यहोशू की पुस्तक पर टीका · अध्याय 9

यहोशू 9

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यहोशू 9

यहोशू 9:1-15

1. यह सुनकर हित्ती, एमोरी, कनानी, परिज्जी, हिव्वी और यबूसी, जितने राजा यरदन के इस पार पहाड़ी देश में, और नीचे के देश में, और लबानोन के साम्हने के महासमुद्र के सारे तीर पर रहते थे,

1. Quum autem audissent omnes reges qui erant trans Jordanem in monte, et in planitie, et in toto tractu marls magni e regione Libani, Hitthaeus, Amorrhaeus, Chananaeus, Pherisaeus, Hivaeus, et Jebusaeus,

2. वे एक मन होकर यहोशू और इस्राएलियों से लड़ने को इकट्ठे हुए।

2. Congregaverunt se pariter ad pugnandum cum Josue et Israel uno consensu.

3. जब गिबोन के निवासियों ने सुना कि यहोशू ने यरीहो और ऐ से क्या-क्या किया है,

3. Habitatores vero Gibeon audientes quod fecerat Josue urbi Jericho et Hai,

4. तब उन्होंने छल किया, और राजदूतों का भेष बनाकर अपने गदहों पर पुराने बोरे, और पुराने, फटे और जोड़े हुए मदिरा के कुप्पे लादकर,

4. Egerunt etiam ipsi callide. Nam abierunt et finxerunt se legatos esse, et tulerunt saccos vetustos, in suis asinis, et utres vini vestustos, et ruptos ac colligatos,

5. अपने पाँवों में पुरानी गाँठी हुई जूतियाँ, और तन पर पुराने वस्त्र पहिने; और उनके मार्ग के भोजन की सारी रोटी सूखी और फफूँदी लगी हुई थी।

5. Et calceamenta vetusta, et resarta in pedibus suis, et vestes re. tustas super se, et torus panis viatici eorum aridus ac mucidus.

6. तब वे गिलगाल की छावनी में यहोशू के पास जाकर उससे और इस्राएली पुरुषों से कहने लगे, हम दूर देश से आए हैं; इसलिये अब तुम हम से वाचा बाँधो।

6. Perrexerunt ergo ad Josuam in castra in Gilgal, dixeruntque ei et viris Israel, E terra longinqua venimus, itaque nunc percutite nobiscum foedus.

7. इस्राएली पुरुषों ने उन हिव्वियों से कहा, क्या जाने तुम हमारे बीच में ही रहते हो; फिर हम तुम से वाचा कैसे बाँधें?

7. Tune responderunt viri Israel ad Hivaeum, Forte in medio mei tu habitas, et quomodo percutiam tocum foedus?

8. उन्होंने यहोशू से कहा, हम तेरे दास हैं। तब यहोशू ने उनसे कहा, तुम कौन हो? और कहाँ से आए हो? 8. At illi dixerunt ad Josuam, Servi tui sumus. Quibus ait Josua, Quinam estis, et unde venistis?

9. उन्होंने उससे कहा, तेरे दास बहुत दूर के देश से तेरे परमेश्वर यहोवा का नाम सुनकर आए हैं; क्योंकि हम ने उसकी कीर्ति, और जो कुछ उसने मिस्र में किया, वह सब सुना है,

9. Responderunt ei, E terra longinqua valde venerunt servi tui in nomine Jehovae Dei tui. Audivimus enim famam ejus, et quaecunque fecit in AEgypto,

10. और जो कुछ उसने एमोरियों के उन दोनों राजाओं से किया जो यरदन के उस पार रहते थे, अर्थात् हेशबोन के राजा सीहोन से, और बाशान के राजा ओग से जो अशतारोत में था।

10. Quaecunque item fecit duobus regibus Amorrhaei, qui erant trans Jordanem, Sihon regi Hesebon, et Og regi Basan in Astaroth.

11. इसलिये हमारे यहाँ के पुरनियों ने और हमारे देश के सब निवासियों ने हम से कहा, कि मार्ग के लिये अपने साथ भोजनवस्तु लेकर उनसे मिलने को जाओ, और उनसे कहना, कि हम तुम्हारे दास हैं; इसलिये अब तुम हम से वाचा बाँधो। 11. Dixeruntque nobis seniores nostri, et emnes habitatores terrae nostrae, Tollite in manu vestra escam pro itinere, et ite in occursum eorum, ac dicite illis, Servi vestri sumus, et nunc percutite nobiscum foedus.

12. जिस दिन हम तुम्हारे पास चलने को निकले उस दिन तो हम ने अपने-अपने घर से यह रोटी मार्ग के भोजन के लिये गरम ली थी; परन्तु अब देखो, यह सूख गई है और इसमें फफूँदी लग गई है।

12. Iste est panis noster, calidum pro viatico paravimus e domibus nostris quo die egressi sumus ut veniremus ad vos, nunc autem aruit, et siccus est.

13. फिर ये जो मदिरा के कुप्पे हम ने भर लिये थे, तब तो नये थे, परन्तु देखो, अब ये फट गए हैं; और हमारे ये वस्त्र और जूतियाँ बड़ी लम्बी यात्रा के कारण पुरानी हो गई हैं।

13. Et isti sunt utres vini, quos impleverimus novos, et ecce rupti sunt. Et ista vestimenta nostra, et calceamenta nostra vetustate attrita sunt ob longum iter.

14. तब उन पुरुषों ने उनके भोजन में से कुछ ग्रहण किया, और यहोवा से सलाह न ली।

14. Sumpserunt ergo viri de viatico eorum, et os Jehovae non interrogaverunt.

15. तब यहोशू ने उनसे मेल करके उनसे यह वाचा बाँधी, कि तुम को जीवित छोड़ेंगे; और मण्डली के प्रधानों ने उनसे शपथ खाई।

15. Et fecit cum eis Josue pa-cem, et percussit cum eis foedus quod sineret cos vivere, juraveruntque eis principes congregationis.

1. “जब सब राजाओं ने सुना” इत्यादि। जब कि इस्राएली प्रजा का आगमन इन राजाओं को आरम्भ ही से भली-भाँति ज्ञात था, तो यह निश्चित है कि उनके मन ऊपर से निश्चिन्तता अथवा जड़ता के नशे में डाल दिए गए थे, कि वे तुरन्त एका करके उनका सामना करने को न उठे। जब तक दो नगरों के विनाश ने उन्हें बलपूर्वक झकझोरकर उद्यम के लिये न जगाया, तब तक अपनी रक्षा का कोई प्रबन्ध न करना अत्यन्त मूढ़ता का लक्षण था। क्योंकि जब युद्ध सब का साझा था, तो अपने पड़ोसियों को कोई सहायता न भेजना, वरन् ऐसी कोई सेना भी तैयार न रखना जो उनकी रक्षा के लिये प्रबल प्रभाव डाल सके, एक प्रकार से स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर देना था। परन्तु इस रीति से परमेश्वर ने अपनी प्रजा की निर्बलता पर दया की, जिसके मन में इतनी जातियों की संयुक्त सेनाएँ कम भय उत्पन्न न करतीं।

अतः यह निश्चित है कि शत्रुओं के आलस्य और सुस्ती के द्वारा इस्राएली और भी शीघ्रता से आगे बढ़ सके। क्योंकि इस बीच उन्हें सम्भलने का अवकाश मिल गया, और इस प्रकार जिन्हें शत्रुओं का नाम मात्र ही भयभीत कर सकता था, वे धीरज के साथ उनका सामना करने की तैयारी कर सके। इसी प्रकार, यद्यपि दुष्ट और त्यागे हुए लोग हर सम्भव युक्ति से कलीसिया का नाश करना चाहते हैं, तौभी परमेश्वर उनकी हानि पहुँचाने की शक्ति छीनने के लिये उनकी युक्तियों को तितर-बितर और गड़बड़ कर देता है, वरन् उनका साहस ही नष्ट कर देता है। दूसरी ओर, ये जातियाँ अपना उन्मत्त दुस्साहस प्रकट करती हैं। प्रत्यक्ष आश्चर्यकर्म से हार मानने के बदले वे परमेश्वर की अजेय सामर्थ्य के विरुद्ध वन-पशुओं के समान भड़कती ही रहती हैं। यरीहो के ले लिए जाने का समाचार उन तक पहुँच चुका था। क्या वह मनुष्यों की युक्ति से, या उनके कार्य से, या उनके पराक्रम से, या उनके यन्त्रों से गिराया गया था? नहीं, उसकी शहरपनाह तो अपने आप गिर पड़ी थी। तो फिर वे किस भरोसे से एका करके स्वर्ग के विरुद्ध शस्त्र उठा सकते हैं?

3. “जब गिबोन के निवासियों ने सुना” इत्यादि। अकेले गिबोन के निवासी युद्ध करने के प्रस्ताव को ठुकराकर छल का सहारा लेते हैं, और बहुत दूर रहने का बहाना करके मेल प्राप्त करने का यत्न करते हैं। ऐसा प्रयास करना उनके पड़ोसियों की दृष्टि में अत्यन्त घृणित था, क्योंकि यह एक प्रकार से उनके बीच फूट डालना, इस्राएलियों के लिये द्वार खोल देना, और अपने मित्र-राज्यों के बल को घटा देना था। और यद्यपि यहोशू और प्रधानों की मूर्खतापूर्ण सरल-विश्वासिता उचित रूप से दोष के योग्य है, क्योंकि वे किसी ऐसे विषय में, जिसकी ठीक-ठीक जाँच न की गई थी, उतावली से वाचा बाँधने को किसी प्रकार बाध्य न थे, तौभी प्रभु ने, जो अन्धकार में से ज्योति निकालने का अभ्यस्त है, इसे अपनी प्रजा के लाभ में बदल दिया; क्योंकि इससे उन्हें विश्राम का एक अवकाश मिल गया, जबकि वे एक शान्त प्रदेश में ठहरे रहे।

फ्रांसीसी में, "Car c'estoit une stupidite par trop grande de ne se point tenir sur ses gardes, jusqu'a tant quils fussent resveillez comme par force de leur paresse oyans la ruine et le sac de deux villes;" "क्योंकि यह अत्यन्त बड़ी मूढ़ता थी कि वे तब तक चौकस न रहें, जब तक दो नगरों के विनाश और लूट का समाचार सुनकर वे मानो बलपूर्वक अपने आलस्य से जगाए न गए।" — सं.

“उनका सामना करने को।” लातीनी में, "Ad eos excipiendos." फ्रांसीसी में, "उनका भली-भाँति स्वागत करने, और उन्हें वीरता से पीछे हटाने को।" — सं.

फ्रांसीसी में, "Dissippe et renverse leur conseils, entreprises, et machinations: et mesme il leur oste le sens et l'entendement;" "उनकी युक्तियों, योजनाओं और षड्यन्त्रों को तितर-बितर कर देता और उलट देता है; और उनसे बुद्धि और समझ तक छीन लेता है।" — सं.

गिबोनियों ने सचमुच ठीक और बुद्धिमानी से विचार किया, जब उन्होंने यह ठान लिया कि व्यर्थ विरोध करके परमेश्वर को अपने विरुद्ध और अधिक भड़काने के बदले वे कुछ भी सह लेंगे। परन्तु जिनकी कृपा और संरक्षण का वे आनन्द लेना चाहते थे, उन्हीं को फँसाने के लिये छल और अनुचित युक्तियों का प्रयोग करना जितना तर्क और न्याय के विपरीत था, उतना ही बेतुका और हास्यास्पद भी था। क्योंकि जो वाचा घोर छल के सिवाय और किसी नींव पर नहीं टिकी थी, उसकी स्थिरता ही क्या हो सकती थी? वे बहाना करते हैं कि वे परदेशी हैं जो बहुत दूर देश से आए हैं। इसलिये यहोशू कोरे मुखौटों के साथ वाचा बाँध रहा है, और उनके वचनों के अनुसार ही कोई दायित्व अपने ऊपर लेता है, अन्यथा नहीं। अतः जिस धूर्तता से उन्होंने अपने आप को भीतर घुसा लिया, उससे उन्हें कोई लाभ न होना चाहिए था। तौभी, क्योंकि उस समय मनुष्यों में खराई की बड़ी मात्रा अब भी बनी हुई थी, उन्होंने छल से निकलवाई हुई शपथ प्राप्त कर लेना भी पर्याप्त समझा, क्योंकि उन्हें पूरा निश्चय था कि इस्राएल की प्रजा उसे भंग नहीं करेगी।

यह कथन कि उन्होंने भी धूर्तता से काम किया, कुछ लोग भूल से यह समझते हैं कि इसमें उस युक्ति की ओर संकेत है जिससे यहोशू ने ऐ के नागरिकों को धोखा दिया था; और दूसरे लोग भी उतनी ही अशुद्धता से इसे याकूब के समय से जोड़ते हैं, जिसके पुत्रों शिमोन और लेवी ने विश्वासघात से शकेमियों का नाश किया था (उत्पत्ति 34)। यहाँ विरोध केवल राजाओं की शत्रुतापूर्ण तैयारियों और उन गुप्त चालों के बीच है जिनके साथ गिबोनी यहोशू के पास आए। इसी कारण, यह कहे जाने के बाद कि कुछ लोगों ने खुले युद्ध का परिणाम आजमाने के अभिप्राय से एका किया था, गिबोनियों की चाल जोड़ी गई है; और इसलिये अर्थ यह है कि यहोशू को न केवल उन घोषित शत्रुओं से निपटना पड़ा जो युद्ध के लिये इकट्ठे हुए थे, वरन् एक जाति के धूर्त कपट से भी।

परन्तु यह प्रश्न किया जाता है कि गिबोनियों ने एक ऐसे विषय में, जो कदापि आवश्यक न था, इतनी चिन्ता से परिश्रम क्यों किया? क्योंकि हम आगे देखेंगे कि इस्राएलियों को आज्ञा दी गई थी कि वे सब के सामने मेल का प्रस्ताव रखें, जिससे उसके बाद उनके पास युद्ध की घोषणा करने का न्यायसंगत और विधिसम्मत कारण हो। परन्तु क्योंकि सर्वत्र यह चर्चा थी कि वे कनान देश में स्थायी निवास चाहते हैं (जो वे वहाँ के निवासियों को निकाले बिना प्राप्त नहीं कर सकते थे), इसलिये गिबोनी यह निष्कर्ष निकालते हैं कि किसी न किसी रीति से उन्हें धोखा देने के सिवाय उन्हें दया करने के लिये बाँधने का और कोई उपाय नहीं; क्योंकि वे जिस देश पर चढ़ आए थे, उसे दूसरों के अधिकार में रहने देना अपनी इच्छा से और जान-बूझकर कभी स्वीकार न करते। वरन्, क्योंकि यह ज्ञात था कि उन्हें सब का नाश करने की आज्ञा मिली थी, इसलिये छल का सहारा लेने के सिवाय उनके पास और कोई विकल्प न रहा, क्योंकि अन्यथा बचाव पाने की सारी आशा छिन चुकी थी। और इसी कारण वे थोड़े ही समय बाद उस छल के लिये क्षमा माँगते हैं जो आवश्यकता ने उनसे करवाया था।

फ्रांसीसी में, "Duquel les trois enfans, assavoir, Ruben, Levi et Simeon;" "जिसके तीन पुत्र, अर्थात् रूबेन, लेवी और शिमोन।" — सं.

परन्तु यहाँ एक प्रश्न उठता है; क्योंकि इस्राएली यह आपत्ति करते हैं कि उन्हें कनान की जातियों के साथ कोई भी सन्धि करने की स्वतन्त्रता नहीं, वरन् वे उन्हें पूरी रीति से नष्ट करने को बाध्य हैं। निश्चय इन दो बातों में असंगति है: अधीनता स्वीकार करने का उपदेश देना, और साथ ही विनती करनेवालों और स्वेच्छा से आनेवालों को ग्रहण करने से इन्कार करना। परन्तु यद्यपि परमेश्वर ने यह चाहा कि युद्ध के नियम प्रचलित रीति और परम्परा के अनुसार माने जाएँ, और इसलिये अधीनता स्वीकार करने की शर्त पर मेल का प्रस्ताव रखा जाए, तौभी उसकी इच्छा केवल उन जातियों के मनों को परखने की थी, कि वे अपने ही हठ के द्वारा अपने ऊपर विनाश ले आएँ। साथ ही, इस्राएली प्रजा को यह जताया गया था कि उन्हें उनका नाश करना है; और इससे अनिवार्य रूप से यह निष्कर्ष निकला कि जो कनान देश में रहते थे उन्हें सहन नहीं किया जा सकता था, और उनके साथ वाचा बाँधना अनुचित था।

हम आगे चलकर दोनों बातें स्पष्ट रूप से कही हुई पाएँगे, अर्थात् यह कि सब के सब युद्ध करते रहने पर अड़े रहे, क्योंकि परमेश्वर का अभिप्राय यही था कि उनके मन कठोर किए जाएँ, और वे नष्ट हो जाएँ। अतः यह न्यायसंगत निष्कर्ष था कि जो मृत्यु के लिये ठहराए गए थे उन्हें बचाया नहीं जा सकता था। यदि कोई यह आपत्ति करे कि गिबोनी, जिन्होंने स्वेच्छा से मेल की विनती की, इसलिये अपवाद थे, तो मेरा उत्तर यह है कि इस समय इस्राएली उस औपचारिक रीति पर विचार नहीं कर रहे थे जिसका कोई परिणाम नहीं निकलता था, वरन् केवल परमेश्वर की प्रतिज्ञा और आज्ञा पर ध्यान दे रहे हैं। इसी कारण वे कोई आशा शेष नहीं रहने देते, क्योंकि उन्हें सीधी और स्पष्ट आज्ञा दी गई थी कि वे एक-एक व्यक्ति को घात करके देश को शुद्ध करें, और जिन्हें उन्होंने मारा उनके स्थान पर स्वयं बसें।

6. “तब वे यहोशू के पास गए” इत्यादि। मैं कह चुका हूँ कि कठोर विधि के अनुसार इस प्रकार की वाचा शून्य और व्यर्थ थी। क्योंकि जब उनकी विनती स्वीकार होती है, तो इसके सिवाय और क्या ठहराया जाता है कि वे सुरक्षित रखे जाएँ, इस शर्त पर कि वे पृथ्वी के किसी दूर और सुदूर प्रदेश से आए हों? और जितनी बार वे उसी झूठ को दोहराते हैं, उतना ही वे छल से प्राप्त की हुई सन्धि को निष्फल कर देते हैं, क्योंकि उसका सच्चा अर्थ केवल इतना ही है कि इस्राएली किसी ऐसी परदेशी प्रजा को, जो बहुत दूरी पर रहती है, कोई कष्ट न देंगे। विशेष रूप से यही अर्थ होना इस बात से प्रकट होता है कि इस्राएली कनान देश के सब निवासियों को स्पष्ट रूप से अलग कर देते हैं। अतः वे इस छल से कुछ भी प्राप्त न कर सके। न ही परमेश्वर के नाम का कपटपूर्ण बहाना बनाकर, और इस प्रकार यहोशू के मन पर एक प्रकार का कुहरा डालकर, उन्हें कोई अधिक सहायता मिलती है। वे बहाना करते हैं कि वे परमेश्वर के नाम के कारण आए हैं; मानो वे परमेश्वर की, अर्थात् इस्राएल के परमेश्वर की, महिमा करने का अंगीकार कर रहे हों; क्योंकि इसमें उन अन्धविश्वासों का मौन त्याग निहित है जिनके वे अभ्यस्त थे। क्योंकि यदि यह सच है कि वे मिस्र में किए गए आश्चर्यकर्मों पर विश्वास से प्रेरित होकर आए थे, तो वे इस्राएल के परमेश्वर को, यद्यपि वह उनके लिये अनजाना परमेश्वर था, सर्वोच्च सामर्थ्य का अधिकारी मान लेते हैं।

14. “तब उन पुरुषों ने उनके भोजन में से कुछ लिया” इत्यादि। कुछ टीकाकार यहाँ इन नीरस कल्पनाओं का सहारा लेते हैं कि उन्होंने वह रोटी इसलिये खाई कि स्वाद से जान लें कि वह पुरानी होने से बासी है या नहीं, अथवा यह कि उन्होंने भोज के द्वारा वाचा को पक्का किया। परन्तु मेरी समझ में ये शब्द वरन् उनकी अत्यधिक सरल-विश्वासिता की एक परोक्ष निन्दा हैं, कि उन्होंने तुच्छ आधारों पर एक मनगढ़न्त कथा को मान लिया, और केवल रोटी पर ध्यान दिया, यह विचार किए बिना कि वह कल्पित कथा किसी भी विश्वसनीय रंग से रहित थी। और निश्चय, यदि उनकी इन्द्रियाँ कुण्ठित न हो गई होतीं, तो बहुत सी बातें तुरन्त उनके ध्यान में आ जातीं जो गिबोनियों का खण्डन कर देतीं। परन्तु क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है कि सबसे तीक्ष्ण आँखें भी किसी खोखले दिखावे से चौंधिया जाती हैं, इसलिये उनकी और भी कठोर निन्दा इस बात के लिये की गई है कि उन्होंने परमेश्वर की इच्छा जानने का यत्न न किया। उपाय तो हाथ में ही था, यदि वे ईश्वरीय वाणी से पूछे बिना कुछ भी न करते। यह विषय सावधानी से जाँचने के योग्य था, और इसलिये यह घोर लापरवाही का चिन्ह था कि जब एक याजक ऊरीम और तुम्मीम के द्वारा परमेश्वर से उत्तर माँगने को तैयार था, तब भी उन्होंने एक अस्पष्ट विषय में उतावली से निर्णय कर लिया, मानो उनके पास सम्मति पाने का कोई साधन ही न हो। उनकी उतावली इस कारण और भी कम क्षमा के योग्य थी कि उसके साथ परमेश्वर के अनुग्रह की ऐसी घोर उपेक्षा भी मिली हुई थी।

यहोशू 9:16-27

16. और उनके साथ वाचा बाँधने के तीन दिन के बाद उनको समाचार मिला, कि वे हमारे पड़ोस के रहनेवाले लोग हैं, और हमारे ही बीच में बसे हैं।

16. Post tres autem dies a foedere cum illis inito audierunt, quod propinqui essent ipsis, et in medio ipsorum habitarent.

17. तब इस्राएली कूच करके तीसरे दिन उनके नगरों को पहुँच गए। उनके नगर गिबोन, कपीरा, बेरोत और किर्यत्यारीम थे।

17. Profectique sunt filii Israel, et venerunt ad urbes ipsorum die tertio. Urbes autem eorum erant Gibeon, Chephirat, Beeroth, Ciriatjearlm.

इस प्रकार किया गया धोखा इससे अधिक भद्दा नहीं हो सकता था। गिबोनियों का मुख्य नगर यरीहो से पश्चिम की ओर चौदह मील से अधिक दूर न था, और ऐ से, जहाँ इस्राएलियों ने हाल ही में इतनी उल्लेखनीय विजय पाई थी, दक्षिण-पश्चिम की ओर मुश्किल से उसकी आधी दूरी पर था; और इसलिये यह असम्भव नहीं कि भागनेवालों का पीछा करते समय इस्राएली वास्तव में उसी प्रदेश के भीतर पहुँच चुके हों जिसे उनके अगुवे अब अज्ञानता से इतना अधिक दूर समझते हैं कि वह प्रतिज्ञा किए हुए देश की सीमाओं से बिलकुल बाहर हो। उनके पराक्रम की जो प्रशंसा की गई, उसने उनके घमण्ड को इतना फुलाया, और एक शक्तिशाली यद्यपि दूर की जाति की मित्रता ने उनकी विजयों को आगे बढ़ाने में इतने लाभों की आशा दिलाई, कि वे तुरन्त फन्दे में फँस गए, मानो वे धोखा खाने को लगभग तैयार ही बैठे थे। — सं.

18. और इस्राएलियों ने उनको न मारा, क्योंकि मण्डली के प्रधानों ने उनके संग इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की शपथ खाई थी। तब सारी मण्डली के लोग प्रधानों के विरुद्ध कुड़कुड़ाने लगे।

18. Et non percusserunt eos filii Israel, eo quod jurassent eis princi-pes congregationis per Jehovam Deum Israel: et murmuravit tota congregatio contra principes.

19. तब सब प्रधानों ने सारी मण्डली से कहा, हम ने उनसे इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की शपथ खाई है, इसलिये अब उनको छू नहीं सकते।

19. Tunc dixerunt omnes principes ad totam congregationem, Nos juravimus eis per Jehovam Deum Israel, ideo mine non possumus attingere eos.

20. हम उनसे यही करेंगे, कि उनको जीवित छोड़ देंगे, नहीं तो जो शपथ हम ने उनके साथ खाई है उसके कारण हम पर क्रोध पड़ेगा।

20. Hoc faciemus eis, servabimus eos vivos, ne sit contra nos ira propter jusjurandum quod juravimus eis.

21. फिर प्रधानों ने उनसे कहा, वे जीवित छोड़े जाएँ; परन्तु वे सारी मण्डली के लिये लकड़हारे और पानी भरनेवाले बनें; जैसा प्रधानों ने उनसे कहा था।

21. Dixerunt itaque illis principes, Vivant, et caedant ligna, et fodiant aquam toti congregationi, quemadmodum loquuti sunt eis cuncti principes.

22. फिर यहोशू ने उनको बुलवाकर कहा, तुम तो हमारे ही बीच में रहते हो, फिर तुम ने हम से यह कहकर क्यों छल किया है, कि हम तुम से बहुत दूर रहते हैं? 22. Vocavit itaque cos Josue, et loquutus est ad eos, dicendo: Ut quid decepistis nos, dicendo, Remoti sumus a vobis valde, cum in medio nostri habitefts?

23. इसलिये अब तुम शापित हो, और तुम में से ऐसा कोई न रहेगा जो दास, अर्थात् मेरे परमेश्वर के भवन के लिये लकड़हारा और पानी भरनेवाला न हो।

23. Nunc ergo maledicti estis, nec delebuntur ex vobis servi, et caedentes ligna, et fodientes aquam pro domo Dei met.

24. उन्होंने यहोशू को उत्तर दिया, तेरे दासों को यह निश्चय बताया गया था, कि तेरे परमेश्वर यहोवा ने अपने दास मूसा को आज्ञा दी थी कि तुम को वह सारा देश दे, और उसके सारे निवासियों को तुम्हारे साम्हने से सत्यानाश करे; इसलिये हम लोगों को तुम्हारे कारण अपने प्राणों का बड़ा भय हुआ, और हम ने ऐसा काम किया।

24. Qui responderunt ad Josuam, atque dixerunt, Cum renunciando renunciatum fuit servis tuis quomodo praeceperat Jehova Deus tuus Most servo suo ut daret vobis terram, et disperderet omnes habitatores terrae a facie vestra, timuimus valde animabus nostris a facie vestra, et fecimus istud.

25. और अब देख, हम तेरे वश में हैं; जैसा बर्ताव तुझे भला और ठीक जान पड़े, वैसा ही व्यवहार हमारे साथ कर।

25. Et nunc ecce sumus in manu tua, sicut placet, et sicut rectum est in oculis tuis, ut facias nobis, facies.

26. तब उसने उनसे वैसा ही किया, और उन्हें इस्राएलियों के हाथ से ऐसा बचाया, कि उन्होंने उन्हें घात न किया।

26. Et fecit eis ita, liberavitque eos de manu filiorum Israel, nec interfecerunt eos.

27. परन्तु यहोशू ने उसी दिन उनको मण्डली के लिये, और जो स्थान यहोवा चुन ले उसमें उसकी वेदी के लिये, लकड़हारे और पानी भरनेवाले नियुक्त कर दिया, जैसा आज तक है।

27. Constituitque eos Josue eo die caesores lignorum, et haustores aquaq congregationi, et altari Jehovae usque in huuc diem in loco quem elegerit.

16. “और ऐसा हुआ” इत्यादि। तीन दिन के बाद छल के खुल जाने के द्वारा उनकी चंचलता की जो ताड़ना हुई, उसने दण्ड की शीघ्रता के कारण उन्हें अपनी लज्जा और अपमान का और भी अधिक बोध कराया होगा। क्योंकि इससे यह प्रकट हो गया कि आलस्य और जड़ता के कारण वे बड़ी मूर्खता से भूल में पड़ गए थे, क्योंकि उन्होंने एक ऐसे विषय की जाँच करने का कष्ट न उठाया जो लगभग उनकी आँखों के सामने रखा था। उनका उस प्रदेश में से शान्ति से होकर निकलना, बिना कठिनाई के नगरों में प्रवेश करना, और भोजन-सामग्री के लिये खुले साधन पाना, परमेश्वर की पितृतुल्य कोमलता का फल था, जो न केवल उनका दोष क्षमा करता है, वरन् जो बात उचित रूप से उनके लिये हानिकारक हो सकती थी, उसे उनकी भलाई के लिये फेर देता है। यहाँ यह बताया गया है कि इस्राएलियों ने उस प्रदेश में शत्रुता का व्यवहार नहीं किया, क्योंकि गिबोनियों को शपथ से पक्की की हुई सुरक्षा की प्रतिज्ञा मिल चुकी थी।

अब दो प्रश्न उठते हैं: पहला, क्या इस्राएलियों ने, जिनका धोखेबाज़ों को अपना वचन देने का कोई भी अभिप्राय न था, कोई दायित्व अपने ऊपर लिया था? और दूसरा, क्या प्रजा के अधिकार में यह न था कि वह उस प्रतिज्ञा को रद्द कर दे जो उसके अगुवों ने मूर्खता और भूल से की थी? सामान्य सिद्धान्त के विषय में, शपथ के बन्धन को अत्यन्त पवित्र माना जाना चाहिए, यहाँ तक कि हम भूल के बहाने उन सन्धियों से भी पीछे न हटें जिनमें हमें धोखा दिया गया हो, क्योंकि परमेश्वर का पवित्र नाम सारे संसार के धन से भी अधिक बहुमूल्य है। इसलिये यद्यपि किसी मनुष्य ने थोड़े ही विचार के साथ शपथ खाई हो, तौभी कोई हानि या व्यय उसे शपथ पूरी करने से मुक्त नहीं करेगा। मुझे कोई सन्देह नहीं कि इसी अर्थ में दाऊद कहता है (भजन संहिता 15:4) कि परमेश्वर के सच्चे उपासक, यदि उन्होंने अपनी हानि की शपथ खाई हो, तो बदलते नहीं; क्योंकि वे अपनी प्रतिज्ञाओं से मुकरकर परमेश्वर के नाम को तिरस्कार के लिये खोल देने के बदले हानि उठाना अधिक अच्छा समझेंगे।

अपनी विधि-शिक्षा के कारण कैल्विन यहाँ उठाए गए इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर विचार करने के लिये भली-भाँति योग्य था, और इस विषय में उसके सामान्य सिद्धान्तों की, यहाँ भी और इस अध्याय की टीका के पिछले खण्ड में भी, यथार्थता पर विवाद करना असम्भव है। तौभी उसके कुछ कथनों में असंगति का आभास होता है। तीसरे पद से आरम्भ होनेवाले खण्ड में वह लातीनी में कहता है, "Cum larvis ergo paciscitur Josue, nec quidquam obligationis contrahit, nisi secundum eorum verba;" अथवा जैसा फ्रांसीसी में है, "Josue donques traitte alliance avec des masques ou phantosmes et n'est nullement oblige, sinon suivant leurs paroles;" "अतः यहोशू मुखौटों या छायाओं के साथ वाचा बाँधता है, और उनके वचनों के अनुसार ही बँधा है, अन्यथा किसी प्रकार नहीं।" फिर, छठे पद से आरम्भ होनेवाले खण्ड में वह कहता है, "Dixi summo jure evanidum et irritum fuisse ejusmodi foedus," अथवा जैसा फ्रांसीसी में है, "J'ay dit qu'a la rigueur de droit une telle alliance estoit nulle et cassee;" "मैं कह चुका हूँ कि कठोर विधि के अनुसार ऐसी वाचा शून्य और व्यर्थ थी।" और वह इसका कारण एक प्रश्न के रूप में देता है, जब वह पूछता है, "जब उनकी विनती स्वीकार होती है, तो उन्हें (गिबोनियों को) इसके सिवाय और क्या मिलता है कि वे सुरक्षित रखे जाएँ, इस शर्त पर कि वे किसी दूर देश से आए हों?" परन्तु यदि गिबोनियों को कुछ नहीं मिला, अथवा दूसरे शब्दों में, यदि वे कुछ भी माँगने के अधिकारी न थे, तो यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस्राएली कुछ भी देने को बाध्य नहीं हो सकते थे। वे एक पारस्परिक अनुबन्ध के दो पक्ष थे, जिसमें एक पक्ष के दावे ठीक-ठीक दूसरे पक्ष के दायित्वों के प्रतिरूप या माप थे। इसलिये यह आशा की जा सकती थी कि जब कैल्विन ने यह निर्णय कर दिया कि गिबोनियों का कोई दावा नहीं था, तो वह निश्चय यह भी निर्णय करेगा कि इस्राएलियों पर कोई दायित्व नहीं आया। परन्तु यहाँ, इस दूसरी बात पर विचार करते समय, वह अपना आधार बदलता हुआ प्रतीत होता है, क्योंकि वह स्पष्ट रूप से कहता है कि हम उन सन्धियों से भी पीछे नहीं हट सकते जिनमें हमें धोखा दिया गया हो। तौभी यह असंगति केवल ऊपरी है। वह यह नहीं कहता कि हम ऐसी सन्धियों से बँधे हैं, मानो वे अपने आप में मान्य हों, वरन् वह उन परिस्थितियों की ओर ध्यान दिलाता है जो हम पर यह औपचारिक दायित्व डाल सकती हैं कि हम ऐसा आचरण करें मानो हम उनसे बँधे हों। दूसरे शब्दों में, वह इस विषय को विधि के न्यायालय से हटाकर विवेक के न्यायालय में ले आता है, और इस प्रकार उसे उन विषयों की श्रेणी में रख देता है जिनकी ओर संत पौलुस ने संकेत किया, जब उसने उचित बातों और लाभदायक बातों के बीच भेद किया। यहोशू और पुरनियों ने उतावली से शपथ खाई थी, परन्तु ऐसा करके, यों कहें, इस्राएल के परमेश्वर के सम्मान को गिरवी रख देने के कारण, वे चाहे जो भी मूल्य चुकाना पड़े, उसे छुड़ाने को बाध्य थे। — सं.

अतः मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि यदि केवल किसी निजी हित पर प्रभाव पड़ना हो, तो जो कुछ हमने शपथ खाकर प्रतिज्ञा की हो, वह सब पूरा किया जाना चाहिए। और शब्दों से यह प्रकट है कि इस्राएली डरते थे कि कहीं वे कनान की जातियों के बीच अपने परमेश्वर के नाम को अपमान के लिये खोल न दें। क्योंकि मैं समझता हूँ कि इस कथन में विशेष बल है — कि उन्होंने इस्राएल के परमेश्वर की शपथ खाई थी। परन्तु एक विशेष कारण से इस्राएली उस कपटपूर्ण सन्धि से पीछे हटने को स्वतन्त्र थे; क्योंकि उन्होंने न केवल अपना अधिकार छोड़ दिया था, वरन् परमेश्वर की उस आज्ञा से भी अनुचित रूप से हट गए थे, जिसमें एक छोटे से छोटे अंश में भी हस्तक्षेप करना उचित न था। न तो पराजितों को छोड़ देना, और न आत्मसमर्पण की शर्तें ठहराना उनके अधिकार में था, तौभी अब वे ऐसा व्यवहार करते हैं मानो यह कार्य उन्हें सौंपा गया हो। इस प्रकार हम देखते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के नाम को दो बार अपवित्र किया, जब कि शपथ के बहाने वे उस बात का समर्थन करने पर अड़े रहे जिसकी प्रतिज्ञा उन्होंने मूर्खता से की थी।

साधारण लोगों ने गिबोनियों के प्रति सब प्रकार की हिंसा से रुककर अपने अगुवों का जो आदर किया, उसमें हम उस युग की खराई देखते हैं। अन्य स्थानों में यह बात सहज ही सूझ जाती कि यह कहकर प्रतिज्ञा से बच निकलें कि कुछ थोड़े से व्यक्तियों के समझौते से सारी प्रजा बँधी नहीं है, जैसा रोमियों ने कॉडियम की सन्धि को अस्वीकार करते समय किया, जिसकी शपथ केवल कौंसलों, दूतों और ट्रिब्यूनों ने सीनेट और प्रजा की आज्ञा के बिना खाई थी। इसलिये उस अनगढ़ सरलता की और भी अधिक प्रशंसा उचित है, जिसमें धार्मिक दायित्व का प्रभाव उन अति सूक्ष्म तर्कों से अधिक था जिन्हें आज के अधिकांश मनुष्य स्वीकार करते और सराहते हैं। प्रजा इस बात पर सचमुच क्रुद्ध है कि उनके अगुवों ने अपने अधिकार से अधिक अपने ऊपर ले लिया था, परन्तु उनका संयम उन्हें कुड़कुड़ाने और कोलाहल से आगे नहीं बढ़ने देता।

20. “हम उनसे यही करेंगे” इत्यादि। यद्यपि समझौते के अनुसार वे गिबोनियों को जीवनदान देते हैं, तौभी वे पूरी वाचा को केवल आंशिक रूप में ही पक्का करते हैं। क्योंकि जब कि गिबोनी पूर्ण सुरक्षा पाने के अधिकारी थे, उनसे उनकी स्वतन्त्रता छीन ली जाती है, जो जीवन से भी अधिक प्रिय है। इससे हम यह अनुमान करते हैं कि यहोशू और अन्य लोगों ने, मानो किसी सन्देह और उलझन के विषय में, एक प्रकार का बीच का मार्ग निकाला, जिससे शपथ पूरी रीति से व्यर्थ न हो जाए। इस युक्ति का मुख्य उद्देश्य भीड़ को शान्त करना था; साथ ही, जब वे गिबोनियों द्वारा धोखा खाने पर क्रुद्ध थे, तब उन्होंने उस छल का दण्ड दिया, और दण्ड से छूट जाने को उनके उपहास को बढ़ाने न दिया। इस व्यवस्था में यह एक कठोर शर्त थी कि गिबोनी न केवल दासों के कामों के लिये ठहराए गए, वरन् अपने घरों से भी अलग कर दिए गए, कि वे भटकता और मारा-मारा फिरता जीवन बिताएँ। उन पर डाला गया नीच सेवकों का काम जितना परिश्रम का था उतना ही हीन भी था, परन्तु सबसे बुरी बात यह थी कि जहाँ कहीं परमेश्वर सन्दूक को ठहराना चाहे, वहाँ वे लकड़ी काटें और पानी भरें।

फ्रांसीसी में, "Quand il ne passe point outre le murmure, et qu'il se contente de cela;" "जब वे कुड़कुड़ाने से आगे नहीं बढ़ते, और उसी पर सन्तुष्ट रहते हैं।" — सं.

22. “फिर यहोशू ने उनको बुलवाया” इत्यादि। क्योंकि उसे एक दुःखद और कठोर दण्डाज्ञा सुनानी थी, इसलिये वह पहले यह कहता है कि इस निर्णय में कोई अन्याय नहीं, क्योंकि इससे बढ़कर अनुचित बात और कोई न होगी कि चालें और छल उनका प्रयोग करनेवालों के लिये लाभदायक ठहरें। अतः वह पहले तो उनसे इस बात पर विवाद करता है कि उन्होंने झूठ के द्वारा संकट को टाला, और फिर तुरन्त उन्हें शापित ठहराता है। इससे मैं यह समझता हूँ कि वह उनकी दासता का दोष उन्हीं के सिर डालता है, क्योंकि वे उससे अधिक बुरा कुछ नहीं सहते जिसके योग्य वे अपनी धूर्तता या विश्वासघात से ठहरे हैं; मानो वह यह कह रहा हो कि जो दण्ड वह सुनाता है उसका कारण उन्हीं में है। यह सचमुच कठोर है कि जिन परिश्रमों के लिये वे ठहराए गए उनका कोई अन्त निश्चित नहीं किया गया, क्योंकि इन शब्दों में यही निहित है, तुम में से दास कभी न मिटेंगे; परन्तु वह घोषणा करता है कि उनके साथ कोई अन्याय नहीं किया गया, क्योंकि वे अपनी ही इच्छा से, अथवा अपने ही दोष से, शापित हुए थे। वे सचमुच उस आवश्यकता का तर्क देकर, जिसने उन्हें विवश किया, अपराध को हल्का करते हैं, तौभी वे उस दण्ड से इन्कार नहीं करते, जिसे वे न्याय से दिया गया मानते हैं। हो सकता है कि भय से दबकर उन्होंने किसी बात से इन्कार न किया हो, वरन् शान्ति से और चापलूसी के साथ उन पर लगाई गई शर्तों को मान लिया हो। क्योंकि विवाद करने से उन्हें क्या लाभ होता? तौभी मुझे कोई सन्देह नहीं कि क्योंकि वे जानते थे कि उन्होंने अनुचित किया है, और अपने आप को पूरी रीति से निर्दोष ठहराने का उनके पास कोई साधन न था, इसलिये जब तक उनके प्राण बचे रहे, तब तक उन्होंने यही समझा कि उनके साथ बड़ी दया का व्यवहार किया गया है,

लातीनी में, "Nec sine assentatione;" "और चापलूसी के बिना नहीं।" फ्रांसीसी में, "et sans flatterie;" "और बिना चापलूसी के।" — सं.

इस व्यवस्था से उत्पन्न अनेक हानिकारक परिणामों में से एक यह था कि इस्राएली राष्ट्र के बीचोंबीच एक पतित जाति-वर्ग बन गया, और उसके फलस्वरूप घरेलू दासता का, उसके सबसे बुरे रूपों में से एक में, प्रवेश हुआ। — सं.

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