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खण्ड VII. "एक संक्षिप्त उत्तर . . ."
परमेश्वर की अनन्त पूर्वनियति - खण्ड 7 - एक संक्षिप्त उत्तर
किसी तुच्छ मनुष्य की एक मूर्खतापूर्ण लिखित पुस्तिका मेरे मार्ग में आ पड़ी है, जो अपनी सारी नीचता के होते हुए भी परमेश्वर की महिमा का रक्षक और प्रतिशोधी होने का दम भरता है, और इसके लिए वह ईश्वरीय सिद्धान्त और शिक्षा के विरुद्ध युद्ध छेड़ता है: "कि जगत पर परमेश्वर का शासन ऐसा है कि उसमें कुछ भी नहीं होता सिवाय उसकी गुप्त युक्ति और आज्ञा के द्वारा।"
इस बीच यह अभागा प्राणी यह नहीं देखता कि जब वह परमेश्वर की धार्मिकता को दोषारोपण से मुक्त करने के छलपूर्ण बहाने पकड़ रहा है, तब वह उसकी सामर्थ्य को पूरी तरह उलट रहा है; यह सब मानो स्वयं परमेश्वर को टुकड़े-टुकड़े करने का प्रयत्न है। परन्तु अपनी अपवित्रता को रंग देने के लिए वह अपने उपक्रम की भूमिका में, जितनी दुष्टता से उतनी ही द्वेषपूर्ण रीति से, यह टिप्पणी जड़ता है: "कि परमेश्वर बुराई का कारण नहीं है; और न वह पाप की इच्छा करता है।" मानो जब हम परमेश्वर के लिए सब शासन की सर्वोच्चता का दावा करते हैं, तब हम यह कहते हों कि वही पाप का रचयिता है!
अब यह प्रकट है कि इस वाक्य के द्वारा जॉन कैल्विन पर आक्रमण किया गया है। परन्तु यह सर्वविदित है कि जॉन कैल्विन उस ईश-निन्दा से इतनी दूर है जिसका आरोप यह तुच्छ प्राणी उस पर लगाना चाहता है, कि उसकी द्वेष-भावना से अपनी रक्षा के लिए उसे किसी लम्बे बचाव की आवश्यकता नहीं।
जॉन कैल्विन अपनी सारी रचनाओं में, जहाँ कहीं पाप की चर्चा होती है, निरन्तर ऊँचे स्वर से घोषणा करता है कि परमेश्वर का नाम पाप के साथ मिलाया या उल्लेख नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव के अनुकूल सत्यनिष्ठा और न्याय के सिवाय कुछ भी नहीं है। तब यह कितनी घृणित निन्दा है कि एक ऐसे मनुष्य को, जो इतने समय से परमेश्वर की कलीसिया का हितकारी रहा है, परमेश्वर को पाप का रचयिता ठहराने के अपराध में फँसाया जाए!
इस द्वेषपूर्ण निन्दा का पात्र निश्चय ही अपनी सब रचनाओं में यह पुष्टि करता है कि परमेश्वर की इच्छा के बिना कुछ नहीं होता! परन्तु साथ ही वह यह भी दृढ़ता से कहता है कि जो कार्य मनुष्यों के द्वारा दुष्टता से किए जाते हैं, वे परमेश्वर की गुप्त युक्ति के द्वारा इस प्रकार नियन्त्रित होते हैं, कि उस युक्ति का मनुष्यों की पापमयता से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं।
इस निन्दित जन की शिक्षा का सार यह है कि परमेश्वर आश्चर्यजनक रीतियों से, और ऐसी रीतियों से जो हमारे लिए अज्ञात हैं, सब बातों को उस अन्त की ओर निर्देशित करता है जो वह चाहता है, ताकि उसकी अनन्त इच्छा ही सब वस्तुओं का प्रथम कारण ठहरे। परन्तु परमेश्वर वह क्यों चाहता है जो हमें उसके स्वभाव के विपरीत प्रतीत हो सकता है, इसे वह निन्दित जन अगम्य मानकर स्वीकार करता है! और इसलिए वह ऊँचे स्वर से घोषणा करता है कि परमेश्वर के कार्यों के क्यों? की ढिठाई या कौतूहल से छानबीन नहीं करनी चाहिए; वरन्, जैसे परमेश्वर की युक्तियाँ एक अथाह गहराई हैं और ऐसे रहस्य हैं जो हमारी समझ की सीमाओं से परे हैं, वैसे ही मनुष्य को उचित है कि उन्हें दुस्साहस से जाँचने के बजाय श्रद्धा से दण्डवत् करे।
इस बीच इस सारी घृणित निन्दा का पात्र एक पवित्र सिद्धान्त के रूप में यह मानता है कि यद्यपि परमेश्वर की युक्तियों का कारण छिपा और अज्ञात है, तौभी उसकी धार्मिकता की उच्च स्तुति सदा परमेश्वर को ही दी जानी चाहिए, क्योंकि उसकी इच्छा सब न्याय का सर्वोच्च नियम है, और होनी ही चाहिए! इसलिए जो कोई भी हो, जो इन बातों को निरन्तर सिखानेवाले मनुष्य पर परमेश्वर को पाप का रचयिता बनाने जैसा इतना भयंकर आरोप लादना चाहता है, वह पहले यह प्रमाणित करने का भार अपने ऊपर ले कि जब उन दुष्ट मनुष्यों ने मसीह को क्रूस पर चढ़ाकर "वही किया जिसे तेरे हाथ और तेरी युक्ति ने पहले से ठहरा दिया था कि वह हो," तब उन्होंने परमेश्वर को अपनी दुष्टता का भागी बना दिया और उसे अपने अपराध के अंश में उलझा लिया! "वही जो तेरे हाथ और तेरी युक्ति ने पहले से ठहराया था कि हो" ये शब्द कैल्विन के नहीं हैं (यह स्मरण रहे), वरन् पवित्र आत्मा के, और पतरस के, और सारी आदि कलीसिया के हैं (प्रेरितों के काम 4:28)।
इसलिए ये अनुचित और असंयत मनुष्य पवित्र आत्मा की शुद्ध और निर्मल शिक्षा को अपनी अशुद्धता और मलिनता से दूषित करना और इस प्रकार भोले लोगों की आँखों को अन्धा करना छोड़ दें; ऐसा न हो कि अनुभवहीन लोग, जो प्रश्न के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझते, पाप का उल्लेख सुनकर परमेश्वर को पाप का रचयिता बनाने की उस भयानक और घृणित चट्टान से जा टकराएँ! जब दाऊद ने शिकायत की कि वह चारों ओर अपने शत्रुओं की अन्यायपूर्ण हिंसा से दबाया गया है, तब भी वह यह जोड़ने से नहीं चूकता, "कि यह सब परमेश्वर ने किया है!" जब अय्यूब लुटेरों के द्वारा अपनी सम्पत्ति से वंचित किया गया और शैतान के द्वारा सताया गया, तब वह भी स्वीकार करता है कि ये सब विपत्तियाँ उस पर परमेश्वर की ओर से आईं! यदि कोई उत्तर दे, "कि इस प्रकार तो परमेश्वर पाप का रचयिता बन जाता है," तो वह परमेश्वर के पवित्र भविष्यद्वक्ताओं और स्वयं पवित्र आत्मा से युद्ध करे। परन्तु पवित्र भविष्यद्वक्ताओं और पवित्र आत्मा के साक्षियों ने उस पवित्र भेद को दृढ़ता से थामे रखा कि यद्यपि सब कुछ इस प्रकार परमेश्वर के ठहराए जाने के अनुसार हुआ, तौभी जो कुछ परमेश्वर चाहता या ठहराता है वह धर्मी और न्यायपूर्ण है; और उन्होंने समान स्पष्टता और दृढ़ता के साथ ऊसको सब से ऊपर रखा, जो अपने गुप्त और प्रभुतासम्पन्न राज्य से स्वयं शैतान और सब दुष्टों पर शासन करता है।
यदि जॉन कैल्विन ने इतना ही कहा होता, तो अब तक दिया गया यह संक्षिप्त उत्तर इस तुच्छ प्राणी की अधर्मी निन्दा का खण्डन करने के लिए पर्याप्त हो सकता था, जो जान-बूझकर और विकृत भाव से उसके विचारों और शिक्षा को बिगाड़ता और कुरूप बनाता है। परन्तु इस निन्दक के उद्देश्य और लक्ष्य और भी पूरी तरह प्रकट हो जाएँ, इसके लिए यदि हम उसके द्वेषपूर्ण धुएँ के कुछ और उठते हुए बादलों को देख लें, तो शायद समय और परिश्रम व्यर्थ न जाएगा। अब चूँकि इस निरर्थक प्राणी का उद्देश्य परमेश्वर को उसके सर्वोच्च शासन और प्रभुता से वंचित करना है, और चूँकि वह पूरी निर्लज्जता के साथ एक ही वार में उस सिद्धान्त को काट डालता है कि परमेश्वर का संकल्प सब वस्तुओं का प्रथम कारण है; इसलिए मैं संक्षेप में उन कुछ मध्यवर्ती कारणों और युक्तियों को पकड़कर जाँचूँगा जो वह प्रस्तुत करता है।
यह भ्रष्ट प्राणी दावा करता है कि प्लेटो के विचार मेरे विचारों से कहीं ऊँचे थे, क्योंकि वह परमेश्वर को पाप का रचयिता कहलाने नहीं देता। जबकि इस प्राणी को वास्तव में यह पता ही नहीं कि प्लेटो क्या सोचता या कहता है। और इस अपवित्र लिखनेवाले को "बुराई" शब्द ही इतना घृणित लगता है कि वह साफ़ इनकार करता है कि वे असंख्य "बुराइयाँ", जिनके हम सब पात्र हैं, परमेश्वर से आती हैं। यह तो परमेश्वर को जगत के न्यायी के उसके पद से एक ही बार में वंचित कर देना है, इससे कम या अधिक कुछ नहीं! परन्तु जब कैल्विन, और उससे पहले लूथर और बूसर, और उनसे भी पहले अगस्तीन और अन्य भक्त शिक्षक यह गवाही देते हैं कि परमेश्वर की इच्छा जगत की सब वस्तुओं का सर्वोच्च कारण है, तब उनमें से प्रत्येक के, और सब के, मन में परमेश्वर को किसी भी दोष की छाया में उलझाने की बात सम्भव सीमा तक दूर थी। और जहाँ तक कैल्विन का सम्बन्ध है, वह अपनी सब रचनाओं में परमेश्वर की निरंकुश, अथवा अत्याचारी, सामर्थ्य की उस धारणा को, जो दर्शन-बघारनेवाले धर्मविज्ञानियों ने अपनी पाठशालाओं में फैला रखी है, तीव्र उत्साह के साथ अस्वीकार करता और घृणित घोषित करता है। और इस कारण से: क्योंकि परमेश्वर की सामर्थ्य उसकी अनन्त बुद्धि से अलग नहीं की जानी चाहिए, और न की जा सकती है। इस गवाही से इस अशुद्ध कुत्ते का निर्लज्ज भौंकना तुरन्त खण्डित हो जाता है, जब वह मसीह की कलीसिया के ईमानदार और विश्वासयोग्य शिक्षकों के मुँह से ऐसी बातें कहलवाता है जो ईश-निन्दात्मक, घृणित और पहले कभी न सुनी गई हैं, और जो अन्त में, अपनी द्वेषपूर्णता के बराबर निरर्थकता के साथ, उसके अपने ही मस्तिष्क की दुष्ट कार्यशाला से निकाली गई हैं!
यह सारी घृणित निन्दा उगलने के बाद, यह अशुद्ध प्राणी यह प्रमाणित करने का दावा करता है कि परमेश्वर बुराइयों का कारण नहीं है — पहले प्रकृति की व्यवस्था से, और फिर दिव्य प्लेटो के अधिकार से, जैसा कि वह उसे कहता है, जिसके द्वारा (वह कहता है) परमेश्वर भलाई का कारण कहा गया है। सारे मामले का समाधान नितान्त सरल है। जिस सत्यनिष्ठा को हम परमेश्वर में मानते हैं, उसकी छाप भले और बुरे के सारे स्वाभाविक ज्ञान पर लगी है। इसलिए जितना कोई अपना जीवन प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार ढालता है, उतना वह परमेश्वर के स्वभाव को प्रकट करता है। क्योंकि धार्मिकता परमेश्वर को उतनी ही प्रिय है जितना अधर्म उसके लिए घृणित है। परन्तु जो कुछ मनुष्य के द्वारा दुष्टता से किया जाता है, उस सब पर वह अपनी गुप्त युक्ति से कैसे शासन और नियन्त्रण करता है, यह निश्चित करना हमारा काम नहीं है; परन्तु यह निश्चय रखना और घोषणा करना हमारा काम है कि परमेश्वर जो कुछ करता है उसमें वह अपनी सिद्ध धार्मिकता से कभी विचलित नहीं होता!
इस तुच्छ प्राणी के दूसरे तर्क का भी मैं यही उत्तर देता हूँ। परमेश्वर का यह उदात्त योद्धा यह प्रश्न उठाता है: यदि परमेश्वर पाप का रचयिता है (जैसा कि वह दावा करता है कि हम कहते हैं), तो वह पाप के किए जाने को कभी रोकता ही क्यों है? वह मनुष्यों की गर्दन पर से लगाम पूरी तरह क्यों नहीं ढीली छोड़ देता? अब परमेश्वर को पाप का रचयिता बनाए जाने के विषय में इस कुत्ते के भौंकने का क्या अर्थ है? सच तो यह है कि यह आदमी अपनी ही कल्पना में राक्षस गढ़ता है ताकि उनसे लड़ने की कीर्ति पा सके। तब क्या होगा यदि मैं उस प्रश्न को, जो परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता के समर्थन में सचमुच पूछा जा सकता है, बिलकुल भिन्न रीति से उलटकर पूछूँ: यदि परमेश्वर नहीं चाहता कि जो हो रहा है वह हो, तो वह उसे होने से रोकता क्यों नहीं? वह मनुष्यों की गर्दन पर लगाम क्यों छोड़ देता है कि वे उसे करें? परन्तु इस प्रकार के आलंकारिक विरोध और विरोधाभास से हम तुरन्त उसका सार निकाल सकते हैं जिसकी गवाही अगस्तीन देता है: "परमेश्वर एक गुप्त और आश्चर्यजनक रीति से उन बातों की न्यायपूर्वक इच्छा करता है जिन्हें मनुष्य अन्यायपूर्वक करते हैं। यद्यपि अपनी उस इच्छा के अनुसार, जो उसकी व्यवस्था में सच्चाई से व्यक्त है, वह अधर्म से घृणा करता है और केवल सत्यनिष्ठा में ही प्रसन्न होता है। और इसी सोते से वे सब श्राप बहते हैं जो व्यवस्था के साथ जोड़े गए हैं। क्योंकि यदि अधर्म उसे अप्रिय न होते, क्योंकि वे उसके स्वभाव के सर्वथा विपरीत हैं, तो वह न दण्डों की घोषणा करता और न उन्हें माँगता।" इसलिए जो कुछ इस तुच्छ प्राणी ने परमेश्वर को (जैसा वह सोचता है) अपमान से मुक्त ठहराने के लिए ढेर लगाया है, वह सब नितान्त अनावश्यक और व्यर्थ है। और वास्तव में, वह स्वयं ही परमेश्वर पर अपमान का विचार डालता रहता है, जबकि वह एक सन्देहपूर्ण मामले में (जैसा वह सोचता है) परमेश्वर को भला दिखाने के लिए चिन्तापूर्वक परिश्रम कर रहा है।
थक जाने तक अपनी गालियाँ बकते रहने के बाद, हमारा पवित्र योद्धा कुछ और निकट आता है और दावा करता है कि इन संकटपूर्ण दिनों में कुछ लोग, यह खुलकर सिखाने का साहस न करते हुए कि परमेश्वर बुराइयों का कारण है, वही बात भाषा के भिन्न रूपों में सुझाते हैं, यह कहते हुए कि आदम ने परमेश्वर की इच्छा से पाप किया, और कि दुष्ट मनुष्य अपनी सब दुष्टताएँ केवल परमेश्वर की अनुमति से ही नहीं, वरन् उसकी वास्तविक प्रेरणा से करते हैं। इस पर हमारा यह उदात्त वक्ता बड़े विलाप के साथ चिल्ला उठता है, "हाय अभागे मनुष्य! यह कैसे हो सकता था कि परमेश्वर ने यह चाहा हो, जिसने आदम को अपने ही स्वरूप में बनाया था?
मानो परमेश्वर की गुप्त युक्तियों का ठीक-ठीक कारण बताना और मरणशील मनुष्यों को उस स्वर्गीय बुद्धि को, जिसकी ऊँचाई और गहराई को देखने और दण्डवत् करने की उन्हें आज्ञा दी गई है, सूई की नोक तक समझा देना मेरा काम हो। नहीं! मूसा ही अपने इस वचन से ऐसी सारी मूर्खतापूर्ण वाचालता को रोक दे: "गुप्त बातें हमारे परमेश्वर यहोवा की हैं; परन्तु जो प्रकट की गई हैं वे हमारे और हमारी सन्तानों के लिए हैं" (व्यवस्थाविवरण 29:29)।
हम यहाँ देखते हैं कि मूसा, लोगों को व्यवस्था की शिक्षा से सन्तुष्ट रहने की आज्ञा देते हुए, उन्हें चेतावनी देता है कि वे परमेश्वर की गुप्त युक्तियों को परमेश्वर ही पर छोड़ दें, रहस्य जानकर जिनकी आराधना की जानी चाहिए, जिनकी छानबीन नहीं की जानी चाहिए।
यहाँ, अपनी लेखनी की नोक कुछ मुड़ी और भोथरी पाकर, वह उसे फिर से तेज़ करता है, उन पर प्रचण्ड आक्रमण के लिए जो (उसी के कथनानुसार) यह दावा करते हैं कि दुष्टताएँ केवल परमेश्वर की इच्छा से ही नहीं, वरन् उसकी प्रेरणा से ही की जाती हैं। अब अपने को एक असीम क्षेत्र में प्रविष्ट पाकर वह उल्लसित होता और बड़बड़ाता है, और कोई भी प्रकार की गाली बिना उगले नहीं छोड़ता, ताकि भक्त सेवकों के मन को व्यथित करे, जिनके गुणों का, काश परमेश्वर करे, वह सौवें अंश में भी अनुकरण कर सकता। सबसे पहले वह उन्हें स्वेच्छाचारियों के साथ गिनता है, जिनसे यदि वह सिद्धान्त में तनिक भी भिन्न होता, तो निश्चय ही अपनी निरी अज्ञानता से इस सर्वोत्तम कारण को बिगाड़ देता। अब जबकि कैल्विन की एक पुस्तक है जो विशेष रूप से इन्हीं स्वेच्छाचारियों के विरुद्ध लिखी गई है, तो जो मनुष्य इतने उपयोगी और पवित्र परिश्रम के बदले ऐसा अनुचित प्रतिफल लौटाता है, उसका मुँह कैसा होगा? वह निश्चयपूर्वक तर्क करता है कि यदि परमेश्वर मनुष्यों को पाप करने के लिए प्रेरित करता है, तो शैतान स्वयं इससे अधिक कुछ नहीं करता। मान लें कि हम क्षण भर के लिए यह अपवित्र तुलना स्वीकार कर लें, तो मसीह के सेवकों के विषय में हमारा यह वीर क्या कहेगा, जिन पर शैतान सदा युद्ध करता है, परन्तु परमेश्वर कभी नहीं? परन्तु आइए देखें कि यह अपवित्र प्राणी अपनी अपवित्रता को किन तर्कों पर टिकाता है। "शैतान जो चाहे करे (वह कहता है), और जैसे चाहे परीक्षा में डाले, वह मनुष्य की इच्छा को विवश नहीं कर सकता। परन्तु परमेश्वर, जो मनुष्य के हृदय को अपने हाथ में रखता है, इच्छा को विवश कर सकता है। इसलिए यदि परमेश्वर बलपूर्वक करवाएगा, तो वह करवाएगा और उसे करवाना ही होगा, चाहे तुम चाहो या न चाहो।" यहाँ अज्ञानता और उसका दुस्साहस तुरन्त प्रकट हो जाते हैं।
अब, सब स्वस्थ मन के लोग इस पर सहमत हैं कि कोई पाप ऐसा नहीं जो स्वैच्छिक न हो। इसलिए तुम्हें स्वस्थ विवेकवाला एक भी ऐसा मनुष्य नहीं मिलेगा जो यह कहे कि मनुष्य अपनी इच्छा के विरुद्ध पाप करते हैं। परन्तु कैल्विन, परमेश्वर के वचन के अनुसार, और अगस्तीन तथा अन्य भक्त लेखकों के पीछे चलते हुए भी, यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपनी ही इच्छा और सहमति से पाप करते हैं, तब भी परमेश्वर शैतान के हाथों में "बड़ा भ्रम" सौंप देता है, कि वह निकम्मे लोगों को इधर-उधर हाँके, जैसा पौलुस गवाही देता है (2 थिस्सलुनीकियों 2:11)। शैतान इसी प्रकार परमेश्वर की आज्ञा से निकलता है कि सब भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में झूठ बोलनेवाली आत्मा बनकर अहाब को धोखा दे (1 राजा 22:21)। परन्तु यहाँ शास्त्र की गवाहियाँ इकट्ठी करना मेरा उद्देश्य नहीं है। मेरा वर्तमान उद्देश्य केवल यह दिखाना है कि यह भौंकनेवाला कुत्ता निर्दोषों के विरुद्ध कितने उलटे ढंग से चिल्लाता है। "कोई दुष्ट मनुष्य दुष्ट कहकर कैसे पहचाना जाता है (वह कहता है) सिवाय दुष्टता करने के?" मानो हम, उस सारी छूट को जो परमेश्वर शैतान के हाथों में देता है, उसके गुप्त न्यायदण्डों के सिर मढ़कर, इसी से आराधना के योग्य परमेश्वर को पाप का रचयिता बना देते हों! मानो हम, इसके विपरीत, खुले रूप से और सब के सामने यह गवाही नहीं देते कि परमेश्वर पाप से सदा नितान्त दूर है और होना ही चाहिए, क्योंकि (जैसा हम दिखाते हैं) वह कठोरतम न्याय और धार्मिकता से ही निकम्मे लोगों को अन्धा और कठोर करता है! "परन्तु इस प्रकार (परमेश्वर का यह वीर तर्क करता है) परमेश्वर की इच्छा और शैतान की इच्छा एक ही हो जाएगी।" ऐसा नहीं है। जैसा मैं पहले दिखा चुका हूँ, बहुत बड़ा अन्तर है, क्योंकि यद्यपि परमेश्वर और शैतान एक ही बात चाहते हैं, तौभी वे इसे सर्वथा भिन्न रीति से चाहते हैं। क्योंकि कौन इनकार करेगा कि शैतान उत्सुकता से दुष्टों के विनाश की कामना करता है, जो विनाश तौभी परमेश्वर की ओर से आता है? फिर भी धर्मी न्यायी का उद्देश्य उस शत्रु के उद्देश्य से, जो अनियन्त्रित क्रूरता की साँसें भरता है, असीम रूप से भिन्न है! परमेश्वर ने चाहा कि यरूशलेम पूरी तरह नष्ट किया जाए; शैतान ने भी वही विनाश चाहा। फिर भी मैं इस पवित्र गाँठ को अपने शब्दों की अपेक्षा अगस्तीन के शब्दों से खोलना अधिक पसन्द करूँगा, जो लौरेन्तियुस के विरुद्ध अपने "संक्षिप्त ग्रन्थ" (अध्याय ci.) में इस प्रश्न की उत्तम चर्चा करता है: कैसे मनुष्य बुरी इच्छा से वह चाहता है जो परमेश्वर भली इच्छा से चाहता है (जैसे, उदाहरणार्थ, जब एक दुष्ट पुत्र अपने पिता की मृत्यु चाहता है और परमेश्वर भी वही मृत्यु चाहता है); और अन्त में, कैसे परमेश्वर जो कुछ उसने ठहराया है उसे अपने सेवकों की भली इच्छाओं के द्वारा नहीं, वरन् मनुष्यों की दुष्ट इच्छाओं और वासनाओं के द्वारा पूरा करता है। मैं अपने पाठकों को उस पवित्र विषय की व्याख्या के लिए, जो अगस्तीन ने अपनी रचनाओं के उस भाग में दी है जिसका मैंने उल्लेख किया है, वहीं भेजता हूँ।
यदि, तब, उद्देश्य की भिन्नता इच्छा को एक ही होने से नहीं रोकती, तो क्या यह उसके योग्य ही न होता कि परमेश्वर का यह वीर नरक की गहराइयों में निगल लिया जाता, इससे पहले कि उसने इस प्रकार ईश्वरीय महिमा को अपवित्र किया और अपनी घृणित कुतर्कों से उसे दूषित किया? और फिर भी, वह हम पर यह आरोप लगाने का साहस करता है कि हम अपने हृदय में परमेश्वर की उस धार्मिकता का इनकार करते हैं जिसे हम अपने मुँह से मानते हैं! जबकि यह नीच प्राणी स्वयं, जब वह निरंकुश धृष्टता के साथ यह दावा करने का साहस करता है कि जिनके विरुद्ध वह युद्ध करता है वे जीवन की खराई के लिए कभी प्रयत्न नहीं करते, इस प्रकार सब अधर्म में लिप्त रहता है मानो स्वर्ग के सिंहासन पर कोई न्यायी बैठा ही न हो! परन्तु मैं शान्ति से पूछता हूँ, किस हृदय में परमेश्वर की धार्मिकता का उपहास होना अधिक सम्भव है? उस हृदय में जिसमें भक्ति की सारी अभिलाषा पाई जाती है, या उसमें जिसमें हर प्रकार के अधर्म को खुली लगाम दी गई है? वास्तविक बात यह है कि कैल्विन में, और उसके समान लोगों में, कोई एक भी बात ऐसी नहीं जिससे यह भला नैतिकता-शिक्षक अधिक पूरी तरह घृणा करता हो, उनके नैतिक अनुशासन की अटल कठोरता से बढ़कर!
तथापि, यह तुच्छ मनुष्य जितना नीरस और अशिक्षित है, फिर भी वह अपनी नीच सेवा में अत्यन्त भद्दे हास्य को भर्ती करने का प्रयत्न करता है, यह पूछते हुए कि "क्या परमेश्वर ने आदम का पाप चाहा था, या शैतान ने?" क्या कभी भक्त या वास्तव में गम्भीर लोगों ने ऐसे गहरे रहस्यों पर परिहास करने या चुटकुले कसने की छूट अपने को दी है; वरन् निर्लज्ज कुत्तों की भाँति उन पर भौंकने की? वे निश्चय स्वीकार करते हैं कि आदम का पतन परमेश्वर के गुप्त विधान के शासन और नियन्त्रण के बिना नहीं हुआ, परन्तु वे कभी सन्देह नहीं करते कि उसकी गुप्त युक्ति का अन्त और उद्देश्य धर्मी और न्यायपूर्ण थे। परन्तु जैसे कारण परमेश्वर के मन में छिपा है, वैसे ही वे संयम और श्रद्धा के साथ उसके प्रकट किए जाने की प्रतीक्षा करते हैं, जो उस दिन किया जाएगा जब हम उस परमेश्वर को "आमने-सामने" देखेंगे, जिसे हम अब "दर्पण में धुँधला" और अस्पष्ट देखते हैं। श्रेष्ठतम और अत्यन्त भक्त मनुष्यों की नीचतम गाली-गलौज में इस प्रकार मग्न रहकर, इस भक्त योद्धा की अगली बात यह होती कि उन सब की जीभें उखाड़कर आग में फेंक दी जाएँ!
तथापि इसकी बहुत बड़ी सम्भावना है कि कैल्विन के विरुद्ध इस प्राणी का सारा क्रोध उसके मित्र सर्वेटस की स्मृति को चढ़ाई गई एक पवित्र भेंट के रूप में ही ठहराया गया है, और अपने सजातीय साथी की मृत्यु पर विलाप करते हुए, और अपना बदला चुकाने की कोई और रीति न पाकर, वह सत्य के रक्षकों के प्रति क्रूरता में सब जल्लादों को पीछे छोड़ देता है। परमेश्वर की दोहरी इच्छा के सिद्धान्त के विषय में, जिसे कैल्विन, अगस्तीन और अन्य भक्त शिक्षकों के पीछे चलते हुए, स्वयं परमेश्वर में आरोपित करता है, यह उत्कृष्ट धर्मशास्त्रीय न्यायी घोषणा करता है कि वह उस बचकानी बकवास पर चकित होता है जिसके द्वारा यह प्रस्तुत किया गया है। निश्चय ही प्रत्येक जन उसे सबसे अधिक विद्वान मनुष्यों में गिनेगा जो दूसरे की "बचकानी बकवास" की बात कर सकता है! परन्तु यह घृणास्पद बनावट पूरी तरह प्रमाणित करती है कि वह इस प्रकार व्यर्थ महिमा की हाँफती हुई खोज में बकवास करता है। और वह आगे जोड़ता है: "कि यह भेद, परमेश्वर की दोहरी इच्छा, हमारे द्वारा गढ़ा गया था, क्योंकि इसके बिना हम परमेश्वर की निन्दा करने के आरोप के सामने अपने को खुला छोड़ देते।" जबकि उसके इसी एक शब्द से उसका अपना उन्मत्त पागलपन प्रकट और उजागर हो जाता है; क्योंकि वह भूल जाता है कि उसने स्वयं निरन्तर सबसे निर्दोष मनुष्यों को खुली ईश-निन्दा बोलने का दोष दिया है। और क्या (मैं तुमसे पूछता हूँ) यह स्वयं उसकी ही कोई सन्देहास्पद ईश-निन्दा थी जब उसने परमेश्वर को पाप का रचयिता बनाया, और दावा किया कि वह न केवल पाप की इच्छा करता है, वरन् मनुष्यों को पाप करने के लिए सचमुच प्रेरित करता है, इस प्रकार उसे अपने ही स्वभाव को त्यागते हुए और अधर्मों पर भोज करते और उनमें अपना आनन्द मनाते हुए चित्रित करता है? और ये गालियाँ निर्लज्जता से उगल चुकने के बाद, अब वह अपने आप को और जो उसने कहा है उसे सर्वथा भूलकर, कहता है कि हम अपनी ईश-निन्दाओं को किसी रंग-रोगन से ढाँकते हैं, ताकि वे दिखाई न दें।
तथापि यह देखने योग्य है कि वह परमेश्वर की दोहरी इच्छा के अपने खण्डन के प्रयास में कौन-से तर्क प्रस्तुत करता है। वह हम पर आरोप लगाता है कि इस सिद्धान्त के द्वारा हम परमेश्वर में विश्वासघात आरोपित करते हैं; मानो उसे एक बात कहते और दूसरी सोचते हुए ठहराते हों, शास्त्र की उन गवाहियों के विपरीत जिनमें परमेश्वर कहता है, "मैं यहोवा बदलता नहीं" (मलाकी 3:6); "उसमें न तो कोई परिवर्तन होता है" (याकूब 1:17)। परन्तु यह मूर्ख प्राणी यह नहीं सोचता कि इस निन्दा का निशाना केवल कैल्विन और सत्य के अन्य ऐसे साक्षी ही नहीं हैं, वरन् स्वयं मूसा भी है, जो यह घोषणा करते हुए कि व्यवस्था यहूदियों और उनकी सन्तानों को दी गई थी, सब "गुप्त बातों" को परमेश्वर पर छोड़ देता है, यह कहते हुए कि वे उसकी "हैं" (व्यवस्थाविवरण 29:20)। ऐसा नहीं कि इस निन्दा का खण्डन करने में कोई कठिनाई है, क्योंकि परमेश्वर जो उचित है उसकी आज्ञा देकर यह गवाही देता है कि उसे सचमुच क्या भाता है; और न उसके अपने मन में कोई और युक्ति छिपी है जिसके द्वारा वह किसी भी ऐसी बात से प्रेम करता या उसे पूरा करना चाहता हो जिसे वह मनुष्य में दोषी ठहराता है।
परन्तु वह अपने न्यायदण्ड आश्चर्यजनक रीति से चलाता है, ऐसे कि अपनी अतुल्य बुद्धि और न्याय से वह उन बातों को, जो अपने आप में बुरी हैं, भले अन्त के लिए ठहराता और निर्देशित करता है। और न कैल्विन कभी यह मानेगा कि परमेश्वर उसकी इच्छा करता है जो बुरा है — अर्थात् जहाँ तक वह बुरा है — परन्तु यह कि उसके गुप्त और धर्मी न्यायदण्ड मनुष्यों के अधर्मों को नियन्त्रित करने में आश्चर्यजनक रीति से चमक उठते हैं। उदाहरणार्थ, अबशालोम के व्यभिचारपूर्ण कार्यों के द्वारा परमेश्वर दाऊद के व्यभिचार को दण्ड देता है। इसलिए जब परमेश्वर आदम को "भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष" का फल न चखने की आज्ञा देता है, तब वह इसके द्वारा उसकी आज्ञाकारिता की परीक्षा करता है। इस बीच, जो होने वाला था उसे उसने पहले से जाना; और केवल पहले से जाना ही नहीं, वरन् उसे ठहराया। यदि यह सत्य हमारे नाज़ुक धर्मशास्त्रीय न्यायी के स्वाद के लिए अत्यन्त कठोर और खुरदरा है, तो वह शिक्षा के स्वाद को दोष न दे, वरन् अपनी ही कड़वाहट और अरुचि को। और जब वह अपने लोहे के मुग्दर के सारे भार से, अपने भारी शब्दों के द्वारा चलाकर, हमारे हृदयों में यह ठोंकने का प्रयत्न करता है कि परमेश्वर की इच्छा केवल एक ही है, जिसे वह हम पर अपने भविष्यद्वक्ताओं और मसीह के द्वारा प्रकट करता है, तब अगस्तीन अपने अधिकार के बल से उसके मुग्दर के सब प्रहारों को रोक देता है। "ये (पवित्र पिता कहता है) प्रभु के पराक्रमी कार्य हैं, जो उसकी इच्छा के प्रत्येक बिन्दु में उत्कृष्ट रूप से सिद्ध हैं; और ऐसी बुद्धिमानी से सिद्ध कि जब स्वर्गदूत-स्वभाव और मानव-स्वभाव दोनों ने पाप किया — अर्थात् दोनों में से प्रत्येक ने वह नहीं किया जो परमेश्वर चाहता था, वरन् वह जो हर स्वभाव ने स्वयं चाहा, यद्यपि दोनों स्वभावों ने वही किया जो एक अर्थ में परमेश्वर की इच्छा के विपरीत था — तौभी परमेश्वर ने प्रत्येक स्वभाव की उसी इच्छा के द्वारा वह पूरा किया जो उसने धर्म से चाहा, बुरे कार्यों को भी परम भलाई के रूप में काम में लाते हुए, उनके अनन्त दण्ड के लिए जिन्हें उसने न्यायपूर्वक अनन्त दण्ड के लिए पूर्वनियत किया था, और उनके अनन्त उद्धार के लिए जिन्हें उसने अनुग्रह के लिए पूर्वनियत किया था। क्योंकि जहाँ तक पहले प्रकार के लोगों का सम्बन्ध था, उन्होंने वह किया जो परमेश्वर ने नहीं चाहा; परन्तु परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता के विषय में, जो इस प्रकार बुराई से भलाई निकाल सकती थी, वे उस सर्वशक्तिमत्ता से स्वतन्त्र होकर इसे करना किसी रीति से चाह नहीं सकते थे। क्योंकि परमेश्वर की इच्छा के विपरीत कार्य करने के उसी तथ्य से, उसी कार्य के द्वारा परमेश्वर की इच्छा उनके द्वारा पूरी की गई। क्योंकि कार्य करने के इसी सर्वशक्तिमान ढंग में परमेश्वर के कार्यों का पराक्रम निहित है! ऐसे कि, कार्य-विधि की एक अव्याख्येय रीति से, वह परमेश्वर की इच्छा के बिना नहीं होता जो अपने आप में उसकी इच्छा के विपरीत भी है, क्योंकि उसकी इच्छा के बिना वह हो ही नहीं सकता था। और तौभी परमेश्वर अनिच्छा से नहीं, वरन् इच्छा से चाहता है। क्योंकि भलाई के परमेश्वर के रूप में वह बुराई को कभी होने ही न देता, यदि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में वह उस बुराई में से भलाई निकाल न सकता!"
इसलिए यह तुच्छ प्राणी उन सब भयंकर पाखण्डों और ईश-निन्दाओं को, जो वह हमारे दिनों के अत्यन्त भक्त सेवकों के विरुद्ध चलाता है, स्वयं प्रतिष्ठित अगस्तीन के सिर पर फेंके। यह नितान्त सत्य है कि परमेश्वर की इच्छा शास्त्र को छोड़ और कहीं नहीं खोजी जानी चाहिए। परन्तु जब यह मोटा सूअर अपनी थूथन से सब कुछ उखाड़ता फिर रहा है, तब वह यह नहीं सोचता कि यद्यपि विश्वासी सदा श्रद्धा और संयम को बढ़ाते रहते हैं, तौभी परमेश्वर के गुप्त न्यायदण्ड मिटाए या शून्य नहीं किए जा सकते! परन्तु विश्वास की सारी नम्रता के साथ उस "बड़ी गहराई" (भजन संहिता 36:6) पर विचार करना और उसकी आराधना करना एक बात है, और हठ के साथ उसे अस्वीकार करना बिलकुल दूसरी बात है, क्योंकि वह मानव-मन की उन सब शक्तियों को, जो उसे समझने का प्रयत्न करती हैं, तुरन्त निगल जाती है। तथापि यह नीच प्राणी, इसलिए कि वह शास्त्र की उन सब गवाहियों को, जिनसे शिक्षा पाकर हम परमेश्वर के अद्भुत और महिमामय विधान की पुष्टि करते हैं, मिटा सके, इतने से सन्तुष्ट हो जाता है कि खुलकर घोषणा कर दे कि हम सब विधर्मियों ने सदा भक्ति का दुरुपयोग किया है, उसे मात्र एक आड़ बनाकर, और परमेश्वर के नाम पर हर प्रकार की बुराई की उत्पत्ति की है। भला, यदि यह गोल-मटोल कथन सारे मामले को निपटाने के लिए पर्याप्त माना जाए, तो वही सारी स्वर्गीय शिक्षा का खण्डन करने और परमेश्वर के नाम को पूरी तरह मिटा देने के लिए भी समान रूप से योग्य माना जा सकता है।
यह तुच्छ प्राणी आगे जोड़ता है, "कि वह हमारे द्वारा उसके विरुद्ध लाए जानेवाले हर तर्क का उत्तर दो रीतियों से दे सकता है। पहले यह दिखाकर कि वे सब अंश जो बुराई का कारण परमेश्वर को ठहराते प्रतीत होते हैं, उसकी प्रभावकारी इच्छा नहीं, वरन् उसका किसी बात को होने देना या छोड़ देना ठहराते हैं।" परन्तु उस निन्दा को सर्वथा दूर करो जो परमेश्वर की अनन्त इच्छा और आज्ञाओं की चर्चा करते समय भला और बुरा शब्दों पर खड़ी की गई है। क्योंकि हम भली-भाँति जानते हैं कि परमेश्वर के स्वभाव के लिए पाप से बढ़कर कुछ भी विपरीत नहीं है। परन्तु मनुष्य जब पाप करते हैं तब अपनी ही दुष्टता से कार्य करते हैं, इसलिए सारा दोष स्वयं उन्हीं पर है। परन्तु शास्त्र के उन सब अंशों को (जिनमें कार्य करते समय मन की भावना का स्पष्ट वर्णन है) परमेश्वर की ओर से मात्र अनुमति में बदल देना एक तुच्छ चालाकी है, और उस महान सत्य से बच निकलने का एक व्यर्थ प्रयत्न है! तथापि पूर्वजों ने उन अंशों की व्याख्या अनुमति शब्द से अवश्य की; क्योंकि यह पाकर कि अधिक सीधे शब्दों की स्पष्ट कठोरता कुछ लोगों को पहली बार सुनने पर बुरी लगती है, वे उसे कोमल अभिव्यक्तियों से हलका करने के लिए चिन्तित हुए। परन्तु इस प्रकार हलका करने की अपनी अत्यधिक चिन्ता में, और ऐसा कोई अपराध न होने देने के अपने प्रयत्न में, उन्होंने उस महान सत्य के प्रति जो ध्यान की दृढ़ता उचित थी, उसमें कुछ ढील कर दी।
तथापि यह तुच्छ प्राणी, जो पूर्वजों से इतना परिचित होने का दावा करता है, उनके वास्तविक मन के विषय में अपनी पूरी अज्ञानता प्रकट कर देता है; क्योंकि अगस्तीन की उन अनुभवहीनताओं के उदाहरणों को पकड़कर, जिनका उल्लेख मैं पहले कर चुका हूँ कि वे उसकी रचनाओं में तब पाए जाते हैं जब वह शास्त्र में अभी गहराई से निपुण नहीं हुआ था, वह उन सब स्पष्ट और सामर्थी अंशों को छोड़ देता है जिनमें वह निकम्मे लोगों को अन्धा और कठोर करने में परमेश्वर के गुप्त न्यायदण्डों को उनके वास्तविक और सक्रिय संचालन में (यदि मैं ऐसा कह सकूँ) स्वीकार करता है। यही अज्ञानता और अशिक्षा इस निरर्थक प्राणी के द्वारा भी प्रकट होती है जब वह हिएरोनिमुस के अधिकार पर हमें बताता है कि जब परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह बुराइयाँ करता या सृजता है, तब वे अभिव्यक्तियाँ आलंकारिक हैं।" परन्तु यदि "बुराइयाँ" विपत्तियों से अधिक या कम कुछ नहीं हैं (जैसा कि भली-भाँति जाना और सर्वत्र माना जाता है), तो उन बातों में अलंकार की खोज क्यों की जाए जो अपने आप में पूर्णतः प्रकट और स्पष्ट हैं?
परन्तु आइए अनुमति के सिद्धान्त को तनिक और निकटता से, फिर भी संक्षेप में, देखें। यूसुफ को उसके भाइयों ने दुष्टता से बेचा। यूसुफ स्वयं घोषणा करता है कि वह इस दुष्टता के द्वारा परमेश्वर की ओर से मिस्र भेजा गया, न कि उसके भाइयों के द्वारा, जिन्होंने इसे किया; और वह घोषणा करता है कि यह सब परमेश्वर की युक्ति से हुआ, कि उसके पिता का घराना पाला जाए और जीवित रखा जाए। अब, क्या यह सब, मैं तुमसे पूछता हूँ, मात्र अनुमति है? अय्यूब भी गवाही देता है कि वह परमेश्वर ही था जिसने उससे वह सारी सम्पत्ति ले ली जिससे लुटेरों और डाकुओं ने उसे वंचित किया था! क्या परमेश्वर का "ले लेना", मैं तुमसे पूछता हूँ, परमेश्वर की ओर से कोई कार्य प्रकट नहीं करता? कहा गया है कि परमेश्वर ने अन्यजातियों के हृदय फेर दिए कि वे उसकी प्रजा से बैर रखें। क्या हम कहेंगे कि यह परमेश्वर की ओर से मात्र अनुमति थी? शास्त्र स्वयं इस "फेरने" को परमेश्वर का एक निश्चित और प्रकट कार्य बताता है। इसी प्रकार जब कहा जाता है कि परमेश्वर मनुष्यों को "निकम्मी बुद्धि" के वश में कर देता है, और उन्हें "नीच कामनाओं" के वश में छोड़ देता है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसके भयानक न्यायदण्डों के वे कार्य प्रकट किए गए हैं जिनके द्वारा वह निकम्मे लोगों से धर्मी बदला लेता है! यदि परमेश्वर इन बड़े न्यायदण्डों के पूरे होते समय मात्र एक निष्क्रिय दर्शक होता, और उन्हें केवल पूरे होने देता, तो क्या वह दर्शक की ऐसी मात्र अनुमति से वास्तव में न्यायी का काम करता? परमेश्वर नबूकदनेस्सर को "अपने हाथ की कुल्हाड़ी" कहता है (यशायाह 10:5); वह अश्शूरियों को भी "अपने क्रोध की लाठी" कहता है; सब दुष्ट मनुष्यों को वह अपनी "छड़ी" ठहराता है; और वह निश्चयपूर्वक घोषणा करता है कि इनके द्वारा वह वही करेगा जो उसने करना ठहराया है। यहाँ मात्र अनुमति को कहाँ स्थान मिलेगा? यिर्मयाह, मादियों को सम्बोधित करते हुए, पुकार उठता है, "श्रापित हो वह जो यहोवा का काम धोखे से करता है; और श्रापित हो वह जो अपनी तलवार को लहू बहाने से रोक रखता है" (यिर्मयाह 48:10)। देखो! ये खूनी मनुष्य चाहे जो क्रूरता करें, भविष्यद्वक्ता दूसरे अर्थ में उसे परमेश्वर का काम कहता है, क्योंकि परमेश्वर ने उनके हाथ से बाबुलियों पर अपना बदला लिया। दाऊद भी इसी प्रकार गवाही देता है कि जो कुछ बुराई वह सह रहा था, वह परमेश्वर ही का किया हुआ था, और इसलिए वह "चुप" रहा (भजन संहिता 39:9)। अब, कौन मनुष्य किन अलंकारों या उक्तियों से "तू ने यह किया" शब्द को "तू ने होने दिया" में बदल देगा, या किसी बात के करने को मात्र उसके होने देने में बदल देगा? पौलुस भी घोषणा करता है कि परमेश्वर ही दुष्टों पर बड़ा भ्रम भेजता है कि वे झूठ पर विश्वास करें" (2 थिस्सलुनीकियों 2:11)। अतः जहाँ परमेश्वर का "प्रभावशाली कार्य" (इफिसियों 3:7) प्रकट दिखाई देता है, जैसा कि यहाँ दिखता है, वहाँ किस रसायन या युक्ति से कोई ऐसे "प्रभावशाली कार्य" में से ईश्वरीय इच्छा और उद्देश्य को निकाल लेगा?
यह श्रेष्ठ धर्मशास्त्रीय शिक्षक और न्यायी ऐसे अंशों की व्याख्या के लिए, जैसे "तू ऐसा परमेश्वर नहीं जो दुष्टता से प्रसन्न होता है" (भजन संहिता 5:4), एक नियम के रूप में यह ठहराता है कि उस पाठ से वे सब लोग अभिप्रेत माने जाएँ जो परमेश्वर में बुराई आरोपित करते प्रतीत होते हैं। परन्तु इसका वर्तमान प्रश्न से क्या सम्बन्ध है? हमारे द्वारा परमेश्वर पर अधर्म का कोई धब्बा नहीं लगाया जाता। हम जो कुछ दृढ़ता से कहते हैं वह इसके सर्वथा विपरीत है। अपने सब तर्कों में हम केवल इतना ही स्थापित करते हैं कि परमेश्वर संसार के सब कार्यों पर सिद्ध और ईश्वरीय खराई के साथ शासन और नियन्त्रण करता है। यदि हम में से कोई परमेश्वर की सामर्थ्य को उसकी धार्मिकता से अलग करता, तो निश्चय ही हम उन लोगों की मौन भर्त्सना के उचित पात्र ठहरते जो निरन्तर निन्दापूर्वक हमसे दोहराते हैं "कि परमेश्वर की सामर्थ्य के लिए अत्याचार से बढ़कर कुछ भी विपरीत नहीं है।" परन्तु अब, जब हम उसे "दुष्टता से प्रसन्न न होनेवाला" ठहराते हैं, तो क्या इस बहाने उसे संसार के न्यायी के रूप में उसके सिंहासन से घसीट लिया जाए, और यह मान लिया जाए कि उसके पास दुष्ट मनुष्यों और उनके बुरे कार्यों के द्वारा भलाई करने की कोई सर्वशक्तिमत्ता नहीं? क्योंकि सच्चाई यह है कि जैसे परमेश्वर प्रायः दुष्टों के हाथों से अपने न्यायदण्ड पूरे करता है, वैसे ही जो कोई उसे अनुमति की सीमाओं में बाँधेगा, वह उसे तुरन्त संसार के न्यायी के उसके पद से निकाल देगा! एली के पुत्रों ने अपने याजकीय पद का बुरा और लज्जाजनक दुरुपयोग किया था, और वे पलिश्तियों के हाथ से नाश हुए। अब हमारे महान धर्मशास्त्री के नियम के अनुसार हमें इसका अर्थ यह लेना होगा कि सब कुछ परमेश्वर की अनुमति से हुआ। परन्तु शास्त्र क्या कहता है? कि सब कुछ इसलिए हुआ क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें नाश करने का निश्चय किया था। बस देखो कि सब पागल अपने पागलपन से कहाँ तक हाँके जाते हैं जहाँ कोई धर्म, कोई संकोच, कोई लज्जा उन्हें रोकनेवाली नहीं। वे दौड़ते चले जाते हैं, जब तक कि वे न केवल मनुष्यों को, वरन् परमेश्वर को भी अपनी उन्मत्त कल्पनाओं के अधीन न कर लें।
परन्तु चूँकि यह मानना सर्वथा बेतुका होता कि परमेश्वर की इच्छा के विपरीत कुछ भी हो सकता है, जबकि परमेश्वर को ईश्वरीय स्वतन्त्रता है कि जो वह नहीं चाहता कि हो उसे रोक दे, तो यह प्राणी अपने विरुद्ध खड़े इस तर्क से छुटकारा पाने में कितना चतुर कारीगर है, यह अब हम थोड़े शब्दों में समझाएँ। वह पहले यह दावा करता है कि इसकी जाँच करना ही हास्यास्पद है। कैसी खेद की बात थी कि अगस्तीन के पास ऐसा कोई सचेतक नहीं था जो उसे उस सारे पवित्र परिश्रम से बचा लेता जो उसने इस महान प्रश्न पर किया, और जिस परिश्रम से (हमारे धर्मशास्त्रीय वीर के अनुसार) उसने अपने आप को "पूर्णतः हास्यास्पद" बना लिया! जबकि अगस्तीन इसी तर्क से प्रमाणित करता है कि पृथ्वी पर जो कुछ होता है वह सब परमेश्वर के इसी गुप्त विधान से प्रभावशाली रीति से शासित और नियन्त्रित है। और न वह यह निष्कर्ष निकालने में हिचकिचाता है कि जो कुछ किया जाता है, वह परमेश्वर की इच्छा से किया जाता है! इसी निष्कर्ष के अनुसार भजनकार गवाही देता है कि परमेश्वर स्वर्ग में विराजमान होकर वही करता है जो वह चाहता है: "परन्तु हमारा परमेश्वर (भजनकार कहता है) स्वर्ग में है: उसने जो कुछ चाहा वही किया है" (भजन संहिता 115:3)। परन्तु, मैं तुमसे पूछता हूँ, यह प्रश्न हास्यास्पद क्यों है? हमारा महान धर्मशास्त्रीय सचेतक उत्तर देता है: "क्योंकि परमेश्वर से उसके कार्यों का कारण पूछना उचित नहीं।" तब हमारा विनम्र सचेतक इस महान विनम्रता को इस महान विषय के अपने सारे व्यवहार में क्यों नहीं बनाए रखता? तब इस विनम्र प्राणी के प्रचण्ड चिल्लाने और कोलाहल कहाँ से उठते हैं? और कहाँ से, सिवाय इस तथ्य से कि घमण्डी और अज्ञानी परमेश्वर की युक्तियों को घृणा और तिरस्कार से ठुकराते हैं? क्योंकि, सचमुच, उनके तुच्छ मन उसकी गहराई और विशालता को थाम नहीं सकते! इसलिए सब बातों को अपनी ही इच्छा के अनुसार व्यवस्थित करने की स्वतन्त्रता परमेश्वर पर छोड़ दो, और इस विषय पर सारा झगड़ा तुरन्त समाप्त हो जाएगा। परन्तु यह उचित और ठीक है कि पागल लोग इस प्रकार एक-दूसरे से लड़ते रहें, ताकि वे आपसी विनाश से एक-दूसरे का अन्त कर दें।
यहाँ हम अपने धर्मशास्त्रीय वीर के व्यर्थ बचाव के उस पुराने बिन्दु पर लौट आते हैं: "कि बहुत सी बातें परमेश्वर की इच्छा के विपरीत होती हैं।" इसे हम बड़ी प्रसन्नता से मान लेते हैं, बशर्ते कि यह परमेश्वर की इच्छा के विपरीत होना बहुत आगे तक न खींचा जाए। उदाहरणार्थ, परमेश्वर ने प्रायः यहूदियों को इकट्ठा करना चाहा, "परन्तु उन्होंने न चाहा"; यद्यपि उसने उन्हें अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, "तड़के उठकर," जैसा वह स्वयं बलपूर्वक कहता है, अपने पास बुलाया (यिर्मयाह 7:13)। परन्तु क्योंकि मन-फिराव परमेश्वर का विशेष दान है, इसलिए जिन्हें वह वास्तव में मन फिरानेवाला चाहता है उन्हें वह स्वयं प्रभावशाली रीति से मन फिराता है। पौलुस जो कहता है, "परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो" (1 तीमुथियुस 2:4), वह किस अर्थ में है, यह पाठक, जैसा हमने पहले देखा और समझाया है, संदर्भ से सीखें। उद्धार की भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ और प्रकार हैं (जैसा हमने ऊपर इस अंश को खोलते समय दिखाया है)। परन्तु परमेश्वर सब मनुष्यों को बाहरी वचन के योग्य नहीं समझता (जैसा हमने पहले संसार के इतिहास से और उन थोड़ी जातियों से दिखाया है जिनके पास परमेश्वर ने अपना बाहरी वचन भी भेजा); और वे थोड़े ही हैं जिन्हें वह अपने गुप्त प्रकाश का भागी बनाता है।
परन्तु अपनी उलझन से अधिक सरलता से निकलने के लिए, यह अयोग्य प्राणी अन्त में अपने बचाव के लिए स्वतन्त्र इच्छा की ढाल उठा लेता है। वह कहता है, "इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर उन मनुष्यों को बुराई करने से नहीं रोकता जिन्हें अपनी इच्छानुसार करने की स्वतन्त्र इच्छा है।" जबकि वही तो बड़ा आश्चर्य है! और उसका समाधान केवल उस उदात्त सत्य और उसकी शिक्षा से ही होता है कि मनुष्य जो कुछ करते हैं, वे परमेश्वर की अनन्त इच्छा और गुप्त उद्देश्य के अनुसार ही करते हैं! परन्तु यह निरर्थक प्राणी हम पर शून्य से गढ़ा हुआ शब्द क्यों थोपता है? स्वतन्त्र इच्छा क्या है, जब शास्त्र सर्वत्र घोषणा करता है कि मनुष्य, शैतान का बन्दी, सेवक और दास होकर, अपने सारे मन और झुकाव के साथ हर प्रकार की दुष्टता में बहा चला जाता है, और परमेश्वर की बातों को समझने में सर्वथा असमर्थ है, उन्हें करने की तो बात ही क्या?
कुत्ते के मुँहवाली बेईमानी के इस खण्डन में, जैसे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को हर प्रकार की निन्दाओं के विरुद्ध ईमानदारी और स्पष्टता से थामा गया है, मुझे निश्चय है कि मैंने नम्रता के साथ एक ऐसा कार्य पूरा किया है जो कलीसिया के लिए उपयोगी और सुखद है, और परमेश्वर को भी ग्रहणयोग्य है।
