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सातवीं आज्ञा।
इसलिए वे घूमनेवाली कुर्सी के लुटेरे, देश और राजमार्ग के लुटेरे भी कहलाते हैं, ताले तोड़नेवाले और छिपकर चोरी करनेवाले नहीं जो नकद धन झपट ले जाते हैं, वरन् वे जो [घर में] कुर्सी पर बैठे रहते हैं और बड़े कुलीन पुरुष, और आदरणीय, भक्त नागरिक कहलाते हैं, और तौभी किसी अच्छे बहाने से लूटते और चोरी करते हैं।
हाँ, यहाँ हम छोटे-मोटे अकेले चोरों के विषय में चुप रह सकते, यदि हम उन बड़े, शक्तिशाली महाचोरों पर आक्रमण करें जिनके साथ स्वामी और शासक संगति रखते हैं, जो प्रतिदिन न केवल एक-दो नगरों को, वरन् सारे जर्मनी को लूटते हैं। हाँ, सब चोरों के मुखिया और सर्वोच्च संरक्षक, रोम की पवित्र गद्दी को, उसके सारे दल-बल समेत, हम कहाँ रखें, जिसने चोरी से सारे संसार का धन हथिया लिया है, और आज के दिन तक उसे दबाए बैठी है?
संक्षेप में, संसार की चाल यही है: जो कोई खुलेआम चोरी और लूट कर सकता है, वह स्वतन्त्र और सुरक्षित घूमता है, कोई उसे छेड़ता नहीं, और वह यह भी माँगता है कि उसका आदर किया जाए। इस बीच छोटे छिपकर चोरी करनेवाले, जिन्होंने एक बार अपराध किया है, उन्हें लज्जा और दण्ड सहना पड़ता है ताकि पहलेवाले भक्त और आदरणीय दिखें। परन्तु वे जान लें कि परमेश्वर की दृष्टि में वे सबसे बड़े चोर हैं, और कि वह उन्हें वैसा ही दण्ड देगा जिसके वे योग्य हैं और जो वे कमाते हैं।
अब, क्योंकि यह आज्ञा इतनी दूर तक पहुँचनेवाली [और व्यापक] है, जैसा अभी दिखाया गया, इसलिए आवश्यक है कि इस पर भली-भाँति ज़ोर दिया जाए और साधारण लोगों को समझाया जाए, उन्हें उनकी उच्छृंखलता और निश्चिन्तता में चलते रहने न दिया जाए, वरन् परमेश्वर के क्रोध को सदा उनकी आँखों के सामने रखा जाए, और उसे उनके मन में बैठाया जाए। क्योंकि हमें यह प्रचार मसीहियों को नहीं, वरन् मुख्य रूप से दुष्टों और बदमाशों को करना है, जिन्हें प्रचार करना न्यायाधीशों, जेलरों या मास्टर हान्नेस [जल्लाद] के लिए अधिक उचित होता। इसलिए हर एक जान ले कि परमेश्वर की अप्रसन्नता के खतरे पर उसका कर्तव्य है कि वह न केवल अपने पड़ोसी को कोई हानि न पहुँचाए, न उसे लाभ से वंचित करे, न किसी सौदे या व्यापार में कोई बेईमानी या द्वेष का काम करे, वरन् विश्वासयोग्यता से उसके लिए उसकी सम्पत्ति की रक्षा करे, उसके लाभ को सुरक्षित करे और बढ़ाए, विशेषकर जब कोई ऐसी सेवा के लिए धन, मज़दूरी और अपनी जीविका पाता है।
अब जो कोई इसे मनमाने ढंग से तुच्छ जानता है, वह सचमुच आगे निकल सकता है और जल्लाद से बच सकता है, परन्तु वह परमेश्वर के क्रोध और दण्ड से न बचेगा; और जब वह बहुत समय तक अपनी ढिठाई और अहंकार का अभ्यास कर चुकेगा, तब भी वह आवारा और भिखारी ही बना रहेगा, और इसके अतिरिक्त उस पर सब विपत्तियाँ और दुर्भाग्य आएँगे। अब तुम अपनी राह चलते हो [जहाँ कहीं तुम्हारे हृदय की प्रसन्नता तुम्हें बुलाती है], जबकि तुम्हें अपने स्वामी और स्वामिनी की सम्पत्ति की रक्षा करनी चाहिए, जिस सेवा के लिए तुम अपना पेट और गला भरते हो, चोर की नाईं अपनी मज़दूरी लेते हो, लोगों से कुलीन पुरुष जैसा व्यवहार करवाते हो; क्योंकि बहुत से ऐसे हैं जो अपने स्वामियों और स्वामिनियों के प्रति ढीठ भी होते हैं, और उनकी कोई भलाई या सेवा करने को तैयार नहीं होते जिससे उन्हें हानि से बचाया जा सके।
परन्तु विचार करो कि तुम्हें क्या मिलेगा जब तुम अपनी सम्पत्ति के स्वामी बनोगे और अपने घर में बस जाओगे (जिसमें परमेश्वर सब दुर्भाग्यों के साथ सहायता करेगा), तब वह [तुम्हारा विश्वासघात] फिर से उभर आएगा और तुम्हारे ही सिर आ पड़ेगा, और तुम पाओगे कि जहाँ तुमने एक दमड़ी के मूल्य का धोखा या हानि की है, वहाँ तुम्हें फिर से तीस चुकानी पड़ेंगी।
ऐसा ही हाल उन कारीगरों और दिहाड़ी मज़दूरों का भी होगा जिनकी ऐसी असहनीय दुष्टता हमें अब सुननी और सहनी पड़ती है, मानो वे दूसरे की
