22 में से पुस्तक XI · 34 अध्याय

पुस्तक XI

दो नगरों की उत्पत्ति, सृष्टि, और स्वर्गदूत। अनुवादक: रेवरेंड मार्कस डॉड्स, एम.ए.

इस पुस्तक में खोजें

    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    यहाँ से इस ग्रंथ के दूसरे भाग[440] का आरंभ होता है, जो दोनों नगरों — पृथ्वी के नगर और परमेश्वर के नगर — की उत्पत्ति, इतिहास, और नियति का वर्णन करता है। सबसे पहले, ऑगस्टीन इस पुस्तक में यह दिखाते हैं कि किस प्रकार भले और दुष्ट स्वर्गदूतों के पृथक्करण द्वारा ये दोनों नगर मूलतः बने; और इस अवसर पर सृष्टि की उत्पत्ति की चर्चा करते हैं, जैसा कि पवित्रशास्त्र में उत्पत्ति की पुस्तक के आरंभ में वर्णित है।

    1. ग्रंथ के इस भाग के विषय में, जिसमें हम दोनों नगरों की उत्पत्ति और अंत का वर्णन आरंभ करते हैं

    परमेश्वर के जिस नगर की हम बात कर रहे हैं, वह वही है जिसकी साक्षी उस पवित्रशास्त्र में दी गई है, जो अपने दैवी अधिकार के कारण सभी जातियों के समस्त लेखों से श्रेष्ठ है, और जिसने सब प्रकार के मनों को अपने प्रभाव में ले लिया है — और यह किसी आकस्मिक बौद्धिक हलचल के कारण नहीं, वरन् स्पष्टतः एक विशेष ईश्वरीय प्रबंध के कारण हुआ है। क्योंकि वहाँ लिखा है, "हे परमेश्वर के नगर, तेरे विषय महिमा की बातें कही गई हैं।"[441] और एक अन्य भजन में हम पढ़ते हैं, "यहोवा महान और अति स्तुति के योग्य है, हमारे परमेश्वर के नगर में, अपने पवित्र पर्वत पर, जो सारी पृथ्वी के आनन्द को बढ़ाता है।"[442] और उसी भजन में, थोड़ा आगे, "जैसा हम ने सुना था, वैसा ही सेनाओं के यहोवा के नगर में, अपने परमेश्वर के नगर में, देखा भी। परमेश्वर उसे सदा स्थिर रखेगा।" और एक अन्य भजन में, "एक नदी है जिसकी धाराएँ परमेश्वर के नगर को, अर्थात् परमप्रधान के पवित्र निवास-स्थान को आनन्दित करती हैं। परमेश्वर उसके मध्य में है, वह डगमगाएगा नहीं।"[443] इन साक्ष्यों से, और ऐसे अन्य साक्ष्यों से, जिन्हें उद्धृत करना नीरस होगा, हमने यह जाना है कि परमेश्वर का एक नगर है, और उसके संस्थापक ने हमारे भीतर ऐसा प्रेम जगाया है जो हमें उसकी नागरिकता की लालसा कराता है। परन्तु इस पवित्र नगर के संस्थापक की अपेक्षा पृथ्वी के नगर के नागरिक अपने ही देवताओं को प्राथमिकता देते हैं, यह न जानते हुए कि वही देवताओं का परमेश्वर है — झूठे, अर्थात् अधर्मी और अभिमानी देवताओं का नहीं, जो उसके अपरिवर्तनीय और मुक्त रूप से दिए गए प्रकाश से वंचित होकर, एक प्रकार की दरिद्र शक्ति तक सिमट गए हैं, और अपने ही निजी विशेषाधिकारों को लालच से पकड़े रहते हैं, तथा अपने भ्रमित अनुयायियों से दैवी सम्मान चाहते हैं — बल्कि भक्त और पवित्र देवताओं का, जो एक के अधीन रहना अधिक पसन्द करते हैं, बनिस्बत अनेकों को अपने अधीन करने के, और जो स्वयं परमेश्वर के रूप में पूजे जाने की अपेक्षा परमेश्वर की आराधना करना अधिक चाहते हैं। परन्तु इस नगर के शत्रुओं को हमने पिछली दस पुस्तकों में, अपनी सामर्थ्य और अपने प्रभु तथा राजा की सहायता के अनुसार, उत्तर दे दिया है। अब, जो मुझसे अपेक्षित है उसे पहचानते हुए, और अपनी प्रतिज्ञा को स्मरण रखते हुए, तथा उसी सहायता पर भरोसा करते हुए, मैं दोनों नगरों — अर्थात् पृथ्वी के नगर और स्वर्गीय नगर — की उत्पत्ति, प्रगति, और उनकी उपयुक्त नियति की चर्चा करने का प्रयास करूँगा, जो, जैसा हमने कहा, इस वर्तमान संसार में एक-दूसरे में घुले-मिले और जैसे उलझे हुए हैं। और, सबसे पहले, मैं यह स्पष्ट करूँगा कि इन दोनों नगरों की नींव मूलतः किस प्रकार रखी गई, अर्थात् स्वर्गदूतों के बीच उत्पन्न हुए भेद में।

    2. परमेश्वर के ज्ञान के विषय में, जिसे कोई भी मनुष्य परमेश्वर और मनुष्यों के मध्यस्थ, मनुष्य मसीह यीशु, के अतिरिक्त प्राप्त नहीं कर सकता

    यह एक महान और अत्यंत दुर्लभ बात है कि कोई मनुष्य सम्पूर्ण सृष्टि — भौतिक और अभौतिक — का चिंतन करने और उसकी परिवर्तनशीलता को पहचानने के बाद, उससे आगे बढ़े, और अपने मन की निरंतर उड़ान द्वारा परमेश्वर के अपरिवर्तनीय सत्त्व तक पहुँचे, तथा चिंतन की उस ऊँचाई में स्वयं परमेश्वर से यह सीखे कि दिव्य सत्त्व से भिन्न जो कुछ भी है, वह सब केवल उसी ने बनाया है। क्योंकि परमेश्वर मनुष्य से किसी श्रव्य प्राणी के माध्यम से बात नहीं करता, जिसकी ध्वनि कानों में गूँजे, ताकि वायु के कम्पन बोलने वाले को सुनने वाले से जोड़ें; न ही वह किसी आत्मिक सत्ता के माध्यम से बोलता है जिसका शरीर जैसा आभास हो, जैसा हम स्वप्नों या ऐसी ही अवस्थाओं में देखते हैं; क्योंकि उस स्थिति में भी वह मानो शरीर के कानों से बोलता प्रतीत होता है, क्योंकि वह शरीर के आभास के माध्यम से बोलता है, और स्थान के वास्तविक अंतराल के आभास के साथ — क्योंकि दर्शन (visions) भौतिक वस्तुओं के यथावत प्रतिरूप होते हैं। अतः परमेश्वर इनके द्वारा नहीं, वरन् सत्य के द्वारा ही बोलता है, यदि कोई शरीर से नहीं वरन् मन से सुनने को तैयार हो। क्योंकि वह मनुष्य के उस अंश से बात करता है जो उसमें विद्यमान बाकी सब अंशों से श्रेष्ठ है, और जिससे श्रेष्ठ केवल परमेश्वर स्वयं है। क्योंकि मनुष्य को सर्वाधिक उपयुक्त रूप से परमेश्वर के प्रतिरूप में बना हुआ समझा जाता है (या, यदि यह समझा न जा सके, तो कम से कम विश्वास किया जाता है), निःसंदेह यह उसका वही अंश है जिसके द्वारा वह उन निम्नतर अंशों से ऊपर उठता है जो उसे पशुओं के साथ समान रूप से प्राप्त हैं, और जो उसे परम सत्ता के अधिक निकट लाता है। परन्तु चूँकि मन, यद्यपि स्वभाव से तर्क और बुद्धि के योग्य है, तो भी मोहग्रस्त और जड़ हो चुके दोषों के कारण, उसके अपरिवर्तनीय प्रकाश में न केवल आनन्दित होने और स्थिर रहने से, वरन् उसे सहन करने से भी असमर्थ है, जब तक कि वह धीरे-धीरे स्वस्थ, नवीनीकृत, और ऐसी धन्यता के योग्य न बना दिया जाए — इसलिए सबसे पहले उसे विश्वास से भर कर, इस प्रकार शुद्ध किया जाना आवश्यक था। और ताकि वह इस विश्वास में सत्य की ओर अधिक विश्वासपूर्वक बढ़ सके, सत्य ने स्वयं — अर्थात् परमेश्वर, परमेश्वर का पुत्र — अपनी दिव्यता को नष्ट किए बिना मनुष्यत्व धारण करके,[444] इस विश्वास को स्थापित और सुदृढ़ किया, ताकि मनुष्य के लिए मनुष्य के परमेश्वर तक पहुँचने का एक मार्ग हो, अर्थात् एक परमेश्वर-मनुष्य के द्वारा। क्योंकि यही परमेश्वर और मनुष्यों के बीच का मध्यस्थ है, मनुष्य मसीह यीशु। क्योंकि मनुष्य के रूप में ही वह मध्यस्थ और मार्ग है। क्योंकि यदि मार्ग चलने वाले और उस स्थान के बीच स्थित हो जहाँ वह जाना चाहता है, तो उसे वहाँ पहुँचने की आशा है; परन्तु यदि कोई मार्ग ही न हो, या वह न जानता हो कि वह कहाँ है, तो यह जानना किस काम का कि उसे कहाँ जाना चाहिए? अब एकमात्र वह मार्ग जो सभी भूलों से पूर्णतः सुरक्षित है, वही है जब एक ही व्यक्ति एक साथ परमेश्वर और मनुष्य दोनों हो — परमेश्वर हमारा लक्ष्य, और मनुष्य हमारा मार्ग।[445]

    3. दिव्य आत्मा द्वारा रचित प्रामाणिक पवित्रशास्त्र के अधिकार के विषय में

    इस मध्यस्थ ने, जो कुछ उसने पर्याप्त समझा, पहले भविष्यद्वक्ताओं द्वारा, फिर अपने ही मुख से, और बाद में प्रेरितों द्वारा कह दिया, और इसके अतिरिक्त उस पवित्रशास्त्र को उत्पन्न किया जिसे प्रामाणिक कहा जाता है, जिसका सर्वोच्च अधिकार है, और जिसे हम उन सभी विषयों में स्वीकार करते हैं जिनसे अनभिज्ञ रहना हमारे लिए उचित नहीं, और जिन्हें हम स्वयं जान भी नहीं सकते। क्योंकि यदि हम वर्तमान वस्तुओं का ज्ञान अपनी ही इन्द्रियों की साक्षी से प्राप्त करते हैं,[446] चाहे वे आंतरिक हों या बाह्य, तो जो वस्तुएँ हमारी इन्द्रियों से दूर हैं, उनके विषय में हमें दूसरों की साक्षी की आवश्यकता होती है, क्योंकि हम उन्हें अपनी इन्द्रियों से नहीं जान सकते, और हम उन व्यक्तियों पर विश्वास करते हैं जिनकी इन्द्रियों के सम्मुख वे वस्तुएँ रही हैं या हैं। तदनुसार, जैसे हम उन दृश्य वस्तुओं के विषय में, जिन्हें हमने स्वयं नहीं देखा, उन पर विश्वास करते हैं जिन्होंने देखा है (और इसी प्रकार सभी इन्द्रियगोचर वस्तुओं के विषय में भी), वैसे ही उन बातों के विषय में जिन्हें मन और आत्मा द्वारा ग्रहण किया जाता है,[447] अर्थात् जो हमारी आंतरिक इन्द्रिय से दूर हैं, हमें उचित है कि हम उन लोगों पर विश्वास करें जिन्होंने उन्हें उस अभौतिक प्रकाश में स्थापित देखा है, या जो उन्हें निरंतर चिंतन करते हैं।

    4. कि संसार न तो आदिहीन है, और न ही परमेश्वर की किसी नई इच्छा से बनाया गया, जिसके द्वारा उसने बाद में वह चाहा जो उसने पहले नहीं चाहा था

    समस्त दृश्य वस्तुओं में संसार सबसे महान है; समस्त अदृश्य वस्तुओं में परमेश्वर सबसे महान है। परन्तु संसार है, यह हम देखते हैं; परमेश्वर है, यह हम विश्वास करते हैं। कि परमेश्वर ने संसार को बनाया, इसे हम स्वयं परमेश्वर से बढ़कर किसी अन्य से अधिक सुरक्षित रूप से विश्वास नहीं कर सकते। परन्तु हमने उसे कहाँ सुना है? पवित्रशास्त्र से बढ़कर कहीं भी स्पष्टता से नहीं, जहाँ उसके भविष्यद्वक्ता ने कहा, "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।"[448] क्या भविष्यद्वक्ता वहाँ उपस्थित था जब परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी को बनाया? नहीं; परन्तु परमेश्वर की बुद्धि, जिसके द्वारा सब कुछ बनाया गया, वहाँ उपस्थित थी,[449] और बुद्धि पवित्र आत्माओं में स्वयं को समाहित कर लेती है, और उन्हें परमेश्वर तथा उसके भविष्यद्वक्ताओं का मित्र बना देती है, और चुपचाप उन्हें उसके कार्यों की सूचना देती है। उन्हें परमेश्वर के स्वर्गदूतों द्वारा भी सिखाया जाता है, जो सदा पिता का मुख देखते रहते हैं,[450] और जिसे उचित हो उसे उसकी इच्छा बताते हैं। इन्हीं भविष्यद्वक्ताओं में से वह था जिसने कहा और लिखा, "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।" और वह परमेश्वर का ऐसा उपयुक्त साक्षी था, कि परमेश्वर की उसी आत्मा ने, जिसने उस पर ये बातें प्रकट कीं, उसे इतने पहले यह भविष्यवाणी करने में भी समर्थ किया कि हमारा विश्वास भी आने वाला है।

    परन्तु परमेश्वर ने उसी समय आकाश और पृथ्वी को बनाना क्यों चुना, जिन्हें उसने उससे पहले तक नहीं बनाया था?[451] यदि जो लोग यह प्रश्न उठाते हैं वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि संसार अनादि और आदिहीन है, और इसलिए यह परमेश्वर द्वारा नहीं बनाया गया, तो वे विचित्र रूप से भ्रमित हैं, और अधर्म के असाध्य पागलपन में बड़बड़ा रहे हैं। क्योंकि यद्यपि भविष्यद्वक्ताओं की वाणी मौन रहे, तो भी संसार स्वयं, अपने सुव्यवस्थित परिवर्तनों और गतियों द्वारा, और समस्त दृश्य वस्तुओं के सुंदर स्वरूप द्वारा, अपनी ही साक्षी देता है — दोनों ही बातों की, कि यह बनाया गया है, और यह भी कि यह परमेश्वर के अतिरिक्त और किसी के द्वारा नहीं बनाया जा सकता था, जिसकी महिमा और सुंदरता अवर्णनीय और अदृश्य है। जहाँ तक उन लोगों की बात है[452] जो यह तो मानते हैं कि यह परमेश्वर द्वारा बनाया गया, परन्तु उसे कालिक नहीं वरन् केवल सृजनात्मक आदि प्रदान करते हैं, ताकि किसी दुर्बोध रीति से संसार सदा से ही एक सृजित संसार के रूप में विद्यमान रहा हो — वे ऐसा दावा करते हैं जो उन्हें परमेश्वर को इस आरोप से बचाता प्रतीत होता है कि उसने मनमाने ढंग से जल्दबाज़ी की, या संसार को बनाने का विचार अचानक, मानो एक बिल्कुल नए विचार के रूप में सोचा, या यद्यपि वह अपरिवर्तनीय है, तो भी अपनी इच्छा को आकस्मिक रूप से बदल दिया। परन्तु मैं नहीं देखता कि उनकी यह धारणा अन्य बातों में, और विशेषतः आत्मा के विषय में, कैसे टिक सकती है; क्योंकि यदि वे यह तर्क दें कि आत्मा परमेश्वर के साथ सहअनादि है, तो वे यह स्पष्ट करने में पूर्णतः असमर्थ होंगे कि उसमें नया दुःख कहाँ से आ गया, जो पिछली अनंतता में कभी विद्यमान नहीं था। क्योंकि यदि वे कहें कि उसकी धन्यता और दुःख निरंतर एक-दूसरे के बाद आते-जाते रहते हैं, तो उन्हें आगे यह भी कहना होगा कि यह हेरफेर सदा चलता रहेगा; जिससे यह विसंगति उत्पन्न होगी कि यद्यपि आत्मा को धन्य कहा जाता है, तो भी वह इस बात में धन्य नहीं है कि वह अपने ही आगामी दुःख और अपमान को पहले से जानती है। और फिर भी, यदि वह इसे पहले से नहीं जानती, और यह मान लेती है कि वह न कभी अपमानित होगी न दुखी, वरन् सदा धन्य ही रहेगी, तो वह धन्य इसलिए है क्योंकि वह भ्रमित है; और इससे अधिक मूर्खतापूर्ण कथन और कोई नहीं हो सकता। परन्तु यदि उनका विचार यह है कि आत्मा का दुःख विगत अनंतता के युगों में उसकी धन्यता के साथ हेरफेर करता रहा है, परन्तु अब, एक बार जब आत्मा मुक्त कर दी गई है, तो वह इसके बाद फिर कभी दुःख की ओर नहीं लौटेगी — तो भी वे यही मानते हैं कि वह पहले कभी सचमुच धन्य नहीं रही, वरन् अंततः एक नई और अनिश्चित धन्यता का आनन्द लेना आरंभ करती है; अर्थात्, उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि आत्मा के साथ कोई नई बात, और वह भी एक महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय बात, घटित होती है, जो सम्पूर्ण विगत अनंतता में उसके साथ कभी नहीं घटी। और यदि वे यह अस्वीकार करें कि परमेश्वर के अनादि उद्देश्य में आत्मा का यह नया अनुभव सम्मिलित था, तो वे यह अस्वीकार करते हैं कि वह उसकी धन्यता का रचयिता है, जो एक अकथनीय अधर्म है। दूसरी ओर, यदि वे कहें कि आत्मा की भावी धन्यता परमेश्वर की किसी नई इच्छा का परिणाम है, तो वे यह कैसे दिखाएँगे कि परमेश्वर उस परिवर्तनशीलता का दोषी नहीं है जो उन्हें अप्रिय लगती है? इसके अतिरिक्त, यदि वे यह स्वीकार करें कि वह काल में बनाई गई, परन्तु काल में कभी नष्ट नहीं होगी — कि उसका, संख्या के समान,[453] आदि तो है परन्तु अंत नहीं है — और इसलिए, एक बार दुःख का अनुभव करके और उससे मुक्त हो जाने पर, वह फिर कभी उसकी ओर नहीं लौटेगी, तो वे निश्चय ही यह स्वीकार करेंगे कि यह सब परमेश्वर के अपरिवर्तनीय संकल्प का किसी भी प्रकार उल्लंघन किए बिना होता है। तो फिर, उन्हें उसी प्रकार संसार के विषय में भी यह विश्वास करने दें कि यह भी काल में बनाया जा सकता था, और फिर भी परमेश्वर ने, इसे बनाते समय, अपनी अनादि योजना में कोई परिवर्तन नहीं किया।

    5. कि हमें न तो संसार से पूर्व के अनंत काल-युगों को समझने का, और न ही अनंत अंतरिक्ष-क्षेत्रों को समझने का प्रयास करना चाहिए

    अब हमें यह देखना चाहिए कि उन लोगों को क्या उत्तर दिया जा सकता है, जो यह तो स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर संसार का सृष्टिकर्ता है, परन्तु उसकी सृष्टि के समय के विषय में उलझन में हैं, और साथ ही यह भी कि उन कठिनाइयों का वे क्या उत्तर देंगे जो हम उसकी सृष्टि के स्थान के विषय में उठा सकते हैं। क्योंकि जैसे वे यह माँग करते हैं कि संसार उसी समय क्यों बनाया गया, उससे पहले क्यों नहीं, वैसे ही हम यह पूछ सकते हैं कि यह ठीक यहीं क्यों बनाया गया जहाँ यह है, अन्यत्र क्यों नहीं। क्योंकि यदि वे संसार से पूर्व काल के अनंत विस्तार की कल्पना करते हैं, जिनमें परमेश्वर निष्क्रिय नहीं रह सकता था, तो उसी प्रकार वे संसार के बाहर भी अंतरिक्ष के अनंत क्षेत्रों की कल्पना कर सकते हैं, जिनमें, यदि कोई यह कहे कि सर्वशक्तिमान अपने हाथ को कार्य करने से नहीं रोक सकता, तो क्या इससे यह परिणाम नहीं निकलेगा कि उन्हें एपिक्यूरस के असंख्य संसारों के स्वप्न को अपनाना होगा? — केवल इस अंतर के साथ कि वह यह दावा करता है कि वे परमाणुओं की आकस्मिक गतियों द्वारा बनते और नष्ट होते हैं, जबकि वे यह मानेंगे कि वे परमेश्वर के हाथ से बनाए गए हैं, यदि वे यह दावा करें कि संसार के चारों ओर हर दिशा में अंतहीन रूप से फैले हुए अंतरिक्ष की असीम विशालता में, परमेश्वर विश्राम नहीं कर सकता, और यह कि जिन संसारों को वे उसके द्वारा बनाया हुआ मानते हैं, वे नष्ट नहीं हो सकते। क्योंकि यहाँ प्रश्न उन लोगों के साथ है जो, हमारी ही भाँति, यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर आत्मिक है, और स्वयं को छोड़कर समस्त अस्तित्वों का सृष्टिकर्ता है। जहाँ तक अन्य लोगों की बात है, उनके साथ किसी धार्मिक प्रश्न पर वाद-विवाद करना एक विनम्रता ही है, क्योंकि उन्होंने केवल उन मनुष्यों में ख्याति अर्जित की है जो अनेक देवताओं को दैवी सम्मान देते हैं, और अन्य दार्शनिकों के बीच केवल इसी कारण प्रमुख बने हैं कि, यद्यपि वे अभी भी सत्य से दूर हैं, तो भी शेष लोगों की तुलना में वे उसके अधिक निकट हैं। जब ये लोग न तो दिव्य सत्त्व को किसी स्थान में सीमित करते हैं, न उसे बाँटते हैं, वरन्, जैसा परमेश्वर के योग्य है, यह मानते हैं कि वह सर्वत्र पूर्णतः, यद्यपि आत्मिक रूप से, उपस्थित है — तो क्या वे यह कहेंगे कि यह सत्त्व संसार के बाहर के उन अपार क्षेत्रों से अनुपस्थित है, और केवल एक ही स्थान में — जो उस अनंतता की तुलना में अत्यंत छोटा है — अर्थात् उसी में जहाँ संसार है, व्याप्त है? मुझे नहीं लगता कि वे इस विसंगति तक बढ़ेंगे। चूँकि वे यह मानते हैं कि केवल एक ही संसार है, जो भौतिक दृष्टि से विशाल तो है, परन्तु सीमित है, और अपने निश्चित स्थान में है, और यह परमेश्वर के कार्य द्वारा बनाया गया — तो उन्हें संसार से पूर्व के अनंत काल में परमेश्वर के विश्राम का वही स्पष्टीकरण देना चाहिए जो वे उसके बाहर के अनंत क्षेत्रों में उसके विश्राम के विषय में देते हैं। और जैसे यह आवश्यक नहीं कि परमेश्वर ने संसार को उसी स्थान पर, जहाँ वह है, अन्यत्र नहीं, संयोगवश रखा हो न कि दिव्य कारण से — यद्यपि कोई मानवीय कारण यह नहीं समझ सकता कि यह वहीं क्यों रखा गया, और यद्यपि चुने गए स्थान में ऐसा कोई गुण नहीं था जिससे उसे अनंत अन्य स्थानों पर प्राथमिकता मिले — वैसे ही यह भी आवश्यक नहीं कि हम यह मान लें कि परमेश्वर संसार को उसी और उससे पहले नहीं, किसी और समय पर बनाते समय संयोग से निर्देशित हुआ, यद्यपि पूर्ववर्ती काल एक अनंत भूतकाल में बीतता रहा था, और यद्यपि ऐसा कोई अंतर नहीं था जिससे किसी एक काल को दूसरे की अपेक्षा चुना जा सके। परन्तु यदि वे कहें कि मनुष्यों के विचार व्यर्थ हैं जब वे अनंत स्थानों की कल्पना करते हैं, क्योंकि संसार के अतिरिक्त कोई स्थान नहीं है, तो हम उत्तर देंगे कि उसी तर्क से, परमेश्वर के विश्राम के भूतकाल की कल्पना करना भी व्यर्थ है, क्योंकि संसार से पूर्व कोई काल नहीं है।

    6. कि संसार और काल दोनों का एक ही आदि था, और एक ने दूसरे की प्रतीक्षा नहीं की

    क्योंकि यदि अनंतकाल (eternity) और काल (time) को इस भेद से सही ढंग से पहचाना जाता है, कि काल किसी गति और संक्रमण के बिना नहीं होता, जबकि अनंतकाल में कोई परिवर्तन नहीं है, तो कौन यह नहीं देखता कि यदि कोई सृष्टि न बनाई गई होती जो किसी गति द्वारा परिवर्तन को जन्म दे सके — जिसकी गति और परिवर्तन के विभिन्न अंश, चूँकि वे एक साथ नहीं हो सकते, एक के बाद एक होते हैं — तो काल हो ही नहीं सकता था, और इस प्रकार, इन छोटे या बड़े कालांतरालों में, काल का आरंभ होता? चूँकि परमेश्वर, जिसकी अनंतता में कोई परिवर्तन नहीं है, काल का सृष्टिकर्ता और नियोजक है, मुझे यह समझ नहीं आता कि यह कैसे कहा जा सकता है कि उसने कालखंड बीत जाने के बाद संसार को बनाया, जब तक यह न कहा जाए कि संसार से पूर्व कोई सृष्टि थी जिसकी गति द्वारा काल बीत सकता था। और यदि पवित्र और अचूक पवित्रशास्त्र कहता है कि आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की, ताकि यह समझा जाए कि उसने इससे पूर्व कुछ भी नहीं बनाया था — क्योंकि यदि उसने शेष सब से पहले कुछ बनाया होता, तो यह कहा जाता कि वह वस्तु "आदि में" बनाई गई — तो निश्चय ही संसार काल में नहीं, वरन् काल के साथ ही, बनाया गया। क्योंकि जो काल में बनाया जाता है, वह किसी काल के बाद और किसी काल से पहले बनाया जाता है — जो बीत चुका है उसके बाद, और जो आने वाला है उससे पहले। परन्तु उस समय कुछ भी बीता हुआ नहीं हो सकता था, क्योंकि कोई ऐसी सृष्टि नहीं थी जिसकी गति से उसकी अवधि मापी जा सकती। परन्तु संसार काल के साथ ही बनाया गया, यदि संसार की सृष्टि में परिवर्तन और गति भी सृजित की गई, जैसा प्रथम छह या सात दिनों के क्रम से स्पष्ट प्रतीत होता है। क्योंकि इन दिनों में सांझ और भोर गिने जाते हैं, यहाँ तक कि छठे दिन, परमेश्वर ने जो कुछ तब बनाया, वह सब पूरा हो गया, और सातवें दिन परमेश्वर का विश्राम रहस्यमय और उदात्त रूप से चिह्नित किया गया। ये किस प्रकार के दिन थे, इसकी कल्पना करना हमारे लिए अत्यंत कठिन, या शायद असंभव है, और उसे कह पाना तो और भी अधिक!

    7. उन आरंभिक दिनों की प्रकृति के विषय में, जिनमें सूर्य के होने से पहले भी सांझ और भोर होने की बात कही गई है

    हम देखते हैं कि हमारे साधारण दिनों की सांझ सूर्य के अस्त होने से ही होती है, और भोर उसके उदय होने से ही होती है; परन्तु सबसे पहले के तीन दिन सूर्य के बिना ही बीते, क्योंकि यह कहा जाता है कि सूर्य चौथे दिन बनाया गया। और सबसे पहले, वस्तुतः, परमेश्वर के वचन से प्रकाश बनाया गया, और हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर ने उसे अंधकार से अलग किया, और प्रकाश को दिन, और अंधकार को रात कहा; परन्तु वह किस प्रकार का प्रकाश था, और किस आवर्ती गति से उसने सांझ और भोर बनाई, यह हमारी इन्द्रियों की पहुँच से परे है; न ही हम यह समझ सकते हैं कि यह कैसे हुआ, और फिर भी हमें इसे निःसंकोच विश्वास करना चाहिए। क्योंकि या तो वह कोई भौतिक प्रकाश था, चाहे वह संसार के ऊपरी भागों से, जो हमारी दृष्टि से बहुत दूर हैं, आया हो, या उस स्थान से जहाँ बाद में सूर्य को प्रज्वलित किया गया; या "प्रकाश" के नाम से उस पवित्र नगर का संकेत दिया गया, जो पवित्र स्वर्गदूतों और धन्य आत्माओं से बना है — वह नगर जिसके विषय में प्रेरित कहता है, "जो यरूशलेम ऊपर है, वह स्वर्ग में हमारी अनन्त माता है";[454] और अन्यत्र, "क्योंकि तुम सब ज्योति की सन्तान, और दिन की सन्तान हो; हम रात या अन्धकार के नहीं हैं।"[455] फिर भी कुछ अर्थों में हम इस दिन की भी भोर और सांझ की बात उपयुक्त रूप से कर सकते हैं। क्योंकि सृष्टि का ज्ञान, सृष्टिकर्ता के ज्ञान की तुलना में, केवल एक धुंधलका है; और इसलिए यह भोर होकर उजाला होता है जब सृष्टि सृष्टिकर्ता की स्तुति और प्रेम की ओर खिंचती है; और रात कभी नहीं होती जब सृष्टि के प्रेम के कारण सृष्टिकर्ता का त्याग नहीं किया जाता। संक्षेप में, पवित्रशास्त्र, जब वह उन दिनों को क्रमशः वर्णन करता है, कभी "रात" शब्द का उल्लेख नहीं करता। यह कभी नहीं कहता, "रात हुई," वरन् "सांझ हुई फिर भोर हुई — यह पहला दिन था।" इसी प्रकार दूसरे और शेष दिनों के विषय में भी। और वस्तुतः, सृजित वस्तुओं का ज्ञान, जब वे अपने में देखी जाती हैं, तो, मानो, अधिक फीका होता है, बनिस्बत इसके कि जब वे परमेश्वर की बुद्धि में देखी जाएँ, जैसे उस कला में जिसके द्वारा वे बनाई गईं। इसलिए "सांझ" "रात" से अधिक उपयुक्त बिंब है; और फिर भी, जैसा मैंने कहा, भोर तब लौटती है जब सृष्टि सृष्टिकर्ता की स्तुति और प्रेम की ओर लौटती है। जब वह ऐसा अपने ही ज्ञान में करती है, वह पहला दिन है; जब आकाश (firmament) के ज्ञान में — जो उस आकाश को दिया गया नाम है जो ऊपर के जल और नीचे के जल के बीच है — वह दूसरा दिन है; जब पृथ्वी, समुद्र, और पृथ्वी से उगने वाली सब वस्तुओं के ज्ञान में, वह तीसरा दिन है; जब बड़े और छोटे ज्योतिपिंडों, और समस्त तारों के ज्ञान में, वह चौथा दिन है; जब जल में तैरने वाले और आकाश में उड़ने वाले समस्त प्राणियों के ज्ञान में, वह पाँचवाँ दिन है; जब पृथ्वी पर रहने वाले समस्त प्राणियों, और स्वयं मनुष्य के ज्ञान में, वह छठा दिन है।[456]

    8. छह दिनों के कार्य के पश्चात् सातवें दिन परमेश्वर के विश्राम करने का हमें क्या अर्थ समझना चाहिए

    जब यह कहा जाता है कि परमेश्वर ने सातवें दिन अपने समस्त कार्यों से विश्राम किया, और उसे पवित्र ठहराया, तो हमें इसे बालसुलभ ढंग से नहीं समझना चाहिए, मानो कार्य परमेश्वर के लिए कोई परिश्रम हो, जिसने "कहा और वह हो गया" — जिसने आत्मिक और अनादि वचन से कहा, न कि श्रव्य और क्षणिक वचन से। परन्तु परमेश्वर का विश्राम उन लोगों के विश्राम को दर्शाता है जो परमेश्वर में विश्राम करते हैं, जैसे किसी घर का आनन्द उन लोगों के आनन्द को दर्शाता है जो घर में आनन्दित होते हैं, यद्यपि घर नहीं, वरन् कोई और वस्तु उस आनन्द का कारण होती है। तो फिर ऐसा वाक्य-प्रयोग कितना अधिक सुबोध हो जाता है, यदि घर स्वयं, अपनी ही सुंदरता से, निवासियों को आनन्दित करे! क्योंकि इस स्थिति में हम इसे न केवल उस अलंकार से आनन्दित कहते हैं जिसमें समाहित करने वाली वस्तु का प्रयोग समाहित वस्तु के लिए किया जाता है (जैसे जब हम कहते हैं, "रंगशालाएँ तालियाँ बजाती हैं," "चरागाह रँभाते हैं," जिसका अर्थ है कि एक में मनुष्य तालियाँ बजाते हैं, और दूसरे में बैल रँभाते हैं), वरन् उस अलंकार से भी जिसमें कारण को मानो प्रभाव के रूप में कहा जाता है, जैसे जब किसी पत्र को आनन्दित कहा जाता है, क्योंकि वह अपने पाठकों को आनन्दित करता है। अतः सबसे उपयुक्त रूप से, पवित्र वृत्तान्त कहता है कि परमेश्वर ने विश्राम किया, जिसका अर्थ है कि वे लोग विश्राम करते हैं जो उसमें हैं, और जिन्हें वह विश्राम कराता है। और यही बात भविष्यसूचक वृत्तान्त उन मनुष्यों से भी प्रतिज्ञा करता है जिनसे वह बोलता है, और जिनके लिए वह लिखा गया — कि वे स्वयं, उन भले कार्यों के पश्चात् जो परमेश्वर उनमें और उनके द्वारा करता है, यदि वे विश्वास द्वारा इस जीवन में परमेश्वर के निकट पहुँचने में सफल हुए हैं, तो उसमें अनन्त विश्राम का आनन्द लेंगे। यह बात परमेश्वर की प्राचीन प्रजा को उनके सब्त की व्यवस्था में निहित विश्राम द्वारा पूर्वाभासित की गई थी, जिसकी चर्चा मैं, अपने उचित स्थान पर, अधिक विस्तार से करूँगा।

    9. स्वर्गदूतों की सृष्टि के विषय में पवित्रशास्त्र हमें क्या विश्वास करना सिखाता है

    वर्तमान में, चूँकि मैंने पवित्र नगर की उत्पत्ति का, और सबसे पहले पवित्र स्वर्गदूतों का, जो इस नगर का एक बड़ा भाग बनाते हैं — वस्तुतः इसका अधिक धन्य भाग, क्योंकि वे कभी निर्वासित नहीं हुए — वर्णन करने का बीड़ा उठाया है, इसलिए मैं परमेश्वर की सहायता से, और जहाँ तक उचित प्रतीत हो, इस विषय से संबंधित पवित्रशास्त्र को समझाने के कार्य में स्वयं को लगाऊँगा। जहाँ पवित्रशास्त्र संसार की सृष्टि के विषय में बोलता है, वहाँ यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि स्वर्गदूत कब या क्या बनाए गए; परन्तु यदि उनका उल्लेख किया गया है, तो वह "आकाश" नाम के अंतर्गत अंतर्निहित है, जब यह कहा जाता है, "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की," या शायद अधिक सम्भवतः "प्रकाश" नाम के अंतर्गत, जिसकी चर्चा शीघ्र ही होगी। परन्तु यह कि उन्हें पूर्णतः छोड़ दिया गया, इसे मैं विश्वास करने में असमर्थ हूँ, क्योंकि यह लिखा है कि परमेश्वर ने सातवें दिन अपने उन समस्त कार्यों से विश्राम किया जो उसने बनाए थे; और यह पुस्तक स्वयं यह कहकर आरंभ होती है, "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की," जिससे प्रतीत होता है कि आकाश और पृथ्वी से पहले परमेश्वर ने कुछ भी नहीं बनाया। चूँकि, इसलिए, उसने आकाश और पृथ्वी से आरंभ किया — और स्वयं पृथ्वी, जैसा पवित्रशास्त्र आगे जोड़ता है, आरंभ में अदृश्य और बेडौल थी, प्रकाश अभी तक नहीं बनाया गया था, और अंधकार गहरे जल के ऊपरी सतह को ढके हुए था (अर्थात्, पृथ्वी और समुद्र के एक अनिश्चित अराजक मिश्रण को ढके हुए था, क्योंकि जहाँ प्रकाश नहीं है, वहाँ अंधकार का होना अनिवार्य है) — और फिर जब वे सभी वस्तुएँ, जिनके विषय में लिखा है कि वे छह दिनों में पूर्ण हुईं, सृजित और व्यवस्थित की गईं, तो स्वर्गदूतों को कैसे छोड़ दिया जा सकता है, मानो वे परमेश्वर के उन कार्यों में सम्मिलित न हों जिनसे उसने सातवें दिन विश्राम किया? फिर भी, यद्यपि यह तथ्य कि स्वर्गदूत परमेश्वर की रचना हैं, यहाँ नहीं छोड़ा गया है, तो भी यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं है; परन्तु अन्यत्र पवित्रशास्त्र इसे अत्यंत स्पष्ट रीति से घोषित करता है। क्योंकि भट्ठी में तीन बालकों के भजन में यह कहा गया था, "हे यहोवा के समस्त कार्यों, यहोवा को धन्य कहो";[457] और इन कार्यों में, जिनका उल्लेख बाद में विस्तार से किया गया है, स्वर्गदूतों का नाम लिया गया है। और भजन में यह कहा गया है, "याह की स्तुति करो! यहोवा की स्तुति स्वर्ग में से करो, उसकी स्तुति ऊंचे स्थानों में करो! हे उसके सब दूतों, उसकी स्तुति करो; हे उसकी सब सेना, उसकी स्तुति कर! हे सूर्य और चन्द्रमा, उसकी स्तुति करो; हे सब ज्योतिमय तारागण, उसकी स्तुति करो! हे सबसे ऊंचे आकाश, और हे आकाश के ऊपर वाले जल, तुम उसकी स्तुति करो। वे यहोवा के नाम की स्तुति करें, क्योंकि उसी ने आज्ञा दी और ये सिरजे गए।"[458] यहाँ स्वर्गदूतों के विषय में अत्यंत स्पष्ट रूप से और दिव्य अधिकार से यह कहा गया है कि वे परमेश्वर द्वारा बनाए गए, क्योंकि उनके विषय में, अन्य आकाशीय वस्तुओं के साथ, यह कहा गया है, "उसी ने आज्ञा दी और ये सिरजे गए।" तो फिर किसमें इतना साहस होगा कि यह सुझाव दे कि स्वर्गदूत छह दिनों की सृष्टि के बाद बनाए गए? यदि कोई इतना मूर्ख हो, तो उसकी मूर्खता समान अधिकार वाले एक पवित्रशास्त्र-वचन से दूर हो जाती है, जहाँ परमेश्वर कहता है, "जब तारे बनाए गए, तो स्वर्गदूतों ने ऊँचे शब्द से मेरी स्तुति की।"[459] इसलिए स्वर्गदूत तारों से पहले विद्यमान थे; और तारे चौथे दिन बनाए गए। तो क्या हम कहें कि वे तीसरे दिन बनाए गए? कदापि नहीं; क्योंकि हम जानते हैं कि उस दिन क्या बनाया गया। पृथ्वी जल से अलग की गई, और प्रत्येक तत्व ने अपना विशिष्ट रूप ग्रहण किया, और पृथ्वी ने वह सब उत्पन्न किया जो उस पर उगता है। तो क्या दूसरे दिन? यह भी नहीं; क्योंकि उस दिन ऊपर के जल और नीचे के जल के बीच आकाश बनाया गया, और उसे "आकाश" कहा गया, जिस आकाश में तारे चौथे दिन बनाए गए। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि स्वर्गदूत इन छह दिनों में परमेश्वर के कार्यों में सम्मिलित हैं, तो वे वही प्रकाश हैं जिसे "दिन" कहा गया, और जिसकी एकता को पवित्रशास्त्र इस बात से चिह्नित करता है कि उस दिन को "पहला दिन" नहीं, वरन् "एक दिन" कहा गया है।[460] क्योंकि दूसरा दिन, तीसरा दिन, और शेष दिन अन्य दिन नहीं हैं; वरन् वही "एक" दिन छह या सात की संख्या पूरी करने के लिए दोहराया जाता है, ताकि परमेश्वर के कार्यों और उसके विश्राम, दोनों का ज्ञान हो सके। क्योंकि जब परमेश्वर ने कहा, "उजियाला हो, तो उजियाला हो गया," यदि हमें इस प्रकाश में स्वर्गदूतों की सृष्टि को समझने का औचित्य है, तो निश्चय ही वे उस अनन्त प्रकाश के सहभागी बनाकर सृजित किए गए जो परमेश्वर की अपरिवर्तनीय बुद्धि है, जिसके द्वारा सब कुछ बनाया गया, और जिसे हम परमेश्वर का एकलौता पुत्र कहते हैं; ताकि वे, उस प्रकाश से प्रकाशित होकर जिसने उन्हें बनाया, स्वयं प्रकाश बन जाएँ और "दिन" कहलाएँ, उस अपरिवर्तनीय प्रकाश और दिन में सहभागी होकर जो परमेश्वर का वचन है, जिसके द्वारा वे स्वयं और शेष सब कुछ बनाए गए। "सच्ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आनेवाली थी"[461] — यह ज्योति प्रत्येक शुद्ध स्वर्गदूत को भी प्रकाशित करती है, ताकि वह स्वयं में नहीं, वरन् परमेश्वर में प्रकाश हो; जिससे यदि कोई स्वर्गदूत मुँह मोड़ ले, तो वह अशुद्ध बन जाता है, जैसे वे सब जिन्हें अशुद्ध आत्मा कहा जाता है, और जो अब प्रभु में प्रकाश नहीं रहे, वरन् स्वयं में अंधकार हैं, अनन्त प्रकाश की सहभागिता से वंचित होकर। क्योंकि बुराई की कोई सकारात्मक प्रकृति नहीं है; वरन् भलाई की हानि को ही "बुराई" नाम दिया गया है।[462]

    10. सरल और अपरिवर्तनीय त्रिएकत्व — पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा, एक परमेश्वर — के विषय में, जिसमें सत्त्व और गुण एक ही हैं

    अतः एक ऐसी भलाई है जो अकेली सरल है, और इसलिए अकेली अपरिवर्तनीय है, और यह परमेश्वर है। इसी भलाई द्वारा शेष सब कुछ सृजित किया गया है, परन्तु वे सरल नहीं हैं, और इसलिए अपरिवर्तनीय भी नहीं। "सृजित," मैं कहता हूँ — अर्थात् बनाया गया, न कि जन्मा हुआ। क्योंकि जो उस सरल भलाई से जन्मा है, वह स्वयं की भाँति सरल है, और स्वयं के समान ही है। इन दोनों को हम पिता और पुत्र कहते हैं; और दोनों, पवित्र आत्मा के साथ मिलकर, एक ही परमेश्वर हैं; और इसी आत्मा के लिए "पवित्र" विशेषण पवित्रशास्त्र में, मानो, विशेष रूप से नियत किया गया है। और वह पिता और पुत्र से भिन्न है, क्योंकि वह न तो पिता है, न पुत्र। मैं "भिन्न" कहता हूँ, "भिन्न वस्तु" नहीं, क्योंकि वह उनके समान ही सरल भलाई है, अपरिवर्तनीय और सह-अनादि। और यह त्रिएकत्व एक ही परमेश्वर है; और त्रिएकत्व होने से यह कम सरल नहीं हो जाता। क्योंकि हम यह नहीं कहते कि भलाई की प्रकृति सरल है क्योंकि अकेले पिता के पास वह है, या अकेले पुत्र के पास, या अकेले पवित्र आत्मा के पास; न ही हम, सबेलियसवादी विधर्मियों की भाँति, यह कहते हैं कि यह केवल नाम मात्र का त्रिएकत्व है, और इसमें व्यक्तियों का कोई वास्तविक भेद नहीं है; वरन् हम कहते हैं कि यह सरल है, क्योंकि यह वही है जो इसके पास है, सिवाय एक-दूसरे के साथ व्यक्तियों के सम्बन्ध के। क्योंकि इस सम्बन्ध के विषय में यह सत्य है कि पिता के पास एक पुत्र है, और फिर भी वह स्वयं पुत्र नहीं है; और पुत्र के पास एक पिता है, और वह स्वयं पिता नहीं है। परन्तु, दूसरे के साथ सम्बन्ध से परे, स्वयं के विषय में, प्रत्येक वही है जो उसके पास है; इस प्रकार, वह स्वयं में जीवित है, क्योंकि उसके पास जीवन है, और वह स्वयं वही जीवन है जो उसके पास है।

    इसी कारण से, तो, त्रिएकत्व की प्रकृति को सरल कहा जाता है, क्योंकि उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे वह खो सके, और क्योंकि वह एक वस्तु नहीं है जिसकी विषय-वस्तु कुछ और हो, जैसे प्याला और उसमें भरा द्रव, या शरीर और उसका रंग, या वायु और उसका प्रकाश या ताप, या मन और उसकी बुद्धि। क्योंकि इनमें से कोई भी वह नहीं है जो उसके पास है: प्याला द्रव नहीं है, न शरीर रंग है, न वायु प्रकाश और ताप है, न मन बुद्धि है। और इसीलिए इन्हें उससे वंचित किया जा सकता है जो इनके पास है, और इन्हें अन्य गुणों और अवस्थाओं में बदला जा सकता है, ताकि प्याला उस द्रव से रीता किया जा सके जिससे वह भरा है, शरीर विवर्ण हो जाए, वायु अंधकारमय हो जाए, मन मूढ़ हो जाए। जो अक्षय शरीर पुनरुत्थान में संतों को प्रतिज्ञा किया गया है, वह अवश्य ही अपने अक्षयता के गुण को नहीं खो सकता, परन्तु शारीरिक सत्त्व और अक्षयता का गुण एक ही वस्तु नहीं हैं। क्योंकि अक्षयता का गुण प्रत्येक अलग-अलग भाग में सम्पूर्ण रूप से निवास करता है, न कि एक में अधिक और दूसरे में कम; क्योंकि कोई भी भाग दूसरे से अधिक अक्षय नहीं है। शरीर, वस्तुतः, अपने पूरे रूप में अपने भाग से बड़ा है; और उसका एक भाग बड़ा है, दूसरा छोटा, फिर भी बड़ा भाग छोटे भाग से अधिक अक्षय नहीं है। शरीर, जो अपने प्रत्येक भाग में सम्पूर्ण शरीर नहीं है, एक वस्तु है; अक्षयता, जो सर्वत्र पूर्ण है, दूसरी वस्तु है — क्योंकि अक्षय शरीर का प्रत्येक भाग, चाहे वह अन्य दृष्टि से शेष भागों के असमान हो, समान रूप से अक्षय है। क्योंकि हाथ, उदाहरणार्थ, उँगली से अधिक अक्षय नहीं है क्योंकि वह उँगली से बड़ा है; इसलिए, यद्यपि उँगली और हाथ असमान हैं, उनकी अक्षयता समान है। इस प्रकार, यद्यपि अक्षयता किसी अक्षय शरीर से अविभाज्य है, तो भी शरीर का सत्त्व एक वस्तु है, और अक्षयता का गुण दूसरी। और इसलिए शरीर वह नहीं है जो उसके पास है। स्वयं आत्मा भी, यद्यपि वह सदा बुद्धिमान हो (जैसी वह छुड़ाए जाने पर अनन्तकाल तक रहेगी), उस अपरिवर्तनीय बुद्धि में सहभागी होकर ही ऐसी होगी, जो वह स्वयं नहीं है; क्योंकि यद्यपि वायु उस प्रकाश से कभी वंचित नहीं होती जो उसमें फैला हुआ है, तो भी वह इस कारण प्रकाश के समान वस्तु नहीं बन जाती। मेरा यह अभिप्राय नहीं कि आत्मा वायु है, जैसा कुछ लोगों ने माना है जो आत्मिक प्रकृति की कल्पना नहीं कर सके;[463] परन्तु, अत्यधिक असमानता के बावजूद, इन दोनों वस्तुओं में एक प्रकार की समानता है, जिससे यह कहना उपयुक्त हो जाता है कि अभौतिक आत्मा परमेश्वर की सरल बुद्धि के अभौतिक प्रकाश से आलोकित होती है, जैसे भौतिक वायु भौतिक प्रकाश से आलोकित होती है, और जैसे वायु, जब इस प्रकाश से वंचित हो जाती है, अंधकारमय हो जाती है (क्योंकि भौतिक अंधकार प्रकाश-रहित वायु के अतिरिक्त और कुछ नहीं है),[464] वैसे ही आत्मा, बुद्धि के प्रकाश से वंचित होकर, अंधकारमय हो जाती है।

    इसके अनुसार, तो, वे बातें जो सत्त्व में और सचमुच दिव्य हैं, सरल कहलाती हैं, क्योंकि उनमें गुण और सत्त्व एक ही हैं, और क्योंकि वे स्वयं में दिव्य, या बुद्धिमान, या धन्य हैं, बिना किसी बाह्य पूरक के। पवित्रशास्त्र में, यह सच है, बुद्धि की आत्मा को "बहुविध"[465] कहा गया है क्योंकि उसमें अनेक वस्तुएँ समाहित हैं; परन्तु जो कुछ वह समाहित करती है, वह स्वयं भी वही है, और एक होते हुए भी वह ये सब वस्तुएँ है। क्योंकि न तो अनेक बुद्धियाँ हैं, वरन् एक ही है, जिसमें बौद्धिक वस्तुओं के अगणित और अनंत भण्डार हैं, जिसमें दृश्य और परिवर्तनशील वस्तुओं के, जो उसके द्वारा सृजित की गईं, समस्त अदृश्य और अपरिवर्तनीय कारण-तत्त्व हैं।[466] क्योंकि परमेश्वर ने कुछ भी अनजाने में नहीं बनाया; यहाँ तक कि किसी मानवीय शिल्पकार के विषय में भी यह नहीं कहा जा सकता कि उसने ऐसा किया। परन्तु यदि उसने वह सब जाना जो उसने बनाया, तो उसने केवल वही वस्तुएँ बनाईं जिन्हें उसने पहले से जाना था। जिससे एक अत्यंत उल्लेखनीय, परन्तु सत्य, निष्कर्ष निकलता है, कि यह संसार हमें तभी ज्ञात हो सकता था जब वह अस्तित्व में होता, परन्तु यह तभी अस्तित्व में आ सकता था जब यह परमेश्वर को पहले से ज्ञात होता।

    11. क्या पतित स्वर्गदूत उस धन्यता में सहभागी थे, जिसे भले स्वर्गदूत अपनी सृष्टि के समय से सदैव भोगते आए हैं

    और चूँकि ये बातें ऐसी हैं, इसलिए वे आत्माएँ जिन्हें हम स्वर्गदूत कहते हैं, कभी भी और किसी भी रीति से अंधकार नहीं थीं, वरन्, जैसे ही वे बनाई गईं, प्रकाश बनाई गईं; तो भी वे इसलिए सृजित नहीं की गई थीं कि वे किसी भी रीति से अस्तित्व में रहें और जीवित रहें, वरन् इसलिए प्रकाशित की गई थीं कि वे बुद्धिमानी और धन्यता से जिएँ। उनमें से कुछ ने, इस प्रकाश से मुँह मोड़कर, वह बुद्धिमान और धन्य जीवन प्राप्त नहीं किया, जो निश्चय ही अनन्त है, और जिसके साथ उसकी अनन्तता का निश्चित विश्वास भी है; परन्तु उनके पास अब भी तर्क का जीवन है, यद्यपि मूर्खता से अंधकारमय, और इसे वे खोना चाहें तो भी नहीं खो सकते। परन्तु कौन यह निर्धारित कर सकता है कि गिरने से पहले वे उस बुद्धि में किस सीमा तक सहभागी थे? और हम कैसे कह सकते हैं कि वे उसमें उतना ही सहभागी थे जितने वे लोग जो उसके द्वारा सचमुच और पूर्णतः धन्य हैं, अनन्त धन्यता के सच्चे निश्चय में विश्राम करते हुए? क्योंकि यदि वे इस सच्चे ज्ञान में समान रूप से सहभागी होते, तो दुष्ट स्वर्गदूत भी भले स्वर्गदूतों के समान अनन्तकाल तक धन्य बने रहते, क्योंकि वे उसकी समान रूप से प्रतीक्षा करते। क्योंकि, चाहे कोई जीवन कितना भी दीर्घ क्यों न हो, यदि उसका अंत निश्चित है तो उसे सचमुच अनन्त नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह "जीवन" इसलिए कहलाता है कि वह जिया जाता है, परन्तु "अनन्त" इसलिए कि उसका कोई अंत नहीं। इसलिए, यद्यपि हर अनन्त वस्तु इसी कारण धन्य नहीं होती (क्योंकि नरक की अग्नि भी अनन्त है), तो भी यदि कोई जीवन सचमुच और पूर्णतः धन्य नहीं हो सकता जब तक वह अनन्त न हो, तो इन स्वर्गदूतों का जीवन धन्य नहीं था, क्योंकि वह अंत के लिए नियत था, और इसलिए अनन्त नहीं था, चाहे वे इसे जानते हों या न जानते हों। एक स्थिति में भय ने, दूसरी में अज्ञानता ने, उन्हें धन्य होने से रोका। और यद्यपि उनकी अज्ञानता इतनी बड़ी नहीं थी कि उनमें पूर्णतः मिथ्या आशा उत्पन्न कर देती, फिर भी इसने उन्हें इस अनिश्चय में डाँवाडोल छोड़ दिया कि उनका कल्याण अनन्त होगा या किसी समय समाप्त हो जाएगा — इतने महान भाग्य के विषय में यह संदेह ही उस पूर्ण धन्यता के साथ असंगत था, जिसे हम विश्वास करते हैं कि भले स्वर्गदूतों ने भोगा। क्योंकि हम "धन्यता" शब्द के प्रयोग को इस प्रकार संकुचित और सीमित नहीं करते कि उसे केवल परमेश्वर पर ही लागू करें,[467] यद्यपि निःसंदेह वह इतना सचमुच धन्य है कि उससे बड़ी धन्यता हो ही नहीं सकती; और उसकी धन्यता की तुलना में, स्वर्गदूतों की धन्यता क्या है, यद्यपि अपनी सामर्थ्य के अनुसार वे पूर्णतः धन्य हों?

    12. उन धर्मियों की धन्यता की तुलना, जिन्हें अभी तक दिव्य प्रतिफल प्राप्त नहीं हुआ, हमारे आदि माता-पिता की स्वर्गोद्यान में की धन्यता के साथ

    और स्वर्गदूत ही तर्कशील और बौद्धिक सृष्टि के एकमात्र सदस्य नहीं हैं जिन्हें हम धन्य कहते हैं। क्योंकि कौन यह नकारने का साहस करेगा कि स्वर्गोद्यान में वे प्रथम मनुष्य, पाप से पहले, धन्य थे, यद्यपि वे इस बात से अनिश्चित थे कि उनकी धन्यता कब तक रहेगी, और क्या वह अनन्त होगी (और यदि वे पाप न करते तो वह अवश्य ही अनन्त होती) — मैं कहता हूँ, कौन ऐसा करेगा, यह देखते हुए कि अब भी हम बिना किसी अनुचितता के उन्हें धन्य कहते हैं जिन्हें हम अमरता की आशा में एक धर्मी और पवित्र जीवन जीते हुए देखते हैं, जिनके विवेक में कोई विदारक पश्चाताप नहीं है, वरन् जो अपनी वर्तमान दुर्बलता के पापों की दिव्य क्षमा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं? ये लोग, यद्यपि इस बात के निश्चित हैं कि यदि वे दृढ़ बने रहें तो उन्हें प्रतिफल मिलेगा, इस बात के निश्चित नहीं हैं कि वे दृढ़ बने रहेंगे। क्योंकि कौन मनुष्य यह जान सकता है कि वह अनुग्रह के अभ्यास और वृद्धि में अंत तक दृढ़ बना रहेगा, जब तक कि उसे उस परमेश्वर से किसी प्रकटीकरण द्वारा निश्चय न दिया गया हो, जो अपने न्यायपूर्ण और गुप्त न्याय में, यद्यपि किसी को धोखा नहीं देता, इस विषय में बहुत कम लोगों को सूचित करता है? तदनुसार, वर्तमान सुख की दृष्टि से, स्वर्गोद्यान में प्रथम मनुष्य इस असुरक्षित अवस्था के किसी भी धर्मी मनुष्य से अधिक धन्य था; परन्तु भावी कल्याण की आशा की दृष्टि से, प्रत्येक वह मनुष्य जो न केवल यह अनुमान लगाता है, वरन् निश्चय जानता है कि वह स्वर्गदूतों की संगति में, और बुराई की पहुँच से परे, परम प्रधान परमेश्वर का अनन्तकाल तक आनन्द लेगा — यह मनुष्य, चाहे उसे कैसी भी शारीरिक यातनाएँ सताएँ, उससे अधिक धन्य है जो, स्वर्गोद्यान की उस महान् धन्यता में भी, अपने भाग्य के विषय में अनिश्चित था।[468]

    13. क्या सभी स्वर्गदूत आरम्भ से एक ही सामान्य आनन्द की दशा में इस प्रकार सृजे गए थे कि जो गिर पड़े उन्हें अपने गिरने का पता न था, और जो स्थिर रहे उन्हें गिरे हुओं के विनाश के बाद अपनी दृढ़ता का निश्चय प्राप्त हुआ

    इन सब बातों से किसी को भी सहज ही यह समझ में आ जाएगा कि जिस आनन्द को कोई भी बुद्धिमान प्राणी अपने उचित लक्ष्य के रूप में चाहता है, वह इन दो बातों के मेल से प्राप्त होता है, अर्थात् यह कि वह उस अपरिवर्तनशील भलाई का, जो परमेश्वर है, निरन्तर भोग करे; और यह कि वह हर प्रकार के संदेह से मुक्त हो, और निश्चय जान ले कि वह सदा उसी भोग में बना रहेगा। हम भक्तिपूर्वक विश्वास करते हैं कि प्रकाश के स्वर्गदूतों की दशा ऐसी ही है; परन्तु बुद्धि हमें यह निष्कर्ष निकालने को विवश करती है कि पतित स्वर्गदूत, जिन्होंने अपने ही दोष से उस प्रकाश को खो दिया, पाप करने से पहले भी इस आनन्द का भोग नहीं करते थे। तौभी यदि उनके गिरने से पहले उनका जीवन कुछ समय तक चला हो, तो हमें मानना होगा कि उन्हें किसी प्रकार का आनन्द तो प्राप्त था, यद्यपि वह आनन्द वह नहीं था जिसके साथ पूर्वज्ञान भी हो। अथवा, यदि यह विश्वास करना कठिन जान पड़े कि जब स्वर्गदूत सृजे गए, तो कुछ को अपनी स्थिरता या पतन के विषय में अज्ञान की दशा में सृजा गया, जबकि दूसरों को अपने आनन्द की अनन्तता का पूर्ण निश्चय दिया गया—यदि यह विश्वास करना कठिन है कि वे सब आरम्भ से समान दशा में नहीं थे, जब तक कि जो अब बुरे हैं वे अपनी ही इच्छा से भलाई के प्रकाश से गिर न पड़े—तो निश्चय ही यह विश्वास करना कहीं अधिक कठिन है कि भले स्वर्गदूत अब अपने अनन्त आनन्द के विषय में अनिश्चित हैं, और अपने बारे में उतना भी नहीं जानते जितना हम पवित्रशास्त्र से उनके विषय में जान पाए हैं। क्योंकि कौन काथलिक मसीही यह नहीं जानता कि भले स्वर्गदूतों में कभी कोई नया शैतान उत्पन्न न होगा, जैसे वह यह जानता है कि यह वर्तमान शैतान भलों की संगति में फिर कभी न लौटेगा? क्योंकि सुसमाचार का सत्य सन्तों और विश्वासियों से प्रतिज्ञा करता है कि वे परमेश्वर के स्वर्गदूतों के समान होंगे; और उनसे यह भी प्रतिज्ञा की गई है कि वे "अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे।"[469] परन्तु यदि हमें यह निश्चय हो कि हम अनन्त आनन्द से कभी न गिरेंगे, जबकि उन्हें यह निश्चय नहीं है, तो हम उनके समान नहीं, वरन उनसे श्रेष्ठ होंगे। परन्तु चूँकि सत्य कभी धोखा नहीं देता, और चूँकि हम उनके समान होंगे, अतः उन्हें भी अपने आनन्द का निश्चय अवश्य होना चाहिए। और चूँकि दुष्ट स्वर्गदूतों को इसका निश्चय नहीं हो सकता था, क्योंकि उनका आनन्द अन्त होने वाला था, इसलिए या तो यह मानना होगा कि स्वर्गदूत असमान थे, या यह कि यदि वे समान थे, तो भले स्वर्गदूतों को दूसरों के विनाश के बाद अपने आनन्द की अनन्तता का निश्चय दिया गया; जब तक कि कोई यह न कहे कि प्रभु के शैतान के विषय में ये शब्द, "वह आरम्भ से हत्यारा था, और सत्य पर स्थिर नहीं रहा,"[470] ऐसे समझे जाने चाहिए मानो वह न केवल मानव जाति के आरम्भ से हत्यारा था, जब मनुष्य को, जिसे वह अपने छल से मार सकता था, बनाया गया, बल्कि यह भी कि वह अपनी ही सृष्टि के समय से सत्य पर स्थिर नहीं रहा, और इसलिए भले स्वर्गदूतों के साथ कभी धन्य नहीं रहा, वरन अपने सृष्टिकर्ता के अधीन होने से इनकार करके, मानो अपने ही एक निजी प्रभुत्व में, अभिमानपूर्वक उल्लसित हुआ, और इस प्रकार वह स्वयं धोखा खाया हुआ और धोखा देने वाला बना। क्योंकि सर्वशक्तिमान के आधिपत्य से बचा नहीं जा सकता; और जो कोई वस्तुओं को जैसी वे हैं वैसे भक्तिपूर्वक स्वीकार नहीं करता, वह अभिमानपूर्वक कल्पना करता है, और एक ऐसी दशा से अपने को धोखा देता है जो वस्तुतः है ही नहीं; इस प्रकार धन्य प्रेरित यूहन्ना के ये शब्द समझ में आने लगते हैं: "शैतान आरम्भ ही से पाप करता आया है,"[471]—अर्थात्, जिस समय से वह सृजा गया, उसने उस धार्मिकता को अस्वीकार कर दिया जिसका भोग केवल वही इच्छा कर सकती है जो भक्तिपूर्वक परमेश्वर के अधीन हो। जो कोई यह मत अपनाता है, वह कम से कम मानीवादी नामक विधर्मियों से, और किसी भी अन्य विनाशकारी सम्प्रदाय से असहमत है, जो यह समझता हो कि शैतान ने किसी विरोधी बुरे तत्त्व से अपने लिए एक अलग स्वभाव प्राप्त किया है। ये लोग भ्रम से इतने मूर्ख बना दिए गए हैं कि, यद्यपि वे हमारे साथ सुसमाचारों के अधिकार को स्वीकार करते हैं, तौभी वे यह ध्यान नहीं देते कि प्रभु ने यह नहीं कहा, "शैतान स्वभाव से ही सत्य के लिए पराया था," वरन यह कहा, "शैतान सत्य पर स्थिर नहीं रहा," जिससे उसका अर्थ यह समझाना था कि वह सत्य से गिर पड़ा था, जिसमें यदि वह स्थिर रहता, तो उसका भागी बनता, और भले स्वर्गदूतों के साथ आनन्द में बना रहता।[472]

    14. शैतान के विषय में जो कहा गया है उसकी व्याख्या, कि वह सत्य पर स्थिर नहीं रहा, क्योंकि सत्य उसमें नहीं था

    इसके अतिरिक्त, मानो हम यह पूछ रहे हों कि शैतान सत्य पर स्थिर क्यों नहीं रहा, हमारे प्रभु इसका कारण जोड़ते हुए कहते हैं, "क्योंकि उसमें सत्य नहीं है।" अब, यदि वह उस पर स्थिर रहता, तो सत्य उसमें होता। परन्तु यह वाक्य-रचना असाधारण है। क्योंकि जैसे ये शब्द हैं, "वह सत्य पर स्थिर नहीं रहा, क्योंकि उसमें सत्य नहीं है," ऐसा प्रतीत होता है मानो उसमें सत्य का न होना ही उसके स्थिर न रहने का कारण हो; जबकि वास्तव में उसका सत्य पर स्थिर न रहना ही उसमें सत्य के न होने का कारण है। यही रूप भजन में भी पाया जाता है: "मैंने तुझे पुकारा, क्योंकि हे परमेश्वर, तूने मेरी सुन ली है,"[473] जहाँ हमें यह अपेक्षा होती कि कहा जाता, हे परमेश्वर, तूने मेरी सुन ली है, क्योंकि मैंने तुझे पुकारा। परन्तु जब उसने कहा, "मैंने पुकारा," तो मानो कोई इसका प्रमाण खोज रहा हो, वह परमेश्वर के सुन लेने के परिणाम से अपनी प्रार्थना की सच्ची आर्तता प्रमाणित करता है; मानो उसने कहा हो, इस बात का प्रमाण कि मैंने प्रार्थना की, यही है कि तूने मेरी सुन ली।

    15. इन शब्दों को कैसे समझें, "शैतान आरम्भ ही से पाप करता है।"

    जहाँ तक यूहन्ना की उस बात का प्रश्न है, जो वह शैतान के विषय में कहता है, "शैतान आरम्भ ही से पाप करता आया है,"[474] वे लोग[475] जो यह समझते हैं कि इसका अर्थ यह है कि शैतान पापमय स्वभाव के साथ बनाया गया था, इसे गलत समझते हैं; क्योंकि यदि पाप स्वाभाविक हो, तो वह पाप ही नहीं रहता। और वे भविष्यद्वाणी के उन प्रमाणों का उत्तर कैसे देते हैं—चाहे वह यशायाह की यह बात हो जब वह बाबुल के राजा के रूप में शैतान का चित्रण करता है, "हे भोर के पुत्र शुक्र, तू आकाश से क्योंकर गिर पड़ा है!"[476] अथवा यहेजकेल की यह बात, "तू अदन में, परमेश्वर की बारी में था; हर एक मूल्यवान पत्थर तेरा आवरण था,"[477] जहाँ यह अर्थ है कि वह कुछ समय तक पाप-रहित था; क्योंकि थोड़ी दूर आगे और भी स्पष्ट रूप से कहा गया है, "तू अपनी चाल-चलन में सिद्ध था?" और यदि इन वचनों की और कोई व्याख्या भली-भाँति नहीं हो सकती, तो हमें इस वचन को भी, "वह सत्य पर स्थिर नहीं रहा," इसी प्रकार समझना होगा, कि वह कभी सत्य में था, परन्तु उसमें स्थिर नहीं रहा। और इस वचन से, "शैतान आरम्भ ही से पाप करता है," यह नहीं समझा जाना चाहिए कि उसने अपने सृजे जाने के आरम्भ से ही पाप किया, वरन अपने पाप के आरम्भ से, जब अपने अभिमान के कारण उसने पाप करना आरम्भ किया। अय्यूब की पुस्तक में भी एक वचन है, जिसका विषय शैतान है: "यह परमेश्वर की सृष्टि का आरम्भ है, जिसे उसने अपने स्वर्गदूतों के खेलने के लिये बनाया,"[478] जो उस भजन से मेल खाता है, जहाँ कहा गया है, "वहाँ वह अजगर है, जिसे तूने वहाँ खेलने के लिये बनाया है।"[479] परन्तु इन वचनों से हमें यह नहीं समझना चाहिए कि शैतान आरम्भ में स्वर्गदूतों के खेल का साधन बनने के लिए ही सृजा गया था, वरन यह कि उसे उसके पाप के बाद इस दण्ड के लिए ठहराया गया। अतः उसका आरम्भ परमेश्वर की हस्तकला है; क्योंकि ऐसा कोई स्वभाव नहीं, चाहे वह पशुओं में सबसे छोटा, सबसे नीचा और सबसे अन्तिम ही क्यों न हो, जो उसकी रचना न हो जिससे समस्त माप, समस्त रूप, और समस्त व्यवस्था उत्पन्न हुई है, जिनके बिना कुछ भी योजित या कल्पित नहीं किया जा सकता। तो फिर यह स्वर्गदूतीय स्वभाव, जो उसकी बनाई हुई अन्य सब वस्तुओं से गरिमा में बढ़कर है, कितना अधिक उस परमप्रधान की हस्तकला है!

    16. सृजी हुई वस्तुओं के पदक्रम और भेद के विषय में, चाहे उनकी उपयोगिता के अनुसार आँके जाएँ, या सत्ता के स्वाभाविक क्रम के अनुसार

    क्योंकि उन वस्तुओं में, जो अस्तित्व रखती हैं और जो परमेश्वर सृष्टिकर्ता के सत्त्व से नहीं हैं, जिनमें जीवन है वे उनसे ऊपर हैं जिनमें जीवन नहीं है; जिनमें उत्पन्न करने की, अथवा चाहने तक की शक्ति है, वे उनसे ऊपर हैं जिनमें यह सामर्थ्य नहीं है। और जीवधारियों में, जिनमें संवेदन-शक्ति है वे उनसे ऊँचे हैं जिनमें कोई संवेदना नहीं, जैसे पशु वृक्षों से ऊपर गिने जाते हैं। और संवेदनशील वस्तुओं में, बुद्धिमान वे हैं जो बुद्धिहीनों से ऊपर हैं—मनुष्य, यथा, पशुओं से ऊपर। और बुद्धिमानों में, अमर वस्तुएँ, जैसे स्वर्गदूत, नश्वरों से ऊपर हैं, जैसे मनुष्य। ये पदक्रम प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार हैं; परन्तु प्रत्येक मनुष्य किसी वस्तु में जो उपयोगिता पाता है उसके अनुसार मूल्य के विविध मापदण्ड होते हैं, जिससे यह होता है कि हम कुछ संवेदनहीन वस्तुओं को कुछ संवेदनशील प्राणियों से अधिक पसन्द करते हैं। और यह पसन्द इतनी प्रबल है कि यदि हमारे पास सामर्थ्य होता, तो हम इन प्राणियों को प्रकृति से सर्वथा मिटा देते, चाहे इसलिए कि हमें प्रकृति में उनका स्थान मालूम नहीं, या फिर, जानते हुए भी, अपनी सुविधा के लिए उन्हें बलि चढ़ा देते। यथा, कौन अपने घर में चूहों की अपेक्षा रोटी, और पिस्सुओं की अपेक्षा सोना नहीं रखना चाहेगा? परन्तु इसमें आश्चर्य की बहुत कम बात है, क्योंकि जब स्वयं मनुष्यों के द्वारा ही (जिनका स्वभाव निश्चय ही सर्वोच्च गरिमा का है) मूल्य आँका जाता है, तो प्रायः दास की अपेक्षा घोड़े के लिए, और दासी की अपेक्षा किसी रत्न के लिए अधिक दिया जाता है। इस प्रकार प्रकृति पर विचार करने वाले की बुद्धि उन निर्णयों से बहुत भिन्न निर्णय देती है जो अभावग्रस्त की आवश्यकता, या विषयी की लालसा द्वारा निर्धारित होते हैं; क्योंकि पहली सृष्टि के क्रम में किसी वस्तु का अपने आप में क्या मूल्य है इस पर विचार करती है, जबकि आवश्यकता इस पर विचार करती है कि वह वस्तु उसकी आवश्यकता को कैसे पूरा करती है; बुद्धि उसकी खोज करती है जिसे मानसिक ज्योति सत्य निर्णय देगी, जबकि सुखेच्छा उसकी खोज करती है जो शारीरिक इन्द्रिय को सुखद रूप से गुदगुदाए। परन्तु बुद्धिमान स्वभावों में इच्छा और प्रेम का, मानो कहें तो, इतना भार है कि यद्यपि प्रकृति के क्रम में स्वर्गदूत मनुष्यों से ऊपर हैं, तौभी न्याय के तराजू में, भले मनुष्य बुरे स्वर्गदूतों से अधिक मूल्यवान हैं।

    17. कि दुष्टता का दोष स्वभाव नहीं, वरन स्वभाव के विरुद्ध है, और इसका उद्गम सृष्टिकर्ता में नहीं, वरन इच्छा में है

    अतः इन शब्दों को, "यह परमेश्वर की हस्तकला का आरम्भ है,"[480] उसके स्वभाव के सन्दर्भ में समझा जाना चाहिए, न कि शैतान की दुष्टता के सन्दर्भ में; क्योंकि निःसन्देह, दुष्टता तभी दोष या विकार[481] हो सकती है जहाँ स्वभाव पहले से बिगड़ा हुआ नहीं था। विकार भी स्वभाव के इतना विरुद्ध है कि वह उसे हानि पहुँचाए बिना नहीं रह सकता। और इसलिए परमेश्वर से दूर हो जाना तभी विकार होता, जब वह ऐसे स्वभाव में हो जिसका गुण परमेश्वर के साथ बने रहना हो। अतः दुष्ट इच्छा भी स्वभाव की भलाई का एक सुदृढ़ प्रमाण है। परन्तु परमेश्वर, जैसा वह भले स्वभावों का परम भला सृष्टिकर्ता है, वैसा ही वह दुष्ट इच्छाओं का सर्वाधिक न्यायी शासक भी है; इसलिए, जब वे भले स्वभावों का दुरुपयोग करती हैं, तो वह दुष्ट इच्छाओं का भी भला उपयोग करता है। तदनुसार, उसने शैतान को (जो परमेश्वर की सृष्टि से भला था, अपनी इच्छा से दुष्ट बना) उसकी ऊँची पदवी से नीचे गिरा दिया, और अपने स्वर्गदूतों की हँसी का पात्र बना दिया,—अर्थात्, उसने उसके प्रलोभनों को उन्हीं के लाभ के लिए काम में लिया, जिन्हें वह उनके द्वारा हानि पहुँचाना चाहता था। और चूँकि परमेश्वर, जब उसने उसे सृजा, तो निश्चय ही उसकी भावी दुष्टता से अनजान नहीं था, और उस भलाई को पहले से जानता था जो वह स्वयं उसकी बुराई में से निकालेगा, इसलिए भजन कहता है, "यह लिव्यातान, जिसे तूने वहाँ खेलने के लिये बनाया है,"[482] जिससे हम देख सकें कि यद्यपि परमेश्वर ने अपनी भलाई से उसे भला सृजा, तौभी उसने पहले से यह देख और ठहरा रखा था कि जब वह दुष्ट बनेगा तब वह उसका उपयोग किस प्रकार करेगा।

    18. जगत की उस सुन्दरता के विषय में, जो परमेश्वर की व्यवस्था द्वारा विपरीत वस्तुओं के विरोध से और भी उज्ज्वल हो जाती है

    क्योंकि परमेश्वर कभी किसी को नहीं सृजता—मैं स्वर्गदूत की बात नहीं कहता, वरन मनुष्य तक को भी नहीं—जिसकी भावी दुष्टता को वह पहले से जानता हो, यदि वह समान रूप से यह भी न जानता हो कि वह उसे भलाई के पक्ष में किन-किन कामों में लगा सकेगा, इस प्रकार युगों के प्रवाह को, मानो विरोधाभासों से सजी हुई किसी उत्तम कविता के समान, अलंकृत करते हुए। क्योंकि जिन्हें प्रतिविरोध (antithesis) कहा जाता है, वे वाणी के अलंकारों में सबसे मनोहर हैं। इन्हें लातीनी में "विरोध" कहा जा सकता है, या अधिक शुद्ध रूप से कहें तो "प्रति-स्थापन"; परन्तु यह शब्द हमारे बीच सामान्य प्रयोग में नहीं है,[483] यद्यपि लातीनी भाषा, और वास्तव में सब जातियों की भाषाएँ, शैली के इन्हीं अलंकारों का उपयोग करती हैं। कुरिन्थियों के दूसरे पत्र में प्रेरित पौलुस भी प्रतिविरोध का सुन्दर उपयोग करता है, वहाँ जहाँ वह कहता है, "धार्मिकता के हथियारों से जो दाहिने और बाएँ हैं; आदर और अनादर से, अपवाद और सुख्याति से; ठगनेवालों के समान, तौभी सच्चे; अनजाने के समान, तौभी पहचाने हुए; मरनेवालों के समान, और देखो, हम जीवित हैं; ताड़ना पाए हुओं के समान, तौभी न मारे गए; शोक करनेवालों के समान, तौभी सर्वदा आनन्दित; कंगालों के समान, तौभी बहुतों को धनी बनानेवाले; कुछ न रखनेवालों के समान, तौभी सब कुछ के अधिकारी।"[484] अतः जैसे इन विपरीत वस्तुओं के विरोध भाषा को सुन्दरता देते हैं, वैसे ही इस संसार के प्रवाह की सुन्दरता विपरीत वस्तुओं के विरोध से सिद्ध होती है, जो मानो शब्दों की नहीं वरन वस्तुओं की वाक्पटुता द्वारा व्यवस्थित की गई हो। यह बात सिराक की पुस्तक (Ecclesiasticus) में इस प्रकार बड़ी स्पष्टता से कही गई है: "भलाई बुराई के सामने, और जीवन मृत्यु के सामने रखा गया है; वैसे ही पापी धर्मी के सामने है। इसी प्रकार परमप्रधान के सब कार्यों को देख, ये सब जोड़े-जोड़े, एक दूसरे के विरुद्ध हैं।"[485]

    19. जो प्रतीत होता है, इन शब्दों से हमें क्या समझना चाहिए, "परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया।"

    तदनुसार, यद्यपि दिव्य वचन की अस्पष्टता में निश्चय ही यह गुण है कि वह सत्य के विषय में अनेक मतों को उठाने और उन पर विचार-विमर्श कराने का कारण बनती है, जिससे प्रत्येक पाठक उसमें कोई नया अर्थ देखता है, तौभी किसी अस्पष्ट वाक्यांश का जो भी अर्थ बताया जाए, उसे या तो स्पष्ट तथ्यों की साक्षी से पुष्ट किया जाना चाहिए, या फिर अन्य कम अस्पष्ट वचनों से सिद्ध किया जाना चाहिए। यह अस्पष्टता लाभदायक है, चाहे लेखक का अभिप्राय अन्ततः अनेक अन्य व्याख्याओं पर विचार करने के बाद प्राप्त हो, या चाहे वह अभिप्राय छिपा ही रहे, परन्तु उस अस्पष्टता पर विचार-विमर्श से अन्य सत्य प्रकट हो जाएँ। मुझे तो यह परमेश्वर के कार्य के विरुद्ध प्रतीत नहीं होता, यदि हम यह समझें कि स्वर्गदूत तब सृजे गए जब वह पहला उजियाला बनाया गया, और पवित्र तथा अशुद्ध स्वर्गदूतों के बीच वियोजन तब हुआ जब, जैसा कहा गया है, "परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया; और परमेश्वर ने उजियाले को दिन, और अन्धियारे को रात कहा।" क्योंकि यह विभेद केवल वही कर सकता था, जो उनके गिरने से पहले ही यह भी जान सकता था कि वे गिरेंगे, और यह कि सत्य के प्रकाश से वंचित होकर वे अभिमान के अन्धकार में बने रहेंगे। क्योंकि जहाँ तक उस दिन और रात का सम्बन्ध है, जिनसे हम परिचित हैं, उसने आकाश की उन ज्योतियों को, जो हमारी इन्द्रियों को स्पष्ट दिखाई देती हैं, उजियाले और अन्धियारे के बीच अलग करने की आज्ञा दी। "आकाश के अन्तर में ज्योतियां हों," वह कहता है, "जिनके द्वारा दिन और रात अलग हों;" और थोड़ी देर बाद वह कहता है, "और परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियां बनाईं; बड़ी ज्योति को दिन पर प्रभुता करने के लिये, और छोटी ज्योति को रात पर प्रभुता करने के लिये; और तारागण को भी बनाया। और परमेश्वर ने उन्हें आकाश के अन्तर में रखा, कि वे पृथ्वी पर प्रकाश दें, और दिन तथा रात पर प्रभुता करें, और उजियाले को अन्धियारे से अलग करें।"[486] परन्तु उस उजियाले के बीच, जो स्वर्गदूतों की वह पवित्र मण्डली है जो सत्य की ज्योति से आत्मिक रूप से प्रकाशमान है, और उस विरोधी अन्धकार के बीच, जो उन स्वर्गदूतों की आत्मिक दशा की दुर्गन्धयुक्त मलिनता है जो धार्मिकता के प्रकाश से फिर गए, केवल वही अलग कर सकता था, जिससे उनकी दुष्टता (जो स्वभाव की नहीं, वरन इच्छा की थी), यद्यपि वह अभी भविष्य में थी, न तो छिपी रह सकती थी और न अनिश्चित।

    20. उजियाले और अन्धियारे के वियोजन के बाद आने वाले इन शब्दों के विषय में, "और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है।"

    अब, हमें पवित्रशास्त्र के इस वाक्यांश से बिना ध्यान दिए आगे नहीं बढ़ना चाहिए कि जब परमेश्वर ने कहा, "उजियाला हो: तो उजियाला हो गया," तो तुरन्त यह जोड़ा गया, "और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है।" इस प्रकार का कोई कथन इस विवरण के बाद नहीं आया कि उसने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया, और उजियाले को दिन तथा अन्धियारे को रात कहा, ऐसा न हो कि उसकी स्वीकृति की मुहर उजियाले के साथ-साथ उस अन्धियारे पर भी लगी हुई प्रतीत हो। क्योंकि जब अन्धियारा अस्वीकृति का विषय नहीं था, जैसे जब उसे आकाशीय पिण्डों द्वारा उस उजियाले से अलग किया गया जिसे हमारी आँखें देखती हैं, तब यह कथन कि परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है, वियोजन के अभिलिखित होने से पहले नहीं, वरन उसके बाद डाला गया है। "और परमेश्वर ने उन्हें," यह वाक्यांश इस प्रकार चलता है, "आकाश के अन्तर में रखा, कि वे पृथ्वी पर प्रकाश दें, और दिन तथा रात पर प्रभुता करें, और उजियाले को अन्धियारे से अलग करें: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।" क्योंकि उसने दोनों को स्वीकृत किया, क्योंकि दोनों निष्पाप थे। परन्तु जहाँ परमेश्वर ने कहा, "उजियाला हो: तो उजियाला हो गया; और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है;" और विवरण आगे कहता है, "और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया: और परमेश्वर ने उजियाले को दिन, और अन्धियारे को रात कहा," वहाँ इस स्थान पर यह कथन नहीं जोड़ा गया, "और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है," ऐसा न हो कि दोनों को अच्छा कहा जाए, जबकि उनमें से एक बुरा था, स्वभाव से नहीं, वरन अपने ही दोष से। और इसलिए, इस दशा में, केवल उजियाले को ही सृष्टिकर्ता की स्वीकृति मिली, जबकि स्वर्गदूतीय अन्धकार, यद्यपि वह ठहराया गया था, तौभी स्वीकृत नहीं हुआ।

    21. परमेश्वर के अनादि और अपरिवर्तनशील ज्ञान और इच्छा के विषय में, जिसके द्वारा उसने जो कुछ बनाया वह उसे अनादि योजना में भी और वास्तविक परिणाम में भी भाया

    क्योंकि उस अपरिवर्तित पुनरावृत्ति से, "और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है," और क्या समझा जाना चाहिए, सिवाय इसके कि यह उस कार्य की योजना का अनुमोदन है, जो परमेश्वर की बुद्धि है? क्योंकि निश्चय ही परमेश्वर ने कार्य की वास्तविक सिद्धि में पहली बार यह नहीं जाना कि वह अच्छा है, वरन इसके विपरीत, यदि वह पहले से उसके द्वारा नहीं जाना गया होता, तो कुछ भी नहीं बनाया जाता। इसलिए, जब वह यह देखता है कि वह अच्छा है, जिसे यदि उसने बनने से पहले न देखा होता, तो वह कभी नहीं बनता, तो यह स्पष्ट है कि वह उसकी अच्छाई को खोज नहीं रहा, वरन सिखा रहा है। प्लेटो ने तो यहाँ तक साहस किया कि कहा, जब जगत पूर्ण हो गया, परमेश्वर मानो आनन्द से उल्लसित हो उठा।[487] और प्लेटो इतना मूर्ख नहीं था कि इसका यह अर्थ चाहता हो कि परमेश्वर अपनी सृष्टि की नवीनता से अधिक धन्य बना दिया गया; वरन वह इस प्रकार यह दिखाना चाहता था कि अब पूर्ण हुआ कार्य अपने बनाने वाले की स्वीकृति को उसी प्रकार प्राप्त हुआ जैसे वह योजना में रहते हुए प्राप्त कर चुका था। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर का ज्ञान विभिन्न प्रकार का हो, जो उन वस्तुओं को जो अभी नहीं हैं, उन्हें जो हैं, और उन्हें जो हो चुकी हैं, भिन्न-भिन्न रीति से जानता हो। क्योंकि वह हमारी रीति के अनुसार न तो आगे की ओर भविष्य को देखता है, न वर्तमान की ओर, न पीछे मुड़कर बीते हुए को; वरन एक ऐसी रीति से जो हमारे सोचने के ढंग से सर्वथा भिन्न और बहुत तथा गहराई से दूर है। क्योंकि वह विचार के संक्रमण द्वारा इस से उस की ओर नहीं जाता, वरन समस्त वस्तुओं को पूर्ण अपरिवर्तनीयता के साथ देखता है; इसलिए जो वस्तुएँ समय में प्रकट होती हैं, उनमें भविष्य अभी नहीं हैं, वर्तमान अभी हैं, और भूत अब नहीं हैं; परन्तु ये सब उसके द्वारा उसकी स्थिर और अनादि वर्तमानता में समाहित हैं। न ही वह एक रीति से आँख द्वारा और दूसरी रीति से मन द्वारा देखता है, क्योंकि वह मन और शरीर से मिलकर नहीं बना है; न ही उसका वर्तमान ज्ञान उससे भिन्न है जो वह सदा था या सदा रहेगा, क्योंकि समय के वे परिवर्तन—भूत, वर्तमान, और भविष्य—यद्यपि हमारे ज्ञान को बदलते हैं, तौभी उसके ज्ञान को प्रभावित नहीं करते, "जिसमें न कोई परिवर्तन और न फिरने की परछाईं है।"[488] उसकी उन धारणाओं में, जिनकी आत्मिक दृष्टि में वह जो कुछ जानता है वह एक साथ ही समाहित है, विचार से विचार की ओर कोई वृद्धि भी नहीं है। क्योंकि जैसे बिना किसी ऐसी गति के जिसे समय माप सके, वह स्वयं सब कालिक वस्तुओं को गति देता है, वैसे ही वह सब कालों को ऐसे ज्ञान से जानता है जिसे समय माप नहीं सकता। और इसलिए उसने देखा कि जो उसने बनाया वह अच्छा था, जब उसने देखा कि उसे बनाना अच्छा है। और जब उसने उसे बना हुआ देखा, तो इस कारण उसका ज्ञान न तो दुगना हुआ, न किसी रीति से बढ़ा; मानो उसे जो उसने देखा उसे बनाने से पहले कम ज्ञान था। क्योंकि निश्चय ही वह वैसा सिद्ध कर्ता न होता जैसा वह है, यदि उसका ज्ञान इतना सिद्ध न होता कि उसके पूर्ण किए गए कार्यों से उसमें कोई वृद्धि न हो। इसलिए, यदि केवल यही उद्देश्य होता कि हमें बताया जाए कि उजियाले को किसने बनाया, तो यह कहना पर्याप्त होता, "परमेश्वर ने उजियाला बनाया;" और यदि उन साधनों के विषय में जिनसे वह बनाया गया, आगे की जानकारी देना अभिप्रेत होता, तो यह कहना पर्याप्त होता, "और परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो: तो उजियाला हो गया," जिससे हम न केवल यह जान सकें कि परमेश्वर ने जगत को बनाया, वरन यह भी कि उसने उसे वचन के द्वारा बनाया। परन्तु चूँकि यह उचित था कि सृष्टि के विषय में तीन प्रमुख सत्य हमें बताए जाएँ, अर्थात्, किसने उसे बनाया, किन साधनों से, और क्यों, इसलिए लिखा है, "परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो: तो उजियाला हो गया। और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है।" यदि, तो, हम पूछें कि उसे किसने बनाया, तो वह "परमेश्वर" था। यदि, किन साधनों से, तो उसने कहा "हो जाए," और वह हो गया। यदि हम पूछें, उसने उसे क्यों बनाया, तो "वह अच्छा था।" न तो परमेश्वर से बढ़कर कोई रचयिता है, न परमेश्वर के वचन से बढ़कर कोई सामर्थ्यशाली कौशल है, न इससे उत्तम कोई कारण है कि भला परमेश्वर भलाई की सृष्टि करे। यही कारण प्लेटो ने भी जगत की सृष्टि का सबसे पर्याप्त कारण ठहराया है, कि भले परमेश्वर द्वारा भले कार्य किए जाएँ;[489] चाहे उसने यह वचन पढ़ा हो, या शायद उसे इन बातों की सूचना उन लोगों से मिली हो जिन्होंने उन्हें पढ़ा था, या अपनी तीव्र प्रतिभा से, सृजी हुई वस्तुओं के द्वारा आत्मिक और अदृश्य वस्तुओं में प्रवेश कर गया हो, या उन लोगों द्वारा उनके विषय में सिखाया गया हो जिन्होंने उन्हें जान लिया था।

    22. उनके विषय में जो भले सृष्टिकर्ता की इस भली सृष्टि के कुछ अंशों को स्वीकार नहीं करते, और जो यह सोचते हैं कि कोई स्वाभाविक बुराई है

    तथापि, भली सृष्टि का यह कारण, अर्थात् परमेश्वर की भलाई—यह कारण, मैं कहता हूँ, इतना न्यायसंगत और उपयुक्त, जिसे भक्तिपूर्वक और सावधानी से तौलने पर जगत की उत्पत्ति के विषय में जाँच करने वालों के सब विवादों का अन्त हो जाता है—कुछ विधर्मियों[490] द्वारा नहीं पहचाना गया, क्योंकि निस्सन्देह ऐसी अनेक वस्तुएँ हैं, जैसे आग, पाला, हिंसक पशु, और इसी प्रकार की अन्य वस्तुएँ, जो हमारे इस पतले रक्त वाले और दुर्बल नश्वर शरीर के अनुकूल नहीं, वरन उसे हानि पहुँचाती हैं, जो इस समय न्यायसंगत दण्ड के अधीन है। वे यह विचार नहीं करते कि ये वस्तुएँ अपने-अपने स्थानों में कितनी प्रशंसनीय हैं, अपने-अपने स्वभावों में कितनी उत्तम हैं, शेष सृष्टि के साथ कितनी सुन्दरता से समायोजित हैं, और अपने-अपने योगदानों द्वारा, मानो किसी राज्य में, जगत को कितना सौन्दर्य प्रदान करती हैं; और वे हमारे लिए भी कितनी उपयोगी हैं, यदि हम उन्हें उनके उपयुक्त प्रयोगों के ज्ञान के साथ काम में लाएँ—यहाँ तक कि विष भी, जो अविवेकपूर्ण प्रयोग से विनाशकारी होते हैं, अपने गुणों और उद्देश्य के अनुरूप प्रयोग करने पर स्वास्थ्यप्रद और औषधीय बन जाते हैं; जैसे, इसके विपरीत, वे वस्तुएँ जो हमें सुख देती हैं, जैसे भोजन, पेय, और सूर्य का प्रकाश, अत्यधिक या असमय प्रयोग करने पर हानिकारक पाई जाती हैं। और इस प्रकार दिव्य विधान हमें यह चेतावनी देता है कि हम वस्तुओं की मूर्खतापूर्वक निन्दा न करें, वरन उनकी उपयोगिता की सावधानी से खोज करें; और जहाँ हमारी मानसिक क्षमता या दुर्बलता चूक जाए, वहाँ यह विश्वास करें कि कोई उपयोगिता है, भले ही वह छिपी हो, जैसा हमने अनुभव किया है कि कुछ अन्य वस्तुएँ भी थीं जिन्हें हम लगभग खोज ही न पाए। क्योंकि वस्तुओं के उपयोग का यह छिपाव स्वयं या तो हमारी नम्रता का अभ्यास है, या हमारे अभिमान को समतल करना है; क्योंकि कोई भी स्वभाव सर्वथा बुरा नहीं है, और यह नाम केवल भलाई के अभाव के लिए है, और किसी वस्तु के लिए नहीं। परन्तु पार्थिव वस्तुओं से लेकर स्वर्गीय वस्तुओं तक, दृश्य से अदृश्य तक, कुछ वस्तुएँ दूसरों से उत्तम हैं; और इसी उद्देश्य के लिए वे असमान हैं, कि वे सब अस्तित्व में रह सकें। अब परमेश्वर बड़ी वस्तुओं में इतना बड़ा कर्ता है, कि वह छोटी वस्तुओं में भी कम नहीं है—क्योंकि इन छोटी वस्तुओं को उनकी अपनी बड़ाई से नहीं (जो अस्तित्व में ही नहीं), वरन उनके रचने वाले की बुद्धि से मापा जाना चाहिए; जैसे, मनुष्य के दृश्य रूप में, यदि एक भौंह मूँड़ दी जाए, तो शरीर से तो लगभग कुछ भी नहीं लिया जाता, परन्तु सौन्दर्य से कितना कुछ लिया जाता है!—क्योंकि सौन्दर्य आकार से नहीं, वरन अंगों के अनुपात और व्यवस्था से बनता है। परन्तु हमें इस बात पर अधिक आश्चर्य नहीं होता कि जो लोग यह मानते हैं कि किसी बुरे स्वभाव को किसी विरोधी सिद्धान्त द्वारा, जो उसके अपने अनुरूप हो, उत्पन्न और प्रसारित किया गया है, वे यह स्वीकार करने से इनकार करते हैं कि सृष्टि का कारण यह था कि भले परमेश्वर ने भली सृष्टि उत्पन्न की। क्योंकि वे यह विश्वास करते हैं कि वह उस बुराई को, जो उसके विरुद्ध युद्ध कर रही थी, दूर करने की तीव्र आवश्यकता से इस सृष्टि के कार्य में प्रवृत्त हुआ, और उसने अपने भले स्वभाव को उस बुराई के साथ, उसे रोकने और जीतने के लिए मिला दिया; और यह कि उसका यह स्वभाव, इस प्रकार लज्जाजनक रूप से मलिन होकर, और अत्यन्त क्रूरता से दबाया और बन्दी बनाया जाकर, वह उसे शुद्ध करने और छुड़ाने का परिश्रम करता है, और अपने सारे परिश्रम के बावजूद पूरी तरह सफल नहीं होता; परन्तु उसका वह भाग जो उस मलिनता से शुद्ध नहीं किया जा सका, पराजित और बन्दी बनाए गए शत्रु के लिए बन्दीगृह और बेड़ी का काम देता है। मानीवादी इस प्रकार की बकवास, या यों कहें, प्रलाप न करते, यदि वे परमेश्वर के स्वभाव को, जैसा वह वस्तुतः है, अपरिवर्तनीय और सर्वथा अविनाशी, और किसी हानि के अधीन न मानते; और यदि, इसके अतिरिक्त, वे मसीही सुबुद्धि के साथ यह मानते कि जिस आत्मा ने अपने आप को अपनी ही इच्छा से बुरे की ओर परिवर्तित होने में, और पाप से भ्रष्ट होने में, और इस प्रकार अनादि सत्य के प्रकाश से वंचित होने में समर्थ दिखाया है—यह आत्मा, मैं कहता हूँ, न तो परमेश्वर का अंश है, न परमेश्वर के समान स्वभाव की है, वरन उसके द्वारा सृजी गई है, और अपने सृष्टिकर्ता से बहुत भिन्न है।

    23. उस भ्रम के विषय में जिसमें ओरिजन का सिद्धान्त फँसा हुआ है

    परन्तु यह और भी अधिक आश्चर्य की बात है कि उनमें से भी कुछ, जो हमारे साथ यह विश्वास करते हैं कि समस्त वस्तुओं का एक ही स्रोत है, और कि कोई भी स्वभाव जो दिव्य नहीं, उस सृष्टिकर्ता से उत्पन्न हुए बिना अस्तित्व में नहीं आ सकता, तौभी उन्होंने जगत की सृष्टि के इस अत्यन्त भले और सरल कारण को भले और सरल विश्वास के साथ स्वीकार करने से इनकार कर दिया है, कि भले परमेश्वर ने उसे भला बनाया; और कि सृजी हुई वस्तुएँ, परमेश्वर से भिन्न होते हुए भी, उससे निम्न थीं, तथापि भली थीं, क्योंकि वे किसी और के द्वारा नहीं, वरन उसी के द्वारा सृजी गई थीं। परन्तु वे कहते हैं कि आत्माएँ, यद्यपि निस्सन्देह परमेश्वर के अंश नहीं, वरन उसके द्वारा सृजी गई हैं, तौभी उन्होंने परमेश्वर को त्यागकर पाप किया; कि, अपने-अपने विविध पापों के अनुपात में, उन्होंने स्वर्ग से लेकर पृथ्वी तक भिन्न-भिन्न मात्रा में अवनति, और बन्दीगृहों के समान भिन्न-भिन्न शरीर अर्जित किए; और कि यही जगत है, और यही इसकी सृष्टि का कारण है—भली वस्तुओं का उत्पादन नहीं, वरन बुराई का निरोध। ओरिजन को यह मत रखने के लिए न्यायोचित रूप से दोष दिया जाता है। क्योंकि उन पुस्तकों में जिन्हें वह περὶ ἀρχῶν, अर्थात्, उत्पत्तियों के विषय में, नाम देता है, यही उसका मत है, यही उसका कथन है। और मैं अपने आश्चर्य को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं कर सकता, कि इतना विद्वान और कलीसियाई साहित्य में इतना पारंगत व्यक्ति, यह पहले तो देख ही न सका कि यह इस प्रामाणिक पवित्रशास्त्र के अभिप्राय के कितना विरुद्ध है, जो परमेश्वर के सब कार्यों का वर्णन करते हुए, नियमित रूप से यह जोड़ता है, "और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है;" और जब सब कुछ पूरा हो गया, तो ये शब्द डालता है, "और परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था उसे देखा तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है।"[491] क्या इसका स्पष्ट अभिप्राय यह समझा जाना नहीं था कि जगत की सृष्टि का इसके सिवा और कोई कारण नहीं था कि भले परमेश्वर द्वारा भले प्राणी बनाए जाएँ? इस सृष्टि में, यदि किसी ने पाप न किया होता, तो जगत बिना किसी अपवाद के भले स्वभावों से भर जाता और सुशोभित होता; और यद्यपि पाप है, तौभी सब वस्तुएँ इस कारण पाप से भरी हुई नहीं हैं, क्योंकि स्वर्गीय निवासियों का बहुत बड़ा भाग अपने स्वभाव की सिद्धता बनाए रखता है। और पापमय इच्छा, यद्यपि उसने अपने ही स्वभाव की व्यवस्था का उल्लंघन किया, तौभी इस कारण वह परमेश्वर की व्यवस्थाओं से नहीं बच सकी, जो समस्त वस्तुओं को न्यायपूर्वक भलाई के लिए व्यवस्थित करता है। क्योंकि जैसे किसी चित्र की सुन्दरता भली-भाँति संयोजित छायाओं से बढ़ जाती है, वैसे ही, उस दृष्टि के लिए जिसमें उसे परखने का कौशल हो, यह जगत पापियों द्वारा भी सुशोभित होता है, यद्यपि, अपने आप में देखा जाए तो, उनकी विकृति एक दुःखद कलंक है।

    दूसरी बात, ओरिजन को, और उसके साथ मत रखने वाले सबको, यह देखना चाहिए था कि यदि यह सच्चा मत होता कि जगत इसलिए सृजा गया कि आत्माओं को उनके पापों के कारण, ऐसे शरीरों से युक्त किया जाए जिनमें वे सुधार-गृहों के समान बन्द रहें, जिसमें हल्के पाप करने वालों को हल्के और अधिक तेजस्वी शरीर, और स्थूल तथा गम्भीर पाप करने वालों को अधिक स्थूल और नीच शरीर मिलें, तो इससे यह परिणाम निकलता कि दुष्टात्माएँ, जो दुष्टता में सबसे गहरी हैं, दुष्ट मनुष्यों से भी अधिक, पार्थिव शरीर पाने योग्य होतीं, क्योंकि ये सबसे स्थूल और सबसे कम तेजस्वी शरीर हैं। परन्तु वास्तव में, जिससे हम देख सकें कि आत्माओं के योग्यार्ह की माप शरीरों के गुणों से नहीं की जानी चाहिए, सबसे दुष्ट शैतान एक तेजस्वी शरीर रखता है, जबकि मनुष्य, जो दुष्ट तो है, परन्तु उसकी तुलना में उसकी दुष्टता छोटी और क्षम्य है, उसे अपने पाप से पहले ही मिट्टी का शरीर मिला। और इससे अधिक मूर्खतापूर्ण दावा और क्या हो सकता है कि परमेश्वर ने, हमारे इस सूर्य के द्वारा, भौतिक सृष्टि को लाभ पहुँचाने, या उसकी सुन्दरता को चमक देने का उद्देश्य नहीं रखा, और इसलिए इस एक जगत के लिए एक ही सूर्य बनाया, वरन यह कि संयोगवश केवल एक ही आत्मा ने ऐसा पाप किया था कि वह ऐसे शरीर में बन्द किए जाने योग्य ठहरी जैसा वह है? इस सिद्धान्त के अनुसार, यदि संयोग से एक नहीं, वरन दो, या दस, या सौ आत्माओं ने समान रूप से, और समान मात्रा के दोष के साथ पाप किया होता, तो इस जगत में सौ सूर्य होते। और यह कि ऐसा नहीं है, इसका कारण सृष्टिकर्ता की वह विचारशील दूरदर्शिता नहीं है जो भौतिक वस्तुओं की सुरक्षा और सुन्दरता की योजना बनाती है, वरन यह तथ्य है कि पाप करने का ऐसा विशिष्ट गुण केवल एक ही आत्मा को मिला, जिससे केवल उसी ने ऐसा शरीर अर्जित किया। स्पष्ट है कि ऐसे मत रखने वाले व्यक्तियों को उन आत्माओं को नहीं, जिनके विषय में वे नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं, वरन स्वयं अपने आप को बन्द करने का लक्ष्य रखना चाहिए, ऐसा न हो कि वे गिर पड़ें, और उचित रूप से, सत्य से बहुत दूर जा पड़ें। और जहाँ तक उन तीन उत्तरों का प्रश्न है जिनकी मैंने पहले सिफारिश की थी, कि जब किसी सृजी हुई वस्तु के विषय में ये प्रश्न पूछे जाएँ, उसे किसने बनाया? किन साधनों से? क्यों?—कि उत्तर दिया जाए, परमेश्वर ने, वचन के द्वारा, क्योंकि वह अच्छा था—इन तीन उत्तरों के विषय में यह अत्यन्त संदिग्ध है कि क्या इनमें स्वयं त्रित्व का ही, अर्थात् पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा का, इस प्रकार रहस्यमय रूप से संकेत दिया गया है, या क्या पवित्रशास्त्र के इस वाक्यांश में इस अर्थ के लिए कोई और भला कारण है—यह, मैं कहता हूँ, संदिग्ध है, और किसी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह एक ही ग्रन्थ में सब कुछ स्पष्ट कर दे।

    24. दिव्य त्रित्व के विषय में, और उसकी उपस्थिति के उन संकेतों के विषय में जो उसके कार्यों में सर्वत्र बिखरे हुए हैं

    हम विश्वास करते हैं, हम दृढ़ता से मानते हैं, हम विश्वासपूर्वक प्रचार करते हैं, कि पिता ने वचन को, अर्थात् बुद्धि को, जिसके द्वारा सब वस्तुएँ बनाई गईं, जन्म दिया—एकलौता पुत्र, एक वैसे ही जैसे पिता एक है, अनादि वैसे ही जैसे पिता अनादि है, और, पिता के समान ही, परम भला; और कि पवित्र आत्मा पिता और पुत्र दोनों का समान रूप से आत्मा है, और स्वयं दोनों के साथ एक ही सत्ता का और समान रूप से अनादि है; और कि यह सम्पूर्ण, व्यक्तित्वों[492] की भिन्नता के कारण त्रित्व है, और अखण्ड दिव्य सत्ता के कारण एक परमेश्वर है, जैसे अखण्ड सर्वशक्तिमत्ता के कारण एक सर्वशक्तिमान भी है; तथापि इस प्रकार कि, जब हम प्रत्येक के विषय में अलग-अलग पूछते हैं, तो कहा जाता है कि प्रत्येक परमेश्वर और सर्वशक्तिमान है; और, जब हम सबके विषय में एक साथ कहते हैं, तो कहा जाता है कि न तीन परमेश्वर हैं, न तीन सर्वशक्तिमान, वरन एक ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर है; इन तीनों की अखण्ड एकता इतनी महान है, कि इसे इसी प्रकार कहा जाना आवश्यक है। परन्तु, क्या पिता और पुत्र का पवित्र आत्मा, जो दोनों भले हैं, उचित रूप से दोनों की भलाई कहा जा सकता है, क्योंकि वह दोनों के लिए समान है, इसे मैं उतावली से निर्धारित करने का साहस नहीं करता। तथापि, मुझे यह कहने में कम संकोच होगा कि वह दोनों की पवित्रता है, न कि मानो वह केवल एक दिव्य गुण हो, वरन वह स्वयं भी दिव्य सत्ता है, और त्रित्व में तीसरा व्यक्ति है। मुझे यह कहने का साहस इसलिए अधिक होता है, क्योंकि, यद्यपि पिता आत्मा है, और पुत्र आत्मा है, और पिता पवित्र है, और पुत्र पवित्र है, तौभी तीसरा व्यक्ति विशिष्ट रूप से पवित्र आत्मा कहलाता है, मानो वह अन्य दोनों के साथ एक ही सत्ता वाली सारभूत पवित्रता हो। परन्तु यदि दिव्य भलाई दिव्य पवित्रता से भिन्न कुछ नहीं है, तो निश्चय ही यह एक युक्तिसंगत जिज्ञासा है, न कि धृष्टतापूर्ण हस्तक्षेप, यह खोजना कि क्या वही त्रित्व किसी रहस्यमय वाक्-शैली में संकेतित नहीं है, जिसके द्वारा हमारी जिज्ञासा उत्तेजित होती है, जब यह लिखा जाता है कि प्रत्येक सृजी हुई वस्तु को किसने बनाया, किन साधनों से, और क्यों। क्योंकि वचन का पिता ही है जिसने कहा, हो जाए। और जो कुछ तब बना जब उसने कहा, वह निश्चय ही वचन के साधन से बना। और इन शब्दों से, "परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है," पर्याप्त रूप से संकेत मिलता है कि परमेश्वर ने जो बनाया वह किसी आवश्यकता से नहीं, न किसी अभाव की पूर्ति के लिए, वरन केवल अपनी ही भलाई से बनाया, अर्थात्, क्योंकि वह अच्छा था। और यह सृष्टि हो जाने के बाद कहा गया है, जिससे इसमें कोई सन्देह न रहे कि बनाई गई वस्तु ने उस भलाई को सन्तुष्ट किया जिसके कारण वह बनाई गई। और यदि हम यह समझने में सही हैं कि यह भलाई पवित्र आत्मा है, तो सम्पूर्ण त्रित्व हमें सृष्टि में प्रकट है। इसी में उस पवित्र नगर का भी, अर्थात् परमेश्वर के उस नगर का जो ऊपर भले स्वर्गदूतों के बीच है, उद्गम, ज्ञानोदय, और आनन्द है। क्योंकि यदि हम पूछें कि वह कहाँ से है, तो परमेश्वर ने उसे सृजा; अथवा उसकी बुद्धि कहाँ से है, तो परमेश्वर ने उसे प्रकाशित किया; अथवा उसका आनन्द कहाँ से है, तो परमेश्वर ही उसका आनन्द है। उसे अपना रूप उसी में बने रहने से मिलता है; अपना ज्ञानोदय उसी पर ध्यान करने से; अपना आनन्द उसी में बने रहने से। वह है; वह देखता है; वह प्रेम करता है। परमेश्वर की अनादिता में उसका जीवन है; परमेश्वर के सत्य में उसका प्रकाश है; परमेश्वर की भलाई में उसका आनन्द है।

    25. दर्शनशास्त्र के तीन भागों में विभाजन के विषय में

    जहाँ तक कोई निर्णय कर सकता है, यह उसी कारण से है कि दार्शनिकों ने विज्ञान का त्रिविध विभाजन करने का लक्ष्य रखा, अथवा यों कहें, वे यह देख पाने में समर्थ हुए कि त्रिविध विभाजन विद्यमान है (क्योंकि उन्होंने इसे गढ़ा नहीं, वरन केवल खोजा), जिसका एक भाग भौतिक कहलाता है, दूसरा तार्किक, और तीसरा नैतिक। इन नामों के लातीनी समानार्थी अब अनेक लेखकों के लेखन में सुपरिचित हो चुके हैं, जिससे ये विभाजन प्राकृतिक, बौद्धिक, और नैतिक कहलाते हैं, जिनका मैंने आठवीं पुस्तक में संक्षेप में उल्लेख किया है। ऐसा नहीं है कि मैं यह निष्कर्ष निकालना चाहूँ कि इन दार्शनिकों के मन में, इस त्रिविध विभाजन में, परमेश्वर के त्रित्व का कोई विचार था, यद्यपि कहा जाता है कि प्लेटो ही सबसे पहले इस विभाजन को खोजने और प्रचारित करने वाला था, और उसने देखा कि केवल परमेश्वर ही प्रकृति का रचयिता, बुद्धि का दाता, और उस प्रेम का प्रज्वलित करने वाला हो सकता है जिससे जीवन भला और धन्य बनता है। परन्तु यह निश्चित है कि, यद्यपि दार्शनिक वस्तुओं के स्वभाव के विषय में, और सत्य की खोज की रीति के विषय में, और उस भलाई के विषय में जिसकी ओर हमारे सब कार्यों को अग्रसर होना चाहिए, असहमत हैं, तौभी इन तीन बड़े सामान्य प्रश्नों में ही उनकी सारी बौद्धिक शक्ति व्यय होती है। और यद्यपि मतों में एक उलझा हुआ वैविध्य है, प्रत्येक व्यक्ति इन प्रश्नों में से प्रत्येक के विषय में अपना ही मत स्थापित करने का प्रयत्न करता है, तौभी उनमें से कोई भी इस बात में सन्देह नहीं करता कि प्रकृति का कोई कारण है, विज्ञान की कोई पद्धति है, और जीवन का कोई लक्ष्य तथा उद्देश्य है। फिर, ऐसी तीन वस्तुएँ हैं जो प्रत्येक कारीगर के पास होनी चाहिए यदि उसे कुछ भी सिद्ध करना हो—स्वभाव, शिक्षा, अभ्यास। स्वभाव को सामर्थ्य से आँका जाता है, शिक्षा को ज्ञान से, अभ्यास को उसके फल से। मुझे मालूम है कि, ठीक-ठीक कहा जाए तो, फल वह है जिसका हम भोग करते हैं, और उपयोग [अभ्यास] वह है जिसका हम उपयोग करते हैं। और इनके बीच यही अन्तर प्रतीत होता है, कि हम उसे भोगना कहते हैं जो अपने आप में, और अन्य उद्देश्यों से निरपेक्ष होकर, हमें आनन्दित करता है; और उसे उपयोग करना कहते हैं जिसे हम किसी आगे के उद्देश्य के लिए खोजते हैं। इसी कारण, कालिक वस्तुओं का भोग करने की अपेक्षा उपयोग किया जाना चाहिए, जिससे हम अनादि वस्तुओं के भोग के योग्य ठहरें; और उन विकृत प्राणियों के समान न हों जो धन का भोग करना और परमेश्वर का उपयोग करना चाहते हैं—परमेश्वर के लिए धन व्यय न करके, वरन धन के लिए परमेश्वर की उपासना करके। तथापि, सामान्य बोलचाल में, हम फलों का भी उपयोग करते हैं और उपयोगों का भी भोग करते हैं। क्योंकि हम ठीक ही "खेत के फलों" की बात करते हैं, जिनका हम सब वर्तमान जीवन में निश्चय ही उपयोग करते हैं। और इसी प्रयोग के अनुसार मैंने कहा था कि मनुष्य में तीन बातें देखी जानी हैं, स्वभाव, शिक्षा, अभ्यास। इन्हीं से दार्शनिकों ने, जैसा मैंने कहा, उस विज्ञान का त्रिविध विभाजन विकसित किया जिससे धन्य जीवन प्राप्त होता है: प्राकृतिक भाग का सम्बन्ध स्वभाव से है, बौद्धिक का शिक्षा से, और नैतिक का अभ्यास से। यदि, तो, हम स्वयं अपने स्वभाव के रचयिता होते, तो हम स्वयं में ज्ञान उत्पन्न कर लेते, और हमें शिक्षा द्वारा, अर्थात्, दूसरों से सीखकर, उस तक पहुँचने की आवश्यकता न होती। हमारा प्रेम भी, स्वयं से निकलकर और स्वयं की ओर लौटकर, हमारे जीवन को धन्य बनाने के लिए पर्याप्त होता, और उसे किसी बाह्य भोग की आवश्यकता न होती। परन्तु अब, चूँकि हमारे स्वभाव का आवश्यक रचयिता परमेश्वर है, यह निश्चित है कि बुद्धिमान होने के लिए हमें उसी को अपना गुरु मानना होगा; और धन्य होने के लिए, उसी को हमें आत्मिक मधुरता प्रदान करने वाला मानना होगा।

    26. परमोच्च त्रित्व के उस प्रतिरूप के विषय में, जो किसी न किसी रूप में मानव-स्वभाव में उसकी वर्तमान अवस्था में भी पाया जाता है

    और हम वास्तव में अपने भीतर परमेश्वर का, अर्थात् परमोच्च त्रित्व का, प्रतिरूप पहचानते हैं—एक ऐसा प्रतिरूप जो, यद्यपि परमेश्वर के समान नहीं है, वरन् उससे बहुत दूर है,—न तो उसके साथ सहनित्य है, और न, संक्षेप में कहें तो, उसके साथ सहसत्तात्मक है,—फिर भी अपने स्वभाव में उसके अन्य किसी भी कार्य से उसके अधिक निकट है, और आगे इस प्रकार पुनर्स्थापित होने के लिए नियत है कि वह उसकी और भी निकट समानता धारण करे। क्योंकि हम हैं, और जानते हैं कि हम हैं, और अपने होने में तथा अपने इस ज्ञान में आनन्दित होते हैं। इसके अतिरिक्त, इन तीन बातों में हमें कोई सच्चाई-सा दिखने वाला भ्रम विचलित नहीं करता; क्योंकि हम इनके साथ किसी शारीरिक इन्द्रिय द्वारा सम्पर्क में नहीं आते, जैसे हम अपने से बाहर की वस्तुओं को अनुभव करते हैं—जैसे, उदाहरणार्थ, रंगों को देखने से, ध्वनियों को सुनने से, गन्धों को सूँघने से, स्वादों को चखने से, कठोर और कोमल वस्तुओं को स्पर्श से,—जिन सब इन्द्रियगोचर वस्तुओं की केवल उनसे मिलती-जुलती प्रतिमाएँ ही हैं, न कि स्वयं वे वस्तुएँ, जिन्हें हम मन में ग्रहण करते और स्मृति में धारण करते हैं, और जो हमें उन वस्तुओं की इच्छा करने के लिए उत्तेजित करती हैं। परन्तु, प्रतिमाओं या कल्पित छायाओं के किसी भी भ्रामक निरूपण के बिना, मुझे यह पूर्णतः निश्चित है कि मैं हूँ, और यह कि मैं इसे जानता हूँ और इसमें आनन्दित होता हूँ। इन सत्यों के सम्बन्ध में मुझे अकादमीवादियों के उन तर्कों से तनिक भी भय नहीं, जो कहते हैं, यदि तुम धोखा खा रहे हो तो क्या? क्योंकि यदि मैं धोखा खा रहा हूँ, तो मैं हूँ।[493] क्योंकि जो नहीं है, वह धोखा नहीं खा सकता; और यदि मैं धोखा खा रहा हूँ, तो इसी बात से यह सिद्ध है कि मैं हूँ। और चूँकि यदि मैं धोखा खा रहा हूँ तो मैं हूँ, तो फिर यह विश्वास करने में मुझे कैसे धोखा हो सकता है कि मैं हूँ? क्योंकि यह निश्चित है कि यदि मैं धोखा खा रहा हूँ तो मैं हूँ। इसलिए, चूँकि मुझे, धोखा खाए हुए व्यक्ति को, होना ही होगा, चाहे मैं धोखा खाया ही क्यों न हो, निश्चय ही मुझे इस ज्ञान में कि मैं हूँ, कोई धोखा नहीं है। और, परिणामस्वरूप, मुझे यह जानने में भी कोई धोखा नहीं है कि मैं जानता हूँ। क्योंकि, जैसे मैं जानता हूँ कि मैं हूँ, वैसे ही मैं यह भी जानता हूँ कि मैं जानता हूँ। और जब मैं इन दोनों बातों से प्रेम करता हूँ, तो मैं उनमें एक तीसरी वस्तु और जोड़ देता हूँ, अर्थात् अपना प्रेम, जो उतने ही महत्त्व का है। क्योंकि इसमें भी मुझे कोई धोखा नहीं है कि मैं प्रेम करता हूँ, क्योंकि जिन वस्तुओं से मैं प्रेम करता हूँ उनमें मुझे धोखा नहीं है; यद्यपि यदि ये वस्तुएँ झूठी भी होतीं, तो भी यह सत्य होता कि मैं झूठी वस्तुओं से प्रेम करता था। क्योंकि यदि यह झूठ होता कि मैं उनसे प्रेम करता हूँ, तो मुझे झूठी वस्तुओं से प्रेम करने के कारण न्यायसंगत रूप से दोषी कैसे ठहराया जा सकता था और उससे रोका कैसे जा सकता था? परन्तु, चूँकि वे सत्य और वास्तविक हैं, कौन इसमें सन्देह करता है कि जब उनसे प्रेम किया जाता है, तो उनका प्रेम स्वयं सत्य और वास्तविक होता है? आगे, जैसे कोई ऐसा नहीं जो सुखी होना न चाहे, वैसे ही कोई ऐसा नहीं जो होना न चाहे। क्योंकि वह सुखी कैसे हो सकता है, यदि वह कुछ है ही नहीं?

    27. अस्तित्व के विषय में, और उसके ज्ञान के विषय में, और दोनों के प्रेम के विषय में

    और सचमुच अस्तित्व में होने का यह तथ्य किसी स्वाभाविक जादू के समान इतना सुखद है कि दुःखी लोग भी, और किसी कारण से नहीं, नष्ट हो जाने की इच्छा नहीं करते; और, जब वे अनुभव करते हैं कि वे दुःखी हैं, तो यह नहीं चाहते कि वे स्वयं मिटा दिए जाएँ, बल्कि यह चाहते हैं कि उनका दुःख मिट जाए। यहाँ तक कि उन लोगों को भी लीजिए जो, अपनी ही दृष्टि में और वास्तव में भी, पूर्णतः दुःखी हैं, और जिन्हें ऐसा गिना भी जाता है—न केवल बुद्धिमानों द्वारा उनकी मूर्खता के कारण, बल्कि उनके द्वारा भी जो स्वयं को धन्य मानते हैं, और जो उन्हें इसलिए दुःखी समझते हैं क्योंकि वे निर्धन और दरिद्र हैं—यदि कोई इन लोगों को अमरता दे दे, जिसमें उनका दुःख अमर हो जाए, और यह विकल्प भी दे कि यदि वे एक ही दुःख में सदा-सर्वदा बने रहने से हिचकिचाएँ, तो वे मिटा दिए जा सकते हैं, और कहीं भी, किसी भी दशा में न रहें—तो वे तत्क्षण, प्रसन्नता से, वरन् उल्लासपूर्वक, यह चुनेंगे कि वे सदा बने रहें, भले ही ऐसी ही दशा में, बजाय इसके कि सर्वथा न रहें। ऐसे लोगों की सुविख्यात मनोदशा इसकी साक्षी देती है। क्योंकि जब हम देखते हैं कि वे मरने से डरते हैं, और ऐसे दुर्भाग्य में जीना ही अधिक पसन्द करते हैं बजाय इसके कि मृत्यु द्वारा उसे समाप्त करें, तो क्या यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं होता कि स्वभाव सर्वनाश से कैसे हिचकता है? और, तदनुसार, जब वे जानते हैं कि उन्हें मरना ही है, तो वे यह बड़े उपकार के रूप में चाहते हैं कि उन पर यह कृपा की जाए कि वे उसी दुःख में थोड़ी देर और जी लें, और मृत्यु द्वारा उसे समाप्त करने में विलम्ब करें। और इस प्रकार वे निर्विवाद रूप से यह सिद्ध करते हैं कि वे कितनी प्रसन्न उत्सुकता से अमरता को स्वीकार करेंगे, भले ही वह उन्हें अनन्त विनाश ही प्रदान करे। क्या समस्त अबोध पशु भी, जिन्हें ऐसी गणनाओं का कुछ भी ज्ञान नहीं, विशाल अजगरों से लेकर तुच्छतम कीड़ों तक, यह सब साक्षी नहीं देते कि वे अस्तित्व में रहना चाहते हैं, और इसलिए अपनी सामर्थ्य भर हर गति से मृत्यु से बचते हैं? वरन्, स्वयं पौधे और झाड़ियाँ भी, जिनमें ऐसा कोई जीवन नहीं जो उन्हें दृश्य गतियों द्वारा विनाश से बचने में समर्थ बनाए, क्या वे सब अपने ही ढंग से अपने अस्तित्व को बनाए रखने का यत्न नहीं करतीं, भूमि में अधिकाधिक गहरी जड़ें जमाकर, ताकि वे पोषण खींच सकें, और आकाश की ओर स्वस्थ शाखाएँ फैला सकें? अन्ततः, निर्जीव पदार्थ भी, जिनमें न तो संवेदन है और न बीजात्मक जीवन, फिर भी या तो ऊपरी वायु की ओर जाते हैं, या नीचे धँसते हैं, या मध्यवर्ती स्थिति में सन्तुलित रहते हैं, ताकि वे उस स्थिति में अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकें जहाँ वे अपने स्वभाव के सबसे अधिक अनुरूप हो सकते हैं।

    और मानव-स्वभाव अपने अस्तित्व के ज्ञान से कितना प्रेम करता है, और वह धोखा खाने से कैसे हिचकता है, यह इसी तथ्य से पर्याप्त रूप से समझ में आ जाएगा कि हर मनुष्य स्वस्थ मन से दुःखी होना, पागलपन में प्रसन्न होने से अधिक पसन्द करता है। और यह महान् और आश्चर्यजनक सहज-प्रवृत्ति समस्त प्राणियों में केवल मनुष्यों को ही प्राप्त है; क्योंकि, यद्यपि उनमें से कुछ की इस संसार के प्रकाश के लिए दृष्टि हमसे भी तीक्ष्ण है, तथापि वे उस आध्यात्मिक प्रकाश तक नहीं पहुँच सकते जिससे हमारा मन किसी रीति से आलोकित होता है, ताकि हम सब बातों के विषय में सही निर्णय कर सकें। क्योंकि हमारी निर्णय-शक्ति इस प्रकाश की हमारी ग्राह्यता के अनुपात में होती है। तथापि, अबोध पशु, यद्यपि उनमें ज्ञान नहीं है, फिर भी निश्चय ही उनमें ज्ञान से मिलती-जुलती कोई वस्तु है; जबकि अन्य भौतिक वस्तुओं को इन्द्रियगोचर कहा जाता है, इसलिए नहीं कि उनमें इन्द्रियाँ हैं, बल्कि इसलिए कि वे हमारी इन्द्रियों के विषय हैं। फिर भी पौधों में, उनके पोषण और जनन में, इन्द्रियगत जीवन से कुछ समानता है। तथापि, ये सब वस्तुएँ और समस्त भौतिक वस्तुएँ अपने कारण अपने स्वभाव में छिपाए रहती हैं; परन्तु उनके बाह्य रूप, जो संसार की इस दृश्य संरचना को सौन्दर्य प्रदान करते हैं, हमारी इन्द्रियों द्वारा अनुभव किए जाते हैं, मानो वे अपने ज्ञान की कमी की क्षतिपूर्ति हमें ज्ञान प्रदान करके करना चाहते हों। परन्तु हम उन्हें अपनी शारीरिक इन्द्रियों द्वारा इस रीति से अनुभव करते हैं कि हम उनका न्याय इन्हीं इन्द्रियों द्वारा नहीं करते। क्योंकि हमारे पास एक और कहीं अधिक श्रेष्ठ इन्द्रिय है, जो भीतरी मनुष्य से सम्बन्धित है, जिसके द्वारा हम यह अनुभव करते हैं कि क्या न्यायसंगत है और क्या अन्यायपूर्ण है—न्यायसंगत को एक बोधगम्य विचार के माध्यम से, अन्यायपूर्ण को उसके अभाव से। इस इन्द्रिय को अपने कार्यों में न तो दृष्टि से, न कान के छिद्र से, न नासिका के वायु-मार्ग से, न तालु के स्वाद से, न किसी शारीरिक स्पर्श से सहायता मिलती है। इसी के द्वारा मुझे यह निश्चय होता है कि मैं हूँ, और यह कि मैं यह जानता हूँ; और इन दोनों से मैं प्रेम करता हूँ, और उसी रीति से मुझे यह निश्चय होता है कि मैं इनसे प्रेम करता हूँ।

    28. क्या हमें उस प्रेम से भी प्रेम करना चाहिए जिससे हम अपने अस्तित्व और उसके ज्ञान से प्रेम करते हैं, ताकि हम दिव्य त्रित्व के प्रतिरूप के और भी अधिक निकट हो सकें

    हमने इन दोनों बातों के विषय में, अर्थात् अपने अस्तित्व और उसके ज्ञान के विषय में, तथा हम उनसे कितना प्रेम करते हैं, और निम्नतर सृष्टि-प्राणियों में भी इनकी किस प्रकार की समानता पाई जाती है, फिर भी किस भेद के साथ, इतना कह दिया है जितना इस ग्रन्थ का विषय-क्षेत्र माँगता है। अब हमें उस प्रेम के विषय में बोलना शेष है जिससे इनसे प्रेम किया जाता है, यह निर्धारित करने के लिए कि क्या यह प्रेम स्वयं प्रिय है। और निःसन्देह ऐसा है; और इसका प्रमाण यह है। क्योंकि जिन मनुष्यों से न्यायसंगत रूप से प्रेम किया जाता है, उनमें वस्तुतः प्रेम ही से प्रेम किया जाता है; क्योंकि वह व्यक्ति न्यायसंगत रूप से भला मनुष्य नहीं कहलाता जो जानता है कि क्या भला है, बल्कि वह जो उससे प्रेम करता है। क्या यह स्पष्ट नहीं कि हम अपने भीतर उसी प्रेम से प्रेम करते हैं जिससे हम जिस भी भलाई से प्रेम करते हैं उससे प्रेम करते हैं? क्योंकि एक ऐसा प्रेम भी है जिससे हम उससे प्रेम करते हैं जिससे हमें प्रेम नहीं करना चाहिए; और यह प्रेम उसके द्वारा घृणित होता है जो उस प्रेम से प्रेम करता है जिससे वह उससे प्रेम करता है जिससे प्रेम करना उचित है। क्योंकि दोनों का एक ही मनुष्य में विद्यमान होना पूर्णतः सम्भव है। और यह सह-अस्तित्व मनुष्य के लिए भला है, इस उद्देश्य से कि वह प्रेम जो हमारे भले जीवन की ओर ले जाता है, बढ़े, और वह दूसरा, जो हमें बुराई की ओर ले जाता है, घटे, यहाँ तक कि हमारा सम्पूर्ण जीवन पूर्णतः चंगा होकर भलाई में परिणत हो जाए। क्योंकि यदि हम पशु होते, तो हम शारीरिक और इन्द्रियगत जीवन से प्रेम करते, और यही हमारे लिए पर्याप्त भलाई होती; और जब उसके सम्बन्ध में हमारी दशा भली होती, तो हम उससे आगे कुछ न ढूँढ़ते। इसी प्रकार, यदि हम वृक्ष होते, तो हम, शब्द के कठोर अर्थ में, वस्तुतः किसी वस्तु से प्रेम नहीं कर सकते थे; तथापि हम, मानो, उस वस्तु के लिए लालायित प्रतीत होते जिसके द्वारा हम अधिकाधिक भरपूर और सम्पन्न फलदायी बन सकते। यदि हम पत्थर होते, या तरंगें, या वायु, या ज्वाला, या उस प्रकार की कोई अन्य वस्तु, तो हम में संवेदन और जीवन दोनों का अभाव होता, फिर भी हमारे भीतर अपने ही उचित स्थान और स्वाभाविक क्रम की ओर एक प्रकार का आकर्षण होता। क्योंकि पदार्थों का विशिष्ट गुरुत्व, मानो, उनका प्रेम ही है, चाहे वे अपने भार से नीचे की ओर ले जाए जाएँ, या अपनी हल्केपन से ऊपर की ओर।[494] क्योंकि जिस प्रकार शरीर अपने गुरुत्व से वहन किया जाता है, उसी प्रकार आत्मा प्रेम से, जहाँ कहीं भी वह वहन की जाती है। परन्तु हम मनुष्य हैं, अपने सृष्टिकर्ता के प्रतिरूप में सृजे गए, जिसकी नित्यता सत्य है, और जिसका सत्य नित्य है, जिसका प्रेम नित्य और सत्य है, और जो स्वयं वह नित्य, सत्य, और आराध्य त्रित्व है, बिना किसी मिश्रण के, बिना किसी पार्थक्य के; और, इसलिए, जब हम उन समस्त कार्यों पर दृष्टिपात करते हैं जिन्हें उसने स्थापित किया है, तो हम, मानो, उसके पदचिह्न पहचान सकते हैं, कभी अधिक स्पष्ट और कभी कम स्पष्ट, यहाँ तक कि उन वस्तुओं में भी जो हमसे नीचे हैं, क्योंकि वे इतना भी अस्तित्व में नहीं आ सकती थीं, या किसी रूप में बन नहीं सकती थीं, या किसी नियम का अनुसरण या पालन नहीं कर सकती थीं, यदि वे उसके द्वारा नहीं रची गई होतीं जो परमोच्च रूप से है, और परमोच्च रूप से भला और परमोच्च रूप से बुद्धिमान है; तथापि अपने ही भीतर उसका प्रतिरूप देखते हुए, आइए हम, सुसमाचार के उस छोटे पुत्र के समान, अपने पास आएँ, और उठकर उसकी ओर लौट जाएँ जिससे हम अपने पाप के कारण दूर हो गए थे। वहाँ हमारे अस्तित्व में कोई मृत्यु नहीं होगी, हमारे ज्ञान में कोई भ्रम नहीं, हमारे प्रेम में कोई विपत्ति नहीं। परन्तु अब, यद्यपि हमें इन तीन बातों के अपने अधिकार का आश्वासन दूसरों की साक्षी से नहीं, बल्कि उनकी उपस्थिति के अपने ही आत्म-बोध से मिलता है, और क्योंकि हम उन्हें अपनी ही अत्यन्त सत्यवादी आन्तरिक दृष्टि से देखते हैं, फिर भी, चूँकि हम स्वयं यह नहीं जान सकते कि वे कब तक बनी रहेंगी, और क्या वे कभी समाप्त न होंगी, और उनके भले या बुरे प्रयोग का क्या परिणाम होगा, हम उन दूसरों को ढूँढ़ते हैं जो हमें इन बातों से परिचित करा सकें, यदि हमने उन्हें पहले से ही न पाया हो। इन साक्षियों की विश्वसनीयता के विषय में, अभी नहीं, परन्तु आगे, बोलने का अवसर मिलेगा। परन्तु इस पुस्तक में आइए हम, जैसा हमने आरम्भ किया है, परमेश्वर की सहायता से आगे बढ़ें, परमेश्वर के नगर की चर्चा करते हुए, न उसकी तीर्थयात्रा और मरणशीलता की अवस्था में, बल्कि जैसा वह स्वर्गों में सदा अमर होकर विद्यमान है—अर्थात्, आइए हम उन पवित्र स्वर्गदूतों की चर्चा करें जो परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखते हैं, जो न कभी पतित हुए और न कभी होंगे, जिनके और उनके बीच, जिन्होंने नित्य ज्योति को त्याग दिया और अन्धकार बन गए, परमेश्वर ने, जैसा हम पहले कह चुके हैं, आरम्भ में ही एक विभाजन कर दिया।

    29. उस ज्ञान के विषय में जिससे पवित्र स्वर्गदूत परमेश्वर को उसके सारतत्त्व में जानते हैं, और जिससे वे उसके कार्यों के कारणों को कारीगर की कला में देखते हैं, इससे पहले कि वे उन्हें उस कलाकार के कार्यों में देखें

    वे पवित्र स्वर्गदूत परमेश्वर के ज्ञान तक श्रव्य शब्दों से नहीं, बल्कि अपरिवर्तनीय सत्य की, अर्थात् परमेश्वर के एकलौते वचन की, अपने प्राणों में उपस्थिति से पहुँचते हैं; और वे स्वयं इस वचन को, और पिता को, और उनकी पवित्र आत्मा को जानते हैं, और यह भी कि यह त्रित्व अविभाज्य है, और इसके तीनों व्यक्तित्व एक ही सत्ता हैं, और यह कि तीन परमेश्वर नहीं बल्कि एक ही परमेश्वर है; और इसे वे इस प्रकार जानते हैं कि यह उनके द्वारा हमसे बढ़कर समझा जाता है जितना हम स्वयं को समझते हैं। इस प्रकार, वे सृष्ट वस्तु को भी जानते हैं, स्वयं उसमें नहीं, बल्कि इस श्रेष्ठतर मार्ग से, परमेश्वर की बुद्धि में, मानो उस कला में जिसमें वह सृजी गई थी; और, परिणामस्वरूप, वे स्वयं को अपने में जानने से अधिक परमेश्वर में जानते हैं, यद्यपि उन्हें यह पिछला ज्ञान भी है। क्योंकि वे सृजे गए थे, और अपने सृष्टिकर्ता से भिन्न हैं। इसलिए, उसमें उन्हें, मानो, एक दोपहर का ज्ञान प्राप्त है; अपने में, एक सन्ध्याकालीन ज्ञान, हमारे पूर्व स्पष्टीकरणों के अनुसार।[495] क्योंकि किसी वस्तु को उस अभिकल्प में जानने में, जिसके अनुरूप वह बनाई गई, और उसे स्वयं उसमें जानने में बड़ा अन्तर है—उदाहरणार्थ, रेखाओं की सीधाई और आकृतियों की शुद्धता एक रीति से जानी जाती है जब मानसिक रूप से कल्पित की जाए, दूसरी रीति से जब कागज पर अंकित की जाए; और न्याय एक रीति से अपरिवर्तनीय सत्य में जाना जाता है, दूसरी रीति से एक न्यायी मनुष्य की आत्मा में। ऐसा ही सब अन्य वस्तुओं के साथ है—जैसे, ऊपर के और नीचे के जल के बीच का आकाश-मण्डल, जिसे आकाश कहा गया; नीचे के जलों का एकत्रीकरण, और सूखी भूमि का उघड़ना, और वनस्पतियों तथा वृक्षों की उत्पत्ति; सूर्य, चन्द्रमा और तारों की सृष्टि; और जलों में से उत्पन्न प्राणियों, पक्षियों, मछलियों और समुद्र के दानवाकार जीवों की; और पृथ्वी पर चलने या रेंगने वाली हर वस्तु की, और स्वयं मनुष्य की, जो पृथ्वी की समस्त वस्तुओं में श्रेष्ठ है—ये सब वस्तुएँ एक रीति से स्वर्गदूतों द्वारा परमेश्वर के वचन में जानी जाती हैं, जिसमें वे उन नित्य स्थिर कारणों और तर्कों को देखते हैं जिनके अनुसार वे बनाई गईं, और दूसरी रीति से अपने में: पहली में, अधिक स्पष्ट ज्ञान के साथ; दूसरी में, अधिक धुँधले ज्ञान के साथ, जो अभिकल्प का कम, बल्कि नंगे कार्यों का ही अधिक है। तथापि, जब ये कार्य स्वयं सृष्टिकर्ता की स्तुति और आराधना से जोड़े जाते हैं, तो यह ऐसा होता है मानो उन्हें चिन्तन करने वालों के मनों में प्रातःकाल का उदय हो गया हो।

    30. संख्या छह की पूर्णता के विषय में, जो उन संख्याओं में पहली है जो अपने ही अंशों से बनती है

    ये कार्य छह दिनों में (वही दिन छह बार दोहराया गया) पूर्ण किए गए बताए जाते हैं, क्योंकि छह एक पूर्ण संख्या है—इसलिए नहीं कि परमेश्वर को दीर्घकाल की आवश्यकता थी, मानो वह सब कुछ एक साथ रच नहीं सकता था, जो तब उन्हीं के लिए उचित गतियों से समय के प्रवाह को अंकित करता, बल्कि इसलिए कि कार्यों की पूर्णता संख्या छह के द्वारा संकेतित की गई थी। क्योंकि छह वह पहली संख्या है जो अपने ही[496] अंशों से बनती है, अर्थात् अपने छठे, तिहाई और आधे भाग से, जो क्रमशः एक, दो, और तीन हैं, और जो मिलकर छह की कुल संख्या बनाते हैं। किसी संख्या को देखने के इस ढंग में, उन्हें उसके अंश कहा जाता है जो उसे ठीक-ठीक विभाजित कर देते हैं, जैसे आधा, तिहाई, चौथाई, या किसी भी भाजक वाला भिन्न—उदाहरणार्थ, चार नौ का एक भाग है, परन्तु इसलिए उसका अंशीय भाग नहीं; परन्तु एक है, क्योंकि वह उसका नवाँ भाग है; और तीन है, क्योंकि वह उसका तिहाई है। फिर भी ये दोनों भाग, नवाँ और तिहाई, अर्थात् एक और तीन, मिलकर उसके पूर्ण योग नौ से बहुत दूर रह जाते हैं। इसी प्रकार, संख्या दस में, चार एक भाग है, फिर भी उसे विभाजित नहीं करता; परन्तु एक उसका अंशीय भाग है, क्योंकि वह उसका दसवाँ है; इसी प्रकार उसका एक पाँचवाँ भाग है, जो दो है; और एक आधा, जो पाँच है। परन्तु ये तीन भाग, एक दसवाँ, एक पाँचवाँ, और एक आधा, अर्थात् एक, दो, और पाँच, मिलकर दस नहीं, बल्कि आठ बनाते हैं। संख्या बारह के विषय में फिर, इसके भाग मिलकर पूरे से अधिक हो जाते हैं; क्योंकि उसका एक बारहवाँ है, अर्थात् एक; एक छठा, अर्थात् दो; एक चौथाई, जो तीन है; एक तिहाई, जो चार है; और एक आधा, जो छह है। परन्तु एक, दो, तीन, चार, और छह मिलकर बारह नहीं, बल्कि उससे अधिक, अर्थात् सोलह बनाते हैं। इतना मैंने संख्या छह की पूर्णता को स्पष्ट करने के लिए उचित समझा है, जो, जैसा मैंने कहा, वह पहली संख्या है जो अपने ही अंशों को जोड़ने से ठीक-ठीक बनती है; और इतने ही दिनों की संख्या में परमेश्वर ने अपना कार्य पूरा किया।[497] और, इसलिए, हमें संख्याओं के विज्ञान को तुच्छ नहीं समझना चाहिए, जो, पवित्रशास्त्र के अनेक स्थानों में, सावधान व्याख्याकार के लिए विशेष उपयोगी सिद्ध होता है।[498] न ही यह बिना कारण के परमेश्वर की प्रशंसाओं में गिना गया है, "तूने सब वस्तुओं को गिनती, और नाप, और तौल में ठहराया है।"[499]

    31. सातवें दिन के विषय में, जिसमें पूर्णता और विश्राम का उत्सव मनाया जाता है

    परन्तु, सातवें दिन (अर्थात्, वही दिन सात बार दोहराया गया, जो संख्या भी, यद्यपि अन्य कारण से, एक पूर्ण संख्या है), परमेश्वर का विश्राम प्रकट किया गया है, और तब ही, हम पहली बार उसके पवित्र किए जाने के विषय में सुनते हैं। इसलिए परमेश्वर इस दिन को अपने कार्यों से पवित्र नहीं करना चाहता था, बल्कि अपने विश्राम से, जिसकी कोई सन्ध्या नहीं, क्योंकि वह कोई सृष्ट वस्तु नहीं है; इसलिए, एक रीति से परमेश्वर के वचन में और दूसरी रीति से स्वयं में ज्ञात होकर, वह एक द्विविध ज्ञान बनाए—दिन का प्रकाश और सन्ध्या (दिन और सन्ध्या)। संख्या सात की पूर्णता के विषय में और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है, परन्तु यह पुस्तक पहले से ही बहुत लम्बी हो चुकी है, और मुझे भय है कि कहीं मैं अपने विज्ञान के अल्प ज्ञान को प्रदर्शित करने के अवसर को अधिक बचकानेपन से, न कि अधिक लाभदायक ढंग से, पकड़ता प्रतीत न होऊँ। मुझे, इसलिए, संयम और गम्भीरता से बोलना चाहिए, ऐसा न हो कि "गिनती" का बहुत उत्सुकतापूर्वक अनुसरण करने में, मुझ पर "तौल" और "नाप" को भुला देने का आरोप लगे। यहाँ इतना कह देना पर्याप्त है, कि तीन वह पहली पूर्ण संख्या है जो विषम है, चार वह पहली जो सम है, और इन दोनों से सात बनती है। इस कारण इसे अक्सर सभी संख्याओं के स्थान पर रखा जाता है, जैसे, "धर्मी सात बार गिरता है, और फिर उठ खड़ा होता है,"[500]—अर्थात्, चाहे वह कितनी ही बार क्यों न गिरे, वह नष्ट नहीं होगा (और इसे पापों के विषय में नहीं, बल्कि विनम्रता की ओर ले जाने वाली विपत्तियों के विषय में समझा जाना अभिप्रेत था)। फिर, "दिन में सात बार मैं तेरी स्तुति करूँगा,"[501] जिसे कहीं और इस प्रकार व्यक्त किया गया है, "मैं यहोवा को सर्वदा धन्य कहूँगा।"[502] और ऐसे अनेक उदाहरण दैवी वचनों में पाए जाते हैं, जिनमें संख्या सात का, जैसा मैंने कहा, सामान्यतः किसी वस्तु की समग्रता या पूर्णता व्यक्त करने के लिए प्रयोग होता है। और इसी प्रकार पवित्र आत्मा, जिसके विषय में प्रभु कहते हैं, "वह तुम्हें सब सत्य सिखाएगा,"[503] इसी संख्या से संकेतित है।[504] इसी में परमेश्वर का विश्राम है, वह विश्राम जो उसके लोग उसमें पाते हैं। क्योंकि विश्राम समग्रता में है, अर्थात् पूर्ण पूर्णता में, जबकि अंश में परिश्रम है। और इस प्रकार हम तब तक परिश्रम करते हैं जब तक हम अंशतः जानते हैं; "परन्तु जब वह जो पूर्ण है आएगा, तब वह जो अंशतः है समाप्त हो जाएगा।"[505] हम स्वयं पवित्रशास्त्र में भी परिश्रम से ही खोज करते हैं। परन्तु पवित्र स्वर्गदूत, जिनकी संगति और सभा के लिए हम अपनी इस परिश्रमपूर्ण तीर्थयात्रा में लम्बी साँसें भरते हैं, चूँकि वे पहले से ही अपने नित्य निवास में विद्यमान हैं, वे ज्ञान की पूर्ण सुगमता और विश्राम की धन्यता का भोग करते हैं। बिना किसी कठिनाई के वे हमारी सहायता करते हैं; क्योंकि उनकी आध्यात्मिक गतियाँ, शुद्ध और मुक्त, उन्हें कोई परिश्रम नहीं देतीं।

    32. उस मत के विषय में कि स्वर्गदूत संसार से पहले सृजे गए थे

    परन्तु यदि कोई हमारे मत का विरोध करे, और कहे कि जब यह कहा गया, "उजियाला हो, और उजियाला हुआ," तो उससे पवित्र स्वर्गदूतों का संकेत नहीं है; यदि वह यह मान ले या सिखाए कि किसी भौतिक प्रकाश का, जो तब पहली बार सृजा गया, अभिप्राय था, और यह कि स्वर्गदूत न केवल उस आकाश-मण्डल से पहले सृजे गए जो जलों को विभाजित करता है और जिसे "आकाश" कहा गया, बल्कि उस समय से भी पहले जो इन शब्दों में संकेतित है, "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की;" यदि वह यह दावा करे कि इस वाक्यांश "आदि में" का यह अर्थ नहीं है कि इससे पहले कुछ भी नहीं बनाया गया (क्योंकि स्वर्गदूत तो थे), बल्कि यह कि परमेश्वर ने सब वस्तुओं को अपनी बुद्धि या वचन के द्वारा बनाया, जो पवित्रशास्त्र में "आदि" कहलाता है, जैसा उसने स्वयं, सुसमाचार में, यहूदियों को उत्तर दिया जब उन्होंने उससे पूछा कि वह कौन है, कि वह आदि है[506]—मैं इस बिन्दु पर विवाद नहीं करूँगा, मुख्यतः इसलिए कि इससे मुझे यह जानने में अत्यन्त सन्तोष मिलता है कि उत्पत्ति की पुस्तक के आरम्भ ही में त्रित्व की महिमा गाई गई है। क्योंकि, यह कहने के बाद, "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की," जिसका अर्थ यह है कि पिता ने उन्हें पुत्र में बनाया (जैसा भजन साक्षी देता है जहाँ वह कहता है, "हे यहोवा, तेरे काम कितने अधिक हैं! तूने उन सब को बुद्धि से बनाया है"[507]), थोड़ी देर बाद पवित्र आत्मा का भी उचित रूप से उल्लेख किया गया है। क्योंकि, जब हमें यह बता दिया गया था कि परमेश्वर ने आरम्भ में किस प्रकार की पृथ्वी सृजी, अथवा वह पिण्ड या पदार्थ क्या था जिसे परमेश्वर ने "आकाश और पृथ्वी" के नाम से संसार के निर्माण के लिए तैयार किया था, जैसा इन अतिरिक्त शब्दों में बताया गया है, "और पृथ्वी बेडौल और सुनसान थी; और गहरे जल के ऊपर अन्धकार था," तब, त्रित्व के उल्लेख को पूरा करने के लिए, तुरन्त यह जोड़ा गया, "और परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता था।" प्रत्येक व्यक्ति इसे जैसा चाहे वैसा ले ले; क्योंकि यह इतना गहन अंश है कि यह भली-भाँति पाठक के कौशल के अभ्यास के लिए अनेक मतों को सुझा सकता है, और उनमें से कोई भी विश्वास के नियम से बहुत दूर नहीं भटकता। साथ ही, कोई इसमें सन्देह न करे कि पवित्र स्वर्गदूत अपने स्वर्गीय निवासों में, यद्यपि परमेश्वर के साथ सहनित्य नहीं हैं, फिर भी नित्य और सच्ची धन्यता के प्रति सुरक्षित और निश्चित हैं। उन्हीं की संगति से प्रभु सिखाता है कि उसके छोटे बालक सम्बन्धित हैं; और वह न केवल कहता है, "वे परमेश्वर के स्वर्गदूतों के समान होंगे,"[508] बल्कि यह भी दिखाता है कि स्वर्गदूत स्वयं किस धन्य चिन्तन का भोग करते हैं, यह कहते हुए, "चौकस रहो कि तुम इन छोटों में से किसी को तुच्छ न जानो: क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि स्वर्ग में उनके स्वर्गदूत मेरे पिता का, जो स्वर्ग में है, मुख निरन्तर देखते रहते हैं।"[509]

    33. स्वर्गदूतों के दो भिन्न और असमान समुदायों के विषय में, जो अनुपयुक्त रूप से नहीं ज्योति और अन्धकार के नामों से संकेतित किए गए हैं

    कि कुछ स्वर्गदूतों ने पाप किया, और इस संसार के निम्नतम भागों में डाल दिए गए, जहाँ वे, मानो, न्याय के दिन तक अपने अन्तिम दण्ड की प्रतीक्षा में बन्दी रखे गए हैं, प्रेरित पतरस अत्यन्त स्पष्ट रूप से घोषित करता है, जब वह कहता है कि "परमेश्वर ने उन स्वर्गदूतों को जिन्होंने पाप किया, न छोड़ा, परन्तु उन्हें नरक में डालकर अन्धकार की जंजीरों में सौंप दिया, कि वे न्याय के लिए रखे जाएँ।"[510] तब कौन इसमें सन्देह कर सकता है कि परमेश्वर ने, चाहे पूर्वज्ञान में या कार्य में, इनके और शेष के बीच विभाजन कर दिया? और कौन इस बात का खण्डन करेगा कि शेष को न्यायसंगत रूप से "ज्योति" कहा जाता है? क्योंकि हम भी, जो अभी विश्वास से जीते हैं, केवल आशा रखते हुए और अभी उनके समान होने का भोग न पाते हुए, पहले से ही प्रेरित के द्वारा "ज्योति" कहलाते हैं: "क्योंकि तुम कभी अन्धकार थे, परन्तु अब प्रभु में ज्योति हो।"[511] परन्तु इन विद्रोही स्वर्गदूतों के विषय में, जो कोई भी उन्हें अविश्वासी मनुष्यों से भी बुरा समझता या मानता है, उसे भली-भाँति ज्ञात है कि वे "अन्धकार" कहलाते हैं। इसलिए, यद्यपि उत्पत्ति के इन स्थानों में, जहाँ यह कहा गया है, "परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो, और उजियाला हुआ," और "परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया," ज्योति और अन्धकार को शाब्दिक अर्थ में लिया जाना है, तथापि, अपनी ओर से, हम इनसे स्वर्गदूतों के इन दोनों समुदायों को समझते हैं—एक परमेश्वर का भोग करता हुआ, दूसरा अहंकार से फूला हुआ; एक, जिससे कहा गया है, "उसके सब स्वर्गदूतों, उसकी स्तुति करो,"[512] दूसरा, जिसका प्रधान कहता है, "यदि तू गिरकर मुझे दण्डवत् करे, तो मैं ये सब कुछ तुझे दे दूँगा;"[513] एक परमेश्वर के पवित्र प्रेम से प्रज्वलित, दूसरा आत्म-उन्नति की अशुद्ध वासना से दुर्गन्धित। और चूँकि, जैसा लिखा है, "परमेश्वर अभिमानियों का सामना करता है, परन्तु दीनों पर अनुग्रह करता है,"[514] हम कह सकते हैं, एक स्वर्गों के स्वर्ग में निवास करता है, दूसरा वहाँ से गिराया जाकर वायु के निचले प्रदेशों में उग्र होता फिरता है; एक भक्ति की उज्ज्वलता में शान्त, दूसरा धूमिल इच्छाओं से आँधी-तूफ़ान में डूबा हुआ; एक, परमेश्वर की प्रसन्नता के अनुसार, कोमलता से सहायता करता हुआ, न्यायपूर्वक प्रतिफल देता हुआ,—दूसरा, अपने ही अहंकार से प्रेरित, वश में करने और चोट पहुँचाने की वासना से खौलता हुआ; एक परमेश्वर की भलाई का सेवक अपनी सुइच्छा की सीमा तक, दूसरा परमेश्वर की सामर्थ्य द्वारा उस हानि से रोका गया जो वह करना चाहता है; पहला दूसरे पर हँसता है जब वह अपने अत्याचारों द्वारा अनिच्छा से भलाई करता है, दूसरा पहले से ईर्ष्या करता है जब वह अपने तीर्थयात्रियों को एकत्र करता है। ये दोनों स्वर्गदूतीय समुदाय, तब, एक-दूसरे से असमान और विरोधी, एक स्वभाव से भी भला और इच्छा से भी सीधा, दूसरा भी स्वभाव से भला परन्तु इच्छा से भ्रष्ट, जैसा वे पवित्रशास्त्र के अन्य और अधिक स्पष्ट स्थानों में प्रकट किए गए हैं, वैसे ही, मुझे लगता है, वे उत्पत्ति की इस पुस्तक में ज्योति और अन्धकार के नामों से बोले गए हैं; और यदि लेखक का शायद कोई भिन्न अर्थ रहा हो, तो भी अस्पष्ट भाषा पर हमारी यह चर्चा व्यर्थ नहीं हुई; क्योंकि, यद्यपि हम उसका अभिप्राय ढूँढ़ने में असमर्थ रहे, फिर भी हमने विश्वास के उस नियम का पालन किया है, जो अन्य समान अधिकार वाले स्थानों से विश्वासियों को पर्याप्त रूप से ज्ञात है। क्योंकि, यद्यपि यहाँ परमेश्वर के भौतिक कार्यों की ही चर्चा है, फिर भी उनकी आध्यात्मिक कार्यों से निश्चय ही समानता है, ताकि पौलुस कह सके, "तुम सब ज्योति की सन्तान और दिन की सन्तान हो: हम न रात के हैं, न अन्धकार के।"[515] यदि, दूसरी ओर, उत्पत्ति के लेखक ने इन शब्दों में वही देखा जो हम देखते हैं, तो हमारी यह चर्चा इस अधिक सन्तोषजनक निष्कर्ष पर पहुँचती है, कि परमेश्वर का वह मनुष्य, इतना विशिष्ट रूप से और दैवीय रूप से बुद्धिमान, या वरन्, परमेश्वर की वह आत्मा जिसने उसके द्वारा परमेश्वर के उन कार्यों को लिपिबद्ध किया जो छठे दिन पूर्ण हुए, यह माना जा सकता है कि उसने स्वर्गदूतों का कोई भी उल्लेख न छोड़ा हो, चाहे उसने उन्हें "आदि में" शब्दों में सम्मिलित किया हो, क्योंकि उसने उन्हें सबसे पहले बनाया, या, जो सबसे अधिक सम्भावित प्रतीत होता है, क्योंकि उसने उन्हें एकलौते वचन में बनाया। और, इन नामों आकाश और पृथ्वी के अन्तर्गत, समस्त सृष्टि संकेतित है, चाहे उसे आध्यात्मिक और भौतिक में विभाजित माना जाए, जो अधिक सम्भावित प्रतीत होता है, या संसार के उन दो महान् भागों में जिनमें समस्त सृजी हुई वस्तुएँ समाहित हैं, ताकि, सबसे पहले, सृष्टि को संक्षेप में प्रस्तुत किया जाए, और फिर उसके भागों को दिनों की रहस्यमय संख्या के अनुसार गिना जाए।

    34. उस विचार के विषय में कि आकाश-मण्डल द्वारा जलों के विभाजन में स्वर्गदूतों का अभिप्राय था, और उस अन्य विचार के विषय में कि जल सृजे नहीं गए थे

    कुछ लोगों[516] ने, तथापि, यह माना है कि स्वर्गदूतों की सेनाओं का किसी न किसी रूप में जल के नाम से संकेत किया गया है, और यह कि यही अभिप्राय है, "जलों के बीच एक आकाश-मण्डल हो;"[517] कि ऊपर के जलों को स्वर्गदूतों के अर्थ में समझा जाए, और नीचे के जलों को या तो दृश्यमान जलों के, या दुष्ट स्वर्गदूतों की भीड़ के, या मनुष्यों की जातियों के अर्थ में। यदि ऐसा है, तो यहाँ यह प्रकट नहीं होता कि स्वर्गदूत कब सृजे गए, बल्कि कब वे विभाजित किए गए। यद्यपि ऐसे मूर्ख और दुष्ट मनुष्यों की भी कमी नहीं रही[518] जिन्होंने यह नकारने का दुस्साहस किया कि जल परमेश्वर द्वारा बनाए गए, क्योंकि कहीं भी यह नहीं लिखा है, "परमेश्वर ने कहा, जल हों।" उतनी ही मूर्खता से वे पृथ्वी के विषय में भी वही कह सकते हैं, क्योंकि हम कहीं भी नहीं पढ़ते, "परमेश्वर ने कहा, पृथ्वी हो।" परन्तु, वे कहते हैं, यह तो लिखा है, "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।" हाँ, और वहाँ जल का भी अभिप्राय है, क्योंकि दोनों एक ही शब्द में सम्मिलित हैं। क्योंकि, "समुद्र उसी का है," जैसा भजन कहता है, "और उसी ने उसे बनाया है; और उसके हाथों ने सूखी भूमि को रचा।"[519] परन्तु जो लोग ऊपर के जलों को आकाश के ऊपर के स्वर्गदूतों के अर्थ में समझना चाहते हैं, उन्हें तत्त्वों के विशिष्ट गुरुत्व के विषय में एक कठिनाई है, और उन्हें भय है कि जल, अपने द्रवत्व और भार के कारण, संसार के ऊपरी भागों में नहीं रखे जा सकते थे। इसलिए, यदि वे अपने ही सिद्धान्तों पर एक मनुष्य की रचना करें, तो वे उसके सिर में किसी नमी युक्त द्रव को, या जिसे यूनानी "श्लेष्म" कहते हैं, और जो हमारे शरीर के तत्त्वों में जल का कार्य करता है, नहीं रखेंगे। परन्तु, परमेश्वर की रचना में, सिर ही श्लेष्म का स्थान है; और निश्चय ही यह अत्यन्त उपयुक्त है; फिर भी, उनकी इस धारणा के अनुसार, इतना असंगत है कि यदि हमें यह तथ्य ज्ञात न होता, और हमें इसी ग्रन्थ से यह बताया जाता कि परमेश्वर ने मनुष्य के शरीर के सबसे ऊपरी भाग में एक नम, ठण्डा, और इसलिए भारी द्रव रखा है, तो ये संसार-तौलने वाले इसे विश्वास करने से इन्कार कर देते। और यदि उनके समक्ष पवित्रशास्त्र का अधिकार प्रस्तुत किया जाता, तो वे यह दावा करते कि इन शब्दों का कोई और ही अभिप्राय होना चाहिए। परन्तु, यदि हम संसार की सृष्टि के विषय में इस दिव्य ग्रन्थ में लिखी सभी बातों की छानबीन करें और उन्हें खोजें, तो हमें बहुत कुछ कहना पड़ेगा, और हम इस ग्रन्थ के प्रस्तावित उद्देश्य से बहुत दूर भटक जाएँगे। चूँकि, तब, हमने स्वर्गदूतों के इन दो विविध और विरोधी समुदायों के विषय में जो आवश्यक प्रतीत हुआ कह दिया है, जिनमें दो मानव-समुदायों (जिनके विषय में हम शीघ्र ही बोलने का इरादा रखते हैं) का उद्गम भी पाया जाता है, आइए हम इस पुस्तक को भी तत्काल समाप्त कर दें।

    टिप्पणियाँ

    1. [441] भज. 87:3.
    2. [442] भज. 48:1.
    3. [443] भज. 46:4.
    4. [444] Homine assumto, non Deo consumto.
    5. [445] Quo itur Deus, qua itur homo.
    6. [446] यहाँ एक वाक्यांश जोड़ा गया है जो præsentia की व्युत्पत्ति præ vensibus से देता है।
    7. [447] एक अन्य व्युत्पत्ति, sententia का sensus से, अर्थात् मन की आन्तरिक अनुभूति से।
    8. [448] उत्प. 1:1.
    9. [449] नीति. 8:27.
    10. [450] मत्ती 18:10.
    11. [451] एपिक्यूरसवादियों में एक सामान्य प्रश्न; सिसरो के De Nat. Deor. i. 9 में वेलेइयस द्वारा उठाया गया; मानीशियों द्वारा अपनाया गया और आगस्टीन द्वारा Conf. xi. 10, 12 में, तथा De Gen. contra Man. i. 3 में भी सम्बोधित किया गया।
    12. [452] नव-प्लातोनवादी।
    13. [453] संख्या एक से आरम्भ होती है, परन्तु अनन्त तक चलती रहती है।
    14. [454] गला. 4:26.
    15. [455] 1 थिस्स. 5:5.
    16. [456] तुलना करें de Gen. ad lit. i. और iv.
    17. [457] पद 35.
    18. [458] भज. 148:1-5.
    19. [459] अय्यू. 38:7.
    20. [460] वाइव्स यहाँ बताता है कि यूनानी धर्मशास्त्रियों और जेरोम ने, प्लेटो के साथ, यह माना कि आध्यात्मिक सृष्ट प्राणी पहले बनाए गए, और परमेश्वर द्वारा भौतिक वस्तुओं की सृष्टि में उनका प्रयोग किया गया। लातीनी धर्मशास्त्रियों और बेसिल ने माना कि परमेश्वर ने सब वस्तुएँ एक साथ बनाईं।
    21. [461] यूह. 1:9.
    22. [462] Mali enim nulla natura est: sed amissio boni, mali nomen accepit.
    23. [463] प्लूटार्क (De Plac. फिलि. 1:3, और iv. 3) हमें बताता है कि यह मत मिलेतुस के अनाक्सिमेनीज़, अनाक्सागोरस के अनुयायियों, और अनेक स्तोइकवादियों द्वारा माना जाता था। सिनिक डायोजिनीज़, तथा अपोलोनिया के डायोजिनीज़ ने भी यही मत अपनाया प्रतीत होता है। ज़ेलर की Stoics, पृष्ठ 121 और 199 देखें।
    24. [464] "Ubi lux non est, tenebræ sunt, non quia aliquid sunt tenebræ, sed ipsa lucis absentia tenebræ dicuntur."—आगस्टीन, De Gen. contra Man. 7.
    25. [465] बुद्धि. 7:22.
    26. [466] इस भाषा का प्रबल प्लातोनी रंग सम्भवतः एक शुद्ध शाब्दिक अनुवाद में सबसे अच्छी तरह सुरक्षित रहता है।
    27. [467] वाइव्स टिप्पणी करता है कि प्राचीनों ने धन्यता को सब भलाई में एक सर्वथा पूर्ण अवस्था के रूप में परिभाषित किया, जो परमेश्वर के लिए विशिष्ट है। सम्भवतः आगस्टीन को Tusc. Disp. lib. v. की उल्लेखनीय चर्चा की स्मृति रही हो, तथा यह परिभाषा "Neque ulla alia huic verbo, quum beatum dicimus, subjecta notio est, nisi, secretis malis omnibus, cumulata bonorum complexio."
    28. [468] इस अध्याय के साथ De Dono Persever. और De Correp. et Gratia की पुस्तकों की तुलना करें।
    29. [469] मत्ती 25:46.
    30. [470] यूह. 8:44.
    31. [471] 1 यूह. 3:8.
    32. [472] तुलना करें Gen. ad Lit. xi. 27 आदि।
    33. [473] भज. 17:6.
    34. [474] 1 यूह. 3:8.
    35. [475] मानीशी लोग।
    36. [476] यशा. 14:12.
    37. [477] यहे. 28:13.
    38. [478] अय्यू. 40:14 (सप्ततियों के अनुसार)।
    39. [479] भज. 104:26.
    40. [480] अय्यू. 40:14 (सप्ततियों के अनुसार)।
    41. [481] यह ध्यान में रखना चाहिए कि इस स्थान में "दोष" का अर्थ पापपूर्ण दाग है।
    42. [482] भज. 104:26.
    43. [483] क्विंटिलियन इसे सामान्यतः विरोधाभास के अर्थ में प्रयोग करता है।
    44. [484] 2 कुरि. 6:7-10.
    45. [485] सिरा. 33:15.
    46. [486] उत्प. 1:14-18.
    47. [487] यह सन्दर्भ Timæus, पृष्ठ 37 C. से है, जहाँ वह कहता है, "जब जनक सृष्टिकर्ता ने जीवन और गति में इस सृजित प्रतिरूप को नित्य देवताओं का देखा, तो वह प्रसन्न हुआ, और अपने आनन्द में विचार करने लगा कि वह इसे अपने आदर्श के और भी समान कैसे बना सके।"
    48. [488] याकू. 1:17.
    49. [489] जिस अंश का सन्दर्भ दिया गया है वह Timæus, पृष्ठ 29 D. में है: "आइए हम कहें कि सृष्टिकर्ता के इस विश्व को बनाने का कारण क्या था। वह भला था; और भले में किसी भी वस्तु के प्रति कभी कोई ईर्ष्या उत्पन्न नहीं होती। इसलिए, ईर्ष्या से मुक्त होकर, उसने चाहा कि सब वस्तुएँ, यथासम्भव, उसी के समान हों।"
    50. [490] मानीशी लोग, अर्थात्।
    51. [491] उत्प. 1:31.
    52. [492] Proprietas.
    53. [493] यह उन अंशों में से एक है जिन्हें सर विलियम हैमिल्टन ने, देकार्त के "Cogito, ergo sum" के साथ, अपने इस प्रमाण की पुष्टि में उद्धृत किया है, कि जहाँ तक हम अस्तित्व के कुछ रूपों के प्रति सचेत हैं, वहाँ तक हमें इस बात की पूर्ण निश्चितता है कि हम अस्तित्व में हैं। हैमिल्टन की Reid, पृष्ठ 744 में टिप्पणी A देखें।
    54. [494] Confessions, xiii. 9 से तुलना करें।
    55. [495] अध्याय 7।
    56. [496] या अंशीय भाग।
    57. [497] तुलना करें आगस्टीन, Gen. ad Lit. iv. 2, और De Trinitate, iv. 7।
    58. [498] संख्याओं के विषय में प्राचीन मतों को दर्शाने वाले अंशों के लिए, स्मिथ के Dict. में लेख "number" देखें।
    59. [499] बुद्धि. 11:20.
    60. [500] नीति. 24:16.
    61. [501] भज. 119:164.
    62. [502] भज. 34:1.
    63. [503] यूह. 16:13.
    64. [504] यशा. 11:2 में, जैसा वह अपने आठवें उपदेश में दिखाता है, जहाँ इस विषय को आगे विस्तार से लिया गया है; अन्यथा, कोई यह मान सकता था कि उसका सन्दर्भ प्रका. 3:1 से था।
    65. [505] 1 कुरि. 13:10.
    66. [506] आगस्टीन का सन्दर्भ यूह. 8:25 से है; पृष्ठ 415 देखें। उसे वरन् प्रका. 3:14 का सन्दर्भ देना चाहिए था।
    67. [507] भज. 104:24.
    68. [508] मत्ती 22:30.
    69. [509] मत्ती 18:10.
    70. [510] 2 पत. 2:4.
    71. [511] इफि. 5:8.
    72. [512] भज. 148:2.
    73. [513] मत्ती 4:9.
    74. [514] याकू. 4:6.
    75. [515] 1 थिस्स. 5:5
    76. [516] आगस्टीन ने स्वयं यह विचार अपने Conf. xiii. 32 में प्रकाशित किया, परन्तु बाद में इसे "पर्याप्त विचार के बिना कहा गया" मानकर वापस ले लिया (Retract. II. vi. 2)। एपिफ़ेनियस और जेरोम इसे ओरिजन का बताते हैं।
    77. [517] उत्प. 1:6.
    78. [518] अर्थात्, ऑडियन और सैम्पसियन, थियोडोरेट और एपिफ़ेनियस द्वारा उल्लिखित तुच्छ विधर्मी सम्प्रदाय।
    79. [519] भज. 95:5.

    ↑ ऊपर जाएँ ↑ विषय-सूची ← पुस्तकें

    ↑