और इसके अतिरिक्त, यह बात भी बिना विवाद के सदा दृढ़ता से थामी जानी चाहिए कि पाप परमेश्वर को सदा घृणित रहा है। क्योंकि दाऊद ने परमप्रधान की जो स्तुति ऊँचे स्वर से की है वह उसकी आराध्य महिमा पर हर रीति से ठीक बैठती है: “तू सब अनर्थ करनेवालों से घृणा करता है” (भजन संहिता 5:5)। इसलिए मनुष्य के पतन को ठहराने में परमेश्वर का विशेष रूप से एक अत्यन्त महिमामय और अत्यन्त न्यायसंगत उद्देश्य था; ऐसा उद्देश्य जिसके हमारे चिन्तन में परमेश्वर की ओर से पाप का उल्लेख या विचार कभी प्रवेश नहीं कर सकता; उसके प्रवेश का विचार ही हमें भय से भर देता है!

इसलिए यद्यपि मैं इस प्रकार दृढ़ता से कहता हूँ कि परमेश्वर ने आदम के पतन को ठहराया, तौभी मैं इसे इस प्रकार कहता हूँ कि किसी भी प्रकार यह न मान लूँ कि परमेश्वर उस पतन का यथार्थ और वास्तविक कर्ता था। तथापि इस महान बात पर अब विस्तार से न रुकते हुए मैं केवल अपना यह मत, विश्वास और भावना प्रकट करूँगा कि अगस्तीन इस विषय में जो गहरी शिक्षा देता है वह परमेश्वर के आदम के पतन को ठहराने में पूरी हुई: “एक अद्भुत और अवर्णनीय रीति से वह परमेश्वर की इच्छा के बिना नहीं हुआ (वह कहता है), जो उसकी इच्छा के विरुद्ध भी हुआ; क्योंकि यदि उसकी इच्छा उसे होने की अनुमति न देती, तो वह हो ही नहीं सकता था। तौभी उसने उसकी अनुमति अनिच्छा से नहीं, परन्तु इच्छा से दी।” इसलिए वह महान और उदात्त सिद्धान्त जिस पर अगस्तीन तर्क करता है, अस्वीकार नहीं किया जा सकता: “कि मनुष्य और भ्रष्ट हुए स्वर्गदूत दोनों ने, जहाँ तक वे स्वयं सम्बद्ध थे, वह किया जो परमेश्वर नहीं चाहता था या जो उसकी इच्छा के विरुद्ध था; परन्तु जहाँ तक परमेश्वर की सब पर प्रबल सर्वशक्तिमत्ता का सम्बन्ध है, वे किसी भी रीति से उसे उसकी इच्छा के बिना नहीं कर सकते थे।” इस पवित्र जन के इन विचारों से मैं पूरे हृदय से सहमत हूँ। मैं गम्भीरता से मानता हूँ कि मनुष्य और भ्रष्ट हुए स्वर्गदूतों ने अपने पाप के द्वारा वह किया जो परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध था, इसलिए कि परमेश्वर उनकी बुरी इच्छा के द्वारा वह पूरा करे जो उसकी ठहरानेवाली इच्छा के अनुसार था। यदि कोई उत्तर दे कि यह उसकी बुद्धि की समझ से परे है, तो मैं भी यही स्वीकार और अंगीकार करता हूँ। परन्तु हम आश्चर्य क्यों करें कि परमेश्वर की अनन्त और अगम्य महिमा हमारी सीमित बुद्धि की सँकरी सीमाओं से परे है? तथापि मैं मानवीय तर्क की किसी भी शक्ति से इस उदात्त और गुप्त भेद को समझाने का बीड़ा उठाने से इतना दूर हूँ कि मैं इस चर्चा के आरम्भ में कही हुई उस बात को सदा अपनी स्मृति में रखूँगा—कि जो परमेश्वर के प्रकट किए हुए से अधिक जानना चाहते हैं वे पागल हैं! इसलिए आओ, हम परमेश्वर की अनुमति से अधिक जानने की अत्यधिक और मतवाली जिज्ञासा की अपेक्षा बुद्धिमान अज्ञानता में अधिक आनन्दित हों। हमारे मन की सब शक्तियाँ इस श्रद्धापूर्ण निश्चय की सीमा में अपने को रोके रखें कि परमेश्वर ने मनुष्य के पाप के द्वारा कुछ नहीं चाहा, सिवाय उसके जो उसके अनन्त न्याय से उत्पन्न हुआ!

पिगियस आगे कहता है: “यदि मनुष्य का धर्मत्याग परमेश्वर का काम है, तो पवित्रशास्त्र का वह कथन सच नहीं ठहरता जब वह कहता है, ‘परमेश्वर जो कुछ करता है वह बहुत अच्छा है।’” अब मैं पवित्र रूप से गवाही दे सकता हूँ, और पूरी निष्कपटता से स्वीकार करता हूँ, कि मेरे विरोधी की यह टीका कभी मेरे मन में आई ही नहीं। मैंने सर्वत्र यही कहा है कि मनुष्य आदि में पूर्ण रूप से खरा सृजा गया था। मैंने यह निरन्तर इसीलिए कहा है कि उस भ्रष्टता को, जो उसने अपने पतन से अपने ऊपर ली, परमेश्वर के सिर न मढ़ा जाए। मैंने उतनी ही निरन्तरता से यह भी कहा है कि वह अनन्त मृत्यु जिसके अधीन मनुष्य ने अपने आप को किया, उसके अपने दोष से इस प्रकार उत्पन्न हुई कि परमेश्वर किसी भी प्रकार उसका कर्ता नहीं माना जा सकता। अब यदि मैंने कभी यह कहा होता कि प्रथम मनुष्य का परमेश्वर से दूर हो जाना किसी भी रीति से परमेश्वर के आत्मा की प्रेरणा या गति से हुआ; यदि मैंने इसके विपरीत एकरूप से यह न माना होता कि आदम शैतान के बहकावे से और अपने ही हृदय की प्रेरणा से गिरा; तो सचमुच पिगियस मुझ पर उचित ही अपना क्रोधपूर्ण आक्रमण कर सकता था। परन्तु अब, जबकि मैं मनुष्य के पतन के कार्य का सारा निकटतम कारण परमेश्वर से दूर करता हूँ, इस प्रकार उस कार्य का सारा दोष भी उससे दूर करता हूँ, और पाप और दोष मनुष्य ही पर छोड़ता हूँ। जब मैं यह शिक्षा देता हूँ, तो मेरा विरोधी यह कहकर मुझे निन्दापूर्वक और दुष्टता से क्यों बदनाम करता है कि मैं मनुष्य के पतन को “परमेश्वर के कामों में से एक” बनाता हूँ? परन्तु यह कैसे हुआ कि परमेश्वर ने अपने पूर्वज्ञान और आदेश से वह ठहराया जो आदम में होना था, और फिर भी इस प्रकार ठहराया कि वह स्वयं दोष का तनिक भी भागी न हुआ, और न अपराध का कर्ता या अनुमोदक हुआ; यह कैसे हुआ, मैं फिर कहता हूँ, एक ऐसा रहस्य है जो स्पष्टतः मानवीय बुद्धि के किसी भी प्रयास से भेदने के लिए बहुत ही गहरा है। इसलिए इस विषय में मैं अपनी पूर्ण अज्ञानता स्वीकार करने में लज्जित नहीं हूँ। और विश्वासियों में से किसी के लिए यह दूर ही रहे कि वह उस बात की अपनी अज्ञानता स्वीकार करने से लजाए जिसे प्रभु परमेश्वर ने अपनी अगम्य ज्योति की प्रभा में पूरी तरह लपेट रखा है!

और यहाँ मेरे पाठक निश्चित रहें कि मैं दूसरों को कोई ऐसी सम्मति नहीं देता जिसका मैं स्वयं पूरे हृदय से पालन नहीं करता। क्योंकि प्रभु मेरा गवाह है, और मेरी अन्तरात्मा भी पवित्र आत्मा में वही गवाही देती है, कि मैं परमेश्वर के इन विस्मयकारी न्यायों पर प्रतिदिन इस प्रकार मनन करता हूँ कि जो कुछ मैं अब जानता और जिसकी मैंने गवाही दी है, उससे परे कुछ भी जानने की मुझे तनिक भी जिज्ञासा या इच्छा नहीं होती। और न परमेश्वर के सर्वोपरि न्याय के विषय में कोई सन्देहभरी शंका कभी मेरे मन में चुपके से घुसती है। न कुड़कुड़ाने की कोई प्रवृत्ति मेरी आत्मा को कभी लुभाती है। संक्षेप में, मैं अगस्तीन के इन विचारों में शान्तिपूर्वक और स्वेच्छा से भी पूरा विश्राम पाता हूँ: “परमेश्वर (वह कहता है), जिसने सब कुछ बहुत अच्छा बनाया, पहले से जानता था कि उस अच्छाई में से बुराई उत्पन्न होगी; और वह यह भी जानता था कि उसकी महिमामय और सर्वशक्तिमान भलाई बुराई को बिलकुल होने न देने की अपेक्षा बुराई में से भलाई निकालने से अधिक ऊँची उठाई जाएगी। उसने स्वर्गदूतों और मनुष्यों के जीवन को इसलिए ठहराया कि पहले उस जीवन के द्वारा प्रकट करे कि स्वतन्त्र इच्छा क्या कर सकती है, और फिर आगे दिखाए कि उसके अनुग्रह का आशीर्वाद और उसके न्याय का निर्णय क्या कर सकता है।” इन ईश्वरीय विचारों में मैं केवल इतना जोड़ूँगा (अपनी हार्दिक सहमति दोहराते हुए) कि यदि किसी के कान निरन्तर इतने खुजलाते हों कि वे परमेश्वर के किसी भी भेद को छिपा और बन्द नहीं रहने दे सकते, तो ऐसे शिष्यों को अपनी शिक्षा से सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करनेवाला शिक्षक पागल से भी बुरा होगा।

नहीं! हम तो उस बात को सुनें और उससे थरथराएँ जो दाऊद के साथ घटी जब वह परमेश्वर के कुछ असाधारण न्यायों की पूछताछ करने की ओर झुका, जो मनुष्यों की बाहरी दशा और इस वर्तमान जीवन में दिखाई देते थे: “मैं तो पशु सा था, और समझता न था; मैं तेरे संग रहकर भी, मानो पशु बन गया था” (भजन संहिता 73:22)। हम देखते हैं कि दाऊद जैसा उच्च भविष्यद्वक्ता भी उचित सीमा से परे बुद्धिमान बनने का प्रयत्न करके घबराहट में पड़ा और अपने आप को मानो एक पशु अनुभव किए बिना न रह सका। तब क्या यह मान लिया जाए कि हम स्वर्ग या पृथ्वी की सब वस्तुओं में सबसे गहरी, परमेश्वर की युक्ति को समझने के प्रयास में मन की बेतुकी उच्छृंखलता में दण्ड पाए बिना लिप्त हो सकते हैं? जब पौलुस गवाही दे चुका कि परमेश्वर ने नष्ट हुए मनुष्य-समूह में से जिसे चाहा उसे चुना और जिसे चाहा उसे ठुकराया, तब प्रेरित यह समझाने का प्रयत्न करने से इतना दूर था कि परमेश्वर ने ऐसा कैसे या क्यों किया, कि विस्मय, आराधना और भय से अभिभूत होकर वह यह पुकार उठा, “आहा! कैसी गहराई!” इत्यादि। तब क्या हम उस “गहराई” से भयभीत हुए बिना और सारी श्रद्धा से रहित होकर पतन की “गहराई” में खोज करने और यह पूछने का दुस्साहस करें कि परमेश्वर ने क्यों सारी मानवजाति को आदम में गिरने दिया? मैं पहले ही कह चुका हूँ कि आदम का पतन उसकी सारी सन्तान के लिए नम्रता की स्थायी शिक्षा है; ऐसी शिक्षा जिससे वे सीख सकें कि वे अपने आप में कुछ नहीं हैं और अनन्त जीवन के विषय में कुछ नहीं कर सकते; कि आदम सिद्ध था, और सिद्धता से कर सकता था, तौभी वह गिर गया! “आहा! कैसी गहराई!” अब बुद्धिमान होने का एकमात्र सही नियम यही है कि मनुष्य का मन आश्चर्य की उस लगाम से अपने को रोके रखे—“आहा! कैसी गहराई!” इत्यादि।

तथापि हमने इस महान प्रश्न को इतने हल्के रूप में भी इसलिए नहीं छुआ कि वह गूढ़ था और परमेश्वर के पवित्रस्थान के भीतरी कोने में छिपा था, परन्तु इसलिए कि व्यर्थ जिज्ञासा को प्रश्रय नहीं दिया जाना चाहिए, जिस जिज्ञासा की पालनहार और धाई उच्च-भाव की कल्पनाएँ हैं। और यद्यपि मैं अगस्तीन की “उत्पत्ति पर टीका” (अध्याय 11, 4-8) की सब बातों का बहुत अनुमोदन करता हूँ, जहाँ वह सब कुछ को परमेश्वर के भय और श्रद्धा की शिक्षा में ढाल देता है; तौभी वह दूसरा अंश, जहाँ वह दिखाता है कि परमेश्वर ने आदम की दोषी ठहरी हुई जाति में से जिन्हें चाहा उन्हें चुना और जिन्हें चाहा उन्हें ठुकराया, मुझे विश्वास को जगाने और उसका अभ्यास कराने के लिए कहीं अधिक उपयुक्त जान पड़ता है; और उस विषय का उसका विवेचन अधिक प्रचुर फल उत्पन्न करनेवाला है। इसलिए मैं अपनी ओर से उस सिद्धान्त पर बल देने में, जिसकी शिक्षा में मानव स्वभाव की भ्रष्टता, पाप और दोष निहित है, अधिक स्वतन्त्रता और आनन्द पाता हूँ। शिक्षा का यह सार मुझे केवल सारी मूलभूत भक्ति की शिक्षा के लिए अधिक सहायक ही नहीं, वरन् अधिक ईश्वरविज्ञानसम्मत भी जान पड़ता है। तथापि हम स्मरण रखें कि शिक्षा के इस पिछले सार में, अर्थात् मानव स्वभाव की भ्रष्टता और बिगाड़ के विषय में, हमें संयम और नम्रता से तर्क करना चाहिए। सबसे बड़ी सावधानी यह रखनी चाहिए कि हम उससे आगे न जाएँ जहाँ तक प्रभु अपने वचन के द्वारा हमें ले चलता है। क्योंकि हम भली-भाँति जानते हैं कि मानवीय बुद्धि के तर्कों और पैठ के प्रलोभन कितने मोहक होते हैं। इसलिए और भी अधिक सावधानी बरतनी चाहिए कि विश्वास की सरलता अपनी सुनहरी जंजीर से हमारी सब इन्द्रियों को कसकर बाँध ले।

अब, कि परमेश्वर मनुष्यों को अपने पवित्र आत्मा की गुप्त प्रेरणा और प्रभाव से अपनी ओर खींचता है, इसकी गवाही हमारी प्रतिदिन की प्रार्थनाएँ भी देती हैं। क्योंकि जब हम अपने सतानेवालों के लिए प्रार्थना करते हैं, तो उनके लिए और क्या माँगते हैं सिवाय इसके कि वे जो पहले अनिच्छुक थे परमेश्वर की आज्ञा मानने को इच्छुक हो जाएँ; कि वे जिन्होंने पहले सत्य का विरोध किया, हमारे साथ उसे ग्रहण करें; कि वे जो पहले परमेश्वर से लड़ते थे उससे प्रेम करें? परन्तु यह प्रत्यक्ष है कि यह सब मनुष्यों को बिना भेद नहीं दिया जाता कि परमेश्वर अचानक उन्हें अनन्त जीवन के योग्य ठहराए जो सौ बार अनन्त विनाश के योग्य ठहर चुके थे। “परन्तु यह कैसे है (अगस्तीन कहता है) कि परमेश्वर यह अनुग्रह देता है, कुछ को उनकी उचित योग्यता के अनुसार क्रोध के बर्तन, और औरों को अपने अनुग्रह के अनुसार दया के बर्तन बनाता है; यदि हम पूछें कि यह कैसे है, तो इसके सिवाय और कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता, ‘प्रभु का मन किसने जाना है?’ और यद्यपि संसार का अभिमान और ढिठाई ऐसी तुलना पर, जो स्वयं पवित्र आत्मा ने की है, लात मारती है, तौभी यह किसी प्रकार सहन करने योग्य नहीं कि परमेश्वर की दशा मनुष्य की दशा से बुरी हो! क्योंकि मनुष्यों में कौन-सा साहूकार है जिसे यह अधिकार नहीं कि एक देनदार से भुगतान माँगे, और दूसरे का ऋण क्षमा कर दे?” यह दृष्टान्त अगस्तीन बहुत बार और अत्यन्त उपयुक्त रीति से प्रयोग करता है। “वह (कहता है) हो ही नहीं सकता कि मनुष्य का स्वाभाविक मन एक क्षण में विचलित न हो जाए, जब वह सुनता है कि परमेश्वर का वही अनुग्रह कुछ अयोग्य लोगों को नहीं दिया जाता, और औरों को, जो प्रत्यक्षतः उतने ही अयोग्य हैं, मुफ़्त में दिया जाता है। तथापि आओ, हम भली-भाँति विचार करें कि जब सब समान रूप से अनन्त दण्ड के अधीन थे, तब हमारे लिए परमेश्वर पर ऐसी रोक लगाना किसी प्रकार उचित या ठीक नहीं कि वह जिस पर चाहे दया न करे।” परन्तु अगस्तीन बहुत ठीक कहता है कि परमेश्वर के न्याय को मानवीय न्याय के छोटे मापदण्ड से किसी प्रकार नहीं नापा जाना चाहिए। “इस विस्मयकारी विषय पर जो कुछ कहा जा सकता है सब कह लिए जाने के बाद (वह कहता है) प्रेरित की वह छोटी परन्तु श्रद्धा से भरी पुकार हमारे सारे विवादों का अन्त कर दे। आओ, हम उसके साथ परमेश्वर के अगम मन के आगे श्रद्धा से खड़े हों और कहें, ‘आहा! कैसी गहराई!’ इत्यादि। यदि ढीठ जीभें शोर मचाएँ, विवाद करें या और माँगें, तो प्रेरित की वह ऊँची झिड़की कहने में हम कभी न लजाएँ न दुखी हों, ‘हे मनुष्य, भला तू कौन है, जो परमेश्वर का सामना करता है?’”

अब यद्यपि मैं मानता हूँ कि मैंने अपनी “संस्थापना” में विरोध की उन विविध बेतुकी बातों का, जो मेरे विरोधी मेरी शिक्षा को कलंकित और बदनाम करने के लिए चारों ओर से उस पर लादते हैं, स्पष्टता और संक्षेप में पहले ही खण्डन कर दिया है; और यद्यपि मैं समझता हूँ कि मैंने उन अनेक कल्पनाओं का, जिनसे अज्ञानी लोग अपने आप को भरमाते और उलझाते हैं, प्रभावी रीति से सामना किया और उन्हें उघाड़ा है; तौभी, चूँकि पिगियस को मेरी गवाहियों और विरोधियों को दिए गए मेरे उत्तरों को कुतरने में बड़ा आनन्द मिला है, इसलिए मैं आगे बढ़ते हुए अपने ऊपर से उसकी विषैली मैल धोने से इनकार नहीं करूँगा।

हमारे कुछ विरोधियों ने बेतुके ढंग से पूछा है: यदि उद्धार परमेश्वर की गुप्त युक्ति में है, तो मनुष्य अपने उद्धार के विषय में निश्चित कैसे हो सकते हैं? मैंने इन कथनों में उत्तर दिया है, जो सत्य हैं। चूँकि उद्धार की निश्चयता हमारे लिए मसीह में “प्रस्तुत की गई” है, इसलिए जीवन के इस सोते को, जो इसलिए खोला गया है कि मनुष्य उसमें से भर लें, छोड़ देना, और परमेश्वर के मन और युक्ति के छिपे हुए गर्तों में से अनन्त जीवन का जल निकालने के लिए व्यर्थ परिश्रम और कष्ट करना, व्यर्थ भी है और स्वयं मसीह का अनादर भी! पौलुस गवाही तो देता है कि हम “जगत की उत्पत्ति से पहले चुने गए,” परन्तु वह मसीह में था। इसलिए कोई भी परमेश्वर द्वारा अपने चुने जाने का भरोसा “मसीह में” के सिवाय और कहीं न खोजे, जब तक कि वह “जीवन की पुस्तक” को, जिसमें उसका नाम लिखा है, मिटा देना और हटा देना न चाहे। परमेश्वर का हमें “मसीह में” गोद लेना इसी उद्देश्य से है कि हम उसकी सन्तान गिने जाएँ। अब पवित्रशास्त्र घोषणा करता है कि वे सब जो परमेश्वर के एकलौते पुत्र पर विश्वास करते हैं, परमेश्वर की सन्तान और वारिस हैं। इसलिए मसीह वह स्वच्छ दर्पण है जिसमें हम परमेश्वर के अनन्त और छिपे हुए चुनाव को देखने के लिए बुलाए गए हैं; और उस चुनाव का वह बयाना भी है। परन्तु वह आँख जिससे हम उस अनन्त जीवन को देखते हैं जिसे परमेश्वर इस दर्पण में हमारे सामने रखता है, विश्वास है। और वह हाथ जिससे हम इस बयाने और प्रतिज्ञा को थामते हैं, विश्वास है। यदि कोई इस बात को और स्पष्टता से कहलवाना चाहे, तो वह यों समझे: चुनाव ईश्वरीय क्रम में विश्वास से पहले आता है, परन्तु वह विश्वास के द्वारा देखा और समझा जाता है। जिस बात को मैं यहाँ केवल छू रहा हूँ, पाठक उसे मेरी “संस्थापना” में और विस्तार से समझाई हुई पाएँगे। इसीलिए मसीह, पिता की युक्ति में अपनों के अनन्त चुनाव पर ज़ोर देते हुए, साथ ही वह आधार भी बताता है जिस पर उनका भरोसा सुरक्षित रूप से टिक सकता है; जहाँ वह कहता है, “मैंने तेरा नाम उन मनुष्यों पर प्रगट किया जिन्हें तू ने जगत में से मुझे दिया। वे तेरे थे और तू ने उन्हें मुझे दिया; और उन्होंने तेरे वचन को मान लिया है” (यूहन्ना 17:6)। हम यहाँ देखते हैं कि परमेश्वर अपने आप से आरम्भ करता है, जब वह हमें चुनने और मसीह को देने की कृपा करता है। परन्तु वह चाहता है कि हम मसीह से आरम्भ करें, यदि हम जानना चाहें कि हम उसकी “निज प्रजा” में गिने गए हैं। कहा जाता है कि परमेश्वर पिता ने हमें अपने पुत्र को दिया, इस उद्देश्य से कि उसके चुने हुओं में से हर एक को यह ज्ञान प्राप्त हो कि जब तक वह मसीह में बना रहता है तब तक वह उसके स्वर्गीय राज्य का वारिस है, जिससे बाहर मृत्यु और विनाश हमें चारों ओर से घेरे हैं। इसीलिए कहा जाता है कि मसीह पिता का “नाम प्रगट करता है,” क्योंकि वह अपने आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों पर पिता द्वारा हमारे चुने जाने का वह ज्ञान मुहर लगाता है, जो पुत्र के सुसमाचार की वाणी के द्वारा हम पर खुले रूप से घोषित किया जाता है।

अब यदि हम अपने मित्र पिगियस की बात मानें, तो वह यह दिखाएगा कि मैं ऐसा परिश्रम और पसीना बहाता हूँ, और बातों को इस प्रकार उलटता-पलटता हूँ, और सब कुछ को इस प्रकार गड्डमड्ड करता हूँ कि यह पूरी तरह प्रकट हो जाए कि मैं जो कुछ लिखता या कहता हूँ उस सबमें अपनी ही अन्तरात्मा से दोषी ठहरा हूँ। पिगियस तो अपनी विशेष वाचालता की बाढ़ को संसार के सबसे सरल ढंग से, पसीने की एक बूँद बहाए बिना ही उँडेल सकता है। परन्तु अपनी जीभ को पूरी छूट देने के लिए वह सदा अपने आप को अच्छी तरह दाखमधु से तर करने का ध्यान रखता प्रतीत होता है, ताकि वह बिना किसी लज्जा की रोक के वे गालियों की आँधियाँ उड़ा सके जो पहले उसके दोनों फूले हुए गालों को भरती हैं। एक और आपत्ति यह है, “कि यदि परमेश्वर की पूर्वनियति उद्धार का अटल और अनिवार्य कारण है, तो हम में सारा विश्वास और भरोसा, और उसकी आवश्यकता, तुरन्त हमारे हाथ से छिन जाते हैं।” ऐसे बेतुके कथन के उत्तर में अपना कोई तर्क दिए बिना मैं केवल इतना कहूँगा कि जब पौलुस गवाही देता है कि हम ईश्वरीय गोद लेने के भागी बनाए गए हैं, क्योंकि हम जगत की उत्पत्ति से पहले चुने गए थे; तो मैं पूछता हूँ, इस शिक्षा और उसके सम्बन्ध में अव्याख्येय या उलझा हुआ क्या है? क्योंकि जब प्रेरित उसी प्रसंग में सिखाता है कि जो इस प्रकार परमेश्वर द्वारा पहले चुने गए थे वे पीछे उसके उद्देश्य के अनुसार बुलाए गए, तो वह, यदि मैं भूल नहीं करता, हमारे विश्वास के दृढ़ भरोसे को परमेश्वर के चुनाव के अटल आदेश के साथ सुन्दरता से मेल खिलाता है।

पिगियस आगे यह तर्क करता है: “यदि वे सब जो मसीह की देह के अंग हैं ‘जीवन की पुस्तक में लिखे हुए’ हैं, तो पियक्कड़, व्यभिचारी, चोर, झूठी शपथ खानेवाले, हत्यारे, इत्यादि, इत्यादि, परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे। परन्तु यह सब प्रेरित पौलुस की स्पष्ट गवाही के सर्वथा विपरीत है, क्योंकि इनमें से बहुत लोग बपतिस्मा के द्वारा ‘मसीह में कलम लगाए गए’ और उन्होंने ‘मसीह को पहन लिया’ है।” अब पहले तो मैं अपने पाठकों से विनती करूँगा कि वे एक क्षण के लिए पवित्रशास्त्र की इस खुली लगाम की अपवित्रता पर ध्यान दें, जिसमें पिगियस मनमाना विचरने में बड़ा आनन्द पाता है; और फिर यह कि वे उस अपवित्रता का बदला लेने में परमेश्वर के न्यायपूर्ण निर्णय को देखें, जिसका उदाहरण पिगियस अपने आप में इतने प्रत्यक्ष रूप से देता है। क्योंकि उसके लिए सारे पवित्रशास्त्र को एक साथ पैरों तले रौंदना कुछ भी नहीं है! बस वह अपने पाठकों की आँखों को परमेश्वर के वचन के झूठे रंगों से धोखा दे सके और अनुभवहीनों की दृष्टि में अपने आप को बड़ा बना सके, तो वह सारी भक्ति के मूल सिद्धान्तों को उखाड़ने पर चुटकी बजाएगा। परन्तु प्रभु उससे उसकी सामान्य बुद्धि छीन लेता है और उसे बच्चों के भी उपहास का पात्र बना देता है।

अब प्रेरित पौलुस खतने को दो प्रकार का बताता है: “अक्षर” का खतना और “आत्मा” का खतना; इसी प्रकार हमें बपतिस्मा के विषय में भी सदा सोचना और कहना चाहिए। बहुत से लोग अपनी देह में केवल चिह्न धारण करते हैं, परन्तु यथार्थता के स्वामी होने से दूर हैं। इसी प्रकार पतरस ने भी यह कहने के पश्चात् कि हम बपतिस्मा से बचाए जाते हैं, तुरन्त एक और सुधार और चेतावनी के रूप में घोषणा की कि केवल देह का बाहरी धोया जाना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि भली अन्तरात्मा का उत्तर भी न हो। “शरीर के मैल को दूर करना नहीं (वह कहता है), परन्तु परमेश्वर के सामने भली अन्तरात्मा का उत्तर” (1 पतरस 3:21)। इसलिए पवित्रशास्त्र संस्कारों को प्रस्तुत करते समय सदा उनके विषय में द्विविध अर्थ में बोलता है। जब वह उन कपटियों से बात करता है जो खोखले चिह्न में घमण्ड करके यथार्थता की उपेक्षा करते हैं, तब ऐसों के व्यर्थ भरोसे को गिराने के लिए वह यथार्थता को चिह्न से सावधानी से अलग करता है, और इस भेद से उनके मन का टेढ़ापन तुरन्त उघड़ और पराजित हो जाता है। इसी रीति से पौलुस कुरिन्थियों को स्मरण दिलाता है (1 कुरिन्थियों 10:5) कि प्राचीन प्रजा को इससे कोई लाभ नहीं हुआ कि लाल समुद्र के पार जाते समय वे सब बपतिस्मा पाए थे, और हमारे साथ “सब ने एक ही आत्मिक भोजन खाया,” और हमारे साथ “सब ने एक ही आत्मिक जल पीया”; अर्थात् (पौलुस का तात्पर्य है) उन्होंने हमारे साथ आत्मिक दानों के एक ही बाहरी चिह्नों में भाग लिया। परन्तु जब प्रेरित विश्वासियों से बात करता है, तब वह संस्कारों के विषय में उनके वैध और प्रभावी उपयोग में बोलता है, जैसा कि वे अपनी ईश्वरीय स्थापना के उद्देश्यों को पूरा करते हैं। इसलिए जब पौलुस संस्कारों के विषय में इस प्रकार बोलता है, तब वह इन वाक्यांशों को, कि जिन्होंने “मसीह को पहन लिया है,” जो “उसकी देह में कलम लगाए गए हैं,” जो “उसके साथ गाड़े गए हैं,” जो “उसके नाम में बपतिस्मा पाए हैं,” इत्यादि, उनके मूल अर्थ में प्रयोग करता है। परन्तु पिगियस पौलुस के इन वाक्यांशों के प्रयोग से बेतुके ढंग से यह निष्कर्ष निकालता है कि वे सब जिन पर जल के दृश्य तत्व का छिड़काव हुआ है वे सचमुच आत्मा से नया जन्म पा चुके हैं और सचमुच मसीह की देह में सम्मिलित हो चुके हैं, ताकि वे परमेश्वर के लिए और उसकी धार्मिकता में जीएँ। और वह अपनी रचनाओं के पृष्ठ पर पृष्ठ ऐसी बेतुकी बातों से भरने में लजाता भी नहीं। जबकि जब मैं अपनी रचनाओं में सामान्यतः मनुष्यों के विषय में बोलता हूँ, तब उन सब को जिन पर बाहरी बपतिस्मा के जल का छिड़काव हुआ है, बाहरी अर्थ में “मसीह के अंग” कहता हूँ। तथापि थोड़ी ही देर बाद पिगियस अपने फैले हुए पंखों को कुछ समेट लेता है, और टिप्पणी करता है कि बहुत से लोग मसीह से गिर जाते हैं जो सचमुच उसकी देह में कलम लगाए गए थे; और वह यह ठहराता है कि जिन्हें मसीह ने पिता से इस रूप में पाया कि वे उसकी विश्वासयोग्यता और देखरेख को सौंपे गए थे, उन्हें वह इस प्रकार बचाता है कि उनका उद्धार फिर भी उनकी अपनी स्वतन्त्र इच्छा पर निर्भर रहे। “बहुत से ऐसे हैं (वह कहता है) जिनके पास मसीह के अनुग्रह की सुरक्षा की कमी नहीं, परन्तु जो स्वयं अपने प्रति चूकते हैं।”

निश्चय ही उन लोगों के आलस्य और कृतघ्नता की पर्याप्त कठोरता से निन्दा कभी नहीं की जा सकती जो स्वेच्छा से अपने आप को परमेश्वर की सुरक्षा से हटा लेते हैं। परन्तु यह मसीह का अपमान है, जिसे किसी प्रकार सहन नहीं किया जाना चाहिए, कि कोई मनुष्य कहे कि परमेश्वर के चुने हुए उसके द्वारा इस शर्त पर बचाए जाते हैं कि वे अपनी देखरेख परिश्रम से करें। इस प्रकार मसीह की वह सुरक्षा पूरी तरह अनिश्चित और संदिग्ध बना दी जाती है, जिसके विरुद्ध स्वयं मसीह घोषणा करता है कि शैतान और नरक की सब युक्तियाँ कभी प्रबल न होंगी। मसीह ने स्वयं प्रतिज्ञा की कि वह उन सब को अनन्त जीवन देगा जो उसे पिता की ओर से दिए गए थे। और उसने गवाही दी कि जिस दिन उसने यह प्रतिज्ञा की उस दिन तक वह उन सब का सुरक्षित रखवाला रहा, और कि “उनमें से कोई नाश न हुआ, केवल वही जो नाश होने को था; इसलिए कि पवित्रशास्त्र की बात पूरी हो” (यूहन्ना 17:2, 12)। एक और स्थान पर वह घोषणा करता है कि परमेश्वर के चुने हुए उसके हाथों में हैं, और कोई उन्हें छीन न सकेगा, क्योंकि परमेश्वर सारे संसार से अधिक सामर्थी है। तब यदि सब चुने हुओं के लिए अनन्त जीवन निश्चित है; यदि मसीह के हाथ से कोई छीना नहीं जा सकता; यदि वे किसी हिंसा, किसी हताश आक्रमण से उससे फाड़ कर अलग नहीं किए जा सकते; यदि उनका उद्धार परमेश्वर की अजेय सामर्थ्य में स्थित है; तो पिगियस का माथा कितना ढीठ और दुस्साहसी होगा कि वह ऐसी निश्चयता और सुरक्षा को हिलाने का प्रयत्न करे? परन्तु बात यहीं समाप्त नहीं होती। वह आगे कहता है, “यद्यपि मसीह किसी को निकालता नहीं; तौभी बहुत से अपनी ही इच्छा से उसके पास से चले जाते हैं। और जो कुछ समय के लिए परमेश्वर की सन्तान थे वे वैसे बने नहीं रहते।” पिगियस यहाँ इस बात से कि वह यह स्वीकार करने से इनकार करता है कि वे सब जिन्हें पिता ने मसीह को दिया, अन्त तक उसके हाथों में सुरक्षित रखे जाते हैं ताकि वे बचाए जाएँ, व्याख्याकार के रूप में अपनी दुष्टता और हठधर्मिता प्रकट करता है। क्योंकि जितने गिर जाते हैं उनके विषय में यूहन्ना घोषित करता है कि वे मसीह के झुण्ड के थे ही नहीं। “वे हम में से निकले तो, पर हम में के थे नहीं (सुसमाचार-लेखक कहता है); क्योंकि यदि वे हम में के होते, तो निःसन्देह हमारे साथ रहते; पर निकल इसलिए गए कि प्रगट हो कि वे सब हम में के नहीं हैं” (1 यूहन्ना 2:19)।

पिगियस कहता है कि यदि तुम्हारी शिक्षा और तर्क सच है कि सब चुने हुए इस प्रकार मसीह के हाथ में “अन्त तक” सुरक्षित हैं, तो उद्धार की वह शर्त जो स्वयं मसीह ने रखी है व्यर्थ ही प्रस्तावित की गई, जहाँ वह कहता है, “जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा उसी का उद्धार होगा” (मत्ती 10:22)। यहाँ हर कोई स्वीकार करेगा कि मेरा विरोधी टालमटोल करता है। उसने यह प्रमाणित करने का बीड़ा उठाया था कि हमारे उद्धार का भरोसा परमेश्वर द्वारा हमारे चुने जाने के साथ संगत रूप से टिक नहीं सकता। परन्तु अब उसका तर्क हमें उस बिन्दु से खींच ले जाता है, और हमें यह प्रमाणित करने की ओर ले जाता है कि पहला अनिवार्यतः पिछले पर टिका है। इस प्रकार मैं अपने आप को इस मनुष्य के उग्र आक्रमणों की लहरों से निरन्तर इतना उछलता-पटकता पाता हूँ कि शायद ही कोई क्षण बीतता हो जिसमें मैं डूबने के संकट में न होऊँ। परन्तु जैसे परमेश्वर अपने चुने हुओं को डूबने से बचाने के लिए सदा थामे रहता है, वैसे ही मुझे पूरा भरोसा है कि मैं अपने विरोधी के सब निरन्तर तूफ़ानों के सामने स्थिर रहूँगा। जब पिगियस मुझसे पूछता है कि मैं कैसे जानता हूँ कि मैं चुना हुआ हूँ, तो मेरा उत्तर यह है, “मेरे लिए मसीह हज़ार गवाहों से बढ़कर है।” क्योंकि जब मैं अपने आप को उसकी देह में कलम लगा हुआ पाता हूँ, तब मेरा उद्धार ऐसे सुरक्षित, निश्चिन्त और शान्त स्थान में टिका है कि मानो मैं उसे स्वर्ग में पहले ही पा चुका हूँ। यदि पिगियस उत्तर में कहे कि परमेश्वर के अनन्त चुनाव का निर्णय वर्तमान अनुग्रह से नहीं किया जा सकता, तो मैं अपनी ओर से उन अनुभूतियों को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न नहीं करूँगा जो विश्वासी इस विषय में अनुभव करते हैं, क्योंकि “परायों” को उस रोटी का स्वाद चखना भी नहीं दिया गया जिस पर परमेश्वर की “सन्तान” पलती है। परन्तु जब पिगियस बकवाद करने का साहस करता है कि पवित्रशास्त्र में कहीं नहीं मिलता कि परमेश्वर की सन्तान अपने वर्तमान अनुग्रह से अपने अनन्त चुनाव को जानती है, तो ऐसे नंगे और नीच झूठ का खण्डन परमेश्वर का वचन एक क्षण में कर देता है। जब पौलुस गवाही दे चुका कि जो चुने गए वे बुलाए जाते, धर्मी ठहराए जाते, और अन्त में एक धन्य अमरता को पहुँचते हैं, तब मानो हर ओर से एक दृढ़ गढ़ से सुरक्षित होकर वह इस प्रकार उल्लसित और विजयी होता है, “परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा?” इत्यादि। और ताकि कोई यह न समझे कि सुरक्षा की यह शिक्षा सब मनुष्यों पर सामान्यतः लागू होती है, वह तुरन्त बाद इसे प्रत्येक विश्वासी के विशेष उपयोग के लिए लागू करता है: “क्योंकि मुझे निश्चय है (वह कहता है) कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी” (रोमियों 8:33, 38, 39)। अब, जबकि पिगियस चाहता है कि विश्वासी का अनन्त उद्धार का भरोसा किसी भी क्षण छोटा करके तोड़ा जा सके, पौलुस उसे भविष्य में और इस वर्तमान जीवन की सीमा से परे अनन्तता तक फैलाता है, और प्रमाणित करता है कि ऐसा भरोसा परमेश्वर के चुनाव के सिवाय और किसी स्रोत से नहीं आता! इसके विपरीत, पिगियस विश्वासी के भरोसे और उसके चुनाव को एक-दूसरे के विपरीत और विरोधी के रूप में इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि वह उन्हें एक-दूसरे को नष्ट करनेवाला बना देता है।

“तब यहेजकेल का क्या तात्पर्य है (पिगियस पूछता है) जब वह धर्मी मनुष्य पर विनाश की घोषणा करता है, यदि वह सीधे मार्ग से फिर जाए?” (यहेजकेल 18:26।) अब हम इससे इनकार नहीं करते कि निकम्मों में कभी-कभी बहुत-सी ऐसी बातें होती हैं जो परमेश्वर की सन्तान में भी पाई जाती हैं; परन्तु वे धार्मिकता के रूप से कितना ही क्यों न चमकें, यह निश्चित है कि वे कभी गोद लेने के आत्मा से नहीं उपजी थीं। ऐसे निकम्मे मनुष्य, जो इस प्रकार प्रत्यक्षतः धर्मी दिखते हैं, कभी सच्चाई से परमेश्वर को अपना पिता कहकर नहीं पुकार सकते। क्योंकि पौलुस गवाही देता है कि गोद लेने के उस आत्मा से कभी कोई “चलाया” नहीं जाता सिवाय परमेश्वर के पुत्रों के, जिन्हें वह अनन्त जीवन के “वारिस” भी घोषित करता है। यदि ऐसा न होता, तो वही प्रेरित एक और स्थान पर जो गवाही देता है वह सही न ठहरता, जहाँ वह कहता है, “हमने संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाया है जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें जो परमेश्वर ने हमें मुफ़्त में दी हैं।” और फिर, “परन्तु हम में मसीह का मन है” (1 कुरिन्थियों 2:12, 16)। यदि ऐसा न होता (हम दोहराते हैं), तो प्रेरित पौलुस ने उस आत्मा को, जिससे विश्वासी मुहर पाते हैं, व्यर्थ ही “उनकी भावी मीरास का बयाना” कहा होता। परन्तु परमेश्वर द्वारा हमारे चुने जाने का सही ज्ञान हमारे अन्तिम स्थिर बने रहने के विश्वास को दृढ़ करता है, इसका भरपूर प्रमाण मसीह की वह एक प्रार्थना देनी चाहिए, जिसमें वह सब चुने हुओं को अपने स्वर्गीय पिता को सौंपता है, उन्हें नाम लेकर संसार से अलग करता है, और प्रार्थना करता है कि जब यह संसार न रहेगा तब वे इसकी सब बुराई से बचे रहें, और महिमा में अपने और पिता के साथ “सिद्ध” और “एक” किए जाएँ (यूहन्ना 17)।

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