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यहोशू 24
यहोशू 24:1-14
1. Congregavit itaque Josue omnes tribus Israel in Sichem, vocavitque seniores Israel, et capita ejus, judicesque ejus, ac praefectos ejus: steteruntque coram Deo.
1. फिर यहोशू ने इस्राएल के सब गोत्रों को शकेम में इकट्ठा किया, और इस्राएल के वृद्ध लोगों, और मुख्य पुरुषों, और न्यायियों, और सरदारों को बुलवाया; और वे परमेश्वर के सामने उपस्थित हुए।
"itaque" (इसलिये) शब्द यहाँ बिना किसी प्रमाण के जोड़ा गया है; परन्तु कैल्विन, जैसा कि वह इस पद की टीका में समझाता है, इसे आवश्यक समझता है, ताकि पिछले अध्याय के साथ सम्बन्ध बना रहे, और उसकी इस धारणा के अनुसार यह दिखाया जाए कि दोनों अध्यायों में केवल एक ही सभा का वृत्तान्त है। इसके विपरीत, जैसा कि पृष्ठ 264 की टिप्पणी में कहा गया है, यहाँ दिए गए वृत्तान्त की सम्पूर्ण धारा यही संकेत करती प्रतीत होती है कि यह पिछली सभा के क्रम का नहीं, वरन् किसी बाद के अवसर पर और उससे भी अधिक गम्भीर प्रयोजन के लिए बुलाई गई सभा का वर्णन है। — सं.
2. तब यहोशू ने उन सब लोगों से कहा, इस्राएल का परमेश्वर यहोवा इस प्रकार कहता है, कि प्राचीनकाल में अब्राहम और नाहोर का पिता तेरह आदि, तुम्हारे पुरखा महानद के उस पार रहते थे, और वे दूसरे देवताओं की उपासना करते थे।
2. Dixitque Josue ad universum populum, Sic dicit Jehova Deus Israel, Trans flumen habitaverunt patres vestri a seculo, ut Thare pater Abraham, et pater Nachor, servicruntque diis alienis.
3. और मैं ने तुम्हारे मूलपुरुष अब्राहम को महानद के उस पार से ले आकर कनान देश के सब स्थानों में फिराया, और उसका वंश बढ़ाया, और उसे इसहाक को दिया।
3. Et tuli patrem vestrum Abraham e loco qui erat trans flumen, et deduxi per universam terram Chanaan: multiplicavique semen ejus, et dedi ei Isaac.
4. फिर मैं ने इसहाक को याकूब और एसाव दिए; और एसाव को मैं ने सेईर नामक पहाड़ी देश दिया कि वह उसका अधिकारी हो; परन्तु याकूब बेटों-पोतों समेत मिस्र को गया।
4. Et dedi ipsi Isaac Jacob et Esau: tradidique ipsi Esau montem Seir, ut possideret eum: Jacob autem et filii ejus descenderunt in Aegyptum.
5. फिर मैं ने मूसा और हारून को भेजकर उन सब कामों के द्वारा जो मैं ने मिस्र में किए उस देश को मारा; और उसके बाद तुम को निकाल लाया।
5. Misique Mosen et Aharon, et percussi Aegyptum, quemadmodum feci in medio ejus, et postea eduxi vos.
6. और मैं तुम्हारे पुरखाओं को मिस्र में से निकाल लाया, और तुम समुद्र के पास पहुँचे; और मिस्रियों ने रथ और सवारों को संग लेकर लाल समुद्र तक तुम्हारे पुरखाओं का पीछा किया।
6. Et eduxi patres vestros ex Aegypto, deveniestique ad mare, et persequuti sunt Aegyptii patres vestros cum curribus, et equitibus usque ad mare rubrum.
7. Tum clamaverunt ad Jehovam, et posuit caliginem inter vos et Aegyptios: induxitque super eum mare, ac operuit eum: et viderunt oculi vestri quae feci in Aegypto, et habitastis in solitudine in diebus multis.
7. और जब उन्होंने यहोवा की दोहाई दी, तब उसने तुम्हारे और मिस्रियों के बीच में अन्धियारा कर दिया, और उन पर समुद्र को बहाकर उनको डुबा दिया; और जो कुछ मैं ने मिस्र में किया उसे तुम लोगों ने अपनी आँखों से देखा; फिर तुम बहुत दिन तक जंगल में रहे।
8. तब मैं तुम को उन एमोरियों के देश में ले आया, जो यरदन के उस पार बसे थे; और वे तुम से लड़े, और मैं ने उन्हें तुम्हारे वश में कर दिया, कि तुम उनके देश के अधिकारी हो जाओ; और मैं ने उनका तुम्हारे सामने से सत्यानाश कर डाला।
8. Postea adduxi vos ad terram Aemorrhaei habitantis trans Jordanem: praeliatique sunt vobiscum, et tradidi eos in manum vestram: possedistisque terram eorum, ac delevi eos a facie vestra.
9. फिर मोआब के राजा सिप्पोर का पुत्र बालाक उठकर इस्राएल से लड़ा; और तुम्हें शाप देने के लिए बोर के पुत्र बिलाम को बुलवा भेजा;
9. Surrexit autem Balac filius Sippor rex Moab, et praeliatis est cum Israel: misitque et vocavit Bileam filium Beor, ut malediceret vobis:
10. परन्तु मैं ने बिलाम की नहीं सुनी; वह तुम को आशीष ही आशीष देता गया; इस प्रकार मैं ने तुम को उसके हाथ से बचाया।
10. Et nolui audire Bileam, sed benedixi benedicendo vobis, et liberavi vos e manu ejus.
11. तब तुम यरदन पार होकर यरीहो के पास आए; और यरीहो के लोग, और एमोरी, परिज्जी, कनानी, हित्ती, गिर्गाशी, हिव्वी और यबूसी तुम से लड़े; और मैं ने उन्हें तुम्हारे वश में कर दिया।
11. Transistisque Jordanem, et venistis ad Jericho: pugnaveruntque contra vos viri Jericho, Aemorrhaeus, et Perizaeus, et Chananaeus, et Hittaus, et Girgasaeus, et Hivaeus, et Jebusaeus: tradidique eos in manum vestram.
यहाँ क्रियाओं में प्रथम पुरुष से अन्य पुरुष की ओर एक बहुत आकस्मिक परिवर्तन है—"उन्होंने दोहाई दी", "उसने कर दिया", "उसने बहाया", "उसने डुबा दिया"—मानो यहोशू ने वास्तविक सन्देश देना बन्द कर दिया हो और केवल वृत्तान्त सुनानेवाला बन गया हो। तौभी सन्देश तुरन्त फिर आरम्भ हो जाता है: "जो कुछ मैं ने किया उसे तुम्हारी आँखों ने देखा है।" सप्तुआजिन्त पद के आरम्भ में "ἀνεβοήσαμεν", अर्थात् "हम ने दोहाई दी", पढ़ता है, और उसके पश्चात् यहोशू 24:13 के अन्त तक वृत्तान्त की शैली का प्रयोग करता है, और यहोशू 24:8 में "वह ले आया" तथा यहोशू 24:10 में "तुम्हारा परमेश्वर प्रभु नहीं चाहता था" कहता है। — सं.
12. और मैं ने तुम्हारे आगे बर्रों को भेजा, और उन्होंने एमोरियों के दोनों राजाओं को तुम्हारे सामने से भगा दिया; यह तेरी तलवार या धनुष का काम नहीं हुआ।
12. Et misit ante vos crabrones, qui expulerunt eos a facie vestra duos reges Aemorrhaei, non gladio tuo, nec arcu tuo.
13. फिर मैं ने तुम्हें ऐसा देश दिया जिसमें तुम ने परिश्रम न किया था, और ऐसे नगर भी दिए जिन्हें तुम ने न बसाया था, और तुम उनमें बसे हो; और जिन दाख और जलपाई के बगीचों के फल तुम खाते हो उन्हें तुम ने नहीं लगाया था।
13. Dedique vobis terram in qua non laborastis, et urbes quas non aedificastis, et habitastis in eis: vineas et oliveta quae non plantastis, comedetis.
14. इसलिये अब यहोवा का भय मानकर उसकी सेवा खराई और सच्चाई से करो; और जिन देवताओं की सेवा तुम्हारे पुरखा महानद के उस पार और मिस्र में करते थे, उन्हें दूर करके यहोवा की सेवा करो।
14. Nunc ergo timete Jehovam, et servite ei in perfectione, et veritate, et auferte deos quibus servierunt patres vestri trans flumen, et in Aegypto, et servite Jehovae.
1. “फिर यहोशू ने सब गोत्रों को इकट्ठा किया” इत्यादि। मेरी सम्मति में वह अब उसी बात को अधिक विस्तार से समझाता है जिसे उसने पहले संक्षेप में बताया था। क्योंकि एक ही कारण से लोगों को दो बार किसी पराए स्थान पर ले जाना उचित न होता। इसलिये इस दोहराव के द्वारा वृत्तान्त का क्रम आगे बढ़ाया जाता है। और अब वह वह बात बताता है जिसका उल्लेख उसने पहले नहीं किया था, कि वे सब प्रभु के सामने खड़े थे—यह ऐसी अभिव्यक्ति है जो सभा की अधिक पवित्र गरिमा और गम्भीरता को सूचित करती है। इसी कारण मैंने पूरक अव्यय “इसलिये” जोड़ा है, ताकि यह प्रकट हो कि जो वृत्तान्त आरम्भ हुआ था वह अब आगे चलता है। क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि यहोशू ने विधिपूर्वक और गम्भीर रीति से यहोवा के नाम की दोहाई दी, और मानो उसकी उपस्थिति में लोगों को सम्बोधित किया, जिससे हर एक अपने मन में विचार करे कि जो कुछ किया जा रहा है उस सब पर परमेश्वर अध्यक्षता कर रहा है, और कि वे वहाँ किसी निजी कार्य में नहीं लगे थे, वरन् स्वयं परमेश्वर के साथ एक पवित्र और अटल वाचा को दृढ़ कर रहे थे। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि, जैसा थोड़ी देर बाद कहा गया है, वहाँ उसका पवित्रस्थान था। अतः यह सम्भव है कि वाचा का सन्दूक वहाँ पहुँचाया गया था—उसका स्थान बदलने के उद्देश्य से नहीं, वरन् इसलिये कि ऐसे गम्भीर कार्य में वे अपने आप को परमेश्वर के पार्थिव न्यायासन के सामने उपस्थित कर सकें।
लातीनी में, "Terrestre Dei tribunal." फ्रांसीसी में, "Le siege judicial que Dieu avoit en terre;" “वह न्याय-आसन जो परमेश्वर का पृथ्वी पर था।” — सं.
क्योंकि ऐसा कोई धार्मिक बन्धन नहीं था जो सन्दूक को हटाने से रोकता, और शकेम की स्थिति भी अधिक दूर नहीं थी।
2. “तुम्हारे पुरखा उस पार रहते थे” इत्यादि। वह अपने भाषण का आरम्भ उनके उस सेंतमेंत लेपालकपन का स्मरण दिलाकर करता है, जिसके द्वारा परमेश्वर ने उनकी ओर से किसी भी प्रयत्न से पहले ही उन पर अनुग्रह किया था, ताकि वे किसी विशेष उत्तमता या पुण्य का घमण्ड न कर सकें। क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें एक अधिक घनिष्ठ बन्धन से अपने साथ बाँध लिया था, और यद्यपि वे दूसरों से किसी रीति से अच्छे न थे, तौभी उसने अपनी निरी सुइच्छा के सिवाय किसी और बात का विचार किए बिना उन्हें अपनी निज प्रजा होने के लिए इकट्ठा किया था। इसके अतिरिक्त, यह स्पष्ट प्रकट करने के लिए कि उनमें घमण्ड करने योग्य कुछ भी नहीं था, वह उन्हें उनके मूल की ओर ले जाता है, और स्मरण दिलाता है कि उनके पुरखा कसदियों के देश में रहते थे, और दूसरों के साथ मिलकर मूरतों की उपासना करते थे, और अपने देशवासियों की बड़ी भीड़ से किसी बात में भिन्न न थे। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अब्राहम, जब वह मूर्तिपूजा में डूबा हुआ था, मानो सबसे निचले गड़हे में से उठाया गया।
यहूदी लोग, निश्चय ही, अपने वंश को झूठी प्रतिष्ठा देने के लिए यह कथा गढ़कर सुनाते हैं कि अब्राहम इसलिये अपने देश से निर्वासित हुआ कि उसने कसदियों की अग्नि को परमेश्वर मानने से इनकार किया था। परन्तु यदि हम प्रेरित लेखक के शब्दों पर ध्यान दें, तो देखेंगे कि वह तेरह और नाहोर से अधिक लोक-प्रचलित मूर्तिपूजा के दोष से मुक्त नहीं ठहराया गया। क्योंकि यह क्यों कहा गया है कि प्रजा के पुरखा पराए देवताओं की सेवा करते थे, और कि अब्राहम को उस देश से छुड़ाया गया, यदि केवल यह दिखाने के लिए नहीं कि उनके मूल ही में परमेश्वर की सेंतमेंत दया किस प्रकार प्रकट हुई? यदि अब्राहम अपने बाकी देशवासियों से भिन्न होता, तो उसकी अपनी भक्ति ही उसे अलग पहचान देती। परन्तु इसके विपरीत बात स्पष्ट रूप से इसलिये कही गई है कि यह दिखाया जाए कि उसमें अपनी कोई ऐसी विशेष उत्तमता नहीं थी जो उस पर दिए गए अनुग्रह को घटा सके, और इसलिये उसके वंशजों को यह मानना उचित था कि जब वह खोया हुआ था, तब वह मृत्यु से जीवन में उठाया गया।
यह लगभग अविश्वसनीय और भयंकर बात प्रतीत होती है कि नूह के जीवित रहते ही मूर्तिपूजा न केवल सारे संसार में सर्वत्र फैल गई थी, वरन् शेम के घराने में भी घुस गई थी, जिसमें कम से कम अधिक शुद्ध धर्म को फलना-फूलना चाहिए था। इस विषय में मनुष्य की मूढ़ता कितनी उन्मत्त और अदम्य है, यह इस तथ्य से सिद्ध होता है कि वह पवित्र कुलपति, जिस पर ईश्वरीय आशीष विशेष रूप से दी गई थी, अपने वंशजों पर अंकुश न रख सका, और उन्हें सच्चे परमेश्वर को त्यागने और अन्धविश्वास के आगे अपने आप को व्यभिचारिणी की नाईं बेच देने से रोक न सका।
3. “और मैं ने तुम्हारे मूलपुरुष अब्राहम को ले लिया” इत्यादि। यह कथन उस बात की और भी पुष्टि करता है जो मैंने अभी दिखाई, कि अब्राहम अपने ही सद्गुण से गहरे अज्ञान और भ्रम के अथाह गड़हे से बाहर नहीं निकला, वरन् परमेश्वर के हाथ से बाहर खींचा गया। क्योंकि यह नहीं कहा गया कि उसने अपनी ही इच्छा से परमेश्वर को खोजा, वरन् यह कि परमेश्वर ने उसे ले लिया और कहीं और पहुँचा दिया। तब यहोशू ईश्वरीय कृपा का विस्तार से वर्णन करता है कि परमेश्वर ने अब्राहम को उसकी लम्बी परदेश-यात्रा में आश्चर्यकर्म के द्वारा सुरक्षित रखा। परन्तु आगे जो कहा गया है उससे कुछ सन्देह उत्पन्न होता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने अब्राहम का वंश बढ़ाया, और फिर भी उसे केवल इसहाक दिया, क्योंकि उसके सिवाय किसी और का उल्लेख नहीं किया गया। परन्तु यह तुलना उनके प्रति परमेश्वर के अनुपम अनुग्रह को प्रकट करती है, इस बात में कि यद्यपि अब्राहम की सन्तान अन्यथा बहुत थी, तौभी केवल उनके पूर्वज ने ही वैध उत्तराधिकारी का स्थान पाया। इसी अर्थ में तुरन्त जोड़ा गया है कि यद्यपि एसाव और याकूब भाई और जुड़वाँ थे, तौभी दोनों में से एक रखा गया और दूसरा छोड़ दिया गया। इसलिये हम देखते हैं कि क्यों, इश्माएल और उसके भाई के विषय में भी और एसाव के विषय में भी, वह याकूब के प्रति ईश्वरीय दया और भलाई की ऊँचे स्वर से प्रशंसा करता है, मानो वह यह कह रहा हो कि उसका वंश किसी और बात में दूसरों से श्रेष्ठ न था, केवल इसी में कि परमेश्वर ने उसे विशेष रूप से चुन लिया था।
यहाँ जिन कथाओं की ओर संकेत है, उनमें से एक यह है कि तेरह न केवल मूरतों का उपासक, वरन् मूरतें बनानेवाला भी था; और अब्राहम ने मूर्तिपूजा की मूर्खता का निश्चय हो जाने पर अपने पिता की सब मूरतें नष्ट कर डालीं। ऐसा करने के बाद उसने तर्कों की एक श्रृंखला के द्वारा, जो बड़ी गम्भीरता से लिखी गई है, अपने पिता को अपने आचरण के औचित्य का निश्चय कराने का परिश्रम किया; परन्तु अपने इस भक्तिपूर्ण प्रयत्न में सफल न होने के कारण उसे भागना पड़ा, और इस प्रकार वह परदेशी बनकर भटकने लगा। — सं.
4. “परन्तु याकूब और उसके बेटे उतर गए” इत्यादि। एसाव के त्यागे जाने का उल्लेख करने के बाद, वह यह बताने लगता है कि याकूब किस प्रकार मिस्र में उतर गया; और यद्यपि वह अपने आप को एक ही कथन तक सीमित रखता है, तौभी वह कथन ऐसा है जो परमेश्वर की पितृवत् कृपा के बड़े, भरपूर और स्पष्ट प्रकटीकरण को सूचित करता है। इसमें सन्देह नहीं किया जा सकता कि यद्यपि पवित्र इतिहासकार हर एक किए गए आश्चर्यकर्म के विषय में ऊँचे शब्दों में नहीं बोलता, तौभी यहोशू ने लोगों के सामने उनके छुटकारे का ऐसा सारांश रखा जो पर्याप्त हो। पहले वह मिस्र में किए गए आश्चर्यकर्मों की ओर संकेत करता है; फिर वह लाल समुद्र के पार होने का गुणगान करता है, जहाँ परमेश्वर ने अपनी अनमोल सामर्थ्य से उनकी सहायता की; और तीसरे, वह उन्हें उस समय का स्मरण दिलाता है जिसमें वे जंगल में भटकते रहे।
8. “तब मैं तुम को उस देश में ले आया” इत्यादि। अन्ततः वह उन विजयों के विषय में कहना आरम्भ करता है जिन्होंने उनके निवास-स्थानों पर अधिकार करने का मार्ग खोल दिया। क्योंकि यद्यपि यरदन के पार का देश निज भाग के अंश के रूप में प्रतिज्ञा नहीं किया गया था, तौभी क्योंकि परमेश्वर ने अपनी आज्ञा से उसे अपनी उदारता की अतिरिक्त अभिव्यक्ति के रूप में कनान देश के साथ जोड़ दिया था, इसलिये यहोशू अकारण नहीं, लोगों के प्रति ईश्वरीय उदारता की सराहना करते हुए उसे दूसरे देश के साथ जोड़ता है; और घोषणा करता है कि वे केवल इतना ही नहीं कि ईश्वरीय सहायता पर भरोसा रखकर शस्त्रों और बल में श्रेष्ठ ठहरे, वरन् उन घातक फन्दों से भी बचाए गए जो बालाक ने उनके लिए बिछाए थे। क्योंकि यद्यपि वह छली बिलाम अपने शापों और कोसनों से कुछ भी न कर सका, तौभी उसके द्वेष को विफल करने में प्रकट हुई परमेश्वर की अद्भुत सामर्थ्य पर ध्यान देना अत्यन्त लाभदायक था। क्योंकि यह ऐसा ही था मानो वह आमने-सामने आ गया हो और हर उस वस्तु से युद्ध किया हो जो उनकी हानि कर सकती थी।
उन्हें और भी दृढ़ता से यह निश्चय कराने के लिए कि उन्होंने केवल परमेश्वर की अगुवाई से ही नहीं, वरन् केवल उसकी सामर्थ्य से विजय पाई थी, वह उस बात को दोहराता है जो हम मूसा की पुस्तकों में पढ़ते हैं (व्यवस्थाविवरण 7:20), कि मनुष्य के हाथ के बिना शत्रु को तितर-बितर करने के लिए बर्रें भेजी गईं। यह उससे कहीं अधिक प्रभावशाली आश्चर्यकर्म था कि वे किसी और रीति से पराजित किए जाते, भगाए जाते और तितर-बितर किए जाते। क्योंकि जो लोग आशा के विपरीत बिना किसी कठिनाई के विजय पा लेते हैं, वे यद्यपि मान लेते हैं कि युद्ध का सफल परिणाम परमेश्वर का दान है, तौभी तुरन्त अपने आप को घमण्ड से अन्धा होने देते हैं, और प्रशंसा को अपनी ही बुद्धि, फुर्ती और वीरता की ओर फेर देते हैं। परन्तु जब यह कार्य बर्रों के द्वारा किया जाता है, तब ईश्वरीय कर्तृत्व निःसन्देह प्रमाणित हो जाता है। इसलिये निष्कर्ष यह है कि लोगों ने देश को अपनी तलवार या धनुष से प्राप्त नहीं किया—यह निष्कर्ष 44वें भजन में दोहराया गया है, और प्रतीत होता है कि वह इसी स्थल से लिया गया है। अन्त में, उन्हें यह स्मरण दिलाने के बाद कि वे दूसरे मनुष्यों के परिश्रम से उपजे फल खाते थे, वह उन्हें उपदेश देता है कि परमेश्वर से वैसा ही प्रेम करें जैसा उसकी भलाई के योग्य है।
यहोशू 24:15-24
15. और यदि यहोवा की सेवा करनी तुम्हें बुरी लगे, तो आज चुन लो कि तुम किस की सेवा करोगे, चाहे उन देवताओं की जिनकी सेवा तुम्हारे पुरखा महानद के उस पार करते थे, और चाहे एमोरियों के देवताओं की जिनके देश में तुम रहते हो; परन्तु मैं तो अपने घराने समेत यहोवा ही की सेवा करूँगा।
15. Quod si molestum est vobis servire Jehovae, eligite vobis hodie quos colatis: sive deos, quibus servierunt patres vestri, qui fuerunt trans flumen, sive deos Aemorrhaei, in quorum habitatis terra: ego vero, et domus mea colemus Jehovam.
16. तब लोगों ने उत्तर दिया, यहोवा को त्यागकर दूसरे देवताओं की सेवा करनी हम से दूर रहे;
16. Cui respondit populus, dicens, Absit a nobis ut derelinquamus Jehovam, serviendo diis alienis.
17. क्योंकि हमारा परमेश्वर यहोवा वही है जो हम को और हमारे पुरखाओं को दासत्व के घर, अर्थात् मिस्र देश से निकाल ले आया, और हमारे देखते बड़े-बड़े आश्चर्यकर्म किए, और जिस मार्ग पर और जितनी जातियों के मध्य में से हम चले आते थे उनमें हमारी रक्षा की;
17. Jehova enim Deus noster ipse est qui eduxit nos et patres nostros e terra AEgypti, e domo servorum, et qui fecit in oculis nostris signa ista magna: servavitque nos in omni via per quam ambulavimus, et in omnibus populis per quorum transivimus medium.
शब्दशः, "और यदि यह तुम्हारी आँखों में बुरा हो।" यह अंग्रेज़ी अनुवाद, "और यदि यह तुम्हें बुरा लगे," से बहुत कम भिन्न है, और कैल्विन के लातीनी पाठ, "Quod si molestum est," "परन्तु यदि यह कष्टदायक है," तथा सप्तुआजिन्त, Εἰδὲμὴἀρέσκει ὑμῖν, "यदि यह तुम्हें प्रिय नहीं है," दोनों से उत्तम है। लूथर ठीक इसी अन्तिम का अनुसरण करता है: "Gefallt es euch aber nicht." — सं.
18. और हमारे सामने से इस देश में रहनेवाली एमोरी आदि सब जातियों को यहोवा ने निकाल दिया है; इसलिये हम भी यहोवा की सेवा करेंगे, क्योंकि हमारा परमेश्वर वही है।
18. Expulitque Jehova omnes populos, atque adeo Aemorrhaeum habitatorem terrae a facie nostra: etiam nos serviemus Jehovae, quiae ipse est Deus noster.
19. यहोशू ने लोगों से कहा, तुम से यहोवा की सेवा नहीं हो सकती; क्योंकि वह पवित्र परमेश्वर है; वह जलन रखनेवाला परमेश्वर है; वह तुम्हारे अपराध और पाप क्षमा न करेगा।
19. Dixitque Josue ad populum Non poteritis servire Jehovae, quia Deus sanctus est, Deus aemulator est: non parcet sceleribus vestris, atque peccatis vestris.
20. यदि तुम यहोवा को त्यागकर पराए देवताओं की सेवा करने लगोगे, तो यद्यपि वह तुम्हारा भला करता आया है, तौभी वह फिरकर तुम्हारी हानि करेगा और तुम्हारा अन्त भी कर डालेगा।
20. Si dereliqueritis Jehovam, et servieritis deo alieno, convertet se et malefaciet vobis, consumetque vos, postquam benefecerit vobis.
21. लोगों ने यहोशू से कहा, नहीं; हम यहोवा ही की सेवा करेंगे।
21. Cui respondit populus, Nequaquam: sed Jehovae serviemus.
22. यहोशू ने लोगों से कहा, तुम आप ही अपने विरुद्ध साक्षी हो कि तुम ने यहोवा की सेवा करनी चुन ली है। उन्होंने कहा, हम साक्षी हैं।
22. Dixitque Josue ad populum, Testes estis contra vos quod vos elegeritis vobis Jehovam ut illi serviatis. Et dixerunt, Testes.
23. उसने कहा, इसलिये अब अपने बीच में से पराए देवताओं को दूर करके अपना-अपना मन इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की ओर लगाओ।
23. Nunc ergo auferte deos alienos, qui sunt in medio vestri, et inclinate cor vestrum ad Jehovam Deum Israel.
सप्तुआजिन्त में "दासत्व के घर से" ये शब्द छोड़ दिए गए हैं। — सं.
सप्तुआजिन्त में लोगों का उत्तर छोड़ दिया गया है। — सं.
24. लोगों ने यहोशू से कहा, हम तो अपने परमेश्वर यहोवा ही की सेवा करेंगे, और उसी की बात मानेंगे।
24. Cui respondit populus Jehovae Deo nostro serviemus, et voci ejus obediemus.
15. “और यदि यहोवा की सेवा करनी तुम्हें बुरी लगे” इत्यादि। यहाँ ऐसा प्रतीत होता है मानो यहोशू उस बात का बहुत कम ध्यान रख रहा हो जो एक ईमानदार और सीधे मनवाले अगुवे को शोभा देती है। यदि लोगों ने परमेश्वर को त्यागकर मूरतों के पीछे चलना आरम्भ किया होता, तो उसका कर्तव्य था कि उनके अधर्मी और घृणित विद्रोह का दण्ड दे। परन्तु अब, उन्हें यह विकल्प देकर कि वे अपनी इच्छा के अनुसार परमेश्वर की सेवा करें या न करें, वह लगाम ढीली कर देता है, और उन्हें ढिठाई से पाप में कूद पड़ने की छूट देता है। आगे जो आता है वह और भी अधिक असंगत है, जब वह उनसे कहता है कि वे प्रभु की सेवा नहीं कर सकते, मानो वह जान-बूझकर उन्हें जूआ उतार फेंकने को उकसाना चाहता हो। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि उनकी भावनाओं को उभारने और प्रकट करने में उसकी जीभ आत्मा की प्रेरणा से चलाई गई थी। क्योंकि जब प्रभु मनुष्यों को अपने अधिकार के अधीन लाता है, तो वे प्रायः भक्ति के लिए उत्साह का अंगीकार करने को बड़ी तत्परता दिखाते हैं, यद्यपि वे तुरन्त उससे गिर जाते हैं। इस प्रकार वे बिना नींव के निर्माण करते हैं। ऐसा इसलिये होता है कि वे न तो अपनी निर्बलता पर उतना अविश्वास करते हैं जितना उन्हें करना चाहिए, और न यह विचार करते हैं कि अपने आप को पूर्ण रूप से प्रभु से बाँध लेना कितना कठिन है। इसलिये गम्भीर आत्म-परीक्षा की आवश्यकता है, ऐसा न हो कि हम किसी चंचल आवेग से ऊपर उड़ा लिए जाएँ, और इस प्रकार अपने पहले ही प्रयत्नों में सफलता से वंचित रह जाएँ। इसी अभिप्राय से यहोशू परख के रूप में यहूदियों को स्वतंत्र कर देता है, मानो उन्हें अपना ही स्वामी बना देता है, और यह चुनने को स्वतंत्र छोड़ देता है कि वे किस परमेश्वर की सेवा करना चाहते हैं—इस उद्देश्य से नहीं कि उन्हें सच्चे धर्म से हटा दे, जिसकी ओर वे पहले ही बहुत अधिक झुके हुए थे, वरन् इसलिये कि वे बिना सोचे-समझे ऐसी प्रतिज्ञाएँ न कर बैठें जिन्हें वे थोड़े ही समय बाद तोड़ डालें। क्योंकि यहोशू का वास्तविक उद्देश्य, जैसा हम देखेंगे, उस वाचा को नया करना और दृढ़ करना था जो परमेश्वर के साथ पहले ही बाँधी जा चुकी थी। इसलिये वह अकारण नहीं उन्हें चुनाव की स्वतंत्रता देता है, ताकि वे आगे चलकर यह बहाना न बना सकें कि उन पर दबाव डाला गया था, जबकि उन्होंने अपनी ही सम्मति से अपने आप को बाँधा था। इस बीच, उनमें लज्जा का भाव जगाने के लिए, वह घोषणा करता है कि वह और उसका घराना परमेश्वर की आराधना में स्थिर बने रहेंगे।
लातीनी में, "Atque ita inter primos conatus nos successus destituet." फ्रांसीसी में, "Et qu'ainsi entre les premiers efforts nous nous trouvions n'estre pas bien fournis pour rencontrer ainsi qu'il faut, et tenir bon;" “और इस प्रकार अपने पहले ही प्रयत्नों में हम अपने आप को इस योग्य न पाएँ कि जैसा उचित है वैसा सामना कर सकें और दृढ़ खड़े रह सकें।” — सं.
16. “तब लोगों ने उत्तर दिया” इत्यादि। यहाँ हम देखते हैं कि उसे दिए गए विकल्प पर पछताने का कोई कारण न रहा, जब लोग किसी दूसरे के शब्दों में शपथ खाते हुए नहीं, और न किसी बाहरी आदेश के आगे चापलूसी से झुकते हुए, घोषणा करते हैं कि परमेश्वर से फिर जाना एक अधर्म का काम होगा। और इस प्रकार जब लोग स्वेच्छा से अपने ऊपर व्यवस्था का बन्धन रखते हैं, तो इससे वाचा कुछ कम दृढ़ नहीं होती। उत्तर का सार यह है कि प्रभु ने अद्भुत छुटकारे के द्वारा उन्हें अपनी निज प्रजा होने के लिए मोल लिया है, निरन्तर उनकी सहायता की है, और यह दिखाया है कि वह उनके बीच उनका परमेश्वर होकर विद्यमान है; इसलिये उसे त्यागकर दूसरे देवताओं की ओर फिर जाना घृणित कृतघ्नता होगी।
19. “यहोशू ने लोगों से कहा” इत्यादि। यहाँ यहोशू पूर्णतः असंगत रीति से काम करता प्रतीत होता है, कि भय का कारण सुझाकर वह लोगों के तत्पर और सजग उत्साह को कुचल देता है। क्योंकि वह इस बात पर किस उद्देश्य से बल देता है कि वे प्रभु की सेवा नहीं कर सकते, सिवाय इसके कि वे अपनी पूर्ण असमर्थता का बोध करके निराशा में पड़ जाएँ, और इस प्रकार अनिवार्य रूप से परमेश्वर के भय से दूर हो जाएँ? तौभी एक आलसी प्रजा को, जो निश्चिन्तता के कारण और भी अधिक सुस्त हो गई थी, जगाने के लिए इस कठोर रीति की चेतावनी का प्रयोग करना आवश्यक था। और हम देखते हैं कि यह उपाय कम से कम क्षणिक सफलता प्राप्त करने में विफल न हुआ। क्योंकि वे न तो हियाव छोड़ते हैं और न अधिक आलसी होते हैं, वरन् उस बाधा को पार करके निडरता से उत्तर देते हैं कि वे अपने कर्तव्य के पालन में स्थिर रहेंगे।
संक्षेप में, यहोशू उन्हें परमेश्वर की सेवा करने से रोकता नहीं, वरन् केवल यह समझाता है कि वे कितने हठीले और आज्ञा न माननेवाले हैं, ताकि वे अपना स्वभाव बदलना सीखें। इसी प्रकार मूसा अपने गीत में (व्यवस्थाविवरण 32), जब वह परमेश्वर और लोगों के बीच तलाक कराता हुआ प्रतीत होता है, तो वह उन्हें कोंचने और उत्तेजित करने के सिवाय और कुछ नहीं करता, ताकि वे शीघ्र अच्छे के लिए बदल जाएँ। यहोशू, निश्चय ही, परमेश्वर के स्वभाव से पूर्ण रूप में तर्क करता है; परन्तु उसका विशेष लक्ष्य लोगों का टेढ़ा आचरण और अदम्य हठ है। वह घोषणा करता है कि यहोवा पवित्र और जलन रखनेवाला परमेश्वर है। यह बात निश्चय ही मनुष्यों को उसकी आराधना करने से किसी रीति से रोकनी नहीं चाहिए; परन्तु इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अशुद्ध, दुष्ट और अपवित्र तिरस्कार करनेवाले, जिनमें कोई धर्म नहीं, उसके क्रोध को भड़काते हैं, और उसके साथ उनकी कोई संगति नहीं हो सकती, क्योंकि वे उसे अक्षम्य पाएँगे। और जब यह कहा जाता है कि वह उनकी दुष्टता को क्षमा न करेगा, तो यहाँ कोई सामान्य नियम नहीं ठहराया गया, वरन्, जैसा अन्य स्थानों में प्रायः होता है, यह कथन उनके आज्ञा न माननेवाले स्वभाव के विरुद्ध कहा गया है। इसका सम्बन्ध न तो सामान्य दोषों से है और न विशेष दोषों से, वरन् यह परमेश्वर के घोर इनकार तक सीमित है, जैसा अगला पद प्रमाणित करता है। इसलिये लोग और भी अधिक तत्परता से उत्तर देते हैं कि वे प्रभु की सेवा करेंगे।
22. “यहोशू ने लोगों से कहा” इत्यादि। अब हम समझते हैं कि वह उद्देश्य क्या था जिस पर यहोशू अब तक लक्ष्य किए हुए था। वह लोगों को भयभीत करके उन्हें उनके धर्म से गिराना नहीं था, वरन् इस बात के द्वारा उस बन्धन को और अधिक पवित्र बनाना था कि उन्होंने अपनी ही इच्छा से उसके शासन को चुना है, और उसके मार्गदर्शन की शरण ली है, ताकि वे उसकी रक्षा के अधीन जीवन बिताएँ। इसलिये वे स्वीकार करते हैं कि यदि वे विश्वासघाती निकलें, तो उनका अपना विवेक उन पर दोष लगाएगा और उन्हें विश्वासघात का दोषी ठहराएगा। परन्तु यद्यपि यह घोषणा करने में कि वे अपने ही दण्ड के साक्षी होंगे वे कपटी न थे, तौभी इस प्रतिज्ञा का स्मरण कितनी सहजता से मिट गया, यह न्यायियों की पुस्तक से प्रकट है। क्योंकि जब उनमें से अधिक वृद्ध लोग मर गए, तब वे शीघ्र ही नाना प्रकार के अन्धविश्वासों की ओर मुड़ गए। इस उदाहरण से हमें सिखाया जाता है कि मनुष्यों की इन्द्रियों पर कितने प्रकार के धोखे छाए रहते हैं, और वे गुप्त कोने कितने टेढ़े-मेढ़े हैं जिनमें वे अपने कपट और मूर्खता को छिपाते हैं, जबकि वे व्यर्थ भरोसे के द्वारा अपने आप को धोखा देते हैं।
लातीनी में, "Liberius." फ्रांसीसी में, "Plus hardiment et franchement;" “अधिक साहस और खुलेपन के साथ।” — सं.
23. “इसलिये अब पराए देवताओं को दूर करो” इत्यादि। यह कैसे हो सकता है कि जो लोग अभी हाल ही में अन्धविश्वास का ऐसा कठोर पलटा लेनेवाले थे, उन्होंने स्वयं मूरतों को स्थान दे दिया हो? तौभी ये शब्द स्पष्ट आज्ञा देते हैं कि वे अपने बीच में से पराए देवताओं को दूर करें। यदि हम यह अर्थ लगाएँ कि उनके अपने घर अब भी मूरतों से अशुद्ध थे, तो हम मानो एक चमकीले दर्पण में देख सकते हैं कि मनुष्य-जाति का अधिकांश भाग उन्हीं अवगुणों में कितनी आत्म-सन्तुष्टि से लिप्त रह सकता है, जिनका दूसरों में वह निर्दय कठोरता से पीछा करता है। परन्तु क्योंकि मैं यह सम्भव नहीं समझता कि आकान को दण्ड दिए जाने के बाद उन्होंने प्रकट अपवित्रीकरण से अपने आप को अशुद्ध करने का साहस किया हो, इसलिये मेरा झुकाव यह मानने की ओर है कि यहाँ उनके आचरण की नहीं, वरन् उनकी प्रवृत्तियों की ओर संकेत है, और उनसे कहा गया है कि वे झूठे देवताओं के सब विचारों को अपने से दूर कर दें। क्योंकि उसने इसी अध्याय में पहले उन्हें उपदेश दिया था कि वे उन देवताओं को दूर करें जिनकी सेवा उनके पुरखा महानद के उस पार और मिस्र में करते थे। परन्तु कोई यह नहीं समझेगा कि कसदियों की मूरतें उनके भण्डारों में संजोकर रखी गई थीं, या कि वे मिस्र से अशुद्ध देवताओं को अपने साथ लाए थे, जो परमेश्वर और उनके बीच शत्रुता का कारण बनें। इसलिये अर्थ केवल यह है कि वे सब मूरतों का त्याग करें, और सब अपवित्रता से अपने आप को शुद्ध करें, ताकि वे शुद्धता से केवल परमेश्वर ही की आराधना करें।
यही इस वाक्यांश का आशय प्रतीत होता है, “अपना मन प्रभु की ओर लगाओ”, जिसे इसके तुल्य समझा जा सकता है: उसी में विश्राम करो, और अपना मन उसके प्रेम में ऐसा लगा दो कि केवल उसी में आनन्दित और सन्तुष्ट रहो।
फ्रांसीसी में, "Leur propre conscience les redarguera comme coulpables et conveincus de desloyaute, et d'avoir fausse leur foy, s'ils ne tiennent leur promesse;" “यदि वे अपनी प्रतिज्ञा पूरी न करें, तो उनका अपना विवेक उन्हें दोषी और विश्वासघात के अपराधी, तथा अपना वचन भंग करनेवाले ठहराकर दण्ड के योग्य ठहराएगा।” — सं.
फ्रांसीसी इतना और जोड़ता है, "Comme s'il n'y avoit rien a redire en eux;" “मानो उनमें आपत्ति करने योग्य कुछ भी न हो।” — सं.
वे शब्द, जिनका शाब्दिक अर्थ है, “वे देवता जो तुम्हारे बीच में हैं,” यह संकेत करते प्रतीत होते हैं कि इस समय भी कुछ इस्राएली गुप्त रूप से मूर्तिपूजा के आदी थे। — सं.
यहोशू 24:25-33
25. तब यहोशू ने उसी दिन उन लोगों से वाचा बँधाई, और शकेम में उनके लिए विधि और नियम ठहराया।
25. Percussit itaque Josue foedus cum populo in die illa: et prosposuit ei praeceptum et judicium in Sechem.
26. यह सारा वृत्तान्त यहोशू ने परमेश्वर की व्यवस्था की पुस्तक में लिख दिया; और एक बड़ा पत्थर लेकर वहाँ उस बांज वृक्ष के तले खड़ा किया, जो यहोवा के पवित्रस्थान के पास था।
26. Scripsit Josue verba ista in libro Legis Dei: tulit quoque lapidem magnum, statuitque eum ibi subter quercum, quae erat in sanctuario Jehovae.
27. तब यहोशू ने सब लोगों से कहा, सुनो, यह पत्थर हम लोगों का साक्षी रहेगा, क्योंकि जितने वचन यहोवा ने हम से कहे हैं उन्हें इसने सुना है; इसलिये यह तुम्हारा साक्षी रहेगा, ऐसा न हो कि तुम अपने परमेश्वर से मुकर जाओ।
27. Dixitque Josue ad universum populum, En lapis iste erit nobis in testimonium: ipse enim audivit omnia verba Jehovae quae loquutus est nobiscum, eritque contra vos in testimonium, ne forte mentiamini contra Deum vestrum.
28. तब यहोशू ने लोगों को अपने-अपने निज भाग पर जाने के लिए विदा किया।
28. Remisitque Josue populum, quemlibet in haereditatem suam.
29. इन बातों के बाद यहोवा का दास, नून का पुत्र यहोशू, एक सौ दस वर्ष का होकर मर गया।
29. His autem gestis, mortuus est Josue filius Nun servus Jehovae centum et decem annorum.
सप्तुआजिन्त कहता है, “शीलो में, इस्राएल के परमेश्वर के तम्बू के सामने;” और कुछ व्याख्याकार, इससे तथा अन्य विचारों से प्रेरित होकर, यह दिखाने का परिश्रम करते हैं—यद्यपि बहुत कम विश्वसनीयता के साथ—कि यहाँ वर्णित सारा कार्य शीलो में हुआ था, और कि शकेम नाम यहाँ उस नाम के नगर को नहीं, वरन् इतने बड़े प्रदेश को दिया गया है कि शीलो भी उसमें सम्मिलित था। — सं.
30. और उसको तिम्नत्सेरह में, जो एप्रैम के पहाड़ी देश में गाश नामक पहाड़ की उत्तर अलंग पर है, उसी के भाग की सीमा में मिट्टी दी गई।
30. Sepelieruntque eum in termino haereditatis ejus in Thimnatserah, quae est in monte Ephraim ad aquilonem montis Gaas.
31. और यहोशू के जीवन भर, और जो वृद्ध लोग यहोशू के मरने के बाद जीवित रहे और जानते थे कि यहोवा ने इस्राएल के लिए कैसे-कैसे काम किए थे, उनके भी जीवन भर इस्राएली यहोवा ही की सेवा करते रहे।
31. Servivitque Israel Jehovae cunctis diebus Josue, cunctisque diebus eniorum qui diu vixerunt post Josue, quinque noverunt omne opus Jehovae quod fecerat ipsi Israel.
32. फिर यूसुफ की हड्डियाँ, जिन्हें इस्राएली मिस्र से ले आए थे, शकेम की भूमि के उस भाग में गाड़ी गईं, जिसे याकूब ने शकेम के पिता हमोर के पुत्रों से एक सौ चाँदी के सिक्कों में मोल लिया था; और वह यूसुफ की सन्तान का निज भाग हो गई।
32. Ossa autem Joseph quae detulerant filii Israel ex Aegypto, sepelierunt in Sechem, in parte agri quam acquisierat Jacob a filiis Hamor patris Sechem centum nummis, et fuerunt filiis Joseph in possessione sua.
33. और हारून का पुत्र एलीआजर भी मर गया; और उसको एप्रैम के पहाड़ी देश में उस पहाड़ी पर मिट्टी दी गई, जो उसके पुत्र पीनहास की थी और उसको दे दी गई थी।
33. Porro Eleazar filius Aharon mortuus est, et sepelierunt eum in Gibeath Phinees filii ejus, qui datus fuit illi in monte Ephraim.
सप्तुआजिन्त यहाँ यहोशू 24:29 और 31 का क्रम बदल देता है, और यहोशू 24:29 के अन्त में, जो इस प्रकार उसका यहोशू 24:31 बन जाता है, यह अनोखा कथन जोड़ता है कि जो कब्र उन्होंने वहाँ उसके लिए बनाई, उसके भीतर उन्होंने वे पत्थर की छुरियाँ रख दीं जिनसे उसने गिलगाल में इस्राएलियों का खतना किया था, जब वह उन्हें मिस्र से निकाल लाया, जैसा प्रभु ने उन्हें आज्ञा दी थी; और वे आज के दिन तक वहीं हैं। — सं.
25. “तब यहोशू ने वाचा बँधाई” इत्यादि। यह स्थल उस उद्देश्य को प्रकट करता है जिसके लिए सभा बुलाई गई थी, अर्थात् वाचा को नया करके लोगों को और भी पूर्णता से और और भी गम्भीरता से परमेश्वर से बाँधना। इसलिये इस समझौते में यहोशू ने ऐसे काम किया मानो वह परमेश्वर की ओर से इसलिये नियुक्त किया गया हो कि उसके नाम में लोगों द्वारा प्रतिज्ञा की गई श्रद्धा और आज्ञाकारिता को ग्रहण करे। अतः दूसरे वाक्यांश में व्याख्या के रूप में यह जोड़ा गया है कि उसने उनके सामने विधि और नियम रखा। क्योंकि कुछ व्याख्याकार इसके अर्थ को बिगाड़ते और तोड़-मरोड़ देते हैं, जो इसे यहोशू के किसी नए भाषण से सम्बन्धित बताते हैं, जबकि इसे ठीक-ठीक मूसा की व्यवस्था के विषय में समझना चाहिए—मानो यह कहा गया हो कि यहोशू ने इसके सिवाय और कोई अनुबन्ध नहीं किया कि वे व्यवस्था के पालन में दृढ़ बने रहें, और वाचा की कोई और धाराएँ सामने नहीं रखी गईं; वे केवल उसी शिक्षा में दृढ़ किए गए जिसे उन्होंने पहले ग्रहण और अंगीकार किया था। इसी प्रकार मलाकी भी, उन्हें परमेश्वर के जूए के अधीन रखने के लिए, इससे अधिक कुछ नहीं माँगता कि वे मूसा की व्यवस्था को स्मरण रखें। (मलाकी 4:4)
26. “यह सारा वृत्तान्त यहोशू ने लिख दिया” इत्यादि। इसे उस प्रामाणिक ग्रन्थ के विषय में समझो जो वाचा के सन्दूक के पास रखा जाता था, मानो उसमें चिरस्थायी स्मरण के लिए जमा किए गए सार्वजनिक अभिलेख हों। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब व्यवस्था पढ़ी जाती थी, तब इस वाचा की घोषणा भी साथ में जोड़ दी जाती थी। परन्तु क्योंकि प्रायः ऐसा होता है कि जो लिखा जाता है वह बिना खोली पुस्तकों में छिपा रह जाता है, इसलिये स्मरण के लिए एक और सहायता दी गई, ऐसी जो सदा आँखों के सामने रहे, अर्थात् पवित्रस्थान के निकट सन्दूक के नीचे रखा गया पत्थर। इसका यह अर्थ नहीं कि सन्दूक का स्थायी स्थान वहीं था, वरन् यह कि वह वहाँ इसलिये रखा गया था कि वे परमेश्वर की उपस्थिति में आ सकें। इसलिये जितनी बार वे उसकी उपस्थिति में आते, उतनी बार बाँधी गई वाचा की साक्षी या स्मृति-चिह्न उनकी आँखों के सामने रहता, ताकि वे विश्वास में और भी अच्छी रीति से स्थिर रखे जाएँ।
यहोशू का यह कथन कि पत्थर ने वचनों को सुना, निश्चय ही अतिशयोक्तिपूर्ण है, परन्तु ईश्वरीय वचन की प्रभावशीलता और सामर्थ्य को व्यक्त करने के लिए अनुपयुक्त नहीं, मानो यह कहा गया हो कि वह निर्जीव चट्टानों और पत्थरों को भी बेध देता है; यहाँ तक कि यदि मनुष्य बहरे हों, तो उनका दण्ड सब तत्वों में गूँज उठता है। “मुकर जाना” (झूठ बोलना) यहाँ, जैसा अन्य स्थानों में प्रायः होता है, छल और कपट से काम करने के अर्थ में, अर्थात् दी हुई प्रतिज्ञा को निष्फल करने और तोड़ने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। कौन यह न समझता कि इतनी भली-भाँति स्थापित वाचा अनेक युगों तक वंशजों के लिए दृढ़ और पवित्र रहेगी? परन्तु यहोशू ने अपनी अत्यन्त बड़ी चिन्ता से केवल इतना ही प्राप्त किया कि कुछ वर्षों तक उसका कठोरता से पालन होता रहा।
फ्रांसीसी इतना और जोड़ता है, "Et on le laisse la dormir;" “और उसे वहीं सोने दिया जाता है।” — सं.
29. “इन बातों के बाद” इत्यादि। गाड़े जाने का आदर श्रद्धा का एक चिह्न था, जो स्वयं लोगों के स्नेहपूर्ण आदर की साक्षी देता था। परन्तु न यह श्रद्धा और न यह स्नेह गहराई तक जड़ पकड़े हुए था। वह उपाधि, जिससे यहोशू को उसकी मृत्यु के बाद विभूषित किया गया, जब उसे प्रभु का दास कहा गया, उन अभागे और भ्रष्ट मनुष्यों का सब बहाना छीन लेती है जिन्होंने थोड़े ही समय बाद उस प्रभु को ठुकरा दिया जिसने उनके बीच आश्चर्यकर्म किए थे। इसलिये जब यह कहा जाता है कि यहोशू के जीवित रहते और अधिक वृद्ध लोगों के मर जाने तक वे प्रभु की सेवा करते रहे, तो परोक्ष रूप से उनकी अस्थिरता की ओर ध्यान खींचा जाता है। क्योंकि यहाँ एक मौन विरोधाभास है, जो उस पतन और विमुखता को सूचित करता है जब वे अचानक ईश्वरीय उपकारों की विस्मृति से ग्रस्त हो गए। इसलिये यदि आज के दिनों में भी ऐसा होता है तो कोई आश्चर्य नहीं, कि जब परमेश्वर अपने किसी दास को विशिष्ट और उत्तम वरदानों से सुसज्जित करता है, तब उसका अधिकार कलीसिया की व्यवस्था और दशा की रक्षा करता और उसे बनाए रखता है; परन्तु जब वे मर जाते हैं, तब तुरन्त दुःखदायी विनाश आरम्भ हो जाता है, और छिपी हुई अभक्ति बेलगाम स्वच्छन्दता के साथ फूट निकलती है।
32. “और यूसुफ की हड्डियाँ” इत्यादि। यूसुफ की हड्डियों के गाड़े जाने का समय नहीं बताया गया; परन्तु यह अनुमान करना सहज है कि इस्राएलियों ने यह कर्तव्य तब पूरा किया जब उन्हें शकेम नगर में शान्तिपूर्ण निवास मिल गया। क्योंकि यद्यपि उसने कब्र के लिए कोई विशेष स्थान निर्धारित नहीं किया था, तौभी उन्होंने उसकी हड्डियों को उस खेत में रखना आदर का चिह्न समझा जिसे याकूब ने मोल लिया था। तौभी यह हो सकता है कि यह बात लोगों की उस सुस्ती की निन्दा के रूप में कही गई हो, जिसके कारण यूसुफ अब्राहम के साथ गाड़ा न जा सका, क्योंकि वह स्थान अब भी शत्रु के अधिकार में था। स्तिफनुस (प्रेरितों के काम 7) बारहों कुलपतियों की हड्डियों का उल्लेख करता है, और यह असम्भव नहीं कि अन्य गोत्रों ने भी स्पर्धा की भावना से अपने पूर्वजों की राख को इकट्ठा किया हो। वहाँ कहा गया है कि वह खेत अब्राहम ने मोल लिया था; परन्तु स्पष्ट है कि नाम में कोई भूल घुस आई है। गाड़े जाने के विषय में हमें सामान्यतः यह मानना चाहिए कि पवित्रशास्त्र में उसका इतनी बार उल्लेख इसलिये है कि वह भविष्य के पुनरुत्थान का प्रतीक है।
