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यहोशू 11
यहोशू 11:1-15
1. यह सुनकर हासोर के राजा याबीन ने मादोन के राजा योबाब,
1. Quum autem Jabim rex Hasor, misit ad Jobab regem Madam, et ad regem Simeron, et ad regem Achsaph, और शिम्रोन के राजा, और अक्षाप के राजा को,
2. और उन राजाओं को जो उत्तर की ओर पहाड़ी देश में, और किन्नेरेत की दक्खिन के अराबा में, और नीचे के देश में, और पच्छिम की ओर दोर के ऊँचे देश में रहते थे,
2. Ad reges quoque qui habitabunt ab aquilone in montanis, et in planitie ad meridiem Cineroth, et in planitie in Naphoth-Dor ab occidente.
3. और पूरब और पच्छिम दोनों ओर के रहनेवाले कनानियों, और एमोरियों, हित्तियों, परिज्जियों, और पहाड़ी देश के यबूसियों, और मिस्पा देश में हेर्मोन के नीचे रहनेवाले हिव्वियों को बुलवा भेजा।
3. Ad Chananaeum ab oriente et occidente, et Amorrhaeum, et Hitthaeum, et Pherisaeum, et Jebusaeum in montanis, et Hivaeum sub Hermon in terra Mispath.
4. और वे अपनी-अपनी सारी सेना समेत निकल आए; वे समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान बहुत थे, और उनके साथ बहुत से घोड़े और रथ भी थे।
4. Et egressi sunt ipsi, et omnes exercitus eorum cum ipsis, populus multus tanquam arena quae est juxta littus maris, prae multitudine, et equi, et currus multi valde.
5. तब ये सब राजा इकट्ठे हुए, और इस्राएलियों से लड़ने को मेरोम नाम ताल के पास आकर एक संग छावनी डाली।
5. Congregati sunt omnes reges isti, et venientes castrametati sunt pariter ad aquas Merom, ut pugnarent cum Israele.
6. तब यहोवा ने यहोशू से कहा, उनसे मत डर, क्योंकि कल इसी समय मैं उन सभों को इस्राएलियों के वश करके मरवा डालूँगा; तू उनके घोड़ों की नस कटवाना, और उनके रथ आग में जला देना।
6. Dixit autem Jehova ad Josuam, Ne timeas a facie eorum: cras enim hoc tempore tradam omnes istos occisos coram Israele, equos eorum subnervabis, et currus eorum combures igni.
7. तब यहोशू सब योद्धाओं समेत मेरोम नाम ताल के पास अचानक पहुँचकर उन पर टूट पड़ा।
7. Venit itaque Josue, et cunctus populus bellator cum eo adversus ipsos ad aquam Merom repente, et irruerunt in eos.
8. और यहोवा ने उनको इस्राएलियों के हाथ में कर दिया, इसलिए उन्होंने उन्हें मार लिया, और बड़े नगर सीदोन और मिस्रपोतमैम तक, और पूर्व की ओर मिस्पे के मैदान तक उनका पीछा किया; और उनको यहाँ तक मारा कि उनमें से किसी को जीवित न छोड़ा।
8. Et tradidit eos Jehova in manum Israelis, percusseruntque eos, et persequuti sunt usque ad Sidonem magnam, et usque ad fervores aquarum, et usque ad campum Mispe ad orientem: ac percusserunt eos donec non reliquerit eis superstitem.
9. तब यहोशू ने यहोवा की आज्ञा के अनुसार उनसे किया; उसने उनके घोड़ों की नस कटवाई, और उनके रथ आग में जला दिए।
9. Fecitque eis Josue quemadmodum dixerat eis Jehova, equos eorum subnervavit, et currus eorum combussit igni.
10. उस समय यहोशू ने घूमकर हासोर को ले लिया, और उसके राजा को तलवार से मार डाला; क्योंकि पहले हासोर उन सब राज्यों में मुख्य था।
10. Et reversus Josue eodem tempore cepit Hasor, et regem ejus percussit gladio, aHasor enim antea fuerat caput omnium istorum regnorum.
11. और जितने प्राणी उसमें थे उन सभों को उन्होंने तलवार से मारकर सत्यानाश किया; कोई साँस लेनेवाला न बचा; और उसने हासोर को आग लगाकर फुँकवा दिया।
11. Percusserunt quoque omnem animam quae illic erat, acie gladii perdendo: non remansit ulla anima: et Hasor combussit igni.
12. और उन राजाओं के सब नगरों को, और उनके सब राजाओं को यहोशू ने ले लिया, और उन्हें तलवार से मारकर सत्यानाश किया, जैसी यहोवा के दास मूसा ने आज्ञा दी थी।
12. Omnes urbes regum istorum, et universos reges earum cepit Josue, percussitque eos acie gladii, perdendo eos sicuti praeceperat Moses servus Jehovae.
13. परन्तु जो नगर अपने टीलों पर दृढ़ता से बसे थे उनमें से इस्राएल ने किसी को नहीं जलाया, केवल हासोर को छोड़कर; उसे यहोशू ने फुँकवा दिया।
13. Tantummodo omnes urbes quae manebant in statu suo non combussit Israel, praeter Hasor solam quam combussit Josue.
14. और इन नगरों की सारी लूट और पशुओं को इस्राएलियों ने अपने लिए लूट लिया; परन्तु सब मनुष्यों को उन्होंने तलवार से यहाँ तक मारा कि उनका सत्यानाश कर डाला, और किसी साँस लेनेवाले को जीवित न छोड़ा।
14. Et omnia spolia urbium istarum, et jumenta praedati sunt sibi filii Israel: veruntamen omnes homines percusserunt acie gladii quousque perderent eos: non reliquerunt ullam animam.
15. जो आज्ञा यहोवा ने अपने दास मूसा को दी थी, उसी के अनुसार मूसा ने यहोशू को आज्ञा दी, और यहोशू ने वैसा ही किया; जो-जो आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी थी, उनमें से उसने कुछ भी पूरी किए बिना न छोड़ा।
15. Quemadmodum praeceperat Jehova Mosi servo suo: sic praecepit Moses Josue, et Josue sic fecit, ut non omitteret quidquam ex omnibus quae praeceperat Jehova Mosi.
1. “और जब याबीन ने” इत्यादि। इस नई सन्धि में भी हमें परमेश्वर की उस पितृ-स्नेह से भी बढ़कर देखभाल का उज्ज्वल प्रकाशन मिलता है, जिसके द्वारा वह अपनी प्रजा से संकटों को दूर रखता है, और कृपा तथा सहनशीलता के साथ उनकी निर्बलता में सहायता भी करता है। यदि याबीन, उन संगी राजाओं के साथ जिनका यहाँ उल्लेख किया गया है, खुले रूप से पड़ोसी राजाओं का साथी बन गया होता, तो इस्राएलियों के विरुद्ध कहीं अधिक भयंकर युद्ध छिड़ जाता, और उनके मन पर कहीं अधिक चिन्ता और व्याकुलता छा जाती। निःसन्देह प्रभु के लिए यह उतना ही सहज होता कि वह उनकी सारी सेनाओं को एक साथ तितर-बितर कर दे, जितना कि उनके प्रति सब भय और त्रास को दूर कर देना। तौभी वह अपनी प्रजा पर, जो वैसे भी निर्बल थी, सीमा से अधिक बोझ डालना नहीं चाहता था, कहीं ऐसा न हो कि शत्रुओं की अत्यधिक संख्या उन्हें भय से भर दे और निराशा में धकेल दे। इसलिए उसने उन अनेक जातियों को, जिनका हित इसी में था कि वे उतावली से हथियार उठाकर दौड़ पड़ें, तब तक सुस्ती और विस्मय की दशा में रखा, जब तक कि चुनी हुई प्रजा उल्लेखनीय विजयों के द्वारा शेष युद्धों को लड़ने के लिए उत्साहित न हो गई। वे एक विशाल प्रदेश को लूटते और उजाड़ते हैं, और उसे निवासियों से रहित और साधनों से शून्य छोड़ देते हैं। पड़ोस की शक्तियों में से, जिन्हें बाद में आक्रमण करना था, कोई तनिक भी हलचल नहीं करता। इस्राएली सुरक्षित रूप से अपनी पत्नियों और बच्चों के पास लौट आते हैं। जब उन्होंने साहस बटोर लिया और नए युद्ध के लिए तैयार हो गए, तब अचानक विभिन्न जातियों से बनी एक बहुत बड़ी सेना प्रकट होती है, जिन्होंने अब तक शान्त बैठे रहकर विजय का अवसर प्रदान किया था। उनका इस प्रकार बाद के समय में आगे आना ठीक वैसा ही था मानो उन्होंने युद्ध-विराम कर लिया हो। इस प्रकार परमेश्वर ने न केवल अपनी चुनी हुई प्रजा के लिए युद्ध किया, वरन् शत्रुओं को बाँटकर उनकी शक्ति को कई गुना बढ़ा दिया।
यदि इस्राएली धीरे-धीरे युद्ध में भरोसा रखने के अभ्यस्त न किए गए होते, और साथ ही उन्होंने परमेश्वर की प्रत्यक्ष सहायता का अनुभव न किया होता, तो वह आक्रमण कितना भयानक रहा होता! पहले तो उनकी संख्या की तुलना समुद्र की बालू से की गई है, और फिर उनके पास घोड़े और रथ भी हैं। क्योंकि इस्राएलियों के पास घुड़सवार सेना बिलकुल न थी, इसलिए यह आश्चर्य की बात है कि वे इस व्यूह को देखकर भयभीत न हुए। अतः वे धीरे-धीरे आगे बढ़ाए गए, जब तक कि वे इसे सहने के योग्य न हो गए। क्योंकि पिछली लड़ाइयों में उसने उन्हें मानो सुखद पूर्वाभ्यासों के द्वारा ही साधा था। इसमें यह भी जोड़ा जा सकता है कि प्रभु ने अनेक विजयों के द्वारा बार-बार अपनी सामर्थ्य की गवाही दी थी, ताकि वे उसे उचित से अधिक हलका न समझें। यदि उनके सब शत्रु एक ही बार में परास्त कर दिए जाते, तो वे निःसन्देह परमेश्वर की स्तुति बड़ी धूमधाम से करते, परन्तु वे उसे सहज ही भूल भी जाते। इसलिए आवश्यक था कि एक-दूसरे से अलग और भिन्न बार-बार के प्रमाण उनकी आँखों के सामने रखे जाएँ, कहीं ऐसा न हो कि वे किसी एक विजय को भाग्य का संयोग मान बैठें।
लातीनी में, “Judundis praeludiis.” फ्रांसीसी में, “Escarmouches plaisantes;” “सुखद झड़पें।” — सं.
6. “और यहोवा ने यहोशू से कहा” इत्यादि। इतनी बड़ी और इतनी सुसज्जित सेना को नष्ट करने का परिश्रम और कठिनाई जितनी अधिक थी, उतना ही अधिक आवश्यक था कि उनमें नया भरोसा फूँका जाए। इसलिए प्रभु अपने दास यहोशू पर प्रकट होता है, और उसे वही सफलता देने की प्रतिज्ञा करता है जो वह पहले कई अवसरों पर उसे दे चुका था। यह ध्यान से देखने की बात है कि जितनी बार वह अपनी प्रतिज्ञाओं को दोहराता है, उतनी बार मनुष्यों को उनकी भुलक्कड़ी, या उनके आलस्य, या उनकी चंचलता का स्मरण कराया जाता है। क्योंकि यदि विश्वास को समय-समय पर नया पोषण न दिया जाए, तो वह तुरन्त मुरझाकर गिर जाता है। तौभी हमारी विकृत अरुचि ऐसी है कि एक ही बात को दो बार सुनना हमें प्रायः उबाऊ लगता है। इसलिए आइए, हम यह सीखें कि जितनी बार हमें नए संघर्षों में उतरने के लिए बुलाया जाए, उतनी बार हम ईश्वरीय प्रतिज्ञाओं का स्मरण करें, जो हमारी शिथिलता को सुधार सकें या हमें हमारे आलस्य से जगा सकें। और विशेष करके, जो बात यहाँ सामान्य रूप से कही गई है, उसे हम अपने दैनिक आचरण पर लागू करें; जैसे प्रभु अब यह संकेत करता है कि जो कुछ उसने सब जातियों के विषय में घोषित किया था, वह इस वर्तमान अवसर पर विशेष रूप से निश्चित और स्थिर ठहरेगा।
समय के इस विवरण से हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ये राजा यहोशू और प्रजा पर गिलगाल में आक्रमण करने के लिए काफ़ी दूर तक चढ़ आए थे। क्योंकि ईश्वरीय संकेत के तुरन्त बाद यहोशू की तत्परता का उल्लेख किया गया है। उससे अगले ही दिन विजय की प्रतिज्ञा की जाती है। अतः वे अधिक दूर न थे। और मेरोम का ताल, जहाँ उन्होंने अपनी छावनी डाली थी, यरदन से सटा हुआ है, और गन्नेसरत की अपेक्षा, जिस प्रदेश से कुछ शत्रु आए थे, गिलगाल के कहीं अधिक निकट है। कहा जाता है कि यह ताल पहाड़ों पर हिम के जमने या पिघलने के अनुसार घटता या बढ़ता है। इसके अतिरिक्त, यहोशू और प्रजा को जो यह आज्ञा दी गई कि वे घोड़ों की टाँगों या जाँघों की नसें काट डालें और रथों को जला दें, उसका उद्देश्य निःसन्देह यह था कि वे युद्ध की उन अधिक कृत्रिम रीतियों को न अपनाएँ जो अधर्मी जातियों में प्रचलित थीं। निश्चय ही यह आवश्यक था कि वे सैनिकों के रूप में सेवा करें और शत्रु से वीरता के साथ लड़ें; तौभी उन्हें केवल प्रभु पर ही निर्भर रहना था, केवल उसी की सामर्थ्य में अपने को बलवन्त समझना था, और केवल उसी पर टेक लगाना था।
यदि उनके पास घुड़सवार सेना और रथों का व्यूह होता, तो ऐसा होना कठिन ही होता। क्योंकि हम जानते हैं कि ऐसी आडम्बरपूर्ण साज-सज्जा आँखों को कैसे चौंधिया देती है, और मन को अहंकारपूर्ण भरोसे से कैसे मतवाला कर देती है। इसके अतिरिक्त एक व्यवस्था ठहराई गई थी (व्यवस्थाविवरण 17:16) कि उनके राजा अपने लिए घोड़े और रथ न जुटाएँ; स्पष्ट है कि इसलिए, क्योंकि जिस बात का श्रेय परमेश्वर ने अपने लिए रखा था, उसे वे अपने सैन्य-अनुशासन को देने के लिए अत्यन्त प्रवृत्त हो जाते। इसी से यह प्रचलित कहावत है (भजन संहिता 20:7), “किसी को रथों का, और किसी को घोड़ों का भरोसा है, परन्तु हम तो अपने परमेश्वर यहोवा ही का नाम लेंगे।”
फ्रांसीसी में, “Elle secoule et evanouist;” “वह” (विश्वास) “पिघलकर लुप्त हो जाता है।” — सं.
लातीनी में, “Oraculo enim subnectitur expeditio Josue.” फ्रांसीसी में, “Car l'expedition de Josue est conjointe avec l'avertissement que Dieu luy donne;” “क्योंकि यहोशू की चढ़ाई उस संकेत के साथ जुड़ी हुई है जो परमेश्वर उसे देता है।” — सं.
परमेश्वर उनसे दुस्साहस के सब उकसावे छीन लेना चाहता था, ताकि वे अपनी सीमाओं में सन्तुष्ट रहकर शान्ति से जीवन बिताएँ, और अपने पड़ोसियों पर अन्यायपूर्वक आक्रमण न करें। और अनुभव ने दिखा दिया कि जब किसी बुरी महत्त्वाकांक्षा ने उनके राजाओं को घोड़े मोल लेने के लिए उकसाया, तब वे जितनी उतावली से युद्धों में उलझे, उतने ही असफल भी रहे। इसलिए आवश्यक था कि घोड़ों की नसें काटकर उन्हें युद्ध के लिए निकम्मा कर दिया जाए, और रथों को नष्ट कर दिया जाए, ताकि इस्राएली अन्यजातियों की रीतियों के अभ्यस्त न हो जाएँ।
8. “और यहोवा ने उनको कर दिया” इत्यादि। उस पराजय की विशालता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि संहार सीदोन तक चलता रहा, जो मेरोम के ताल से बहुत दूर था। सीदोन को उसकी व्यापारिक मण्डी के रूप में ख्याति और उसके निवासियों की बड़ी संख्या के कारण “बड़ा” कहा गया है। यहाँ उसकी तुलना उसी नाम के किसी छोटे नगर से नहीं की गई है। इब्रानी संज्ञा मिस्रपोत, जिसे कुछ लोग बिना बदले व्यक्तिवाचक नाम के रूप में रखते हैं, उसका अनुवाद हमने “जल का उबलना” करना अधिक उचित समझा है, क्योंकि सम्भव है कि वहाँ गरम सोते थे जो उबलते थे। इसके अतिरिक्त, जिस घबराहट ने उन्हें ऐसी तितर-बितर भगदड़ में भगा दिया, वह स्पष्ट दिखाती है कि प्रभु के गुप्त आतंक ने उन्हें सिर के बल खदेड़ दिया था; वैसे ही यह भी निश्चित है कि जिन इस्राएलियों ने इतने संकटों के बीच से भागनेवालों का पीछा करने का साहस किया, वे स्वर्गीय सामर्थ्य के द्वारा मानवीय शौर्य से कहीं ऊँचे स्तर तक पहुँचा दिए गए थे।
लातीनी में, “Et lacus Merom, ubi castra locaverant, qui Jordani contiguns est, longe propius accedit ad Gilgal quam Gennesara ex cujus tractu pars hostium profecta erat.” फ्रांसीसी में, “Et le lac de Merom ou ils s'estoyent campez, qui est contigu au Jourdain, approche beaucoup plus pres de Gilgal que ne fait Genesara, du rivage duquel ume partie des ennemis s'estoit levee;” “और मेरोम का ताल, जहाँ उन्होंने डेरे डाले थे, जो यरदन से सटा हुआ है, गन्नेसरत की अपेक्षा गिलगाल के कहीं अधिक निकट पहुँचता है, जिसके तटों से शत्रुओं का एक भाग उठ खड़ा हुआ था।” यहाँ दिए गए भौगोलिक विवरण, और विशेष करके मेरोम के ताल से सम्बन्धित विवरण, अधूरे भी हैं और अशुद्ध भी। टीका से जो धारणा बनती है वह यह है कि इस भयानक सन्धि के राजाओं ने अपनी सेनाएँ एक कर लेने के बाद दक्खिन की ओर कूच करना आरम्भ किया, और गिलगाल से थोड़ी ही दूरी पर आ पहुँचे, जहाँ सम्भवतः उन्हें आशा थी कि वे अचानक यहोशू पर टूट पड़ेंगे और उसे बेखबर पकड़ लेंगे। इस बीच उन्होंने मेरोम के ताल के पास छावनी डाली, और यहोशू ने ईश्वरीय संकेत पाकर अपनी सेना के साथ फुर्ती से कूच किया, और उन्हें वैसे ही बेखबर जा पकड़ा जैसे वे उसे पकड़ने की आशा करते थे। इस मत के अनुसार मेरोम का ताल गिलगाल के तुलनात्मक रूप से निकट था, और इसी कारण इस टिप्पणी के आरम्भ में दिए गए लातीनी और फ्रांसीसी उद्धरण में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है। फ्रांसीसी साफ़ कहता है कि गिलगाल की दूरी मेरोम के ताल से गन्नेसरत के ताल की अपेक्षा कम थी। और लातीनी, यद्यपि वह अस्पष्टता से मुक्त नहीं है, या तो यही बात कहता है या इससे भी अधिक अशुद्ध बात, अर्थात् यह कि मेरोम का ताल गन्नेसरत के ताल की अपेक्षा गिलगाल के अधिक निकट था। इसके विपरीत, अब यह भली-भाँति ज्ञात है कि मेरोम का ताल, जो आज का अल-हूले है, गन्नेसरत के ताल से दस मील उत्तर में स्थित है, और फलस्वरूप गिलगाल से ठीक उतने ही मील अधिक दूर है जितना गन्नेसरत का ताल; गिलगाल से इन तालों की दूरियाँ क्रमशः मेरोम के लिए लगभग पचहत्तर, और गन्नेसरत के लिए पैंसठ मील हैं। जब तथ्य यह है, तो स्पष्ट है कि जब यहोशू को अगले दिन विजय की प्रतिज्ञा करनेवाले ईश्वरीय सन्देश से सम्मानित किया गया, तब वह गिलगाल में नहीं हो सकता था। वास्तविक स्थिति यह प्रतीत होती है कि जब यहोशू देश के मध्य और दक्खिनी भागों को जीत चुका, तब अनेक राजाओं या सरदारों ने, जिनके प्रदेश प्रतिज्ञा के देश के सारे उत्तरी भाग पर फैले हुए थे, एक साझा सन्धि की, और मेरोम के ताल को अपने इकट्ठा होने का स्थान ठहराया। यहोशू ने, जो इस सन्धि से भली-भाँति अवगत था और उसके भयानक स्वरूप को समझता था, शत्रु को अपनी योजनाएँ पक्की करने का समय देने की प्रतीक्षा नहीं की, और न ही तब तक निष्क्रिय पड़ा रहा जब तक वे वास्तव में उसकी छावनी से एक दिन की यात्रा की दूरी पर न आ जाएँ; वरन् वह आक्रमण करने का दृढ़ निश्चय करके निकल पड़ा, और इसी उद्देश्य से उत्तर की ओर दूर तक, शत्रु के देश के ठीक भीतर तक बढ़ गया था, जब शीघ्र और उल्लेखनीय सफलता के आश्वासन के द्वारा वे सारे भय पूरी रीति से दूर कर दिए गए जो उनके भयानक व्यूह ने स्वयं उसमें या उसकी सेना में उत्पन्न किए हों। — सं.
यहोशू की प्रशंसा उसके संयम के लिए भी उतनी ही की गई है जितनी उसकी तत्पर आज्ञाकारिता के लिए। यदि परमेश्वर का भय उस पर छाया न होता, तो वह इतने अधिक घोड़ों और रथों की हानि इतनी सहर्षता से न सहता। क्योंकि बहाने गढ़ने में हमारी चतुराई ऐसी है कि यह तर्क देना विश्वसनीय लगता कि यद्यपि वह उन्हें युद्ध के काम में नहीं ला सकता था, तौभी उनका मूल्य किसी भी प्रकार तुच्छ समझने योग्य न था। परन्तु उसने यह समझा कि परमेश्वर की इच्छा को छोड़ किसी और बात का विचार करने का उसे कोई अधिकार नहीं है। फिर, क्योंकि वह अपने अच्छे आचरण के द्वारा प्रजा को इच्छुक और आज्ञाकारी बनाने में सफल हुआ था, इसलिए जो काम सब ने मिलकर किया था, उसकी प्रशंसा उसने एक व्यक्ति के रूप में उचित ही पाई।
12. “और उन राजाओं के सब नगरों को” इत्यादि। सेना को परास्त कर देने के बाद वे देश को लूटने और उजाड़ने, और नगरों को लेने और ढाने लगे। यह जो कहा गया है कि जो नगर ज्यों-के-त्यों बने रहे वे जलाए नहीं गए, इससे कुछ सम्भावना के साथ यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कुछ नगर बलपूर्वक धावा करके लिए गए, और इस प्रकार ढा दिए गए। केवल हासोर, घेराबन्दी समाप्त हो जाने और संघर्ष की गर्मी ठण्डी पड़ जाने के बाद, आग से नष्ट किया गया, क्योंकि उसी ने वह मशाल उठाई थी जिसने युद्ध की आग भड़काई थी। परन्तु पहले दी गई व्याख्या के अनुसार इस स्थल में बार-बार और अधिक स्पष्टता से यह कहा गया है कि जब यहोशू ने छोटे से बड़े तक सब को घात किया, तब उसने अपने आवेश की लगाम ढीली नहीं छोड़ी। क्योंकि अब उस बात का स्पष्ट कथन है जो अब तक व्यक्त नहीं की गई थी, अर्थात् यह कि यहोशू ने जो कुछ प्रभु ने मूसा के द्वारा आज्ञा दी थी, वह सब पूरा करके अपना भाग विश्वासयोग्यता से निभाया। यह ठीक ऐसा है मानो जब उसने उसकी आज्ञा के अनुसार उन जातियों को नष्ट किया, तब उसने अपने हाथ परमेश्वर के अधिकार में सौंप दिए हों। और इसलिए हमें यह दृढ़ता से मानना चाहिए कि चाहे सारा संसार हमें दोषी ठहराए, तौभी हमें सब दोष से मुक्त करने के लिए इतना ही पर्याप्त है कि हमारे पास परमेश्वर का अधिकार है। इस बीच हमें बुद्धिमानी से यह विचार करना उचित है कि प्रत्येक मनुष्य की बुलाहट क्या माँगती है, कहीं ऐसा न हो कि कोई अपने उत्साह को खुली छूट देकर, यहोशू का अनुकरण करना चाहते हुए, परमेश्वर का कड़ा सेवक ठहरने के बदले क्रूर और रक्तपिपासु ठहराया जाए।
लातीनी में, “Deum habere authorem.” फ्रांसीसी में, “Que nous ayons Dieu pour garant et autheur de ce que nous faisons;” “कि जो कुछ हम करते हैं उसके लिए परमेश्वर हमारा प्रतिभू और रचयिता हो।” — सं.
यहोशू 11:16-23
16. तब यहोशू ने उस सारे देश को, अर्थात् पहाड़ी देश, और सारे दक्खिनी देश, और सारे गोशेन देश, और नीचे के देश, और अराबा, और इस्राएल के पहाड़ी देश, और उसी के नीचे के देश को,
16. Et cepit Josue omnem terram istam montanam, et omnem australem, omnemque Gosen et planitiem atque campestria, montem quoque Israel et planitiem ejus.
17. हालाक नाम पहाड़ से लेकर, जो सेईर की ओर चढ़ता है, बालगाद तक, जो लबानोन के मैदान में हेर्मोन पर्वत के नीचे है, ले लिया; और उनके सब राजाओं को पकड़कर मारा और घात किया।
17. A monte Laevi qui assurgit versus Seir usque ad Baalgad in campo Libani sub monte Hermon: omnes quoque reges eorum cepit, et percussit eos et interfecit.
18. उन सब राजाओं से युद्ध करते-करते यहोशू को बहुत दिन लग गए।
18. Diebus multis gessit Josue cum omnibus regibus istis bellum.
19. गिबोन के निवासी हिव्वियों को छोड़ किसी नगर ने इस्राएलियों से मेल न किया; और सब नगरों को उन्होंने लड़कर ले लिया।
19. Non fuit urbs quae pacem fecerit cum filiis Israel praeter Hivaeos habitatores Gibeon: omnes coeperunt praelio.
20. क्योंकि यहोवा की ओर से यह हुआ कि उनके मन कठोर हो जाएँ, और वे इस्राएलियों का साम्हना करके उनसे युद्ध करें, जिससे वह उनका सत्यानाश कर डाले, और उन पर कुछ भी दया न हो,
20. Quia a Jehova fuit, ut induraretcor eorum in occursum belli cum Israel: ut deleret eos, nec restaret illis misericordia: sed ut disperderet eos, sicut praeceperat Jehova Mosi. वरन् वह उन्हें नष्ट कर डाले, जैसी यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी।
21. उस समय यहोशू ने आकर पहाड़ी देश में से, अर्थात् हेब्रोन, दबीर, और अनाब से, वरन् यहूदा के सारे पहाड़ी देश से और इस्राएल के सारे पहाड़ी देश से अनाकियों को नाश किया; यहोशू ने उनके नगरों समेत उनका सत्यानाश कर डाला।
21. Venit autem Josue tempore illo, et excidit Anakim e montanis: ex Hebron, ex Debir, ex Anab, et ex omni monte Jehuda, et ex omni monte Israel: una cum urbibus eorum delevit eos Josue.
22. इस्राएलियों के देश में कोई अनाकी न रह गया; केवल अज्जा, गत, और अशदोद में कुछ बच रहे।
22. Non remansit ex Anakim in terra filiorum Israel: tantum in Gad et in Asdod residui fuerunt.
23. सो जैसा यहोवा ने मूसा से कहा था, वैसा ही यहोशू ने वह सारा देश ले लिया; और यहोशू ने उसे इस्राएल के गोत्रों के विभागों के अनुसार उनका निज भाग करके दे दिया। और देश को लड़ाई से विश्राम मिला।
23. Accepit itaque Josue totam terram prorsus ut dixerat Jehova Mosi, et tradidit eam in haereditatem Israeli secundum divisiones eorum per tribus suas: et terra quievit a bello.
16. “तब यहोशू ने उस सारे देश को ले लिया” इत्यादि। विजयों की इस अटूट श्रृंखला में, जब देश ने आप ही अपने पुराने निवासियों को उगल दिया ताकि इस्राएलियों को स्वतन्त्र अधिकार मिल जाए, तब यह प्रत्यक्ष रूप से प्रकट हो गया, जैसा भजन में कहा गया है (भजन संहिता 44:3), “वे न तो अपनी तलवार के बल से इस देश के अधिकारी हुए, और न अपने बाहुबल से; परन्तु तेरे दाहिने हाथ और तेरी भुजा और तेरे प्रसन्न मुख के कारण जयवन्त हुए; क्योंकि तू उनको चाहता था।”
स्थानों और प्रदेशों को गिनाने का उद्देश्य हमें यह बताना है कि जो काम परमेश्वर ने आरम्भ किया था, उसे वह बिना रुकावट आगे बढ़ाता रहा। परन्तु यह समझना भूल है, जैसा कि कुछ लोग समझते हैं, कि इस्राएल नाम से किसी विशेष पहाड़ का अर्थ है। क्योंकि अध्याय के अन्त से (यहोशू 11:21) यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह शब्द बिना भेद के इस्राएल और यहूदा के पहाड़ी भाग पर लागू किया गया है। इसलिए इस गिनती में एक विस्तार है, क्योंकि दस गोत्रों के पहाड़ों की तुलना चुपचाप यहूदा के पहाड़ों से की गई है। अतः यहाँ एक विरोधी तुलना निहित समझना चाहिए। दूसरे पहाड़ के विषय में (यहोशू 11:17) उसका उपनाम अस्पष्ट है। कुछ लोग इसका अर्थ “विभाजन” समझते हैं, मानो वह दो भागों में कटा हुआ हो; दूसरे इसका अर्थ “चिकना” लेते हैं, क्योंकि वह वृक्षों से रहित था, जैसे गंजेपन से सिर चिकना हो जाता है। क्योंकि यह बात अनिश्चित है और कम महत्त्व की है, इसलिए पाठक अपनी इच्छा से चुनने के लिए स्वतन्त्र है।
18. “उन सब राजाओं से युद्ध करते-करते यहोशू को बहुत दिन लग गए” इत्यादि। पहले उसने थोड़े ही समय में, और मानो दौड़ की फुर्ती से, पाँच राज्यों पर अधिकार कर लिया था; दूसरों के विषय में बात भिन्न थी — हिचकिचाहट, या थकान, या आलस्य के कारण नहीं, परन्तु इस कारण कि प्रभु ने अपनी प्रजा को विविध रीतियों से साधा, ताकि वह अपने बहुविध अनुग्रह का और भी उज्ज्वल प्रदर्शन करे, जो हमारी दृष्टि में प्रायः अपना मूल्य खो देता है यदि वह केवल एक ही और समान रीति से प्रकट किया जाए। इसलिए जैसे पहले ईश्वरीय सामर्थ्य अविश्वसनीय सहजता से काम पूरा करने के द्वारा विशेष रूप से प्रकट हुई थी, जब शत्रु पल भर में परास्त कर दिए गए, वैसे ही अब एक लम्बे खिंचे हुए युद्ध ने स्वर्गीय सहायता के अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए। और यह अचानक और अनपेक्षित रूप से नहीं हुआ; क्योंकि परमेश्वर ने मूसा के द्वारा पहले ही बता दिया था कि ऐसा ही होगा, कहीं ऐसा न हो कि यदि देश एकाएक उजाड़ बना दिया जाए, तो वनपशु प्रबल हो जाएँ (व्यवस्थाविवरण 7:22)। संक्षेप में, हम यहाँ मानो दर्पण में देखते हैं कि जो कुछ प्रभु ने मूसा के द्वारा प्रतिज्ञा की थी, वह वास्तविकता में, और किसी सन्दिग्ध घटना के द्वारा नहीं, पूरा हुआ। परन्तु जब हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की निश्चितता को पहचानते हैं, तब हमें उस अनुग्रह पर भी मनन करना चाहिए जो उसकी चुनी हुई प्रजा के प्रति स्थिर किया गया, इस बात में कि उसने एक दूरदर्शी गृहस्वामी के समान काम किया, और जो कुछ उनके लाभ के लिए था, उसमें से किसी बात की उपेक्षा या चूक नहीं की।
19. “किसी नगर ने मेल न किया” इत्यादि। यह वाक्य पहली दृष्टि में उस बात के विरुद्ध प्रतीत होता है जो मूसा की पुस्तकों में सर्वत्र कही गई है, कि इस्राएलियों को उन जातियों के साथ कोई वाचा नहीं बाँधनी थी, न उनके साथ मेल की कोई शर्तें ठहरानी थीं, वरन् इसके विपरीत उनका पूरी रीति से सत्यानाश करना, और उनकी जाति और नाम को मिटा डालना था (निर्गमन 23:32; व्यवस्थाविवरण 7:2)। जब वे जातियाँ इस प्रकार कोई भी समझौता करने के साधन से वंचित कर दी गई थीं, और मेल के कोई भी प्रस्ताव वे व्यर्थ ही करतीं, तो उस विनाश का कारण, जिससे बचने की विनती करने का भी उनके पास कोई साधन न था, उनकी हठ को ठहराना असंगत प्रतीत होता है।
लातीनी में, “Dissectus.” फ्रांसीसी में, “Couppee ou fendue;” “कटा हुआ, या फटा हुआ।” — सं. योसेफ़स के अनुसार (Antiquit., 5:2) यहोशू ने अपने युद्धों में जो समय बिताया वह पाँच वर्ष था; दूसरे इसे सात वर्ष ठहराते हैं, और अपने अनुमान को निम्नलिखित गणना से सिद्ध करते हैं: — यहोशू 14:7-10 में कालेब कहता है कि जब वह कादेशबर्ने से देश का भेद लेने को भेजा गया था, तब वह चालीस वर्ष का था, और तब से लेकर अब तक (प्रत्यक्षतः उस समय तक जब युद्ध अभी-अभी समाप्त हुए थे) पैंतालीस वर्ष बीत चुके थे। इन पैंतालीस वर्षों में से अड़तीस वर्ष जंगल में बीते, और फलस्वरूप शेष सात वर्ष ही वह पूरी अवधि है जो यरदन पार करने से लेकर कालेब के यह कथन करने के समय तक बीती थी। — सं.
सेप्टुआजिंट ने, मानो यहाँ बताए गए विचारों के समान विचारों से प्रभावित होकर, 19वें पद (यहोशू 11:19) का अनुवाद इस प्रकार करके इस प्रत्यक्ष असंगति से बचने का प्रयत्न किया है, “और ऐसा कोई नगर न था जिसे इस्राएल ने न ले लिया हो: उन्होंने युद्ध करके सब को ले लिया।” तौभी एक पाठान्तर भी है, जो लगभग शब्दशः साधारण अनुवाद से मेल खाता है। — सं.
क्योंकि मान लीजिए कि उन्होंने अपने आगे हाथों में जैतून की डालियाँ लिए हुए दूत भेजे होते, और वे शान्ति के उपायों में लगे होते, तो यहोशू तुरन्त उत्तर देता कि वह विधिपूर्वक कोई भी बातचीत नहीं कर सकता, क्योंकि प्रभु ने इसका निषेध किया है। इसलिए यदि वे युद्ध से बचने के सौ प्रयत्न भी करते, तौभी उन्हें नष्ट होना ही पड़ता। तो फिर उन्हें इस बात के लिए दोष क्यों दिया जाता है कि उन्होंने मेल की खोज नहीं की, मानो जब उन्होंने देख लिया कि उनका सामना एक ऐसी प्रजा से है जो किसी प्रकार शान्त नहीं की जा सकती, तब उन्हें लड़ने के लिए विवशता ने न धकेला हो? परन्तु यदि उनके लिए कुछ और करना सम्भव ही न था, तो जब वे विवश होकर अपने शत्रु के प्रकोप का सामना कर रहे थे, तब उन पर कोई दोष लगाना अन्याय है।
इस आपत्ति का मैं यह उत्तर देता हूँ कि यद्यपि इस्राएलियों को उन पर कोई दया दिखाने का निषेध था, तौभी उनका सामना शत्रुतापूर्ण रीति से किया गया, ताकि युद्ध न्यायसंगत हो। और परमेश्वर के गुप्त विधान के द्वारा यह अद्भुत रीति से ठहराया गया कि वे, जो विनाश के लिए ठहराए जा चुके थे, स्वेच्छा से उसके लिए अपने को अर्पित करें, और इस्राएलियों को उकसाकर स्वयं अपने विनाश का कारण बनें। इसलिए प्रभु ने न केवल यह आज्ञा दी कि उन्हें क्षमा न दी जाए, वरन् उन्हें अन्धे क्रोध के लिए भी उभारा, ताकि दया के लिए कोई स्थान न रह जाए। और प्रजा के लिए उचित था कि वह इस विषय में अत्यधिक बुद्धिमान या खोजी न बने। क्योंकि जब प्रभु ने एक ओर उन्हें कोई भी वाचा बाँधने से रोका, और दूसरी ओर यह भी नहीं चाहा कि वे बिना उकसाए शत्रुता के उपाय करें, तब इस कार्य-पद्धति पर अत्यधिक चिन्तित वाद-विवाद उनके मन को बहुत अस्थिर कर सकता था। इसलिए उलझन से अपने को छुड़ाने का एकमात्र उपाय यही था कि वे अपनी चिन्ता परमेश्वर की गोद में डाल दें। और उसने अपनी अगम्य बुद्धि से यह प्रबन्ध किया कि जब कार्य करने का समय आए, तब उसकी प्रजा अपने मार्ग में किसी बाधा से रुक न जाए। इस प्रकार यरदन पार के राजाओं ने, क्योंकि उन्होंने ही पहले हथियार उठाए थे, अपने दुस्साहस का दण्ड न्याय से भोगा। क्योंकि इस्राएलियों ने उन पर तब तक शत्रुता के हथियारों से आक्रमण नहीं किया जब तक उन्हें उकसाया न गया। इसी प्रकार यरीहो के नागरिकों ने भी अपने फाटक बन्द करके सबसे पहले युद्ध की घोषणा की। दूसरों के विषय में भी यही बात है, जिन्होंने अपनी हठ के द्वारा इस्राएलियों को युद्ध चलाने का आधार दे दिया।
अब यह प्रकट हो जाता है कि ये दोनों बातें आपस में कितनी पूर्णता से मेल खाती हैं। प्रभु ने मूसा को आज्ञा दी कि वह उन जातियों को नष्ट करे जिन्हें उसने विनाश के लिए ठहरा दिया था; और इसी के अनुसार जब उसने त्यागे हुओं के मन कठोर किए, तब उसने अपनी आज्ञप्ति के लिए मार्ग खोल दिया। तो सबसे पहले परमेश्वर की इच्छा आती है, जिसे मुख्य कारण मानना चाहिए। क्योंकि जब उनका अधर्म अपनी चरम सीमा तक पहुँच गया था, तब उसने उन्हें नष्ट करने का निश्चय किया। यही मूसा को दी गई आज्ञा का मूल था — ऐसी आज्ञा जो तौभी निष्फल रह जाती, यदि चुनी हुई प्रजा को उन लोगों की कुटिलता और हठ के द्वारा, जिन्हें नष्ट किया जाना था, ईश्वरीय न्याय को पूरा करने के लिए शस्त्र-सज्जित न किया गया होता। परमेश्वर उन्हें इसी उद्देश्य से कठोर करता है कि वे अपने आप को दया से बाहर कर लें। इसी कारण वह कठोरता उसका कार्य कहलाती है, क्योंकि उसके द्वारा उसकी योजना की पूर्ति निश्चित होती है। यदि वे लोग, जो यह कल्पना करते हैं कि परमेश्वर केवल स्वर्ग से नीचे झाँककर देखता है कि मनुष्य क्या करना पसन्द करेंगे, और जो यह सोचना भी सहन नहीं कर सकते कि मनुष्यों के मन उसके गुप्त कार्य के द्वारा रोके जाते हैं, ऐसे स्पष्ट विषय को धुँधला करने का कोई प्रयत्न करें, तो वे अपनी ढिठाई के सिवा और क्या दिखाते हैं? वे परमेश्वर को केवल अनुमति देने की शक्ति ही देते हैं, और इस रीति से उसकी युक्ति को मनुष्यों की इच्छा पर निर्भर बना देते हैं। परन्तु आत्मा क्या कहता है? यह कि वह कठोरता परमेश्वर की ओर से है, जो इस प्रकार उन्हें सिर के बल गिरा देता है जिन्हें वह नष्ट करना चाहता है।
21. “उस समय यहोशू ने आकर” इत्यादि। अनाक के पुत्रों के विषय में हम अन्यत्र बात कर चुके हैं। वे दानवों की एक जाति थे, जिनके विशाल डील-डौल के वर्णन से भेदियों ने प्रजा को इतना भयभीत कर दिया था कि उन्होंने कनान देश में आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। इसलिए, क्योंकि वे इतने भय के पात्र थे, यह महत्त्वपूर्ण था कि वे मार्ग से हटा दिए जाएँ, और प्रजा सफलता की अच्छी आशा के द्वारा अधिक स्फूर्तिमान बनाई जाए। उन वस्तुओं को, जो उन्हें भय और चिन्ता से भर देती थीं, सदा उनके मन के सामने रखे रहना अत्यन्त हानिकारक होता, क्योंकि भय उस महिमा को धुँधला कर देता था जो पिछली विजयों के लिए परमेश्वर को दी गई थी, और उनके विश्वास को उलट देता था, जब वे यह सोचते थे कि उनके सब संघर्षों में सबसे कठिन संघर्ष अभी उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। इसलिए यह अकारण नहीं है कि ईश्वरीय सहायता के दूसरे उदाहरणों के साथ इसका भी उल्लेख किया गया है कि ऐसे राक्षसों से देश को शुद्ध करके वह प्रजा के लिए एक उपयुक्त निवास-स्थान बना दिया गया। जितना यह कम विश्वसनीय प्रतीत होता था कि उनसे सफलता के साथ युद्ध किया जा सकेगा, उतनी ही अधिक प्रखरता से ईश्वरीय सामर्थ्य प्रकट हुई।
23. “सो यहोशू ने वह सारा देश ले लिया” इत्यादि। यद्यपि यह बात सच होने से बहुत दूर थी कि यहोशू ने वास्तव में सारा देश प्राप्त कर लिया था, तौभी यह ठीक ही कहा गया है कि उसने उसे वैसे ही प्राप्त किया जैसा परमेश्वर ने मूसा से कहा था; पिछला उपवाक्य उस सामान्य वाक्य के अर्थ को सीमित कर देता है। क्योंकि स्पष्ट रूप से यह जोड़ा गया था कि जिस विजय की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की थी, वह धीरे-धीरे की जाएगी, कहीं ऐसा न हो कि यदि वे किसी उजाड़ वीराने में आगे बढ़ते चले जाएँ, तो बाद में उन्हें वनों के हिंसक पशुओं से युद्ध करना पड़े। इसलिए हम यह कहने के लिए स्वतन्त्र हैं कि यद्यपि प्रभु ने अभी अपनी प्रजा को प्रतिज्ञा के देश का अधिकारी नहीं बनाया था, तौभी जो कुछ करने का उसने वचन दिया था, उसे उसने वास्तव में पूरा कर दिया था, क्योंकि उसने एक सुविधाजनक निवास-स्थान दे दिया था, और ऐसा जो उस समय के लिए पर्याप्त था। और प्रयुक्त शब्दों से यह संकेत मिलता है कि वह दूसरा प्रदेश भी, जो अभी उनके पूर्ण और वास्तविक अधिकार में नहीं आया था, इसमें सम्मिलित है; क्योंकि यह कहा गया है कि जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया था, वह कुलों के अनुसार बाँटा गया। और संक्षेप में, हम आगे चलकर बँटवारे में देखते हैं कि ऐसे प्रदेश चिट्ठियों के द्वारा भागों में बाँटे गए जिन्हें प्रजा ने यहोशू की मृत्यु के बाद तक, वरन् कई युगों के बाद तक, वास्तव में अपने अधीन नहीं किया। इन शब्दों का अर्थ, जो अब स्पष्ट है, केवल यह है कि यहोशू के जीवित रहते ही प्रतिज्ञा का एक निश्चित नमूना दिखा दिया गया, जिससे वह देश को चिट्ठी डालकर बाँटने में पूरी रीति से निश्चिन्त हो सका।
फ्रांसीसी में, “Dieu les endurcit, afin qu'ils se monstrent indigne de toute pitie et compassion qu'on eust peu avoir d'eux;” “परमेश्वर उन्हें इसलिए कठोर करता है कि वे अपने को उस सारी करुणा और सहानुभूति के अयोग्य दिखाएँ जो उनके प्रति अनुभव की जा सकती थी।” — सं. लातीनी में, “Perquam noxium.” फ्रांसीसी में, “Fort dangereuse;” “अत्यन्त भयानक।” — सं.
23वें पद (यहोशू 11:23) का लातीनी पाठ, जो इस प्रकार आरम्भ होता है, “Accepit itaque Josue totam terram prorsus ut dixerat Jehova Mosi;” “सो यहोशू ने सारा देश पूर्ण रूप से प्राप्त किया, जैसा प्रभु ने मूसा से कहा था,” इस प्रत्यक्ष अशुद्धता को दूर तो करता है, परन्तु केवल शाब्दिक अर्थ का बलिदान करके, जिसे अंग्रेज़ी अनुवाद पूर्ण रूप से व्यक्त करता है: “सो (और) यहोशू ने वह सारा देश ले लिया, उस सब के अनुसार जो प्रभु ने मूसा से कहा था।” यह निश्चय ही लातीनी से श्रेष्ठ है, जो एक व्याख्यात्मक टिप्पणी के द्वारा वह प्राप्त करने का प्रयत्न करता है जो अंग्रेज़ी अनुवाद उतनी ही अच्छी रीति से शाब्दिक अनुवाद के द्वारा प्राप्त कर लेता है। टीका में 23वें पद (यहोशू 11:23) के शब्द, जैसे उद्धृत किए गए हैं, Et cepit Josue हैं। इससे यह असम्भव नहीं लगता कि पाठ का Accepit केवल Et cepit की छपाई की भूल है। — सं.
फ्रांसीसी में, “Or en la division nous verrons puis apres, que les regions qui furent assujetties a l'empire de peuple apres la mort de Josue, voire plusieurs siecles depuis, furent mises en sort pour voir a qui elles escherroyent;” “अब बँटवारे में हम आगे चलकर देखेंगे कि जो प्रदेश यहोशू की मृत्यु के बाद, वरन् कई शताब्दियों के बाद, प्रजा के प्रभुत्व के अधीन किए गए, वे इस बात को देखने के लिए चिट्ठी में डाले गए कि वे किसके भाग में पड़ें।”
लातीनी में, “Exhibitum fuisse certum specimen promissionis ut secure licuerit terram sorte dividere.” फ्रांसीसी में, “La promesse fut tellement ratifice, et si bien eprouvee par effect, qu'il leur fut loisible de diviser la terre par sort;” “प्रतिज्ञा इस सीमा तक पुष्ट और तथ्य के द्वारा प्रमाणित हुई कि वे अवकाश के साथ देश को चिट्ठी डालकर बाँट सके।” — सं.
