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तीसरी आज्ञा।
इसलिए ध्यान दो कि इस आज्ञा का बल और सामर्थ्य विश्राम करने में नहीं, वरन् पवित्र करने में है, ताकि इस दिन के साथ एक विशेष पवित्र अभ्यास जुड़ा हो। क्योंकि दूसरे काम और धन्धे ठीक-ठीक पवित्र अभ्यास नहीं कहलाते, जब तक कि मनुष्य स्वयं पहले पवित्र न हो। परन्तु यहाँ एक ऐसा काम किया जाना है जिसके द्वारा मनुष्य स्वयं पवित्र बनाया जाता है, जो (जैसा हम सुन चुके हैं) केवल परमेश्वर के वचन के द्वारा होता है। तो इसी के लिए निश्चित स्थान, समय, व्यक्ति और आराधना की सारी बाहरी व्यवस्था बनाई और ठहराई गई है, ताकि यह सार्वजनिक रूप से चलता रहे।
इसलिए, क्योंकि परमेश्वर के वचन पर इतना कुछ निर्भर है कि उसके बिना कोई पवित्र दिन पवित्र नहीं माना जा सकता, हमें जानना चाहिए कि परमेश्वर इस आज्ञा के कड़े पालन पर ज़ोर देता है, और उन सब को दण्ड देगा जो उसके वचन को तुच्छ जानते हैं और उसे सुनने और सीखने को तैयार नहीं हैं, विशेषकर उस समय जो इस प्रयोजन के लिए ठहराया गया है।
इसलिए इस आज्ञा के विरुद्ध केवल वे ही पाप नहीं करते जो पवित्र दिन का घोर दुरुपयोग करते और उसे अपवित्र करते हैं, जैसे वे जो अपने लोभ या ओछेपन के कारण परमेश्वर का
वचन सुनने की उपेक्षा करते हैं या मदिरालयों में पड़े रहते हैं और सूअरों की नाईं धुत्त होकर पड़े रहते हैं; वरन् वह दूसरी भीड़ भी, जो परमेश्वर के वचन को किसी और तुच्छ बात की नाईं सुनती है, और केवल रीति के कारण प्रचार में आती है, और फिर चली जाती है, और वर्ष के अन्त में उसके विषय में उतना ही कम जानती है जितना आरम्भ में। क्योंकि अब तक यह धारणा प्रचलित रही कि यदि तुमने एक मिस्सा सुन लिया या सुसमाचार का पाठ सुन लिया, तो तुमने रविवार को ठीक रीति से पवित्र मान लिया; परन्तु किसी ने परमेश्वर के वचन की चिन्ता न की, जैसे किसी ने उसे सिखाया भी नहीं। अब, जबकि हमारे पास परमेश्वर का वचन है, तौभी हम दुरुपयोग को सुधारते नहीं; हम अपने को प्रचार सुनने और चेतावनी पाने तो देते हैं, परन्तु बिना गम्भीरता और ध्यान के सुनते हैं।
इसलिए जान लो कि तुम्हें केवल सुनने की ही नहीं, वरन् उसे सीखने और स्मरण में रखने की भी चिन्ता करनी चाहिए, और यह न सोचो कि यह तुम्हारी इच्छा पर छोड़ा गया है या बहुत महत्त्व की बात नहीं, वरन् यह कि यह परमेश्वर की आज्ञा है, जो तुमसे लेखा माँगेगा कि तुमने उसके वचन को कैसे सुना, सीखा और आदर दिया है।
वैसे ही उन नकचढ़ी आत्माओं को भी डाँटा जाना चाहिए जो एक-दो उपदेश सुन लेने पर उसे उबाऊ और नीरस पाते हैं, यह सोचकर कि वे यह सब भली-भाँति जानते हैं, और उन्हें और शिक्षा की आवश्यकता नहीं। क्योंकि ठीक यही वह पाप है जो अब तक प्राणघातक पापों में गिना जाता रहा है, और _achedia_ (आकेदिया) कहलाता है, अर्थात् सुस्ती या ऊब, एक घातक, खतरनाक महामारी जिससे शैतान बहुतों के हृदयों पर जादू करता और उन्हें धोखा देता है, ताकि वह हमें अचानक आ घेरे और चुपके से परमेश्वर का वचन हमसे छीन ले।
क्योंकि मैं तुमसे यह कहता हूँ, चाहे तुम उसे पूरी रीति से जानते हो और सब बातों में पहले से ही निपुण हो, तौभी तुम प्रतिदिन शैतान के अधिकार-क्षेत्र में हो, जो न दिन को और न रात को रुकता है कि बिना तुम्हारे जाने तुम पर चुपके से टूट पड़े, और तुम्हारे हृदय में पिछली और सब आज्ञाओं के विरुद्ध अविश्वास और दुष्ट विचार सुलगाए। इसलिए तुम्हें परमेश्वर का वचन सदा अपने हृदय में, अपने होंठों पर और अपने कानों में रखना चाहिए। परन्तु जहाँ हृदय निठल्ला है, और वचन नहीं गूँजता, वहाँ वह घुस आता है और इससे पहले कि हमें पता चले, हानि कर चुका होता है। दूसरी ओर, वचन का प्रभाव ऐसा है कि जब कभी उस पर गम्भीरता से मनन किया जाता है, उसे सुना और काम में लाया जाता है, तो वह कभी फल के बिना नहीं रहता, वरन् सदा नई समझ, आनन्द और भ-
