भाग 27 / 37

उसके लिए कि ऐसे लोग उत्पन्न हों जो संसार की सेवा करें और परमेश्वर के ज्ञान को बढ़ाएँ,

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छठी आज्ञा। उसके लिए कि ऐसे लोग उत्पन्न हों जो संसार की सेवा करें और परमेश्वर के ज्ञान, भक्तिपूर्ण जीवन और सब सद्गुणों को बढ़ाएँ, ताकि दुष्टता और शैतान के विरुद्ध लड़ें।

इसलिए मैंने सदा यह सिखाया है कि इस पदवी को न तुच्छ जाना जाए और न बदनाम किया जाए, जैसा अन्धा संसार और हमारे झूठे धर्माधिकारी करते हैं, वरन् इसे परमेश्वर के वचन के अनुसार माना जाए, जिसके द्वारा यह सजाई और पवित्र की गई है, ताकि यह न केवल दूसरी पदवियों के बराबर रखी जाए, वरन् उन सब से आगे और बढ़कर हो, चाहे वे सम्राट, शासकों, बिशपों, या जिस किसी की भी हों। क्योंकि कलीसियाई और नागरिक दोनों पदवियों को अपने आप को नम्र करना होगा और सब को इसी पदवी में पाया जाना होगा, जैसा हम सुनेंगे। इसलिए यह कोई विशेष पदवी नहीं, वरन् सबसे सामान्य और सबसे श्रेष्ठ पदवी है, जो सारे

मसीही जगत में व्याप्त है, हाँ, जो सारे संसार में फैली हुई है।

दूसरे स्थान पर, तुम्हें यह भी जानना चाहिए कि यह न केवल एक आदरणीय, वरन् एक आवश्यक दशा भी है, और परमेश्वर ने गम्भीरता से आज्ञा दी है कि सामान्य रूप से, सब अवस्थाओं में, पुरुष और स्त्रियाँ, जो इसी के लिए सृजे गए, इसी पदवी में पाए जाएँ; तौभी कुछ अपवादों के साथ

(यद्यपि थोड़े), जिन्हें परमेश्वर ने विशेष रूप से अलग रखा है, ताकि वे विवाह की पदवी के योग्य न हों, या जिन्हें उसने एक ऊँचे, अलौकिक वरदान के द्वारा छूट दी है कि वे इस पदवी के बिना पवित्रता बनाए रख सकें। क्योंकि जहाँ प्रकृति अपनी चाल चलती है, जैसी वह परमेश्वर के द्वारा रोपी गई है, वहाँ विवाह के बिना पवित्र रहना सम्भव नहीं। क्योंकि मांस और लहू मांस और लहू ही रहते हैं, और स्वाभाविक झुकाव और उत्तेजना बिना रोक-टोक अपनी चाल चलते हैं, जैसा हर कोई देखता और अनुभव करता है। इसलिए, कि कुछ हद तक अशुद्धता से बचना अधिक सहज हो, परमेश्वर ने विवाह की पदवी की आज्ञा दी है, ताकि हर एक का अपना उचित भाग हो और वह उसी से सन्तुष्ट रहे; यद्यपि इसके अतिरिक्त परमेश्वर का अनुग्रह भी आवश्यक है ताकि हृदय भी शुद्ध हो।

इससे तुम देखते हो कि यह पोप-पक्षी भीड़, याजक, भिक्षु और भिक्षुणियाँ, कैसे परमेश्वर की व्यवस्था और आज्ञा का विरोध करते हैं, क्योंकि वे विवाह को तुच्छ जानते और वर्जित करते हैं, और सदा की पवित्रता बनाए रखने का दुस्साहस करते और मन्नत मानते हैं, और इसके अतिरिक्त सीधे-सादे लोगों को झूठे शब्दों और दिखावों [छल-कपट] से धोखा देते हैं। क्योंकि किसी में पवित्रता के प्रति इतना कम प्रेम और झुकाव नहीं जितना ठीक उन्हीं में है जो बड़ी पवित्रता के कारण विवाह से बचते हैं, और या तो खुली और निर्लज्ज वेश्यावृत्ति में लिप्त रहते हैं, या गुप्त रूप से उससे भी बुरा करते हैं, यहाँ तक कि उसके विषय में कोई बोलने का साहस न करे, जैसा, हाय! बहुत अधिक जाना जा चुका है। और, संक्षेप में, यद्यपि वे उस कर्म से रुके भी रहें, तौभी उनके हृदय अशुद्ध विचारों और बुरी अभिलाषाओं से इतने भरे हैं कि एक निरन्तर जलन और गुप्त पीड़ा बनी रहती है, जिससे विवाहित जीवन में बचा जा सकता है। इसलिए विवाह की दशा से बाहर पवित्रता की सब मन्नतें इस आज्ञा के द्वारा दोषी ठहराई गई हैं, और उन सब बेचारे फँसे हुए विवेकों को, जिन्हें उनकी मठवासी मन्नतों ने धोखा दिया है, अशुद्ध दशा को छोड़कर विवाहित जीवन में प्रवेश करने की स्वतन्त्र अनुमति दी गई है, हाँ, आज्ञा भी दी गई है, यह विचार करते हुए कि यदि मठवासी जीवन भक्तिपूर्ण भी होता, तौभी पवित्रता बनाए रखना उनके वश में न होता, और यदि वे उसमें बने रहें, तो उन्हें इस आज्ञा के विरुद्ध केवल अधिक से अधिक पाप ही करना पड़ेगा।

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