यहोशू की पुस्तक पर टीका · अध्याय 8

यहोशू 8

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यहोशू 8

यहोशू 8:1-29

1. तब यहोवा ने यहोशू से कहा, मत डर, और न तेरा मन कच्चा हो; सब योद्धाओं को साथ ले, और उठकर ऐ पर चढ़ाई कर; देख, मैंने ऐ के राजा को, उसकी प्रजा, उसके नगर और उसके देश समेत तेरे हाथ में कर दिया है;

1. Dixitque Jehova ad Josuam, Netimeas, nec formides, sume tecum omnem populum bellicosum, et surge, ascende in Hai. Vide, dedi in manu tua regem Hai, ac populum ejus, urbem ejus, et terram ejus.

2. और जैसा तूने यरीहो और उसके राजा से किया वैसा ही ऐ और उसके राजा से भी करना; केवल उसकी लूट और उसके पशु तुम अपने लिए ले लेना; उस नगर के पीछे की ओर अपने लिए घात लगा।

2. Faciesque Hai, et regi ejus, quemadmodum fecisti Jericho, et regi ejus; tamen spolia ejus, et animalia ejus praedabimini vobis. Colloca autem insidias urbi a tergo ejus.

3. तब यहोशू सब योद्धाओं समेत ऐ पर चढ़ाई करने को उठा; और यहोशू ने तीस हज़ार शूरवीर पुरुषों को चुनकर रात ही को भेज दिया।

3. Surrexit itaque Josue, et omnis populus bellicosus, ut ascenderunt in Hai, et elegit Josue trigintamillia virorum fortium robore, misitque eos nocte.

4. और उसने उनको यह आज्ञा दी, सुनो, तुम उस नगर के विरुद्ध, अर्थात् नगर के पीछे की ओर, घात लगाए बैठे रहना; नगर से बहुत दूर न जाना, परन्तु सब के सब तैयार रहना;

4. Ac praecepit eis, dicendo, Attendite vos, Insidiabimini urbi a tergo ejus, nec removeatis vos ab ea procul, sed estote omnes vos parati.

5. और मैं, और सब लोग जो मेरे संग हैं, उस

5. Et ego et omnis populus, qui mecum est, accedemus ad urbem: quum autem egredientur in occursum nostrum, sicut prius, fugiemus ante eos: नगर के निकट जाएँगे; और जब वे पहले के समान हमारा सामना करने को निकलेंगे, तब हम उनके आगे से भागेंगे,

6. (क्योंकि वे हमारे पीछे-पीछे निकल आएँगे) यहाँ तक कि हम उन्हें नगर से दूर खींच ले जाएँगे; क्योंकि वे कहेंगे, वे पहले के समान हमारे आगे से भागे जाते हैं; इसलिए हम उनके आगे से भागेंगे।

6. Tunc egredientur post nos donec avellamus eos ab urbe: dicent enim, Fugiunt ante nos, ut prius: et fugiemus ante eos.

7. तब तुम घात में से उठकर नगर को अपने अधिकार में कर लेना; क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर यहोवा उसको तुम्हारे हाथ में कर देगा।

7. Vos autem surgetis ex insidiis, et expelletis habitotores urbis, tradetque eam Jehova Deus vester in manu vestra.

8. और जब तुम नगर को ले लो, तब उसमें आग लगा देना; यहोवा की आज्ञा के अनुसार ही करना। देखो, मैंने तुम्हें आज्ञा दी है।

8. Quum ceperitis urbem, succendetis eam igni, secundum sermonem Jehovae facietis. Videte, praecepi vobis.

9. तब यहोशू ने उनको भेज दिया; और वे घात में बैठने को चले गए, और बेतेल और ऐ के बीच में, ऐ की पश्चिम ओर, ठहरे रहे; परन्तु यहोशू उस रात को लोगों के बीच टिका रहा।

9. Misitque itaque eos Josue, et perrexerunt ad insidias, manseruntque inter Bethel et Hai, ab occidente Hai. Mansit autem Josue nocte illa in medio populi.

10. और यहोशू बिहान को सवेरे उठा, और लोगों की गिनती की, और वह इस्राएल के पुरनियों समेत लोगों के आगे-आगे ऐ की ओर चढ़ गया।

10. Postea surrexit Josue summo mane, recensuitque populum, atque ascendit ipse et seniores Israel ante populum versus Hai.

11. और सब लोग, अर्थात् वे योद्धा जो उसके संग थे, चढ़ गए, और निकट जाकर नगर के सामने पहुँचे, और ऐ की उत्तर ओर डेरे डाले; और उनके और ऐ के बीच एक तराई थी।

11. Omnisque populus bellicosus, qui erat cum eo ascenderunt et appropinquarunt, veneruntque e regione urbis, et castrametati sunt ab aquilone Hai. Vallis autem erat inter ipsum et Hai.

12. और उसने लगभग पाँच हज़ार पुरुषों को लेकर बेतेल और ऐ के बीच, नगर की पश्चिम ओर, घात में बैठा दिया।

12. Tulitque praeterea circiter quinque millia virorum, quos locavit in insidiis inter Bethel et Hai ab occidente urbi.

13. और जब उन्होंने लोगों को, अर्थात् नगर की उत्तर ओर की सारी सेना को, और नगर की पश्चिम ओर घात में बैठे हुओं को ठिकाने पर कर दिया, तब यहोशू उसी रात तराई के बीच में गया।

13. Et propius accessit populus tota castra quae erant ab aquilone urbi, et insidiae ejus ab occidente ipsi urbi, perrexitque Josue nocte illa in medium vallis.

14. जब ऐ के राजा ने यह देखा, तब उन्होंने फुर्ती की और सवेरे उठे, और नगर के पुरुष, अर्थात् राजा और उसकी सारी प्रजा, ठहराए हुए समय पर मैदान के सामने इस्राएल से लड़ने को निकले; परन्तु वह नहीं जानता था कि नगर के पीछे उसके विरुद्ध लोग घात लगाए बैठे हैं।

14. Porro quum videret rex Hai, festinaverunt et mane surrexerunt, atque egressi sunt homines urbis in occursum Israel ad praelium, ipse et universus populus ejus ad tempus constitutum ante campestria: nesciebat autem quod insidiae sibi essent a tergo urbis.

15. तब यहोशू और सब इस्राएली उनके सामने मानो हार खाकर जंगल के मार्ग से भाग निकले।

15. Et profligati sunt Josue, et universus Israel ante eos, et fugerunt per viam deserti.

16. और ऐ में जितने लोग थे वे सब उनका पीछा करने को इकट्ठे बुलाए गए; और वे यहोशू का पीछा करते हुए नगर से दूर खिंच गए।

16. Et congregati sunt totus populus qui in urbe erat, ut persequeretur eos. Et persequuti sunt Josuam, abstractique sunt ab urbe.

17. और न ऐ में और न बेतेल में कोई पुरुष रह गया जो इस्राएल के पीछे न निकला हो; और उन्होंने नगर को खुला छोड़कर इस्राएल का पीछा किया।

17. Neque remansit quisquam ex Hai et Bethel, qui non egressus sit post Israel, et reliquerunt urbem apertam, et persequuti sunt Israelem.

18. तब यहोवा ने यहोशू से कहा, अपने हाथ का बर्छा ऐ की ओर बढ़ा; क्योंकि मैं

18. Dixit autem Jehova ad Josuam, Eleva hastam quae est in manu tua contra Hai, quia in manu tua dabo eam. Et elevavit Josue hastem quae erat in manu sua contra urbem. उसे तेरे हाथ में दे दूँगा। और यहोशू ने अपने हाथ का बर्छा नगर की ओर बढ़ाया।

19. और उसके हाथ बढ़ाते ही घात में बैठे हुए लोग फुर्ती से अपने स्थान से उठे, और दौड़कर नगर में घुस गए, और उसको ले लिया, और फुर्ती करके नगर में आग लगा दी।

19. Tum insidiae surrexerunt repente e loco suo, et cucurrerunt quum elevasset manum suam, veneruntque ad urbem, et ceperunt eam, et festinarunt urbem succendere igni.

20. जब ऐ के पुरुषों ने पीछे फिरकर दृष्टि की, तो क्या देखा कि नगर का धुआँ आकाश की ओर उठ रहा है; और उनमें न इधर भागने की शक्ति रही न उधर; और जो लोग जंगल की ओर भागे जाते थे वे पीछा करनेवालों पर पलट पड़े।

20. Vertentes autem sese viri Hai viderunt, et ecce ascendebat fumus urbis in coelum, neque erant eis spatia ad fugiendum huc et illuc. Populus autem qui fugerat in desertum versus est contra persequentes.

21. जब यहोशू और सब इस्राएलियों ने देखा कि घात में बैठे हुओं ने नगर को ले लिया है और नगर का धुआँ उठ रहा है, तब उन्होंने लौटकर ऐ के पुरुषों को मार डाला।

21. Josue itaque et universus Israel ubi viderunt quod insidiae cepissent urbem, ascendissetque fumus urbis, reversi sunt, et percusserunt viros Hai.

22. और दूसरे भी नगर से उनका सामना करने को निकले; सो वे इस्राएलियों के बीच में पड़ गए, कुछ इधर और कुछ उधर; और उन्होंने उनको यहाँ तक मारा कि उनमें से न कोई बचा और न कोई भाग निकला।

22. Illi praeterea egressi sunt ex urbe in occursum eorum, fueruntque Israel in medio, isti hinc, et illi inde, et percusserunt eos, donec nemo remaneret eis superstes et evasor.

23. और ऐ के राजा को वे जीवित पकड़कर यहोशू के पास ले आए।

23. Regem quoque Hai ceperunt vivum, et stiterunt eum coram Josue.

24. और जब इस्राएल ऐ के सब निवासियों को मैदान में, अर्थात् उस जंगल में जहाँ उन्होंने उनका पीछा किया था, घात कर चुका, और वे सब के सब तलवार से मारे गए यहाँ तक कि उनका अन्त हो गया, तब सब इस्राएली ऐ को लौटे और उसे तलवार से मारा।

24. Quum autem finem fecisset Israel caedendi omnes habitatores Hai in deserto quo persequuti fuerant eos, et cecidissent omnes ipsi acie gladii donec consumerentur, reversus est universus Israel ad Hai, et percusserunt eam acie gladii.

25. और उस दिन जितने मारे गए, क्या पुरुष क्या स्त्री, वे सब बारह हज़ार थे, अर्थात् ऐ के सब

25. Fuitque numerus omnium qui ceciderunt die illa a viro usque ad mulierem circiter duodecim millia, omnes viri Hai. पुरुष।

26. क्योंकि जब तक यहोशू ने ऐ के सब निवासियों का सत्यानाश न कर डाला, तब तक उसने अपना हाथ, जिससे उसने बर्छा बढ़ाया था, पीछे न खींचा।

26. Porro Josue non reduxit manum suam quam elevaverat ad laceam, donec interficeret omnes habitatores Hai.

27. केवल पशुओं और उस नगर की लूट को इस्राएल ने यहोवा के उस वचन के अनुसार, जो उसने यहोशू को आज्ञा देकर कहा था, अपने लिए ले लिया।

27. Tantum animalia et spolia urbis ejus sibi praedati sunt filii Israel secundum sermonem Jehovae, quem praeceperat ipsi Josue.

28. तब यहोशू ने ऐ को जला दिया, और उसे सदा के लिए ढेर बना दिया; वह आज तक उजाड़ पड़ा है।

28. Succendit igitur Josue Hai et posuit eam acervum sempiternum vastitatum usque ad hunc diem.

29. और ऐ के राजा को उसने साँझ तक वृक्ष पर लटका रखा; और ज्योंही सूर्य डूबा, यहोशू ने आज्ञा दी कि उसकी लोथ वृक्ष पर से उतारकर नगर के फाटक के प्रवेश-स्थान पर डाल दी जाए, और उस पर पत्थरों का एक बड़ा ढेर लगा दिया जो आज तक बना है।

29. Regem vero Hai suspendit in ligno usque ad tempus vespertinum: cumque occubuisset sol, praecepit Josue, et deposuerunt cadaver ejus e ligno, et projecerunt illud ad introitum portae urbis, et statuerunt super illud acervum lapidum grandem usque ad hunc diem.

1. “तब यहोवा ने यहोशू से कहा” इत्यादि। यहोशू के लिए, और लोगों के लिए भी, यह बड़े महत्त्व की बात थी कि उनमें नया साहस भरा जाए, जिससे वे भरोसे के साथ ऐ नगर पर धावा बोलने की तैयारी करें, जहाँ से वे हाल ही में हानि और उससे भी बढ़कर अपमान के साथ पीछे हटा दिए गए थे। इसलिए परमेश्वर, इस अभियान में उन्हें निर्भय बनाने के लिए, प्रतिज्ञा करता है कि वह नगर उन्हें दे देगा। इसी उद्देश्य से वह उन्हें आज्ञा देता है कि वे खुले युद्ध की अपेक्षा युक्ति से अधिक लड़ें, शत्रु को बाहर फुसलाएँ, और घात के लिए एक गुप्त स्थान चुनें जो उन्हें अचानक आ घेरे। थोड़े से हज़ार लोग तो उस विशाल सेना के द्वारा, जो अचानक और अनपेक्षित रूप से नगर पर टूट पड़ती, बिना किसी कठिनाई के पराजित किए जा सकते थे। परन्तु जैसा हम पहले देख चुके हैं कि सबके हृदय पिघल गए थे, इसलिए परमेश्वर ने उनकी दुर्बलता का ध्यान रखा, और उन पर उनकी सामर्थ्य से अधिक बोझ नहीं डाला, जब तक कि वे अपने अत्यधिक आतंक से उबरकर तत्परता के साथ उसकी आज्ञाओं का पालन करने योग्य न हो जाएँ।

यह तो सच है कि अब उसने उनके अपने परिश्रम को काम में लिया, कुछ तो इसलिए कि वे सदा आश्चर्यकर्मों की ही बाट जोहते हुए आलस्य के वश में न हो जाएँ, और कुछ इसलिए कि कार्य करने की भिन्न-भिन्न और असमान रीतियों में भी वे पहचान लें कि उसकी सामर्थ्य एक ही है। परन्तु इस विशेष कारण को छोड़ न देने की सावधानी रखनी चाहिए, अर्थात् यह कि वे अब तक अपने भय से उबरे नहीं थे, इसलिए यदि वे युक्ति को सहायक साधन के रूप में काम में लाया जाता न देखते, तो उन्हें खुले संघर्ष में उतरने के लिए कठिनाई से ही राज़ी किया जा सकता था। तौभी प्रथम स्थान उस प्रतिज्ञा का है, “मत डर, क्योंकि मैंने उसे तेरे हाथ में कर दिया है”; क्योंकि यद्यपि शब्दों में वह यहोशू को सम्बोधित है, तौभी वह सारी प्रजा पर समान रूप से लागू होती है, क्योंकि यह अत्यन्त आवश्यक था कि एक-एक जन चिन्ता से मुक्त हो और नए भरोसे से सुसज्जित किया जाए। नगर को यरीहो के समान जला देने की आज्ञा लोगों की भावना के प्रति एक रियायत प्रतीत होती है, क्योंकि इस प्रकार लिया गया प्रतिशोध उनके अपमान की स्मृति को मिटा देता। साथ ही, जिससे वे इस अभियान में अधिक स्वेच्छा से लगें, लूट विजय के पुरस्कार के रूप में उन्हीं के लिए छोड़ दी गई है।

13. “यहोशू उसी रात गया” इत्यादि। यह सम्भव नहीं कि छावनी में से सब के सब बुलाए गए हों, वरन् सेना उन लोगों से बनी थी जो युद्ध के अधिक अभ्यस्त थे। वह पर्याप्त बड़ी थी, यह इस तथ्य से प्रकट है कि उसमें से पाँच हज़ार घात के लिए अलग किए गए। पहले तो पैंतीस हज़ार गिने जाते प्रतीत होते हैं, परन्तु प्रसंग से स्पष्ट है कि संख्या इतनी बड़ी न थी। मेरा झुकाव इसी अनुमान की ओर अधिक है कि तीस हज़ार खुली लड़ाई के लिए बाहर ले जाए गए, और पाँच हज़ार विशेष रूप से घात के लिए अलग रखे गए। यहोशू उसे सौंपे गए कार्य को पूरा करने में फुर्ती करता है, और भोर ही को कूच आरम्भ कर देता है; और इस फुर्ती में हम देखते हैं कि वह प्रतिज्ञा कितनी प्रभावशाली सिद्ध हुई थी। यदि सबके मन भय से मुक्त न किए गए होते, तो वह उन्हें आज्ञा मानने के लिए इतना तत्पर कभी न पाता।

ऊपर से देखने पर तो इतनी बड़ी टुकड़ी को छिपे मार्गों से घात के योग्य स्थान तक भेजने में थोड़ी ही बुद्धिमानी दिखाई देती है। क्योंकि वे चाहे कितनी ही चुप्पी और शान्ति से क्यों न चलें, केवल उनके पाँवों की आहट से ही काफ़ी शोर हुआ होगा। यदि कोई कहे कि उनसे मिलनेवाला कोई न था, क्योंकि उस प्रदेश के सब निवासी खेतों को छोड़कर नगर में शरण ले चुके थे, तो हम थोड़ा आगे चलकर यह उल्लेख पाएँगे कि इस्राएलियों के नगर के निकट आने से पहले ही ऐ के राजा को उनके आगमन का पता चल गया था; और यह भेदियों के बिना कठिनाई से ही हो सकता था। परन्तु यह मान भी लें कि खेतों में उन्हें कोई न मिला, तौभी रात के समय वहाँ से होकर निकलना, घात के लिए उपयुक्त स्थान चुनना, और अपनी उपस्थिति का कोई चिह्न दिए बिना उस पर अधिकार कर लेना, निश्चय ही कठिन काम था। जहाँ तक यहोशू की कार्य-विधि का सम्बन्ध है, यद्यपि वह देख सकता था कि यह कार्य छोटी सेना से भी पूरा हो सकता है, तौभी ऐसा प्रतीत होता है कि लोगों की हाल की घबराहट के कारण वह इस बात में बहुत सावधान रहने को विवश हुआ कि उन्हें किसी जोखिम-भरे कार्य में न लगाए। क्योंकि यदि सेना में से थोड़े ही लोग भेजे जाते, तो सम्भवतः वे उस भूमिका से इनकार कर देते जिसमें उन्हें विशेष रूप से संकट में पड़ना था।

इस बीच प्रभु अपनी प्रजा के प्रति अत्यन्त सहनशीलता दिखाता है, क्योंकि वह ऐसे शत्रु को उनके हाथ में सौंप देता है जिस पर इतनी सरलता से विजय पाई जानी थी। उसका अद्भुत अनुग्रह विशेष रूप से इसमें प्रकट होता है कि उसने उन सबको अन्धा कर दिया, यहाँ तक कि उन्हें घात का कोई सन्देह ही न हुआ। मुझे कोई सन्देह नहीं कि जब यह कहा गया है कि वह इसे नहीं जानता था, तो इतिहास-लेखक का अभिप्राय परमेश्वर की उस दुर्लभ और असाधारण कृपा की ओर ध्यान दिलाना है, जिससे उसने मानो अपने हाथ की छाया से ढाँपकर, पहले उन तीस हज़ार को जो यहोशू के साथ थे, और फिर उन पाँच हज़ार को, ऐसा छिपाए रखा कि वे सब के सब शत्रु की दृष्टि से बचे रहे। जब अब पाँच हज़ार का उल्लेख किया जाता है, तो मैं इसका यह अर्थ नहीं समझता कि यहोशू ने एक नई घात तैयार की, मानो पहले से ही अत्यधिक संख्या पर्याप्त न थी; वरन् लेखक अब केवल यह दिखाता है कि जिन पैंतीस हज़ार को यहोशू ने शस्त्रबद्ध किया था, वे किस प्रकार बाँटे गए। क्योंकि इतनी बड़ी भीड़ को इतनी छोटी अतिरिक्त सहायता किस प्रयोजन से दी जाती? इसके अतिरिक्त, जिस स्थान पर उन्हें ठहरने की आज्ञा दी गई है, वह वही है जो पहले बताया गया था; यह बात सेना की दो अलग-अलग टुकड़ियों पर लागू नहीं हो सकती।

15. “तब यहोशू और सब इस्राएली मानो हार खाकर” इत्यादि। यह एक दूसरी युक्ति है। भागने का बहाना करके वे शत्रु को दूर खींच ले जाते हैं, और फिर उनके लिए नगर में लौटने का कोई मार्ग नहीं छोड़ते, जो उनके इस सन्देह से पहले ही कि पीछे से कोई विपत्ति आनेवाली है, आग की लपटों में घिर चुका था। इसलिए जब ऐ का राजा इस्राएलियों का पराजितों के समान पीछा करता है, तब सेना के उस भाग को, जो बेतेल की ओर छिपा था, नगर ले लेने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है, और निवासियों के लिए यह समझने में बहुत देर हो जाती है कि उनका पूर्ण विनाश हो चुका है। क्योंकि जब वे पहले ही पीछे धकेल दिए गए थे और हर ओर मारे जा रहे थे, तब नगर की लपटें देखकर वे निराशा से अभिभूत हो गए, और ऐसे पूर्ण रूप से घेर लिए गए कि एक भी व्यक्ति बच न सका।

यहाँ कुछ लोग जो यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या छल और युक्ति से शत्रु पर विजय पाना उचित है, वह घोर अज्ञान से उत्पन्न होता है। पहली बात, यह निश्चित है कि युद्ध केवल प्रहार करने से ही नहीं लड़े जाते; क्योंकि वे ही सर्वश्रेष्ठ सेनापति माने जाते हैं जो केवल बल-प्रयोग की अपेक्षा कौशल और परामर्श से अधिक सिद्ध करते हैं; और दूसरी बात, जो जितने अधिक समय तक सेवा करके अनुभव प्राप्त करता है, वह उतना ही अच्छा सैनिक बनता है। अतः यदि युद्ध उचित है, तो यह सब विवाद से परे है कि विजय पाने की प्रचलित रीतियाँ भी उचित रूप से काम में लाई जा सकती हैं, बशर्ते कि युद्ध-विराम के द्वारा या किसी अन्य रीति से एक बार दिए गए वचन का कभी उल्लंघन न हो।

17. “और न ऐ में कोई पुरुष रह गया” इत्यादि। प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाएगा कि कुछ लोग नगर में पकड़े गए और मारे गए, और इसलिए हमें यह मानना चाहिए कि नगर से बाहर धावा सब के सब ने नहीं किया था, और बूढ़े पुरुष, स्त्रियाँ और युद्ध के अयोग्य बहुत से अन्य लोग खेतों में नहीं दौड़ पड़े थे; अर्थ केवल इतना है कि नगर की रक्षा के लिए कोई रक्षक-दल नहीं छोड़ा गया। यही बात बेतेल के विषय में भी कही गई है, और इससे हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि बेतेल, एक छोटा और महत्त्वहीन नगर होने के कारण, किसी दूसरी सत्ता के अधीन था। तौभी उसके निवासियों ने, अपने नगर की रक्षा करने में असमर्थ होने के कारण, उसे छोड़ दिया, और अपनी सारी सेना ऐ के राजा को सौंप दी, जिसके वे सम्भवतः करदाता थे। यह अनिश्चित है कि वे इस्राएलियों के आगमन से पहले ही ऐ के राजा के पास चले गए थे, ताकि संघर्ष में अपनी सेना उसकी सेना से मिला दें; परन्तु अधिक सम्भावना यही है कि प्रतिरोध करने में असमर्थ होने के कारण वे समझौते के अनुसार एक गढ़वाले और अधिक जनसंख्यावाले नगर में आ गए थे। उन्होंने सोचा कि जब तक वे अपने से बढ़कर एक पड़ोसी नगर की छाया में सुरक्षित न रहें, तब तक किसी प्रकार सुरक्षित नहीं रह सकते।

18. “तब यहोवा ने यहोशू से कहा” इत्यादि। यह अंश दिखाता है कि चाहे नगर की दृढ़ किलेबन्दी के कारण, चाहे उसके निवासियों की वीरता के कारण, चाहे इस्राएलियों की घबराहट के कारण, विजय कठिन थी, क्योंकि परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह स्वयं एक बर्छे के उठाए जाने के द्वारा उसे ले लेगा। यदि सफलता निःसन्देह होती, तो यह चिह्न अनावश्यक होता; अतः उनके मन चिन्तित और व्याकुल रहे होंगे, क्योंकि प्रभु, उन्हें मूर्छित होने से बचाने के लिए, यहोशू के हाथ में भरोसे का एक झण्डा खड़ा करता है। यह तो सच है कि थोड़ा आगे चलकर बर्छा उठाने का एक भिन्न कारण बताया गया है, जब यह कहा जाता है कि इस प्रकार घात में बैठे हुओं को संकेत दिया गया, और तदनुसार वे झपटकर निकल पड़े। परन्तु यदि वह सचमुच संकेत के रूप में ही काम में लाया गया, तो बर्छे को परमेश्वर की उस विजयी सामर्थ्य का प्रदर्शन मानना, जो हर सन्देह को दूर कर देती है, कठिनाई से ही उचित होगा। तौभी, क्योंकि स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा गया कि वह बर्छा ही वह कारण था जिससे घात में बैठाए गए सैनिक बाहर निकले, इसलिए सच्चाई यह हो सकती है कि वे अपनी ही इच्छा से निकले, चाहे इसलिए कि वह उपयुक्त समय था, चाहे इसलिए कि जयजयकार और कोलाहल से उन्हें पता चल गया कि युद्ध वास्तव में आरम्भ हो चुका है। क्योंकि जब हम बीच की लम्बी दूरी पर विचार करते हैं, और विशेषकर इस पर कि यहोशू एक तराई में खड़ा था, तो यह विश्वास करना कठिन ही है कि उन्होंने वह बर्छा देखा होगा। इसके अतिरिक्त, यदि हम यह मानें कि बर्छे का उठाया जाना, यद्यपि किसी भिन्न प्रयोजन के लिए था, तौभी उसका यह प्रभाव भी हुआ कि उनमें अतिरिक्त साहस भर गया, तो इसमें कोई असंगति न होगी।

इतना तो निश्चित माना जाना चाहिए: पहला, कि इस गम्भीर चिह्न के द्वारा उन्हें युद्ध के सुखद परिणाम का और भी पक्का निश्चय कराया गया; और दूसरा, कि यहोशू का परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार अपनी सेना को उत्साहित करने के सिवा और कोई अभिप्राय न था। क्योंकि अन्त में यह जोड़ा गया है कि यहोशू ने अपना हाथ तब तक पीछे न खींचा जब तक कि नगर ले न लिया गया, शत्रु हर ओर नष्ट न कर दिया गया, और स्वयं युद्ध समाप्त न हो गया। इससे प्रकट है कि उसने संघर्ष के बीच में उसे विजय-चिह्न के रूप में दिखाया, जिससे इस्राएलियों को सफलता के विषय में कोई सन्देह न रहे। क्योंकि यद्यपि उसने उन्हें युद्ध में उतरने और वीरता से अपने शस्त्र चलाने की आज्ञा दी, तौभी उसने साथ ही स्पष्ट घोषणा कर दी कि वे पहले ही विजय पा चुके हैं।

एक ही बात के दो बार कहे जाने से युद्ध का क्रम कुछ अस्पष्ट हो गया है, परन्तु उसका सार पर्याप्त स्पष्ट है। इस्राएली भय का बहाना करते हुए पीछे हटे, और युद्ध वास्तव में आरम्भ भी न हुआ था कि ऐ के निवासियों के लिए लौटकर अपने नगर की रक्षा करने का मार्ग बन्द हो गया। जब दोनों सेनाएँ आमने-सामने भिड़ गईं, तब घात में बैठे हुए उठे और ऐसी फुर्ती की कि जब शत्रु ने पीठ फेरी, तब तक नगर से अग्निकाण्ड की लपटें उठ रही थीं। इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि नगर इस्राएलियों के अधिकार में था, परन्तु मुख्य संहार तब हुआ जब नगर में के लोग युद्ध में भाग लेने को बाहर निकले, क्योंकि निवासी, जो चारों ओर से घिर गए थे, प्रतिरोध और पलायन दोनों को समान रूप से व्यर्थ पाते थे। इस प्रकार वे निराशा से ग्रस्त हो गए, और एक संकरे स्थान में ठसाठस भरे हुए हर ओर काट डाले गए।

यह कथन कि जो लोग भागने का बहाना कर रहे थे उनके लौटने से पहले नगर में संहार नहीं हुआ, मैं इसका यह अर्थ समझता हूँ कि सारी सेनाओं ने अपनी शक्ति मिलाकर भीतर धावा किया, लूट पर अधिकार किया, और जो कोई बचे रह गए हों उन सबको मार डाला। यदि कोई यह आपत्ति करे कि युद्ध चलते समय ही नगर जला दिया गया था, तो मेरा उत्तर यह है कि आग तो इसलिए लगाई गई थी कि दोनों सेनाओं को पता चल जाए कि नगर इस्राएलियों के अधिकार में है, परन्तु वह वास्तव में आग से नष्ट नहीं किया गया था। क्षण भर में लूट को पकड़कर ले जाना, वरन् पात्रों और सम्पत्ति के बड़े भाग को शहरपनाह के बाहर लाना सम्भव न था; और जिस लूट को परमेश्वर ने दे दिया था, उसे जान-बूझकर नष्ट कर देना मूर्खता होती। अतः हम देखते हैं कि पहली आग सारे नगर को नष्ट करने के प्रयोजन से नहीं लगाई गई थी, वरन् वह केवल आंशिक अग्निकाण्ड था जो उसके ले लिए जाने की सूचना देता था, और यह कि इस्राएली बिना रक्तपात या संघर्ष के खुले फाटकों से भीतर घुसे। इसकी पुष्टि थोड़ा आगे होती है, जब जलाने का कार्य स्वयं यहोशू के नाम लिखा जाता है, न केवल इसलिए कि वह उसकी आज्ञा से जलाया गया, वरन् इसलिए भी कि युद्ध से लौटने के बाद उसने ध्यान रखा कि वह पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया जाए; क्योंकि तुरन्त ही यह जोड़ा गया है कि उसने उसे पत्थरों का ढेर बना दिया, ताकि वह सदा का उजाड़ बना रहे।

25. “और उस दिन जितने मारे गए” इत्यादि। अर्थ यह नहीं कि सब मारे गए लोग ऐ के ही निवासी थे, वरन् यह कि जितने उसमें रहते थे वे सब मारे गए, एक भी न बचा। हम पहले ही देख चुके हैं कि बेतेल के निवासी भी उनके साथ मिले हुए थे; और क्योंकि उस नगर का आगे फिर कोई उल्लेख नहीं होता, इसलिए कुछ सम्भावना के साथ यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने नगर को, जो बहुत कम किलेबन्द था, छोड़ दिया था, और अधिक सुरक्षा के लिए ऐसे नगर में चले गए थे जिसके विषय में उन्हें आशा थी कि उसकी रक्षा सहज ही की जा सकेगी। अतः इन शब्दों का अर्थ केवल इतना है कि जितने नगर से बाहर निकले थे और जितने उसमें पाए गए, वे सब के सब एक-एक करके मारे गए। यदि कुछ लोग यह मानने की ओर अधिक झुकें कि शहरपनाह के भीतर मारे गए लोगों की यह संख्या केवल बूढ़ों, रोगियों, स्त्रियों और बालकों तक सीमित है, तो मैं इस विषय पर विवाद नहीं करूँगा। तौभी, यदि हम विचार करें कि एक छोटा-सा कस्बा ही एक ऐसे नगर से जुड़ा था जो न बहुत विस्तृत था न बहुत जनसंख्यावाला, तो अधिक सम्भावना यही है कि इस संख्या में वे लोग भी सम्मिलित हैं जो युद्ध में गिरे।

ऐ और प्रतीत होता है उसका करदाता नगर बेतेल, जो इस प्रकार भयानक विनाश के अधीन किए गए, यरूशलेम से लगभग बारह मील उत्तर में, और यरीहो से सत्रह मील पश्चिम-उत्तरपश्चिम में स्थित थे, और इससे पहले बहुत भिन्न परिस्थितियों में इस्राएलियों के ध्यान में लाए जा चुके थे। क्योंकि उन्होंने मूसा के रोचक वृत्तान्त में पढ़ा था कि अब्राहम ने किस प्रकार एक पहाड़ पर अपना तम्बू खड़ा किया, “जिसकी पश्चिम ओर बेतेल और पूर्व ओर ऐ था; और वहाँ उसने यहोवा के लिए एक वेदी बनाई, और यहोवा से प्रार्थना की,” (उत्पत्ति 12:8; उत्पत्ति 13:3;) और किस प्रकार बेतेल ने, जो पहले लूज कहलाता था, अपना नाम बदल लिया, क्योंकि याकूब ने अपने अद्भुत स्वप्न से जागकर घोषणा की थी कि यह “परमेश्वर के भवन को छोड़ और कुछ नहीं” और “स्वर्ग का फाटक” है। (उत्पत्ति 28:11-19.) ऐ पर सुनाए गए और पूरे किए गए दण्ड के होते हुए भी, ऐसा प्रतीत होता है कि वह फिर से बसाया गया, बँधुआई से लौटने के बाद बिन्यामीनियों ने उसमें निवास किया, (नहेम्याह 7:32; नहेम्याह 11:31; एज्रा 2:28,) योसेफुस ने Aina नाम से उसका उल्लेख किया है, और आज भी उसके स्थान के कुछ चिह्न दिखाई देते हैं। — सं.

26. “क्योंकि यहोशू ने अपना हाथ पीछे न खींचा” इत्यादि। जैसे बर्छा उठाकर उसने मानो स्वर्ग से आशा का चिह्न और बयाना दिया था, वैसे ही वह अपने अनुयायियों के मन उस पर तब तक लगाए रखने से नहीं रुका जब तक कि वे नगर के स्वामी न हो गए। इस प्रकार दृढ़ बने रहकर उसने भली-भाँति प्रमाणित कर दिया कि वह महत्त्वाकांक्षा से कितना दूर था, और व्यर्थ आडम्बर के लिए कुछ भी करने से कितना मुक्त था। क्योंकि यह ठीक ऐसा था मानो उसने अगुवे का पद त्याग दिया हो, और विजय की सारी प्रशंसा परमेश्वर को सौंप दी हो। वह कितना निर्भीक योद्धा था, यह अन्य अंशों से स्पष्ट है। वह अब भी स्वेच्छा से अपने सैनिक कर्तव्य निभा सकता था, और इस प्रकार वह कर सकता था जो उसकी ख्याति और महिमा बढ़ाने के लिए कहीं अधिक उपयुक्त होता। परन्तु मानो उसका हाथ बर्छे से बाँध दिया गया हो, वह सैनिकों को केवल परमेश्वर की ओर देखने का उपदेश देता है, जिसे वह युद्ध की सफलता सौंप देता है। इस प्रकार अलग खड़े रहकर उसने उससे अधिक लाभ पहुँचाया, जितना वह तब पहुँचाता यदि वह चारों ओर अपने ही हाथ से शत्रुओं के ढेर के ढेर गिरा देता; साथ ही उसका स्थिर बने रहना किसी भी मात्रा की फुर्ती से अधिक प्रशंसनीय था।

29. “और ऐ के राजा को उसने लटका दिया” इत्यादि। यद्यपि ऐसा प्रतीत होता है कि उसने लोगों की घृणा को सन्तुष्ट करने के लिए राजा के साथ बड़ी कठोरता का व्यवहार किया, तौभी मुझे कोई सन्देह नहीं कि उसने निष्ठापूर्वक ईश्वरीय न्याय को पूरा करने का यत्न किया। विजेता तो प्रायः बन्दी राजाओं को छोड़ देते हैं, क्योंकि उनका पद अपने साथ कुछ आदरणीय-सा लिए प्रतीत होता है; परन्तु उन जातियों में राजाओं की दशा भिन्न थी, जिनमें परमेश्वर विशेष रूप से यह दिखाना चाहता था कि वह उस दुष्टता से कितनी घृणा करता है जिसे उसने इतने लम्बे समय तक सहा था। क्योंकि जब सब के सब विनाश के लिए ठहराए गए थे, तब ईश्वरीय प्रतिशोध ने उचित ही उन अगुवों पर अधिक कठोरता और कड़ाई से अपने आप को प्रकट किया, जिनसे विनाश का कारण उत्पन्न हुआ था।

हम यह भी जोड़ सकते हैं कि राजा पर डाले गए अपमानजनक दण्ड ने साधारण लोगों के प्रति नरमी बरतने को और भी कम आवश्यक बना दिया, और इस प्रकार इस्राएलियों को एक असामयिक दया में पड़ने से रोका, जो उन्हें सार्वत्रिक संहार के कार्य को पूरा करने में अधिक सुस्त या असावधान बना सकती थी।

परमेश्वर ने जान-बूझकर राजा को जीवित ही यहोशू के हाथ में सौंप दिया, जिससे उसका दण्ड अधिक उल्लेखनीय हो और इस प्रकार उदाहरण के लिए अधिक उपयुक्त हो। यदि वह संघर्ष में दूसरों के साथ बिना भेद के गिर गया होता, तो वह कलंक के इस विशेष चिह्न से बच जाता; परन्तु अब उसकी मृत्यु के बाद भी ईश्वरीय प्रतिशोध उसकी लोथ का पीछा करता है। वरन् लटकाए जाने के बाद उसे उस नगर के फाटक पर फेंक दिया जाता है जहाँ वह न्याय करने के लिए अपने सिंहासन पर बैठा करता था, और भावी पीढ़ियों के लिए उसके अपमान को स्थायी बनाने के प्रयोजन से एक स्मारक खड़ा किया जाता है। तौभी उसके गाड़े जाने का उल्लेख इसलिए किया गया है कि हम जान लें कि कुछ भी उपद्रवी आवेश में नहीं किया गया, क्योंकि यहोशू ने सावधानी से उस बात का पालन किया जो मूसा ने व्यवस्था में ठहराई थी, (व्यवस्थाविवरण 21:23) अर्थात् यह कि फाँसी के खम्भों पर लटकाए गए लोग सूर्यास्त से पहले उतार लिए जाएँ, क्योंकि ऐसा दृश्य घृणित माना जाता था। और निश्चय ही, जहाँ मृतकों को भूमि में गाड़ना मानवोचित है, वहाँ उन्हें जंगली पशुओं या पक्षियों द्वारा फाड़े जाने के लिए बाहर फेंक देना अमानवीय क्रूरता है। इसलिए, कि लोग बर्बरता के अभ्यस्त न हो जाएँ, परमेश्वर ने अपराधियों को लटकाए जाने की अनुमति दी, बशर्ते कि वे एक दिन से अधिक बिना गाड़े लटके न रहें। और कि लोग इस कर्तव्य के प्रति, जिसकी अन्यथा सहज ही उपेक्षा हो सकती थी, अधिक सचेत रहें, मूसा घोषणा करता है कि जो कोई वृक्ष पर लटकाया जाता है वह शापित है; मानो वह कहता हो कि यदि वह घृणित वस्तु तुरन्त हटाई न जाए, तो उस प्रकार की मृत्यु से भूमि अशुद्ध हो जाती है।

यहोशू 8:30-35

30. तब यहोशू ने इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के लिए एबाल पर्वत पर एक वेदी बनाई,

30. Tunc aedificavit Josue altare Jehovae Deo Israel in monte Ebal,

31. जैसा यहोवा के दास मूसा ने इस्राएलियों को आज्ञा दी थी, और जैसा मूसा की व्यवस्था की पुस्तक में लिखा है, अर्थात् समूचे पत्थरों की एक वेदी, जिस पर किसी ने लोहा न उठाया था; और उस पर उन्होंने यहोवा के लिए होमबलि चढ़ाए, और मेलबलि किए।

31. Quemadmodum praeceperat Moses servus Jehovae filiis Israel: sicut scriptum est in libro legis Mosis, altare ex lapidibus integris, super quos non levaverant ferrum: et immolaverunt super illud holocausta Jehovae, et sacrificaverunt hostias prosperitatum.

32. और उसने वहाँ उन पत्थरों पर मूसा की व्यवस्था की एक प्रतिलिपि लिखी, जिसे उसने इस्राएलियों के सामने लिखा।

32. Scripsit quoque ibi in lapidibus repetitam legem Mosis, quam scripsit coram filiis Israel.

33. और सब इस्राएली, और उनके पुरनिये, और सरदार, और उनके न्यायी, यहोवा की वाचा का सन्दूक उठानेवाले लेवीय याजकों के सामने सन्दूक के इधर और उधर खड़े हुए, क्या परदेशी क्या देशी; उनमें से आधे गिरिज्जीम पर्वत के सामने, और आधे एबाल पर्वत के सामने खड़े हुए; जैसा यहोवा के दास मूसा ने पहले आज्ञा दी थी, कि वे इस्राएली प्रजा को आशीर्वाद दें।

33. Universus autem Israel, et seniores ejus, et praefecti, et Judices ejus stabant hinc et inde ad arcam coram sacerdotibus Levitis portantibus arcam foederis Jehovae, tam peregrinus quam indigena: dimidia pars ejus contra montem Garizin, et dimidia pars ejus contra montem Ebal: quemadmodum praeceperat Moses servus Jehovae, ut benediceret populo Israel primum.

34. और उसके बाद उसने व्यवस्था के सारे वचन, अर्थात् आशीष और शाप, उस सब के अनुसार जो व्यवस्था की पुस्तक में लिखा है, पढ़कर सुनाए।

34. Et post haec legit omnia verba legis, benedictionem et maledictionem, secundum id totum quod scriptum est in libro legis.

35. जितनी बातों की मूसा ने आज्ञा दी थी, उनमें से कोई ऐसा वचन न रहा जिसे यहोशू ने इस्राएल की सारी सभा के सामने, और स्त्रियों, और बालबच्चों, और उनके बीच रहनेवाले परदेशियों के सामने पढ़कर न सुनाया हो।

35. Non fuit quidquam ex omnibus quae praeceperat Moses quod non legerit Josue coram universo coetu Israel, et mulieribus, et parvulis, et peregrinis versantibus in medio ipsorum.

30. “तब यहोशू ने एक वेदी बनाई” इत्यादि। परमेश्वर को यह भाया था कि कनान देश में उसके लिए चढ़ाया जानेवाला यह पहला असाधारण बलिदान हो, जिससे इस प्रकार लोग अपनी कृतज्ञता प्रकट करें, और देश विधिवत् रीति से पवित्र किया जाने लगे। जब तक वे किसी खाली प्रदेश पर अधिकार न कर लेते, तब तक लोगों के लिए यह सम्भव न था कि इससे पहले स्वतन्त्रता से और अपनी ही भूमि पर ऐसा करें। अब, परमेश्वर ने उन्हें साथ ही दो आज्ञाएँ दी थीं — पहली, कि वे एबाल पर्वत पर एक वेदी खड़ी करें; और दूसरी, कि वे चूने से पुते हुए दो पत्थर खड़े करें, जिन पर वे व्यवस्था लिखें, जिससे हर आने-जानेवाला उसे देख और पढ़ सके। अब हम पढ़ते हैं कि दोनों आज्ञाएँ निष्ठापूर्वक पूरी की गईं।

29वाँ पद ऐ के विनाश का वृत्तान्त समाप्त करता है, और 30वाँ पद अचानक एबाल पर्वत पर वेदी बनाने से आरम्भ होता है। दोनों स्थानों के बीच की दूरी बीस मील से कम नहीं है, क्योंकि ऐ यरूशलेम से केवल बारह मील और एबाल तीस मील उत्तर में है। इस्राएलियों के सारे समुदाय द्वारा इतने मीलों की यात्रा, और वह भी ऐसे देश में से होकर जो कम से कम ऐ की विजय तक शत्रु के निर्विवाद अधिकार में था, अवश्य ही काफ़ी समय लेनेवाली रही होगी, और बड़े परिश्रम और कठिनाई से पूरी हुई होगी। यह कैसे हुआ कि उसके विषय में एक भी शब्द नहीं कहा गया, और हमें ऐ से सीधे एबाल ले जाया जाता है, मानो दोनों स्थान एक-दूसरे से बहुत दूर होने के बदले वास्तव में सटे हुए हों? क्या यात्रा की घटनाएँ इतनी महत्त्वहीन थीं कि उनका तनिक भी उल्लेख आवश्यक न था? या क्या यहोशू की पुस्तक में दिया गया वृत्तान्त इतना संक्षिप्त है कि ऐसी घटनाएँ भी, जो किसी अधिक विस्तृत ग्रन्थ में बड़ा स्थान ले सकती थीं, जान-बूझकर उससे निकाल दी गई हैं? यदि इन दोनों प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है, और ऐसा प्रतीत होता है कि उनका उत्तर नकारात्मक ही होना चाहिए, तो एक ही प्रश्न शेष रहता है: क्या समय के क्रम का पालन किया गया है? दूसरे शब्दों में, क्या उस रोचक वृत्तान्त में, जो अब इतिहास में दर्ज सबसे अद्भुत राष्ट्रीय सभाओं में से एक के विषय में दिया जानेवाला है, हमारे सामने वृत्तान्त के पूर्व-कथन का एक और उदाहरण नहीं है, वैसा ही जैसा हम पहले अध्याय में देख चुके हैं? यदि ऐसा मान लिया जाए, तो वृत्तान्त का क्रम नौवें अध्याय में खोजा जाना चाहिए, और एबाल और गिरिज्जीम पर्वतों पर हुई घटना के वृत्तान्त को एक उपकथा के रूप में देखा जाना चाहिए। यह अत्यन्त उल्लेखनीय है कि सेप्टुआजिंट में यह सारी उपकथा इस स्थान पर छोड़ दी गई है, और नौवें अध्याय के आरम्भ में दिए गए एमोरियों की सन्धि के वृत्तान्त के बाद ही प्रस्तुत की गई है। — सं.

तीसरी आज्ञा आशीष और शाप के पाठ से सम्बन्धित थी: इसे भी यहोशू ने कुछ कम सावधानी से नहीं पूरा किया।

वेदी से आरम्भ करें, — कहा गया है कि वह ईश्वरीय आज्ञा के अनुसार बिना गढ़े पत्थरों से बनाई गई। क्योंकि ऐसे समूचे पत्थर, जिन पर राजमिस्त्रियों का लोहा नहीं चलाया गया, खुरदरे और अनगढ़ कहलाते हैं। यह बात व्यवस्थाविवरण 27 में विशेष रूप से उस वेदी के विषय में कही गई है जिसका अब उल्लेख हो रहा है। परन्तु यही बात पहले सामान्य रूप से अन्य सब वेदियों के विषय में भी कही जा चुकी थी। कुछ व्याख्याकार, कारण खोजते हुए, अनावश्यक रूप से रूपक का सहारा लेते हैं, और कहते हैं कि मनुष्यों का हाथ और परिश्रम इसलिए वर्जित किया गया है कि ज्योंही हम अपनी कोई युक्ति भीतर लाते हैं, परमेश्वर की आराधना दूषित हो जाती है। यह बात सचमुच सच्चाई और बुद्धिमानी से कही गई है, परन्तु यहाँ अप्रासंगिक है, क्योंकि ईश्वरीय अभिप्राय केवल वेदियों के स्थायी होने का निषेध करना था। क्योंकि हम जानते हैं कि विधिपूर्वक बलिदान चढ़ाने के लिए यह आज्ञा दी गई थी कि सबकी एक ही सामान्य वेदी हो, जिससे आपसी एकता बनी रहे और किसी बाहरी अन्धविश्वास के प्रवेश से भ्रष्टता के सब स्रोत रोके जाएँ; संक्षेप में, जिससे धर्म एक और सरल बना रहे, क्योंकि वेदियों की विविधता शीघ्र ही फूट उत्पन्न कर देती, और इस प्रकार लोगों को बाँटकर सच्ची भक्ति को भगा देती।

फिर, स्थान चुनना लोगों की इच्छा पर नहीं छोड़ा गया था, वरन् परमेश्वर मूसा की पुस्तकों में निरन्तर इस अधिकार को अपने लिए रखता है। इसलिए वह भक्ति के अभ्यासों को उसी स्थान तक सीमित करता है जहाँ वह अपने नाम का स्मरण रखे। इसके अतिरिक्त, क्योंकि ईश्वरीय इच्छा तुरन्त प्रकट नहीं की गई थी, और न स्थान ठहराया गया था, इसलिए कि इस बीच आराधना बन्द न हो जाए, यह अनुमति दी गई कि जहाँ कहीं सन्दूक ठहरे वहाँ एक वेदी बनाई जाए; परन्तु ऐसी वेदी जो केवल पत्थरों के अनगढ़ ढेर से या मिट्टी के ढेले से बनी हो, जिससे वह केवल अस्थायी रहे।

पाठक ध्यान दे कि लोगों को यह विकल्प दिया गया था कि वे उसे अनगढ़ पत्थरों से बनाएँ, जिससे उसका रूप श्रद्धा को आकर्षित न करे, या मिट्टी से, जो अपने आप भुरभुराकर बिखर जाती। एक शब्द में, यह व्यवस्था उस स्थायी वेदी को श्रेष्ठता प्रदान करने की ओर ले जाती थी, जब परमेश्वर ने उसके स्थान के लिए सिय्योन पर्वत को चुन लिया। इसीलिए भजन में कहा गया है, “मैं आनन्दित हुआ… हे यरूशलेम, हमारे पाँव तेरे आँगनों में खड़े रहेंगे!” (भजन संहिता 122:1, 2) जिसे अन्य अनुवादक मेलबलि कहते हैं, उसका अनुवाद मैंने अकारण नहीं, “समृद्धि के बलिदान” किया है, क्योंकि वे या तो सफल परिणामों की याचना करने के लिए, या धन्यवाद देने के लिए चढ़ाए जाते थे; और इब्रानी शब्द इसके अनुपयुक्त नहीं है, जैसा कि पाठक मूसा की पुस्तकों पर मेरी टीकाओं में अधिक विस्तार से समझाया हुआ पाएगा।

फ्रांसीसी में, "Car quand il est parle de pierres entrieres sur lesquelles le fur n'avoit point passe, cela signifie des pierres, telles qu'elles viennent de la carriere, qui ne sont point polies ni accoustrees par artifice;" “क्योंकि जब ऐसे समूचे पत्थरों का उल्लेख किया जाता है जिन पर कोई औज़ार नहीं चला, तो उसका अर्थ ऐसे पत्थर हैं जैसे वे खदान से निकलते हैं, जिन्हें कारीगरी से न चिकना किया गया है न गढ़ा गया है।” — सं.

32. “और उसने वहाँ उन पत्थरों पर लिखा” इत्यादि। यहाँ उल्लिखित पत्थरों पर एक भिन्न नियम लागू होता है, जिन पर परमेश्वर चाहता था कि उसकी व्यवस्था का स्मारक सदा दिखाई देता रहे, जिससे मिस्र के अन्धविश्वासों से शुद्ध धर्म की रक्षा के लिए मानो एक प्रकार का बाड़ा खड़ा कर दिया जाए। इसलिए उन पर चूना पोता गया, जिससे वे अधिक सुस्पष्ट दिखाई दें और उन पर का लेख अधिक साफ़ हो। मैं उन लोगों की राय से सहर्ष सहमत हूँ जो “दोहराई गई व्यवस्था” से एक लिखित प्रति, या जिसे साधारणतः नकल या प्रतिलिपि कहते हैं, समझते हैं। तौभी मैं यह विश्वास नहीं कर सकता कि उस पर पूरा ग्रन्थ अंकित किया गया; क्योंकि कोई भी पत्थर, चाहे कितने ही बड़े क्यों न हों, सारे विवरणों को समाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते थे। इसलिए मैं समझता हूँ कि “व्यवस्था” शब्द से केवल उसका सार और उसकी विधियाँ अभिप्रेत हैं। इससे देश में प्रवेश करनेवाले परदेशियों के लिए भी यह प्रत्यक्ष हो गया कि उसमें किस परमेश्वर की आराधना होती है, और जब व्यवस्था किसी पुस्तक में सँजोकर नहीं रखी गई, वरन् सबकी आँखों के सामने प्रकट कर दी गई, तब भूल का हर बहाना छिन गया। संक्षेप में, चाहे याजक गूँगे ही क्यों न रहे हों, पत्थर स्वयं स्पष्ट रूप से बोलते थे।

33. “और सब इस्राएली, और उनके पुरनिये” इत्यादि। आज्ञाकारिता का तीसरा उदाहरण यह था कि सब गोत्रों को गिरिज्जीम पर्वत और एबाल पर्वत पर छह-छह की पंक्तियों में एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ा किया गया। क्योंकि वे इस प्रकार व्यवस्थित किए गए कि छह एबाल पर्वत पर खड़े हुए, और उतने ही सामनेवाले गिरिज्जीम पर्वत पर। बीच का स्थान वाचा के सन्दूक के साथ लेवियों से भरा था, जिससे प्रभु चारों ओर से अपनी ही प्रजा से घिरा रहे। कहा गया है कि यहोशू इसलिए खड़ा हुआ कि वह पहले लोगों को आशीर्वाद दे, क्योंकि परमेश्वर का अभिप्राय यह था कि वह मधुरता और मनमोहक कृपालुता के द्वारा लोगों को अपनी ओर आकर्षित करे। क्योंकि यद्यपि मूसा, लोगों के हठ को डाँटने के लिए, केवल शापों का ही उल्लेख करता है, तौभी यह निश्चित है कि वे एक प्रकार से आनुषंगिक थे, क्योंकि वास्तविक रीति यह थी कि आशीषों को साधन बनाकर उन लोगों को आज्ञाकारिता की ओर जीता जाए जो अन्यथा हठीले सिद्ध हो सकते थे। परन्तु जब कृपापूर्ण निमन्त्रण निष्फल सिद्ध हुआ, तब शाप एक नए उपाय और औषधि के रूप में जोड़े गए।

परमेश्वर ने अपने उन सेवकों के लिए जो व्यवस्था का पालन करें, भरपूर प्रतिफल की प्रतिज्ञा की थी। दूसरी ओर, अपराधियों को डराने के लिए शाप सुनाए गए। अब हर एक को अपने ही दण्ड-निर्णय पर हस्ताक्षर करने को विवश किया जाता है, जब एक-एक वाक्य के उत्तर में “आमीन” कहा जाता है। क्योंकि इस प्रकार वे न केवल परमेश्वर के मुख से अपने आप को दोषी ठहराए जाते सुनते हैं, वरन् मानो उसके द्वारा भेजे गए दूत हों, वे स्वयं उस दण्ड की घोषणा करते हैं जो उनकी बाट जोह रहा हो। ऐसी ही घोषणा यरदन के पार मोआब के मैदान में भी की गई थी, परन्तु अब वे और भी गम्भीरता से बाँधे जाते हैं, और स्वीकार करते हैं कि किस शर्त पर उन्हें कनान देश में बसना है। इस सब को कुछ कम महत्त्व नहीं मिला कि बालकों को भी गवाहों के रूप में सम्मिलित किया गया।

फ्रांसीसी में, "Le sommaire, et les defenses et commandemens;" “सार, और निषेध और आज्ञाएँ।” — सं.

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