अध्याय 9

खण्ड VI: अनन्त पूर्वनियति

Calvin's Calvinism · John Calvin

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खण्ड VI: अनन्त पूर्वनियति

अनन्त पूर्वनियति — खण्ड 6

हमारे योग्य मित्र जॉर्जियस के अनुसार हमारे भूल में पड़ने का तीसरा कारण यह है कि यद्यपि पवित्रशास्त्र में मनुष्यों के “अन्धे किए जाने” और “कठोर किए जाने” का उल्लेख अवश्य है, तौभी हम इस बात को ध्यान में नहीं रखते कि अधिक बड़े पापों पर अधिक बड़े दण्ड दिए जाते हैं। परन्तु हम अपनी ओर से उस बात का इनकार नहीं करते जो पवित्रशास्त्र की असंख्य साक्षियों से स्पष्ट रूप से प्रमाणित होती है, कि परमेश्वर अपने अनुग्रह के तिरस्कार, अहंकार, हठ और ऐसे ही अनेक अन्य पापों को अन्धेपन से और न्याय के अन्य बहुत से प्रकारों से दण्ड देता है। और निश्चय ही वे सब प्रत्यक्ष दण्ड, जिनका उल्लेख सारे पवित्रशास्त्र में मिलता है, परमेश्वर के धर्ममय न्याय के उसी सामान्य दृष्टिकोण से सम्बद्ध किए जाने चाहिए, जिसके प्रकटीकरण में हम सदा यह देखते हैं कि जिन्होंने परमेश्वर को जान लेने के बाद उसका यथोचित भय नहीं माना और जैसा चाहिए था वैसा उसका आदर नहीं किया, वे “निकम्मे मन के हवाले कर दिए गए” और सब प्रकार की अशुद्धता और अभिलाषा में लोटने के लिए छोड़ दिए गए। परन्तु इस गम्भीर विषय पर हम आगे और विस्तार से विचार करेंगे।

इसलिए, यद्यपि प्रभु इस प्रकार दुष्टों को प्रतिशोधी उन्माद और घबराहट से मारता है और इस प्रकार उन्हें उनके योग्य दण्ड का बदला चुकाता है, तौभी इससे इस तथ्य में कोई अन्तर नहीं पड़ता कि सब त्यागे हुओं में सामान्यतः अन्धापन और मन की हठीली कठोरता पाई जाती है। अतः जब फिरौन के विषय में कहा जाता है कि वह परमेश्वर की ओर से “कठोर किया गया”, तब वह अपने आप में पहले से ही इस योग्य था कि परमप्रधान उसे शैतान के हाथ सौंप दे। फिर भी मूसा साक्षी देता है कि फिरौन इससे पहले ही परमेश्वर की ओर से “इसी कारण” अन्धा किया गया था (निर्गमन 9:16)। और पौलुस भी इसका कोई और कारण नहीं जोड़ता, सिवाय इसके कि फिरौन त्यागे हुओं में से एक था (रोमियों 9:17)। इसी रीति से प्रेरित यह भी दिखाता है कि जब परमेश्वर ने यहूदियों को समझ की ज्योति से वंचित कर दिया और उन्हें भयानक अन्धकार में गिरने दिया, तो इसके द्वारा उन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह के अपने दुष्ट तिरस्कार का धर्ममय दण्ड भोगा। तौभी प्रेरित स्पष्ट संकेत देता है कि यही अन्धापन परमेश्वर की ओर से सब त्यागे हुओं पर सामान्यतः न्यायपूर्वक डाला जाता है। क्योंकि वह साक्षी देता है कि “बचे हुए लोग” “अनुग्रह से चुने जाने के अनुसार” उद्धार पाए, परन्तु “शेष सब” अन्धे किए गए। यदि तब “शेष सब” लोग, जिनके उद्धार में परमेश्वर का चुनाव राज्य नहीं करता, “अन्धे” किए गए हैं, तो यह निस्सन्देह और निर्विवाद रूप से प्रकट है कि वे ही लोग, जिन्होंने अपने विद्रोह और परमेश्वर के कोप को भड़काने के द्वारा अपने ऊपर यह अतिरिक्त अन्धापन बुलाया, आरम्भ से ही अन्धेपन के लिए ठहराए गए थे। इसलिए पौलुस के वचन प्रकट रूप से सत्य हैं, जहाँ वह कहता है कि कोप के पात्र “विनाश के लिए पहले से तैयार किए गए” थे; अर्थात् वे सब जो लेपालकपन के आत्मा से रहित होकर अपने ही पाप और दोष से अनन्त विनाश में जा गिरे। इसलिए मैं यह मानने में संकोच नहीं करता कि परमेश्वर के गुप्त न्यायों में कुछ सदा पहले से रहता है, परन्तु “छिपा हुआ”। क्योंकि परमेश्वर किस प्रकार दुष्टों को दोषी ठहराता है और फिर भी दुष्ट को धर्मी ठहराता है, यह परमेश्वर के उस गुप्त मन में बन्द एक भेद है जो सारी मानवीय समझ की पहुँच से बाहर है। इसलिए हमारे लिए इससे उत्तम और इससे अधिक शोभा देनेवाली बात कुछ नहीं कि हम प्रेरित के साथ भय मानकर खड़े रहें और पुकार उठें, “उसके विचार कैसे अथाह हैं, और उसके मार्ग कैसे अगम हैं!” (रोमियों 11:33।) क्योंकि परमेश्वर के न्याय एक गहरा अथाह कुण्ड हैं।

तब जॉर्जियस आगे कहता है, “कि सारे पवित्रशास्त्र में एक भी शब्द नहीं मिलता जिससे यह वैधानिक रूप से निष्कर्ष निकाला जा सके कि जो लोग परमेश्वर के अनन्त न्याय से त्यागे गए थे वे ‘अन्धे किए गए’, और कि पूर्वनियति के विषय में हम जो कुछ साक्षी देते हैं वह केवल दार्शनिक कल्पना की चतुराई पर टिका है; क्योंकि परमेश्वर उन सब बातों से अनजान नहीं हो सकता था जो होनेवाली थीं, और जो कुछ उसने पहले से देखा वह उस पूर्वज्ञान के अनुसार होने से रुक नहीं सकता था।” हमारे सिद्धान्त के इस झूठे चित्रण का मैं कोई उत्तर नहीं देता। मेरी पुस्तकें ही इसका स्थायी खण्डन हैं। बात यह है कि जैसे पूज्य मठाध्यक्ष की असीम कृपा ने इस अभिमानी व्यक्ति को अपने मूर्ख भाइयों के बीच जो चाहे कहने की छूट दे दी, और उसे इतना साहस हुआ कि अपने मस्तिष्क में आए सब स्वप्नों को उनके बीच परमेश्वर की वाणी बताकर बढ़ा-चढ़ाकर कहे, वैसे ही उसने मठ के बाहर भी अपने लिए वही साख मान ली। परन्तु जो बात मैं हज़ार बार सिद्ध कर चुका हूँ, उसे प्रमाणित करने के लिए अब बहुत शब्द कहने से क्या लाभ? —कि चुने हुओं और त्यागे हुओं के बीच के उस भेद को (जिसके विरुद्ध जॉर्जियस इतने उग्र पर व्यर्थ रूप से लड़ता है) हम परमेश्वर के केवल पूर्वज्ञान से नहीं निकालते (जैसा इस व्यक्ति ने हमारी साक्षी का मूर्खतापूर्ण विकृत रूप गढ़ा है), परन्तु हम प्रमाणित करते हैं कि यह पवित्रशास्त्र के असंख्य स्पष्ट और अधिकारपूर्ण स्थलों में सिखाया गया है। फिर भी यह व्यक्ति कल्पना करता है और दिखाना चाहता है कि हम केवल परमेश्वर के पूर्वज्ञान से लड़ते हैं। परन्तु पाठकगण मेरे द्वारा पहले ही उद्धृत बीस से अधिक स्पष्ट स्थल पाएँगे जो इस व्यर्थ कल्पना के विपरीत बात प्रमाणित करते हैं। वह डींग मारता है कि विशेष और व्यक्तिगत चुनाव हमारी अपनी गढ़ी हुई बात है; क्योंकि परमेश्वर किन्हीं विशेष या व्यक्तिगत जनों को नहीं चुनता। परन्तु स्वयं मसीह इसके विपरीत ऊँचे स्वर से घोषणा करता है, “कि वह जानता है कि उसने किन्हें चुना है” (यूहन्ना 13:18)।

तो हे पाठको, देखो कि जॉर्जियस अपनी ही गढ़ी हुई कैसी बड़ी युद्ध-मशीनों से परमेश्वर की उस अनन्त मनसा को हिलाने का परिश्रम करता है, जिससे कुछ लोग उद्धार के लिए चुने गए और कुछ विनाश के लिए ठहराए गए! पौलुस सचमुच विश्वास के द्वारा परमेश्वर की धार्मिकता को सब के लिए सामान्य ठहराता है, और किसी प्रकार का भी भेद स्वीकार नहीं करता, यह साक्षी देते हुए कि “सब ने पाप किया और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।” मैं भी अपने सम्पूर्ण हृदय से पौलुस के अनुसार मानता हूँ कि परमेश्वर की धार्मिकता विश्वास के द्वारा सब को सेंतमेंत दी जाती है। परन्तु मनुष्यों में विश्वास कहाँ से आता है? केवल आत्मा की सेंतमेंत ज्योति से। और पौलुस उन्हें कौन समझता है जो मसीह पर विश्वास करते हैं? केवल उन्हें जिन्हें उसका स्वर्गीय पिता खींच लाया है। और निश्चय ही मसीह अपनी ओर से किसी को अपना नहीं गिनता सिवाय उसके जो उसे उसके पिता की ओर से दिया गया। इसलिए वह घोषणा करता है कि जो उसे दिए गए वे पहले से उसके पिता के थे। जॉर्जियस, हम भली-भाँति जानते हैं, यहाँ स्वाभाविक विश्वास के विषय में अपना पागलपन-भरा स्वप्न हमारे मुँह पर ठूँस देगा, और इस बेतुकी बात का खण्डन करने के लिए रुकना मेरे वर्तमान उद्देश्य का भाग नहीं है। मैं केवल इतना कहूँगा कि परमेश्वर की धार्मिकता मसीह पर विश्वास करनेवाले “सब के लिए और सब पर” है। परन्तु उसी प्रेरित की साक्षी पर मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि जहाँ एक विश्वास करता है और दूसरा विश्वास नहीं करता, वहाँ भेद केवल परमेश्वर ही करता है; कि आशीष पाने में कुछ लोगों का दूसरों से बढ़कर होना केवल परमेश्वर की ओर से है, ताकि कोई घमण्ड न करे। मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि जो वस्तुएँ परमेश्वर की ओर से हमें सेंतमेंत दी गई हैं उन्हें हम जानें, इसके लिए हमारा अनन्त अधिकार आत्मा की बयाना और मुहर के द्वारा हमारे हृदयों पर मुहरबन्द किया गया है। मैं यह भी दृढ़ता से कहता हूँ कि मसीह पर विश्वास करने की हमारी सामर्थ्य हमें परमेश्वर की ओर से दी गई है। इसके अतिरिक्त मैं मानता हूँ कि “हमारे मन की आँखें” परमेश्वर की ओर से “ज्योतिर्मय की जाती हैं”, ताकि हम जानें कि “उसके बुलाने की आशा क्या है।” और अन्त में मैं साक्षी देता हूँ कि विश्वास पवित्र आत्मा का फल है।

पौलुस सचमुच घोषणा करता है कि “कुछ भेद नहीं।” परन्तु उसका अभिप्राय यह है कि यहूदी और यूनानी में कुछ भेद नहीं, क्योंकि परमेश्वर दोनों को समान रूप से उद्धार के लिए बुलाता है। अब जॉर्जियस यहाँ कहता है कि मनुष्यों की ये दो जातियाँ सारी मानवजाति को समेट लेती हैं। मान लिया, फिर भी वह इस तर्क से यह प्रमाणित नहीं कर सकता कि धार्मिकता मानवजाति के प्रत्येक व्यक्ति से अलग-अलग और पृथक् रूप से प्रतिज्ञा की गई है। और मान लें कि हम यह अन्तिम बात भी मान लें, तौभी हमें अन्त में उसी मूल प्रस्ताव और तथ्य पर आना पड़ेगा कि कोई भी मनुष्य अपने सामने रखी गई भलाई का भागी विश्वास के बिना नहीं हो सकता। इस तर्क से तब भिक्षु को विश्वास को सब मनुष्यों के लिए सामान्य बनाने की अनिवार्यता में धकेला जाना होगा। और यह, जैसा हम पहले भरपूर प्रमाणित कर चुके हैं, प्रेरित पौलुस के मन के सीधे विपरीत है। हमारा भिक्षु अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहेगा कि हमारे सिद्धान्त के अनुसार केवल चुने हुए लोग ही “परमेश्वर की महिमा से रहित” हुए हैं। और वह इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँचता है? क्योंकि (वह कहता है) मसीह का अनुग्रह उन सब पर उँडेला गया है जिन्होंने पाप किया। परन्तु मैं परमेश्वर के अनुग्रह को सार्वभौमिक मानता हूँ, इस रीति से कि बड़ा भेद इसमें ठहरे: कि सब “परमेश्वर की मनसा के अनुसार” बुलाए नहीं गए हैं।

जॉर्जियस अपने आपको बहुत चतुराई से तर्क करता हुआ मानता है जब वह कहता है, “मसीह सारे जगत के पापों का प्रायश्चित है। इसलिए जो लोग त्यागे हुओं को मसीह के लाभों में सहभागिता से बाहर रखना चाहते हैं, उन्हें अनिवार्य रूप से उन्हें जगत के बाहर कहीं रखना होगा।” अब हम इस अवसर पर इस प्रश्न के उस प्रचलित समाधान को टिकने नहीं देंगे, जो यह मानता है कि मसीह ने सब मनुष्यों के लिए पर्याप्त रूप से दुःख उठाया, परन्तु प्रभावकारी रूप से केवल अपने चुने हुओं के लिए। यह बड़ी बेतुकी बात, जिसके द्वारा हमारे भिक्षु ने अपने ही बन्धुओं के बीच इतनी वाहवाही पाई है, मेरे लिए कोई महत्त्व नहीं रखती। यूहन्ना सचमुच मसीह की मृत्यु से पूर्ण हुए प्रायश्चित के लाभों को परमेश्वर के सब चुने हुओं तक फैलाता है, चाहे वे जगत के किसी भी भूभाग में बिखरे हुए हों। परन्तु ऐसा होने पर भी इस तथ्य में कोई अन्तर नहीं पड़ता कि जगत में त्यागे हुए लोग चुने हुओं के साथ मिले हुए हैं। यह भी निर्विवाद तथ्य है कि मसीह “सारे जगत” के पापों का प्रायश्चित करने आया। परन्तु सारी कठिनाई का समाधान तुरन्त इस सत्य और तथ्य में हाथ के पास है कि यह “जो कोई उस पर विश्वास करे” वही है जो “नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।” क्योंकि हमारा वर्तमान प्रश्न यह नहीं है कि मसीह की सामर्थ्य या गुण क्या है, न यह कि अपने आप में उसकी प्रभावकारिता क्या है, परन्तु यह है कि वे कौन हैं जिन्हें वह अपने आपको भोगने के लिए देता है। अब यदि मसीह का अधिकारी होना विश्वास में निहित है, और यदि विश्वास लेपालकपन के आत्मा से उमड़ता है, तो इससे यह निकलता है कि परमेश्वर की ओर से केवल वही उसके बच्चों में गिना जाता है जिसे परमेश्वर ने मसीह का भागी होने के लिए ठहराया है। वास्तव में सुसमाचार-लेखक यूहन्ना मसीह के कार्य को इसके सिवाय और कुछ नहीं बताता कि वह अपनी मृत्यु के द्वारा “परमेश्वर के सब बच्चों को” एक में “इकट्ठा करे।” इस सब से हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यद्यपि उसके द्वारा मेल-मिलाप सब मनुष्यों के सामने प्रस्तुत किया जाता है, तौभी वह बड़ा लाभ विशेष रूप से चुने हुओं का है, कि वे “इकट्ठे” किए जाएँ और “साथ-साथ” अनन्त जीवन के भागी बनाए जाएँ।

परन्तु यह ध्यान रहे कि जब मैं कहता हूँ कि मसीह के द्वारा मेल-मिलाप सब को प्रस्तुत किया जाता है, तब मेरा अभिप्राय यह नहीं कि वह सन्देश या राजदूतता, जिसके द्वारा पौलुस के अनुसार परमेश्वर “जगत को अपने साथ मिला लेता है,” वास्तव में सब मनुष्यों तक पहुँचती है; परन्तु यह कि वह उन सब के हृदयों पर, जिनके पास वह आती है, अन्धाधुन्ध ऐसी मुहरबन्द नहीं होती कि उनमें प्रभावकारी हो। और जहाँ तक हमारे वर्तमान विरोधी की इस बकवास का सम्बन्ध है कि “परमेश्वर के यहाँ किसी का पक्षपात नहीं,” उसे पहले “जाकर सीखना” होगा कि हमारी पिछली व्याख्याओं के अनुसार “व्यक्ति” शब्द का क्या अर्थ है; और तब इस विषय में उसके कारण हमें और कष्ट नहीं होगा।

“परन्तु पौलुस हमें सिखाता है (जॉर्जियस आगे कहता है) कि परमेश्वर ‘चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो।’” इसलिए उसकी उस स्थल की समझ के अनुसार या तो यह निकलता है कि परमेश्वर अपनी इच्छाओं में निराश होता है, या यह कि बिना किसी अपवाद के सब मनुष्यों का उद्धार होना अनिवार्य है। यदि वह यह उत्तर दे कि परमेश्वर अपनी ओर से, या जहाँ तक उसका सम्बन्ध है, चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, फिर भी उद्धार प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा पर छोड़ा गया है; तो मैं बदले में उससे पूछता हूँ कि यदि ऐसा है तो परमेश्वर ने जगत के आरम्भ से ही सुसमाचार को सब मनुष्यों में बिना भेद प्रचार किए जाने की आज्ञा क्यों नहीं दी? उसने इतनी पीढ़ियों के मनुष्यों को इतने युगों तक मृत्यु के सारे अन्धकार में भटकने क्यों दिया? अब प्रेरित के सन्दर्भ में यह आगे आता है कि परमेश्वर “चाहता है कि सब मनुष्य सत्य की पहचान तक पहुँचें।” परन्तु सारे स्थल का अर्थ पूर्णतः स्पष्ट है, और किसी निष्कपट और सुविवेकी पाठक के लिए उसमें कोई अस्पष्टता नहीं। हम इस सारे स्थल की पिछले पृष्ठों में पूरी व्याख्या कर चुके हैं। प्रेरित ने अभी पहले यह उपदेश दिया था कि कलीसिया में “राजाओं और हाकिमों” आदि के लिए गम्भीर और सामान्य प्रार्थनाएँ की जाएँ, ताकि किसी को उन राजाओं और अधिकारियों के विषय में शोक करने का कारण न रहे जिन्हें परमेश्वर उन पर ठहराना चाहे; क्योंकि उस समय शासक विश्वास के सबसे उग्र शत्रु थे। इसलिए पौलुस कलीसिया की प्रार्थनाओं के द्वारा इस स्थिति के लिए ईश्वरीय प्रबन्ध करता है, और यह कहकर भी कि मसीह का अनुग्रह मनुष्यों के इस वर्ग तक भी, अर्थात् हर प्रकार के राजाओं, हाकिमों और शासकों तक भी, पहुँच सकता है।

परन्तु यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि यह निकम्मा व्यक्ति जितना अधिक साहस पवित्रशास्त्र को मरोड़ने में दिखाता है, उतना ही अपने उद्देश्य के अनुकूल स्थल पर स्थल जमा करने में उदार हो, क्योंकि उसमें न धर्म का कण भर है न लज्जा का, जो उसकी अन्धाधुन्ध ढिठाई को रोके। परन्तु वह अपने उन्मत्त विवादों में जितना ही विस्तार करता है, मैं अपने उत्तरों में उतना ही संक्षिप्त रहने का यत्न करूँगा, जिससे मुझे आशा है कि उसके दावे थम जाएँगे। वह यशायाह 56:3 का यह स्थल उद्धृत करता है: “और परदेशी सन्तान यह न कहे, कि यहोवा मुझे अपने लोगों से निश्चय अलग कर देगा।” और वह मान लेता है कि वह पद त्यागे हुओं पर कभी लागू नहीं हो सकता। क्योंकि वह यह मानना बेतुका समझता है कि चुने हुओं को कभी “परदेशी की सन्तान” कहा जाए। इसके उत्तर में मैं कहता हूँ कि पवित्रशास्त्र में यह कोई असामान्य बात नहीं कि जो लोग जगत की उत्पत्ति से पहले चुने गए थे, उन्हें फिर भी “परदेशी” या “परदेशी की सन्तान” माना जाता है, जब तक कि वे विश्वास के द्वारा परमेश्वर के घराने में और उसकी सन्तानों के बीच इकट्ठे न कर लिए जाएँ। पतरस के शब्द, जो भविष्यद्वक्ता यशायाह से लिए गए हैं, ये हैं: “तुम पहले तो कुछ भी नहीं थे, पर अब परमेश्वर के लोग हो” (1 पतरस 2:10)। अब पतरस यहाँ किससे बात कर रहा है? क्या उन्हीं से नहीं जिनके विषय में उसने पत्री के आरम्भ में साक्षी दी थी कि वे “परमेश्वर के पूर्वज्ञान के अनुसार चुने हुए” हैं? पौलुस इस बात को इफिसियों की अपनी पत्री में और भी खुले प्रकाश में रखता है। उसमें उनके परमेश्वर की ओर से अनन्त चुनाव पर बहुत विस्तार से कहने के बाद वह आगे उन्हें स्मरण दिलाता है कि “उस समय तुम इस्राएल की प्रजा के भागी न थे, और प्रतिज्ञा की वाचाओं के भाग से अलग थे, और आशाहीन और जगत में परमेश्वर रहित थे” (इफिसियों 2:12)। और यदि यशायाह आत्मा की प्रेरणा से इस प्रकार अपवित्र पत्थरों से परमेश्वर का मन्दिर बनाते हुए यह घोषणा करे कि उसका नया अभिषेक होगा, तो क्या यह आश्चर्य का कारण है! क्योंकि जब अन्यजातियों की बुलाहट परमेश्वर के हृदय में आरम्भ से छिपी थी, तब उनमें बाहर से सब प्रकार की निन्दनीय अशुद्धता के सिवाय और क्या दिखाई देता था? उनमें से जो अन्त में विश्वास के द्वारा मसीह की आत्मिक देह में सम्मिलित किए गए, वे उस सारे समय सचमुच परमेश्वर की भेड़ें ही थे, जैसा स्वयं मसीह साक्षी देता है (यूहन्ना 10:16)। परन्तु वे ऐसी भेड़ें थीं जो अभी बाड़े से बाहर थीं और “अँधेरे पहाड़ों पर भटकती” थीं। और यद्यपि वे स्वयं उस सारे समय यह नहीं जानते थे, तौभी चरवाहा उन्हें जानता था, उस अनन्त पूर्वनियति के अनुसार जिससे उसने जगत की उत्पत्ति से पहले अपनों को अपने लिए चुन लिया। अगस्तीन इसे बहुत सही और सुन्दर रीति से प्रस्तुत करता है।

“अब यदि भविष्यद्वक्ता यहेजकेल का वह वचन सच है (जॉर्जियस आगे कहता है), कि ‘पुत्र पिता के अधर्म का भार न उठाएगा,’ तो मानवजाति का कोई भाग मूल पाप में नहीं छोड़ा गया।” परन्तु मैं इस अशुद्ध पशु से सचमुच कोई सम्बन्ध नहीं रखूँगा (व्यवस्थाविवरण 14:7)। मेरा उद्देश्य केवल अज्ञानियों की सहायता करना है, कि वे ऐसी निकम्मी हुज्जतों में फँसकर बहक न जाएँ। इससे बढ़कर निश्चित कोई बात नहीं कि वे सब सामान्य विनाश के अधीन रहते हैं जो मसीह की देह में कलम नहीं लगाए गए हैं। परायों के साथ उदारता दिखानेवाला यह भला भिक्षु भाई सब को एक साथ ढेर लगाता है और उन्हें भी घराने में ठूँसता है जिनके विरुद्ध परमेश्वर ने द्वार बन्द कर दिया और बेंड़ा लगा दिया। परन्तु वह मनुष्य, चाहे कोई भी हो, जान-बूझकर पागल है, जो यह नहीं मानता कि जो स्वभाव से आदम में मरे थे उनमें से कोई भी अनन्त जीवन में परमेश्वर की ठहराई हुई रीति को छोड़ किसी और रीति से बहाल नहीं किया जा सकता। प्रेरित के निर्धारित किए अनुसार विश्वास करनेवाले और विश्वास न करनेवाले मनुष्य की सन्तान के बीच प्रकट भेद यह है कि पहली “पवित्र” है, परन्तु दूसरी “अशुद्ध।” और इसी पवित्र सिद्धान्त पर, इससे पहले कि अन्यजातियाँ “बीच की दीवार” को, जो उनके बीच थी, गिराकर यहूदियों के साथ कलीसिया में कलम लगाई जातीं, प्रेरित अब्राहम की डालियों को उनकी पवित्र जड़ के कारण “पवित्र” कहता है। परन्तु इस बात पर लम्बी चर्चा की क्या आवश्यकता? क्या उसी भविष्यद्वक्ता यहेजकेल ने, जिसके वचन का यह भिक्षु दुरुपयोग करता है, खतनारहित अन्यजातियों को अपवित्र जन जानकर बारम्बार विनाश का दण्डादेश नहीं दिया? और खतना अब भी किसी और आधार पर जीवन की वाचा न होता। तब यह कहना कैसे सच हो सकता है कि पुत्र पिता के पाप का दण्ड नहीं भोगेगा? और दूसरी ओर मैं पूछता हूँ, वह मनुष्य जो अशुद्ध अण्डे से अशुद्ध कौआ जन्मा है, अपने आपको निर्दोष होने का घमण्ड कैसे कर सकता है? क्योंकि मूल पाप आदम से सार्वभौमिक रूप से इस प्रकार उतरता है कि वह प्रत्येक मनुष्य के स्वभाव की निजी सम्पत्ति बन जाता है। इसलिए कोई भी, यह कल्पना करके कि वह दूसरे के पाप का दोष उठा रहा है और अपने आपको दोषरहित मानकर, न्यायपूर्वक शिकायत नहीं कर सकता। परन्तु यदि परमेश्वर के लिए यह उचित नहीं कि वह बच्चों में उनके पिताओं के पापों का दण्ड दे, तो उस वचन का क्या अर्थ है, “पितरों के अधर्म का दण्ड उनके बेटों पर तीसरी और चौथी पीढ़ी तक देनेवाला”? (निर्गमन 20:5।) और फिर, “पितरों के अधर्म का दण्ड उनके बेटों पर, और पोतों पर, तीसरी और चौथी पीढ़ी तक देनेवाला”? (निर्गमन 34:17।) इसके अतिरिक्त, इस दण्ड-प्रतिशोध का पहला भाग यह है कि आदम की अचुनी सन्तान, परमेश्वर के आत्मा से रहित छोड़ी जाकर, अपने स्वभाव के मूल पाप में डूबी रहती है।

जब जॉर्जियस इस प्रकार तर्क करता है: “यूहन्ना कहता है जो पाप करेगा, मैं उसका नाम जीवन की पुस्तक में से काट दूँगा; यदि तुम इसे त्यागे हुओं पर लागू करके समझाओ, तो वे कभी जीवन की पुस्तक में लिखे ही नहीं गए थे। यदि तुम इसका अर्थ चुने हुओं के विषय में करो, तो परमेश्वर की अनन्त मनसा अस्थिर होगी और विफल हो जाएगी” — अब हमारा भिक्षु इस प्रकार बकता है मानो परमेश्वर सदा हम से मनुष्यों की समझ के अनुकूल रीति से बात नहीं करता। कृतघ्नता का कैसा नीच नमूना है कि परमेश्वर का इस प्रकार अपमान किया जाए, इसलिए कि उसने हमारे और हमारी सीमित समझ के प्रति अत्यन्त कृपा करके अपने आपको ऐसे सरल शब्दों में व्यक्त किया! यदि यह निकम्मा व्यक्ति पवित्रशास्त्र की अपनी व्याख्या इसी रीति से, अक्षर के अनुसार, करता रहा, तो वह शीघ्र ही हमारे लिए एक देहधारी परमेश्वर गढ़ लेगा, और कारण यह देगा कि पवित्रशास्त्र परमेश्वर के कान, आँखें, पाँव और हाथ होने की बात कहता है। परन्तु उस स्थल का अर्थ अत्यन्त सरल और स्पष्ट है: कि वे “जीवन की पुस्तक में से काट दिए जाते हैं” जो कुछ समय तक परमेश्वर की सन्तान गिने गए, क्योंकि वे उनके बीच थे, पर बाद में पीछे हट गए और अपने ही स्थान को गिर पड़े, जैसा पतरस ने यहूदा के विषय में बहुत सच्चाई से वर्णन किया है। परन्तु ऐसे जनों के विषय में, जैसा यूहन्ना साक्षी देता है, “वे हम में से थे ही नहीं; क्योंकि यदि वे हम में से होते, तो हमारे साथ रहते” (1 यूहन्ना 2:19)। परन्तु जो बात यूहन्ना इस प्रकार संक्षेप में कहता है, उसे भविष्यद्वक्ता यहेजकेल सार रूप में और विस्तार से प्रस्तुत करता है: “वे मेरे लोगों की गुप्त सभा में न होंगे, और न इस्राएल के घराने की सूची में लिखे जाएँगे।” यही कुंजी उस कठिनाई को भी खोलेगी जो वहाँ दिखाई दे सकती है जहाँ मूसा और पौलुस “जीवन की पुस्तक में से काटे जाने” की अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं। बात यह है कि वे अपने शोक की अधिकता से मानो अपने आपे से बाहर हो गए थे, इसलिए उन्होंने यह कहा कि वे परमेश्वर की कलीसिया के, जो उस समय इतनी भरी-पूरी थी, मिट जाने की अपेक्षा स्वयं नाश होने को तैयार हैं। परन्तु जब मसीह अपने चेलों से कहता है कि “आनन्द करो कि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे हैं,” तब वह उसे एक चिरस्थायी आशीष के रूप में कहता है, जिससे वे कभी वंचित न किए जाएँगे। एक शब्द में, मसीह जीवन की पुस्तक में नामों के लिखे जाने के सम्बन्ध में दोनों अर्थों को जोड़ता और संगत करता है, जब वह कहता है, “हर एक पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा।” इसके द्वारा वह स्पष्ट संकेत देता है कि त्यागे हुए भी कभी-कभी देखने में जड़ पकड़ लेते हैं, तौभी परमेश्वर के हाथ से लगाए नहीं गए होते।

प्रेरित पौलुस की उस तुलना पर (रोमियों 5:12), जहाँ वह कहता है, “जैसे एक मनुष्य के द्वारा पाप दण्ड के लिए जगत में आया; वैसे ही एक मनुष्य के द्वारा धार्मिकता का दान जीवन के लिए आया,” जॉर्जियस इस प्रकार तर्क करता है: “इसलिए यदि एक के द्वारा बहुत लोग मरे, तो परमेश्वर का अनुग्रह और भी अधिक बढ़ना चाहिए, कि बहुत लोग मसीह के द्वारा जीवन में राज्य करें।” अब यदि प्रेरित यहाँ यह प्रमाणित कर रहा होता कि मसीह का अनुग्रह सब मनुष्यों तक फैला है, तो अपने आपको पराजित मानकर मैं चुप हो जाता और इस विषय में और कुछ न कहता। परन्तु चूँकि प्रेरित का उद्देश्य केवल यह दिखाना है कि विश्वासियों में मसीह का अनुग्रह उस श्राप से कितना अधिक सामर्थी है जो उन्हें आदम से मिला, तो इस धन्य सत्य में ऐसा क्या है जो उन लोगों के अनन्त चुनाव को हिला दे जिन्हें मसीह ने पतन के खण्डहरों में से बहाल करके अनन्त जीवन के अधिकार और आनन्द में पहुँचाया, और शेष को उनके पापों में नाश होने के लिए छोड़ दिया? परन्तु हमारा भिक्षु प्रेरित के विशेष शब्दों पर अड़ना चाहता है। “पौलुस (वह कहता है) सारी मानवजाति को समेट लेता है जब वह ये शब्द प्रयोग करता है, ‘एक मनुष्य का पाप’ और ‘सब मनुष्यों पर आया।’ इसलिए अनन्त जीवन की सहभागिता से किसी को वैधानिक रूप से बाहर नहीं किया जा सकता।” परन्तु यदि हमें इस रीति से तर्क करने की छूट हो, तो मैं यह तर्क देने को प्रवृत्त होऊँगा कि यदि ऐसा है, तो परमेश्वर को स्वाभाविक परिणाम के रूप में कुछ नए जगत अवश्य रचने होंगे, ताकि उनमें इस जगत से अच्छा प्रबन्ध किया जा सके! मसीह घोषणा करता है कि आदम में आया श्राप किसी प्रकार उस अनुग्रह के बराबर नहीं था जो उसमें है, क्योंकि जैसा उसका प्रेरित कहता है, “जहाँ पाप बढ़ा, वहाँ अनुग्रह उससे भी कहीं अधिक बढ़ा।” अब यदि मनुष्यों की सन्तानों की संख्या (चुने हुओं और त्यागे हुओं की, श्राप के अधीन और अनुग्रह के अधीन रहनेवालों की) एक में घटा दी जाए, तो मसीह निश्चय ही उससे अधिक का उद्धार नहीं कर सकता था जितनों का आदम ने नाश किया, अर्थात् मनुष्यों की इन दो संख्याओं से अधिक का। इसलिए पौलुस का विश्वास अपने ही चुनाव और उद्धार के विषय में पूर्णतः संकट में पड़ जाएगा, जब तक कि समुद्र में से तुरन्त कोई नया जगत न उठ खड़ा हो! फिर भी सत्य की रक्षा में मैं कोई और ढाल नहीं लूँगा सिवाय उसके जो हमारा भिक्षु स्वयं पौलुस के एक और स्थल के द्वारा मेरी बाँह पर बाँधता है, जिसे वह डींग मारते हुए प्रस्तुत करता है, “जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसे ही मसीह में सब जिलाए जाएँगे।” यदि सत्य का यह निकम्मा विरोधी इस पद के दूसरे भाग को आदम की सब सन्तानों पर लागू करे, तो पौलुस तुरन्त हाथ उठाकर उसे रोक देता है। क्योंकि वह इसके तुरन्त बाद स्पष्ट साक्षी देता है कि वह वहाँ केवल मसीह के अंगों के विषय में कह रहा है। “मसीह (वह कहता है) पहला फल; फिर उसके आने पर जो मसीह के हैं।” अब पौलुस यहाँ निर्विवाद रूप से पुनरुत्थान के विषय में कह रहा है, जिसके बाद धन्य अमरता आएगी — वही अमरता जिसमें हम अपने विश्वास-वचन में अपना विश्वास अंगीकार करते हैं जब हम कहते हैं, “मैं विश्वास करता हूँ … अनन्त जीवन में।”

परन्तु इसलिए कि मैं इस निकम्मे व्यक्ति के बेतुके तर्कों को एक के बाद एक उठाकर अपने पाठकों को व्यर्थ न थकाऊँ, मेरा उद्देश्य अब यह होगा कि जो बहुत से बिना ध्यान दिए बचे हैं उनमें से कुछ और को पकड़ूँ। हमें किस अर्थ में समझना चाहिए कि परमेश्वर पापी की मृत्यु नहीं चाहता, परन्तु यह कि सब फिरकर जीवित रहें, इसे मैं पिछले पृष्ठों में विस्तार से समझा चुका हूँ। क्योंकि जब परमेश्वर मनुष्यों को पश्चाताप के लिए उपदेश देता है और उनके लौटने पर उन्हें जीवन देने का प्रस्ताव करता है, तो वह उपदेश और प्रस्ताव सब मनुष्यों के लिए सामान्य है। परन्तु अपनी सन्तानों के विषय में परमेश्वर उन्हें इस अनमोल विशेषाधिकार के योग्य ठहराता है कि वह उनमें से उनके “पत्थर के हृदय” निकालकर उन्हें “मांस के हृदय” देता है। और मैं भिक्षु को यह किसी प्रकार नहीं मानने देता कि प्रभु के वे सब शब्द व्यर्थ और हवा में कहे गए हैं, जिनके द्वारा वह उन सब दुष्टों को, जो अपने प्रति अपनी बुराई में दोषी ठहराए जाते हैं, निरुत्तर छोड़ देता है; जबकि अपने चुने हुओं में वह इस प्रकार कार्य करता है कि अपने आत्मा की गुप्त सामर्थ्य से उसके सत्य की शिक्षा उनके हृदयों में प्रभावकारी हो जाती है, जब वचन उनके कानों में गूँजता है। और इस साधारण निन्दा से किसी के मन को व्यथित होने का तनिक भी कारण नहीं, जो अपवित्रता से यह संकेत देती है “कि परमेश्वर मनुष्यों को चलने का उपदेश देकर केवल उनका उपहास करता है, जबकि वह जानता है कि वे अपने पाँवों से अपंग हैं।” क्योंकि निश्चय ही परमेश्वर मनुष्यों की कोई हानि नहीं करता जब वह उनसे उससे अधिक कुछ नहीं माँगता जो वे वास्तव में उसके देनदार हैं, जब तक कि सचमुच वह कर्ज़दार, जिसके पास चुकाने को कुछ नहीं है, अपने ऋणदाता के सामने यह डींग न मारे कि उसने उसे सब चुका दिया; और वह भी तब जब ऋणदाता आश्चर्य से उसकी डींगों पर हँसता है! परन्तु मैं इस गम्भीर युद्ध के इस भाग को और आगे नहीं बढ़ाऊँगा। इसमें निहित सत्य हर मनुष्य के विवेक के नाश के बिना नष्ट नहीं किया जा सकता।

परमेश्वर अपनी प्रजा इस्राएल के कानों को अपने भविष्यद्वक्ता की वाणी से मारे जाने और भरे जाने की आज्ञा देता है। किस उद्देश्य से? कि उनके हृदय छुए जाएँ? नहीं; परन्तु कि वे कठोर किए जाएँ! कि सुननेवाले पश्चाताप करें? नहीं; परन्तु कि पहले से नष्ट हुए होकर वे दुगुने नाश हों! हे भिक्षु, यदि तू यह उत्तर दे कि कारण अधिक बलवान था, और इसलिए सब परिणामों पर प्रभुता करता था; तो वर्तमान उदाहरण में मैं केवल इसी स्वीकारोक्ति को अपने लिए माँगता हूँ। इसलिए यह किसी प्रकार बेतुका नहीं कि सत्य की शिक्षा, परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार, फैलाई जाए; यद्यपि वह जानता है कि असंख्य लोगों में वह अपने उद्धारक प्रभाव से रहित होगी। उतनी ही तुच्छ वह हुज्जत भी है जब भिक्षु घोषणा करता है कि मसीह का वह वचन, जहाँ वह उस “भेड़” के विषय में कह रहा है जो “खो जाने” के बाद “लौटा लाई गई,” चुनाव के सिद्धान्त के साथ संगत नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी मैं सन्तुष्ट हूँ कि जो बरछा वह मुझ पर चलाता है, उसे मैं भिक्षु पर कहीं अधिक उचित रीति से और प्रभावी ढंग से लौटा सकता हूँ। मसीह जो यह दर्शाता है कि कुछ समय खोए रहने के बाद जो “लौटा लाई गई” वह एक भेड़ थी, उसका ठीक यही कारण था कि वह भेड़ होने के कारण, परमेश्वर के अपने स्वतंत्र और अनन्त चुनाव के सम्बन्ध में, जितने समय वह खोई रही, अनन्त चरवाहे की सुरक्षा में सुरक्षित थी!

इसी कूड़े में से वह तार्किक दुविधा भी है जिसे वह प्रस्तुत करता है और जिससे वह हम सब को भ्रम में डालने की आशा करता है: “यदि (वह तर्क करता है) विशेष चुनाव जैसी कोई बात होती, तो भविष्यद्वक्ता का वह उपदेश, जहाँ वह कहता है, ‘दुष्ट अपनी चाल छोड़ दे,’ उसके साथ किसी प्रकार संगत नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि यदि वह उपदेश चुने हुओं को दिया गया है, तो वे ‘दुष्ट’ कैसे हो सकते हैं जिनमें ‘सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं ’? यदि वह त्यागे हुओं को दिया गया है, तो त्यागे हुओं को पश्चाताप का उपदेश कैसे दिया जा सकता है?” मेरा उत्तर यह है कि भविष्यद्वक्ता का उपदेश चुने हुओं और त्यागे हुओं दोनों को दिया गया है — पहलों को, कि उनमें से जिन्होंने कुछ समय के लिए जूआ उतार फेंका है और स्वच्छन्दता से मार्ग से बाहर चले गए हैं, वे इस प्रकार चेतावनी पाकर सुबुद्धि में लौट आएँ; और दूसरों को, कि अपने अधर्मों में सुन्न पड़े हुए वे ऐसी बेधनेवाली पुकारों से अपनी भयानक दशा के बोध की ओर उकसाए जाएँ। क्योंकि हम न तो अपने मन में कल्पना करते हैं और न दूसरों के सामने झूठा चित्र खींचते हैं कि चुने हुए पवित्र आत्मा के निरन्तर निर्देशन में सदा ठीक मार्ग पर बने रहते हैं; इसके विपरीत हम सदा यह कहते हैं कि वे अपने पाँवों से फिसलते हैं, मार्ग से भटक जाते हैं, और पाप और भूल की नाना चट्टानों से टकराते हैं, और बहुधा उद्धार के सही मार्ग से सर्वथा बाहर होते हैं। परन्तु चूँकि परमेश्वर की सुरक्षा, जिसके द्वारा वे चलाए और बचाए जाते हैं, सब वस्तुओं से बलवन्त है, इसलिए यह असम्भव है कि वे पूर्ण विनाश में गिरें। “मनुष्यों को आज्ञा दी गई है (भिक्षु आगे कहता है) कि सावधान रहें कि नाश न हों। परन्तु यह निश्चित है कि चुने हुए सब खतरों से परे रखे गए हैं। और त्यागे हुओं के लिए सब सावधानी और चेतावनी व्यर्थ ही है।” इस तर्क का भी मेरा उत्तर यह है: इस पवित्र विषय में कुछ भी अनोखा नहीं है। चुने हुए, जो निरन्तर संघर्ष में लगे हैं, उन्हें युद्ध के लिए आवश्यक शस्त्रों से इस प्रकार सज्जित होना चाहिए। इसके अतिरिक्त ऐसे उपदेशों से सब मनुष्यों का परिश्रम सामान्यतः उभारा जाता है। जबकि त्यागे हुए सब उपदेश की उपेक्षा करके अन्त में अपने आपको असाध्य सिद्ध करते हैं। क्योंकि रोगों में औषधि तब तक यत्न से दी जाती है जब तक सब उपचार की निराशा अपना अचूक रूप प्रकट न कर दे।

जॉर्जियस की एक और आपत्ति यह है, “कि अब्राहम चुने हुओं का पिता नहीं कहलाता, परन्तु विश्वासियों का पिता; और कि उद्धार चुने हुओं से नहीं, परन्तु विश्वास करनेवालों से प्रतिज्ञा किया गया है।” तब वह उन्हें कौन ठहराएगा जो अपने पिता अब्राहम के साथ स्वर्ग के राज्य में इकट्ठे किए जाएँगे? क्योंकि मसीह निश्चय ही घोषणा करता है कि यह महान आशीष केवल चुने हुओं का है। वरन् मसीह यह भी घोषणा करता है कि आनेवाले भयानक विनाशों की सीमा बाँधी जाएगी, “चुने हुओं के कारण!” क्या! क्या हम इनकार करेंगे कि वे अब्राहम की सन्तान हैं जो उसके साथ परमेश्वर के घराने के, कलीसिया के सदस्य बनाए गए हैं? और मैं तुमसे पूछता हूँ, अब्राहम को इतना बड़ा सम्मान कैसे दिया गया कि वह विश्वासियों का पिता कहलाया, यदि इसलिए नहीं कि वह परमेश्वर की ओर से चुना गया था? और ऐसा कैसे है कि वे उसकी भ्रष्ट सन्तान गिने जाते हैं जो अपने विश्वासी पिता का अपने विश्वास के द्वारा यथोचित प्रतिनिधित्व नहीं करते?

सच तो यह है कि इस निकम्मे धर्मत्यागी की ढिठाई पूर्णतः घृणित है। वह अपने सब तर्कों में अपनी पूरी शक्ति से उसी चिह्न को बिगाड़ने, मिटाने और दूर करने का परिश्रम करता है जिससे परमेश्वर किसी और चिह्न से बढ़कर अपनी प्रजा को पहचान देता और अलग करता है। मैं बिना किसी हिचकिचाहट के मानता हूँ कि अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा “विश्वास करनेवालों” से की गई है, परन्तु इस शर्त पर कि भिक्षु अपनी ओर से इनकार न करे कि अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा उसी प्रकार चुने हुओं से भी की गई है; क्योंकि यशायाह यों कहता है, “और मेरे चुने हुए उसके अधिकारी होंगे” (यशायाह 5:9)। मैं अपने विरोधी से यह भी माँगूँगा कि वह मान ले कि केवल वही विश्वास करते हैं जिन्हें परमेश्वर अपने आत्मा से ज्योतिर्मय करता है, और यह भी मान ले कि चुनाव विश्वास की जननी है। पौलुस साक्षी देता है कि वह “चुने हुओं के लिए सब कुछ सहने” को तैयार है (2 तीमुथियुस 2:10)। और मसीह ऊँचे स्वर से घोषणा करता है कि पिता परमेश्वर सब चुने हुओं का “पलटा लेनेवाला है” (लूका 18:7)। इसके अतिरिक्त, पौलुस कुलुस्सियों को उपदेश देता है कि वे “परमेश्वर के चुने हुओं के समान जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता” आदि “धारण करें” (कुलुस्सियों 3:12)। एक और स्थान पर प्रेरित चुने हुओं को पाप या दोष के हर आरोप से मुक्त घोषित करता है। “परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा?” रोमियों 8:33। तो क्या विश्वासी इन सब आशीषों से वंचित किए जाएँगे? यह उन वस्तुओं का शत्रुता से भी बुरा बिछोह करना होगा जिन्हें परमेश्वर ने परस्पर और वास्तव में अविभाज्य रूप से जोड़ा है। वरन् “परमेश्वर के चुनाव का उद्देश्य बना रहे,” इसलिए जो कभी अन्धे थे वे विश्वास के लिए “ज्योतिर्मय किए जाते हैं।” उस विश्वास के द्वारा वे मसीह की धार्मिकता पाते हैं; और उसी विश्वास के द्वारा वे “रखे जाते हैं” और “अन्त तक स्थिर रहते हैं।”

जॉर्जियस आगे तर्क करता है: “जब पवित्रशास्त्र नाश होनेवालों पर विनाश का दण्डादेश सुनाता है, तब वह उस विनाश का कारण परमेश्वर की अनन्त मनसा से किसी प्रकार सम्बद्ध या आरोपित नहीं करता, परन्तु घोषणा करता है कि वह नाश होनेवालों पर ही टिकता है।” परन्तु हम त्यागे हुओं को कभी इस प्रकार चित्रित नहीं करते कि वे परमेश्वर के आत्मा से रहित छोड़े गए हैं, जब वह उनके विरोध करनेवाले विवेकों से बात करता है, कि उनके अधर्मों का दोष परमेश्वर पर लगाया जाए। मनुष्य जो भी पाप करें, वे सारा दोष केवल अपने ही ऊपर लें। और यदि कोई अपने पाप के दोष या अपराध से बच निकलने का यत्न करे, तो मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि ऐसा व्यक्ति अपने आपको अपने ही विवेक की जंजीरों से इतनी मज़बूती से बँधा पाएगा कि अपने अपराधों के धर्ममय दण्ड से कभी छूट नहीं पाएगा। आदम जब तक चाहे यह कहकर अपना बचाव करे कि वह उस पत्नी के बहकावे में आ गया जो परमेश्वर ने उसे दी थी। तौभी उसके भीतर ही अविश्वास का घातक विष पाया जाएगा; उसके भीतर ही सब सलाहकारों में निकृष्टतम, भ्रष्ट महत्त्वाकांक्षा पाई जाएगी; उसके भीतर ही परमेश्वर के प्रति शैतानी विद्रोह की जलती मशाल पाई जाएगी! इसलिए वे कहीं अधिक अक्षम्य होंगे जो परमेश्वर की अनन्त मनसा के गहन रहस्यों में से अपने अधर्मों का वह कारण ज़बरदस्ती निकालने का यत्न करते हैं जो अपने ही हृदयों की गहरी भ्रष्टता में से अपना भयानक सिर सदा उठाता रहता है। वे “निकम्मे मन के हवाले किए जाने” के पूर्ण योग्य हैं जिन्होंने परमेश्वर की वैसी महिमा नहीं की जैसी करनी चाहिए थी, जहाँ तक कि वह “उसके बनाए हुए कामों” — आकाश और पृथ्वी — के चिन्तन से जाना जा सकता है। जो लोग जान-बूझकर, सोच-समझकर और द्वेष से मसीह के अनुग्रह को ठुकराते हैं और सुसमाचार की जलती और चमकती ज्योति की ओर पीठ फेरते हैं, वे और भी भारी दण्ड के योग्य हैं। इसलिए प्रत्येक जन अपने पापों को स्वीकार करे और केवल अपने आपको दोषी ठहराए, और हृदय से सारा दोष अपना ही मानकर अपने न्यायी से दया की विनती करे।

यदि कोई त्यागा हुआ जन हुज्जत करे और शोर मचाने को प्रवृत्त हो, तो पवित्रशास्त्र एक तैयार और मुँह बन्द कर देनेवाला उत्तर देता है, “हे इस्राएल, तूने अपना नाश किया है!” (होशे 13:9)। क्योंकि जैसा हमने अपने आरम्भ में कहा था, यदि प्राचीन शास्त्रीय कवि में मेदिया की शिकायत सर्वथा हास्यास्पद है, जब वह विलाप करती है कि अर्गो जहाज़ बनाने के लिए पेलियोन पर्वत से वृक्ष क्यों काटे गए, जबकि सच यह था कि उसके अपने कामी हृदय में जलती प्रेम की ज्वाला ही उसके अपने पिता और अपने सारे राज्य को, अपने साथ, नाश करने का वास्तविक कारण थी; तो उन लोगों के तर्क तो और भी कम सुनने योग्य हैं जो अपने पाप और दोष के दूर के कारण दूर से, यहाँ तक कि बादलों से ही, खींच लाना चाहते हैं; जबकि उसका दृश्य सदा उनकी आँखों के सामने है, जो उनके अपने हृदयों के गहरे जमे स्रोत से निरन्तर फूटता रहता है, और जिसके प्रमाण स्पष्ट और निरन्तर हैं, चाहे वे उन्हें छिपाने का कितना ही यत्न करें। इसलिए पवित्रशास्त्र सब बुराइयों का कारण मनुष्यों के स्वाभाविक पापों को ठहराता है!

सच तो यह है कि मेरे और भिक्षु के बीच बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर के गुप्त न्याय की अनिवार्य आज्ञाकारिता करते हैं, या उसके द्वारा अपने किसी दोष के बिना अनिवार्य रूप से अपने पाप में बहाए जाते हैं, जिसे हम न केवल झूठा सिद्धान्त घोषित करते हैं, परन्तु घृणित और निन्दनीय अपवित्रता मानते हैं; परन्तु हमारे बीच प्रश्न यह है कि क्या वे दुष्ट, जो अपने स्वेच्छा के पापों से अपने विरुद्ध परमेश्वर के कोप को भड़काते हैं, परमेश्वर की ओर से (सब के धर्ममय परन्तु अगम्य कारण के रूप में) “उसकी अपनी इच्छा की मनसा के अनुसार” पहले से त्यागे गए थे। अब जैसे पौलुस मनुष्यों के पापों की कठोर निन्दा करता है, उन्हें उनके अपने विवेक पर बलपूर्वक लगाता है, और साथ ही मनुष्यों की अपवित्र निन्दाओं से परमेश्वर के न्याय का दृढ़ता से समर्थन करता है; वैसे ही वह खुलकर घोषणा करता है और छिपाता नहीं कि जो अपने पापों से अपने आपको विनाश में गिराते हैं, वे “विनाश के लिए तैयार किए गए कोप के पात्र” हैं। मसीह भी त्यागे हुओं पर उनके दोष को जैसा उनके योग्य है वैसा लगाता है। परन्तु साथ ही वह दिखाता है कि सब का बड़ा कारण यह था कि वे “ऐसे पौधे थे जो उसके पिता के हाथ के लगाए हुए न थे।” एक शब्द में, हमें बताया गया है कि पिता ने पुत्र को वे दिए जो उसके थे, कि वह उन्हें पवित्र करे। इसके विपरीत पक्ष में, पौलुस ने दिखाया कि “चुने हुओं ने उसे (अर्थात् “विश्वास की धार्मिकता को”) पाया,” फिर जोड़ता है कि शेष सब अन्धे किए गए। इसलिए जॉर्जियस के सब तर्क व्यर्थ हैं, जो केवल मनुष्यों के प्रकट पापों पर आँखें गड़ाए रखता है, और मानवजाति की सारी दुष्टता के उस छिपे हुए स्रोत, स्वभाव की भ्रष्टता, का कभी विचार नहीं करता!

भिक्षु समझता है कि हम एक बड़ी बेतुकी बात में फँसे हैं क्योंकि हम मनुष्य की इच्छा को पाप करने में स्वतंत्र ठहराते हैं, जबकि त्यागे हुए निश्चय ही अनिवार्यतः पाप करते हैं। परन्तु मनुष्य में इच्छा की वह स्वतंत्रता जिसके विषय में हम बात करते हैं, और जिससे हमारा भिक्षु इतना परिचित बनता है, अन्त में उसके लिए सर्वथा अज्ञात है। अब पौलुस कुछ को “स्वतंत्र” कहता है जो “धार्मिकता से स्वतंत्र” हैं, अर्थात् वे जो परमेश्वर के भय और सब संयम से रहित होकर अधर्म में रंगरलियाँ मनाते हैं। तो क्या इससे यह निकलता है कि ऐसे लोग “पाप के दास” नहीं हैं? हमारा भिक्षु हमें परमेश्वर की सामर्थ्य को सीमित करने और बाँधने का दोष भी लगाता है। “क्योंकि (वह कहता है) यदि परमेश्वर सब होनेवाली बातों को पहले से जानता और ठहराता है, तो उसमें उन्हें बाद में बदलने की सामर्थ्य नहीं।” सचमुच यह एक अद्भुत आश्चर्य है कि परमेश्वर नश्वर मनुष्य के समान नहीं जो सदा लचीला और परिवर्तनशील है, और हर घड़ी अपना मन और अपने उद्देश्य बदलता रहता है! अरे, जिस बात के विरुद्ध भिक्षु इतने उग्र रूप से लड़ता है वही यह है कि आराधना के योग्य परमेश्वर सदा एक ही मन का और अपने आप से संगत है। इसलिए उसका बड़ा भ्रम यह है कि परमेश्वर के अटल आदेशों को उसकी सामर्थ्य से अलग करके वह उसे अपने ही विरुद्ध बँटा हुआ बना देता है। यदि हम स्तोइकों की भाँति बोलते, तो सेनेका की प्रसिद्ध उक्ति के अनुसार कहते, “कि परमेश्वर स्वयं में एक अनिवार्यता है।” परन्तु हम अधिक श्रद्धा और संयम से कहते हैं “कि परमेश्वर सदा एक ही बात चाहता है; और यही उसकी अपरिवर्तनीयता की प्रशंसा है।” इसलिए वह जो कुछ ठहराता है, उसे पूरा करता है; और यह उसकी सर्वशक्तिमत्ता के साथ ईश्वरीय संगति में है। और परमेश्वर की इच्छा, इस प्रकार उसकी सामर्थ्य से अविभाज्य रूप से जुड़ी होकर, उसके गुणों की ऐसी उच्च संगति स्थापित करती है जो उस ईश्वरीय व्यवस्था के योग्य है जिसके द्वारा स्वर्ग और पृथ्वी की सब वस्तुएँ चलाई जाती हैं।

इस अभागे व्यक्ति के पवित्रशास्त्र की साक्षियों पर साक्षियाँ ढेर करने के व्यर्थ प्रदर्शन के विषय में, जिनका आपस में कोई सम्बन्ध नहीं और जिनके अर्थ और प्रयोग प्रायः विपरीत हैं; इस सब पर मैं अत्यल्प ध्यान देता हूँ। परन्तु यद्यपि मैं उसकी अज्ञानता को अनदेखा करने को तैयार हूँ, मैं उसकी ढिठाई पर लगाम लगाने को उत्सुक हूँ, ताकि वह सरल मन के लोगों को कष्ट न दे। प्रेरित पौलुस के एक स्थल से यह दिखाने के बाद कि परमेश्वर उन पर जो सत्य को ग्रहण नहीं करते “बड़ा भ्रम भेजता है कि वे झूठ की प्रतीति करें” (2 थिस्सलुनीकियों 2:10, 11); वह इसके पीछे एक और स्थल ले आता है जिसका सन्दर्भ बिलकुल भिन्न है, जहाँ प्रेरित कहता है कि सुसमाचार की शिक्षा “नाश होनेवालों के लिए ढकी हुई है; जिनके विषय में इस संसार के ईश्वर ने अविश्वासियों की बुद्धि को अन्धा कर दिया है” (2 कुरिन्थियों 4:3, 4)। मैं मानता हूँ कि इन अन्धों को “विश्वास न करनेवाले” कहा गया है। परन्तु यदि इन जनों के अन्धेपन का एकमात्र कारण अविश्वास है, तो उन शब्दों का क्या अर्थ है जो तुरन्त आगे आते हैं, “परमेश्वर ने, जिसने कहा कि अन्धकार में से ज्योति चमके, हमारे हृदयों में ज्योति चमकाई है”? हम जानते हैं कि अन्धकार सर्वत्र राज्य करता है; परन्तु यहाँ हम देखते हैं कि अन्धकार में से ज्योति केवल परमेश्वर ही निकालता है।

जॉर्जियस हम पर निर्दयता का दोष भी लगाता है और कहता है कि हम अपने और बहुतों के विरुद्ध उद्धार का मार्ग रोकते हैं, जबकि स्वयं मसीह कनानी स्त्रियों और “खोई हुई भेड़ों”, यहाँ तक कि “पराए कुत्तों” को भी बड़ी कृपा से बुलाता है — इस सब के उत्तर में हम कहते हैं कि हम सब मनुष्यों के सामने विश्वास और पश्चाताप की शिक्षाएँ विश्वासयोग्यता से रखते हैं, कि सब मनुष्य (यदि परमेश्वर चाहे) मसीह से लाभ पाएँ। जब जब्दी की पत्नी ने हमारे प्रभु से विनती की कि वह उसके एक पुत्र को अपनी दाहिनी ओर और दूसरे को बाईं ओर बैठाए, तब इस मूर्खतापूर्ण और असामयिक अभिलाषा को रोकने के लिए हमारे प्रभु ने घोषणा की कि ऐसी इच्छा उसकी वर्तमान दशा और बुलाहट के अनुकूल नहीं; और साथ ही उसने अस्पष्ट नहीं, परन्तु स्पष्ट संकेत दिया कि उसके स्वर्गीय पिता की ओर से हर एक के लिए एक स्थान ठहराया गया है, जो अपने समय पर प्रकट किया जाएगा। इसी रीति से मनुष्यों के उस अन्धविश्वास को भी, जो भविष्य की घटनाओं और परिणामों पर (जो केवल परमेश्वर के हाथ में हैं) अटकता है, और जो पवित्रशास्त्र में इतने स्पष्ट रूप से प्रकट है, हमें सदा उजागर करना चाहिए, और अपनी चुप्पी से उसे प्रश्रय नहीं देना चाहिए। क्योंकि जब तक परिणामों के प्रकट होने का दिन न आए, हमारा कर्तव्य यह है कि जो परमेश्वर ने आज्ञा दी है वही करें: बिना अपवाद के सब मनुष्यों को पश्चाताप और विश्वास के लिए उपदेश दें। क्योंकि सुसमाचार की शिक्षा और प्रचार सब मनुष्यों के लिए है और सब मनुष्यों के लाभ के लिए है; और इन्हीं उद्देश्यों के लिए वे हमें सौंपे गए हैं कि हम उन्हें खुले रूप से घोषित करें, तब तक कि त्यागे हुए लोग अपनी शोचनीय हठ से हमारे मार्ग को रोककर द्वार बन्द न कर दें।

हमारी साक्षी से पूर्वनियति के सिद्धान्त को, जो पवित्रशास्त्र के अनेक स्थलों की बहुगुणित साक्षी से पुष्ट है, स्वीकार करने को विवश पाकर जॉर्जियस एक नई हुज्जत मैदान में फेंकता है, जिससे अधिक मूर्खतापूर्ण या अधिक सड़ी हुई कोई बात कल्पना भी नहीं की जा सकती: “कि नए नियम के विश्वासी परमेश्वर की ओर से ‘चुने हुए’ कहे जाते हैं, इस अर्थ में कि वे वे हैं जिन पर परमेश्वर ने उस भेद की सम्पत्ति प्रकट की जो युगों से छिपा था।” इस अर्थ को, जो वह अपनी ही मूर्खतापूर्ण गढ़न से विषय पर लगाता है, पुष्ट करने के लिए वह पवित्रशास्त्र के उन सब स्थलों को इकट्ठा करता है जो मसीह के द्वारा प्रकट किए गए अनुग्रह की उत्कृष्टता बताते हैं। और तब वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इफिसियों की पत्री के पहले अध्याय में जो कुछ है उसका कोई और उद्देश्य नहीं सिवाय यह दिखाने के कि परमेश्वर ने नए नियम के विश्वासियों को यह विशेष निधि देकर प्रतिष्ठित करना स्वीकार किया। और जब उससे कहा जाता है कि बताए कि यह अनुग्रह किस समय को लक्षित करता है, तो वह कहता है कि वह सब मनुष्यों के लिए बिना भेद मसीह के आने से जगत के अन्त तक सामान्य किया गया।

परन्तु पौलुस के शब्द इस अनुग्रह की एक बहुत भिन्न सीमा दिखाते हैं। पौलुस की साक्षी का सार यह है कि केवल वे ही विश्वास के लिए ज्योतिर्मय किए जाते हैं जो “परमेश्वर की अनन्त प्रसन्नता के अनुसार” अनन्त जीवन के लिए पूर्वनियत किए गए थे। और इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि सुसमाचार के पहले प्रचार के समय कुछ जनों की एक विशेष बुलाहट थी। और सुसमाचार सब के लिए प्रकाशित भी नहीं किया गया था। और मान लें कि यह मान भी लिया जाए कि बाहरी वाणी से घोषित होकर वह सब के कानों में पड़ा; तौभी पौलुस की साक्षी एक कहीं अधिक गहरी बुलाहट की ओर संकेत करती है, उस बुलाहट की ओर जिससे परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों के हृदयों में प्रवेश करता है। परन्तु जब हम बाहरी और भीतरी तथा प्रभावकारी बुलाहट के बीच यह महान भेद करते हैं, तो ऐसा भेद जॉर्जियस के लिए सब स्वप्न है! परन्तु इस भेद को करना तुच्छ बात है या गम्भीर, इसका विश्वास का अनुभव एक भरपूर समझ देता है। इसके अतिरिक्त, प्रेरित इफिसियों की इस पत्री में चुनाव की चर्चा किसी और अर्थ में या किसी और उद्देश्य से नहीं करता, जैसे वह अन्यत्र करता है, जैसे (2 थिस्सलुनीकियों 2:13) जब वह “परमेश्वर का धन्यवाद करता है, कि उसने आरम्भ से थिस्सलुनीकियों को उद्धार के लिए चुन लिया।” और स्मरण रहे, पौलुस यहाँ विश्वासियों की एक छोटी मण्डली को दुष्टों की भीड़ से अलग कर रहा है।

भिक्षु यहाँ उत्तर देगा, “कि अनुग्रह के उच्छृंखल तिरस्कारी, जब उनकी बात की जाती है, सदा चुने हुओं के विपरीत प्रस्तुत किए जाते हैं।” परन्तु इसका वर्तमान विषय से कुछ भी सम्बन्ध नहीं; क्योंकि मैं वर्तमान उदाहरण में जिस बात के लिए तर्क कर रहा हूँ वह केवल यह है कि कुछ लोग परमेश्वर की ओर से दूसरों की अपेक्षा विशेष रूप से चुने गए हैं। जबकि जॉर्जियस इसके विपरीत बकता चला जाता है कि हम केवल एक निश्चित समय में जन्म लेने के लिए पूर्वनियत हैं, अर्थात् मसीह के आने के बाद, जैसा वह ऊपर तर्क करता है। तब त्यागे हुए यहूदा का क्या हाल है, जिसके विषय में मसीह घोषणा करता है कि वह चुने हुओं में से नहीं था, परन्तु “उसमें शैतान था,” यद्यपि उसने अपने ईश्वरीय स्वामी के वचन सुने थे और उसकी घरेलू संगति का आनन्द लिया था? परन्तु मसीह तुरन्त और स्पष्ट रूप से जोड़ता है, “मैं तुम सब के विषय में नहीं कहता: जिन्हें मैंने चुन लिया है उन्हें मैं जानता हूँ” (यूहन्ना 13:18)। परन्तु यदि हमें इस उन्मादी व्यक्ति की सुननी है, तो हेरोदेस की दशा, जो मसीह के बाद हुआ, दाऊद की दशा से, जो मसीह से पहले हुआ, उत्तम थी; और उसके अनुसार दुष्ट शास्त्री और फरीसी चुनाव के सम्मान में पवित्र भविष्यद्वक्ताओं से आगे होंगे! क्योंकि वह कहेगा कि भविष्यद्वक्ता अपनी आयु और समय के कारण चुने हुए विश्वासियों की संख्या में नहीं थे। वरन् वह सर्वत्र चिल्लाता है कि चुनाव का अनुग्रह सामान्यतः किसी एक युग का है। एक शब्द में, वह अपने आपको इस बात की प्रतिभूति के रूप में प्रस्तुत करता है कि प्रेरित ने कहीं भी पूर्वनियति के विषय में अन्यथा नहीं कहा। क्या! क्या प्रेरित अपने ही युग के सब मनुष्यों को सम्मिलित करता है, जब वह कहता है, “जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी”? क्या! क्या वह मनुष्यों की सामान्य भीड़ से उन्हें अलग नहीं करता जिनके विषय में वह कहता है कि वे “उसकी मनसा के अनुसार बुलाए हुए” हैं? अन्त में, जब प्रेरित अन्यत्र कहता है, “परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है कि बुद्धिमानों को लज्जित करे (1 कुरिन्थियों 1:27), तो क्या वह ऐसा प्रकट भेद करते हुए यह चाहता है कि उसके शब्द उसकी सारी पीढ़ी पर लागू हों?

परन्तु अपने आपको अब भी सत्य के जाल में उलझा पाकर वह बच निकलने का एक और मार्ग पकड़ता है: “कि वे चुने हुए नहीं कहलाते जिन्हें परमेश्वर ने दूसरों से ऊपर ठहराया, परन्तु वे जो सामान्य चुनाव और अनुग्रह में स्थिर रहते हैं।” इसका उसका अभिप्राय यह है कि परमेश्वर की दृष्टि में अन्त में वही चुने हुए गिने जाते हैं जो अपने विश्वास की स्थिरता से अपने आपको मनुष्यों की सामान्य भीड़ से अलग करते हैं। प्रेरित पौलुस का जो स्थल वह अपने सिद्धान्त को प्रमाणित करने के लिए प्रस्तुत करता है, यह है: “मैं परमेश्वर और चुने हुए स्वर्गदूतों के सामने तुझे आदेश देता हूँ।” अब भिक्षु इस स्थल से जो बात अपने लिए मनवाना चाहता है वह यह है कि चूँकि चुने हुए स्वर्गदूत धर्मत्यागी स्वर्गदूतों के साथ अलग होकर गिरे नहीं, इसलिए उन्होंने ऐसी उच्च योग्यता के द्वारा अपने लिए चुनाव का अनुग्रह प्राप्त किया। परन्तु मान लें कि हम इसके विपरीत यह कहें कि वे इसलिए स्थिर रहे कि वे चुने हुए स्वर्गदूत थे, तो ऐसा कथन सत्य के कितना अधिक निकट होगा!

जब मसीह भविष्यवाणी करता है कि शैतान का भ्रम इतना बड़ा होगा कि यदि हो सके तो “चुने हुओं” को भी “भरमा ले,” तब वह यह असम्भवता प्रकट करता है कि शैतान जो भी बल प्रयोग करे, कभी चुने हुओं को बहका ले जाए। तब हम किस सामर्थ्य से यह मानें कि चुने हुए इस प्रकार सुरक्षित रहेंगे? जॉर्जियस स्वप्न देखता है, अपनी ही शक्ति से! परन्तु मसीह की निश्चित घोषणा इससे कितनी भिन्न है: “कोई (वह कहता है) उन भेड़ों को मेरे हाथ से छीन न सकेगा जो मेरे पिता ने मेरी देख-रेख में सौंपी हैं। मेरा पिता, जिसने उन्हें मुझे दिया है, सब से बड़ा है; और कोई उन्हें मेरे पिता के हाथ से छीन नहीं सकता” (यूहन्ना 10:29)। उसी रीति से प्रेरित विश्वासियों को अपनी ही विश्वासयोग्यता पर निर्भर रहने की सराहना कदापि नहीं करता; परन्तु इसके विपरीत वह उन्हें स्मरण दिलाता है कि “परमेश्वर विश्वासयोग्य है, जिसने उन्हें बुलाया है: वही इसे पूरा भी करेगा” (1 थिस्सलुनीकियों 5:24)। परन्तु भिक्षु प्रत्येक जन को उसके अपने चुनाव का कर्ता और व्यवस्थापक बनाता है। जबकि मसीह निश्चित रूप से घोषणा करता है कि जिन्हें उसने जगत में से चुन लिया है वे उसके अपने हैं (यूहन्ना 15:19)। मसीह की इस घोषणा के पूर्ण सामंजस्य में पौलुस ऊँचे स्वर से कहता है कि “जो परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, अर्थात् जो उसकी मनसा के अनुसार बुलाए हुए हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं” (रोमियों 8:28)। और वह उसी महान सत्य को उतने ही ऊँचे स्वर से उन बच्चों के विषय में कहता है जो अभी जन्मे भी नहीं थे: “कि परमेश्वर की मनसा बनी रहे; कर्मों से नहीं, परन्तु उसके बुलानेवाले से। जैसा लिखा है, मैंने याकूब से प्रेम किया, परन्तु एसाव से बैर” (रोमियों 9:11-13)। तब भिक्षु यहाँ किस अनिवार्यता में धकेला जाता है? अरे, इस निकम्मे व्यक्ति को अपने सिद्धान्त के अनुसार निश्चय ही यह प्रमाणित करना पड़ेगा कि याकूब ने, अपनी माता के गर्भ में बन्द रहते हुए भी, अपने लिए, अपने ही परिश्रम से, अपने ही चुनाव का सम्मान प्राप्त किया; और कि वह अपनी ही विश्वासयोग्यता से अन्त तक उसके अधिकार में बना रहा।

भिक्षु के इस विवाद में भी उतनी ही सामान्य बुद्धि और सामान्य समझ है, “कि वह त्यागा जाना, जिसके विषय में पौलुस कहता है, अलग-अलग व्यक्तियों से नहीं, परन्तु यहूदी लोगों की सारी देह से सम्बन्धित था।” क्योंकि उस स्थल की उसकी व्याख्या यह है कि यहूदी जाति ने मसीह को ठुकराकर अपने आपको अनन्त जीवन की मीरास से वंचित कर लिया। अब मैं यह मानने को स्वतंत्र हूँ कि इसी एक बात पर इस महान विषय के सम्बन्ध में सारे विवाद का कारण टिका है। परन्तु कोई भी स्वस्थ मन का मनुष्य यह निष्कर्ष नहीं निकालेगा या यह नहीं मानेगा कि सारा महान प्रश्न इन संकरी सीमाओं में बँधा है। क्योंकि पहली बात तो यह कि प्रेरित पौलुस स्पष्ट सिखाता है कि अब्राहम की पीढ़ी में चुने हुए और त्यागे हुए दोनों प्रकार के जन आपस में मिले-जुले थे। और दूसरी बात यह कि वही प्रेरित सामान्यतः घोषणा करता है कि मानवजाति की मिली-जुली भीड़ में से जन्म के द्वारा, भिन्न वर्गों के रूप में, “कोप के पात्र” और “दया के पात्र” उत्पन्न होते हैं, परमेश्वर की महिमा के प्रकट होने के लिए।

पौलुस सचमुच इस्राएल के त्यागे जाने का पहला निकटतम कारण उनका सुसमाचार पर विश्वास न करना बताता है। कि यह कारण प्रेरितों द्वारा स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है, इससे मैं किसी प्रकार इनकार नहीं करता। परन्तु स्मरण रहे, वह पहले परमेश्वर के गुप्त न्यायों के विषय में महान सिद्धान्त स्पष्ट रूप से स्थापित करता है। प्रेरित दो बातों पर स्पष्ट रूप से बल देता है। पहली, कि परमेश्वर कभी किसी एक लोग से इतना बँधा न था कि उसका स्वतंत्र चुनाव कुछ व्यक्तियों के चुनने या त्यागने में राज्य करने से रुक जाए। और दूसरी, कि यहूदियों ने अपनी कृतघ्नता से अपने आपको परमेश्वर के घराने से बाहर कर लिया, जबकि वे अनन्त जीवन की वाचा के विशेष उत्तराधिकारी थे। परन्तु इसलिए कि यहूदियों के इस बाद के त्यागे जाने से परमेश्वर की गुप्त मनसा के हिलने का जो आभास होता है, उससे परमेश्वर के उद्देश्यों में परिवर्तन का आभास किसी के मन को व्याकुल न करे, प्रेरित इस परिणाम से बचाव उस उपयुक्त घोषणा के द्वारा करता है कि “परमेश्वर के वरदान और बुलाहट अटल हैं” (रोमियों 11:29), और इसलिए “अनुग्रह से चुने जाने के अनुसार बचे हुए लोग” उद्धार पाएँगे (रोमियों 11:5)। इन शब्दों से प्रेरित का अभिप्राय यह है कि परमेश्वर का चुनाव, जो उसकी गुप्त मनसा में स्थित है, दृढ़ और अटल बना रहता है।

परन्तु इस निकम्मे मनुष्य की ढिठाई अपने आपको और भी नीचता से प्रकट करती है जब वह घोषणा करता है कि एसाव अपनी पहलौठे की जन्मसिद्ध मीरास बेचने से पहले त्यागा नहीं गया था। मैं प्रेरित की उस साक्षी को सहर्ष स्वीकार करता हूँ जहाँ वह कहता है कि एसाव के अपने आपको अपनी मीरास से वंचित कर लेने के बाद वह ठुकरा दिया गया (इब्रानियों 12:17)। परन्तु क्या हमें यह मानना चाहिए कि उसके पिता इसहाक की ओर से उसका वह त्यागा जाना, जिसे वह तब भोग रहा था, परमेश्वर के उस पूर्व न्याय और उद्देश्य को, जो उसके त्यागे जाने का मूल कारण था, पूरी तरह रद्द कर देता है? निश्चय ही नहीं। उतना ही नहीं जितना याकूब का विश्वास और आज्ञाकारिता उसके परमेश्वर की ओर से स्वतंत्र और अनन्त गोद लिए जाने को रद्द नहीं करती।

जिस टिप्पणी से मैंने इस विवाद का आरम्भ किया था, उसे मैं अब इसके अन्त में दोहराता हूँ: कि जो सिद्धान्त मैंने यहाँ प्रस्तुत किया है उसका खण्डन करने का प्रयास कोई नहीं करेगा सिवाय उसके जो अपने आपको परमेश्वर के आत्मा से अधिक बुद्धिमान समझे। परन्तु आजकल मनुष्यों का खट्टा विरोध इतनी ऊँचाई पर पहुँच गया है कि वे उसे भी, जो प्रकट रूप से स्वयं पवित्रशास्त्र से लिया गया है, स्वेच्छा से और शान्ति से ग्रहण नहीं करते, जब तक कि वे दूसरों पर बोलने और चुप रहने की व्यवस्था थोपकर परमेश्वर के विशेषाधिकार अपने ऊपर न ले लें। और फिर भी इन ढीठों में से कुछ अपने वास्तविक सिद्धान्तों को नम्रता के वेश में छिपाना चाहते हैं, यह जताते हुए कि वे अपनी ओर से उसका इनकार करने का साहस नहीं करेंगे जिसकी साक्षी परमेश्वर के सब सेवकों ने दी है। मैं अपनी ओर से गम्भीरता और श्रद्धा से घोषणा करता हूँ कि मैं नम्रता की कोई और व्यवस्था नहीं जानता सिवाय उसके जो मैंने अपने स्वर्गीय स्वामी की पाठशाला में सीखी है! फिर भी मैं भली-भाँति जानता हूँ कि मनुष्यों को परम पवित्र विश्वास में उन्नत करने के लिए सब बातों को संयमित करने में हर सम्भव विवेक अपनाया जाना चाहिए। परन्तु जैसा मैंने अपनी सारी सेवकाई में और इस वर्तमान ग्रन्थ में भी विश्वास और शुद्ध विवेक के साथ ऐसा करने का यत्न किया है — यदि कुछ लोगों की बारीक आपत्तियाँ अभी सन्तुष्ट नहीं हुईं, तो मैं अपनी ओर से अनुभव करता हूँ कि मैंने अपना कर्तव्य पूरा किया है। जिसके सुनने के कान हों वह सुन ले।”

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