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चौथी आज्ञा। तुम पिता और माता की आज्ञा न मानोगे और उनके अनुशासन के अधीन न होगे, तो जल्लाद की आज्ञा मानो; यदि तुम उसकी आज्ञा न मानोगे, तो कंकाल-पुरुष के, अर्थात् मृत्यु के अधीन हो जाओ [मृत्यु, जो सब को वश में करती है, दुष्ट बच्चों की शिक्षिका]। क्योंकि इस बात पर परमेश्वर दृढ़ता से अड़ा है: या तो यदि तुम प्रेम और सेवा देकर
उसकी आज्ञा मानोगे, तो वह तुम्हें सब भलाई से बहुतायत से प्रतिफल देगा, या यदि तुम उसे अप्रसन्न करोगे, तो वह तुम पर मृत्यु और जल्लाद दोनों भेजेगा।
इतने सारे दुष्ट कहाँ से आते हैं जिन्हें प्रतिदिन फाँसी दी जानी, सिर काटा जाना, पहिये पर तोड़ा जाना पड़ता है, सिवाय [माता-पिता की] आज्ञा न मानने के, क्योंकि वे दयालुता से अनुशासन के अधीन नहीं होते, यहाँ तक कि परमेश्वर के दण्ड के द्वारा वे ऐसा कर बैठते हैं कि हम उनका दुर्भाग्य और शोक देखते हैं? क्योंकि ऐसे टेढ़े लोग कम ही स्वाभाविक या समय पर मृत्यु मरते हैं।
परन्तु भक्त और आज्ञाकारी लोगों को यह आशीष मिलती है कि वे सुखद शान्ति में बहुत दिन जीते हैं और अपने बच्चों के बच्चों को (जैसा ऊपर कहा गया) तीसरी और चौथी पीढ़ी तक देखते हैं।
अनुभव भी यही सिखाता है, कि जहाँ आदरणीय, पुराने परिवार हैं जो फलते-फूलते हैं और जिनके बहुत से बच्चे हैं, वे निश्चय ही अपना उद्गम इस बात के ऋणी हैं कि उनमें से कुछ भली-भाँति पाले गए और अपने माता-पिता का ध्यान रखते थे। दूसरी ओर, दुष्टों के विषय में लिखा है, भजन संहिता 109,13: उसका वंश नाश हो जाए; और दूसरी पीढ़ी में उनका नाम मिटा दिया जाए। इसलिए भली-भाँति ध्यान दो कि परमेश्वर की दृष्टि में आज्ञाकारिता कितनी बड़ी बात है, क्योंकि वह उसे इतना ऊँचा मानता है, उससे इतना प्रसन्न होता है, और उसका इतना भरपूर प्रतिफल देता है, और इसके अतिरिक्त जो इसके विपरीत चलते हैं उन पर इतनी कड़ाई से दण्ड लागू करता है।
यह सब मैं इसलिए कहता हूँ कि यह जवानों के मन में भली-भाँति बैठाया जाए। क्योंकि कोई विश्वास नहीं करता कि यह आज्ञा कितनी आवश्यक है, यद्यपि पोप-तन्त्र के अधीन अब तक इसे न तो मान दिया गया और न सिखाया गया। ये सरल और सहज शब्द हैं, और हर कोई सोचता है कि वह इन्हें पहले से जानता था; इसलिए लोग इन्हें हल्के में लेकर आगे बढ़ जाते हैं, दूसरी बातों की ओर मुँह बाए ताकते हैं, और न यह देखते और विश्वास करते हैं कि यदि इनकी अवहेलना की जाए तो परमेश्वर इतना अधिक अप्रसन्न होता है, और न यह कि यदि कोई इनका पालन करे तो वह इतना भानेवाला और बहुमूल्य काम करता है।
इस आज्ञा में अधिकार रखनेवाले उन व्यक्तियों के प्रति, जिन्हें आज्ञा देनी और शासन करना होता है, हर प्रकार की आज्ञाकारिता के विषय में एक और कथन भी आता है। क्योंकि सारा अधिकार माता-पिता के अधिकार से ही बहता और फैलता है। क्योंकि जहाँ एक पिता अकेले अपने
[विद्रोही और चिड़चिड़े] बच्चे को शिक्षित करने में असमर्थ होता है, वहाँ वह उसे पढ़ाने के लिए एक शिक्षक रखता है; यदि वह बहुत निर्बल हो, तो वह अपने मित्रों और पड़ोसियों की सहायता लेता है; यदि वह इस जीवन से चला जाए, तो वह अपना अधिकार और शासन उन दूसरों को सौंपता और प्रदान करता है जो इस प्रयोजन के लिए ठहराए गए हैं। वैसे ही, घर-गृहस्थी के प्रबन्ध के लिए उसके अधीन घरेलू सेवक, दास और दासियाँ होने चाहिए, ताकि वे सब जिन्हें हम स्वामी कहते हैं, माता-पिता के स्थान पर हैं और उन्हें शासन करने की अपनी शक्ति और अधिकार उन्हीं से प्राप्त करने चाहिए। इसी कारण पवित्रशास्त्र में वे सब पिता भी कहलाते हैं, क्योंकि वे अपने शासन में पिता का काम करते हैं, और अपने अधीनों के प्रति उनका हृदय पिता जैसा होना चाहिए। जैसे प्राचीन काल से रोमी और दूसरी जातियाँ घर के स्वामियों और स्वामिनियों को patreset matresfamiliae कहती थीं, अर्थात् घर के पिता और घर की माताएँ। वैसे ही वे अपने राष्ट्रीय शासकों और अधिपतियों को
