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ऑगस्टीन पहले भाग्य के सिद्धांत की चर्चा करते हैं, ताकि उन लोगों का खंडन कर सकें जो रोमी साम्राज्य की शक्ति और वृद्धि का श्रेय भाग्य को देना चाहते हैं, जबकि इसे झूठे देवताओं का काम नहीं ठहराया जा सकता, जैसा कि पिछली पुस्तक में दिखाया जा चुका है। इसके बाद वे सिद्ध करते हैं कि परमेश्वर के पूर्वज्ञान और हमारी स्वतंत्र इच्छा के बीच कोई विरोध नहीं है। फिर वे प्राचीन रोमियों के आचरण के विषय में बात करते हैं, और दिखाते हैं कि किस अर्थ में यह स्वयं रोमियों के सद्गुण के कारण था, और किस सीमा तक परमेश्वर की युक्ति के कारण, कि उसने उनके राज्य को बढ़ाया, यद्यपि उन्होंने उसकी आराधना नहीं की। अन्त में वे बताते हैं कि मसीही सम्राटों के वास्तविक सुख को क्या माना जाना चाहिए।
1. कि रोमी साम्राज्य और सब राज्यों का कारण न तो आकस्मिक है और न तारों की स्थिति में निहित है
अतः रोमी साम्राज्य की महानता का कारण न तो आकस्मिक है और न भाग्यगत, यदि हम उन लोगों के निर्णय या मत के अनुसार चलें जो उन बातों को आकस्मिक कहते हैं जिनका या तो कोई कारण नहीं होता, या जिनके कारण किसी बुद्धिगम्य क्रम से नहीं निकलते, और उन बातों को भाग्यगत कहते हैं जो परमेश्वर और मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र होकर किसी निश्चित क्रम की अनिवार्यता से घटित होती हैं। संक्षेप में, मानवीय राज्य परमेश्वर के विधान से स्थापित होते हैं। और यदि कोई उनके अस्तित्व का कारण भाग्य को ठहराता है, क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा या सामर्थ्य को ही भाग्य का नाम देता है, तो वह अपना मत भले ही रखे, पर अपनी भाषा सुधारे। क्योंकि जब कोई उससे यह प्रश्न करेगा कि उसका भाग्य से क्या अभिप्राय है, तो जो वह बाद में कहेगा, वही आरम्भ में क्यों नहीं कह देता? क्योंकि जब मनुष्य यह शब्द सुनते हैं, तो भाषा के सामान्य प्रयोग के अनुसार, वे इससे केवल उस विशेष तारा-स्थिति के प्रभाव को समझते हैं जो किसी के जन्म या गर्भधारण के समय विद्यमान होती है—जिसे कुछ लोग परमेश्वर की इच्छा से पूर्णतः पृथक मानते हैं, जबकि दूसरे कहते हैं कि यह भी उसी इच्छा पर निर्भर है। परन्तु जो लोग यह मानते हैं कि तारे, परमेश्वर की इच्छा से अलग, यह निर्धारित करते हैं कि हम क्या करेंगे, या कौन-सी भलाइयाँ पाएँगे, या कौन-सी बुराइयाँ सहेंगे, उनकी बात किसी को भी नहीं सुननी चाहिए—न केवल उन्हें जो सच्चे धर्म को मानते हैं, वरन् उन्हें भी जो किन्हीं भी देवताओं की, यहाँ तक कि झूठे देवताओं की भी, आराधना करना चाहते हैं। क्योंकि यह मत वास्तव में इसके सिवा और क्या कहता है, कि किसी भी देवता की आराधना या प्रार्थना नहीं की जानी चाहिए? परन्तु हमारा वर्तमान वाद-विवाद इनके विरुद्ध नहीं, बल्कि उनके विरुद्ध है जो अपने कल्पित देवताओं की रक्षा में मसीही धर्म का विरोध करते हैं। परन्तु जो लोग तारों की स्थिति को परमेश्वर की इच्छा पर निर्भर मानते हैं, और मानो यह ठहराते हैं कि प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव कैसा होगा और उसके साथ क्या भला या बुरा घटित होगा—यदि वे यह सोचते हैं कि इन्हीं तारों को परमेश्वर की सर्वोच्च सामर्थ्य से यह शक्ति दी गई है कि वे अपनी इच्छा के अनुसार इन बातों का निर्धारण करें—तो वे आकाशमण्डल का बड़ा अपमान करते हैं, जिसकी मानो सबसे तेजोमय सभा और सबसे भव्य सभा-भवन में, वे यह मानते हैं कि ऐसे दुष्ट कार्य ठहराए जाते हैं जिन्हें, यदि कोई पार्थिव राज्य ठहराए, तो सारी मानव जाति के निर्णय से उसका विनाश ठहराया जाए। तो फिर परमेश्वर के लिए, जो तारों और मनुष्यों दोनों का प्रभु है, मनुष्यों के कार्यों के विषय में कौन-सा न्याय शेष रह जाता है, जब इन कार्यों का कारण आकाशीय अनिवार्यता ठहराई जाती है? या, यदि वे यह न कहें कि तारे, यद्यपि उन्हें सर्वोच्च परमेश्वर से कुछ शक्ति अवश्य प्राप्त हुई है, अपनी ही स्वेच्छा से इन बातों को निर्धारित करते हैं, परन्तु केवल यह कहें कि उसकी आज्ञाएँ उनके द्वारा साधन-रूप में, ऐसी अनिवार्यताओं के प्रयोग और प्रवर्तन में, पूरी की जाती हैं—तो क्या हमें परमेश्वर के विषय में भी वही सोचना होगा जो तारों की इच्छा के विषय में सोचना हमें अनुचित प्रतीत होता था? परन्तु यदि यह कहा जाए कि तारे इन बातों को उत्पन्न करने के बजाय केवल सूचित करते हैं, कि वह तारों की स्थिति मानो भविष्य की बातों की भविष्यवाणी करने वाली एक प्रकार की वाणी है, न कि उनका कारण—क्योंकि यही मत असाधारण विद्वानों का रहा है—तो निश्चय ही ज्योतिषी इस प्रकार नहीं बोला करते, यह कहते हुए, उदाहरण के लिए, कि मंगल की अमुक स्थिति हत्या को सूचित करती है, परन्तु यह कहते हैं कि वह हत्या को उत्पन्न करती है। फिर भी, यद्यपि हम यह मान लें कि वे उचित रीति से नहीं बोलते, और हमें उसी वाणी-रूप को स्वीकार करना चाहिए जिसे दार्शनिकों ने उन बातों की भविष्यवाणी करने में अपनाया है जिन्हें वे तारों की स्थिति में खोज लेने का दावा करते हैं—तो यह कैसे हुआ कि वे कभी भी यह कारण नहीं बता सके कि जुड़वों के जीवन में, उनके कार्यों में, उनके साथ घटित होने वाली घटनाओं में, उनके व्यवसायों, कलाओं, सम्मानों और मानव जीवन से जुड़ी अन्य बातों में, यहाँ तक कि उनकी मृत्यु में भी, प्रायः इतना बड़ा अन्तर क्यों पाया जाता है, कि इन बातों की दृष्टि से बहुत-से पूर्णतः अपरिचित लोग उनसे एक-दूसरे की अपेक्षा अधिक मिलते-जुलते हैं, यद्यपि वे जन्म के समय अत्यन्त अल्प अन्तराल से पृथक हुए, परन्तु गर्भधारण के समय एक ही मैथुन-क्रिया से और एक ही क्षण में उत्पन्न हुए थे?
2. जुड़वों के स्वास्थ्य में भिन्नता के विषय में
सिसरो कहते हैं कि प्रसिद्ध वैद्य हिप्पोक्रेट्स ने लिखकर छोड़ा है कि उन्हें एक जोड़े भाइयों के जुड़वाँ होने का सन्देह इस बात से हुआ कि वे दोनों एक ही समय बीमार पड़े, और उनका रोग दोनों में एक ही समय अपने चरम पर पहुँचा और शान्त हुआ।[185] स्टोइक पोसिडोनियस, जो ज्योतिष विद्या में बहुत रुचि रखता था, इस बात की व्याख्या यह मानकर किया करता था कि वे एक ही नक्षत्र के अधीन जन्मे और गर्भ में आए थे। इस प्रश्न में वैद्य का अनुमान स्वीकार किए जाने के कहीं अधिक योग्य है, और विश्वसनीयता के कहीं अधिक निकट है, क्योंकि जिस रीति से माता-पिता मैथुन के समय शरीर में प्रभावित हुए होंगे, उसी रीति से गर्भस्थ शिशुओं के प्रारम्भिक तत्त्व भी प्रभावित हुए होंगे, जिससे उनके जन्म तक बढ़ने और विकसित होने के लिए आवश्यक सब कुछ एक ही माता के शरीर से मिलने के कारण, वे समान शारीरिक प्रकृति के साथ जन्में हों। इसके बाद, एक ही घर में, एक ही प्रकार के भोजन पर पोषित होकर, जहाँ उन्हें एक ही प्रकार की वायु, एक ही स्थान, और जल की एक ही गुणवत्ता भी मिली—जिनका, वैद्यक शास्त्र की साक्षी के अनुसार, शारीरिक स्वास्थ्य की दशा पर, भले या बुरे, बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है—और जहाँ उन्हें एक ही प्रकार के व्यायाम की भी आदत रही हो, उनकी शारीरिक प्रकृतियाँ इतनी समान हो जातीं कि वे एक ही समय और एक ही कारणों से समान रूप से रोगग्रस्त होते। परन्तु यह चाहना कि उनके जन्म या गर्भधारण के समय विद्यमान उस विशेष तारा-स्थिति को उनके एक साथ रोगग्रस्त होने का कारण ठहराया जाए, सबसे बड़ी धृष्टता प्रकट करता है, जबकि अत्यन्त भिन्न प्रकार के, अत्यन्त भिन्न दशाओं में, और अत्यन्त भिन्न घटनाओं के अधीन अनेक प्राणी एक ही समय, एक ही प्रदेश में, और एक ही आकाश के नीचे गर्भ में आए और जन्मे हो सकते हैं। परन्तु हम जानते हैं कि जुड़वें न केवल भिन्न-भिन्न व्यवहार करते हैं और अत्यन्त भिन्न स्थानों को जाते हैं, वरन् भिन्न-भिन्न प्रकार के रोगों से भी पीड़ित होते हैं; जिसका, मेरी दृष्टि में, हिप्पोक्रेट्स सबसे सरल कारण यह देते कि भोजन और व्यायाम की भिन्नता के कारण, जो शरीर की प्रकृति से नहीं वरन् मन की प्रवृत्ति से उत्पन्न होती है, वे स्वास्थ्य के विषय में एक-दूसरे से भिन्न हो गए हों। इसके अतिरिक्त, पोसिडोनियस, या तारों के भाग्य-प्रभाव का कोई भी अन्य समर्थक, यदि वह अनजान मनों को उन बातों में धोखा देने का इच्छुक न हो जिनसे वे अनभिज्ञ हैं, तो इसका कोई उत्तर देने में बहुत उलझ जाएगा। परन्तु जो वे जुड़वों के जन्मों के बीच बीतने वाले उस अत्यन्त अल्प अन्तराल से, आकाश के उस बिन्दु के कारण जहाँ जन्म-घड़ी का चिह्न रखा जाता है और जिसे वे 'लग्न' कहते हैं, सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं, वह या तो जुड़वों के स्वभावों, कार्यों, आदतों और भाग्यों में पाई जाने वाली भिन्नता की तुलना में असंगत रूप से छोटा है, या जुड़वों की उस दशा की तुलना में असंगत रूप से बड़ा है, चाहे नीची हो या ऊँची, जो दोनों के लिए समान होती है—जिनके सबसे बड़े अन्तर का कारण वे हर स्थिति में उसी घड़ी में रखते हैं जिसमें एक जन्मा। और इसी कारण, यदि एक दूसरे के तुरन्त बाद इस प्रकार जन्मे कि लग्न में कोई परिवर्तन न हो, तो मैं दोनों से सम्बन्धित सब बातों में पूर्ण समानता की मांग करता हूँ, जो किसी भी जुड़वों के मामले में कभी नहीं पाई जा सकती। परन्तु यदि दूसरे के जन्म की धीमी गति लग्न में परिवर्तन के लिए समय दे, तो मैं भिन्न-भिन्न माता-पिता की मांग करता हूँ, जो जुड़वों के पास कभी नहीं हो सकते।
3. निगिडियस ज्योतिषी द्वारा जुड़वों के जन्म के प्रश्न में कुम्हार के चाक से लिए गए तर्कों के विषय में
अतः वह प्रसिद्ध कहानी कुम्हार के चाक के विषय में व्यर्थ ही सामने लाई जाती है, जो उस उत्तर का वर्णन करती है जो निगिडियस ने कहा जाता है कि इस प्रश्न से उलझन में पड़कर दिया था, और जिसके कारण उसे फिगुलुस कहा जाने लगा।[186] क्योंकि उसने पूरी शक्ति से कुम्हार के चाक को घुमाकर, उस पर स्याही से चिह्न लगाया, अत्यन्त द्रुत गति से दो बार उस पर आघात करते हुए, जिससे आघात मानो चाक के एक ही भाग पर पड़ते प्रतीत हुए। फिर जब घूमना बन्द हुआ, तो उसके द्वारा लगाए गए चिह्न चाक के किनारे पर एक-दूसरे से काफी दूरी पर पाए गए। इस प्रकार, उसने कहा, आकाशमण्डल के घूमने की महान द्रुतगति को देखते हुए, यद्यपि जुड़वे इतने ही अल्प अन्तराल में जन्मे हों जितना अन्तराल मैंने इस चाक पर लगाए आघातों के बीच रखा, फिर भी वह अल्प समयान्तराल आकाशमण्डल में एक अत्यन्त बड़ी दूरी के समान है। अतः, उसने कहा, जुड़वों की आदतों और भाग्यों में जो भी असमानताएँ देखी जाती हैं, वे इसी से उत्पन्न होती हैं। यह तर्क उन बर्तनों से भी अधिक भंगुर है जो उस चाक के घूमने से बनाए जाते हैं। क्योंकि यदि आकाश में इतना गूढ़ अर्थ है जिसे नक्षत्रों के अवलोकन से नहीं समझा जा सकता, कि जुड़वों में से एक को विरासत मिले और दूसरे को न मिले, तो जो जुड़वे नहीं हैं उनके विषय में, उनके नक्षत्रों की जाँच करके, उस रहस्य से सम्बन्धित बातें बताने का, जिसे कोई नहीं समझ सकता, और उन्हें प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के ठीक क्षण से जोड़ने का साहस वे कैसे करते हैं? अब, यदि जो जुड़वे नहीं हैं उनकी जन्म-घड़ियों से सम्बन्धित ऐसी भविष्यवाणियों को इस आधार पर उचित ठहराया जाए कि वे आकाश के अधिक विस्तृत क्षेत्रों के अवलोकन पर आधारित हैं, जबकि जुड़वों के जन्मों को अलग करने वाले वे अत्यन्त अल्प क्षण, जो आकाश के सूक्ष्म भागों के अनुरूप होते हैं, तुच्छ बातों से जोड़े जाने चाहिए जिनके विषय में ज्योतिषियों से पूछा नहीं जाता—क्योंकि कौन उनसे यह पूछेगा कि उसे कब बैठना है, कब बाहर टहलना है, कब और क्या भोजन करना है?—तो हम इस प्रकार बोलने में कैसे न्यायसंगत ठहर सकते हैं, जब हम जुड़वों की आदतों, कार्यों और नियति में इतनी बहुविध भिन्नता दिखा सकते हैं?
4. एसाव और याकूब नामक जुड़वों के विषय में, जो स्वभाव और कार्यों दोनों में एक-दूसरे से अत्यन्त भिन्न थे
प्राचीन पुरखाओं के समय में, प्रतिष्ठित व्यक्तियों की बात करें तो, दो जुड़वाँ भाई जन्मे, जिनमें से पहला दूसरे के तुरन्त बाद इस प्रकार जन्मा कि पहले ने दूसरे की एड़ी पकड़ रखी थी। उनके जीवन और स्वभाव में इतना बड़ा अन्तर था, उनके कार्यों में इतनी बड़ी असमानता थी, उनके माता-पिता के प्रेम में उनके प्रति इतना बड़ा भेद था, कि उनके बीच के इस विरोधाभास ने पारस्परिक शत्रुतापूर्ण द्वेष तक उत्पन्न कर दिया। क्या जब हम कहते हैं कि वे एक-दूसरे से इतने भिन्न थे, तो हमारा अभिप्राय यह है कि जब एक चलता था तो दूसरा बैठा रहता था, जब एक सोता था तो दूसरा जागता था—अर्थात् वे भिन्नताएँ जो आकाश के उन सूक्ष्म भागों से सम्बन्धित ठहराई जाती हैं जिन्हें वे लोग नहीं समझ सकते जो किसी के जन्म के क्षण विद्यमान तारा-स्थिति को इसलिए नोट करते हैं कि उसके विषय में ज्योतिषियों से पूछा जा सके? इन जुड़वों में से एक बहुत समय तक भाड़े का सेवक रहा; दूसरे ने कभी सेवा नहीं की। इनमें से एक अपनी माता का प्रिय था; दूसरा नहीं था। इनमें से एक ने वह सम्मान खो दिया जो उनके लोगों में इतना मूल्यवान माना जाता था; दूसरे को वह प्राप्त हुआ। और उनकी पत्नियों, सन्तानों और सम्पत्ति के विषय में हम क्या कहें? इन सब बातों में वे कितने भिन्न थे! अतः यदि ऐसी बातें जुड़वों के जन्मों के बीच बीतने वाले उन सूक्ष्म समयान्तरालों से जुड़ी हैं, और नक्षत्रों से सम्बन्धित नहीं ठहराई जानी चाहिए, तो अन्य लोगों के विषय में, जो जुड़वे नहीं हैं, उनके नक्षत्रों की जाँच से ऐसी बातों की भविष्यवाणी क्यों की जाती है? और यदि दूसरी ओर, यह कहा जाए कि इन बातों की भविष्यवाणी इसलिए की जाती है क्योंकि वे सूक्ष्म और अगोचर क्षणों से नहीं, वरन् उन समयान्तरालों से जुड़ी हैं जिन्हें देखा और नोट किया जा सकता है, तो इस विषय में वह कुम्हार का चाक किस काम का है, सिवाय इसके कि वह मिट्टी के हृदय वाले मनुष्यों को इसलिए घुमाए कि वे ज्योतिषियों की बातों की खोखलेपन को पहचानने से रोके जाएँ?
5. जिस रीति से ज्योतिषी एक व्यर्थ विद्या का दावा करते हुए दोषी ठहरते हैं
क्या वे ही व्यक्ति, जिन्हें हिप्पोक्रेट्स की वैद्यक बुद्धि ने जुड़वें होने का सन्देह कराया, क्योंकि उसने देखा कि उनका रोग दोनों में एक ही समय अपने चरम पर पहुँचा और शान्त हुआ—क्या ये, मैं कहता हूँ, उन लोगों का पर्याप्त खण्डन नहीं करते जो उस बात को तारों के प्रभाव से जोड़ना चाहते हैं जो वास्तव में शारीरिक प्रकृति की समानता के कारण थी? क्योंकि वे दोनों एक ही रोग से, और एक ही समय, बीमार क्यों पड़े, न कि उनके जन्म के क्रम के अनुसार एक के बाद एक? (क्योंकि निश्चय ही वे दोनों एक ही समय जन्म नहीं ले सकते थे।) या, यदि उनके भिन्न-भिन्न समयों में जन्म लेने के तथ्य से यह आवश्यक रूप से सिद्ध नहीं होता कि उन्हें भिन्न-भिन्न समयों में बीमार पड़ना चाहिए, तो वे यह क्यों तर्क करते हैं कि उनके जन्मों के समय में भेद ही अन्य बातों में उनके भेद का कारण था? वे भिन्न-भिन्न समयों में जन्मे होने के कारण भिन्न-भिन्न समयों में परदेश की यात्रा क्यों कर सकते थे, भिन्न-भिन्न समयों में विवाह क्यों कर सकते थे, भिन्न-भिन्न समयों में सन्तान क्यों उत्पन्न कर सकते थे, और अन्य अनेक बातें भिन्न-भिन्न समयों में क्यों कर सकते थे, परन्तु उसी कारण से भिन्न-भिन्न समयों में बीमार भी नहीं पड़ सकते थे? क्योंकि यदि जन्म के क्षण के भेद ने लग्न को बदल दिया, और अन्य सब बातों में असमानता उत्पन्न कर दी, तो जो एक-साथता उनके गर्भधारण की थी, वह उनकी बीमारियों के आक्रमण में क्यों बनी रही? या, यदि स्वास्थ्य की नियति गर्भधारण के समय से जुड़ी है, परन्तु अन्य बातों की नियति जन्म के समय से जुड़ी कही जाती है, तो उन्हें जन्म के नक्षत्रों की जाँच से स्वास्थ्य के विषय में कुछ भी भविष्यवाणी नहीं करनी चाहिए, जब तक गर्भधारण की घड़ी भी न दी जाए, ताकि उसके नक्षत्रों की जाँच की जा सके। परन्तु यदि वे कहें कि वे गर्भधारण के लग्न की जाँच किए बिना बीमारियों के आक्रमण की भविष्यवाणी करते हैं, क्योंकि ये जन्म के क्षणों से सूचित होती हैं, तो वे इन जुड़वों में से किसी एक को उसके जन्म के लग्न से यह कैसे बता सकते थे कि वह कब बीमार पड़ेगा, जबकि दूसरे को भी, जिसका जन्म-लग्न वही नहीं था, अनिवार्यतः उसी समय बीमार पड़ना था? फिर मैं पूछता हूँ, यदि जुड़वों के जन्मों के बीच का समयान्तर इतना बड़ा है कि उनके लग्नों के भेद के कारण उनके नक्षत्रों में भी भेद उत्पन्न हो जाता है, और इसलिए उन सब प्रमुख बिन्दुओं में भी जिन्हें इतना अधिक प्रभाव दिया जाता है, कि इस परिवर्तन से भी नियति में भेद आ जाता है, तो यह कैसे सम्भव हो सकता है, जबकि वे भिन्न-भिन्न समयों में गर्भ में नहीं आए हो सकते? या, यदि एक ही क्षण गर्भ में आए दो व्यक्तियों की जन्म के विषय में भिन्न-भिन्न नियति हो सकती है, तो एक ही क्षण जन्मे दो व्यक्तियों की जीवन और मृत्यु के लिए भिन्न-भिन्न नियति क्यों नहीं हो सकती? क्योंकि यदि वह एक क्षण जिसमें दोनों गर्भ में आए, इसमें बाधा नहीं बना कि एक दूसरे से पहले जन्मे, तो यदि दो व्यक्ति एक ही क्षण जन्मते हैं, तो किस बात में बाधा हो सकती है कि वे एक ही क्षण न मरें? यदि एक-साथ गर्भधारण जुड़वों को गर्भ में भिन्न-भिन्न रूप से प्रभावित होने देता है, तो जन्म की एक-साथता किन्हीं भी दो व्यक्तियों को संसार में भिन्न-भिन्न भाग्य पाने की अनुमति क्यों न दे? और इस प्रकार इस विद्या, या यों कहें कि इस भ्रम, की सब कल्पित बातें मिट जाएँगी। यह कैसी विचित्र बात है, कि दो बालक जो एक ही समय, वरन् एक ही क्षण, एक ही तारा-स्थिति के अधीन गर्भ में आए, उनकी भिन्न-भिन्न नियतियाँ हों जो उन्हें जन्म की भिन्न-भिन्न घड़ियों तक ले जाएँ, जबकि दो बालक, जो दो भिन्न माताओं से, एक ही क्षण, एक ही तारा-स्थिति के अधीन जन्मे हों, उनकी ऐसी भिन्न-भिन्न नियतियाँ न हो सकें जो उन्हें अनिवार्यतः जीवन और मृत्यु की भिन्न-भिन्न रीतियों तक ले जाएँ? क्या वे गर्भधारण के समय अभी तक बिना नियति के होते हैं, क्योंकि उन्हें नियति तभी मिल सकती है जब वे जन्म लें? तो फिर उनका क्या अभिप्राय है जब वे कहते हैं कि यदि गर्भधारण की घड़ी ज्ञात हो जाए, तो ये ज्योतिषी अनेक बातों की भविष्यवाणी कर सकते हैं? इसी से वह कहानी भी उत्पन्न हुई, जिसे कुछ लोग बार-बार दोहराते हैं, कि किसी ज्ञानी ने अपनी पत्नी के साथ सहवास के लिए ऐसी घड़ी चुनी, ताकि वह एक प्रतिष्ठित पुत्र उत्पन्न करना सुनिश्चित कर सके। इसी मत से पोसिडोनियस, जो एक महान ज्योतिषी और साथ ही दार्शनिक भी था, का वह उत्तर भी निकला, जो उन जुड़वों के विषय में था जो एक ही समय बीमारी से आक्रान्त हुए, अर्थात्, "यह उनके साथ इसलिए हुआ क्योंकि वे एक ही समय गर्भ में आए, और एक ही समय जन्मे।" क्योंकि निश्चय ही उसने "गर्भधारण" शब्द इसलिए जोड़ा, ऐसा न हो कि उससे कहा जाए कि वे दोनों एक ही समय जन्म नहीं ले सकते थे, यह जानते हुए कि किसी भी दशा में वे दोनों अवश्य एक ही समय गर्भ में आए होंगे; इस प्रकार वह यह दिखाना चाहता था कि उसने उनके एक समान और एक साथ बीमार पड़ने का कारण उनकी शारीरिक प्रकृति की समानता को निकटतम कारण मानकर नहीं ठहराया, वरन् यह माना कि उनके स्वास्थ्य की समानता के विषय में भी वे एक तारकीय सम्बन्ध से बँधे हुए थे। अतः यदि गर्भधारण के समय का नियतियों की समानता से इतना अधिक सम्बन्ध है, तो ये ही नियतियाँ जन्म की परिस्थितियों से बदली नहीं जानी चाहिए; या, यदि यह कहा जाए कि जुड़वों की नियतियाँ इसलिए बदल जाती हैं क्योंकि वे भिन्न-भिन्न समयों में जन्मते हैं, तो हमें यह क्यों न समझना चाहिए कि वे पहले ही इसलिए बदल दी गई थीं ताकि वे भिन्न-भिन्न समयों में जन्म ले सकें? तो क्या संसार में रहने वाले मनुष्यों की इच्छा जन्म की नियतियों को नहीं बदलती, जब जन्म का क्रम उन नियतियों को बदल सकता है जो उन्हें गर्भधारण के समय प्राप्त थीं?
6. भिन्न-भिन्न लिंगों के जुड़वों के विषय में
परन्तु जुड़वों के गर्भधारण में भी, जो निश्चय ही दोनों के लिए एक ही क्षण होता है, प्रायः ऐसा होता है कि एक पुरुष के रूप में और दूसरा स्त्री के रूप में गर्भ में आता है। मैं भिन्न-भिन्न लिंगों के दो जुड़वों को जानता हूँ। वे दोनों जीवित हैं, और अपनी आयु के प्रफुल्लित काल में हैं; और यद्यपि वे शरीर में एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं, जहाँ तक लिंग-भेद अनुमति देता है, फिर भी वे अपने जीवन के सम्पूर्ण दायरे और उद्देश्य में अत्यन्त भिन्न हैं (उन भेदों को ध्यान में रखते हुए जो पुरुषों और स्त्रियों के जीवन के बीच अनिवार्यतः पाए जाते हैं)—एक तो गणक (काउंट) का पद धारण किए हुए है, और लगभग सदैव सेना के साथ विदेशी सेवा में घर से दूर रहता है, दूसरी अपने देश की मिट्टी या अपने जन्म-प्रदेश को कभी नहीं छोड़ती। इससे भी बढ़कर—और यह और भी अविश्वसनीय है, यदि तारों की नियति पर विश्वास किया जाए, यद्यपि यदि हम मनुष्यों की इच्छाओं और परमेश्वर के निःशुल्क वरदानों पर विचार करें तो यह कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है—वह विवाहित है; वह एक पवित्र कुँआरी है: उसने अनेक सन्तान उत्पन्न की हैं; उसने विवाह तक कभी नहीं किया। परन्तु क्या लग्न का प्रभाव बहुत बड़ा नहीं है? मुझे लगता है कि मैंने उसकी निरर्थकता दिखाने के लिए पर्याप्त कह दिया है। परन्तु वे ज्योतिषी कहते हैं, अन्य बातों में लग्न का प्रभाव चाहे जो भी हो, जन्म के सम्बन्ध में तो वह निश्चय ही सार्थक है। परन्तु गर्भधारण के सम्बन्ध में क्यों नहीं, जो निस्सन्देह एक ही मैथुन-क्रिया से होता है? और वास्तव में, प्रकृति का बल इतना बड़ा है कि एक बार गर्भवती होने के बाद स्त्री पुनः गर्भधारण के योग्य नहीं रहती। या फिर क्या वे जन्म के समय बदल दिए गए, या तो वह पुरुष में या वह स्त्री में, उनके लग्नों के भेद के कारण? परन्तु, यद्यपि यह कहना पूर्णतः निरर्थक नहीं है कि कुछ तारकीय प्रभावों में केवल शरीरों में भेद उत्पन्न करने की कुछ शक्ति है—जैसे, उदाहरण के लिए, हम देखते हैं कि वर्ष की ऋतुएँ सूर्य के निकट आने और दूर जाने से चक्र में आती हैं, और कुछ प्रकार की वस्तुएँ चन्द्रमा के घटने-बढ़ने से बढ़ जाती या घट जाती हैं, जैसे समुद्री-कँटीले जीव, सीप, और समुद्र की अद्भुत ज्वार-भाटा—तो इससे यह सिद्ध नहीं होता कि मनुष्यों की इच्छाएँ तारों की स्थिति के अधीन कर दी जानी चाहिए। तथापि ज्योतिषी, जब वे हमारे कार्यों को भी नक्षत्रों से बाँधना चाहते हैं, तो वे हमें केवल यह जाँचने पर विवश करते हैं कि क्या इन शरीरों में भी परिवर्तन किसी तारकीय कारण के अतिरिक्त किसी अन्य कारण से न हों। क्योंकि किसी शरीर से उसके लिंग से अधिक घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित और क्या हो सकता है? और फिर भी, एक ही तारा-स्थिति के अधीन, भिन्न-भिन्न लिंगों के जुड़वे गर्भ में आ सकते हैं। अतः इससे बड़ी निरर्थकता क्या कही या मानी जा सकती है, कि तारों की वह स्थिति, जो गर्भधारण के समय दोनों के लिए समान थी, यह कारण नहीं बन सकी कि वह बालिका अपने भाई से, जिसके साथ उसका नक्षत्र समान था, भिन्न लिंग की न हो, जबकि तारों की वह स्थिति जो उनके जन्म की घड़ी में विद्यमान थी, यह कारण बन सकी कि वह विवाह और पवित्र कुँआरेपन के बीच के महान अन्तर से उससे पृथक कर दी जाए?
7. विवाह के लिए, या रोपने के लिए, या बीज बोने के लिए दिन चुनने के विषय में
अब, क्या कोई यह तर्क प्रस्तुत करेगा कि विशेष कार्यों के लिए विशेष दिन चुनने से मनुष्य अपने कार्यों के लिए नई नियतियाँ उत्पन्न करते हैं? उदाहरण के लिए, यह मत यह कहेगा कि वह मनुष्य एक प्रतिष्ठित पुत्र पाने के लिए नहीं, वरन् एक तुच्छ पुत्र पाने के लिए जन्मा था, और इसलिए, विद्वान होने के कारण, उसने अपनी पत्नी के साथ सहवास के लिए एक घड़ी चुनी। इस प्रकार उसने एक ऐसी नियति उत्पन्न की जो उसके पास पहले नहीं थी, और उसकी स्वयं की बनाई हुई उस नियति से कुछ ऐसा भाग्यगत होने लगा जो उसकी जन्म-घड़ी की नियति में सम्मिलित नहीं था। ओह, कैसी विलक्षण मूर्खता! विवाह के लिए एक दिन चुना जाता है; और इसका कारण, मेरा विश्वास है, यह है कि यदि कोई दिन न चुना जाए, तो विवाह किसी अशुभ दिन पड़ सकता है, और दुःखद सिद्ध हो सकता है। तो फिर जो तारों ने जन्म की घड़ी में पहले ही ठहरा दिया है, उसका क्या होता है? क्या यह कहा जा सकता है कि मनुष्य चुनाव के एक कार्य से उसे बदल सकता है जो उसके लिए पहले ही निर्धारित हो चुका है, जबकि जो उसने स्वयं दिन चुनने में निर्धारित किया है, उसे किसी अन्य शक्ति द्वारा बदला नहीं जा सकता? इस प्रकार, यदि केवल मनुष्य ही, और आकाश के नीचे की सब वस्तुएँ नहीं, तारों के प्रभाव के अधीन हैं, तो वे कुछ दिनों को दाखलताएँ या वृक्ष रोपने के लिए, या अनाज बोने के लिए उपयुक्त क्यों चुनते हैं, और अन्य दिनों को पशुओं को वश में करने के लिए, या नर को मादा के साथ मिलाने के लिए, ताकि गायें और घोड़ियाँ गर्भवती हो सकें, और ऐसी ही अन्य बातों के लिए उपयुक्त क्यों मानते हैं? यदि यह कहा जाए कि चुने हुए दिनों का इन बातों पर प्रभाव इसलिए होता है क्योंकि नक्षत्र समय के क्षणों में भेद के अनुसार सब पार्थिव वस्तुओं, सजीव और निर्जीव, पर शासन करते हैं, तो विचार करें कि कितने अनगिनत प्राणी एक ही क्षण में जन्म लेते या उत्पन्न होते या अपना आरम्भ पाते हैं, जो इतने भिन्न-भिन्न परिणामों तक पहुँचते हैं, कि वे किसी भी छोटे बालक को यह विश्वास दिला सकते हैं कि दिनों के विषय में ये टिप्पणियाँ हास्यास्पद हैं। क्योंकि कौन इतना पागल होगा कि यह दावा करने का साहस करे कि सब वृक्षों, सब जड़ी-बूटियों, सब पशुओं, सर्पों, पक्षियों, मछलियों, कीड़ों में से प्रत्येक का अपना पृथक जन्म या आरम्भ का क्षण है? फिर भी, मनुष्य ज्योतिषियों की कुशलता परखने के लिए, गूँगे पशुओं के नक्षत्रों को उनके सामने लाने के अभ्यस्त हैं, जिनके जन्म के नक्षत्रों को वे इस खोज के उद्देश्य से घर पर सावधानी से देखते हैं; और वे उन ज्योतिषियों को अन्य सबकी अपेक्षा अधिक पसन्द करते हैं, जो नक्षत्रों की जाँच से यह कहते हैं कि वे किसी पशु के, न कि किसी मनुष्य के, जन्म को सूचित करते हैं। वे यह भी बताने का साहस करते हैं कि वह कैसा पशु है, चाहे वह ऊन देने वाला पशु हो, या बोझ ढोने के योग्य पशु हो, या हल जोतने के योग्य हो, या घर की रखवाली के योग्य हो; क्योंकि ज्योतिषियों को कुत्तों की नियति के विषय में भी परखा जाता है, और इस विषय में उनके उत्तरों के बाद उनसे पूछने वालों की प्रशंसा-ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। वे मनुष्यों को इतना धोखा देते हैं कि उन्हें यह सोचने पर विवश कर देते हैं कि किसी मनुष्य के जन्म के समय अन्य सब प्राणियों का जन्म रुक जाता है, यहाँ तक कि उसी क्षण, उसी आकाश-क्षेत्र के अधीन, एक मक्खी भी जीवन में नहीं आती जिस समय वह जन्म ले रहा होता है। और यदि यह मक्खी के विषय में स्वीकार किया जाए, तो यह तर्क वहीं नहीं रुक सकता, वरन् मक्खियों से ऊँट और हाथियों तक पहुँचना ही होगा। न ही वे इस बात पर ध्यान देना चाहते हैं कि जब किसी खेत में बोने के लिए एक दिन चुना गया हो, तो इतने सारे बीज एक साथ भूमि में गिरते हैं, एक साथ अंकुरित होते हैं, उगते हैं, पूर्णता को पहुँचते हैं, और एक साथ पकते हैं; और फिर भी, इन सब बालियों में से, जो समकालीन और, मानो, सहोत्पन्न हैं, कुछ फफूँद से नष्ट हो जाती हैं, कुछ पक्षियों द्वारा खा ली जाती हैं, और कुछ मनुष्यों द्वारा तोड़ ली जाती हैं। वे यह कैसे कह सकते हैं कि इन सबके भिन्न-भिन्न नक्षत्र थे, जिन्हें वे इतने भिन्न-भिन्न परिणामों तक पहुँचते देखते हैं? क्या वे यह मान लेंगे कि ऐसी बातों के लिए दिन चुनना मूर्खता है, और यह कहना कि वे आकाशीय आदेश के क्षेत्र में नहीं आतीं, जबकि वे केवल मनुष्यों को ही तारों के अधीन करते हैं, जिन्हें अकेले संसार में परमेश्वर ने स्वतंत्र इच्छाएँ प्रदान की हैं? इन सब बातों पर विचार करते हुए, हमारे पास यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण है कि जब ज्योतिषी बहुत-से अद्भुत उत्तर देते हैं, तो इसका कारण उन आत्माओं की गुप्त प्रेरणा है जो सर्वोत्तम प्रकार की नहीं हैं, जिनका कार्य मनुष्यों के मनों में तारों के भाग्य-प्रभाव के विषय में उन झूठे और हानिकारक विचारों को डालना और उन्हें उनमें दृढ़ करना है, न कि उनका लग्नों को चिह्नित करना और जाँचना, किसी ऐसी विद्या के अनुसार जिसका वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं है।
8. उनके विषय में जो भाग्य के नाम से तारों की स्थिति को नहीं, वरन् परमेश्वर की इच्छा पर निर्भर कारणों की शृंखला को पुकारते हैं
परन्तु जो लोग भाग्य के नाम से, किसी प्राणी के गर्भ में आने, या जन्म लेने, या अस्तित्व में आने के समय विद्यमान तारों की व्यवस्था को नहीं, वरन् कारणों की उस सम्पूर्ण शृंखला और क्रम को पुकारते हैं जो प्रत्येक वस्तु को वही बनाता है जो वह बनती है, उनके साथ मुझे केवल शाब्दिक विवाद में परिश्रम और संघर्ष करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे कारणों के इस तथाकथित क्रम और सम्बन्ध का श्रेय परमप्रधान परमेश्वर की इच्छा और सामर्थ्य को देते हैं, जिसके विषय में यह अत्यन्त सही और अत्यन्त सत्य माना जाता है कि वह सब बातों को घटित होने से पहले जानता है, और कुछ भी अनियंत्रित नहीं छोड़ता; जिससे सब सामर्थ्य आते हैं, यद्यपि सबकी इच्छाएँ उसी से नहीं आतीं। अब, यह कि जिसे वे भाग्य कहते हैं वह मुख्यतः परमप्रधान परमेश्वर की ही इच्छा है, जिसकी सामर्थ्य सब बातों में अजेय रूप से फैली हुई है, यह निम्नलिखित पंक्तियों से सिद्ध होता है, जिनका रचयिता, यदि मैं भूल नहीं कर रहा, अन्नायस सेनेका है:—
"हे सर्वोच्च पिता, हे ऊँचे आकाशों के अधिपति, मुझे वहाँ ले चल जहाँ तेरी इच्छा हो; मैं बिना विलम्ब तत्पर आज्ञाकारिता दिखाऊँगा। देख, मैं यहाँ हूँ। मैं तेरी प्रभुतापूर्ण इच्छा पूरी करने को तुरन्त आता हूँ; यदि तेरी आज्ञा मेरी इच्छा के विपरीत हो, तो भी मैं कराहते हुए तेरा अनुसरण करूँगा, और सौंपे गए कार्य को, मन की सारी अनिच्छा-भरी पीड़ा सहते हुए, पूरा करूँगा—दुष्ट बनकर; जबकि यदि मैं भला होता, तो वही कार्य, चाहे कठिन हो, सद्गुणी प्रसन्नता से करता। भाग्य उस मनुष्य को ले चलता है जो सहमति से चलता है; परन्तु जो अनिच्छुक है, उसे वह घसीटता है।"[187]इस अन्तिम पंक्ति में वह अत्यन्त स्पष्ट रूप से उसी को "भाग्य" कहता है जिसे उसने पहले "परमप्रधान पिता की इच्छा" कहा था, जिसकी वह आज्ञा मानने को तैयार है, ऐसा वह कहता है, ताकि वह इच्छापूर्वक अगुवाई पाए, न कि घसीटा जाए अनिच्छापूर्वक, क्योंकि "नियतियाँ उस मनुष्य की अगुवाई करती हैं जो इच्छापूर्वक अनुसरण करता है, परन्तु जो अनिच्छुक है, उसे वे घसीटती हैं।"
निम्नलिखित होमरीय पंक्तियाँ, जिन्हें सिसरो लातीनी में अनुवाद करता है, भी इसी मत का समर्थन करती हैं:—
"मनुष्यों के मन वैसे ही होते हैं, जैसा वह प्रकाश है जिसे स्वयं पिता जोव उर्वर पृथ्वी पर प्रकट रूप से उण्डेलता है।"[188]यह नहीं कि सिसरो यह चाहता हो कि ऐसे प्रश्न में किसी काव्यात्मक भाव को कोई महत्त्व दिया जाए; क्योंकि जब वह कहता है कि स्टोइक लोग, भाग्य की सामर्थ्य का प्रतिपादन करते समय, होमर की इन पंक्तियों का प्रयोग करने के अभ्यस्त थे, तो वह उस कवि के मत के विषय में नहीं, वरन् उन दार्शनिकों के मत के विषय में बात कर रहा है, क्योंकि इन पंक्तियों से, जिन्हें वे भाग्य के विषय में अपने विवाद के सम्बन्ध में उद्धृत करते हैं, यह अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि वे भाग्य किसे मानते हैं, क्योंकि वे उसे जिसे वे परमप्रधान देवता मानते हैं, जुपिटर के नाम से पुकारते हैं, जिससे, वे कहते हैं, सारी नियतियों की शृंखला लटकी हुई है।
9. सिसरो की परिभाषा के विरुद्ध, परमेश्वर के पूर्वज्ञान और मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा के विषय में
जिस रीति से सिसरो स्टोइकों का खण्डन करने के कार्य में प्रवृत्त होता है, उससे प्रकट होता है कि उसे यह विश्वास नहीं था कि वह पहले भविष्यकथन (दैवज्ञता) का खण्डन किए बिना तर्क में उनके विरुद्ध कुछ भी सिद्ध कर सकता है।[189] और वह इस बात को नकार कर यह सिद्ध करने का प्रयत्न करता है कि भविष्य की बातों का कोई ज्ञान है ही नहीं, और अपनी सारी शक्ति से यह प्रतिपादन करता है कि ऐसा ज्ञान न तो परमेश्वर में है और न मनुष्य में, और न घटनाओं की कोई भविष्यवाणी है। इस प्रकार वह परमेश्वर के पूर्वज्ञान को भी नकारता है, और व्यर्थ तर्कों द्वारा, तथा कुछ ऐसे दैवज्ञ-वचनों को स्वयं के सामने खड़ा करके जिनका खण्डन करना अत्यन्त सरल है, सारी भविष्यवाणी को, यहाँ तक कि जो प्रकाश से भी अधिक स्पष्ट है, उलटने का प्रयत्न करता है (यद्यपि इन दैवज्ञ-वचनों का भी वह खण्डन नहीं करता)।
परन्तु ज्योतिषियों की इन अटकलों का खण्डन करने में उसका तर्क विजयी है, क्योंकि सचमुच ये ऐसी हैं कि स्वयं अपने आप को नष्ट और खण्डित कर देती हैं। फिर भी, जो लोग तारों के भाग्य-प्रभाव का प्रतिपादन करते हैं, वे उनसे कहीं अधिक सहनीय हैं जो भविष्य की घटनाओं के पूर्वज्ञान को नकारते हैं। क्योंकि परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना, और साथ ही यह नकारना कि उसे भविष्य की बातों का पूर्वज्ञान है, सबसे स्पष्ट मूर्खता है। सिसरो ने स्वयं यह देखा, और इसलिए पवित्रशास्त्र के इन शब्दों में निहित शिक्षा को स्वीकार करने का प्रयत्न किया, "मूर्ख ने अपने मन में कहा है, कोई परमेश्वर नहीं है।"[190] तथापि, उसने यह अपनी ओर से नहीं किया, क्योंकि वह देखता था कि ऐसा मत कितना घृणित और आपत्तिजनक होगा; और इसलिए देवताओं की प्रकृति पर अपनी पुस्तक में,[191] वह कोट्टा को इस विषय में स्टोइकों के विरुद्ध वाद-विवाद करने देता है, और उसने अपना मत लूसिलियस बाल्बस के पक्ष में देना अधिक उचित समझा, जिसे उसने स्टोइक पक्ष की रक्षा सौंपी, न कि कोट्टा के पक्ष में, जिसने यह प्रतिपादित किया कि कोई देवत्व है ही नहीं। परन्तु, दैवज्ञता पर अपनी पुस्तक में, वह स्वयं अपनी ओर से भविष्य की बातों के पूर्वज्ञान के सिद्धान्त का अत्यन्त खुलकर विरोध करता है। परन्तु यह सब वह इसलिए करता प्रतीत होता है कि वह भाग्य के सिद्धान्त को स्वीकार न करे, और ऐसा करके स्वतंत्र इच्छा को नष्ट न कर दे। क्योंकि वह यह मानता है कि भविष्य की बातों का ज्ञान एक बार स्वीकार कर लिए जाने पर, भाग्य इतने आवश्यक परिणाम के रूप में अनुसरण करता है कि उसे नकारा नहीं जा सकता।
परन्तु दार्शनिकों के ये उलझाने वाले तर्क-वितर्क और वाद-विवाद चाहे जैसे चलते रहें, हम, ताकि हम परमप्रधान और सच्चे परमेश्वर को ही स्वीकार करें, उसकी इच्छा, सर्वोच्च सामर्थ्य, और पूर्वज्ञान को स्वीकार करते हैं। न ही हमें इस बात का भय हो कि आखिरकार हम इच्छा से वह नहीं करते जो हम इच्छा से करते हैं, क्योंकि उसने, जिसका पूर्वज्ञान अचूक है, पहले से जान लिया था कि हम इसे करेंगे। यही वह बात थी जिससे सिसरो भयभीत था, और इसलिए उसने पूर्वज्ञान का विरोध किया। स्टोइक लोग भी यह मानते थे कि सब बातें अनिवार्यता से घटित नहीं होतीं, यद्यपि वे यह प्रतिपादित करते थे कि सब बातें नियति के अनुसार घटित होती हैं। तो फिर सिसरो को भविष्य की बातों के पूर्वज्ञान में किस बात का भय था? निस्सन्देह यह था—कि यदि सब भविष्य की बातें पहले से जान ली गई हैं, तो वे उसी क्रम में घटित होंगी जिस क्रम में उन्हें पहले जाना गया था; और यदि वे इस क्रम में घटित होती हैं, तो परमेश्वर द्वारा पहले से जानी गई बातों का एक निश्चित क्रम है; और यदि बातों का एक निश्चित क्रम है, तो कारणों का भी एक निश्चित क्रम है, क्योंकि कुछ भी बिना किसी प्रभावी कारण के पहले हुए घटित नहीं हो सकता। परन्तु यदि कारणों का एक निश्चित क्रम है जिसके अनुसार वह सब कुछ घटित होता है जो घटित होता है, तो, वह कहता है, भाग्य द्वारा ही वह सब घटित होता है जो घटित होता है। परन्तु यदि यह सत्य है, तो फिर हमारे अपने वश में कुछ भी नहीं है, और इच्छा की स्वतंत्रता जैसी कोई वस्तु नहीं है; और यदि हम यह मान लें, वह कहता है, तो मानव जीवन की सारी व्यवस्था उलट-पुलट हो जाती है। व्यर्थ ही कानून बनाए जाते हैं। व्यर्थ ही निन्दाओं, प्रशंसाओं, डाँटों, और उपदेशों का सहारा लिया जाता है; और भलों के लिए पुरस्कार और दुष्टों के लिए दण्ड ठहराने में कोई न्याय शेष नहीं रहता। और ऐसे लज्जाजनक, निरर्थक, और मानवता के लिए हानिकारक परिणाम न आएँ, इसलिए सिसरो भविष्य की बातों के पूर्वज्ञान को अस्वीकार करना चुनता है, और धार्मिक मन को इस विकल्प में बन्द कर देता है, कि इन दो बातों में से एक को चुने, या तो यह कि कुछ हमारे अपने वश में है, या यह कि पूर्वज्ञान है—ये दोनों सत्य नहीं हो सकतीं; परन्तु यदि एक को स्वीकार किया जाए, तो दूसरी उसी से नकार दी जाती है। इसलिए वह, एक सचमुच महान और बुद्धिमान पुरुष की भाँति, और एक ऐसा व्यक्ति जिसने मानवता की भलाई के लिए बहुत और अत्यन्त कुशलता से सलाह दी, उन दोनों में से इच्छा की स्वतंत्रता को चुनता है, जिसकी पुष्टि के लिए वह भविष्य की बातों के पूर्वज्ञान को नकारता है; और इस प्रकार, मनुष्यों को स्वतंत्र बनाना चाहते हुए, वह उन्हें अधर्मी बना देता है। परन्तु धार्मिक मन दोनों को चुनता है, दोनों को स्वीकार करता है, और भक्ति के विश्वास से दोनों को बनाए रखता है। परन्तु यह कैसे? सिसरो कहता है; क्योंकि भविष्य की बातों के ज्ञान को स्वीकार कर लेने पर, परिणामों की एक शृंखला अनुसरण करती है जो इस बात पर समाप्त होती है, कि हमारी अपनी स्वतंत्र इच्छाओं पर कुछ भी निर्भर नहीं हो सकता। और आगे, यदि कुछ भी हमारी इच्छाओं पर निर्भर है, तो हमें उन्हीं तर्क के चरणों से पीछे जाना होगा जब तक हम इस निष्कर्ष तक न पहुँचें कि भविष्य की बातों का कोई पूर्वज्ञान नहीं है। क्योंकि हम निम्नलिखित क्रम में सब चरणों से पीछे जाते हैं:—यदि स्वतंत्र इच्छा है, तो सब बातें भाग्य के अनुसार घटित नहीं होतीं; यदि सब बातें भाग्य के अनुसार घटित नहीं होतीं, तो कारणों का कोई निश्चित क्रम नहीं है; और यदि कारणों का कोई निश्चित क्रम नहीं है, तो परमेश्वर द्वारा पहले से जानी गई बातों का भी कोई निश्चित क्रम नहीं है—क्योंकि बातें बिना प्रभावी कारणों के पहले हुए घटित नहीं हो सकतीं—परन्तु यदि परमेश्वर द्वारा पहले से जाना गया कारणों का कोई स्थिर और निश्चित क्रम नहीं है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि सब बातें उसी प्रकार घटित होती हैं जैसा उसने पहले से जाना था कि वे घटित होंगी। और आगे, यदि यह सत्य नहीं है कि सब बातें ठीक वैसे ही घटित होती हैं जैसा उनके विषय में उसने पहले से जाना था, तो, वह कहता है, परमेश्वर में भविष्य की घटनाओं का कोई पूर्वज्ञान नहीं है।
अब, बुद्धि के इन अधर्मी और भक्तिहीन दुःसाहसों के विरुद्ध, हम दोनों बातों का प्रतिपादन करते हैं—कि परमेश्वर सब बातों को घटित होने से पहले जानता है, और कि हम अपनी स्वतंत्र इच्छा से वह सब कुछ करते हैं जिसे हम जानते और अनुभव करते हैं कि हम केवल इसलिए करते हैं क्योंकि हम इसे चाहते हैं। परन्तु हम यह नहीं कहते कि सब बातें भाग्य से घटित होती हैं; वरन् हम यह प्रतिपादित करते हैं कि कुछ भी भाग्य से घटित नहीं होता; क्योंकि हम यह सिद्ध करते हैं कि भाग्य नाम, जैसा उसका प्रयोग वे लोग करते हैं जो भाग्य की बात करते हैं—जिसका अभिप्राय वे प्रत्येक के गर्भधारण या जन्म के समय विद्यमान तारों की स्थिति से लेते हैं—एक निरर्थक शब्द है, क्योंकि ज्योतिष विद्या स्वयं एक भ्रम है। परन्तु कारणों के उस क्रम को, जिसमें सर्वोच्च प्रभावशीलता परमेश्वर की इच्छा को दी जाती है, हम न तो नकारते हैं और न उसे भाग्य के नाम से पुकारते हैं, सिवाय इसके कि हम शायद भाग्य को उस अर्थ में समझें जो "बोलना" है, इसे लातीनी शब्द fari, अर्थात् बोलना, से व्युत्पन्न मानते हुए; क्योंकि हम यह नकार नहीं सकते कि पवित्रशास्त्र में यह लिखा है, "परमेश्वर ने एक बार कहा है, मैं ने यह दो बातें सुनी हैं, कि सामर्थ्य परमेश्वर ही की है। हे परमेश्वर, दया भी तेरी ही है, क्योंकि तू हर एक मनुष्य को उसके कामों के अनुसार बदला देगा।"[192] अब "उसने एक बार कहा है" इस वाक्यांश को "अटल रूप से" के अर्थ में समझा जाना चाहिए, अर्थात् उसने अपरिवर्तनीय रूप से कहा है, क्योंकि वह उन सब बातों को जो होने वाली हैं, और उन सब बातों को जो वह करेगा, अपरिवर्तनीय रूप से जानता है। अतः हम भाग्य शब्द का प्रयोग उस अर्थ में कर सकते थे जो उसे fari, अर्थात् बोलना, से व्युत्पन्न होने पर मिलता है, यदि वह पहले से ही किसी अन्य अर्थ में समझा जाना आरम्भ न हो चुका होता, जिसमें मैं यह नहीं चाहता कि मनुष्यों के हृदय अनजाने में फिसल जाएँ। परन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि, यद्यपि परमेश्वर के लिए सब कारणों का एक निश्चित क्रम है, इसलिए हमारी अपनी इच्छाओं के स्वतंत्र प्रयोग पर कुछ भी निर्भर नहीं हो सकता, क्योंकि हमारी इच्छाएँ स्वयं उस कारणों के क्रम में सम्मिलित हैं जो परमेश्वर के लिए निश्चित है, और जो उसके पूर्वज्ञान में समाहित है, क्योंकि मानवीय इच्छाएँ भी मानवीय कार्यों के कारण हैं; और जिसने वस्तुओं के सब कारणों को पहले से जाना, वह निश्चय ही उन कारणों में हमारी इच्छाओं से अनभिज्ञ नहीं रहा होगा। क्योंकि वह स्वीकृति भी जो सिसरो स्वयं देता है, इस तर्क में उसका खण्डन करने के लिए पर्याप्त है। क्योंकि उसे यह कहने से क्या लाभ है कि बिना किसी कारण के कुछ भी घटित नहीं होता, परन्तु प्रत्येक कारण भाग्यगत नहीं है, क्योंकि एक आकस्मिक कारण है, एक प्राकृतिक कारण है, और एक इच्छाजनित कारण है? यह पर्याप्त है कि वह यह स्वीकार करता है कि जो कुछ भी घटित होता है, उसके पहले अवश्य कोई कारण होता है। क्योंकि हम कहते हैं कि जिन कारणों को आकस्मिक कहा जाता है, वे कारणों के अभाव के लिए केवल एक नाम नहीं हैं, वरन् केवल छिपे हुए हैं, और हम उन्हें या तो सच्चे परमेश्वर की इच्छा को, या किसी न किसी प्रकार की आत्माओं की इच्छा को, ठहराते हैं। और प्राकृतिक कारणों के विषय में, हम उन्हें उसकी इच्छा से किसी भी प्रकार पृथक नहीं करते जो सम्पूर्ण प्रकृति का रचयिता और निर्माता है। परन्तु अब इच्छाजनित कारणों के विषय में। ये या तो परमेश्वर से, या स्वर्गदूतों से, या मनुष्यों से, या किसी भी प्रकार के पशुओं से सम्बन्धित हो सकते हैं, यदि वास्तव में बुद्धिरहित पशुओं की उन सहज प्रवृत्तियों को, जिनके द्वारा वे अपनी प्रकृति के अनुसार विभिन्न वस्तुओं को चाहते या टालते हैं, इच्छाएँ कहा जा सके। और जब मैं स्वर्गदूतों की इच्छाओं की बात करता हूँ, तो मेरा अभिप्राय या तो भले स्वर्गदूतों की इच्छाओं से है, जिन्हें हम परमेश्वर के स्वर्गदूत कहते हैं, या दुष्ट स्वर्गदूतों की इच्छाओं से, जिन्हें हम शैतान के दूत, या दुष्टात्माएँ कहते हैं। और मनुष्यों की इच्छाओं से भी मेरा अभिप्राय या तो भलों की या दुष्टों की इच्छाओं से है। और इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि घटित होने वाली सब बातों के प्रभावी कारण इच्छाजनित कारणों के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं, अर्थात् ऐसे कारण जो उस प्रकृति से सम्बन्धित हैं जो जीवन की आत्मा है। क्योंकि वायु या पवन को भी आत्मा कहा जाता है, परन्तु चूँकि वह एक भौतिक वस्तु है, वह जीवन की आत्मा नहीं है। अतः जीवन की वह आत्मा, जो सब वस्तुओं को जीवन देती है, और प्रत्येक शरीर की, और प्रत्येक सृजित आत्मा की, सृष्टिकर्ता है, स्वयं परमेश्वर है, वह अनुत्पन्न आत्मा। उसकी सर्वोच्च इच्छा में वह सामर्थ्य निवास करती है जो सब सृजित आत्माओं की इच्छाओं पर कार्य करती है, भलों की सहायता करती है, दुष्टों का न्याय करती है, सबको नियंत्रित करती है, कुछ को सामर्थ्य देती है, कुछ को नहीं देती। क्योंकि जैसे वह सब प्रकृतियों का सृष्टिकर्ता है, वैसे ही वह सब सामर्थ्यों का दाता है, परन्तु सब इच्छाओं का नहीं; क्योंकि दुष्ट इच्छाएँ उससे नहीं हैं, क्योंकि वे उस प्रकृति के विरुद्ध हैं जो उसी से है। शरीरों के विषय में, वे इच्छाओं के अधिक अधीन हैं: कुछ हमारी इच्छाओं के अधीन हैं, जिनसे मेरा अभिप्राय सब जीवित नाशवान प्राणियों की इच्छाओं से है, परन्तु पशुओं की अपेक्षा मनुष्यों की इच्छाओं के अधिक अधीन हैं। परन्तु ये सब सबसे अधिक परमेश्वर की इच्छा के अधीन हैं, जिसकी सब इच्छाएँ भी अधीन हैं, क्योंकि उनके पास वही सामर्थ्य है जो उसने उन्हें प्रदान की है, उससे अधिक नहीं। अतः वस्तुओं का वह कारण, जो करता है परन्तु स्वयं बनाया नहीं गया, परमेश्वर है; परन्तु अन्य सब कारण करते भी हैं और बनाए भी जाते हैं। ऐसी हैं सब सृजित आत्माएँ, और विशेष रूप से बुद्धिमान आत्माएँ। अतः भौतिक कारण, जिनके विषय में यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि वे बनाए जाते हैं न कि करते हैं, प्रभावी कारणों में नहीं गिने जाने चाहिए, क्योंकि वे केवल वही कर सकते हैं जो आत्माओं की इच्छाएँ उनके द्वारा करती हैं। तो फिर, कारणों का वह क्रम जो परमेश्वर के पूर्वज्ञान के लिए निश्चित है, यह कैसे अनिवार्य बनाता है कि हमारी इच्छाओं पर कुछ भी निर्भर न हो, जबकि हमारी इच्छाओं का स्वयं कारणों के इस क्रम में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है? अतः सिसरो उनके साथ विवाद करता है जो कारणों के इस क्रम को भाग्यगत कहते हैं, या यों कहें कि इस क्रम को ही भाग्य के नाम से पुकारते हैं; जिससे हमें घृणा है, विशेषकर उस शब्द के कारण, जिसे मनुष्य उस अर्थ में समझने के अभ्यस्त हो गए हैं जो सत्य नहीं है। परन्तु जहाँ वह यह नकारता है कि सब कारणों का क्रम परमेश्वर के पूर्वज्ञान के लिए अत्यन्त निश्चित और पूर्णतः स्पष्ट है, हम उसके मत से स्टोइकों से भी अधिक घृणा करते हैं। क्योंकि या तो वह यह नकारता है कि परमेश्वर है ही—जो वास्तव में उसने अपनी पुस्तक De Natura Deorum में एक काल्पनिक पात्र के मुँह से करने का प्रयत्न किया है—या यदि वह यह स्वीकार करता है कि वह है, परन्तु यह नकारता है कि वह भविष्य की बातों का पूर्वज्ञानी है, तो यह और क्या है, सिवाय इसके कि "मूर्ख ने अपने मन में कहा, कोई परमेश्वर नहीं है"? क्योंकि जो सब भविष्य की बातों का पूर्वज्ञानी नहीं है, वह परमेश्वर नहीं है। इसलिए हमारी इच्छाओं में भी उतनी ही सामर्थ्य है जितनी परमेश्वर ने चाही और पहले से जानी कि उनमें होनी चाहिए; और इसलिए जो भी सामर्थ्य उनमें है, वे उसे अत्यन्त निश्चित सीमाओं के भीतर रखती हैं; और जो कुछ उन्हें करना है, वे उसे अत्यन्त निश्चय के साथ करेंगी, क्योंकि उसने, जिसका पूर्वज्ञान अचूक है, पहले से जान लिया था कि उनमें इसे करने की सामर्थ्य होगी, और वे इसे करेंगी। इसलिए, यदि मुझे भाग्य नाम को किसी भी वस्तु पर लागू करना ही चुनना पड़े, तो मैं यह कहना अधिक उचित समझूँगा कि दो पक्षों में से दुर्बल पक्ष का भाग्य होता है, और सबल पक्ष की, जिसके वश में दूसरा है, इच्छा होती है—इसकी अपेक्षा कि हमारी इच्छा की स्वतंत्रता उस कारणों के क्रम से बहिष्कृत हो, जिसे स्टोइक लोग, शब्द के अपने विशिष्ट और असाधारण प्रयोग से, भाग्य कहते हैं।
10. क्या हमारी इच्छाएं अनिवार्यता के अधीन हैं
इसलिए, उस अनिवार्यता से भी नहीं डरना चाहिए, जिसके भय से स्तोइक दार्शनिकों ने वस्तुओं के कारणों में ऐसे भेद करने का प्रयत्न किया, जिससे वे कुछ बातों को अनिवार्यता के अधिकार से बचा सकें, और अन्य बातों को उसके अधीन कर सकें। जिन बातों को वे अनिवार्यता के अधीन नहीं रखना चाहते थे, उनमें उन्होंने हमारी इच्छाओं को रखा, क्योंकि वे जानते थे कि यदि इच्छाएं अनिवार्यता के अधीन हों तो वे स्वतंत्र नहीं रह सकतीं। क्योंकि यदि उसे हमारी अनिवार्यता कहा जाए जो हमारे अधिकार में नहीं है, परन्तु हमारी अनिच्छा होने पर भी वही करता है जो वह कर सकता है,—जैसे मृत्यु की अनिवार्यता,—तो यह स्पष्ट है कि हमारी इच्छाएं, जिनके द्वारा हम धार्मिकता से या दुष्टता से जीवन बिताते हैं, ऐसी अनिवार्यता के अधीन नहीं हैं; क्योंकि हम बहुत सी बातें करते हैं, जिन्हें यदि हम न चाहते तो निश्चय ही न करते। यह सबसे पहले इच्छा करने के कार्य में ही सत्य है,—क्योंकि यदि हम चाहें, तो वह है; यदि हम न चाहें, तो वह है नहीं,—क्योंकि यदि हम अनिच्छुक होते तो हम चाहते ही नहीं। परन्तु यदि हम अनिवार्यता की यह परिभाषा करें कि जिसके अनुसार हम कहते हैं कि किसी वस्तु का इस या उस स्वभाव का होना, या इस या उस रीति से किया जाना आवश्यक है, तो मुझे नहीं मालूम कि हमें उस अनिवार्यता से क्यों डरना चाहिए, जो हमारी इच्छा की स्वतंत्रता को छीन लेती हो। क्योंकि हम परमेश्वर के जीवन या परमेश्वर के पूर्वज्ञान को अनिवार्यता के अधीन नहीं करते, यदि हम कहें कि परमेश्वर का सदा जीवित रहना और सब बातों को पहले से जान लेना आवश्यक है; जैसे उसकी शक्ति भी कम नहीं होती जब हम कहते हैं कि वह न मर सकता है, न भूल कर सकता है,—क्योंकि यह उसके लिए इस प्रकार असम्भव है, कि यदि यह उसके लिए सम्भव होता, तो वह कम शक्तिशाली होता। परन्तु निश्चय ही वह सर्वशक्तिमान कहलाने के योग्य है, यद्यपि वह न मर सकता है, न भूल कर सकता है। क्योंकि वह इस कारण सर्वशक्तिमान कहलाता है कि वह जो चाहता है वही करता है, न कि इस कारण कि वह वह सहता है जो वह नहीं चाहता; क्योंकि यदि ऐसा उस पर आ पड़े, तो वह किसी रीति से सर्वशक्तिमान न रहेगा। इसलिए, वह कुछ बातें इसी कारण नहीं कर सकता कि वह सर्वशक्तिमान है। इसी प्रकार, जब हम कहते हैं कि यह आवश्यक है कि जब हम चाहते हैं, तो हम स्वतंत्र चुनाव से चाहते हैं, तब हम यह कहकर एक ओर तो निश्चय सत्य बात कहते हैं, और दूसरी ओर अपनी इच्छाओं को उस अनिवार्यता के अधीन नहीं करते जो स्वतंत्रता को नष्ट कर दे। इसलिए हमारी इच्छाएं इच्छाओं के रूप में विद्यमान रहती हैं, और वे स्वयं वह सब करती हैं जो हम इच्छा करके करते हैं, और जो न किया जाता यदि हम अनिच्छुक होते। परन्तु जब कोई व्यक्ति अनिच्छुक होते हुए भी दूसरे की इच्छा से कुछ सहता है, तब भी इच्छा अपनी मूल वैधता बनाए रखती है,—हमारा अर्थ उस व्यक्ति की इच्छा से नहीं है जो कष्ट देता है, क्योंकि उसे तो हम परमेश्वर की शक्ति में ही समाहित समझते हैं। क्योंकि यदि कोई इच्छा केवल विद्यमान हो, परन्तु जो चाहती है उसे करने में असमर्थ हो, तो वह किसी अधिक शक्तिशाली इच्छा से दबा दी जाएगी। और यह भी तब ही होता जब वहां इच्छा विद्यमान होती, और वह दूसरे पक्ष की नहीं, वरन उस व्यक्ति की इच्छा होती जिसने चाहा तो, परन्तु जो चाहा उसे पूरा करने में असमर्थ रहा। इसलिए, मनुष्य जो कुछ अपनी इच्छा के विरुद्ध सहता है, उसे मनुष्यों की, या स्वर्गदूतों की, या किसी सृजित आत्मा की इच्छा पर नहीं, वरन उसकी इच्छा पर आरोपित करना चाहिए जो इच्छाओं को शक्ति देता है। इसलिए यह बात नहीं है कि परमेश्वर ने पहले से जान लिया कि हमारी इच्छाओं के अधिकार में क्या होगा, इस कारण हमारी इच्छाओं के अधिकार में कुछ भी नहीं है। क्योंकि जिसने इसे पहले से जान लिया, उसने कुछ न कुछ ही जान लिया, न कि कुछ भी नहीं। और यदि जिसने पहले से जान लिया कि हमारी इच्छाओं के अधिकार में क्या होगा, उसने कुछ न कुछ जान लिया, कुछ भी नहीं नहीं, तो निश्चय ही, यद्यपि उसने पहले से जान लिया, फिर भी हमारी इच्छाओं के अधिकार में कुछ है। इसलिए हम किसी भी रीति से इसके लिए बाध्य नहीं हैं कि परमेश्वर के पूर्वज्ञान को बनाए रखते हुए इच्छा की स्वतंत्रता को छीन लें, या इच्छा की स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए यह अस्वीकार करें कि वह आनेवाली बातों को पहले से जानता है, जो कि भक्तिहीनता होगी। परन्तु हम दोनों को स्वीकार करते हैं। हम विश्वासयोग्यता और सच्चाई से दोनों को मान लेते हैं। पहली बात इसलिए, कि हम भली रीति से विश्वास करें; और दूसरी इसलिए, कि हम भली रीति से जीवन बिताएं। क्योंकि जो परमेश्वर के विषय में भली रीति से विश्वास नहीं करता, वह बुरी रीति से जीवन बिताता है। इसलिए, यह हमसे दूर रहे कि अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए हम उसके पूर्वज्ञान को अस्वीकार करें, जिसकी सहायता से हम स्वतंत्र हैं या स्वतंत्र होंगे। इसलिए यह व्यर्थ नहीं है कि नियम बनाए जाते हैं, और उलाहने, उपदेश, प्रशंसा और निन्दा का सहारा लिया जाता है; क्योंकि इन्हें भी उसने पहले से जान लिया था, और ये उतने ही लाभदायक हैं जितना उसने पहले से जान लिया था कि वे होंगे। प्रार्थनाएं भी उन बातों को प्राप्त करने में सहायक हैं जिन्हें उसने पहले से जान लिया था कि वह उन्हें देनेवालों को देगा; और भले कामों के लिए पुरस्कार और पापों के लिए दण्ड न्यायपूर्वक ठहराए गए हैं। क्योंकि मनुष्य इस कारण पाप नहीं करता कि परमेश्वर ने पहले से जान लिया था कि वह पाप करेगा। वरन इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि जब वह पाप करता है तो वह स्वयं ही पाप करता है, क्योंकि जिसका पूर्वज्ञान भ्रान्तिरहित है, उसने यह पहले से नहीं जाना कि भाग्य, या सौभाग्य, या कोई और वस्तु पाप करेगी, वरन यह कि वह मनुष्य स्वयं पाप करेगा, जो यदि न चाहे तो पाप नहीं करता। परन्तु यदि वह पाप करने की इच्छा न करे, तो यह भी परमेश्वर ने पहले से जान लिया था।
11. परमेश्वर के सार्वभौमिक विधान के विषय में, जिसके नियमों में सब वस्तुएं समाहित हैं
इसलिए, वह परमेश्वर जो सर्वोच्च और सत्य है, अपने वचन और पवित्र आत्मा के साथ (जो तीन होकर भी एक हैं), एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर, हर प्राण और हर शरीर का सृजनहार और रचनेवाला है; जिसके अनुग्रह से वे सब सुखी हैं जो सत्य के द्वारा सुखी हैं, व्यर्थता के द्वारा नहीं; जिसने मनुष्य को प्राण और शरीर से युक्त एक बुद्धिमान प्राणी बनाया, और जब उसने पाप किया, तो न उसे दण्ड से मुक्त छोड़ा, न उसे दया से रहित छोड़ा; जिसने भलों और बुरों दोनों को, पत्थरों के समान अस्तित्व, वृक्षों के समान वानस्पतिक जीवन, पशुओं के समान इन्द्रिय-जीवन, और केवल स्वर्गदूतों के समान बुद्धिजीवन दिया है; जिससे हर एक ढंग, हर एक जाति, हर एक क्रम है; जिससे माप, संख्या और तौल है; जिससे प्रकृति में विद्यमान हर वस्तु है, वह जिस भी प्रकार की हो और जिस भी मूल्य की हो; जिससे बीजों के रूप और रूपों के बीज हैं, और बीजों तथा रूपों की गति है; जिसने देह को उसका उद्गम, सौन्दर्य, स्वास्थ्य, प्रजनन-क्षमता, अंगों की व्यवस्था, और उसके अंगों के बीच कल्याणकारी सामंजस्य भी दिया; जिसने अबुद्धिमान प्राण को स्मृति, इन्द्रियबोध और लालसा दी है, परन्तु बुद्धिमान प्राण को इनके अतिरिक्त बुद्धि और इच्छा भी दी है; जिसने स्वर्ग और पृथ्वी, स्वर्गदूतों और मनुष्यों की तो बात ही क्या, परन्तु सबसे छोटे और सबसे तुच्छ पशु की अंतड़ियों को भी, या पक्षी के पंख को, या पौधे के छोटे फूल को, या वृक्ष के पत्ते को भी, उनके सब अंगों के बीच सामंजस्य और, जैसे कि, एक परस्पर शांति के बिना नहीं छोड़ा;—वह परमेश्वर कभी यह विश्वास करने योग्य नहीं हो सकता कि उसने मनुष्यों के राज्यों, उनके आधिपत्यों और दासताओं को, अपने विधान के नियमों से बाहर छोड़ दिया हो।
12. किन सद्गुणों के कारण प्राचीन रोमी इस योग्य बने कि सच्चा परमेश्वर, यद्यपि उन्होंने उसकी आराधना नहीं की, उनके साम्राज्य को बढ़ाए
इसलिए आगे विचार करें कि रोमियों के वे कौन से सद्गुण थे, जिनकी सहायता करने के लिए सच्चा परमेश्वर, जिसके अधिकार में पृथ्वी के राज्य भी हैं, कृपापूर्वक झुका, जिससे साम्राज्य को बढ़ाया जाए, और यह भी कि उसने ऐसा किस कारण से किया। और इस प्रश्न पर स्पष्टता से विचार करने के लिए, हमने पहले की पुस्तकें इसलिए लिखी हैं, कि यह दिखाया जाए कि उन देवताओं की शक्ति, जिनकी—उनकी धारणा के अनुसार—इतने तुच्छ और मूर्खतापूर्ण संस्कारों से आराधना की जानी थी, इस मामले में कुछ भी काम नहीं करती थी; और वर्तमान ग्रंथ में जो हमने अब तक किया है, वह भाग्य के सिद्धांत का खण्डन करने के लिए है, ऐसा न हो कि जो कोई पहले ही यह विश्वास कर चुका हो कि रोमी साम्राज्य को उन देवताओं की आराधना से नहीं बढ़ाया और बचाया गया, वह फिर भी उसके विस्तार और सुरक्षा को किसी प्रकार के भाग्य के कारण मान बैठे, न कि परमोच्च परमेश्वर की सर्वशक्तिशाली इच्छा के कारण। प्राचीन और आदिकालीन रोमी, यद्यपि उनका इतिहास हमें दिखाता है कि वे, इब्रानियों को छोड़कर अन्य सब जातियों के समान, झूठे देवताओं की आराधना करते थे, और बलिदान परमेश्वर को नहीं, वरन दुष्टात्माओं को चढ़ाते थे, फिर भी उनके इतिहासकार ने उन्हें यह प्रशंसा दी है, कि वे "प्रशंसा के लोभी, धन के उड़ानेवाले, बड़ी महिमा के इच्छुक, और सामान्य सम्पत्ति से सन्तुष्ट थे।"[193] महिमा से वे अत्यन्त उत्कटता से प्रेम करते थे: उसके लिए वे जीना चाहते थे, उसके लिए वे मरने में भी संकोच नहीं करते थे। हर दूसरी इच्छा को उस एक ही बात के लिए उनके उत्साह के बल से दबा दिया जाता था। अंततः उनके अपने देश को भी, क्योंकि सेवा करना अपमानजनक और शासन तथा आदेश देना महिमापूर्ण प्रतीत होता था, उन्होंने पहले तो सच्चे मन से स्वतंत्र होने की इच्छा की, और फिर शासक बनने की। इसी कारण, राजाओं के आधिपत्य को सहन न करते हुए, उन्होंने शासन को दो प्रधानों के हाथों में दे दिया, जो एक वर्ष के लिए पद पर रहते थे, और जिन्हें राजा या स्वामी नहीं, वरन कौंसल कहा जाता था।[194] परन्तु राजसी वैभव किसी शासक के प्रशासन (regentis) के, या लोकहित के लिए सलाह देनेवाले की भलमनसाहत (consulentis) के अनुरूप प्रतीत नहीं होता था, वरन एक स्वामी (dominantis) के अभिमान के अनुरूप अधिक प्रतीत होता था। इसलिए, राजा टार्क्विन के निर्वासित हो जाने पर, और कौंसली शासन की स्थापना हो जाने पर, यह हुआ, जैसा कि उपर्युक्त लेखक स्वयं रोमियों की प्रशंसा में कहता है, कि "स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद राज्य आश्चर्यजनक गति से बढ़ने लगा, इतनी बड़ी महिमा की इच्छा ने उस पर अधिकार कर लिया था।" प्रशंसा की वह उत्कटता और महिमा की वह इच्छा ही थी, जिसने वे अनेक आश्चर्यजनक कार्य सिद्ध किए, जो निःसन्देह मानवीय दृष्टि में प्रशंसनीय और महिमापूर्ण थे। उसी सल्लुस्त ने अपने ही समय के महापुरुषों, मार्कस काटो और कैयस सीज़र की प्रशंसा की, यह कहते हुए कि बहुत समय तक गणराज्य में सद्गुण में महान कोई नहीं था, परन्तु उसके अपने स्मरण में ये दो व्यक्ति उत्कृष्ट सद्गुण के, और बहुत भिन्न रुचियों के थे। अब, सीज़र के विषय में जो प्रशंसा वह करता है, उसमें उसने यह भी रखा, कि वह एक बड़े साम्राज्य, एक सेना, और एक नए युद्ध की इच्छा रखता था, जिससे उसे एक ऐसा क्षेत्र मिले जहां उसकी प्रतिभा और सद्गुण चमक सकें। इस प्रकार वीर स्वभाव के लोगों की सदा यह प्रार्थना रहती थी कि बेल्लोना दुःखी जातियों को युद्ध के लिए उकसाए, और अपने रक्तरंजित कोड़े से उन्हें उत्तेजित करे, जिससे उन्हें अपनी वीरता प्रदर्शित करने का अवसर मिले। यही, वास्तव में, वह था जो प्रशंसा की इच्छा और महिमा की प्यास ने किया। इसलिए, पहले तो स्वतंत्रता के प्रेम से, और बाद में आधिपत्य के प्रेम से, और प्रशंसा तथा महिमा की इच्छा के द्वारा, उन्होंने अनेक बड़े कार्य सिद्ध किए; और उनके सबसे श्रेष्ठ कवि इस बात की गवाही देते हैं कि वे इन सब उद्देश्यों से प्रेरित थे:
"वहाँ पोर्सेना, अभिमान से फूला हुआ, रोम को तारक्विन के लिए द्वार खोलने की आज्ञा देता है; अस्त्रों सहित वह नगर को घेर लेता है, ऐनियस के पुत्र दृढ़ता से डटे रहते हैं विजय के लिए।"[195]उस समय उनकी सबसे बड़ी अभिलाषा यही थी कि वे वीरतापूर्वक मरें या स्वतंत्र होकर जीवित रहें; परन्तु जब स्वतंत्रता प्राप्त हो गई, तो महिमा की इतनी बड़ी इच्छा ने उन पर अधिकार कर लिया, कि केवल स्वतंत्रता ही पर्याप्त न रही जब तक कि आधिपत्य की भी खोज न की जाए, उनकी वह बड़ी अभिलाषा वही थी जिसे उस कवि ने जुपिटर के मुख में रखा है:
"नहीं, स्वयं यूनो भी, जिसके उग्र कोप ने समुद्र, पृथ्वी, और आकाश को अस्त्र-शस्त्र से भर दिया, अपनी उदास त्योरी बदलकर मुस्कान में ले आएगी, और रोम के पुत्रों, उस चोगाधारी जाति को महिमा दिलाने में मेरे साथ होड़ करेगी। ऐसा ही मेरा निश्चय है। एक दिन आएगा, जब रोम के महान युग अपनी गति बनाए रखेंगे, तब असाराकुस के वंशज मिर्मिडनों पर विजय पाएँगे, फ्थिया और मिसीने पर राज्य करेंगे, और आर्गोस को अपने अधीन झुका देंगे।"[196]इन बातों को, वास्तव में, वर्जिल जुपिटर के मुख से भविष्यवाणी के रूप में कहलवाता है, जबकि वास्तविकता में, वह स्वयं अपने ही मन में उन बातों का पुनरावलोकन कर रहा था जो पहले ही हो चुकी थीं, और जिन्हें उसने वर्तमान वास्तविकताओं के रूप में देखा था। परन्तु मैंने इनका उल्लेख इसी उद्देश्य से किया है कि यह दिखाया जाए कि स्वतंत्रता के बाद, रोमी आधिपत्य को इतना अधिक महत्व देते थे, कि उसे उन वस्तुओं में स्थान मिला जिन्हें उन्होंने सबसे अधिक प्रशंसा दी। इसी कारण वह कवि, अन्य जातियों की कलाओं की अपेक्षा उन कलाओं को अधिक श्रेष्ठ मानते हुए जो विशेष रूप से रोमियों की अपनी हैं, अर्थात् शासन करने और आदेश देने की, तथा जातियों को अधीन करने और जीतने की कलाएं, कहता है,
"औरों को, सम्भवतः, अधिक सुन्दर कौशल के साथ, कांसे या पत्थर से मुखाकृतियाँ उकेरनी होंगी, संदिग्ध मुकदमे लड़ने होंगे, आकाश का मानचित्र बनाना होगा, और बताना होगा कि ग्रह कब उदय और अस्त होते हैं; परन्तु हे रोमी, तू जातियों पर दूर-दूर तक शासन कर; यही तेरा गुण हो, कि पराजित शत्रुओं पर शान्ति का शासन थोपे, दीन आत्मा पर दया करे, और अहंकारियों को कुचल दे।"[197]इन कलाओं का उन्होंने इतनी अधिक निपुणता से अभ्यास किया, जितना कम वे सुखों में, और धन के लोभ तथा संग्रह में शरीर और मन की दुर्बलता में लिप्त हुए, और इनके द्वारा नैतिकता को बिगाड़ते हुए, दुखी नागरिकों से धन छीनकर उसे नीच रंगमंच के अभिनेताओं पर उड़ाते हुए। इसी कारण ये नीच स्वभाव के लोग, जो सल्लुस्त के लिखने और वर्जिल के गाने के समय बहुत हो गए थे, इन कलाओं से सम्मान और महिमा की खोज नहीं करते थे, वरन विश्वासघात और छल से। इसी कारण वह कहता है, "परन्तु आरम्भ में मनुष्यों के मनों को लोभ की अपेक्षा महत्वाकांक्षा ने अधिक उद्वेलित किया, जो दुर्गुण होते हुए भी सद्गुण के अधिक निकट है। क्योंकि महिमा, सम्मान और सत्ता को भला मनुष्य और नीच मनुष्य दोनों समान रूप से चाहते हैं; परन्तु पहला," वह कहता है, "उनकी ओर सच्चे मार्ग से आगे बढ़ता है, जबकि दूसरा, भली कलाओं को कुछ भी न जानते हुए, उन्हें छल और धोखे से पाने का प्रयत्न करता है।"[198] और भली कलाओं से महिमा, सम्मान और सत्ता प्राप्त करने की खोज का अर्थ यह है कि उन्हें सद्गुण से खोजा जाए, न कि धोखेभरी चालबाज़ी से; क्योंकि भला और नीच मनुष्य दोनों ही इन वस्तुओं की इच्छा करते हैं, परन्तु भला मनुष्य सच्चे मार्ग से उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। वह मार्ग सद्गुण है, जिस पर चलते हुए वह अपने अधिकार के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है—अर्थात् महिमा, सम्मान और सत्ता की ओर। अब यह कि यह भावना रोमी मन में गहराई से बैठी हुई थी, इसका संकेत उनके देवताओं के मन्दिरों से भी मिलता है; क्योंकि उन्होंने सद्गुण और सम्मान के मन्दिर एक दूसरे के अत्यन्त निकट बनाए, और इस प्रकार परमेश्वर के ही वरदानों की देवताओं के रूप में आराधना की। इससे हम समझ सकते हैं कि जो भले थे उन्होंने सद्गुण का अन्तिम उद्देश्य क्या माना, और अन्ततः उसे किस बात से जोड़ा, अर्थात् सम्मान से; क्योंकि बुरों के पास तो कोई सद्गुण नहीं था, यद्यपि वे सम्मान की इच्छा रखते थे, और छल तथा धोखे से उसे पाने का प्रयत्न करते थे। काटो को एक उच्चतर प्रकार की प्रशंसा दी गई है, क्योंकि वह उसके विषय में कहता है, "जितना कम उसने महिमा की खोज की, उतनी ही अधिक वह उसके पीछे आई।"[199] हम इसे एक उच्चतर प्रकार की प्रशंसा कहते हैं; क्योंकि वह महिमा जिसकी इच्छा से रोमी जलते थे, वह मनुष्यों का मनुष्यों के विषय में भला सोचने का निर्णय है। और इसलिए सद्गुण उससे उत्तम है, जो केवल अपने ही विवेक के निर्णय से सन्तुष्ट रहता है, किसी मानवीय निर्णय से नहीं। जहां से प्रेरित कहता है, "क्योंकि हमारी महिमा यह है, हमारे विवेक की गवाही।"[200] और एक और स्थान पर वह कहता है, "परन्तु हर एक अपने ही काम को परखे, और तब वह अपने ही में महिमा पाएगा, न कि दूसरे में।"[201] इसलिए वह महिमा, सम्मान और सत्ता, जिसकी वे स्वयं के लिए इच्छा रखते थे, और जिसे भले लोग भली कलाओं से प्राप्त करने का प्रयत्न करते थे, सद्गुण से खोजी नहीं जानी चाहिए थी, वरन सद्गुण को उनसे खोजा जाना चाहिए था। क्योंकि सच्चा सद्गुण वही है जो उस लक्ष्य की ओर निर्देशित हो जिसमें मनुष्य का सर्वोच्च और अन्तिम कल्याण है। इसलिए काटो ने भी जिन सम्मानों की खोज की, उन्हें उसे खोजना नहीं चाहिए था, वरन राज्य को उन्हें उसके सद्गुणों के कारण स्वयं ही, बिना खोजे, उसे दे देना चाहिए था।
परन्तु उस समय के दो महान रोमियों में से, काटो वह था जिसका सद्गुण सद्गुण के सच्चे स्वरूप के सबसे अधिक निकट था। इसलिए, आइए हम काटो के अपने ही विचार का सन्दर्भ लें, यह जानने के लिए कि उस समय और पहले के समयों में राज्य की स्थिति के विषय में उसने क्या निर्णय बनाया था। "मैं नहीं मानता," वह कहता है, "कि हमारे पूर्वजों ने हथियारों के द्वारा गणराज्य को छोटे से बड़ा बनाया। यदि ऐसा होता, तो हमारे समय का गणराज्य उनके समय की अपेक्षा कहीं अधिक समृद्ध होता, क्योंकि हमारे मित्रों और नागरिकों की संख्या कहीं अधिक है; और इसके अतिरिक्त, हमारे पास उनकी अपेक्षा कहीं अधिक शस्त्र और घोड़े हैं। परन्तु इनसे भिन्न अन्य बातें थीं जिन्होंने उन्हें महान बनाया, और हमारे पास उनमें से कोई भी नहीं है: घर में उद्यम, बाहर न्यायपूर्ण शासन, विचार-विमर्श में स्वतंत्र मन, जो न अपराध का न लालसा का अभ्यस्त हो। इनके स्थान पर, हमारे पास विलासिता और लोभ है, राज्य में दरिद्रता, नागरिकों में सम्पन्नता है; हम धन की प्रशंसा करते हैं, हम आलस्य का अनुसरण करते हैं; भले और बुरे में कोई भेद नहीं किया जाता; सद्गुण के सब पुरस्कार चालबाज़ी से प्राप्त कर लिए जाते हैं। और यह कोई आश्चर्य नहीं, जब हर व्यक्ति केवल अपने ही भले के लिए सोचता है, जब तुम घर में सुख के, और सार्वजनिक मामलों में धन और पक्षपात के दास हो, यह कोई आश्चर्य नहीं कि असुरक्षित गणराज्य पर आक्रमण हो जाए।"[202]
जो कोई काटो या सल्लुस्त के इन वचनों को सुनता है, वह सम्भवतः यह सोचता है कि प्राचीन रोमियों को दी गई ऐसी प्रशंसा उन सभी पर, या कम से कम उनमें से बहुतों पर, लागू होती थी। परन्तु ऐसा नहीं है; अन्यथा वे बातें जो काटो स्वयं लिखता है, और जिन्हें मैंने इस ग्रंथ की दूसरी पुस्तक में उद्धृत किया है, सत्य न होतीं। उस स्थान पर वह कहता है, कि राज्य के आरम्भ से ही अधिक शक्तिशालियों द्वारा अन्याय किए जाते थे, जिससे जनता पितरों (सीनेटरों) से अलग हो गई, और इसके अतिरिक्त अन्य आंतरिक विवाद भी थे; और वह एकमात्र समय जिस पर न्यायपूर्ण और संयमित शासन विद्यमान था, वह राजाओं के निर्वासन के बाद का था, और वह भी केवल उतने समय तक जितने समय तक उन्हें टार्क्विन से डरने का कारण था, और वे उसके कारण एट्रुरिया के विरुद्ध जो कठिन युद्ध छेड़ा गया था, उसे चला रहे थे; परन्तु इसके बाद पितरों ने जनता को दासों के समान दबाया, उन्हें राजाओं के समान कोड़े मारे, उन्हें उनकी भूमि से निकाल दिया, और अन्य सबको छोड़कर, शासन को केवल अपने ही हाथों में रखा। और इन विवादों को, जबकि पितर शासन करना चाहते थे और जनता सेवा करने को अनिच्छुक थी, दूसरे पूनी युद्ध ने समाप्त कर दिया; क्योंकि पुनः बड़ा भय उनके व्याकुल मनों पर दबाव डालने लगा, और उन्हें एक अन्य और बड़ी चिन्ता के द्वारा उन विवादों से रोककर, उन्हें फिर से नागरिक एकता की ओर वापस ले आया। परन्तु जो बड़े कार्य तब सिद्ध हुए, वे कुछ थोड़े लोगों के प्रशासन के द्वारा सिद्ध हुए, जो अपनी रीति में भले थे। और इन थोड़े भले लोगों की बुद्धि और पूर्वदृष्टि से, जिसने पहले गणराज्य को इन बुराइयों को सहने में समर्थ बनाया और उन्हें कम किया, वह अधिकाधिक बड़ा होता गया। और यही इतिहासकार पुष्टि करता है, जब वह कहता है कि, शान्ति और युद्ध में, भूमि और समुद्र पर, रोमी जनता की अनेक प्रसिद्ध उपलब्धियों को पढ़कर और सुनकर, वह यह समझना चाहता था कि इन बड़े कार्यों को विशेष रूप से किस बात ने बनाए रखा। क्योंकि वह जानता था कि रोमी अक्सर एक छोटी सेना के साथ शत्रु की बड़ी सेनाओं से लड़े थे; और वह यह भी जानता था कि थोड़े साधनों के साथ उन्होंने सम्पन्न राजाओं से युद्ध किए थे। और वह कहता है कि, इस बात पर बहुत विचार करने के बाद, उसे यह स्पष्ट प्रतीत हुआ कि थोड़े नागरिकों के उत्कृष्ट सद्गुण ने ही सब कुछ सिद्ध किया, और इससे यह स्पष्ट होता है कि दरिद्रता ने सम्पन्नता को, और छोटी संख्या ने बड़ी भीड़ को कैसे परास्त किया। परन्तु, वह जोड़ता है, इसके बाद जब राज्य विलासिता और आलस्य से भ्रष्ट हो गया, तो गणराज्य फिर से, अपनी ही महानता के कारण, अपने अधिकारियों और सेनापतियों के दुर्गुणों को सहने में समर्थ रहा। इसलिए काटो की प्रशंसाएं भी केवल थोड़े लोगों पर ही लागू होती हैं; क्योंकि केवल थोड़े ही लोगों के पास वह सद्गुण था जो मनुष्यों को सच्चे मार्ग से महिमा, सम्मान और सत्ता की खोज की ओर ले जाता है—अर्थात् सद्गुण के द्वारा ही। यह घर में उद्यम, जिसकी काटो बात करता है, इस इच्छा का परिणाम था कि सार्वजनिक कोष को समृद्ध किया जाए, यद्यपि परिणाम घर में दरिद्रता ही हो; और इसलिए, जब वह नैतिकता के बिगड़ने से उत्पन्न होनेवाली बुराई की बात करता है, तो वह अभिव्यक्ति को उलट देता है, और कहता है, "राज्य में दरिद्रता, घर में सम्पन्नता।"
13. प्रशंसा के प्रेम के विषय में, जो यद्यपि एक दुर्गुण है, तौभी सद्गुण माना जाता है, क्योंकि उससे बड़े दुर्गुण को रोका जाता है
इसलिए, जब पूर्व के राज्य दीर्घ काल तक प्रसिद्ध रहे, तो परमेश्वर को यह भाया कि एक पश्चिमी साम्राज्य भी उठे, जो समय में बाद का होते हुए भी विस्तार और महानता में अधिक प्रसिद्ध हो। और इस उद्देश्य से कि वह अन्य जातियों में विद्यमान गम्भीर बुराइयों पर विजय पा सके, उसने जानबूझकर इसे ऐसे मनुष्यों को दिया, जो सम्मान, प्रशंसा और महिमा के लिए अपने देश के भले के लिए विचार करते थे, जिनकी महिमा में वे अपनी ही महिमा खोजते थे, और जिनकी सुरक्षा को प्राथमिकता देने में उन्होंने अपनी सुरक्षा से भी संकोच नहीं किया, धन की इच्छा और अन्य अनेक दुर्गुणों को इस एक दुर्गुण के लिए दबाते हुए, अर्थात् प्रशंसा के प्रेम के लिए। क्योंकि उसमें सबसे शुद्ध बोध है जो यह पहचान लेता है कि प्रशंसा का प्रेम भी एक दुर्गुण है; और यह बात कवि होरेस के बोध से भी नहीं छिपी, जो कहता है,
"क्या तू महत्वाकांक्षा से फूला हुआ है? सलाह ले: वह पुस्तक तुझे चैन देगी यदि तू उसे तीन बार पढ़े।"[203]और उसी कवि ने, एक गीतात्मक रचना में, आधिपत्य की लालसा को दबाने की इच्छा से इस प्रकार कहा है:
"महत्वाकांक्षी मन पर शासन कर, और तेरे पास उससे बड़ा राज्य होगा जितना कि यदि तू दूर के गादेस को लीबिया से जोड़ दे, और इस प्रकार दोनों कार्थेजवासियों को अपने अधीन कर ले।"[204]तौभी, जो लोग नीच वासनाओं को, पवित्र आत्मा की उस शक्ति से नहीं जो भक्ति के विश्वास से प्राप्त होती है, या बोधगम्य सौन्दर्य के प्रेम से नहीं, वरन मनुष्यों की प्रशंसा की इच्छा से रोकते हैं, या कम से कम ऐसी प्रशंसा के प्रेम से उन्हें अच्छी तरह रोकते हैं, वे वास्तव में अभी पवित्र नहीं हैं, वरन केवल कम नीच हैं। तुल्ली भी इस तथ्य को छिपाने में सफल न हो सका; क्योंकि, उन्हीं पुस्तकों में जो उसने लिखीं, दे रिपब्लिका, जब वह राज्य के प्रधान की शिक्षा के विषय में बात करता है, जिसे, वह कहता है, महिमा पर पालना चाहिए, तो वह आगे कहता है कि उनके पूर्वजों ने महिमा की इच्छा से अनेक आश्चर्यजनक और प्रसिद्ध कार्य किए। इसलिए, इस दुर्गुण का विरोध करने के बजाय, उन्होंने तो यह भी सोचा कि इसे उत्तेजित और प्रज्वलित किया जाना चाहिए, यह मानते हुए कि यह गणराज्य के लिए लाभदायक होगा। परन्तु तुल्ली अपने दर्शनशास्त्र की पुस्तकों में भी इस विषैले विचार को नहीं छिपाता, क्योंकि वहां वह इसे दिन से भी अधिक स्पष्टता से स्वीकार करता है। क्योंकि जब वह उन अभ्यासों की बात करता है जिन्हें सच्चे कल्याण की दृष्टि से किया जाना चाहिए, और मनुष्यों की प्रशंसा की व्यर्थ इच्छा की दृष्टि से नहीं, तो वह निम्नलिखित सार्वभौमिक और सामान्य कथन प्रस्तुत करता है:
"सम्मान कलाओं का पोषण करता है, और सब लोग महिमा से अध्ययन को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित होते हैं; और वे अभ्यास सदा उपेक्षित रहते हैं जो सामान्यतः अपमानित समझे जाते हैं।"[205]
14. मनुष्यों की प्रशंसा के प्रेम को मिटाने के विषय में, क्योंकि धर्मियों की सारी महिमा परमेश्वर में है
इसलिए, निःसन्देह इस इच्छा का विरोध करना उसके आगे झुकने से कहीं अधिक उत्तम है, क्योंकि जो इस मलिनता से जितना अधिक शुद्ध है, वह परमेश्वर के उतना ही अधिक समरूप है; और, यद्यपि यह दुर्गुण हृदय से पूरी तरह मिटता नहीं है,—क्योंकि यह उनके भी मनों को परखना नहीं छोड़ता जो सद्गुण में भली प्रगति कर रहे हैं,—तो भी, महिमा की इच्छा को धार्मिकता के प्रेम से पीछे छोड़ दिया जाए, जिससे यदि कहीं "उपेक्षित पड़ी हुई वे वस्तुएं दिखें जो सामान्यतः अपमानित समझी जाती हैं," और यदि वे भली हैं, यदि वे उचित हैं, तो मनुष्यों की प्रशंसा का प्रेम भी लज्जित होकर सत्य के प्रेम के आगे झुक जाए। क्योंकि यह दुर्गुण भक्तिपूर्ण विश्वास का इतना अधिक शत्रु है, कि यदि हृदय में महिमा का प्रेम परमेश्वर के भय या प्रेम से बढ़कर हो, तो प्रभु ने कहा, "तुम जो एक दूसरे से महिमा चाहते हो, और उस महिमा को नहीं चाहते जो एकमात्र परमेश्वर की ओर से है, कैसे विश्वास कर सकते हो?"[206] इसके अतिरिक्त, कुछ ऐसे लोगों के विषय में जिन्होंने उस पर विश्वास तो किया था, परन्तु उसे खुलकर मान लेने से डरते थे, सुसमाचार लेखक कहता है, "उन्होंने मनुष्यों की प्रशंसा को परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय जाना;"[207] जो पवित्र प्रेरितों ने नहीं किया, जिन्होंने, जब उन्होंने मसीह के नाम की उन स्थानों में घोषणा की जहां वह न केवल अपमानित था, और इसलिए उपेक्षित था,—जैसा कि सिसरो कहता है, "वे वस्तुएं सदा उपेक्षित रहती हैं जो सामान्यतः अपमानित समझी जाती हैं,"—वरन जिसे अत्यन्त घृणा की दृष्टि से देखा जाता था, तो भी उन्होंने उस बात को दृढ़ता से पकड़े रखा जो उन्होंने उस उत्तम गुरु से सुनी थी, जो मनों का वैद्य भी था, "यदि कोई मनुष्यों के सामने मुझे अस्वीकार करे, तो मैं भी उसे अपने स्वर्गीय पिता के सामने, और परमेश्वर के स्वर्गदूतों के सामने अस्वीकार करूंगा,"[208] कोसनों और उलाहनों के बीच, और अत्यन्त गम्भीर सतावों और निष्ठुर दण्डों के बीच भी, वे मानवीय क्रोध के शोर से मानवीय उद्धार के प्रचार से विचलित नहीं हुए। और जब, जैसा उन्होंने दिव्य बातें की और कही, और दिव्य जीवन जीया, कठोर हृदयों को, जैसे कि, जीतते हुए, और उनमें धार्मिकता की शान्ति लाते हुए, बड़ी महिमा मसीह की कलीसिया में उनके पीछे-पीछे चली, तो उन्होंने उस पर अपने सद्गुण के अन्तिम लक्ष्य के रूप में विश्राम नहीं किया, वरन उस महिमा को ही परमेश्वर की महिमा से जोड़ते हुए, जिसके अनुग्रह से वे वह बने जो वे थे, उन्होंने उसी ज्वाला से उन लोगों के मनों को भी, जिनके भले के लिए वे विचार करते थे, उसके प्रेम में प्रज्वलित करने का प्रयत्न किया, जिससे वे स्वयं वैसे ही बन सकें जैसे वे स्वयं थे। क्योंकि उनके गुरु ने उन्हें यह सिखाया था कि वे मनुष्यों की महिमा के लिए भला बनने की खोज न करें, यह कहते हुए, "सावधान रहो, कि तुम अपने धर्म के काम मनुष्यों को दिखाने के लिए न करो, नहीं तो तुम्हें अपने स्वर्गीय पिता से कोई फल न मिलेगा।"[209] परन्तु फिर, ऐसा न हो कि इसे गलत समझकर, वे मनुष्यों को प्रसन्न करने के भय से, अपनी भलाई को छिपाकर कम उपयोगी बन जाएं, यह दिखाने के लिए कि किस उद्देश्य से उन्हें उसे प्रकट करना चाहिए, वह कहता है, "तुम्हारे काम मनुष्यों के सामने ऐसे चमकें, कि वे तुम्हारे भले कामों को देखें, और तुम्हारे स्वर्गीय पिता की महिमा करें।"[210] ध्यान दो, यह नहीं, "कि तुम उनके द्वारा देखे जाओ, अर्थात् जिससे उनकी आंखें तुम्हारी ओर लगें,"—क्योंकि तुम स्वयं में कुछ भी नहीं हो,—वरन "कि वे तुम्हारे स्वर्गीय पिता की महिमा करें," अपनी दृष्टि उस पर स्थिर करके जिससे वे भी वैसे ही बन सकें जैसे तुम हो। इन्हीं का अनुसरण उन शहीदों ने किया, जो स्केवोलाओं, कर्टियसों और डेकियसों से सच्चे सद्गुण में, क्योंकि सच्ची भक्ति में, और साथ ही अपनी संख्या की विशालता में भी, बढ़कर थे। परन्तु क्योंकि वे रोमी एक पृथ्वी के नगर में थे, और उनके सामने, उसके लिए किए गए सब कार्यों के अन्तिम लक्ष्य के रूप में, उसकी सुरक्षा और एक राज्य था, स्वर्ग में नहीं, वरन पृथ्वी पर,—अनन्त जीवन के क्षेत्र में नहीं, वरन मृत्यु और उत्तराधिकार के क्षेत्र में, जहां मरनेवालों का स्थान मरते हुओं से लिया जाता है,—तो महिमा के अतिरिक्त वे और क्या प्रेम करते, जिससे वे मृत्यु के बाद भी अपने प्रशंसकों के मुख में जीवित रहना चाहते थे?
15. उस सांसारिक पुरस्कार के विषय में जो परमेश्वर ने रोमियों के सद्गुणों को दिया
अब, इसलिए, जिन्हें परमेश्वर ने अपने पवित्र स्वर्गदूतों के साथ अपने ही स्वर्गीय नगर में अनन्त जीवन देने का उद्देश्य नहीं रखा था, जिसकी संगति की ओर वह सच्ची भक्ति ले जाती है जो धर्म की सेवा, जिसे यूनानी λατρεία कहते हैं, सच्चे परमेश्वर के अतिरिक्त किसी और को नहीं देती,—यदि उससे उस अत्यन्त उत्कृष्ट साम्राज्य की सांसारिक महिमा भी रोक ली जाती, तो उनकी भली कलाओं को,—अर्थात् उनके सद्गुणों को,—जिनके द्वारा उन्होंने इतनी बड़ी महिमा प्राप्त करने का प्रयत्न किया, कोई पुरस्कार न दिया जाता। क्योंकि उनके विषय में जो कुछ भला इसलिए करते प्रतीत होते हैं कि वे मनुष्यों से महिमा प्राप्त करें, प्रभु भी यही कहता है, "मैं तुम से सच कहता हूं, कि उन्हें उनका फल मिल चुका है।"[211] इसी प्रकार इन्होंने भी गणराज्य के लिए अपने निजी मामलों को तुच्छ समझा, और उसके कोष के लिए लोभ का विरोध किया, स्वतंत्रता की भावना से अपने देश के भले के लिए विचार किया, और न अपराध का न लालसा का अभ्यस्त हुए जिसे उनके नियमों ने अपराध घोषित किया था। इन सब कार्यों के द्वारा, सच्चे मार्ग के समान, वे सम्मान, सत्ता और महिमा की ओर आगे बढ़े; वे लगभग सब जातियों में सम्मानित हुए; उन्होंने अपने साम्राज्य के नियम अनेक जातियों पर लागू किए; और आज तक, साहित्य और इतिहास दोनों में, वे लगभग सब जातियों में महिमामय हैं। इसका कोई कारण नहीं कि वे सर्वोच्च और सच्चे परमेश्वर के न्याय के विरुद्ध शिकायत करें,—"उन्हें उनका फल मिल चुका है।"
16. स्वर्गीय नगर के पवित्र नागरिकों के पुरस्कार के विषय में, जिनके लिए रोमियों के सद्गुणों का उदाहरण उपयोगी है
परन्तु पवित्र लोगों का पुरस्कार बहुत भिन्न है, जिन्होंने यहां भी उस परमेश्वर के नगर के लिए उलाहने सहे, जो इस संसार से प्रेम करनेवालों को घृणित प्रतीत होता है। वह नगर अनन्त है। वहां कोई नहीं जन्मता, क्योंकि वहां कोई नहीं मरता। वहां सच्चा और सम्पूर्ण आनन्द है,—किसी देवी का नहीं, वरन परमेश्वर का वरदान। वहां से हम विश्वास की प्रतिज्ञा प्राप्त करते हैं, जबकि अपने प्रवास में हम उसके सौन्दर्य के लिए तरसते हैं। वहां भलों और बुरों पर सूर्य नहीं उगता, वरन धर्म का सूर्य केवल भलों की रक्षा करता है। वहां घर में कष्ट सहकर सार्वजनिक कोष को समृद्ध करने के लिए कोई बड़ा उद्यम आवश्यक नहीं है, क्योंकि वहां सत्य का साझा कोष है। और, इसलिए, यह न केवल रोम के नागरिकों को पुरस्कृत करने के लिए था कि उसका साम्राज्य और महिमा इस प्रकार असाधारण रूप से बढ़ाई गई, वरन इसलिए भी कि उस अनन्त नगर के नागरिक, अपने यहां के प्रवास के दौरान, इन उदाहरणों पर उत्साह और गम्भीरता से विचार करें, और देखें कि अनन्त जीवन के कारण उन्हें उस स्वर्गीय देश से कैसा प्रेम होना चाहिए, यदि पृथ्वी का देश मानवीय महिमा के कारण अपने नागरिकों द्वारा इतना प्रेम किया गया था।
17. किस लाभ के लिए रोमियों ने युद्ध छेड़े, और उन्होंने अपने विजित लोगों के कल्याण में कितना योगदान दिया
क्योंकि, जहां तक मरनेवालों के इस जीवन का सम्बन्ध है, जो कुछ दिनों में व्यतीत होकर समाप्त हो जाता है, इससे क्या अन्तर पड़ता है कि एक मरणशील मनुष्य किसके शासन में जीवित है, यदि जो शासन करते हैं वे उसे भक्तिहीनता और अधर्म के लिए बाध्य न करें? क्या रोमियों ने उन जातियों को किसी प्रकार की हानि पहुंचाई, जिन पर, जब वे अधीन हो गईं, उन्होंने अपने नियम लागू किए, सिवाय इसके कि यह युद्ध में बड़े संहार के साथ किया गया? अब, यदि यह जातियों की सहमति से किया गया होता, तो यह अधिक सफलता के साथ किया गया होता, परन्तु फिर विजय की कोई महिमा न होती, क्योंकि रोमी स्वयं भी उन नियमों से मुक्त नहीं थे जो उन्होंने अन्यों पर लागू किए थे। यदि यह मार्स और बेल्लोना के बिना किया गया होता, जिससे विजय के लिए कोई स्थान न रहता, और कोई किसी को न जीतता जहां किसी ने युद्ध ही न किया हो, तो क्या रोमियों और अन्य जातियों की स्थिति एक ही न होती, विशेष रूप से यदि वह उस समय ही किया गया होता जो बाद में सबसे अधिक मानवीय और स्वीकार्य रीति से किया गया, अर्थात् रोमी साम्राज्य से सम्बन्धित सबको रोमी नागरिकता के अधिकार में स्वीकार करना, और जो पहले केवल थोड़ों का ही विशेषाधिकार था, उसे सबका विशेषाधिकार बनाना, इस एक शर्त के साथ, कि निम्न वर्ग जिनकी अपनी कोई भूमि नहीं थी, सार्वजनिक व्यय पर जीवित रहें—एक भरण-पोषण कर, जो उन्हें अपनी हार्दिक सहमति से, गणराज्य के भले प्रशासकों के हाथों में, जिसके वे सदस्य थे, कहीं अधिक अच्छी रीति से चुकाया गया होता, बजाय इसके कि उससे विजित मनुष्यों के रूप में इसे बलपूर्वक छीना जाता? क्योंकि मैं यह नहीं देखता कि सुरक्षा, भली नैतिकता, और निश्चय ही मनुष्यों की गरिमा के लिए इससे क्या लाभ होता है, कि कुछ ने जीता और कुछ जीते गए, सिवाय इसके कि यह उन्हें मानवीय महिमा का वह अत्यन्त पागलपन भरा वैभव देता है, जिसमें "उन्हें उनका फल मिल चुका है," जो इसकी अत्यधिक इच्छा से जलते थे, और अत्यन्त उत्कट युद्ध छेड़ते थे। क्योंकि क्या उनकी भूमि कर नहीं चुकाती? क्या उन्हें वह कुछ सीखने का विशेषाधिकार है जो अन्यों को सीखने का विशेषाधिकार नहीं है? क्या अन्य देशों में अनेक सीनेटर नहीं हैं जो रोम को देखकर भी नहीं जानते? बाहरी दिखावे को हटा दो,[212] और अन्ततः सब मनुष्य मनुष्यों के अतिरिक्त और क्या हैं? परन्तु यद्यपि इस युग की विकृति यह अनुमति दे कि सब भले मनुष्यों को अन्यों से अधिक सम्मान मिले, तो भी मानवीय सम्मान को इतना बड़ा मूल्य नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि वह धुआं है जिसमें कोई तौल नहीं। परन्तु हम इन बातों में भी परमेश्वर की कृपा का लाभ उठाएं। आइए हम विचार करें कि उन्होंने कितनी बड़ी वस्तुओं को तुच्छ समझा, कितनी बड़ी वस्तुओं को सहा, मानवीय महिमा के लिए उन्होंने किन लालसाओं को दबाया, जिन्होंने ऐसे सद्गुणों के पुरस्कार के रूप में, जैसे कि, उस महिमा के योग्य बने; और यह हमारे लिए अभिमान को दबाने में भी उपयोगी हो, जिससे, जैसे वह नगर जिसमें हमें राज्य करने की प्रतिज्ञा दी गई है, इस नगर से उतना अधिक बढ़कर है जितना स्वर्ग पृथ्वी से दूर है, जितना अनन्त जीवन सांसारिक आनन्द से, ठोस महिमा खाली प्रशंसा से, या स्वर्गदूतों की संगति मरनेवालों की संगति से, या उसकी महिमा जिसने सूर्य और चन्द्रमा को बनाया, सूर्य और चन्द्रमा के प्रकाश से बढ़कर है,—उस महान देश के नागरिकों को स्वयं यह प्रतीत न हो कि उन्होंने कुछ बहुत बड़ा किया है, यदि, उसे प्राप्त करने के लिए, उन्होंने कुछ भले कार्य किए हों या कुछ बुराइयां सही हों, जब वे मनुष्य इस पृथ्वी के देश के लिए पहले ही ऐसे बड़े कार्य कर चुके थे, ऐसी बड़ी बातें सह चुके थे। और विशेष रूप से इन सब बातों पर विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि पापों की क्षमा, जो नागरिकों को स्वर्गीय देश में इकट्ठा करती है, उसमें कुछ ऐसा है जिसकी एक छायायुक्त समानता रोमुलस के उस शरणस्थान में पाई जाती है, जहां हर प्रकार के अपराधों के दण्ड से भागकर वह भीड़ इकट्ठी हुई जिससे राज्य की स्थापना होनी थी।
18. मसीहियों को घमण्ड करने से कितना दूर रहना चाहिए, यदि उन्होंने अनन्त देश के प्रेम के लिए कुछ किया हो, जब रोमियों ने मानवीय महिमा और एक पृथ्वी के नगर के लिए ऐसे बड़े कार्य किए
इसलिए, उस अनन्त और स्वर्गीय नगर के लिए इस संसार के सब आकर्षणों को तुच्छ समझना, वे कितने भी सुखद क्यों न हों, कौन सी बड़ी बात है, यदि इस पृथ्वी के नगर के लिए ब्रूटस अपने ही पुत्र को मृत्युदण्ड दे सकता था,—एक ऐसा बलिदान जिसे स्वर्गीय नगर किसी को भी करने के लिए बाध्य नहीं करता? परन्तु निश्चय ही अपने पुत्रों को मृत्युदण्ड देना उससे कहीं अधिक कठिन है, जो स्वर्गीय देश के लिए किया जाना अपेक्षित है, अर्थात् उन वस्तुओं को दरिद्रों में बांट देना जिन्हें अपने बच्चों के लिए संचित और सुरक्षित रखने की वस्तुएं समझा जाता था, या विश्वास और धार्मिकता के लिए, यदि कोई परीक्षा उठे जो हमें ऐसा करने के लिए बाध्य करे, तो उन्हें जाने देना। क्योंकि यह पार्थिव धन नहीं है जो हमें या हमारे पुत्रों को सुखी बनाता है; क्योंकि वह तो हमारे जीवनकाल में ही हमसे खो जाना चाहिए, या हमारी मृत्यु के बाद किसी और के अधिकार में आ जाना चाहिए, जिसे हम नहीं जानते, या सम्भवतः जिसे हम नहीं चाहते। परन्तु परमेश्वर ही है जो हमें सुखी बनाता है, जो मनों का सच्चा धन है। परन्तु ब्रूटस के विषय में, वह कवि भी जो उसकी प्रशंसा गाता है, यह गवाही देता है कि अपने पुत्र को मार डालना उसके लिए दुःख का कारण था, क्योंकि वह कहता है,
"और अपने ही विद्रोही पुत्रों को, संकटग्रस्त स्वतन्त्रता के लिए, रक्त बहाने हेतु दण्डित करता है, अभागा पिता! भले ही आनेवाली पीढ़ियाँ इस कृत्य को जैसे भी आँकें।"[213]परन्तु आगे की पंक्ति में वह उसे उसके दुःख में यह कहते हुए सान्त्वना देता है,
"देश-प्रेम सब पर भारी पड़ेगा।"वे दो बातें हैं, अर्थात् स्वतंत्रता और मनुष्यों की प्रशंसा की इच्छा, जिन्होंने रोमियों को प्रशंसनीय कार्यों के लिए बाध्य किया। इसलिए, यदि मरणशील मनुष्यों की स्वतंत्रता के लिए, और मनुष्यों की प्रशंसा की इच्छा के लिए जिसकी खोज मरणशील लोग करते हैं, एक पिता अपने पुत्रों को मृत्युदण्ड दे सकता था, तो यह कौन सी बड़ी बात है, यदि, उस सच्ची स्वतंत्रता के लिए जिसने हमें पाप, मृत्यु और शैतान के आधिपत्य से मुक्त किया है,—मनुष्यों की प्रशंसा की इच्छा से नहीं, वरन मनुष्यों को, राजा टार्क्विन से नहीं, वरन दुष्टात्माओं और दुष्टात्माओं के प्रधान से, मुक्त करने की उत्कट इच्छा से,—हम, यह न कहें कि अपने पुत्रों को मृत्युदण्ड दें, वरन मसीह के दरिद्रों को अपने पुत्रों में गिनें? यदि, इसके अतिरिक्त, एक और रोमी प्रधान, जिसका उपनाम टॉर्क्वेतुस था, ने अपने पुत्र को इस कारण नहीं मार डाला कि उसने अपने देश के विरुद्ध युद्ध किया था, वरन इस कारण कि, एक शत्रु द्वारा चुनौती दिए जाने पर, उसने युवावस्था की उत्तेजना से युद्ध किया, यद्यपि अपने देश के लिए, तौभी उन आदेशों के विरुद्ध जो उसके पिता ने सेनापति के रूप में दिए थे; और उसने यह इसलिए किया, यद्यपि उसका पुत्र विजयी हुआ था, ऐसा न हो कि अधिकार के तिरस्कार के उदाहरण में उतनी बुराई हो जितनी शत्रु को मारने की महिमा में भलाई है;—यदि, मैं कहता हूं, टॉर्क्वेतुस ने ऐसा किया, तो वे क्यों घमण्ड करें, जो एक स्वर्गीय देश के नियमों के लिए, सब पार्थिव भली वस्तुओं को तुच्छ समझते हैं, जो पुत्रों से कहीं कम प्रिय हैं? यदि फ्यूरियस कैमिलस, जिसे उन लोगों ने दोषी ठहराया जो उससे ईर्ष्या रखते थे, इसके बावजूद कि उसने अपने देशवासियों की गर्दनों से उनके सबसे कटु शत्रुओं, वेयेंतेस, का जुआ उतार फेंका था, फिर से अपने कृतघ्न देश को गॉलों से छुड़ाया, क्योंकि उसके पास और कोई ऐसा देश नहीं था जिसमें उसे महिमा का जीवन जीने के बेहतर अवसर मिल सकें;—यदि कैमिलस ने ऐसा किया, तो उसे कोई बड़ा कार्य करने का सम्मान क्यों दिया जाए, जिसने, सम्भवतः शारीरिक शत्रुओं के हाथों कलीसिया में अत्यन्त गम्भीर और अपमानजनक हानि सहकर भी, विधर्मी शत्रुओं की ओर शरण नहीं ली, या स्वयं उसके विरुद्ध कोई विधर्म नहीं उठाया, वरन जितना वह कर सकता था, विधर्मियों की अत्यन्त विनाशकारी विकृति से उसकी रक्षा की, क्योंकि कोई दूसरी कलीसिया नहीं है, मैं यह नहीं कहता जिसमें महिमा का जीवन जीया जा सके, वरन जिसमें अनन्त जीवन प्राप्त किया जा सके? यदि म्यूसियस ने, राजा पोर्सेना के साथ शान्ति स्थापित करने के लिए, जो रोमियों को अत्यन्त गम्भीर युद्ध से दबा रहा था, जब वह पोर्सेना को मारने में सफल न हुआ, वरन भूल से किसी अन्य को मार डाला, अपना दाहिना हाथ बढ़ाकर उसे एक जलते हुए यज्ञवेदी पर रख दिया, यह कहते हुए कि उसके जैसे बहुत लोगों ने उसके विनाश की योजना बनाई है, जिससे पोर्सेना, उसकी दृढ़ता से भयभीत होकर, और उसके जैसे लोगों की योजना के विचार से, तुरन्त अपने सब युद्ध के उद्देश्य वापस ले लिया, और शान्ति कर ली;—यदि, मैं कहता हूं, म्यूसियस ने ऐसा किया, तो कौन उसके स्वर्ग के राज्य पर अपने पुण्य के दावों की बात करेगा, यदि उसके लिए उसने ज्वालाओं को न केवल एक हाथ, वरन अपना सम्पूर्ण शरीर दे दिया हो, और वह भी अपनी स्वेच्छा से नहीं, वरन इसलिए कि वह किसी अन्य के द्वारा सताया गया था? यदि कर्टियस ने, अपने घोड़े को उकसाते हुए, अपने आपको पूरी तरह अस्त्र-शस्त्र से लदा हुआ एक गहरी खाई में डाल दिया, उनके देवताओं के वचनों का पालन करते हुए, जिनने आदेश दिया था कि रोमी उस खाई में अपनी सबसे उत्तम वस्तु डाल दें, और वे इससे केवल यह समझ सके कि, क्योंकि वे मनुष्यों और अस्त्रों में उत्कृष्ट थे, देवताओं ने आदेश दिया था कि एक शस्त्रधारी मनुष्य को उस विनाश में सिर के बल फेंक दिया जाए;—यदि उसने ऐसा किया, तो क्या हम कहें कि उस मनुष्य ने अनन्त नगर के लिए कोई बड़ा कार्य किया है जिसकी मृत्यु ऐसी ही किसी मृत्यु से हुई हो, तथापि स्वेच्छा से किसी खाई में नहीं गिरकर, वरन अपने विश्वास के किसी शत्रु के हाथों यह मृत्यु सहकर, विशेष रूप से जब उसे अपने प्रभु से, जो उसके देश का राजा भी है, एक अधिक निश्चित वचन प्राप्त हुआ है, "उनसे मत डरो जो देह को घात करते हैं, परन्तु प्राण को घात नहीं कर सकते?"[214] यदि डेकियस लोगों ने अपने आपको मृत्यु के लिए समर्पित किया, अपने आपको, जैसे कि, शब्दों के एक रूप में पवित्र करते हुए, कि गिरकर, और अपने लहू से देवताओं के क्रोध को शान्त करते हुए, वे रोमी सेना को बचाने का साधन बन सकें;—यदि उन्होंने ऐसा किया, तो पवित्र शहीद अपने आपको गर्व से न प्रस्तुत करें, जैसे कि उन्होंने उस देश में हिस्सा पाने के लिए कोई पुण्यमय कार्य किया हो जहां अनन्त जीवन और आनन्द है, यदि अपने लहू बहाने तक भी, न केवल उन भाइयों से प्रेम करते हुए जिनके लिए वह बहाया गया, वरन, जैसा उन्हें आदेश दिया गया था, उन्हीं शत्रुओं से भी जिनके द्वारा वह बहाया जा रहा था, उन्होंने प्रेम के विश्वास और विश्वास के प्रेम में एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा की। यदि मार्कस पुल्विलस ने, जुपिटर, यूनो और मिनर्वा को एक मन्दिर समर्पित करते समय, अपने पुत्र की मृत्यु के विषय में लाई गई झूठी सूचना को इतनी उदासीनता से लिया, इस उद्देश्य से कि वह इतना विचलित हो जाए कि वहां से चला जाए, और इस प्रकार मन्दिर समर्पित करने की महिमा उसके सहकर्मी को मिल जाए;—यदि उसने वह सूचना इतनी उदासीनता से ली कि उसने अपने पुत्र को बिना गाड़े ही बाहर फेंक देने का आदेश भी दे दिया, महिमा के प्रेम ने उसके हृदय में शोक के दुःख पर विजय पा ली,—तो कोई कैसे यह दावा करे कि उसने सुसमाचार के प्रचार के लिए कोई बड़ा कार्य किया है, जिसके द्वारा स्वर्गीय नगर के नागरिक विभिन्न भ्रमों से मुक्त होते हैं, और विभिन्न भटकावों से इकट्ठे किए जाते हैं, जिनसे उनके प्रभु ने, जब वह अपने पिता के दाह-संस्कार के विषय में चिन्तित था, कहा, "मेरे पीछे चला आ, और मरे हुओं को अपने मरे हुओं को गाड़ने दे?"[215] रेगुलस, अपनी शपथ को न तोड़ने के लिए, अपने अत्यन्त निष्ठुर शत्रुओं के साथ भी, स्वयं रोम से उनके पास लौट गया, क्योंकि (जैसा कि कहा जाता है कि उसने रोमियों को उत्तर दिया जब वे उसे रोकना चाहते थे) उसे अफ्रीकियों का दास रहने के बाद रोम में एक सम्मानित नागरिक की गरिमा नहीं मिल सकती थी, और कार्थेजवासियों ने उसे अत्यन्त कठिन यातनाओं से मृत्युदण्ड दिया, क्योंकि उसने सीनेट में उनके विरुद्ध बोला था। यदि रेगुलस ने ऐसा किया, तो उस देश के प्रति सच्ची निष्ठा के लिए, जिसके आनन्द की ओर विश्वास स्वयं ले जाता है, कौन सी यातनाएं तुच्छ नहीं समझी जानी चाहिए? या मनुष्य ने प्रभु को उसकी सब कृपाओं के लिए क्या दिया होगा, यदि, उस निष्ठा के लिए जो वह उसका ऋणी है, उसने वे बातें सही हों जो रेगुलस ने अपने अत्यन्त निर्दयी शत्रुओं के हाथों उस अच्छी निष्ठा के लिए सहीं, जिसका वह उनका ऋणी था? और एक मसीही अपनी स्वेच्छिक दरिद्रता पर घमण्ड करने का साहस कैसे करे, जिसे उसने इसलिए चुना है कि इस जीवन के प्रवास के दौरान वह उस मार्ग पर अधिक निर्बाध रीति से चल सके जो उस देश की ओर ले जाता है जहां सच्चा धन है, अर्थात् परमेश्वर स्वयं;—मैं कहता हूं, वह इसके लिए कैसे घमण्ड करे, जब वह सुनता या पढ़ता है कि लूसियस वैलेरियस, जो कौंसल के पद पर रहते हुए मरा, इतना दरिद्र था कि उसके अन्तिम संस्कार का व्यय लोगों द्वारा इकट्ठे किए गए धन से चुकाया गया था?—या जब वह सुनता है कि क्विंतियस सिन्सिनातुस, जिसके पास केवल चार एकड़ भूमि थी, और वह उसे अपने ही हाथों से जोतता था, उसे हल से लेकर तानाशाह बनाया गया,—एक पद जो कौंसल के पद से भी अधिक सम्मानित था,—और यह कि, शत्रु को जीतकर बड़ी महिमा प्राप्त करने के बाद भी, उसने फिर भी अपनी दरिद्रता में बने रहना अधिक पसन्द किया? या वह कैसे किसी बड़े कार्य करने का घमण्ड करे, जिसे इस संसार के किसी पुरस्कार के प्रस्ताव से उस स्वर्गीय और अनन्त देश के साथ अपने सम्बन्ध को त्यागने के लिए राजी नहीं किया जा सका, जब वह सुनता है कि फैब्रीकियस को एपिरस के राजा पिर्रस द्वारा दिए गए बड़े उपहारों से, जिसने उसे अपने राज्य का चौथा भाग देने का वचन दिया था, रोमी नगर को त्यागने के लिए राजी नहीं किया जा सका, वरन उसने वहां एक साधारण व्यक्ति के रूप में अपनी दरिद्रता में बने रहना अधिक पसन्द किया? क्योंकि यदि, जब उनका गणराज्य,—अर्थात् जनता का हित, देश का हित, साझा हित,—अत्यन्त समृद्ध और सम्पन्न था, तब वे स्वयं अपने ही घरों में इतने दरिद्र थे, कि उनमें से एक, जो पहले ही दो बार कौंसल रह चुका था, उस दरिद्र लोगों की सीनेट से सेंसर द्वारा इस कारण निकाल दिया गया कि उसके पास दस पौंड चांदी के बर्तन पाए गए,—क्योंकि, मैं कहता हूं, वे ही मनुष्य जिनकी विजयों से सार्वजनिक कोष समृद्ध हुआ, इतने दरिद्र थे,—तो क्या सब मसीहियों को, जो कहीं अधिक श्रेष्ठ उद्देश्य से अपने धन को साझा सम्पत्ति बनाते हैं, अर्थात् (जैसा प्रेरितों के काम में लिखा है) कि वे हर एक को उसकी आवश्यकता के अनुसार बांट दें, और कोई यह न कहे कि कुछ भी उसका अपना है, वरन सब वस्तुएं उनकी साझा सम्पत्ति हों,[216]—क्या उन्हें यह नहीं समझना चाहिए कि उन्हें अपने आप पर घमण्ड नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे यह स्वर्गदूतों की संगति प्राप्त करने के लिए करते हैं, जब उन मनुष्यों ने रोमियों की महिमा को बनाए रखने के लिए लगभग वैसा ही किया?
यह सब, और रोमी इतिहास में पाई जानेवाली इस प्रकार की अन्य बातें, इतनी व्यापक रूप से कैसे जानी जा सकती थीं, और इतनी बड़ी प्रसिद्धि के साथ कैसे घोषित की जा सकती थीं, यदि रोमी साम्राज्य, जो दूर-दूर तक फैला हुआ था, शानदार सफलताओं के द्वारा अपनी महानता तक न पहुंचा होता? इस कारण, उस साम्राज्य के द्वारा, जो इतना विस्तृत और इतने दीर्घकाल तक बना रहा, और ऐसे महान पुरुषों के गुणों के द्वारा भी इतना प्रतापी और महिमामय था, जो प्रतिफल वे खोजते थे वह उनकी उत्कट आकांक्षाओं को दिया गया, और साथ ही हमारे सामने ऐसे उदाहरण भी रखे गए हैं जिनमें आवश्यक चेतावनी निहित है, इसलिए कि यदि हम देखें कि हमने उन गुणों को परमेश्वर के अत्यंत महिमामय नगर के लिए दृढ़ता से धारण नहीं किया, जो किसी न किसी रूप में उन गुणों के समान हैं जिन्हें उन्होंने पृथ्वी के एक नगर की महिमा के लिए दृढ़ता से धारण किया, तो हम लज्जा से बिंध जाएं, और यह भी कि यदि हमें यह चेतना हो कि हमने उन्हें दृढ़ता से धारण किया है, तो हम अहंकार से फूल न जाएं, क्योंकि, जैसा प्रेरित कहता है, “क्योंकि मैं समझता हूं कि इस समय के दुख उस आनेवाली महिमा की तुलना में कुछ भी नहीं जो हम पर प्रगट होगी।”[217] परन्तु जहां तक मानवीय और सांसारिक महिमा का सम्बन्ध है, इन प्राचीन रोमियों के जीवन पर्याप्त रूप से सम्मान के योग्य समझे गए। इस कारण, हम उस सत्य के प्रकाश में भी देखते हैं, जो पुराने नियम में ढका हुआ था और नए नियम में प्रकट किया गया है, अर्थात यह कि परमेश्वर की उपासना सांसारिक और कालिक लाभों को ध्यान में रखकर नहीं करनी चाहिए, जिन्हें ईश्वरीय विधान भले और बुरे दोनों को समान रूप से देता है, परन्तु अनन्त जीवन, सदा बने रहनेवाले वरदानों, और स्वर्गीय नगर की संगति को ध्यान में रखकर करनी चाहिए;—इस सत्य के प्रकाश में हम देखते हैं कि यहूदी लोग सर्वथा उचित रूप से रोमियों की महिमा के लिए एक विजय-चिन्ह के रूप में दिए गए; क्योंकि हम देखते हैं कि ये रोमी लोग, जो सांसारिक महिमा पर टिके हुए थे, और उसे उन गुणों के द्वारा, जैसे भी वे थे, प्राप्त करना चाहते थे, उन लोगों पर जय पाई जिन्होंने अपनी बड़ी भ्रष्टता में सच्ची महिमा के दाता, और अनन्त नगर के दाता को मार डाला और तज दिया।
19. सच्ची महिमा और प्रभुत्व की लालसा के बीच के अन्तर के विषय में
मानवीय महिमा की लालसा और प्रभुत्व की लालसा के बीच निश्चय ही अन्तर है; क्योंकि यद्यपि जिस किसी को मानवीय महिमा में अत्यधिक आनन्द मिलता है, वह प्रभुत्व की उत्कट कामना करने की ओर भी बहुत प्रवृत्त होगा, तौभी जो मानवीय प्रशंसा की भी सच्ची महिमा की लालसा रखते हैं, वे उन लोगों को अप्रसन्न करने से बचने का प्रयत्न करते हैं जो उनके विषय में भला निर्णय करते हैं। क्योंकि बहुत से भले नैतिक गुण हैं, जिनके बहुत से सक्षम निर्णायक हैं, यद्यपि वे गुण बहुतों के पास नहीं हैं; और उन भले नैतिक गुणों के द्वारा वे लोग महिमा, सम्मान, और प्रभुत्व की ओर आगे बढ़ते हैं, जिनके विषय में सैलस्ट कहता है, “परन्तु वे सच्चे मार्ग से आगे बढ़ते हैं।”
परन्तु जो कोई, महिमा की उस लालसा के बिना, जो मनुष्य को अपने चालचलन पर भला निर्णय करनेवालों को अप्रसन्न करने से डरा देती है, प्रभुत्व और सत्ता की लालसा रखता है, वह बहुधा अपनी प्रिय वस्तु को अत्यंत खुले अपराधों के द्वारा प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। इस कारण जो महिमा की लालसा रखता है, वह उसे प्राप्त करने के लिए या तो सच्चे मार्ग से आगे बढ़ता है, या निश्चय ही छल और कपट से, यह चाहते हुए कि जब वह भला नहीं है, तो भी भला दिखे। इस कारण जिसके पास गुण हैं, उसके लिए महिमा को तुच्छ जानना एक बड़ा गुण है; क्योंकि उसका तिरस्कार परमेश्वर के द्वारा देखा जाता है, परन्तु मानवीय निर्णय के लिए प्रकट नहीं होता। क्योंकि मनुष्य जो कुछ भी दूसरों की आंखों के सामने यह दिखाने के लिए करता है कि वह महिमा का तिरस्कार करनेवाला है, यदि वे यह सन्देह करें कि वह इसे और अधिक प्रशंसा—अर्थात और अधिक महिमा—प्राप्त करने के लिए कर रहा है, तो उसके पास सन्देह करनेवालों की धारणा को यह दिखाने का कोई उपाय नहीं है कि वास्तविकता उनके सन्देह से भिन्न है। परन्तु जो प्रशंसा करनेवालों के निर्णय को तुच्छ जानता है, वह सन्देह करनेवालों की उतावली को भी तुच्छ जानता है। तौभी, यदि वह सचमुच भला है, तो वह उनके उद्धार को तुच्छ नहीं जानता; क्योंकि उस मनुष्य की धार्मिकता इतनी बड़ी होती है, जो अपने गुण परमेश्वर के आत्मा से पाता है, कि वह अपने शत्रुओं तक से प्रेम करता है, और उन्हें इस प्रकार प्रेम करता है कि चाहता है कि उससे बैर रखनेवाले और उसकी निन्दा करनेवाले भी धार्मिकता की ओर फिरें, और उसके सहभागी बनें, वह भी पृथ्वी के नहीं वरन स्वर्गीय देश में। परन्तु अपनी प्रशंसा करनेवालों के विषय में, यद्यपि वह उनकी प्रशंसा को थोड़ा महत्व देता है, तौभी वह उनके प्रेम को थोड़ा महत्व नहीं देता; न ही वह उनकी प्रशंसा से बचने का प्रयत्न करता है, ऐसा न हो कि वह उनका प्रेम खो दे। और इस कारण, वह गंभीरता से यह प्रयत्न करता है कि उनकी प्रशंसाएं उसी की ओर लक्षित हों, जिससे प्रत्येक व्यक्ति जो कुछ भी अपने में सचमुच प्रशंसनीय है, वह प्राप्त करता है। परन्तु जो महिमा का तिरस्कार करनेवाला है, परन्तु प्रभुत्व का लोभी है, वह क्रूरता और विलासिता के दुर्गुणों में पशुओं से भी आगे बढ़ जाता है। रोमियों में से कुछ ऐसे ही थे, जिनमें सम्मान का प्रेम तो नहीं था, परन्तु प्रभुत्व की प्यास बनी रही; और इतिहास इस बात की गवाही देता है कि ऐसे बहुत थे। परन्तु नीरो कैसर ही पहला था जो इस दुर्गुण की चोटी, और मानो गढ़ तक पहुंचा; क्योंकि उसकी विलासिता इतनी बड़ी थी कि कोई यह सोचता कि उसमें डरने योग्य कुछ भी पुरुषोचित नहीं है, और उसकी क्रूरता ऐसी थी कि यदि इसके विपरीत ज्ञात न होता, तो कोई यह न सोचता कि उसके स्वभाव में कुछ भी स्त्रैण है। तौभी सत्ता और प्रभुत्व ऐसे मनुष्यों को भी परमप्रधान परमेश्वर के विधान के बिना नहीं दिए जाते, जब वह यह निर्णय करता है कि मानवीय दशा ऐसे स्वामियों के योग्य है। इस विषय में ईश्वरीय वचन स्पष्ट है; क्योंकि परमेश्वर की बुद्धि इस प्रकार कहती है: “मेरे ही द्वारा राजा राज्य करते हैं, और अत्याचारी भूमि पर अधिकार रखते हैं।”[218] परन्तु ऐसा न सोचा जाए कि “अत्याचारियों” से दुष्ट और भक्तिहीन राजाओं का अर्थ नहीं, वरन शब्द के प्राचीन प्रयोग के अनुसार वीर पुरुषों का अर्थ है, जैसा वर्जिल कहता है,
"क्योंकि जान ले कि सन्धि टिक नहीं सकती जहाँ राजा राजा से मिले परन्तु हाथ न मिलाए,"[219]किसी अन्य स्थान पर परमेश्वर के विषय में यह अत्यंत स्पष्टता से कहा गया है, कि वह “प्रजा की दुष्टता के कारण कपटी मनुष्य को राज्य करने देता है।”[220] इस कारण, यद्यपि मैंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार यह दिखाया है कि किस कारण परमेश्वर, जो एकमात्र सच्चा और न्यायी है, ने रोमियों की, जो एक सांसारिक राज्य के किसी मानदण्ड के अनुसार भले थे, इतने बड़े साम्राज्य की महिमा प्राप्त करने में सहायता की, तौभी इसके पीछे कोई अधिक गुप्त कारण भी हो सकता है, जो मानव जाति की योग्यताओं की विविधता पर निर्भर है, और जिसे परमेश्वर हमसे अधिक भली-भांति जानता है। जो सचमुच भक्त हैं, उन सभी के बीच यह एक तथ्य है, कि सच्ची भक्ति के बिना—अर्थात सच्चे परमेश्वर की सच्ची उपासना के बिना—कोई भी सच्चा गुण नहीं रख सकता; और यह कि जो गुण मानवीय प्रशंसा का दास है, वह सच्चा गुण नहीं है। तौभी, जो लोग उस अनन्त नगर के नागरिक नहीं हैं, जिसे पवित्रशास्त्र में परमेश्वर का नगर कहा गया है, वे उस गुण को रखते हुए भी पृथ्वी के नगर के लिए उससे अधिक उपयोगी हैं, बजाय इसके कि उनके पास वह भी न हो। परन्तु मानवीय बातों के लिए इससे अधिक शुभ कुछ नहीं हो सकता कि, परमेश्वर की दया से, जो लोग जीवन की सच्ची भक्ति से युक्त हैं, यदि उनमें लोगों पर शासन करने की कुशलता हो, तो उनके पास सत्ता भी हो। परन्तु ऐसे मनुष्य, इस जीवन में कितने भी बड़े गुण रखते हों, इसे पूर्णतः परमेश्वर के अनुग्रह पर आरोपित करते हैं, कि उसने उन्हें यह दिया है—चाहना, विश्वास करना, खोजना। और साथ ही, वे यह भी समझते हैं कि वे उस धार्मिकता की सिद्धता से कितने दूर हैं, जो उन पवित्र स्वर्गदूतों की संगति में विद्यमान है, जिसके योग्य बनने का वे प्रयत्न कर रहे हैं। परन्तु वह गुण, जो सच्ची भक्ति के बिना मानवीय महिमा का दास है, कितना भी प्रशंसित और सराहा जाए, तौभी उसकी तुलना पवित्र लोगों के गुण के दुर्बल आरम्भ से भी नहीं की जा सकती, जिनकी आशा सच्चे परमेश्वर के अनुग्रह और दया पर टिकी है।
20. यह कि गुणों का मानवीय महिमा की सेवा करना शारीरिक सुख की सेवा करने के समान ही लज्जाजनक है
वे दार्शनिक,—जो मानवीय भलाई का चरम लक्ष्य गुण में ही रखते हैं, ताकि कुछ अन्य दार्शनिकों को लज्जित करें, जो गुणों को स्वीकार तो करते हैं, परन्तु उन सबको शारीरिक सुख के लक्ष्य के सन्दर्भ में मापते हैं, और यह मानते हैं कि यह सुख अपने ही लिए खोजा जाना चाहिए, परन्तु गुण सुख के कारण,—एक प्रकार का शब्द-चित्र खींचने के आदी हैं, जिसमें सुख किसी विलासी रानी की भांति एक राजसिंहासन पर बैठता है, और सारे गुण दासों के समान उसके अधीन हैं, उसके संकेत को देखते हुए, कि वे वह करें जो कुछ वह आदेश दे। वह विवेक को यह आदेश देती है कि वह निरंतर सतर्क रहे कि सुख कैसे शासन कर सके, और सुरक्षित रह सके। न्याय को वह यह आज्ञा देती है कि जितना सम्भव हो वह उपकार करे, ताकि उन मित्रताओं को सुरक्षित रखे जो शारीरिक सुख के लिए आवश्यक हैं; कि किसी के साथ अन्याय न करे, ऐसा न हो कि नियमों के तोड़े जाने के कारण सुख सुरक्षा में जीवित न रह सके। धीरज को वह आज्ञा देती है कि यदि उसकी स्वामिनी, अर्थात सुख के शरीर पर कोई ऐसी विपत्ति आ पड़े जो मृत्यु का कारण नहीं बनती, तो वह उसे मन में वीरतापूर्वक धारण करे, जिससे वह पूर्व के आनन्दों को स्मरण करके वर्तमान पीड़ा की तीव्रता को कम कर सके। संयम को वह आज्ञा देती है कि वह अपने सबसे प्रिय भोजन की भी केवल एक निश्चित मात्रा ही ले, ऐसा न हो कि असंयमित उपभोग के द्वारा शरीर के स्वास्थ्य को बिगाड़कर कुछ हानिकारक सिद्ध हो, और इस प्रकार सुख, जिसे एपीक्यूरियन लोग मुख्यतः शरीर के स्वास्थ्य में मानते हैं, गम्भीर रूप से आहत हो। इस प्रकार गुण, अपनी महिमा की सारी गरिमा के साथ, सुख के दास होंगे, जैसे किसी अहंकारी और अपयशी स्त्री के दास।
हमारे दार्शनिक कहते हैं कि इस चित्र से अधिक लज्जाजनक और भयावह कुछ भी नहीं है, और जिसे भले मनुष्यों की आंखें सबसे कम सह सकती हैं। और वे सत्य कहते हैं। परन्तु मैं यह नहीं मानता कि वह चित्र पर्याप्त रूप से उचित होता, यदि गुणों को मानवीय महिमा के दासों के रूप में दिखाया जाता; क्योंकि यद्यपि वह महिमा कोई विलासी स्त्री नहीं है, तौभी वह फूली हुई है, और उसमें बहुत व्यर्थता है। इस कारण गुणों की दृढ़ता और स्थिरता के अयोग्य है कि उन्हें इस महिमा की सेवा करते हुए दिखाया जाए, कि विवेक कुछ भी प्रबन्ध न करे, न्याय कुछ भी न बांटे, संयम कुछ भी नियंत्रित न करे, केवल इस लक्ष्य के लिए कि लोग प्रसन्न हों और व्यर्थ महिमा की सेवा हो। और वे इस निम्नता के आरोप से अपना बचाव भी नहीं कर सकेंगे, जब वे, महिमा के तिरस्कार करनेवाले होने के बहाने से, अन्य मनुष्यों के निर्णय की उपेक्षा करते हैं, अपने ही सामने बुद्धिमान प्रतीत होते हैं, और अपने ही को प्रसन्न करते हैं। क्योंकि उनका गुण,—यदि वह वास्तव में गुण है भी,—केवल एक और ढंग से मानवीय प्रशंसा के अधीन है; क्योंकि जो अपने ही को प्रसन्न करने का प्रयत्न करता है, वह फिर भी मनुष्य को प्रसन्न करने का प्रयत्न करता है। परन्तु जो परमेश्वर के प्रति सच्ची भक्ति के साथ, जिससे वह प्रेम करता, विश्वास करता, और आशा रखता है, अपना ध्यान उन बातों पर अधिक लगाता है जिनमें वह अपने ही को अप्रसन्न करता है, बजाय उन बातों पर, यदि ऐसी कोई हों, जो उसे प्रसन्न करती हैं, या बल्कि, स्वयं को नहीं, वरन सत्य को प्रसन्न करती हैं,—वह इसका, कि वह अब सत्य को किस प्रकार प्रसन्न कर सकता है, कारण किसी और को नहीं, वरन उसकी दया को ही मानता है जिसे अप्रसन्न करने से वह डरता रहा है, अपने भीतर जो कुछ चंगा हो गया है उसके लिए धन्यवाद देते हुए, और जो अभी तक अचंगा है उसके चंगे होने के लिए प्रार्थनाएं उठाते हुए।
21. यह कि रोमी प्रभुत्व उसी के द्वारा दिया गया, जिससे सारी सत्ता है, और जिसके विधान से सब बातें शासित होती हैं
ये बातें ऐसी होने के कारण, हम राज्यों और साम्राज्यों को देने की सामर्थ्य किसी और को नहीं, वरन केवल सच्चे परमेश्वर को मानते हैं, जो स्वर्ग के राज्य में सुख केवल भक्तों को देता है, परन्तु पृथ्वी पर राजकीय सत्ता भक्तों और अभक्तों दोनों को देता है, जैसा उसे भाता है, जिसकी भली इच्छा सदा न्यायपूर्ण होती है। क्योंकि यद्यपि हमने उन सिद्धांतों के विषय में कुछ कहा है जो उसके प्रबन्ध का मार्गदर्शन करते हैं, जितना उसे इसे स्पष्ट करना अच्छा लगा है, तौभी मनुष्यों के हृदयों की गुप्त बातों पर विचार करना, और स्पष्ट परीक्षण के द्वारा विभिन्न राज्यों की योग्यताओं का निर्णय करना, हमारे लिए बहुत अधिक है, और हमारी सामर्थ्य से बहुत परे है। इस कारण, वह जो एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, जो मानव जाति को कभी न्यायपूर्ण निर्णय और सहायता के बिना नहीं छोड़ता, ने रोमियों को राज्य दिया जब उसने चाहा, और जितना बड़ा उसने चाहा, जैसा उसने अश्शूरियों को भी दिया, और यहां तक कि फारसियों को भी, जिनके विषय में उनकी अपनी पुस्तकें गवाही देती हैं कि वे केवल दो देवताओं की उपासना करते हैं, एक भला और दूसरा बुरा,—इब्रानी लोगों के विषय में कुछ न कहते हुए, जिनके विषय में मैं पहले ही जितना आवश्यक लगा उतना कह चुका हूं, जो, जब तक वे एक राज्य थे, सच्चे परमेश्वर के अतिरिक्त किसी और की उपासना नहीं करते थे। इस कारण, उसी ने, जिसने फारसियों को फसलें दी, यद्यपि उन्होंने देवी सेगेशिया की उपासना नहीं की, जिसने पृथ्वी के अन्य आशीष दिए, यद्यपि उन्होंने उन अनेक देवताओं की उपासना नहीं की जिनके विषय में रोमी लोग समझते थे कि वे प्रत्येक किसी विशेष वस्तु पर, या उनमें से बहुत से प्रत्येक वस्तु पर, अधिकार रखते हैं,—उसी ने, मैं कहता हूं, फारसियों को प्रभुत्व दिया, यद्यपि उन्होंने उन देवताओं में से किसी की भी उपासना नहीं की जिनके प्रति रोमी लोग यह मानते थे कि वे साम्राज्य के लिए ऋणी हैं। और यही सत्य जातियों के साथ-साथ व्यक्तियों के विषय में भी है। जिसने मारियुस को सत्ता दी, उसी ने कैयुस कैसर को भी दी; जिसने ऑगस्टस को दी, उसी ने नीरो को भी दी; जिसने अत्यंत कृपालु सम्राटों, पिता और पुत्र वेस्पासियन को दी, उसी ने क्रूर डोमीशियन को भी दी; और, अंततः, सबकी चर्चा करने की आवश्यकता से बचने के लिए, जिसने मसीही कॉन्स्टेंटाइन को दी, उसी ने धर्मत्यागी जूलियन को भी दी, जिसका प्रतिभाशाली मन एक अपवित्र और घृणित जिज्ञासा से, जो सत्ता के प्रेम से उत्तेजित थी, धोखा खा गया। और यह इस कारण था कि वह जिज्ञासा के द्वारा व्यर्थ भविष्यवाणियों में इतना लीन हो गया, कि, जय का विश्वास रखते हुए, उसने उन जलपोतों को जला दिया जो उसकी सेना के लिए आवश्यक सामग्री से लदे थे, और इस कारण, उतावली और दुःसाहसिक कार्यों में उग्र उत्साह से लगकर, वह अपनी लापरवाही के न्यायपूर्ण परिणाम के रूप में शीघ्र ही मार डाला गया, और अपनी सेना को शत्रु के देश में बिना सामग्री के छोड़ गया, और ऐसी विकट स्थिति में कि वह कभी नहीं बच सकती थी, सिवाय इसके कि रोमी साम्राज्य की सीमाओं को बदला जाए, जो टर्मिनुस देवता के उस अपशगुन के विरुद्ध था, जिसके विषय में मैंने पिछली पुस्तक में कहा था; क्योंकि टर्मिनुस देवता ने आवश्यकता के आगे झुक लिया, यद्यपि उसने जुपिटर के आगे नहीं झुका था। स्पष्ट है कि ये बातें एक ही परमेश्वर के द्वारा शासित और नियंत्रित होती हैं, जैसा उसे भाता है; और यदि उसके उद्देश्य गुप्त हैं, तो क्या इस कारण वे अन्यायपूर्ण हैं?
22. युद्धों की अवधि और परिणाम परमेश्वर की इच्छा पर निर्भर करते हैं
इसी प्रकार युद्धों की अवधि भी उसी के द्वारा निश्चित की जाती है, जैसा उसे उचित लगे, अपनी न्यायपूर्ण इच्छा, और चाह, और दया के अनुसार, मानव जाति को पीड़ित करने या शान्ति देने के लिए, ताकि वे कभी अधिक, कभी कम समय तक चलें। समुद्री लुटेरों का युद्ध और तीसरा पूनी युद्ध अविश्वसनीय शीघ्रता से समाप्त हो गए। भगोड़े ग्लैडिएटरों का युद्ध भी, यद्यपि उसमें बहुत से रोमी सेनापति और कौंसल पराजित हुए, और इटली भयानक रूप से उजाड़ा और लूटा गया, तौभी तीसरे वर्ष में समाप्त हो गया, यद्यपि अपने चलते रहने के दौरान वह अपने में बहुत बातों का अन्त था। पिसेंतेस, मार्सी, और पेलिग्नी, जो दूर की नहीं वरन इटली की ही जातियां थीं, रोमी अधीनता के दीर्घकालीन और अत्यंत निष्ठावान दासत्व के पश्चात, स्वतंत्रता में सिर उठाने का प्रयत्न किया, यद्यपि अब बहुत सी जातियां रोमी सत्ता के अधीन हो चुकी थीं, और कार्थेज गिराया जा चुका था। इस इटालियन युद्ध में रोमी लोग बहुत बार पराजित हुए, और दो कौंसल, अन्य प्रतिष्ठित सीनेटरों के साथ, नष्ट हो गए; तौभी यह विपत्ति दीर्घकाल तक नहीं खिंची, क्योंकि पांचवें वर्ष ने इसे समाप्त कर दिया। परन्तु दूसरा पूनी युद्ध, जो अठारह वर्षों तक चला, और गणराज्य के लिए सबसे बड़ी विपत्तियां और आपदाएं लाया, रोमियों की शक्ति को क्षीण और लगभग समाप्त कर गया; क्योंकि दो युद्धों में लगभग सत्तर हजार रोमी मारे गए।[221] पहला पूनी युद्ध तेईस वर्षों तक लड़े जाने के पश्चात समाप्त हुआ। मिथ्रिदातिक युद्ध चालीस वर्षों तक लड़ा गया। और ऐसा न सोचा जाए कि रोमियों के प्रारम्भिक और अत्यधिक सराहे गए समयों में वे कहीं अधिक वीर थे और युद्धों को शीघ्र समाप्त करने में अधिक सक्षम थे, सैमनाइट युद्ध लगभग पचास वर्षों तक खिंचा; और इस युद्ध में रोमी लोग इस प्रकार पराजित हुए कि उन्हें जुए के नीचे भी डाला गया। परन्तु क्योंकि उन्होंने न्याय के लिए महिमा से प्रेम नहीं किया, वरन प्रतीत होता है कि उन्होंने महिमा के लिए न्याय से प्रेम किया, उन्होंने वह शान्ति और सन्धि तोड़ दी जो सम्पन्न हुई थी। ये बातें मैं इस कारण कहता हूं, क्योंकि बहुत से, बीती बातों से अनजान, और कुछ जो जानते हुए भी छिपाते हैं, यदि मसीही समयों में किसी युद्ध को अपनी आशा से थोड़ा अधिक खिंचते देखते हैं, तो तुरन्त हमारे धर्म पर उग्र और उद्दण्ड आक्रमण करते हैं, यह चिल्लाते हुए कि यदि यह न होता, तो प्राचीन रीतियों के अनुसार देवताओं से अब भी विनती की जाती; और तब, रोमियों की उस वीरता के द्वारा, जो मार्स और बेल्लोना की सहायता से इतने बड़े युद्धों को शीघ्रता से समाप्त कर देती थी, यह युद्ध भी शीघ्र समाप्त हो जाता। इस कारण, जिन्होंने इतिहास पढ़ा है, वे स्मरण करें कि प्राचीन रोमियों ने कितने दीर्घकालीन युद्ध लड़े, जिनके विभिन्न परिणाम थे और जो शोकजनक संहार लाए, इस सामान्य सत्य के अनुसार कि पृथ्वी, आन्दोलित समुद्र की भांति, तूफानों के अधीन है—विभिन्न मात्राओं की ऐसी बुराइयों के तूफान,—और वे कभी-कभी उस बात को स्वीकार करें जिसे वे स्वीकार करना नहीं चाहते, और परमेश्वर के विरुद्ध पागलों की भांति बोलकर स्वयं को नष्ट न करें और अज्ञानियों को धोखा न दें।
23. उस युद्ध के विषय में जिसमें गोथों का राजा रेडागाइसस, जो दुष्ट आत्माओं का उपासक था, अपनी सारी विशाल सेनाओं के साथ एक ही दिन में पराजित हुआ
तौभी वे उस बात का धन्यवाद के साथ उल्लेख नहीं करते जो परमेश्वर ने अत्यंत हाल ही में, और हमारी अपनी स्मृति के भीतर, आश्चर्यजनक और दयापूर्वक किया है, परन्तु जितना उनसे हो सके, वे इसे, यदि सम्भव हो, सर्वथा विस्मृति में डालने का प्रयत्न करते हैं। परन्तु यदि हम इन बातों के विषय में मौन रहें, तो हम भी वैसे ही कृतघ्न होंगे। जब गोथों का राजा रेडागाइसस, नगर के अत्यंत निकट अपनी स्थिति बना कर, एक विशाल और भयानक सेना के साथ, रोमियों पर पहले से ही आ पड़ा था, तो वह एक ही दिन में इतनी शीघ्रता और इतनी पूर्णता से पराजित हुआ, कि, जब एक भी रोमी घायल नहीं हुआ, मारे जाने की तो बात ही क्या, उसकी सेना के एक लाख से भी बहुत अधिक लोग गिरा दिए गए, और वह स्वयं और उसके पुत्र, बन्दी बनाए जाकर, तुरन्त मार डाले गए, वह दण्ड भोगते हुए जिसके वे योग्य थे। क्योंकि यदि इतना भक्तिहीन मनुष्य, इतनी बड़ी और इतनी भक्तिहीन सेना के साथ, नगर में प्रवेश कर जाता, तो वह किसे बचाता? वह शहीदों की किन कब्रों का सम्मान करता? किस व्यक्ति के साथ अपने व्यवहार में वह परमेश्वर का भय दिखाता? किसका लहू बहाने से वह रुकता? किसकी पवित्रता को वह अखण्ड रखना चाहता? परन्तु वे अपने देवताओं की स्तुति में कितने ऊंचे स्वर में न बोलते! वे कितनी अपमानजनक डींग मारते, यह कहते हुए कि रेडागाइसस ने विजय पाई है, कि वह ऐसी बड़ी बातें कर सकने में सफल हुआ, क्योंकि उसने नित्य बलिदानों के द्वारा देवताओं को प्रसन्न और अपने पक्ष में कर लिया था—ऐसी बात जिसे मसीही धर्म ने रोमियों को करने की अनुमति नहीं दी! क्योंकि जब वह उन स्थानों की ओर बढ़ रहा था जहां वह परमप्रधान महामहिम के संकेत पर परास्त हुआ, जब उसका यश सब ओर बढ़ रहा था, तो हमें कार्थेज में यह बताया जा रहा था कि मूर्तिपूजक लोग विश्वास कर रहे थे, प्रचारित कर रहे थे, और डींग मार रहे थे, कि वह, अपने अनुकूल देवताओं की सहायता और संरक्षण के कारण, क्योंकि उन बलिदानों के कारण जो वह कथित रूप से उन्हें नित्य चढ़ाता था, निश्चय ही उन लोगों के द्वारा पराजित नहीं होगा जो रोमी देवताओं को ऐसे बलिदान नहीं चढ़ाते थे, और यहां तक कि किसी को भी उन्हें चढ़ाने की अनुमति नहीं देते थे। और अब ये दुर्भागी मनुष्य परमेश्वर की उस बड़ी दया के लिए धन्यवाद नहीं देते, जिसने, मनुष्यों की उस भ्रष्टता को ताड़ना देने का निश्चय करके, जो बर्बरों की भ्रष्टता से कहीं अधिक भारी ताड़ना के योग्य थी, अपने क्रोध को इतनी कोमलता से संयमित किया, कि पहले तो गोथों के राजा को एक आश्चर्यजनक ढंग से पराजित होने दिया, ऐसा न हो कि महिमा उन दुष्ट आत्माओं को मिले, जिनसे वह विनती करता जाना जाता था, और इस प्रकार दुर्बलों के मन उलट जाएं; और फिर, इसके पश्चात, यह होने दिया कि, जब रोम को लिया जाना था, तो वह उन बर्बरों के द्वारा लिया जाए, जिन्होंने, पूर्व के सारे युद्धों की किसी भी रीति के विरुद्ध, मसीही धर्म के प्रति श्रद्धा के कारण, उन्हें सुरक्षा दी जो पवित्र स्थानों में शरण के लिए भागे, और जो दुष्ट आत्माओं का, और भक्तिहीन बलिदानों की रीतियों का, इतना विरोध करते थे, कि वे मनुष्यों के साथ की तुलना में उनके साथ कहीं अधिक भयानक युद्ध लड़ते प्रतीत होते थे। इस प्रकार सच्चे प्रभु और वस्तुओं के शासक ने रोमियों को दयापूर्वक भी ताड़ना दी, और दुष्ट आत्माओं के उपासकों की आश्चर्यजनक पराजय के द्वारा यह भी दिखाया कि वे बलिदान वर्तमान वस्तुओं की सुरक्षा के लिए भी आवश्यक नहीं थे; ताकि, जो हठपूर्वक अड़े नहीं रहते, परन्तु बुद्धिमानी से इस बात पर विचार करते हैं, वे सच्चे धर्म को वर्तमान समय की आवश्यकताओं के कारण न त्यागें, वरन अनन्त जीवन की अत्यंत निश्चित आशा में उससे और भी अधिक चिपटे रहें।
24. मसीही सम्राटों का सुख क्या था, और वह कहां तक सच्चा सुख था
क्योंकि न तो हम यह कहते हैं कि कुछ मसीही सम्राट इस कारण सुखी थे कि उन्होंने दीर्घकाल तक राज्य किया, या शान्तिपूर्ण मृत्यु पाकर अपने पुत्रों को साम्राज्य में उत्तराधिकारी छोड़ा, या गणराज्य के शत्रुओं को दबाया, या अपने विरुद्ध उठनेवाले शत्रु नागरिकों के प्रयत्न से बचने और उसे दबाने दोनों में समर्थ हुए। इस शोकपूर्ण जीवन के इन और अन्य वरदानों या सुखों को कुछ दुष्ट आत्माओं के उपासकों ने भी पाने के योग्य ठहराया है, जो परमेश्वर के उस राज्य से सम्बन्धित नहीं हैं जिससे ये सम्बन्धित हैं; और इसका कारण परमेश्वर की दया में खोजा जाना चाहिए, जो नहीं चाहता कि जो उस पर विश्वास करते हैं वे ऐसी वस्तुओं को सर्वोच्च भलाई के रूप में चाहें। परन्तु हम कहते हैं कि वे सुखी हैं यदि वे न्यायपूर्वक राज्य करते हैं; यदि वे उन लोगों की प्रशंसा के बीच फूल नहीं उठते जो उन्हें उच्च सम्मान देते हैं, और उन लोगों की अत्यधिक विनम्रता से भरी सेवा के बीच भी नहीं, वरन स्मरण रखते हैं कि वे मनुष्य हैं; यदि वे अपनी सत्ता को उसकी महिमा की दासी बनाते हैं, उसे उसकी उपासना के अधिकतम विस्तार के लिए उपयोग करते हुए; यदि वे परमेश्वर का भय मानते, प्रेम करते, और उसकी उपासना करते हैं; यदि वे अपने राज्य से बढ़कर उस राज्य से प्रेम करते हैं जिसमें उन्हें सहभागी रखने से डर नहीं लगता; यदि वे दण्ड देने में धीमे, और क्षमा देने में तैयार हैं; यदि वे उस दण्ड को गणराज्य के शासन और सुरक्षा के लिए आवश्यक होने के कारण लगाते हैं, और अपने ही बैर को सन्तुष्ट करने के लिए नहीं; यदि वे क्षमा इस उद्देश्य से नहीं देते कि अधर्म दण्ड से बचे, वरन इस आशा से कि अपराधी अपने चालचलन को सुधार ले; यदि वे जो भी कठोरता आदेश देने के लिए बाध्य हुए हों, उसकी क्षतिपूर्ति दया की सहृदयता और उदारता की दानशीलता से करते हैं; यदि उनकी विलासिता उतनी ही संयमित है जितनी वह असंयमित हो सकती थी; यदि वे किसी भी जाति पर शासन करने के बजाय भ्रष्ट इच्छाओं पर शासन करना अधिक पसन्द करते हैं; और यदि वे यह सब कुछ खोखली महिमा की उत्कट लालसा से नहीं, वरन अनन्त सुख के प्रेम से करते हैं, अपने पापों के लिए सच्चे परमेश्वर को, जो उनका परमेश्वर है, दीनता, अनुताप, और प्रार्थना के बलिदान चढ़ाने में लापरवाही न करते हुए। ऐसे मसीही सम्राट, हम कहते हैं, वर्तमान समय में आशा के द्वारा सुखी हैं, और उस वास्तविकता के ही भोग में ऐसे होने के लिए ठहराए गए हैं, जब वह जिसकी हम प्रतीक्षा कर रहे हैं आ जाएगी।
25. उस समृद्धि के विषय में जो परमेश्वर ने मसीही सम्राट कॉन्स्टेंटाइन को दी
क्योंकि भले परमेश्वर ने, ऐसा न हो कि जो मनुष्य यह विश्वास करते हैं कि उसकी उपासना अनन्त जीवन को दृष्टि में रखकर करनी है, वे यह सोचें कि कोई भी इस सारी उच्च पदवी, और इस सांसारिक प्रभुत्व को प्राप्त नहीं कर सकता, यदि वह दुष्ट आत्माओं का उपासक न हो,—यह मानकर कि ये आत्माएं ऐसी बातों के विषय में बड़ी सामर्थ्य रखती हैं,—इस कारण उसने सम्राट कॉन्स्टेंटाइन को, जो दुष्ट आत्माओं का नहीं, वरन स्वयं सच्चे परमेश्वर का उपासक था, इतनी पूर्णता से सांसारिक वरदान दिए जितने की कोई इच्छा करने का साहस भी न करता। उसे उसने एक नगर की स्थापना का सम्मान भी दिया,[222] जो रोमी साम्राज्य का सहचर, और मानो रोम की ही पुत्री थी, परन्तु दुष्ट आत्माओं के किसी भी मन्दिर या मूर्ति के बिना। वह दीर्घकाल तक एकमात्र सम्राट के रूप में राज्य करता रहा, और बिना किसी सहायता के सारे रोमी जगत को धारण किए रखा और उसकी रक्षा की। युद्धों को चलाने और सम्पन्न करने में वह अत्यंत विजयी रहा; अत्याचारियों को गिराने में वह अत्यंत सफल रहा। वह बड़ी आयु में, रोग और बुढ़ापे से मरा, और अपने पुत्रों को साम्राज्य में उत्तराधिकारी छोड़ गया।[223] परन्तु फिर, ऐसा न हो कि कोई सम्राट कॉन्स्टेंटाइन के सुख को पाने के योग्य बनने के लिए मसीही बने, जबकि प्रत्येक व्यक्ति को अनन्त जीवन के लिए मसीही बनना चाहिए, परमेश्वर ने जोवियन को जूलियन से कहीं पहले ले लिया, और यह होने दिया कि ग्रेशियन एक अत्याचारी की तलवार से मार डाला जाए। परन्तु उसके मामले में इस विपत्ति का कहीं अधिक सांत्वना था, बजाय महान पॉम्पी के मामले के, क्योंकि उसका बदला केटो के द्वारा नहीं लिया जा सका, जिसे उसने मानो गृह-युद्ध का उत्तराधिकारी छोड़ा था। परन्तु ग्रेशियन का, यद्यपि भक्त मन ऐसी सांत्वनाओं की आवश्यकता नहीं रखते, बदला थियोडोसियस के द्वारा लिया गया, जिसे उसने साम्राज्य में अपने साथ सहयोगी बनाया था, यद्यपि उसका अपना एक छोटा भाई था, इस कारण कि वह विस्तृत सत्ता से अधिक एक विश्वासयोग्य संधि की इच्छा रखता था।
26. थियोडोसियस ऑगस्टस के विश्वास और भक्ति के विषय में
और इस कारण, थियोडोसियस ने न केवल ग्रेशियन के जीवनकाल में उसे वह निष्ठा बनाए रखी जो उसके योग्य थी, वरन उसकी मृत्यु के पश्चात भी, वह, एक सच्चे मसीही की भांति, अपने छोटे भाई वैलेंटिनियन को अपने संरक्षण में ले लिया, संयुक्त सम्राट के रूप में, जब उसे उसके पिता के हत्यारे मैक्सिमस के द्वारा निकाल दिया गया था। उसने उसकी रक्षा पैतृक स्नेह से की, यद्यपि वह उसे बिना किसी कठिनाई के हटा सकता था, क्योंकि वह सर्वथा साधनहीन था, यदि वह विस्तृत साम्राज्य की लालसा से प्रेरित होता, और उपकारी होने की महत्वाकांक्षा से नहीं। इस कारण उसे यह कहीं अधिक आनन्द था, कि जब उसने उस बालक को अपना लिया, और उसकी शाही पदवी को उसके लिए सुरक्षित रखा, तो उसे अपनी मानवता और दयालुता से ही सांत्वना दे। इसके पश्चात, जब उस सफलता के कारण मैक्सिमस भयावह बनता जा रहा था, थियोडोसियस, अपनी दुविधापूर्ण चिन्ताओं के बीच, किसी अपवित्र और अवैध जिज्ञासा के सुझावों की ओर नहीं खींचा गया, वरन योहन के पास भेजा, जिसका निवास मिस्र के मरुस्थल में था,—क्योंकि उसने यह जान लिया था कि परमेश्वर का यह सेवक (जिसका यश दूर-दूर तक फैल रहा था) भविष्यवाणी के वरदान से युक्त था,—और उससे उसे जय का आश्वासन मिला। तुरन्त अत्याचारी मैक्सिमस के हत्यारे ने, अत्यंत गहरी करुणा और सम्मान के भाव से, बालक वैलेंटिनियनुस को साम्राज्य में उसके उस भाग में फिर से स्थापित कर दिया जिससे उसे निकाला गया था। वैलेंटिनियनुस के, शीघ्र ही पश्चात, गुप्त हत्या के द्वारा, या किसी अन्य साजिश या दुर्घटना के द्वारा मारे जाने पर, थियोडोसियस ने, उस भविष्यद्वक्ता से फिर उत्तर पाकर, और उस पर पूरा भरोसा रखकर, अत्याचारी यूजीनियस के विरुद्ध चढ़ाई की, जो उस सम्राट के उत्तराधिकारी के रूप में अवैध रूप से चुना गया था, और उसकी अत्यंत सामर्थी सेना को, तलवार से अधिक प्रार्थना के द्वारा, पराजित किया। युद्ध में उपस्थित कुछ सैनिकों ने मुझे बताया कि जो भी हथियार वे फेंक रहे थे, वे सब एक तेज हवा के द्वारा उनके हाथों से छीन लिए गए, जो थियोडोसियस की सेना की दिशा से शत्रु पर बह रही थी; न ही उसने केवल उन तीरों को जो उनके विरुद्ध फेंके गए थे अधिक वेग से चलाया, वरन उन तीरों को भी, जो वे स्वयं फेंक रहे थे, उनके ही शरीरों पर लौटा दिया। और इस कारण कवि क्लॉडियन ने, यद्यपि वह मसीह के नाम से पराया था, तौभी उसकी स्तुति में यह कहा, “हे राजकुमार, परमेश्वर के द्वारा बहुत अधिक प्रिय, तेरे लिए एओलुस अपनी गुफाओं से सशस्त्र तूफान बहाता है; तेरे लिए वायु युद्ध करती है, और वायुएं एक स्वर से तेरे बिगुलों का पालन करती हैं।”[224] परन्तु विजेता ने, जैसा उसने विश्वास किया था और भविष्यवाणी की थी, जुपिटर की उन मूर्तियों को गिरा दिया, जिन्हें, मानो, न जाने किस प्रकार की रीतियों से उसके विरुद्ध पवित्र किया गया था, और आल्प्स में स्थापित किया गया था। और इन मूर्तियों की बिजलियां, जो सोने से बनी थीं, उसने हर्षपूर्वक और कृपापूर्वक अपने दूतों को भेंट कर दीं, जो (जैसा उस अवसर का हर्ष अनुमति देता था) हंसी में कह रहे थे कि वे ऐसी बिजलियों से मारे जाने में अत्यंत प्रसन्न होंगे। अपने ही शत्रुओं के पुत्रों को, जिनके पिता उसके आदेशों से नहीं वरन युद्ध की उग्रता से मारे गए थे, जो एक गिरजाघर में शरण के लिए भाग गए थे, यद्यपि वे अभी तक मसीही नहीं थे, वह उस अवसर का लाभ उठाकर मसीही धर्म की ओर लाने के लिए उत्सुक रहा, और उनके साथ मसीही प्रेम से व्यवहार किया। न ही उसने उन्हें उनकी सम्पत्ति से वंचित किया, वरन उन्हें उसे रखने देने के अतिरिक्त, उन्हें और सम्मान भी दिए। उसने युद्ध के पश्चात किसी भी मनुष्य के प्रति व्यवहार को निजी शत्रुताओं से प्रभावित नहीं होने दिया। वह सिन्ना, और मारियुस, और सुल्ला, और ऐसे अन्य पुरुषों की भांति नहीं था, जो गृह-युद्धों को समाप्त होने पर भी समाप्त नहीं करना चाहते थे, वरन इसका शोक अधिक करते थे कि वे उठे ही क्यों, बजाय इसके कि वे यह चाहते कि जब वे समाप्त हो जाएं, तो किसी को हानि न पहुंचे। इन सारी घटनाओं के बीच, अपने राज्य के आरम्भ से ही, उसने अत्यंत न्यायपूर्ण और दयापूर्ण नियमों के द्वारा भक्तिहीनों के विरुद्ध विपत्तिग्रस्त कलीसिया की सहायता करना बन्द नहीं किया, जिसे विधर्मी वैलेंस ने, एरियनों का पक्ष लेते हुए, अत्यंत उग्रता से सताया था। सचमुच, उसे इस कलीसिया का सदस्य होना पृथ्वी पर राजा होने से भी अधिक आनन्द देता था। अन्यजातियों की मूर्तियों को उसने सब जगह गिराने का आदेश दिया, यह भली-भांति समझते हुए कि सांसारिक वरदान भी दुष्ट आत्माओं के हाथ में नहीं, वरन सच्चे परमेश्वर के हाथ में रखे गए हैं। और उसकी धार्मिक दीनता से अधिक आश्चर्यजनक क्या हो सकता था, जब, अपने कुछ निकट सहयोगियों की आवश्यकता से बाध्य होकर, उसने थिस्सलुनीकियों के गम्भीर अपराध का बदला लिया, जिसे बिशपों की प्रार्थना पर उसने क्षमा करने का वचन दिया था, और, कलीसिया के अनुशासन के अधीन होकर, इस प्रकार प्रायश्चित किया कि उसकी शाही महानता को गिरा हुआ देखकर, उसके लिए मध्यस्थता करनेवाले लोग उससे भी अधिक रो पड़े, जितना अपराध की चेतना ने उन्हें उसके क्रोधित होने पर डराया था? ये और इसी प्रकार के अन्य भले काम, जिन्हें बताने में बहुत समय लगेगा, वह इस कालिक जगत से अपने साथ ले गया, जहां मानवीय महानता और श्रेष्ठता की सबसे बड़ी बातें भी मात्र वाष्प हैं। इन कामों का प्रतिफल अनन्त सुख है, जिसका दाता परमेश्वर है, यद्यपि केवल उन्हीं को जो सच्चे मन से भक्त हैं। परन्तु इस जीवन के अन्य सारे आशीष और विशेषाधिकार, जैसे संसार स्वयं, प्रकाश, वायु, पृथ्वी, जल, फल, और मनुष्य का प्राण स्वयं, उसकी देह, इन्द्रियां, मन, जीवन, वह भले और बुरे दोनों पर उदारता से बहाता है। और इन आशीषों में साम्राज्य का अधिकार भी गिना जाना है, जिसकी सीमा वह विभिन्न समयों में अपने विधान की आवश्यकताओं के अनुसार नियंत्रित करता है। इस कारण, मैं देखता हूं, कि अब हमें उन लोगों को उत्तर देना है, जो, अत्यंत स्पष्ट प्रमाणों के द्वारा खण्डित और सिद्ध किए जाकर, जिनसे यह दिखाया गया है कि इन सांसारिक वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए, जिन्हें मूढ़ लोग ही चाहते हैं, झूठे देवताओं की वह भीड़ किसी काम की नहीं है, यह दावा करने का प्रयत्न करते हैं कि देवताओं की उपासना वर्तमान जीवन के हित को नहीं, वरन मृत्यु के पश्चात आनेवाले जीवन के हित को दृष्टि में रखकर करनी है। क्योंकि जो लोग इस संसार की मित्रता के लिए व्यर्थ वस्तुओं की उपासना करने को तैयार हैं, और इस बात का शोक नहीं करते कि वे अपनी बालसुलभ समझ पर छोड़ दिए गए हैं, मुझे लगता है कि उन्हें इन पांच पुस्तकों में पर्याप्त उत्तर दिया जा चुका है; जिनमें से, जब मैंने पहली तीन प्रकाशित की थीं, और वे बहुतों के हाथों में पहुंचने लगी थीं, तो मैंने सुना कि कुछ लोग उनके विरुद्ध किसी न किसी प्रकार का लिखित उत्तर तैयार कर रहे हैं। तब मुझे बताया गया कि वे अपना उत्तर पहले ही लिख चुके हैं, परन्तु ऐसे समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब वे उसे बिना किसी खतरे के प्रकाशित कर सकें। ऐसे व्यक्तियों को मैं सलाह दूंगा कि वे उस बात की इच्छा न करें जो उनके लिए किसी लाभ की नहीं हो सकती; क्योंकि मनुष्य के लिए यह मान लेना बहुत आसान है कि उसने तर्कों का उत्तर दे दिया है, जबकि वह केवल मौन रहने से अनिच्छुक रहा है। क्योंकि व्यर्थता से अधिक वाचाल और क्या है? और यद्यपि वह, यदि चाहे, सत्य से भी अधिक ऊंचे स्वर में चिल्ला सकती है, तौभी वह इस सबके होते हुए भी सत्य से अधिक सामर्थी नहीं है। परन्तु मनुष्य उन सारी बातों पर, जो हमने कही हैं, ध्यान से विचार करें, और यदि, संयोगवश, बिना किसी पक्षपात के निर्णय करते हुए, वे स्पष्ट रूप से यह समझ लें कि ये ऐसी बातें हैं जिन्हें उनकी अत्यंत निर्लज्ज बकवास, और, मानो, व्यंग्यात्मक और नकलची तुच्छता के द्वारा उखाड़ा नहीं जा सकता, वरन केवल हिलाया जा सकता है, तो वे अपनी मूढ़ताओं पर संयम रखें, और मूढ़ों के द्वारा सराहे जाने के बजाय बुद्धिमानों के द्वारा सुधारे जाने को अधिक पसन्द करें। क्योंकि यदि वे सत्य बोलने की स्वतंत्रता के लिए नहीं, वरन गाली देने के अधिकार के लिए अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो क्या उनके साथ वही न हो जो सिसरो किसी के विषय में कहता है, “हे दुर्भागी मनुष्य! जो पाप करने के लिए स्वतंत्र था?”[225] इस कारण, जो कोई भी गाली देने के अधिकार के कारण अपने को सुखी समझता है, वह कहीं अधिक सुखी होता यदि वह उसे बिलकुल भी न मिला होता; क्योंकि वह इस बीच, खोखली डींग को त्यागकर, उन लोगों का, जिनके विचारों का वह विरोधी है, स्वतंत्र सलाह-मशवरे के द्वारा खण्डन कर सकता, और, जैसा उसे शोभा देता है, आदरपूर्वक, गम्भीरता से, निष्कपटता से, उन सब बातों को सुन सकता जो उन लोगों के द्वारा प्रस्तुत की जा सकती हैं जिनसे वह मित्रतापूर्ण विवाद के द्वारा सलाह लेता है।
टिप्पणियाँ
- [185] यह तथ्य हिप्पोक्रेट्स या सिसरो के किसी भी उपलब्ध ग्रंथ में दर्ज नहीं है। वीव्स का अनुमान है कि यह सिसरो की पुस्तक De Fato में मिल सकता है।
- [186] अर्थात कुम्हार।
- [187] Epist. 107.
- [188] Odyssey, xviii. 136, 137.
- [189] De Divinat. ii.
- [190] भजन संहिता 14:1
- [191] पुस्तक 3।
- [192] भजन संहिता 62:11-12।
- [193] Sallust, Cat. vii.
- [194] ऑगस्टीन बताते हैं कि 'consul' नाम consulere से लिया गया है, और इस प्रकार यह rex (regere से) या dominus (dominari से) के शासन से कहीं अधिक कोमल शासन को दर्शाता है।
- [195] Æneid, viii. 646.
- [196] Æneid, i. 279.
- [197] Ibid. vi. 847.
- [198] Sallust, in Cat. c. xi.
- [199] Sallust, in Cat. c. 54.
- [200] 2 कुरिन्थियों 1:12.
- [201] गलातियों 6:4.
- [202] Sallust, in Cat. c. 52.
- [203] Horace, Epist. i. 1. 36, 37.
- [204] Hor. Carm. ii. 2.
- [205] Tusc. Quæst. i. 2.
- [206] यूहन्ना 5:44.
- [207] यूहन्ना 12:43.
- [208] मत्ती 10:33.
- [209] मत्ती 6:1.
- [210] मत्ती 5:16.
- [211] मत्ती 6:2.
- [212] Jactantia.
- [213] Æneid, vi. 820.
- [214] मत्ती 10:28.
- [215] मत्ती 8:22.
- [216] प्रेरितों के काम 2:45.
- [217] रोमियों 8:18.
- [218] नीतिवचन 8:15.
- [219] Æneid, vii. 266.
- [220] अय्यूब 34:30.
- [221] थ्रेसीमीन सरोवर और कान्नै के विषय में।
- [222] कॉन्स्टेंटिनोपल।
- [223] कॉन्स्टेंटियुस, कॉन्स्टेंटाइन, और कॉन्स्तांस।
- [224] Panegyr. de tertio Honorii consulatu.
- [225] Tusc. Quaest. v. 19.
