भाग 22 / 37

वे विचार करें कि वे परमेश्वर की आज्ञाकारिता के बन्धन में हैं; और यह कि, सबसे पहले

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चौथी आज्ञा। वे विचार करें कि वे परमेश्वर की आज्ञाकारिता के बन्धन में हैं; और यह कि, सबसे पहले, उन्हें अपना पद गम्भीरता और विश्वासयोग्यता से निभाना चाहिए, न केवल अपने बच्चों, सेवकों, प्रजा, इत्यादि की शारीरिक आवश्यकताओं के लिए भरण-पोषण और प्रबन्ध करने के लिए, वरन् सबसे बढ़कर उन्हें परमेश्वर के आदर और स्तुति के लिए प्रशिक्षित करने के लिए। इसलिए यह न सोचो कि यह तुम्हारी प्रसन्नता और मनमानी पर छोड़ा गया है, वरन् यह कि यह परमेश्वर की कड़ी आज्ञा और आदेश है, जिसे तुम्हें इसका लेखा भी देना होगा।

परन्तु यहाँ फिर वही दुःखद दशा उत्पन्न होती है कि कोई इसे न समझता है न इस पर ध्यान देता है, और सब ऐसे जीते रहते हैं मानो परमेश्वर ने हमें बच्चे हमारी प्रसन्नता या मनोरंजन के लिए दिए हों, और सेवक इसलिए कि हम उन्हें गाय या गधे की नाईं केवल काम के लिए काम में लाएँ, या मानो हमें अपनी प्रजा के साथ केवल अपनी उच्छृंखलता को तृप्त करना हो, उनकी उपेक्षा करते हुए, मानो इससे हमें कोई सरोकार न हो कि वे क्या सीखते हैं या कैसे जीते हैं; और कोई यह देखना नहीं चाहता कि यह सर्वोच्च महामहिम की आज्ञा है, जो इसके लिए हमसे अत्यन्त कड़ाई से लेखा लेगा और हमें दण्ड देगा; और न यह कि जवानों के विषय में इतनी गम्भीरता से चिन्ता करने की कितनी बड़ी आवश्यकता है। क्योंकि यदि हम नागरिक और कलीसियाई दोनों प्रकार के शासन के लिए उत्तम और योग्य व्यक्ति चाहते हैं, तो हमें अपने बच्चों को सिखाने और शिक्षित करने में कोई परिश्रम, समय या खर्च नहीं बचाना चाहिए, ताकि वे परमेश्वर और संसार की सेवा कर सकें, और हमें केवल यही नहीं सोचना चाहिए कि हम उनके लिए धन और सम्पत्ति कैसे इकट्ठी करें। क्योंकि परमेश्वर तो हमारे बिना भी उनका भरण-पोषण कर सकता है और उन्हें धनी बना सकता है, जैसा वह प्रतिदिन करता है। परन्तु इसी प्रयोजन के लिए

उसने हमें बच्चे दिए हैं, और यह आज्ञा दी है कि हम उन्हें उसकी इच्छा के अनुसार प्रशिक्षित करें और उन पर शासन करें, नहीं तो उसे पिता और माता की कोई आवश्यकता न होती। इसलिए हर एक जान ले कि ईश्वरीय कृपा खो देने के खतरे पर उसका यह कर्तव्य है कि वह अपने बच्चों को सब बातों से बढ़कर परमेश्वर के भय और ज्ञान में पाले, और यदि वे प्रतिभाशाली हों, तो उन्हें कुछ सीखने और पढ़ने दे, ताकि जो भी आवश्यकता हो उसके लिए उन्हें काम में लाया जा सके [कि उन्हें उदार शिक्षा में सिखाया और प्रशिक्षित किया जाए, ताकि लोग शासन में और जो कुछ आवश्यक हो उसमें उनकी सहायता पा सकें]।

यदि ऐसा किया जाता, तो परमेश्वर भी हमें भरपूर आशीष देता और हमें ऐसे मनुष्यों को प्रशिक्षित करने का अनुग्रह देता जिनके द्वारा देश और लोग सुधर सकें, और वैसे ही सुशिक्षित नागरिक, पवित्र और गृहस्थी सँभालनेवाली पत्नियाँ, जो बाद में भक्त बच्चों और सेवकों को पालें। अब यहाँ विचार करो कि यदि तुम लापरवाह हो और अपनी ओर से अपने बच्चे को उपयोगिता और भक्ति में पालने में चूक जाते हो, तो तुम कितनी घातक हानि कर रहे हो, और कैसे तुम अपने ऊपर सारा पाप और क्रोध ले आते हो, और इस प्रकार अपने ही बच्चों के द्वारा नरक कमाते हो, चाहे तुम अन्यथा भक्त और पवित्र ही क्यों न हो। और क्योंकि इसकी अवहेलना की जाती है, इसलिए परमेश्वर संसार को इतना भयानक दण्ड देता है कि न अनुशासन है, न शासन, न शान्ति, जिसकी हम सब शिकायत करते हैं, परन्तु यह नहीं देखते कि यह हमारा ही दोष है; क्योंकि जैसे हम उन्हें प्रशिक्षित करते हैं, वैसे ही हमारे बिगड़े हुए और आज्ञा न माननेवाले बच्चे और प्रजा होती है। इतना उपदेश पर्याप्त हो; क्योंकि इसे विस्तार से खींचना किसी और समय का काम है।

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