पुस्तक XX, XXII में से · 30 अध्याय

पुस्तक XX

अन्तिम न्याय। अनुवादक: रेव. मार्कस डॉड्स, एम.ए.

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    1. यद्यपि परमेश्वर सर्वदा न्याय करता है, तथापि इस पुस्तक में हमारे विचार को उसके अन्तिम न्याय पर ही केन्द्रित रखना उचित है

    परमेश्वर के अनुग्रह पर आश्रित होकर उसके अन्तिम न्याय के दिन के विषय में बोलने का, और अधर्मियों तथा अविश्वासियों के विरुद्ध उसकी पुष्टि करने का विचार रखते हुए, हमें सबसे पहले, जैसे किसी भवन की नींव में, परमेश्वर की वाणियों को रखना चाहिए। जो लोग ऐसी वाणियों पर विश्वास नहीं करते, वे अपनी ओर से मिथ्या और भ्रमपूर्ण कुतर्कों द्वारा उनका विरोध करने का भरसक प्रयत्न करते हैं, या तो यह तर्क करते हुए कि जो पवित्रशास्त्र से लिया गया है उसका अर्थ कुछ और है, या पूर्णतः यह इन्कार करते हुए कि वह परमेश्वर की वाणी है। क्योंकि मुझे लगता है कि जो कोई भी लिखे हुए को समझता है, और यह विश्वास करता है कि यह उस परम और सच्चे परमेश्वर द्वारा पवित्र पुरुषों के माध्यम से सुनाया गया है, वह इन वाणियों के आगे झुकने और उनकी स्वीकृति देने से इन्कार नहीं करता—चाहे वह मुख से अपनी स्वीकृति स्वीकार करे, या किसी दुष्ट प्रभाव से लज्जित या भयभीत होकर ऐसा करने से बचे; अथवा यहाँ तक कि, उन्माद के समान एक हठधर्मिता के साथ, वह उस बात का बचाव करने का प्रबल प्रयत्न करता है जिसे वह जानता और मानता है कि झूठ है, उस बात के विरुद्ध जिसे वह जानता और मानता है कि सत्य है।

    इस कारण, जिसे सच्चे परमेश्वर की सारी कलीसिया अपने विश्वास के रूप में धारण और अंगीकार करती है, कि मसीह जीवतों और मृतकों का न्याय करने के लिए स्वर्ग से आएगा, उसे हम परमेश्वर के न्याय का अन्तिम दिन, या अन्तिम काल, कहते हैं। क्योंकि हम नहीं जानते कि यह न्याय कितने दिनों तक चलेगा; परन्तु जो कोई भी पवित्रशास्त्र को पढ़ता है, यद्यपि असावधानी से ही क्यों न हो, उसे यह बताने की आवश्यकता नहीं कि उनमें "दिन" शब्द प्रायः "काल" के अर्थ में उपयोग किया जाता है। और जब हम परमेश्वर के न्याय के दिन की बात करते हैं, तो हम "अन्तिम" या "अन्त्य" शब्द इस कारण जोड़ते हैं, क्योंकि परमेश्वर अभी भी न्याय करता है, और मानव इतिहास के आरम्भ से ही न्याय करता आया है, उन प्रथम मनुष्यों को स्वर्गोद्यान से निकालकर और जीवन के वृक्ष से वंचित करके, जिन्होंने इतना बड़ा पाप किया। हाँ, वह निश्चय ही न्याय कर रहा था जब उसने पाप करनेवाले स्वर्गदूतों को भी नहीं छोड़ा, जिनका प्रधान, डाह से जीता जाकर, स्वयं छला जाने के बाद मनुष्यों को छलनेवाला बना। न ही यह परमेश्वर के गहन और न्यायपूर्ण निर्णय के बिना है कि दानवों और मनुष्यों का जीवन—एक वायु में, दूसरा पृथ्वी पर—दुःख, विपत्तियों, और भूलों से भरा है। और यदि किसी ने भी पाप न किया होता, तो भी यह केवल परमेश्वर के भले और उचित निर्णय से ही होता कि सारी बुद्धिसंगत सृष्टि अपने प्रभु के प्रति अटूट भक्ति बनाए रखकर अनन्त धन्यता में बनी रह सके। वह मात्र सामूहिक रूप से ही न्याय नहीं करता, दानवों की जाति और मनुष्यों की जाति को उनके आदि पाप के कारण दुःखी होने के लिए दण्डित करता है, वरन् वह व्यक्तियों के इच्छापूर्वक और निजी कार्यों का भी न्याय करता है। क्योंकि दानव भी यह प्रार्थना करते हैं कि उन्हें सताया न जाए,[673] जो यह सिद्ध करता है कि अन्याय किए बिना उन्हें उनके योग्य कर्मों के अनुसार या तो छोड़ा जा सकता है या सताया जा सकता है। और मनुष्य अपने पापों के लिए परमेश्वर द्वारा प्रायः प्रकट रूप से, और सर्वदा गुप्त रूप से, इस जीवन में या मृत्यु के बाद दण्डित किए जाते हैं, यद्यपि कोई भी मनुष्य परमेश्वर की सहायता के बिना उचित कार्य नहीं करता; और कोई भी मनुष्य या दानव परमेश्वर के दिव्य और परम न्यायपूर्ण निर्णय की अनुमति के बिना अनुचित कार्य नहीं करता। क्योंकि, जैसा प्रेरित कहता है, "परमेश्वर में कोई अधर्म नहीं है;"[674] और जैसा वह अन्यत्र कहता है, "उसके निर्णय अगम्य हैं, और उसके मार्ग अगोचर हैं।"[675] इस पुस्तक में, इसलिए, मैं परमेश्वर की अनुमति से, न उन आदि न्यायों की बात करूँगा, न इन बीच के परमेश्वर के न्यायों की, वरन् उस अन्तिम न्याय की, जब मसीह जीवतों और मृतकों का न्याय करने के लिए स्वर्ग से आएगा। क्योंकि वही दिन ठीक ही न्याय का दिन कहलाता है, क्योंकि उसमें इस अज्ञानतापूर्ण प्रश्न के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा कि यह दुष्ट व्यक्ति क्यों सुखी है और वह धर्मी व्यक्ति क्यों दुःखी है। उस दिन सच्ची और पूर्ण धन्यता केवल भले लोगों का भाग्य होगी, जबकि उचित और परम दुःख केवल दुष्टों का, और उन्हीं का, भाग होगा।

    2. मानवीय व्यवहारों के मिश्रित जाल में परमेश्वर का न्याय विद्यमान है, यद्यपि उसे पहचाना नहीं जा सकता

    इस वर्तमान समय में हम उन कष्टों को धैर्यपूर्वक सहना सीखते हैं जिनके अधीन भले मनुष्य भी होते हैं, और उन आशीषों को तुच्छ समझना सीखते हैं जिनका भोग दुष्ट भी करते हैं। और इस कारण, जीवन की उन दशाओं में भी, जिनमें परमेश्वर का न्याय स्पष्ट नहीं होता, उसकी शिक्षा हितकारी है। क्योंकि हम नहीं जानते कि परमेश्वर के किस निर्णय से यह भला मनुष्य निर्धन है और वह दुष्ट मनुष्य धनी है; क्यों वह, जो हमारी दृष्टि में अपने त्यागे हुए जीवन के लिए घोर दुःख भोगने योग्य है, आनन्द मनाता है, जबकि वह जिसका सराहनीय जीवन हमें यह सोचने पर विवश करता है कि वह सुखी होना चाहिए, दुःख से पीड़ित रहता है; क्यों निर्दोष मनुष्य न्यायालय से न केवल प्रतिकार बिना, वरन् दण्डित होकर विदा किया जाता है, या तो न्यायी के अन्याय से हानि उठाकर, या झूठी गवाही से दबाकर, जबकि इसके विपरीत उसका दोषी विपक्षी न केवल दण्ड बिना छोड़ा जाता है, वरन् उसके दावे भी स्वीकृत किए जाते हैं; क्यों अधर्मी अच्छे स्वास्थ्य का भोग करता है, जबकि धर्मी रोग में क्षीण होता है; क्यों दुष्ट लोग सबसे सुदृढ़ शरीर के होते हैं, जबकि जो किसी को एक शब्द से भी हानि नहीं पहुँचा सकते वे बचपन ही से जटिल रोगों से पीड़ित रहते हैं; क्यों जो समाज के लिए उपयोगी है वह असामयिक मृत्यु से छीन लिया जाता है, जबकि जिन्हें, जैसा प्रतीत हो, कभी जन्म ही नहीं लेना चाहिए था, वे असाधारण दीर्घ जीवन पाते हैं; क्यों जो पापों से भरा हुआ है वह सम्मान से विभूषित किया जाता है, जबकि निर्दोष मनुष्य उपेक्षा के अन्धकार में गड़ा रहता है। परन्तु इस प्रकार के सब विरोधाभासों को कौन एकत्र या गणना कर सकता है? परन्तु यदि यह असंगत स्थिति इस जीवन में सर्वदा एक-सी रहती, जिसमें, जैसा पवित्र स्तोत्रकार कहता है, "मनुष्य व्यर्थता के समान है, उसके दिन ढलती हुई छाया के समान हैं,"[676]—इतनी एक-सी कि पृथ्वी की क्षणिक समृद्धि केवल दुष्ट ही पाते, और उसके कष्ट केवल भले ही भोगते,—तो इसे परमेश्वर के न्यायपूर्ण, वरन् दयालु निर्णय से जोड़ा जा सकता था। हम यह मान सकते थे कि जो उन अनन्त आशीषों को, जो मानवीय धन्यता का सार हैं, पाने के लिए नियत नहीं हैं, वे या तो अपनी दुष्टता के उचित प्रतिफल के रूप में क्षणिक आशीषों से भ्रमित किए गए हैं, या परमेश्वर की दया से उनके द्वारा शान्ति दी गई है, और जो अनन्त पीड़ाएँ भोगने के लिए नियत नहीं हैं, वे अपने पापों के लिए कालिक ताड़ना से पीड़ित किए गए हैं, या पुण्य में अधिक उन्नति के लिए प्रेरित किए गए हैं। परन्तु अब, जैसा वास्तव में है, क्योंकि हम न केवल भले मनुष्यों को जीवन के कष्टों में फँसा और दुष्ट मनुष्यों को उसके सुखों का भोग करते देखते हैं, जो अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है, वरन् यह भी कि दुष्टता प्रायः दुष्टों पर ही आ पड़ती है, और भलाई भलों को ही चौंका देती है, इसी कारण परमेश्वर के निर्णय अगम्य हैं, और उसके मार्ग अगोचर हैं। इसलिए, यद्यपि हम नहीं जानते कि परमेश्वर, जिसमें सर्वोच्च पुण्य, सर्वोच्च बुद्धि, सर्वोच्च न्याय है, न कोई दुर्बलता, न उतावलापन, न अन्याय, किस निर्णय से ये बातें करता या होने देता है, तो भी हमारे लिए यह हितकारी है कि हम ऐसी बातों को, चाहे भली हों या बुरी, जो भले और बुरे दोनों को समान रूप से प्राप्त होती हैं, तुच्छ समझना सीखें, और उन भली वस्तुओं की लालसा करें जो केवल भले लोगों की हैं, और उन बुराइयों से भागें जो केवल बुरे लोगों की हैं। परन्तु जब हम उस न्याय तक पहुँचेंगे, जिसका समय विशेष रूप से न्याय का दिन, और कभी-कभी प्रभु का दिन, कहलाता है, तब हम परमेश्वर के सब न्यायों की न्यायपूर्णता को पहचानेंगे, न केवल उनकी जो तब घोषित किए जाएँगे, वरन् उन सबकी भी जो आदि से प्रभावी हो चुके हैं, या उस समय से पहले प्रभावी हो सकते हैं। और उस दिन हम यह भी पहचानेंगे कि किस न्यायपूर्णता से परमेश्वर के इतने अधिक, वरन् प्रायः सभी, न्यायपूर्ण निर्णय इस वर्तमान जीवन में मानवीय बोध या अन्तर्दृष्टि की जाँच से परे रहते हैं, यद्यपि इस विषय में भक्त मनों से यह छिपा नहीं है कि जो छिपा है वह न्यायपूर्ण है।

    3. सुलैमान सभोपदेशक की पुस्तक में उन बातों के विषय में क्या कहता है जो भले और दुष्ट दोनों मनुष्यों पर समान रूप से घटित होती हैं

    इस्राएल का बुद्धिमानतम राजा सुलैमान, जो यरूशलेम में राज्य करता था, उस पुस्तक को, जिसे सभोपदेशक कहा जाता है, और जिसे यहूदी अपने प्रामाणिक ग्रंथों में गिनते हैं, इस प्रकार आरम्भ करता है: "व्यर्थ ही व्यर्थ, सभोपदेशक ने कहा, व्यर्थ ही व्यर्थ; सब कुछ व्यर्थ है। मनुष्य को उस सारे परिश्रम से जो वह धरती पर करता है क्या प्राप्त होता है?"[677] और इस विषय को लेकर इस जीवन की विपत्तियों और भ्रमों, तथा वर्तमान काल की परिवर्तनशील प्रकृति को, जिसमें कुछ भी ठोस या स्थायी नहीं है, गणना करते हुए आगे बढ़कर, वह धरती के नीचे की अन्य व्यर्थताओं के बीच यह भी विलाप करता है, कि यद्यपि बुद्धि मूर्खता से उतनी ही बढ़कर है जितना उजियाला अन्धकार से बढ़कर है, और यद्यपि बुद्धिमान की आँखें उसके सिर में होती हैं, जबकि मूर्ख अन्धकार में चलता है,[678] तो भी एक ही घटना सब पर पड़ती है, अर्थात्, इस धरती के नीचे इस जीवन में, निश्चय ही उन्हीं बुराइयों की ओर संकेत करते हुए जिन्हें हम भले और बुरे दोनों मनुष्यों पर समान रूप से पड़ते देखते हैं। वह आगे कहता है कि भले लोग जीवन के कष्ट ऐसे भोगते हैं जैसे वे कुकर्मी हों, और बुरे लोग जीवन के सुख ऐसे भोगते हैं जैसे वे भले हों। "पृथ्वी पर एक व्यर्थता की जाती है; कि धर्मी लोग हैं जिनके साथ वैसा ही होता है जैसा दुष्टों के कर्म के अनुसार होना चाहिए: फिर, दुष्ट लोग हैं जिनके साथ वैसा ही होता है जैसा धर्मियों के कर्म के अनुसार होना चाहिए। मैंने कहा, कि यह भी व्यर्थता है।"[679] इस बुद्धिमानतम पुरुष ने अपनी यह सारी पुस्तक इस व्यर्थता के पूर्ण उद्घाटन के लिए समर्पित की, जो स्पष्टतः इसी उद्देश्य से कि हम उस जीवन की लालसा करें जिसमें धरती के नीचे कोई व्यर्थता नहीं, वरन् उसके अधीन सत्यता है जिसने सूर्य को बनाया। इस व्यर्थता में, तो, क्या यह परमेश्वर के न्यायपूर्ण और उचित निर्णय के अनुसार नहीं था कि मनुष्य, व्यर्थता के समान बनाया गया, बीत जाने के लिए नियत था? परन्तु व्यर्थता के इन दिनों में यह महत्वपूर्ण भेद रखता है कि वह सत्य का प्रतिरोध करता है या उसके अधीन होता है, और कि वह सच्ची भक्ति से रहित है या उसका भागी है,—महत्वपूर्ण इस दृष्टि से नहीं कि इस क्षणिक और व्यर्थ जीवन की आशीषें पाई जाएँ या उसकी विपत्तियों से बचा जाए, वरन् उस भविष्य के न्याय के सम्बन्ध में जो भले मनुष्यों को भली वस्तुएँ, और बुरे मनुष्यों को बुरी वस्तुएँ, स्थायी, अहरणीय अधिकार में सौंप देगा। अन्त में, यह बुद्धिमान पुरुष अपनी इस पुस्तक को यह कहकर समाप्त करता है, "परमेश्वर का भय मान, और उसकी आज्ञाओं का पालन कर: क्योंकि यही सब मनुष्यों के लिए है। क्योंकि परमेश्वर हर एक काम को, हर एक तुच्छ जन के साथ, न्याय में लाएगा, चाहे वह भला हो या बुरा।"[680] इससे अधिक सच्ची, संक्षिप्त, और हितकारी उक्ति और क्या हो सकती थी? "परमेश्वर का भय मान," वह कहता है, "और उसकी आज्ञाओं का पालन कर: क्योंकि यही सब मनुष्यों के लिए है।" क्योंकि जो कोई भी वास्तविक अस्तित्व रखता है, वह यही है, अर्थात् परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करनेवाला है; और जो यह नहीं है, वह कुछ भी नहीं है। क्योंकि जब तक वह व्यर्थता की समानता में रहता है, वह सत्यता के प्रतिरूप में नया नहीं किया जाता। "क्योंकि परमेश्वर हर एक काम को न्याय में लाएगा,"—अर्थात्, जो कुछ भी मनुष्य इस जीवन में करता है,—"चाहे वह भला हो या बुरा, हर एक तुच्छ जन के साथ,"—अर्थात्, हर उस मनुष्य के साथ जो यहाँ तुच्छ प्रतीत होता है, और इस कारण गिना नहीं जाता; क्योंकि परमेश्वर उसे भी देखता है, और उसे न तुच्छ जानता है, न अपने न्याय में उसे छोड़ता है।

    4. कि अन्तिम न्याय के प्रमाण पहले नये नियम से, और फिर पुराने नियम से, प्रस्तुत किए जाएँगे

    अतः परमेश्वर के इस अन्तिम न्याय के जो प्रमाण मैं प्रस्तुत करना चाहता हूँ, वे पहले नये नियम से, और फिर पुराने नियम से लिए जाएँगे। क्योंकि यद्यपि पुराना नियम समय की दृष्टि से पहले है, नया नियम आन्तरिक महत्ता में प्रथम स्थान रखता है; क्योंकि पुराना नये के लिए अग्रदूत का कार्य करता है। इसलिए हम पहले नये नियम से वचन उद्धृत करेंगे, और उन्हें पुराने नियम की उक्तियों से पुष्ट करेंगे। पुराने में व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता हैं, नये में सुसमाचार और प्रेरितों की पत्रियाँ। अब प्रेरित कहता है, "व्यवस्था के द्वारा पाप का ज्ञान होता है। परन्तु अब परमेश्वर की धार्मिकता व्यवस्था के बिना प्रकट हुई है, जिसकी गवाही व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता देते हैं; अब परमेश्वर की धार्मिकता यीशु मसीह पर विश्वास करने से उन सब पर है जो विश्वास करते हैं।"[681] परमेश्वर की यह धार्मिकता नये नियम से सम्बन्धित है, और इसका साक्ष्य पुरानी पुस्तकों में, अर्थात् व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं में, विद्यमान है। इसलिए मैं पहले मुकद्दमा प्रस्तुत करूँगा, और फिर गवाहों को बुलाऊँगा। यह क्रम स्वयं यीशु मसीह हमें पालन करने का निर्देश देता है, यह कहते हुए, "परमेश्वर के राज्य में शिक्षा पाया हुआ शास्त्री उस भले घर के स्वामी के समान है, जो अपने भण्डार से नई और पुरानी वस्तुएँ निकालता है।"[682] उसने "पुरानी और नई" नहीं कहा, जो वह अवश्य कहता यदि वह समय के क्रम के बजाय महत्ता के क्रम का अनुसरण करना न चाहता।

    5. वे वचन जिनमें उद्धारकर्ता घोषणा करता है कि जगत के अन्त में परमेश्वर का न्याय होगा

    उद्धारकर्ता स्वयं, उन नगरों को डाँटते हुए जिनमें उसने बड़े-बड़े काम किए थे परन्तु जिन्होंने विश्वास नहीं किया, और उन्हें विदेशी नगरों की तुलना में प्रतिकूल स्थिति में रखते हुए, कहता है, "परन्तु मैं तुम से कहता हूँ, कि न्याय के दिन सोर और सैदा के लोगों का दोष तुम्हारे दोष से हलका ठहरेगा।"[683] और कुछ आगे वह कहता है, "मैं तुम से सच कहता हूँ, कि न्याय के दिन सदोम देश का दोष तुझ से हलका ठहरेगा।"[684] यहाँ वह अत्यन्त स्पष्टता से यह भविष्यवाणी करता है कि न्याय का एक दिन आनेवाला है। और एक अन्य स्थान पर वह कहता है, "नीनवे के लोग न्याय में इस पीढ़ी के साथ उठेंगे, और इसे दोषी ठहराएँगे: क्योंकि उन्होंने योना के प्रचार से मन फिराया; और देखो, योना से बड़ा यहाँ है। दक्षिण की रानी न्याय में इस पीढ़ी के साथ उठेगी, और इसे दोषी ठहराएगी: क्योंकि वह पृथ्वी के दूर-दूर देशों से सुलैमान का ज्ञान सुनने आई; और देखो, सुलैमान से बड़ा यहाँ है।"[685] इस वचन से हम दो बातें सीखते हैं, कि न्याय होगा, और कि वह मृतकों के पुनरुत्थान के समय होगा। क्योंकि जब वह नीनवे के लोगों और दक्षिण की रानी के विषय में बोला, तो निश्चय ही वह मृत व्यक्तियों के विषय में बोल रहा था, तो भी उसने कहा कि वे न्याय के दिन उठेंगे। उसने यह नहीं कहा, "वे दोषी ठहराएँगे," जैसे कि वे स्वयं न्यायी होंगे, वरन् इस कारण कि, उनकी तुलना में, दूसरे न्यायसंगत रूप से दोषी ठहराए जाएँगे।

    फिर, एक अन्य वचन में, जिसमें वह भले और बुरे के वर्तमान मिश्रण और भविष्य के पृथक्करण की बात कर रहा था,—वह पृथक्करण जो न्याय के दिन किया जाएगा,—उसने बोए हुए गेहूँ और उनके बीच बोए हुए जंगली दाने से एक तुलना प्रस्तुत की, और अपने चेलों को इसका यह अर्थ बताया: "जो अच्छा बीज बोता है वह मनुष्य का पुत्र है,"[686] आदि। यहाँ, निश्चय ही, उसने न्याय या न्याय के दिन का नाम नहीं लिया, परन्तु परिस्थितियों का वर्णन करके इसे कहीं अधिक स्पष्टता से इंगित किया, और भविष्यवाणी की कि यह जगत के अन्त में होगा।

    इसी प्रकार वह अपने चेलों से कहता है, "मैं तुम से सच कहता हूँ, कि तुम जिन्होंने मेरा अनुसरण किया है, नये सृजन में, जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा के सिंहासन पर बैठेगा, तुम भी बारह सिंहासनों पर बैठकर इस्राएल के बारह गोत्रों का न्याय करोगे।"[687] यहाँ हम सीखते हैं कि यीशु अपने चेलों के साथ न्याय करेगा। और इस कारण उसने यहूदियों से अन्यत्र कहा, "यदि मैं बालजबूल की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूँ, तो तुम्हारे पुत्र किस की सहायता से उन्हें निकालते हैं? इस कारण वे तुम्हारे न्यायी होंगे।"[688] न ही हमें यह मानना चाहिए कि केवल बारह मनुष्य ही उसके साथ न्याय करेंगे, यद्यपि वह कहता है कि वे बारह सिंहासनों पर बैठेंगे, क्योंकि बारह की संख्या से उन सबकी सम्पूर्णता संकेतित होती है जो न्याय करेंगे। क्योंकि सात की संख्या (जो प्रायः सम्पूर्णता का प्रतीक है) के दो भाग, अर्थात् चार और तीन, एक दूसरे से गुणा किए जाने पर बारह देते हैं। क्योंकि चार गुणा तीन, या तीन गुणा चार, बारह होते हैं। इस बारह की संख्या में और भी अर्थ हैं। यदि यह बारह सिंहासनों का सही अर्थ न होता, तो, क्योंकि हम पढ़ते हैं कि विश्वासघाती यहूदा के स्थान पर मत्तिय्याह प्रेरित नियुक्त किया गया, प्रेरित पौलुस, यद्यपि उसने उन सब से बढ़कर परिश्रम किया,[689] उसे न्याय का कोई सिंहासन न मिलता; परन्तु वह स्पष्ट रूप से स्वयं को न्यायियों की गिनती में सम्मिलित मानता है जब वह कहता है, "क्या तुम नहीं जानते कि हम स्वर्गदूतों का न्याय करेंगे?"[690] यही नियम बारह की संख्या को उन पर लागू करने में भी देखा जाना चाहिए जिनका न्याय किया जाना है। क्योंकि यद्यपि यह कहा गया, "इस्राएल के बारह गोत्रों का न्याय करते हुए," लेवी का गोत्र, जो तेरहवाँ है, इस कारण न्याय से मुक्त नहीं होगा, न ही न्याय केवल इस्राएल पर, और अन्य जातियों पर नहीं, किया जाएगा। और "नये सृजन में" शब्दों से उसका निश्चय ही अर्थ मृतकों का पुनरुत्थान समझा जाना था; क्योंकि हमारी देह अक्षयता द्वारा नई सृजी जाएगी, जैसे हमारा प्राण विश्वास द्वारा नया सृजा जाता है।

    अनेक वचन मैं छोड़ देता हूँ, क्योंकि, यद्यपि वे अन्तिम न्याय की ओर संकेत करते प्रतीत होते हैं, तो भी निकट परीक्षण करने पर वे अस्पष्ट पाए जाते हैं, या किसी अन्य घटना की ओर संकेत करते हैं,—चाहे उद्धारकर्ता के उस आगमन की ओर जो उसकी कलीसिया में, अर्थात् उसके अंगों में, निरन्तर होता रहता है, जिसमें वह थोड़ा-थोड़ा करके, टुकड़े-टुकड़े में आता है, क्योंकि सारी कलीसिया उसकी देह है, या यरूशलेम, इस पृथ्वी के नगर, के विनाश की ओर। क्योंकि जब वह इसकी भी बात करता है, तो वह प्रायः ऐसी भाषा का प्रयोग करता है जो जगत के अन्त और उस अन्तिम व महान न्याय के दिन पर भी लागू होती है, जिससे इन दोनों घटनाओं में तब तक भेद नहीं किया जा सकता जब तक तीनों सुसमाचार-लेखकों, मत्ती, मरकुस, और लूका, में इस विषय से सम्बन्धित सब समानान्तर वचनों की एक दूसरे से तुलना न की जाए,—क्योंकि कुछ बातें एक सुसमाचार-लेखक द्वारा अधिक अस्पष्ट रूप से, और दूसरे द्वारा अधिक स्पष्ट रूप से, कही गई हैं,—जिससे यह प्रकट हो जाता है कि किन बातों का सम्बन्ध किस एक घटना से समझा जाना है। यही वह कार्य है जो मैंने धन्य स्मृति के हेसिखियस, सैलोन के बिशप, को लिखे एक पत्र में, जिसका शीर्षक "जगत के अन्त के विषय में" है, करने का प्रयत्न किया है।[691]

    अब मैं मत्ती के सुसमाचार से वह वचन उद्धृत करूँगा जो मसीह के सर्वाधिक प्रभावी और अन्तिम न्याय द्वारा भले और दुष्ट के पृथक्करण की बात करता है: "जब मनुष्य का पुत्र," वह कहता है, "अपनी महिमा में आएगा,... तब वह अपने बाईं ओरवालों से भी कहेगा, हे शापितो, मेरे पास से उस अनन्त आग में चले जाओ जो शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गई है।"[692] तब वह इसी प्रकार दुष्टों को वे बातें गिनाता है जो उन्होंने नहीं की थीं, परन्तु जिनके विषय में उसने दाहिनी ओरवालों से कहा था कि उन्होंने की थीं। और जब वे पूछते हैं कि उन्होंने उसे कब इन वस्तुओं की आवश्यकता में देखा, तो वह उत्तर देता है कि, क्योंकि उन्होंने यह उसके इन छोटे भाइयों में से किसी एक के लिए नहीं किया, उन्होंने यह उसके लिए नहीं किया, और अपने वचन का समापन इन शब्दों में करता है, "और ये अनन्त दण्ड में चले जाएँगे, परन्तु धर्मी अनन्त जीवन में।" इसके अतिरिक्त, सुसमाचार-लेखक यूहन्ना अत्यन्त स्पष्टता से यह कहता है कि उसने पहले ही भविष्यवाणी की थी कि न्याय मृतकों के पुनरुत्थान के समय होगा। क्योंकि यह कहने के बाद, "पिता किसी का न्याय नहीं करता, वरन् उसने सारा न्याय पुत्र को सौंप दिया है; कि सब लोग पुत्र का वैसा ही आदर करें जैसा वे पिता का करते हैं: जो पुत्र का आदर नहीं करता, वह पिता का आदर नहीं करता जिसने उसे भेजा है;" वह तुरन्त जोड़ता है, "मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, कि जो मेरी बात सुनकर मेरे भेजनेवाले पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसी का है; और वह दण्ड की आज्ञा में नहीं आता, वरन् मृत्यु से पार होकर जीवन में आ गया है।"[693] यहाँ उसने कहा कि उस पर विश्वास करनेवाले न्याय में नहीं आएँगे। तो फिर, वे कैसे न्याय द्वारा दुष्टों से पृथक किए जाएँगे, और उसकी दाहिनी ओर बिठाए जाएँगे, यदि इस वचन में "न्याय" का अर्थ दण्डाज्ञा न हो? क्योंकि इस अर्थ में, वे न्याय में नहीं आते जो उसकी बात सुनते हैं, और उस पर विश्वास करते हैं जिसने उसे भेजा।

    6. पहला पुनरुत्थान क्या है, और दूसरा क्या है

    इसके बाद वह ये शब्द जोड़ता है, "मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, कि वह समय आता है, वरन् अभी है, जब मुर्दे परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे; और जो सुनेंगे वे जीएँगे। क्योंकि जैसे पिता के आप में जीवन है, वैसे उसने पुत्र को भी अपने आप में जीवन रखने का अधिकार दिया है।"[694] अभी तक वह दूसरे पुनरुत्थान की बात नहीं कर रहा, अर्थात् देह के पुनरुत्थान की, जो अन्त में होगा, वरन् पहले की, जो अभी है। यह भेद करने के लिए ही वह कहता है, "वह समय आता है, वरन् अभी है।" अब यह पुनरुत्थान देह से नहीं, वरन् प्राण से सम्बन्धित है। क्योंकि प्राणों की भी अपनी एक मृत्यु दुष्टता और पापों में होती है, जिससे वे उन मृतकों में गिने जाते हैं जिनके विषय में उन्हीं होठों ने कहा, "मुर्दों को अपने मुर्दे गाड़ने दो,"[695]—अर्थात्, जो प्राण में मरे हुए हैं वे उन्हें गाड़ें जो देह में मरे हुए हैं। इन्हीं मृतकों के विषय में, तो—अधर्म और दुष्टता में मरे हुओं के विषय में—वह कहता है, "वह समय आता है, वरन् अभी है, जब मुर्दे परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे; और जो सुनेंगे वे जीएँगे।" "जो सुनेंगे," अर्थात्, जो मानते हैं, विश्वास करते हैं, और अन्त तक स्थिर रहते हैं। यहाँ भले और बुरे में कोई भेद नहीं किया गया है। क्योंकि सब मनुष्यों के लिए यह भला है कि वे उसका शब्द सुनें और जीएँ, अधर्म की मृत्यु से भक्ति के जीवन में पार होकर। इस मृत्यु के विषय में प्रेरित पौलुस कहता है, "इसलिए सब मरे हुए हैं, और वह सब के लिए मरा, कि जो जीवित हैं वे आगे को अपने लिए न जीएँ, वरन् उसके लिए जो उनके लिए मरा और जी उठा।"[696] इस प्रकार सब, बिना किसी अपवाद के, पापों में मरे हुए थे, चाहे वे आदि पाप हों या इच्छापूर्वक किए गए पाप, अज्ञानतावश किए गए पाप, या ज्ञान के विरुद्ध किए गए पाप; और इन सब मृतकों के लिए वह एकमात्र जीवित व्यक्ति मरा, अर्थात् जिसमें कोई पाप नहीं था, जिससे जो अपने पापों की क्षमा से जीते हैं वे अपने लिए नहीं, वरन् उसके लिए जीएँ जो सब के लिए, हमारे पापों के लिए, मरा, और हमारी धार्मिकता के लिए जी उठा, जिससे हम, उस पर विश्वास करके जो अधर्मी को धर्मी ठहराता है, और अधर्म से धर्मी ठहराए जाकर या मृत्यु से जिलाए जाकर, उस पहले पुनरुत्थान को प्राप्त कर सकें जो अभी है। क्योंकि इस पहले पुनरुत्थान में केवल वे ही भागी होते हैं जो अनन्तकाल के लिए धन्य होंगे; परन्तु दूसरे में, जिसकी वह आगे बात करता है, सब, जैसा हम जानेंगे, भागी होते हैं, धन्य और दुखी दोनों। एक दया का पुनरुत्थान है, दूसरा न्याय का। और इस कारण स्तोत्र में लिखा है, "हे यहोवा, मैं दया और न्याय का गीत गाऊँगा; मैं तेरा ही भजन गाऊँगा।"[697]

    और इस न्याय के विषय में वह आगे कहता है, "और उसने उसे न्याय करने का भी अधिकार दिया है, क्योंकि वह मनुष्य का पुत्र है।" यहाँ वह दिखाता है कि वह उसी देह में न्याय करने आएगा जिसमें वह न्याय पाने आया था। क्योंकि यही दिखाने के लिए वह कहता है, "क्योंकि वह मनुष्य का पुत्र है।" और फिर हमारे प्रयोजन के लिए ये शब्द आते हैं: "इस पर अचम्भा मत करो: क्योंकि वह समय आता है, जिसमें जितने कब्रों में हैं वे उसका शब्द सुनकर निकल आएँगे; जिन्होंने भलाई की है वे जीवन के पुनरुत्थान के लिए, और जिन्होंने बुराई की है वे न्याय के पुनरुत्थान के लिए।"[698] यहाँ वह "न्याय" शब्द का प्रयोग उसी अर्थ में करता है जिसमें उसने थोड़ा पहले किया था, जब उसने कहा, "जो मेरी बात सुनकर मेरे भेजनेवाले पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसी का है, और वह न्याय में नहीं आता, वरन् मृत्यु से पार होकर जीवन में आ गया है;" अर्थात्, पहले पुनरुत्थान में भागी होने से, जिसके द्वारा इस वर्तमान समय में मृत्यु से जीवन की ओर पार होना होता है, वह उस दण्ड में नहीं आएगा, जिसे वह "न्याय" के नाम से पुकारता है, जैसे कि उस स्थान में भी जहाँ वह कहता है, "परन्तु जिन्होंने बुराई की है वे न्याय के पुनरुत्थान के लिए," अर्थात् दण्ड के लिए। इसलिए, जो कोई भी दूसरे पुनरुत्थान में दण्डित न होना चाहे, वह पहले में उठे। क्योंकि "वह समय आता है, वरन् अभी है, जब मुर्दे परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे; और जो सुनेंगे वे जीएँगे," अर्थात् वे उस दण्ड में नहीं आएँगे, जिसे दूसरी मृत्यु कहा जाता है; जिस मृत्यु में, दूसरे या शारीरिक पुनरुत्थान के बाद, वे झोंक दिए जाएँगे जो पहले या आत्मिक पुनरुत्थान में नहीं उठते। क्योंकि "वह समय आता है" (परन्तु यहाँ वह यह नहीं कहता, "वरन् अभी है," क्योंकि यह जगत के अन्त में, परमेश्वर के अन्तिम और सबसे महान न्याय में, आएगा) "जब जितने कब्रों में हैं वे उसका शब्द सुनकर निकल आएँगे।" वह यह नहीं कहता, जैसा पहले पुनरुत्थान में, "और जो सुनेंगे वे जीएँगे।" क्योंकि सब नहीं जीएँगे, कम से कम उस जीवन से नहीं जो अकेला जीवन कहलाने योग्य है क्योंकि वह अकेला धन्य है। क्योंकि उन्हें सुनने के लिए, और अपनी उठती हुई देहों में कब्रों से निकल आने के लिए, किसी न किसी प्रकार का जीवन तो होना ही चाहिए। और क्यों सब नहीं जीएँगे, यह वह आगे के शब्दों में सिखाता है: "जिन्होंने भलाई की है, जीवन के पुनरुत्थान के लिए,"—ये वे हैं जो जीएँगे; "परन्तु जिन्होंने बुराई की है, न्याय के पुनरुत्थान के लिए,"—ये वे हैं जो नहीं जीएँगे, क्योंकि वे दूसरी मृत्यु में मरेंगे। उन्होंने बुराई की है क्योंकि उनका जीवन बुरा रहा है; और उनका जीवन बुरा रहा है क्योंकि वह पहले या आत्मिक पुनरुत्थान में, जो अभी है, नया नहीं किया गया, या क्योंकि वे अपने नए किए गए जीवन में अन्त तक स्थिर नहीं रहे। जैसे, तो, दो नए जन्म हैं, जिनका मैं पहले ही उल्लेख कर चुका हूँ,—एक विश्वास के अनुसार, जो इस वर्तमान जीवन में बपतिस्मा के द्वारा होता है; दूसरा देह के अनुसार, जो अपनी अक्षयता और अमरता में महान और अन्तिम न्याय के द्वारा पूर्ण किया जाएगा,—वैसे ही दो पुनरुत्थान भी हैं,—एक पहला और आत्मिक पुनरुत्थान, जो इस जीवन में होता है, और हमें दूसरी मृत्यु में आने से बचाता है; दूसरा वह दूसरा पुनरुत्थान है, जो अभी नहीं, वरन् जगत के अन्त में होगा, और जो देह का है, प्राण का नहीं, और जो अन्तिम न्याय द्वारा कुछ को दूसरी मृत्यु में, और कुछ को उस जीवन में भेज देगा जिसमें कोई मृत्यु नहीं है।

    7. यूहन्ना के प्रकाशितवाक्य में दोनों पुनरुत्थानों और हज़ार वर्षों के विषय में क्या लिखा है, और इन बातों के विषय में युक्तिसंगत रूप से क्या माना जा सकता है

    सुसमाचार-लेखक यूहन्ना ने उस पुस्तक में, जो प्रकाशितवाक्य कहलाती है, इन दोनों पुनरुत्थानों की बात की है, परन्तु इस प्रकार कि कुछ मसीही इन दोनों में से पहले को नहीं समझते, और इस कारण इस वचन का अर्थ हास्यास्पद कल्पनाओं में बदल देते हैं। क्योंकि प्रेरित यूहन्ना उस पूर्वोक्त पुस्तक में कहता है, "और मैंने एक स्वर्गदूत को स्वर्ग से उतरते देखा.... धन्य और पवित्र है वह जो पहले पुनरुत्थान में भागी है: ऐसों पर दूसरी मृत्यु का कोई अधिकार नहीं; वरन् वे परमेश्वर और मसीह के याजक होंगे, और उसके साथ हज़ार वर्ष तक राज्य करेंगे।"[699] जिन्होंने इस वचन के बल पर यह सन्देह किया है कि पहला पुनरुत्थान भविष्य का और शारीरिक है, वे, अन्य बातों के साथ, विशेष रूप से हज़ार वर्षों की संख्या से प्रेरित हुए हैं, मानो यह उचित हो कि सन्त इस प्रकार उस काल में एक प्रकार के सब्त-विश्राम का आनन्द लें, मनुष्य के सृजे जाने और अपने महापाप के कारण स्वर्गोद्यान की धन्यता से इस मरणधर्मा जीवन के दुःखों में निकाले जाने के बाद के छः हज़ार वर्षों के परिश्रम के पश्चात एक पवित्र अवकाश; जिससे इस प्रकार, जैसा लिखा है, "प्रभु के लिए एक दिन हज़ार वर्ष के समान है, और हज़ार वर्ष एक दिन के समान,"[700] छः हज़ार वर्षों की पूर्णता के बाद, जैसे छः दिनों के बाद, आनेवाले हज़ार वर्षों में एक प्रकार का सातवें दिन का सब्त हो; और यह कि इसी प्रयोजन के लिए सन्त उठते हैं, अर्थात् इस सब्त को मनाने के लिए। और यह मत आपत्तिजनक न होता, यदि यह माना जाता कि उस सब्त में सन्तों का आनन्द आत्मिक होगा, और परमेश्वर की उपस्थिति के फलस्वरूप होगा; क्योंकि मैं स्वयं भी कभी यही मत रखता था।[701] परन्तु, क्योंकि वे यह दावा करते हैं कि जो तब पुनः उठेंगे वे असंयमित शारीरिक भोजों के अवकाश का आनन्द लेंगे, जिनमें इतना खाना-पीना होगा कि वह न केवल संयमी लोगों की भावना को धक्का पहुँचाएगा, वरन् विश्वसनीयता की सीमा को भी लाँघ जाएगा, ऐसे दावों पर केवल शारीरिक मनुष्य ही विश्वास कर सकते हैं। जो इन पर विश्वास करते हैं, वे 'किलिआस्ट' के आध्यात्मिक नाम से पुकारे जाते हैं, जिसे हम शब्दशः "सहस्रवर्षवादी" के नाम से व्यक्त कर सकते हैं।[702] इन मतों का बिन्दु-दर-बिन्दु खण्डन करना एक थकाऊ कार्य होगा: हम इसके बजाय यह दिखाना पसन्द करते हैं कि पवित्रशास्त्र के उस वचन को कैसे समझा जाना चाहिए।

    प्रभु यीशु मसीह स्वयं कहता है, "कोई भी किसी बलवन्त के घर में घुसकर उसका माल लूट नहीं सकता, जब तक कि वह पहले उस बलवन्त को न बाँध ले,"[703]—बलवन्त से उसका अर्थ शैतान से है, क्योंकि उसे मानवजाति को बन्दी बनाने की शक्ति थी; और उसके माल से, जिसे वह लेनेवाला था, उन लोगों से है जिन्हें शैतान ने विविध पापों और अधर्मों में बन्दी बना रखा था, परन्तु जो उस पर विश्वास करनेवाले बननेवाले थे। इसी बलवन्त को बाँधने के लिए, तो, प्रेरित ने प्रकाशितवाक्य में देखा कि "एक स्वर्गदूत स्वर्ग से उतर रहा है, जिसके पास अथाह कुण्ड की कुंजी है, और उसके हाथ में एक साँकल है। और उसने," वह कहता है, "उस अजगर को, अर्थात उस पुराने सांप को, जो इब्लीस और शैतान कहलाता है, पकड़ा, और उसे हज़ार वर्ष तक बान्ध दिया,"—अर्थात्, उसकी शक्ति को ऐसा लगाम और नियन्त्रित कर दिया कि वह उन्हें, जो छुड़ाए जानेवाले थे, बहका और अपने वश में न कर सके। अब हज़ार वर्षों को दो प्रकार से समझा जा सकता है, जहाँ तक मुझे प्रतीत होता है: या तो इसलिए कि ये बातें वर्षों के छठे हज़ार, या छठी सहस्राब्दी (जिसका उत्तरार्ध अब बीत रहा है) में होती हैं, मानो छठे दिन में, जिसके पश्चात एक ऐसा सब्त आनेवाला है जिसकी कोई सन्ध्या नहीं, अर्थात् सन्तों का अनन्त विश्राम, इस प्रकार कि, पूरे का नाम लेकर उसके एक भाग की बात करते हुए, वह सहस्राब्दी के अन्तिम भाग को—अर्थात् उस भाग को जो जगत के अन्त से पहले अभी समाप्त होना बाकी था—हज़ार वर्ष कहता है; या उसने हज़ार वर्षों का प्रयोग इस जगत की सारी अवधि के समतुल्य के रूप में किया, समय की परिपूर्णता को अंकित करने के लिए पूर्णता की संख्या का प्रयोग करते हुए। क्योंकि हज़ार दस का घन है। क्योंकि दस गुणा दस सौ बनाता है, अर्थात् एक समतल पृष्ठ का वर्ग। परन्तु इस पृष्ठ को ऊँचाई देने के लिए, और इसे घन बनाने के लिए, सौ को फिर से दस से गुणा किया जाता है, जो हज़ार देता है। इसके अतिरिक्त, यदि सौ कभी-कभी सम्पूर्णता के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे जब प्रभु ने उस व्यक्ति से, जिसने सब कुछ त्यागकर उसका अनुसरण किया, प्रतिज्ञा के रूप में कहा, "उसे इस जगत में सौ गुणा प्राप्त होगा;"[704] जिसकी, मानो, प्रेरित यह कहते हुए व्याख्या करता है, "मानो कुछ न रखते हुए भी, सब कुछ रखते हैं,"[705]—क्योंकि प्राचीन काल में भी यह कहा गया था, सारा जगत ही विश्वासी की सम्पत्ति है,—तो कितनी अधिक युक्तिसंगतता से हज़ार को सम्पूर्णता के लिए रखा गया है, क्योंकि यह घन है, जबकि दूसरा केवल वर्ग है? और इसी कारण हम स्तोत्र के इन शब्दों की, "उसने अपनी वाचा को सदा स्मरण रखा है, वह वचन जो उसने हज़ार पीढ़ियों के लिए आज्ञा दी,"[706] इससे बेहतर कोई व्याख्या नहीं कर सकते कि इसका अर्थ "सब पीढ़ियों के लिए" समझा जाए।

    "और उसने उसे अथाह कुण्ड में डाल दिया,"—अर्थात् शैतान को अथाह कुण्ड में डाल दिया। अथाह कुण्ड से अभिप्राय दुष्टों की उस असंख्य भीड़ से है जिनके हृदय परमेश्वर की कलीसिया के विरुद्ध द्वेष में अगम्य गहराई तक डूबे हुए हैं; इसका अर्थ यह नहीं कि शैतान पहले वहाँ नहीं था, परन्तु उसे वहाँ डाला गया कहा जाता है, क्योंकि, विश्वासियों को हानि पहुँचाने से रोके जाने पर, वह अधर्मियों पर और भी अधिक पूर्णता से अधिकार जमा लेता है। क्योंकि वह मनुष्य शैतान द्वारा अधिक पूर्णता से अधिकृत होता है जो न केवल परमेश्वर से अलग हो चुका है, वरन् परमेश्वर की सेवा करनेवालों से भी अकारण घृणा करता है। "और उसे बन्द कर दिया, और उस पर मुहर लगा दी, कि वह जातियों को तब तक और न बहकाए जब तक हज़ार वर्ष पूरे न हो जाएँ।" "उसे बन्द कर दिया,"—अर्थात् उसे बाहर जाने से, वर्जित काम करने से रोक दिया। और "उस पर मुहर लगा दी" के जुड़ने का अर्थ मुझे यह प्रतीत होता है कि इसका उद्देश्य यह गुप्त रखना था कि कौन शैतान के दल का है और कौन नहीं। क्योंकि इस जगत में यह एक रहस्य है, क्योंकि हम यह नहीं बता सकते कि जो खड़ा प्रतीत होता है वह भी गिरेगा या नहीं, या जो लेटा प्रतीत होता है वह उठेगा या नहीं। परन्तु इस निषेध की साँकल और बन्दीगृह द्वारा शैतान उन जातियों को बहकाने से वर्जित और नियन्त्रित किया जाता है जो मसीह की हैं, परन्तु जिन्हें उसने पहले बहकाया था या अधीन कर रखा था। क्योंकि जगत की नींव पड़ने से पहले परमेश्वर ने इन्हें अन्धकार के वश से छुड़ाकर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में प्रवेश कराने का चुनाव किया, जैसा प्रेरित कहता है।[707] क्योंकि कौन मसीही नहीं जानता कि वह अभी भी जातियों को बहकाता है, और उन्हें अपने साथ अनन्त दण्ड की ओर खींचता है, परन्तु उन्हें नहीं जो अनन्त जीवन के लिए पूर्वनियत हैं? और कोई भी इस बात से निराश न हो कि शैतान प्रायः उन्हें भी बहका लेता है जो मसीह में नया जन्म पा चुके हैं, और परमेश्वर के मार्ग पर चलने लगे हैं। क्योंकि "प्रभु अपनों को पहचानता है,"[708] और इनमें से किसी को भी शैतान अनन्त दण्ड की ओर नहीं बहका सकता। क्योंकि प्रभु उन्हें परमेश्वर के रूप में जानता है, जिससे भविष्य की कोई भी बात छिपी नहीं है; न कि मनुष्य के रूप में, जो किसी मनुष्य को वर्तमान समय में देखता है (यदि उसे यह कहा जा सके कि वह उसे देखता है जिसका हृदय वह नहीं देखता), परन्तु जो स्वयं को भी इतना नहीं देख पाता कि यह जान सके कि वह कैसा व्यक्ति बननेवाला है। शैतान, तो, इसलिए बाँधा और अथाह कुण्ड में बन्द किया गया है कि वह उन जातियों को न बहका सके जिनसे कलीसिया इकट्ठी की जाती है, और जिन्हें उसने कलीसिया के अस्तित्व में आने से पहले बहकाया था। क्योंकि यह नहीं कहा गया, "कि वह किसी मनुष्य को न बहकाए," वरन् "कि वह जातियों को न बहकाए"—निश्चय ही उनका अर्थ है जिनके बीच कलीसिया विद्यमान है—"जब तक हज़ार वर्ष पूरे न हो जाएँ,"—अर्थात्, या तो छठे दिन का वह शेष भाग जो हज़ार वर्षों का है, या वे सब वर्ष जो जगत के अन्त तक बीतने हैं।

    यह वचन, "कि वह हज़ार वर्ष के पूरे होने तक जाति-जाति के लोगों को फिर न भरमाए," यह समझना नहीं चाहिए कि इसके बाद वह केवल उन्हीं जातियों को भरमाएगा जिनसे पूर्वनियत कलीसिया बनी है, और जिन्हें भरमाने से वह उस साँकल और बन्धन के द्वारा रोका गया है; बल्कि यह उस प्रयोग-रीति के अनुसार कहा गया है जो पवित्रशास्त्र में बारम्बार प्रयुक्त होती है, और जिसका एक उदाहरण भजन में मिलता है, "इसी प्रकार हमारी आँखें हमारे परमेश्वर यहोवा की ओर तब तक लगी रहती हैं, जब तक वह हम पर अनुग्रह न करे,"[709]—न कि जैसे कि जब वह उन पर अनुग्रह कर दे, तो उसके सेवकों की आँखें फिर उनके परमेश्वर यहोवा की ओर लगी न रहेंगी। अथवा वचनों का क्रम निश्चय ही यह है, "और उसने उसे बन्द किया और उस पर मुहर लगाई, जब तक हज़ार वर्ष पूरे न हो जाएँ;" और बीच में जोड़ा गया यह वाक्यांश, "कि वह जाति-जाति के लोगों को फिर न भरमाए," उस सम्बन्ध में नहीं समझा जाना चाहिए जिसमें वह खड़ा है, बल्कि अलग से, और जैसे कि बाद में जोड़ा गया हो, ताकि सम्पूर्ण वाक्य इस प्रकार पढ़ा जाए, "और उसने उसे बन्द किया और उस पर मुहर लगाई जब तक हज़ार वर्ष पूरे न हो जाएँ, कि वह जाति-जाति के लोगों को फिर न भरमाए,"—अर्थात् वह तब तक बन्द रखा गया है जब तक हज़ार वर्ष पूरे न हों, इसी कारण से, कि वह जातियों को फिर से धोखा न दे सके।

    8. शैतान के बाँधे जाने और खोले जाने के विषय में

    योहन कहता है, "इसके बाद अवश्य है कि वह थोड़े समय के लिए फिर से छोड़ा जाए।" यदि शैतान का बाँधा और बन्द किया जाना इसका अर्थ है कि वह कलीसिया को भरमाने में असमर्थ बना दिया गया है, तो क्या उसका खोला जाना इसी सामर्थ्य का फिर से मिल जाना है? कदापि नहीं। क्योंकि जो कलीसिया जगत की उत्पत्ति से पहले पूर्वनियत और चुनी गई है, वह कलीसिया जिसके विषय में कहा गया है, "प्रभु अपनों को जानता है," वह उससे कभी भरमाई नहीं जाएगी। तौभी इस जगत में एक कलीसिया रहेगी, यहाँ तक कि जब शैतान छोड़ा जाएगा तब भी, जैसी वह आरम्भ से रही है, और सर्वदा रहेगी, क्योंकि मरने वालों के स्थान नए विश्वासियों से भरे जाते रहेंगे। क्योंकि थोड़ा आगे योहन कहता है कि शैतान, छोड़े जाने पर, उन जातियों को जिन्हें उसने सारे जगत में भरमाया है, कलीसिया के विरुद्ध युद्ध करने के लिये खींच लाएगा, और इन शत्रुओं की गिनती समुद्र के बालू के तुल्य होगी। "और वे पृथ्वी की चारों दिशाओं में चढ़ आए, और पवित्र लोगों की छावनी और उस प्रिय नगर को घेर लिया: और परमेश्वर की ओर से आकाश से आग गिरी, और उन्हें भस्म कर दिया। और शैतान जिस ने उन्हें भरमाया था, आग और गन्धक की उस झील में डाला गया, जहाँ पशु और झूठा भविष्यद्वक्ता है, और वे युगानुयुग रात दिन तड़पाए जाएँगे।"[710] यह बात अन्तिम न्याय से सम्बन्ध रखती है, परन्तु मैंने इसका उल्लेख अभी करना उचित समझा, ऐसा न हो कि कोई यह समझ बैठे कि उस छोटी सी अवधि में, जिसमें शैतान छोड़ा हुआ रहेगा, पृथ्वी पर कोई कलीसिया न रहेगी, चाहे इस कारण से कि शैतान को कोई कलीसिया न मिले, या वह उसे बहुविधि सताव के द्वारा नाश कर डाले। शैतान, तो, उस सम्पूर्ण समय के दौरान बन्धन में नहीं है जिसे यह पुस्तक समेटती है,—अर्थात् मसीह के पहले आगमन से लेकर जगत के अन्त तक, जब वह दूसरी बार आएगा,—इस अर्थ में बन्धन में नहीं, कि इस बीच की अवधि में, जो हज़ार वर्ष के नाम से पुकारी जाती है, वह कलीसिया को न भरमाएगा, क्योंकि छोड़े जाने पर भी वह उसे न भरमाएगा। क्योंकि निश्चय ही यदि उसके बाँधे जाने का अर्थ यह है कि वह कलीसिया को भरमाने में समर्थ या अनुमति-प्राप्त नहीं है, तो उसके खोले जाने का अर्थ इसके सिवा और क्या हो सकता है कि वह ऐसा करने में समर्थ या अनुमति-प्राप्त हो जाए? परन्तु परमेश्वर ऐसा न करे कि ऐसा हो! बल्कि शैतान का बाँधा जाना इसका अर्थ है कि वह मनुष्यों को भरमाने की अपनी सम्पूर्ण सामर्थ्य के प्रयोग से, चाहे बलपूर्वक विवश करके या धोखे से छलकर उन्हें अपने पक्ष में करने से, रोका गया है। यदि उसे इतनी लम्बी अवधि तक मनुष्यों की निर्बलता पर आक्रमण करने की अनुमति दी जाती, तो बहुत से लोग, जिन्हें परमेश्वर ऐसे परीक्षण में डालना नहीं चाहता, अपने विश्वास से गिर जाते, या विश्वास करने से रोक दिए जाते; और ऐसा न हो, इसी कारण वह बाँधा गया है।

    परन्तु जब वह छोटी सी अवधि आएगी तब वह छोड़ा जाएगा। क्योंकि वह अपनी और अपने दूतों की सारी सामर्थ्य के साथ तीन वर्ष छह महीने तक क्रोध करेगा; और जिनके साथ वह युद्ध करेगा उन्हें उसकी सारी हिंसा और चालबाज़ियों का सामना करने की सामर्थ्य दी जाएगी। और यदि वह कभी छोड़ा न जाता, तो उसकी दुष्ट सामर्थ्य इतनी स्पष्ट न होती, और पवित्र नगर के दृढ़ धैर्य का इतना प्रमाण न मिलता: संक्षेप में, यह कम प्रकट होता कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर उसकी बड़ी दुष्टता का कैसा भला उपयोग करता है। क्योंकि सर्वशक्तिमान संतों को उसके परीक्षण से पूर्णतः दूर नहीं रखता, बल्कि केवल उनके भीतरी मनुष्यत्व को आड़ देता है, जहाँ विश्वास निवास करता है, ताकि बाहरी परीक्षण के द्वारा वे अनुग्रह में बढ़ें। और वह उसे इस कारण बाँधता है कि वह अपनी दुष्टता के मुक्त और उत्सुक प्रयोग से उन असंख्य निर्बल जनों के, जो पहले से विश्वास कर चुके हैं या आगे विश्वास करने वाले हैं, विश्वास को न रोके या नाश न करे, जिनसे कलीसिया को बढ़ना और पूर्ण होना है; और वह अन्त में उसे इस कारण छोड़ेगा, कि परमेश्वर का नगर देख सके कि उसने कितने बड़े शत्रु को जीता है, अपने उद्धारकर्ता, सहायक, और छुड़ानेवाले की बड़ी महिमा के लिये। और हम उन विश्वासियों और संतों की तुलना में क्या हैं जो उस समय होंगे, यह देखते हुए कि वे एक ऐसे शत्रु के छोड़े जाने से परखे जाएँगे, जिससे बाँधे रहते हुए भी हम बड़े जोखिम में युद्ध करते हैं? यद्यपि यह भी निश्चित है कि इस बीच की अवधि में भी मसीह के कुछ ऐसे सैनिक रहे हैं और हैं, जो इतने बुद्धिमान और दृढ़ हैं, कि यदि वे उसके छोड़े जाने के समय इस नाशवान दशा में जीवित होते, तो वे उसके सब जाल और आक्रमणों से अत्यन्त बुद्धिमानी से बचते और अत्यन्त धैर्य से सहते।

    अब शैतान इस प्रकार न केवल तब बाँधा गया था जब कलीसिया यहूदिया से परे जातियों में अधिकाधिक फैलने लगी थी, बल्कि अब भी और जगत के अन्त तक बाँधा रहेगा, जब वह छोड़ा जाएगा। क्योंकि अब भी मनुष्य उस अविश्वास से, जिसमें उसने उन्हें पकड़ रखा था, विश्वास की ओर फिरते हैं, और निःसन्देह जगत के अन्त तक फिरते रहेंगे। और यह बलवन्त हर एक उदाहरण में बाँधा जाता है जिसमें वह अपनी किसी सम्पत्ति से लूट लिया जाता है; और वह अथाह गड्ढा जिसमें वह बन्द किया गया है, तब समाप्त नहीं हो जाता जब वे मर जाते हैं जो उस समय जीवित थे जब वह उसमें पहले बन्द किया गया था, बल्कि इनका स्थान उन दूसरों ने ले लिया है, और जगत के अन्त तक लेते रहेंगे, जो इनके बाद जन्मे और मसीहियों के प्रति उसी प्रकार का द्वेष रखते हैं, और जिनके अंधे हृदयों की गहराई में वह निरन्तर एक अथाह गड्ढे के समान बन्द है। परन्तु यह प्रश्न है कि क्या इन तीन वर्ष छह महीनों में, जब वह छोड़ा हुआ और अपनी सारी सामर्थ्य के साथ क्रोध कर रहा होगा, कोई ऐसा व्यक्ति जो पहले विश्वास नहीं कर चुका, विश्वास की ओर आ जुड़ेगा। क्योंकि तब यह वचन कैसे सच्चा ठहरेगा, "बलवन्त के घर में घुसकर उसका माल लूटने वाला कौन है, जब तक वह पहले उस बलवन्त को न बाँध ले?" इस कारण यह पद हमें विश्वास करने के लिये विवश करता प्रतीत होता है कि उस अवधि में, यद्यपि वह छोटी है, कोई भी मसीही समुदाय में नहीं जोड़ा जाएगा, बल्कि शैतान उनसे युद्ध करेगा जो पहले से मसीही बन चुके हैं, और यद्यपि इनमें से कुछ जीते जाकर शैतान के पक्ष में जा मिलें, तौभी वे परमेश्वर के पुत्रों की पूर्वनियत गिनती में नहीं हैं: क्योंकि योहन, जिसने यह प्रकाशितवाक्य लिखा, अकारण नहीं अपनी पत्री में कुछ लोगों के विषय में कहता है, "वे हम में से निकल गए, परन्तु वे हम में से नहीं थे; क्योंकि यदि वे हम में से होते, तो निःसन्देह हमारे साथ ही बने रहते।"[711] परन्तु छोटे बालकों का क्या होगा? क्योंकि यह सर्वथा अविश्वसनीय है कि इन दिनों में कुछ मसीही बालक जन्म न लें, जो अभी बपतिस्मा न पाए हों, और यह भी कि उसी अवधि में कुछ जन्म न लें; और यदि ऐसे हों, तो हम विश्वास नहीं कर सकते कि उनके माता-पिता उन्हें नये जन्म के जलकुण्ड तक लाने का कोई मार्ग न पा लेंगे। परन्तु यदि ऐसा हो, तो जब शैतान छोड़ा हुआ है, ये सम्पत्तियाँ उससे कैसे लूटी जाएँगी, जबकि उसके घर में कोई तब तक नहीं घुसता जब तक कि पहले उसे न बाँध ले? इसके विपरीत, हमें यही विश्वास करना चाहिए कि इन दिनों में न तो कलीसिया से गिरने वालों की, न उससे जुड़ने वालों की कमी होगी; बल्कि माता-पिता में अपने बालकों के लिये बपतिस्मा माँगने का, और उनमें जो तब पहली बार विश्वास करेंगे, ऐसा दृढ़ संकल्प होगा, कि वे उस बलवन्त को, यद्यपि अनबंधा है, जीत लेंगे,—अर्थात्, वे उससे सजग होकर बचेंगे, और धैर्यपूर्वक उसका सामना सहेंगे, यद्यपि वह ऐसी चालबाज़ियाँ काम में लाएगा और ऐसा बल लगाएगा जो उसने पहले कभी न किया; और इस प्रकार वे उससे, यद्यपि अनबंधा है, छीन लिये जाएँगे। और तौभी सुसमाचार का यह वचन झूठा न होगा, "बलवन्त के घर में घुसकर उसका माल लूटने वाला कौन है, जब तक वह पहले उस बलवन्त को न बाँध ले?" क्योंकि इस सच्चे वचन के अनुसार यही क्रम बना रहता है—पहले बलवन्त बाँधा जाता है, फिर उसकी सम्पत्ति लूटी जाती है; क्योंकि कलीसिया सब जातियों से, दूर-पास से, निर्बलों और बलवानों से इतनी बढ़ी है, कि ईश्वरीय रूप से भविष्यद्वाणी की गई और पूरी हुई बातों में अपने अत्यन्त सुदृढ़ विश्वास से, वह अनबंधे शैतान की भी सम्पत्ति लूट सकेगी। क्योंकि जैसे हमें यह मानना ही होगा, "जब अधर्म बढ़ता है, तो बहुतों का प्रेम ठंडा पड़ जाता है,"[712] और यह भी कि जिनके नाम जीवन की पुस्तक में नहीं लिखे गए, वे बड़ी संख्या में उस छोड़े गए शैतान के कठोर और अभूतपूर्व सतावों और चालबाज़ियों के आगे झुक जाएँगे, उसी प्रकार हमें यह भी सोचना होगा कि न केवल वे जिन्हें वह समय विश्वास में स्थिर पाएगा, बल्कि कुछ वे भी जो तब तक विश्वास से बाहर रहे हैं, उस विश्वास में, जिसे उन्होंने अब तक अस्वीकार किया है, दृढ़ हो जाएँगे, और अनबंधे शैतान को भी जीतने में समर्थ हो जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह उन्हें पवित्रशास्त्रों को समझने में सहायता देगा, जिनमें, अन्य बातों के साथ, ठीक वही अन्त पहले से बताया गया है जिसे वे स्वयं आते हुए देख रहे होंगे। और यदि ऐसा हो, तो उसके बाँधे जाने की चर्चा पहले की जानी चाहिए, ताकि इसके बाद उसकी—बंधे और खुले, दोनों दशाओं में—सम्पत्ति की लूट हो सके; क्योंकि इसी के विषय में कहा गया है, "बलवन्त के घर में घुसकर उसका माल लूटने वाला कौन है, जब तक वह पहले उस बलवन्त को न बाँध ले?"

    9. संतों का मसीह के साथ हज़ार वर्ष तक राज्य करना क्या है, और यह अनन्त राज्य से किस प्रकार भिन्न है

    परन्तु जब शैतान बाँधा हुआ है, संत उन्हीं हज़ार वर्षों के दौरान मसीह के साथ राज्य करते हैं, जिन्हें उसी रीति से समझा जाना है, अर्थात् उसके प्रथम आगमन के समय के रूप में।[713] क्योंकि, उस राज्य को छोड़ दें जिसके विषय में वह अन्त में कहेगा, "आओ, मेरे पिता के धन्य लोगों, उस राज्य को अपने अधिकार में ले लो जो तुम्हारे लिये तैयार किया गया है,"[714] कलीसिया अभी उसका राज्य या स्वर्ग का राज्य नहीं कहलाई जा सकती थी, यदि उसके संत अभी भी उसके साथ राज्य न कर रहे होते, यद्यपि दूसरी और सर्वथा भिन्न रीति से; क्योंकि अपने संतों से वह कहता है, "देख, मैं सर्वदा, जगत के अन्त तक, तुम्हारे साथ हूँ।"[715] निश्चय ही यह इस वर्तमान समय में है कि परमेश्वर के राज्य में भली प्रकार शिक्षा पाया हुआ शास्त्री, जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं, अपने भण्डार से नई और पुरानी वस्तुएँ निकालता है। और कलीसिया से वे लवनेवाले उन जंगली बीजों को बाहर निकाल लेंगे जिन्हें उसने कटनी तक गेहूँ के साथ बढ़ने दिया, जैसा वह इन वचनों में समझाता है, "कटनी जगत का अन्त है; और लवनेवाले स्वर्गदूत हैं। सो जैसे जंगली बीज इकट्ठे किए जाकर आग में जलाए जाते हैं, वैसे ही जगत के अन्त में होगा। मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके राज्य में से सब ठोकर के कारणों को इकट्ठा करेंगे।"[716] क्या उसका अर्थ उस राज्य से हो सकता है जिसमें कोई ठोकर के कारण नहीं हैं? तब यह उसके वर्तमान राज्य, अर्थात् कलीसिया से ही होना चाहिए, कि उन्हें इकट्ठा किया जाता है। इसी प्रकार वह कहता है, "जो कोई इन छोटी आज्ञाओं में से एक को भी तोड़े, और मनुष्यों को वैसी ही शिक्षा दे, वह स्वर्ग के राज्य में छोटा कहलाएगा: परन्तु जो उन्हें माने और सिखाए, वह स्वर्ग के राज्य में बड़ा कहलाएगा।"[717] वह दोनों को ही स्वर्ग के राज्य में होना कहता है, अर्थात् वह मनुष्य भी जो उन आज्ञाओं को नहीं मानता जिनकी वह शिक्षा देता है,—क्योंकि "तोड़ना" का अर्थ है न मानना, न पूरा करना,—और वह भी जो वैसा ही करता और सिखाता है जैसा वह स्वयं करता है; परन्तु एक को वह छोटा कहता है, दूसरे को बड़ा। और वह तुरन्त जोड़ता है, "क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो,"—अर्थात् उनकी धार्मिकता से जो सिखाते हैं और स्वयं नहीं मानते; क्योंकि शास्त्रियों और फरीसियों के विषय में वह अन्यत्र कहता है, "क्योंकि वे कहते हैं और करते नहीं;"[718]—इस कारण, जब तक तुम्हारी धार्मिकता उनकी धार्मिकता से बढ़कर न हो, अर्थात् जब तक तुम वह न तोड़ो बल्कि वही करो जो तुम सिखाते हो, "तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करोगे।"[719] हमें स्वर्ग के राज्य को एक अर्थ में समझना चाहिए जिसमें वह भी जो अपनी शिक्षा तोड़ता है, और वह भी जो उसे मानता है, दोनों साथ हैं, एक छोटा, दूसरा बड़ा; और दूसरे अर्थ में उस स्वर्ग के राज्य को, जिसमें केवल वही प्रवेश करेगा जो अपनी शिक्षा को पूरा करता है। इस कारण, जहाँ दोनों वर्ग विद्यमान हैं, वह कलीसिया है जैसी वह अब है, परन्तु जहाँ केवल एक ही वर्ग रहेगा, वह कलीसिया है जैसी वह होने वाली है, जब उसमें कोई दुष्ट व्यक्ति न रहेगा। इस कारण कलीसिया अभी भी मसीह का राज्य है, और स्वर्ग का राज्य है। तदनुसार, अभी भी उसके संत उसके साथ राज्य करते हैं, यद्यपि उस रीति से भिन्न रीति से जिस रीति से वे आगे राज्य करेंगे; और तौभी, यद्यपि जंगली बीज कलीसिया में गेहूँ के साथ बढ़ते हैं, वे उसके साथ राज्य नहीं करते। क्योंकि वे उसके साथ राज्य करते हैं जो वह करते हैं जो प्रेरित कहता है, "यदि तुम मसीह के साथ जिलाए गए हो, तो उन बातों की खोज में लगे रहो जो ऊपर हैं, जहाँ मसीह परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है। उन्हीं बातों की खोज करो जो ऊपर हैं, उन बातों की नहीं जो पृथ्वी पर हैं।"[720] ऐसे लोगों के विषय में वह यह भी कहता है कि उनका देशवास स्वर्ग में है।[721] संक्षेप में, वे उसके साथ राज्य करते हैं जो उसके राज्य में इस प्रकार हैं कि वे स्वयं उसका राज्य हैं। परन्तु किस अर्थ में वे मसीह का राज्य हैं जो, इससे अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं, यद्यपि वे उसमें तब तक रहते हैं जब तक जगत के अन्त में सब ठोकर के कारण उसमें से इकट्ठे नहीं कर लिये जाते, तौभी उसमें अपनी ही बातों की खोज करते हैं, और उन बातों की नहीं जो मसीह की हैं?[722]

    यह उस युद्धरत राज्य के विषय में है, जिसमें शत्रु के साथ संघर्ष अब भी बना है, और युद्धरत वासनाओं के साथ युद्ध चलता है, या जब वे झुकते हैं तो उन पर शासन लगाया जाता है, जब तक हम उस अत्यन्त शान्तिपूर्ण राज्य तक न पहुँच जाएँ जिसमें हम किसी शत्रु के बिना राज्य करेंगे, और इसी वर्तमान जीवन के इस प्रथम पुनरुत्थान के विषय में है कि प्रकाशितवाक्य उन ऊपर उद्धृत वचनों में कहता है। क्योंकि, यह कहने के बाद कि शैतान हज़ार वर्ष तक बाँधा जाता है और इसके बाद थोड़े समय के लिये छोड़ा जाता है, वह आगे इस बात का वर्णन देता है कि कलीसिया उन दिनों में क्या करती है या कलीसिया में क्या किया जाता है, इन वचनों में, "और मैंने सिंहासन देखे और उनके ऊपर बैठे हुओं को, और न्याय का अधिकार उन्हें दिया गया।" यह नहीं मानना चाहिए कि यह अन्तिम न्याय की ओर संकेत करता है, बल्कि उन शासकों के सिंहासनों की ओर और उन शासकों की ओर स्वयं, जिनके द्वारा कलीसिया अब शासित होती है। और न्याय के अधिकार दिये जाने का इससे बढ़कर कोई और स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता जो हमें इन वचनों में मिलता है, "जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे वह स्वर्ग में बंधा रहेगा; और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे वह स्वर्ग में खुला रहेगा।"[723] इसी से प्रेरित कहता है, "मुझे बाहरवालों का न्याय करने से क्या काम? क्या तुम भीतरवालों का न्याय नहीं करते?"[724] "और उन आत्माओं को," योहन कहता है, "जो यीशु की गवाही और परमेश्वर के वचन के लिये घात की गई थीं,"—यह समझते हुए जो वह आगे कहता है, "मसीह के साथ हज़ार वर्ष तक राज्य करती रहीं,"[725]—अर्थात्, उन शहीदों की आत्माएँ जो अभी अपनी देहों के साथ फिर से नहीं जुड़ीं। क्योंकि भक्त मृतकों की आत्माएँ कलीसिया से अलग नहीं हैं, जो अभी भी मसीह का राज्य है; अन्यथा मसीह की देह में भाग लेने के समय परमेश्वर की वेदी पर उनकी कोई स्मृति न की जाती, न ही खतरे के समय उसके बपतिस्मे की ओर दौड़ने से कोई लाभ होता, कि हम इस जीवन से उसके बिना न निकल जाएँ; न ही मेल-मिलाप से, यदि पश्चाताप के अभाव या दुष्ट अन्तःकरण के कारण कोई उसकी देह से अलग हो जाए। क्योंकि ये बातें क्यों की जाती हैं, यदि यह नहीं कि विश्वासी लोग, मरे हुए होने पर भी, उसके अंग हैं? इस कारण, जब यह हज़ार वर्ष चल रहे हैं, उनकी आत्माएँ उसके साथ राज्य करती हैं, यद्यपि अभी उनकी देहों के साथ मिलकर नहीं। और इस कारण इसी पुस्तक के एक अन्य भाग में हम पढ़ते हैं, "धन्य हैं वे मरे हुए जो अब से प्रभु में मरते हैं: और अब, आत्मा कहता है, कि वे अपने श्रमों से विश्राम पाएँ; क्योंकि उनके कार्य उनके साथ हो लेते हैं।"[726] कलीसिया, तो, अभी जीवितों और मृतकों में मसीह के साथ अपना राज्य आरम्भ कर देती है। क्योंकि, जैसा प्रेरित कहता है, "मसीह इस कारण मरा, कि वह जीवितों और मृतकों दोनों का प्रभु हो।"[727] परन्तु उसने केवल शहीदों की आत्माओं का उल्लेख किया, क्योंकि वे जिन्होंने सत्य के लिये मृत्युपर्यन्त संघर्ष किया है, स्वयं मृत्यु के बाद विशेष रूप से राज्य करते हैं; परन्तु, अंश से पूर्ण को समझते हुए, हम इन वचनों को उन सब अन्य लोगों के विषय में समझते हैं जो कलीसिया से हैं, जो मसीह का राज्य है।

    जो वचन इसके बाद आते हैं, "और यदि किसी ने पशु की, या उसकी छवि की उपासना नहीं की, न अपने माथे पर, न अपने हाथ पर उसकी छाप ली," हमें इन्हें जीवितों और मृतकों दोनों के विषय में समझना चाहिए। और यह पशु क्या है, यद्यपि इसके लिये अधिक सावधान खोज की आवश्यकता है, तौभी सच्चे विश्वास के विरुद्ध नहीं है कि इससे स्वयं अधर्मी नगर को, और अविश्वासियों के उस समुदाय को समझा जाए, जो विश्वासी लोगों और परमेश्वर के नगर के विरुद्ध खड़ा है। "उसकी छवि" मुझे प्रतीत होता है कि उसका अर्थ है उसका बनावटी रूप, अर्थात्, उन मनुष्यों में जो विश्वास करने का दावा करते हैं, परन्तु अविश्वासियों की भाँति जीवन बिताते हैं। क्योंकि वे वैसा होने का बहाना करते हैं जो वे नहीं हैं, और मसीही कहलाते हैं, सच्ची समानता से नहीं, बल्कि धोखे की एक छवि से। क्योंकि इस पशु के अन्तर्गत न केवल मसीह के नाम और उसके सर्वाधिक महिमामय नगर के प्रकट शत्रु आते हैं, बल्कि वे जंगली बीज भी जिन्हें जगत के अन्त में उसके राज्य, कलीसिया, में से इकट्ठा किया जाना है। और वे कौन हैं जो पशु और उसकी छवि की उपासना नहीं करते, यदि वे नहीं जो वह करते हैं जो प्रेरित कहता है, "अविश्वासियों के साथ एक ही जुए में न बँधो?"[728] क्योंकि ऐसे लोग उपासना नहीं करते, अर्थात् सम्मति नहीं देते, अधीन नहीं होते; न ही वे अपने माथे पर अपने अंगीकार के द्वारा, या अपने हाथ पर अपने आचरण के द्वारा, उस छाप को, अपराध के उस चिन्ह को, प्राप्त करते हैं। वे, तो, जो इन अपवित्रताओं से मुक्त हैं, चाहे वे अब भी इस नाशवान शरीर में जीवित हों, या मर गए हों, अभी भी मसीह के साथ राज्य करते हैं, इस पूरी अवधि के दौरान जो हज़ार वर्ष से संकेतित है, इस समय के अनुकूल रीति से।

    "उनमें से बाकी," वह कहता है, "जीवित नहीं हुए।" क्योंकि अभी वह घड़ी है जब मृतक परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे, और जो सुनेंगे वे जीवित होंगे; और उनमें से बाकी जीवित नहीं होंगे। ये जोड़े गए वचन, "जब तक हज़ार वर्ष पूरे न हो जाएँ," इसका अर्थ है कि वे उस समय में जीवित न हुए जिसमें उन्हें मृत्यु से जीवन में पार होकर जीवित हो जाना चाहिए था। और इसलिए, जब देह के पुनरुत्थान का दिन आएगा, वे अपनी कब्रों से निकलेंगे, परन्तु जीवन के लिये नहीं, बल्कि न्याय के लिये, अर्थात् दण्ड के लिये, जो दूसरी मृत्यु कहलाती है। क्योंकि जो कोई हज़ार वर्ष पूरे होने तक जीवित नहीं हुआ, अर्थात् इस सारी अवधि के दौरान जिसमें पहला पुनरुत्थान चल रहा है,—जिसने परमेश्वर के पुत्र का शब्द नहीं सुना, और मृत्यु से जीवन में पार नहीं हुआ,—वह मनुष्य दूसरे पुनरुत्थान में, अर्थात् शरीर के पुनरुत्थान में, निश्चय ही अपने शरीर के साथ दूसरी मृत्यु में पार हो जाएगा। क्योंकि वह आगे कहता है, "यह पहला पुनरुत्थान है। धन्य और पवित्र है वह जिसे पहले पुनरुत्थान में भाग मिला है," या जो इसका अनुभव करता है। अब वह इसका अनुभव करता है जो न केवल पाप की मृत्यु से जीवित होता है, बल्कि इस नये जीवन में बना रहता है। "इन पर दूसरी मृत्यु का कोई अधिकार नहीं है।" इस कारण उसे बाकियों पर अधिकार है, जिनके विषय में उसने ऊपर कहा था, "उनमें से बाकी हज़ार वर्ष पूरे होने तक जीवित नहीं हुए;" क्योंकि इस बीच की सारी अवधि में, जो हज़ार वर्ष कहलाती है, वे शरीर में भले ही कैसे भी जीवन बिताते रहे हों, वे उस मृत्यु से, जिसमें उनकी दुष्टता उन्हें पकड़े रखती थी, जीवन में जागृत नहीं किये गए, कि इस नये जीवित हुए जीवन के द्वारा वे पहले पुनरुत्थान में सहभागी बनें, और इस प्रकार दूसरी मृत्यु का उन पर कोई अधिकार न रहे।

    10. उनको क्या उत्तर दिया जाए जो सोचते हैं कि पुनरुत्थान केवल देहों से सम्बन्ध रखता है, आत्माओं से नहीं

    कुछ ऐसे हैं जो समझते हैं कि पुनरुत्थान की चर्चा केवल देह के विषय में ही की जा सकती है, और इस कारण वे यह विवाद करते हैं कि प्रकाशितवाक्य का यह पहला पुनरुत्थान देह का ही पुनरुत्थान है। क्योंकि, वे कहते हैं, "फिर उठना" केवल उन्हीं वस्तुओं के विषय में कहा जा सकता है जो गिरती हैं। अब देहें मृत्यु में गिरती हैं।[729] इस कारण आत्माओं का पुनरुत्थान नहीं हो सकता, बल्कि केवल देहों का। परन्तु वे उस प्रेरित को क्या उत्तर देते हैं जो आत्माओं के पुनरुत्थान की बात करता है? क्योंकि निश्चय ही यह भीतरी मनुष्यत्व में था, न कि बाहरी में, कि वे लोग फिर उठे थे जिनसे वह कहता है, "यदि तुम मसीह के साथ जिलाए गए हो, तो उन बातों की खोज में लगे रहो जो ऊपर हैं।"[730] उसने यही भाव अन्यत्र दूसरे शब्दों में व्यक्त किया, यह कहते हुए, "कि जैसे मसीह पिता की महिमा से मरे हुओं में से जी उठा, वैसे ही हम भी नये जीवन में चलें।"[731] इसी प्रकार, "हे सोनेवाले, जाग उठ, और मरे हुओं में से उठ, और मसीह तुझे उजियाला देगा।"[732] जो वे इस विषय में कहते हैं कि जो कुछ नहीं गिरता वह फिर नहीं उठ सकता, जिससे वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि पुनरुत्थान केवल देहों से सम्बन्ध रखता है, आत्माओं से नहीं, क्योंकि देहें गिरती हैं, तो वे इन वचनों को क्यों कुछ नहीं समझते, "हे यहोवा से डरनेवालों, उसकी दया की बाट देखो; और मार्ग से हटकर गिर न जाओ;"[733] और "वह अपने स्वामी के लिये खड़ा रहता है या गिरता है;"[734] और "जो समझता है कि वह खड़ा है, वह चौकस रहे कि गिर न जाए?"[735] क्योंकि मुझे प्रतीत होता है कि यह गिरना, जिससे बचने के लिये हमें चौकस रहना है, आत्मा का गिरना है, न कि देह का। यदि, तो, फिर उठना उन्हीं वस्तुओं का गुण है जो गिरती हैं, और आत्माएँ गिरती हैं, तो यह मानना ही होगा कि आत्माएँ भी फिर उठती हैं। "इन पर दूसरी मृत्यु का कोई अधिकार नहीं है," इन वचनों में यह भी जोड़ा गया है, "बल्कि वे परमेश्वर और मसीह के याजक होंगे, और उसके साथ हज़ार वर्ष तक राज्य करेंगे;" और यह केवल अध्यक्षों और प्राचीनों के विषय में नहीं है, जो अब कलीसिया में विशेष रूप से याजक कहलाते हैं; बल्कि जैसे हम रहस्यमय अभिषेक के कारण सब विश्वासियों को मसीही कहते हैं, वैसे ही हम सबको याजक कहते हैं क्योंकि वे उस एक याजक के अंग हैं। इन्हीं के विषय में प्रेरित पतरस कहता है, "एक पवित्र प्रजा, एक राजकीय याजकवर्ग।"[736] निश्चय ही उसने, यद्यपि सरसरी और प्रासंगिक रूप में, यह संकेत दिया कि मसीह परमेश्वर है, यह कहते हुए परमेश्वर और मसीह के याजक, अर्थात् पिता और पुत्र के, यद्यपि यह अपने सेवक-रूप में और मनुष्य के पुत्र के रूप में था कि मसीह मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिये याजक बनाया गया। परन्तु इसे हम पहले ही एक से अधिक बार समझा चुके हैं।

    11. गोग और मागोग के विषय में, जिन्हें शैतान जगत के अन्त में छोड़े जाने पर कलीसिया को सताने के लिये उभारेगा

    "और जब हज़ार वर्ष पूरे हो जाएँगे, शैतान अपने बन्दीगृह से छोड़ा जाएगा, और पृथ्वी की चारों दिशाओं में जो जातियाँ हैं उन्हें भरमाने के लिये निकलेगा, अर्थात् गोग और मागोग को, और उन्हें युद्ध के लिये खींचेगा, जिनकी गिनती समुद्र के बालू के तुल्य है।" यह, तो, उनके भरमाने में उसका उद्देश्य है, कि उन्हें इस युद्ध के लिये खींचे। क्योंकि इससे पहले भी वह जितनी और जिस प्रकार की भी छलनाएँ कर सकता था, वह करता रहा। और वचन "वह निकलेगा" का अर्थ है, वह छिपे हुए द्वेष से खुले सताव में फूट पड़ेगा। क्योंकि यह सताव, जो अन्तिम न्याय के निकट आने के समय होगा, वह अन्तिम सताव होगा जिसे सारे जगत में पवित्र कलीसिया सहेगी, जब पूरा मसीह का नगर पूरे शैतान के नगर से, जैसा प्रत्येक पृथ्वी पर विद्यमान है, आक्रमण किया जाएगा। क्योंकि ये जातियाँ जिन्हें वह गोग और मागोग नाम देता है, उन्हें किसी विशेष भाग की किसी बर्बर जातियों के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए, चाहे गेटे और मैसागेटे, जैसा कुछ लोग आदि-अक्षरों से निष्कर्ष निकालते हैं, या रोमी शासन के अधीन न रहनेवाली कुछ अन्य विदेशी जातियाँ। क्योंकि योहन यह चिह्नित करता है कि वे सारी पृथ्वी पर फैली हुई हैं, जब वह कहता है, "जो जातियाँ पृथ्वी की चारों दिशाओं में हैं," और उसने जोड़ा कि वे गोग और मागोग हैं। इन नामों का अर्थ हम यह पाते हैं, गोग, "एक छत," मागोग, "छत से,"—अर्थात् एक घर, जैसा हो, और वह जो घर से निकलता है। वे, तो, वे जातियाँ हैं जिनमें हमने पाया कि शैतान अथाह गड्ढे के समान बन्द था, और शैतान स्वयं उनमें से निकलकर बाहर जाता है, ताकि वे छत हों, वह छत से निकलनेवाला। अथवा यदि हम दोनों शब्दों को जातियों पर ही लगाएँ, न कि एक उन पर और एक शैतान पर, तो वे दोनों ही छत हैं, क्योंकि उनमें वह पुराना शत्रु अभी बन्द है, और जैसे छत से ढका हुआ है; और वे तब "छत से" होंगी जब वे छिपे हुए द्वेष से खुले द्वेष में फूट पड़ेंगी। ये वचन, "और वे पृथ्वी की चौड़ाई पर चढ़ आए, और पवित्र लोगों की छावनी और उस प्रिय नगर को घेर लिया," इसका अर्थ यह नहीं है कि वे किसी एक स्थान पर आए हैं, या आएँगे, जैसे कि पवित्र लोगों की छावनी और वह प्रिय नगर किसी एक ही स्थान में हो; क्योंकि यह छावनी और कुछ नहीं बल्कि मसीह की कलीसिया है, जो सारे जगत में फैली है। और इस कारण जहाँ कहीं भी कलीसिया होगी,—और वह सब जातियों में होगी, जैसा "पृथ्वी की चौड़ाई" से सूचित है,—वहाँ भी पवित्र लोगों की छावनी और वह प्रिय नगर होगा, और वहाँ वह उसके सब शत्रुओं के भयानक सताव से घिरा हुआ होगा; क्योंकि वे भी सब जातियों में उसके साथ विद्यमान होंगे,—अर्थात्, वह संकुचित किया जाएगा, कठिनता से दबाया जाएगा, और क्लेश की संकीर्णताओं में बन्द किया जाएगा, परन्तु अपने सैनिक कर्तव्य को न त्यागेगा, जो "छावनी" शब्द से सूचित है।

    12. क्या वह आग जो आकाश से उतरी और उन्हें भस्म कर गई, दुष्टों के अन्तिम दण्ड की ओर संकेत करती है

    ये वचन, "और आकाश से आग उतरी और उन्हें भस्म कर दिया," उस अन्तिम दण्ड के विषय में नहीं समझे जाने चाहिए जो तब दिया जाएगा जब कहा जाएगा, "मुझसे दूर हो जाओ, हे शापितों, उस अनन्त आग में;"[737] क्योंकि तब वे आग में डाले जाएँगे, न कि आग उनके ऊपर आकाश से उतरेगी। इस स्थान में "आकाश से आग" को संतों की उस दृढ़ता के रूप में भली प्रकार समझा जाता है, जिसके द्वारा वे उनके सामने झुकने से इनकार करते हैं जो उनके विरुद्ध उग्र होते हैं। क्योंकि दृढ़ता ही "आकाश" है, जिसकी दृढ़ता से ये आक्रमणकारी अपनी दहकती हुई उग्रता में पीड़ित होंगे, क्योंकि वे संतों को मसीह-विरोधी के पक्ष में खींच लाने में असमर्थ रहेंगे। यही वह आग है जो उन्हें भस्म करेगी, और यह "परमेश्वर की ओर से" है; क्योंकि यह परमेश्वर के अनुग्रह से ही है कि संत अजेय बन जाते हैं, और इस प्रकार अपने शत्रुओं को तड़पाते हैं। क्योंकि जैसे भले अर्थ में कहा गया है, "तेरे भवन की धुनि ने मुझे खा लिया है,"[738] वैसे ही बुरे अर्थ में कहा गया है, "अशिक्षित प्रजा को धुनि ने पकड़ लिया है, और अब आग शत्रुओं को भस्म कर देगी।"[739] "और अब," अर्थात्, अन्तिम न्याय की आग नहीं। अथवा यदि इस आकाश से उतरकर उन्हें भस्म करनेवाली आग से योहन का अर्थ उस आघात से था जिससे मसीह अपने आगमन में कलीसिया के उन सतानेवालों को मारेगा जिन्हें वह तब पृथ्वी पर जीवित पाएगा, जब वह मसीह-विरोधी को अपने मुख के श्वास से मार डालेगा,[740] तो भी यह दुष्टों का अन्तिम न्याय नहीं है; बल्कि अन्तिम न्याय वह है जिसे वे देह के पुनरुत्थान हो जाने पर सहेंगे।

    13. क्या मसीह-विरोधी के सताव का समय हज़ार वर्षों में गिना जाना चाहिए

    मसीह-विरोधी का यह अन्तिम सताव तीन वर्ष छह महीने तक चलेगा, जैसा हम पहले कह चुके हैं, और जैसा प्रकाशितवाक्य की पुस्तक और भविष्यद्वक्ता दानिय्येल दोनों में कहा गया है। यद्यपि यह समय संक्षिप्त है, तौभी अकारण नहीं यह प्रश्न उठता है कि क्या यह उन हज़ार वर्षों में समाहित है जिनमें शैतान बाँधा हुआ है और संत मसीह के साथ राज्य करते हैं, या क्या यह छोटी अवधि इन वर्षों के अतिरिक्त जोड़ी जानी चाहिए। क्योंकि यदि हम कहें कि वे हज़ार वर्षों में सम्मिलित हैं, तो संत उस अवधि से अधिक समय तक मसीह के साथ राज्य करते हैं जितने समय तक शैतान बाँधा रहता है। क्योंकि वे अपने राजा और विजयी के साथ उस मुकुट-सताव में भी सामर्थ्यपूर्वक राज्य करेंगे जब शैतान अब अनबंधा होगा और उनके विरुद्ध अपनी सारी सामर्थ्य से क्रोध करेगा। तो फिर पवित्रशास्त्र शैतान के बाँधे जाने और संतों के राज्य दोनों को उसी हज़ार वर्ष से कैसे परिभाषित करता है, यदि शैतान का बाँधा जाना संतों के इस मसीह के साथ राज्य से तीन वर्ष छह महीने पहले समाप्त हो जाता है? दूसरी ओर, यदि हम कहें कि इस सताव की छोटी अवधि हज़ार वर्षों के भाग के रूप में नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त अवधि के रूप में गिनी जानी चाहिए, तो हम निश्चय ही इन वचनों की व्याख्या कर सकते हैं, "परमेश्वर और मसीह के याजक उसके साथ हज़ार वर्ष तक राज्य करेंगे; और जब हज़ार वर्ष पूरे हो जाएँगे, शैतान अपने बन्दीगृह से छोड़ा जाएगा;" क्योंकि इस प्रकार वे संकेत देते हैं कि संतों का राज्य और शैतान का बन्धन एक साथ ही समाप्त होंगे, ताकि यह सताव जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं, न तो संतों के राज्य के, न शैतान के बन्धन के, समकालीन हो, बल्कि एक अतिरिक्त जोड़े हुए काल के रूप में गिना जाए। परन्तु तब इस दशा में हमें यह मान लेना पड़ता है कि संत उस सताव के दौरान मसीह के साथ राज्य नहीं करेंगे। परन्तु कौन यह कहने की हिम्मत कर सकता है कि उसके अंग उसके साथ उस समय राज्य नहीं करेंगे जब वे सबसे अधिक, और सबसे बड़े धैर्य के साथ, उससे चिपके रहेंगे, और जब प्रतिरोध की महिमा और शहादत का मुकुट युद्ध की गर्मी के अनुपात में अधिक प्रत्यक्ष होगा? या यदि यह सुझाया जाए कि उन्हें राज्य न करना कहा जा सकता है, इस कारण उन क्लेशों के, जिन्हें वे सहेंगे, तो इससे यह निकलेगा कि वे सब संत जिन्होंने पहले, हज़ार वर्षों के दौरान, क्लेश सहा है, अपने क्लेश की अवधि में मसीह के साथ राज्य करते हुए नहीं कहलाएँगे, और परिणामस्वरूप वे भी जिनकी आत्माएँ इस पुस्तक के लेखक ने देखी होने का कहा है, और जो यीशु की गवाही और परमेश्वर के वचन के लिये घात की गई थीं, सताव सहते समय मसीह के साथ राज्य नहीं करती थीं, और वे स्वयं मसीह का राज्य नहीं थीं, यद्यपि मसीह तब उन्हें विशेष रूप से अपने अधिकार में रखता था। यह वास्तव में सर्वथा असंगत है, और तिरस्करणीय है। परन्तु निश्चय ही उन गौरवशाली शहीदों की विजयी आत्माएँ, सब कष्टों और श्रमों को जीतकर और समाप्त करके, और अपने नाशवान अंगों को त्याग करके, हज़ार वर्ष पूरे होने तक मसीह के साथ राज्य करती रही हैं, और राज्य करती हैं, ताकि वे बाद में उसके साथ राज्य करें जब उन्हें अपनी अविनाशी देहें प्राप्त हो जाएँ। और इस कारण इन तीन वर्ष साढ़े में उन आत्माओं का, जो उसकी गवाही के लिये घात की गई थीं, चाहे वे पहले से देह से पार हो गई थीं या उस अन्तिम सताव में पार होंगी, उसके साथ राज्य होगा जब तक यह नाशवान जगत अन्त को न पहुँच जाए, और उस राज्य में प्रवेश न कर ले जिसमें कोई मृत्यु न होगी। और इस प्रकार संतों का मसीह के साथ राज्य शैतान के बन्धन और बन्दीगृह से अधिक समय तक चलेगा, क्योंकि वे इन तीन वर्ष साढ़े के दौरान, जिनमें शैतान अब बाँधा हुआ नहीं है, अपने राजा, परमेश्वर के पुत्र, के साथ राज्य करेंगे। यह शेष रह जाता है, तो, कि जब हम पढ़ते हैं कि "परमेश्वर और मसीह के याजक उसके साथ हज़ार वर्ष तक राज्य करेंगे; और जब हज़ार वर्ष पूरे हो जाएँगे, शैतान अपने बन्दीगृह से छोड़ा जाएगा," तो हम यह समझें कि या तो संतों के राज्य के हज़ार वर्ष समाप्त नहीं होते, यद्यपि शैतान का बन्दीगृह समाप्त हो जाता है,—ताकि दोनों पक्षों के अपने हज़ार वर्ष हों, अर्थात्, अपना पूर्ण काल, तौभी प्रत्येक की वास्तविक अवधि उसके लिये उपयुक्त भिन्न हो, संतों का राज्य लम्बा, शैतान का बन्दीगृह छोटा,—या कम से कम यह कि, जैसे तीन वर्ष छह महीने एक अत्यन्त छोटा समय है, इसे न तो शैतान के बन्दीगृह के सम्पूर्ण काल से घटाया गया माना जाए, न संतों के राज्य के सम्पूर्ण काल में जोड़ा गया, जैसा हमने ऊपर सोलहवीं पुस्तक में दिखाया है[741] उस चार सौ वर्षों की गोल संख्या के विषय में, जिन्हें चार सौ कहा गया, यद्यपि वास्तव में इससे कुछ अधिक थे; और ऐसे प्रयोग पवित्र लेखों में बारम्बार पाए जाते हैं, यदि कोई उन पर ध्यान दे।

    14. शैतान और उसके अनुयायियों के दण्ड के विषय में; और सब मृतकों के शरीर के पुनरुत्थान का संक्षिप्त विवरण, तथा अन्तिम प्रतिफलदायक न्याय के विषय में

    इस अन्तिम सतावट के उल्लेख के बाद, वह संक्षेप में यह बताता है कि शैतान, और वह नगर जिसका वह स्वामी है, अन्तिम न्याय में क्या-क्या दुःख भोगेंगे। क्योंकि वह कहता है, "और शैतान जिस ने उन्हें भरमाया था, आग और गन्धक की झील में झोंका गया, जिस में पशु और झूठा भविष्यद्वक्ता हैं, और वे रात दिन युगानुयुग तड़पाए जाएंगे।" हम पहले ही कह चुके हैं कि 'पशु' से भलीभाँति दुष्ट नगर ही समझा जाता है। उसका झूठा भविष्यद्वक्ता या तो मसीह-विरोधी है, या वह प्रतिमा अथवा कल्पित रूप है जिसकी चर्चा हम उसी स्थान पर कर चुके हैं। इसके बाद वह अन्तिम न्याय का ही एक संक्षिप्त वर्णन देता है, जो मृतकों के दूसरे अर्थात् शारीरिक पुनरुत्थान के समय होगा, जैसा उस पर प्रकट किया गया था: "मैं ने एक बड़ा श्वेत सिंहासन देखा, और उस पर एक को बैठे हुए, जिसके साम्हने से आकाश और पृथ्वी भाग गए, और उनका स्थान फिर न मिला।" वह यह नहीं कहता, "मैं ने एक बड़ा श्वेत सिंहासन देखा, और उस पर एक को बैठे हुए, और उसके साम्हने से आकाश और पृथ्वी भाग गए," क्योंकि वह तब तक हुआ नहीं था, अर्थात् जीवितों और मृतकों के न्याय होने से पहले; परन्तु वह कहता है कि उस ने उसे सिंहासन पर बैठे देखा जिसके साम्हने से आकाश और पृथ्वी भागे, परन्तु बाद में। क्योंकि जब न्याय समाप्त हो जाएगा, तब यह आकाश और यह पृथ्वी रहेंगे ही नहीं, और एक नया आकाश और नई पृथ्वी होगी। क्योंकि यह जगत रूपान्तर के द्वारा बीत जाएगा, सम्पूर्ण विनाश के द्वारा नहीं। और इसी कारण प्रेरित कहता है, "क्योंकि इस जगत का रूप बीता जाता है। मैं चाहता हूं कि तुम चिन्तारहित रहो।"[742] इस प्रकार रूप बीत जाता है, स्वभाव नहीं। यूहन्ना ने यह कहने के बाद कि उस ने एक को सिंहासन पर बैठे देखा जिसके साम्हने से आकाश और पृथ्वी भागे, यद्यपि यह बाद में ही हुआ, वह कहता है, "और मैं ने मरे हुओं को, बड़े और छोटे, देखा; और पुस्तकें खोली गईं; और एक और पुस्तक खोली गई, जो हर एक मनुष्य के जीवन की पुस्तक है; और मरे हुओं का उन बातों के अनुसार जो उन पुस्तकों में लिखी थीं, उनके कामों के अनुसार न्याय किया गया।" उस ने कहा कि पुस्तकें खोली गईं, और एक पुस्तक भी; परन्तु उस ने हमें इस पुस्तक के स्वरूप के विषय में अनिश्चित छोड़ दिया, जो, वह कहता है, "हर एक मनुष्य के जीवन की पुस्तक है।" तो उन पुस्तकों से, जिन्हें उस ने पहले कहा, हमें पुराने और नए पवित्र ग्रन्थों को समझना चाहिए, कि उनके द्वारा यह दिखाया जा सके कि परमेश्वर ने कौन-कौन सी आज्ञाएं दी थीं; और हर एक मनुष्य के जीवन की वह पुस्तक यह दिखाने के लिए है कि हर एक मनुष्य ने कौन सी आज्ञाओं का पालन किया या उन्हें छोड़ दिया। यदि इस पुस्तक को भौतिक रूप से समझा जाए, तो कौन इसके आकार या लम्बाई का हिसाब लगा सकता है, या उस समय का, जो एक ऐसी पुस्तक को पढ़ने में लगेगा जिस में हर मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन लिखा हो? क्या मनुष्यों जितने ही स्वर्गदूत उपस्थित होंगे, और क्या हर मनुष्य अपने नियुक्त स्वर्गदूत से अपने जीवन का वृत्तान्त सुनेगा? ऐसी स्थिति में सब जीवनों को समेटने वाली एक पुस्तक नहीं होगी, बल्कि हर जीवन के लिए एक अलग पुस्तक होगी। परन्तु हमारा वाक्यांश हमें केवल एक ही पुस्तक के विषय में सोचने के लिए बाधित करता है। "और एक और पुस्तक खोली गई," ऐसा कहा गया है। इसलिए हमें इसे परमेश्वर की एक विशेष शक्ति के रूप में समझना चाहिए, जिस के द्वारा यह सम्भव होगा कि हर एक अपने सब कामों को, चाहे भले हों या बुरे, स्मरण में ला सके, और उन्हें आश्चर्यजनक तेज़ी से मन में देख सके, ताकि यह ज्ञान अन्तःकरण को दोषी ठहराए या निर्दोष सिद्ध करे, और इस प्रकार सब और हर एक का न्याय एक साथ किया जाए। और इस परमेश्वरीय शक्ति को पुस्तक कहा गया है, क्योंकि उस में हम, जैसे कि, वह सब पढ़ेंगे जो वह हमें स्मरण कराती है। यह दिखाने के लिए कि छोटे और बड़े मरे हुए, जिनका न्याय किया जाना है, कौन हैं, वह उस बात की ओर लौटता है जिसे उस ने छोड़ दिया था या बल्कि टाल दिया था, और कहता है, "और समुद्र ने अपने में के मरे हुओं को दे दिया; और मृत्यु और अधोलोक ने अपने में के मरे हुओं को दे दिया।" यह निःसन्देह मरे हुओं के न्याय होने से पहले हुआ, तौभी इसका उल्लेख बाद में किया गया है। और इस प्रकार, मैं कहता हूं, वह फिर उस बात की ओर लौटता है जिसे उस ने छोड़ दिया था। परन्तु अब वह घटनाओं का क्रम बनाए रखता है, और उसे दिखाने के लिए अपने उचित स्थान पर वह दोहराता है जो वह पहले ही मरे हुओं के न्याय के विषय में कह चुका था। क्योंकि यह कहने के बाद, "और समुद्र ने अपने में के मरे हुओं को दे दिया, और मृत्यु और अधोलोक ने अपने में के मरे हुओं को दे दिया," उस ने तुरन्त वही जोड़ दिया जो वह पहले ही कह चुका था, "और उनका उनके-उनके कामों के अनुसार न्याय किया गया।" क्योंकि यह ठीक वही है जो उस ने पहले कहा था, "और मरे हुओं का उनके कामों के अनुसार न्याय किया गया।"

    15. वे मरे हुए कौन हैं, जो समुद्र के द्वारा, और मृत्यु और अधोलोक के द्वारा न्याय के लिये सौंपे जाते हैं

    परन्तु वे मरे हुए कौन हैं जो समुद्र में थे, और जिन्हें समुद्र ने प्रस्तुत किया? क्योंकि हम यह नहीं मान सकते कि जो समुद्र में मरते हैं वे अधोलोक में नहीं हैं, न ही यह कि उनके शरीर समुद्र में सुरक्षित रहते हैं; और न ही, जो और भी अधिक असंगत है, यह कि समुद्र ने भलों को रख लिया, जबकि अधोलोक ने बुरों को ग्रहण किया। इसे कौन मान सकता है? परन्तु कुछ लोग बहुत समझदारी से यह मानते हैं कि यहां समुद्र इस जगत के लिये रखा गया है। जब यूहन्ना यह दिखाना चाहता था कि जिन्हें मसीह शरीर में अब भी जीवित पाएगा, उनका न्याय उन के साथ किया जाएगा जो फिर से जी उठेंगे, तो उस ने उन्हें भी मरे हुए कहा—भले लोगों को भी, जिनके विषय में कहा गया है, "क्योंकि तुम मर गए, और तुम्हारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है,"[743] और दुष्टों को भी, जिनके विषय में कहा गया है, "मरे हुओं को अपने मरे हुओं को गाड़ने दो।"[744] उन्हें मरे हुए भी कहा जा सकता है, क्योंकि वे मरणधर्मी शरीर धारण करते हैं, जैसा प्रेरित कहता है, "शरीर तो पाप के कारण मरा हुआ है; परन्तु आत्मा धर्म के कारण जीवन है,"[745] यह सिद्ध करते हुए कि एक जीवित मनुष्य में, जो शरीर में है, एक शरीर भी है जो मरा हुआ है, और एक आत्मा भी है जो जीवन है। तौभी उस ने यह नहीं कहा कि शरीर मरणधर्मी है, परन्तु मरा हुआ है, यद्यपि तुरन्त बाद वह अधिक साधारण रीति से मरणधर्मी शरीरों की बात करता है। तो ये वे मरे हुए हैं जो समुद्र में थे, और जिन्हें समुद्र ने प्रस्तुत किया, अर्थात् वे मनुष्य जो इस जगत में थे, क्योंकि वे अब तक मरे नहीं थे, और जिन्हें जगत ने न्याय के लिये प्रस्तुत किया। "और मृत्यु और अधोलोक ने," वह कहता है, "अपने में के मरे हुओं को दे दिया।" समुद्र ने उन्हें प्रस्तुत किया, क्योंकि उन्हें केवल उसी स्थान पर पाया जाना था जहां वे थे; परन्तु मृत्यु और अधोलोक ने उन्हें दे दिया या लौटा दिया, क्योंकि उन्होंने उन्हें उस जीवन में फिर बुलाया जिसे वे पहले ही छोड़ चुके थे। और सम्भवतः यह बिना कारण नहीं था कि न तो मृत्यु और न अधोलोक को अकेले पर्याप्त समझा गया, और दोनों का उल्लेख किया गया—मृत्यु भलों को दर्शाने के लिये, जिन्होंने केवल मृत्यु का दुःख भोगा, अधोलोक का नहीं; अधोलोक दुष्टों को दर्शाने के लिये, जो अधोलोक का दण्ड भी भोगते हैं। क्योंकि यदि यह विश्वास करना असंगत नहीं लगता कि प्राचीन सन्त, जो मसीह में और उसके तब आने वाले भविष्य में विश्वास रखते थे, ऐसे स्थानों में रखे गए थे जो दुष्टों की पीड़ाओं से तो बहुत दूर थे, परन्तु फिर भी अधोलोक में थे,[746] जब तक मसीह के लोहू और उन स्थानों में उसके उतरने ने उन्हें छुड़ाया नहीं, तो निश्चय ही अच्छे मसीही, जो उस बहुमूल्य दाम से जो पहले ही चुकाया जा चुका है छुड़ाए गए हैं, अधोलोक से पूरी तरह अपरिचित हैं, जब तक वे अपने शरीर की पुनःप्राप्ति और अपने प्रतिफल के मिलने की प्रतीक्षा करते हैं। "उनका उनके-उनके कामों के अनुसार न्याय किया गया," यह कहने के बाद, उस ने संक्षेप में यह जोड़ा कि न्याय क्या था: "मृत्यु और अधोलोक आग की झील में डाले गए;" इन नामों से वह शैतान और उसके स्वर्गदूतों की सारी सेना को दर्शाता है, क्योंकि वही मृत्यु और अधोलोक की पीड़ाओं का कर्ता है। क्योंकि यह वही है जो उस ने पहले ही, पूर्वानुमान से, अधिक स्पष्ट भाषा में कह दिया था: "शैतान जिस ने उन्हें भरमाया था, आग और गन्धक की झील में झोंका गया।" जो अस्पष्ट बात उस ने इन शब्दों में जोड़ी थी, "जिस में पशु और झूठा भविष्यद्वक्ता भी हैं," उसे वह यहां स्पष्ट करता है, "जिनका नाम जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ नहीं मिला, वे आग की झील में डाले गए।" यह पुस्तक परमेश्वर को स्मरण कराने के लिये नहीं है, जैसे कि बातें भूल के कारण उस से छूट सकती हों, परन्तु यह उन लोगों के विषय में उसकी पूर्वनियति का प्रतीक है जिन्हें अनन्त जीवन दिया जाएगा। क्योंकि यह इस कारण नहीं है कि परमेश्वर अनजान है, और वह पुस्तक में पढ़कर स्वयं को सूचित करता है, परन्तु उसका अचूक पूर्वज्ञान ही जीवन की वह पुस्तक है जिस में वे लिखे हुए हैं, अर्थात् जिन्हें पहले से जाना गया है।

    16. नए आकाश और नई पृथ्वी के विषय में

    दुष्टों के सम्बन्ध में न्याय की भविष्यद्वाणी को समाप्त करने के बाद, अब यह शेष है कि वह भलों के विषय में भी कहे। प्रभु के इन शब्दों, "ये अनन्त दण्ड में चले जाएंगे," को संक्षेप में स्पष्ट करने के बाद, अब यह शेष है कि वह उन से जुड़े शब्दों को स्पष्ट करे, "परन्तु धर्मी अनन्त जीवन में।"[747] "और मैं ने देखा," वह कहता है, "एक नया आकाश और नई पृथ्वी: क्योंकि पहला आकाश और पहली पृथ्वी बीत गए; और समुद्र फिर न रहा।"[748] यह उस क्रम में होगा जो उस ने पहले से ही इन शब्दों में बताया है, "मैं ने एक को सिंहासन पर बैठे देखा, जिसके साम्हने से आकाश और पृथ्वी भाग गए।" क्योंकि जैसे ही वे जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए नहीं हैं, उनका न्याय हो जाएगा और वे अनन्त आग में डाल दिए जाएंगे—उस आग का स्वभाव, या जगत अथवा विश्व में उसका स्थान, मेरी समझ में किसी मनुष्य को ज्ञात नहीं है, सिवाय इसके कि परमेश्वर की आत्मा किसी पर उसे प्रकट करे—तब इस जगत का रूप एक सर्वव्यापी अग्नि की ज्वाला में बीत जाएगा, जैसे पहले एक बार जगत सर्वव्यापी जलप्रलय से डूब गया था। और इस सर्वव्यापी अग्नि-ज्वाला से उन नाशवान तत्वों के गुण, जो हमारे नाशवान शरीरों के अनुकूल थे, पूरी तरह नष्ट हो जाएंगे, और हमारे तत्व ऐसे गुण ग्रहण करेंगे जो, एक आश्चर्यजनक रूपान्तर के द्वारा, हमारे अमर शरीरों के साथ मेल खाएंगे, ताकि, जैसे जगत स्वयं किसी उत्तम वस्तु में नया किया जाता है, वैसे ही वह उन मनुष्यों के लिये उचित रूप से अनुकूल हो, जो स्वयं अपने शरीर में किसी उत्तम वस्तु में नए किए गए हैं। जहां तक इस कथन का सम्बन्ध है, "और समुद्र फिर न रहा," मैं सहज ही यह नहीं कहूंगा कि क्या वह उस अत्यधिक ताप से सूख जाएगा, या स्वयं भी किसी उत्तम वस्तु में परिवर्तित हो जाएगा। क्योंकि हम पढ़ते हैं कि एक नया आकाश और नई पृथ्वी होगी, परन्तु मुझे स्मरण नहीं कि मैं ने कहीं भी नए समुद्र के विषय में कुछ पढ़ा हो, सिवाय इसके जो मुझे इसी पुस्तक में मिलता है, "जैसे स्फटिक के समान काँच का एक समुद्र।"[749] परन्तु वह तब जगत के इस अन्त की बात नहीं कर रहा था, न ही वह वास्तविक समुद्र की बात करता प्रतीत होता है, परन्तु "जैसे एक समुद्र।" यह सम्भव है कि, जैसे भविष्यसूचक भाषा लाक्षणिक और वास्तविक भाषा को मिलाने में आनन्द लेती है, और इस प्रकार किसी रूप में अर्थ को ढांक देती है, वैसे ही शब्द "और समुद्र फिर न रहा" उसी अर्थ में लिये जा सकते हैं जिस अर्थ में पहले का वाक्यांश, "और समुद्र ने अपने में के मरे हुओं को दे दिया।" क्योंकि तब इस जगत का कुछ भी शेष न रहेगा, मानव जीवन की उछल-कूद और अशान्ति का कुछ भी शेष न रहेगा, और यही वह है जो समुद्र के द्वारा दर्शाया गया है।

    17. कलीसिया की अनन्त महिमा के विषय में

    "और मैं ने देखा," वह कहता है, "एक बड़ा नगर, नया यरूशलेम, परमेश्वर के पास से स्वर्ग से उतरता हुआ, दुल्हिन के समान अपने पति के लिये सजाया हुआ। और मैं ने सिंहासन से एक बड़ा शब्द यह कहते सुना, देख, परमेश्वर का निवास मनुष्यों के साथ है, और वह उनके साथ निवास करेगा, और वे उसकी प्रजा होंगे, और परमेश्वर आप उनके साथ रहेगा। और परमेश्वर उनकी आंखों से सब आंसू पोंछ देगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, न शोक, न विलाप, परन्तु कोई पीड़ा भी न रहेगी: क्योंकि पहली बातें बीत गई हैं। और जो सिंहासन पर बैठा था उस ने कहा, देख, मैं सब कुछ नया करता हूं।"[750] इस नगर के विषय में कहा जाता है कि यह स्वर्ग से उतरता है, क्योंकि वह अनुग्रह जिस से परमेश्वर ने इसे बनाया, स्वर्गीय है। इसलिये वह यशायाह के द्वारा इस से कहता है, "मैं ही यहोवा हूं जिस ने तुझे बनाया।"[751] यह वास्तव में अपने आरम्भ से ही स्वर्ग से उतरा है, क्योंकि इसके नागरिक इस जगत के काल में परमेश्वर के अनुग्रह से बढ़ते हैं, जो ऊपर से, स्वर्ग से भेजे गए पवित्र आत्मा में नए जन्म के कुण्ड के द्वारा नीचे उतरता है। परन्तु परमेश्वर के अन्तिम न्याय के द्वारा, जो उसके पुत्र यीशु मसीह के द्वारा किया जाएगा, परमेश्वर के अनुग्रह से एक ऐसी महिमा प्रकट होगी जो इतनी व्यापक और इतनी नई होगी, कि पुरानी बात का कोई चिन्ह शेष न रहेगा; क्योंकि हमारे शरीर भी अपने पुराने विनाश और मरणधर्मिता से नए अक्षय और अमरत्व में परिवर्तित हो जाएंगे। इस प्रतिज्ञा को उस वर्तमान काल पर लगाना, जिस में सन्त अपने राजा के साथ हज़ार वर्ष तक राज्य करते हैं, मुझे अत्यन्त निर्लज्जता प्रतीत होती है, जब यह इतनी स्पष्टता से कहा गया है, "परमेश्वर उनकी आंखों से सब आंसू पोंछ देगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, न शोक, न विलाप, परन्तु पीड़ा न रहेगी।" और कौन इतना असंगत और विवादप्रिय हठधर्मिता से इतना अंधा है कि इतनी धृष्टता कर सके कि यह कहे कि इस मरणधर्मी अवस्था की विपत्तियों के बीच, परमेश्वर की प्रजा, या यहां तक कि एक भी सन्त, आंसुओं या पीड़ा के बिना जीवित है, या कभी जीवित रहा है, या कभी जीवित रहेगा—जबकि सचाई यह है कि मनुष्य जितना अधिक पवित्र होता है, और पवित्र इच्छा से जितना अधिक भरा होता है, उतनी ही अधिक उसकी प्रार्थना में आंसुओं की बहुतायत होती है? क्या ये स्वर्गीय यरूशलेम के एक नागरिक के वचन नहीं हैं: "मेरे आंसू ही रात दिन मेरा आहार रहे हैं";[752] और "मैं हर रात अपनी खाट को आंसुओं से भिगोता हूं; अपने बिछौने को अपने आंसुओं से तर करता हूं";[753] और "मेरा कराहना तुझ से छिपा नहीं है";[754] और "मेरा दुःख फिर से ताज़ा हो गया"?[755] या क्या वे परमेश्वर की सन्तान नहीं हैं जो भारी होकर कराहते हैं, न इस कारण कि वे नंगे होना चाहते हैं, परन्तु इस कारण कि वे और वस्त्र पहनना चाहते हैं, कि मरणधर्मिता जीवन के द्वारा निगल ली जाए?[756] क्या वे भी, जिन के पास आत्मा का पहला फल है, अपने आप में नहीं कराहते, दत्तक होने की, अपने शरीर के छुटकारे की, प्रतीक्षा करते हुए?[757] क्या प्रेरित पौलुस स्वयं स्वर्गीय यरूशलेम का एक नागरिक नहीं था, और क्या वह इस से भी अधिक ऐसा नहीं था जब उसे अपने इस्राएली भाइयों के लिये हृदय का भार और निरन्तर दुःख था?[758] परन्तु उस नगर में मृत्यु कब न रहेगी, सिवाय इसके जब यह कहा जाएगा, "हे मृत्यु, तेरा विवाद कहां है?[759] हे मृत्यु, तेरा डंक कहां है? मृत्यु का डंक पाप है।"[760] स्पष्ट है कि जब यह कहा जा सकेगा, "कहां है"—तब कोई पाप न रहेगा। परन्तु अभी के लिये यह इस नगर का कोई दुर्बल नागरिक नहीं, परन्तु यही प्रेरित यूहन्ना स्वयं कहता है, "यदि हम कहें कि हम में पाप नहीं है, तो हम अपने आप को धोखा देते हैं, और सच्चाई हम में नहीं है।"[761] निःसन्देह, यद्यपि यह पुस्तक 'प्रकाशितवाक्य' कहलाती है, इस में पाठक के मन को व्यायाम देने वाले बहुत से अस्पष्ट वाक्य हैं, और ऐसे थोड़े ही वाक्य इतने स्पष्ट हैं जो हमें अन्य वाक्यों की व्याख्या में सहायता दें, यद्यपि हम प्रयास करें; और यह कठिनाई इस बात से बढ़ जाती है कि वही बातें इतने भिन्न रूपों में दोहराई जाती हैं, कि जिन बातों का उल्लेख किया गया है वे भिन्न प्रतीत होती हैं, यद्यपि वास्तव में वे केवल भिन्न रीति से कही गई हैं। परन्तु इन शब्दों में, "परमेश्वर उनकी आंखों से सब आंसू पोंछ देगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, न शोक, न विलाप, परन्तु पीड़ा न रहेगी," भविष्य के जगत और सन्तों की अमरता और अनन्तता की ओर इतना स्पष्ट संकेत है—क्योंकि केवल तब और केवल वहीं ऐसी अवस्था सच होगी—कि यदि हम इसे अस्पष्ट समझें, तो हमें पवित्रशास्त्र के किसी भी भाग में कुछ भी स्पष्ट पाने की आशा नहीं करनी चाहिए।

    18. प्रेरित पतरस ने अन्तिम न्याय के विषय में क्या भविष्यद्वाणी की

    आइए अब देखें कि प्रेरित पतरस ने इस न्याय के विषय में क्या भविष्यद्वाणी की। "अन्तिम दिनों में," वह कहता है, "उपहास करने वाले आएंगे.... तौभी हम, उसकी प्रतिज्ञा के अनुसार, नए आकाशों और नई पृथ्वी की बाट जोहते हैं, जिस में धर्म का वास है।"[762] इस में मरे हुओं के पुनरुत्थान के विषय में कुछ नहीं कहा गया है, परन्तु इस जगत के विनाश के विषय में निश्चय ही पर्याप्त कहा गया है। और जलप्रलय के अपने उल्लेख के द्वारा वह हमें, जैसे कि, यह संकेत देता प्रतीत होता है कि जगत के अन्त में जगत का विनाश किस सीमा तक होगा, यह हमें कितना मानना चाहिए। क्योंकि वह कहता है कि जो जगत तब था वह नष्ट हो गया, और न केवल पृथ्वी स्वयं, परन्तु आकाश भी, जिस से हम वायुमण्डल समझते हैं, जिसका स्थान जल ने भर लिया था। इसलिये सारा, या लगभग सारा, तूफानी वातावरण (जिसे वह आकाश, या बल्कि आकाशों, कहता है, अर्थात् पृथ्वी का वातावरण, न कि वह ऊपरी वायु जिस में सूर्य, चन्द्रमा और तारे स्थित हैं) नमी में बदल गया, और इस प्रकार पृथ्वी के साथ नष्ट हो गया, जिसका पहला रूप जलप्रलय के द्वारा नष्ट हो गया था। "परन्तु जो आकाश और पृथ्वी अब हैं, वे उसी वचन के द्वारा रखे गए हैं, दुष्ट मनुष्यों के न्याय और विनाश के दिन के लिये आग के वास्ते सुरक्षित रखे गए हैं।" इसलिये आकाश और पृथ्वी, या वह जगत जो जल से इसलिये बचाया गया कि वह उस जगत के स्थान में खड़ा रहे जो जलप्रलय में नष्ट हो गया था, वह स्वयं अन्त में दुष्ट मनुष्यों के न्याय और विनाश के दिन आग के लिये सुरक्षित रखा गया है। वह यह पुष्टि करने में संकोच नहीं करता कि इस बड़े परिवर्तन में मनुष्य भी नष्ट होंगे: तौभी उनका स्वभाव बना रहेगा, यद्यपि अनन्त दण्डों में। कोई शायद यह प्रश्न पूछे, यदि न्याय की घोषणा के बाद जगत स्वयं जल जाना है, तो सन्त उस अग्नि-ज्वाला के समय कहां होंगे, और नए आकाश और नई पृथ्वी के द्वारा उसके प्रतिस्थापित होने से पहले, क्योंकि उन्हें किसी न किसी स्थान पर होना ही है, क्योंकि उनके भौतिक शरीर हैं? हम उत्तर दे सकते हैं कि वे ऊपरी क्षेत्रों में होंगे जहां तक उस अग्नि-ज्वाला की लपट नहीं पहुंचेगी, जैसे जलप्रलय का जल भी नहीं पहुंचा था; क्योंकि उनके ऐसे शरीर होंगे कि वे जहां चाहें वहां होंगे। इसके अतिरिक्त, जब वे अमर और अक्षय हो जाएंगे, तो वे उस अग्नि-ज्वाला की लपट से बहुत अधिक भयभीत नहीं होंगे, जैसे उन तीन पुरुषों के नाशवान और मरणधर्मी शरीर धधकती भट्ठी में बिना हानि के जीवित रह सके थे।

    19. प्रेरित पौलुस ने थिस्सलुनीकियों को मसीह-विरोधी के प्रकट होने के विषय में क्या लिखा, जो प्रभु के दिन से पहले होगा

    मैं देखता हूं कि मुझे इस अन्तिम न्याय के विषय में सुसमाचारों और पत्रियों के बहुत से वचनों को छोड़ना ही होगा, कि यह ग्रन्थ अनुचित रूप से लम्बा न हो जाए; परन्तु मैं किसी भी दशा में वह नहीं छोड़ सकता जो प्रेरित पौलुस थिस्सलुनीकियों को लिखते समय कहता है, "हे भाइयों, हम अपने प्रभु यीशु मसीह के आगमन के द्वारा तुम से बिनती करते हैं,"[763] इत्यादि।

    कोई भी इस में सन्देह नहीं कर सकता कि उस ने यह मसीह-विरोधी और न्याय के दिन के विषय में लिखा, जिसे वह यहां प्रभु का दिन कहता है, और न ही यह कि उस ने घोषित किया कि यह दिन तब तक नहीं आएगा जब तक पहले वह न आए जिसे धर्मत्यागी कहा जाता है—धर्मत्यागी, अर्थात् प्रभु परमेश्वर से भागा हुआ। और यदि यह सब अधर्मियों के विषय में उचित रूप से कहा जा सकता है, तो उसके विषय में और भी कितना अधिक? परन्तु यह अनिश्चित है कि वह किस मन्दिर में बैठेगा, चाहे उस मन्दिर के खण्डहर में जो सुलैमान ने बनाया था, या कलीसिया में; क्योंकि प्रेरित किसी मूर्ति या दानव के मन्दिर को परमेश्वर का मन्दिर नहीं कहता। और इस कारण कुछ लोग मानते हैं कि इस वाक्यांश में मसीह-विरोधी का अर्थ केवल वह स्वामी स्वयं नहीं, परन्तु उसकी सारी देह है, अर्थात् वह मनुष्यों की भीड़ जो उस से चिपटी रहती है, उसके साथ उनके स्वामी के रूप में; और वे यह भी मानते हैं कि हमें यूनानी को अधिक सही रीति से इस प्रकार पढ़ना चाहिए, न कि "परमेश्वर के मन्दिर में," परन्तु "के लिये" या "परमेश्वर के मन्दिर के रूप में," जैसे कि वह स्वयं परमेश्वर का मन्दिर हो, अर्थात् कलीसिया।[764] फिर इन शब्दों के विषय में, "और अब तुम जानते हो कि क्या रोकता है," अर्थात् तुम जानते हो कि क्या बाधा या विलम्ब का कारण है, "कि वह अपने ही समय पर प्रकट हो सके"; ये दिखाते हैं कि वह स्पष्ट कथन देने के लिये तैयार नहीं था, क्योंकि उस ने कहा कि वे जानते थे। और इस प्रकार हम, जिन्हें उनका ज्ञान नहीं है, चाहते तो हैं, परन्तु प्रयास करने पर भी यह समझ नहीं सकते कि प्रेरित ने किस बात की ओर संकेत किया, विशेष रूप से जब उसका अर्थ उस के आगे जोड़ी गई बातों से और भी अस्पष्ट हो जाता है। क्योंकि उसका क्या अर्थ है जब वह कहता है, "क्योंकि अधर्म का भेद अभी से काम कर रहा है: केवल जो अब रोक रहा है, वह उसे बीच में से हटाए जाने तक रोकता रहे: और तब वह दुष्ट प्रकट किया जाएगा?" मैं खुलकर मान लेता हूं कि मैं नहीं जानता कि उसका क्या अर्थ है। तौभी मैं उन अनुमानों का उल्लेख करूंगा जो मैं ने सुने या पढ़े हैं।

    कुछ लोग मानते हैं कि प्रेरित पौलुस ने रोमी राज्य की ओर संकेत किया, और कि वह इससे अधिक स्पष्ट भाषा का प्रयोग करने के लिये तैयार नहीं था, ऐसा न हो कि उस पर इस राज्य के लिये बुरा चाहने का लांछन लगाया जाए, जिसके अनन्त होने की आशा की जाती थी; इस प्रकार, "क्योंकि अधर्म का भेद अभी से काम कर रहा है," यह कहते समय, उस ने नेरो की ओर संकेत किया, जिसके काम पहले ही मसीह-विरोधी के कामों के समान प्रतीत होते थे। और इसलिये कुछ लोग मानते हैं कि वह फिर से उठेगा और मसीह-विरोधी बनेगा। दूसरे लोग, फिर, यह मानते हैं कि वह मरा भी नहीं है, परन्तु वह इस लिये छिपा दिया गया कि यह माना जाए कि वह मार डाला गया था, और कि वह अब उस ही अवस्था के बल में गुप्त रूप से जीवित है जिस अवस्था तक वह पहुंचा था जब यह विश्वास किया गया था कि वह नष्ट हो गया, और वह तब तक जीवित रहेगा जब तक वह अपने ही समय पर प्रकट न हो और अपने राज्य में फिर स्थापित न हो जाए।[765] परन्तु मुझे आश्चर्य है कि मनुष्य अपने अनुमानों में इतने धृष्ट हो सकते हैं। तौभी, यह विश्वास करना असंगत नहीं है कि प्रेरित के ये शब्द, "केवल जो अब रोक रहा है, वह उसे बीच में से हटाए जाने तक रोकता रहे," रोमी राज्य की ओर संकेत करते हैं, जैसे यह कहा गया हो, "केवल जो अब राज्य कर रहा है, वह उसे बीच में से हटाए जाने तक राज्य करता रहे।" "और तब वह दुष्ट प्रकट किया जाएगा": कोई भी इस में सन्देह नहीं करता कि इसका अर्थ मसीह-विरोधी है। परन्तु दूसरे लोग मानते हैं कि शब्द, "तुम जानते हो कि क्या रोकता है," और "अधर्म का भेद काम कर रहा है," केवल उन दुष्टों और कपटियों की ओर संकेत करते हैं जो कलीसिया में हैं, जब तक वे इतनी बड़ी संख्या तक न पहुंच जाएं कि मसीह-विरोधी को एक बड़ी प्रजा दे सकें, और कि यही अधर्म का भेद है, क्योंकि यह छिपा हुआ प्रतीत होता है; और यह भी कि प्रेरित विश्वासियों को अपने विश्वास को दृढ़ता से बनाए रखने के लिये उत्साहित कर रहा है, जब वह कहता है, "केवल जो अब रोक रहा है, वह उसे बीच में से हटाए जाने तक रोकता रहे," अर्थात् जब तक अधर्म का वह भेद, जो अब छिपा हुआ है, कलीसिया से बाहर न हो जाए। क्योंकि वे मानते हैं कि यूहन्ना इसी भेद की ओर संकेत करता है जब वह अपनी पत्री में कहता है, "हे बालको, यह अन्तिम समय है: और जैसे तुम ने सुना है कि मसीह-विरोधी आने वाला है, वैसे ही अब बहुत से मसीह-विरोधी उठ खड़े हुए हैं; इस से हम जानते हैं कि यह अन्तिम समय है। वे हम में से निकल गए, परन्तु वे हम में से नहीं थे; क्योंकि यदि वे हम में से होते, तो निःसन्देह हमारे साथ बने रहते।"[766] इसलिये जैसे कलीसिया से बहुत से विधर्मी निकल गए, जिन्हें यूहन्ना "बहुत से मसीह-विरोधी" कहता है, उस समय अन्त से पहले, जिसे यूहन्ना "अन्तिम समय" कहता है, वैसे ही अन्त में वे निकल जाएंगे जो मसीह के नहीं, परन्तु उस अन्तिम मसीह-विरोधी के हैं, और तब वह प्रकट किया जाएगा।

    इस प्रकार, प्रेरित के अस्पष्ट शब्दों के अनुमानित स्पष्टीकरण विविध हैं। जो बात उस ने कही, उस में कोई सन्देह नहीं है, वह यह है, कि मसीह जीवितों और मृतकों का न्याय करने के लिये तब तक नहीं आएगा जब तक मसीह-विरोधी, उसका विरोधी, पहले उन्हें भरमाने के लिये न आ जाए जो आत्मा में मरे हुए हैं; यद्यपि उनका भरमाया जाना परमेश्वर के गुप्त न्याय का परिणाम है जो पहले ही हो चुका है। क्योंकि, जैसा कहा गया है, "उसका आगमन शैतान की सामर्थ के अनुसार, सब शक्ति, और चिन्हों, और झूठे आश्चर्यकर्मों के साथ, और नाश होने वालों में अधर्म के सब भरमाव के साथ होगा।" क्योंकि तब शैतान खोला जाएगा, और उस मसीह-विरोधी के द्वारा वह सब शक्ति से, झूठी परन्तु आश्चर्यजनक रीति से, काम करेगा। यह सामान्यतः प्रश्न किया जाता है कि क्या इन कामों को "चिन्ह और झूठे आश्चर्यकर्म" इस कारण कहा जाता है कि वह मनुष्यों की इन्द्रियों को झूठी दिखावटों से भरमाने वाला है, या इस कारण कि जो काम वह करता है, यद्यपि वे सच्चे आश्चर्यकर्म हैं, उनका उन लोगों के लिये झूठ होना है जो यह विश्वास करेंगे कि ऐसे काम केवल परमेश्वर के द्वारा ही किए जा सकते हैं, शैतान की शक्ति से अनजान होने के कारण, और विशेष रूप से ऐसी अभूतपूर्व शक्ति से जिसे वह तब पहली बार प्रकट करेगा। क्योंकि जब वह आग के समान स्वर्ग से गिरा, और एक ही आघात में पवित्र अय्यूब के असंख्य घराने और उसके विशाल पशुओं के झुण्डों को उजाड़ दिया, और फिर आंधी के समान घर पर टूट पड़ा और उसके बालकों को मार डाला, तो ये झूठी दिखावटें नहीं थीं, तौभी ये शैतान के काम थे, जिसे परमेश्वर ने यह शक्ति दी थी। वे क्यों "चिन्ह और झूठे आश्चर्यकर्म" कहलाते हैं, यह हम तब अधिक भलीभाँति जान सकेंगे जब वह समय स्वयं आ जाएगा। परन्तु उस नाम का कारण जो भी हो, वे ऐसे चिन्ह और आश्चर्यकर्म होंगे जो उन्हें भरमाएंगे जो भरमाए जाने के योग्य होंगे, "क्योंकि उन्होंने सत्य के प्रेम को ग्रहण नहीं किया कि वे उद्धार पा सकें।" प्रेरित ने यह कहने में भी संकोच नहीं किया, "इस कारण परमेश्वर उन पर भ्रम की शक्ति भेजेगा कि वे झूठ पर विश्वास करें।" परमेश्वर भेजेगा, क्योंकि परमेश्वर शैतान को ये काम करने की अनुमति देगा, यह अनुमति उसके अपने न्यायपूर्ण न्याय के अनुसार होगी, यद्यपि उनका किया जाना शैतान के अधर्मी और द्वेषपूर्ण उद्देश्य के अनुसरण में होगा, "कि वे सब जिन्होंने सत्य पर विश्वास नहीं किया, परन्तु अधर्म में सुख पाया, दोषी ठहराए जाएं।" इसलिये, दोषी ठहराए जाने के कारण, वे भरमाए जाएंगे, और भरमाए जाने के कारण, वे दोषी ठहराए जाएंगे। परन्तु, दोषी ठहराए जाने के कारण, वे परमेश्वर के उन गुप्त रूप से न्यायपूर्ण और न्यायपूर्ण रूप से गुप्त न्यायों के द्वारा भरमाए जाएंगे, जिनसे उस ने बुद्धिमान सृष्टि के पहले पाप से लेकर कभी न्याय करना बन्द नहीं किया है; और भरमाए जाने के कारण, वे उस अन्तिम और प्रकट न्याय में दोषी ठहराए जाएंगे जो यीशु मसीह के द्वारा किया जाएगा, जो स्वयं अत्यन्त अन्यायपूर्ण रीति से न्याय किया गया था और अत्यन्त न्यायपूर्ण रीति से न्याय करेगा।

    20. उस ही प्रेरित ने थिस्सलुनीकियों की पहली पत्री में मृतकों के पुनरुत्थान के विषय में क्या सिखाया

    परन्तु प्रेरित ने यहां मृतकों के पुनरुत्थान के विषय में कुछ नहीं कहा है; परन्तु अपनी थिस्सलुनीकियों की पहली पत्री में वह कहता है, "हे भाइयों, हम नहीं चाहते कि जो सो गए हैं उनके विषय में तुम अनजान रहो,"[767] इत्यादि। प्रेरित के ये शब्द भविष्य में मृतकों के पुनरुत्थान की अत्यन्त स्पष्टता से घोषणा करते हैं, जब प्रभु मसीह जीवितों और मृतकों का न्याय करने आएगा।

    परन्तु सामान्यतः यह प्रश्न पूछा जाता है कि क्या वे लोग, जिन्हें हमारा प्रभु पृथ्वी पर जीवित पाएगा, जिनका इस वाक्यांश में प्रेरित और उसके साथ जीवित रहने वालों के द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया है, कभी मरेंगे ही नहीं, या क्या वे उस पल में, जिस में वे उन के साथ जो फिर से जी उठेंगे, प्रभु से आकाश में मिलने के लिये उठा लिये जाएंगे, अगम्य तेज़ी के साथ मृत्यु के द्वारा अमरता में प्रवेश करेंगे? क्योंकि हम यह नहीं कह सकते कि यह असम्भव है कि वे आकाश के द्वारा ऊंचे उठाए जाते हुए मरें और फिर से जीवित हो जाएं। क्योंकि शब्द, "और इस प्रकार हम सर्वदा प्रभु के साथ रहेंगे," ऐसे नहीं समझे जाने चाहिए जैसे उसका अर्थ यह हो कि हम सदा आकाश में प्रभु के साथ रहेंगे; क्योंकि वह स्वयं वहां नहीं ठहरेगा, परन्तु आते हुए केवल उस में से होकर गुज़रेगा। क्योंकि हम उस से मिलने जाएंगे जब वह आ रहा होगा, न कि वहां जहां वह ठहरता है; परन्तु "इस प्रकार हम प्रभु के साथ रहेंगे," अर्थात्, जहां कहीं हम उसके साथ होंगे, हम अमर शरीर धारण किए हुए उसके साथ होंगे। हम इन शब्दों को इसी अर्थ में लेने के लिये बाधित प्रतीत होते हैं, और यह मानने के लिये कि जिन्हें प्रभु पृथ्वी पर जीवित पाएगा, वे उस छोटे से समय में मृत्यु का दुःख भी भोगेंगे और अमरता भी प्राप्त करेंगे; क्योंकि यही प्रेरित कहता है, "मसीह में सब जीवित किए जाएंगे";[768] जबकि, शरीर के इस ही पुनरुत्थान की बात करते हुए, वह अन्यत्र कहता है, "जो तू बोता है वह तब तक जीवित नहीं होता जब तक वह मर न जाए।"[769] तो फिर, जिन्हें मसीह पृथ्वी पर जीवित पाएगा, वे यदि न मरें तो उस में अमरता के लिये कैसे जीवित किए जाएंगे, जब कि इसी कारण यह कहा गया है, "जो तू बोता है वह तब तक जीवित नहीं होता जब तक वह मर न जाए"? या यदि हम मानवीय शरीरों को ठीक रीति से 'बोया हुआ' नहीं कह सकते, सिवाय इस सीमा तक कि मरकर वे किसी रीति से पृथ्वी में लौट जाते हैं, जैसे परमेश्वर के द्वारा मानव जाति के पापी पिता के विरुद्ध कहा गया वाक्य भी है, "तू मिट्टी है, और मिट्टी में लौट जाएगा,"[770] तो हमें यह मान लेना चाहिए कि जिन्हें मसीह अपने आगमन पर अब भी शरीर में पाएगा, वे न तो प्रेरित के इन शब्दों में, और न ही उत्पत्ति के शब्दों में सम्मिलित हैं; क्योंकि, बादलों में उठा लिये जाने के कारण, वे निश्चय ही 'बोए' नहीं जाते, न पृथ्वी की ओर जाते हैं न उस में लौटते हैं, चाहे उन्हें बिलकुल मृत्यु का अनुभव न हो या वे आकाश में एक क्षण के लिये मरें।

    परन्तु, दूसरी ओर, हमारे सामने उसी प्रेरित का यह कथन आता है जब वह कुरिन्थियों से शरीर के पुनरुत्थान के विषय में बोल रहा था, "हम सब जी उठेंगे," या, जैसा अन्य प्रतियां पढ़ती हैं, "हम सब सो जाएंगे।"[771] तो फिर, जब कि पुनरुत्थान तब तक नहीं हो सकता जब तक मृत्यु पहले न हुई हो, और जब कि हम इस वाक्यांश में 'सोने' का अर्थ मृत्यु के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझ सकते, तो कैसे सब सोएंगे या फिर से जी उठेंगे यदि इतने अधिक व्यक्ति, जिन्हें मसीह शरीर में पाएगा, न सोएंगे न फिर से जी उठेंगे? यदि तो हम यह मानें कि जो सन्त मसीह के आगमन पर जीवित पाए जाएंगे, और उस से मिलने के लिये उठा लिये जाएंगे, वे उस ही आरोहण में मरणधर्मी से अमर शरीरों में परिवर्तित हो जाएंगे, तो हमें प्रेरित के शब्दों में कोई कठिनाई नहीं मिलेगी, चाहे जब वह कहता है, "जो तू बोता है वह तब तक जीवित नहीं होता जब तक वह मर न जाए," या जब वह कहता है, "हम सब जी उठेंगे," या "सब सो जाएंगे," क्योंकि सन्त भी अमरता में जीवित नहीं किए जाएंगे यदि वे पहले न मरें, भले ही अत्यन्त संक्षेप में; और इस कारण वे उस पुनरुत्थान से मुक्त नहीं होंगे जिस से पहले, भले ही अत्यन्त संक्षेप में, सोना होता है। और हमें यह अविश्वसनीय क्यों लगे कि शरीरों की वह भीड़ आकाश में, जैसे कि, बोई जाए, और आकाश में ही तुरन्त अमर और अक्षय होकर फिर से जी उठे, जब कि हम उसी प्रेरित की गवाही पर यह विश्वास करते हैं कि पुनरुत्थान पल भर की झपकी में होगा, और कि बहुत समय से मरे हुए शरीरों की धूल उन अंगों में, जो अब सदा जीवित रहने वाले हैं, अगम्य सहजता और तेज़ी के साथ लौट आएगी? न ही हम यह मानते हैं कि इन सन्तों के मामले में यह वाक्य, "तू मिट्टी है, और मिट्टी में लौट जाएगा," व्यर्थ है, यद्यपि उनके शरीर मरते समय पृथ्वी पर नहीं गिरते, परन्तु आकाश में उठाए जाते हुए एक ही साथ मरते और फिर जी उठते हैं। क्योंकि "तू मिट्टी में लौट जाएगा" का अर्थ है, तू मृत्यु के समय उस बात में लौट जाएगा जो तू जीवन के आरम्भ से पहले था। तू, जब निर्जीव होगा, वही होगा जो तू सजीव होने से पहले था। क्योंकि यह मिट्टी के एक मुख में था कि परमेश्वर ने जीवन का श्वास फूंका जब मनुष्य एक जीवित प्राणी बनाया गया; जैसे यह कहा गया हो, तू प्राण-सहित मिट्टी है, जो तू पहले नहीं था; तू प्राण-रहित मिट्टी होगा, जैसा तू पहले था। और यही वह है जो सब मरे हुओं के शरीर सड़ने से पहले होते हैं; और वही उन सन्तों के शरीर होंगे यदि वे मरें, चाहे वे कहीं भी मरें, ज्यों ही वे उस जीवन को त्याग देंगे जिसे वे तुरन्त फिर प्राप्त करने वाले हैं। इस प्रकार, तब, वे मिट्टी में लौटते या जाते हैं, इस अर्थ में कि जीवित मनुष्यों से वे मिट्टी बन जाएंगे, जैसे जो राख बन जाता है उसके विषय में कहा जाता है कि वह राख में चला गया; जो सड़ जाता है, उसके विषय में कि वह सड़न में चला गया; और इस प्रकार छ: सौ अन्य बातों के विषय में भी। परन्तु जिस रीति से यह होगा, उसका हम अभी केवल दुर्बलता से अनुमान लगा सकते हैं, और इसे हम केवल तब समझेंगे जब यह हो जाएगा। क्योंकि जब मसीह जीवितों और मृतकों का न्याय करने आएगा तब मृतकों का शारीरिक पुनरुत्थान होगा, इस पर हमें विश्वास करना ही चाहिए यदि हम मसीही होना चाहते हैं। परन्तु यदि हम उस रीति को, जिस से यह होगा, पूर्ण रूप से समझ नहीं सकते, तो इस कारण हमारा विश्वास व्यर्थ नहीं है। अब, तौभी, हमें, जैसा हम ने पहले प्रतिज्ञा की थी, यह दिखाना चाहिए, जितना आवश्यक प्रतीत हो, कि प्राचीन भविष्यद्वाणी की पुस्तकों ने परमेश्वर के इस अन्तिम न्याय के विषय में क्या भविष्यद्वाणी की; और मुझे लगता है कि इन भविष्यद्वाणियों की चर्चा और स्पष्टीकरण में अधिक समय नहीं लगेगा, यदि पाठक ने उस सहायता का, जो हम पहले ही दे चुके हैं, सावधानी से लाभ उठाया हो।

    21. भविष्यद्वक्ता यशायाह के मृतकों के पुनरुत्थान और प्रतिफलदायक न्याय के विषय में वचन

    भविष्यद्वक्ता यशायाह कहता है, "मरे हुए फिर जी उठेंगे, और जो कब्रों में हैं वे सब फिर जी उठेंगे; और जो पृथ्वी में हैं वे सब आनन्दित होंगे: क्योंकि तेरी ओर से जो ओस है वही उनका स्वास्थ्य है, और दुष्टों की पृथ्वी गिर पड़ेगी।"[772] इस वाक्यांश का सारा पहला भाग धन्य लोगों के पुनरुत्थान से सम्बन्धित है; परन्तु शब्द, "दुष्टों की पृथ्वी गिर पड़ेगी," को ठीक ही इस अर्थ में समझा जाता है कि दुष्टों के शरीर दण्ड के विनाश में गिर जाएंगे। और यदि हम उन शब्दों की, जो भलों के पुनरुत्थान से सम्बन्धित हैं, अधिक सूक्ष्मता और सावधानी से जांच करें, तो हम पहले पुनरुत्थान से "मरे हुए फिर जी उठेंगे" शब्दों को, और दूसरे पुनरुत्थान से आगे के शब्दों, "और जो कब्रों में हैं वे सब फिर जी उठेंगे," को सम्बन्धित कर सकते हैं। और यदि हम पूछें कि उन सन्तों से क्या सम्बन्ध है जिन्हें प्रभु अपने आगमन पर पृथ्वी पर जीवित पाएगा, तो आगे का यह वाक्यांश उन से उचित रूप से सम्बन्धित किया जा सकता है: "जो पृथ्वी में हैं वे सब आनन्दित होंगे: क्योंकि तेरी ओर से जो ओस है वही उनका स्वास्थ्य है।" इस स्थान पर "स्वास्थ्य" से अमरता समझना सर्वोत्तम है। क्योंकि वही सबसे सिद्ध स्वास्थ्य है जो दैनिक उपचार के समान भोजन से पुनः स्थापित नहीं किया जाता। इसी प्रकार, वही भविष्यद्वक्ता, भलों को आशा देते और दुष्टों को न्याय के दिन के विषय में भयभीत करते हुए, कहता है, "यहोवा यों कहता है, देख, मैं उन पर शान्ति की नदी के समान, और अन्यजातियों की महिमा पर एक बहती हुई धार के समान बहूंगा: उनके पुत्र कांधों पर उठाए जाएंगे, और घुटनों पर शान्ति पाएंगे। जैसे कोई माता अपने पुत्र को शान्ति देती है, वैसे ही मैं तुम्हें शान्ति दूंगा; और तुम यरूशलेम में शान्ति पाओगे। और तुम देखोगे, और तुम्हारा हृदय आनन्दित होगा, और तुम्हारी हड्डियां घास के समान उठ खड़ी होंगी; और यहोवा का हाथ उसके भक्तों पर प्रगट होगा, और वह हठधर्मियों को धमकाएगा। क्योंकि, देखो, यहोवा आग के समान आएगा, और उसके रथ आंधी के समान, कि क्रोध के साथ बदला ले, और आग की ज्वाला से उजाड़ दे। क्योंकि यहोवा की आग से सारी पृथ्वी का, और उसकी तलवार से सब प्राणियों का न्याय होगा: बहुत लोग यहोवा के द्वारा घायल किए जाएंगे।"[773] भलों से अपनी प्रतिज्ञा में वह कहता है कि वह शान्ति की नदी के समान बहेगा, अर्थात्, शान्ति की अधिकतम सम्भव बहुतायत में। इस शान्ति से हम अन्त में तृप्त किए जाएंगे; परन्तु इस विषय में हम पूर्ववर्ती पुस्तक में बहुत कुछ कह चुके हैं। यही वह नदी है जिस में वह कहता है कि वह उन पर बहेगा जिन्हें वह इतनी बड़ी धन्यता की प्रतिज्ञा देता है, कि हम समझ सकें कि उस धन्यता के क्षेत्र में, जो स्वर्ग में है, सब कुछ इस नदी से तृप्त होता है। परन्तु क्योंकि वहां से, पृथ्वी के शरीरों पर भी, अक्षयता और अमरता की शान्ति बहेगी, इस कारण वह कहता है कि वह इस नदी के समान बहेगा, कि वह जैसे स्वयं को ऊपर की बातों से नीचे की बातों में उंडेल दे, और मनुष्यों को स्वर्गदूतों के समान बना दे। "यरूशलेम" से भी हमें वह नहीं समझना चाहिए जो अपने बालकों के साथ दासी है, परन्तु वह जो, प्रेरित के अनुसार, हमारी स्वतन्त्र माता है, स्वर्ग में अनन्त।[774] उस में हम शान्ति पाएंगे जब हम पृथ्वी की चिन्ताओं और विपत्तियों से थके हुए निकलेंगे, और उसके बालकों के समान उसके घुटनों और कांधों पर उठा लिये जाएंगे। ऐसे प्रेम-सुखों के अनजान और नए होकर, हम अनजाने आनन्द में ग्रहण किए जाएंगे। वहां हम देखेंगे, और हमारा हृदय आनन्दित होगा। वह यह नहीं कहता कि हम क्या देखेंगे; परन्तु परमेश्वर के अतिरिक्त और क्या, कि सुसमाचार की यह प्रतिज्ञा हम में पूरी हो, "धन्य हैं वे जो मन के शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे"?[775] हम उन सब बातों के अतिरिक्त और क्या देखेंगे जिन्हें अब हम नहीं देखते, परन्तु जिन पर हम विश्वास करते हैं, और जिनकी धारणा, हमारी दुर्बल क्षमता के अनुसार, वास्तविकता से अतुलनीय रूप से कम है? "और तुम देखोगे," वह कहता है, "और तुम्हारा हृदय आनन्दित होगा।" यहां तुम विश्वास करते हो, वहां तुम देखोगे।

    परन्तु क्योंकि उसने कहा था, "तुम्हारा मन प्रफुल्लित होगा," ऐसा न हो कि हम यह समझें कि उस यरूशलेम की आशीषें केवल आत्मिक ही हैं, वह आगे जोड़ता है, "और तुम्हारी हड्डियाँ घास के समान उठ खड़ी होंगी," जिसमें वह शरीर के पुनरुत्थान की ओर संकेत करता है, और मानो अपनी पहले की छोड़ी हुई बात को पूरा करता है। क्योंकि यह उस समय नहीं होगा जब हम देख चुके होंगे; परन्तु हम तब देखेंगे जब यह हो चुका होगा। क्योंकि वह पहले ही नये आकाश और नई पृथ्वी के विषय में बोल चुका था, बार-बार, और अनेक रूपकों में, उन बातों को दोहराते हुए जो सन्तों से प्रतिज्ञा की गई थीं, और कहते हुए, "देखो, मैं नये आकाश और नई पृथ्वी की सृष्टि करता हूँ, और पहली बातें स्मरण में न आएँगी, न मन में उभरेंगी; परन्तु वे उसमें आनन्द और उल्लास पाएँगे। देखो, मैं यरूशलेम को उल्लास, और अपनी प्रजा को आनन्द बनाऊँगा। और मैं यरूशलेम में उल्लास करूँगा, और अपनी प्रजा में आनन्द करूँगा; और उसमें रोने का शब्द फिर सुनाई न देगा;"[776] और अन्य प्रतिज्ञाएँ, जिन्हें कुछ लोग हज़ार वर्षों के दौरान की शारीरिक भोग-विलास पर लागू करने का प्रयत्न करते हैं। क्योंकि भविष्यवाणी की रीति में रूपक और शब्दार्थ दोनों प्रकार की अभिव्यक्तियाँ मिली हुई होती हैं, जिससे एक गम्भीर मन उपयोगी और कल्याणकारी प्रयत्न से आत्मिक अर्थ तक पहुँच सके; परन्तु शारीरिक जड़ता, या अशिक्षित और अनुशासनरहित मन की मन्दता, ऊपरी अक्षर में ही टिकी रह जाती है, और सोचती है कि उसके नीचे और कुछ खोजने को नहीं है। परन्तु इन भविष्यसूचक अभिव्यक्तियों की शैली के विषय में इतना ही पर्याप्त हो। और अब, उनके अर्थ की ओर लौटते हैं। जब उसने कहा था, "और तुम्हारी हड्डियाँ घास के समान उठ खड़ी होंगी," तो यह दिखाने के लिए कि यह भलों का पुनरुत्थान था, यद्यपि शारीरिक पुनरुत्थान, जिसकी ओर उसने संकेत किया था, उसने आगे जोड़ा, "और यहोवा का हाथ उसके भक्तों पर प्रगट होगा।" यह और क्या है सिवाय उस हाथ के जो उन्हें जो उसकी भक्ति करते हैं, उनसे जो उसे तुच्छ समझते हैं, अलग करता है? इनके विषय में प्रसंग तुरन्त जोड़ता है, "और वह अवज्ञाकारियों को धमकाएगा," या, जैसा एक अन्य अनुवादक के अनुसार है, "अविश्वासियों को।" वह उस समय वास्तव में धमकाएगा नहीं, परन्तु जो धमकियाँ अभी दी जा रही हैं वे तब वास्तव में पूरी होंगी। "क्योंकि देखो," वह कहता है, "यहोवा आग के समान आएगा, और उसके रथ बवण्डर के समान, कोप के साथ बदला लेने के लिए, और आग की लपट से विनाश करने के लिए। क्योंकि यहोवा की आग से सारी पृथ्वी का न्याय किया जाएगा, और उसकी तलवार से सब प्राणी; यहोवा के द्वारा बहुत लोग घायल किए जाएँगे।" आग, बवण्डर, तलवार से उसका अर्थ परमेश्वर का न्यायिक दण्ड है। क्योंकि वह कहता है कि यहोवा स्वयं आग के समान आएगा, अर्थात् उनके लिए जिनके लिए उसका आगमन दण्डदायी होगा। उसके रथों से (क्योंकि शब्द बहुवचन में है) हम उपयुक्त रूप से स्वर्गदूतों की सेवा समझते हैं। और जब वह कहता है कि सारा प्राणी और सारी पृथ्वी उसकी आग और तलवार से न्याय की जाएगी, तो हम यह नहीं समझते कि आत्मिक और पवित्र लोग इसमें सम्मिलित हैं, वरन् पार्थिव और शारीरिक लोग, जिनके विषय में कहा गया है कि वे "पार्थिव बातों पर मन लगाते हैं,"[777] और "देह के अनुसार सोचना मृत्यु है,"[778] और जिन्हें यहोवा केवल देह कहता है जब वह कहता है, "मेरी आत्मा इन मनुष्यों में सदा न रहेगी, क्योंकि वे देह हैं।"[779] जहाँ तक इन शब्दों की बात है, "यहोवा के द्वारा बहुत लोग घायल किए जाएँगे," यह घायल करना दूसरी मृत्यु उत्पन्न करेगा। वास्तव में, आग, तलवार, और घाव को अच्छे अर्थ में भी समझा जा सकता है। क्योंकि प्रभु ने कहा था कि वह पृथ्वी पर आग भेजना चाहता है।[780] और जब पवित्र आत्मा आया तो उन्हें विभाजित जीभें आग के समान दिखाई दीं।[781] और हमारा प्रभु कहता है, "मैं पृथ्वी पर शान्ति भेजने नहीं, वरन् तलवार भेजने आया हूँ।"[782] और पवित्रशास्त्र कहता है कि परमेश्वर का वचन दोधारी तलवार है,[783] दो धारों, अर्थात् दोनों वाचाओं के कारण। और श्रेष्ठगीत में पवित्र कलीसिया कहती है कि वह प्रेम से घायल है,[784]—मानो प्रेम के बाण से बेधी गई हो। परन्तु यहाँ, जहाँ हम पढ़ते या सुनते हैं कि यहोवा बदला लेने के लिए आएगा, यह स्पष्ट है कि हमें इन अभिव्यक्तियों को किस अर्थ में समझना चाहिए।

    इस न्याय में भस्म होनेवालों का संक्षेप में उल्लेख करने के बाद, दुष्टों और पापियों की बात उन भोज्य पदार्थों के रूपक में करते हुए जो पुरानी व्यवस्था द्वारा निषिद्ध थे, और जिनसे उन्होंने परहेज़ नहीं किया था, वह संक्षेप में नई वाचा के अनुग्रह का वर्णन करता है, उद्धारकर्ता के पहले आगमन से लेकर उस अन्तिम न्याय तक, जिसकी हम अभी चर्चा कर रहे हैं; और इसी के साथ वह अपनी भविष्यवाणी समाप्त करता है। क्योंकि वह बताता है कि यहोवा घोषणा करता है कि वह सब जातियों को इकट्ठा करने आ रहा है, कि वे आएँ और उसका तेज देखें।[785] क्योंकि, जैसा प्रेरित कहता है, "सभी ने पाप किया है, और परमेश्वर के तेज से रहित हैं।"[786] और वह कहता है कि वह उनके बीच अद्भुत काम करेगा, जिन्हें देखकर वे चकित होंगे और उस पर विश्वास करेंगे; और कि उनमें से वह उद्धार पाए हुओं को विभिन्न जातियों में, और दूर के द्वीपों में भेजेगा जिन्होंने न उसका नाम सुना है न उसका तेज देखा है, और कि वे उसके तेज को जातियों के बीच बताएँगे, और उन भाइयों को लाएँगे जिनसे भविष्यद्वक्ता बोल रहा था, अर्थात् चुने हुए इस्राएलियों के भाइयों को परमेश्वर पिता के अधीन विश्वास में लाएँगे; और कि वे सब जातियों से भार ढोनेवाले पशुओं और गाड़ियों पर यहोवा के लिए एक चढ़ावा लाएँगे (जिनसे स्वर्गदूतीय या मानवीय सेवा के रूप में परमेश्वर द्वारा दी गई सहायता समझी जाती है), उस पवित्र नगरी यरूशलेम को, जो इस समय पृथ्वी पर बिखरी हुई है, विश्वासी सन्तों में। क्योंकि जहाँ परमेश्वरीय सहायता दी जाती है, वहाँ मनुष्य विश्वास करते हैं, और जहाँ वे विश्वास करते हैं, वहाँ वे आते हैं। और यहोवा ने उन्हें, एक रूपक में, इस्राएल की उन सन्तानों से तुलना की जो उसके भवन में स्तोत्रों के साथ उसे बलि चढ़ाते थे, जो अब सर्वत्र कलीसिया द्वारा किया जाता है; और उसने प्रतिज्ञा की कि वह उनमें से अपने लिए याजक और लेवी चुनेगा, जो हम पहले ही सिद्ध होते देखते हैं। क्योंकि हम देखते हैं कि याजक और लेवी अब किसी विशेष कुल और रक्त से नहीं चुने जाते, जैसा मूल रूप से हारून के क्रम के अनुसार याजकपद में नियम था, वरन् जैसा नई वाचा के लिए उचित है, जिसके अधीन मसीह मलिकिसिदक के क्रम के अनुसार महायाजक है, हर मनुष्य को परमेश्वरीय अनुग्रह से दी गई योग्यता के अनुसार। और ये याजक केवल उनकी उपाधि से नहीं, जो प्रायः अयोग्य मनुष्यों द्वारा भी धारण की जाती है, वरन् उस पवित्रता से जाने जानी चाहिए जो भले और बुरे दोनों में सामान्य नहीं होती।

    इस दयालुता के विषय में इस प्रकार बोलने के बाद, जो अब कलीसिया द्वारा अनुभव की जाती है, और हमें अत्यन्त स्पष्ट और परिचित है, वह उन अन्तिम स्थितियों की भी भविष्यवाणी करता है जिन तक मनुष्य पहुँचेंगे जब अन्तिम न्याय भलों और बुरों को अलग कर देगा, भविष्यद्वक्ता के द्वारा, या भविष्यद्वक्ता स्वयं परमेश्वर के लिए बोलते हुए, यह कहते हुए, "क्योंकि जैसे नये आकाश और नई पृथ्वी मेरे साम्हने बने रहेंगे, यहोवा की यह वाणी है, वैसे ही तुम्हारा वंश और तुम्हारा नाम बना रहेगा, और उनके लिए महीने के बाद महीना, और विश्रामदिन के बाद विश्रामदिन होगा। सब प्राणी यरूशलेम में मेरे साम्हने भजन करने आएँगे, यहोवा की यह वाणी है। और वे बाहर जाएँगे, और उन मनुष्यों के अंगों को देखेंगे जिन्होंने मेरे विरुद्ध पाप किया है: उनका कीड़ा नहीं मरेगा, और उनकी आग नहीं बुझेगी; और वे सब प्राणियों के लिए तमाशा बनेंगे।"[787] इस बिन्दु पर भविष्यद्वक्ता ने अपनी पुस्तक समाप्त की, जैसे इस बिन्दु पर संसार का अन्त होगा। कुछ ने "शव"[788] का अनुवाद "मनुष्यों के अंगों" के स्थान पर किया है, शव से शरीर के प्रत्यक्ष दण्ड का अर्थ लेते हुए, यद्यपि शव साधारणतः केवल मरे हुए मांस के लिए प्रयुक्त होता है, जबकि यहाँ बताए गए शरीर सजीव होंगे, अन्यथा वे किसी पीड़ा का अनुभव नहीं कर सकते; परन्तु सम्भवतः बिना असंगति के उन्हें शव कहा जा सकता है, क्योंकि वे उनके शरीर हैं जो दूसरी मृत्यु में पड़नेवाले हैं। और इसी कारण, जैसा मैं पहले ही उद्धृत कर चुका हूँ, इस्हीं भविष्यद्वक्ता द्वारा कहा गया है, "दुष्टों की पृथ्वी गिर जाएगी।"[789] यह स्पष्ट है कि जो अनुवादक मनुष्यों के लिए भिन्न शब्द प्रयोग करते हैं, वे केवल पुरुषों को सम्मिलित करने का अर्थ नहीं रखते, क्योंकि कोई नहीं कहेगा कि जिन स्त्रियों ने पाप किया वे उस न्याय में उपस्थित न होंगी; परन्तु पुरुष जाति, अधिक श्रेष्ठ होने के कारण, और जिससे स्त्री उत्पन्न हुई, दोनों लिंगों को सम्मिलित करने के लिए प्रयुक्त है। परन्तु जो बात हमारे विषय के लिए विशेष रूप से सम्बद्ध है वह यह है, कि जब "सब प्राणी आएँगे" शब्द भलों पर लागू होते हैं, क्योंकि परमेश्वर की प्रजा मनुष्यों की हर जाति से बनी होगी,—क्योंकि सब मनुष्य उपस्थित नहीं होंगे, क्योंकि अधिकांश दण्ड में होंगे,—परन्तु, जैसा मैं कह रहा था, क्योंकि प्राणी भलों के लिए प्रयुक्त है, और अंग या शव बुरों के लिए, निश्चय ही यह बिना किसी संदेह के इस प्रकार रखा गया है कि वह न्याय, जिसमें भलों और बुरों को उनकी नियति के अनुसार बाँट दिया जाएगा, शरीर के पुनरुत्थान के बाद होगा, जिसमें हमारा विश्वास इन शब्दों के प्रयोग से पूर्णतः स्थापित होता है।

    22. भलों के बुरों के दण्ड को देखने के लिए बाहर जाने का क्या अर्थ है

    परन्तु किस प्रकार भले बुरों के दण्ड को देखने के लिए बाहर जाएँगे? क्या वे शारीरिक गति से अपने सुखी निवासों को छोड़कर दण्ड के स्थानों की ओर जाएँगे, जिससे वे दुष्टों की पीड़ाओं को अपनी शारीरिक उपस्थिति में देख सकें? निश्चय नहीं; वरन् वे ज्ञान के द्वारा बाहर जाएँगे। क्योंकि यह वाक्यांश, बाहर जाना, यह बताता है कि जिन्हें दण्ड दिया जाएगा वे बाहर होंगे। और इसी प्रकार प्रभु भी इन स्थानों को "बाहरी अन्धकार" कहता है,[790] जिसके विपरीत वह प्रवेश है जिसके विषय में भले सेवक से कहा गया है, "अपने प्रभु के आनन्द में प्रवेश कर," जिससे यह न समझा जाए कि दुष्ट वहाँ प्रवेश कर सकते हैं और जाने जा सकते हैं, वरन् यह कि भले अपने ज्ञान से उनकी ओर बाहर जाते हैं, क्योंकि भलों को यह जानना है कि बाहर क्या हो रहा है। क्योंकि जो पीड़ा में होंगे वे यह न जान सकेंगे कि प्रभु के आनन्द के भीतर क्या हो रहा है; परन्तु जो उस आनन्द में प्रवेश करेंगे वे जान सकेंगे कि बाहरी अन्धकार में क्या हो रहा है। इसलिए कहा गया है, "वे बाहर जाएँगे," क्योंकि वे जान लेंगे कि जो बाहर हैं वे क्या कर रहे हैं। क्योंकि यदि भविष्यद्वक्ता उन बातों को जान सकते थे जो अभी तक नहीं हुई थीं, परमेश्वर के उस निवास के द्वारा जो उनके मन में था, यद्यपि सीमित था, तो क्या अमर सन्त उन बातों को नहीं जान सकेंगे जो पहले ही हो चुकी हैं, जब परमेश्वर सब में सब कुछ होगा?[791] तब सन्तों का वंश और नाम उस धन्यता में बना रहेगा,—वंश, जिसके विषय में यूहन्ना कहता है, "और उसका बीज उसमें बना रहता है;"[792] और नाम, जिसके विषय में यशायाह के द्वारा ही कहा गया, "मैं उन्हें एक अनन्त नाम दूँगा।"[793] "और उनके लिए महीने के बाद महीना, और विश्रामदिन के बाद विश्रामदिन होगा," जैसे यह कहा गया हो, चन्द्रमा के बाद चन्द्रमा, और विश्राम के ऊपर विश्राम, दोनों ही वे स्वयं होंगे जब वे समय की पुरानी छायाओं से अनन्तता के नये प्रकाश में संक्रमण करेंगे। वह कीड़ा जो कभी नहीं मरता, और वह आग जो कभी नहीं बुझती, जो दुष्टों के दण्ड को रचती है, भिन्न-भिन्न लोगों द्वारा भिन्न-भिन्न रूप से समझाई जाती है। क्योंकि कुछ दोनों को शरीर पर लागू करते हैं, कुछ दोनों को आत्मा पर; जबकि अन्य आग को शारीरिक रूप से शरीर पर, और कीड़े को रूपक के रूप में आत्मा पर लागू करते हैं, जो अधिक विश्वसनीय विचार प्रतीत होता है। परन्तु अभी इस भिन्नता की चर्चा का समय नहीं है, क्योंकि हमने इस पुस्तक को अन्तिम न्याय के विषय में लगाने का प्रयत्न किया है, जिसमें भलों और बुरों को अलग किया जाता है: उनके पुरस्कार और दण्ड के विषय में हम अन्यत्र अधिक सावधानी से चर्चा करेंगे।

    23. दानिय्येल ने मसीह-विरोधी के सताव, परमेश्वर के न्याय, और सन्तों के राज्य के विषय में क्या भविष्यवाणी की

    दानिय्येल अन्तिम न्याय की भविष्यवाणी इस प्रकार करता है कि वह दिखाता है कि मसीह-विरोधी पहले आएगा, और अपने वर्णन को सन्तों के अनन्त राज्य तक ले जाता है। क्योंकि जब उसने भविष्यसूचक दर्शन में चार पशुओं को देखा, जो चार राज्यों का द्योतक थे, और चौथे को एक निश्चित राजा द्वारा विजित होते देखा, जिसे मसीह-विरोधी के रूप में पहचाना जाता है, और इसके बाद मनुष्य के पुत्र का अनन्त राज्य, अर्थात् मसीह का, वह कहता है, "मेरी आत्मा भयभीत हो गई, मैं दानिय्येल अपने शरीर में, और मेरे सिर के दर्शनों ने मुझे व्याकुल कर दिया,"[794] इत्यादि। कुछ लोगों ने इन चार राज्यों को अश्शूरियों, फारसियों, मकिदुनियों, और रोमियों के द्योतक के रूप में समझाया है। जो लोग इस व्याख्या की उपयुक्तता को समझना चाहें, वे दानिय्येल पर जेरोम की पुस्तक पढ़ सकते हैं, जो पर्याप्त सावधानी और विद्वत्ता से लिखी गई है। परन्तु जो इस अंश को आधी नींद में भी पढ़े, वह यह देखने से नहीं चूक सकता कि मसीह-विरोधी का राज्य परमेश्वर के अन्तिम न्याय से पहले कलीसिया पर, यद्यपि अल्प समय के लिए, भयंकर आक्रमण करेगा, जिसके बाद परमेश्वर का अन्तिम न्याय सन्तों के अनन्त राज्य का प्रवेश कराएगा। क्योंकि प्रसंग से यह स्पष्ट है कि समय, समय, और आधा समय का अर्थ एक वर्ष, और दो वर्ष, और आधा वर्ष है, अर्थात् साढ़े तीन वर्ष। कभी-कभी पवित्रशास्त्र में यही बात महीनों से बताई जाती है। क्योंकि यद्यपि यहाँ लातीनी में समय शब्द अनिश्चित रूप से प्रयुक्त प्रतीत होता है, यह केवल इस कारण है कि लातीनियों के पास द्विवचन नहीं है, जैसा यूनानियों के पास है, और जैसा इब्रियों के पास भी बताया जाता है। इसलिए समय दो समयों के लिए प्रयुक्त है। जहाँ तक दस राजाओं की बात है, जिन्हें, जैसा प्रतीत होता है, मसीह-विरोधी दस व्यक्तियों के रूप में पाएगा जब वह आएगा, मैं मानता हूँ कि मुझे डर है कि हम इस विषय में धोखा खा सकते हैं, और कि वह अप्रत्याशित रूप से आ सकता है जब रोमी जगत में दस राजा जीवित न हों। क्योंकि क्या हो यदि यह संख्या दस उन सब राजाओं की समग्र संख्या को द्योतित करती हो जो उसके आगमन से पहले होंगे, जैसे समग्रता प्रायः एक हज़ार, या एक सौ, या सात, या अन्य संख्याओं से प्रतीकित की जाती है, जिन्हें गिनाना आवश्यक नहीं है?

    एक अन्य स्थान पर वही दानिय्येल कहता है, "और ऐसा संकट का समय होगा, जैसा पृथ्वी पर किसी जाति के उत्पन्न होने से लेकर उस समय तक नहीं हुआ: और उस समय तेरी वह सारी प्रजा, जो पुस्तक में लिखी हुई पाई जाएगी, बचाई जाएगी। और मिट्टी के ढेर में सोए हुओं में से बहुत से जागेंगे, कुछ अनन्त जीवन के लिए, और कुछ लज्जा और अनन्त निन्दा के लिए। और जो बुद्धिमान हैं वे आकाशमण्डल की चमक के समान चमकेंगे; और बहुत से धर्मी सदा के लिए तारों के समान।"[795] यह अंश उस अंश से बहुत समान है जो हम सुसमाचार से उद्धृत कर चुके हैं,[796] कम से कम मृत शरीरों के पुनरुत्थान के विषय में। क्योंकि जो वहाँ "कब्रों में" कहे गए हैं, वे यहाँ "मिट्टी के ढेर में सोए हुए" कहे गए हैं, या, जैसा अन्य अनुवाद करते हैं, "पृथ्वी की धूल में।" वहाँ कहा गया है, "वे बाहर निकल आएँगे;" तो यहाँ, "वे जागेंगे।" वहाँ, "जिन्होंने भला किया है, वे जीवन के पुनरुत्थान के लिए; और जिन्होंने बुरा किया है, वे न्याय के पुनरुत्थान के लिए;" यहाँ, "कुछ अनन्त जीवन के लिए, और कुछ लज्जा और अनन्त निन्दा के लिए।" यह भी कोई भेद नहीं समझा जाना चाहिए, कि सुसमाचार की अभिव्यक्ति "जो सब कब्रों में हैं" के स्थान पर भविष्यद्वक्ता "सब" नहीं कहता, वरन् "मिट्टी के ढेर में सोए हुओं में से बहुत से।" क्योंकि पवित्रशास्त्र में बहुत से कभी-कभी सब के लिए प्रयुक्त होता है। इस प्रकार अब्राहम से कहा गया था, "मैं तुझे बहुत सी जातियों का पिता बनाता हूँ," यद्यपि एक अन्य स्थान पर उससे कहा गया था, "तेरे वंश में सब जातियाँ धन्य होंगी।"[797] ऐसे पुनरुत्थान के विषय में स्वयं भविष्यद्वक्ता से थोड़ी देर बाद कहा गया है, "और तू जा, और विश्राम कर: क्योंकि पूर्णता की समाप्ति तक अभी एक दिन शेष है; और तू विश्राम करेगा, और दिनों के अन्त में अपने भाग में उठेगा।"[798]

    24. दाऊद के भजनों में से वे अंश जो जगत के अन्त और अन्तिम न्याय की भविष्यवाणी करते हैं

    भजनों में अन्तिम न्याय की ओर बहुत से संकेत हैं, परन्तु अधिकांश केवल आकस्मिक और संक्षिप्त। परन्तु मैं यह उल्लेख करने से नहीं चूक सकता जो वहाँ इस जगत के अन्त के विषय में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है: "आदि में तूने पृथ्वी की नींव डाली, हे यहोवा; और आकाश तेरे हाथों की करनी है। वे नष्ट हो जाएँगे, परन्तु तू बना रहेगा; हाँ, वे सब वस्त्र के समान पुराने हो जाएँगे; और तू उन्हें वस्त्र के समान बदल देगा, और वे बदल जाएँगे: परन्तु तू वही रहेगा, और तेरे वर्ष समाप्त न होंगे।"[799] यह कैसे है कि पोरफिरी, जो इब्रियों की भक्ति की प्रशंसा करता है कि उन्होंने एक ऐसे परमेश्वर की उपासना की जो महान और सच्चा है, और स्वयं देवताओं के लिए भी भयावह है, फिर भी इन्हीं देवताओं की वाणियों का अनुसरण करते हुए मसीहियों पर यह घोर मूर्खता का दोष लगाता है कि वे कहते हैं कि यह जगत नष्ट हो जाएगा? क्योंकि यहाँ हम इब्रियों की पवित्र पुस्तकों में पाते हैं, उस परमेश्वर के विषय में जिसे यह महान दार्शनिक स्वयं देवताओं के लिए भी भयावह मानता है, "आकाश तेरे हाथों की करनी है: वे नष्ट हो जाएँगे।" जब आकाश, जो जगत का उच्चतर और अधिक सुरक्षित भाग है, नष्ट होगा, तो क्या स्वयं जगत बचा रहेगा? यदि यह विचार बृहस्पति को प्रिय नहीं है, जिसकी वाणी को यह दार्शनिक मसीहियों की सहजविश्वासिता को धिक्कारने के लिए एक अकाट्य प्रमाण के रूप में उद्धृत करता है, तो वह इब्रियों की बुद्धि को भी मूर्खता कहकर क्यों नहीं धिक्कारता, यह देखते हुए कि यह भविष्यवाणी उनकी सबसे पवित्र पुस्तकों में पाई जाती है? परन्तु यदि यह इब्री बुद्धि, जिससे पोरफिरी इतना मोहित है कि वह अपने ही देवताओं की वाणियों के द्वारा उसकी प्रशंसा करता है, यह घोषित करती है कि आकाश नष्ट होने वाला है, तो वह इतना मोहग्रस्त क्यों है कि वह मसीहियों के विश्वास से घृणा करता है, आंशिक रूप से यदि पूर्णतः नहीं, इसी कारण से कि वे विश्वास करते हैं कि जगत नष्ट होने वाला है?—यद्यपि यह देखना सरल नहीं है कि आकाश कैसे नष्ट होगा यदि जगत नष्ट न हो। और, वास्तव में, उन पवित्र लेखों में जो विशेष रूप से हमारे अपने हैं, और इब्रियों तथा हमारे लिए सामान्य नहीं—मेरा अर्थ सुसमाचारीय और प्रेरितीय पुस्तकों से है—ये अभिव्यक्तियाँ प्रयुक्त हैं: "इस जगत का रूप जाता रहता है;"[800] "जगत जाता रहता है;"[801] "आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे,"[802]—अभिव्यक्तियाँ जो, मेरे विचार में, "वे नष्ट हो जाएँगे" से कुछ अधिक कोमल हैं। प्रेरित पतरस की पत्री में भी, जहाँ वह जगत जो तब था, जल से डूबकर नष्ट हुआ बताया गया है, यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट है कि जगत का कौन-सा भाग सम्पूर्ण के लिए द्योतित किया गया है, और किस अर्थ में नष्ट हुआ शब्द लिया जाना है, और कौन-से आकाश न्याय के दिन और अधर्मियों के विनाश के लिए आग के वास्ते सुरक्षित रखे गए हैं।[803] और जब वह थोड़ी देर बाद कहता है, "प्रभु का दिन चोर के समान आएगा; जिसमें आकाश बड़े गर्जन के साथ टल जाएगा, और तत्त्व जलकर गल जाएँगे, और पृथ्वी और उसमें के काम भस्म हो जाएँगे;" और तब जोड़ता है, "इसलिए, जब ये सब वस्तुएँ गल जानेवाली हैं, तो तुम्हें किस प्रकार के मनुष्य होना चाहिए?"[804]—इन आकाशों को, जो नष्ट होनेवाले हैं, वही समझा जा सकता है जिनके विषय में उसने कहा था कि वे आग के लिए सुरक्षित रखे गए हैं; और वे तत्त्व जो जलने वाले हैं वे हैं जो इस जगत के इस निचले भाग में तूफान और अशान्ति से भरे हुए हैं जिसमें उसने कहा था कि ये आकाश सुरक्षित रखे गए हैं; क्योंकि उच्चतर आकाश, जिनके आकाशमण्डल में तारे स्थित हैं, सुरक्षित हैं, और अपनी सम्पूर्णता में बने रहते हैं। क्योंकि पवित्रशास्त्र की यह अभिव्यक्ति भी, कि "तारे आकाश से गिरेंगे,"[805] यह न कहते हुए कि एक भिन्न व्याख्या कहीं अधिक श्रेष्ठ है, यही दिखाती है कि आकाश स्वयं बने रहेंगे, यदि तारे उनसे गिरने वाले हैं। यह अभिव्यक्ति, तो, या तो रूपक है, जो अधिक विश्वसनीय है, या यह घटना इस निचले आकाश में होगी, जैसा वर्जिल द्वारा उल्लिखित है,—

    "एक उल्का प्रकाश की एक धारा लिए आकाश के आर-पार चमकदार जगमगाई, फिर इडा के वनों में जा खोई।"[806]

    परन्तु जो अंश मैंने भजन से उद्धृत किया है वह आकाशों में से किसी को भी विनाश की नियति से अपवर्जित नहीं करता प्रतीत होता; क्योंकि वह कहता है, "आकाश तेरे हाथों की करनी है: वे नष्ट हो जाएँगे;" इसलिए, क्योंकि उनमें से कोई भी परमेश्वर के कामों की श्रेणी से अपवर्जित नहीं है, उनमें से कोई भी विनाश से अपवर्जित नहीं है। क्योंकि हमारे विरोधी इब्री भक्ति की, जिसे उनके अपने देवताओं की स्वीकृति मिली है, प्रेरित पतरस के शब्दों से रक्षा करने के लिए, जिससे वे घोर घृणा रखते हैं, नहीं झुकेंगे; न वे यह तर्क करेंगे कि, जैसे प्रेरित अपनी पत्री में सम्पूर्ण जगत के जलप्रलय में नष्ट होने की बात कहते हुए एक भाग का अर्थ रखता है, यद्यपि केवल उसका निचला भाग, और उसके संगत आकाश ही नष्ट हुए, वैसे ही भजन में सम्पूर्ण को भाग के लिए प्रयुक्त किया गया है, और यह कहा गया है, "वे नष्ट हो जाएँगे," यद्यपि केवल निचले आकाश ही नष्ट होंगे। परन्तु क्योंकि, जैसा मैंने कहा, वे इस प्रकार तर्क करने के लिए नहीं झुकेंगे, इस डर से कि वे पतरस के अर्थ को स्वीकार करते हुए प्रतीत न हों, या अन्तिम विनाशकारी अग्नि को उतना ही महत्त्व न दें जितना हम जलप्रलय को देते हैं, जबकि वे यह मानते हैं कि न कोई जल न कोई ज्वाला सम्पूर्ण मानवजाति को नष्ट कर सकती थी, उनके लिए केवल यही शेष रह जाता है कि वे यह मानें कि उनके देवताओं ने इब्रियों की बुद्धि की प्रशंसा इसलिए की क्योंकि उन्होंने यह भजन नहीं पढ़ा था।

    परमेश्वर के अन्तिम न्याय का ही उल्लेख 50वें भजन में भी इन शब्दों में किया गया है, "परमेश्वर प्रगट रूप से आएगा, हमारा परमेश्वर, और मौन न रहेगा: आग उसके आगे भस्म करेगी, और उसके चारों ओर बड़ी झंझावात होगी। वह ऊपर के आकाश को, और पृथ्वी को, अपनी प्रजा का न्याय करने के लिए बुलाएगा। उसके सन्तों को उसके पास इकट्ठा करो; जो बलिदानों के ऊपर उससे वाचा बाँधते हैं।"[807] इसे हम अपने प्रभु यीशु मसीह के विषय में समझते हैं, जिसकी हम आकाश से जीवितों और मृतकों का न्याय करने के लिए बाट जोहते हैं। क्योंकि वह प्रगट रूप से आएगा कि धर्मियों और अधर्मियों का न्यायपूर्वक न्याय करे, जो पहले गुप्त रूप से आया था कि अधर्मियों द्वारा अन्यायपूर्वक न्याय किया जाए। वह, मैं कहता हूँ, प्रगट रूप से आएगा, और मौन न रहेगा, अर्थात्, वह अपने न्याय की वाणी से अपने आपको प्रकट करेगा, जो इससे पहले, जब वह गुप्त रूप से आया, अपने न्यायकर्ता के आगे मौन रहा जब वह वध होने के लिए भेड़ के समान लाया गया, और, बाल कतरनेवाले के आगे मेम्ने के समान, अपना मुँह न खोला, जैसा हम पढ़ते हैं कि उसके विषय में यशायाह द्वारा भविष्यवाणी की गई थी,[808] और जैसा हम सुसमाचार में इसे पूरा होते देखते हैं।[809] जहाँ तक आग और झंझावात की बात है, हम यह पहले ही बता चुके हैं कि इन्हें किस प्रकार समझा जाना है, जब हम यशायाह में एक समान अंश की व्याख्या कर रहे थे।[810] जहाँ तक इस अभिव्यक्ति की बात है, "वह ऊपर के आकाश को बुलाएगा," क्योंकि सन्तों और धर्मियों को उपयुक्त रूप से आकाश कहा जाता है, निस्सन्देह इसका अर्थ वही है जो प्रेरित कहता है, "हम उनके साथ बादलों में उठाए जाएँगे, कि प्रभु से हवा में मिलें।"[811] क्योंकि यदि हम इसका केवल शब्दार्थ लें, तो कैसे यह सम्भव है कि ऊपर के आकाश को बुलाया जाए, जैसे आकाश कहीं और के अलावा ऊपर के सिवा हो ही सके? और यह अगली अभिव्यक्ति, "और पृथ्वी को अपनी प्रजा का न्याय करने के लिए," यदि हम केवल शब्द जोड़ें, "वह बुलाएगा," अर्थात्, "वह पृथ्वी को भी बुलाएगा," और "ऊपर के" न जोड़ें, तो यह हमें सुदृढ़ शिक्षा के अनुरूप एक अर्थ देता प्रतीत होता है, जिसमें आकाश उन्हें द्योतित करता है जो मसीह के साथ न्याय करेंगे, और पृथ्वी उन्हें जिनका न्याय किया जाएगा; और इस प्रकार यह शब्द, "वह ऊपर के आकाश को बुलाएगा," इसका अर्थ यह नहीं होगा, "वह हवा में उठा लेगा," वरन् "वह न्याय के आसनों तक उठाएगा।" सम्भवतः, यह भी, "वह आकाश को बुलाएगा," इसका अर्थ हो सकता है, वह उच्च और ऊँचे स्थानों में स्वर्गदूतों को बुलाएगा, कि वह उनके साथ न्याय करने के लिए उतरे; और "वह पृथ्वी को भी बुलाएगा" इसका अर्थ तब यह होगा, वह पृथ्वी के मनुष्यों को न्याय के लिए बुलाएगा। परन्तु यदि "और पृथ्वी" के शब्दों के साथ हम केवल "वह बुलाएगा" ही नहीं, वरन् "ऊपर के" भी समझें, जिससे पूर्ण अर्थ यह बने, वह ऊपर के आकाश को बुलाएगा, और वह ऊपर की पृथ्वी को बुलाएगा, तो मुझे लगता है कि इसे उन मनुष्यों के विषय में सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है जो मसीह से हवा में मिलने के लिए उठाए जाएँगे, और जो अपनी आत्माओं के सम्बन्ध में आकाश कहलाते हैं, और अपने शरीरों के सम्बन्ध में पृथ्वी। तब "अपनी प्रजा का न्याय करना" इसके सिवा और क्या है कि न्याय के द्वारा भलों को बुरों से अलग करना, जैसे भेड़ों को बकरियों से? तब वह स्वर्गदूतों की ओर मुड़कर कहता है: "उसके सन्तों को उसके पास इकट्ठा करो।" क्योंकि निश्चय ही इतना महत्त्वपूर्ण कार्य स्वर्गदूतों की सेवा द्वारा ही सम्पन्न होना चाहिए। और यदि हम पूछें कि वे सन्त कौन हैं जो स्वर्गदूतों द्वारा उसके पास इकट्ठे किए जाते हैं, तो हमें बताया जाता है, "जो बलिदानों के ऊपर उससे वाचा बाँधते हैं।" यह सन्तों का सारा जीवन है, कि वे बलिदानों के ऊपर परमेश्वर से वाचा बाँधें। क्योंकि "बलिदानों के ऊपर" या तो दया के कामों की ओर संकेत करता है, जो परमेश्वर के न्याय में बलिदानों से श्रेष्ठ हैं, जो कहता है, "मैं बलिदानों से अधिक दया चाहता हूँ;"[812] या यदि "बलिदानों के ऊपर" का अर्थ बलिदानों में है, तो ये ही दया के काम वे बलिदान हैं जिनसे परमेश्वर प्रसन्न होता है, जैसा मुझे स्मरण है कि मैंने इस रचना की दसवीं पुस्तक में कहा है;[813] और इन्हीं कामों में सन्त परमेश्वर से वाचा बाँधते हैं, क्योंकि वे इन्हें उन प्रतिज्ञाओं के लिए करते हैं जो उसकी नई वाचा में निहित हैं। और इसलिए, जब उसके सन्त उसके पास इकट्ठे किए जाएँगे और अन्तिम न्याय में उसके दाहिने हाथ पर बैठाए जाएँगे, तब मसीह कहेगा, "आओ, मेरे पिता के धन्य लोगों, उस राज्य को अपने अधिकार में ले लो जो जगत की उत्पत्ति से तुम्हारे लिए तैयार किया गया है। क्योंकि मैं भूखा था, और तुमने मुझे खाने को दिया,"[814] और इसी प्रकार आगे, भलों के भले कामों का, और न्यायकर्ता के अन्तिम वचन द्वारा नियत उनके अनन्त पुरस्कारों का उल्लेख करते हुए।

    25. मलाकी की भविष्यवाणी के विषय में, जिसमें वह अन्तिम न्याय की, और उस शुद्धिकरण की बात करता है जिससे कुछ लोग शुद्धिकारी दण्डों द्वारा गुजरेंगे

    भविष्यद्वक्ता मलाकी या मलाकियास, जो एंजल भी कहलाता है, और जिसे कुछ लोग (क्योंकि जेरोम[815] हमें बताता है कि यह इब्रियों की राय है) याजक एज्रा[816] से एक ही मानते हैं, जिनके अन्य लेख भी प्रामाणिक ग्रंथों में स्वीकार किए गए हैं, अन्तिम न्याय की भविष्यवाणी करते हुए कहता है, "देखो, वह आता है, यहोवा सर्वशक्तिमान की यह वाणी है; और उसके आगमन के दिन को कौन सह सकेगा? ... क्योंकि मैं यहोवा तुम्हारा परमेश्वर हूँ, और मैं नहीं बदलता।"[817] इन शब्दों से यह अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि अन्तिम न्याय में कुछ लोग किसी प्रकार के शुद्धिकारी दण्डों को सहेंगे; क्योंकि इस वाक्य से और क्या समझा जा सकता है, "उसके आगमन के दिन को कौन सह सकेगा, या उसे देखने के योग्य कौन होगा? क्योंकि वह ढालनेवाले की आग के समान, और धोबियों की जड़ी के समान प्रवेश करता है: और वह सोने और चाँदी के समान गलाते और शुद्ध करते हुए बैठेगा: और वह लेवी के पुत्रों को शुद्ध करेगा, और उन्हें सोने और चाँदी के समान ढालेगा?" इसी प्रकार यशायाह कहता है, "यहोवा सिय्योन की सन्तानों की मलिनता को धो देगा, और उनके बीच से लोहू को शुद्ध करेगा, न्याय की आत्मा से और जलाने की आत्मा से।"[818] जब तक हम यह न कहें कि वे मलिनता से शुद्ध किए जाते हैं और एक प्रकार से स्वच्छ किए जाते हैं, जब दुष्ट दण्डमूलक न्याय द्वारा उनसे अलग किए जाते हैं, इस प्रकार कि एक पक्ष का निष्कासन और दण्ड ही दूसरे पक्ष का शुद्धिकरण है, क्योंकि वे अब ऐसे मनुष्यों के कलुष से मुक्त होकर जीवित रहेंगे। परन्तु जब वह कहता है, "और वह लेवी के पुत्रों को शुद्ध करेगा, और उन्हें सोने और चाँदी के समान ढालेगा, और वे यहोवा को धार्मिकता में बलिदान चढ़ाएँगे; और यहूदा और यरूशलेम के बलिदान यहोवा को भाएँगे," तो वह घोषित करता है कि जो शुद्ध किए जाएँगे वे तब धार्मिकता के बलिदानों से यहोवा को प्रसन्न करेंगे, और फलस्वरूप वे अपनी उस अधर्मता से शुद्ध होंगे जिसने उन्हें परमेश्वर के लिए अप्रिय बनाया था। अब वे स्वयं, जब शुद्ध हो जाएँगे, सम्पूर्ण और पूर्ण धार्मिकता के बलिदान होंगे; क्योंकि ऐसे मनुष्य परमेश्वर को अपने आप से बढ़कर और कौन-सी भेंट चढ़ा सकते हैं? परन्तु शुद्धिकारी दण्डों के इस प्रश्न को हमें अन्य समय के लिए स्थगित करना चाहिए, ताकि इसे अधिक उपयुक्त रूप से समझाया जा सके। लेवी और यहूदा और यरूशलेम के पुत्रों से हमें स्वयं कलीसिया समझना चाहिए, जो केवल इब्रियों से नहीं, वरन् अन्य जातियों से भी इकट्ठी की गई है; न वैसी कलीसिया जैसी वह अब है, जब "यदि हम कहें कि हम में पाप नहीं है, तो हम अपने आपको धोखा देते हैं, और सत्य हम में नहीं है,"[819] वरन् जैसी वह तब होगी, अन्तिम न्याय द्वारा शुद्ध की गई जैसे खलिहान फटकनी की हवा से, और उसके उन सदस्यों को जिन्हें आवश्यकता है आग द्वारा शुद्ध किया गया, जिससे बिलकुल भी कोई ऐसा शेष न रहे जो अपने पापों के लिए बलिदान चढ़ाए। क्योंकि जो कोई ऐसी भेंट चढ़ाता है वह निश्चय ही पाप में है, जिनकी क्षमा के लिए वे भेंट चढ़ाते हैं, कि परमेश्वर को स्वीकार्य भेंट चढ़ाकर, वे तब क्षमा किए जा सकें।

    26. सन्तों द्वारा परमेश्वर को चढ़ाए जानेवाले बलिदानों के विषय में, जो उसे प्रिय होंगे, जैसे आदिकाल के दिनों और पूर्वकाल के वर्षों में

    और यह इस उद्देश्य से था कि यह दिखाया जाए कि उसका नगर तब इस रीति का पालन नहीं करेगा, कि परमेश्वर ने कहा कि लेवी के पुत्र धार्मिकता में बलिदान चढ़ाएँगे,—अतः पाप में नहीं, और फलस्वरूप पाप के लिए नहीं। और इससे हम देखते हैं कि यहूदी कैसे व्यर्थ ही अपने आपको पुरानी वाचा की व्यवस्था के अनुसार बलिदान चढ़ाने के पुराने समयों की वापसी की आशा देते हैं, इन शब्दों के आधार पर जो आगे आते हैं, "और यहूदा और यरूशलेम का बलिदान यहोवा को भाएगा, जैसा आदिकाल के दिनों में, और जैसा पूर्वकाल के वर्षों में।" क्योंकि व्यवस्था के समयों में वे बलिदान धार्मिकता में नहीं वरन् पापों में चढ़ाते थे, विशेष रूप से और प्रधानतः पापों के लिए चढ़ाते हुए, इतना कि स्वयं याजक, जिसे हमें उनका सबसे धर्मी मनुष्य मानना चाहिए, परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार पहले अपने ही पापों के लिए, और तब प्रजा के पापों के लिए बलिदान चढ़ाने का अभ्यासी था। और इसलिए हमें यह समझाना चाहिए कि हम इन शब्दों को कैसे समझें, "जैसा आदिकाल के दिनों में, और जैसा पूर्वकाल के वर्षों में;" क्योंकि सम्भवतः वह उस समय की ओर संकेत करता है जिसमें हमारे प्रथम माता-पिता स्वर्गोद्यान में थे। तब, वास्तव में, पाप के हर धब्बे और दोष से अछूते और शुद्ध, उन्होंने अपने आपको परमेश्वर को शुद्धतम बलिदानों के रूप में चढ़ाया। परन्तु क्योंकि वे अपने अपराध के कारण वहाँ से निकाल दिए गए, और मानव-स्वभाव उनमें दण्डित हुआ, एक मध्यस्थ को छोड़कर, और उन्हें छोड़कर जो बपतिस्मा पा चुके हैं, और अभी तक शिशु हैं, "पृथ्वी पर एक भी शुद्ध नहीं, यहाँ तक कि वह बालक भी नहीं जिसका जीवन पृथ्वी पर केवल एक दिन का रहा है।"[820] परन्तु यदि यह उत्तर दिया जाए कि जो विश्वास में चढ़ाते हैं वे धार्मिकता में चढ़ाते कहे जा सकते हैं, क्योंकि धर्मी विश्वास से जीवित रहता है,[821]—वह अपने आपको धोखा देता है, तो भी, यदि वह कहता है कि उसमें पाप नहीं है, और इसलिए वह ऐसा नहीं कहता, क्योंकि वह विश्वास से जीवित रहता है,—तो क्या कोई कहेगा कि विश्वास का यह समय उस पूर्णता के समान रखा जा सकता है जब वे जो धार्मिकता में बलिदान चढ़ाते हैं अन्तिम न्याय की आग से शुद्ध किए जाएँगे? और फलस्वरूप, क्योंकि यह विश्वास किया जाना चाहिए कि इस प्रकार के शुद्धिकरण के बाद धर्मी कोई पाप नहीं रखेंगे, निश्चय ही वह समय, जहाँ तक पाप से मुक्ति का सम्बन्ध है, किसी अन्य काल से तुलनीय नहीं हो सकता, सिवाय उस काल के जिसमें हमारे प्रथम माता-पिता स्वर्गोद्यान में अपने अपराध से पहले सबसे निष्पाप सुख में रहते थे। यही वह काल है, तो, जो उचित रूप से समझा जाता है जब कहा जाता है, "जैसा आदिकाल के दिनों में, और जैसा पूर्वकाल के वर्षों में।" क्योंकि यशायाह में भी, नये आकाश और नई पृथ्वी की प्रतिज्ञा के बाद, सन्तों की धन्यता के अन्य तत्त्वों के बीच जो वहाँ रूपकों और आकृतियों में वर्णित हैं, जिनकी पर्याप्त व्याख्या देने से मुझे अतिविस्तार से बचने की इच्छा रोकती है, कहा गया है, "जैसे जीवन के वृक्ष के दिन होंगे, वैसे ही मेरी प्रजा के दिन होंगे।"[822] और कौन है जिसने पवित्रशास्त्र को देखा हो और न जानता हो कि परमेश्वर ने जीवन का वृक्ष कहाँ लगाया, जिसके फल से उसने हमारे प्रथम माता-पिता को उनके अपने अधर्म द्वारा स्वर्गोद्यान से निकाले जाने पर वंचित कर दिया, और जिसके चारों ओर एक भयानक और अग्निमय बाड़ लगा दी गई?

    परन्तु यदि कोई यह तर्क करे कि जीवन के वृक्ष के वे दिन जिनका उल्लेख भविष्यद्वक्ता यशायाह ने किया है, मसीह की कलीसिया के वर्तमान समय हैं, और कि मसीह स्वयं भविष्यसूचक रूप से जीवन का वृक्ष कहलाता है, क्योंकि वह बुद्धि है, और बुद्धि के विषय में सुलैमान कहता है, "यह उन सभी के लिए जीवन का वृक्ष है जो इसे थाम लेते हैं;"[823] और यदि वे यह मानते हैं कि हमारे प्रथम माता-पिता ने स्वर्गोद्यान में वर्ष नहीं बिताए, वरन् इतनी शीघ्र उससे निकाल दिए गए कि उनकी कोई सन्तान वहाँ उत्पन्न नहीं हुई, और कि इसलिए उस काल की ओर उन शब्दों में संकेत नहीं हो सकता जो इस प्रकार हैं, "जैसा आदिकाल के दिनों में, और जैसा पूर्वकाल के वर्षों में," तो मैं इस प्रश्न में प्रवेश करने से बचता हूँ, ऐसा न हो कि सब कुछ पर चर्चा करते हुए मैं अतिविस्तृत हो जाऊँ, और सारे विषय को अनिश्चय में छोड़ दूँ। क्योंकि मुझे एक अन्य अर्थ दिखाई देता है, जो हमें यह विश्वास करने से रोके कि व्यवस्थात्मक बलिदानों के आदिकाल के दिनों और पूर्वकाल के वर्षों की पुनःस्थापना भविष्यद्वक्ता द्वारा हमारे लिए एक बड़े वरदान के रूप में प्रतिज्ञा की गई हो सकती है। क्योंकि पुरानी व्यवस्था के अधीन बलि के रूप में चुने गए पशुओं को निर्दोष, और हर प्रकार के दोष से मुक्त होना आवश्यक था, और वे उन पवित्र मनुष्यों के द्योतक थे जो सब पाप से मुक्त हैं, जिसका एकमात्र उदाहरण मसीह में पाया गया। इसलिए, जैसे न्याय के बाद वे जो ऐसे शुद्धिकरण के योग्य हैं वे आग द्वारा भी शुद्ध किए जाएँगे, और पूर्णतः निष्पाप बनाए जाएँगे, और अपने आपको परमेश्वर को धार्मिकता में चढ़ाएँगे, और वास्तव में निर्दोष और हर प्रकार के दोष से मुक्त बलि होंगे, तब वे निश्चय ही "जैसा आदिकाल के दिनों में, और जैसा पूर्वकाल के वर्षों में" होंगे, जब शुद्धतम बलियाँ चढ़ाई जाती थीं, इस भविष्य की सच्चाई की छाया। क्योंकि तब सन्तों के शरीर और आत्मा में वह पवित्रता होगी जो इन बलियों के शरीरों में द्योतित की गई थी।

    तत्पश्चात, उन लोगों के विषय में जो शुद्धिकरण के नहीं वरन दण्ड के योग्य हैं, वह कहता है, "और मैं न्याय के लिए तुम्हारे निकट आऊँगा, और दुष्कर्मियों तथा व्यभिचारियों के विरुद्ध शीघ्र गवाह बनूँगा;" और अन्य दण्डनीय अपराधों को गिनाने के बाद वह कहता है, "क्योंकि मैं तुम्हारा प्रभु परमेश्वर हूँ, और मैं बदलता नहीं।" यह ऐसा है जैसे उसने कहा हो, यद्यपि तुम्हारे दोष ने तुम्हें बुरे के लिए बदल दिया है, और मेरे अनुग्रह ने तुम्हें भले के लिए बदल दिया है, तौभी मैं नहीं बदलता। और वह कहता है कि वह स्वयं गवाह होगा, क्योंकि अपने न्याय में उसे किसी गवाह की आवश्यकता नहीं; और वह "शीघ्र" होगा, या तो इस कारण कि वह अचानक आने वाला है, और जो न्याय विलम्बित प्रतीत होता था वह उसके अप्रत्याशित आगमन से अत्यन्त शीघ्र हो जाएगा, या इस कारण कि वह मनुष्यों के अन्तःकरण को बिना किसी दीर्घ भाषण के सीधे कायल करेगा। "क्योंकि," जैसा लिखा है, "दुष्टों के विचारों में उसकी जाँच सम्पन्न होगी।"[824] और प्रेरित कहता है, "वे विचार जो दोष लगाते या फिर निर्दोष ठहराते हैं, उस दिन जब परमेश्वर मनुष्यों की गुप्त बातों का न्याय करेगा, मेरे उस सुसमाचार के अनुसार जो यीशु मसीह में है।"[825] इस प्रकार, प्रभु शीघ्र गवाह होगा, जब वह अचानक स्मृति में वह बात ले आएगा जो अन्तःकरण को कायल और दण्डित करेगी।

    27. भले और बुरे के अलगाव के विषय में, जो अन्तिम न्याय के भेदकारी प्रभाव को घोषित करता है

    इस भविष्यद्वक्ता से जो अनुच्छेद मैंने पूर्व में किसी अन्य प्रयोजन के लिए उद्धृत किया था, वह भी अन्तिम न्याय की ओर संकेत करता है, जिसमें वह कहता है, "वे मेरे होंगे, सर्वशक्तिमान प्रभु कहता है, उस दिन जब मैं अपनी लाभ-राशि इकट्ठी करूँगा,"[826] इत्यादि। जब धर्मियों और दुष्टों में भेद करने वाले पुरस्कार और दण्ड की यह विविधता उस धार्मिकता के सूर्य के नीचे अनन्त जीवन की चमक में प्रकट होगी—एक ऐसी विविधता जो इस लोक की व्यर्थता पर चमकने वाले इस सूर्य के नीचे नहीं पहचानी जाती—तब ऐसा न्याय होगा जैसा इससे पहले कभी नहीं हुआ।

    28. यह कि मूसा की व्यवस्था को आत्मिक रूप से समझा जाना चाहिए, जिससे शारीरिक व्याख्या की दण्डनीय बुड़बुड़ाहट को रोका जा सके

    आगे के शब्दों में, "मेरे सेवक मूसा की व्यवस्था को स्मरण रखो, जो मैंने होरेब में उसे सारे इस्राएल के लिए दी थी,"[827] भविष्यद्वक्ता अवसर पाकर आज्ञाओं और विधियों का उल्लेख करता है, इसके पश्चात कि वह उस महत्वपूर्ण भेद की घोषणा कर चुका है जो भविष्य में व्यवस्था का पालन करनेवालों और उसे तुच्छ जाननेवालों के बीच किया जाएगा। वह यह भी चाहता है कि वे व्यवस्था की आत्मिक व्याख्या करना सीखें, और उसमें मसीह को पाएँ, जिसके न्याय से भले और बुरे के बीच वह विभाजन किया जाना है। क्योंकि प्रभु स्वयं यहूदियों से बिना कारण नहीं कहता, "यदि तुम मूसा पर विश्वास करते, तो मुझ पर भी विश्वास करते; क्योंकि उसने मेरे विषय में लिखा।"[828] क्योंकि व्यवस्था को शारीरिक रूप से ग्रहण करने से, यह न समझते हुए कि उसकी पार्थिव प्रतिज्ञाएँ आत्मिक बातों के प्रतीक थीं, वे ऐसी बुड़बुड़ाहटों में गिर पड़े कि उन्होंने ढिठाई से यह कहा, "परमेश्वर की सेवा करना व्यर्थ है; और इसमें क्या लाभ है कि हमने उसकी विधि का पालन किया, और सर्वशक्तिमान प्रभु के सम्मुख विनम्र होकर चले? और अब हम परदेशियों को धन्य कहते हैं; हाँ, दुष्टता करनेवाले स्थापित हो जाते हैं।"[829] उनके ये ही शब्द थे जिन्होंने भविष्यद्वक्ता को एक प्रकार से विवश किया कि वह अन्तिम न्याय की घोषणा करे, जिसमें दुष्ट प्रतीति में भी धन्य नहीं होंगे, वरन प्रकटरूप से अत्यन्त दुखी होंगे; और जिसमें भले लोग क्षणिक दुःख से भी पीड़ित नहीं होंगे, वरन निर्मल और अनन्त धन्यता का आनन्द लेंगे। क्योंकि उसने पहले भी उन लोगों के कुछ ऐसे ही शब्द उद्धृत किए थे जिन्होंने कहा था, "जो कोई बुराई करता है, वह प्रभु की दृष्टि में भला है, और ऐसे ही लोग उसे भाते हैं।"[830] यह, मैं कहता हूँ, मूसा की व्यवस्था को शारीरिक रूप से समझने के कारण ही था कि वे परमेश्वर के विरुद्ध इस प्रकार बुड़बुड़ाने लगे थे। और इसी कारण 73वें भजन का लेखक कहता है कि उसके पग डगमगाने को थे, उसके चरण फिसलने को थे, क्योंकि वह पापियों के वैभव पर विचार करते हुए उनसे डाह करता था, यहाँ तक कि उसने अन्य बातों के बीच यह कहा, परमेश्वर कैसे जानता है, और क्या परमप्रधान में ज्ञान है? और फिर, क्या मैंने अपने हृदय को व्यर्थ शुद्ध रखा, और अपने हाथों को निर्दोषता में धोया?[831] वह आगे कहता है कि इस अत्यन्त कठिन प्रश्न को सुलझाने के उसके प्रयास, जो तब उठता है जब भले दुखी और दुष्ट सुखी प्रतीत होते हैं, तब तक व्यर्थ रहे जब तक वह परमेश्वर के पवित्रस्थान में न गया, और अन्तिम बातों को न समझा।[832] क्योंकि अन्तिम न्याय में बातें ऐसी नहीं होंगी; वरन धर्मियों की प्रकट धन्यता और दुष्टों के प्रकट दुःख में एक सर्वथा भिन्न स्थिति प्रकट होगी।

    29. न्याय से पूर्व एलिय्याह के आगमन के विषय में, कि यहूदी उसके प्रचार और पवित्रशास्त्र की व्याख्या द्वारा मसीह की ओर फिरें

    उन्हें मूसा की व्यवस्था पर ध्यान देने की चेतावनी देने के बाद, यह पूर्वबोध रखते हुए कि वे बहुत काल तक उसे आत्मिक और सम्यक रूप से न समझेंगे, वह आगे कहता है, "और देख, प्रभु का महान और चिह्नयुक्त दिन आने से पहले मैं तिशबी एलिय्याह को तुम्हारे पास भेजूँगा: और वह पिता का हृदय पुत्र की ओर, और मनुष्य का हृदय अपने निकटतम सम्बन्धी की ओर फेरेगा, ऐसा न हो कि मैं आकर पृथ्वी को पूरी तरह मार डालूँ।"[833] विश्वासियों की बातचीत और हृदय में यह एक परिचित विषय है, कि न्याय से पूर्व अन्तिम दिनों में यहूदी सच्चे मसीह में, अर्थात हमारे मसीह में, इस महान और आश्चर्यजनक भविष्यद्वक्ता एलिय्याह के द्वारा विश्वास करेंगे, जो उन्हें व्यवस्था की व्याख्या करेगा। क्योंकि हम बिना कारण यह आशा नहीं रखते कि हमारे न्यायी और उद्धारकर्ता के आगमन से पूर्व एलिय्याह आएगा, क्योंकि हमारे पास यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण है कि वह अब भी जीवित है; क्योंकि, जैसा पवित्रशास्त्र हमें अत्यन्त स्पष्ट रूप से बताता है,[834] वह इस जीवन से आग के एक रथ में उठा लिया गया था। इसलिए, जब वह आएगा, तो वह उस व्यवस्था की आत्मिक व्याख्या देगा जिसे यहूदी अब तक शारीरिक रूप से समझते हैं, और इस प्रकार "पिता का हृदय पुत्र की ओर" फेरेगा, अर्थात पिताओं का हृदय उनकी सन्तानों की ओर; क्योंकि सप्तति के अनुवादकों ने अक्सर बहुवचन के स्थान पर एकवचन का उपयोग किया है। और इसका अर्थ यह है कि पुत्र, अर्थात यहूदी, व्यवस्था को वैसे ही समझेंगे जैसे पिताओं ने, अर्थात भविष्यद्वक्ताओं ने, और उनमें भी स्वयं मूसा ने, उसे समझा था। क्योंकि पिताओं का हृदय अपनी सन्तानों की ओर तब फिरेगा जब सन्तानें व्यवस्था को वैसे ही समझेंगी जैसे उनके पिताओं ने समझा; और सन्तानों का हृदय अपने पिताओं की ओर तब फिरेगा जब उनके विचार पिताओं के समान होंगे। सप्तति ने "और मनुष्य का हृदय अपने निकटतम सम्बन्धी की ओर" यह अभिव्यक्ति इस कारण प्रयोग की, क्योंकि पिता और सन्तान एक दूसरे के विशेष रूप से निकटतम होते हैं। सप्तति के अनुवादकों के, जिन्होंने पवित्रशास्त्र का अनुवाद भविष्यवाणी की दृष्टि रखते हुए किया, शब्दों में एक अन्य और अधिक उपयुक्त अर्थ मिल सकता है, अर्थात यह कि एलिय्याह परमेश्वर पिता का हृदय पुत्र की ओर फेरेगा—निःसन्देह इस अर्थ में नहीं कि वह पिता के पुत्र के प्रति इस प्रेम को उत्पन्न करेगा, वरन इस अर्थ में कि वह इसे प्रकट करेगा, और यहूदी भी, जो पहले द्वेष रखते थे, तब हमारे मसीह जो पुत्र है, से प्रेम करेंगे। क्योंकि यहूदियों के सम्बन्ध में, परमेश्वर का हृदय हमारे मसीह से फिरा हुआ है, यह उनकी परमेश्वर और मसीह के विषय में धारणा है। परन्तु उनके सम्बन्ध में परमेश्वर का हृदय पुत्र की ओर तब फिरेगा जब वे स्वयं हृदय में फिरेंगे, और पुत्र के प्रति पिता के प्रेम को जानेंगे। आगे के शब्द, "और मनुष्य का हृदय अपने निकटतम सम्बन्धी की ओर"—अर्थात एलिय्याह मनुष्य का हृदय भी अपने निकटतम सम्बन्धी की ओर फेरेगा—इसे इससे बेहतर और किस प्रकार समझा जा सकता है सिवा इसके कि मनुष्य का हृदय मनुष्य मसीह की ओर फिरेगा? क्योंकि यद्यपि परमेश्वर के रूप में वह हमारा परमेश्वर है, तौभी दास का रूप लेकर उसने कृपापूर्वक हमारा निकटतम सम्बन्धी भी बनना स्वीकार किया। यही तो है जो एलिय्याह करेगा, "ऐसा न हो," वह कहता है, "कि मैं आकर पृथ्वी को पूरी तरह मार डालूँ।" क्योंकि जो पार्थिव बातों पर मन लगाते हैं, वे ही पृथ्वी हैं। आज तक शारीरिक यहूदी ऐसे ही हैं; और इसी कारण उनकी परमेश्वर के विरुद्ध ये बुड़बुड़ाहटें हैं, "दुष्ट उसे भाते हैं," और "परमेश्वर की सेवा करना व्यर्थ बात है।"[835]

    30. यह कि पुराने नियम की पुस्तकों में, जहाँ कहा गया है कि परमेश्वर जगत का न्याय करेगा, मसीह का व्यक्तित्व स्पष्ट रूप से संकेतित नहीं है, परन्तु कुछ अनुच्छेदों से, जिनमें प्रभु परमेश्वर बोलता है, यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि मसीह ही अभिप्रेत है

    पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के अन्तिम न्याय से सम्बन्धित और भी अनेक अनुच्छेद हैं—इतने अधिक, कि उन सबको उद्धृत करने से यह पुस्तक असीम आकार की हो जाएगी। यह प्रमाणित करना ही पर्याप्त है कि पुराना और नया नियम दोनों ही उस न्याय की घोषणा करते हैं। परन्तु पुराने नियम में यह इतनी निश्चितता से घोषित नहीं है जितनी नये नियम में, कि वह न्याय मसीह के द्वारा सम्पन्न किया जाएगा, अर्थात कि मसीह न्यायी के रूप में स्वर्ग से उतरेगा; क्योंकि जब उसमें प्रभु परमेश्वर या उसके भविष्यद्वक्ता के द्वारा यह कहा जाता है कि प्रभु परमेश्वर आएगा, तो हम इसे अनिवार्यतः मसीह के विषय में नहीं समझते। क्योंकि पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा—तीनों ही प्रभु परमेश्वर हैं। तथापि हमें इसे बिना प्रमाण के नहीं छोड़ना चाहिए। और इसलिए हमें पहले यह दिखाना होगा कि किस प्रकार यीशु मसीह भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों में प्रभु परमेश्वर की उपाधि के अन्तर्गत बोलता है, जबकि इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि बोलनेवाला यीशु मसीह ही है; जिससे कि अन्य अनुच्छेदों में, जहाँ यह तुरन्त स्पष्ट नहीं होता, और तथापि जहाँ यह कहा गया है कि प्रभु परमेश्वर उस अन्तिम न्याय के लिए आएगा, हम समझ सकें कि यीशु मसीह ही अभिप्रेत है। भविष्यद्वक्ता यशायाह में एक अनुच्छेद है जो मेरे कहने का तात्पर्य स्पष्ट करता है। क्योंकि परमेश्वर भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहता है, "मेरी सुन, याकूब और इस्राएल, जिसे मैं बुलाता हूँ। मैं ही पहला हूँ, और मैं सर्वदा हूँ: और मेरे हाथ ने पृथ्वी की स्थापना की है, और मेरे दाहिने हाथ ने आकाश को स्थिर किया है। मैं उन्हें बुलाऊँगा, और वे एक साथ खड़े होंगे, और इकट्ठे होंगे, और सुनेंगे। किसने उन्हें ये बातें बताई हैं? तेरे प्रेम में मैंने बाबेल पर तेरी इच्छा पूरी की है, कि मैं कसदियों के वंश को दूर कर दूँ। मैंने कहा है, और मैंने बुलाया है: मैं उसे लाया हूँ, और उसका मार्ग सफल बनाया है। मेरे निकट आओ, और यह सुनो। मैंने आदि से गुप्त में नहीं कहा; जब वे बनाए गए, तब मैं वहाँ था। और अब प्रभु परमेश्वर और उसकी आत्मा ने मुझे भेजा है।"[836] वह स्वयं ही था जो प्रभु परमेश्वर के रूप में बोल रहा था; और तथापि हम यह न समझ पाते कि यह यीशु मसीह ही था, यदि उसने यह न जोड़ा होता, "और अब प्रभु परमेश्वर और उसकी आत्मा ने मुझे भेजा है।" क्योंकि उसने यह दास के रूप के सन्दर्भ में कहा, भविष्य की घटना का वर्णन ऐसे किया जैसे वह भूतकाल की हो, जैसा उसी भविष्यद्वक्ता में हम पढ़ते हैं, "वह भेड़ के समान वध के लिए ले जाया गया,"[837] यह नहीं "वह ले जाया जाएगा;" वरन भविष्य को व्यक्त करने के लिए भूतकाल का प्रयोग किया गया है। और भविष्यवाणी सदैव इसी प्रकार बोलती है।

    जकर्याह में एक और भी अनुच्छेद है जो स्पष्ट रूप से घोषित करता है कि सर्वशक्तिमान ने सर्वशक्तिमान को भेजा; और इन शब्दों को परमेश्वर पिता और परमेश्वर पुत्र के अतिरिक्त और किन व्यक्तियों के विषय में समझा जा सकता है? क्योंकि लिखा है, "सर्वशक्तिमान प्रभु यों कहता है, महिमा के बाद उसने मुझे उन जातियों के पास भेजा है जिन्होंने तुम्हें लूटा; क्योंकि जो तुम्हें छूता है, वह उसकी आँख की पुतली को छूता है। देख, मैं उनके विरुद्ध अपना हाथ बढ़ाऊँगा, और वे अपने ही सेवकों के लिए लूट बन जाएँगे: और तुम जान लोगे कि सर्वशक्तिमान प्रभु ने मुझे भेजा है।"[838] ध्यान दो, सर्वशक्तिमान प्रभु कहता है कि सर्वशक्तिमान प्रभु ने उसे भेजा। इन शब्दों को मसीह के अतिरिक्त और किसी के विषय में समझने का साहस कौन कर सकता है, जो इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों से बोल रहा है? क्योंकि वह सुसमाचार में कहता है, "मैं इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के अतिरिक्त और किसी के पास नहीं भेजा गया,"[839] जिनकी तुलना उसने यहाँ परमेश्वर की आँख की पुतली से की, गहनतम प्रेम को व्यक्त करने के लिए। और भेड़ों के इस वर्ग से प्रेरित स्वयं भी सम्बन्धित थे। परन्तु महिमा के बाद, अर्थात उसके पुनरुत्थान के बाद—क्योंकि उससे पहले सुसमाचार-लेखक ने कहा था कि "यीशु अभी महिमान्वित नहीं हुआ था,"[840]—वह अपने प्रेरितों के व्यक्तित्व में जातियों के पास भेजा गया; और इस प्रकार भजन की यह बात पूरी हुई, "तू मुझे लोगों के विरोध से बचाएगा; तू मुझे जातियों का प्रधान बनाएगा।"[841] इस प्रकार जिन्होंने इस्राएलियों को लूटा था, और जिनकी इस्राएलियों ने उनके अधीन होकर सेवा की थी, वे स्वयं उसी रीति से लूटे जाने के लिए नहीं थे, वरन स्वयं अपने व्यक्तित्व में इस्राएलियों की लूट बनने के लिए थे। क्योंकि यह प्रेरितों से तब प्रतिज्ञा की गई थी जब प्रभु ने कहा, "मैं तुम्हें मनुष्यों के मछुए बनाऊँगा।"[842] और उनमें से एक से वह कहता है, "अब से तू मनुष्यों को पकड़ेगा।"[843] तब वे लूट बनने के लिए थे, परन्तु भले अर्थ में, जैसे वे जो उस बलवान से तब छीन लिए जाते हैं जब वह किसी अधिक बलवान के द्वारा बाँध लिया जाता है।[844]

    इसी प्रकार प्रभु, उसी भविष्यद्वक्ता के द्वारा बोलते हुए, कहता है, "और उस दिन ऐसा होगा, कि मैं उन सब जातियों को नाश करने का उपाय करूँगा जो यरूशलेम के विरुद्ध आती हैं। और मैं दाऊद के घराने पर, और यरूशलेम के निवासियों पर, अनुग्रह और दया की आत्मा उंडेलूँगा; और वे मुझे देखेंगे क्योंकि उन्होंने मेरा अपमान किया है, और वे उसके लिए ऐसे विलाप करेंगे जैसे किसी अत्यन्त प्रिय के लिए, और उसके लिए ऐसे कटु शोक करेंगे जैसे किसी एकलौते के लिए।"[845] उन सब जातियों को, जो पवित्र नगर यरूशलेम की शत्रु हैं और जो उसके "विरुद्ध आती हैं," अर्थात उसका विरोध करती हैं, या, जैसा कुछ अनुवाद करते हैं, "उसके ऊपर आती हैं," जैसे उसे अपने अधीन दबाने के लिए—इन्हें नाश करना, या दाऊद के घराने और यरूशलेम के निवासियों पर अनुग्रह और दया की आत्मा उंडेलना, परमेश्वर के अतिरिक्त और किसका काम हो सकता है? यह निःसन्देह परमेश्वर का ही काम है, और भविष्यद्वक्ता इन शब्दों को परमेश्वर के लिए ही कहता है; और तथापि मसीह यह दिखाता है कि वही वह परमेश्वर है जो ये इतनी बड़ी और दिव्य बातें करता है, जब वह आगे कहता है, "और वे मुझे देखेंगे क्योंकि उन्होंने मेरा अपमान किया है, और वे उसके लिए ऐसे विलाप करेंगे जैसे किसी अत्यन्त प्रिय (या प्रियतम) के लिए, और उसके लिए ऐसे कटु शोक करेंगे जैसे किसी एकलौते के लिए।" क्योंकि उस दिन यहूदी—कम से कम उनमें से वे जो अनुग्रह और दया की आत्मा को पाएँगे—जब वे उसे अपने ऐश्वर्य में आते देखेंगे, और यह पहचानेंगे कि यह वही है जिसका उन्होंने, अपने पूर्वजों के व्यक्तित्व में, तब अपमान किया था जब वह पहले अपनी दीनता में आया था, तो अपने उस अपमान पर, जो उन्होंने उसके दुःखभोग में किया, पश्चाताप करेंगे: और उनके पूर्वज स्वयं, जो इस महाभारी अधर्म के कर्ता थे, उसे तब देखेंगे जब वे उठेंगे; परन्तु यह केवल उनके दण्ड के लिए होगा, और उनके सुधार के लिए नहीं। ये शब्द, "और मैं दाऊद के घराने पर, और यरूशलेम के निवासियों पर, अनुग्रह और दया की आत्मा उंडेलूँगा, और वे मुझे देखेंगे क्योंकि उन्होंने मेरा अपमान किया है," उनके विषय में नहीं वरन उनकी उन सन्तानों के विषय में समझे जाने चाहिए, जो उस समय एलिय्याह के द्वारा विश्वास करेंगी। परन्तु जैसे हम यहूदियों से कहते हैं, तुमने मसीह को मार डाला, यद्यपि यह उनके पूर्वजों ने किया था, वैसे ही ये लोग इस बात का शोक करेंगे कि उन्होंने भी किसी अर्थ में वही किया जो उनके पूर्वजों ने किया था। इसलिए, यद्यपि जो लोग दया और अनुग्रह की आत्मा को पाएँगे और विश्वास करेंगे, वे अपने अधर्मी पूर्वजों के साथ दण्डित नहीं किए जाएँगे, तौभी वे ऐसे विलाप करेंगे जैसे उन्होंने स्वयं वही किया हो जो उनके पूर्वजों ने किया। उनका शोक दोष से इतना नहीं, जितना भक्तिपूर्ण स्नेह से उत्पन्न होगा। निश्चय ही जिन शब्दों का सप्तति ने अनुवाद किया है, "वे मुझे देखेंगे क्योंकि उन्होंने मेरा अपमान किया," वे इब्री में इस प्रकार हैं, "वे मुझे देखेंगे जिसे उन्होंने बेधा।"[846] और इस शब्द से मसीह का क्रूसारोपण निश्चय ही अधिक स्पष्टता से संकेतित होता है। परन्तु सप्तति के अनुवादकों ने उस अपमान की ओर संकेत करना अधिक उचित समझा जो उसके पूरे दुःखभोग में सम्मिलित था। क्योंकि वास्तव में उन्होंने उसका अपमान तब भी किया जब वह पकड़ा गया और जब वह बाँधा गया, जब उसका न्याय किया गया, जब उसे उस वस्त्र के द्वारा जो उन्होंने उसे पहनाया और उस घुटने टेककर की गई श्रद्धा के द्वारा उपहास किया गया, जब उसे कँटीला मुकुट पहनाया गया और सिर पर बेंत से मारा गया, जब उसने अपना क्रूस उठाया, और जब अन्त में वह वृक्ष पर टँगा। और इसलिए हम प्रभु के दुःखभोग को अधिक पूर्णता से तब पहचानते हैं जब हम एक ही व्याख्या तक सीमित न रहकर दोनों को मिलाते हैं, और "अपमान किया" तथा "बेधा" दोनों को पढ़ते हैं।

    इसलिए, जब हम भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों में यह पढ़ते हैं कि परमेश्वर अन्त में न्याय करने के लिए आएगा, तो न्याय के इस उल्लेख मात्र से, और यद्यपि अर्थ निश्चित करने के लिए कुछ और नहीं है, हमें यह समझ लेना चाहिए कि मसीह ही अभिप्रेत है; क्योंकि यद्यपि पिता न्याय करेगा, तौभी वह पुत्र के आगमन के द्वारा न्याय करेगा। क्योंकि वह स्वयं, अपनी प्रकट उपस्थिति में, "किसी का न्याय नहीं करता, वरन सारा न्याय पुत्र को सौंप दिया है;"[847] क्योंकि जैसे पुत्र का न्याय एक मनुष्य के रूप में हुआ, वैसे ही वह मानवीय रूप में ही न्याय करेगा। क्योंकि यह वही है, जिसके विषय में परमेश्वर यशायाह के द्वारा याकूब और इस्राएल के नाम से बोलता है, जिसके वंश से मसीह ने देह ग्रहण की, जैसा लिखा है, "याकूब मेरा सेवक है, मैं उसे सम्भालूँगा; इस्राएल मेरा चुना हुआ है, मेरी आत्मा ने उसे ग्रहण किया है: मैंने अपनी आत्मा उस पर रखी है; वह अन्यजातियों के लिए न्याय प्रकट करेगा। वह न चिल्लाएगा, न रुकेगा, और न उसकी आवाज़ बाहर सुनी जाएगी। वह मींजी हुई नरकट को न तोड़ेगा, और सुलगती हुई बत्ती को न बुझाएगा: परन्तु सच्चाई में न्याय प्रकट करेगा। वह चमकेगा और तोड़ा न जाएगा, जब तक वह पृथ्वी पर न्याय स्थापित न कर दे: और जातियाँ उसके नाम पर आशा रखेंगी।"[848] इब्री में "याकूब" और "इस्राएल" नहीं है; परन्तु सप्तति के अनुवादकों ने, "मेरा सेवक" इस अभिव्यक्ति के महत्व को दिखाने की इच्छा से, और यह कि यह उस दास के रूप की ओर संकेत करता है जिसमें परमप्रधान ने स्वयं को दीन किया, उस मनुष्य का नाम जोड़ दिया जिसके वंश से उसने दास का रूप लिया। पवित्र आत्मा उसे दी गई, और जैसा सुसमाचार-लेखक गवाही देता है, वह कबूतर के रूप में प्रकट हुई।[849] उसने अन्यजातियों के लिए न्याय प्रकट किया, क्योंकि उसने वह भविष्यवाणी की जो उनसे छिपा था। अपनी नम्रता में वह न चिल्लाया, और न सत्य की घोषणा करना उसने छोड़ा। परन्तु उसकी आवाज़ बाहर न सुनी गई, और न सुनी जाती है, क्योंकि उसकी देह के बाहर रहनेवाले उसकी आज्ञा नहीं मानते। और यहूदी स्वयं, जिन्होंने उसे सताया, उसने नहीं तोड़ा, यद्यपि मींजी हुई नरकट के समान उनकी खराई नष्ट हो गई थी, और सुलगती हुई बत्ती के समान उनका प्रकाश बुझ गया था; क्योंकि उसने उन्हें बचा रखा, इसलिए कि वह न्याय पाने आया था, न्याय करने नहीं। उसने सच्चाई में न्याय प्रकट किया, यह घोषित करते हुए कि यदि वे अपनी दुष्टता में बने रहे तो उन्हें दण्ड मिलेगा। उसका मुख पहाड़ पर चमका,[850] उसकी कीर्ति जगत में चमकी। वह तोड़ा नहीं गया और न पराजित हुआ, क्योंकि न तो उसमें स्वयं, न ही उसकी कलीसिया में, सतावट उसे नष्ट करने में सफल हुई। और इसलिए वह बात न हुई है, और न होगी, जो उसके शत्रुओं ने कहा या कहते हैं, "वह कब मरेगा, और उसका नाम कब नष्ट होगा?"[851] "जब तक वह पृथ्वी पर न्याय स्थापित न कर दे।" देखो, वह छिपी हुई बात जिसे हम खोज रहे थे, प्रकट हो गई है। क्योंकि यही वह अन्तिम न्याय है, जिसे वह पृथ्वी पर तब स्थापित करेगा जब वह स्वर्ग से आएगा। और उसी में हम भविष्यवाणी की इस समाप्ति-वाक्य को भी पहले से पूरा होते देखते हैं: "उसके नाम पर जातियाँ आशा रखेंगी।" और इस पूर्णता के द्वारा, जिसे कोई नकार नहीं सकता, मनुष्य उस बात पर विश्वास करने के लिए प्रेरित होते हैं जिसे अत्यन्त ढिठाई से नकारा जाता है। क्योंकि उस बात की आशा कौन कर सकता था, जिसे अब वे भी, जो अभी तक मसीह पर विश्वास नहीं करते, हमारे बीच पूर्ण होते देखते हैं, और जो इतनी अखण्डनीय है कि वे केवल दाँत पीस सकते हैं और घुलते जा सकते हैं? कौन, मैं कहता हूँ, यह आशा कर सकता था कि जातियाँ मसीह के नाम पर आशा रखेंगी, जब वह पकड़ा गया, बाँधा गया, कोड़े मारा गया, उपहास किया गया, क्रूस पर चढ़ाया गया, जब चेले स्वयं भी वह आशा खो बैठे थे जो उन्होंने उस पर रखनी आरम्भ की थी? वह आशा जो तब क्रूस पर मुश्किल से केवल एक डाकू में पाई जाती थी, अब पृथ्वी पर सर्वत्र जातियों द्वारा सँजोई जाती है, जो उस क्रूस के चिह्न से चिह्नित हैं जिस पर वह मरा, कि वे अनन्त काल तक न मरें।

    तो, यह कि अन्तिम न्याय यीशु मसीह के द्वारा उस रीति से सम्पन्न किया जाएगा जैसा पवित्र लेखों में भविष्यवाणी की गई है, इसे कोई नकारता या सन्दिग्ध नहीं मानता, सिवा उनके जो किसी अविश्वसनीय द्वेष या अन्धेपन के कारण इन लेखों पर विश्वास करने से मुकर जाते हैं, यद्यपि उनकी सच्चाई सारे जगत के सम्मुख पहले से ही प्रमाणित हो चुकी है। और उस न्याय के समय या उससे सम्बन्धित निम्नलिखित घटनाएँ घटित होंगी, जैसा हमने सीखा है: तिशबी एलिय्याह आएगा; यहूदी विश्वास करेंगे; मसीह-विरोधी सताएगा; मसीह न्याय करेगा; मृतक उठेंगे; भले और दुष्ट अलग किए जाएँगे; जगत भस्म होगा और नया बनाया जाएगा। हम विश्वास करते हैं कि ये सब बातें घटित होंगी; परन्तु किस प्रकार, या किस क्रम में, यह मानवीय समझ हमें पूर्णतः नहीं सिखा सकती, वरन केवल उन घटनाओं का अनुभव ही सिखा सकता है। मेरी धारणा तो यह है, कि वे उस क्रम में घटित होंगी जिस क्रम में मैंने उन्हें वर्णित किया है।

    मुझे परमेश्वर की सहायता से जो प्रतिज्ञा की है उसे पूर्ण करने के लिए अभी दो पुस्तकें और लिखनी हैं। इनमें से एक दुष्टों के दण्ड का वर्णन करेगी, दूसरी धर्मियों की धन्यता का; और उनमें मैं विशेष रूप से यह प्रयास करूँगा कि, परमेश्वर के अनुग्रह से, उन तर्कों का खण्डन करूँ जिनके द्वारा कुछ अभागे प्राणी स्वयं को यह प्रतीत कराते हैं कि वे दिव्य प्रतिज्ञाओं और चेतावनियों को कमज़ोर कर रहे हैं, और उन बातों को व्यर्थ शब्द कहकर उपहास करते हैं जो विश्वास का सबसे हितकर पोषण हैं। परन्तु जो लोग दिव्य बातों में शिक्षित हैं, वे परमेश्वर की सच्चाई और सर्वशक्तिमानता को ही उन बातों के पक्ष में सबसे सशक्त तर्क मानते हैं, जो, मनुष्यों को कितनी भी अविश्वसनीय प्रतीत हों, तौभी पवित्रशास्त्र में निहित हैं, जिसकी सच्चाई अनेक प्रकार से पहले ही प्रमाणित हो चुकी है; क्योंकि वे निश्चित हैं कि परमेश्वर किसी भी रीति से झूठ नहीं बोल सकता, और वह वह कर सकता है जो अविश्वासियों के लिए असम्भव है।

    टिप्पणियाँ

    1. [673] Matt. viii. 29.
    2. [674] Rom. ix. 14.
    3. [675] Rom. xi. 33.
    4. [676] Ps. cxliv. 4.
    5. [677] Eccles. i. 2, 3.
    6. [678] Eccles. ii. 13, 14.
    7. [679] Eccles. viii. 14.
    8. [680] Eccles. xii. 13, 14.
    9. [681] Rom. iii. 20-22.
    10. [682] Matt. xiii. 52.
    11. [683] Matt. xi. 22.
    12. [684] Matt. xi. 24.
    13. [685] Matt. xii. 41, 42.
    14. [686] ऑगस्टीन पूरे अनुच्छेद को उद्धृत करते हैं, Matt. xiii. 37-43.
    15. [687] Matt. xix. 28.
    16. [688] Matt. xii. 27.
    17. [689] 1 Cor. xv. 10.
    18. [690] 1 Cor. vi. 3.
    19. [691] Ep. 199.
    20. [692] Matt. xxv. 34-41, पूर्ण रूप से उद्धृत।
    21. [693] John v. 22-24.
    22. [694] John v. 25, 26.
    23. [695] Matt. viii. 22.
    24. [696] Cor. v. 14, 15.
    25. [697] Ps. ci. 1.
    26. [698] John v. 28, 29.
    27. [699] Rev. xx. 1-6. पूरा अनुच्छेद उद्धृत है।
    28. [700] Pet. iii. 8.
    29. [701] Serm. 259.
    30. [702] Milliarii.
    31. [703] Mark iii. 27; "goods" के स्थान पर "Vasa"।
    32. [704] Matt. xix. 29.
    33. [705] 2 Cor. vi. 10.
    34. [706] Ps. cv. 8.
    35. [707] Col. i. 13.
    36. [708] 2 Tim. ii. 19.
    37. [709] Ps. cxxiii. 2.
    38. [710] Rev. xx. 9, 10.
    39. [711] 1 John ii. 19.
    40. [712] Matt. xxiv. 12.
    41. [713] उसके पहले और दूसरे आगमन के बीच।
    42. [714] Matt. xxv. 34.
    43. [715] Matt. xxviii. 20.
    44. [716] Matt. xiii. 39-41.
    45. [717] Matt. v. 19.
    46. [718] Matt. xxiii. 3.
    47. [719] Matt. v. 20.
    48. [720] Col. iii. 1, 2.
    49. [721] Phil. iii. 20.
    50. [722] Phil. ii. 21.
    51. [723] Matt. xviii. 18.
    52. [724] 1 Cor. v. 12.
    53. [725] Rev. xx. 4.
    54. [726] Rev. xiv. 13.
    55. [727] Rom. xiv. 9.
    56. [728] 2 Cor. vi. 14.
    57. [729] और, जैसा ऑगस्टीन कहते हैं, इसी कारण उन्हें cadavera कहा जाता है, cadere से, अर्थात "गिरना।"
    58. [730] Col. iii. 1.
    59. [731] Rom. vi. 4.
    60. [732] Eph. v. 14.
    61. [733] Ecclus. ii. 7.
    62. [734] Rom. xiv. 4.
    63. [735] 1 Cor. x. 12.
    64. [736] 1 Peter ii. 9.
    65. [737] Matt. xxv. 41.
    66. [738] Ps. lxix. 9.
    67. [739] Isa. xxvi. 11.
    68. [740] 2 Thess. ii. 8.
    69. [741] अध्याय 24।
    70. [742] 1 Cor. vii. 31, 32.
    71. [743] Col. iii. 3.
    72. [744] Matt. viii. 22.
    73. [745] Rom. viii. 10.
    74. [746] "Apud inferos," अर्थात नरक में, उस अर्थ में जिसमें यह शब्द भजनों और विश्वास-वचन में प्रयुक्त होता है।
    75. [747] Matt. xxv. 46.
    76. [748] Rev. xxi. 1.
    77. [749] Rev. xv. 2.
    78. [750] Rev. xxi. 2-5.
    79. [751] Isa. xlv. 8.
    80. [752] Ps. xlii. 3.
    81. [753] Ps. vi. 6.
    82. [754] Ps. xxxviii. 9.
    83. [755] Ps. xxxix. 2.
    84. [756] 2 Cor. v. 4.
    85. [757] Rom. viii. 23.
    86. [758] Rom. ix. 2.
    87. [759] ऑगस्टीन ने इसलिए νεικος पढ़ा, वुल्गेट के νίκη के स्थान पर नहीं।
    88. [760] 1 Cor. xv. 55.
    89. [761] 1 John i. 8.
    90. [762] 2 Pet. iii. 3-13. पूरा अनुच्छेद ऑगस्टीन के द्वारा उद्धृत है।
    91. [763] 2 Thess. ii. 1-11. पूरा अनुच्छेद लातीनी में दिया गया है। पद 3 में वुल्गेट के discessio के स्थान पर refuga का प्रयोग हुआ है।
    92. [764] ऑगस्टीन ये शब्द जोड़ते हैं, "Sicut dicimus, Sedet in amicum, id est, velut amicus; vel si quid aliud isto locutionis genere dici solet."
    93. [765] स्वेतोनियस, नीरो, अध्याय 57।
    94. [766] 1 John ii. 18, 19.
    95. [767] 1 Thess. iv. 13-16.
    96. [768] 1 Cor. xv. 22.
    97. [769] 1 Cor. xv. 36.
    98. [770] Gen. iii. 19.
    99. [771] 1 Cor. xv. 51.
    100. [772] Isa. xxvi. 19.
    101. [773] Isa. lxvi. 12-16.
    102. [774] Gal. iv. 26.
    103. [775] Matt. v. 8.
    104. [776] Isa. lxv. 17-19.
    105. [777] Phil. iii. 19.
    106. [778] Rom. viii. 6.
    107. [779] Gen. vi. 3.
    108. [780] Luke xii. 49.
    109. [781] Acts ii. 3.
    110. [782] Matt. x. 34.
    111. [783] Heb. iv. 12.
    112. [784] Song of Sol. ii. 5.
    113. [785] Isa. lxvi. 18.
    114. [786] Rom. iii. 23.
    115. [787] Isa. lxvi. 22-24.
    116. [788] जैसा वुल्गेट में है: cadavera virorum।
    117. [789] यहाँ ऑगस्टीन यह टिप्पणी जोड़ते हैं, "कौन नहीं देखता कि cadavera (शव) को cadendo (गिरने) से यह नाम मिला है?"
    118. [790] Matt. xxv. 30.
    119. [791] 1 Cor. xv. 28.
    120. [792] 1 John iii. 9.
    121. [793] Isa. lvi. 5.
    122. [794] Dan. vii. 15-28. अनुच्छेद विस्तार से उद्धृत है।
    123. [795] Dan. xii. 1-3.
    124. [796] John v. 28.
    125. [797] Gen. xvii. 5, और xxii. 18।
    126. [798] Dan. xii. 13.
    127. [799] Ps. cii. 25-27.
    128. [800] 1 Cor. vii. 31.
    129. [801] 1 John ii. 17.
    130. [802] Matt. xxiv. 35.
    131. [803] 2 Pet. iii. 6.
    132. [804] 2 Pet. iii. 10, 11.
    133. [805] Matt. xxiv. 29.
    134. [806] Æneid, ii. 694.
    135. [807] Ps. l. 3-5.
    136. [808] Isa. liii. 7.
    137. [809] Matt. xxvi. 63.
    138. [810] अध्याय 21।
    139. [811] 1 Thess. iv. 17.
    140. [812] Hos. vi. 6.
    141. [813] अध्याय 6।
    142. [814] Matt. xxv. 34.
    143. [815] उसके "Proem. ad Mal." में।
    144. [816] देखें Smith's Bible Dict.
    145. [817] Mal. iii. 1-6. पूरा अंश उद्धृत है।
    146. [818] Isa. iv. 4.
    147. [819] 1 John i. 8.
    148. [820] Job xiv. 4.
    149. [821] Rom. i. 17.
    150. [822] Isa. lxv. 22.
    151. [823] Prov. iii. 18.
    152. [824] Wisd. i. 9.
    153. [825] Rom. ii. 15, 16.
    154. [826] Mal. iii. 17-iv. 3.
    155. [827] Mal. iv. 4.
    156. [828] John v. 46.
    157. [829] Mal. iii. 14, 15.
    158. [830] Mal. ii. 17.
    159. [831] In innocentibus.
    160. [832] Ps. lxxiii.
    161. [833] Mal. iv. 5, 6.
    162. [834] 2 Kings ii. 11.
    163. [835] Mal. ii. 17, iii. 14.
    164. [836] Isa. xlviii. 12-16.
    165. [837] Isa. liii. 7.
    166. [838] Zech. ii. 8, 9.
    167. [839] Matt. xv. 24.
    168. [840] John vii. 39.
    169. [841] Ps. xviii. 43.
    170. [842] Matt. iv. 19.
    171. [843] Luke v. 10.
    172. [844] Matt. xii. 29.
    173. [845] Zech. xii. 9, 10.
    174. [846] वुल्गेट में इस प्रकार है।
    175. [847] John v. 22.
    176. [848] Isa. xlii. 1-4.
    177. [849] John i. 32.
    178. [850] Matt. xvii. 1, 2.
    179. [851] Ps. xli. 5.

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