भाग II

परमेश्वर ने आदम को केवल दण्ड के लिए ही नहीं, वरन् उस दण्ड के कारणों के लिए भी पूर्वनियत किया

Calvin's Calvinism · John Calvin

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परमेश्वर ने आदम को केवल दण्ड के लिए ही नहीं, वरन् उस दण्ड के कारणों के लिए भी पूर्वनियत किया

शोध-वाक्य II।

(अर्थात् अपवाद II।)

परमेश्वर ने आदम को केवल दण्ड के लिए ही

नहीं, वरन् उस दण्ड के कारणों के लिए भी

पूर्वनियत किया, जिसके पतन को उसने केवल पहले से देखा ही नहीं, वरन् अपनी

गुप्त और अनन्त आज्ञा से चाहा भी, और

ठहराया कि वह गिरे, और

उस पतन के लिए, कि वह अपने समय पर घटित हो,

परमेश्वर ने उसके सामने वह सेब

रखा, जो उस पतन का कारण बने।

निन्दक की

शोध-वाक्य II पर टिप्पणियाँ

और कथन।

आपके विरोधी कहते हैं कि यह दूसरा शोध-वाक्य शैतान की शिक्षा है, और वे मुझ कैल्विन से माँग करते हैं कि मैं उन्हें बताऊँ कि पवित्र शास्त्र में इस शोध-वाक्य का सार कहाँ लिखा है?

शोध-वाक्य II के विषय में जॉन कैल्विन का उत्तर

इस दूसरे शोध-वाक्य में आप फिर ठीक वही मनुष्य दिखाई देते हैं जो पहले थे। अब मेरे लेखों में से वह अंश प्रस्तुत कीजिए जिसमें मैं सिखाता हूँ "कि सेब परमेश्वर द्वारा आदम के सामने रखा गया, ताकि वह उसके पतन का कारण हो।" वस्तुतः आपकी सारी लोकप्रियता का यही स्रोत है, अर्थात् अनुभवहीन लोगों के मनों पर अँधेरे का बादल डाल देना, ताकि वे उस सत्य की ऊँचाई तक न उठ सकें जो शरीर और शारीरिक मन की साधारण समझ की पहुँच से परे है।

परन्तु शब्दों पर झगड़ा न करते हुए, मैं स्वेच्छा से और तुरन्त मान लेता हूँ कि मैंने जो लिखा है वह यह है: "कि आदम का पतन संयोग से, या अकस्मात् नहीं हुआ; वरन् परमेश्वर की गुप्त योजना द्वारा ठहराया गया था।" और यही वह शिक्षा है जिसे आप निश्चय के साथ "शैतान की शिक्षा" घोषित करते हैं। मैं जानता हूँ कि आप अपनी ही दृष्टि में सर्वोच्च अधिकार के न्यायी हैं, और इसीलिए अपने अहंकार में आप समझते हैं कि आप गालियों के पाँच घिनौने शब्दों से सत्य की उस दृढ़ इमारत को ढा सकते हैं जिसे मैंने खड़ा किया है, और फिर जिसे मैंने अत्यन्त अभेद्य तर्कों से थामा है। आप मुझसे पवित्रशास्त्र से साक्षी प्रस्तुत करने को कहते हैं, जिससे प्रकट हो कि आदम परमेश्वर की गुप्त आज्ञा के बिना नहीं गिरा। परन्तु यदि आपने मेरे लेखों के कुछ पन्ने भी ध्यान से पढ़े होते, तो मेरा वह विचार आपसे छिप नहीं सकता था जो मेरी पुस्तकों में सर्वत्र आता है, कि परमेश्वर सब बातों को अपनी गुप्त योजना और आज्ञा से चलाता है। आप परमेश्वर को अपनी ही रीति का पूर्वज्ञान देते हैं, और उसे मानो स्वर्ग में बैठा हुआ ऐसा आलसी, निष्क्रिय, उदासीन दर्शक दिखाते हैं जो मनुष्यों के जीवन की सब बातों को देखता रहता है। जबकि स्वयं परमेश्वर, अपने लिए सदा उस अधिकार और कार्य का दावा करते हुए कि सारे जगत में जो कुछ होता है उसकी पतवार वही थामे, अपने पूर्वज्ञान को अपनी सामर्थ्य से कभी अलग नहीं होने देता! और तर्क की यह रीति केवल मेरी ही नहीं, वरन् निश्चय ही आगस्टीन की भी है। "यदि (वह पवित्र पिता कहता है) परमेश्वर ने जो होना उसने नहीं चाहा उसे पहले से देखा, तो परमेश्वर सब बातों पर सर्वोच्च शासन नहीं रखता। इसलिए परमेश्वर ने जो होना था उसे ठहराया, क्योंकि यदि वह न चाहता कि वह हो, तो कुछ भी नहीं हो सकता था।"

यदि आप इसे बेतुका ठहराएँ, तो आप पहले जितने ही दूर रहेंगे, और उसी उलझन में फिर जा पड़ेंगे जिसमें आप मेरी शिक्षा को "शैतान की शिक्षा" बनाकर पड़े थे। क्योंकि आपको अपनी बुरी दशा का वह उपाय काम में लाना चाहिए था जो आपके हाथ के पास तैयार था। परन्तु आपने यह नहीं किया, और न कर सकते थे, यह बिलकुल स्पष्ट है। आप यों सोच सकते थे, "परमेश्वर ने आदम का पतन पहले से देखा। यदि वह चाहता तो उसे रोकना उसके अधिकार में था। परन्तु उसने ऐसा करना नहीं चाहा। उसने ऐसा करना क्यों नहीं चाहा? उसके न चाहने का इसके सिवाय और कोई कारण नहीं ठहराया जा सकता कि उसकी इच्छा का झुकाव या रुझान बिलकुल और ही ओर था।" परन्तु यदि आप अपने आप को परमेश्वर से विवाद में पड़ने दें, तो अच्छा होगा कि आप अपवित्र रीति से उसी समय उस पर दोष लगाएँ और उसे दोषी ठहराएँ, कि उसने मनुष्य को ऐसी स्वाभाविक दुर्बलता के साथ बनाया कि वह गिरने के योग्य रहे, और वह भी इसके कारण अनन्त विनाश में! परन्तु आप उत्तर देंगे कि आदम अपनी स्वतंत्र इच्छा से गिरा। इसके बदले में मेरा उत्तर यह है कि आदम को उस धीरज और स्थिरता से सम्पन्न होने की आवश्यकता थी जिससे परमेश्वर के चुने हुए सम्पन्न हैं, जिन्हें परमेश्वर चेतावनी देता है कि "गिरने से" खरे और सुरक्षित "बचे रहें" (यहूदा 24)।

यह अत्यन्त निश्चित है कि यदि स्वर्ग से हर क्षण हमें नई शक्ति न मिलती रहे, तो हमारे गिरने की ऐसी प्रवृत्ति है कि हम हज़ार बार नाश हो जाएँ। परन्तु परमेश्वर अपने सब चुने हुओं को ऐसा अजेय धीरज देता है, जिससे वे इस प्रकार थामे रहते हैं कि "अन्त तक स्थिर रहें।" तो मैं फिर पूछता हूँ, यदि परमेश्वर चाहता कि आदम दृढ़ और सुरक्षित रहे, तो परमेश्वर ने यही धीरज और स्थिरता आदम को क्यों नहीं दी? यहाँ निश्चय ही हर मुँह चुप और मूक रहना चाहिए; या सब सुलैमान के साथ मानें कि "यहोवा ने सब वस्तुएँ विशेष उद्देश्य के लिए बनाई हैं, वरन् दुष्ट को भी विपत्ति के दिन के लिए" (नीतिवचन 16:4)। यदि यह आपको बेतुका होकर खटके, तो अपने मन में सोचिए कि क्या पवित्रशास्त्र इतनी बार व्यर्थ ही घोषणा करता है कि परमेश्वर के निर्णय "बड़ी गहराई" हैं। यदि हमारे लिए परमेश्वर की अगम्य योजना को अपनी मानवीय क्षमता के मापदण्ड से नापना सम्भव होता, तो मूसा ने व्यर्थ कहा होता: "गुप्त बातें हमारे परमेश्वर यहोवा के वश में हैं; परन्तु जो प्रकट की गई हैं वे सदा के लिए हमारे और हमारी सन्तान के वश में हैं" (व्यवस्थाविवरण 29:29)।

आप मुझसे माँग करते हैं कि मैं पवित्रशास्त्र का वह स्थान बताऊँ जिससे मैं सिद्ध करता हूँ कि परमेश्वर ने आदम का पतन इसलिए नहीं रोका कि उसकी इच्छा उसे रोकने की न थी। मानो ऐसे सब प्रश्नों और प्रश्नकर्ताओं के प्रति परमेश्वर का वह स्मरणीय उत्तर अपने आप में पूर्ण प्रमाण न रखता हो: "मैं जिस पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूँगा।" इससे प्रेरित पौलुस तुरन्त, और उचित ही, निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर सब पर दया नहीं करता, क्योंकि वह सब पर दया करना नहीं चाहता। और निश्चय ही ये शब्द, किसी व्याख्याता की सहायता के बिना, स्पष्ट और ऊँचे स्वर में घोषणा करते हैं कि परमेश्वर किसी ऐसे नियम से नहीं बँधा जो उसे सब मनुष्यों पर बिना भेद के और एक-सी दया दिखाने को विवश करे; वरन् वह अपनी इच्छा का प्रभु है, कि जिसे चाहे क्षमा दे और जिन्हें चाहे छोड़ दे। इसके अतिरिक्त यह निश्चित है कि परमेश्वर तब भी वही था जो अब है, जब भविष्यद्वक्ता ने उसके विषय में कहा, "वह अपनी इच्छा के अनुसार करता है" (दानिय्येल 4:35)। इसलिए, यदि परमेश्वर ने आदम के पतन की अनुमति अपनी इच्छा के विरुद्ध दी (जैसा आप चाहते हैं), तो आप आगे कहेंगे कि संघर्ष में शैतान ने उसे हरा दिया; और इस प्रकार आप मनीकीयों की नाईं दो शासक सिद्धान्त बना देंगे। परन्तु पौलुस भी परमेश्वर के इस महान मुकद्दमे की पैरवी करते हुए उसकी तुलना (और वह भी गम्भीरता और संयम से) एक कुम्हार से करता है, जो अपनी इच्छा से एक ही लोंदे में से विभिन्न प्रकार के बर्तन जैसे चाहे बना सकता है। अब प्रेरित अपना तर्क पाप से आरम्भ कर सकता था, यदि वह इस प्रकार प्रेरित होता। परन्तु वह ऐसा नहीं करता। वह इस महान विषय का आरम्भ परमेश्वर के स्वतंत्र अधिकार का उसकी महिमामय कारीगरी के आदि से ही, अर्थात् उसकी गुप्त, अनन्त और प्रभुता-सम्पन्न इच्छा से, समर्थन करके करता है। और जहाँ वह आगे जोड़ता है, "कि सबको अविश्वास के अधीन बन्द किया गया", तो क्या वह सिखाता है कि यह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध या उसके बिना हुआ? क्या वह इसके विपरीत नहीं सिखाता कि परमेश्वर उस अविश्वास की दशा का कर्ता था? यदि आप उत्तर दें कि सब लोग जैसे योग्य थे वैसे ही अविश्वास के दण्ड के अधीन किए गए, तो सन्दर्भ उस व्याख्या को भी नहीं मानता, क्योंकि पौलुस वहाँ परमेश्वर के गुप्त निर्णयों के विषय में बोल रहा है। और उसका वह गम्भीर उद्गार, "आहा! कैसी गहराई!" आदि, सीधे उस व्याख्या के विरुद्ध जाता है। इसलिए, जैसे परमेश्वर ने आदि से मसीह को खोए हुओं की सहायता के लिए पूर्वनियत किया, वैसे ही अपनी अकल्पनीय और अनमोल योजना से उसने एक ऐसा मार्ग ठहराया जिससे वह आदम के पतन के द्वारा अपनी महिमा प्रकट करे।

मैं स्वेच्छा से मानता हूँ कि जहाँ परमेश्वर अपनी दया के स्वतंत्र प्रवाह का समर्थन करता है, वहाँ वह सामान्यतः समस्त मानव जाति के विषय में बोलता है, जो आदम में पहले ही नाश हो चुकी थी; परन्तु आदम के गिरने से पहले भी यही दृष्टि और विचार लागू था, कि उसकी इच्छा तब भी यह दया दिखाने के लिए पर्याप्त थी, जब और जैसे वह चाहे। इसके अतिरिक्त, उसकी यह अनन्त इच्छा, यद्यपि वह उसके सिवाय किसी पर और किसी वस्तु पर निर्भर नहीं, और न उसे प्रभावित करनेवाला कोई पूर्व कारण है, तथापि सर्वोच्च विवेक और सर्वोच्च न्याय पर स्थापित है। क्योंकि यद्यपि मनुष्यों के विषय में उनकी असंयमिता पर लगाम और रोक लगाने के लिए नियम की आवश्यकता होती है, परमेश्वर के विषय में स्थिति बिलकुल भिन्न है। वह स्वयं अपना नियम है, अपने लिए आप ही नियम! और उसकी इच्छा सर्वोच्च न्याय का सर्वोच्च मापदण्ड है।

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