पुस्तक XIV (22 में से) · 28 अध्याय

पुस्तक XIV

दो प्रेम जो दो नगरों का निर्माण करते हैं। अनुवादक: रेवरेंड मार्कस डॉड्स, एम.ए.

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    ऑगस्टीन एक बार फिर प्रथम मनुष्य के पाप की चर्चा करते हैं, और सिखाते हैं कि वही मनुष्य के देहिक जीवन और उसकी दुष्ट अभिलाषाओं का कारण है। विशेष रूप से वे यह सिद्ध करते हैं कि वासना के साथ आनेवाली लज्जा उस अनाज्ञाकारिता का उचित दण्ड है, और यह जाँचते हैं कि यदि मनुष्य पाप न करता, तो वह वासना के बिना अपनी संतति को कैसे बढ़ा सकता था।

    1. कि प्रथम मनुष्य की अनाज्ञाकारिता सब मनुष्यों को दूसरी मृत्यु के अनंत दुःख में डाल देती, यदि परमेश्वर के अनुग्रह ने बहुतों को न बचाया होता

    हम पूर्ववर्ती पुस्तकों में पहले ही कह चुके हैं कि परमेश्वर, यह चाहते हुए कि मानव जाति न केवल अपनी प्रकृति की समानता के कारण एक दूसरे के साथ संगति कर सके, वरन यह भी कि वे नातेदारी के बंधनों से मेल और शांति में एक साथ बंधे रहें, यह उचित समझा कि सब मनुष्यों को एक ही व्यक्ति से उत्पन्न करे, और मनुष्य को ऐसी प्रकृति देकर बनाए कि जाति के सदस्य मरते ही न, यदि वे दो प्रथम व्यक्ति (जिनमें से एक शून्य में से बनाया गया, और दूसरा उससे) अपनी अनाज्ञाकारिता के द्वारा इसके योग्य न बन गए होते; क्योंकि उन्होंने इतना बड़ा पाप किया कि उससे मानव प्रकृति बिगड़ गई, और यह अपनी संतति को भी हस्तांतरित हुई, जो पाप के अधीन और मृत्यु के वश में है। और मृत्यु का राज्य मनुष्यों पर इस प्रकार शासन करता रहा कि पाप का उचित दण्ड सबको सिर के बल दूसरी मृत्यु में, जिसका कोई अंत नहीं, गिरा देता, यदि परमेश्वर के अयोग्य अनुग्रह ने कुछ लोगों को उससे न बचाया होता। और इस प्रकार यह हुआ है कि यद्यपि पृथ्वी भर में बहुत ही अधिक और बड़ी-बड़ी जातियाँ हैं, जिनके रीति-रिवाज, बोली, शस्त्र और वस्त्र स्पष्ट भेदों से अलग-अलग हैं, तौभी मानव समाज के केवल दो ही प्रकार हैं, जिन्हें हम अपने पवित्रशास्त्र की भाषा के अनुसार उचित रूप से दो नगर कह सकते हैं। एक में वे लोग सम्मिलित हैं जो देह के अनुसार जीवन जीना चाहते हैं, और दूसरे में वे जो आत्मा के अनुसार जीवन जीना चाहते हैं; और जब वे अपनी-अपनी इच्छा को पूरा करते हैं, तो वे अपनी-अपनी जाति के अनुसार शांति में रहते हैं।

    2. देहिक जीवन के विषय में, जिसे न केवल शारीरिक भोग-विलास में जीने के रूप में, वरन भीतरी मनुष्य के दोषों में जीने के रूप में भी समझा जाना चाहिए

    पहले हमें यह देखना होगा कि देह के अनुसार जीवन जीना क्या है, और आत्मा के अनुसार जीवन जीना क्या है। क्योंकि जो कोई पवित्रशास्त्र की भाषा का न तो स्मरण रखता है और न ही पर्याप्त रूप से विचार करता है, वह हमारी उक्त बात पहली बार सुनकर यह समझ सकता है कि एपीक्यूरियन दार्शनिक देह के अनुसार जीवन जीते हैं, क्योंकि वे मनुष्य का सर्वोच्च भला शारीरिक सुख में रखते हैं; और वे भी ऐसा ही करते हैं जिनका यह विचार रहा है कि किसी न किसी रूप में शारीरिक भला ही मनुष्य का परम भला है; और सामान्य जन भी, जो इस विषय पर कोई सिद्धांत या दर्शन बनाए बिना वासना की ओर इतने प्रवृत्त हैं कि वे शारीरिक अनुभूतियों से प्राप्त सुख के अतिरिक्त किसी और सुख में आनंद नहीं ले सकते: और वह यह भी समझ सकता है कि स्टोइक दार्शनिक, जो मनुष्य का परम भला प्राण में रखते हैं, आत्मा के अनुसार जीवन जीते हैं; क्योंकि मनुष्य का प्राण आत्मा ही तो है? परन्तु पवित्रशास्त्र के अर्थ में दोनों ही देह के अनुसार जीवन जीनेवाले सिद्ध होते हैं। क्योंकि "देह" शब्द से इसका अर्थ केवल पार्थिव और नाशवान प्राणी की देह से नहीं है, जैसा वह कहता है, "सब देह एक ही प्रकार की नहीं; एक देह मनुष्यों की है, दूसरी पशुओं की, दूसरी मछलियों की, और दूसरी पक्षियों की,"[2] वरन यह शब्द और भी बहुत से अर्थों में प्रयोग होता है; और इन विविध प्रयोगों में से एक सामान्य प्रयोग यह है कि "देह" शब्द स्वयं मनुष्य के लिए प्रयोग किया जाए, जिसमें मनुष्य की प्रकृति के अंश को पूर्ण के लिए लिया जाता है, जैसा इन शब्दों में है, "व्यवस्था के कामों से कोई देह धर्मी न ठहरेगा;"[3] क्योंकि यहाँ "कोई देह नहीं" कहने से उसका अर्थ "कोई मनुष्य नहीं" के अतिरिक्त और क्या हो सकता है? और वास्तव में वह इसके कुछ ही बाद इसे और भी स्पष्ट रूप से कहता है: "व्यवस्था से कोई मनुष्य धर्मी न ठहरेगा;"[4] और गलातियों को लिखी पत्री में, "यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से धर्मी नहीं ठहरता।" और इसी प्रकार हम इन शब्दों को समझते हैं, "और वचन देह बन गया,"[5]—अर्थात मनुष्य बन गया, जिसे कुछ लोगों ने इसके सही अर्थ में न लेकर यह समझ लिया कि मसीह में मानवीय प्राण नहीं था।[6] क्योंकि जैसे सुसमाचार में मरियम मगदलिनी के इन शब्दों में पूर्ण के स्थान पर पूर्ण ही प्रयोग हुआ है, "वे मेरे प्रभु को उठा ले गए हैं, और मैं नहीं जानती कि उन्होंने उन्हें कहाँ रखा है,"[7] जिससे उसका अर्थ केवल मसीह की देह से था, जिसे उसने समझा था कि उस कब्र से निकाल ली गई है जिसमें उसे रखा गया था, वैसे ही अंश पूर्ण के लिए प्रयोग होता है, जब "देह" नाम लिया जाता है परन्तु संकेत मनुष्य की ओर होता है, जैसा ऊपर उद्धृत वचनों में है।

    तब से पवित्रशास्त्र "देह" शब्द का प्रयोग इतने प्रकारों में करता है, जिन्हें एकत्रित करने और जाँचने का समय नहीं है, इसलिए यदि हमें यह जानना है कि देह के अनुसार जीवन जीना क्या है (जो निश्चय ही बुरा है, यद्यपि देह की प्रकृति स्वयं बुरी नहीं है), तो हमें प्रेरित पॉल की उस पत्री के उस अंश की सावधानी से जाँच करनी होगी जो उन्होंने गलातियों को लिखी, जिसमें वे कहते हैं, "अब देह के काम तो प्रगट हैं, अर्थात व्यभिचार, अशुद्धता, कामुकता, मूर्तिपूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, फूट, विरोध, विधर्म, डाह, हत्या, पियक्कड़पन, लीलाक्रीड़ा, और इनके समान और काम; इनके विषय में मैं तुम्हें पहले ही चेतावनी देता हूँ, जैसा कि मैंने पहले भी कहा था, कि जो ऐसे-ऐसे काम करते हैं, वे परमेश्वर के राज्य के अधिकारी न होंगे।"[8] प्रेरितिक पत्री का यह सम्पूर्ण अंश, जहाँ तक यह विचाराधीन विषय से संबंधित है, इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए पर्याप्त होगा कि देह के अनुसार जीवन जीना क्या है। क्योंकि देह के जिन कामों को उन्होंने प्रगट और दण्ड के योग्य कहा, उनमें हम केवल वे ही नहीं पाते जो देह के सुख से संबंधित हैं, जैसे व्यभिचार, अशुद्धता, कामुकता, पियक्कड़पन, लीलाक्रीड़ा, वरन वे भी जो, यद्यपि देह के सुख से दूर हैं, प्राण के दोषों को प्रगट करते हैं। क्योंकि कौन नहीं देखता कि मूर्तिपूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध, विधर्म, डाह प्राण के ही दोष हैं, देह के नहीं? क्योंकि यह पूर्णतः संभव है कि कोई मनुष्य मूर्तिपूजा या किसी विधर्मी भूल के कारण देह के सुखों से दूर रहे; और तौभी, जब वह ऐसा करता है, तो इस प्रेरितिक अधिकार के अनुसार वह देह के अनुसार जीवन जीता हुआ ही प्रमाणित होता है; और देह के सुख से दूर रहते हुए भी वह देह के दण्डनीय कामों का अभ्यास करता हुआ प्रमाणित होता है। जिसमें शत्रुता है, वह उसे अपने प्राण में नहीं रखता क्या? या कौन अपने शत्रु से, या जिसे वह अपना शत्रु समझता है, यह कहेगा, तेरी देह मेरे विरुद्ध बुरी है, और यह नहीं कि तेरा प्राण मेरे विरुद्ध बुरा है? संक्षेप में, यदि कोई उन बातों को सुने जिन्हें मैं "देहिकताएँ" कह सकता हूँ, तो वह उन्हें मनुष्य के देहिक अंश से जोड़ने में नहीं चूकेगा; इसलिए किसी को इसमें संदेह नहीं कि "शत्रुताएँ" मनुष्य के प्राण से संबंधित हैं। तो फिर विश्वास और सत्य में अन्यजातियों के गुरु इन सब और इसी प्रकार की बातों को देह के काम क्यों कहते हैं, यदि इसलिए नहीं कि उस वाक्-शैली के द्वारा जिसमें अंश पूर्ण के लिए प्रयोग होता है, वे चाहते हैं कि हम "देह" शब्द से स्वयं मनुष्य को समझें?

    3. कि पाप का कारण देह नहीं, वरन प्राण है, और पाप से प्राप्त भ्रष्टता पाप नहीं, वरन पाप का दण्ड है

    परन्तु यदि कोई कहे कि देह ही सब दोषों और बुरे आचरण का कारण है, क्योंकि प्राण केवल इसलिए बुराई से जीता है कि वह देह के द्वारा प्रेरित होता है, तो निश्चय ही उसने मनुष्य की सम्पूर्ण प्रकृति पर सावधानी से विचार नहीं किया। क्योंकि "नाशवान देह प्राण को दबा देती है।"[9] इसीलिए प्रेरित भी, इस नाशवान देह की चर्चा करते हुए, जिसके विषय में उन्होंने कुछ पहले कहा था, "यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्य नाश होता जाता है,"[10] कहते हैं, "हम जानते हैं कि यदि हमारे इस तम्बू का पार्थिव घर गिर जाए, तो हमारे पास परमेश्वर की बनाई हुई एक और इमारत है, अर्थात स्वर्ग में एक अनन्त घर जो हाथों से नहीं बनाया गया। क्योंकि हम इस में कुड़कुड़ाते हैं, और अपने उस घर को जो स्वर्ग से है, पहिनने की उत्कण्ठा से बाट जोहते हैं: यदि हम पहिने हुए, नंगे न ठहरें। क्योंकि हम जो इस तम्बू में हैं, भारी बोझ के मारे कुड़कुड़ाते हैं: इस कारण नहीं कि हम उतारा जाना चाहते हैं, वरन यह चाहते हैं कि उसके ऊपर एक और वस्त्र पहिनाया जाए, कि नाशवानता जीवन में समा जाए।"[11] हम तो इस नाशवान देह से भारी दबे हुए हैं; परन्तु यह जानते हुए कि इस भारीपन का कारण देह की प्रकृति और तत्व नहीं, वरन इसकी भ्रष्टता है, हम यह नहीं चाहते कि देह से रहित हो जाएँ, वरन यह चाहते हैं कि इसकी अमरता से आवृत हो जाएँ। क्योंकि तब भी एक देह होगी, परन्तु वह फिर बोझ नहीं रहेगी, क्योंकि वह फिर नाशवान न रहेगी। अभी तो, "नाशवान देह प्राण को दबा देती है, और पार्थिव तम्बू उस मन को भारी कर देता है जो बहुत सी बातों पर सोचता-विचारता है," तौभी वे भूल में हैं जो यह समझते हैं कि प्राण की सब बुराइयाँ देह से ही उत्पन्न होती हैं।

    वर्जिल, वास्तव में, प्लेटो के विचारों को उन सुन्दर पंक्तियों में व्यक्त करते प्रतीत होते हैं, जहाँ वे कहते हैं,—

    "एक अग्निमय शक्ति उनके जीवन को प्रेरित करती है, एक सत्तत्व जो स्वर्ग से उतरा है, यद्यपि वह मिट्टी के अंगों से आंशिक रूप से अवरुद्ध है, और क्षय के मंद 'वस्त्र' से।"[12]

    परन्तु यद्यपि वे आगे मन के चार सबसे सामान्य भावों—इच्छा, भय, आनन्द, शोक—का उल्लेख यह दिखाने के उद्देश्य से करते हैं कि देह ही सब पापों और दोषों का मूल है, यह कहते हुए,—

    "इससे उत्पन्न होती हैं उग्र अभिलाषाएँ और रेंगते हुए भय, और मानवीय हास्य, मानवीय आँसू, बंदीगृह-सी अंधकार में बंद होकर, वे बाहर की ओर देखती हैं, परन्तु कोई ज्योति नहीं देखतीं,"[13]

    तौभी हम इससे बिलकुल भिन्न विश्वास करते हैं। क्योंकि देह की भ्रष्टता, जो प्राण को दबाती है, प्रथम पाप का कारण नहीं, वरन उसका दण्ड है; और यह नाशवान देह नहीं थी जिसने प्राण को पापी बनाया, वरन पापी प्राण ही था जिसने देह को नाशवान बनाया। और यद्यपि देह की इस भ्रष्टता से दोष की कुछ प्रेरणाएँ और वस्तुतः वासनामय इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं, तौभी हमें दुष्ट जीवन के सब दोष देह पर नहीं लगाने चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि हम इसके द्वारा शैतान को इन सबसे निर्दोष ठहरा दें, क्योंकि उसके पास देह नहीं है। क्योंकि यद्यपि हम शैतान को व्यभिचारी या पियक्कड़ नहीं कह सकते, न ही उसमें किसी वैषयिक भोग का दोष लगा सकते हैं (यद्यपि वह इस प्रकार पाप करनेवालों का गुप्त उत्तेजक और प्रेरक है), तौभी वह अत्यंत अभिमानी और ईर्ष्यालु है। और इस दुष्टता ने उसे इस प्रकार पकड़ रखा है कि इसी के कारण वह अंधकार की बेड़ियों में अनन्त दण्ड के लिए रखा गया है।[14] अब ये दोष, जो शैतान पर प्रभुत्व रखते हैं, प्रेरित देह पर लगाते हैं, जो निश्चय ही शैतान के पास नहीं है। क्योंकि वे कहते हैं, "बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, विरोध, डाह" देह के काम हैं; और इन सब बुराइयों में अभिमान ही मूल और शीर्ष है, और वह शैतान में शासन करता है, यद्यपि उसके पास देह नहीं है। क्योंकि कौन संतों से अधिक बैर रखता है? कौन उनसे अधिक विरोध रखता है? कौन अधिक ईर्ष्यालु, कटु और डाह करनेवाला है? और जब वह ये सब काम प्रगट करता है, यद्यपि उसके पास देह नहीं है, तो वे देह के काम कैसे हैं, यदि इसलिए नहीं कि वे मनुष्य के काम हैं, जिसे, जैसा मैंने कहा, "देह" नाम से पुकारा जाता है? क्योंकि मनुष्य शैतान के समान इसलिए नहीं बना कि उसके पास देह है, जो शैतान के पास नहीं है, वरन इसलिए कि वह अपने अनुसार—अर्थात मनुष्य के अनुसार—जीवन जीता है। क्योंकि शैतान भी अपने अनुसार जीवन जीना चाहता था जब वह सत्य में स्थिर नहीं रहा; इसलिए जब उसने झूठ बोला, तो यह परमेश्वर की ओर से नहीं, वरन स्वयं उसकी ओर से था, जो न केवल झूठा है, वरन झूठ का पिता भी है, क्योंकि वही पहला था जिसने झूठ बोला, और जो पाप के समान झूठ का भी उत्पत्तिकर्ता है।

    4. मनुष्य के अनुसार जीवन जीना क्या है, और परमेश्वर के अनुसार जीवन जीना क्या है

    इसलिए जब मनुष्य मनुष्य के अनुसार जीवन जीता है, परमेश्वर के अनुसार नहीं, तो वह शैतान के समान होता है। क्योंकि कोई स्वर्गदूत भी स्वर्गदूत के अनुसार नहीं जी सकता था, वरन केवल परमेश्वर के अनुसार ही, यदि उसे सत्य में स्थिर रहना था, और परमेश्वर का सत्य बोलना था, अपना झूठ नहीं। और मनुष्य के विषय में भी वही प्रेरित एक अन्य स्थान पर कहते हैं, "यदि मेरे झूठ के द्वारा परमेश्वर का सत्य और भी अधिक प्रगट हुआ;"[15]—"मेरा झूठ," उन्होंने कहा, और "परमेश्वर का सत्य।" इसलिए जब मनुष्य सत्य के अनुसार जीवन जीता है, तो वह अपने अनुसार नहीं, वरन परमेश्वर के अनुसार जीवन जीता है; क्योंकि वह परमेश्वर ही था जिसने कहा, "मैं सत्य हूँ।"[16] इसलिए जब मनुष्य अपने अनुसार—अर्थात मनुष्य के अनुसार, परमेश्वर के अनुसार नहीं—जीवन जीता है, तो निश्चय ही वह झूठ के अनुसार जीवन जीता है; यह नहीं कि मनुष्य स्वयं झूठ है, क्योंकि परमेश्वर उसका रचनेवाला और सृष्टिकर्ता है, जो निश्चय ही झूठ का रचनेवाला और सृष्टिकर्ता नहीं है, वरन इसलिए कि मनुष्य सीधा बनाया गया था, कि वह अपने अनुसार न जिए, वरन उसके अनुसार जिए जिसने उसे बनाया,—दूसरे शब्दों में, कि वह उसकी इच्छा पूरी करे, अपनी नहीं; और जैसा वह बनाया गया था वैसा न जीना, यही झूठ है। क्योंकि वह निश्चय ही धन्य होना चाहता है, फिर भी इस प्रकार नहीं जीना चाहता कि वह धन्य हो सके। और यदि यह इच्छा झूठ नहीं तो झूठ क्या है? इसलिए यह बिना अर्थ के नहीं कहा गया कि सब पाप झूठ है। क्योंकि कोई भी पाप उस इच्छा या इच्छाशक्ति के अतिरिक्त नहीं किया जाता जिससे हम चाहते हैं कि हमारे साथ भला हो, और यह चाहने से बचते हैं कि हमारे साथ बुरा हो। इसलिए वह झूठ है जो हम इसलिए करते हैं कि हमारे साथ भला हो, परन्तु जो हमें पहले से भी अधिक दुखी बना देता है। और यह क्यों है, यदि इसलिए नहीं कि मनुष्य के सुख का स्रोत केवल परमेश्वर में है, जिसे वह पाप करते समय त्याग देता है, और अपने में नहीं, जिसके अनुसार जीवन जीते हुए वह पाप करता है?

    इसलिए जब हम अपने इस कथन को कहते हैं, कि कुछ लोग देह के अनुसार जीवन जीते हैं और कुछ आत्मा के अनुसार, इसी कारण दो भिन्न-भिन्न और परस्पर विरोधी नगर उत्पन्न हुए हैं, तो हम समान रूप से यह भी कह सकते थे, "क्योंकि कुछ लोग मनुष्य के अनुसार जीवन जीते हैं, कुछ परमेश्वर के अनुसार।" क्योंकि पॉल कुरिन्थियों से बहुत स्पष्ट रूप से कहते हैं, "क्योंकि जब तुम में डाह और झगड़ा है, तो क्या तुम देहिक नहीं हो, और मनुष्य के अनुसार नहीं चलते?"[17] इसलिए मनुष्य के अनुसार चलना और देहिक होना एक ही बात है; क्योंकि देह से, अर्थात मनुष्य के एक अंश से, मनुष्य ही अभिप्रेत है। क्योंकि इससे पहले उन्होंने कहा था कि वही लोग प्राणिक थे जिन्हें उन्होंने बाद में देहिक कहा, यह कहते हुए, "क्योंकि मनुष्यों में से कौन किसी मनुष्य की बातें जानता है, केवल उस मनुष्य की आत्मा के सिवाय जो उस में है? वैसे ही परमेश्वर की बातें कोई नहीं जानता, केवल परमेश्वर की आत्मा के सिवाय। अब हमें इस जगत की आत्मा नहीं, वरन वह आत्मा मिली है जो परमेश्वर की ओर से है; कि हम उन बातों को जान सकें जो परमेश्वर की ओर से हमें सेंत-मेंत मिली हैं। जिन्हें हम उन शब्दों में नहीं कहते जो मनुष्य के ज्ञान से सिखाए जाते हैं, वरन जो पवित्र आत्मा सिखाता है; आत्मिक बातों की आत्मिक बातों से तुलना करते हुए। परन्तु प्राणिक मनुष्य परमेश्वर की आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता; क्योंकि वे उसके लिए मूर्खता हैं।"[18] इसलिए इसी प्रकार के मनुष्यों से, अर्थात प्राणिक मनुष्यों से, वे कुछ ही समय बाद कहते हैं, "और मैं, भाइयो, तुम से आत्मिकों के समान नहीं, वरन देहिकों के समान बोल सका।"[19] और इसे भी उसी प्रयोग के अनुसार समझना चाहिए, जिसमें अंश पूर्ण के लिए लिया जाता है। क्योंकि प्राण और देह दोनों, जो मनुष्य के अंग हैं, संपूर्ण मनुष्य को दर्शाने के लिए प्रयोग किए जा सकते हैं; इसलिए प्राणिक मनुष्य और देहिक मनुष्य दो भिन्न बातें नहीं, वरन एक ही बात है, अर्थात मनुष्य जो मनुष्य के अनुसार जीवन जीता है। इसी प्रकार इन शब्दों में मनुष्यों के अतिरिक्त और कुछ अभिप्रेत नहीं है, "व्यवस्था के कामों से कोई देह धर्मी न ठहरेगा;"[20] या इन शब्दों में, "याकूब के साथ पचहत्तर प्राण मिस्र में गए।"[21] एक स्थान पर, "कोई देह नहीं" का अर्थ "कोई मनुष्य नहीं" है; और दूसरे में, "पचहत्तर प्राण" से पचहत्तर मनुष्य अभिप्रेत हैं। और "न उन शब्दों में जो मनुष्य का ज्ञान सिखाता है" यह वाक्य समान रूप से "न उन शब्दों में जो देह का ज्ञान सिखाता है" भी हो सकता था; और "तुम मनुष्य के अनुसार चलते हो" यह वाक्य "देह के अनुसार" भी हो सकता था। और यह इन शब्दों में और भी स्पष्ट हो जाता है जो इसके बाद आए: "क्योंकि जब कोई कहता है, मैं पॉल का हूँ, और दूसरा, मैं अपुल्लोस का हूँ, तो क्या तुम मनुष्य नहीं?" जिस बात को उन्होंने पहले "तुम प्राणिक हो," "तुम देहिक हो" कहकर व्यक्त किया था, उसी को वे अब "तुम मनुष्य हो" कहकर व्यक्त करते हैं; अर्थात तुम मनुष्य के अनुसार जीवन जीते हो, परमेश्वर के अनुसार नहीं, क्योंकि यदि तुम उसके अनुसार जीवन जीते, तो तुम परमेश्वर होते।

    5. कि देह और प्राण की प्रकृति के विषय में प्लेटोवादियों का मत मानीवादियों के मत जितना निंदनीय नहीं है, तौभी यह भी आपत्तिजनक है, क्योंकि यह दोषों की उत्पत्ति देह की प्रकृति पर लगाता है

    इसलिए यह आवश्यक नहीं कि हम अपने पापों और दोषों में देह की प्रकृति पर सृष्टिकर्ता की हानि के लिए दोष लगाएँ, क्योंकि अपनी जाति और मात्रा में देह अच्छी है; परन्तु सृष्टिकर्ता रूपी भले को त्यागकर सृजित भले के अनुसार जीवन जीना अच्छा नहीं है, चाहे मनुष्य देह के अनुसार जीवन जीना चुने, या प्राण के अनुसार, या सम्पूर्ण मानव प्रकृति के अनुसार, जो देह और प्राण से मिलकर बनी है, और जिसे इसलिए या तो "देह" के नाम से, या केवल "प्राण" के नाम से पुकारा जाता है। क्योंकि जो प्राण की प्रकृति को प्रमुख भले के रूप में सराहता है, और देह की प्रकृति की निन्दा इस प्रकार करता है जैसे वह बुरी हो, वह निश्चय ही प्राण के प्रेम में और देह के द्वेष में देहिक ही है; क्योंकि उसके ये भाव मानवीय कल्पना से उत्पन्न होते हैं, परमेश्वर के सत्य से नहीं। प्लेटोवादी, वास्तव में, इतने मूर्ख नहीं हैं कि मानीवादियों के समान हमारी वर्तमान देहों को एक बुरी प्रकृति के रूप में तुच्छ समझें;[22] क्योंकि वे उन सब तत्वों को, जिनसे यह दृश्य और स्पर्शनीय जगत बना है, अपने सब गुणों के साथ, अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर को अर्पित करते हैं। तौभी वे यह विश्वास करते हैं कि देह के मृत्युग्रस्त अंगों और पार्थिव संरचना से प्राण इस प्रकार प्रभावित होता है कि उसमें इच्छा, भय, आनन्द और शोक के रोग उत्पन्न होते हैं, और इन चार विकारों के अन्तर्गत, जिन्हें सिसरो[23] कहते हैं, या यूनानियों के साथ जिन्हें अधिकांश लोग "भाव" कहना पसन्द करते हैं, मानव जीवन की सम्पूर्ण दुष्टता समाहित है। परन्तु यदि ऐसा है, तो यह कैसे हुआ कि वर्जिल में ऐनियस, जब उसने अपने पिता से पाताल में सुना कि प्राण देहों में लौटेंगे, इस घोषणा पर आश्चर्य व्यक्त करता है, और पुकार उठता है:

    "हे पिता! क्या मन यह कल्पना कर सकता है कि सुखी आत्माएँ इस लोक को छोड़ेंगी, और ऊपर के आकाश की खोज करेंगी, कि वे मंद मिट्टी से फिर जुड़ जाएँ? यह ज्योति के लिए भयावह लालसा, यह कहाँ से आती है, बताओ, और क्यों?"[24]

    तो क्या यह भयानक लालसा उन विदेह प्राणों की उस अभिमानित पवित्रता में भी अब तक बनी रहती है, और क्या यह अब भी मृत्युग्रस्त अंगों और पार्थिव अवयवों से उत्पन्न होती है? क्या वह यह नहीं मानता कि जब वे देह में लौटने की लालसा करना आरम्भ करते हैं, तब तक वे देह की इन सब कथित महामारियों से पहले ही मुक्त हो चुके होते हैं? इससे हम यह जानते हैं कि, यद्यपि प्रस्थान करते और लौटते प्राणों की यह अनन्त क्रमिक शुद्धि और मलिनता चाहे जितनी सत्य हो—जो निश्चय ही सर्वथा असत्य है—तौभी यह नहीं कहा जा सकता कि प्राण के सब दोषपूर्ण और दुष्ट संचालन पार्थिव देह से ही उत्पन्न होते हैं; क्योंकि, उनके अपने ही कथन के अनुसार, "यह भयानक लालसा," उनके प्रतिष्ठित प्रवक्ता के शब्दों का प्रयोग करने के लिए, देह से इतनी बाहरी है कि यह उस प्राण को भी प्रेरित करती है जो देह के सब कलंक से शुद्ध हो चुका है, और किसी भी देह से पृथक विद्यमान है, और उसे, इसके अतिरिक्त, फिर से देहधारी होने के लिए प्रेरित करती है। इसलिए वे स्वयं भी यह मान लेते हैं कि प्राण न केवल देह के द्वारा इच्छा, भय, आनन्द, शोक के लिए प्रेरित होता है, वरन यह अपने ही आवेग से भी इन भावों से उद्वेलित हो सकता है।

    6. मानवीय इच्छाशक्ति के उस स्वभाव के विषय में जो प्राण के भावों को उचित या अनुचित बनाता है

    परन्तु मानवीय इच्छाशक्ति का स्वभाव अत्यंत महत्वपूर्ण है; क्योंकि यदि वह अनुचित है, तो प्राण के ये संचालन भी अनुचित होंगे, परन्तु यदि वह उचित है, तो वे न केवल निर्दोष, वरन प्रशंसनीय भी होंगे। क्योंकि इच्छाशक्ति ही इन सब में विद्यमान है; वस्तुतः इनमें से कोई भी इच्छाशक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। क्योंकि इच्छा और आनन्द उन वस्तुओं के प्रति सहमति की इच्छाशक्ति के अतिरिक्त और क्या हैं जिन्हें हम चाहते हैं? और भय और उदासी उन वस्तुओं से विमुखता की इच्छाशक्ति के अतिरिक्त और क्या हैं जिन्हें हम नहीं चाहते? परन्तु जब सहमति उन वस्तुओं को प्राप्त करने के प्रयास का रूप लेती है जिन्हें हम चाहते हैं, तो इसे इच्छा कहा जाता है; और जब सहमति उन वस्तुओं का आनन्द लेने का रूप लेती है जिन्हें हम चाहते हैं, तो इसे आनन्द कहा जाता है। इसी प्रकार, जब हम उससे विमुख होते हैं जो हम नहीं चाहते कि हो, तो इस इच्छाशक्ति को भय कहा जाता है; और जब हम उससे विमुख होते हैं जो हमारी इच्छा के विरुद्ध हो चुका है, तो इच्छाशक्ति के इस कार्य को शोक कहा जाता है। और सामान्यतः, जिन सब वस्तुओं को हम खोजते या टालते हैं, उनके संबंध में, जैसे मनुष्य की इच्छाशक्ति आकर्षित या विकर्षित होती है, वैसे ही वह बदलकर इन भिन्न-भिन्न भावों में परिवर्तित हो जाती है। इसलिए जो मनुष्य परमेश्वर के अनुसार जीवन जीता है, मनुष्य के अनुसार नहीं, उसे भले का प्रेमी होना चाहिए, और इसलिए बुराई से द्वेष रखनेवाला भी। और क्योंकि कोई भी स्वभाव से बुरा नहीं है, वरन जो कोई बुरा है वह दोष के कारण बुरा है, इसलिए जो परमेश्वर के अनुसार जीवन जीता है उसे बुरे मनुष्यों के प्रति पूर्ण द्वेष रखना चाहिए, इस प्रकार कि वह न तो उस मनुष्य से उसके दोष के कारण द्वेष करे, न ही उस दोष से उस मनुष्य के कारण प्रेम करे, वरन दोष से द्वेष करे और मनुष्य से प्रेम करे। क्योंकि दोष के शापित हो जाने पर, वह सब कुछ बना रहेगा जिससे प्रेम किया जाना चाहिए, और कुछ भी न रहेगा जिससे द्वेष किया जाना चाहिए।

    7. कि "प्रेम" और "चाहना" शब्द

    जो परमेश्वर से प्रेम करने, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने का संकल्प करता है, मनुष्य के अनुसार नहीं वरन परमेश्वर के अनुसार, उसे इस प्रेम के कारण भली इच्छाशक्ति का कहा जाता है; और इसे पवित्रशास्त्र में सामान्यतः "प्रीति" कहा जाता है, परन्तु इसे उन्हीं पुस्तकों में "प्रेम" भी कहा जाता है। क्योंकि प्रेरित कहते हैं कि जिस मनुष्य को प्रजा का शासक चुना जाना है, उसे भले का प्रेमी होना चाहिए।[25] और जब प्रभु ने स्वयं पतरस से पूछा, "क्या तू इनसे अधिक मुझ पर चाहना (diligis) रखता है?" पतरस ने उत्तर दिया, "हे प्रभु, तू जानता है कि मैं तुझसे प्रेम (amo) करता हूँ।" और फिर दूसरी बार प्रभु ने यह नहीं पूछा कि क्या पतरस उससे प्रेम (amaret) करता है, वरन क्या वह उस पर चाहना (diligeret) रखता है, और उसने फिर उत्तर दिया, "हे प्रभु, तू जानता है कि मैं तुझसे प्रेम (amo) करता हूँ।" परन्तु तीसरे प्रश्न में प्रभु ने स्वयं अब यह नहीं कहा, "क्या तू मुझ पर चाहना (diligis) रखता है," वरन "क्या तू मुझसे प्रेम (amas) करता है?" और तब सुसमाचार लेखक जोड़ता है, "पतरस उदास हो गया क्योंकि उसने उससे तीसरी बार कहा, क्या तू मुझसे प्रेम (amas) करता है?" यद्यपि प्रभु ने तीन बार नहीं वरन केवल एक ही बार, "क्या तू मुझसे प्रेम (amas) करता है?" कहा था, और दो बार "Diligis me?" कहा था, जिससे हम यह जानते हैं कि जब प्रभु ने "diligis" कहा, तब भी उन्होंने "amas" के समानार्थी शब्द का प्रयोग किया। पतरस ने भी एक ही वस्तु के लिए सर्वत्र एक ही शब्द का प्रयोग किया, और तीसरी बार भी उत्तर दिया, "हे प्रभु, तू सब कुछ जानता है, तू जानता है कि मैं तुझसे प्रेम (amo) करता हूँ।"[26]

    मैंने इसका उल्लेख करना उचित समझा, क्योंकि कुछ लोगों का यह मत है कि प्रीति या चाहना (dilectio) एक वस्तु है, और प्रेम (amor) दूसरी। वे कहते हैं कि dilectio भले भाव के लिए प्रयोग होता है, और amor बुरे प्रेम के लिए। परन्तु यह अत्यंत निश्चित है कि लौकिक साहित्य भी ऐसा कोई भेद नहीं जानता। तथापि, यह भेद है या नहीं और कैसे है, यह निश्चित करना दार्शनिकों का काम है, यद्यपि उनके अपने लेखन पर्याप्त रूप से इस बात के प्रमाण हैं कि वे भले विषयों पर, और स्वयं परमेश्वर पर भी, रखे गए प्रेम (amor) को बड़ा महत्व देते हैं। परन्तु हम यह दिखाना चाहते थे कि हमारे धर्म के पवित्रशास्त्र, जिनके अधिकार को हम अन्य सब लेखों से अधिक मानते हैं, amor, dilectio और caritas में कोई भेद नहीं करते; और हम पहले ही दिखा चुके हैं कि amor एक भले संदर्भ में प्रयोग होता है। और यदि किसी की यह कल्पना हो कि amor निःसंदेह भले और बुरे दोनों प्रेमों के लिए प्रयोग होता है, परन्तु dilectio केवल भले के लिए ही सुरक्षित है, तो उसे यह स्मरण रहे कि भजनकार क्या कहते हैं, "जो अधर्म से प्रेम (diligit) करता है, वह अपने ही प्राण से द्वेष करता है;"[27] और प्रेरित यूहन्ना के शब्द, "यदि कोई जगत से प्रेम (diligere) करता है, तो उसमें पिता का प्रेम (dilectio) नहीं है।"[28] यहाँ तुम्हें एक ही वचन में dilectio भले और बुरे दोनों अर्थों में प्रयुक्त मिलता है। और यदि कोई amor के बुरे अर्थ में प्रयोग का उदाहरण माँगे (क्योंकि हम इसके भले अर्थ में प्रयोग को पहले ही दिखा चुके हैं), तो वह इन शब्दों को पढ़े, "क्योंकि मनुष्य अपने ही आप के प्रेमी (amantes), धन के प्रेमी (amatores) होंगे।"[29]

    इसलिए उचित इच्छाशक्ति सुनिर्देशित प्रेम है, और अनुचित इच्छाशक्ति कुनिर्देशित प्रेम है। इसलिए प्रेम, जब वह प्रिय वस्तु को पाने की लालसा करता है, तो वह इच्छा है; और जब वह उसे पाकर उसका आनन्द लेता है, तो वह आनन्द है; जब वह उससे बचकर भागता है जो उसके विरुद्ध है, तो वह भय है; और जब वह उसका अनुभव करता है जो उसके विरुद्ध हो चुका है, तो वह उदासी है। अब ये संचालन बुरे हैं यदि प्रेम बुरा है; भले हैं यदि प्रेम भला है। जो हम कहते हैं उसे हम पवित्रशास्त्र से सिद्ध करें। प्रेरित "कूच करने और मसीह के साथ रहने की इच्छा रखते हैं।"[30] और, "मेरे प्राण ने तेरे नियमों की लालसा करने की इच्छा की;"[31] या यदि यह कहना अधिक उचित हो, "मेरे प्राण ने तेरे नियमों की इच्छा करने की लालसा की।" और, "बुद्धि की इच्छा राज्य तक पहुँचाती है।"[32] तौभी सदा से यह प्रयोग होता रहा है कि यदि विषय निर्दिष्ट न हो तो "इच्छा" और "वासना" को बुरे अर्थ में समझा जाए। परन्तु आनन्द भले अर्थ में प्रयोग होता है: "हे धर्मियों, प्रभु में आनन्दित रहो और मगन हो।"[33] और, "तूने मेरे हृदय में आनन्द भर दिया है।"[34] और, "तू मुझे अपने मुख से आनन्द से भर देगा।"[35] भय भले अर्थ में प्रेरित के द्वारा प्रयोग होता है जब वे कहते हैं, "भय और कँपकँपी के साथ अपने उद्धार का कार्य करते जाओ।"[36] और, "अभिमानी न हो, वरन भय रख।"[37] और, "मुझे भय है, कि जैसे सर्प ने अपनी धोखेबाजी से हव्वा को बहकाया, वैसे ही तुम्हारे मन उस सरलता से जो मसीह में है, भ्रष्ट न हो जाएँ।"[38] परन्तु उदासी के विषय में, जिसे सिसरो रोग (ægritudo) कहना अधिक पसन्द करते हैं, और वर्जिल पीड़ा (dolor) (जैसा वे कहते हैं, "Dolent gaudentque"[39]), परन्तु जिसे मैं शोक कहना अधिक पसन्द करता हूँ, क्योंकि रोग और पीड़ा शारीरिक दुःख को व्यक्त करने के लिए अधिक सामान्यतः प्रयोग होते हैं,—इस भाव के विषय में, मैं कहता हूँ, यह प्रश्न कि क्या इसे भले अर्थ में प्रयोग किया जा सकता है, अधिक कठिन है।

    8. उन तीन विकारों के विषय में, जिन्हें स्टोइक दार्शनिक बुद्धिमान मनुष्य के प्राण में स्वीकार करते थे, शोक या उदासी को छोड़कर, जिसे पुरुषोचित मन को अनुभव नहीं करना चाहिए

    जिन भावों को यूनानी लोग εὐπαθείαι कहते हैं, और जिन्हें सिसरो constantiæ कहते हैं, उन्हें स्टोइक दार्शनिक तीन तक सीमित रखते थे; और बुद्धिमान मनुष्य के प्राण में तीन "विकारों" के स्थान पर, उन्होंने क्रमशः इच्छा के स्थान पर "इच्छाशक्ति", आनन्द के स्थान पर "संतोष", और भय के स्थान पर "सावधानी" रख दी; और रोग या पीड़ा के विषय में, जिसे हमने अस्पष्टता से बचने के लिए "शोक" कहना पसन्द किया, उन्होंने यह अस्वीकार किया कि यह बुद्धिमान मनुष्य के मन में हो सकता है। इच्छाशक्ति, वे कहते हैं, भले को खोजती है, और बुद्धिमान मनुष्य यही करता है। संतोष का विषय वह भला है जो प्राप्त है, और यह बुद्धिमान मनुष्य निरन्तर रखता है। सावधानी बुराई से बचती है, और बुद्धिमान मनुष्य को इससे बचना चाहिए। परन्तु शोक उस बुराई से उत्पन्न होता है जो पहले ही हो चुकी है; और जैसा वे मानते हैं कि बुद्धिमान मनुष्य के साथ कोई बुराई नहीं हो सकती, इसलिए उसके मन में शोक का कोई प्रतिनिधि नहीं हो सकता। इसलिए, उनके अनुसार, केवल बुद्धिमान मनुष्य ही इच्छाशक्ति रखता है, संतुष्ट रहता है, सावधानी बरतता है; और मूर्ख इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता सिवाय इच्छा करने, आनन्दित होने, भय खाने, उदास होने के। पहले तीन भावों को सिसरो constantiæ कहते हैं, और अन्तिम चार को perturbationes। परन्तु बहुत से लोग इन अन्तिम को passions (विकार) कहते हैं; और, जैसा मैंने कहा, यूनानी लोग पहले को εὐπαθείαι और दूसरे को πάθη कहते हैं। और जब मैंने यह जानने के लिए पवित्रशास्त्र की सावधानी से जाँच की कि क्या यह शब्दावली इसके द्वारा स्वीकृत है, तो मुझे भविष्यद्वक्ता का यह कथन मिला: "दुष्टों के लिए कोई संतोष नहीं, यहोवा कहते हैं;"[40] जैसे कि दुष्ट बुराइयों के विषय में संतुष्ट होने की अपेक्षा आनन्दित होना अधिक उचित रूप से कर सकते हैं, क्योंकि संतोष तो भलों और भक्तों का गुण है। मुझे सुसमाचार में भी यह वचन मिला: "जो कुछ तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, वही तुम भी उनके साथ करो;"[41] जिससे यह प्रतीत होता है कि बुरी या लज्जाजनक बातें इच्छा का विषय हो सकती हैं, परन्तु इच्छाशक्ति का नहीं। वास्तव में, कुछ व्याख्याकारों ने इस अभिव्यक्ति को प्रचलित प्रयोग के अधिक अनुरूप बनाने के लिए "भली बातें" शब्द जोड़ दिए हैं, और इसे यह अर्थ दिया है, "जो भी भले काम तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें।" क्योंकि उन्होंने सोचा कि इससे कोई भी यह न चाहेगा कि दूसरे मनुष्य उसे अशोभनीय, यदि लज्जाजनक न भी कहा जाए, तृप्तियाँ प्रदान करें—उदाहरण के लिए, विलासी भोज—इस मान्यता पर कि यदि वह उन्हें भी वैसा ही लौटा दे, तो वह इस आदेश को पूरा कर रहा होगा। यूनानी सुसमाचार में, जिससे लातीनी अनुवाद किया गया है, "भला" शब्द नहीं आता, वरन केवल, "जो कुछ भी तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, वही तुम भी उनके साथ करो," और, जैसा मैं मानता हूँ, इसलिए क्योंकि "भला" शब्द "चाहना" (would) शब्द में पहले से ही सम्मिलित है; क्योंकि वे "इच्छा करना" (desire) नहीं कहते।

    तौभी यद्यपि हम कभी-कभी भाषा की इन सटीक विशिष्टताओं का लाभ ले सकते हैं, हमें सदा इनके द्वारा बाँधा नहीं जाना चाहिए; और जब हम उन लेखकों को पढ़ते हैं जिनके अधिकार के विरुद्ध जाना अवैध है, तो हमें उन वचनों में उपर्युक्त अर्थों को स्वीकार करना चाहिए जहाँ सही अर्थ किसी अन्य व्याख्या से प्राप्त नहीं हो सकता, जैसे उन उदाहरणों में जो हमने भाग में भविष्यद्वक्ता से, भाग में सुसमाचार से लिए। क्योंकि कौन नहीं जानता कि दुष्ट आनन्द से उल्लसित होते हैं? तौभी "दुष्टों के लिए कोई संतोष नहीं, यहोवा कहते हैं।" और यह कैसे है, यदि इसलिए नहीं कि संतोष, जब यह शब्द अपने उचित और विशिष्ट अर्थ में प्रयोग होता है, आनन्द से भिन्न कुछ अर्थ रखता है? इसी प्रकार, कौन यह अस्वीकार करेगा कि मनुष्यों को यह आदेश देना अनुचित होता कि जो कुछ वे चाहते हैं कि दूसरे उनके साथ करें, वे स्वयं दूसरों के साथ करें, कहीं ऐसा न हो कि वे एक दूसरे को लज्जाजनक और अवैध सुख से प्रसन्न करें? और तौभी यह आदेश, "जो कुछ तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, वही तुम भी उनके साथ करो," अत्यंत हितकारी और न्यायपूर्ण है। और यह कैसे है, यदि इसलिए नहीं कि इस स्थान पर "इच्छाशक्ति" कड़े अर्थ में प्रयोग हुई है, और उस इच्छाशक्ति को दर्शाती है जिसका विषय बुराई नहीं हो सकता? परन्तु सामान्य वाक्-प्रयोग इस कथन की अनुमति न देता, "किसी भी प्रकार का झूठ बोलने की इच्छा न करो,"[42] यदि एक बुरी इच्छाशक्ति भी न होती, जिसकी दुष्टता उसे उससे पृथक करती है जिसका स्वर्गदूतों ने उत्सव मनाया, "पृथ्वी पर शान्ति, मनुष्यों के प्रति सद्भावना।"[43] क्योंकि "भली" शब्द अनावश्यक है यदि भली इच्छाशक्ति के अतिरिक्त कोई और प्रकार की इच्छाशक्ति ही नहीं है। और प्रेरित प्रीति की प्रशंसा में इसे एक बड़ी बात के रूप में क्यों उल्लेखित करते कि "यह अधर्म में आनन्दित नहीं होती," यदि इसलिए नहीं कि दुष्टता ऐसे आनन्दित होती है? क्योंकि लौकिक लेखकों में भी ये शब्द निर्विशेष रूप से प्रयोग होते हैं। क्योंकि सिसरो, जो वाक्पटुओं में सबसे उर्वर हैं, कहते हैं, "मैं चाहता हूँ, हे आदरणीय पितरो, कि मैं दयावान बनूँ।"[44] और कौन इतना पंडिताऊ होगा कि यह कहे कि उन्हें "मैं चाहता हूँ" के स्थान पर "मैं इच्छा करता हूँ" कहना चाहिए था, क्योंकि यह शब्द भले संदर्भ में प्रयोग होता है? फिर, टेरेंस में, वह उच्छृंखल युवक, उग्र वासना से जलता हुआ, कहता है, "मैं फिलुमेना के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहता।"[45] कि यह "चाहना" वासना ही थी, यह उसके वृद्ध सेवक के उत्तर से पर्याप्त रूप से स्पष्ट है जो वहाँ प्रस्तुत किया गया है: "कितना बेहतर होता कि तुम अपने हृदय से उस प्रेम को दूर करने का प्रयत्न करते, इसकी अपेक्षा कि इस प्रकार बोलकर व्यर्थ ही अपनी वासना को और भड़काते!" और यह कि "संतोष" शब्द लौकिक लेखकों द्वारा बुरे अर्थ में प्रयोग होता था, इसका प्रमाण वर्जिल की वह पंक्ति देती है, जिसमें वे इन चार विकारों को अत्यंत संक्षेप में समाहित करते हैं,—

    "इससे वे भय खाते और अभिलाषा करते हैं, शोक करते और संतुष्ट होते हैं।"[46]

    उसी लेखक ने यह अभिव्यक्ति भी प्रयोग की थी, "मन के बुरे संतोष।"[47] इस प्रकार भले और बुरे मनुष्य समान रूप से इच्छाशक्ति रखते हैं, सावधान रहते हैं, और संतुष्ट रहते हैं; या, इसी बात को अन्य शब्दों में कहें, तो भले और बुरे मनुष्य समान रूप से इच्छा करते, भय खाते, आनन्दित होते हैं, परन्तु पहले भले ढंग से, दूसरे बुरे ढंग से, जैसा कि इच्छाशक्ति उचित या अनुचित होती है। शोक भी, जिसे स्टोइक दार्शनिक बुद्धिमान मनुष्य के मन में प्रकट नहीं होने देते थे, भले अर्थ में प्रयोग होता है, और विशेष रूप से हमारे लेखों में। क्योंकि प्रेरित कुरिन्थियों की प्रशंसा करते हैं क्योंकि उनमें भक्तिपूर्ण शोक था। परन्तु सम्भव है कोई यह कहे कि प्रेरित ने उन्हें इसलिए बधाई दी क्योंकि वे पश्चातापपूर्वक शोकित थे, और ऐसा शोक केवल उनमें ही हो सकता है जिन्होंने पाप किया हो। क्योंकि उनके शब्द ये हैं: "क्योंकि मैं देखता हूँ कि उस पत्री ने तुम्हें शोकित किया, यद्यपि यह थोड़े समय के लिए ही था। अब मैं आनन्दित हूँ, इसलिए नहीं कि तुम शोकित हुए, वरन इसलिए कि तुम पश्चाताप की ओर शोकित हुए; क्योंकि तुम भक्तिपूर्ण रीति से शोकित हुए, कि तुम्हें हमारी ओर से किसी बात में हानि न हो। क्योंकि भक्तिपूर्ण शोक उद्धार के लिए ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है जिसका पछतावा नहीं होता, परन्तु संसार का शोक मृत्यु उत्पन्न करता है। क्योंकि देखो, इस बात ने ही, कि तुम भक्तिपूर्ण रीति से शोकित हुए, तुम में कैसी सावधानी उत्पन्न की!"[48] इसलिए स्टोइक दार्शनिक यह उत्तर देकर अपना बचाव कर सकते हैं,[49] कि शोक वास्तव में पाप के पश्चाताप के लिए उपयोगी है, परन्तु यह बुद्धिमान मनुष्य के मन में कोई स्थान नहीं पा सकता, क्योंकि उसके साथ कोई पाप जुड़ा नहीं होता जिसके लिए वह शोकपूर्वक पश्चाताप करे, न ही कोई अन्य बुराई जिसे सहने या अनुभव करने से वह शोकित हो सके। क्योंकि वे कहते हैं कि अल्सीबाइअडीज़ (यदि मेरी स्मृति मुझे धोखा नहीं दे रही), जो स्वयं को सुखी मानता था, जब सुकरात ने उससे तर्क किया और यह सिद्ध किया कि वह मूर्ख होने के कारण दुखी है, तो उसने आँसू बहाए। इसलिए उसके मामले में, मूर्खता इस उपयोगी और वांछनीय शोक का कारण थी, जिससे मनुष्य इस बात पर शोक करता है कि वह वैसा है जैसा उसे नहीं होना चाहिए था। परन्तु स्टोइक दार्शनिक यह नहीं मानते कि मूर्ख शोकित नहीं हो सकता, वरन यह कि बुद्धिमान मनुष्य शोकित नहीं हो सकता।

    9. प्राण के उन विकारों के विषय में जो धर्मियों के जीवन में उचित भावों के रूप में प्रकट होते हैं

    परन्तु जहाँ तक मानसिक विकारों के इस प्रश्न का संबंध है, हम इन दार्शनिकों को इस रचना की नवीं पुस्तक[50] में उत्तर दे चुके हैं, यह दिखाते हुए कि यह वास्तविक विवाद की अपेक्षा शब्दों का विवाद अधिक है, और वे सत्य की अपेक्षा विवाद ही खोजते हैं। हमारे बीच, पवित्रशास्त्र और शुद्ध सिद्धांत के अनुसार, परमेश्वर के पवित्र नगर के नागरिक, जो इस जीवन की यात्रा में परमेश्वर के अनुसार जीवन जीते हैं, भय भी करते हैं और इच्छा भी, शोक भी करते हैं और आनन्दित भी होते हैं। और क्योंकि उनका प्रेम उचित रूप से स्थापित है, उनके ये सब भाव उचित हैं। वे अनन्त दण्ड से भय खाते हैं, वे अनन्त जीवन की इच्छा करते हैं; वे शोक करते हैं क्योंकि वे स्वयं अपने भीतर कुड़कुड़ाते हैं, अपने पुत्रत्व की, अपनी देह के उद्धार की बाट जोहते हुए;[51] वे आशा में आनन्दित होते हैं, क्योंकि "वह वचन जो लिखा है पूरा हो जाएगा, मृत्यु जय में समा गई है।"[52] इसी प्रकार वे पाप करने से भय खाते हैं, वे धीरता बनाए रखने की इच्छा करते हैं; वे पाप में शोक करते हैं, वे भले कामों में आनन्दित होते हैं। वे पाप करने से भय खाते हैं, क्योंकि वे सुनते हैं कि "क्योंकि अधर्म बढ़ जाएगा, बहुतों का प्रेम ठंडा हो जाएगा।"[53] वे धीरता बनाए रखने की इच्छा करते हैं, क्योंकि वे सुनते हैं कि यह लिखा है, "जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, वही उद्धार पाएगा।"[54] वे पाप के लिए शोक करते हैं, यह सुनकर कि "यदि हम कहें कि हम में पाप नहीं, तो हम अपने आप को धोखा देते हैं, और हम में सत्य नहीं।"[55] वे भले कामों में आनन्दित होते हैं, क्योंकि वे सुनते हैं कि "प्रभु हर्ष से देनेवाले से प्रेम रखता है।"[56] इसी प्रकार, जैसे वे बलवान या दुर्बल होते हैं, वैसे ही वे परीक्षा में डाले जाने से भय खाते या इच्छा करते हैं, परीक्षा में शोक करते या आनन्दित होते हैं। वे परीक्षा में डाले जाने से भय खाते हैं, क्योंकि वे यह आदेश सुनते हैं, "यदि कोई भूल में पकड़ा जाए, तो तुम जो आत्मिक हो, नम्रता की आत्मा में उसे सुधारो; अपने ऊपर भी ध्यान रखते हुए, कहीं तुम भी परीक्षा में न पड़ो।"[57] वे परीक्षा में डाले जाने की इच्छा करते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के नगर के एक वीर को यह कहते सुनते हैं, "हे यहोवा, मुझे जाँच और परख; मेरे मन और हृदय को परीक्षा में डाल।"[58] वे परीक्षाओं में शोक करते हैं, क्योंकि वे पतरस को रोते देखते हैं;[59] वे परीक्षाओं में आनन्दित होते हैं, क्योंकि वे याकूब को यह कहते सुनते हैं, "हे मेरे भाइयो, जब तुम विभिन्न परीक्षाओं में पड़ो, तो इसे बड़ा ही आनन्द समझो।"[60]

    और वे ये भाव न केवल अपने ही विषय में अनुभव करते हैं, वरन उनके विषय में भी जिनके उद्धार की वे इच्छा करते हैं और जिनके विनाश से वे भय खाते हैं, और जिनकी हानि या उद्धार उन्हें शोक या आनन्द से प्रभावित करते हैं। क्योंकि यदि हम, जो अन्यजातियों में से कलीसिया में आए हैं, उपयुक्त रूप से उस उदार और शक्तिशाली वीर का उदाहरण दें जो अपनी दुर्बलताओं में गर्व करता है, विश्वास और सत्य में जातियों का गुरु (doctor), जिसने अपने सब सहप्रेरितों से अधिक परिश्रम किया, और अपनी पत्रियों से परमेश्वर की प्रजा के गोत्रों को शिक्षा दी, जिन्होंने न केवल अपने समय के लोगों को, वरन सब उन लोगों को भी शिक्षित किया जो भविष्य में एकत्रित होने थे,—वह वीर, मैं कहता हूँ, और मसीह का पहलवान, उसके द्वारा शिक्षित, उसकी आत्मा से अभिषिक्त, उसके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया, उसमें महिमामय, इस जगत के रंगमंच पर एक बड़ा संघर्ष विधिपूर्वक करता हुआ, और स्वर्गदूतों और मनुष्यों के लिए एक तमाशा बनाया गया,[61] और अपने ऊँचे बुलावे के पुरस्कार के लिए आगे बढ़ता हुआ,[62]—हम विश्वास की आँखों से उसे अत्यंत आनन्द के साथ देखते हैं, आनन्दित होनेवालों के साथ आनन्दित होते हुए, और रोनेवालों के साथ रोते हुए;[63] यद्यपि बाहर की लड़ाइयों और भीतर के भयों से घिरा हुआ;[64] कूच करने और मसीह के साथ रहने की इच्छा करता हुआ;[65] रोमियों को देखने की लालसा करता हुआ, कि उसे उनमें भी, जैसे अन्य अन्यजातियों में, कुछ फल मिल सके;[66] कुरिन्थियों के लिए ईर्ष्या करता हुआ, और उस ईर्ष्या में यह भय खाता हुआ कि उनके मन उस पवित्रता से भ्रष्ट न हो जाएँ जो मसीह में है;[67] इस्राएलियों के लिए बड़ा दुःख और निरन्तर हृदय का शोक रखता हुआ,[68] क्योंकि वे, परमेश्वर की धार्मिकता से अनजान होकर, और अपनी ही धार्मिकता स्थापित करने का प्रयत्न करते हुए, परमेश्वर की धार्मिकता के अधीन नहीं हुए;[69] और न केवल अपना शोक, वरन कुछ ऐसे लोगों पर, जो पहले पाप कर चुके थे और अपनी अशुद्धता और व्यभिचार से पश्चाताप नहीं किया था, कड़वा विलाप भी प्रकट करता हुआ।[70]

    यदि ये भाव और वृत्तियाँ, जो भले के प्रेम और पवित्र प्रीति से उत्पन्न होती हैं, दोष कहलानी हैं, तो हमें उन भावों को भी, जो वास्तव में दोष हैं, गुणों के नाम से चलने देना चाहिए। परन्तु क्योंकि ये भाव, जब उचित ढंग से प्रयोग किए जाते हैं, सही तर्क के मार्गदर्शन का पालन करते हैं, तो कौन यह कहने का साहस करेगा कि वे रोग या दुष्ट विकार हैं? इसलिए प्रभु स्वयं भी, जब उन्होंने एक दास के रूप में मानवीय जीवन व्यतीत करने की कृपा की, उनमें कोई पाप नहीं था, तौभी उन्होंने इन भावों को वहाँ प्रयोग किया जहाँ उन्होंने यह उचित समझा। क्योंकि जैसे उनमें एक सच्चा मानवीय शरीर था, वैसे ही उनमें एक सच्चा मानवीय प्राण भी था, और वैसे ही एक सच्चा मानवीय भाव भी था। इसलिए, जब हम सुसमाचार में पढ़ते हैं कि यहूदियों की कठोर-हृदयता ने उन्हें शोकपूर्ण क्रोध से प्रेरित किया,[71] कि उन्होंने कहा, "मैं तुम्हारे लिए आनन्दित हूँ, कि तुम विश्वास करो,"[72] कि लाजर को जिलाने से पहले उन्होंने आँसू भी बहाए,[73] कि उन्होंने अपने चेलों के साथ फसह खाने की उत्कट इच्छा की,[74] कि जब उनकी पीड़ा निकट आई तो उनका प्राण उदास हुआ,[75] ये भाव निश्चय ही उन पर झूठे रूप से नहीं लगाए गए हैं। परन्तु जैसे वे मनुष्य बने जब उन्हें यह भाया, वैसे ही, अपने निश्चित उद्देश्य के अनुग्रह में, जब उन्हें यह भाया, उन्होंने अपने मानवीय प्राण में उन भावों का अनुभव किया।

    परन्तु हमें आगे यह भी मान लेना होगा कि जब ये मनोभाव भली प्रकार नियंत्रित हों और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हों, तब भी वे इस जीवन के लिए विशेष हैं, न कि उस भविष्य के जीवन के लिए जिसकी हम प्रतीक्षा करते हैं, और यह भी कि अनेक बार हम अपनी इच्छा के विरुद्ध ही उनके अधीन हो जाते हैं। और इसी प्रकार कभी-कभी हम स्वयं के विरुद्ध रोते हैं, अपने आपे से बाहर हो जाते हैं—यह किसी दोषपूर्ण अभिलाषा के कारण नहीं, वरन प्रशंसनीय प्रेम के कारण होता है। इस प्रकार हम में ये मनोभाव मानवीय दुर्बलता से उत्पन्न होते हैं; परन्तु प्रभु यीशु के विषय में यह बात नहीं थी, क्योंकि उनकी दुर्बलता भी उनके सामर्थ्य का परिणाम थी। परन्तु जब तक हम इस जीवन की दुर्बलता को धारण किए रहते हैं, यदि हम में ये संवेग बिलकुल न हों, तो हम भले मनुष्यों के बदले बुरे ही अधिक ठहरेंगे। क्योंकि प्रेरित ने उनकी निन्दा की और उन्हें घृणित ठहराया जो, जैसा उसने कहा, "स्वाभाविक प्रेम से रहित" थे।[76] पवित्र भजनहार ने भी उनकी त्रुटि निकाली जिनके विषय उसने कहा, "मैं ने किसी को ढूंढ़ा जो मेरे साथ विलाप करे, परन्तु कोई न मिला।"[77] क्योंकि इस दुःख के स्थान में रहते हुए पीड़ा से पूर्ण रूप से मुक्त रहना, जैसा कि इस संसार के एक विद्वान ने समझा और कहा,[78] मन और शरीर दोनों की संवेदनशीलता को कुंठित करने के मूल्य पर ही प्राप्त होता है। और इसलिए जिसे यूनानी लोग ἀπάθεια कहते हैं, और जिसे लातीनी लोग, यदि उनकी भाषा उन्हें अनुमति देती, "इम्पैसिबिलितास" कहते—यदि इसका अर्थ आत्मा की अविकार्यता लिया जाए, न कि शरीर की, अर्थात उन मनोविकारों से मुक्ति जो बुद्धि के विरुद्ध हैं और मन को अशांत करते हैं—तो निःसन्देह यह एक भला और अत्यन्त चाहने योग्य गुण है, परन्तु यह इस जीवन में प्राप्त होने वाला नहीं है। क्योंकि प्रेरित के ये वचन साधारण जनसमूह का नहीं, वरन अत्यन्त भक्त, धर्मी और पवित्र पुरुषों का अंगीकार हैं: "यदि हम कहें कि हम में पाप नहीं है, तो हम अपने आप को धोखा देते हैं, और सत्य हम में नहीं है।"[79] जब किसी मनुष्य में कोई पाप नहीं रहेगा, तभी यह ἀπάθεια होगी। इस समय तो इतना ही पर्याप्त है कि हम अपराध के बिना जीवन बिताएं; और जो यह सोचता है कि वह पाप के बिना जीवन बिता रहा है, वह पाप को नहीं वरन क्षमा को दूर रखता है। और यदि उसे अपैथिया कहा जाए जहाँ मन किसी भी मनोविकार का विषय न हो, तो कौन ऐसी संवेदनहीनता को सब दोषों से बुरी न मानेगा? यह युक्तिपूर्वक कहा जा सकता है कि जिस सिद्ध धन्यता की हम आशा रखते हैं, वह भय या उदासी की किसी भी पीड़ा से मुक्त होगी; परन्तु ऐसा कौन कहेगा, जो सत्य से बिलकुल दूर न हो, कि वहाँ न प्रेम होगा न आनन्द? परन्तु यदि अपैथिया से यह अर्थ लिया जाए कि वहाँ कोई भय भयभीत नहीं करता और कोई पीड़ा कष्ट नहीं देती, तो हमें इस जीवन में, यदि हम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीना चाहते हैं, ऐसी स्थिति को त्याग देना होगा, परन्तु उस धन्यता में, जो हमारी सनातन स्थिति के रूप में प्रतिज्ञा की गई है, इसका आनन्द लेने की आशा रख सकते हैं।

    क्योंकि जिस भय के विषय प्रेरित यूहन्ना कहता है, "प्रेम में भय नहीं होता; वरन सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है, क्योंकि भय में दण्ड का भाव होता है। जो भय करता है, वह प्रेम में सिद्ध नहीं हुआ,"[80]—वह भय उस भय के समान नहीं है जो प्रेरित पौलुस को इस बात का था कि कुरिन्थियों को सर्प की चतुराई से भ्रमित न किया जाए; क्योंकि यह भय प्रेम में समाहित हो सकता है, वरन प्रेम ही इसे धारण करने में समर्थ है। परन्तु जो भय प्रेम में नहीं है, वह उस प्रकार का है जिसके विषय पौलुस स्वयं कहता है, "क्योंकि तुम्हें फिर दासत्व की आत्मा नहीं मिली जिससे तुम भयभीत हो।"[81] परन्तु जो "पवित्र भय जो सदा बना रहता है"[82] है, यदि उसे उस आनेवाले लोक में भी रहना है (और किस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यह सदा बना रहता है?), तो वह उस बुराई से डराने वाला भय नहीं जो घट सकती है, वरन वह उस भलाई में स्थिर रखने वाला भय है जो कभी खोई नहीं जा सकती। क्योंकि जहाँ प्राप्त की गई भलाई का प्रेम अपरिवर्तनीय है, वहाँ निश्चय ही बुराई से बचने वाला भय, यदि मैं ऐसा कहूँ, चिन्ता से मुक्त होता है। क्योंकि "पवित्र भय" के नाम से दाऊद उस इच्छा का संकेत देता है जिससे हम अनिवार्य रूप से पाप से सिकुड़ जाएंगे और उससे अपनी रक्षा करेंगे—दुर्बलता की उस चिन्ता से नहीं जो डरती है कि हम कदाचित बलपूर्वक पाप कर बैठें, वरन सिद्ध प्रेम की शान्ति से। अथवा यदि उस चिरस्थायी और आनन्दमय सुखों की परम अडिग सुरक्षा में किसी प्रकार का भय बिलकुल भी न रहेगा, तो यह वचन, "यहोवा का भय पवित्र है, वह सदा बना रहता है," उसी अर्थ में लिया जाना चाहिए जिस अर्थ में यह दूसरा वचन लिया जाता है, "दीनों का धैर्य सदा नाश न होगा।"[83] क्योंकि धैर्य, जो केवल वहीं आवश्यक है जहाँ दुःख सहने पड़ें, सनातन नहीं होगा, परन्तु जिस वस्तु की ओर धैर्य हमें ले जाता है वह सनातन होगी। सो सम्भवतः यह "पवित्र भय" इस कारण सदा बना रहने वाला कहा जाता है, क्योंकि जिस ओर भय ले जाता है वह बना रहेगा।

    और चूँकि यह ऐसा ही है,—क्योंकि धन्य जीवन को प्राप्त करने के लिए हमें भला जीवन बिताना अनिवार्य है,—इस कारण भले जीवन में ये सब मनोभाव उचित रीति से होते हैं, बुरे जीवन में ये विपरीत रीति से होते हैं। परन्तु सनातन धन्य जीवन में प्रेम और आनन्द होंगे, न केवल उचित वरन सुदृढ़ भी; परन्तु वहाँ भय और शोक बिलकुल न होंगे। इससे कुछ अंश तक यह प्रकट हो जाता है कि परमेश्वर के नगर के नागरिकों को इस अपनी यात्रा में किस प्रकार का होना चाहिए, जो आत्मा के अनुसार जीते हैं, न कि देह के अनुसार,—अर्थात परमेश्वर के अनुसार, न कि मनुष्य के अनुसार,—और वे उस अमरता में भी किस प्रकार के होंगे, जिस ओर वे यात्रा कर रहे हैं। और दुष्टों का नगर या समाज, जो परमेश्वर के अनुसार नहीं वरन मनुष्य के अनुसार जीता है, और जो मनुष्यों या दुष्टात्माओं के मतों को झूठी उपासना में और सच्ची दिव्यता के तिरस्कार में ग्रहण करता है, उन दुष्ट संवेगों से रोगों और उपद्रवों के समान हिल जाता है। और यदि उसके कुछ नागरिक ऐसे प्रतीत हों जो इन विकारों को रोकते और मानो संयत करते हैं, तो वे अभक्तिपूर्ण अहंकार से इतने फूले हुए होते हैं कि उनकी पीड़ा जितनी कम होती है, उनका रोग उतना ही अधिक बड़ा होता है। और यदि कुछ लोग, अपनी विरलता के अनुपात में एक राक्षसी घमण्ड से भरकर, स्वयं से इस कारण मोहित हो गए हैं कि उन्हें कोई भी मनोविकार उत्तेजित या प्रेरित नहीं कर सकता, कोई भाव उन्हें हिला या झुका नहीं सकता, तो ऐसे लोग सच्ची शान्ति प्राप्त करने के बदले समस्त मानवता को खो देते हैं। क्योंकि कोई वस्तु केवल इस कारण उचित नहीं ठहरती कि वह अटल है, और न ही केवल इस कारण स्वस्थ ठहरती है कि वह संवेदनहीन है।

    10. क्या यह विश्वास करना उचित है कि हमारे आदि माता-पिता स्वर्गोद्यान में, पाप करने से पहले, सब मनोविकारों से मुक्त थे

    परन्तु यह प्रश्न उपयुक्त है कि क्या हमारे आदि पिता, अथवा आदि माता-पिता (क्योंकि वहाँ दो का विवाह हुआ था), पाप करने से पहले, अपनी प्राणिक देह में वैसे मनोविकारों का अनुभव करते थे जैसे हम उस आत्मिक देह में, जब पाप शुद्ध होकर सर्वथा मिट जाएगा, नहीं करेंगे। क्योंकि यदि वे ऐसा अनुभव करते थे, तो फिर वे उस प्रशंसित धन्यता के स्थान, स्वर्गोद्यान में, धन्य कैसे थे? क्योंकि जो भय या शोक से प्रभावित हो, उसे सर्वथा धन्य कैसे कहा जा सकता है? और उन आशीषों की ऐसी बहुतायत में, जहाँ न मृत्यु का भय था न रोग का, और जहाँ भली इच्छा जो कुछ चाहती उसमें कोई कमी न थी, और जहाँ कुछ भी उपस्थित न था जो मनुष्य के मानसिक या शारीरिक सुख में बाधा डाल सके, वे व्यक्ति किससे भयभीत होते या क्या कष्ट सहते? परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम निर्मल था, और उनका परस्पर स्नेह विश्वासयोग्य और निष्कपट विवाह का था; और इस प्रेम से एक अद्भुत आनन्द बहता था, क्योंकि वे जिससे प्रेम करते थे उसे सदा भोगते थे। पाप से उनका बचाव शान्तिपूर्ण था; और जब तक वह बना रहा, कोई और बुराई उन पर आक्रमण करके शोक न ला सकती थी। अथवा क्या वे कदाचित उस निषिद्ध फल को छूने और खाने की इच्छा करते थे, फिर भी मरने से डरते थे; और इस प्रकार, उस धन्य स्थान में भी, भय और इच्छा दोनों ही मानवजाति के इन आदि जनों को सताते थे? दूर हो यह विचार कि जहाँ पाप नहीं था, वहाँ ऐसा हो सकता था! और वास्तव में, उन वस्तुओं की इच्छा करना जिन्हें परमेश्वर की व्यवस्था निषेध करती है, और उनसे दण्ड के भय से दूर रहना, धर्म के प्रेम से नहीं—यह तो पहले से ही पाप है। दूर हो, कहता हूँ, यह विचार कि किसी पाप के होने से पहले उस फल के विषय वही पाप पहले ही किया जा चुका था जिससे हमारा प्रभु हमें किसी स्त्री के विषय में सावधान करता है: "जो कोई किसी स्त्री को कुदृष्टि से देखे, वह अपने मन में उसके साथ व्यभिचार पहले ही कर चुका।"[84] सो जितने धन्य ये हमारे आदि माता-पिता थे, जो न किसी मानसिक विकार से उद्वेलित होते थे और न किसी शारीरिक असुविधा से खिन्न होते थे, उतना ही धन्य समस्त मानवजाति भी रह सकती थी, यदि उन्होंने वह बुराई प्रारम्भ न की होती जिसे उन्होंने अपनी सन्तान को सौंप दिया, और यदि उनकी सन्तान में से किसी ने भी दण्ड के योग्य अधर्म न किया होता; और यह आदि धन्यता उस आशीर्वाद के बल पर, जिसने कहा था, "फूलो-बढ़ो,"[85] तब तक बनी रहती जब तक पूर्वनियत सन्तों की संख्या पूरी न हो जाती, और तब उन्हें वह उच्चतर सुख प्रदान किया जाता जिसे परम धन्य स्वर्गदूत भोगते हैं—अर्थात एक ऐसी धन्यता, जिसमें यह सुदृढ़ आश्वासन होता कि कोई पाप नहीं करेगा, और कोई मरेगा नहीं; और इस प्रकार सन्त, श्रम, पीड़ा, या मृत्यु का कोई स्वाद लिए बिना, वैसे ही जीवित रहते जैसे अब वे पुनरुत्थान में, इन सब वस्तुओं को सहन कर लेने के पश्चात, जीवित रहेंगे।

    11. पहले मनुष्य के पतन के विषय में, जिसमें स्वभाव भला सृजा गया था, और जिसे केवल उसका सृष्टिकर्ता ही बहाल कर सकता है

    परन्तु क्योंकि परमेश्वर ने सब बातों को पहले से देख लिया था, और इस कारण वह इससे अनजान नहीं था कि मनुष्य भी गिरेगा, इस कारण हमें इस पवित्र नगर पर उस दृष्टि से विचार करना चाहिए जो परमेश्वर ने पहले देखी और नियुक्त की, न कि अपने ही विचारों के अनुसार, जो परमेश्वर के विधान को नहीं समेट सकते। क्योंकि मनुष्य अपने पाप से परमेश्वर की मंत्रणा को न बिगाड़ सका, न ही परमेश्वर को इस पर बाध्य कर सका कि वह अपने निर्णय को बदल दे; क्योंकि परमेश्वर के पूर्वज्ञान ने दोनों बातों को पहले ही देख लिया था—अर्थात यह भी कि जिस मनुष्य को उसने भला सृजा था वह कैसा बुरा बन जाएगा, और यह भी कि इससे भी वह स्वयं कैसी भलाई निकालेगा। क्योंकि यद्यपि यह कहा जाता है कि परमेश्वर अपने निश्चयों को बदल देता है (जिससे लाक्षणिक अर्थ में पवित्रशास्त्र यहाँ तक कहता है कि परमेश्वर पछताया[86]), तौभी यह मनुष्य की प्रत्याशा या प्राकृतिक कारणों के क्रम के सन्दर्भ में कहा जाता है, न कि उस के सन्दर्भ में जो सर्वशक्तिमान ने पहले से जान लिया था कि वह करेगा। इस कारण परमेश्वर ने, जैसा लिखा है, मनुष्य को सीधा बनाया,[87] और परिणामतः एक भली इच्छा के साथ। क्योंकि यदि उसमें भली इच्छा न होती, तो वह सीधा न हो सकता था। सो भली इच्छा परमेश्वर का कार्य है; क्योंकि परमेश्वर ने उसे उसी के साथ सृजा। परन्तु पहली बुरी इच्छा, जो मनुष्य के सब बुरे कार्यों से पहले थी, कोई सकारात्मक कार्य न थी, वरन एक प्रकार का परमेश्वर के कार्य से अपने ही कार्यों की ओर गिर जाना थी। और इस कारण जो कार्य उससे उत्पन्न हुए वे बुरे थे, क्योंकि उनका लक्ष्य परमेश्वर नहीं, वरन इच्छा स्वयं थी; इस प्रकार वह इच्छा, या मनुष्य स्वयं, जहाँ तक उसकी इच्छा बुरी है, मानो वह बुरा वृक्ष था जो बुरा फल लाता है। इसके अतिरिक्त, बुरी इच्छा, यद्यपि वह स्वभाव के साथ मेल में नहीं वरन उसके विरुद्ध है, इसलिये कि वह एक दोष या दाग है, तौभी यह उसके विषय में, जैसे प्रत्येक दोष के विषय में, सत्य है कि वह किसी स्वभाव के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती, और केवल उस स्वभाव में जो शून्य में से सृजा गया हो, न कि उस में जिसे सृष्टिकर्ता ने अपने आप से जन्म दिया हो, जैसे उसने वचन को जन्म दिया, जिसके द्वारा सब वस्तुएँ बनी। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने मनुष्य को पृथ्वी की धूल से बनाया, तौभी पृथ्वी स्वयं, और प्रत्येक पार्थिव पदार्थ, पूर्ण रूप से शून्य में से सृजा गया है; और मनुष्य की आत्मा को भी परमेश्वर ने शून्य में से सृजा, और मनुष्य को बनाते समय उसे देह के साथ जोड़ दिया। परन्तु बुराइयाँ भलाई से इस प्रकार पूर्ण रूप से पराजित होती हैं कि यद्यपि उन्हें अस्तित्व में रहने की अनुमति दी जाती है, इसलिये कि यह दिखाया जा सके कि परमेश्वर का परम धर्ममय पूर्वदर्शन उनका भी भला उपयोग कैसे कर सकता है, तौभी भलाई बुराई के बिना अस्तित्व में रह सकती है, जैसे सच्चे और परम परमेश्वर में स्वयं, और जैसे प्रत्येक अदृश्य और दृश्य स्वर्गीय सृष्टि में जो इस धूमिल वातावरण के ऊपर विद्यमान है; परन्तु बुराई भलाई के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती, क्योंकि जिन स्वभावों में बुराई विद्यमान है, वे, जहाँ तक वे स्वभाव हैं, भले ही हैं। और बुराई इस प्रकार दूर नहीं की जाती कि किसी स्वभाव को, या स्वभाव के किसी अंश को, जिसे बुराई ने प्रविष्ट कराया था, हटा दिया जाए, वरन उसे चंगा और सुधार कर, जो बिगड़ गया और भ्रष्ट हो गया था। इसलिये इच्छा तब सचमुच स्वतंत्र है, जब वह दोषों और पापों की दासी नहीं है। ऐसी ही वह हमें परमेश्वर द्वारा दी गई थी; और यह अपनी ही भूल से खोकर, केवल उसी के द्वारा बहाल की जा सकती है जो आरम्भ में इसे देने में समर्थ था। और इसलिये सत्य कहता है, "यदि पुत्र तुम्हें स्वतंत्र करेगा, तो तुम सचमुच स्वतंत्र हो जाओगे;"[88] जो इसके समान है कि यदि पुत्र तुम्हें उद्धार देगा, तो तुम सचमुच उद्धार पाओगे। क्योंकि वह हमारा मुक्तिदाता है, इसलिये कि वह हमारा उद्धारकर्ता है।

    मनुष्य तब परमेश्वर के साथ, अपने शासक के रूप में, एक ऐसे स्वर्गोद्यान में रहता था जो एक साथ भौतिक भी था और आत्मिक भी। क्योंकि यह न तो केवल भौतिक था, देह के लाभ के लिये, और आत्मिक नहीं, मन के लाभ के लिये; न ही यह केवल आत्मिक था, ताकि मनुष्य को अपनी भीतरी संवेदनाओं से आनन्द दे, और भौतिक नहीं, ताकि उसे अपनी बाहरी इन्द्रियों से आनन्द दे। परन्तु स्पष्टतः यह दोनों उद्देश्यों के लिये दोनों ही था। परन्तु उस अभिमानी और इसीलिये ईर्ष्यालु स्वर्गदूत के पश्चात्—जिसके पतन के विषय मैं इस रचना की ग्यारहवीं और बारहवीं पुस्तकों में जितना कह सका उतना कह चुका हूँ, और उसके साथियों के विषय भी, जो परमेश्वर के स्वर्गदूत होने से उसके स्वर्गदूत बन गए—दूसरे के अधीन रहने के बदले किसी प्रकार के साम्राज्य के ठाट-बाट से शासन करने को अधिक चाहते हुए, वह आत्मिक स्वर्गोद्यान से गिर पड़ा, और मनुष्य के मन में अपनी फुसलाने वाली कुटिलता को घुसाने का प्रयत्न करते हुए—जिसकी अपतित अवस्था स्वयं के पतित हो जाने पर उसे और भी ईर्ष्या से भर देती थी—उसने उस भौतिक स्वर्गोद्यान में, जिसमें वह और अन्य सब पार्थिव प्राणी उन दो मानवों, अर्थात पुरुष और उसकी पत्नी, के साथ, उनके अधीन और निर्दोष रूप से रहते थे, अपने मुखपत्र के रूप में सर्प को चुना; और उसने सर्प को इस कारण चुना क्योंकि, फिसलनदार और घुमावदार चालों में चलने के कारण, वह उसके उद्देश्य के लिये उचित था। और इस प्राणी को अपने स्वर्गदूतीय स्वभाव की उपस्थिति और श्रेष्ठ सामर्थ्य से अपने दुष्ट उद्देश्यों के लिये वशीभूत करते हुए, उसने इसे अपने साधन के रूप में दुरुपयोग किया, और पहले स्त्री पर अपनी छलकपट का प्रयोग किया, उस मानवीय संगति के दुर्बलतर भाग पर अपना आक्रमण करते हुए, कि वह क्रमशः सम्पूर्ण को प्राप्त कर ले, यह न मानते हुए कि पुरुष सहज ही उसकी बात सुन लेगा या धोखा खा जाएगा, वरन इस आशा से कि वह स्त्री की भूल के आगे झुक जाएगा। क्योंकि जैसे हारून लोगों की उस अन्धी इच्छा से सहमत होने के लिये प्रेरित नहीं हुआ था जब उन्होंने चाहा कि वह उनके लिये मूर्ति बनाए, तौभी वह दबाव के आगे झुक गया; और जैसे यह विश्वासयोग्य नहीं है कि सुलैमान इतना अन्धा था कि उसने सोचा कि मूर्तियों की पूजा की जानी चाहिए, वरन वह स्त्रियों की चापलूसी से ऐसे अपवित्र कार्य की ओर खींचा गया; उसी प्रकार हम यह विश्वास नहीं कर सकते कि आदम धोखा खा गया और उसने शैतान के वचन को सत्य मान लिया, और इसलिये परमेश्वर की व्यवस्था का उल्लंघन किया, वरन यह कि वह आत्मीयता के आकर्षण से स्त्री के आगे झुक गया, पति पत्नी के आगे, एक मानव उस एकमात्र दूसरे मानव के आगे। क्योंकि प्रेरित ने बिना किसी विशेष तात्पर्य के यह नहीं कहा, "और आदम धोखा नहीं खाया, परन्तु स्त्री धोखा खाकर अपराध में फंस गई;"[89] परन्तु वह इस प्रकार कहता है, क्योंकि स्त्री ने सर्प की कही बात को सत्य मान लिया, परन्तु पुरुष अपने एकमात्र साथी से अलग होना सहन न कर सका, यद्यपि इसमें पाप की सहभागिता सम्मिलित थी। इस कारण वह कम दोषी नहीं था, वरन उसने आँखें खोलकर पाप किया। और इसलिये प्रेरित यह नहीं कहता, "उसने पाप नहीं किया," वरन "वह धोखा नहीं खाया।" क्योंकि वह यह दिखाता है कि उसने पाप किया जब वह कहता है, "एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया,"[90] और तुरन्त बाद अधिक स्पष्टता से, "आदम के अपराध की समानता में।" परन्तु उसका अर्थ यह था कि वे धोखा खाए हुए हैं जो यह निर्णय नहीं करते कि जो वे करते हैं वह पाप है; परन्तु वह तो जानता था। अन्यथा यह कैसे सत्य होता कि "आदम धोखा नहीं खाया?" परन्तु अभी तक परमेश्वर की कठोरता का कोई अनुभव न होने के कारण, वह सम्भवतः इस सीमा तक धोखा खाया हुआ था कि उसने सोचा कि उसका पाप क्षमा योग्य है। और परिणामतः वह उस प्रकार धोखा नहीं खाया जैसे स्त्री धोखा खाई थी, वरन वह उस निर्णय के विषय में धोखा खाया जो उसकी सफाई पर दिया जाना था: "जो स्त्री तू ने मेरे संग करने को दी थी, उसने मुझे दिया, और मैं ने खाया।"[91] अधिक कहने की क्या आवश्यकता है? यद्यपि वे दोनों भोलेपन से धोखा नहीं खाए थे, तौभी दोनों ही शैतान के जालों में उलझ गए, और पाप द्वारा पकड़े गए।

    12. मनुष्य के पहले पाप के स्वभाव के विषय में

    यदि किसी को यह समझने में कठिनाई हो कि अन्य पाप मानवीय स्वभाव को उस प्रकार क्यों नहीं बदलते जैसे यह उन आदि मानवों के अपराध से बदला गया, जिससे यह स्वभाव उस महान भ्रष्टता के अधीन हो गया जिसे हम अनुभव करते और देखते हैं, और मृत्यु के अधीन, और इतने प्रचण्ड और परस्पर विरोधी मनोविकारों से विचलित और झकझोरा हुआ हो गया, और निश्चय ही उससे बहुत भिन्न है जो वह पाप से पहले था, यद्यपि तब भी वह एक प्राणिक देह में निवास करता था—यदि, कहता हूँ, कोई इससे प्रभावित हो, तो उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि वह पाप छोटा और तुच्छ था इस कारण कि वह भोजन के विषय में किया गया था, और वह भोजन न बुरा था न हानिकारक, केवल इसलिये कि वह निषिद्ध था; क्योंकि उस अद्वितीय सुख के स्थान में परमेश्वर कोई बुरी वस्तु सृज या रोप नहीं सकता था। परन्तु उस आदेश के द्वारा जो उसने दिया, परमेश्वर ने आज्ञापालन की सराहना की, जो, एक प्रकार से, बुद्धिमान सृष्टि में सब गुणों की माता और रक्षिका है, जो इस प्रकार सृजी गई थी कि उसके लिये अधीनता लाभकारी है, जबकि सृष्टिकर्ता की इच्छा के स्थान पर अपनी ही इच्छा की पूर्ति उसका विनाश है। और चूँकि यह आदेश, जो अन्य प्रकार के भोजन की बड़ी बहुतायत के बीच एक ही प्रकार के भोजन से दूर रहने का निर्देश देता था, इतना सहज था मानने योग्य—स्मृति के लिये इतना हल्का भार—और, सबसे बढ़कर, इसके पालन में वासना से किसी प्रकार का प्रतिरोध नहीं मिला, जो पाप के दण्डस्वरूप परिणाम के रूप में केवल बाद में उत्पन्न हुई, इस कारण इसका उल्लंघन करने का अधर्म उस सहजता के अनुपात में ही अधिक बड़ा था जिससे इसे माना जा सकता था।

    13. कि आदम के पाप में एक बुरी इच्छा बुरे कार्य से पहले थी

    हमारे आदि माता-पिता खुले अनाज्ञापालन में इस कारण गिरे क्योंकि वे गुप्त रूप से पहले ही भ्रष्ट हो चुके थे; क्योंकि वह बुरा कार्य कभी नहीं होता यदि उससे पहले एक बुरी इच्छा न होती। और हमारी बुरी इच्छा का मूल क्या है, अभिमान के अतिरिक्त? क्योंकि "अभिमान पाप का आदि है।"[92] और अभिमान क्या है, अनुचित उन्नति की लालसा के अतिरिक्त? और यह अनुचित उन्नति तब होती है, जब आत्मा उसे त्याग देती है जिससे उसे अपने लक्ष्य के रूप में चिपटे रहना चाहिए, और स्वयं ही एक प्रकार का लक्ष्य बन जाती है। यह तब होता है जब वह अपनी ही सन्तुष्टि बन जाती है। और यह तब होता है जब वह उस अपरिवर्तनीय भलाई से गिर जाती है जिसे उससे अधिक उसे सन्तुष्ट करना चाहिए। यह गिरना स्वेच्छापूर्ण है; क्योंकि यदि इच्छा उस उच्चतर और अपरिवर्तनीय भलाई के प्रेम में स्थिर रहती, जिससे वह बुद्धि के लिये प्रकाशित और प्रेम के लिये प्रज्वलित होती थी, तो वह अपनी ही सन्तुष्टि खोजने के लिये मुड़ न जाती, और इस प्रकार शीतल और अन्धकारमय न बनती; स्त्री यह विश्वास न करती कि सर्प सत्य बोल रहा था, न ही पुरुष अपनी पत्नी की विनती को परमेश्वर के आदेश से अधिक चाहता, न ही यह सोचता कि अपने जीवन-सहचरी से चिपटे रहना, यहाँ तक कि पाप की सहभागिता में भी, एक क्षमा योग्य अपराध था। सो वह दुष्ट कर्म—अर्थात निषिद्ध फल खाने का अपराध—उन व्यक्तियों द्वारा किया गया जो पहले से ही दुष्ट थे। वह "बुरा फल"[93] केवल "भ्रष्ट वृक्ष" से ही उत्पन्न हो सकता था। परन्तु वृक्ष का बुरा होना स्वभाव का परिणाम न था; क्योंकि निश्चय ही वह केवल इच्छा के दोष से ही ऐसा बन सकता था, और दोष स्वभाव के विरुद्ध है। अब, स्वभाव दोष से भ्रष्ट न हो सकता था यदि वह शून्य में से न बनाया गया होता। परिणामतः, यह कि वह एक स्वभाव है, इसका कारण यह है कि वह परमेश्वर द्वारा बनाया गया है; परन्तु यह कि वह उससे गिर जाता है, इसका कारण यह है कि वह शून्य में से बनाया गया है। परन्तु मनुष्य इस प्रकार नहीं गिरा[94] कि वह पूर्ण रूप से कुछ भी न रह जाए; परन्तु स्वयं की ओर मुड़कर, उसका अस्तित्व उससे अधिक संकुचित हो गया जितना वह तब था जब वह उससे चिपटा हुआ था जो परम रूप से है। इस कारण, स्वयं में अस्तित्व रखना, अर्थात परमेश्वर को त्यागकर अपनी ही सन्तुष्टि बनना, पूर्ण रूप से शून्यता बनना नहीं है, परन्तु उसके निकट पहुँचना है। और इसलिये पवित्रशास्त्र अभिमानियों को एक और नाम से पुकारते हैं, "स्वयं को भाने वाले।" क्योंकि हृदय का उठाया जाना भला है, परन्तु स्वयं की ओर नहीं, क्योंकि यह अभिमान है, वरन प्रभु की ओर, क्योंकि यह आज्ञापालन है, और यह केवल दीनों का ही कार्य हो सकता है। इस कारण दीनता में कुछ ऐसा है जो, अद्भुत रूप से, हृदय को ऊँचा उठाता है, और अभिमान में कुछ ऐसा है जो उसे नीचा करता है। यह वास्तव में विरोधाभासी प्रतीत होता है, कि ऊँचाई नीचा करे और नीचाई ऊँचा उठाए। परन्तु भक्तिपूर्ण दीनता हमें उसके अधीन होने योग्य बनाती है जो हमसे ऊँचा है; और परमेश्वर से अधिक कोई हमसे ऊँचा नहीं है; और इसलिये दीनता, हमें परमेश्वर के अधीन बनाकर, हमें ऊँचा उठाती है। परन्तु अभिमान, जो स्वभाव का एक दोष है, अधीनता से इन्कार करने और उस परम सत्ता के विरुद्ध बलवा करने के उसी कार्य द्वारा, नीची अवस्था में गिर जाता है; और तब वह पूरा होता है जो लिखा है: "जब वे स्वयं को उठाते थे, तू उन्हें गिरा देता था।"[95] क्योंकि वह यह नहीं कहता, "जब वे उठाए जा चुके थे," जैसे कि पहले वे ऊँचे उठाए गए, और बाद में गिराए गए; वरन "जब उन्होंने स्वयं को उठाया" तभी वे गिरा दिये गए—अर्थात वह उठाना स्वयं ही एक पतन था। और इसीलिये दीनता को परमेश्वर के नगर के लिये विशेष रूप से अनुशंसित किया जाता है, जैसे वह इस संसार में प्रवास करता है, और परमेश्वर के नगर में, और उसके राजा मसीह के व्यक्तित्व में, विशेष रूप से प्रदर्शित की जाती है; जबकि अभिमान का विपरीत दोष, पवित्रशास्त्र की गवाही के अनुसार, विशेष रूप से उसके विरोधी शैतान पर शासन करता है। और निश्चय ही यही वह बड़ा भेद है जो उन दो नगरों को, जिनकी हम चर्चा कर रहे हैं, अलग करता है—एक भक्तों का समाज, दूसरा अभक्तों का, प्रत्येक उन स्वर्गदूतों के साथ संयुक्त जो उनके पक्ष से जुड़े हैं, और एक स्वयं के प्रेम से, दूसरा परमेश्वर के प्रेम से निर्देशित और गढ़ा गया है।

    शैतान तब मनुष्य को उस खुले और प्रत्यक्ष पाप में—अर्थात जो परमेश्वर ने निषेध किया था उसे करने में—न फँसा पाता, यदि मनुष्य पहले से ही अपने ही लिये जीना आरम्भ न कर देता। यही वह बात थी जिसने उसे इन शब्दों को आनन्द से सुनने दिया, "तुम परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे,"[96] जिसे वे अपने परम और सच्चे लक्ष्य के प्रति आज्ञापालनपूर्वक बने रहकर कहीं अधिक सहजता से प्राप्त कर लेते, बजाय इसके कि वे अभिमानपूर्वक अपने ही लिये जीवन बिताएं। क्योंकि सृजे गए देवता देवता इस कारण नहीं हैं कि उनमें स्वयं क्या है, वरन इस कारण कि वे सच्चे परमेश्वर में सहभागी हैं। अधिक होने की लालसा से मनुष्य कम हो जाता है; और स्वयं-पर्याप्त होने की आकांक्षा से, वह उससे गिर पड़ता है जो सचमुच उसके लिये पर्याप्त है। इस कारण, यह दुष्ट अभिलाषा जो मनुष्य को स्वयं को इस प्रकार भाने के लिये प्रेरित करती है जैसे वह स्वयं ही प्रकाश हो, और जो इस प्रकार उसे उस प्रकाश से दूर कर देती है जिसका अनुसरण करता तो वह स्वयं प्रकाश बन जाता—यह दुष्ट अभिलाषा, कहता हूँ, गुप्त रूप से पहले से ही उसमें विद्यमान थी, और खुला पाप तो केवल उसका परिणाम था। क्योंकि यह सत्य है जो लिखा है, "विनाश से पहले अभिमान होता है, और आदर से पहले दीनता होती है;"[97] अर्थात गुप्त विनाश खुले विनाश से पहले होता है, जबकि पहला विनाश समझा नहीं जाता। क्योंकि कौन उन्नति को विनाश समझता है, यद्यपि परम सत्ता को त्यागते ही पतन आरम्भ हो जाता है? परन्तु कौन इसे विनाश नहीं मानता, जब आदेश का स्पष्ट और असन्दिग्ध उल्लंघन होता है? और परिणामतः, परमेश्वर के निषेध का सन्दर्भ ऐसे कार्य से था कि जब वह किया जाए, तो उसे धर्म करने के किसी बहाने से बचाया न जा सके।[98] और मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि अभिमानियों के लिये यह लाभदायक है कि वे एक खुले और असन्दिग्ध उल्लंघन में गिरें, और इस प्रकार स्वयं से अप्रसन्न हो जाएं, जैसे कि स्वयं को भाकर वे पहले ही गिर चुके थे। क्योंकि पतरस अधिक स्वस्थ अवस्था में था जब वह रोया और स्वयं से असन्तुष्ट था, बजाय इसके कि जब उसने साहसपूर्वक अनुमान लगाया और स्वयं से सन्तुष्ट हुआ। और यही पवित्र भजनहार ने कहा जब उसने कहा, "उनके मुख को लज्जा से भर दे, कि वे हे यहोवा तेरे नाम को खोजें;"[99] अर्थात जो लोग अपनी ही महिमा खोजने में स्वयं को भाए थे, वे तेरी महिमा खोजने में तुझमें प्रसन्न और सन्तुष्ट हों।

    14. उस पाप में निहित अभिमान के विषय में, जो स्वयं पाप से भी बुरा था

    परन्तु यह और भी बुरा और अधिक दण्डनीय अभिमान है जो प्रत्यक्ष पापों में भी किसी बहाने की शरण खोजता है, जैसा हमारे इन आदि माता-पिता ने किया, जिनमें से स्त्री ने कहा, "सर्प ने मुझे धोखा दिया, और मैं ने खाया;" और पुरुष ने कहा, "जो स्त्री तू ने मेरे संग करने को दी थी, उसने मुझे उस वृक्ष का फल दिया, और मैं ने खाया।"[100] यहाँ क्षमा माँगने का कोई वचन नहीं है, चंगाई की विनती का कोई वचन नहीं है। क्योंकि यद्यपि वे, कैन के समान, यह नहीं नकारते कि उन्होंने वह कार्य किया, तौभी उनका अभिमान उसकी दुष्टता को किसी और पर डालना चाहता है—स्त्री का अभिमान सर्प पर, पुरुष का स्त्री पर। परन्तु जहाँ किसी दिव्य आदेश का स्पष्ट उल्लंघन होता है, वहाँ यह स्वयं को क्षमा देने के बदले स्वयं पर आरोप लगाना ही अधिक है। क्योंकि यह तथ्य कि स्त्री ने सर्प के फुसलाने पर पाप किया, और पुरुष ने स्त्री के देने पर, उल्लंघन को कम नहीं करता, जैसे कि कोई ऐसा हो जिस पर हमें परमेश्वर से अधिक विश्वास करना या उसके आगे झुकना चाहिए।

    15. उस दण्ड के न्याय के विषय में जो हमारे आदि माता-पिता को उनके अनाज्ञापालन के लिये दिया गया

    इस कारण, क्योंकि वह पाप परमेश्वर के अधिकार का तिरस्कार था—जिसने मनुष्य को सृजा था; जिसने उसे अपने ही स्वरूप में बनाया था; जिसने उसे अन्य प्राणियों से ऊँचा स्थान दिया था; जिसने उसे स्वर्गोद्यान में रखा था; जिसने उसे प्रत्येक प्रकार की बहुतायत और सुरक्षा से समृद्ध किया था; जिसने उस पर न बहुत, न बड़े, न कठिन आदेश लगाए थे, वरन, एक स्वस्थ आज्ञापालन को उसके लिये सहज बनाने के लिये, उसे एक ही अत्यन्त संक्षिप्त और अत्यन्त हल्का आदेश दिया था जिससे उस प्राणी को, जिसकी सेवा स्वतंत्र होनी थी, यह स्मरण कराया कि वह प्रभु है—इस कारण यह न्यायोचित था कि दण्ड का पालन हुआ, और ऐसा दण्ड कि मनुष्य, जिसे आदेशों का पालन करके अपनी देह में भी आत्मिक होना चाहिए था, अपनी आत्मा में भी शारीरिक बन गया; और जैसे उसने अपने अभिमान में स्वयं की सन्तुष्टि बनने का प्रयत्न किया था, परमेश्वर ने अपने न्याय में उसे स्वयं के अधीन छोड़ दिया—न कि उस पूर्ण स्वाधीनता में जीने के लिये जिसका उसने दिखावा किया था, वरन उस स्वतंत्रता के स्थान पर जिसकी वह इच्छा करता था, स्वयं से असन्तुष्ट होकर उस पर एक कठोर और दुःखमय दासत्व में जीने के लिये जिसके आगे उसने पाप करके स्वयं को समर्पित कर दिया था—अपने विरुद्ध ही देह में मरने के लिये अभिशप्त, जैसे वह स्वेच्छा से आत्मा में मर गया था, यहाँ तक कि (यदि परमेश्वर के अनुग्रह ने उसे न बचाया होता) सनातन मृत्यु के लिये भी दण्डित, क्योंकि उसने सनातन जीवन को त्याग दिया था। जो कोई ऐसे दण्ड को अत्यधिक या अन्यायपूर्ण समझता है, वह यह दिखाता है कि वह उस पाप की बड़ी दुष्टता को मापने में असमर्थ है जिसे इतनी सहजता से टाला जा सकता था। क्योंकि जैसे अब्राहम का आज्ञापालन न्यायपूर्वक बड़ा घोषित किया जाता है, क्योंकि जो आदेश दिया गया था—अपने पुत्र को मारना—अत्यन्त कठिन था, उसी प्रकार स्वर्गोद्यान में अनाज्ञापालन उतना ही अधिक बड़ा था, क्योंकि जो आदेश दिया गया था उसकी कठिनाई नगण्य थी। और जैसे दूसरे मनुष्य का आज्ञापालन इस कारण अधिक प्रशंसनीय था कि वह यहाँ तक कि "मृत्यु तक" आज्ञाकारी बना,[101] उसी प्रकार पहले मनुष्य का अनाज्ञापालन इस कारण अधिक घृणित था कि वह मृत्यु तक भी अनाज्ञाकारी बन गया। क्योंकि जहाँ अनाज्ञापालन से जुड़ा दण्ड बड़ा हो, और सृष्टिकर्ता का आदेश सहज हो, वहाँ कौन पर्याप्त रूप से यह आँक सकता है कि इतने सहज विषय में इतनी बड़ी सामर्थ्य के अधिकार का पालन न करना कितनी बड़ी दुष्टता है, विशेषकर जब वह सामर्थ्य इतने भयावह दण्ड से चेतावनी देती है?

    संक्षेप में, एक ही शब्द में सब कहने के लिए, उस पाप में अनाज्ञापालन का दण्ड अनाज्ञापालन के अतिरिक्त और क्या था? क्योंकि मनुष्य का दुःख उसकी स्वयं के प्रति अपनी ही अनाज्ञाकारिता के अतिरिक्त और क्या है, जिससे, जो वह कर सकता था उसे करने के लिये तैयार न होने के परिणामस्वरूप, वह अब वह करना चाहता है जो वह नहीं कर सकता? क्योंकि यद्यपि वह पाप करने से पहले स्वर्गोद्यान में सब कुछ नहीं कर सकता था, तौभी वह केवल वही करना चाहता था जो वह कर सकता था, और इसलिये वह जो चाहता था वह सब कर सकता था। परन्तु अब, जैसा हम उसकी सन्तान में पहचानते हैं, और जैसा दिव्य पवित्रशास्त्र गवाही देता है, "मनुष्य व्यर्थता के समान है।"[102] क्योंकि कौन गिन सकता है कि वह कितनी बातें चाहता है जिन्हें वह नहीं कर सकता, जब तक वह स्वयं के प्रति अनाज्ञाकारी है, अर्थात जब तक उसका मन और उसकी देह उसकी इच्छा के अधीन नहीं होते? क्योंकि उसकी इच्छा के विरुद्ध उसका मन बारम्बार उद्वेलित होता है, और उसकी देह कष्ट सहती है, बूढ़ी होती है, और मरती है; और अपनी इच्छा के विरुद्ध हम वह सब कुछ सहते हैं जो हम सहते हैं, जिसे हम न सहते यदि हमारा स्वभाव सम्पूर्ण रूप से और अपने सब अंगों में हमारी इच्छा का पालन करता। परन्तु क्या यह देह की दुर्बलताएँ नहीं हैं जो उसकी सेवा में बाधा डालती हैं? तौभी इससे क्या भेद पड़ता है कैसे उसकी सेवा में बाधा पड़ती है, जब तक यह तथ्य बना रहता है कि उस सर्वोच्च परमेश्वर के न्यायपूर्ण प्रतिफल से, जिसके अधीन और जिसकी सेवा में हम रहने से इन्कार कर बैठे, हमारी देह, जो हमारे अधीन थी, अब अनाज्ञाकारिता से हमें सताती है, यद्यपि हमारे अनाज्ञापालन ने संकट हम पर ही लाया, परमेश्वर पर नहीं? क्योंकि उसे हमारी सेवा की आवश्यकता नहीं जैसे हमें अपनी देह की सेवा की है; और इसलिये जो हमने किया वह उसके लिये कोई दण्ड नहीं था, परन्तु जो हम पाते हैं वह हमारे लिये दण्ड है। और जिन्हें शारीरिक पीड़ाएँ कहा जाता है, वे आत्मा की पीड़ाएँ हैं जो देह में और देह से उत्पन्न होती हैं। क्योंकि देह स्वयं से और आत्मा के बिना कौन सी पीड़ा या अभिलाषा अनुभव कर सकती है? परन्तु जब कहा जाता है कि देह अभिलाषा करती है या कष्ट सहती है, तो इसका अर्थ, जैसा हम बता चुके हैं, यह है कि मनुष्य ऐसा करता है, अथवा आत्मा का कोई अंश जो देह की संवेदना से प्रभावित होता है, चाहे वह कठोर संवेदना हो जो पीड़ा उत्पन्न करती है, या कोमल हो जो सुख उत्पन्न करती है। परन्तु देह में पीड़ा केवल आत्मा की एक असुविधा है जो देह से उत्पन्न होती है, और उसके कष्ट से एक प्रकार का सिकुड़ना है, जैसे आत्मा की पीड़ा, जिसे उदासी कहा जाता है, उन बातों से सिकुड़ना है जो हमारी इच्छा के विरुद्ध हम पर घटी हैं। परन्तु उदासी अकसर भय से पहले होती है, जो स्वयं आत्मा में है, देह में नहीं; जबकि शारीरिक पीड़ा से पहले देह का किसी प्रकार का भय नहीं होता, जो पीड़ा से पहले देह में अनुभव किया जा सके। परन्तु सुख से पहले एक निश्चित भूख होती है जो देह में एक लालसा के समान अनुभव की जाती है, जैसे भूख और प्यास, और वह जननिक भूख जो सबसे सामान्य रूप से "वासना" के नाम से पहचानी जाती है, यद्यपि यह सब अभिलाषाओं के लिये सामान्य शब्द है। क्योंकि क्रोध को भी प्राचीन लोगों ने प्रतिशोध की वासना के अतिरिक्त और कुछ नहीं परिभाषित किया;[103] यद्यपि कभी-कभी मनुष्य निर्जीव वस्तुओं पर भी क्रोधित होता है जो उसके प्रतिशोध को अनुभव नहीं कर सकतीं, जैसे जब कोई कलम तोड़ देता है, या किसी बुरी तरह लिखने वाली पंखनुमा कलम को कुचल देता है। तौभी यह भी, यद्यपि कम युक्तिपूर्ण है, अपनी रीति से प्रतिशोध की एक वासना है, और, यूँ कहें तो, प्रतिफल के [उस महान नियम की] एक रहस्यमय प्रकार की छाया है, कि जो बुराई करते हैं उन्हें बुराई सहनी चाहिए। सो प्रतिशोध की एक वासना है, जिसे क्रोध कहा जाता है; धन की एक वासना है, जिसे लोभ के नाम से जाना जाता है; विजय पाने की एक वासना है, चाहे किसी भी साधन से, जिसे हठधर्मिता कहा जाता है; प्रशंसा की एक वासना है, जिसे आत्मश्लाघा कहा जाता है। ऐसी अनेक और विविध वासनाएँ हैं, जिनमें से कुछ के अपने नाम हैं, जबकि अन्यों के नहीं। क्योंकि शासन करने की वासना को कौन सहजता से कोई नाम दे सकता है, जो तौभी अत्याचारियों की आत्मा में इतना सामर्थ्यवान प्रभाव रखती है, जैसा गृहयुद्ध गवाही देते हैं?

    16. वासना की बुराई के विषय में—एक शब्द जो, अनेक दोषों पर लागू होते हुए भी, विशेष रूप से यौन अशुद्धता के लिये विनियोजित किया गया है

    इस कारण, यद्यपि वासना के अनेक विषय हो सकते हैं, तौभी जब कोई विषय निर्दिष्ट नहीं होता, तब वासना शब्द सामान्यतः मन में जननांगों की वासनामय उत्तेजना का बोध कराता है। और यह वासना न केवल सम्पूर्ण देह और बाहरी अंगों पर अधिकार कर लेती है, वरन भीतर भी अपने आपको अनुभूत कराती है, और सम्पूर्ण मनुष्य को एक ऐसे उन्माद से हिला देती है जिसमें मानसिक संवेग शारीरिक भूख के साथ मिश्रित हो जाता है, जिससे जो सुख उत्पन्न होता है वह सब शारीरिक सुखों में सबसे बड़ा है। यह सुख सचमुच इतना अधिकार करने वाला है कि जिस क्षण में यह पूर्ण होता है, समस्त मानसिक क्रिया स्थगित हो जाती है। बुद्धि और पवित्र आनन्दों का कौन मित्र, जो विवाहित होते हुए भी, यह जानते हुए, जैसा प्रेरित कहता है, "अपने पात्र को पवित्रता और आदर में कैसे रखा जाए, अभिलाषा के उस रोग में नहीं, जैसे अन्यजाति के लोग जो परमेश्वर को नहीं जानते,"[104] यह न चाहेगा, यदि यह सम्भव होता, कि वह इस वासना के बिना सन्तान उत्पन्न करे, कि इस सन्तानोत्पत्ति के कार्य में इसके लिये सृजे गए अंग वासना की उष्णता से उत्तेजित न हों, वरन उसकी इच्छा से चलित हों, उसी प्रकार जिस प्रकार उसके अन्य अंग उसके अपने-अपने उद्देश्यों के लिये उसकी सेवा करते हैं? परन्तु इस सुख में आनन्दित होने वाले भी अपनी ही इच्छा से इसकी ओर प्रेरित नहीं होते, चाहे वे स्वयं को उचित सुखों तक सीमित रखें या अनुचित सुखों की ओर उल्लंघन करें; वरन कभी यह वासना उनकी इच्छा के विरुद्ध ही उन्हें व्याकुल करती है, और कभी जब वे इसे अनुभव करना चाहते हैं तब यह उनका साथ नहीं देती, इस प्रकार कि यद्यपि वासना मन में उग्र होती है, यह देह में हिलती-डुलती नहीं। इस प्रकार, अद्भुत रूप से, यह संवेग न केवल सन्तानोत्पत्ति की न्यायसंगत इच्छा का पालन करने में असफल रहता है, वरन कामुक वासना की सेवा करने से भी इन्कार करता है; और यद्यपि यह अकसर उस आत्मा के विरुद्ध, जो इसका प्रतिरोध करती है, अपनी सम्पूर्ण संयुक्त शक्ति लगा देता है, तौभी कभी-कभी यह स्वयं के विरुद्ध ही विभाजित हो जाता है, और आत्मा को हिलाते हुए भी देह को अचल छोड़ देता है।

    17. हमारे आदि माता-पिता की नग्नता के विषय में, जिसे उन्होंने अपने नीच और लज्जास्पद पाप के पश्चात देखा

    न्यायपूर्वक ही लज्जा इस वासना से इतने विशेष रूप से जुड़ी है; न्यायपूर्वक ही, ये अंग स्वयं, जो हमारी इच्छा से नहीं वरन एक प्रकार की स्वतंत्र स्वेच्छाचारिता से, यूँ कहें तो, गतिमान और नियंत्रित होते हैं, "लज्जास्पद" कहलाते हैं। पाप से पहले उनकी अवस्था भिन्न थी। क्योंकि जैसा लिखा है, "वे नंगे थे और लजाते नहीं थे,"[105]—इसलिये नहीं कि उनकी नग्नता उनसे अज्ञात थी, वरन इस कारण कि नग्नता अभी लज्जास्पद नहीं थी, क्योंकि अभी तक वासना उन अंगों को इच्छा की स्वीकृति के बिना गतिमान नहीं करती थी; अभी तक देह अपनी अनाज्ञाकारिता से मनुष्य की अनाज्ञाकारिता के विरुद्ध गवाही नहीं देती थी। क्योंकि वे अन्धे सृजे नहीं गए थे, जैसा अज्ञानी सामान्य जन कल्पना करते हैं;[106] क्योंकि आदम ने उन प्राणियों को देखा जिनके नाम उसने रखे, और हव्वा के विषय हम पढ़ते हैं, "स्त्री ने देखा कि वह वृक्ष खाने के लिये उत्तम है, और देखने के लिये सुहावना है।"[107] उनकी आँखें, इस कारण, खुली थीं, परन्तु इस बात के लिये खुली नहीं थीं, अर्थात इतनी सजग नहीं थीं कि वे यह पहचान सकें कि अनुग्रह के उस वस्त्र से उन्हें क्या प्रदान किया गया था, क्योंकि उन्हें अपने अंगों के अपनी इच्छा के विरुद्ध युद्ध करने का कोई बोध नहीं था। परन्तु जब वे इस अनुग्रह से वंचित कर दिये गए,[108] कि उनकी अनाज्ञाकारिता उचित प्रतिफल से दण्डित हो, तब उनके शारीरिक अंगों की गति में एक निर्लज्ज नवीनता आरम्भ हुई जिसने नग्नता को अशोभनीय बना दिया: इसने तुरन्त उन्हें सजग भी बना दिया और लज्जित भी। और इसलिये, परमेश्वर के आदेश का खुले उल्लंघन से उल्लंघन करने के पश्चात, लिखा है: "और उन दोनों की आँखें खुल गईं, और उन्होंने जाना कि वे नंगे हैं; और उन्होंने अंजीर के पत्ते सीकर अपने लिये लंगोटियाँ बनाईं।"[109] "उन दोनों की आँखें खुल गईं"—देखने के लिये नहीं, क्योंकि वे पहले से ही देखते थे, वरन उस भलाई और उस बुराई के बीच भेद करने के लिये जिसे उन्होंने खो दिया था और जिसमें वे गिर पड़े थे। और इसलिये वह वृक्ष स्वयं, जिसे छूने से उन्हें मना किया गया था, इस परिस्थिति से भले और बुरे के ज्ञान का वृक्ष कहलाया, कि यदि वे उसमें से खाते तो यह उन्हें यह ज्ञान प्रदान करता। क्योंकि रोग की असुविधा स्वास्थ्य के सुख को प्रकट करती है। "उन्होंने जाना," इस कारण, "कि वे नंगे थे"—उस अनुग्रह से नंगे, जो उन्हें शारीरिक नग्नता से लज्जित होने से रोकता था जब तक पाप की व्यवस्था उनके मन का प्रतिरोध नहीं करती थी। और इस प्रकार उन्होंने वह ज्ञान प्राप्त किया जिसकी धन्य अज्ञानता में वे जीवित रह सकते थे, यदि वे, परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य आज्ञापालन में, उस अपराध को करने से मुकर जाते जिसने उन्हें अविश्वासयोग्यता और अनाज्ञापालन के हानिकारक प्रभावों के अनुभव में डाल दिया। और इसलिये, अपनी ही देह की अनाज्ञाकारिता से लज्जित होकर, जो उनकी अनाज्ञाकारिता की गवाही देती थी और साथ ही उसे दण्डित भी करती थी, "उन्होंने अंजीर के पत्ते सीकर अपने लिये लंगोटियाँ बनाईं," अर्थात अपने गुह्य अंगों के लिये कटिबन्ध; क्योंकि कुछ अनुवादकों ने इस शब्द को succinctoria के रूप में प्रस्तुत किया है। Campestria वास्तव में एक लातीनी शब्द है, परन्तु इसका उपयोग उन जांघियों या लंगोटियों के लिये होता है जिन्हें उन युवकों ने, जो campus में व्यायाम के लिये वस्त्र उतारते थे, इसी प्रकार के उद्देश्य के लिये उपयोग किया; इस कारण जो इस प्रकार कमरबन्द होते थे उन्हें सामान्यतः campestrati कहा जाता था। लज्जा ने विनम्रतापूर्वक उस वस्तु को ढाँक दिया जिसे वासना ने अनाज्ञाकारिता से उस इच्छा के विरुद्ध गतिमान किया, जो इस प्रकार अपनी ही अनाज्ञाकारिता के लिये दण्डित हुई। परिणामतः सब जातियाँ, जो उस एक ही मूल से उत्पन्न हुई हैं, लज्जास्पद अंगों को ढाँकने की इतनी सशक्त प्रवृत्ति रखती हैं कि कुछ बर्बर लोग स्नान में भी उन्हें प्रकट नहीं करते, वरन अपनी जांघिया पहने हुए ही स्नान करते हैं। भारत के अन्धकारमय निर्जन स्थानों में भी, यद्यपि कुछ दार्शनिक नग्न रहते हैं, और इसी कारण जिम्नोसोफिस्ट कहलाते हैं, तौभी वे इन अंगों के विषय में अपवाद रखते हैं, और उन्हें ढाँकते हैं।

    18. उस लज्जा के विषय में जो प्रत्येक यौन-सम्भोग के साथ रहती है

    वासना को अपनी पूर्णता के लिये अन्धकार और गुप्तता चाहिए; और यह न केवल तब जब अवैध सम्भोग की इच्छा की जाती है, वरन उस व्यभिचार में भी जिसे पृथ्वी के नगर ने वैधानिक बना दिया है। जहाँ दण्ड का कोई भय नहीं है, वहाँ भी ये अनुमत सुख जनदृष्टि से सिकुड़ जाते हैं। जहाँ इस वासना के लिये व्यवस्था की गई है, वहाँ भी गुप्तता का प्रावधान किया जाता है; और जबकि वासना को व्यवस्था के निषेधों को हटाना सहज लगा, निर्लज्जता को गोपनीयता का आवरण त्यागना असम्भव लगा। क्योंकि निर्लज्ज मनुष्य भी इसे लज्जास्पद कहते हैं; और यद्यपि वे इस सुख को चाहते हैं, तौभी इसे प्रकट करने का साहस नहीं करते। क्या यह सत्य नहीं कि विवाहित सम्भोग भी, जो सन्तान उत्पत्ति के लिये व्यवस्था द्वारा स्वीकृत है, वैधानिक और सम्माननीय होते हुए भी, प्रत्येक दृष्टि से गोपनीयता की खोज नहीं करता? क्या दुल्हा अपनी दुल्हन को दुलारने से पहले सेवकों को, और यहाँ तक कि विवाह-सखियों को, और उन मित्रों को भी, जिन्हें निकटतम सम्बन्धों ने विवाह-कक्ष में प्रवेश दिया है, बाहर नहीं कर देता? रोमी वाक्पटुता के सबसे बड़े आचार्य कहते हैं कि सब उचित कार्य प्रकाश में रखे जाने की इच्छा करते हैं, i.e. अर्थात जाने जाने की इच्छा करते हैं। यह उचित कार्य, तौभी, जाने जाने की ऐसी इच्छा रखता है, कि तौभी यह देखे जाने से लज्जित होता है। ऐसा कौन है जो नहीं जानता कि पति और पत्नी के बीच क्या होता है जिससे सन्तान उत्पन्न हो? क्या इसी उद्देश्य के लिये पत्नियाँ इतनी विधि-विधान से विवाहित नहीं की जातीं? और तौभी, जब यह भली प्रकार समझा गया कार्य सन्तान उत्पत्ति के लिये किया जाता है, तब सन्तान स्वयं, जो उनसे पहले ही उत्पन्न हो चुकी हो सकती है, उसकी गवाह होने की भी अनुमति नहीं दी जाती। यह उचित कार्य प्रकाश की खोज करता है, जहाँ तक यह जाना जाना चाहता है, परन्तु तौभी देखे जाने से डरता है। और ऐसा क्यों, यदि इस कारण नहीं कि जो कुछ स्वभाव से उचित और शोभनीय है, वह इस प्रकार किया जाता है कि उसके साथ पाप का लज्जा-उत्पादक दण्ड जुड़ा हुआ हो?

    19. यह कि जैसा मनुष्य के पाप करने से पूर्व नहीं था, वैसा अब क्रोध और वासना को बुद्धि के संयमकारी प्रभाव से वश में रखना आवश्यक हो गया है

    इसी कारण उन दार्शनिकों ने भी, जो सत्य के निकट पहुँचे थे, स्वीकार किया है कि क्रोध और वासना मन की दुष्ट भावनाएँ हैं, क्योंकि वे उन विषयों के प्रति भी, जिन्हें बुद्धि निषिद्ध नहीं ठहराती, अनियंत्रित और अव्यवस्थित रूप से गति करती हैं, और इस कारण मन और बुद्धि के नियमन की आवश्यकता होती है। और वे कहते हैं कि मन का यह तीसरा भाग एक प्रकार के दुर्ग में स्थापित है, जो अन्य भागों पर शासन करे, जिससे कि जब यह शासन करे और वे सेवा करें, तब मनुष्य की धार्मिकता बिना किसी भंग के बनी रहे।[110] ये भाग, जिन्हें वे एक बुद्धिमान और संयमी मनुष्य में भी दुष्ट मानते हैं, कि मन को अपने संयोजक और संयमकारी प्रभाव से उन्हें उन विषयों से, जिनकी ओर वे अवैध रूप से प्रवृत्त होते हैं, वश में करना और वापस बुलाना चाहिए, और उन्हें उन विषयों तक पहुँच देनी चाहिए जिन्हें बुद्धि की व्यवस्था स्वीकृति देती है,—कि क्रोध, उदाहरण के लिए, न्यायपूर्ण अधिकार के प्रवर्तन के लिए अनुमत हो सकता है, और वासना संतान उत्पन्न करने के कर्तव्य के लिए,—ये भाग, मैं कहता हूँ, स्वर्गोद्यान में पाप से पहले दुष्ट नहीं थे, क्योंकि वे कभी भी किसी पवित्र इच्छा के विरुद्ध किसी ऐसे विषय की ओर गति नहीं करते थे जिससे उन्हें बुद्धि की संयमकारी रोक से रोकना आवश्यक हो। क्योंकि यद्यपि अब वे इस प्रकार गति करते हैं, और उस संयमकारी और रोकने वाली शक्ति द्वारा नियंत्रित होते हैं, जिसका प्रयोग वे लोग करते हैं जो संयमपूर्वक, न्यायपूर्वक और भक्तिपूर्वक जीवन बिताते हैं, कभी सहजता से और कभी अधिक कठिनाई से, तथापि यह स्वभाव का स्वस्थ रूप नहीं, वरन पाप से उत्पन्न दुर्बलता है। और यह कैसे है कि लज्जा क्रोध या अन्य भावनाओं द्वारा निर्दिष्ट कर्मों और शब्दों को उस प्रकार नहीं ढाँपती जैसे वह वासना की गतियों को ढाँपती है, यदि इसका कारण यह नहीं कि जिन अंगों का हम उन्हें पूरा करने में उपयोग करते हैं, वे स्वयं भावनाओं से नहीं, वरन सहमत इच्छा के अधिकार से गति करते हैं? क्योंकि जो व्यक्ति क्रोध में किसी को गाली देता है या यहाँ तक कि मारता भी है, वह ऐसा नहीं कर सकता जब तक उसकी जीभ और हाथ इच्छा के अधिकार से गति न करें, जैसे वे तब भी गति करते हैं जब क्रोध नहीं होता। परन्तु जनन-अंग वासना के शासन के इतने अधीन हैं कि उनमें उसके द्वारा दी गई गति के अतिरिक्त कोई गति नहीं होती। यही है जिसकी हमें लज्जा है; यही है जिसे हम लजाते हुए देखनेवालों की आँखों से छिपाते हैं। और मनुष्य किसी पर अन्यायपूर्वक क्रोध प्रकट करते समय साक्षियों की भीड़ को सहन कर लेगा, बजाय इसके कि वह अपनी पत्नी के साथ निर्दोष रीति से समागम करते समय किसी एक व्यक्ति की दृष्टि को सहन करे।

    20. सिनिक (कुत्ते के समान) दार्शनिकों की मूर्खतापूर्ण पशुता के विषय में

    यही वह बात है जिसे उन कैनाइन या सिनिक[111] दार्शनिकों ने नज़रअंदाज़ किया है, जब उन्होंने मनुष्यों की शालीन प्रवृत्तियों का उल्लंघन करते हुए अपने अशुद्ध और निर्लज्ज मत को, जो सचमुच कुत्तों के योग्य है, बड़े गर्व से घोषित किया, अर्थात् कि जब वैवाहिक क्रिया विधिसम्मत है, तो किसी को भी उसे खुले में, गली में या किसी सार्वजनिक स्थान पर करने में लज्जा नहीं होनी चाहिए। सहज लज्जा ने इस उन्मत्त कल्पना को दबा दिया है। क्योंकि यद्यपि कहा जाता है[112] कि डायोजनीज़ ने एक बार अपने मत को व्यवहार में लाने का साहस किया, इस धारणा के अधीन कि यदि उसकी असाधारण निर्लज्जता मानव-स्मृति में गहराई से अंकित हो जाए तो उसका संप्रदाय और भी अधिक प्रसिद्ध हो जाएगा, तथापि इस उदाहरण का बाद में अनुसरण नहीं किया गया। उनमें लज्जा का प्रभाव, जिससे वे मनुष्यों के सामने लजाएँ, उस भ्रम के प्रभाव से अधिक था जिससे वे कुत्तों जैसा दिखावा करें। और संभवतः, स्वयं डायोजनीज़ के मामले में भी, तथा जिन्होंने उसका अनुकरण किया, समागम का केवल आभास और बहाना ही था, वास्तविकता नहीं। आज भी सिनिक दार्शनिक देखे जा सकते हैं; क्योंकि ये वे सिनिक हैं जो केवल पैलियम पहनने से संतुष्ट नहीं होते, वरन एक डंडा भी लेकर चलते हैं; तथापि उनमें से कोई भी उस बात को करने का साहस नहीं करता जिसकी हम बात कर रहे हैं। यदि वे करते, तो भीड़ उन पर थूकती, पत्थर मारना तो दूर की बात है। तो मानव-स्वभाव निःसंदेह इस वासना से लजाता है; और उचित रूप से, क्योंकि इन अंगों की अवज्ञा और इच्छा के प्रति उनकी अवहेलना, मनुष्य के प्रथम पाप के दण्ड की स्पष्ट गवाही है। और यह उपयुक्त था कि यह विशेष रूप से उन अंगों में प्रकट हो, जिनके द्वारा वह स्वभाव उत्पन्न होता है जो उस प्रथम और महान पाप से बिगड़ गया है,—वह पाप जिसके दुष्ट संबंध से कोई नहीं बच सकता, जब तक कि परमेश्वर का अनुग्रह उसमें व्यक्तिगत रूप से उस बात का प्रायश्चित न करे जो सबके सम्मिलित विनाश के लिए की गई थी, जब सब एक ही मनुष्य में थे, और जिसका परमेश्वर के न्याय द्वारा दण्ड दिया गया।

    21. यह कि मनुष्य के अपराध ने उस उर्वरता के आशीष को, जो मनुष्य के पाप करने से पहले उस पर उच्चारित की गई थी, निरस्त नहीं किया, परन्तु उसे वासना के रोग से संक्रमित कर दिया

    अतः यह हमसे दूर रहे कि हम यह समझें कि हमारे प्रथम माता-पिता ने स्वर्गोद्यान में वह वासना अनुभव की जिसने बाद में उन्हें लजाने और अपनी नग्नता छिपाने पर विवश किया, या कि उसी के द्वारा उन्होंने परमेश्वर के इस आशीर्वाद को पूरा किया होगा, "बढ़ो और गुणा हो जाओ और पृथ्वी में भर जाओ;"[113] क्योंकि वासना का आरंभ पाप के बाद ही हुआ। यह पाप के बाद ही था कि हमारे स्वभाव ने, जिसने पूरे शरीर पर अपना अधिकार खो दिया था, परन्तु समस्त लज्जा नहीं खोई थी, उसे अनुभव किया, देखा, उससे लजाया, और उसे छिपाया। परन्तु विवाह पर वह आशीष, जिसने उन्हें बढ़ने, गुणा होने और पृथ्वी में भर जाने के लिए प्रेरित किया, यद्यपि वह उनके पाप करने के बाद भी जारी रही, तो भी वह उनके पाप करने से पहले दी गई थी, इसलिए कि संतान की उत्पत्ति को विवाह की महिमा के भाग के रूप में मान्यता मिले, न कि पाप के दण्ड के भाग के रूप में। परन्तु अब, मनुष्य स्वर्गोद्यान की धन्यता से अनजान होकर, यह मानते हैं कि वहाँ संतानें किसी अन्य रीति से उत्पन्न नहीं हो सकती थीं, सिवाय उस रीति के जिससे वे अब उत्पन्न होती जानी जाती हैं, अर्थात् वासना के द्वारा, जिससे सम्माननीय विवाह भी लजाता है; कुछ लोग तो केवल अस्वीकार ही नहीं करते, वरन दिव्य शास्त्रों का संदेहपूर्वक उपहास करते हैं, जिनमें हम पढ़ते हैं कि हमारे प्रथम माता-पिता, पाप करने के बाद, अपनी नग्नता से लजाए और उसे छिपाया; जबकि दूसरे, यद्यपि वे शास्त्र को स्वीकार करते और उसका सम्मान करते हैं, तो भी यह मानते हैं कि यह वाक्यांश, "बढ़ो और गुणा हो जाओ," शारीरिक उर्वरता की ओर संकेत नहीं करता, क्योंकि एक समान वाक्यांश आत्मा के संबंध में इन शब्दों में उपयोग किया गया है, "तू मेरी आत्मा में मुझे शक्ति से गुणा करेगा;"[114] और इसी प्रकार, उत्पत्ति में इन शब्दों के आगे, "और पृथ्वी में भर जाओ, और उस पर अधिकार करो," वे पृथ्वी से उस शरीर को समझते हैं जिसे आत्मा अपनी उपस्थिति से भरती है, और जिस पर वह शासन करती है जब वह शक्ति में गुणा होती है। और वे यह मानते हैं कि तब भी संतानें अब से अधिक वासना के बिना उत्पन्न नहीं हो सकती थीं, जो पाप के बाद प्रज्वलित हुई, देखी गई, उससे लजाया गया, और उसे छिपाया गया; और यहाँ तक कि संतानें स्वर्गोद्यान में जन्म नहीं लेतीं, वरन केवल उसके बाहर, जैसा कि वास्तव में हुआ। क्योंकि यह उनके वहाँ से निकाले जाने के बाद ही था कि वे संतान उत्पन्न करने के लिए एक साथ आए, और उन्होंने उन्हें उत्पन्न किया।

    22. वैवाहिक संबंध के विषय में, जैसा वह मूलतः परमेश्वर द्वारा स्थापित और आशीषित किया गया था

    परन्तु हम, अपनी ओर से, इस बात में कोई संदेह नहीं रखते कि परमेश्वर की आशीष के आधार पर बढ़ना, गुणा होना और पृथ्वी में भर जाना विवाह का एक वरदान है, जैसा परमेश्वर ने आदि से, मनुष्य के पाप करने से पहले ही उसे स्थापित किया था, जब उसने उन्हें नर और नारी बनाया,—अर्थात् दो लिंग स्पष्टतः भिन्न। और यह परमेश्वर का वही कार्य था जिस पर उसकी आशीष उच्चारित हुई। क्योंकि जैसे ही शास्त्र ने कहा, "उसने उन्हें नर और नारी बनाया,"[115] वह तुरंत आगे कहता है, "और परमेश्वर ने उन्हें आशीष दी, और परमेश्वर ने उनसे कहा, बढ़ो, और गुणा हो जाओ, और पृथ्वी में भर जाओ, और उस पर अधिकार करो," इत्यादि। और यद्यपि इन सब बातों की आत्मिक अर्थ में व्याख्या करना अनुचित नहीं होगा, तो भी "नर और नारी" को एक मनुष्य में दो वस्तुओं के रूप में नहीं समझा जा सकता, जैसे कि उसमें एक वस्तु शासन करती हो और दूसरी शासित होती हो; परन्तु यह पूर्णतः स्पष्ट है कि वे नर और नारी के रूप में, भिन्न लिंगों के शरीरों के साथ, संतान उत्पन्न करने के उद्देश्य से, और इस प्रकार बढ़ने, गुणा होने और पृथ्वी में भर जाने के लिए बनाए गए थे; और इस स्पष्ट सत्य का विरोध करना बड़ी मूर्खता है। यह न तो उस आत्मा की बात थी जो आदेश देती है और उस शरीर की जो आज्ञा मानता है, न ही उस बुद्धिमान आत्मा की जो शासन करती है और उस अबुद्धिमान इच्छा की जो शासित होती है, न ही उस चिंतनशील गुण की जो श्रेष्ठ है और उस क्रियाशील की जो अधीन है, न ही मन की समझ और शरीर की अनुभूति की, वरन स्पष्टतः उस वैवाहिक संबंध की, जिससे दोनों लिंग परस्पर बंधे हुए हैं, कि जब हमारे प्रभु से पूछा गया कि क्या किसी कारण से अपनी पत्नी को त्यागना उचित है (क्योंकि इस्राएलियों के हृदय की कठोरता के कारण मूसा ने त्याग-पत्र देने की अनुमति दी थी), तो उन्होंने उत्तर देते हुए कहा, "क्या तुमने नहीं पढ़ा कि जिसने उन्हें आदि में बनाया, उसने उन्हें नर और नारी बनाया, और कहा, इस कारण मनुष्य अपने पिता और माता को छोड़ेगा, और अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे? इस कारण वे अब दो नहीं, वरन एक तन हैं। इसलिए जो परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे।"[116] तो यह निश्चित है कि आदि से मनुष्य दो लिंगों में, नर और नारी के रूप में बनाए गए थे, जैसा हम अब उन्हें देखते और जानते हैं, और वे एक कहलाते हैं, या तो वैवाहिक संबंध के कारण, या स्त्री की उत्पत्ति के कारण, जो पुरुष की पसली से बनाई गई थी। और यह इसी मूल उदाहरण के द्वारा है, जिसे परमेश्वर ने स्वयं स्थापित किया, कि प्रेरित सभी पतियों को विशेष रूप से अपनी-अपनी पत्नियों से प्रेम करने की चेतावनी देता है।[117]

    23. क्या यदि मनुष्य पाप न करता तो स्वर्गोद्यान में भी संतानोत्पत्ति होती, अथवा क्या वहाँ पवित्रता और वासना के बीच कोई संघर्ष होता

    परन्तु जो कहता है कि यदि पाप न होता तो न समागम होता और न संतानोत्पत्ति, वह वास्तव में यह कहता है कि संतों की संख्या पूर्ण करने के लिए मनुष्य का पाप आवश्यक था। क्योंकि यदि ये दोनों पाप न करते हुए केवल अकेले ही जीवित रहते, क्योंकि, जैसा माना जाता है, वे बिना पाप किए संतान उत्पन्न नहीं कर सकते थे, तो निश्चय ही पाप आवश्यक था, इसलिए कि न केवल दो, वरन अनेक धर्मी मनुष्य हों। और यदि इसे बिना विसंगति के स्थापित नहीं किया जा सकता, तो हमें यह विश्वास करना चाहिए कि इस परम धन्य नगर को पूर्ण करने योग्य संतों की संख्या वैसी ही महान होती, चाहे किसी ने पाप न किया होता, जैसी अब है जब परमेश्वर का अनुग्रह पापियों की भीड़ से अपने नागरिकों को इकट्ठा करता है, जब तक इस संसार की संतानें जन्म देती और जन्म लेती रहती हैं।[118]

    और इस कारण वह विवाह, जो स्वर्गोद्यान की धन्यता के योग्य था, यदि पाप न होता तो वासना की लज्जा के बिना ही वांछित फल देता। परन्तु यह कैसे हो सकता, इसे सिखाने के लिए अब कोई उदाहरण नहीं है। तथापि, यह अविश्वसनीय नहीं लगना चाहिए कि एक अंग तब वासना के बिना इच्छा की सेवा कर सकता था, क्योंकि अब भी बहुत से अंग ऐसा करते हैं। क्या हम अभी अपने पैरों और हाथों को नहीं चलाते जब हम उनके द्वारा वे कार्य करना चाहते हैं जो हम करना चाहते हैं? क्या हमें उनमें कोई विरोध नहीं मिलता, वरन हम पाते हैं कि वे इच्छा के तैयार सेवक हैं, हमारे अपने मामले में और दूसरों के मामले में भी, विशेष रूप से यांत्रिक कार्यों में लगे कारीगरों के मामले में, जिनके द्वारा स्वभाव की दुर्बलता और अनाड़ीपन, परिश्रमी अभ्यास द्वारा, आश्चर्यजनक रूप से निपुण हो जाते हैं? और क्या हम विश्वास नहीं करेंगे कि जैसे वे सभी अंग इच्छा की आज्ञाकारी सेवा करते हैं, वैसे ही जनन के अंगों को भी अपना कार्य करना चाहिए था, यद्यपि वासना, जो अवज्ञा का प्रतिफल है, अनुपस्थित होती? क्या सिसरो ने अपने डी रिपब्लिका में शासनों के भेद पर चर्चा करते हुए मानव-स्वभाव से एक उपमा नहीं ली, और नहीं कहा कि हम अपने शारीरिक अंगों को बच्चों के समान आदेश देते हैं, वे इतने आज्ञाकारी हैं; परन्तु आत्मा के दुष्ट भागों के साथ दासों के समान व्यवहार किया जाना चाहिए, और उन्हें अधिक कठोर अधिकार से वश में किया जाना चाहिए? और निःसंदेह, स्वभाव के क्रम में, आत्मा शरीर से अधिक श्रेष्ठ है; तथापि आत्मा शरीर पर स्वयं से अधिक सरलता से आदेश करती है। तथापि यह वासना, जिसकी हम अभी बात कर रहे हैं, इस कारण अधिक लज्जाजनक है, क्योंकि इसमें आत्मा न तो अपने आप की स्वामिनी है, कि वह बिल्कुल वासना न करे, और न ही शरीर की, कि वह अंगों को इच्छा के नियंत्रण में रखे; क्योंकि यदि वे इस प्रकार शासित होते, तो कोई लज्जा नहीं होती। परन्तु अब आत्मा इसलिए लजाती है कि शरीर, जो स्वभाव से उससे निम्न और उसके अधीन है, उसके अधिकार का प्रतिरोध करता है। क्योंकि अन्य भावनाओं में आत्मा द्वारा अनुभव किए गए प्रतिरोध में लज्जा कम होती है, क्योंकि वह प्रतिरोध स्वयं से होता है, और इस प्रकार, जब वह स्वयं से पराजित होती है, तो वह स्वयं ही विजेता होती है, यद्यपि यह विजय अव्यवस्थित और दुष्ट है, क्योंकि यह आत्मा के उन भागों द्वारा संपन्न होती है जिन्हें बुद्धि के अधीन होना चाहिए, तथापि, अपने ही भागों और शक्तियों द्वारा संपन्न होने के कारण, यह विजय, जैसा मैं कहता हूँ, उसकी अपनी है। क्योंकि जब आत्मा स्वयं को उचित अधीनता में विजित कर लेती है, ताकि उसकी अतार्किक गतियाँ बुद्धि द्वारा नियंत्रित हों, जबकि वह स्वयं फिर परमेश्वर के अधीन हो, तो यह एक गुणवान और प्रशंसनीय विजय है। तथापि जब आत्मा अपने ही दुष्ट भागों द्वारा प्रतिरोधित होती है, तब उससे कम लज्जा होती है, बजाय इसके कि जब उसकी इच्छा और व्यवस्था का प्रतिरोध उस शरीर द्वारा किया जाए, जो उससे भिन्न और निम्न है, और अपने अस्तित्व के लिए उस पर निर्भर है।

    परन्तु जब तक इच्छा अपने अधिकार में अन्य अंगों को रखती है, जिनके बिना वासना द्वारा उत्तेजित अंग इच्छा का प्रतिरोध करते हुए वह प्राप्त नहीं कर सकते जो वे चाहते हैं, तब तक पवित्रता बनी रहती है, और पाप का सुख त्याग दिया जाता है। और निःसंदेह, यदि दोषपूर्ण अवज्ञा को दंडात्मक अवज्ञा से ग्रस्त न किया गया होता, तो स्वर्गोद्यान का विवाह इस संघर्ष और विद्रोह से, इच्छा और वासना के इस झगड़े से अनजान होता, कि इच्छा संतुष्ट हो और वासना नियंत्रित हो, वरन वे अंग, अन्य सबकी भाँति, इच्छा के आज्ञाकारी होते। जनन का क्षेत्र[119] उस अंग द्वारा बीजा जाता जो इसी उद्देश्य के लिए बनाया गया था, जैसे पृथ्वी हाथ द्वारा बीजी जाती है। और जबकि अब, जब हम इस विषय की अधिक सटीकता से जाँच करने का प्रयास करते हैं, तो लज्जा हमें बाधित करती है, और हमें पवित्र कानों से क्षमा माँगने के लिए विवश करती है, तो इसका कोई कारण न होता, वरन हम उन सभी बिंदुओं पर, जो इस विषय पर विचार करने वाले के मन में आते हैं, स्वतंत्रतापूर्वक और अश्लील प्रतीत होने के भय के बिना चर्चा कर सकते थे। ऐसे शब्द भी न होते जिन्हें अश्लील कहा जा सकता, वरन इन अंगों के विषय में जो कुछ कहा जाता, वह शरीर के अन्य भागों के विषय में कहे गए शब्दों के समान ही शुद्ध होता। तो जो कोई भी अपवित्र मन के साथ इन पृष्ठों को पढ़ने आए, वह अपने स्वभाव को नहीं, वरन अपनी प्रवृत्ति को दोष दे; वह अपनी ही अशुद्धता के कर्मों को धिक्कारे, न कि उन शब्दों को जिनका प्रयोग हमें आवश्यकता से करना पड़ता है, और जिनके लिए हर पवित्र और भक्त पाठक या श्रोता मुझे अत्यंत सहजता से क्षमा करेगा, जबकि मैं उस संदेहवाद की मूर्खता को उजागर करता हूँ जो केवल अपने ही अनुभव के आधार पर तर्क करता है, और उससे परे किसी भी बात में विश्वास नहीं रखता। जो व्यक्ति प्रेरित की उन स्त्रियों की भयानक दुष्टता की निंदा से क्रुद्ध नहीं होता जिन्होंने "प्राकृतिक उपयोग को उस उपयोग में बदल दिया जो प्रकृति के विरुद्ध है,"[120] वह इस सब को बिना चौंके पढ़ेगा, विशेष रूप से इसलिए कि हम पॉल के समान किसी घातक अशुद्धता का उल्लेख और निंदा नहीं कर रहे, वरन जहाँ तक हम कर सकते हैं, मानव-जनन की व्याख्या कर रहे हैं, जबकि पॉल के समान हम भाषा की समस्त अश्लीलता से बचते हैं।

    24. यह कि यदि मनुष्य स्वर्गोद्यान में निर्दोष और आज्ञाकारी बने रहते, तो जनन-अंग भी अन्य अंगों के समान इच्छा के अधीन होते

    तो पुरुष बीज बोता, और स्त्री उसे ग्रहण करती, जैसी आवश्यकता होती, जनन-अंग इच्छा द्वारा गति करते, वासना द्वारा उत्तेजित नहीं। क्योंकि हम इच्छा से न केवल उन अंगों को गति देते हैं जो ठोस हड्डी के जोड़ों से युक्त हैं, जैसे हाथ, पैर और अंगुलियाँ, वरन हम उन अंगों को भी इच्छा से गति देते हैं जो शिथिल और कोमल स्नायुओं से बने हैं: हम उन्हें गति दे सकते हैं, या उन्हें फैला सकते हैं, या उन्हें मोड़ और घुमा सकते हैं, या उन्हें संकुचित और कठोर कर सकते हैं, जैसा हम मुख और चेहरे की मांसपेशियों के साथ करते हैं। फेफड़े, जो मस्तिष्क के अतिरिक्त आंतरिक अंगों में सबसे कोमल हैं, और इस कारण छाती की गुहा में सावधानीपूर्वक सुरक्षित हैं, तथापि श्वास लेने और छोड़ने, और स्वर उच्चारण तथा उसे नियंत्रित करने के समस्त उद्देश्यों के लिए, इच्छा के आज्ञाकारी होते हैं जब हम श्वास लेते, छोड़ते, बोलते, चिल्लाते, या गाते हैं, ठीक जैसे धौंकनी लोहार या वाद्य-वादक की आज्ञा मानती है। मैं इस तथ्य पर बल नहीं दूँगा कि कुछ पशुओं में अपनी त्वचा के किसी एक स्थान को, जिससे उनका पूरा शरीर ढका है, गति देने की स्वाभाविक शक्ति होती है, यदि वे उस पर कुछ ऐसा अनुभव करें जिसे वे दूर करना चाहते हैं,—एक शक्ति इतनी महान कि इस त्वचा के काँपने से वे न केवल उन मक्खियों को झाड़ सकते हैं जो उन पर बैठ गई हैं, वरन उन बरछों को भी जो उनके मांस में गड़ गए हैं। मनुष्य के पास, यह सच है, यह शक्ति नहीं है; परन्तु क्या यह मानने का कोई कारण है कि परमेश्वर उन प्राणियों को यह शक्ति नहीं दे सकता था जिन्हें वह चाहता था कि उनके पास हो? और इस कारण मनुष्य भी स्वयं अपने अंगों पर पूर्ण अधिकार का सुख भोग सकता था यदि उसने अपनी अवज्ञा से उसे न खोया होता; क्योंकि परमेश्वर के लिए उसे इस प्रकार बनाना कठिन नहीं था कि जो अब उसके शरीर में केवल वासना द्वारा गति करता है, वह केवल इच्छा द्वारा ही गति करे।

    हम यह भी जानते हैं कि कुछ मनुष्य दूसरों से भिन्न रचना के होते हैं, और उनमें अपने शरीर से कुछ ऐसा करने की दुर्लभ और असाधारण क्षमता होती है जो अन्य मनुष्य किसी भी प्रयास से नहीं कर सकते, और वास्तव में, दूसरों को करते सुनकर मुश्किल से विश्वास करते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने कान हिला सकते हैं, या तो एक-एक करके, या दोनों को एक साथ। कुछ ऐसे हैं जो, सिर को हिलाए बिना, बालों को माथे पर नीचे ला सकते हैं, और अपनी इच्छानुसार सारे सिर की त्वचा को आगे-पीछे हिला सकते हैं। कुछ, अपने पेट पर हल्के से दबाव डालकर, उन वस्तुओं की एक अविश्वसनीय मात्रा और विविधता निकाल लेते हैं जिन्हें उन्होंने निगला था, और जो चाहें वह पूरा का पूरा निकाल देते हैं, जैसे किसी थैले से। कुछ पक्षियों, पशुओं और अन्य मनुष्यों की आवाज़ों की इतनी सटीक नकल करते हैं कि, जब तक उन्हें देखा न जाए, भेद बताया नहीं जा सकता। कुछ के पास अपनी आंतों पर इतना नियंत्रण होता है कि वे अपनी इच्छानुसार निरंतर वायु छोड़ सकते हैं, ताकि गायन का प्रभाव उत्पन्न हो। मैं स्वयं एक ऐसे व्यक्ति को जानता था जो जब चाहे पसीना बहाने का अभ्यस्त था। यह भी सुविज्ञात है कि कुछ जब चाहें रो सकते हैं, और अश्रुओं की धारा बहा सकते हैं। परन्तु इससे कहीं अधिक अविश्वसनीय वह है जो हमारे कुछ भाइयों ने बहुत हाल में देखा। कैलामेंसियन[121] कलीसिया के पल्ली में रेस्टिटूटस नामक एक प्रेस्बिटर था, जो, जितनी बार चाहता (और जो इस असाधारण घटना को देखना चाहते थे, वे उससे ऐसा करने का निवेदन करते थे), किसी के द्वारा शोक मनाने वालों की विलाप की नकल करने पर, इतना संवेदनहीन हो जाता, और मृत्यु के समान अवस्था में इस प्रकार पड़ जाता, कि न केवल जब वे उसे चिमटी से पकड़ते और चुभाते तो उसे कुछ अनुभव नहीं होता, वरन जब उस पर अग्नि लगाई जाती, और वह उससे जल जाता, तो उसे उस समय कोई पीड़ा का बोध नहीं होता, सिवाय बाद में घाव से। और यह कि उसका शरीर स्थिर रहता, यह उसके आत्म-नियंत्रण के कारण नहीं, वरन इसलिए कि वह संवेदनहीन था, इस तथ्य से प्रमाणित होता था कि वह किसी मृत मनुष्य से अधिक श्वास नहीं लेता था; तथापि वह कहता था कि जब कोई सामान्य से अधिक स्पष्टता से बोलता, तो वह आवाज़ सुनता, परन्तु जैसे कि वह बहुत दूर से आ रही हो। तो, यह देखते हुए कि इस नाशवान और दुःखी जीवन में भी शरीर कुछ मनुष्यों की सेवा प्रकृति के सामान्य क्रम से परे कई असाधारण गतियों और अवस्थाओं द्वारा करता है, इस बात पर संदेह करने का क्या कारण है कि, इससे पहले कि मनुष्य अपने पाप द्वारा इस दुर्बल और नाशवान अवस्था में फँस गया, उसके अंग वासना के बिना संतान-प्रजनन के लिए उसकी इच्छा की सेवा कर सकते थे? मनुष्य को स्वयं के हाथों सौंप दिया गया है क्योंकि उसने परमेश्वर को त्याग दिया, जबकि वह स्वयं-संतुष्ट होना चाहता था; और परमेश्वर की अवज्ञा करते हुए, वह स्वयं की भी आज्ञा नहीं मान सका। इसी कारण वह इस स्पष्ट दुःख में फँसा है कि वह अपनी इच्छानुसार जीवन नहीं जी सकता। क्योंकि यदि वह अपनी इच्छानुसार जीता, तो वह अपने आप को धन्य समझता; परन्तु यदि वह दुष्टतापूर्वक जीता तो वह ऐसा नहीं हो सकता था।

    25. उस सच्ची धन्यता के विषय में, जिसका सुख यह वर्तमान जीवन नहीं भोग सकता

    तथापि, यदि हम इसे थोड़ा और निकटता से देखें, तो हम पाते हैं कि धन्य के अतिरिक्त कोई भी अपनी इच्छानुसार नहीं जीता, और धर्मी के अतिरिक्त कोई भी धन्य नहीं है। परन्तु धर्मी स्वयं भी अपनी इच्छानुसार नहीं जीता, जब तक कि वह उस स्थिति में न पहुँच जाए जहाँ वह न तो मर सके, न धोखा खा सके, न घायल हो सके, और जब तक उसे यह आश्वासन न हो जाए कि यह उसकी अनंत अवस्था होगी। क्योंकि यह स्वभाव की माँग है; और स्वभाव तब तक पूर्णतः और परिपूर्ण रूप से धन्य नहीं होता जब तक वह उस बात को प्राप्त नहीं कर लेता जिसकी वह खोज करता है। परन्तु वर्तमान में कौन मनुष्य अपनी इच्छानुसार जी सकता है, जब उसके वश में इतना भी नहीं है कि वह जीवित रहे? वह जीवित रहना चाहता है, परन्तु मरने के लिए विवश है। तो फिर वह अपनी इच्छानुसार कैसे जीता है जो उतने समय तक जीवित नहीं रहता जितना वह चाहता है? या यदि वह मरना चाहता है, तो वह अपनी इच्छानुसार कैसे जी सकता है, जबकि वह जीवित रहने की भी इच्छा नहीं करता? या यदि वह इसलिए मरना चाहता है, न इस कारण कि उसे जीवन अप्रिय है, वरन इसलिए कि मृत्यु के बाद वह बेहतर जीवन जिए, तो भी वह अभी अपनी इच्छानुसार नहीं जी रहा, वरन केवल उस जीवन की आशा रखता है जब, मृत्यु के द्वारा, वह उस बात तक पहुँचेगा जिसे वह चाहता है। परन्तु मान लीजिए कि वह अपनी इच्छानुसार जीता है, क्योंकि उसने स्वयं पर बलपूर्वक कार्य किया है, और स्वयं को विवश किया है कि वह वह न चाहे जो वह प्राप्त नहीं कर सकता, और केवल वही चाहे जो वह प्राप्त कर सकता है (जैसा टेरेंस कहता है, "क्योंकि तू वह नहीं कर सकता जो तू चाहता है, वह चाह जो तू कर सकता है"[122]), तो क्या वह इस कारण धन्य है क्योंकि वह धीरजपूर्वक दुःखी है? क्योंकि धन्य जीवन केवल उस मनुष्य के पास होता है जो उससे प्रेम करता है। यदि वह प्रेम किया जाता और प्राप्त किया जाता है, तो वह अवश्य ही अन्य सब वस्तुओं से अधिक उत्कटता से प्रेम किया जाना चाहिए; क्योंकि जो कुछ और प्रेम किया जाता है, वह धन्य जीवन के लिए ही प्रेम किया जाना चाहिए। और यदि उससे वैसा ही प्रेम किया जाता है जैसा उसे किया जाना चाहिए,—और वह मनुष्य धन्य नहीं है जो धन्य जीवन से वैसा प्रेम नहीं करता जैसा उसे करना चाहिए,—तो जो इस प्रकार उससे प्रेम करता है, वह यह चाहने से नहीं रुक सकता कि वह अनंत हो। इसलिए वह तभी धन्य होगा जब वह अनंत होगा।

    26. यह कि हमें विश्वास करना चाहिए कि स्वर्गोद्यान में हमारे प्रथम माता-पिता बिना लजाए संतान उत्पन्न करते

    स्वर्गोद्यान में, तब, मनुष्य अपनी इच्छानुसार जीवन जीता था, जब तक वह वही चाहता था जो परमेश्वर ने आदेश दिया था। वह परमेश्वर के सुख-भोग में जीता था, और परमेश्वर की भलाई से भला था; वह किसी अभाव के बिना जीता था, और उसके वश में था कि वह इस प्रकार अनंत काल तक जीवित रहे। उसके पास भोजन था कि वह भूखा न हो, पेय था कि वह प्यासा न हो, जीवन का वृक्ष था कि बुढ़ापा उसे क्षीण न करे। उसके शरीर में न कोई विकार था, न विकार का बीज, जो उसमें कोई अप्रिय अनुभूति उत्पन्न कर सके। उसे न किसी आंतरिक रोग का भय था, न किसी बाहरी दुर्घटना का। सर्वोत्तम स्वास्थ्य ने उसके शरीर को आशीषित किया था, पूर्ण शांति ने उसकी आत्मा को। जैसे स्वर्गोद्यान में न अत्यधिक गर्मी थी न ठंड, वैसे ही उसके निवासी भय और इच्छा के परिवर्तनों से मुक्त थे। वहाँ न किसी प्रकार का दुःख था, न कोई मूर्खतापूर्ण आनंद; परमेश्वर की उपस्थिति से सच्चा आनंद निरंतर प्रवाहित होता था, जिससे "शुद्ध हृदय, और भले विवेक, और निष्कपट विश्वास" से प्रेम किया जाता था।[123] पति और पत्नी के निष्कपट प्रेम ने उनके बीच एक सुदृढ़ सामंजस्य बनाया था। शरीर और आत्मा एक साथ सामंजस्यपूर्वक कार्य करते थे, और आज्ञा बिना किसी श्रम के मानी जाती थी। न किसी शिथिलता ने उनके विश्राम को थकाऊ बनाया; न किसी निद्रालसता ने श्रम करने की उनकी इच्छा को बाधित किया।[124] In tanta facilitate rerum et felicitate hominum, absit ut suspicemur, non potuisse prolem seri sine libidinis morbo: sed eo voluntatis nutu moverentur illa membra quo cætera, et sine ardoris illecebroso stimulo cum tranquillitate animi et corporis nulla corruptione integritatis infunderetur gremio maritus uxoris. Neque enim quia experientia probari non potest, ideo credendum non est; quando illas corporis partes non ageret turbidus calor, sed spontanea potestas, sicut opus esset, adhiberet; ita tunc potuisse utero conjugis salva integritate feminei genitalis virile semen immitti, sicut nunc potest eadem integritate salva ex utero virginis fluxus menstrui cruoris emitti. Eadem quippe via posset illud injici, qua hoc potest ejici. Ut enim ad pariendum non doloris gemitus, sed maturitatis impulsus feminea viscera relaxaret: sic ad fœtandum et concipiendum non libidinis appetitus, sed voluntarius usus naturam utramque conjungeret. हम उन बातों की चर्चा कर रहे हैं जो अब लज्जाजनक हैं, और यद्यपि हम, जितना हम सक्षम हैं, उन्हें वैसा समझने का प्रयास करते हैं जैसी वे लज्जाजनक बनने से पहले थीं, तो भी आवश्यकता हमें विवश करती है कि हम अपनी चर्चा को शालीनता द्वारा निर्धारित सीमाओं तक ही सीमित रखें, बजाय इसके कि हम उसे अपनी सीमित वाक्-क्षमता के सुझाव अनुसार विस्तृत करें। क्योंकि जिसके विषय में मैं बात कर रहा हूँ, वह उन लोगों द्वारा भी अनुभव नहीं किया गया था जो उसे अनुभव कर सकते थे,—मेरा तात्पर्य हमारे प्रथम माता-पिता से है (क्योंकि पाप और स्वर्गोद्यान से उनके योग्य निष्कासन ने उनकी ओर से इस निर्विकार प्रजनन को होने ही नहीं दिया),—जब आज-कल यौन-संबंध की बात की जाती है, तो यह मनुष्यों के विचारों में इच्छा की वह शांत आज्ञाकारिता नहीं, जैसी हमारे प्रथम माता-पिता में कल्पनीय है, वरन वासना का वह हिंसक कार्य सुझाती है जैसा उन्होंने स्वयं अनुभव किया है। और इस कारण शालीनता मेरा मुख बंद करती है, यद्यपि मेरा मन इस विषय को स्पष्टतः समझता है। परन्तु सर्वशक्तिमान परमेश्वर, समस्त स्वभावों का सर्वोच्च और सर्वोत्तम रचयिता, जो भली इच्छाओं की सहायता करता और उन्हें प्रतिफल देता है, जबकि वह दुष्ट इच्छाओं को त्यागता और दंडित करता है, और दोनों पर शासन करता है, इस योजना से वंचित नहीं था जिससे वह अपने नगर को नागरिकों की उस निश्चित संख्या से भर सके, जिसे उसकी बुद्धि ने उस दोषी मानव-जाति में से भी पहले ही ठहरा दिया था, अब उन्हें योग्यताओं के आधार पर नहीं भेदते हुए, क्योंकि सारा समूह एक दूषित मूल के समान दोषी ठहराया गया था, वरन अनुग्रह द्वारा, और न केवल छुड़ाए गए लोगों के मामले में, वरन उन लोगों में भी, जो नहीं बचाए गए, यह दिखाते हुए कि उसने उन पर कितना अनुग्रह प्रदान किया है। क्योंकि हर कोई यह स्वीकार करता है कि वह बुराई से बचाया गया है, योग्यता से नहीं, वरन अनुग्रहपूर्ण भलाई से, जब वह उन लोगों की संगति से अलग किया जाता है जिनके साथ वह न्यायसम्मत रूप से एक सामान्य दंड सहन कर सकता था, और उसे बिना हानि के जाने दिया जाता है। तो फिर, परमेश्वर को उन्हें बनाने से क्यों नहीं करना चाहिए था जिनके बारे में उसने पूर्वज्ञान से देखा था कि वे पाप करेंगे, जबकि वह उनमें और उनके द्वारा यह दोनों दिखाने में सक्षम था कि उनका अपराध क्या योग्य था, और उसके अनुग्रह ने क्या प्रदान किया, और जबकि, उसके सृजनकारी और व्यवस्थापक हाथ के अधीन, दुष्टों की विकृत अव्यवस्था भी वस्तुओं की सही व्यवस्था को विकृत नहीं कर सकती थी?

    27. उन स्वर्गदूतों और मनुष्यों के विषय में जिन्होंने पाप किया, और यह कि उनकी दुष्टता ने परमेश्वर के विधान की व्यवस्था को भंग नहीं किया

    मनुष्यों और स्वर्गदूतों के पाप प्रभु के उन "महान कार्यों" को, "जो उसकी इच्छा को पूरा करते हैं," बाधित करने में कुछ भी नहीं करते।[125] क्योंकि वह जो अपने विधान और सर्वशक्तिमानता से हर एक को उसका अपना भाग बाँटता है, न केवल भलों का, वरन दुष्टों का भी भला उपयोग करने में सक्षम है। और इस प्रकार दुष्ट स्वर्गदूत का भला उपयोग करते हुए, जो अपनी प्रथम दुष्ट इच्छा के दंड में, अब किसी भी भलाई को चाहने से रोकने वाली कठोरता के लिए अभिशप्त था, परमेश्वर को उसे प्रथम मनुष्य, जो सीधा, अर्थात् भली इच्छा के साथ बनाया गया था, को परीक्षा में डालने की अनुमति क्यों नहीं देनी चाहिए थी? क्योंकि वह इस प्रकार रचा गया था कि यदि वह सहायता के लिए परमेश्वर की ओर देखता, तो मनुष्य की भलाई स्वर्गदूत की दुष्टता को परास्त करती; परन्तु यदि अभिमानी आत्म-तुष्टि से वह अपने रचयिता और पालनकर्ता परमेश्वर को त्याग देता, तो वह पराजित होता। यदि उसकी इच्छा, परमेश्वर की सहायता पर निर्भर रहते हुए, सीधी बनी रहती, तो उसे प्रतिफल मिलता; यदि वह परमेश्वर को त्यागकर दुष्ट हो जाती, तो उसे दंड मिलता। परन्तु परमेश्वर की सहायता में यह विश्वास भी परमेश्वर की सहायता के बिना संपन्न नहीं हो सकता था, यद्यपि मनुष्य के अपने वश में यह था कि वह स्वयं को प्रसन्न करने के द्वारा दिव्य अनुग्रह के लाभों को त्याग दे। क्योंकि जैसे यह हमारे वश में नहीं है कि हम भोजन से स्वयं को सम्भाले बिना इस संसार में जीवित रहें, जबकि यह हमारे वश में है कि हम इस पोषण को अस्वीकार करें और जीवित रहना बंद कर दें, जैसा वे करते हैं जो स्वयं को मार डालते हैं, वैसे ही मनुष्य के वश में नहीं था, स्वर्गोद्यान में भी, कि वह परमेश्वर की सहायता के बिना जैसा उसे जीना चाहिए वैसा जीए; परन्तु उसके वश में था कि वह दुष्टतापूर्वक जीए, यद्यपि इस प्रकार वह अपनी धन्यता को छोटा कर देता, और अत्यंत न्यायपूर्ण दंड भोगता। तो, जब परमेश्वर इस बात से अनजान नहीं था कि मनुष्य गिरेगा, तो उसे उस स्वर्गदूत द्वारा, जो उससे घृणा और ईर्ष्या करता था, परीक्षा में डाले जाने की अनुमति क्यों नहीं देनी चाहिए थी? यह सच है कि वह इस बात से अनजान नहीं था कि वह परास्त हो जाएगा, परन्तु इसलिए कि उसने पूर्वज्ञान से देखा था कि मनुष्य के बीज द्वारा, दिव्य अनुग्रह की सहायता से, यह वही शैतान स्वयं संतों की और भी अधिक महिमा के लिए परास्त किया जाएगा। यह सब इस प्रकार से हुआ कि न तो कोई भविष्य की घटना परमेश्वर के पूर्वज्ञान से बच सकी, न ही उसके पूर्वज्ञान ने किसी को पाप करने के लिए विवश किया, और इस प्रकार बुद्धिमान सृष्टि के अनुभव में, मनुष्य और स्वर्गदूत दोनों में, यह प्रदर्शित किया गया कि प्राणी के अपने अनुमान और रचयिता के संरक्षण के बीच कितना बड़ा अंतर है। क्योंकि कौन यह विश्वास करने या कहने का साहस करेगा कि स्वर्गदूतों और मनुष्यों दोनों को पाप करने से रोकना परमेश्वर के वश में नहीं था? परन्तु परमेश्वर ने इसे उनके ही वश में छोड़ना उचित समझा, और इस प्रकार यह दोनों दिखाना कि उनके अभिमान से क्या बुराई उत्पन्न हो सकती है, और उसके अनुग्रह से क्या भलाई।

    28. दो नगरों, अर्थात् पृथ्वी के नगर और स्वर्गीय नगर, के स्वभाव के विषय में

    इस प्रकार, दो नगर दो प्रेमों द्वारा बनाए गए हैं: पृथ्वी का नगर स्वयं के प्रेम से, यहाँ तक कि परमेश्वर की अवहेलना तक; और स्वर्गीय नगर परमेश्वर के प्रेम से, यहाँ तक कि स्वयं की अवहेलना तक। पहला, एक शब्द में, अपने आप में गर्व करता है, दूसरा प्रभु में। क्योंकि एक मनुष्यों से महिमा चाहता है; परन्तु दूसरे की सबसे बड़ी महिमा परमेश्वर है, जो विवेक का साक्षी है। एक अपनी ही महिमा में अपना सिर उठाता है; दूसरा अपने परमेश्वर से कहता है, "तू मेरी महिमा है, और मेरा सिर उठानेवाला है।"[126] एक में, राजकुमार और वे जातियाँ जिन्हें वह वश में करता है, शासन करने के प्रेम से शासित होते हैं; दूसरे में, राजकुमार और प्रजा एक-दूसरे की प्रेम में सेवा करते हैं, बाद वाले आज्ञा मानते हैं, जबकि पहले वाले सबका ध्यान रखते हैं। एक अपनी शक्ति में, जो उसके शासकों के व्यक्तित्व में प्रकट होती है, आनंदित होता है; दूसरा अपने परमेश्वर से कहता है, "हे प्रभु, मेरी शक्ति, मैं तुझसे प्रेम करूँगा।"[127] और इस कारण एक नगर के बुद्धिमान, मनुष्य के अनुसार जीवन बिताते हुए, अपने शरीर या आत्मा, या दोनों के लिए लाभ खोजते रहे हैं, और जिन्होंने परमेश्वर को जाना, उन्होंने "उसे परमेश्वर के रूप में महिमा नहीं दी, न ही धन्यवादी हुए, वरन अपनी कल्पनाओं में व्यर्थ हो गए, और उनका मूर्ख हृदय अंधकारमय हो गया; अपने आपको बुद्धिमान कहते हुए,"—अर्थात् अपनी ही बुद्धि में गर्व करते हुए, और अभिमान से ग्रस्त होते हुए,—"वे मूर्ख बन गए, और अविनाशी परमेश्वर की महिमा को नाशवान मनुष्य, और पक्षियों, और चौपायों, और रेंगनेवाले प्राणियों के समान बनी हुई मूरत में बदल दिया।" क्योंकि वे मूरतों की पूजा में लोगों के अगुवे या अनुयायी थे, "और उन्होंने सृष्टिकर्ता से बढ़कर सृष्टि की उपासना और सेवा की, जो सदा धन्य है।"[128] परन्तु दूसरे नगर में कोई मानवीय बुद्धि नहीं, वरन केवल भक्ति है, जो सच्चे परमेश्वर को उचित उपासना अर्पित करती है, और संतों की संगति में, पवित्र स्वर्गदूतों के साथ-साथ पवित्र मनुष्यों की संगति में, अपने प्रतिफल की प्रतीक्षा करती है, "कि परमेश्वर सब में सब कुछ हो।"[129]

    टिप्पणियाँ

    1. [2] 1 Cor. xv. 39।
    2. [3] Rom. iii. 20।
    3. [4] Gal. iii. 11।
    4. [5] John. i. 14।
    5. [6] अपोलिनारियनवादी।
    6. [7] John. xx. 13।
    7. [8] Gal. v. 19-21।
    8. [9] Wisd. ix. 15।
    9. [10] 2 Cor. iv. 16।
    10. [11] 2 Cor. v. 1-4।
    11. [12] Æneid, vi. 730-32।
    12. [13] वही, 733, 734।
    13. [14] शैतान के दंड के विषय में देखें: De Agone Christi, 3-5, और De Nat. Boni, 33।
    14. [15] Rom. iii. 7।
    15. [16] John xiv. 6।
    16. [17] 1 Cor. iii. 3।
    17. [18] 1 Cor. ii. 11-14।
    18. [19] 1 Cor. iii. 1।
    19. [20] Rom. iii. 20।
    20. [21] Gen. xlvi. 27।
    21. [22] देखें: ऑगस्टीन, De Hæres. 46।
    22. [23] Tusc. Quæst. iv. 6।
    23. [24] Æneid, vi. 719-21।
    24. [25] Tit. i. 8, यूनानी और वुल्गेट के अनुसार।
    25. [26] John xxi. 15-17। इन पर्यायवाची शब्दों के विषय में उसी स्थान की टीकाओं को देखें।
    26. [27] Ps. xi. 5।
    27. [28] 1 John ii. 15
    28. [29] 2 Tim. iii. 2।
    29. [30] Phil. i. 23।
    30. [31] Ps. cxix. 20।
    31. [32] Wisd. vi. 20।
    32. [33] Ps. xxxii. 11।
    33. [34] Ps. iv. 7।
    34. [35] Ps. xvi. 11।
    35. [36] Phil. ii. 12।
    36. [37] Rom. xi. 20।
    37. [38] 2 Cor. xi. 3।
    38. [39] Æneid, vi. 733।
    39. [40] Isa. lvii. 21।
    40. [41] Matt. vii. 12।
    41. [42] Ecclus. vii. 13।
    42. [43] Luke ii. 14।
    43. [44] Cat. i. 2।
    44. [45] Ter. Andr. ii. 1, 6।
    45. [46] Æneid, vi. 733।
    46. [47] Æneid, v. 278।
    47. [48] 2 Cor. vii. 8-11।
    48. [49] Tusc. Disp. iii. 32।
    49. [50] C. 4, 5।
    50. [51] Rom. viii. 23।
    51. [52] 1 Cor. xv. 54।
    52. [53] Matt. xxiv. 12।
    53. [54] Matt. x. 22।
    54. [55] 1 John i. 8।
    55. [56] 2 Cor. ix. 7।
    56. [57] Gal. vi. 1।
    57. [58] Ps. xxvi. 2।
    58. [59] Matt. xxvi. 75।
    59. [60] Jas. i. 2।
    60. [61] 1 Cor. iv. 9।
    61. [62] Phil. iii. 14।
    62. [63] Rom. xii. 15।
    63. [64] 2 Cor. vii. 5।
    64. [65] Phil. i. 23।
    65. [66] Rom. i. 11-13।
    66. [67] 2 Cor. xi. 1-3।
    67. [68] Rom. ix. 2।
    68. [69] Rom. x. 3।
    69. [70] 2 Cor. xii. 21।
    70. [71] Mark iii. 5।
    71. [72] John xi. 15।
    72. [73] John xi. 35।
    73. [74] Luke xxii. 15।
    74. [75] Matt. xxvi. 38।
    75. [76] Rom. i. 31।
    76. [77] Ps. lxix. 20।
    77. [78] क्रांटोर, एक अकादमिक दार्शनिक, जिसे सिसरो ने उद्धृत किया है, Tusc. Quæst. iii. 6।
    78. [79] 1 John i. 8।
    79. [80] 1 John iv. 18।
    80. [81] Rom. viii. 15।
    81. [82] Ps. xix. 9।
    82. [83] Ps. ix. 18।
    83. [84] Matt. v. 28।
    84. [85] Gen. i. 28।
    85. [86] Gen. vi. 6, और 1 Sam. xv. 11।
    86. [87] Eccles. vii. 29।
    87. [88] John viii. 36।
    88. [89] 1 Tim. ii. 14।
    89. [90] Rom. v. 12।
    90. [91] Gen. iii. 12।
    91. [92] Ecclus. x. 13।
    92. [93] Matt. vii. 18।
    93. [94] Defecit।
    94. [95] Ps. lxxiii. 18।
    95. [96] Gen. iii. 5।
    96. [97] Prov. xviii. 12।
    97. [98] अर्थात्, यह एक स्पष्ट और अविवादित अपराध था।
    98. [99] Ps. lxxxiii. 16।
    99. [100] Gen. iii. 12, 13।
    100. [101] Phil. ii. 8।
    101. [102] Ps. cxliv. 4।
    102. [103] सिसरो, Tusc. Quæst. iii. 6 और iv. 9। इसी प्रकार अरिस्तू भी।
    103. [104] 1 Thess. iv. 4।
    104. [105] Gen. ii. 25।
    105. [106] एक भ्रम जो इन शब्दों से उत्पन्न हुआ, "उन दोनों की आँखें खुल गईं," Gen. iii. 7।—देखें: De Genesi ad lit. ii. 40।
    106. [107] Gen. iii. 6।
    107. [108] ऑगस्टीन के इस सिद्धांत और वाक्य-प्रयोग का पतन के संबंध में उसके संपूर्ण सिद्धांत से जुड़ा होने के कारण महत्वपूर्ण होने से, हम कुछ समानांतर अंश प्रस्तुत करते हैं यह दिखाने के लिए कि ये शब्द यूँ ही नहीं प्रयोग किए गए हैं: De Genesi ad lit. xi. 41; De Corrept. et Gratia, xi. 31; और विशेष रूप से Cont. Julian. iv. 82।
    108. [109] Gen. iii. 7।
    109. [110] देखें: प्लेटो, रिपब्लिक, पुस्तक 4।
    110. [111] एक शब्द उसी विशेषण का लैटिन रूप है, तो दूसरा उसका यूनानी रूप।
    111. [112] डायोजनीज़ लार्टियस द्वारा, vi. 69, और सिसरो, De Offic. i. 41 द्वारा।
    112. [113] Gen. i. 28।
    113. [114] Ps. cxxxviii. 3।
    114. [115] Gen. i. 27, 28।
    115. [116] Matt. xix. 4, 5।
    116. [117] Eph. v. 25।
    117. [118] Luke xx. 34।
    118. [119] देखें: वर्जिल, Georg. iii. 136।
    119. [120] Rom. i. 26।
    120. [121] कैलामा की स्थिति का वर्णन ऑगस्टीन ने कॉन्स्टेंटाइन और हिप्पो के बीच, परन्तु हिप्पो के अधिक निकट, के रूप में किया है।—Contra Lit. Petil. ii. 228। इसका पूर्ण वर्णन पूज़ूला की Histoire de S. Augustin, i. 340 में दिया गया है, जो कहते हैं कि यह नूमिडिया के सबसे महत्वपूर्ण नगरों में से एक था, हिप्पो से अठारह लीग दक्षिण में, और आधुनिक गेल्मा द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है। इसके बिशप पॉसिडियस के कारण ही हमें ऑगस्टीन का समकालीन जीवन-चरित्र प्राप्त होता है।
    121. [122] Andr. ii. 1, 5।
    122. [123] 1 Tim. i. 5।
    123. [124] तुलना करें: बेसिल की स्वर्गोद्यान पर होमिली से, और जॉन डैमासीन, De Fide Orthod. ii. 11 से।
    124. [125] Ps. cxi. 2।
    125. [126] Ps. iii. 3।
    126. [127] Ps. xviii. 1।
    127. [128] Rom. i. 21-25।
    128. [129] 1 Cor. xv. 28।

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