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परमेश्वर की इच्छा मनुष्यों के मन की सारी कठोरता का परम कारण है
भाग VIII: फ़िरौन का कठोर किया जाना ... परमेश्वर का काम था
अनुच्छेद VIII।
(अर्थात् निन्दा VIII।)
फ़िरौन का कठोर किया जाना, और इस प्रकार उसके मन की हठ और विद्रोह, परमेश्वर का काम था, स्वयं मूसा की साक्षी के अनुसार भी, जो फ़िरौन के सारे विद्रोह का श्रेय परमेश्वर को देता है।
अनुच्छेद IX।
(अर्थात् निन्दा IX।)
परमेश्वर की इच्छा मनुष्यों के मन की सारी
कठोरता का परम कारण है।
निन्दक के कथन और अवलोकन।
आठवें और नौवें अनुच्छेदों के अन्तर्गत आपके विरोधी यह प्रश्न पूछते हैं: तो फिर मूसा जब लिखता है, "और फ़िरौन ने अपना मन कठोर किया," तो उसका क्या अर्थ है? क्या "और फ़िरौन ने अपना मन कठोर किया" इन शब्दों का अर्थ यों करना चाहिए: अर्थात्, "और परमेश्वर ने फ़िरौन के मन को कठोर किया"? निश्चय ही यह कहने की अपेक्षा कि "परमेश्वर ने फ़िरौन के मन को कठोर किया" कहीं अधिक कठोर बोलने की रीति होगी; अर्थात्, परमेश्वर ने फ़िरौन को उसके मन की स्वाभाविक कठोरता के विषय में जाना, क्योंकि फ़िरौन ने उसकी आज्ञा मानने से इनकार किया था। इसी प्रकार का एक और प्रश्न वे इन शब्दों के विषय में पूछते हैं, "यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मन को कठोर न करो।" अब यदि तुम इस वचन की व्याख्या यों करो, "परमेश्वर नहीं चाहता कि तुम अपने मन को कठोर करो," तो ऐसी व्याख्या में बड़ी से बड़ी बेतुकी बात होगी, क्योंकि इससे परमेश्वर मनुष्यों को वह करने की आज्ञा देता हुआ ठहरेगा जो केवल उसी का अधिकार है। क्योंकि यदि मन का कठोर किया जाना परमेश्वर का काम है, तो मनुष्यों को अपने-अपने मन को कठोर करने या कठोर न करने की आज्ञा देना बेतुका है; क्योंकि वे ऐसा उतना ही नहीं कर सकते जितना अपने कद में एक हाथ बढ़ा या घटा नहीं सकते।
अनुच्छेद VIII और IX पर जॉन कैल्विन का उत्तर
हे सत्य के अपवित्र निन्दक, यहाँ फिर मैं अपने पाठकों से विनती करता हूँ कि वे मुझ पर भरोसा रखें, और मेरी रचनाओं और मेरी शिक्षा की सारी "रेखा" की तुलना तुम्हारे विकृत और खण्डित अनुच्छेदों से करें। यदि वे कृपा करके ऐसा करें, तो तुम्हारी निन्दाएँ तुरन्त पकड़ी जाएँगी, और वैर की वह सारी ज्वाला जो तुम इस प्रकार मेरे विरुद्ध भड़काते हो, शीघ्र अपने आप बुझ जाएगी। इस बीच, मैं इससे इनकार नहीं करता कि मैंने वही सिखाया है जो मूसा और पौलुस सिखाते हैं, कि फ़िरौन का मन परमेश्वर की ओर से "कठोर किया गया"। परन्तु इस पर तुम मूसा और पौलुस दोनों को तुच्छ जानकर, और जो कुछ उनमें पढ़ा जाता है उस सब को कुछ भी न मानकर, मुझसे तर्क करने लगते हो, और पूछते हो कि क्या, जब हम एक स्थान पर पढ़ते हैं कि "फ़िरौन ने अपना मन कठोर किया," तो इस वचन की अधिक कठोर व्याख्या करना और यह कहना आवश्यक है कि "परमेश्वर ने फ़िरौन के मन को कठोर किया"? अब मुझे तुम्हारे इस प्रश्न के लिए उससे आगे किसी उत्तर की आवश्यकता नहीं जो तुम इस झूठे अनुच्छेद के शब्दों में स्वयं देते हो, जिसमें तुम मेरी रचनाओं से उद्धृत करने का बहाना करके, या उन्हें बिगाड़कर, या उन्हें न समझकर, यह कहलवाते हो कि चूँकि परमेश्वर की इच्छा कठोरता का परम या दूरवर्ती कारण है, इसलिए स्वयं मनुष्य, जो अपना मन कठोर करता है, कठोर होने का निकटवर्ती कारण है और होना ही चाहिए। अब मैंने सब स्थानों पर परम या दूरवर्ती कारण और सब मध्यवर्ती और निकटवर्ती कारणों के बीच का अन्तर अत्यन्त स्पष्ट रूप से दिखाया है। क्योंकि जब पापी अपने भीतर ही हर बुरी वासना की जड़ पा सकता है, तो ऐसे पापी के अपराधों के लिए परमेश्वर पर कोई दोष लगाने का क्या आधार हो सकता है? परमेश्वर पर ऐसा दोष लगानेवाला, जैसा मैं अन्यत्र कह चुका हूँ, ठीक वैसा ही करता है जैसा प्राचीन कवि द्वारा चित्रित मेदिया की धाय, जो बेतुके ढंग से चिल्लाती है, "काश, वे तख़्ते जिनसे अर्गो जहाज़ बना था, पेलियोन पर्वत पर कुल्हाड़ी से कभी काटे न गए होते!" क्योंकि जब तक उसकी स्वामिनी, वह अशुद्ध राजकुमारी, अपनी ही भ्रष्ट वासना में जल रही थी, और उसके बल से अपने पिता के राज्य के साथ विश्वासघात करने और उसे नष्ट करने की ओर अपने आप को सिर के बल खिंचती अनुभव कर रही थी, यह मूर्ख धाय न अपनी स्वामिनी की भ्रष्ट वासना को दोष देती है, न यासोन के गहरे फुसलावों को, न उन निकटवर्ती कारणों को देखती ही है; वरन् उस जहाज़ की शिकायत करती चली जाती है जो यासोन को कोलखिस ले आया, और विलाप करती है कि ऐसा जहाज़ यूनान में बनाया ही क्यों गया। ठीक इसी रीति से वह मनुष्य, जो अपने पाप और दोष का बोध रखते हुए भी अपने अधर्म का दूरवर्ती कारण दूर से, स्वयं परमेश्वर से, खींच लाता है, वह पूरी तरह और हास्यास्पद रूप से भूल जाता है कि वह स्वयं क्या है।
निश्चय ही अब तुम्हें दिख गया होगा कि यद्यपि परमेश्वर अपनी गुप्त और सर्वोच्च रीति से मनुष्यों के मन कठोर करता है, तथापि उस पर कोई दोष नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि हर मनुष्य अपनी प्रकृति की मूल बुराई और दुष्टता से अपना मन आप कठोर करता है।
परन्तु जब परमेश्वर मनुष्यों के मन को अपनी आज्ञाकारिता और आराधना की ओर फेरता है, तो वह उसके कार्य का एक बिलकुल दूसरा रूप है। क्योंकि हम सब स्वभाव से हठ और विरोध की ओर झुके हैं, इसलिए जब तक परमेश्वर उस पर कार्य न करे और उसे वैसा करने को न चलाए, कोई मनुष्य भलाई करने की इच्छा न करेगा। और यद्यपि पवित्रशास्त्र कहता है कि "मन की युक्ति मनुष्य के वश में रहती है, परन्तु मुँह से कहना यहोवा की ओर से होता है," और कि विश्वासी परमेश्वर को ढूँढ़ने और उसकी स्वेच्छा से आराधना करने के लिए अपने मन को तैयार करते हैं, तथापि पवित्रशास्त्र इसमें अपना किसी प्रकार खण्डन नहीं करता, वरन् स्पष्ट दिखाता है कि परमेश्वर के सब सच्चे उपासक उसकी सेवा स्वेच्छा से और मन के प्रेम और पवित्र स्वतन्त्रता से करते हैं। और फिर भी यह इस बात का किसी प्रकार खण्डन नहीं करता, न उसके मार्ग में बाधा है, कि परमेश्वर इस सारे समय अपने गुप्त आत्मा के कार्यों और प्रभावों के द्वारा अपना भाग निभाता है।
परन्तु मनुष्यों के मन को कठोर करने के विषय में, वह परमेश्वर के कार्य की एक भिन्न रीति है, जैसा मैंने अभी कहा। क्योंकि परमेश्वर ठुकराए हुओं पर अपने नया जन्म देनेवाले आत्मा से शासन नहीं करता; वरन् उन्हें शैतान के हवाले कर देता है, और उन्हें उसके दास होने के लिए छोड़ देता है; और वह अपने गुप्त न्याय और युक्ति से उनकी भ्रष्ट इच्छाओं पर ऐसा शासन करता है कि वे वही करने के सिवा कुछ कर नहीं सकते जो उसने ठहराया है। इसलिए इन बातों में ऐसा ईश्वरीय सामंजस्य और अद्भुत संगति है कि यद्यपि परमेश्वर जिसे चाहता है उसे कठोर करता है, तथापि हर कठोर किया हुआ व्यक्ति अपनी कठोरता का कारण और रचयिता स्वयं है। परन्तु ताकि इस अनुच्छेद के उत्तर में मेरे कथन अत्यधिक लम्बे न हो जाएँ, मुझे भक्त और सीधे पाठकों के मन और स्मृति में अगस्तीन की यह चेतावनी बैठाने की अनुमति दी जाए: "जब प्रेरित कहता है कि परमेश्वर ने कुछ लोगों को 'नीच कामनाओं के वश में छोड़ दिया,' तो इसे परमेश्वर की सहनशीलता पर लागू करना बेतुकी अज्ञानता है। क्योंकि वही प्रेरित अन्यत्र परमेश्वर की सहनशीलता को उसकी सामर्थ्य से जोड़ता है, जैसे जहाँ वह कहता है, 'तो क्या यदि परमेश्वर ने अपना क्रोध दिखाने और अपनी सामर्थ्य प्रगट करने की इच्छा से क्रोध के बरतनों की, जो विनाश के लिए तैयार किए गए थे, बड़ी सहनशीलता से सही?' (रोमियों 9:22)," आदि। वरन् यदि यह विद्वान और भक्त पिता और शिक्षक इस महान विषय पर कभी लिखता या बोलता भी नहीं, तो भी हमारी समझ और विश्वास के लिए अकेले परमेश्वर का अधिकार ही पर्याप्त, वरन् अत्यधिक होना चाहिए। मैंने यह नहीं कहा कि "परमेश्वर प्रधानों के मन को हर लेता है, और उन्हें भटका देता है," या "कि परमेश्वर ने फ़िरौन के मन को थामे रखा, ताकि वह मानवता और दया की ओर न झुके।" मैंने यह नहीं कहा "कि परमेश्वर ने जातियों के मन को फेर दिया, और उन्हें अपनी प्रजा से बैर रखने के लिए कठोर किया;" या, "कि उसने मिस्रियों के लिए सीटी बजाई, और उन्हें अपने सेवकों के रूप में काम में लिया।" मैंने यह नहीं कहा "कि सन्हेरीब परमेश्वर के हाथ में उसकी लाठी था, कि उसकी प्रजा को दण्ड दे।" मैंने ये सब बातें नहीं कहीं। ये सब स्वयं परमेश्वर के आत्मा की घोषणाएँ हैं।
क्या! जब पवित्रशास्त्र स्वयं कहता है कि शाऊल परमेश्वर की ओर से एक दुष्ट आत्मा द्वारा बहा ले जाया गया, तो क्या तुम इसे परमेश्वर के अकेले धीरज या केवल अनुमति का श्रेय दोगे? अगस्तीन अपनी चेतावनी-भरी शिक्षा में सत्य के कितना निकट है, जब वह कहता है: "जो पाप शैतान और दुष्ट करते हैं वे उनके अपने हैं; परन्तु उनके पापों से जो कुछ पूरा होता है वह परमेश्वर की सामर्थ्य से सिद्ध होता है, जो अन्धकार को ज्योति से जैसे चाहता है अलग करता है।" अब तुम मुझ पर वह कहने का दोष लगाते हो जिसे परमेश्वर स्वयं इस सारे समय अपने ही वचनों में कहता है। इस विषय में वही अगस्तीन मेरे स्थान पर तुम्हें उत्तर दे, जहाँ वह कहता है: "यदि पवित्रशास्त्र की सावधानी से जाँच की जाए, तो वह दिखाता है कि परमेश्वर न केवल मनुष्यों की उन भली इच्छाओं को (जिन्हें उसने बुरी इच्छाओं में से भली बनाया है) भले कामों और अनन्त जीवन की ओर निर्देशित करता है, वरन् वे इच्छाएँ भी जो अपनी स्वाभाविक भ्रष्टता में बनी रहती हैं, परमेश्वर की सामर्थ्य के अधीन ऐसी हैं कि वह उन्हें जब और जहाँ चाहे फेरता और झुकाता है, या तो आशीषें देने के लिए, या दण्ड देने के लिए; और यह वह अत्यन्त गुप्त, पर साथ ही अत्यन्त धर्मी न्यायों के द्वारा करता है।"
