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इस पुस्तक में परमेश्वर के नगर का इतिहास राजाओं और भविष्यद्वक्ताओं के उस काल में शमूएल से दाऊद तक, वरन मसीह तक, अंकित किया गया है; और राजाओं की पुस्तक, भजनों, और सुलैमान के भजनों में लिखी हुई भविष्यद्वाणियाँ मसीह और कलीसिया के विषय में व्याख्यायित की गई हैं।
1. भविष्यद्वक्ताओं के युग के विषय में
परमेश्वर की अनुकम्पा से हम अब्राहम से की गई उसकी उन प्रतिज्ञाओं के विषय में स्पष्ट रूप से विचार कर चुके हैं, कि शरीर के अनुसार इस्राएल की जाति और विश्वास के अनुसार सब जातियाँ उसका वंश होंगी, और परमेश्वर का नगर, समय के क्रम के अनुसार आगे बढ़ते हुए, यह दिखाएगा[343] कि वे कैसे पूरी हुईं। इसलिए पिछली पुस्तक में दाऊद के राज्यकाल तक आ जाने के बाद, अब हम उसी राज्यकाल से आरम्भ करते हुए, जो शेष रह गया है, उसके विषय में इस कार्य के उद्देश्य के लिए जितना पर्याप्त प्रतीत होगा, विचार करेंगे। अब, जिस समय से पवित्र शमूएल ने भविष्यद्वाणी करना आरम्भ किया, और उसके बाद निरन्तर उस समय तक जब इस्राएल की प्रजा बन्दी बनाकर बाबुल को ले जाई गई, और जब तक, पवित्र यिर्मयाह की भविष्यद्वाणी के अनुसार, सत्तर वर्ष बाद वहाँ से इस्राएल के लौट आने पर, परमेश्वर का भवन नये सिरे से बनाया गया, यह सारा काल भविष्यद्वक्ताओं का युग है। क्योंकि यद्यपि कुलपिता नूह स्वयं, जिसके दिनों में सारी पृथ्वी जलप्रलय से नष्ट हुई, और उससे पहले और बाद के अन्य लोग, इस समय तक जब परमेश्वर की प्रजा पर राजा होने लगे, उन बातों के कारण जो परमेश्वर के नगर और स्वर्ग के राज्य से सम्बन्धित हैं, जिनकी उन्होंने या तो भविष्यवाणी की या जिन्हें आने वाली किसी न किसी रीति से संकेतित किया, अनुचित रूप से भविष्यद्वक्ता नहीं कहलाए जा सकते, और विशेष रूप से क्योंकि हम पढ़ते हैं कि उनमें से कुछ, जैसे अब्राहम और मूसा, स्पष्ट रूप से इस नाम से पुकारे गए थे, तौभी भविष्यद्वक्ताओं के दिन सबसे अधिक और मुख्य रूप से उस समय से कहलाते हैं जब शमूएल ने भविष्यद्वाणी करना आरम्भ किया, जिसने परमेश्वर की आज्ञा से पहले शाऊल को राजा होने के लिए अभिषेक किया, और उसके अस्वीकृत हो जाने पर दाऊद को, जिसके वंश में से अन्य लोग उतने समय तक उसके बाद राज्य करते जितना उन्हें करना उचित होता। यदि, इसलिए, मैं उन सब बातों को दोहराना चाहता जो भविष्यद्वक्ताओं ने मसीह के विषय में भविष्यवाणी की है, जबकि परमेश्वर का नगर, अपने सदस्यों के निरन्तर क्रम में मरते और जन्म लेते हुए, उन कालों में अपनी यात्रा पूरी करता रहा, तो यह कार्य सब सीमाओं के परे बढ़ जाता। पहला कारण यह है कि पवित्रशास्त्र स्वयं, यहाँ तक कि जब वह राजाओं और उनके कार्यों और उनके राज्यकालों की घटनाओं का क्रमवार वर्णन करता प्रतीत होता है, जैसे कि ऐतिहासिक सतर्कता से घटित बातों का वर्णन करने में लगा हो, तो यह पाया जाएगा, यदि उसमें वर्णित बातों को परमेश्वर के आत्मा की सहायता से विचारा जाए, कि वह आने वाली बातों की भविष्यवाणी करने में उतना ही, या निश्चय ही उससे कम नहीं, तत्पर है जितना बीती हुई बातों का वर्णन करने में। और कौन इस पर थोड़ा भी विचार करके नहीं जानता कि यह कैसा श्रमसाध्य और विस्तृत कार्य होता, और इसकी पूरी छानबीन करके और तर्क द्वारा इसे प्रमाणित करने के लिए कितने ग्रन्थों की आवश्यकता होती? और फिर, इस कारण से कि जो निर्विवाद रूप से भविष्यद्वाणी से सम्बन्धित है, उसमें मसीह और स्वर्ग के राज्य, जो परमेश्वर का नगर है, के विषय में इतनी अधिक बातें हैं कि इन्हें समझाने के लिए इस कार्य के उचित अनुपात से कहीं अधिक विस्तृत विवेचन आवश्यक होता। इसलिए मैं, यदि सम्भव हो, अपने आपको इस प्रकार सीमित रखूँगा कि इस कार्य को आगे बढ़ाते हुए, परमेश्वर की सहायता से, न तो अनावश्यक बात कहूँ और न आवश्यक बात छोड़ूँ।
2. वह समय जिसमें परमेश्वर की कनान देश के विषय में की गई प्रतिज्ञा पूरी हुई, जिसे शारीरिक इस्राएल ने भी अपने अधिकार में प्राप्त किया
पिछली पुस्तक में हमने कहा था, कि अब्राहम से की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा में आरम्भ से दो बातों की प्रतिज्ञा की गई थी, एक तो यह, कि उसका वंश कनान देश का अधिकारी होगा, जिसका संकेत तब दिया गया जब कहा गया, "उस देश में जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा, और मैं तुझसे एक बड़ी जाति बनाऊँगा;"[344] परन्तु दूसरी, कहीं अधिक उत्तम, शारीरिक नहीं वरन आत्मिक वंश के विषय में थी, जिसके द्वारा वह इस्राएल की एक ही जाति का नहीं, वरन उन सब जातियों का पिता है जो उसके विश्वास के पगचिह्नों पर चलती हैं, और जिसकी प्रतिज्ञा इन शब्दों में की जाने लगी, "और तेरे कारण पृथ्वी के सब कुल आशीष पाएँगे।"[345] और उसके बाद हमने और भी अनेक प्रमाणों से दिखाया कि इन दोनों बातों की प्रतिज्ञा की गई थी। इसलिए अब्राहम का वंश, अर्थात शरीर के अनुसार इस्राएल की प्रजा, प्रतिज्ञा के देश में पहले से ही थी; और वहाँ, न केवल शत्रुओं के नगरों को अपने अधिकार और कब्जे में रखकर, वरन राजा भी होने के कारण, वह पहले से ही राज्य करने लगी थी, और उस प्रजा के विषय में परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ पहले से ही बड़े भाग में पूरी हो चुकी थीं: न केवल वे जो उन तीन पितरों, अब्राहम, इसहाक और याकूब से की गई थीं, और जो अन्य उनके समय में की गई थीं, वरन वे भी जो मूसा के द्वारा की गई थीं, जिसके द्वारा वही प्रजा मिस्र की दासता से स्वतन्त्र की गई, और जिसके द्वारा उसके समय की सब बीती हुई बातें प्रकट की गईं, जब वह प्रजा को जंगल में से ले गया। परन्तु न तो उस प्रसिद्ध अगुवे नून के पुत्र यहोशू के द्वारा, जो उस प्रजा को प्रतिज्ञा के देश में ले गया, और जातियों को निकालकर, परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार उसे बारह गोत्रों में बाँट दिया, और मर गया; न ही उसके बाद, न्यायियों के सारे समय में, कनान देश के विषय में परमेश्वर की वह प्रतिज्ञा पूरी हुई, कि वह मिस्र की किसी नदी से लेकर बड़ी नदी फरात तक फैलेगा; और न ही तब तक यह होने वाली बात के रूप में भविष्यवाणी की जाती रही, परन्तु इसकी पूर्ति की प्रतीक्षा की जाती रही। और यह दाऊद के द्वारा, और उसके पुत्र सुलैमान के द्वारा पूरी हुई, जिसका राज्य उस सारे प्रतिज्ञा किए गए क्षेत्र पर फैला हुआ था; क्योंकि उन्होंने उन सब जातियों को अपने अधीन कर लिया, और उन्हें कर देनेवाला बना दिया। और इस प्रकार, उन राजाओं के अधीन, अब्राहम का वंश शरीर के अनुसार प्रतिज्ञा के देश में, अर्थात कनान देश में, स्थापित हो गया, ऐसा कि परमेश्वर की उस पार्थिव प्रतिज्ञा की सम्पूर्ण पूर्ति के लिए और कुछ शेष न रह गया, सिवाय इसके कि, जहाँ तक सांसारिक समृद्धि का सम्बन्ध है, इब्री जाति अपने वंशजों के निरन्तर क्रम द्वारा उस देश में इस मरणशील युग के अन्त तक अटल स्थिति में बनी रहे, यदि वह अपने परमेश्वर यहोवा की व्यवस्थाओं का पालन करे। परन्तु क्योंकि परमेश्वर जानता था कि वह ऐसा नहीं करेगी, उसने अपने कुछ थोड़े विश्वासयोग्य लोगों को उसमें प्रशिक्षित करने के लिए, और उन सबको जो बाद में सब जातियों में होनेवाले थे, जिनमें दूसरी प्रतिज्ञा, जो नये नियम में प्रकट हुई है, मसीह के अवतार के द्वारा पूरी होनेवाली थी, आवश्यक चेतावनी देने के लिए, अपने सांसारिक दण्डों का भी उपयोग किया।
3. भविष्यद्वाणियों के त्रिविध अर्थ के विषय में, जो कभी पार्थिव, कभी स्वर्गीय यरूशलेम पर, और कभी दोनों पर लागू होती हैं
इस कारण जैसे अब्राहम, इसहाक, और याकूब को दिया गया वह ईश्वरीय वचन, और अन्य सब भविष्यसूचक चिह्न या वचन जो पूर्ववर्ती पवित्र लेखों में दिए गए हैं, वैसे ही राजाओं के इस समय से आनेवाली अन्य भविष्यद्वाणियाँ भी अंशतः अब्राहम के शरीर की जाति से सम्बन्धित हैं, और अंशतः उसके उस वंश से, जिसमें नये नियम के द्वारा सब जातियाँ मसीह की सहविरासतदार होकर अनन्त जीवन और स्वर्ग के राज्य के अधिकार में आशीषित हैं। इसलिए वे अंशतः उस दासी से सम्बन्धित हैं जो दासत्व के लिए सन्तान जनती है, अर्थात पार्थिव यरूशलेम, जो अपनी सन्तानों के साथ दासत्व में है; परन्तु अंशतः परमेश्वर के स्वतन्त्र नगर से, अर्थात स्वर्गों में अनन्त सत्य यरूशलेम से, जिसकी सन्तान वे सब हैं जो पृथ्वी पर परमेश्वर के अनुसार जीवन बिताते हैं: परन्तु उनमें कुछ बातें ऐसी हैं जो दोनों से सम्बन्धित समझी जाती हैं,—वास्तविक रूप से दासी से, और लाक्षणिक रूप से स्वतन्त्र स्त्री से।[346]
इसलिए तीन प्रकार के भविष्यसूचक वचन पाए जाते हैं; क्योंकि कुछ पार्थिव यरूशलेम से सम्बन्धित हैं, कुछ स्वर्गीय से, और कुछ दोनों से। मैं यह उचित समझता हूँ कि जो मैं कहता हूँ उसे उदाहरणों से प्रमाणित करूँ। भविष्यद्वक्ता नातान को राजा दाऊद को उसके घोर पाप का दोषी ठहराने, और उसके परिणामस्वरूप आनेवाली भविष्य की विपत्तियों की भविष्यवाणी करने के लिए भेजा गया था। कौन इस पर सन्देह कर सकता है कि यह और इस प्रकार की बातें पार्थिव नगर से सम्बन्धित हैं, चाहे सार्वजनिक रूप से, अर्थात प्रजा की सुरक्षा या सहायता के लिए, या निजी रूप से, जब प्रत्येक व्यक्ति के निजी हित के लिए ईश्वरीय वचन दिए जाते हैं जिनसे सांसारिक जीवन के उपयोग के लिए भविष्य की कोई बात जानी जा सके? परन्तु जहाँ हम पढ़ते हैं, "देख, वे दिन आते हैं, यहोवा की यह वाणी है, कि मैं इस्राएल के घराने और यहूदा के घराने के लिए एक नई वाचा बान्धूँगा: उस वाचा के अनुसार नहीं जो मैंने उनके पूर्वजों के साथ उस दिन बान्धी थी जब मैंने उन्हें मिस्र देश से निकालने के लिए उनका हाथ पकड़ा; क्योंकि वे मेरी वाचा में स्थिर न रहे, और मैंने उनकी ओर ध्यान न दिया, यहोवा की यह वाणी है। क्योंकि यह वह वाचा है जो मैं इस्राएल के घराने के लिए बान्धूँगा: उन दिनों के बाद, यहोवा की यह वाणी है, मैं अपनी व्यवस्थाओं को उनके मन में डालूँगा, और उन्हें उनके हृदयों पर लिखूँगा, और मैं उनका ध्यान रखूँगा; और मैं उनका परमेश्वर हूँगा, और वे मेरी प्रजा होंगे;"[347]—निःसन्देह यह ऊपर की यरूशलेम के विषय में भविष्यवाणी की गई है, जिसका प्रतिफल परमेश्वर स्वयं है, और जिसका मुख्य और सम्पूर्ण भला उसे प्राप्त करना और उसका होना है। परन्तु यह दोनों से सम्बन्धित है, कि परमेश्वर का नगर यरूशलेम कहलाता है, और यह भविष्यवाणी की गई है कि परमेश्वर का भवन उसमें होगा; और यह भविष्यवाणी तब पूरी होती प्रतीत होती है जब राजा सुलैमान वह अति उत्तम मन्दिर बनाता है। क्योंकि ये बातें दोनों ही पार्थिव यरूशलेम में हुईं, जैसा इतिहास दिखाता है, और स्वर्गीय यरूशलेम के प्रतिरूप थीं। और इस प्रकार की भविष्यवाणी, जो प्राचीन प्रमाणिक पुस्तकों में, जिनमें ऐतिहासिक वर्णन हैं, अन्य दोनों प्रकारों से मानो संयुक्त और मिश्रित है, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, और उन लोगों की बुद्धि को बहुत उलझा चुकी है और उलझाती है जो पवित्रशास्त्र की खोज करते हैं। उदाहरण के लिए, जो हम ऐतिहासिक रूप से अब्राहम के शरीर के अनुसार वंश में भविष्यवाणी की गई और पूरी हुई बात पढ़ते हैं, उसके लाक्षणिक अर्थ की भी हमें खोज करनी चाहिए, क्योंकि वह अब्राहम के विश्वास के अनुसार वंश में पूरी होनी है। और यह इतना अधिक सत्य है, कि कुछ लोगों ने यह विचार किया है कि इन पुस्तकों में न तो कोई भविष्यवाणी की गई और पूरी हुई बात है, न कोई पूरी हुई बात है यद्यपि भविष्यवाणी नहीं की गई, जो कोई अन्य बात संकेतित न करती हो जिसे लाक्षणिक अर्थ द्वारा ऊँचे परमेश्वर के नगर और उसकी उन सन्तानों से, जो इस जीवन में परदेशी हैं, सम्बन्धित समझा जाना चाहिए। परन्तु यदि ऐसा हो, तो भविष्यद्वक्ताओं के वचन, या बल्कि वे सब पवित्रशास्त्र जो पुराने नियम के नाम से गिने जाते हैं, तीन नहीं वरन दो भिन्न प्रकार के होंगे। क्योंकि वहाँ कुछ भी ऐसा नहीं होगा जो केवल पार्थिव यरूशलेम से सम्बन्धित हो, यदि जो कुछ वहाँ उसके विषय में कहा और पूरा किया गया है, वह कोई ऐसी बात भी संकेतित करता है जो लाक्षणिक पूर्वरूपण द्वारा स्वर्गीय यरूशलेम से भी सम्बन्धित है; परन्तु केवल दो प्रकार होंगे, एक जो स्वतन्त्र यरूशलेम से सम्बन्धित है, दूसरा जो दोनों से। परन्तु जैसे, मेरे विचार में, वे बहुत भूल करते हैं जो यह मानते हैं कि उस प्रकार के लेखों में घटनाओं के अभिलेखों का इससे अधिक कोई अर्थ नहीं है कि वे इसी प्रकार घटित हुईं, वैसे ही मैं उन्हें बहुत ही ढीठ मानता हूँ जो यह तर्क करते हैं कि उनकी सामग्री का सम्पूर्ण सार लाक्षणिक अर्थों में ही है। इसलिए मैंने कहा है कि वे त्रिविध हैं, न कि द्विविध। तौभी, यह मत रखते हुए, मैं उनकी निन्दा नहीं करता जो वहाँ की हर बात से आत्मिक अर्थ निकाल सकते हैं, बशर्ते कि वे सबसे पहले ऐतिहासिक सत्य को सुरक्षित रखें। शेष के लिए, कौन विश्वासी इस पर सन्देह कर सकता है कि वे बातें व्यर्थ ही कही गई हैं जो ऐसी हैं कि, चाहे उन्हें घटित हुआ कहा जाए या भविष्य में होनेवाला, वे न तो मानवीय और न ईश्वरीय बातों के अनुकूल हैं? कौन, यदि सक्षम हो, इन्हें आत्मिक समझ की ओर न लौटाएगा, या यह न मानेगा कि जो सक्षम है उसे इन्हें लौटाना चाहिए?
4. इस्राएली राज्य और याजकपद के पूर्वाभासित परिवर्तन के विषय में, और शमूएल की माता हन्ना ने कलीसिया का प्रतिरूपण करते हुए जो भविष्यवाणी की उसके विषय में
इस कारण परमेश्वर के नगर की प्रगति ने, जहाँ वह राजाओं के समय तक पहुँची, एक प्रतिरूप प्रस्तुत किया, जब, शाऊल के अस्वीकृत हो जाने पर, दाऊद ने पहली बार राज्य इस आधार पर प्राप्त किया कि उसके बाद उसके वंशज निरन्तर क्रम में पार्थिव यरूशलेम में राज्य करते रहेंगे; क्योंकि घटनाओं के क्रम ने आनेवाली बातों के परिवर्तन के विषय में, जो मौन में नहीं छोड़ा जाना चाहिए, संकेत किया और पूर्वबताया, जो दोनों नियमों, पुराने और नये, से सम्बन्धित है,—जहाँ याजकपद और राज्य दोनों उस एक व्यक्ति द्वारा परिवर्तित किए जाते हैं जो याजक है, और साथ ही राजा भी है, नया और सदा-सर्वदा का, अर्थात मसीह यीशु। क्योंकि परमेश्वर की सेवा में एली के याजक होने से अस्वीकृत होने पर शमूएल का स्थानापन्न होना, जिसने एक साथ याजक और न्यायी का पद निभाया, और शाऊल के अस्वीकृत होने पर दाऊद का राज्य में स्थापित होना, दोनों ने इसी बात का प्रतिरूप प्रस्तुत किया जिसकी मैं बात कर रहा हूँ। और शमूएल की माता हन्ना स्वयं, जो पहले बाँझ थी, और बाद में सन्तान से आनन्दित हुई, कुछ और भविष्यवाणी करती प्रतीत नहीं होती, जब वह उस बालक को, जिसे उसने जन्मा और उसी भक्ति के साथ छुड़ाकर परमेश्वर को समर्पित किया जिस भक्ति के साथ उसने उसकी मन्नत मानी थी, परमेश्वर को सौंपते हुए उल्लासपूर्वक यहोवा के प्रति अपना धन्यवाद उमड़ाती है। क्योंकि वह कहती है, "मेरा हृदय यहोवा में सामर्थी हुआ है, और मेरा सींग मेरे परमेश्वर में ऊँचा हुआ है; मेरा मुख मेरे शत्रुओं के विरुद्ध चौड़ा हुआ है; मैं तेरे उद्धार में आनन्दित हुई हूँ। क्योंकि यहोवा के समान कोई पवित्र नहीं; और हमारे परमेश्वर के समान कोई धर्मी नहीं: तेरे सिवा कोई पवित्र नहीं। बड़े घमण्ड से न बोलो, और न ऊँची बातें कहो, और न तुम्हारे मुख से डींग की बातें निकलें: क्योंकि यहोवा ज्ञान का परमेश्वर है, और वह अपनी अद्भुत योजनाएँ बनानेवाला परमेश्वर है। उसने बलवानों का धनुष तोड़ दिया है, और निर्बलों को शक्ति से कमरबस्त किया है। जो रोटी से तृप्त थे वे घटा दिए गए; और भूखे पृथ्वी से आगे निकल गए: क्योंकि बाँझ ने सात जन्मे हैं; और जिसके बहुत सन्तान थे वह दुर्बल हो गई है। यहोवा मारता है और जिलाता है: वह अधोलोक में उतारता है, और फिर ऊपर उठा लाता है। यहोवा दरिद्र बनाता है और धनी बनाता है: वह नीचा करता है और ऊँचा उठाता है। वह दीन को धूल में से उठाता है, और भिखारी को घूरे में से ऊँचा उठाता है, कि वह उसे [अपनी] प्रजा के बलवानों में बैठाए, और उन्हें महिमा के सिंहासन का वारिस बनाए; वह मन्नत माननेवाले को मन्नत देता है, और उसने धर्मियों के वर्षों को आशीष दी है: क्योंकि मनुष्य अपनी शक्ति में बलवान नहीं है। यहोवा अपने विरोधी को निर्बल करेगा: यहोवा पवित्र है। बुद्धिमान अपनी बुद्धि पर घमण्ड न करे; और बलवान अपने बल पर घमण्ड न करे; और धनी अपने धन पर घमण्ड न करे: परन्तु जो घमण्ड करे वह इस बात पर घमण्ड करे, कि वह यहोवा को समझे और जाने, और पृथ्वी के बीच में न्याय और धर्म करे। यहोवा स्वर्गों पर चढ़ गया है, और गर्जा है: वह पृथ्वी की छोर तक न्याय करेगा, क्योंकि वह धर्मी है: और वह हमारे राजाओं को शक्ति देता है, और अपने मसीह का सींग ऊँचा करेगा।"[348]
क्या आप कहते हैं कि ये किसी एक निर्बल स्त्री के शब्द हैं जो एक पुत्र के जन्म के लिए धन्यवाद दे रही है? क्या मनुष्यों का मन सत्य के प्रकाश से इतना विमुख हो सकता है कि यह न समझ सके कि यह स्त्री जो कह रही है वह उसकी अपनी सीमा से कहीं बढ़कर है? इसके अतिरिक्त, जो कोई इन बातों में उचित रूप से रुचि रखता है जो इस पार्थिव यात्रा में भी पहले से ही पूरी होने लगी हैं, क्या वह अपना मन नहीं लगाता, और नहीं समझता, और नहीं स्वीकार करता, कि इस स्त्री के द्वारा—जिसका नाम ही, अर्थात हन्ना, जिसका अर्थ है "उसका अनुग्रह"—स्वयं मसीही धर्म ने, स्वयं परमेश्वर के नगर ने, जिसका राजा और संस्थापक मसीह है, अन्ततः स्वयं परमेश्वर के अनुग्रह ने, इस प्रकार भविष्यसूचक आत्मा के द्वारा कहा है, जिससे अभिमानी काटे जाते हैं ताकि वे गिर जाएँ, और दीन भरे जाते हैं ताकि वे उठें, जिसे वह भजन मुख्य रूप से उत्सवित करता है? जब तक कोई यह न कहे कि इस स्त्री ने कुछ भविष्यवाणी नहीं की, वरन केवल उस पुत्र के लिए, जिसे उसने प्रार्थना के उत्तर में प्राप्त किया था, उल्लासपूर्ण प्रशंसा के साथ परमेश्वर की स्तुति की। तब जब वह कहती है, "उसने बलवानों का धनुष तोड़ दिया है, और निर्बलों को शक्ति से कमरबस्त किया है; जो रोटी से तृप्त थे वे घटा दिए गए, और भूखे पृथ्वी से आगे निकल गए; क्योंकि बाँझ ने सात जन्मे हैं, और जिसके बहुत सन्तान थे वह दुर्बल हो गई है," तो उसका अर्थ क्या है? क्या उसने स्वयं सात जन्मे थे, यद्यपि वह बाँझ रही थी? जब उसने यह कहा तब उसका केवल एक ही पुत्र था; न ही उसके बाद उसने सात जन्मे, न छह, जिनमें शमूएल स्वयं सातवाँ होता, वरन तीन पुत्र और दो पुत्रियाँ। और फिर, जब उस समय तक उस प्रजा पर कोई राजा नहीं था, तो यदि उसने भविष्यवाणी नहीं की, तो वह अन्त में जो कहती है वह कहाँ से कहती है, "वह हमारे राजाओं को शक्ति देता है, और अपने मसीह का सींग ऊँचा करेगा?"
इसलिए मसीह की कलीसिया, महान राजा का नगर,[349] जो अनुग्रह से भरपूर है, सन्तानों से समृद्ध है, वह कहे जो इस भक्त माता के मुख से इतने पहले उसके विषय में कही गई भविष्यवाणी स्वीकार करती है, "मेरा हृदय यहोवा में सामर्थी हुआ है, और मेरा सींग मेरे परमेश्वर में ऊँचा हुआ है।" उसका हृदय सचमुच सामर्थी हुआ है, और उसका सींग सचमुच ऊँचा हुआ है, क्योंकि अपने में नहीं, वरन अपने प्रभु परमेश्वर में। "मेरा मुख मेरे शत्रुओं के विरुद्ध चौड़ा हुआ है;" क्योंकि कठिन संकटों में भी परमेश्वर का वचन बन्धा हुआ नहीं है, यहाँ तक कि उन प्रचारकों में भी नहीं जो स्वयं बन्धन में हैं।[350] "मैं तेरे उद्धार में आनन्दित हुई हूँ," वह कहती है। यह मसीह यीशु स्वयं है, जिसे बूढ़े शिमोन ने, जैसा हम सुसमाचार में पढ़ते हैं, एक छोटे शिशु के रूप में गोद में लेते हुए, तौभी महान के रूप में पहचानते हुए, कहा, "हे प्रभु, अब तू अपने दास को शान्ति से जाने दे, क्योंकि मेरी आँखों ने तेरा उद्धार देख लिया है।"[351] इसलिए कलीसिया कहे, "मैं तेरे उद्धार में आनन्दित हुई हूँ। क्योंकि यहोवा के समान कोई पवित्र नहीं, और हमारे परमेश्वर के समान कोई धर्मी नहीं;" अर्थात पवित्र और पवित्र करनेवाला, धर्मी और धर्मी ठहरानेवाला।[352] "तेरे सिवा कोई पवित्र नहीं;" क्योंकि तेरे ही कारण कोई पवित्र बनता है। और फिर यह आता है, "बड़े घमण्ड से न बोलो, और न ऊँची बातें कहो, और न तुम्हारे मुख से डींग की बातें निकलें। क्योंकि यहोवा ज्ञान का परमेश्वर है।" वह तुम्हें तब भी जानता है जब कोई नहीं जानता; क्योंकि "जो अपने आपको कुछ समझता है जबकि वह कुछ नहीं है, वह अपने आपको धोखा देता है।"[353] ये बातें परमेश्वर के नगर के उन विरोधियों से कही जाती हैं जो बाबुल के हैं, जो अपनी ही शक्ति पर भरोसा करते हैं, और अपने आप में घमण्ड करते हैं, प्रभु में नहीं; जिनमें से शारीरिक इस्राएली भी हैं, पार्थिव यरूशलेम के पृथ्वी से उत्पन्न निवासी, जो, जैसा प्रेरित कहता है, "परमेश्वर के धर्म से अनजान होकर,"[354] अर्थात वह धर्म जो परमेश्वर, जो एकमात्र धर्मी और धर्मी ठहरानेवाला है, मनुष्य को देता है, "और अपने ही धर्म को स्थापित करना चाहते हैं," अर्थात वह जो मानो उन्होंने स्वयं ही प्राप्त किया है, उसके द्वारा नहीं दिया गया, "परमेश्वर के धर्म के अधीन नहीं होते," ठीक इसलिए कि वे अभिमानी हैं, और सोचते हैं कि वे अपने स्वयं के साथ परमेश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं, न कि उसके साथ जो परमेश्वर की ओर से है, जो ज्ञान का परमेश्वर है, और इसलिए विवेकों की भी देखरेख करता है, वहाँ मनुष्यों के विचारों को देखते हुए कि वे व्यर्थ हैं,[355] यदि वे मनुष्यों की ओर से हैं, और उसकी ओर से नहीं। "और तैयार करनेवाला," वह कहती है, "उसकी अद्भुत योजनाएँ।" हम इन अद्भुत योजनाओं को क्या समझें, सिवाय इसके कि अभिमानियों का गिरना और दीनों का उठना अवश्य है? इन अद्भुत योजनाओं का वर्णन वह करती है, यह कहते हुए, "बलवानों का धनुष तोड़ दिया गया है, और निर्बलों को शक्ति से कमरबस्त किया गया है।" धनुष तोड़ दिया गया है, अर्थात उनका इरादा जो अपने आपको इतना सामर्थी समझते हैं कि परमेश्वर के दान और सहायता के बिना ही, मानवीय सामर्थ्य से ईश्वरीय आज्ञाओं को पूरा कर सकते हैं; और वे शक्ति से कमरबस्त हैं जिनकी भीतरी दुहाई यह है, "हे प्रभु, मुझ पर दया कर, क्योंकि मैं निर्बल हूँ।"[356]
"जो रोटी से तृप्त थे," वह कहती है, "वे घटा दिए गए, और भूखे पृथ्वी से आगे निकल गए।" रोटी से तृप्त किसे समझा जाए सिवाय उन्हीं के जो मानो बलवान थे, अर्थात इस्राएली, जिन्हें परमेश्वर के वचन सौंपे गए थे?[357] परन्तु उस प्रजा में दासी की सन्तान घटा दी गई,—इस शब्द minus से, यद्यपि वह लातीनी है, यह विचार भली प्रकार व्यक्त होता है कि जो अधिक थे वे कम कर दिए गए,—क्योंकि, स्वयं उस रोटी में भी, अर्थात ईश्वरीय वचनों में, जिन्हें इस्राएलियों ने सब जातियों में से एकमात्र प्राप्त किया, वे पार्थिव बातों का स्वाद लेते हैं। परन्तु वे जातियाँ जिन्हें वह व्यवस्था नहीं दी गई थी, नये नियम के द्वारा इन वचनों तक पहुँचकर, अत्यन्त प्यासे होकर पृथ्वी से आगे निकल गई हैं, क्योंकि उनमें उन्होंने पार्थिव नहीं, वरन स्वर्गीय बातों का स्वाद लिया है। और यह क्यों हुआ इसका कारण मानो खोजा जाता है; "क्योंकि बाँझ ने," वह कहती है, "सात जन्मे हैं, और जिसके बहुत सन्तान थे वह दुर्बल हो गई है।" यहाँ जो कुछ भविष्यवाणी की गई थी वह उन लोगों पर प्रकट हो गया है जो सात की संख्या को समझते हैं, जो सारी कलीसिया की सिद्धता को दर्शाती है। इस कारण प्रेरित यूहन्ना भी सात कलीसियाओं को लिखता है,[358] इस प्रकार यह दिखाते हुए कि वह एक ही कलीसिया की सम्पूर्णता को लिखता है; और सुलैमान की नीतिवचन की पुस्तक में पहले से ही यह कहा गया है, इसका पूर्वाभास देते हुए, "बुद्धि ने अपना घर बनाया है, उसने अपने सात खम्भे मजबूत किए हैं।"[359] क्योंकि परमेश्वर का नगर सब जातियों में बाँझ था, इससे पहले कि वह बालक उठे जिसे हम देखते हैं।[360] हम यह भी देखते हैं कि सांसारिक यरूशलेम, जिसकी बहुत सन्तान थी, अब दुर्बल हो गई है। क्योंकि, उसमें जो भी स्वतन्त्र स्त्री की सन्तान थे, वे उसकी शक्ति थे; परन्तु अब, क्योंकि वहाँ अक्षर है, आत्मा नहीं, अपनी शक्ति खोकर, वह दुर्बल हो गई है।
"यहोवा मारता है और जिलाता है:" उसने उसे मार दिया जिसकी बहुत सन्तान थी, और इस बाँझ को जीवित किया, ताकि उसने सात जन्मे। यद्यपि यह अधिक उचित रूप से समझा जा सकता है कि उसने उन्हीं को जीवित किया जिन्हें उसने मारा। क्योंकि वह, मानो, यह दोहराते हुए कहती है, "वह अधोलोक में उतारता है, और ऊपर उठा लाता है।" जिनसे सचमुच प्रेरित कहता है, "यदि तुम मसीह के साथ मर गए हो, तो उन बातों की खोज करो जो ऊपर हैं, जहाँ मसीह परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है।"[361] इसलिए वे प्रभु के द्वारा एक कल्याणकारी रीति से मारे जाते हैं, ताकि वह आगे कहता है, "ऊपर की बातों का स्वाद लो, पृथ्वी की बातों का नहीं;" ताकि ये वे ही हैं जो, भूखे होकर, पृथ्वी से आगे निकल गए हैं। "क्योंकि तुम मर गए हो," वह कहता है: देखो परमेश्वर किस प्रकार उद्धारक रीति से मारता है! फिर यह आता है, "और तुम्हारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा है:" देखो परमेश्वर किस प्रकार उसी को जिलाता है! परन्तु क्या वह उन्हें अधोलोक में उतारता और फिर ऊपर उठा लाता है? विश्वासियों में इस विषय में कोई विवाद नहीं है कि हम इस कार्य के दोनों भागों को सबसे भली प्रकार उसमें पूरा होते देखते हैं, अर्थात हमारे शिरोमणि में, जिसके साथ प्रेरित ने कहा है कि हमारा जीवन परमेश्वर में छिपा है। "क्योंकि जब उसने अपने ही पुत्र को न बचाया, वरन उसे हम सबके लिए सौंप दिया,"[362] इस रीति से, निश्चय ही, उसने उसे मार दिया। और क्योंकि उसने उसे मरे हुओं में से फिर उठाया, उसने उसे फिर जिलाया। और क्योंकि उसकी वाणी इस भविष्यवाणी में पहचानी जाती है, "तू मेरे प्राण को अधोलोक में न छोड़ेगा,"[363] उसने उसे अधोलोक में उतारा और फिर ऊपर उठा लाया। उसकी इस दरिद्रता के द्वारा हम धनी बनाए गए हैं;[364] क्योंकि "यहोवा दरिद्र बनाता है और धनी बनाता है।" परन्तु यह जानने के लिए कि इसका अर्थ क्या है, सुनें जो आगे आता है: "वह नीचा करता है और ऊँचा उठाता है;" और सचमुच वह अभिमानियों को दीन करता है और दीनों को ऊँचा उठाता है। जिसे हम अन्यत्र भी पढ़ते हैं, "परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है, परन्तु दीनों को अनुग्रह देता है।"[365] यही इस स्त्री के, जिसका नाम "उसका अनुग्रह" समझा जाता है, सम्पूर्ण गीत का मुख्य भाव है।
आगे, जो यह जोड़ा गया है, "वह दीन को पृथ्वी से उठाता है," मैं इसे किसी और से नहीं, वरन उसी से समझता हूँ जिसके विषय में थोड़ा पहले कहा गया था, "वह हमारे लिए दीन बनाया गया, जब वह धनी था, ताकि उसकी दीनता से हम धनी बनाए जाएँ।" क्योंकि उसने उसे पृथ्वी से इतनी शीघ्रता से उठाया कि उसके शरीर ने विनाश नहीं देखा। और मैं उससे यह भी अलग नहीं करूँगा जो जोड़ा गया है, "और भिखारी को घूरे में से ऊँचा उठाता है।" क्योंकि सचमुच जो दीन पुरुष है वह भिखारी भी है।[366] परन्तु उस घूरे से, जिससे वह उठाया जाता है, हमें सबसे अधिक कारण से सतानेवाले यहूदियों को समझना चाहिए, जिनके विषय में प्रेरित कहता है, जब वह बताता है कि जब वह उनमें से था तब उसने कलीसिया को सताया था, "जो बातें मेरे लिए लाभ थीं, उन्हें मैंने मसीह के लिए हानि समझा; और मैंने उन्हें न केवल हानि, वरन कूड़ा भी समझा है, कि मैं मसीह को प्राप्त करूँ।"[367] इसलिए वह दीन व्यक्ति सब धनियों से ऊपर पृथ्वी से उठाया जाता है, और वह भिखारी उस घूरे से सब धनवानों से ऊपर उठाया जाता है, "कि वह प्रजा के बलवानों के बीच बैठे," जिनसे वह कहता है, "तुम बारह सिंहासनों पर बैठोगे,"[368] "और उन्हें महिमा के सिंहासन का वारिस बनाए।" क्योंकि इन बलवानों ने कहा था, "देख, हम सब कुछ त्यागकर तेरे पीछे हो लिए हैं।" उन्होंने यह मन्नत सबसे अधिक सामर्थ्य से मानी थी।
परन्तु वे यह कहाँ से प्राप्त करते हैं, सिवाय उससे जिसके विषय में यहाँ तत्काल यह कहा गया है, "मन्नत माननेवाले को मन्नत देता है?" अन्यथा वे उन बलवानों में से होते जिनका धनुष निर्बल किया गया है। "देता है," वह कहती है, "मन्नत माननेवाले को मन्नत।" क्योंकि कोई भी परमेश्वर को ग्रहणयोग्य कोई मन्नत तब तक नहीं मान सकता, जब तक वह उससे वह न प्राप्त करे जिसकी वह मन्नत माने। इसके बाद यह आता है, "और उसने धर्मियों के वर्षों को आशीष दी है," अर्थात कि वह उसके साथ सदा जीवित रहे जिससे कहा गया है, "और तेरे वर्षों का अन्त नहीं होगा।" क्योंकि वहाँ वर्ष स्थिर रहते हैं; परन्तु यहाँ वे बीत जाते हैं, हाँ, वे नष्ट हो जाते हैं: क्योंकि आने से पहले वे नहीं होते, और आ जाने के बाद वे नहीं रहेंगे, क्योंकि वे अपने साथ अपना अन्त लाते हैं। अब इन दोनों में से, अर्थात "मन्नत माननेवाले को मन्नत देता है," और "उसने धर्मियों के वर्षों को आशीष दी है," एक वह है जो हम करते हैं, दूसरा वह है जो हम प्राप्त करते हैं। परन्तु यह दूसरा उदार दाता परमेश्वर से तब तक प्राप्त नहीं होता, जब तक वह, सहायक स्वयं, हमें पहले के लिए सक्षम नहीं करता; "क्योंकि मनुष्य अपनी शक्ति में बलवान नहीं है।" "यहोवा अपने विरोधी को निर्बल करेगा," अर्थात उसे जो मन्नत माननेवाले से ईर्ष्या करता है, और उसका विरोध करता है, कि वह जो मन्नत मान चुका है उसे पूरा न कर सके। यूनानी की अस्पष्टता के कारण, इसे "अपने ही विरोधी" के रूप में भी समझा जा सकता है। क्योंकि जब परमेश्वर ने हमें अपना बनाना आरम्भ कर दिया है, तब तत्काल वह जो हमारा विरोधी था उसका बन जाता है, और हमारे द्वारा जीत लिया जाता है; परन्तु अपनी ही शक्ति से नहीं, "क्योंकि मनुष्य अपनी शक्ति में बलवान नहीं है।" इसलिए "यहोवा अपने ही विरोधी को निर्बल करेगा, यहोवा पवित्र है," कि वह उन सन्तों द्वारा जीत लिया जाए, जिन्हें प्रभु, पवित्रों का पवित्र, सन्त बना चुका है। इसी कारण, "बुद्धिमान अपनी बुद्धि पर घमण्ड न करे, और बलवान अपने बल पर घमण्ड न करे, और धनी अपने धन पर घमण्ड न करे; परन्तु जो घमण्ड करे वह इस बात पर घमण्ड करे,—कि वह यहोवा को समझे और जाने, और पृथ्वी के बीच में न्याय और धर्म करे।" वह कम मात्रा में नहीं यहोवा को समझता और जानता है जो यह समझता और जानता है कि यह भी, कि वह यहोवा को समझ और जान सकता है, उसे यहोवा से मिला है। "क्योंकि तेरे पास ऐसा क्या है," प्रेरित कहता है, "जो तूने प्राप्त नहीं किया? परन्तु यदि तूने इसे प्राप्त किया, तो तू ऐसा घमण्ड क्यों करता है जैसे तूने इसे प्राप्त न किया हो?"[369] अर्थात जैसे तेरे पास स्वयं अपना कुछ हो जिस पर तू घमण्ड कर सके। अब, वह न्याय और धर्म करता है जो सीधा जीवन बिताता है। परन्तु वह सीधा जीवन बिताता है जो परमेश्वर की आज्ञा मानते समय उसकी अधीनता स्वीकार करता है। "आज्ञा का उद्देश्य," अर्थात जिस पर आज्ञा का सम्बन्ध है, "शुद्ध हृदय, और भले विवेक, और निष्कपट विश्वास से उत्पन्न प्रेम है।" इसके अतिरिक्त, यह "प्रेम," जैसा प्रेरित यूहन्ना गवाही देता है, "परमेश्वर की ओर से है।"[370] इसलिए धर्म और न्याय करना परमेश्वर की ओर से है। परन्तु "पृथ्वी के बीच में" का क्या अर्थ है? क्या पृथ्वी की छोर पर रहनेवालों को न्याय और धर्म नहीं करना चाहिए? कौन ऐसा कहेगा? तो फिर, "पृथ्वी के बीच में" क्यों जोड़ा गया है? क्योंकि यदि यह न जोड़ा गया होता, और केवल यह कहा गया होता, "न्याय और धर्म करना," तो यह आज्ञा दोनों प्रकार के मनुष्यों से—अर्थात भूमि के भीतर रहनेवालों और समुद्र-तट पर रहनेवालों दोनों से—सम्बन्धित होती। परन्तु ऐसा न हो कि कोई यह समझे कि इस शरीर में बिताए गए जीवन के अन्त के बाद, न्याय और धर्म करने के लिए कोई और समय शेष रहता है जो उसने शरीर में रहते हुए नहीं किया, और इस प्रकार ईश्वरीय न्याय से बचा जा सकता है, "पृथ्वी के बीच में" मुझे उस समय के विषय में कहा गया प्रतीत होता है जब हर व्यक्ति शरीर में जीवित रहता है; क्योंकि इस जीवन में हर व्यक्ति अपनी ही पृथ्वी को अपने साथ लिए फिरता है, जिसे, मनुष्य के मरने पर, सामान्य पृथ्वी वापस ले लेती है, कि उसके पुनरुत्थान पर वह निश्चय ही उसे लौटा दी जाए। इसलिए "पृथ्वी के बीच में," अर्थात जब हमारी आत्मा इस पार्थिव शरीर में बन्द रहती है, न्याय और धर्म किया जाना है, जो आगे के लिए हमारे लाभ का होगा, जब "हर व्यक्ति उसके अनुसार, जो उसने शरीर में करा है, चाहे भला हो चाहे बुरा, प्रतिफल पाएगा।"[371] क्योंकि जब प्रेरित वहाँ "शरीर में" कहता है, तो उसका अर्थ उस समय से है जिसमें उसने शरीर में जीवन बिताया। तौभी यदि कोई द्वेषपूर्ण मन और अधर्मी विचार से निन्दा करे, बिना उसके शरीर के किसी अंग का उपयोग किए, तो वह इस कारण निर्दोष नहीं ठहरेगा कि उसने इसे शारीरिक क्रिया से नहीं किया, क्योंकि उसने इसे उस समय में किया होगा जो उसने शरीर में बिताया। इसी प्रकार हम उसे भी उचित रूप से समझ सकते हैं जो हम भजन में पढ़ते हैं, "परन्तु परमेश्वर, जो युगों से पहले हमारा राजा है, ने पृथ्वी के बीच में उद्धार का कार्य किया है;"[372] ताकि प्रभु यीशु को हमारा वह परमेश्वर समझा जाए जो युगों से पहले है, क्योंकि उसके द्वारा युग बनाए गए, पृथ्वी के बीच में हमारा उद्धार का कार्य करते हुए, क्योंकि वचन देहधारी हुआ और पार्थिव शरीर में रहा।
फिर, हन्ना ने इन शब्दों में भविष्यवाणी करने के बाद, कि जो घमण्ड करे उसे अपने आप में बिलकुल नहीं, वरन प्रभु में घमण्ड करना चाहिए, वह न्याय के दिन आनेवाले प्रतिफल के कारण कहती है, "यहोवा स्वर्गों पर चढ़ गया है, और गर्जा है: वह पृथ्वी की छोर तक न्याय करेगा, क्योंकि वह धर्मी है।" इस पूरे में वह मसीहियों के विश्वास-वचन के क्रम को थामे रहती है: क्योंकि प्रभु मसीह स्वर्ग पर चढ़ गया है, और वहाँ से जीवितों और मरे हुओं का न्याय करने के लिए आनेवाला है।[373] क्योंकि, जैसा प्रेरित कहता है, "वह कौन है जो चढ़ गया, सिवाय उसके जो पृथ्वी के नीचले भागों में भी उतर गया था? जो उतरा वही है जो सब स्वर्गों से ऊपर चढ़ गया, कि वह सब कुछ भर दे।"[374] इसलिए उसने अपने बादलों के द्वारा गर्जा है, जिन्हें उसने ऊपर चढ़ते समय अपने पवित्र आत्मा से भर दिया है। जिस विषय में यशायाह भविष्यद्वक्ता में दासी यरूशलेम, अर्थात वह निष्फल दाख की बारी, को यह धमकी दी गई है कि उस पर कोई बरसात न होगी। परन्तु "वह पृथ्वी की छोर तक न्याय करेगा" ऐसा कहा गया है जैसे यह कहा गया हो, "यहाँ तक कि पृथ्वी के छोरों तक भी।" क्योंकि इसका अर्थ यह नहीं है कि वह पृथ्वी के अन्य भागों का न्याय नहीं करेगा, जो, निःसन्देह, सब मनुष्यों का न्याय करेगा। परन्तु पृथ्वी के छोरों से मनुष्य के छोरों को समझना अधिक उचित है, क्योंकि उन बातों का न्याय नहीं किया जाएगा जो, बीच के समय में, भले या बुरे के लिए बदल जाती हैं, वरन उस अन्त का न्याय किया जाएगा जिस अवस्था में वह पाया जाए जिसका न्याय हो रहा है। इसी कारण यह कहा गया है, "जो अन्त तक स्थिर रहेगा, वही उद्धार पाएगा।"[375] इसलिए, जो पृथ्वी के बीच में लगातार न्याय और धर्म करता है, वह तब दोषी नहीं ठहराया जाएगा जब पृथ्वी के छोरों का न्याय होगा। "और देता है," वह कहती है, "हमारे राजाओं को शक्ति," कि वह उन्हें न्याय करते समय दोषी न ठहराए। वह उन्हें वह शक्ति देता है जिससे वे राजाओं के रूप में देह पर शासन करें, और उसमें संसार को जीत लें जिसने उनके लिए अपना लोहू बहा दिया है। "और अपने मसीह का सींग ऊँचा करेगा।" क्योंकि वह, जिसके विषय में ऊपर कहा गया था, "यहोवा स्वर्गों पर चढ़ गया है," अर्थात प्रभु मसीह स्वयं, जैसा यहाँ कहा गया है, "अपने मसीह का सींग ऊँचा करेगा।" तो फिर, उसके मसीह का मसीह कौन है? क्या इसका अर्थ यह है कि वह अपने विश्वासी लोगों में से हर एक का सींग ऊँचा करेगा, जैसा वह इस भजन के आरम्भ में कहती है, "मेरा सींग मेरे परमेश्वर में ऊँचा हुआ है?" क्योंकि हम ठीक ही उन सबको मसीह कह सकते हैं जो उसके अभिषेक से अभिषिक्त हैं, क्योंकि सिर के साथ सारी देह एक ही मसीह है।[376] ये बातें हन्ना ने, शमूएल की माता, उस पवित्र और अति प्रशंसित पुरुष की, भविष्यवाणी की हैं, जिनमें, वास्तव में, प्राचीन याजकपद का परिवर्तन तब चित्रित किया गया था और अब पूरा हुआ है, क्योंकि जिसकी बहुत सन्तान थी वह दुर्बल हो गई है, कि वह बाँझ जिसने सात जन्मे, मसीह में नया याजकपद प्राप्त करे।
5. परमेश्वर के एक जन ने आत्मा की प्रेरणा से याजक एली से जो बातें कहीं, उनके विषय में, जिनसे यह प्रकट होता है कि अहरोन के अनुसार नियुक्त याजकपद उठा लिया जाएगा
परन्तु यही बात याजक एली के पास भेजे गए परमेश्वर के एक जन के द्वारा और भी स्पष्ट रूप से कही गई है, जिसका नाम यद्यपि नहीं बताया गया, परन्तु जिसका पद और सेवा यह दिखाती है कि वह निःसन्देह एक भविष्यद्वक्ता था। क्योंकि यों लिखा है: "और परमेश्वर का एक जन एली के पास आया, और कहा, यहोवा यों कहता है, जब वे मिस्र देश में फ़िरौन के घराने में दास थे, उस समय मैं ने तेरे मूल पुरुष के घराने पर अपने आप को स्पष्ट रूप से प्रकट किया; और मैं ने तेरे मूल पुरुष के घराने को इस्राएल के सब गोत्रों में से चुन लिया, कि वह मेरे लिये याजकपद का काम करे, मेरी वेदी पर चढ़े, धूप जलाए, और एप्रोद पहिने; और मैं ने तेरे मूल पुरुष के घराने को इस्राएलियों की आग की सब हवनियों में से खाने को दिया। तो फिर तू ने मेरे धूप और मेरी हवनियों को निर्लज्ज दृष्टि से क्यों देखा, और अपने पुत्रों को मुझसे बढ़कर आदर देकर उन्हें यह क्यों दिया कि वे मेरे साम्हने इस्राएल की हर एक बलि के पहिले फल पर आशीष दें? इसलिये यहोवा इस्राएल का परमेश्वर यों कहता है, मैं ने कहा था कि तेरा घराना और तेरे मूल पुरुष का घराना सदा मेरे साम्हने चलता रहेगा; परन्तु अब यहोवा कहता है, यह मुझसे दूर हो; क्योंकि जो मेरा आदर करते हैं उन्हें मैं आदर दूंगा, और जो मुझे तुच्छ जानता है वह तुच्छ ठहराया जाएगा। देख, वे दिन आते हैं, कि मैं तेरे वंश को, और तेरे मूल पुरुष के घराने के वंश को काट डालूंगा, और तेरे घर में कोई बूढ़ा न रहेगा। और मैं तेरे घराने के पुरुष को अपनी वेदी से काट डालूंगा, यहां तक कि उसकी आंखें क्षीण हो जाएंगी और उसका मन गल जाएगा; और तेरे घराने में से जो कोई बचेगा वह मनुष्यों की तलवार से मर जाएगा। और यह तेरे लिये एक चिन्ह होगा जो तेरे इन दोनों पुत्रों, होफनी और पीनहास, पर आ पड़ेगा; वे दोनों एक ही दिन मर जाएंगे। और मैं अपने लिये एक विश्वासयोग्य याजक उठाऊंगा, जो मेरे मन और मेरी आत्मा में जो कुछ है उसके अनुसार करेगा; और मैं उसके लिये एक स्थिर घराना बनाऊंगा, और वह सदा मेरे मसीह के साम्हने चलेगा। और यों होगा कि तेरे घराने में जो कोई बचा रहेगा, वह चांदी का एक टुकड़ा लेकर उसे दण्डवत् करने आएगा, और कहेगा, मुझे अपने याजकपद के किसी एक भाग में रख दे, कि मैं रोटी खा सकूं।"[377]
हम यह नहीं कह सकते कि यह भविष्यवाणी, जिसमें प्राचीन याजकपद के परिवर्तन की इतनी स्पष्टता से भविष्यवाणी की गई है, शमूएल में पूरी हुई थी; क्योंकि यद्यपि शमूएल उस गोत्र से भिन्न किसी अन्य गोत्र का न था जो परमेश्वर द्वारा वेदी की सेवा के लिये नियुक्त किया गया था, तौभी वह अहरोन के पुत्रों में से न था, जिनकी सन्तान इसलिये अलग रखी गई थी कि याजक उन्हीं में से लिये जाएं। और इस प्रकार उस घटना के द्वारा भी वही परिवर्तन प्रकट होता है जो मसीह यीशु के द्वारा होना था, और यह भविष्यवाणी स्वयं कार्य में, न कि शब्द में, ठीक रीति से पुराने नियम की थी, परन्तु लाक्षणिक रूप से नये नियम की थी, और उसी बात को कार्य के द्वारा प्रकट करती थी जो भविष्यद्वक्ता के द्वारा शब्द में याजक एली से कही गई थी। क्योंकि बाद में भी अहरोन के वंश के याजक हुए, जैसे दाऊद के राज्य में सादोक और एबीयाथार, और उनके बाद क्रम से अन्य, इससे पहले कि वह समय आए जब याजकपद के परिवर्तन के विषय में जो बातें इतने पहले से भविष्यवाणी की गई थीं, उन्हें मसीह के द्वारा पूरा होना था। परन्तु अब कौन है जो विश्वास की दृष्टि से इन बातों को देखे और यह न देखे कि ये पूरी हो गई हैं? क्योंकि सचमुच न तो निवासस्थान, न मन्दिर, न वेदी, न बलिदान, और इस कारण न ही कोई याजक, यहूदियों के लिये बचा है, जिनके लिये परमेश्वर की व्यवस्था में यह आज्ञा दी गई थी कि याजक अहरोन के वंश में से ठहराया जाए; जिसका उल्लेख भविष्यद्वक्ता यहां भी करता है, जब वह कहता है, "यहोवा इस्राएल का परमेश्वर यों कहता है, मैं ने कहा था कि तेरा घराना और तेरे मूल पुरुष का घराना सदा मेरे साम्हने चलता रहेगा; परन्तु अब यहोवा कहता है, यह मुझसे दूर हो; क्योंकि जो मेरा आदर करते हैं उन्हें मैं आदर दूंगा, और जो मुझे तुच्छ जानता है वह तुच्छ ठहराया जाएगा।" क्योंकि 'तेरे मूल पुरुष के घराने' के नाम से उसका अभिप्राय उसके निकटतम पिता के घराने से नहीं, वरन् अहरोन के घराने से है, जो पहले याजक ठहराया गया था और जिसके बाद उसके वंश के अन्य लोग उसका स्थान लेते रहे, जैसा कि पहले के शब्दों से प्रकट होता है, जब वह कहता है, "जब वे मिस्र देश में फ़िरौन के घराने में दास थे, तब मैं तेरे मूल पुरुष के घराने पर प्रकट हुआ; और मैं ने तेरे मूल पुरुष के घराने को इस्राएल के सब गोत्रों में से चुन लिया कि वह मेरे लिये याजकपद का काम करे।" उस मिस्री दासत्व में पितरों में से, अहरोन को छोड़ और कौन उसका पिता था, जो उनके स्वतंत्र होने पर याजकपद के लिये चुना गया? इसलिये उसी के वंश के विषय में उस ने इस स्थान में कहा है कि यों होगा कि वे फिर याजक न रहेंगे; जो हम पहले ही पूरा हुआ देखते हैं। यदि विश्वास सजग रहे, तो ये बातें हमारे साम्हने हैं: वे पहचानी जाती हैं, वे ग्रहण की जाती हैं, और अनिच्छुकों की आंखों पर भी बलपूर्वक प्रकट हो जाती हैं, यहां तक कि वे देखी जाती हैं: "देख, वे दिन आते हैं," वह कहता है, "कि मैं तेरे वंश को, और तेरे मूल पुरुष के घराने के वंश को काट डालूंगा, और तेरे घर में कोई बूढ़ा न रहेगा। और मैं तेरे घराने के पुरुष को अपनी वेदी से काट डालूंगा, यहां तक कि उसकी आंखें क्षीण हो जाएंगी और उसका मन गल जाएगा।" देखो, जिन दिनों की भविष्यवाणी की गई थी वे पहले ही आ चुके हैं। अहरोन की रीति पर अब कोई याजक नहीं है; और उसके वंश का जो कोई भी पुरुष है, जब वह मसीहियों के बलिदान को सारे जगत में प्रबल होते देखता है, परन्तु वह बड़ा आदर स्वयं से छिन गया देखता है, तो उसकी आंखें थक जाती हैं और उसका प्राण शोक से गलकर पिघल जाता है।
परन्तु जो आगे कहा गया है वह विशेष रूप से एली के घराने से सम्बन्ध रखता है, जिससे यह बातें कही गई थीं: "और तेरे घराने में से जो कोई बचेगा वह मनुष्यों की तलवार से मर जाएगा। और यह तेरे लिये एक चिन्ह होगा जो तेरे इन दोनों पुत्रों, होफनी और पीनहास, पर आ पड़ेगा; वे दोनों एक ही दिन मर जाएंगे।" यह, इसलिये, इस मनुष्य के घराने से याजकपद के परिवर्तन का चिन्ह बनाया गया है, जिससे यह प्रकट होता है कि अहरोन के घराने का याजकपद बदला जाना है। क्योंकि इस मनुष्य के पुत्रों की मृत्यु मनुष्यों की मृत्यु को नहीं, वरन् अहरोन के पुत्रों के याजकपद की ही मृत्यु को दर्शाती थी। परन्तु जो आगे कहा गया है वह उस याजक से सम्बन्ध रखता है जिसका आदर्श शमूएल ने इस मनुष्य के स्थान पर आकर प्रकट किया। इसलिये जो बातें आगे कही गई हैं वे मसीह यीशु, नये नियम के सच्चे याजक, के विषय में कही गई हैं: "और मैं अपने लिये एक विश्वासयोग्य याजक उठाऊंगा, जो मेरे मन और मेरी आत्मा में जो कुछ है उसके अनुसार करेगा; और मैं उसके लिये एक स्थिर घराना बनाऊंगा।" वही ऊपर की सनातन यरूशलेम है। "और वह," वह कहता है, "मेरे मसीह के साम्हने सर्वदा चलेगा।" "वह चलेगा" का अर्थ है "वह साथ रहेगा", ठीक जैसा उस ने पहले अहरोन के घराने के विषय में कहा था, "मैं ने कहा कि तेरा घराना और तेरे मूल पुरुष का घराना सदा मेरे साम्हने चलता रहेगा।" परन्तु जो वह कहता है, "वह मेरे मसीह के साम्हने चलेगा," वह पूर्णतः घराने ही के विषय में समझा जाना चाहिए, उस याजक के विषय में नहीं, जो स्वयं मसीह है, मध्यस्थ और उद्धारकर्ता। उसका घराना, इसलिये, उसके साम्हने चलेगा। "चलेगा" का अर्थ यह भी समझा जा सकता है कि मृत्यु से जीवन तक, जितने समय तक यह मरणधर्मी दशा इस जगत के अन्त तक चलती रहेगी। परन्तु जहां परमेश्वर कहता है, "जो मेरे मन और मेरी आत्मा में जो कुछ है उसके अनुसार करेगा," हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि परमेश्वर की कोई आत्मा है, क्योंकि वह तो आत्माओं का रचनहार है; परन्तु यह परमेश्वर के विषय में लाक्षणिक रूप से कहा गया है, ठीक रूप से नहीं, ठीक जैसे उसके हाथ और पांव, और अन्य शारीरिक अंग होने की बात कही जाती है। और, ऐसा न हो कि इस प्रकार की भाषा से यह समझा जाए कि इस देह के रूप में मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया है, इसलिये उसे पंख भी दिए गए बताए जाते हैं, जो मनुष्य के पास बिलकुल नहीं हैं; और परमेश्वर से कहा गया है, "मुझे अपने पंखों की छाया में छिपा ले,"[378] कि मनुष्य समझ लें कि उस अवर्णनीय स्वभाव के विषय में ऐसी बातें ठीक शब्दों में नहीं, वरन् लाक्षणिक शब्दों में कही जाती हैं।
परन्तु जो आगे जोड़ा गया है, "और यों होगा कि तेरे घराने में जो कोई बचा रहेगा वह उसे दण्डवत् करने आएगा," वह ठीक रीति से इस एली के घराने के विषय में नहीं कहा गया, वरन् उस अहरोन के घराने के विषय में, जिसके पुरुष यीशु मसीह के आगमन तक बने रहे, और जिस वंश के पुरुष आज तक भी घटे नहीं हैं। क्योंकि एली के उस घराने के विषय में तो ऊपर पहले ही कहा गया था, "और तेरे घराने में से जो कोई बचेगा वह मनुष्यों की तलवार से मर जाएगा।" तो फिर यहां यह सच रूप से कैसे कहा जा सकता है, "और यों होगा कि जो कोई बचा रहेगा वह उसे दण्डवत् करने आएगा," जबकि यह सच है कि दण्डदायक तलवार से कोई भी नहीं बचेगा—जब तक कि इसे उन लोगों के विषय में न समझा जाए जो अहरोन की रीति पर उस सारे याजकपद के वंश से सम्बन्ध रखते हैं? इसलिये, यदि यह उन पूर्वनियत बचे हुओं के विषय में है, जिनके विषय में एक अन्य भविष्यद्वक्ता ने कहा है, "बचे हुए ही उद्धार पाएंगे;"[379] जिस कारण प्रेरित भी कहता है, "इसी प्रकार इस समय भी अनुग्रह के चुनाव के अनुसार बचा हुआ भाग उद्धार पाता है;"[380] क्योंकि यह सहज ही समझा जाता है कि ऐसे ही बचे हुओं के विषय में कहा गया है, "जो तेरे घराने में बचा रहेगा"—निःसन्देह वह मसीह पर विश्वास करता है; जैसे प्रेरित के समय में उस जाति के बहुत से लोगों ने विश्वास किया; और अब भी, यद्यपि बहुत ही थोड़े, ऐसे लोग नहीं हैं जो विश्वास न करते हों, और उनमें वह बात पूरी होती है जो परमेश्वर के इस जन ने यहां तुरन्त आगे जोड़ी है, "वह चांदी का एक टुकड़ा लेकर उसे दण्डवत् करने आएगा"; और यदि उस प्रधान याजक को नहीं, जो परमेश्वर भी है, तो और किसे दण्डवत् करने? क्योंकि अहरोन की रीति पर के उस याजकपद में मनुष्य याजक को दण्डवत् करने के उद्देश्य से परमेश्वर के मन्दिर या वेदी पर नहीं आते थे। परन्तु जो वह कहता है, "चांदी के एक टुकड़े के साथ," उसका अर्थ और क्या है यदि विश्वास का वह संक्षिप्त वचन नहीं, जिसके विषय में प्रेरित यह कहावत उद्धृत करता है, "यहोवा पृथ्वी पर एक पूर्ण करनेवाला और संक्षिप्त करनेवाला वचन बनाएगा?"[381] परन्तु वह चांदी वचन के लिये रखी गई है, इसका प्रमाण वह भजन है, जहां यह गाया गया है, "यहोवा के वचन पवित्र वचन हैं, आग में ताई हुई चान्दी के समान।"[382]
तो फिर वह क्या कहता है जो परमेश्वर के याजक को, अर्थात् उस याजक को जो परमेश्वर भी है, दण्डवत् करने आता है? "मुझे अपने याजकपद के किसी एक भाग में रख दे, कि रोटी खा सकूं।" मैं यह नहीं चाहता कि मुझे अपने पितरों के आदर में रखा जाए, जो कुछ भी नहीं है; मुझे अपने याजकपद के किसी एक भाग में रख दे। क्योंकि "मैं ने तेरे भवन में तुच्छ बने रहना ही चुन लिया है;"[383] मैं चाहता हूं कि मैं तेरे याजकपद का सदस्य बनूं, चाहे किसी भी रूप में, या कितना ही छोटा क्यों न हो। याजकपद से यहां उसका अभिप्राय स्वयं वह प्रजा है, जिसका याजक वह है जो परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ है, अर्थात् मनुष्य मसीह यीशु।[384] इस प्रजा को प्रेरित पतरस "पवित्र लोग, राजकीय याजकवर्ग" कहता है।[385] परन्तु कुछ ने इसका अनुवाद "तेरे बलिदान का," किया है, न कि "तेरे याजकपद का," जो उसी मसीही प्रजा को कम नहीं, वरन् उतना ही दर्शाता है। इसी कारण प्रेरित पौलुस कहता है, "हम बहुत होते हुए भी एक रोटी, एक देह हैं।"[386] [और फिर वह कहता है, "अपने शरीरों को एक जीवित बलिदान करके भेंट करो।"[387]] इसलिये जो उस ने "रोटी खाने" की बात जोड़ी है, वह भी उस बलिदान के ठीक स्वरूप को सुन्दरता से व्यक्त करता है, जिसके विषय में वह याजक स्वयं कहता है, "जो रोटी मैं दूंगा वह जगत के जीवन के लिये मेरा मांस है।"[388] वही बलिदान अहरोन की रीति पर नहीं, वरन् मलिकिसिदक की रीति पर है:[389] पढ़नेवाला समझ ले।[390] इसलिये यह संक्षिप्त और उद्धारकारी दीनतापूर्ण अंगीकार, जिसमें कहा गया है, "मुझे अपने याजकपद के किसी एक भाग में रख दे, कि रोटी खा सकूं," स्वयं वह चांदी का टुकड़ा है, क्योंकि यह संक्षिप्त भी है, और यह परमेश्वर का वह वचन भी है जो विश्वास करनेवाले के मन में निवास करता है। क्योंकि उस ने ऊपर यह कहा था कि उस ने अहरोन के घराने को खाने के लिये पुराने नियम के बलि-पशु दिए थे, जहां वह कहता है, "मैं ने तेरे मूल पुरुष के घराने को इस्राएलियों की आग में चढ़ाई गई सब वस्तुएं खाने को दी हैं," जो निःसन्देह यहूदियों के बलिदान थे; इसलिये यहां उस ने कहा है, "रोटी खाने को," जो नये नियम में मसीहियों का बलिदान है।
6. यहूदी याजकपद और राज्य के विषय में, जिनकी स्थापना सदा के लिये प्रतिज्ञा की गई थी, तौभी वे स्थिर न रहे; जिससे यह समझना चाहिए कि अनन्तता किन अन्य बातों को सुनिश्चित है
अतः, जबकि ये बातें अब उतनी ही स्पष्टता से प्रकट होती हैं जितनी उदात्तता से इनकी भविष्यवाणी की गई थी, तौभी कोई व्यर्थ ही यह प्रश्न पूछने को प्रेरित हो सकता है, कि हम कैसे विश्वास से कह सकते हैं कि इन पुस्तकों में जो सब बातें आने को भविष्यवाणी की गई हैं वे पूरी होंगी, यदि यही बात, जो वहां परमेश्वर के द्वारा कही गई है, "तेरा घराना और तेरे मूल पुरुष का घराना सदा मेरे साम्हने चलता रहेगा," पूरी न हो सकी? क्योंकि हम देखते हैं कि याजकपद बदल दिया गया है; और इस बात की कोई आशा नहीं रह जाती कि जो उस घराने से प्रतिज्ञा की गई थी वह कभी पूरी होगी, क्योंकि जो उसके त्यागे और बदले जाने के बाद आता है वह तो सनातन होने की भविष्यवाणी की गई है। जो कोई यह कहता है वह अभी तक यह नहीं समझता, या यह याद नहीं रखता, कि अहरोन की रीति पर का यह याजकपद स्वयं भविष्य के एक सनातन याजकपद की छाया के रूप में नियुक्त किया गया था; और इसलिये, जब इसके लिये अनन्तता की प्रतिज्ञा की जाती है, तो वह केवल छाया और आकार के लिये नहीं, वरन् उस वस्तु के लिये की जाती है जिसकी छाया और पूर्वाकार इसके द्वारा प्रकट होता है। परन्तु ऐसा न हो कि यह समझा जाए कि वह छाया स्वयं बनी रहेगी, इसलिये इसके परिवर्तन की भी भविष्यवाणी करना आवश्यक था।
इसी प्रकार, शाऊल का राज्य भी, जो निःसन्देह त्यागा और रद्द किया गया था, आने वाले उस राज्य की छाया था जो अनन्तकाल तक बना रहेगा। क्योंकि सचमुच, जिस तेल से वह अभिषिक्त किया गया था, और जिस अभिषेक से उसे मसीह कहा जाता है, उसे एक रहस्यमय अर्थ में लिया जाना चाहिए, और एक बड़े भेद के रूप में समझा जाना चाहिए; जिसे दाऊद स्वयं उसमें इतना अधिक पूजनीय मानता था, कि जब वह एक अन्धेरी गुफा में छिपा था, जिसमें शाऊल भी शरीर की आवश्यकता से विवश होकर आ गया था, और दाऊद ने गुप्त रीति से उसके पीछे आकर उसके वस्त्र का एक छोटा टुकड़ा काट लिया, कि वह यह प्रमाणित कर सके कि उस ने उसे बचा लिया जब वह उसे मार सकता था, और इस प्रकार उसके मन से वह सन्देह दूर कर सके जिसके कारण वह पवित्र दाऊद को अपना शत्रु समझकर उसे बड़ी उग्रता से सताता रहा था—तब भी दाऊद अपने प्रहार किए हुए हृदय के साथ कांप उठा। इसलिये वह इस बात से बहुत डरा कि उस पर शाऊल में इतने बड़े भेद का उल्लंघन करने का दोष न लगाया जाए, क्योंकि उस ने उसके वस्त्रों तक को छू लिया था। क्योंकि यों लिखा है: "और दाऊद का हृदय उसे यह करने के कारण कचोटने लगा कि उस ने उसके बागे का किनारा काट लिया था।"[391] परन्तु अपने साथ के मनुष्यों से, जिन्होंने उसे यह सलाह दी कि वह शाऊल को, जो इस प्रकार उसके हाथ में सौंपा गया था, नष्ट कर दे, वह कहता है, "यहोवा न करे कि मैं अपने स्वामी, यहोवा के अभिषिक्त, पर हाथ उठाकर यह काम करूं, क्योंकि वह यहोवा का अभिषिक्त है।" इसलिये उस ने आनेवाली वस्तु की इस छाया को इतना बड़ा आदर दिया, अपनी ही सुन्दरता के कारण नहीं, वरन् उस वस्तु के कारण जिसका यह पूर्वाकार था। इसी कारण जो शमूएल शाऊल से कहता है, "क्योंकि तू ने मेरी वह आज्ञा नहीं मानी जो यहोवा ने तुझे दी थी, यद्यपि यहोवा ने तेरे राज्य को इस्राएल पर सदा के लिये स्थिर करना चाहा था, तौभी अब तेरा राज्य तेरे लिये स्थिर न रहेगा; और यहोवा अपने मन के अनुसार एक पुरुष ढूंढ़ लेगा, और यहोवा उसे अपनी प्रजा पर प्रधान होने की आज्ञा देगा, क्योंकि तू ने वह नहीं माना जो यहोवा ने तुझे दिया था,"[392] इसे ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए जैसे परमेश्वर ने यह निश्चित किया था कि शाऊल स्वयं सदा राज्य करेगा, और बाद में, उसके पाप करने पर, इस प्रतिज्ञा को नहीं मानेगा; और न ही वह इससे अनजान था कि वह पाप करेगा, परन्तु उस ने उसका राज्य इसलिये स्थापित किया था कि वह सनातन राज्य का एक पूर्वाकार हो। इसलिये उस ने जोड़ा, "तौभी अब तेरा राज्य तेरे लिये स्थिर न रहेगा।" इसलिये जो इसने संकेत किया वह खड़ा रहा है और खड़ा रहेगा; परन्तु वह इस मनुष्य के लिये स्थिर न रहेगा, क्योंकि वह स्वयं सदा राज्य करनेवाला न था, न उसकी सन्तान; जिससे कि कम से कम वह वचन "सदा के लिये" उसकी सन्तान में एक से दूसरे तक पूरा होता हुआ प्रतीत हो। "और यहोवा," वह कहता है, "अपने लिये एक पुरुष ढूंढ़ लेगा," जिसका अर्थ है या तो दाऊद या नये नियम का मध्यस्थ,[393] जो उस अभिषेक में चित्रित किया गया था जिससे दाऊद और उसकी सन्तान भी अभिषिक्त की गई थी। परन्तु यह ऐसा नहीं है जैसे परमेश्वर यह न जानता हो कि वह पुरुष कहां है, और इस प्रकार उसे ढूंढ़ता हो, वरन्, एक मनुष्य के द्वारा बोलते हुए, वह मनुष्य के समान बोलता है, और इस अर्थ में हमें ढूंढ़ता है। क्योंकि न केवल परमेश्वर पिता के लिये, वरन् उसके एकलौते पुत्र के लिये भी, जो खोई हुई वस्तु को ढूंढ़ने आया,[394] हम पहले ही से जाने हुए थे, यहां तक कि जगत की उत्पत्ति से पहले ही उसमें चुन लिए गए थे।[395] इसलिये "वह उसे ढूंढ़ेगा" का अर्थ है, वह अपने ही को रखेगा (ठीक जैसे उस ने कहा हो, जिसे वह पहले ही अपना जान चुका है, उसे वह दूसरों के लिये अपना मित्र प्रकट करेगा)। इसी कारण लातीनी में यह शब्द (quærit) एक उपसर्ग पाकर acquirit (प्राप्त करता है) बन जाता है, जिसका अर्थ पर्याप्त रूप से स्पष्ट है; यद्यपि उस उपसर्ग को जोड़े बिना भी quærere को acquirere ही समझा जाता है, जिससे लाभों को quæstus कहा जाता है।
7. इस्राएल के राज्य के विभाजन के विषय में, जिसके द्वारा आत्मिक इस्राएल के शारीरिक इस्राएल से सनातन विभाजन का पूर्वाभास दिया गया था
फिर शाऊल ने अनाज्ञाकारिता के द्वारा पाप किया, और फिर शमूएल यहोवा के वचन में उससे कहता है, "क्योंकि तू ने यहोवा के वचन को तुच्छ जाना है, इसलिये यहोवा ने तुझे तुच्छ जाना है, कि तू इस्राएल पर राजा न रहे।"[396] और फिर उसी पाप के लिये, जब शाऊल ने उसे मान लिया, और क्षमा के लिये प्रार्थना की, और शमूएल से बिनती की कि वह यहोवा को शान्त करने के लिये उसके साथ लौट आए, तो उस ने कहा, "मैं तेरे साथ न लौटूंगा; क्योंकि तू ने यहोवा के वचन को तुच्छ जाना है, और यहोवा तुझे तुच्छ जानेगा, कि तू इस्राएल पर राजा न रहे। और शमूएल जाने के लिये मुंह फेरने लगा, और शाऊल ने उसके बागे का किनारा पकड़ लिया, और उसे फाड़ दिया। और शमूएल ने उससे कहा, यहोवा ने आज के दिन इस्राएल के राज्य को तेरे हाथ से फाड़ लिया है, और उसे तेरे पड़ोसी को देगा, जो तुझसे उत्तम है, और इस्राएल को दो भागों में विभाजित करेगा। और वह न बदला जाएगा, और न पछताएगा; क्योंकि वह मनुष्य के समान नहीं है, कि वह पछताए; जो धमकी देता है और उस पर स्थिर नहीं रहता।"[397] वह, जिससे यह कहा गया, "यहोवा तुझे तुच्छ जानेगा, कि तू इस्राएल पर राजा न रहे," और "यहोवा ने आज के दिन इस्राएल के राज्य को तेरे हाथ से फाड़ लिया है," इस्राएल पर चालीस वर्ष तक राज्य करता रहा—अर्थात्, ठीक उतने ही समय तक जितना दाऊद स्वयं—तौभी उस ने अपने राज्यकाल के आरम्भिक समय में ही यह सुना, जिससे हम यह समझ सकें कि यह इसलिये कहा गया था कि उसके वंश में से कोई राज्य नहीं करेगा, और जिससे हम दाऊद के वंश की ओर देखें, जिससे शरीर के अनुसार भी उत्पन्न हुआ,[398] परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ, अर्थात् मनुष्य मसीह यीशु।[399]
परन्तु शास्त्र में वह नहीं है जो अधिकांश लातीनी प्रतियों में पढ़ा जाता है, "यहोवा ने आज के दिन इस्राएल के राज्य को तेरे हाथ से फाड़ लिया है," वरन् जैसा हम ने लिखा है वैसा ही यूनानी प्रतियों में पाया जाता है, "यहोवा ने इस्राएल से राज्य को तेरे हाथ से फाड़ लिया है;" जिससे "तेरे हाथ से" शब्दों का अर्थ "इस्राएल से" समझा जाए। इसलिये यह मनुष्य लाक्षणिक रूप से इस्राएल की उस प्रजा को दर्शाता था, जो राज्य को खोनेवाली थी, क्योंकि हमारा प्रभु मसीह यीशु शारीरिक रूप से नहीं, वरन् आत्मिक रूप से राज्य करने को था। और जब उसके विषय में कहा जाता है, "और उसे तेरे पड़ोसी को देगा," तो इसे शारीरिक सम्बन्ध से जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि मसीह, शरीर के अनुसार, इस्राएल से था, जिससे शाऊल भी उत्पन्न हुआ। परन्तु जो जोड़ा गया है, "तुझसे उत्तम," उसे सचमुच "तुझसे बेहतर" भी समझा जा सकता है, और वास्तव में कुछ ने इसका अनुवाद इसी प्रकार किया है; परन्तु इसे इस प्रकार लेना अधिक उचित है, "तुझसे उत्तम," जिसका अर्थ है कि क्योंकि वह उत्तम है, इसलिये वह अवश्य तुझसे ऊंचा हो, उस अन्य भविष्यसूचक कथन के अनुसार, "जब तक मैं तेरे सब शत्रुओं को तेरे पांवों तले न रख दूं।"[400] और उनमें इस्राएल भी है, जिससे, उसके सतानेवाले के रूप में, मसीह ने राज्य छीन लिया; यद्यपि जिस इस्राएल में कोई कपट न था वह भी वहां रहा हो सकता है, उस भूसे में से कुछ अन्न के दानों के समान। क्योंकि निश्चय ही वहीं से प्रेरित आए, वहीं से इतने सारे शहीद आए, जिनमें से स्तिफनुस पहला है, वहीं से इतनी सारी कलीसियाएं आईं, जिनका नाम प्रेरित पौलुस लेता है, उनके मन फिराव में परमेश्वर की महिमा करते हुए।
इस विषय में मुझे सन्देह नहीं कि जो आगे कहा गया है उसे इस प्रकार समझा जाना चाहिए, "और इस्राएल को दो भागों में विभाजित करेगा," अर्थात्, उस इस्राएल में जो दासी से सम्बन्धित है, और उस इस्राएल में जो स्वतंत्र स्त्री से सम्बन्धित है। क्योंकि ये दोनों प्रकार आरम्भ में साथ थे, जैसे अब्राहम अब भी दासी से चिपटा रहा, यहां तक कि वह बांझ, जो परमेश्वर के अनुग्रह से फलवन्त बनाई गई, यह पुकार उठी, "दासी और उसके पुत्र को निकाल दे।"[401] हम जानते हैं, सचमुच, कि सुलैमान के पाप के कारण, उसके पुत्र रहूबियाम के राज्यकाल में इस्राएल दो भागों में विभाजित हो गया, और वैसा ही बना रहा, जिसमें अलग-अलग भागों के अपने-अपने राजा थे, यहां तक कि वह सारी जाति बड़े विनाश के साथ उलट दी गई, और कसदियों द्वारा बन्दी बनाकर ले जाई गई। परन्तु इसका शाऊल से क्या सम्बन्ध था, जब, यदि इस प्रकार की कोई बात धमकाई गई थी, तो वह दाऊद स्वयं के विरुद्ध धमकाई जाती, जिसका पुत्र सुलैमान था? अन्ततः, इब्री जाति अब भीतरी रूप से विभाजित नहीं है, वरन् उसी भ्रान्ति की सहभागिता में पृथ्वी भर में बिना भेद के फैली हुई है। परन्तु वह विभाजन जिससे परमेश्वर ने शाऊल के व्यक्तित्व में, जो उन्हें दर्शाता था, राज्य और प्रजा को धमकाया, इस जोड़ी हुई बात से सनातन और अपरिवर्तनीय दिखाया गया है, "और वह न बदला जाएगा, और न पछताएगा; क्योंकि वह मनुष्य के समान नहीं है, कि वह पछताए; जो धमकी देता है और उस पर स्थिर नहीं रहता,"—अर्थात्, मनुष्य धमकी देता है और उस पर स्थिर नहीं रहता, परन्तु परमेश्वर नहीं, जो मनुष्य के समान नहीं पछताता। क्योंकि जब हम पढ़ते हैं कि वह पछताता है, तो इसका अर्थ है परिस्थिति का परिवर्तन, जो परमेश्वर के अपरिवर्तनीय पूर्वज्ञान से बहता है। इसलिये, जब परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह नहीं पछताता, तो इसे यह समझा जाना चाहिए कि वह नहीं बदलता।
हम देखते हैं कि इस्राएल की प्रजा के इस विभाजन के विषय में यह वाक्य, जो परमेश्वर के द्वारा इन शब्दों में कहा गया, सर्वथा अनिवार्य और पूर्णतः सनातन रहा है। क्योंकि जिन्होंने भी मसीह की ओर फिरा, या फिर रहे हैं, या फिरेंगे, यह परमेश्वर के पूर्वज्ञान के अनुसार हुआ है, न कि मानवजाति के एक ही और समान स्वभाव के अनुसार। निश्चय ही उन इस्राएलियों में से कोई भी, जो मसीह से चिपटे रहकर उसमें स्थिर बने रहे हैं, कभी भी उन इस्राएलियों में सम्मिलित नहीं होगा जो इस जीवन के अन्त तक उसके शत्रु बने रहते हैं, वरन् वे सदा उस विभाजन में बने रहेंगे जिसकी यहां भविष्यवाणी की गई है। क्योंकि पुराना नियम, सीनै पर्वत से, जो दासत्व के लिये जन्म देता है,[402] कुछ भी लाभ नहीं देता, केवल इसलिये कि वह नये नियम की गवाही देता है। अन्यथा, मूसा को जितने भी समय तक पढ़ा जाए, उनके मन पर परदा पड़ा रहता है; परन्तु जब कोई उससे फिरकर मसीह की ओर आएगा, तो वह परदा उठा लिया जाएगा।[403] क्योंकि फिरनेवालों की इच्छा ही पुरानी से नई हो जाती है, जिससे हर एक अब शारीरिक नहीं, वरन् आत्मिक सुख प्राप्त करने की इच्छा रखता है। इसी कारण वह महान भविष्यद्वक्ता शमूएल स्वयं, इससे पहले कि उस ने शाऊल का अभिषेक किया था, जब उस ने इस्राएल के लिये यहोवा को पुकारा था, और उस ने उसकी सुन ली थी, और जब उस ने एक सारा होमबलि चढ़ाया था, जब विदेशी लोग परमेश्वर की प्रजा के विरुद्ध युद्ध करने को आ रहे थे, और यहोवा ने उनके ऊपर गर्जना की और वे घबरा गए, और इस्राएल के साम्हने गिर गए और पराजित हो गए; [तब] उस ने एक पत्थर लिया और उसे पुराने और नये मिस्पा (मिस्पेह) के बीच स्थापित किया, और उसका नाम एबेनेजेर रखा, जिसका अर्थ है "सहायक का पत्थर," और कहा, "यहोवा ने अब तक हमारी सहायता की है।"[404] मिस्पा का अर्थ "इच्छा" है। वह सहायक का पत्थर उद्धारकर्ता की मध्यस्थता है, जिससे हम पुराने मिस्पा से नये की ओर जाते हैं—अर्थात्, उस इच्छा से जिसमें शारीरिक राज्य में शारीरिक सुख की आशा की जाती थी, उस इच्छा की ओर जिसमें स्वर्ग के राज्य में सच्चे आत्मिक सुख की आशा की जाती है; और क्योंकि उससे उत्तम कुछ भी नहीं है, इसलिये यहोवा अब तक हमारी सहायता करता है।
8. दाऊद से उसके पुत्र में की गई प्रतिज्ञाओं के विषय में, जो किसी भी रीति से सुलैमान में नहीं, वरन् मसीह में सर्वाधिक पूर्णता से पूरी हुई
और अब मैं देखता हूं कि मुझे यह दिखाना चाहिए कि, जिस विषय पर मैं विचार कर रहा हूं, उससे सम्बन्धित परमेश्वर ने दाऊद से स्वयं क्या प्रतिज्ञा की, जो राज्य में शाऊल के स्थान पर आया, जिसका परिवर्तन उस अन्तिम परिवर्तन का पूर्वाकार था जिसके कारण सब बातें परमेश्वर के द्वारा कही गईं, सब बातें लिखी गईं। जब राजा दाऊद के साथ बहुत सी बातें समृद्धिपूर्वक हुई थीं, तब उस ने परमेश्वर के लिये एक भवन बनाने का विचार किया, अर्थात् वही अत्यन्त उत्कृष्ट कीर्ति का मन्दिर जो बाद में उसके पुत्र राजा सुलैमान द्वारा बनाया गया। जब वह इस विषय में विचार कर रहा था, तब यहोवा का वचन नातान भविष्यद्वक्ता के पास आया, जिसे उस ने राजा के पास पहुंचाया, जिसमें, परमेश्वर के यह कहने के बाद कि उसके लिये दाऊद स्वयं भवन न बनाए, और कि उस पूरे लम्बे समय में उस ने अपनी प्रजा में से किसी को भी उसके लिये देवदार का भवन बनाने की आज्ञा कभी नहीं दी, वह कहता है, "और अब तू मेरे सेवक दाऊद से यों कहेगा, सर्वशक्तिमान परमेश्वर यों कहता है, मैं ने तुझे भेड़शाला से लिया, कि तू मेरी प्रजा इस्राएल पर अधिपति हो: और तू जहां कहीं गया मैं तेरे साथ रहा, और मैं ने तेरे सब शत्रुओं को तेरे साम्हने से काट डाला, और मैं ने तेरा नाम, पृथ्वी के बड़े-बड़े लोगों के नाम के अनुसार, बड़ा किया है। और मैं अपनी प्रजा इस्राएल के लिये एक स्थान नियुक्त करूंगा, और उसे रोपूंगा, और वह अलग बसा रहेगा, और फिर कभी व्याकुल न होगा; और दुष्टता का पुत्र फिर उसे दीन न करेगा, जैसा आरम्भ से, उन दिनों से जब मैं ने अपनी प्रजा इस्राएल पर न्यायी नियुक्त किए थे। और मैं तुझे तेरे सब शत्रुओं से विश्राम दूंगा, और यहोवा तुझे बताएगा [बता चुका है], कि तू उसके लिये एक भवन बनाएगा। और यों होगा कि जब तेरे दिन पूरे हो जाएंगे, और तू अपने पितरों के साथ सो जाएगा, तब मैं तेरे बाद तेरे वंश को उठाऊंगा, जो तेरे ही गर्भ से उत्पन्न होगा, और मैं उसका राज्य स्थिर करूंगा। वह मेरे नाम के लिये मेरा भवन बनाएगा; और मैं उसकी राजगद्दी को अनन्तकाल तक स्थिर करूंगा। मैं उसका पिता हूंगा, और वह मेरा पुत्र होगा। और यदि वह अधर्म करे, तो मैं उसे मनुष्यों के दण्ड से, और मनुष्य की सन्तानों के कोड़ों से ताड़ना दूंगा: परन्तु मैं अपनी करुणा उससे न लूंगा, जैसे मैं ने उनसे ली जिन्हें मैं ने अपने साम्हने से हटा दिया। और उसका घराना विश्वासयोग्य रहेगा, और उसका राज्य मेरे साम्हने सदा-सर्वदा तक बना रहेगा, और उसकी राजगद्दी सदा-सर्वदा तक स्थापित रहेगी।"[405]
जो यह सोचता है कि यह महान प्रतिज्ञा सुलैमान में पूरी हुई, वह बड़ी भूल करता है; क्योंकि वह इस कथन पर ध्यान देता है, "वह मेरे लिये एक भवन बनाएगा," परन्तु वह इस कथन पर ध्यान नहीं देता, "उसका घराना विश्वासयोग्य रहेगा, और उसका राज्य मेरे साम्हने सदा-सर्वदा तक बना रहेगा।" इसलिये उसे ध्यान देना चाहिए और सुलैमान के घराने को देखना चाहिए, जो झूठे देवताओं की पूजा करनेवाली विदेशी स्त्रियों से भरा था, और स्वयं राजा को, जो पहले बुद्धिमान था, उनके द्वारा बहकाया गया और उसी मूर्तिपूजा में गिर गया देखना चाहिए: और उसे यह सोचने का साहस न करना चाहिए कि परमेश्वर ने या तो यह झूठी प्रतिज्ञा की, या यह पूर्वज्ञान करने में असमर्थ था कि सुलैमान और उसका घराना वैसे ही बन जाएंगे जैसे वे बने। परन्तु हमें यहां सन्देह नहीं करना चाहिए, और इन बातों की पूर्ति हमारे प्रभु मसीह के अतिरिक्त और कहीं नहीं देखनी चाहिए, जो शरीर के अनुसार दाऊद के वंश से बना,[406] ऐसा न हो कि हम शारीरिक यहूदियों के समान व्यर्थ और निष्फल रीति से यहां किसी अन्य की खोज करें। क्योंकि वे भी यह इतना तो समझते हैं, कि जिस पुत्र के विषय में वे उस स्थान पर पढ़ते हैं कि वह दाऊद से प्रतिज्ञा किया गया था, वह सुलैमान न था; इसलिये, उस पर जो प्रतिज्ञा किया गया था और जो अब इतने बड़े प्रकटीकरण के साथ घोषित किया गया है, आश्चर्यजनक अन्धेपन के साथ, वे कहते हैं कि वे किसी अन्य की आशा रखते हैं। सचमुच, सुलैमान में भी भविष्य की घटना की कुछ झलक दिखाई दी, इस अर्थ में कि उस ने मन्दिर बनाया, और अपने नाम के अनुसार शान्ति प्राप्त की (क्योंकि सुलैमान का अर्थ है "शान्तिप्रिय"), और अपने राज्यकाल के आरम्भ में अद्भुत रूप से प्रशंसनीय था; परन्तु जबकि, आनेवाले की छाया के रूप में, उस ने हमारे प्रभु मसीह का पूर्वाभास दिया, उस ने अपने ही व्यक्तित्व में उसके समान भी न रहा। इसी कारण उसके विषय में कुछ बातें ऐसी लिखी गई हैं जैसे वे स्वयं उसके विषय में भविष्यवाणी की गई हों, जबकि पवित्र शास्त्र, घटनाओं के द्वारा भी भविष्यवाणी करते हुए, किसी रीति से उसमें आनेवाली बातों के आकार को रेखांकित करता है। क्योंकि, दिव्य इतिहास की उन पुस्तकों के अतिरिक्त, जिनमें उसका राज्यकाल वर्णित है, 72वां भजन भी शीर्षक में उसके नाम से अंकित है, जिसमें इतनी सारी बातें कही गई हैं जो उस पर बिलकुल भी लागू नहीं हो सकतीं, परन्तु जो प्रभु मसीह पर ऐसी स्पष्ट उपयुक्तता के साथ लागू होती हैं, जिससे यह पूर्णतः प्रकट हो जाता है कि एक में आकार किसी रीति से छाया के रूप में दिखाया गया है, परन्तु दूसरे में सत्य स्वयं प्रस्तुत किया गया है। क्योंकि यह ज्ञात है कि सुलैमान का राज्य किन सीमाओं के भीतर घिरा हुआ था; और तौभी उस भजन में, अन्य बातों की तो बात ही नहीं, हम पढ़ते हैं, "उसका प्रभुत्व समुद्र से समुद्र तक, और महानद से पृथ्वी की छोर तक होगा,"[407] जो हम मसीह में पूरा होते देखते हैं। सच तो यह है कि उस ने अपने राज्य का आरम्भ उस नदी से लिया जहां यूहन्ना बपतिस्मा देता था; क्योंकि, उसके द्वारा दिखाए जाने पर, वह चेलों द्वारा स्वीकार किया जाने लगा, जो उसे न केवल गुरु, वरन् प्रभु भी कहते थे।
न ही यह किसी और कारण से हुआ था कि, जब उसका पिता दाऊद अभी जीवित था, तब सुलैमान ने राज्य करना आरम्भ किया, जो उनके किसी अन्य राजा के साथ नहीं हुआ, सिवाय इसके कि इससे भी यह स्पष्ट रूप से प्रकट हो सके कि यह वह स्वयं न था जिसके विषय में यह भविष्यवाणी, जो पहले उसके पिता से कही गई थी, संकेत करती थी, जब उस ने कहा, "और यों होगा कि जब तेरे दिन पूरे हो जाएंगे, और तू अपने पितरों के साथ सो जाएगा, तब मैं तेरे वंश को, जो तेरे ही गर्भ से उत्पन्न होगा, उठाऊंगा, और मैं उसका राज्य स्थिर करूंगा।" तो फिर, इस आगे के कथन के कारण, "वह मेरे लिये एक भवन बनाएगा," यह कैसे सोचा जाए कि इस सुलैमान की भविष्यवाणी की गई है, और इसके विपरीत इस पहले के कथन के कारण यह क्यों न समझा जाए, "जब तेरे दिन पूरे हो जाएंगे, और तू अपने पितरों के साथ सो जाएगा, मैं तेरे बाद तेरे वंश को उठाऊंगा," कि एक अन्य शान्तिप्रिय जन की प्रतिज्ञा की गई है, जिसके विषय में यह भविष्यवाणी की गई है कि वह उठाया जाएगा, दाऊद की मृत्यु से पहले नहीं, जैसा वह उठाया गया था, वरन् उसके बाद? क्योंकि यीशु मसीह के आने से पहले जितना भी समय का अन्तर रहा हो, निःसन्देह यह राजा दाऊद की मृत्यु के बाद ही था, जिससे उसकी यह प्रतिज्ञा की गई थी, कि उसे आना आवश्यक था, जो परमेश्वर का भवन बनाए, काठ और पत्थर का नहीं, वरन् मनुष्यों का, जैसा हम आनन्दित होते हैं कि वह बनाता है। क्योंकि इस भवन के लिये, अर्थात् विश्वासियों के लिये, प्रेरित कहता है, "परमेश्वर का मन्दिर पवित्र है, और वह मन्दिर तुम हो।"[408]
9. मसीह के विषय की भविष्यवाणी उस में किस प्रकार समान है जो
इस कारण 89वें भजन में भी, जिसका शीर्षक है, "एतान इस्राएली की ओर से अपने लिये एक उपदेश," दाऊद राजा से की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं का उल्लेख किया गया है, और वहां कुछ बातें उन बातों के समान जोड़ी गई हैं जो शमूएल की पुस्तक में पाई जाती हैं, जैसे यह, "मैं ने अपने सेवक दाऊद से शपथ खाई है कि मैं उसके वंश को सदा के लिये स्थिर करूंगा।"[409] और फिर, "तब तू ने दर्शन में अपने पुत्रों से कहा, और कहा, मैं ने एक शक्तिशाली जन पर सहायता रखी है, और अपनी प्रजा में से एक चुने हुए जन को बड़ा किया है। मैं ने अपने सेवक दाऊद को पाया है, और अपने पवित्र तेल से मैं ने उसका अभिषेक किया है। क्योंकि मेरा हाथ उसकी सहायता करेगा, और मेरी बांह उसे बलवन्त करेगी। शत्रु उस पर प्रबल न होगा, और अधर्म का पुत्र फिर उसे हानि न पहुंचाएगा। और मैं उसके शत्रुओं को उसके साम्हने से मार गिराऊंगा, और जो उससे बैर रखते हैं उन्हें मैं भगा दूंगा। और मेरी सच्चाई और मेरी करुणा उसके साथ रहेगी, और मेरे नाम से उसका सींग बड़ा किया जाएगा। मैं उसका हाथ समुद्र में भी, और उसका दाहिना हाथ नदियों में रखूंगा। वह मुझे पुकारेगा, तू मेरा पिता, मेरा परमेश्वर, और मेरे उद्धार का सहायक है। मैं उसे अपना पहलौठा भी बनाऊंगा, पृथ्वी के राजाओं में सर्वोच्च। मैं अपनी करुणा उसके लिये सदा-सर्वदा बनाए रखूंगा, और मेरी वाचा उसके साथ विश्वासयोग्य (स्थिर) रहेगी। मैं उसके वंश को भी सदा-सर्वदा के लिये स्थिर करूंगा, और उसकी राजगद्दी को आकाश के दिनों के समान।"[410] जिन शब्दों को, जब ठीक रीति से समझा जाए, तो सब प्रभु यीशु मसीह के विषय में समझे जाते हैं, दाऊद के नाम के अन्तर्गत, उस सेवक के रूप के कारण, जिसे उस ही मध्यस्थ ने[411] दाऊद के वंश की कुमारी से धारण किया।[412] क्योंकि तुरन्त ही उसकी सन्तान के पापों के विषय में कुछ कहा गया है, जैसा शमूएल की पुस्तक में लिखा गया है, और जिसे सुलैमान के विषय में समझ लेना अधिक सहज है। क्योंकि वहां, अर्थात् शमूएल की पुस्तक में, वह कहता है, "और यदि वह अधर्म करे, तो मैं उसे मनुष्यों के दण्ड से, और मनुष्य की सन्तानों के कोड़ों से ताड़ना दूंगा; परन्तु मैं अपनी करुणा उससे न लूंगा,"[413] जिसमें कोड़ों का अर्थ है सुधार के प्रहार। इसी कारण वह कथन है, "मेरे अभिषिक्तों को मत छूओ।"[414] क्योंकि उसका और क्या अर्थ है यदि यह नहीं, कि उन्हें हानि न पहुंचाओ? परन्तु भजन में, जब दाऊद के विषय में बोलते हुए, वह वहां भी उसी प्रकार की कोई बात कहता है। "यदि उसकी सन्तान," वह कहता है, "मेरी व्यवस्था को त्याग दे, और मेरे नियमों में न चले; यदि वे मेरी धार्मिकता को अपवित्र करें, और मेरी आज्ञाओं को न मानें; तो मैं उनके अधर्मों को दण्ड से, और उनके अपराधों को कोड़ों से देखूंगा: परन्तु मैं अपनी करुणा उसकी ओर से व्यर्थ न करूंगा।"[415] उस ने "उनकी ओर से" नहीं कहा, यद्यपि वह उसकी सन्तान के विषय में बोल रहा था, स्वयं उसके विषय में नहीं; वरन् उस ने "उसकी ओर से" कहा, जिसका अर्थ, यदि ठीक रीति से समझा जाए, तो वही है। क्योंकि स्वयं मसीह के विषय में, जो कलीसिया का सिर है, कोई भी पाप नहीं पाया जा सकता था जिसे मानवीय सुधार के द्वारा परमेश्वर की ओर से रोका जाना आवश्यक होता, जबकि करुणा फिर भी बनी रहती; परन्तु वे उसकी देह और अंगों में पाए जाते हैं, जो उसकी प्रजा है। इसलिये शमूएल की पुस्तक में कहा गया है, "उसका अधर्म," परन्तु भजन में, "उसकी सन्तान का," जिससे हम समझ सकें कि जो उसकी देह के विषय में कहा गया है वह किसी रीति से स्वयं उसके विषय में कहा गया है। इसी कारण भी, जब शाऊल ने उसकी देह को, अर्थात् उसकी विश्वास करनेवाली प्रजा को, सताया, तो वह स्वयं स्वर्ग से कहता है, "शाऊल, शाऊल, तू मुझे क्यों सताता है?"[416] तब भजन के आगे के शब्दों में वह कहता है, "न तो मैं अपनी सच्चाई में हानि पहुंचाऊंगा, न अपनी वाचा को अपवित्र करूंगा, और जो बातें मेरे मुख से निकलती हैं उन्हें मैं अमान्य न करूंगा। एक बार मैं ने अपनी पवित्रता की शपथ खाई है, यदि मैं दाऊद से झूठ बोलूं,"[417]—अर्थात्, मैं किसी भी रीति से दाऊद से झूठ न बोलूंगा; क्योंकि शास्त्र इस प्रकार बोलने का अभ्यस्त है। परन्तु वह क्या है जिसमें वह झूठ न बोलेगा, यह वह आगे कहता है, "उसका वंश सदा बना रहेगा, और उसकी राजगद्दी मेरे साम्हने सूर्य के समान, और चन्द्रमा के समान सदा के लिये पूर्ण, और स्वर्ग में एक विश्वासयोग्य गवाह के समान होगी।"[418]
10. पृथ्वी के यरूशलेम के राज्य में हुए कार्य परमेश्वर की उन प्रतिज्ञाओं से कितने भिन्न हैं, जिससे यह समझा जाए कि प्रतिज्ञा की सच्चाई दूसरे राजा और राज्य की महिमा से सम्बन्धित है
ऐसा न समझा जाए कि इतने दृढ़ता से कही और पुष्टि की गई प्रतिज्ञा सुलैमान में पूरी हो गई, जैसे उसने आशा की हो और न पाया हो, इसलिए वह कहता है, "परन्तु हे यहोवा, तू ने उसे तज दिया है, और तुच्छ जाना है।"[419] यह बात सचमुच सुलैमान के राज्य के विषय में उसके वंशजों में हुई, यहाँ तक कि पृथ्वी के यरूशलेम का, जो उस राज्य की राजधानी थी, विनाश हुआ, और विशेष रूप से उस मन्दिर का भी नाश हुआ जो सुलैमान ने बनवाया था। परन्तु इस कारण परमेश्वर को अपनी प्रतिज्ञा के विरुद्ध कार्य करने वाला न समझा जाए, इसलिए वह तुरन्त आगे कहता है, "तू ने अपने मसीह को विलम्ब में डाल दिया है।"[420] इसलिए यदि प्रभु का मसीह विलम्बित है, तो वह न तो सुलैमान है, और न स्वयं दाऊद है। क्योंकि यद्यपि वे सब राजा जो उस रहस्यमय अभिषेक से पवित्र किए गए थे, उसके अभिषिक्त कहलाते हैं—न केवल राजा दाऊद से लेकर आगे, वरन उस शाऊल से भी जो उस प्रजा का पहला अभिषिक्त राजा था, और स्वयं दाऊद भी उसे प्रभु का अभिषिक्त कहता था—तौभी एक सच्चा मसीह था, जिसका रूप वे भविष्यद्वाणी के अभिषेक द्वारा धारण करते थे; और मनुष्यों की धारणा के अनुसार, जो यह समझते थे कि वह दाऊद में या सुलैमान में आ चुका है, वह बहुत विलम्बित था, परन्तु परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार उसे अपने ही समय में आना था। इस भजन का आगे का भाग यह बताता है कि जब तक वह विलम्बित रहा, तब तक पृथ्वी के यरूशलेम के राज्य का—जहाँ यह आशा की जाती थी कि वह निश्चय राज्य करेगा—क्या हाल होने वाला था: "तू ने अपने दास की वाचा को व्यर्थ कर दिया है; तू ने पृथ्वी पर उसके पवित्रस्थान को अपवित्र किया है। तू ने उसकी सब दीवारें गिरा दी हैं; तू ने उसके गढ़ों को भय में डाल दिया है। मार्ग से जाने वाले सब उसे लूटते हैं; वह अपने पड़ोसियों के लिए निन्दा का विषय बन गया है। तू ने उसके शत्रुओं का दाहिना हाथ ऊँचा किया है; तू ने उसके सब शत्रुओं को आनन्दित किया है। तू ने उसकी तलवार की सहायता को हटा दिया है, और युद्ध में उसकी सहायता नहीं की। तू ने उसे शुद्धता से गिरा दिया है; तू ने उसके सिंहासन को भूमि पर पटक दिया है। तू ने उसके सिंहासन के दिन घटा दिए हैं; तू ने उस पर लज्जा बरसाई है।"[421] ये सब बातें दासी यरूशलेम पर आ पड़ीं, जिसमें कुछ ऐसे भी राज्य करते थे जो स्वतंत्र स्त्री की सन्तान थे, और वे उस राज्य को अस्थायी भण्डारीपन में सम्भालते थे, परन्तु स्वर्गीय यरूशलेम के राज्य को, जिसकी सन्तान वे वास्तव में थे, सच्चे विश्वास में धारण करते थे, और सच्चे मसीह में आशा रखते थे। परन्तु ये बातें उस राज्य पर कैसे आ पड़ीं, यह उसके इतिहास से स्पष्ट हो जाता है यदि उसे पढ़ा जाए।
11. परमेश्वर की प्रजा के उस सत्त्व के विषय में, जो देह धारण करने के द्वारा मसीह में है, जिसे ही अपने प्राण को अधोलोक से छुड़ाने का सामर्थ्य था
परन्तु ये बातें भविष्यद्वाणी करने के बाद भविष्यद्वक्ता परमेश्वर से प्रार्थना करने लगता है; तौभी वह प्रार्थना भी भविष्यद्वाणी ही है: "हे यहोवा, तू अन्त तक कब तक मुँह फेरे रहेगा?"[422] "तेरा मुख" यह समझा जाता है, जैसा अन्यत्र कहा गया है, "तू कब तक अपना मुख मुझसे फेरे रहेगा?"[423] इसी कारण कुछ प्रतियों में यहाँ "फेरे रहेगा" के स्थान पर "फेरेगा" है; यद्यपि यह भी समझा जा सकता है, "तू अपनी उस करुणा को फेर देता है, जिसकी प्रतिज्ञा तू ने दाऊद से की थी।" परन्तु जब वह कहता है, "अन्त तक," तो इसका और क्या अर्थ है, सिवाय अन्त तक ही के? इस अन्त से वह अन्तिम समय समझा जाना चाहिए, जब वह जाति भी मसीह यीशु पर विश्वास करेगी, और इस अन्त से पहले वह सब कुछ पूरा होना है जिसका उसने अभी शोक के साथ विलाप किया है। इसी कारण यहाँ यह भी जोड़ा गया है, "तेरा क्रोध आग के समान भड़केगा। स्मरण कर कि मेरा सत्त्व क्या है।"[424] इसे स्वयं यीशु के, अर्थात अपनी प्रजा के सत्त्व के, विषय में समझने से बढ़कर और कुछ नहीं समझा जा सकता, जिसकी प्रकृति की उसकी देह है। "क्योंकि," वह कहता है, "तू ने मनुष्यों के सब पुत्रों को व्यर्थ नहीं बनाया है।"[425] क्योंकि यदि मनुष्य का वह एक पुत्र इस्राएल का सत्त्व न होता, जिस मनुष्य के पुत्र के द्वारा मनुष्यों के बहुत से पुत्र स्वतंत्र किए जाने थे, तो मनुष्यों के सब पुत्र पूर्णतः व्यर्थ ही बनाए गए होते। परन्तु अब सचमुच सारी मानवजाति प्रथम मनुष्य के पाप के कारण सत्य से व्यर्थता में जा पड़ी है; इस कारण एक अन्य भजन में कहा गया है, "मनुष्य व्यर्थता के समान है: उसके दिन छाया के समान बीत जाते हैं;"[426] तौभी परमेश्वर ने मनुष्यों के सब पुत्रों को व्यर्थ नहीं बनाया, क्योंकि वह मध्यस्थ यीशु के द्वारा बहुतों को व्यर्थता से मुक्त करता है; और जिन्हें उसने छुड़ाए जाने के लिए पहले से नहीं जाना, उन्हें भी उसने सम्पूर्ण बुद्धिसंगत सृष्टि की उस अत्यन्त सुन्दर और अत्यन्त न्यायपूर्ण व्यवस्था में पूर्णतः व्यर्थ नहीं बनाया, वरन उन लोगों के उपयोग के लिए जो छुड़ाए जाने थे, और दो नगरों की परस्पर तुलना करने के लिए बनाया। इसके बाद यह कहा गया है, "कौन ऐसा मनुष्य है जो जीवित रहेगा और मृत्यु को न देखेगा? क्या वह अपने प्राण को अधोलोक के हाथ से छीन लेगा?"[427] यह और कौन है सिवाय दाऊद के वंश से इस्राएल के उस सत्त्व, अर्थात मसीह यीशु के, जिसके विषय प्रेरित कहता है, कि "वह मृतकों में से जी उठकर अब नहीं मरता, और मृत्यु का उस पर फिर अधिकार नहीं रहेगा?"[428] क्योंकि वह इस प्रकार जीवित रहेगा और मृत्यु को न देखेगा, कि तौभी वह मर चुका होगा; परन्तु उसने अपने प्राण को अधोलोक के हाथ से छुड़ा लिया होगा, जहाँ वह कुछ लोगों को अधोलोक की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए उतरा था; और उसने उसे उस सामर्थ्य के द्वारा छुड़ाया, जिसके विषय वह सुसमाचार में कहता है, "मुझे अपना प्राण देने का अधिकार है, और उसे फिर लेने का भी अधिकार है।"[429]
12. जब वह भजन में कहता है, "हे यहोवा, तेरी प्राचीन करुणाएँ कहाँ हैं?" इत्यादि, तो यह प्रतिज्ञाओं के लिए की गई प्रार्थना किस व्यक्ति की समझी जानी चाहिए
परन्तु इस भजन का बाकी भाग इस प्रकार है: "हे यहोवा, तेरी प्राचीन करुणाएँ कहाँ हैं, जिनकी शपथ तू ने अपने सत्य में दाऊद से खाई थी? हे यहोवा, अपने दासों की उस निन्दा को स्मरण कर, जिसे मैं अपनी छाती में बहुत सी जातियों की ओर से उठाए हुए हूँ; जिससे तेरे शत्रुओं ने, हे यहोवा, निन्दा की है, जिससे उन्होंने तेरे मसीह के परिवर्तन की निन्दा की है।"[430] अब यह बहुत उचित रीति से पूछा जा सकता है कि क्या यह उन इस्राएलियों के व्यक्तित्व में कहा गया है जो चाहते थे कि दाऊद से की गई प्रतिज्ञा उनमें पूरी हो; या फिर उन मसीहियों के, जो देह के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार इस्राएली हैं।[431] यह निश्चय ही एतान के समय में कहा या लिखा गया था, जिसके नाम से इस भजन का शीर्षक मिलता है, और वह समय दाऊद के राज्यकाल का ही समय था; इसलिए यह न कहा जाता, "हे यहोवा, तेरी प्राचीन करुणाएँ कहाँ हैं, जिनकी तू ने अपने सत्य में दाऊद से शपथ खाई?" यदि भविष्यद्वक्ता ने उन लोगों का व्यक्तित्व न धारण किया होता जो बहुत बाद में आने वाले थे, जिनके लिए वह समय, जब ये बातें दाऊद से प्रतिज्ञा की गई थीं, प्राचीन था। परन्तु इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है, कि बहुत सी जातियों ने, जब उन्होंने मसीहियों को सताया, उन्हें मसीह के दुःखभोग की निन्दा से ताना दिया, जिसे पवित्रशास्त्र उसका परिवर्तन कहता है, क्योंकि मरने के द्वारा वह अमर बनाया गया है। इस वाक्य के अनुसार मसीह के परिवर्तन को इस्राएलियों द्वारा भी निन्दित समझा जा सकता है, क्योंकि जब उन्होंने आशा की थी कि वह उनका ही होगा, तब वह जातियों का उद्धारकर्ता बना दिया गया; और नये नियम के द्वारा उस पर विश्वास करने वाली बहुत सी जातियाँ अब उनकी, जो पुराने में बने रहते हैं, इस बात से निन्दा करती हैं: इसलिए कहा गया है, "हे यहोवा, अपने दासों की निन्दा को स्मरण कर;" क्योंकि प्रभु के उन्हें न भूलने से, वरन उन पर करुणा करने से, वे भी इस निन्दा के बाद विश्वास करने वाले हैं। परन्तु जो मैंने पहले रखा है, वही अर्थ मुझे सबसे उपयुक्त प्रतीत होता है। क्योंकि मसीह के उन शत्रुओं के लिए, जिन्हें इस बात से ताना दिया जाता है कि मसीह ने उन्हें छोड़कर अन्यजातियों की ओर मुख फेर लिया,[432] यह वाक्य—"हे यहोवा, अपने दासों की निन्दा को स्मरण कर"—असंगत रूप से लगाया जाता है, क्योंकि ऐसे यहूदी परमेश्वर के दास नहीं कहलाने चाहिए; परन्तु ये शब्द उन पर लागू होते हैं जो, यदि मसीह के नाम के कारण सताव में बड़ी लज्जा सहते, यह स्मरण कर सकते थे कि दाऊद के वंश से एक उन्नत राज्य की प्रतिज्ञा की गई थी, और उसकी इच्छा में, निराश होकर नहीं वरन माँगते, ढूँढ़ते, खटखटाते हुए,[433] कह सकते थे, "हे यहोवा, तेरी प्राचीन करुणाएँ कहाँ हैं, जिनकी तू ने अपने सत्य में दाऊद से शपथ खाई? हे यहोवा, अपने दासों की उस निन्दा को स्मरण कर, जिसे मैं बहुत सी जातियों की ओर से अपनी छाती में उठाए हुए हूँ;" अर्थात, जिसे मैंने अपने भीतर धीरजपूर्वक सहा है। "कि तेरे शत्रुओं ने, हे यहोवा, निन्दा की है, जिससे उन्होंने तेरे मसीह के परिवर्तन की निन्दा की है," और उसे परिवर्तन नहीं वरन विनाश मानते हुए।[434] परन्तु "हे यहोवा, स्मरण कर" का और क्या अर्थ है, सिवाय इसके कि तू करुणा करेगा, और मेरे धीरजपूर्वक सही गई लज्जा का प्रतिफल मुझे उस श्रेष्ठता से देगा, जिसकी तू ने अपने सत्य में दाऊद से शपथ खाई? परन्तु यदि हम इन शब्दों को यहूदियों पर लागू करें, तो परमेश्वर के वे दास, जो पृथ्वी के यरूशलेम की विजय के समय, यीशु मसीह के मनुष्य की रीति से जन्म लेने से पहले, बँधुआई में ले जाए गए थे, ऐसी बातें कह सकते थे, मसीह के परिवर्तन को समझते हुए, क्योंकि निश्चय ही उसके द्वारा एक पृथ्वी की और शारीरिक समृद्धि की नहीं, जैसी राजा सुलैमान के थोड़े वर्षों में दिखाई दी थी, वरन एक स्वर्गीय और आत्मिक समृद्धि की अपेक्षा की जानी थी; और जब जातियाँ, जो तब अविश्वास के कारण इससे अनजान थीं, परमेश्वर की प्रजा के बँधुआ होने पर आनन्दित होकर उनका अपमान करती थीं, तो यह और क्या था सिवाय इसके कि जो मसीह के परिवर्तन को समझते थे, उन्हीं को अनजाने में मसीह के परिवर्तन से ताना दिया जाए? और इसलिए जब यह भजन समाप्त होता है, तो आगे जो कहा गया है, "यहोवा की आशीष सदा बनी रहे, आमीन, आमीन," वह स्वर्गीय यरूशलेम से सम्बन्धित परमेश्वर की सारी प्रजा के लिए पूर्णतः उपयुक्त है, चाहे उन बातों के लिए जो नये नियम के प्रकट होने से पहले पुराने नियम में छिपी थीं, या उनके लिए जो अब नये नियम में प्रकट होकर स्पष्ट रूप से मसीह से सम्बन्धित समझी जाती हैं। क्योंकि दाऊद के वंश में यहोवा की आशीष किसी विशेष समय से सम्बन्धित नहीं है, जैसी सुलैमान के दिनों में दिखाई दी थी, वरन सदा के लिए आशा की जानी है, जिस अति निश्चित आशा में कहा गया है, "आमीन, आमीन;" क्योंकि इस शब्द की पुनरावृत्ति उस आशा की पुष्टि है। इसलिए दाऊद इसे समझते हुए, राजाओं की दूसरी पुस्तक में, उस अंश में जिससे हम इस भजन की ओर मुड़ गए थे,[435] कहता है, "तू ने अपने दास के घराने के विषय में बहुत काल तक की बात भी कही है।"[436] इसलिए फिर थोड़ा आगे वह कहता है, "अब आरम्भ कर, और अपने दास के घराने को सदा के लिए आशीष दे," इत्यादि, क्योंकि तब वह पुत्र जन्म लेने वाला था जिससे उसकी वंशावली मसीह तक चलनी थी, जिसके द्वारा उसका घराना अनन्त होना था, और वह परमेश्वर का घराना भी होना था। क्योंकि दाऊद के वंश के कारण वह दाऊद का घराना कहलाता है; परन्तु वही परमेश्वर के मन्दिर के कारण परमेश्वर का घराना भी कहलाता है, जो पत्थरों का नहीं वरन मनुष्यों का बना है, जहाँ प्रजा सदा के लिए अपने परमेश्वर के साथ और उसमें निवास करेगी, और परमेश्वर अपनी प्रजा के साथ और उसमें निवास करेगा, जिससे परमेश्वर अपनी प्रजा को भर दे, और प्रजा अपने परमेश्वर से भर जाए, जब परमेश्वर सब में सब कुछ होगा, वह स्वयं शान्ति में उनका प्रतिफल होगा जो युद्ध में उनका बल है। इसलिए जब नातान के शब्दों में कहा गया है, "और यहोवा तुझे बताएगा कि तू उसके लिए कैसा भवन बनाएगा,"[437] तो बाद में दाऊद के शब्दों में कहा गया है, "क्योंकि तू, हे सर्वशक्तिमान यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर, ने अपने दास का कान खोला है, यह कहते हुए, मैं तेरे लिए एक घराना बनाऊँगा।"[438] क्योंकि यह घर हमारे द्वारा अच्छा जीवन जीने से, और परमेश्वर के द्वारा हमें अच्छा जीवन जीने में सहायता देने से, दोनों प्रकार बनता है; क्योंकि "यदि यहोवा घर न बनाए, तो उसके बनाने वाले व्यर्थ परिश्रम करते हैं।"[439] और जब इस घर का अन्तिम समर्पण होगा, तब परमेश्वर यहाँ नातान के द्वारा जो कहता है, वह पूरा होगा, "और मैं अपनी प्रजा इस्राएल के लिए एक स्थान ठहराऊँगा, और उसे रोपूँगा, और वह अलग बसेगा, और फिर व्याकुल नहीं होगा; और अधर्म का पुत्र उसे फिर दबाएगा नहीं, जैसा आदि से, उन दिनों से जब मैंने अपनी प्रजा इस्राएल पर न्यायियों को ठहराया था।"[440]
13. क्या इस प्रतिज्ञा की गई शान्ति की सच्चाई सुलैमान के अधीन बीते हुए उन समयों को दी जा सकती है
जो कोई इस लोक में और इस पृथ्वी पर इतने बड़े भले की आशा करता है, उसकी बुद्धि मूर्खता ही है। क्या कोई यह सोच सकता है कि यह सुलैमान के राज्यकाल की शान्ति में पूरा हो गया? पवित्रशास्त्र निश्चय ही उस शान्ति की उत्तम प्रशंसा उस आने वाली शान्ति की छाया के रूप में करता है। परन्तु इस धारणा का सजगता से विरोध किया जाना चाहिए, क्योंकि "और अधर्म का पुत्र उसे फिर न दबाएगा" कहे जाने के बाद तुरन्त यह जोड़ा गया है, "जैसा आदि से, उन दिनों से जब मैंने अपनी प्रजा इस्राएल पर न्यायियों को ठहराया था।"[441] क्योंकि उस प्रजा पर न्यायी उस समय से ठहराए गए थे जब उन्होंने प्रतिज्ञा का देश पाया, इससे पहले कि वहाँ राजा होने लगे थे। और निश्चय ही अधर्म के पुत्र ने, अर्थात विदेशी शत्रु ने, उन कालखण्डों में उसे दबाया जिनमें हम पढ़ते हैं कि शान्ति और युद्ध बदलते रहे; और उस काल में सुलैमान से भी अधिक लम्बी शान्ति के समय पाए जाते हैं, जिसने चालीस वर्ष राज्य किया। क्योंकि उस न्यायी के अधीन, जो एहूद कहलाता है, अस्सी वर्ष की शान्ति रही।[442] इसलिए यह हमसे दूर रहे कि हम यह विश्वास करें कि इस प्रतिज्ञा में सुलैमान के समयों की भविष्यवाणी की गई है, और तो और किसी अन्य राजा के समयों की भी नहीं। क्योंकि उनमें से किसी अन्य ने उतनी बड़ी शान्ति में राज्य नहीं किया जितना उसने किया; और न ही वह जाति कभी उस राज्य को इस प्रकार सम्भाल पाई कि उसे शत्रुओं से पराजित होने की कोई चिन्ता न रही हो: क्योंकि मानवीय बातों की अत्यन्त परिवर्तनशीलता में किसी भी प्रजा को इतनी बड़ी सुरक्षा कभी नहीं दी जाती कि वह इस जीवन के विरुद्ध आक्रमणों से न डरे। इसलिए इस प्रतिज्ञा की गई शान्तिपूर्ण और सुरक्षित निवासस्थली अनन्त है, और अधिकारपूर्वक अनन्त काल के लिए स्वतंत्र माता यरूशलेम की है, जहाँ इस्राएल की सच्ची प्रजा होगी: क्योंकि इस नाम का अर्थ है "परमेश्वर को देखना"; जिस प्रतिफल की अभिलाषा में इस दुःखभरी यात्रा में विश्वास के द्वारा भक्तिमय जीवन बिताया जाना है।[443]
14. भजनों के लेखन में दाऊद की चिन्ता के विषय में
इसलिए युगों के बीतने में परमेश्वर के नगर की प्रगति में, दाऊद ने पहले पृथ्वी के यरूशलेम में उस आने वाली वस्तु की छाया के रूप में राज्य किया। अब दाऊद गीतों में निपुण पुरुष था, जो संगीत के सामंजस्य को अत्यन्त प्रिय मानता था, किन्तु किसी अशिष्ट आनन्द से नहीं, वरन विश्वासयुक्त स्वभाव से, और उसके द्वारा उस अपने परमेश्वर की, जो सच्चा परमेश्वर है, एक बड़ी वस्तु के रहस्यमय निरूपण द्वारा सेवा करता था। क्योंकि विभिन्न स्वरों की सामंजस्यपूर्ण विविधता में बुद्धिसंगत और सुव्यवस्थित एकसंगति एक सुव्यवस्थित नगर की सुसंहत एकता का सूचक है। फिर उसकी लगभग सारी भविष्यद्वाणी भजनों में है, जिनमें से एक सौ पचास वे हैं जो उस पुस्तक में समाहित हैं जिसे हम भजन संहिता कहते हैं, जिनके विषय में कुछ लोग यह मानते हैं कि केवल वे ही दाऊद द्वारा रचे गए हैं जिन पर उसका नाम लिखा है। परन्तु कुछ ऐसे भी हैं जो सोचते हैं कि उनमें से कोई भी उसके द्वारा नहीं रचा गया सिवाय उनके जिन पर "दाऊद का" लिखा है; परन्तु जिनके शीर्षक में "दाऊद के लिए" है, वे दूसरों के द्वारा रचे गए हैं जिन्होंने उसका व्यक्तित्व धारण किया। यह धारणा स्वयं उद्धारकर्ता के वचन से सुसमाचार में खण्डित होती है, जब वह कहता है कि दाऊद ने स्वयं आत्मा के द्वारा कहा कि मसीह उसका प्रभु है; क्योंकि 110वाँ भजन इस प्रकार आरम्भ होता है, "यहोवा ने मेरे प्रभु से कहा, तू मेरे दाहिने हाथ बैठ, जब तक मैं तेरे शत्रुओं को तेरे पावों की चौकी न बना दूँ।"[444] और सचमुच वह भजन, अन्य बहुतों के समान, अपने शीर्षक में "दाऊद का" नहीं, वरन "दाऊद के लिए" रखता है। परन्तु मुझे वे लोग अधिक विश्वसनीय धारणा रखने वाले प्रतीत होते हैं, जो इन सभी एक सौ पचास भजनों की रचना का श्रेय उसे देते हैं, और यह मानते हैं कि उसने उनमें से कुछ के आगे अन्य पुरुषों के नाम भी रखे, जो विषय से सम्बन्धित किसी बात का पूर्वाभास कराते थे, परन्तु बाकी के शीर्षकों में किसी भी पुरुष का नाम न रखना चुना, जैसा परमेश्वर ने उसे इस विविधता के प्रबन्धन में प्रेरित किया, जो यद्यपि अस्पष्ट है, तौभी निरर्थक नहीं है। और न ही किसी को इस बात से यह अविश्वास करने के लिए प्रेरित होना चाहिए, कि उस पुस्तक में कुछ भजनों के शीर्षकों में राजा दाऊद के समय के बहुत बाद जीवित रहने वाले कुछ भविष्यद्वक्ताओं के नाम पढ़े जाते हैं, और कि वहाँ कही गई बातें ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे उन्हीं के द्वारा कही गई हों। और भविष्यद्वाणी की आत्मा राजा दाऊद पर, जब वह भविष्यद्वाणी करता था, उन आने वाले भविष्यद्वक्ताओं के इन्हीं नामों को प्रकट करने में भी असमर्थ नहीं थी, जिससे वह भविष्यद्वाणी की रीति से कुछ ऐसा गा सके जो उनके व्यक्तित्व के अनुकूल हो; जैसा एक निश्चित भविष्यद्वक्ता पर यह प्रकट किया गया था कि राजा योशिय्याह तीन सौ वर्ष से भी अधिक समय बाद उठेगा और राज्य करेगा, जिसने उसके नाम के साथ उसके भविष्य के कार्यों की भी भविष्यवाणी की।[445]
15. क्या भजनों में मसीह और उसकी कलीसिया के विषय में की गई सब भविष्यद्वाणियों को इस ग्रन्थ के पाठ में लिया जाना चाहिए
और अब मैं देखता हूँ कि मुझसे यह आशा की जा सकती है कि मैं इस पुस्तक के इस भाग में यह खोलकर बताऊँ कि दाऊद ने भजनों में प्रभु यीशु मसीह या उसकी कलीसिया के विषय में क्या भविष्यद्वाणी की होगी। परन्तु यद्यपि मैंने एक स्थान पर पहले से ऐसा किया है, तौभी मैं वैसा करने से, जैसी वह आशा माँगती प्रतीत होती है, विषय की अधिकता के कारण, न कि उसकी कमी के कारण, रुक जाता हूँ। क्योंकि अतिविस्तार से बचने की आवश्यकता मुझे सब कुछ लिखने से रोकती है; तौभी मुझे डर है कि यदि मैं कुछ का चुनाव करूँ, तो उन बहुतों को, जो ये बातें जानते हैं, ऐसा प्रतीत होगा कि मैंने अधिक आवश्यक बातों को छोड़ दिया है। इसके अतिरिक्त, जो प्रमाण प्रस्तुत किया जाता है, उसे सम्पूर्ण भजन के प्रसंग से समर्थन मिलना चाहिए, जिससे कम से कम, यदि सब कुछ उसका समर्थन न करे, तो भी कुछ भी उसके विरुद्ध न हो; ऐसा न हो कि हम उन केन्तो (खिचड़ी काव्य) की रीति के अनुसार, अपनी इच्छित वस्तु के लिए, किसी महान काव्य से जैसे पद इकट्ठे करते हुए प्रतीत हों, जो अन्ततः उस विषय के बारे में नहीं वरन किसी अन्य और सर्वथा भिन्न विषय के बारे में लिखे गए पाए जाएँ। परन्तु इससे पहले कि प्रत्येक भजन में यह दिखाया जा सके, उसका सम्पूर्ण भाग समझाया जाना चाहिए; और वह कितना बड़ा कार्य होगा, यह दूसरों के ग्रन्थ, और हमारे स्वयं के भी, जिनमें हमने यह किया है, भली भाँति दर्शाते हैं। इसलिए जो चाहे, या जो कर सके, वह उन ग्रन्थों को पढ़े, और वह जान लेगा कि दाऊद ने, जो एक ही समय में राजा और भविष्यद्वक्ता था, मसीह और उसकी कलीसिया के विषय में, अर्थात उस राजा और उस नगर के विषय में जिसे उसने बनाया है, कितनी और कैसी बड़ी बातों की भविष्यद्वाणी की है।
16. मसीह और कलीसिया से सम्बन्धित उन बातों के विषय में, जो खुले रूप से या लाक्षणिक रीति से कही गई हैं, उस
क्योंकि किसी भी विषय के बारे में जो भी सीधी और स्पष्ट भविष्यद्वाणी की गई बातें हों, यह आवश्यक है कि उनके साथ लाक्षणिक बातें भी मिली हुई हों; जो, विशेष रूप से मन्दबुद्धि लोगों के कारण, अधिक विद्वानों पर उन्हें स्पष्ट करने और समझाने का श्रमसाध्य कार्य डाल देती हैं। उनमें से कुछ तो, कहे जाते ही, प्रथम दृष्टि में ही मसीह और कलीसिया को दिखा देते हैं, यद्यपि उनमें कुछ बातें जो कम बोधगम्य हैं, अवकाश के समय समझाई जानी शेष रहती हैं। इसका एक उदाहरण हमें उसी भजन संहिता में मिलता है: "मेरे हृदय से एक उत्तम विषय उभर आया: मैं राजा के लिए अपने वचन कहता हूँ। मेरी जीभ शीघ्रता से लिखने वाले लेखक की लेखनी है। तेरा रूप मनुष्यों के पुत्रों से भी सुन्दर है; तेरे होंठों पर अनुग्रह उंडेला गया है: इसलिए परमेश्वर ने तुझे सदा के लिए आशीष दी है। हे परम पराक्रमी, अपनी तलवार को अपनी जांघ पर बाँध। अपनी उत्तमता और अपनी सुन्दरता के साथ आगे बढ़, समृद्धिपूर्वक चल, और अपने सत्य, नम्रता, और धर्म के कारण राज्य कर; और तेरा दाहिना हाथ तुझे आश्चर्यजनक रीति से आगे ले चलेगा। तेरे तीखे बाण अत्यन्त सामर्थी हैं। राजा के शत्रुओं के हृदय में, प्रजा तेरे अधीन गिर पड़ेगी। हे परमेश्वर, तेरा सिंहासन युगानुयुग है: तेरे राज्य का राजदण्ड न्याय का राजदण्ड है। तू ने धर्म को प्रिय जाना, और अधर्म से बैर रखा है: इसलिए परमेश्वर, तेरे परमेश्वर, ने तुझे तेरे साथियों से बढ़कर उल्लास के तेल से अभिषेक किया है। तेरे वस्त्रों से गन्धरस, और सुगन्धित द्रव्य, और तेजपात, हाथीदाँत के भवनों से, महकते हैं: जिनसे राजाओं की बेटियों ने तेरे सम्मान में तुझे आनन्दित किया है।"[446] ऐसा कौन है, कितना भी मन्दबुद्धि क्यों न हो, जो यहाँ उस मसीह को न पहचान ले जिसका हम प्रचार करते हैं, और जिस पर हम विश्वास करते हैं, यदि वह सुने कि वह परमेश्वर है, जिसका सिंहासन युगानुयुग है, और कि वह परमेश्वर के द्वारा अभिषिक्त है, जैसे परमेश्वर सचमुच अभिषेक करता है, किसी दृश्य वस्तु से नहीं, वरन एक आत्मिक और बोधगम्य अभिषेक से? क्योंकि ऐसा कौन है जो इस धर्म में इतना अनजान हो, या इसकी दूर-दूर तक फैली हुई प्रसिद्धि के प्रति इतना बहरा हो, कि यह न जाने कि मसीह का नाम इस अभिषेक से, अर्थात इस अभिषिक्त होने से, पड़ा है? परन्तु जब यह स्वीकार कर लिया जाता है कि यह राजा मसीह है, तो हर वह व्यक्ति, जो सत्य, नम्रता, और धर्म के कारण राज्य करने वाले के अधीन हो चुका है, अपने अवकाश में इन अन्य बातों की जाँच करे जो यहाँ लाक्षणिक रीति से कही गई हैं: कि उसका रूप मनुष्यों के पुत्रों से किस प्रकार सुन्दर है, एक ऐसी सुन्दरता से जिसे उतना ही अधिक प्रेम और सराहा जाना है जितनी वह कम शारीरिक है; और उसकी तलवार, उसके बाण, और उस प्रकार की अन्य वस्तुएँ क्या हो सकती हैं, जो सीधे रूप से नहीं वरन लाक्षणिक रूप से रखी गई हैं।
तब वह उसकी कलीसिया को देखे, जो अपने इतने महान पति से आत्मिक विवाह और दिव्य प्रेम में जुड़ी हुई है, जिसके विषय में आगे इन शब्दों में कहा गया है, "रानी तेरे दाहिने हाथ, सोने से कढ़े हुए वस्त्र पहने, विविधता से घिरी हुई खड़ी थी। हे बेटी, सुन, और देख, और अपना कान लगा; अपने लोगों को, और अपने पिता के घर को भी भूल जा। क्योंकि राजा ने तेरी सुन्दरता की बड़ी लालसा की है; क्योंकि वह तेरा प्रभु परमेश्वर है। और सोर की बेटियाँ भेंट लेकर उसकी आराधना करेंगी; प्रजा के धनवान तेरे मुख से विनती करेंगे। राजा की बेटी की सारी शोभा भीतर है, स्वर्ण की झालरों में, विविधता से घिरी हुई। कुँवारियाँ उसके पीछे राजा के पास लाई जाएँगी: उसकी पड़ोसिनें तेरे पास लाई जाएँगी। वे आनन्द और उल्लास के साथ लाई जाएँगी: वे राजा के मन्दिर में पहुँचाई जाएँगी। तेरे पितरों के स्थान पर तेरे पुत्र होंगे: तू उन्हें सारी पृथ्वी पर प्रधान ठहराएगी। वे हर पीढ़ी और वंश में तेरे नाम का स्मरण रखेंगे। इसलिए प्रजा सदा के लिए, वरन युगानुयुग तेरा गुणानुवाद करेगी।"[447] मैं नहीं समझता कि कोई इतना मूर्ख होगा कि यह विश्वास करे कि यहाँ किसी दीन स्त्री की प्रशंसा और वर्णन किया गया है, अर्थात उस पत्नी का जो उसकी है, जिससे कहा गया है, "हे परमेश्वर, तेरा सिंहासन युगानुयुग है: तेरे राज्य का राजदण्ड न्याय का राजदण्ड है। तू ने धर्म को प्रिय जाना और अधर्म से बैर रखा है: इसलिए परमेश्वर, तेरे परमेश्वर, ने तुझे तेरे साथियों से बढ़कर उल्लास के तेल से अभिषेक किया है;"[448] अर्थात, स्पष्ट रूप से, मसीहियों से बढ़कर मसीह। क्योंकि ये उसके साथी हैं, जिनकी एकता और एकसंगति से सब जातियों में वह रानी बनती है, जैसा उसके विषय में एक अन्य भजन में कहा गया है, "महाराजा का नगर।"[449] यही आत्मिक रूप से सिय्योन है, जिस नाम का लातीनी में अर्थ है speculatio (दर्शन); क्योंकि वह आने वाले जगत के महान भले को दूर से निहारती है, क्योंकि उसका ध्यान उसी ओर लगा हुआ है। इसी प्रकार वह आत्मिक रूप से यरूशलेम भी है, जिसके विषय में हम पहले से बहुत सी बातें कह चुके हैं। उसकी शत्रु शैतान का नगर है, बाबेल, जिसका अर्थ है "गड़बड़ी।" तौभी इस बाबेल से यह रानी सब जातियों में नया जन्म पाकर स्वतंत्र की जाती है, और सबसे बुरे राजा से सबसे उत्तम राजा की ओर जाती है,—अर्थात शैतान से मसीह की ओर। इसलिए उससे कहा गया है, "अपने लोगों और अपने पिता के घर को भूल जा।" इस अधर्मी नगर का वे भी एक अंश हैं जो केवल देह से इस्राएली हैं, विश्वास से नहीं, और वे इस महाराजा के स्वयं, और उसकी रानी के भी, शत्रु हैं। क्योंकि मसीह, उनके पास आकर और उनके द्वारा मार डाला जाकर, इससे भी अधिक उन दूसरों का राजा बन गया, जिन्हें उसने देह में नहीं देखा। इसी कारण हमारा राजा स्वयं एक निश्चित भजन की भविष्यद्वाणी के द्वारा कहता है, "तू मुझे प्रजा के विरोधों से छुड़ाएगा; तू मुझे जातियों का प्रधान बनाएगा। जिस प्रजा को मैं नहीं जानता था, उसने मेरी सेवा की: कान से सुनते ही उसने मेरी बात मानी।"[450] इसलिए जातियों की यह प्रजा, जिसे मसीह ने अपनी शारीरिक उपस्थिति में नहीं जाना, तौभी उस मसीह पर विश्वास कर लिया जो उसे सुनाया गया; जिससे यह उचित रीति से उसके विषय में कहा जा सके, "कान से सुनते ही उसने मेरी बात मानी," क्योंकि "विश्वास सुनने से आता है।"[451] यह प्रजा, मैं कहता हूँ, उन लोगों में जुड़कर जो देह और विश्वास दोनों से सच्चे इस्राएली हैं, परमेश्वर का नगर है, जिसने देह के अनुसार स्वयं मसीह को जन्म दिया, क्योंकि वह केवल इन्हीं इस्राएलियों में था। क्योंकि उससे ही कुँवारी मरियम आई, जिसमें मसीह ने देह धारण की जिससे वह मनुष्य बने। उस नगर के विषय में एक अन्य भजन कहता है, "माता सिय्योन, ऐसा मनुष्य कहेगा, और वह मनुष्य उसमें बनाया गया है, और सर्वोच्च ने स्वयं उसकी स्थापना की है।"[452] यह सर्वोच्च और कौन है, सिवाय परमेश्वर के? और इस प्रकार मसीह, जो परमेश्वर है, इससे पहले कि वह मरियम के द्वारा उस नगर में मनुष्य बना, उसने कुलपिताओं और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा स्वयं उसकी स्थापना की। इसलिए जैसा इतने पहले भविष्यद्वाणी में इस रानी, परमेश्वर के नगर, से कहा गया था, जिसे हम पहले से पूरा होते देख सकते हैं, "तेरे पितरों के स्थान पर तुझे पुत्र दिए गए हैं; तू उन्हें सारी पृथ्वी पर प्रधान बनाएगी;"[453] इसी प्रकार उसके पुत्रों में से सचमुच उसके पितर [प्रधान] भी सारी पृथ्वी में स्थापित हो जाते हैं, जब प्रजा उसके पास इकट्ठी होकर सदा और युगानुयुग अनन्त स्तुति की स्वीकृति के साथ उसे अंगीकार करती है। निःसन्देह, जो भी व्याख्या यहाँ रूपकात्मक भाषा में कुछ अस्पष्ट रीति से कही गई बातों पर की जाए, उसे इन अत्यन्त स्पष्ट बातों के साथ सहमत होना चाहिए।
17. उन बातों के विषय में जो उस
जैसा उस भजन में भी है जहाँ मसीह को याजक के रूप में अत्यन्त खुले रूप से घोषित किया गया है, जैसे यहाँ वह राजा के रूप में है, "यहोवा ने मेरे प्रभु से कहा, तू मेरे दाहिने हाथ बैठ, जब तक मैं तेरे शत्रुओं को तेरे पावों की चौकी न बना दूँ।"[454] कि मसीह परमेश्वर पिता के दाहिने हाथ बैठा है, यह विश्वास किया जाता है, देखा नहीं जाता; कि उसके शत्रु भी उसके पावों के नीचे रखे गए हैं, यह अभी तक दिखाई नहीं देता; यह हो रहा है, [इसलिए] यह अन्त में दिखाई देगा: हाँ, यह अब विश्वास किया जाता है, आगे यह देखा जाएगा। परन्तु जो आगे कहा गया है, "यहोवा सिय्योन से तेरी सामर्थ्य का राजदण्ड भेजेगा, और तू अपने शत्रुओं के बीच राज्य कर,"[455] यह इतना स्पष्ट है, कि इसका इन्कार करना केवल अविश्वास और भूल ही नहीं, वरन साफ निर्लज्जता प्रकट करेगा। और शत्रुओं को भी निश्चय ही यह मान लेना पड़ता है कि सिय्योन से मसीह की व्यवस्था, जिसे हम सुसमाचार कहते हैं, भेजी गई है, और उसे उसकी सामर्थ्य के राजदण्ड के रूप में स्वीकार करना पड़ता है। परन्तु कि वह अपने शत्रुओं के बीच राज्य करता है, इसकी गवाही वे ही शत्रु देते हैं जिनके बीच वह राज्य करता है, दाँत पीसते और घुलते जाते हुए, और उसके विरुद्ध कुछ भी करने का सामर्थ्य न रखते हुए। फिर वह जो थोड़ा आगे कहता है, "यहोवा ने शपथ खाई है और पश्चाताप नहीं करेगा,"[456] इन शब्दों से वह यह सूचित करता है कि जो वह आगे जोड़ता है वह अपरिवर्तनीय है, "तू सदा के लिए मलिकिसिदक की रीति पर याजक है,"[457] तो किसे यह सन्देह करने की अनुमति है कि यह किसके विषय में कहा गया है, जबकि अब कहीं भी हारून की रीति पर याजकपद और बलिदान नहीं है, और सब जगह मनुष्य मसीह याजक के अधीन भेंट चढ़ाते हैं, जो मलिकिसिदक ने तब दिखाया था जब उसने अब्राहम को आशीष दी थी? इसलिए इन स्पष्ट बातों के आधार पर, जब सही रीति से समझा जाए, उस भजन में कुछ अधिक अस्पष्ट रीति से कही गई बातों को समझा जाना चाहिए, और हम पहले से अपने साधारण उपदेशों में यह बता चुके हैं कि इन बातों को कैसे सही रीति से समझा जाए। इसी प्रकार उस भजन में भी, जहाँ मसीह भविष्यद्वाणी के द्वारा अपने दुःखभोग की नम्रता को व्यक्त करता है, यह कहते हुए, "उन्होंने मेरे हाथ और पाँव छेद दिए हैं; उन्होंने मेरी सब हड्डियाँ गिन ली हैं। वे देखते और घूरते रहे।"[458] इन शब्दों से उसका निश्चय ही यह अर्थ था कि उसकी देह क्रूस पर फैलाई गई थी, कीलों के आर-पार ठोंके जाने से हाथ और पाँव छिदे और बेधे गए थे, और कि उसने इस प्रकार स्वयं को देखने और घूरने वालों के लिए एक तमाशा बना लिया था। और वह आगे कहता है, "उन्होंने मेरे वस्त्र आपस में बाँट लिए, और मेरे वस्त्र पर चिट्ठी डाली।"[459] यह भविष्यद्वाणी किस प्रकार पूरी हुई, यह सुसमाचार का इतिहास बताता है। तब वहाँ कम खुले रूप से कही गई अन्य बातें भी सही रीति से समझी जाती हैं जब वे इतनी बड़ी स्पष्टता से चमकने वाली बातों के साथ सहमत होती हैं; विशेष रूप से इसलिए कि जिन बातों को हम बीती हुई नहीं वरन वर्तमान मानकर देखते हैं, वे भी सारे जगत के द्वारा देखी जाती हैं, अब उसी रीति से प्रकट होती हुई जैसी वे इस भजन में इतने पहले भविष्यद्वाणी की गई पढ़ी जाती हैं। क्योंकि वहाँ थोड़ा आगे कहा गया है, "पृथ्वी के सब सिवाने स्मरण करेंगे, और यहोवा की ओर फिरेंगे, और जातियों के सब कुल उसके सामने दण्डवत करेंगे; क्योंकि राज्य यहोवा का है, और वही जातियों पर राज्य करेगा।"
18. उस
उसके पुनरुत्थान के विषय में भी भजनों की वाणियाँ किसी प्रकार मौन नहीं हैं। क्योंकि तीसरे भजन में उसके व्यक्तित्व में और क्या गाया गया है, "मैं लेट गया और सो गया, [और] जाग उठा, क्योंकि यहोवा मुझे सम्भालेगा?"[460] क्या कोई इतना मूर्ख होगा जो यह विश्वास करे कि भविष्यद्वक्ता ने हमें यह किसी बड़ी बात के रूप में दिखाना चाहा कि वह सोया और उठ बैठा, यदि वह सोना मृत्यु न होता, और वह जागना पुनरुत्थान न होता, जिसे इस प्रकार मसीह के विषय में भविष्यद्वाणी की जानी थी? क्योंकि 41वें भजन में भी यह कहीं अधिक स्पष्टता से दिखाया गया है, जहाँ मध्यस्थ के व्यक्तित्व में, अपनी सामान्य रीति के अनुसार, वे बातें बीती हुई मानकर वर्णित की गई हैं जो अभी आने वाली मानकर भविष्यद्वाणी की गई थीं, क्योंकि जो बातें अभी आने वाली थीं, वे परमेश्वर की पूर्वनियति और पूर्वज्ञान में इस प्रकार थीं जैसे वे हो चुकी हों, क्योंकि वे निश्चित थीं। वह कहता है, "मेरे शत्रु मेरे विषय बुरा बोलते हैं; वह कब मरेगा, और उसका नाम कब मिटेगा? और यदि वह मुझसे मिलने आया, तो उसके हृदय ने व्यर्थ बातें कहीं: उसने अपने लिए अधर्म इकट्ठा किया। वह बाहर गया और तुरन्त सब कुछ प्रकट कर दिया। मेरे विरुद्ध मेरे सब शत्रु एक साथ बुदबुदाते हैं: वे मेरे विरुद्ध बुराई की योजना बनाते हैं। उन्होंने मेरे विरुद्ध एक अन्यायपूर्ण बात की योजना बनाई है। क्या जो सोता है वह फिर न उठेगा?"[461] ये शब्द निश्चय ही यहाँ इस प्रकार रखे गए हैं कि उसे यही कहते हुए समझा जाए, जैसे उसने कहा हो, क्या जो मर गया वह फिर जीवन न पाएगा? पहले के शब्द स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि उसके शत्रुओं ने उसकी मृत्यु का विचार और योजना बनाई थी, और कि यह उसके द्वारा किया गया जो मिलने आया और धोखा देने के लिए बाहर गया। परन्तु यहाँ किसे यहूदा का ध्यान नहीं आता, जो उसका चेला होने से उसका धोखेबाज़ बन गया? इसलिए क्योंकि वे वह करने वाले थे जिसकी उन्होंने योजना बनाई थी—अर्थात वे उसे मार डालने वाले थे—इसलिए वह, उन्हें यह दिखाने के लिए कि वे व्यर्थ द्वेष के साथ उसे मार डालने वाले थे जो फिर उठेगा, इस पद को इस प्रकार जोड़ता है, जैसे उसने कहा हो, तुम कौन सी व्यर्थ बात कर रहे हो? जो तुम्हारा अपराध होगा वही मेरा सोना होगा। "क्या जो सोता है वह फिर न उठेगा?" और तौभी वह आगे के पदों में यह सूचित करता है कि वे इतना बड़ा अधर्म बिना दण्ड पाए न करेंगे, यह कहते हुए, "हाँ, मेरी शान्ति का वह पुरुष जिस पर मैंने भरोसा किया, जिसने मेरी रोटी खाई, उसने मेरे विरुद्ध अपनी पैनी बढ़ाई है;"[462] अर्थात, उसने मुझे पावों तले रौंदा है। "परन्तु तू," वह कहता है, "हे यहोवा, मुझ पर करुणा कर, और मुझे उठा, कि मैं उन्हें उनका बदला दे सकूँ।"[463] अब इसका इन्कार कौन कर सकता है, जो यहूदियों को, मसीह के दुःखभोग और पुनरुत्थान के बाद, युद्ध की मार-काट और विनाश के द्वारा अपने निवासों से पूर्णतः उखाड़े जाते हुए देखता है? क्योंकि उनके द्वारा मार डाला जाकर, वह फिर जी उठा है, और इस बीच अस्थायी अनुशासन के द्वारा उन्हें बदला दे चुका है, सिवाय उनके लिए जो सुधरते नहीं, जिनके लिए वह उस समय के लिए रखता है जब वह जीवितों और मृतकों का न्याय करेगा।[464] क्योंकि प्रभु यीशु ने स्वयं, प्रेरितों को उसी पुरुष को अपने धोखेबाज़ के रूप में दिखाते हुए, इस भजन के इसी पद को उद्धृत किया, और कहा कि यह अपने में पूरा हुआ है: "जिसने मेरी रोटी खाई, उसने मेरे विरुद्ध अपनी पैनी बढ़ाई।" परन्तु वह जो कहता है, "जिस पर मैंने भरोसा किया," वह सिर पर नहीं वरन देह पर लागू होता है। क्योंकि उद्धारकर्ता स्वयं उस व्यक्ति से अनजान नहीं था, जिसके विषय वह पहले से ही कह चुका था, "तुम में से एक शैतान है।"[465] परन्तु वह अपने अंगों का व्यक्तित्व धारण करने का, और उनके विषय में जो कहा जाना चाहिए उसे स्वयं पर लागू करने का, अभ्यस्त है, क्योंकि सिर और देह एक ही मसीह है;[466] इसी से सुसमाचार में वह कथन है, "मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को दिया।"[467] इसे समझाते हुए वह कहता है, "क्योंकि तुम ने मेरे छोटों में से एक के साथ यह किया, तुम ने मेरे साथ किया।"[468] इसलिए उसने यह कहा कि उसने भरोसा किया था, क्योंकि उसके चेलों ने तब यहूदा के विषय में भरोसा किया था; क्योंकि वह प्रेरितों में गिना जाता था।[469]
परन्तु यहूदी यह आशा नहीं करते कि जिस मसीह की वे प्रतीक्षा करते हैं वह मरेगा; इसलिये वे यह नहीं मानते कि हमारा मसीह वही है जिसकी घोषणा व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं ने की थी, बल्कि वे अपने लिये किसी और की, जो मृत्यु के दुःख से मुक्त हो, कल्पना कर लेते हैं। इस कारण, आश्चर्यजनक खोखलेपन और अन्धेपन के साथ, वे यह दावा करते हैं कि हमने जो शब्द रखे हैं उनका अर्थ मृत्यु और पुनरुत्थान नहीं, वरन् निद्रा और फिर से जागना है। परन्तु 16वाँ भजन भी उनसे यह पुकार कर कहता है, "इस कारण मेरा हृदय आनन्दित है, और मेरी जीभ ने जयजयकार किया है; इसके अतिरिक्त मेरा शरीर भी आशा में विश्राम करेगा: क्योंकि तू मेरे प्राण को अधोलोक में न छोड़ेगा; और न अपने पवित्र जन को क्षय देखने देगा।"[470] कौन, उसके सिवा जो तीसरे दिन फिर जी उठा, यह कह सकता था कि उसका शरीर इस आशा में विश्राम कर चुका था; कि उसका प्राण, अधोलोक में न छोड़ा जाकर, वरन् शीघ्र ही उसमें लौटकर, उसे फिर जीवित करे, कि वह उस रीति से क्षय न पाए जैसे शव क्षय पाते हैं—यह बात वे दाऊद भविष्यद्वक्ता और राजा के विषय में किसी रीति से नहीं कह सकते? 68वाँ भजन भी पुकार कर कहता है, "हमारा परमेश्वर उद्धार का परमेश्वर है: और यहोवा के द्वारा भी बाहर जाना मृत्यु ही से हुआ।"[471] इससे बढ़कर और क्या खुलकर कहा जा सकता है? क्योंकि उद्धार का परमेश्वर प्रभु यीशु ही है, जिसका अर्थ है उद्धारकर्ता, या आरोग्य करनेवाला। इसी कारण यह नाम तब दिया गया जब उसके कुँवारी से जन्म लेने से पहिले यह कहा गया था: "तू एक पुत्र को जन्म देगी, और उसका नाम यीशु रखेगी; क्योंकि वही अपने लोगों को उनके पापों से बचाएगा।"[472] क्योंकि उसका रक्त उनके पापों की क्षमा के लिये बहाया जाना था, इसलिये उसके लिये इस जीवन से मृत्यु के अतिरिक्त और कोई निकास होना उचित नहीं था। इस कारण, जब यह कहा गया था, "हमारा परमेश्वर उद्धार का परमेश्वर है," तब तुरन्त यह जोड़ा गया, "यहोवा के द्वारा भी बाहर जाना मृत्यु ही से हुआ," यह दिखाने के लिये कि हमें उसकी मृत्यु के द्वारा ही बचाया जाना था। परन्तु यह कथन आश्चर्यजनक है, "यहोवा के द्वारा भी," जैसे यह कहा गया हो, मनुष्यों का जीवन ऐसा है कि प्रभु स्वयं भी मृत्यु के अतिरिक्त और किसी रीति से इस जीवन से बाहर नहीं जा सकते थे।
19. के विषय में
परन्तु जब यहूदी इस भविष्यद्वाणी की गवाहियों को, जो इतनी स्पष्ट हैं, और जो घटनाओं के द्वारा इतने खुले और निश्चित रूप से पूरी हुई हैं, कुछ भी मानने को तैयार नहीं होते, तब निश्चय ही उनमें वह बात पूरी होती है जो उस भजन में लिखी है जो यहाँ आगे आता है। क्योंकि जब वे बातें जो उसके दुःखभोग से सम्बन्ध रखती हैं वहाँ भी मसीह के व्यक्तित्व में भविष्यद्वाणी के रूप में कही गई हैं, तो वही बात उल्लेख की गई है जो सुसमाचार में प्रकट की गई है: "उन्होंने मेरे भोजन के लिये पित्त दिया; और मेरी प्यास में मुझे पीने को सिरका दिया।"[473] और जैसे अपने लिये इस रीति से दिये गये ऐसे भोज और स्वादिष्ट भोजन के बाद, वह तुरन्त ये शब्द लाता है: "उनकी मेज़ उनके आगे फन्दा, और दण्ड, और ठोकर बन जाए: उनकी आँखें अन्धी हो जाएँ कि वे देख न सकें, और उनकी पीठ सदा झुकी रहे,"[474] आदि। ये बातें कामना के रूप में नहीं कही गई हैं, वरन् कामना के भविष्यद्वाणी-रूप के अन्तर्गत पूर्वबताई गई हैं। तो फिर क्या आश्चर्य, यदि जिनकी आँखें अन्धी हो गई हैं कि वे देख न सकें, वे इन स्पष्ट बातों को नहीं देखते? क्या आश्चर्य, यदि जिनकी पीठ सदा झुकी रहती है कि वे पार्थिव वस्तुओं में गिरे-पड़े रहें, वे स्वर्गीय वस्तुओं की ओर ऊँचा नहीं देखते? क्योंकि शरीर से लिये गये ये शब्द मन के दोषों को सूचित करते हैं। भजनों के विषय में, अर्थात् राजा दाऊद की भविष्यद्वाणी के विषय में, जो कुछ कहा गया है वह पर्याप्त हो, कि हम कुछ सीमा के भीतर रहें। परन्तु जो पाठक इन सब बातों को पहले से जानते थे वे हमें क्षमा करें; और जो शायद अधिक प्रबल प्रमाणों को वे जानते हैं या सोचते हैं कि मैंने अनदेखा कर छोड़ दिया है, उनके विषय में वे शिकायत न करें।
20. दाऊद के राज्य और उसकी योग्यता के विषय में; और उसके पुत्र सुलैमान के, तथा उस मसीह से सम्बन्धित भविष्यद्वाणी के विषय में जो उन पुस्तकों में मिलती है जो उसकी लिखी पुस्तकों के साथ जोड़ी गई हैं, या उनमें जो निःसंदेह उसकी ही हैं
दाऊद ने, इस प्रकार, पार्थिव यरूशलेम में राज्य किया, जो स्वर्गीय यरूशलेम का पुत्र था, और जिसकी दिव्य साक्षी द्वारा बड़ी प्रशंसा हुई; क्योंकि उसके दोष भी उसके पश्चाताप की परम कल्याणकारी दीनता के द्वारा उसकी बड़ी भक्ति से ढक जाते हैं, ऐसा कि वह पूरी तरह उन्हीं में से एक है जिनके विषय में उसने स्वयं कहा है, "धन्य हैं वे जिनके अधर्म क्षमा किए गए, और जिनके पाप ढांपे गए।"[475] उसके बाद उसका पुत्र सुलैमान उसी सारी प्रजा पर राज्य करने लगा, जिसने, जैसा पहले कहा गया, अपने पिता के जीवित रहते ही राज्य करना आरम्भ कर दिया था। इस मनुष्य ने अच्छे आरम्भ के बाद बुरा अन्त पाया। क्योंकि सचमुच "समृद्धि, जो बुद्धिमानों के मन को भी घिसकर थका देती है,"[476] उसे उस बुद्धि से भी अधिक हानि पहुँचाई, जिसका उससे लाभ हुआ था—एक ऐसी बुद्धि जो आज तक प्रसिद्ध है और आगे भी रहेगी, और उस समय भी दूर-दूर तक सराही जाती थी। वह भी अपनी पुस्तकों में भविष्यद्वाणी करता हुआ पाया जाता है, जिनमें से तीन प्रामाणिक अधिकार की मानी जाती हैं—नीतिवचन, सभोपदेशक, और श्रेष्ठगीत। परन्तु सुलैमान के नाम अन्य दो पुस्तकें भी मानी जाती रही हैं, जिनमें से एक को बुद्धि ग्रन्थ, और दूसरी को सिराक ग्रन्थ कहा जाता है, कुछ शैली की समानता के कारण—परन्तु अधिक विद्वानों को इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे उसकी नहीं हैं; तथापि प्राचीन कलीसिया ने, विशेषकर पश्चिमी कलीसिया ने, उन्हें अधिकार में स्वीकार किया—उनमें से एक में, जिसे सुलैमान का बुद्धि ग्रन्थ कहा जाता है, मसीह का दुःखभोग सबसे अधिक खुलकर भविष्यद्वाणी किया गया है। क्योंकि सचमुच उसके भक्तिहीन हत्यारों के ये वचन उद्धृत किए गए हैं: "आओ, हम धर्मी पुरुष के लिये घात लगाएँ, क्योंकि वह हमें अप्रिय है, और हमारे कामों के विरुद्ध है; और वह हमें व्यवस्था के हमारे उल्लंघनों के लिये उलाहना देता है, और हमारी शिक्षा के उल्लंघनों की लज्जा हमें जताता है। वह परमेश्वर के ज्ञान का होने का दावा करता है, और अपने आप को परमेश्वर का पुत्र कहता है। वह हमारे विचारों को उलाहना देने के लिये बना है। हमारे लिये उसे देखना भी भारी है; क्योंकि उसका जीवन अन्य मनुष्यों से भिन्न है, और उसकी चालचलन अलग है। हम उसकी दृष्टि में झूठे ठहराए गए हैं; और वह हमारी चालों से ऐसे दूर रहता है जैसे गंदगी से। वह धर्मियों के अन्तिम भाग की प्रशंसा करता है; और घमंड करता है कि उसका पिता परमेश्वर है। तो आओ, हम देखें कि उसकी बातें सच हैं या नहीं; और आओ, हम परखें कि उसके साथ क्या होगा, तो हम जान लेंगे कि उसका अन्त क्या होगा। क्योंकि यदि धर्मी परमेश्वर का पुत्र है, तो वह उसके लिये उत्तरदायी होगा, और उसे उनके हाथ से छुड़ाएगा जो उसके विरुद्ध हैं। आओ, हम उसे अपमान और यातना के द्वारा प्रश्न में डालें, कि हम उसकी गम्भीरता को जान सकें, और उसकी सहनशीलता को परख सकें। आओ, हम उसे सबसे लज्जाजनक मृत्यु का दण्ड दें; क्योंकि अपनी ही बातों के अनुसार उसका मान होगा। उन्होंने यही सोचा, और भूल में पड़े; क्योंकि उनकी अपनी दुष्टता ने उन्हें पूरी तरह अन्धा कर दिया था।"[477] परन्तु सिराक ग्रन्थ में जातियों के भविष्य के विश्वास की इस रीति भविष्यद्वाणी की गई है: "हम पर दया कर, हे परमेश्वर, हे सबके अधिपति, और अपना भय सारी जातियों पर भेज: अपना हाथ पराई जातियों पर उठा, और उन्हें अपनी सामर्थ्य दिखा। जैसे तू उनके सामने हम में पवित्र ठहराया गया, वैसे ही तू हमारे सामने उनमें भी पवित्र ठहराया जा, और वे भी तुझे मान लें, जैसे हमने भी तुझे मान लिया है; क्योंकि तेरे सिवा कोई परमेश्वर नहीं, हे प्रभु।"[478] यह भविष्यद्वाणी हम एक कामना और प्रार्थना के रूप में यीशु मसीह के द्वारा पूरी हुई देखते हैं। परन्तु जो बातें यहूदियों के नियमग्रन्थ में नहीं लिखी हैं, उन्हें उनके विरोधों के विरुद्ध इतनी दृढ़ता से उद्धृत नहीं किया जा सकता।
परन्तु उन तीन पुस्तकों के विषय में जो स्पष्ट रूप से सुलैमान की हैं, और यहूदियों द्वारा प्रामाणिक मानी जाती हैं, यह दिखाना कि उनमें मसीह और कलीसिया से सम्बन्धित इस प्रकार की क्या-क्या बातें मिल सकती हैं, एक श्रमसाध्य विवेचन की माँग करता है, जिसमें अभी उतरने से यह कार्य अनावश्यक रूप से लम्बा हो जाएगा। तथापि नीतिवचन में जो हम भक्तिहीन पुरुषों को यह कहते हुए पढ़ते हैं, "आओ, हम धर्मी पुरुष को अन्याय से पृथ्वी में छिपा दें; वरन् आओ, हम उसे अधोलोक की भाँति जीवित ही निगल जाएँ, और पृथ्वी पर से उसकी स्मृति मिटा दें: आओ, हम उसकी बहुमूल्य संपत्ति ले लें,"[479] इतना अस्पष्ट नहीं है कि उसे श्रमसाध्य व्याख्या के बिना मसीह और उसकी सम्पत्ति कलीसिया के विषय में न समझा जा सके। सचमुच, दुष्ट किसानों के विषय में सुसमाचार का दृष्टान्त दिखाता है कि हमारे प्रभु यीशु ने स्वयं इसी के समान कुछ कहा था: "यह वारिस है; आओ, हम उसे मार डालें, और मीरास हमारी हो जाएगी।"[480] इसी रीति से इस्ी पुस्तक में वह अंश भी, जिसका हमने पहले ही स्पर्श किया है[481] जब हम उस बांझ स्त्री के विषय में बोल रहे थे जिसने सात को जन्म दिया, उसके कहे जाने के थोड़े ही समय बाद उन लोगों के द्वारा केवल मसीह और कलीसिया के विषय में समझा जाने लगा होगा जो जानते थे कि मसीह परमेश्वर की बुद्धि है। "बुद्धि ने अपना घर बनाया है, और उसने अपने सात खम्भे खड़े किए हैं; उसने अपने पशु बलि किए हैं, अपने दाखमधु को कटोरे में मिलाया है; उसने अपनी मेज़ भी सजाई है। उसने अपने सेवकों को उत्तम उद्घोष के साथ कटोरे की ओर बुलाने भेजा है, यह कहते हुए, जो कोई भोला हो, वह मेरी ओर फिरे। और निर्बुद्धि से उसने कहा है, आओ, मेरी रोटी खाओ, और वह दाखमधु पीओ जो मैंने तुम्हारे लिये मिलाया है।"[482] यहाँ हम निश्चय ही यह देखते हैं कि परमेश्वर की बुद्धि, अर्थात् पिता के साथ सह-अनन्त वचन, ने अपने लिये एक घर बनाया है, अर्थात् कुँवारी के गर्भ में एक मानवीय देह; और उसने अपने आप से कलीसिया को इस प्रकार जोड़ा है जैसे सिर से अंग जोड़े जाते हैं; उसने शहीदों को बलिपशुओं के समान मार डाला है; उसने मेज़ को दाखमधु और रोटी से सजाया है, जहाँ मलिकीसेदक की रीति पर याजकपद भी दिखाई देता है; और उसने भोले-भाले और निर्बुद्धियों को बुलाया है, क्योंकि, जैसा प्रेरित कहता है, "उसने संसार की निर्बल वस्तुओं को चुन लिया है, कि सामर्थी वस्तुओं को लज्जित करे।"[483] तथापि इन निर्बलों से वह आगे यह कहती है, "भोलेपन को छोड़ दो, कि तुम जीवित रहो; और प्रवीणता को खोजो, कि तुम्हें जीवन मिले।"[484] परन्तु इस मेज़ में सहभागी बनना ही जीवन पाने का आरम्भ है। क्योंकि जब वह एक और पुस्तक में, जिसे सभोपदेशक कहा जाता है, कहता है, "मनुष्य के लिये इससे बढ़कर और कोई भलाई नहीं, कि वह खाए और पीए,"[485] तो इससे अधिक विश्वसनीय रीति से और क्या समझा जा सकता है, सिवा इसके कि वह उस मेज़ की सहभागिता की बात कह रहा है, जिसे नए नियम का मध्यस्थ स्वयं, मलिकीसेदक की रीति पर याजक, अपने ही शरीर और रक्त से सजाता है? क्योंकि उस बलिदान ने पुराने नियम के उन सब बलिदानों का स्थान ले लिया है, जो आनेवाली वस्तु की छाया के रूप में चढ़ाए जाते थे; इसी कारण हम 40वें भजन में उसी मध्यस्थ की वाणी को पहचानते हैं जो भविष्यद्वाणी के द्वारा बोल रही है, "बलिदान और अर्घ तू ने नहीं चाहा; परन्तु एक देह तू ने मेरे लिये तैयार की है।"[486] क्योंकि इन सब बलिदानों और अर्घों के बदले, उसकी देह ही चढ़ाई जाती है, और उसमें सहभागी होनेवालों के लिये परोसी जाती है। और यह कि यह सभोपदेशक खाने-पीने के इस वाक्य में, जिसे वह बार-बार दोहराता है, और जिसकी वह बहुत प्रशंसा करता है, शारीरिक सुखों के स्वाद की बात नहीं करता, यह तब पर्याप्त स्पष्ट हो जाता है जब वह कहता है, "शोक के घर में जाना उत्तम है, बजाय भोज के घर में जाने से।"[487] और थोड़ी दूर आगे वह कहता है, "बुद्धिमान का मन शोक के घर में रहता है, और भोले का मन भोज के घर में।"[488] परन्तु मैं इस पुस्तक से उस वचन को उद्धृत करना अधिक उचित समझता हूँ जो दोनों नगरों से सम्बन्ध रखता है—एक शैतान का, दूसरा मसीह का—और उनके राजाओं से, शैतान और मसीह से: "हाय तुझ पर, हे देश," वह कहता है, "जब तेरा राजा एक युवक हो, और तेरे प्रधान भोर में खाते हों! धन्य है तू, हे देश, जब तेरा राजा कुलीनों का पुत्र हो, और तेरे प्रधान उचित समय पर, बल के साथ, और लज्जा के बिना खाते हों!"[489] उसने शैतान को युवक कहा है, उस मूर्खता और घमंड, और उतावलेपन और अनियंत्रण, तथा अन्य दोषों के कारण जो उस आयु में अधिक होते हैं; परन्तु मसीह कुलीनों का पुत्र है, अर्थात् पवित्र कुलपिताओं का, उन लोगों में से जो स्वतन्त्र नगर से सम्बन्ध रखते हैं, जिनसे उसने देह में जन्म लिया। उस नगर तथा अन्य नगरों के प्रधान भोर में खानेवाले हैं, अर्थात् उचित समय से पहले, क्योंकि वे उस समयानुकूल धन्यता की, जो आनेवाले संसार में सच्ची है, प्रतीक्षा नहीं करते, वरन् इस संसार की प्रसिद्धि से शीघ्र सुखी हो जाना चाहते हैं; परन्तु मसीह के नगर के प्रधान एक ऐसी धन्यता के समय की धीरजपूर्वक प्रतीक्षा करते हैं जो भरमानेवाली नहीं है। यह "बल के साथ, और लज्जा के बिना" इन शब्दों से प्रकट किया गया है, क्योंकि आशा उन्हें धोखा नहीं देती, जिसके विषय में प्रेरित कहता है, "परन्तु आशा लज्जित नहीं करती।"[490] एक भजन भी कहता है, "क्योंकि जो तुझ पर आशा रखते हैं वे लज्जित नहीं होंगे।"[491] परन्तु अब श्रेष्ठगीत पवित्र मनों का एक निश्चित आत्मिक सुख है, उस राजा और रानी-नगर के विवाह में, अर्थात् मसीह और कलीसिया के। परन्तु यह सुख अलंकारिक आवरणों में लपेटा गया है, कि दुल्हा और अधिक उत्कण्ठा से चाहा जाए, और और अधिक आनन्द के साथ प्रकट और अनावृत हो; जिससे इस्ी गीत में कहा गया है, "सिधाई ने तुझे आनन्दित किया है;"[492] और दुल्हिन, जो यह सुनती है, "प्रेम तेरे सुखों में है।"[493] हम बहुत सी बातों को इस कार्य को समाप्त करने की इच्छा में मौन रखकर छोड़ देते हैं।
21. सुलैमान के बाद के राजाओं के विषय में, यहूदा और इस्राएल दोनों में
इब्रियों के अन्य राजा, सुलैमान के बाद, चाहे यहूदा में हों चाहे इस्राएल में, अपने कुछ रहस्यमय शब्दों या कार्यों के द्वारा मसीह और कलीसिया से सम्बन्धित जो कुछ हो सकता था, उसकी भविष्यद्वाणी करते हुए मुश्किल से पाए जाते हैं; क्योंकि उस प्रजा के भाग इसी रीति से पुकारे जाते थे, जब सुलैमान के अपराध के कारण, उसके पुत्र रहूबियाम के समय से, जो राज्य में उसका उत्तराधिकारी हुआ, वह परमेश्वर के द्वारा दण्ड के रूप में विभाजित कर दिया गया। दस गोत्र, जिन्हें सुलैमान के सेवक यारोबियाम ने प्राप्त किया, जो शमरोन में राजा नियुक्त हुआ, विशेष रूप से इस्राएल कहलाए, यद्यपि यह पूरी प्रजा का ही नाम था; परन्तु दो गोत्र, अर्थात् यहूदा और बिन्यामीन, जो दाऊद के कारण, कि उसके वंश से राज्य पूरी तरह न छिन जाए, यरूशलेम नगर के अधीन रह गए, यहूदा कहलाए, क्योंकि यही वह गोत्र था जिससे दाऊद उत्पन्न हुआ था। परन्तु बिन्यामीन, वह दूसरा गोत्र जो, जैसा कहा गया, उसी राज्य से सम्बन्धित था, वही था जिससे दाऊद से पहले शाऊल उत्पन्न हुआ था। परन्तु ये दोनों गोत्र मिलकर, जैसा कहा गया, यहूदा कहलाए, और इस नाम से इस्राएल से अलग पहचाने गए, जो दस गोत्रों की अपने राजा के अधीन विशेष उपाधि थी। क्योंकि लेवी का गोत्र, क्योंकि वह याजकीय गोत्र था, राजाओं की नहीं वरन् परमेश्वर की सेवा से बँधा था, तेरहवाँ माना गया। क्योंकि यूसुफ़, इस्राएल के बारह पुत्रों में से एक, अन्यों के समान एक गोत्र नहीं बना, वरन् दो, एप्रैम और मनश्शे। तथापि लेवी का गोत्र भी यरूशलेम के राज्य से अधिक सम्बन्धित था, जहाँ परमेश्वर का वह मन्दिर था जिसकी वह सेवा करता था। प्रजा के विभाजन पर, इस प्रकार, रहूबियाम, सुलैमान का पुत्र, यरूशलेम में यहूदा के पहले राजा के रूप में राज्य करने लगा, और यारोबियाम, सुलैमान का सेवक, शमरोन में इस्राएल के राजा के रूप में। और जब रहूबियाम एक अत्याचारी की भाँति उस अलग हुए भाग को युद्ध से पीछा करना चाहता था, तब प्रजा को परमेश्वर के द्वारा अपने भाइयों से लड़ने से मना किया गया, जिसने उन्हें एक भविष्यद्वक्ता के द्वारा बताया कि यह उसने ही किया है; जिससे यह प्रकट हुआ कि इस विषय में न तो राजा का और न इस्राएल की प्रजा का कोई पाप था, वरन् यह परमेश्वर के दण्डदाता की सिद्ध की गई इच्छा थी। जब यह ज्ञात हुआ, तो दोनों भाग शान्तिपूर्वक स्थिर हो गए, क्योंकि जो विभाजन हुआ था वह धार्मिक नहीं, वरन् राजनैतिक था।
22. यारोबियाम के विषय में, जिसने मूर्तिपूजा की भक्तिहीनता से अपने अधीन प्रजा को अपवित्र कर दिया, जिसके बीच भी परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं को प्रेरित करना और बहुतों को मूर्तिपूजा के अपराध से बचाना बन्द नहीं किया
परन्तु इस्राएल का राजा यारोबियाम, विकृत मन से, परमेश्वर पर विश्वास न करते हुए, जिसे उसने राज्य देने और देने की प्रतिज्ञा में सच्चा पाया था, इस बात से डर गया कि यरूशलेम में परमेश्वर के मन्दिर में आने से, जहाँ, दिव्य व्यवस्था के अनुसार, उस सारी जाति को बलिदान चढ़ाने के लिये आना था, प्रजा उससे बहका ली जाएगी, और दाऊद के वंश की ओर, राजकीय बीज के रूप में, फिर लौट जाएगी; और उसने अपने राज्य में मूर्तिपूजा स्थापित कर दी, और भयानक भक्तिहीनता से प्रजा को छला, अपने साथ उन्हें मूर्तियों की उपासना में फँसाकर। तथापि परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उलाहना देना पूरी तरह बन्द नहीं किया, न केवल उस राजा को, वरन् उसके उत्तराधिकारियों और उसकी भक्तिहीनता का अनुकरण करनेवालों को, और प्रजा को भी। क्योंकि वहाँ बड़े और प्रसिद्ध भविष्यद्वक्ता एलिय्याह और उसका चेला एलीशा उठे, जिन्होंने भी बहुत से आश्चर्यकर्म किए। वहाँ भी, जब एलिय्याह ने कहा, "हे यहोवा, उन्होंने तेरे भविष्यद्वक्ताओं को घात किया है, उन्होंने तेरी वेदियों को गिरा दिया है; और मैं ही एक रह गया हूँ, और वे मेरे प्राण की खोज में हैं," यह उत्तर दिया गया कि वहाँ सात हज़ार पुरुष थे जिन्होंने बाल के आगे घुटने नहीं टेके थे।[494]
23. दोनों इब्री राज्यों की बदलती हुई स्थिति के विषय में, जब तक कि दोनों की प्रजा भिन्न-भिन्न समयों में बँधुआई में न ले जाई गई, यहूदा का बाद में अपने राज्य में बुलाया जाना, जो अन्ततः रोमियों के अधिकार में जा पड़ा
इसी रीति से यहूदा के राज्य में भी, जो यरूशलेम से सम्बन्धित था, उत्तरवर्ती राजाओं के समयों में भी भविष्यद्वक्ता कम नहीं हुए, जैसा परमेश्वर को उन्हें भेजना अच्छा लगा, चाहे जो आवश्यक था उसकी भविष्यवाणी के लिये, चाहे पाप के सुधार और धार्मिकता की शिक्षा के लिये;[495] क्योंकि वहाँ भी, यद्यपि इस्राएल से बहुत कम, ऐसे राजा उठे जिन्होंने अपनी भक्तिहीनताओं से परमेश्वर को बहुत ठेस पहुँचाई, और अपनी प्रजा के साथ, जो उनके ही समान थी, संतुलित कोड़ों से पीटे गए। वहाँ के भक्त राजाओं की योग्यताएँ सचमुच थोड़ी नहीं सराही जाती हैं। परन्तु हम पढ़ते हैं कि इस्राएल में राजा, कुछ अधिक, कुछ कम, परन्तु सब दुष्ट थे। इस्ीलिये प्रत्येक भाग, जैसा दिव्य विधान ने या तो ठहराया या अनुमति दी, समृद्धि से ऊँचा उठाया गया और विविध प्रकार की विपत्ति से दबाया गया; और वह न केवल विदेशी, वरन् एक दूसरे के साथ गृहयुद्धों से भी पीड़ित हुआ, इसलिये कि कुछ विद्यमान कारणों के द्वारा परमेश्वर की दया या क्रोध प्रकट हो सके; जब तक कि, उसके बढ़ते हुए क्रोध के द्वारा, वह सारी जाति विजयी कसदियों के द्वारा न केवल अपने निवास में उलट दी गई, वरन् अधिकतर अश्शूरियों के देशों में पहुँचाई गई—पहले, तेरह गोत्रों का वह भाग जो इस्राएल कहलाता था, परन्तु बाद में यहूदा भी, जब यरूशलेम और वह अत्यन्त प्रसिद्ध मन्दिर गिरा दिया गया—जिन देशों में वह सत्तर वर्ष तक बँधुआई में रही। उस समय के बाद वहाँ से भेजे जाने पर, उन्होंने गिराए गए मन्दिर को फिर बनाया। और यद्यपि बहुत से परदेशियों के देशों में ही रह गए, तथापि राज्य के आगे दो अलग भाग, भिन्न-भिन्न राजाओं के साथ, नहीं रहे, वरन् यरूशलेम में उन पर एक ही अधिपति था; और कुछ समयों पर, हर दिशा से, जहाँ भी वे थे, और जिस स्थान से भी वे सकते थे, वे सब परमेश्वर के मन्दिर में, जो वहाँ था, आते थे। तथापि उस समय भी वे विदेशी शत्रुओं और विजेताओं से रहित नहीं थे; वस्तुतः, मसीह ने उन्हें रोमियों के करदाता पाया।
24. उन भविष्यद्वक्ताओं के विषय में, जो या तो यहूदियों में अन्तिम थे, या जिनके विषय में सुसमाचार का इतिहास मसीह के जन्म के समय की बात करता है
परन्तु उस सारे समय में, जब से वे बाबेल से लौटे, मलाकी, हाग्गै, और जकर्याह के बाद, जिन्होंने तब भविष्यद्वाणी की, और एज्रा के बाद, उनके पास उद्धारकर्ता के आगमन के समय तक कोई भविष्यद्वक्ता नहीं था, सिवा एक और जकर्याह के, यूहन्ना के पिता, और उसकी पत्नी इलीशिबा के, जब मसीह का जन्म पहले से ही निकट था; और जब वह जन्म ले चुका था, वृद्ध शिमोन, और अन्ना विधवा, जो अब बहुत बूढ़ी थी; और अन्त में सबसे बढ़कर, यूहन्ना स्वयं, जो, एक युवक होते हुए, यह भविष्यद्वाणी नहीं कर रहा था कि मसीह, जो अब स्वयं युवक था, आनेवाला है, वरन् भविष्यसूचक ज्ञान के द्वारा उसे, अनजाने रहते हुए भी, दिखा रहा था; जिस कारण प्रभु स्वयं कहते हैं, "व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता यूहन्ना तक थे।"[496] परन्तु इन पाँचों की भविष्यद्वाणी हमें सुसमाचार में बताई गई है, जहाँ हमारे प्रभु की कुँवारी माता भी स्वयं यूहन्ना से पहले भविष्यद्वाणी करती हुई पाई जाती है। परन्तु उनकी इस भविष्यद्वाणी को दुष्ट यहूदी स्वीकार नहीं करते; परन्तु वे अनगिनत लोग जो उनसे सुसमाचार पर विश्वास लाए, इसे स्वीकार किया। क्योंकि तब सचमुच इस्राएल दो भागों में विभाजित हो गया, उस विभाजन से जिसकी अपरिवर्तनीय भविष्यद्वाणी शमूएल भविष्यद्वक्ता ने राजा शाऊल से की थी। परन्तु दुराचारी यहूदी भी मलाकी, हाग्गै, जकर्याह, और एज्रा को प्रामाणिक अधिकार में स्वीकार किए गए अन्तिम मानते हैं। क्योंकि इनकी भी, जैसे अन्यों की, लिखी हुई पुस्तकें हैं, जो भविष्यद्वक्ताओं की बड़ी संख्या में से, थोड़े ही होते हुए, वे पुस्तकें हैं जिन्हें प्रामाणिक अधिकार प्राप्त हुआ है, जिनकी भविष्यद्वाणियों में से मुझे यह उचित लगता है कि इस कार्य में उन बातों को रखूँ जो मसीह और उसकी कलीसिया से सम्बन्धित हैं; और यह, प्रभु की सहायता से, अगली पुस्तक में अधिक सुविधापूर्वक किया जाएगा, कि हम इसी पुस्तक को और अधिक भारी न बना दें, जो पहले ही बहुत लम्बी हो चुकी है।
टिप्पणियाँ
- [343] "इंगित किया है।"
- [344] Gen. xii. 1, 2.
- [345] Gen. xii. 3.
- [346] Gal. iv. 22-31.
- [347] Heb. viii. 8-10.
- [348] 1 Sam. ii. 1-10.
- [349] Ps. xlviii. 2.
- [350] 2 Tim. ii. 9; Eph. vi. 20.
- [351] Luke ii. 25-30.
- [352] Rom. iii. 26?
- [353] Gal. vi. 3.
- [354] Rom. x. 3.
- [355] Ps. xciv. 11; 1 Cor. iii. 20.
- [356] Ps. vi. 2.
- [357] Rom. iii. 2.
- [358] Rev. i. 4.
- [359] Prov. ix. 1.
- [360] "जिसके द्वारा हम उसे फलवन्ती हुई देखते हैं।"
- [361] Col. iii. 1-3.
- [362] Rom. viii. 32.
- [363] Ps. xvi. 10; Acts ii. 27, 31.
- [364] 2 Cor. viii. 9.
- [365] Jas. iv. 6; 1 Pet. v. 5.
- [366] "क्योंकि निर्धन मनुष्य और भिखारी एक ही हैं।"
- [367] Phil. iii. 7, 8.
- [368] Matt. xix. 27, 28.
- [369] 1 Cor. iv. 7.
- [370] 1 John iv. 7.
- [371] 2 Cor. v. 10.
- [372] Ps. lxxiv. 12.
- [373] Acts x. 42.
- [374] Eph. iv. 9, 10.
- [375] Matt. xxiv. 13.
- [376] 1 Cor. 12.
- [377] 1 Sam. ii. 27-36.
- [378] Ps. xvii. 8.
- [379] Isa. x. 21.
- [380] Rom. xi. 5.
- [381] Isa. xxviii. 22; Rom. ix 28.
- [382] Ps. xii. 6.
- [383] Ps. lxxxiv. 10.
- [384] 1 Tim. ii. 5.
- [385] 1 Pet. ii. 9.
- [386] 1 Cor. x. 17.
- [387] Rom. xii. 1.
- [388] John vi. 51.
- [389] Heb. vii. 11, 27.
- [390] Matt. xxiv. 15.
- [391] 1 Sam. xxiv. 5, 6.
- [392] 1 Sam. xiii. 13, 14.
- [393] Heb. ix. 15.
- [394] Luke xix. 10.
- [395] Eph. i. 4.
- [396] 1 Sam. xv. 23.
- [397] 1 Sam. xv. 26-29.
- [398] Rom. i. 3.
- [399] 1 Tim. ii. 5.
- [400] Ps. cx. 1.
- [401] Gen. xxi. 10.
- [402] Gal. iv. 25.
- [403] 2 Cor. iii. 15, 16.
- [404] 1 Sam. vii. 9-12.
- [405] 2 Sam. vii. 8-16.
- [406] Rom. i. 3.
- [407] Ps. lxxii. 8.
- [408] 1 Cor. iii. 17.
- [409] Ps. lxxxix. 3, 4.
- [410] Ps. lxxxix. 19-29.
- [411] Phil. ii. 7.
- [412] Matt. i. 1, 18; Luke i. 27.
- [413] 2 Sam. vii, 14, 15.
- [414] Ps. cv. 15.
- [415] Ps. lxxxix. 30-33.
- [416] Acts ix. 4.
- [417] Ps. lxxxix. 34, 35.
- [418] Ps. lxxxix. 36, 37.
- [419] Ps. lxxxix. 38.
- [420] Ps. lxxxix. 38.
- [421] Ps. lxxxix. 39-45.
- [422] Ps. lxxxix. 46.
- [423] Ps. xiii. 1.
- [424] Ps. lxxxix. 46, 47.
- [425] Ps. lxxxix. 47.
- [426] Ps. cxliv. 4.
- [427] Ps. lxxxix. 48.
- [428] Rom. vi. 9.
- [429] John x. 18.
- [430] Ps. lxxxix. 49-51.
- [431] Rom. iii. 28, 29.
- [432] Acts xiii. 46.
- [433] Matt. vii. 7, 8.
- [434] एक अन्य पाठ, "पूर्णता।"
- [435] ऊपर देखें, अध्याय 8।
- [436] 2 Sam. vii. 19.
- [437] 2 Sam. vii. 8.
- [438] 2 Sam. vii. 27.
- [439] Ps. cxxvii. 1.
- [440] 2 Sam. vii. 10, 11.
- [441] 2 Sam. vii. 10, 11.
- [442] Judg. iii. 30.
- [443] इस्राएल = "परमेश्वर का एक प्रधान"; पनीएल = "परमेश्वर का मुख" (Gen. xxxii. 28-30).
- [444] Ps. cx. 1, जो Matt. xxii. 44 में उद्धृत है।
- [445] 1 Kings xiii. 2; जो 2 Kings xxiii. 15-17 में पूरा हुआ।
- [446] Ps. xlv. 1-9.
- [447] Ps. xlv. 9-17.
- [448] Ps. xlv. 7.
- [449] Ps. xlviii. 2.
- [450] Ps. xviii. 43.
- [451] Rom. x. 5.
- [452] Ps. lxxxvii. 5.
- [453] Ps. xlv. 16.
- [454] Ps. cx. 1.
- [455] Ps. cx. 2.
- [456] Ps. cx. 4.
- [457] Ps. cx. 4.
- [458] Ps. xxii. 16, 17.
- [459] Ps. xxii. 18, 19.
- [460] Ps. iii. 5.
- [461] Ps. xli. 5-8.
- [462] Ps. xli. 9.
- [463] Ps. xli. 10.
- [464] 2 Tim. iv. 1; 2 Pet. iv. 5.
- [465] John vi. 70.
- [466] 1 Cor. xii. 12.
- [467] Matt. xxv. 35.
- [468] Matt. xxv. 40.
- [469] Acts i. 17.
- [470] Ps. xvi. 9, 10.
- [471] Ps. lxviii. 20.
- [472] Matt. i. 21.
- [473] Ps. lxix. 21; Matt. xxvii. 34, 48.
- [474] Ps. lxix. 22, 23.
- [475] Ps. xxxii. 1.
- [476] Sallust, Bel. Cat. c. xi.
- [477] Wisd. ii. 12-21.
- [478] Ecclus. xxxvi. 1-5.
- [479] Prov. i. 11-13.
- [480] Matt. xxi. 38.
- [481] अध्याय 4।
- [482] Prov. ix. 1-5 (पद 1 ऊपर अध्याय 4 में उद्धृत है)।
- [483] 1 Cor. i. 27.
- [484] Prov. ix. 6.
- [485] Eccles. ii. 24, iii. 13, v. 18, viii. 15.
- [486] Ps. xl. 6.
- [487] Eccles. vii. 2.
- [488] Eccles. vii. 4.
- [489] Eccles. x. 16, 17.
- [490] Rom. v. 5.
- [491] Ps. lxix. 6. ?
- [492] Cant. i. 4.
- [493] Cant. vii. 6.
- [494] 1 Kings xix. 10, 14, 15.
- [495] 2 Tim. 16.
- [496] Matt. xi. 13.
