यहोशू की पुस्तक पर टीका · अध्याय 20

यहोशू 20

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यहोशू 20

यहोशू 20:1-9

1. फिर यहोवा ने यहोशू से कहा,

1. Loquutus est autem Jehova ad Josue, dicendo,

2. इस्राएलियों से यह कह, कि मैंने मूसा के द्वारा तुम से जिन शरणनगरों की चर्चा की थी, उन्हें अपने लिये ठहरा लो,

2. Alloquere filios Israel, his verbis, Date urbes refugii, de quibus loquutus sum ad vos per manum Mosis:

3. जिससे जो कोई भूल से बिना जाने किसी प्राणी को मार डाले, वह वहाँ भाग जाए; और वे खून का पलटा लेनेवाले से बचने के लिये तुम्हारे शरणस्थान ठहरेंगे।

3. Ut fugiat illuc homicida qui percusserit animam per errorem, absque scientia: eruntque vobis in refugium a propinquo sanguinis.

4. और जब वह उन नगरों में से किसी को भाग जाए, और उस नगर के फाटक में प्रवेश-स्थान पर खड़ा होकर उस नगर के पुरनियों को अपना मुकद्दमा कह सुनाए, तब वे उसको नगर में अपने पास टिका लें, और उसे कोई स्थान दें, जिसमें वह उनके बीच रहे।

4. Et fugiet ad unam ex civitatibus istis, stabitque ad ostium portae urbis, ac loquetur in auribus seniorum urbis ipsius verba sua, et recolligent eum in urbem ad se, dabuntque ei locum, ac habitabit apud eos.

5. और यदि खून का पलटा लेनेवाला उसका पीछा करे, तो वे उस खूनी को उसके हाथ में न सौंपें; क्योंकि उसने अपने पड़ोसी को बिना जाने मारा, और पहले से उससे बैर न रखता था।

5. Quum autem persequutus fuerit eum propinquus sanguinis, non tradent homicidam in manum ejus: quia absque scientia percussit proximum suum, neque odio habuerat eum ab heri et nudiustertius.

6. और जब तक वह न्याय के लिये मण्डली के सामने खड़ा न हो, और जब तक उन दिनों का महायाजक न मर जाए, तब तक वह उसी नगर में रहे; उसके बाद वह खूनी लौटकर अपने नगर और अपने घर को, अर्थात् उस नगर को जिससे वह भाग आया था, आ जाए।

6. Et habitabit in ea civitate donec stet ante coetum ad judicium, aut donec moriatur sacerdos magnus qui erit in diebus illis: tunc enim revertetur homicida venietque ad urbem suam, et ad domum suam, ad urbem unde fugerat.

7. और उन्होंने नप्ताली के पहाड़ी देश में गलील के केदेश को, और एप्रैम के पहाड़ी देश में शकेम को, और यहूदा के पहाड़ी देश में किर्यतर्बा को, जो हेब्रोन है, ठहराया।

7. Et addixerunt Cedes in Galil in monte Nephtali, et Sechem in monte Ephraim, et Cirjath-arba (ipsa est Hebron) in monte Jehudae.

8. और यरीहो के पास यरदन के उस पार पूर्व की ओर उन्होंने रूबेन के गोत्र में से जंगल के चौरस देश में बेसेर को, और गाद के गोत्र में से गिलाद के रामोत को, और मनश्शे के गोत्र में से बाशान के गोलान को ठहराया।

8. De trans Jordane autem Jericho, ad orientem dederunt Beser in deserto in planitie, de tribu Ruben: et Ramoth in Gilead, de tribu Gadi: et Golan in Basan, de tribu Manasse.

9. सारे इस्राएलियों के लिये, और उनके बीच रहनेवाले परदेशियों के लिये भी, ये ही नगर इसलिये ठहराए गए कि जो कोई किसी प्राणी को भूल से मार डाले, वह वहाँ भाग जाए, और जब तक मण्डली के सामने खड़ा न हो, तब तक खून का पलटा लेनेवाले के हाथ से मारा न जाए।

9. Istae fuerunt urbes conventionis omnibus filiis Israel, et peregrino qui peregrinatur in medio eorum: ut fugeret illuc quicunque interfecisset aliquem per errorem, et non moreretur manu propinqui sanguinis, donec stetisset coram coetu.

1. फिर यहोवा ने यहोशू से कहा, इत्यादि। इस बात में, कि शरणनगरों को ठहराने का विचार उनके अपने मन में तब तक न आया जब तक उन्हें फिर से स्मरण न दिलाया गया, उनकी सुस्ती की परोक्ष रूप से निन्दा की गई प्रतीत होती है। इस विषय की ईश्वरीय आज्ञा यरदन के पार ही दी जा चुकी थी। जब उसका कारण सदा समान रूप से मान्य बना रहा, तो वे प्रतीक्षा क्यों करते हैं? जिसे उन्होंने उचित रीति से आरम्भ किया था, उसे वे पूर्ण रूप से कार्यान्वित क्यों नहीं करते? हम यह भी जोड़ सकते हैं कि यह कितना महत्वपूर्ण था कि निर्दोषों के लिये शरण-स्थान हों, ताकि देश लहू से अशुद्ध न हो। क्योंकि यदि वह उपाय न किया गया होता, तो मारे गए लोगों के कुटुम्बी बिना भेदभाव के उनकी मृत्यु का पलटा लेने को निकलकर बुराई को दुगुना कर देते। देश को कलंक और दूषण से बचाने में आलसी बने रहना निश्चय ही प्रजा को शोभा न देता था। इससे हम देखते हैं कि मनुष्य न केवल अपना कर्तव्य पूरा करने में, वरन् अपनी ही सुरक्षा का प्रबन्ध करने में भी कितने ढीले होते हैं, जब तक प्रभु उन्हें बार-बार न उकसाए, और उपदेश के अंकुश से उन्हें आगे न हाँके। परन्तु उन्होंने केवल असावधानी से पाप किया, यह इस बात से प्रकट है कि वे तुरन्त आज्ञा मानने को तैयार हैं, और न तो टालमटोल करते हैं, न ही उस बात के औचित्य पर विवाद करके एक आवश्यक विषय में बाधाएँ या विलम्ब उत्पन्न करते हैं।

शरणनगरों के द्वारा दिए जानेवाले आश्रय का स्वरूप पहले ही समझाया जा चुका है। वह जान-बूझकर की गई हत्या को दण्ड से छूट नहीं देता था; परन्तु यदि किसी ने भूल से किसी ऐसे मनुष्य को मार डाला हो जिससे उसकी शत्रुता न थी, तो वह इसी प्रयोजन के लिये ठहराए गए इन नगरों में से किसी में भागकर सुरक्षित शरण पाता था। इस प्रकार परमेश्वर ने अभागों की सहायता की, और उन्हें एक घोर कुकर्म का दण्ड भोगने से बचाया, जब वे उसके दोषी न थे। साथ ही मृतक के भाइयों और कुटुम्बियों की भावनाओं का इतना आदर किया गया कि जिन लोगों ने उन्हें शोकित किया था, उनकी निरन्तर उपस्थिति से उनका दुःख न बढ़े। अन्त में, प्रजा हत्या से घृणा करने की अभ्यस्त हुई, क्योंकि मनुष्य-वध, दोषपूर्ण न होने पर भी, महायाजक की मृत्यु तक देश और घर से निर्वासन का कारण होता था। क्योंकि उस अस्थायी निर्वासन ने स्पष्ट रूप से दिखाया कि परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य का लहू कितना बहुमूल्य है। इस प्रकार वह व्यवस्था सार्वजनिक और निजी दोनों दृष्टियों से न्यायपूर्ण, समतापूर्ण और लाभदायक थी। परन्तु संक्षेप में यह ध्यान देना चाहिए कि यहाँ सब बातों का उल्लेख क्रम से नहीं किया गया है। क्योंकि जिसने संयोगवश किसी मनुष्य को मार डाला हो, वह अपना पक्ष रखने के लिये न्यायालय के सामने उपस्थित होकर, और उचित तथा पूर्ण जाँच के बाद निर्दोष ठहराया जाकर, सुरक्षित रह सकता था, जैसा हमने मूसा की पुस्तकों में इस विषय की चर्चा करते समय अधिक विस्तार से समझाया था।

7. और उन्होंने केदेश को ठहराया, इत्यादि। यहाँ प्रयुक्त इब्रानी शब्द केदेश का अर्थ तैयार करना और पवित्र ठहराना भी है। अतः मैं इसका यह अर्थ करता हूँ कि सामान्य उपयोग की आवश्यकता के अनुसार नगर चुने गए। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि बातें भली-भाँति इस रीति से व्यवस्थित की गईं कि निजी हित सार्वजनिक हित के आगे झुक जाए। इसके अतिरिक्त, हम अगले अध्याय में देखेंगे कि किर्यतर्बा, जो बाद में हेब्रोन कहलाया, लेवियों को सौंप दिया गया, यद्यपि वह पहले कालेब की सम्पत्ति था। इससे इस वृद्ध सन्त का दुर्लभ, वरन् अतुलनीय संयम प्रकट हुआ, जिसने उस नगर और उसकी चराइयों दोनों को, जिन पर उसने न्यायपूर्वक अपना अधिकार जताया था, उसी क्षण दूसरों को सहर्ष सौंप दिया जब चिट्ठी ने दिखा दिया कि यह परमेश्वर को भाता है। इस परिवर्तन की ओर संक्षेप में ध्यान दिलाना आवश्यक था, क्योंकि प्रभु को यह भाया कि शरण-स्थान केवल लेवियों के नगरों में हों, ताकि उनकी निर्दोषता अधिक निष्ठा और अधिकार के साथ बचाई जाए।

कैल्विन का यह मत कुछ अनोखा है कि यहोशू को दिया गया सन्देश इस्राएलियों की परोक्ष निन्दा था, क्योंकि उन्होंने पहले ही अपनी इच्छा से शरणनगर नहीं ठहराए थे। अन्य व्याख्याकार समझते हैं कि उन्हें ठहराने का उचित समय अब तक आया ही न था, क्योंकि यह लेवियों को नगर दिए जाने से पहले भली-भाँति नहीं हो सकता था, वरन् उसके बाद ही होना चाहिए था; क्योंकि विषय के स्वरूप की माँग थी कि प्रत्येक शरणनगर लेवियों का नगर हो। — सं. प्रसंगवश यह देखा जा सकता है कि मूसा द्वारा ठहराए गए शरणनगरों में जो मानवता और बुद्धि प्रकट है, वह पोपतन्त्री देशों के असंख्य आश्रय-स्थानों और पवित्र शरण-स्थलों से उत्पन्न अनेक दुरुपयोगों और घृणित कामों से कितनी स्पष्टता से भिन्न है। — सं.

लातीनी में, “Prout communis usus ferebat.” फ्रांसीसी में, “Selon que le profit et l'utilite commune le requeroit;” “जैसा सामान्य लाभ और उपयोगिता की माँग थी।” — सं.

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