अध्याय 12

जॉन कैल्विन की प्रस्तावना (भाग 1/2)

Calvin's Calvinism · John Calvin

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जॉन कैल्विन की प्रस्तावना (भाग 1/2)

प्रस्तावना — परमेश्वर की गुप्त व्यवस्था

जॉन कैल्विन द्वारा

जिस क्षण मैं परमेश्वर की उस व्यवस्था (प्रोविडेंस) पर कुछ कहने का विचार करता हूँ, जिसके द्वारा वह न केवल सारे जगत के विशाल तन्त्र को और उसके प्रत्येक छोटे-से-छोटे अंश को, वरन् मनुष्यों के हृदयों और कर्मों को भी चलाता है, उसी क्षण एक विशाल और जटिल विषय मेरे सामने खड़ा हो जाता है। परन्तु चूँकि मैं इस अद्भुत विषय पर पहले ही ऐसी रीति से लिख चुका हूँ जो, मुझे आशा है, सब सुबुद्धि और निष्पक्ष पाठकों को कुछ अंश तक सन्तुष्ट करेगी, इसलिए इस अवसर पर मैं इसे केवल संक्षेप में और प्रसंगवश छूऊँगा, और यथासम्भव संक्षिप्तता अपनाऊँगा। और मुझसे न तो वाणी की कोई भव्यता अपेक्षित है, न विचारों की ऐसी दीप्ति जो इस विषय की महानता और उत्कृष्टता के अनुरूप हो। मैं केवल थोड़े सीधे-सादे शब्दों में उन्हीं तर्कों को दोहराऊँगा जिन्हें मैंने अपनी “institutes” (संस्थापना) में पूर्ण रूप से विकसित किया है। परन्तु यदि मुझे ऐसी आवश्यकता दिखाई दी, तो मैं अब इन तर्कों के साथ पवित्रशास्त्र की कुछ और साक्षियाँ भी गूँथ दूँगा। और मैं, जैसी मेरी आशा है, स्पष्ट खण्डन के द्वारा पिघियस* और उसके साथियों की कपटपूर्ण और विद्वेषभरी छिद्रान्वेषी बातों को ऐसा धो डालूँगा कि वे भक्तिमानों के मनों को तनिक भी हानि या बाधा न पहुँचा सकें।

व्यवस्था (प्रोविडेंस) से हमारा अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर स्वर्ग में उदासीन होकर बैठा है और वहाँ से केवल यह देखता रहता है कि जगत में क्या हो रहा है; वरन् यह कि वह ऊपर अपने सिंहासन पर पूर्ण सक्रियता और पूर्ण चिन्ता के साथ विराजमान है, और उसी से उस जगत का शासन करता है जिसे उसी ने बनाया है। अतः परमेश्वर, अपनी व्यवस्था के दर्पण में देखा जाए तो, केवल एक क्षण में सब वस्तुओं का सृजनहार ही नहीं, वरन् अपनी सृजी हुई सब वस्तुओं का सतत शासक भी है। इसलिए जो व्यवस्था हम परमेश्वर की ठहराते हैं, वह उसके देखनेवाले नेत्रों से जितनी जुड़ी है उतनी ही उसके कार्य करनेवाले हाथों से भी। इसलिए जब कहा जाता है कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था से जगत पर शासन करता है, तो हमारा अर्थ केवल यह नहीं कि वह प्रकृति के उस क्रम को बनाए रखता और सुरक्षित रखता है जो उसने आरम्भ में अपने मन में ठहराया था, वरन् यह कि वह अपनी सृजी हुई प्रत्येक सृष्टि की विशेष देखभाल रखता और निरन्तर करता रहता है। और यह सत्य और निश्चित है कि जैसे परमेश्वर की अद्भुत बुद्धि ने ही आरम्भ में जगत को बनाया और उसे उसके वर्तमान सुन्दर क्रम में सजाया, वैसे ही यदि परमेश्वर की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य सदा उपस्थित रहकर इस प्रकार रचे और सजाए हुए जगत को थामे न रखे, तो वह अपने निर्धारित क्रम और रूप में एक घण्टा भी न टिक सके।

कि सूर्य दिन-प्रतिदिन हमारे ऊपर उदय होता है; कि इतनी तीव्र गति में उसकी किरणें इतनी संयमित और उसकी अंश-गतियाँ इतनी सुनियोजित हों; कि तारों का क्रम, जो इतने आश्चर्यजनक रूप से सजाया गया है, कभी भंग न हो; कि ऋतुओं का परिवर्तन इतने अटूट रूप से लौटता रहे; कि पृथ्वी प्रतिवर्ष इतनी नियमितता से मनुष्य के पोषण के लिए अपनी कोख खोले; कि तत्त्व और उनके अलग-अलग कण अपने ठहराए हुए कार्य करना न छोड़ें; एक शब्द में, कि प्रकृति की उर्वरता कभी घटे या चुके नहीं—यह समस्त अद्भुत क्रिया, सहक्रिया और निरन्तरता परमेश्वर के निर्देशक हाथ को छोड़ किसी और कारण से उत्पन्न हुई, यह तो कदापि नहीं सोचा जा सकता! और एक सौ चौथा भजन इसी सार्वभौम व्यवस्था की एक लम्बी और ऊँची स्तुति के सिवा और क्या है! प्रेरित पौलुस इसी ईश्वरीय व्यवस्था की स्तुति करता है जब वह कहता है, “क्योंकि हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं” (प्रेरितों के काम 17:28)। इसलिए, जैसे एकमात्र परमेश्वर का सार-तत्त्व उसका अपना विशिष्ट है, वैसे ही वनस्पति का वह जीवनदायी सिद्धान्त, जिससे सब प्राणी टिके रहते हैं और जिसके बिना वे शीघ्र नष्ट हो जाएँगे, विश्वास की दृष्टि से परमेश्वर का एक गुप्त संचार माना जाना चाहिए।

परन्तु सामान्य और सार्वभौम व्यवस्था का ज्ञान अस्पष्ट और धुँधला रहता है, जब तक हम साथ ही यह विश्वास न रखें और इस पर मनन न करें कि परमेश्वर अपनी सृष्टि के प्रत्येक एक-एक प्राणी को अपनी चिन्ता के पंखों के नीचे ढाँपे रखता है। यही महिमामय पाठ सिखाना मसीह का उद्देश्य था जब उसने कहा, “आधे पैसे में बिकनेवाली एक गौरैया भी तुम्हारे स्वर्गीय पिता की जानकारी के बिना भूमि पर नहीं गिरती” (मत्ती 10:29)। परन्तु परमेश्वर की इस विशेष व्यवस्था पर विचार करते समय, जिसके द्वारा वह प्रत्येक प्राणी को अपने हाथों की रचना जानकर उसकी चिन्ता में गुप्त रूप से लगा रहता है, आवश्यक है कि हम उन निश्चित श्रेणियों और विशिष्ट लक्षणों को पवित्र दृष्टि से देखें जिन्हें वह ईश्वरीय रीति से अपने में समाए हुए है।

चूँकि मनुष्य परमेश्वर की सबसे उत्तम रचना है, जिसके “भले” के लिए वे सब वस्तुएँ रची गईं जो आकाश और पृथ्वी में हैं, इसलिए पवित्रशास्त्र परमेश्वर की व्यवस्था को मुख्यतः मानव-जाति की देखभाल और शासन से सम्बन्धित बताता है। पौलुस उस वचन की व्याख्या में, “दाँवनेवाले बैल का मुँह न बाँधना ”, कहता है, “क्या परमेश्वर बैलों के लिए चिन्ता करता है?” — इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर की व्यवस्थापूर्ण चिन्ता विशेष रूप से उन्हीं को अपना कार्यक्षेत्र बनाकर उन पर नहीं ठहरती, वरन् विशेष करके मनुष्यों की चिन्ता में लगी है। इस दृष्टि से, चूँकि ईश्वरीय व्यवस्था की गति परमेश्वर के उन व्यवहारों में है जो वह मनुष्यों से, बुद्धि-सम्पन्न प्राणियों के रूप में, करता है, इसलिए उसका संचालन अधिक निश्चित प्रकाश और उज्ज्वल महिमा धारण कर लेता है। क्योंकि परमेश्वर के न्याय अद्भुत हैं; कभी दुष्टों को दण्ड देने में; कभी विश्वासियों को धीरज सिखाने और उनके शरीर को क्रूस पर चढ़ाने में; कभी जगत की दुष्टताओं को शुद्ध करने में; कभी बहुतों की नींद और आलस्य को जगाने में; कभी घमण्डियों के अहंकार को तोड़ने में; कभी बुद्धिमानों की बुद्धि को हँसी का पात्र बनाने में; कभी द्वेषियों की युक्तियों को नष्ट करने में। दूसरी ओर, परमेश्वर की अतुल भलाई दुखियों की सहायता करने में, निर्दोषों के पक्ष की रक्षा और बचाव करने में, और उनकी सहायता को आने में जो सब सहायता से निराश हो चुके हैं, उज्ज्वल रूप से प्रकट होती है। एक सौ सातवें भजन में परमेश्वर की उस व्यवस्था के संचालन का, जो मनुष्यों के प्रति प्रकट होती है, सुन्दर और महिमामय वर्णन है। उस भजन में भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि वे उलटफेर, जिन्हें मनुष्य प्रायः परिवर्तन की प्रचण्ड बाढ़ें मानते हैं, मानो अन्धे वेग से मनुष्यों पर लुढ़कती हुई संकट की लहरें नहीं हैं, वरन् ऐसे उज्ज्वल दर्पण हैं जिनमें परमेश्वर की भलाई, उसके क्रोध या उसकी धार्मिकता को देखा जा सकता है! और इस धन्य भजन के अन्त में उसका लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि यदि भक्त और “बुद्धिमान” जन जगत के इन विविध परिवर्तनों पर उचित रीति से “ध्यान” दें, तो वे परमेश्वर के मार्गों की समझ पाएँगे और आनन्द के लिए बहुत कारण पाएँगे। साथ ही भजनकार यह भी संकेत करता है कि यही मनन यदि दुष्ट करें, तो परमेश्वर के अद्भुत कामों का विस्मयकारी दृश्य उनके मुँह बन्द कर देगा!

परन्तु यहाँ हमें ईश्वरीय व्यवस्था की अन्य और ऊँची सीढ़ियों पर भी दृष्टि डालनी चाहिए। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर इस प्रकार अपने आपको सारी मानव-जाति का पिता और न्यायी प्रकट करता है, तथापि चूँकि कलीसिया उसका पवित्र स्थान है जिसमें वह निवास करता है, इसलिए वह वहाँ अपनी उपस्थिति को अधिक स्पष्ट और उज्ज्वल प्रमाणों से प्रकट करता है; वहाँ वह अपने आपको अपने परिवार के पिता के रूप में दिखाता है, और यदि मैं ऐसा कह सकूँ तो, अपना निकटतर दर्शन देने की कृपा करता है।

पवित्रशास्त्र इसकी साक्षियों से भरा है, जो घोषणा करती हैं कि परमेश्वर विश्वासियों पर विशेष दृष्टि रखता है: “यहोवा की आँखें (दाऊद कहता है) धर्मियों पर लगी रहती हैं” (भजन संहिता 33:21); “वह अपने भक्तों के प्राणों की रक्षा करता है” (भजन संहिता 97:10); “क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है,” पतरस कहता है (1 पतरस 5:7); “तुम्हारे सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं,” प्रभु स्वयं कहता है (मत्ती 10:30)। एक शब्द में, कलीसिया परमेश्वर की महान कार्यशाला है, जिसमें वह विशेष रीति से अपने अद्भुत कामों को प्रदर्शित करता है; और वही उसकी महिमामय व्यवस्था का अधिक प्रत्यक्ष रंगमंच है।

इसी कारण कहा जाता है कि परमेश्वर ने स्वर्गदूतों को, जो मानो उसके हाथ हैं, विशेष रीति से अपने उन पवित्र लोगों का रखवाला ठहराया है जो उस पर विश्वास करते हैं; ताकि स्वर्गदूतों की भी मसीह की देह से अलग, जिसके वे भी अंग हैं, कोई पृथक् स्थिति या पद न हो। इसलिए, ताकि हम इस सम्पूर्ण ईश्वरीय विषय पर सब ओर देखनेवाली और व्यापक दृष्टि डाल सकें, हमारी आँखें पहले उस सामान्य शासन पर ठहरें जो सारे जगत पर है, जिससे सब वस्तुएँ पोषित होती और अंकुरित होती हैं, कि उन सबकी प्राकृतिक अवस्था, समष्टि में और व्यष्टि में, वही बनी रहे और सुरक्षित रहे।

दूसरे, हमारी आँखें परमेश्वर की उस चौकसी पर ठहरें जिससे वह इन सब सृजी हुई वस्तुओं के एक-एक अंश और कण को चलाता और सम्भालता है; और यह चौकसी ऐसी है कि उनमें या उनके विषय में कुछ भी अज्ञात या अनदेखा नहीं घटता। तीसरे, हमें मानव-जाति के प्रति परमेश्वर की अधिक विशेष चिन्ता को देखना चाहिए, जो ऐसी है कि मनुष्यों का जीवन और मृत्यु, राज्यों और जातियों के सार्वजनिक भाग्य, और व्यक्तियों के निजी मामले, और जो कुछ मनुष्य सामान्यतः भाग्य के सिर मढ़ते हैं, सब उसके स्वर्गीय शासन और प्रबन्ध के अधीन हैं। और अन्त में, हमें उस विशेष सुरक्षा पर मनन करना चाहिए जिससे परमेश्वर अपनी कलीसिया की रक्षा करता है, जिस सुरक्षा में वह अपनी उपस्थिति और अपनी सामर्थ्य को और अधिक स्पष्टता से प्रकट करता है।

इस सिद्धान्त की विशाल और बहुरूपी उपयोगिता को कोई शब्द पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं कर सकते। और जगत के शासन में परमेश्वर की उस व्यवस्था पर, जैसी वह पवित्रशास्त्र में हमारे सामने रखी गई है और विश्वास से देखी जाती है, कोई भी लाभपूर्वक मनन नहीं करेगा, सिवा उसके जो यह अनुभव करते हुए कि उसका सामना अपने सृजनहार और सब वस्तुओं के रचयिता से है, पहले उस भय, आदर और दीनता के साथ “सिर झुकाता” है जो ऐसी विस्मयकारी महिमा के सम्मुख खड़े होनेवाले को शोभा देती है! क्योंकि यदि मनुष्य अपने संगी मनुष्यों को भी यह आदर देने का अभ्यासी है कि उनके कामों को खुले मन और नम्रता से परखे, विशेषकर जहाँ कोई बात उस क्षण कुछ अस्पष्ट और समझने में कठिन जान पड़े; यदि मनुष्य ऐसे अवसरों पर सत्य की खोज में और अधिक चिन्तित और परिश्रमी होता है, और जल्दबाज़ी के निर्णय से अपने संगी मनुष्य को हानि पहुँचाने की अपेक्षा अपना निर्णय रोके रखना अधिक पसन्द करता है; तो क्या, मैं पूछता हूँ, यह पागलपन से भी बुरा और क्रूरता से भी अधिक नहीं है कि परमेश्वर के साथ दस गुनी अधिक स्वतन्त्रता बरती जाए, और उसके विस्मयकारी कामों को हमारे तुच्छ निर्णय के पैमाने पर उतार लाया जाए; असीम रूप से उदात्त और सर्वथा अगम्य बातों पर उतावली सम्मति दी जाए; उसकी गुप्त युक्तियों की थाह लेने का प्रयत्न किया जाए; और सबसे बढ़कर, ऐसे गहन और ऐसे अत्यन्त आराधनीय रहस्यों से खिलवाड़ किया जाए? यह ढिठाई सब युगों में सचमुच विचरती रही है, परन्तु आज के दिनों में उसने पहले के किसी भी युग या समय से अधिक लम्बे डग भरे हैं और अधिक ऊँची डींगें हाँकी हैं। आजकल के बहुत-से अविश्वासी, यह देखकर कि वे परमेश्वर को स्वर्ग से नीचे खींच नहीं सकते (जो वे प्राचीन दैत्यों की नाईं सचमुच करने का प्रयत्न करते हैं), कम-से-कम इतना तो भरसक यत्न करते हैं कि निकृष्टतम और नीचतम निन्दाएँ उगलकर अपने और सब मनुष्यों के विवेक से धर्म और सच्ची उपासना का एक-एक अंश निकाल बाहर करें, और इस प्रकार अपनी अपवित्रता और परमेश्वर तथा उसके सत्य के विरुद्ध अपना क्रोध प्रकट करते हैं।

इनमें से अधिकांश लोगों में सारी बुराई का स्रोत स्पष्टतः यह है: वे हलके और उतावले स्वभाव के लोग होने के कारण पहले अपनी व्यर्थ जिज्ञासा को छूट देते हैं। फिर, उनके सामने कोई निश्चित लक्ष्य या उद्देश्य न होने से, वे अपने आपको सर्वथा निरर्थक अटकलों के हाथ सौंप देते हैं। इसके पीछे एक बेलगाम दुस्साहस आता है, जो उनकी जीभों को ठीक उनकी ढिठाई के अनुपात में उतावलेपन से बोलने को उकसाता है। फिर दूसरे लोग हैं जो एक दुष्ट मनोदशा के वश में हैं, जो भिन्न तो है पर उतनी ही हानिकारक। क्योंकि वे बेतुके स्वप्नों में भटककर अपने मनों को हठ, या निराशा, या आलस्य में डुबो देते हैं। ये सब शैतान की ही चालें हैं; और इन्हें अपनाने में उसका उद्देश्य यह है कि वह सच्ची, खरी और पवित्र शिक्षा को गढ़ी हुई बातों के सब प्रकार के “झूठे चमत्कारों” में उलझा दे, जिनके द्वारा वह हमें न केवल उसकी सारी लाभदायकता और फल से वंचित करे, वरन् उसे या तो तुच्छ, या घृणित, या विनाशकारी भी बना दे। परन्तु शैतान जो भी योजनाएँ अपनाए, हम सदा उस विकृत सावधानी से बचे रहें जिसका आश्रय कुछ लोग लेते हैं, जो ऐसे खतरों का सामना करने के लिए उसे अस्पष्ट करने या बिगाड़ने से छोटा मार्ग नहीं पाते जिसे पवित्रशास्त्र यथासम्भव खुली और नग्न सरलता से कहता है।

अब इन सब बुराइयों का कहीं अधिक उपयुक्त और प्रभावशाली उपचार यह है कि हम अपने मनों को निरन्तर इस विचार के अधीन रखें कि परमेश्वर की व्यवस्था पर किस रीति से और किस उद्देश्य से मनन किया जाना चाहिए। पहला उद्देश्य यह है कि वह हमें सब धृष्ट भरोसे से मुक्त रखे और परमेश्वर के भय में दृढ़ थामे रहे, और हमें निरन्तर प्रार्थना के लिए भी उभारे। दूसरा उद्देश्य यह है कि वह हमें शान्त और चैन भरे मनों से परमेश्वर पर विश्राम करना सिखाए, और यह सिखाए कि हम पूर्ण साहस और निश्चिन्तता के साथ उन खतरों को तुच्छ जानें जो हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं और उन अनगिनत मृत्युओं को भी जो हर दिशा से निरन्तर हमें धमकाती हैं। इन दोनों महान उद्देश्यों को मैं अब यथासम्भव संक्षेप में समझाने का यत्न करूँगा। जो लोग यह कल्पना करते हैं कि भाग्य या संयोग नाम की कोई वस्तु है, या जो अपने उद्यम, या योजनाओं, या परिश्रम से कुछ आशा रखते हैं, वे हर उपाय के पीछे इधर-उधर बहते हैं, चारों ओर हाँके जाते हैं, (जैसा वे कहते हैं) हर पत्थर उलट-पलट कर देखते हैं, हर नया साधन सोचते हैं, और खुले मैदान में घोड़े की नाईं दौड़ते फिरते हैं। परन्तु इस सारी भाग-दौड़ में न प्रार्थना है, न परमेश्वर का भय!

परन्तु वह जो जानता और अनुभव करता है कि मनुष्य और उनकी युक्तियाँ, और सब बातों के परिणाम परमेश्वर की व्यवस्था से चलाए और पलटे जाते हैं, वह भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह के समान काँपते हुए मान लेगा: “हे यहोवा, मैं जान गया हूँ कि मनुष्य का मार्ग उसके अपने वश में नहीं है, और न मनुष्य चलता हुआ अपने पैरों को स्थिर कर सकता है” (यिर्मयाह 10:23)। सुलैमान के उन वचनों को भी मन में रखते हुए—“मनुष्य की गति यहोवा की ओर से होती है, फिर मनुष्य अपना मार्ग कैसे समझ सकता है?” (नीतिवचन 20:24)—वह अपने आपको पूरी तरह परमेश्वर को सौंप देगा और पूर्णतः उसी पर निर्भर रहेगा। जहाँ ऐसी मनोदशा होती है, वहाँ प्रार्थनाएँ सदा पीछे-पीछे आएँगी, कि परमेश्वर हमारे हाथ के हर काम को आरम्भ करे और पूरा करे, जबकि हम इस प्रकार पूर्ण शान्ति से उसी पर, और केवल उसी पर, टिके रहते हैं। ठीक उतनी ही मात्रा में, जो मनुष्य भाग्य की इच्छा के विषय में स्वप्न देखता है, वह अपने आपको शैतान और दुष्टों के द्वारा, मानो हिंसक पशुओं के द्वारा, भय के मारे इधर-उधर हाँके जाने के लिए सौंप देगा—मानो वे अपने आप कुछ कर सकते हों! और इस प्रकार ऐसा मनुष्य निरन्तर चिन्ता से कुढ़ता और झुँझलाता रहेगा; और अपने जीवन को मानो एक ही धागे से लगातार लटकता हुआ देखकर, वह अनन्त पीड़ा में जीवन बिताएगा। वह अपने प्राण या कुशल से निराश हुए बिना मुश्किल से एक पग भी आगे रख सकेगा। जबकि विश्वासी, जिनके सामने सब पर शासन करनेवाला परमेश्वर का हाथ सदा रहता है, अपनी सब चिन्ताएँ और सरोकार उसी पर डालने में कभी न हिचकिचाएँगे। और वे इस बीच पूरी तरह निश्चिन्त रहेंगे कि शैतान और सब दुष्ट मनुष्य, चाहे जितना उपद्रव मचाएँ, न केवल परमेश्वर के द्वारा पैरों से जंजीरों में जकड़े हुए हैं, वरन् उसकी इच्छा पूरी करने को विवश भी किए जाते हैं; और इसी निश्चय के साथ वे अपना जीवन सुरक्षा और शान्ति में बिताएँगे।

ये दो भेद भी इस पवित्र विषय पर ईश्वरीय प्रकाश डालेंगे। परमेश्वर की व्यवस्था को बीते हुए सारे समय के सम्बन्ध में भी देखना चाहिए, और आनेवाले सारे समय के सम्बन्ध में भी। पहले की ईश्वरीय व्यवस्था पर विचार करते हुए, सब बातों में सारी सामर्थ्य परमेश्वर को ही देनी चाहिए (चाहे उन्हें उनके साधनों [media] सहित देखा जाए, उनके साधनों [media] के बिना देखा जाए, या उनके साधनों [media] के विपरीत देखा जाए)—कि परमेश्वर ही सब बातों को ठहराता और नियुक्त करता है। बीते समय का विचार इस प्रकार होना चाहिए: यदि कोई बात सफलतापूर्वक और किसी नश्वर मनुष्य की इच्छाओं के पूरा होने के रूप में घटी है, तो वह “अपने जाल के लिये बलि न चढ़ाए” (जैसा हबक्कूक ने कहा है); न अपनी बुद्धिमानी, सद्गुण या सौभाग्य की चर्चा करे; और वह प्रशंसा न मनुष्य को दे, न किसी सृष्टि को, जो केवल परमेश्वर की ही है। परन्तु वह सदा यह निश्चय रखे कि उसकी सारी भलाई का प्रथम कारण और कर्ता परमेश्वर ही था, चाहे वह किसी भी गौण माध्यम से आई हो। और पूर्व की सब विपत्तियों के विषय में मनुष्य इस सान्त्वना में विश्राम करे कि सब कुछ परमेश्वर की भली इच्छा के अनुसार हुआ; क्योंकि परमेश्वर से शिकायत और विवाद करके मैं अपना कुछ लाभ न करूँगा, और अपने सृजनहार के विरुद्ध अधर्मी हठ के दोष की जंजीर में अपने आपको बाँध लूँगा। और मनुष्य अपने बीते जीवन की स्मृति को इस प्रकार रखे कि जितने दण्ड उसने भोगे हैं, उन सब में वे पाप स्वीकार करे जो उसने किए और जिनके कारण वे दण्ड आए।

आनेवाले समय के सम्बन्ध में, परमेश्वर की व्यवस्था पर सब भक्त मनों को इस प्रकार मनन करना चाहिए: भक्तों के मन परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं और चेतावनियों पर सदा एकाग्र टिके रहें। क्योंकि जैसे ही उनके मन इनसे हटते हैं, वे परमेश्वर के भय की सब शिक्षा के लिए बन्द हो जाते हैं और विश्वास की उन्नति रुक जाती है। परन्तु जो अपनी दृष्टि परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता पर, जैसी वह उसके वचन के दर्पण में दिखाई देती है, सदा लगाए रखेगा और उन प्रतिज्ञाओं पर भी, जो उसमें समाई हैं, भरोसा रखेगा, वह विश्वास के पंखों पर चढ़कर जगत के अनगिनत संकटों के ऊपर उड़ जाएगा। और तब परमेश्वर की उन चेतावनियों के सम्मुख भी, जो उसके वचन में देखी जाती हैं, झुककर, वह उन्हें देखते हुए अपने आपको नम्र करेगा, मानो वे अनेक छड़ियाँ हों।

जब मैंने परमेश्वर की व्यवस्था को उसके माध्यमों सहित देखे जाने की बात कही, तो मेरा तात्पर्य यह था: यदि किसी ने अपने संगी मनुष्य की, जब वह घोर संकट में डूबा हो, सहायता की है, तो मनुष्य के हाथ से मिला छुटकारा मानवीय नहीं, ईश्वरीय छुटकारा है। सूर्य दिन-प्रतिदिन उदय होता है; परन्तु पृथ्वी को अपनी किरणों से प्रकाशित परमेश्वर करता है। पृथ्वी अपने फल उत्पन्न करती है; परन्तु रोटी देनेवाला परमेश्वर है, और उस रोटी के पोषण से बल देनेवाला भी परमेश्वर है। एक शब्द में, जैसे सब निम्न और गौण कारण, अपने आप में देखे जाएँ तो, अनेक परदों की नाईं महिमामय परमेश्वर को हमारी दृष्टि से छिपा लेते हैं (जो वे प्रायः करते ही हैं), वैसे ही विश्वास की आँख को कहीं ऊँचे उठाना चाहिए, कि वह परमेश्वर के हाथ को इन सब उसके साधनों के द्वारा कार्य करते हुए देख सके। परन्तु परमेश्वर की व्यवस्था किसी माध्यम या साधन के बिना भी किस रीति से कार्य कर सकती है, यह मसीह ने हमें अपने ही उदाहरण से सिखाया, जब उसने आक्रमण करनेवाले परीक्षक को इस ढाल से पीछे हटाया: “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुँह से निकलता है जीवित रहेगा” (मत्ती 4:4)। क्योंकि जैसे उद्धारकर्ता जानता था कि परमेश्वर की सामर्थ्य को किसी बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं, वैसे ही वह जानता था कि वह उस बल को रोटी के बिना भी दे सकता है, जिसे वह फिर भी कृपा करके रोटी के द्वारा देना पसन्द करता है।

और, ओह! परमेश्वर की व्यवस्था को जब सब साधनों (media) के विपरीत देखा जाए, तब उसकी कितनी महिमा होनी चाहिए!—जब मुझे विश्वास हो कि वह उन सब बाधाओं से अधिक सामर्थी है जो उसका विरोध कर सकती हैं! केवल इसी भरोसे से मैं हर भय और आशंका पर जयवन्त हूँ। सचमुच यही वह अखाड़ा है जिसमें परमेश्वर हमारे विश्वास का अभ्यास कराता और उसे परखता है। जब हमारे सामने इतनी बाधाएँ आ खड़ी होती हैं जो (जैसा हम देखते हैं) उसकी योजनाओं को रोकती जान पड़ती हैं, कितने प्राणी ऊपर और नीचे, आकाश में और पृथ्वी पर, भयावह रूप में दिखाई देते हैं! और ऐसे में क्या करना चाहिए? यदि हमारा विश्वास परमेश्वर की सामर्थ्य की ईश्वरीय ऊँचाई तक चढ़ सके, तो वह बिना अधिक कठिनाई के उन सब साधनों (media) से लड़ेगा और उन पर जयवन्त होगा जो उसके मार्ग में खड़े हैं और उसकी विजय को रोकने का यत्न करते हैं। इसलिए जो कोई अपने आपको इन सीमाओं के भीतर रखेगा, और न उलझी हुई अटकलों से अपने आपको सताएगा, न यह सुनकर कि सब कुछ अकेला परमेश्वर ही करता है, आलस्य का बहाना बनाएगा, ऐसा मनुष्य न निराशा में डूबेगा, न उन ओछे तर्कों की ओर मुड़ेगा, जो परमेश्वर की महिमा की उपस्थिति में सर्वथा अशोभनीय हैं।

परन्तु अब हमें इस पवित्र विषय की और भी निकटता से जाँच करनी चाहिए। परमेश्वर की व्यवस्था के विषय में झगड़े कहाँ से उठते हैं? ईश्वरीय व्यवस्था स्वयं, जैसी उसे उचित रीति से देखा और विचारा जाना चाहिए, कोई झगड़ा उत्पन्न नहीं करती। परन्तु मानवीय बुद्धि, परमेश्वर के कामों पर विचार करते हुए, अपने आपको अन्धी पाकर अपने सृजनहार से झगड़ने पर टूट पड़ती है। परन्तु क्या आश्चर्य, यदि परमेश्वर की वे युक्तियाँ, जिन पर स्वर्गदूत आँखें उठाए चकित होते और आराधना करते हैं, शारीरिक बुद्धि से मेल नहीं खातीं! फिर भी यह भ्रष्टता सर्वथा असह्य है कि हम, जो स्वभाव से पृथ्वी पर कीड़ों की नाईं रेंगने की योग्यता से ही मुश्किल से सम्पन्न हैं, उसके सिवा किसी बात को स्वीकार न करें जिसे हम, मानो भूमि पर पड़े हुए, अपनी स्वाभाविक आँखों से नीचे देख सकें। परन्तु इसलिए कि परमेश्वर की व्यवस्था का यह ईश्वरीय सिद्धान्त लाभदायक हो, हम आशा करते हैं कि हमारा यह परिश्रम उपयोगी होगा कि इस प्रकार अज्ञानी और अनुभवहीन लोगों के मनों को शान्त करें और दुष्टों और अपवित्र जनों की “निन्दाओं” का खण्डन करें।

इन उद्देश्यों के लिए यह वांछनीय होगा कि हम पहले यह विचार करें कि परमेश्वर की इच्छा ही सारे जगत में होनेवाली सब बातों का महान कारण है; और फिर भी परमेश्वर उन बुराइयों का कर्ता नहीं जो उसमें की जाती हैं। परन्तु मैं ऑगस्टीन के साथ यह नहीं कहूँगा—जो बात, मैं तुरन्त मानता हूँ, उसने सच्ची ही कही—कि “पाप या बुराई में कुछ भी सकारात्मक नहीं है।” क्योंकि यह तर्क की एक ऐसी सूक्ष्मता है जो बहुतों को सन्तोषजनक न लगे। मैं तो तर्क का दूसरा सिद्धान्त मानना चाहूँगा, और कहूँगा, “जो काम मनुष्य के द्वारा व्यर्थ या अधर्म से किए जाते हैं, वे उचित और धार्मिक रीति से परमेश्वर के काम हैं!” और यदि यह किसी को पहली दृष्टि में विरोधाभासी या स्व-विरोधी जान पड़े, तो वह इतना नाक-भौं सिकोड़नेवाला या उतावला न बने कि मेरे साथ परमेश्वर के वचन में जाँच न करे, और न देखे कि उस दर्पण में वह ईश्वरीय विषय कैसा ठहरता है। परन्तु फिर, ताकि मैं किसी ऐसी बात का, जो परमेश्वर की होने की नहीं और जिसे मैंने केवल अपनी सम्मति से उस पर आरोपित किया है, मूर्खतापूर्ण हठ से बचाव न करूँ, आइए हम सुनें कि पवित्रशास्त्र वास्तव में क्या साक्षी देता है, और परमेश्वर के कामों की अपनी परिभाषा पूर्णतः वहीं से बनाएँ। उन सब बातों के विषय में जिन्हें परमेश्वर वास्तव में अपनी युक्ति से चलाता है, परन्तु जो सामान्यतः देखने में आकस्मिक जान पड़ती हैं, ऐसी सब बातों के विषय में पवित्रशास्त्र की स्पष्ट साक्षी यह है, “चिट्ठी तो गोद में डाली जाती है, परन्तु उसका पूरा निर्णय यहोवा की ओर से होता है!” (नीतिवचन 16:33।) इसी प्रकार, यदि किसी वृक्ष से गिरती हुई डाली, या किसी मनुष्य के हाथ से अनजाने फिसलती हुई कुल्हाड़ी, किसी राह चलते के सिर पर गिरकर उसे मार डाले, तो मूसा साक्षी देता है कि परमेश्वर ने यह अपने ईश्वरीय उद्देश्य के अनुसार किया (व्यवस्थाविवरण 19:5), जिसने चाहा कि वह मनुष्य मारा जाए। इसी आशय की पवित्रशास्त्र की और साक्षियाँ मैंने यहाँ जानबूझकर प्रस्तुत नहीं कीं, क्योंकि इस अवसर पर मेरा आशय केवल उन्हें उँगली से दिखा देना है। परन्तु चूँकि स्तोइकों ने ऐसे ही तर्कों पर अपना नियतिवाद खड़ा किया, इसलिए परमेश्वर की इच्छा और उद्देश्य का सच्चा सिद्धान्त बहुतों को, यहाँ तक कि उन्हें भी जो उसे झूठा ठहराने का साहस नहीं करते, घृणित लगता है। परन्तु स्तोइक नियतिवाद का यह सिद्धान्त हम पर लगाया गया एक पुराना कलंक है, जिसके बोझ से ऑगस्टीन बारम्बार शिकायत करता है कि वह दबा हुआ था। इसे बहुत पहले समाप्त हो जाना चाहिए था। परन्तु निश्चय ही किसी भी प्रकार की ईमानदारी, या खरेपन, या विश्वास का दावा करनेवाले मनुष्यों के लिए हम पर ऐसा दोष लगाना उनके सर्वथा अयोग्य और अत्यन्त लज्जाजनक है।

स्तोइकों की व्यर्थ कल्पना क्या थी, यह सर्वविदित है। उन्होंने अपना भाग्यवाद गोर्दियास के जटिल कारणों के जाल से बुना, जिसमें जब उन्होंने स्वयं परमेश्वर को ही उलझा लिया, तो उन्होंने (जैसा कथाएँ कहती हैं) कुछ सुनहरी जंजीरें गढ़ीं कि स्वर्ग के परमेश्वर को ही बाँधें, और उसे निम्न और गौण कारणों के अधीन कर दें!—आज के ज्योतिषी स्तोइकों की नकल करते हैं, जो तारों की कुछ स्थितियों से अपना नियत अनिवार्यता का सिद्धान्त बनाते हैं। अतः हम स्तोइकों को उनके भाग्यवाद के सिद्धान्त पर छोड़ते हैं, जबकि हम परमेश्वर की इच्छा को सब बातों का शासक कारण मानते हैं। परन्तु जगत से आकस्मिकता को सर्वथा निकाल देना बेतुका होगा। मैं यहाँ उन विविध भेदों की चर्चा छोड़ता हूँ जो पाठशालाओं में किए जाते हैं। जो मैं प्रस्तुत करूँगा वह मेरी समझ में सीधा-सादा होगा, खींचा-तानी वाला नहीं; और वह भी जो जीवन के आचरण के लिए लाभदायक हो।

तो मैं इस प्रकार तर्क करूँगा: जो परमेश्वर ने ठहरा दिया है वह अवश्य पूरा होकर रहेगा; फिर भी इस रीति से कि जो इस प्रकार पूरा होता है वह अपने आप में वास्तव में और स्वभाव से अनिवार्य नहीं होता। इसका एक परिचित दृष्टान्त हमारे प्रभु मसीह की हड्डियाँ हैं। पवित्रशास्त्र स्पष्ट साक्षी देता है कि मसीह ने सब बातों में हमारे जैसा शरीर धारण किया। इसलिए कोई भी सचेत मनुष्य यह मानने में नहीं हिचकिचाएगा कि मसीह की देह की हड्डियाँ हमारी ही हड्डियों की नाईं टूट सकनेवाली थीं। फिर भी मुझे लगता है कि इस विषय में एक और अलग प्रश्न निहित है: क्या मसीह की कोई हड्डी टूट सकती थी? क्योंकि परमेश्वर की आज्ञा और वचन के अनुसार आवश्यक था कि उसकी देह के सब अंग पूरे, अटूट और अक्षत रहें। ऐसा नहीं कि मैं इस प्रकार इसलिए कह और तर्क कर रहा हूँ कि मुझे प्रचलित कथन-शैलियों पर पूरी तरह आपत्ति है, जब मनुष्य एक अर्थ में निरपेक्ष अनिवार्यता की बात करते हैं, या परिणामी की अनिवार्यता अथवा परिणाम की अनिवार्यता की बात करते हैं। परन्तु मैं इस प्रकार कहता और तर्क करता हूँ कि तर्क की कोई सूक्ष्मता सबसे सीधे-सादे पाठक को भी उस बात की सच्चाई समझने और स्वीकारने से न रोके जिसकी मैं साक्षी देता हूँ। अतः यदि हम मसीह की देह की हड्डियों के स्वभाव को देखें, तो वे टूट सकनेवाली, अर्थात् भंग हो सकनेवाली थीं। परन्तु यदि हम परमेश्वर की उस आज्ञा को देखें जो अपने समय पर पूरी हुई, तो मसीह की देह की हड्डियाँ टूटने के उतनी ही अधीन न थीं जितने स्वर्गदूत मानवीय दुःखों के अधीन हैं। इस प्रसंग में, जब हमसे कहा जाता है कि हम प्रकृति के उस नियम और क्रम को देखें जो परमेश्वर ने ठहराया है, तो मैं उसमें निहित आकस्मिकता को, उस आकस्मिकता के अपने अर्थ और आशय में, किसी रीति से अस्वीकार नहीं करता।

हमें यहाँ उस सिद्धान्त को भी ध्यान से स्मरण रखना चाहिए जो मैं पहले रख चुका हूँ, कि जब परमेश्वर साधनों (media) और गौण कारणों के द्वारा अपनी सामर्थ्य प्रकट करता है, तब उसकी वह सामर्थ्य उन साधनों या निम्न कारणों से कभी अलग नहीं की जानी चाहिए। यह किसी पियक्कड़ की अति है कि कहे, “परमेश्वर ने ठहरा दिया है कि जो कुछ होने को है वह होगा, और अवश्य होगा; इसलिए हमारी कोई चिन्ता, या अध्ययन, या प्रयत्न बीच में लाना व्यर्थ और निरर्थक है।” परन्तु चूँकि परमेश्वर हमारे लिए निर्धारित करता है कि हमें क्या करना चाहिए, और चाहता है कि हम उसकी सामर्थ्य की क्रिया के साधन बनें, इसलिए हम इसे सदा अपने लिए अनुचित समझें कि जिन बातों को उसने जोड़ा है उन्हें अलग करें। उदाहरणार्थ, परमेश्वर ने “आदि में” पृथ्वी को आज्ञा दी कि वह बिना किसी मानवीय कला या खेती के हर प्रकार की घास और फल उपजाए। परन्तु अब वह मनुष्य के हाथ को अपनी क्रिया का साधन बनाता है: यदि कोई घमण्ड से यह चाहे कि केवल अपना आलसी मुँह खोलकर रोटी पा ले, क्योंकि परमेश्वर की आशीष पृथ्वी को फलवन्त करती है, तो वह ऐसे घमण्ड से न केवल परमेश्वर की व्यवस्था को पैरों तले रौंदेगा, वरन् उसे सर्वथा मिटा ही देगा। क्योंकि वह उन बातों को अलग और टुकड़े-टुकड़े कर देगा जिन्हें परमेश्वर ने एक अटूट सम्बन्ध से जोड़ा है।

इसलिए आनेवाले समय के सम्बन्ध में, चूँकि बातों के परिणाम अभी छिपे और अज्ञात हैं, हर एक को अपने कर्तव्य के पालन में ऐसा तत्पर होना चाहिए मानो प्रत्येक विशेष मामले के परिणाम के विषय में कुछ भी ठहराया ही नहीं गया हो। अथवा (अधिक ठीक कहें तो) हर मनुष्य को उन सब बातों में जो वह परमेश्वर की आज्ञा से हाथ में लेता है, सफलता की ऐसी आशा रखनी चाहिए कि हर आकस्मिकता का परमेश्वर की निश्चित और अटल व्यवस्था से मेल बैठाने के लिए स्वतन्त्र रूप से तैयार रहे। इसके अतिरिक्त, प्रभु हमारे हाथों के काम पर अपनी आशीष की प्रतिज्ञा करता है। इस प्रतिज्ञा के द्वारा हर भक्त मनुष्य मान लेगा कि वह परमेश्वर की ओर से उसकी महिमामय व्यवस्था का एक साधन ठहराया गया है। और ऐसा भक्त जन, इसी प्रतिज्ञा पर भरोसा रखकर, फुर्ती से अपने कार्य के लिए कमर कसेगा, और निश्चय रखेगा कि वह व्यर्थ का परिश्रम हवा में नहीं फेंक रहा; वरन् परमेश्वर के वचन पर टिककर वह विश्वास करेगा कि परमेश्वर अपनी गुप्त युक्ति से उसके सारे परिश्रम को उस परिणाम की ओर ले जाएगा जो सर्वोत्तम होगा। एक शब्द में, जैसे परमेश्वर की व्यवस्था, उचित रीति से विचारी जाए तो, हमारे हाथों को बाँधती नहीं, वरन् उन्हें काम के लिए खोल देती है, वैसे ही वह प्रार्थना में बाधा तो डालती ही नहीं, वरन् उसकी गम्भीरता को सबल और दृढ़ करती है।

बीते समय के विषय में और उन बातों के विषय में जो पहले ही घट चुकी हैं, हमारे निर्णयों को भी ऐसी ही मन की संयमशीलता से नियन्त्रित होना चाहिए। धीरज के लिए इससे बढ़कर कोई उपदेश नहीं कि हम सुनें कि कुछ भी संयोग से नहीं होता; वरन् जो कुछ होता है, वह परमेश्वर की “भली इच्छा” से ठहराई हुई बात की पूर्ति है। फिर भी इससे किसी रीति से यह नहीं निकलता कि हमारा अपना आलस्य, या उतावलापन, या असावधानी, या कोई और दोष, उस विपत्ति का, जिसे हम भोग रहे हों, तात्कालिक कारण नहीं है। और यद्यपि घटनाओं के कारण सदा स्पष्ट दिखाई या समझ नहीं आते, तथापि भक्त मन ऐसी अज्ञानता में भी हर घटना में परमेश्वर को उसकी बुद्धि और न्याय की स्तुति देना न छोड़ेंगे।

परन्तु जहाँ मनुष्यों की युक्तियाँ, इच्छाएँ, उद्देश्य और प्रयत्न बीच में आते हैं, वहाँ तर्क और निर्णय की अधिक कठिनाई हमारे विचारों के सामने आती है, विशेषकर जब हम यह दिखाना चाहें कि परमेश्वर की व्यवस्था ऐसे सब मामलों में भी कैसे राज्य और शासन करती है; न केवल इसलिए कि कुछ भी उसकी इच्छा के सिवा और प्रकार से न किया जाए, वरन् इसलिए भी कि मनुष्य अपने विचार-विमर्श में भी कुछ ऐसा न हिलाएँ जो वह न प्रेरित करे। परमेश्वर सचमुच अपनी व्यवस्था के प्रतिदिन और अद्भुत प्रमाण देता है, जहाँ वह मनुष्यों की मूर्ख युक्तियों को पूरी छूट देता है, और उनकी बड़ी-बड़ी तैयारियों को मानो देखता ही न हुआ, परिणाम में उनकी सब आशाएँ विफल कर देता है। पवित्रशास्त्र एक और क्षेत्र भी प्रकट करता है, जिसमें परमेश्वर अपना प्रभुत्व और अपने हाथ की सामर्थी क्रिया प्रकट करता है—जब वह दुष्टों को बावला कर देता है; जब वह उन्हें घबराहट भरे चक्कर से मारता है, या उनकी सुध-बुध छीन लेता है, या उन्हें जड़ता से स्तब्ध कर देता है; और जब वह “उनका आत्मा भी हर लेता” है, उनका साहस छीन लेता है, और उन्हें भय से ऐसा भर देता है कि वे एक पत्ते के गिरने से ही मृतप्राय हो जाते हैं! इसलिए पिघियस में सामान्य विचार का अभाव है, जब वह परमेश्वर को उसकी भौतिक सृष्टि की संकरी सीमाओं में बाँध देना चाहता है; जब वह परमेश्वर को एक प्रकार के बुद्धिमान प्रबन्धक, या कुशल सेनापति से बढ़कर कुछ नहीं बनाना चाहता, जो रणनीति में निपुण होकर अपने शत्रुओं की योजनाओं को पहले से भाँप लेता है और परिस्थितियों के अनुसार उपचार के रूप में अपनी जवाबी चालें रचता है। मानो पवित्रशास्त्र परमेश्वर को स्पष्ट रूप से उस रूप में न दर्शाता हो जो “बुद्धिमानों को उन्हीं की चतुराई में फँसाता है,” प्रधानों का आत्मा काट डालता है, और उनके “ज्ञान को मूर्खता” ठहराता है! इसलिए पिघियस की यह घोर अज्ञानता है, जब वह इनकार करता है कि जब कोई मनुष्य अपने संगी मनुष्य के द्वारा जान-बूझकर मारा जाता है, तो वह परमेश्वर की इच्छा और आज्ञा से मरता है! मेरा अनुमान है कि वह यह विचार इसलिए रखता है कि समझता है, जहाँ मनुष्य की इच्छा लगी है वहाँ परमेश्वर की इच्छा का कोई सरोकार नहीं! तब पवित्रशास्त्र की उन सब साक्षियों का क्या होगा जो घोषणा करती हैं कि मनुष्यों की तलवारें परमेश्वर के हाथ से चलाई जाती हैं? क्या एली के पुत्र मनुष्य की इच्छा के बिना मारे गए? फिर भी स्तुति परमेश्वर को दी गई है; कि यह वही था जिसने धार्मिकता से चाहा कि वे मारे जाएँ (1 शमूएल 4:1–12)। परन्तु परमेश्वर मनुष्यों के हाथों पर निरन्तर शासन करता है, कभी उन्हें कसकर बाँध देता है और कभी अपनी अनन्त आज्ञाओं को पूरा करने के लिए उन्हें इधर-उधर मोड़ता है—इसमें वह कोई सन्देह नहीं करेगा जिसे पवित्रशास्त्र का तनिक भी परिचय है। वरन् यह तो ऐसा तथ्य है जिसे सामान्य बुद्धि सर्वत्र मानती है कि मनुष्य जो कुछ भी हाथ में लें, उसका परिणाम परमेश्वर के हाथ में है। परन्तु चूँकि मानव-मन के घने अन्धकार के कारण मनुष्यों में यह ज्ञान भी सामान्यतः निर्बल और अस्थिर रहता है, इसलिए पवित्रशास्त्र ने हमारे लिए एक ऊँचा निरीक्षण-स्थान खड़ा किया है, जिस पर खड़े होकर हम चारों ओर देख सकें और परमेश्वर को मनुष्यों के सब कामों पर इस प्रकार शासन और अधिशासन करते हुए देख सकें कि वह उन्हें उस परिणाम तक पहुँचाता है जो उसने स्वयं ठहराया है।

परन्तु इस सारे ईश्वरीय विषय का सार और सत्त्व यह है: यद्यपि मनुष्य, किसी जंजीर में न बँधे पशुओं की नाईं, यहाँ-वहाँ अन्धाधुन्ध दौड़ते हैं, फिर भी परमेश्वर अपनी गुप्त लगाम से उन्हें ऐसा थामे और चलाए रखता है कि वे अपनी एक उँगली भी हिला नहीं सकते जिसमें वे अपने काम से कहीं अधिक परमेश्वर का काम पूरा न करें! परन्तु विश्वासी, जो स्वर्गदूतों की नाईं अपनी स्वेच्छा से उसकी सेवा करते हैं, विशेष रीति से परमेश्वर के हाथ माने जाने चाहिए! फिर भी मैं अब अधिक सीधे रूप से उन मनुष्यों की बात कर रहा हूँ जिनके उद्देश्य परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की अभिलाषा, या उसकी युक्ति के अनुरूप या उससे मेल खाती किसी युक्ति को अपनाने, या उसकी इच्छा के अनुसार चलने के सिवा कुछ भी हैं। दुष्ट जन सचमुच अपनी इच्छाओं की किसी भी पूर्ति पर प्रायः अपने ऊपर घमण्ड करते हैं। परन्तु अन्त में घटना से प्रमाणित होता है कि वे उस पूरे समय केवल वही पूरा कर रहे थे जो परमेश्वर ने ठहराया था, और वह भी अपनी ही इच्छा के विरुद्ध, जबकि उन्हें इसका कुछ पता न था! इसके अतिरिक्त, परमेश्वर स्वयं बहुधा दुष्टों को मनुष्यों के पापों को, विशेषकर अपने ही लोगों के पापों को, दण्ड देने के लिए काम में लाता है। और कभी-कभी वह उन्हें मानो गर्दन से घसीटकर मनुष्यों और पवित्र लोगों के प्रति अपनी भलाई का साधन बनाता है।

उसकी व्यवस्था के पहले प्रकार के अद्भुत प्रबन्धों के उदाहरण देना हमारे वर्तमान उद्देश्य के लिए बहुत बड़ा और बहुत विस्तृत परिश्रम होगा। फिर भी शायद यही उत्तम होगा कि कुछ उदाहरणों को केवल उँगली से छू दें। परमेश्वर ने अश्शूरी को यहूदा से युद्ध करने के लिए उभारकर उसे “अपने क्रोध की छड़ी” कहा, और घोषणा की कि वह अपने हथियार के लिए “अपने रोष की लाठी” से सुसज्जित किया गया था (यशायाह 10:5)। परन्तु वही आराधनीय परमेश्वर आगे उसके घमण्ड को धिक्कारता है और उसे डाँटता है कि उसने अपने आपको दूसरे (परमेश्वर) के हाथ से भाड़े पर लिया हुआ और गढ़ा हुआ “कुल्हाड़ा” और “आरा” क्यों नहीं माना (पद 15)। इसी रीति से जिन्हें उनकी अपनी महत्त्वाकांक्षा, या क्रूरता, या लोभ हिंसक कामों की ओर धकेलता है, उनके विषय में कहा जाता है कि वे परमेश्वर का काम करने के लिए उसके द्वारा “पवित्र ठहराए गए” हैं, और उसके उद्देश्य पूरे करने के लिए उसके भाड़े के सिपाही हैं। प्रभु स्वयं भी साक्षी देता है कि वह ऐसों को अपनी “सीटी” से और अपनी “तुरही” से बुलाता है, कि उसके पक्ष में शस्त्र उठाएँ और उसकी आज्ञाओं को पूरा करें (पद 26)। कि परमेश्वर की भलाई का मार्ग मनुष्यों के बुरे कामों से तैयार किया जाता है, इसे मूसा की लिखी हुई पुस्तकों का केवल एक ही अंश भली-भाँति प्रमाणित कर देगा। यूसुफ के भाइयों का उसके विरुद्ध षड्यन्त्र दुष्टता, विश्वासघात और क्रूरता से भी बढ़कर था, जब उन्होंने उसे मिद्यानियों के हाथ बेच डाला। परन्तु यूसुफ स्वयं उसके इस प्रकार बेचे जाने का कारण, भिन्न उद्देश्य से ही सही, स्वयं परमेश्वर को ठहराता है! “इसलिए अब तुम न तो उदास हो, और न इस बात से अपने आप पर क्रोधित हो कि तुम ने मुझे यहाँ बेच डाला; क्योंकि परमेश्वर ने प्राणों को बचाने के लिए तुम्हारे आगे मुझे भेजा है। इसलिए अब मुझे यहाँ पर भेजनेवाले तुम नहीं, वरन् परमेश्वर ही हो” (उत्पत्ति 45:5, 8)। अतः स्पष्ट है कि यद्यपि उन्होंने दुष्टता की, तथापि परमेश्वर ने उन्हीं के द्वारा अपना काम किया, कि वे मृत्यु में जीवन पाएँ। वे तो अपने आशय के अनुसार अपने भाई को मार चुके थे। परन्तु उसी आशय में से जीवन (अर्थात् उनके स्वाभाविक जीवन और उनके सारे परिवार के जीवन का प्रबन्ध) उन पर चमका।

यही परमेश्वर की क्रिया हम शैतान में भी देख सकते हैं, जो सब दुष्टों का सरदार और सब अन्धकार और अधर्म का प्रधान है। परमेश्वर शैतान को अहाब के पास अपनी ईश्वरीय आज्ञा के साथ भेजता है कि वह “राजा के सब भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में झूठ बोलनेवाली आत्मा” बने। इस प्रकार वह कपटी आत्मा परमेश्वर के क्रोध की सेविका बन जाती है, कि उन दुष्टों को अन्धा करे जो उसके सत्य की आज्ञा न मानते थे। दूसरी ओर, प्रेरित पौलुस उस “शरीर में काँटे” को, जो उस पर भेजा गया, “शैतान का दूत जो उसे घूँसे मारे” कहता है। यहाँ शैतान का विष परमेश्वर के द्वारा प्रेरित के घमण्ड को चंगा करने की औषधि बनाया गया है। अब मैं पूछता हूँ, शैतान अपने आप में कैसा वैद्य है, जिसने मार डालने और नष्ट करने के सिवा कुछ सीखा ही नहीं? परन्तु परमेश्वर, जिसने एक बार आज्ञा दी कि अन्धकार में से ज्योति चमके, यदि चाहे तो नरक में से भी उद्धार को अद्भुत रीति से निकाल सकता है, और इस प्रकार अन्धकार को ही ज्योति में बदल सकता है। परन्तु शैतान क्या करता है? एक अर्थ में, परमेश्वर का काम! अर्थात् परमेश्वर शैतान को अपनी व्यवस्था की आज्ञाकारिता में दृढ़ बँधा रखकर उसे जिधर चाहे उधर मोड़ता है, और इस प्रकार उस महा शत्रु की युक्तियों और प्रयत्नों को अपने ही अनन्त उद्देश्यों की सिद्धि में लगाता है!

अब यदि पवित्रशास्त्र परमेश्वर की गौण या साधनात्मक कार्य-रीति को स्पष्ट रूप से व्यक्त न भी करता, तो भी यह गाँठ खोलना बहुत कठिन न होता। दूसरा और अधिक कठिन प्रश्न यह है कि क्या परमेश्वर ही मनुष्यों के हृदयों में कार्य करता है, उनकी सब युक्तियों को निर्देशित करता है, उनकी इच्छाओं को इधर-उधर मोड़ता है, और उन्हें उसके सिवा कुछ भी करने से रोकता है जो उसने ठहराया है कि वे करें। हम यहाँ यह नहीं पूछ रहे कि परमेश्वर वे सब भक्तिपूर्ण और पवित्र भावनाएँ उत्पन्न करता है या नहीं जो उसके लोगों के हृदयों में पाई जाती हैं, क्योंकि यह निर्विवाद रूप से निश्चित है। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह दुष्टों की सब भ्रष्ट और अधर्मी भावनाओं को भी अपनी सामर्थ्य के हाथ में थामे रखता है, और उन्हें इधर-उधर मोड़ता है, कि वे वही करना चाहें जो उसने उनके द्वारा पूरा करना ठहराया है?

निश्चय ही, जब सुलैमान घोषणा करता है कि “राजा का मन यहोवा के हाथ में है, और जैसे जल की धाराएँ वैसे ही वह उसको जिधर चाहता उधर फेरता है” (नीतिवचन 21:1), तो उसका आशय सामान्य रूप से यह दिखाना है कि न केवल राजाओं की इच्छाएँ, वरन् उनके सब बाहरी कर्म भी परमेश्वर की इच्छा और प्रबन्ध से चलाए जाते हैं। मूसा कहता है कि फिरौन का हृदय स्वयं यहोवा ने कठोर किया। यहाँ परमेश्वर की अनुमति के प्रचलित आश्रय की ओर भागना व्यर्थ है, मानो परमेश्वर के विषय में यह कहा जा सके कि उसने वह किया जिसे उसने केवल होने दिया! और मूसा निश्चयपूर्वक कहता है कि फिरौन के हृदय का कठोर होना परमेश्वर का काम था। और न ही फिरौन के हृदय की क्रूरता परमेश्वर की युक्ति के सिवा किसी और अर्थ में ठहराई गई है, उस अर्थ को छोड़कर जिसमें अन्यत्र कहा गया है कि उसने अपने लोगों को मिस्रियों की दृष्टि में अनुग्रह दिलाया। क्योंकि कौन नहीं देखता कि हिंसक और क्रूर पशु परमेश्वर की सामर्थ्य से वश में किए गए और कोमल बनाए गए, जब मिस्रियों जैसे लोग अचानक दया की ओर फेरे गए? तो हम किस कारण से और किस उद्देश्य से कह सकते हैं कि फिरौन ने ऐसी अमानुषिक क्रूरता दिखाई, सिवा इसके कि यहोवा को यही भाया; एक ओर इसलिए कि इससे वह अपने लोगों के धीरज को परखे; और दूसरी ओर इसलिए कि अपनी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य को प्रकट करे? इसी रीति से कहा गया है कि परमेश्वर ने “उनके शत्रुओं के मन को फेर दिया कि वे उसके लोगों से बैर रखें” (भजन संहिता 105:25)। और वह वचन भी इस मामले को तनिक नहीं बदलता, जहाँ कहा गया है कि “फिरौन ने इस बार भी अपना मन कठोर किया” (निर्गमन 8:32), क्योंकि हम यह नहीं दिखाते कि मनुष्यों के मन किसी बाहरी प्रभाव से हिंसा करने को धकेले जाते हैं, और न हम उनके कठोर होने का कारण परमेश्वर पर थोपते हैं; मानो क्रूर और कठोर मनवाले अपनी ही दुष्टता से स्वेच्छा से कार्य न करते हों, और अपने आप ही हठ और ढिठाई के लिए उत्तेजित न होते हों! हम जो कहते हैं वह यह है कि जब मनुष्य कुटिलता से कार्य करते हैं, तो वे (पवित्रशास्त्र की साक्षी के अनुसार) परमेश्वर के ठहराने वाले उद्देश्य से ऐसा करते हैं। यह पवित्रशास्त्र के एक और भाग में भी बताया गया है, जहाँ कहा गया है कि जब गिबोन के निवासियों ने इस्राएल का सामना किया, तो उन्होंने परमेश्वर की आज्ञा और उद्देश्य के अनुसार ऐसा किया, जिसने उनका मन कठोर किया, जैसा यहोशू 11:20 में कहा गया है: “क्योंकि यहोवा की ओर से ऐसा हुआ कि उनके मन कठोर हो गए, कि वे इस्राएल से युद्ध करने को आएँ, जिससे वह उन्हें सत्यानाश कर डाले।”

परमेश्वर जिस रीति से इस प्रकार कार्य करता है, वह भी पवित्रशास्त्र में बताई गई है। क्योंकि एक स्थान पर यह साक्षी है कि परमेश्वर ने लोगों पर क्रोधित होकर दाऊद के मन को उभारा कि वह लोगों की गिनती करे (2 शमूएल 24:1); परन्तु दूसरे स्थान पर दाऊद के इसी कार्य के विषय में कहा गया है कि दाऊद में इस घमण्ड को उकसानेवाला शैतान था, और उसी ने दाऊद को उभारा कि वह लोगों की गिनती करे (1 इतिहास 21:1)। इससे हम देखते हैं कि शैतान परमेश्वर के क्रोध की छड़ी था, और परमेश्वर ऐसे दुष्टात्माओं और मनुष्यों के साधनों के द्वारा मनुष्यों के मनों को जिधर चाहे उधर प्रेरित करता है। यह परमेश्वर के वचन के एक और भाग में और भी स्पष्ट रूप से बताया गया है, जहाँ कहा गया है कि “यहोवा की ओर से एक दुष्ट आत्मा शाऊल पर आई” (1 शमूएल 16:24; 16:23)। अब शाऊल ने सचमुच अपनी ही दुष्टता से कार्य किया। उसने भीतर छिपी हुई द्वेष-भावना को स्वेच्छा के कर्म में प्रयोग किया। फिर भी उसे उकसानेवाला शैतान था; और वह भी इस तरह नहीं कि परमेश्वर केवल निष्क्रिय दर्शक था, वरन् जब परमेश्वर ने ऐसा चाहा। सचमुच, वह दुष्ट आत्मा उचित रीति से “यहोवा की ओर से” नहीं कही जा सकती थी, यदि वह यहोवा का ठहराया हुआ सेवक न होता कि उसका बदला ले और मानो उसका जल्लाद हो। और शैतान केवल मनुष्यों के मनों को बुरी वासनाओं और कामों के लिए उकसाकर ही परमेश्वर के क्रोध का सेवक नहीं है, वरन् उन्हें प्रभावशाली रीति से घसीटकर और बन्दी बनाकर, अपनी इच्छा से, दुष्ट कामों में ले जाकर भी।

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