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चौथी आज्ञा। patres patriae, अर्थात् सारे देश के पिता, कहते थे, हम पर, जो मसीही होना चाहते हैं, यह बड़ी लज्जा की बात है कि हम उन्हें वैसे ही नहीं पुकारते, या कम से कम उन्हें वैसा नहीं मानते और उनका वैसा आदर नहीं करते।
अब, जो कुछ एक बच्चा पिता और माता का ऋणी है, वही वे सब ऋणी हैं जो घर-गृहस्थी में सम्मिलित हैं। इसलिए दासों और दासियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे न केवल अपने स्वामियों और स्वामिनियों की आज्ञा मानें, वरन् अपने ही पिताओं और माताओं की नाईं उनका आदर भी करें, और वह सब कुछ करें जिसकी वे जानते हैं कि उनसे आशा की जाती है, विवशता और अनिच्छा से नहीं, वरन् अभी बताए गए कारण से प्रसन्नता और आनन्द के साथ, अर्थात् यह कि यह परमेश्वर की आज्ञा है और सब दूसरे कामों से बढ़कर उसे भाता है। इसलिए उन्हें तो ऊपर से मज़दूरी देनी चाहिए और आनन्दित होना चाहिए कि उन्हें ऐसे स्वामी और स्वामिनियाँ मिल सकते हैं जिससे उनका विवेक ऐसा आनन्दित रहे और वे जानें कि वे सचमुच सोने जैसे काम कैसे कर सकते हैं; यह ऐसी बात है जिसकी अब तक उपेक्षा और तिरस्कार किया गया है, जबकि इसके स्थान पर हर कोई शैतान के नाम में मठों में, या तीर्थयात्राओं और पाप-क्षमा-पत्रों के पीछे, [समय और धन की] हानि और बुरे विवेक के साथ दौड़ता रहा।
तो यदि यह सत्य गरीब लोगों के मन में बैठाया जा सके, तो एक सेविका उछल पड़ेगी और परमेश्वर की स्तुति और धन्यवाद करेगी; और अपने सुथरे काम से, जिसके लिए उसे भरण-पोषण और मज़दूरी मिलती है, वह ऐसा खज़ाना पाएगी जैसा उन सब ने नहीं पाया जो सबसे बड़े संत माने जाते हैं। क्या यह जानना और कहना एक उत्तम घमण्ड नहीं है कि यदि तुम अपना प्रतिदिन का घरेलू काम करते हो, तो यह भिक्षुओं की सारी पवित्रता और तपस्वी जीवन से उत्तम है? और इसके अतिरिक्त तुम्हारे पास यह प्रतिज्ञा है कि तुम सब भलाई में फलोगे-फूलोगे और तुम्हारा भला होगा। जहाँ तक तुम्हारे कामों का सम्बन्ध है, तुम इससे अधिक धन्य या पवित्र जीवन कैसे जी सकते हो? क्योंकि परमेश्वर की दृष्टि में विश्वास ही वह है जो वास्तव में किसी व्यक्ति को पवित्र बनाता है, और केवल वही उसकी सेवा करता है, परन्तु काम मनुष्य की सेवा के लिए हैं। वहाँ तुम्हारे पास सब भलाई है, प्रभु में सुरक्षा और बचाव, आनन्दित विवेक और इसके अतिरिक्त एक अनुग्रहकारी परमेश्वर, जो तुम्हें सौ गुणा प्रतिफल देगा, ताकि यदि तुम केवल भक्त और आज्ञाकारी हो, तो तुम एक कुलीन पुरुष के समान हो। परन्तु यदि नहीं, तो पहले तो तुम्हारे पास परमेश्वर के क्रोध और अप्रसन्नता के सिवा कुछ नहीं, हृदय में कोई शान्ति नहीं, और बाद में हर प्रकार की विपत्तियाँ और दुर्भाग्य।
जो कोई इससे प्रभावित नहीं होगा और भक्ति की ओर नहीं झुकेगा, उसे हम जल्लाद और कंकाल-पुरुष के हवाले करते हैं। इसलिए हर एक जो सम्मति मानने को तैयार है, स्मरण रखे कि परमेश्वर खेल नहीं कर रहा, और जान ले कि परमेश्वर ही तुमसे बात करता है और आज्ञाकारिता माँगता है। यदि तुम उसकी आज्ञा मानते हो, तो तुम उसके प्रिय बच्चे हो; परन्तु यदि तुम ऐसा करने को तुच्छ जानते हो, तो अपने प्रतिफल के रूप में लज्जा, दुर्दशा और शोक लो।
यही बात नागरिक शासन की आज्ञाकारिता के विषय में भी कही जानी चाहिए, जो (जैसा हम कह चुके हैं) पूरी रीति से पितृत्व की पदवी में सम्मिलित है और सब सम्बन्धों में सबसे दूर तक फैली हुई है। क्योंकि यहाँ पिता किसी एक परिवार का नहीं, वरन् उतने लोगों का है जितने उसके किरायेदार, नागरिक या प्रजा हैं। क्योंकि उनके द्वारा, जैसे हमारे माता-पिता के द्वारा, परमेश्वर हमें भोजन, घर-बार, सुरक्षा और निश्चिन्तता देता है। इसलिए, क्योंकि वे सारे आदर के साथ ऐसा नाम और उपाधि धारण करते हैं, जैसे
