यहोशू की पुस्तक पर टीका · अध्याय 10

यहोशू 10

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यहोशू 10

यहोशू 10:1-14

1. जब यरूशलेम के राजा अदोनीसेदेक ने सुना कि यहोशू ने ऐ को ले लिया, और उसका सत्यानाश कर डाला है, और जैसा उसने यरीहो और उसके राजा से किया था वैसा ही ऐ और उसके राजा से भी किया है, और यह भी सुना कि गिबोन के निवासियों ने इस्राएलियों से मेल किया, और उनके बीच रहने लगे हैं;

1. Quum audisset Adoni-zedec rex Jerusalem quod cepisset Josue Hai, et eam perdidisset (quemadmodum feceret Jericho, et regi ejus, quod sic fecisset Hai et regi ejus) et quod pacem fecissent habitatores Gibeon cum Israel, et essent inter ipsos:

2. तब वे निपट डर गए, क्योंकि गिबोन बड़ा नगर वरन् राजनगर के तुल्य, और ऐ से बड़ा था, और उसके सब निवासी शूरवीर थे।

2. Tunc timuerunt valde, quod civitas magna esset Gibeon tanquam una e civitatibus regiis, quia major erat quam Hai, omnesque viri ejus fortes.

3. इसलिये यरूशलेम के राजा अदोनीसेदेक ने हेब्रोन के राजा होहाम, यर्मूत के राजा पिराम, लाकीश के राजा यापी, और एग्लोन के राजा दबीर के पास यह कहला भेजा,

3. Propterea misit Adoni-zedec rex Jerusalem ad Hoham regem Hebron et ad Piram regem Jarmuth, et ad Japhiam regem Lachis, et ad Debir regem Eglon, dicendo,

4. कि मेरे पास आकर मेरी सहायता करो, और चलो हम गिबोन को मारें; क्योंकि उसने यहोशू और इस्राएलियों से मेल कर लिया है।

4. Ascendite ad me et suppetias ferte mihi, ut percutiamus Gibeon qui pacem fecit cum Josue et filiis Israel.

5. इसलिये एमोरियों के पाँचों राजाओं ने, अर्थात् यरूशलेम, हेब्रोन, यर्मूत, लाकीश, और एग्लोन के राजाओं ने, अपनी-अपनी सारी सेना इकट्ठी करके चढ़ाई कर दी, और गिबोन के साम्हने डेरे डालकर उससे युद्ध छेड़ दिया।

5. Congregati sunt itaque, et ascenderunt quinque reges Amorrhaei, rex Jerusalem, rex Hebron, rex Jarmuth, rex Lachis, rex Eglon, ipsi et omnes exercitus eorum, et castrametati sunt juxta Gibeon, pugnaveruntque adversus eam.

6. तब गिबोन के निवासियों ने गिलगाल की छावनी में यहोशू के पास यों कहला भेजा, कि अपने दासों की ओर से तू अपना हाथ न हटाना; शीघ्र हमारे पास आकर हमें बचा ले, और हमारी सहायता कर; क्योंकि पहाड़ी देश में रहनेवाले एमोरियों के सब राजा हमारे विरुद्ध इकट्ठे हुए हैं।

6. Miserunt ergo viri Gibeon ad Josuam ad castra in Gilgal, dicendo, Ne contrahas manus tuas a servis tuis: ascende ad nos cito, et serva nos, atque auxiliare nobis: congregati enim sunt contra nos omnes reges Amorrhaei habitantes in monte.

7. तब यहोशू सारे योद्धाओं और सब शूरवीरों को संग लेकर गिलगाल से चल पड़ा।

7. Ascendit itaque Josue de Gilgal, ipse, et universus populus bellator cum eo, omnes potentes viribus.

8. और यहोवा ने यहोशू से कहा, उनसे मत डर, क्योंकि मैं ने उनको तेरे हाथ में कर दिया है; उनमें से एक पुरुष भी तेरे साम्हने टिक न सकेगा।

8. Dixit autem Jehova ad Josue, Ne timeas ab eis: in manum enim tuam tradidi eos, nec consistet quisquam ex eis in conspectu tuo.

9. तब यहोशू रातोंरात गिलगाल से जाकर एकाएक उन पर टूट पड़ा।

9. Et venit ad eos Josue repente: tota enim nocte ascendit de Gilgal.

10. तब यहोवा ने ऐसा किया कि वे इस्राएलियों से घबरा गए, और इस्राएलियों ने गिबोन के पास उनका बड़ा संहार किया, और बेथोरोन के चढ़ाव पर उनका पीछा करके अजेका और मक्केदा तक उनको मारते गए।

10. Et contrivit eos Jehova coram Israel, percussitque eos plaga magna in Gibeon, et persequutus est eos per viam ascensus Beth-horon, et percussit eos usque Azecah et usque Makedah.

11. फिर जब वे इस्राएलियों के साम्हने से भागकर बेथोरोन की उतराई पर आए, तब अजेका पहुँचने तक यहोवा ने आकाश से बड़े-बड़े पत्थर उन पर बरसाए, और वे मर गए; जो ओलों से मारे गए उनकी गिनती इस्राएलियों की तलवार से मारे हुओं से अधिक थी।

11. Dum autem fugerent a facie Israel, et essent in descensu Bethhoron, Jehova demisit super eos lapides magnos e coelo usque ad Azecah, et mortui sunt, plures mortui sunt lapidibus grandinis, quam quos interfecerunt filii Israel gladio.

12. और उस समय, अर्थात् जिस दिन यहोवा ने एमोरियों को इस्राएलियों के वश में कर दिया, उस दिन यहोशू ने यहोवा से इस्राएलियों के देखते इस प्रकार कहा, हे सूर्य, तू गिबोन पर, और हे चन्द्रमा, तू अय्यालोन की तराई के ऊपर थमा रह।

12. Tunc loquutus est Josue ad Jehovam die qua tradidit Jehova Amorrhaeum coram filiis Israel. Dixitque in oculis Israel, Sol in Gibeon expecta, et Luna in valle Ajalon.

13. और सूर्य उस समय तक थमा रहा, और चन्द्रमा उस समय तक ठहरा रहा, जब तक उस जाति के लोगों ने अपने शत्रुओं से पलटा न लिया। क्या यह बात याशार नामक पुस्तक में नहीं लिखी है? और सूर्य आकाशमण्डल के बीचोंबीच ठहरा रहा, और लगभग सारे दिन अस्त होने की उतावली न की।

13. Et expectavit Sol, et luna constitit donec ulcisceretur se gens de inimicis suis. Annon hoc scriptum est in libro Jasar? (vel, recti) Stetit ergo sol in medio coeli, nec festinavit occumbere circiter die una integra.

14. न तो उससे पहले कोई ऐसा दिन हुआ और न उसके बाद, जिसमें यहोवा ने किसी पुरुष की सुनी हो; क्योंकि यहोवा तो इस्राएल की ओर से लड़ता था।

14. Et non fuit sicut dies illa ante eam nec post eam, qua exaudivit Jehova vocem viri: Jehova enim pugnabat pro Israel.

1. जब यरूशलेम के राजा अदोनीसेदेक ने सुना, इत्यादि। जिस षड्‌यन्त्र की ओर उसने पहले संक्षेप में संकेत भर किया था, अब वह उन राजाओं के उस षड्‌यन्त्र का, जो पहाड़ों और मैदान दोनों में रहते थे, अधिक विस्तार से वर्णन करता है। क्योंकि यह बताकर कि वे भय से त्रस्त हो गए, और सम्मिलित युद्ध करने के लिये आपस में गठबन्धन कर लिया, उसने बात को अचानक तोड़ दिया था और गिबोनियों के विषय में कहने लगा था। परन्तु जो बात उसने पहले राजाओं के विषय में सामान्य रूप से कही थी, उसे अब वह केवल एक ही व्यक्ति पर लागू करता है; इसलिये नहीं कि केवल अदोनीसेदेक ही डरा था, वरन् इसलिये कि उसी ने अन्य सब को उकसाया, और इस्राएलियों के विरुद्ध युद्ध चलाने में वही मुख्य प्रवर्तक और अगुआ था। यह बात क्रिया के बहुवचन से पर्याप्त रूप से प्रकट होती है; क्योंकि लिखा है, जब अदोनीसेदेक ने सुना — तब वे निपट डर गए। इससे स्पष्ट होता है कि वे सब एक ही मन के थे, परन्तु जब उनमें से कुछ भय के कारण पीछे हटे रहे, तब उसने, जिसके पास अधिक अधिकार था और जो संकट के अधिक निकट था, शेष चार को हथियार उठाने के लिये बुलाया।

अध्याय के आरम्भ में फिर से बताया गया है कि किस प्रकार पाँचों राजाओं ने इस्राएलियों का सामना करने, और जिस विनाश की धमकी उन सब पर मँडरा रही थी उसे टालने के लिये आपस में सन्धि की। परन्तु क्योंकि इसी बीच गिबोनियों ने आत्मसमर्पण कर दिया था, इसलिये उन्होंने पहले उन्हीं के विरुद्ध हथियार उठाए; एक तो इसलिये कि उन्हें अपने देश के विश्वासघाती ठहराकर दण्ड देने के द्वारा वे उन्हें अपने सब पड़ोसियों के लिये एक दृष्टान्त बना दें, और दूसरे इसलिये कि पराजित शत्रुओं में आतंक फैलाकर वे अपने सैनिकों में भी साहस भर दें। अतः वे गिबोनियों पर आक्रमण करने का निश्चय करते हैं, जिन्होंने अपने दूतावास के द्वारा फूट डालकर इस्राएलियों के लिये मार्ग खोल दिया था। सचमुच युद्ध के लिये उनके पास एक अच्छा बहाना था, क्योंकि वे उन लोगों की कायरता का दण्ड देने का संकल्प कर रहे थे, जिन्होंने अपने पड़ोसियों की विश्वासयोग्यता से रक्षा करने के बदले उन परदेशियों का साथ देना चुना जो सारे देश को उजाड़ने पर थे। और गिबोनियों ने अनुभव से जान लिया कि यदि इस्राएली दया करके उन्हें न बचाते, तो उनकी धूर्त युक्ति कितनी व्यर्थ ठहरती। इसी बीच प्रभु ने उन्हें संकट में पड़ने दिया, ताकि दो बार छुड़ाए जाकर वे और भी अधिक स्वेच्छा और नम्रता से जूआ उठाने के अधीन हो जाएँ।

यहाँ सेप्टुआजिंट में एक अतिरिक्त उपवाक्य जोड़ा गया है, जो मूल में नहीं पाया जाता और सामान्य अनुवादों में सम्मिलित नहीं किया गया, और वह इन शब्दों में है, “ἡνίκα συνέτριψεν αὐτοὺς ἐν Γαβαὼν καὶσυνετρίβησαν ἀπὸπροσώπου υἱω̑ν Ισραήλ;” “जब उसने उन्हें गिबोन में कुचल डाला, और वे इस्राएलियों के साम्हने कुचले गए।” — सं.

फ्रांसीसी में, “Appela et suscita les autres a prendre les armes;” “दूसरों को हथियार उठाने के लिये बुलाया और उकसाया।” यरूशलेम गिबोन से दक्षिण-दक्षिण-पूर्व की ओर केवल लगभग पाँच मील दूर था, जबकि अन्य नगर, जो दक्षिण-दक्षिण-पश्चिम की ओर स्थित थे, बीस से तीस मील तक की दूरियों पर थे। — सं.

6. तब गिबोन के निवासियों ने यहोशू के पास कहला भेजा, इत्यादि। यहाँ वृत्तान्त का क्रम उलट दिया गया है; क्योंकि गिबोनियों ने निश्चय ही घेरे जाने तक प्रतीक्षा नहीं की, वरन् एक सेना को खड़ी और तैयार होते देखकर, और इसमें कोई सन्देह न रखते हुए कि पहला आक्रमण उन्हीं को सहना पड़ेगा, क्योंकि वे सबकी घृणा के पात्र बन चुके थे, वे आक्रमण से पहले ही चेत जाते हैं, और यहोशू की शरण लेने को उतावली करते हैं। जिन्हें जीवनदान दिया गया था, उन्हें त्याग देना एक साथ अवैध, अन्यायपूर्ण और निर्दय होता। वरन्, क्योंकि उनका आत्मसमर्पण वाचा के परिणामस्वरूप हुआ था, इसलिये उन्हें हिंसा और अन्याय से रक्षा पाने का अधिकार था। अतः वे उचित ही इस्राएलियों से विनती करते हैं, जिनकी शरण में वे थे; और यहोशू की ओर से कोई हिचकिचाहट नहीं होती, क्योंकि वह जिनकी अधीनता स्वीकार करने को सहमत हो चुका था, उनकी रक्षा करना अपना कर्तव्य समझता है। यह सच है कि उन्होंने उसे धोखा दिया था, परन्तु छल पकड़े जाने और उनके द्वारा उसे मान लेने के बाद, कुछ परिस्थितियों को घटानेवाली बातें सामने रखकर, उन्होंने क्षमा पा ली थी।

इस प्रकार न्याय-भावना और कर्तव्य-बोध इस्राएलियों को गिबोनियों को उनके भाग्य पर छोड़ देने की अनुमति नहीं देता था। तौभी यहोशू उस तत्परता के लिये प्रशंसा का पात्र है, जिसके साथ उसने विनती मान ली और बिना विलम्ब सहायता भेजी। कहा गया है कि वह सारी रात चलता रहा, और इस प्रकार यदि सारी प्रजा का कल्याण दाँव पर होता, तो भी वह इससे अधिक शीघ्रता से न बढ़ सकता था। यदि अन्यजाति राष्ट्रों ने भी सदा ऐसी ही सच्चाई दिखाई होती, तो वे अपने मित्र-राष्ट्रों पर विपत्ति आ जाने के बाद उनका पलटा लेने के बदले ठीक समय पर उनकी सहायता करते। तौभी “एकाएक” शब्द को एक ही दिन तक सीमित नहीं करना चाहिए, मानो यहोशू ने एक ही रात में तीन दिन की यात्रा पूरी कर ली हो, और अगली भोर गिबोनियों के बीच आ पहुँचा हो। जो कुछ व्यक्त करना अभिप्रेत है वह केवल उसकी बड़ी शीघ्रता है, और यह कि उसने अपने प्रस्थान को अगले दिन तक नहीं टाला।

यह अनुमान कि यहाँ वृत्तान्त का क्रम उलट दिया गया है, कुछ निराधार-सा प्रतीत होता है। लाकीश, जो नगरों में सबसे दूर था, तीस मील से अधिक दूर नहीं था, और यरूशलेम, जैसा कि बताया जा चुका है, केवल पाँच मील दूर था; अतः जहाँ तक केवल दूरी का प्रश्न है, हमें वृत्तान्त के अक्षरशः अभिप्राय के अनुसार यह मानने से कोई बात नहीं रोकती कि राजा अचानक गिबोन पर चढ़ आए थे, और जब गिबोनियों ने यहोशू के पास अपने दूत भेजे, तब वे सचमुच उसे घेरे हुए थे।

यद्यपि इस्राएलियों ने ऐ से या उसके आसपास से अपनी छावनी उठाई, तौभी गिबोनियों की सीमाओं में प्रवेश करने तक तीसरा दिन हो गया था। यह मान भी लें कि तब वे युद्ध की पाँति बाँधकर धीरे-धीरे आगे बढ़े, तौभी जब गिबोनियों की सहायता करने के लिये उससे विनती की जाती है, तब यहोशू अभी कुछ दूरी पर था। हम देख चुके हैं कि यरदन पार करने के बाद गिलगाल पहला पड़ाव था, और इसलिये वह यरीहो से भी अधिक दूर था। यदि कोई इसे बेतुका समझे कि कई नगरों की अधीनता स्वीकार करने के बाद वह पीछे लौट गया, और एक खाली प्रदेश छोड़ गया, जिसे शत्रु से फिर छुड़ाने में नया परिश्रम लग सकता था, तो मैं उत्तर देता हूँ कि यह डरने का कोई कारण न था कि शत्रु आगे बढ़कर उस पर अधिकार करेगा, और बड़े संकट और कठिनाई से भरे अभियान में हाथ डालेगा। सम्भव है कि जब यरीहो पर आक्रमण करने के लिये सैनिकों का एक दल चुना गया, तब स्त्रियाँ, बच्चे, और युद्ध के अयोग्य अन्य सब लोग उसी शान्त कोने में रह गए, जहाँ उन्हें रूबेनियों, गादियों और मनश्शे के आधे गोत्र के उन लोगों की रक्षा मिल सकती थी, जो यरदन के उस पार छोड़ दिए गए थे। क्योंकि वे अपने युद्धों में बच्चों, गर्भवती स्त्रियों, या छाती से दूध पीते शिशुओं को साथ लेकर किस प्रयोजन से जाते? और शत्रु पर चढ़ाइयों के समय इतनी बड़ी भीड़ के लिये भोजन, या उनकी सारी भेड़-बकरियों और गाय-बैलों के लिये पर्याप्त जल कैसे मिल सकता था? अतः मेरा निष्कर्ष यह है कि यहोशू और उसके सैनिक अपने डेरों में इसलिये लौट गए कि अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ थोड़ा विश्राम करें, और वहाँ वह लूट रख दें जिससे वे धनी हुए थे।

8. और यहोवा ने यहोशू से कहा, इत्यादि। यह निश्चित नहीं है कि प्रभु ने पहले ही से पहल करके अपनी वाणी के द्वारा यहोशू को शस्त्र-सज्जित किया, और उसके कोई कदम उठाने से पहले ही उसे गिलगाल से निकाल लाया, या उसने केवल तब उसे दृढ़ किया जब वह प्रस्थान की तैयारी कर चुका था। मुझे यह अधिक सम्भव जान पड़ता है कि यहोशू विनती किए जाते ही परमेश्वर से पूछे बिना दौड़ नहीं पड़ा, वरन् अन्त में, उसकी इच्छा जान लेने के बाद, साहस और शीघ्रता से हथियार उठाए। क्योंकि हाल ही में अत्यधिक सरलता के कारण उसकी ताड़ना हुई थी, इसलिये कम से कम यह अनुमान सम्भव है कि इस कठिन परिस्थिति में उसने ईश्वरीय आज्ञा के बिना कुछ भी करने का प्रयत्न नहीं किया। अतः प्रभु ने उन दीन गिबोनियों पर ध्यान दिया, जब उसने उन्हें अपनी प्रजा की सहायता से वंचित और असहाय नहीं रहने दिया।

यहाँ फिर, जान पड़ता है कि दूरी को बढ़ा-चढ़ाकर आँकने के कारण, कैल्विन एक चतुर व्याख्या का सहारा लेना, और वृत्तान्त को एक प्रकार का रंग देना आवश्यक समझता है। गिलगाल से गिबोन की दूरी अठारह मील से कुछ अधिक थी, और यह निश्चय ही एक रात में कूच करके तय की जा सकती थी। कैल्विन कहता है कि हमें यह नहीं मानना चाहिए कि “यहोशू ने एक ही रात में तीन दिन की यात्रा पूरी कर ली।” परन्तु कहीं यह नहीं कहा गया कि गिबोन गिलगाल से तीन दिन की यात्रा पर था। शब्द ये हैं, “इस्राएलियों ने कूच किया और तीसरे दिन उनके नगरों में पहुँच गए।” (यहोशू 9:17)। दूसरे शब्दों में, इस्राएलियों ने इस विशेष अवसर पर तीन दिन लगाए, या यदि हम गिनती की सामान्य इब्रानी रीति को अपनाएँ, तो पहले दिन का कुछ भाग, दूसरा पूरा दिन, और तीसरे दिन का कुछ भाग। ऐसे कथन से यह निष्कर्ष कदापि उचित नहीं ठहरता कि उन दो स्थानों के बीच यात्रा करने का औसत समय तीन दिन था। — सं.

यहोशू को विजय का भरोसा दिलाया जाता है, ताकि वह उनकी सहायता करे; क्योंकि परमेश्वर आज्ञा देने की अपेक्षा प्रतिज्ञा करने के द्वारा हमें कर्तव्य-पालन के लिये अधिक प्रबलता से उभारता है। जो प्रतिज्ञा यहाँ एक से की गई है वह सब की है, परन्तु यहोशू को आदर देने के लिये वह विशेष रूप से उसी के पास धरोहर के समान रखी जाती है, ताकि वह बाद में उसे अपनी सेना तक पहुँचानेवाला बने। क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग से हर प्रकार के लोगों से अन्धाधुन्ध बात नहीं करता, वरन् यह आदर केवल श्रेष्ठ सेवकों और चुने हुए भविष्यद्वक्ताओं को देता है।

इसके अतिरिक्त यह ध्यान देने योग्य है कि यहोशू ने ईश्वरीय प्रतिज्ञा का दुरुपयोग करके उसे आलस्य का बहाना नहीं बनाया, वरन् सुखद परिणाम का निश्चय पाकर वह और भी अधिक उत्साह से प्रज्वलित हुआ। बहुत से लोग, जब वे दिखावे के साथ अपना विश्वास प्रकट करते हैं, तब विकृत निश्चिन्तता के कारण आलसी और सुस्त हो जाते हैं। यहोशू सुनता है कि विजय उसके हाथ में है, और उसे प्राप्त करने के लिये वह तेज़ी से युद्ध की ओर दौड़ता है। क्योंकि वह जानता था कि सुखद परिणाम उसकी चाल धीमी करने या उसे अधिक ढीला बनाने के लिये नहीं, वरन् इसलिये प्रकट किया गया था कि वह और भी अधिक उत्साह से परिश्रम करे। इसी कारण उसने शत्रु पर अचानक धावा बोल दिया।

10. तब यहोवा ने उन्हें घबरा दिया, इत्यादि। पहले संहार में प्रभु ने अपनी ही सामर्थ्य प्रकट की, परन्तु प्रजा की तलवारों का उपयोग किया। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जब कभी वह मनुष्यों के द्वारा कार्य करता है, तब उसकी महिमा में से कुछ भी घटता नहीं, वरन् जो कुछ होता है वह केवल उसी की महिमा का कारण होता है। क्योंकि जब वह मनुष्यों का सहयोग लेता है, तब वह सहायक सेना के रूप में मित्रों को नहीं बुलाता, न उनसे कुछ उधार लेता है; वरन्, क्योंकि वह जो चाहे केवल एक संकेत से पूरा कर सकता है, इसलिये वह मनुष्यों को भी साधन के रूप में काम में लाता है, यह दिखाने के लिये कि वे उसके हाथ और इच्छा से संचालित होते हैं। साथ ही यह दोनों प्रकार से सच ही कहा जाता है कि शत्रु परमेश्वर के द्वारा, या इस्राएलियों के द्वारा, भगाए और कुचले गए, क्योंकि परमेश्वर ने इस्राएलियों के साधन से ही उन्हें कुचला।

दूसरे संहार में परमेश्वर का हाथ और भी स्पष्टता से प्रकट हुआ, जब शत्रु ओलों से नष्ट किए गए। और स्पष्ट रूप से कहा गया है कि तलवार से मारे गए लोगों की अपेक्षा ओलों से नष्ट हुए लोग अधिक थे, ताकि इसमें कोई सन्देह न रहे कि विजय स्वर्ग से प्राप्त हुई थी। इससे फिर यह समझ में आता है कि ये साधारण ओले नहीं थे, जैसे आँधी-तूफ़ानों में प्रायः गिरा करते हैं। क्योंकि, पहले तो, अचानक नष्ट होने की अपेक्षा अधिक लोग घायल होते, या तितर-बितर होकर बिखर जाते; और दूसरे, यदि परमेश्वर ने उन्हें सीधे लक्ष्य पर न फेंका होता, तो उनका कुछ भाग इस्राएलियों के सिरों पर भी गिरता। अब जब एक सेना पर अलग से प्रहार होता है, और दूसरी, हानि से सुरक्षित रहकर, मानो सहायक सेनाओं से मिलने को आगे बढ़ती है, तब यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि परमेश्वर स्वर्ग से युद्ध कर रहा है। इसी आशय से कहा गया है कि परमेश्वर ने आकाश से ओलों के बड़े-बड़े पत्थर गिराए: क्योंकि अर्थ यह है कि वे असाधारण वेग से गिरे, और सामान्य आकार से कहीं बड़े थे। यदि कभी साधारण युद्धों में अचानक कोई आँधी उठी है और किसी एक पक्ष के लिये लाभदायक सिद्ध हुई है, तो ऐसा प्रतीत हुआ है मानो परमेश्वर ने उस पक्ष को अपनी कृपा का चिह्न दिया हो; और इसी से यह पंक्ति निकली है, “स्वर्ग का अति प्रिय है वह, जिसके पक्ष में तत्त्व भर्ती होकर लड़ते हैं।” यहाँ हमारे सामने एक और भी विशिष्ट आश्चर्यकर्म का वृत्तान्त है, जिसमें परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता खुले रूप से प्रकट हुई।

12. तब यहोशू ने यहोवा से कहा, इत्यादि। अक्षरशः पाठ यही है, परन्तु कुछ लोग इसका अर्थ “यहोवा के साम्हने” करते हैं: क्योंकि परमेश्वर से, जिससे भक्ति की माँग के अनुसार दीनता से विनती की जानी चाहिए, “बात करना” विश्वास की नम्रता के बहुत अनुकूल नहीं जान पड़ता; और तुरन्त आगे जोड़ा गया है कि यहोशू ने अपने शब्द सूर्य से कहे। मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं कि पहले उपवाक्य से प्रार्थना या मन्नत अभिप्रेत है, और दूसरा उपवाक्य उसकी सुनी जाने के बाद के भरोसे की अभिव्यक्ति है: क्योंकि पहले अनुमति पाए बिना सूर्य को ठहरने की आज्ञा देना ढिठाई और अहंकार होता। अतः वह पहले परमेश्वर से पूछता और माँगता है: और तुरन्त उत्तर पाकर वह साहस के साथ सूर्य को वह करने की आज्ञा देता है, जिसके विषय में वह जानता है कि वह परमेश्वर को भाता है।

और मसीह जो विश्वास उत्पन्न करता है, उसकी सामर्थ्य और विशेषाधिकार ऐसा ही है (मत्ती 17:20; लूका 17:6) कि उसकी आज्ञा से पहाड़ और समुद्र हट जाते हैं। भक्त लोग जितना अधिक अपनी शून्यता का अनुभव करते हैं, परमेश्वर उतनी ही अधिक उदारता से अपनी सामर्थ्य उन्हें सौंप देता है; और जब विश्वास वचन से जुड़ा होता है, तब वह उसमें अपनी ही सामर्थ्य प्रदर्शित करता है। संक्षेप में, विश्वास आज्ञा देने का भरोसा उसी वचन से उधार लेता है जिस पर वह आधारित है। इसी प्रकार एलिय्याह ने परमेश्वर की आज्ञा से आकाश को बन्द किया और खोला, और उसमें से आग उतारी; इसी प्रकार मसीह ने अपने चेलों को स्वर्गीय सामर्थ्य से सुसज्जित किया, कि तत्त्व उनके अधीन हो जाएँ।

तौभी सावधानी बरतनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि कोई अपनी ही ओर से उतावली में आज्ञाएँ देने का दुस्साहस करे। यहोशू ने परमेश्वर के अभिप्राय के विषय में भली-भाँति शिक्षा पाने से पहले सूर्य की गति को रोकने और थामने का प्रयत्न नहीं किया। और यद्यपि जब कहा जाता है कि उसने परमेश्वर से बात की, तब ये शब्द उस नम्रता और अधीनता को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं करते, जो परमेश्वर के सेवक को अपनी प्रार्थनाएँ उच्चारित करते समय शोभा देती है, तौभी हमारे लिये संक्षेप में इतना समझ लेना पर्याप्त हो कि इसमें यह निहित है कि यहोशू ने परमेश्वर से अपनी इच्छित वस्तु देने की विनती की, और अपनी विनती स्वीकार हो जाने पर वह एक ऐसे अविश्वसनीय आश्चर्यकर्म का स्वतन्त्र और उदारचित्त घोषक बन गया, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। यदि वह अपनी बुलाहट के विषय में पूर्णतः आश्वस्त न होता, तो सब के साम्हने इतने भरोसे के साथ सूर्य को आज्ञा देने का साहस कभी न करता। यदि ऐसा न होता, तो वह अपने आपको एक नीच और लज्जाजनक अपमान के लिये खोल देता। जब वह बिना हिचकिचाए अपना मुँह खोलता है, और सूर्य और चन्द्रमा से प्रकृति के सनातन नियम से हट जाने को कहता है, तो यह ठीक ऐसा ही है मानो उसने परमेश्वर की उस असीम सामर्थ्य की शपथ देकर उन्हें आज्ञा दी हो, जिससे वह सुसज्जित था। यहाँ भी प्रभु अपनी कलीसिया के प्रति अपनी अनुपम कृपा का उज्ज्वल प्रदर्शन करता है। जैसे वह मानवजाति पर दया करके सूर्य की दैनिक गति के द्वारा दिन को रात से अलग करता है, और उस विशाल गोले को अथक वेग से निरन्तर घुमाता रहता है, वैसे ही उसे यह भाया कि वह थोड़े समय के लिये ठहर जाए, जब तक इस्राएल के शत्रु नष्ट न हो जाएँ।

यहाँ जोड़ा गया अंश लातीनी कवि क्लॉडियन से लिया गया उद्धरण है, जो थियोडोसियस की अपनी प्रशस्ति में, उस सम्राट की एक ऐसी विजय का उल्लेख करते हुए, जिसमें तत्त्व उसके पक्ष में युद्ध करते प्रतीत होते हैं, पुकार उठता है —

O nimium dilecte Deo, tibi militat aether, Et conjurati veniunt ad classica venti!— सं.

13. और सूर्य थमा रहा, इत्यादि। सूर्य गिबोन में किस प्रकार ठहरा, यह प्रश्न कुछ लोग जितनी असामयिकता से उठाते हैं, उतनी ही अकुशलता से कुछ अन्य उसकी व्याख्या करते हैं। क्योंकि यहोशू ने बारीकी से सूर्य को किसी विशेष बिन्दु पर स्थापित नहीं किया, जिससे यह कल्पना करना आवश्यक हो जाए कि युद्ध ग्रीष्म-अयनान्त के समय लड़ा गया था; वरन्, क्योंकि जहाँ तक आँख देख सकती थी वह अय्यालोन के प्रदेश की ओर मुड़ रहा था, यहोशू उसे वहीं रुकने और ठहरने की आज्ञा देता है, अर्थात् उस रेखा के ऊपर बने रहने की जिसे क्षितिज कहते हैं। संक्षेप में, सूर्य, जो पहले ही पश्चिम की ओर ढल रहा था, अस्त होने से रोक दिया जाता है।

घण्टों की संख्या के विषय में मैं अपने आपको अधिक चिन्ता में नहीं डालता; क्योंकि मेरे लिये इतना पर्याप्त है कि दिन सारी रात भर बना रहा। यदि उस काल के इतिहास उपलब्ध होते, तो वे निःसन्देह इस महान आश्चर्यकर्म का गुणगान करते; तौभी, कहीं इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न न उठाया जाए, इसलिये इस पुस्तक का लेखक बताता है कि इसका वृत्तान्त अन्यत्र भी दिया गया था, यद्यपि जिस ग्रन्थ का वह उद्धरण देता है वह खो गया है, और व्याख्याकार याशार शब्द के विषय में भली-भाँति एकमत नहीं हैं। जो सोचते हैं कि इससे मूसा अभिप्रेत है, वे यहाँ दिए गए उदाहरण को सामान्य भविष्यवाणियों से जोड़ने पर बल देते हैं। क्योंकि मूसा यह नाम चुनी हुई प्रजा पर लागू करता है, इसलिये यह मानना अधिक संगत है कि उनके इतिहास की घटनाओं पर लिखे गए विवरण अभिप्रेत हैं। जहाँ तक मेरी बात है, मैं इससे किसी इतिहास के लेखक की अपेक्षा या तो परमेश्वर को या इस्राएल को समझता हूँ।

14. न तो उससे पहले कोई ऐसा दिन हुआ, इत्यादि। हम यशायाह में और पवित्र इतिहास में पढ़ते हैं कि बाद में राजा हिजकिय्याह पर कृपा करके सूर्य की गति बदल दी गई थी। (यशायाह 38:5-8) क्योंकि उसे यह निश्चय दिलाने के लिये कि उसका जीवन अभी पन्द्रह वर्ष और बढ़ाया जाएगा, सूर्य की छाया उन दस अंशों पर, जिन पर वह ढल चुकी थी, पीछे लौटा दी गई। अतः यह पूर्णतः अस्वीकार नहीं किया गया कि कभी किसी अन्य व्यक्ति को भी ऐसी कोई बात प्रदान की गई हो, परन्तु इस आश्चर्यकर्म की अनुपम कहकर प्रशंसा की गई है। कुछ लोगों ने שמע शब्द का जो अनुवाद “आज्ञा मानी” किया है, उसे मैं अत्यन्त कठोर समझकर अस्वीकार करता हूँ। क्योंकि यद्यपि भजन में कहा गया है कि प्रभु अपने सेवकों की इच्छा के अनुसार करता है, जिसे आज्ञा मानने के तुल्य समझा जा सकता है, तौभी ऐसी किसी भी बात से बचना उत्तम है जो परमेश्वर को अधीनस्थ पद देती हुई प्रतीत हो। अतः यहाँ केवल आश्चर्यकर्म की श्रेष्ठता की प्रशंसा की गई है, क्योंकि उसके समान न पहले कुछ देखा गया था, न बाद में हुआ। पद का दूसरा उपवाक्य यहोशू की सुनने में परमेश्वर की दया और कृपालुता का, और साथ ही उस प्रजा के प्रति उसकी पितृतुल्य कृपा का गुणगान करता है, जिसके लिये कहा गया है कि वह लड़ा।

इस समापन-वाक्य से कोई यह सन्देह कर सकता है कि कैल्विन कोपरनिकस की प्रणाली से अनभिज्ञ था, और अब भी यही मानता था कि घूमनेवाली पृथ्वी नहीं वरन् सूर्य है। तौभी, क्योंकि हम जानते हैं कि वह अनेक बातों में अपने युग से आगे था, इसलिये हम यह विश्वास नहीं कर सकते कि इस बात में वह उससे पीछे था। — सं.

जो लोग इस आश्चर्यकर्म की व्याख्या करने का प्रयत्न करते हैं, उन्हें यहाँ दी गई फटकार उन पर दुगुने बल से लागू होती है जो इसे व्याख्या के द्वारा उड़ा देने का प्रयत्न करते हैं। यह कुछ विचित्र है कि इनमें कुछ अत्यन्त प्रसिद्ध यहूदी रब्बी भी हैं, जैसे लेवी-बेन-गेर्सोन और माइमोनाइडीज़, जो दोनों यह मानते हैं कि कोई आश्चर्यकर्म हुआ ही नहीं, वरन् केवल उससे बहुत मिलती-जुलती कोई बात हुई। इस अत्यन्त असाधारण मत को अपनाने का उनका मुख्य कारण मूसा के सम्मान के लिये उनका उत्साह है, जिसे वे समझते हैं कि यह मान लेने से गम्भीर आघात पहुँचेगा कि जो आश्चर्यकर्म उसने कभी नहीं किया, वह उसके उत्तराधिकारी यहोशू के द्वारा किया गया। — सं.

फ्रांसीसी में, “En somme, le soleil remonte estant ja commence a se coucher;” “संक्षेप में, अस्त होना आरम्भ कर चुकने के बाद सूर्य फिर ऊपर चढ़ता है।” — सं.

यहोशू 10:15-28

15. तब यहोशू सारे इस्राएलियों समेत गिलगाल की छावनी को लौट गया।

15. Reversus autem est Josue et universus Israel cum eo ad castra in Gilgal.

16. परन्तु वे पाँचों राजा भागकर मक्केदा के पास की गुफा में जा छिपे।

16. Fugerant vero ipsi reges, et absconderant se in spelunca in Makeda.

फ्रांसीसी में, “Quant a moy, pour dire la verite, je le prends comme s'il estoit parle de Dieu ou du peuple d'Israel, plutost que de celuy qui a escrit Phistoire;” “जहाँ तक मेरी बात है, सच कहूँ तो, मैं इसे ऐसे समझता हूँ मानो यह परमेश्वर के विषय में, या इस्राएल की प्रजा के विषय में कहा गया हो, न कि उसके विषय में जिसने इतिहास लिखा।” याशार के अर्थ के विषय में यहाँ अपनाए गए मत को प्राचीन और आधुनिक दोनों प्रकार के अनेक प्रतिष्ठित व्याख्याकारों का समर्थन प्राप्त है, जो मानते हैं कि यह कोई ऐसा अभिलेख था जिसमें चुनी हुई प्रजा के इतिहास की प्रमुख घटनाओं का विवरण नियमित रूप से लिखा जाता था, और जिसे इस प्रकार सामान्यतः “धर्मी की पुस्तक” कहा जाने लगा होगा, ठीक उसी प्रकार जैसे हम “महापुरुषों की पुस्तक”, “शहीदों की पुस्तक” इत्यादि कहने के अभ्यस्त हैं। याशार की पुस्तक का एकमात्र अन्य उल्लेख 2 शमूएल 1:18 में है, जहाँ उसका उल्लेख इस रूप में किया गया है कि उसमें शाऊल और योनातान के लिये दाऊद का विलापगीत है, या कम से कम उसके सम्बन्ध में उसका उल्लेख है। इसी उल्लेख के आधार पर डी वेट्टे और अन्य तर्कवादी यह तर्क देते हैं कि यहोशू की पुस्तक उतनी प्राचीन नहीं है जितनी सामान्यतः मानी जाती है, और उसे दाऊद के समय के बाद लिखा गया होगा। यह तर्क यह मानकर चलता है कि याशार किसी ऐसे लेखक का नाम है जो दाऊद के समय में या उसके बाद रहा; और इस धारणा के बिना, जिसके लिये कोई ठोस आधार नहीं दिखाया गया, इस तर्क में विश्वसनीयता का लेश भी नहीं है। — सं.

फ्रांसीसी में, “Neantmoins si est ce meilleur d'eviter toujours toutes facons de parler derogantes a la majeste de Dieu, comme s'il estoit question de la ranger;” “तौभी परमेश्वर के प्रताप को घटानेवाली बोलने की सब रीतियों से सदा बचना उत्तम है, मानो उसे अधीन करने का अभिप्राय हो।” — सं.

17. तब यहोशू को यह समाचार मिला, कि पाँचों राजा मक्केदा के पास की गुफा में छिपे हुए मिले हैं।

17. Et nuntiatum est Josue his verbis, Inventi sunt quinque reges absconditi in spelunca in Makeda.

18. यहोशू ने कहा, गुफा के मुँह पर बड़े-बड़े पत्थर लुढ़काकर उनकी देख-भाल के लिये मनुष्यों को उसके पास बैठा दो;

18. Tunc dixit Josue, Devolvite saxa magna ad os speluncae, et constituite juxta eam viros ut custodiant eos.

19. परन्तु तुम रुको मत, अपने शत्रुओं का पीछा करके उनमें से जो जो पिछड़ गए हैं उनको मार डालो; उन्हें अपने-अपने नगर में घुसने का अवसर न दो; क्योंकि तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने उनको तुम्हारे हाथ में कर दिया है।
19. Vos autem persequimini inimicos vestros, et caudam eorum caedite, nec sinatis eos ingredi urbes suas: tradidit enim eos Jehova Deus vester in manum vestram.

20. जब यहोशू और इस्राएली उनका बड़ा संहार करके उन्हें नष्ट कर चुके, और उनमें से जो बच गए वे अपने-अपने गढ़वाले नगर में घुस गए,

20. Quum autem finem fecisset Josue, et filii Israel percutiendi plaga magna valde, donec consumerentur, et superstites qui evaserant ex ipsis ingressi essent urbes munitas.

21. तब सब लोग मक्केदा की छावनी को यहोशू के पास कुशल-क्षेम से लौट आए; और इस्राएलियों के विरुद्ध किसी ने जीभ तक न हिलाई।

21. Reversi sunt universus populus ad castra ad Josue in Makeda in pace: non movit contra filios Israel quisquam linguam suam.

22. तब यहोशू ने आज्ञा दी, कि गुफा का मुँह खोलकर उन पाँचों राजाओं को मेरे पास निकाल ले आओ।

22. Tunc dixit Josue, Aperite os speluncae, et adducite ad me quinque illos reges de spelunca.

“तुम रुको मत” शब्द, जो मूल में, और सेप्टुआजिंट, अंग्रेज़ी तथा अन्य अनुवादों में पाए जाते हैं, कैल्विन के लातीनी अनुवाद में छोड़ दिए गए हैं। — सं.

23. उन्होंने ऐसा ही किया, और यरूशलेम, हेब्रोन, यर्मूत, लाकीश, और एग्लोन के उन पाँचों राजाओं को गुफा में से उसके पास निकाल ले आए।

23. Atque ita fecerunt, nempe adduxerunt ad eum quinque illos reges de spelunca, regem Jerusalem, regem Hebron, regem Jarmuth, regem Lachis, regem Eglon.

24. जब वे उन राजाओं को यहोशू के पास निकाल ले आए, तब यहोशू ने इस्राएल के सब पुरुषों को बुलाकर अपने साथ चलनेवाले योद्धाओं के प्रधानों से कहा, निकट आकर अपने-अपने पाँव इन राजाओं की गर्दनों पर रखो। तब उन्होंने निकट जाकर अपने-अपने पाँव उनकी गर्दनों पर रखे।

24. Quumque eduxissent quinque reges illos ad Josue, vocavit Josue omnes viros Israel, dixitque ducibus virorum bellatorum, qui profecti erant secum, Accedite, ponite pedes vestros super colla regum istorum. Et accesserunt, posueruntque pedes suos super colla ipsorum.

25. तब यहोशू ने उनसे कहा, डरो मत, और न तुम्हारा मन कच्चा हो; हियाव बाँधकर दृढ़ हो; क्योंकि यहोवा तुम्हारे सब शत्रुओं से जिनसे तुम लड़नेवाले हो ऐसा ही करेगा।

25. Tunc dixit ad eos Josue, Ne timeatis, et ne paveatis, fortes estoate, et roborate vos: sic enim faciet Jehova omnibus inimicis vestris contra quos pugnatis.

26. इसके बाद यहोशू ने उनको मरवा डाला, और पाँच वृक्षों पर लटका दिया; और वे साँझ तक उन वृक्षों पर लटके रहे।

26. Posthaec percussit eos Josue, et interfecit eos, et suspendit in quinque lignis, fueruntque suspensi in lignis usque ad vesperum.

27. सूर्य डूबते-डूबते यहोशू की आज्ञा से वे उन वृक्षों पर से उतारकर उसी गुफा में जहाँ वे छिप गए थे डाल दिए गए, और उस गुफा के मुँह पर बड़े-बड़े पत्थर धर दिए गए, वे आज तक वहीं धरे हुए हैं।

27. Fuit praeterea tempore quo occumbit sol praecepit Josue, et deposuerunt eos e lignis, projeceruntque eos in speluncam in qua se absconderant, et posuerunt lapides magnos ad os speluncae usque in hunc diem.

28. उसी दिन यहोशू ने मक्केदा को ले लिया, और उसको तलवार से मारा, और उसके राजा का सत्यानाश किया; और जितने प्राणी उसमें थे उन सभों में से किसी को जीवित न छोड़ा; और जैसा उसने यरीहो के राजा के साथ किया था वैसा ही मक्केदा के राजा से भी किया।

28. Makedam vero cepit Josue eo die, et percussit eam acie gladii, et regem ejus occidit una cum illis, et nullam animam quae esset in ea reliquit superstitem, fecitque regi Makeda quemadmodum fecerat regi Jericho.

15. तब यहोशू लौट गया, इत्यादि। यह पद अपने उचित स्थान पर नहीं रखा गया है, क्योंकि थोड़ी ही देर बाद युद्ध की समाप्ति, और राजाओं को दिया गया दण्ड, जो युद्ध के बाद हुआ, जोड़ा गया है। फिर हमें मक्केदा में छावनी डालने के विषय में बताया जाता है, और अन्त में, अध्याय के अन्त में, गिलगाल को लौटने की बात, जो आरम्भ में समय के क्रम का ध्यान रखे बिना रख दी गई थी, दोहराई जाती है। अतः राजाओं के भागने और छिपने का वृत्तान्त पिछली घटनाओं से जुड़ा हुआ है। क्योंकि युद्ध की गर्मी के बीच यह सूचना पाकर कि वे एक गुफा में छिपे हैं, यहोशू ने इस भय से कि यदि वह उन्हें पकड़ने में लग जाए तो दूसरे बच निकलेंगे, बुद्धिमानी से केवल इतनी आज्ञा देकर सन्तोष किया कि गुफा का मुँह बड़े पत्थरों से बन्द कर दिया जाए, और उन पर पहरेदार बैठा दिए जाएँ, ताकि इस प्रकार मानो बन्दीगृह में बन्द रहकर वे उचित समय पर बाहर निकाले जाएँ और मार डाले जाएँ। इससे यह भी प्रकट होता है कि शत्रु की सेना बहुत बड़ी थी, क्योंकि यद्यपि इस्राएली भागते हुए शत्रुओं पर बड़ी निकटता से दबाव डाल रहे थे, और स्वयं सूर्य ने उन्हें मारने के लिये अतिरिक्त समय दिया, तौभी उनमें से बहुतों को गढ़वाले नगरों में भाग निकलने से रोकना असम्भव था। तौभी इस्राएलियों को दी गई ईश्वरीय सहायता इस बात से पर्याप्त रूप से प्रमाणित हुई कि वे थक जाने तक जो कोई उन्हें मिला उसे इच्छानुसार मारते रहे, और फिर सकुशल लौट आए। क्योंकि यह अभिव्यक्ति कि किसी ने जीभ हिलाने का भी साहस न किया, यह संकेत करती है कि इस्राएलियों ने रक्तहीन विजय पाई, मानो वे लड़ने नहीं, केवल वध करने निकले हों।

18. यहोशू ने कहा, लुढ़काओ, इत्यादि। शत्रु के पूर्णतः पराजित हो जाने पर यहोशू अब स्वतन्त्र है, और मानो अवकाश में है, कि राजाओं को दण्ड दे। इस पर विचार करते समय ईश्वरीय आज्ञा को सदा दृष्टि में रखना चाहिए। उसके बिना राजाओं की गर्दनों को रौंदना, और उनके शवों को फाँसी के खम्भों पर लटकाना असीम अहंकार और बर्बर क्रूरता का प्रमाण होता। यह निश्चित है कि उन्हें हाल ही में ईश्वरीय विधान के द्वारा एक पवित्र प्रतिष्ठा तक उठाया गया था और राजसिंहासन पर बैठाया गया था। अतः यदि परमेश्वर ने ऐसा ठहराया न होता, तो उनके अपमान पर आनन्द मनाना मानवीय भावनाओं के विरुद्ध होता। परन्तु क्योंकि उसकी ऐसी ही इच्छा थी, इसलिये हमें उचित है कि उसके निर्णय को स्वीकार करें, और यह पूछने का दुस्साहस न करें कि वह इतना कठोर क्यों था।

यह सेप्टुआजिंट में पूर्णतः छोड़ दिया गया है। — सं. “रक्तहीन विजय।” लातीनी में, “Incruenta victoria.” फ्रांसीसी में, “De la part des Israelites ils ont acquis la victoire sans qu'il leur ait couste la vie d'un seul homme;” “इस्राएलियों की ओर से, उन्होंने ऐसी विजय पाई जिसमें उनके एक भी मनुष्य का प्राण नहीं गया।” — सं.

साथ ही, जैसा मैं पहले संकेत कर चुका हूँ, हमें स्मरण रखना चाहिए, पहला, कि छोटे से लेकर बड़े तक सब मृत्यु के योग्य थे, क्योंकि उनका अधर्म चरम सीमा तक पहुँच गया था, और राजा, जो दूसरों की अपेक्षा अधिक अपराधी थे, अधिक कठोर दण्ड के योग्य थे; और दूसरा, कि राजाओं के व्यक्तित्व में अटल कठोरता का एक उदाहरण देना उचित था, क्योंकि प्रजा दया के विकृत दिखावे के कारण उन्हें क्षमा करने की ओर अत्यधिक झुक सकती थी। परमेश्वर की इच्छा थी कि सब नष्ट किए जाएँ, और उसने इस दण्डाज्ञा को पूरा करने का दायित्व अपनी प्रजा पर डाला था। यदि उसने उन्हें इसे पूरा करने के लिये प्रबलता से न उभारा होता, तो वे क्षमा देने के लिये आकर्षक बहाने ढूँढ़ लेते। परन्तु जो दया मनुष्य की इच्छा पर परमेश्वर के अधिकार को क्षीण करती है, वह घृणित है। परन्तु अब, जब राजसी सम्मान को भी नहीं छोड़ा जाता, तो साधारण प्रजा और सामान्य जनसमूह के प्रति दया दिखाने का हर बहाना कट जाता है।

इस उदाहरण के द्वारा प्रभु हमें दिखाता है कि वह अपनी चुनी हुई प्रजा में कितनी गहरी रुचि रखता है; क्योंकि राजाओं को उनके पाँवों तले कर देना, और उन्हें उनकी प्रतिष्ठा का ऐसा अपमान करने देना मानो वे छोटे-मोटे डाकू हों, उसकी असाधारण कृपालुता का उदाहरण था; जैसा भजन में कहा गया है, उनके हाथों में दोधारी तलवारें रहें, कि वे अन्यजातियों से पलटा ले सकें, और उनके राजाओं को साँकलों से, और उनके प्रतिष्ठित पुरुषों को लोहे की बेड़ियों से जकड़ रखें, और उनको ठहराया हुआ दण्ड दें! उसके सब भक्तों की ऐसी ही प्रतिष्ठा होगी। (भजन संहिता 149:6-9) उस भयानक दृश्य का साथ ही यह प्रभाव भी था कि वह भय उत्पन्न करे, ताकि इस्राएली उन जातियों के चाल-चलन की नकल न करें जिनके अपराधों को उन्होंने इतनी कठोरता से दण्डित होते देखा था। तदनुसार मूसा की पुस्तकों में हम बार-बार यह चेतावनी पाते हैं, तुमने देखा है कि परमेश्वर ने कनान देश में तुमसे पहले रहनेवाली जातियों से कैसा पलटा लिया। इसलिये चौकस रहो, कि उनके कुटिल कामों के द्वारा अपने परमेश्वर का क्रोध न भड़काओ। एक शब्द में, कि परमेश्वर की आराधना अधिक पवित्रता से की जाए, उसने आज्ञा दी कि देश सब अशुद्धताओं से शुद्ध किया जाए; और क्योंकि वहाँ के निवासी अत्यन्त दुष्ट हो गए थे, इसलिये उसकी इच्छा हुई कि उसका शाप एक नए और असाधारण रीति से उन पर ठहरे।

25. तब यहोशू ने उनसे कहा, डरो मत, इत्यादि। यहोशू अब पाँच राजाओं के व्यक्तित्व में उन सब अन्य राजाओं पर विजय मनाता है जो अभी शेष थे। क्योंकि वह अपनी प्रजा को भरोसा रखने के लिये ऐसे प्रोत्साहित करता है, मानो जो अभी तक अपराजित खड़े थे वे सचमुच उनके पाँवों तले पड़े हों। इससे हम यह समझते हैं कि थोड़े-से लोगों को रौंदे जाने से सारी प्रजा इतनी उत्साहित हो गई कि वह अन्य सब को तुच्छ दृष्टि से देखने लगी, मानो वे पहले ही उखाड़ फेंके गए हों। और निश्चय ही यहाँ हमारे सामने ईश्वरीय सामर्थ्य का और भी उज्ज्वल प्रदर्शन है, जो इस प्रकार भविष्य के लिये भरोसा उत्पन्न कर सकी।

फ्रांसीसी में, “Or c'este une misericorde qui merite d'estre deteestee, quand elle derogue a l'authorite de Dieu, et qu'elle la deminue selon qu'il semble bon aux hommes;” “वह दया घृणा के योग्य है, जो परमेश्वर के अधिकार को घटाती है, और जैसा मनुष्यों को अच्छा लगे उसके अनुसार उसे कम करती है।” — सं.

तौभी यह ध्यान देने योग्य है कि राजा उन पर अधिक कठोरता बरतने के उद्देश्य से नहीं, वरन् केवल अपमान के रूप में लटकाए गए, क्योंकि वे पहले ही मारे जा चुके थे। यह उचित था कि ईश्वरीय पलटे का यह स्मरणीय कार्य सब की आँखों के साम्हने खुले रूप से प्रदर्शित किया जाए। सम्भवतः ईश्वरीय अभिप्राय यह भी था कि अन्य जातियों को निराशा के द्वारा उन्मत्त बना दे, और उन्हें पागलपन तक पहुँचा दे, ताकि वे अपने हठ से इस्राएलियों के क्रोध को और तीव्र करके अपने ऊपर और शीघ्र विनाश ले आएँ। यही अपमान मक्केदा के राजा पर भी किया जाता है, यद्यपि उसने अपनी सेना बाहर नहीं निकाली थी, और वैसा ही विनाश सारी प्रजा पर भी किया जाता है, जो अपनी शहरपनाह के भीतर चुपचाप बैठी रही थी। सम्भव है कि उन्होंने शत्रुता का कोई प्रयत्न किया हो, परन्तु विशेष कारण यह था कि परमेश्वर ने सब पर एक ही दण्डाज्ञा सुनाई थी। शव साँझ को गुफा में क्यों डाले गए, यह मैं अन्यत्र समझा चुका हूँ। इसके अतिरिक्त, यह सारा इतिहास मानो दर्पण में हमारे सामने रखता है कि जब प्रभु अपने न्यायासन पर विराजमान होता है, तब संसार का सारा वैभव उसके साम्हने लुप्त हो जाता है, और जो श्रेष्ठ प्रतीत होते थे उनकी महिमा उसके न्याय से घोर अपमान में बदल जाती है।

यहोशू 10:29-43

29. तब यहोशू सब इस्राएलियों समेत मक्केदा से चलकर लिब्ना को गया, और लिब्ना से लड़ा;

29. Transivit deinde Josue et universus Israel cum eo de Makeda in Libna, et oppugnavit Libna.

30. और यहोवा ने उसको भी राजा समेत इस्राएलियों के हाथ में कर दिया; और यहोशू ने उसको और उसमें के सब प्राणियों को तलवार से मारा; और उसमें से किसी को भी जीवित न छोड़ा; और उसके राजा से वैसा ही किया जैसा उसने यरीहो के राजा के साथ किया था।

30. Tradiditque Jehova illam etiam in manum Israel, et regem ejus, et percussit eam acie gladii, omnemque animam quae erat in ea: non reliquit in ea superstitem, fecitque regi ejus quemadmodum fecerat regi Jericho.

फ्रांसीसी में, “Tout le peuple qui n'estoit point sorti de la ville n'en a pas eut meilleur conte;” “सारी प्रजा, जो नगर से बाहर नहीं निकली थी, उसकी दशा भी कुछ अच्छी न हुई।” — सं.

31. फिर यहोशू सब इस्राएलियों समेत लिब्ना से चलकर लाकीश को गया, और उसके विरुद्ध छावनी डालकर लड़ा;

31. Postea transivit Josue, et universus Israel cum eo de Libna in Lachis, et castrametatus est juxta eam, et oppugnavit eam.

32. और यहोवा ने लाकीश को इस्राएल के हाथ में कर दिया, और दूसरे दिन उसको जीत लिया; और जैसा उसने लिब्ना के सब प्राणियों को तलवार से मारा था वैसा ही उसने लाकीश से भी किया।

32. Deditque Jehova Lachis in manum Israel, et cepit eam die secunda, et percussit eam acie gladii, omnemque animam quae erat in ea prorsus ut fecerat Libna.

33. तब गेजेर का राजा होराम लाकीश की सहायता करने को चढ़ आया; और यहोशू ने प्रजा समेत उसको भी ऐसा मारा कि उसके लिये किसी को जीवित न छोड़ा।

33. Ascendit autem Horam rex Geser ad opem ferendam Lachis, et percussit eum Josue ac populum ejus, ut non reliquerit ei superstitem.

34. फिर यहोशू ने सब इस्राएलियों समेत लाकीश से चलकर एग्लोन को गया; और उसके विरुद्ध छावनी डालकर उससे लड़ने लगा;

34. Transivit insuper Josue et universus Israel cum eo de Lachis in Eglon, et castrametati sunt contra eam, et oppugnaverunt eam.

35. और उसी दिन उन्होंने उसको ले लिया, और उसको तलवार से मारा; और उसी दिन जैसा उसने लाकीश के सब प्राणियों का सत्यानाश किया था वैसा ही उसने उसमें के सब प्राणियों का भी सत्यानाश किया।

35. Ceperuntque eam die illo, et percusserunt acie gladii, et omnem animam quae illic erat, die illa interfecit prorsus ut fecerat Lachis.

36. फिर यहोशू सब इस्राएलियों समेत एग्लोन से चलकर हेब्रोन को गया, और उससे लड़ने लगा;

36. Ascendit postea Josue et universus Israel cum eo ab Eglon in Hebron, et oppugnaverunt eam.

37. और उन्होंने उसको ले लिया, और उसको और उसके राजा और सब गाँवों को, और उनमें के सब प्राणियों को तलवार से मारा; जैसा यहोशू ने एग्लोन से किया था वैसा ही उसने हेब्रोन में भी किसी को जीवित न छोड़ा; उसने उसको और उसमें के सब प्राणियों का सत्यानाश कर डाला।

37. Et ceperunt eam, et percusserunt acie gladii, et regem ejus, et omnia oppida ejus, atque omnem animam quae illic erat: non reliquit superstitem prorsus ut fecerat Eglon. Perdidit ergo eam atque omnem animam quae illic erat.

38. तब यहोशू सब इस्राएलियों समेत घूमकर दबीर को गया, और उससे लड़ने लगा;

38. Postea reversus est Josue, et universus Israel cum eo in Debir, et oppugnavit eam.

39. और राजा समेत उसे और उसके सब गाँवों को ले लिया; और उन्होंने उनको तलवार से घात किया, और जितने प्राणी उनमें थे सब का सत्यानाश कर डाला; किसी को जीवित न छोड़ा; जैसा यहोशू ने हेब्रोन और लिब्ना और उसके राजा से किया था वैसा ही उसने दबीर और उसके राजा से भी किया।

39. Et ceperunt eam, et percusserunt acie gladii, et regem ejus, et omnia oppida ejus, percusseruntque eos acie gladii, atque interfecerunt omnem animam quae illic erat. Non reliquit superstitem, quemadmodum fecerat Hebron, sic fecit Debir, et regi ejus: et quemadmodum fecerat Libna, et regi ejus.

40. इसी प्रकार यहोशू ने उस सारे देश को, अर्थात् पहाड़ी देश, दक्खिनी देश, नीचे के देश, और ढालू देश को, और उनके सब राजाओं को मारा; और इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की आज्ञा के अनुसार किसी को जीवित न छोड़ा, वरन् जितने प्राणी थे सब का सत्यानाश कर डाला।

40. Percussit itaque Josue omnem terram montanam, et meridianam, et campestrem, descensus acclives, et omnes reges earum: non reliquit superstitem: et omnem animam interfecit, quemadmodum praeceperat Jehova Deus Israel.

41. और यहोशू ने कादेशबर्ने से ले गाज़ा तक, और गिबोन तक के सारे गोशेन देश के लोगों को मारा।

41. Percussit itaque Josue a Cades Barne usque ad Asa, et universam terram Gosen usque ad Gibeon.

42. इन सब राजाओं को उनके देशों समेत यहोशू ने एक ही समय में ले लिया, क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा इस्राएलियों की ओर से लड़ता था।

42. Cunctos vero reges istos, et terram eorum cepit Josue simul: quia Jehova Deus Israelis pugnabat pro Israele.

43. तब यहोशू सब इस्राएलियों समेत गिलगाल की छावनी में लौट आया।

43. Inde reversus est Josue et universus Israel cum eo in castra in Gilgal.

29. तब यहोशू मक्केदा से चलकर, इत्यादि। अब हमारे सामने उन नगरों के लिये जाने का वर्णन है, जिनसे शत्रु की सेना खड़ी की गई थी; और इसमें परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य खुले मैदान से कम आश्चर्यजनक रीति से प्रकट नहीं की, विशेषकर जब उसकी शीघ्रता पर विचार किया जाए। क्योंकि यद्यपि जो लोग घबराकर वहाँ भाग आए थे, वे कुछ मात्रा में आतंक उत्पन्न कर सकते थे, तौभी भय शान्त हो जाने पर वे रक्षा के लिये उपयोगी हो सकते थे। उनकी संख्या से दुर्ग-सेना बढ़ गई थी। अतः जब थोड़े ही समय में यहोशू सब नगरों को ले लेता है, और छोटे कस्बों पर अधिकार कर लेता है, तब ऐसी सफलता में, जो अविश्वसनीय होने के साथ-साथ अप्रत्याशित भी थी, परमेश्वर की उपस्थिति स्पष्ट रूप से प्रकट हुई। क्योंकि यदि आक्रमण होने पर उन्होंने केवल अपने फाटक बन्द कर लिये होते, तो क्योंकि यहोशू न तो सीढ़ियाँ लाया था जिनसे वह शहरपनाह पर चढ़ सके, न यन्त्र जिनसे वह उसे गिरा सके, इसलिये हर एक घेराबन्दी में बहुत थकान और विलम्ब हो सकता था। अतः जब वह एक नगर को अगले दिन, और दूसरे को उसी दिन जिस दिन उस पर आक्रमण किया, ले लेता है, तो ये लगातार, सरल और शीघ्र विजयें स्पष्टतः मानवीय सामर्थ्य से परे हैं।

अतः अध्याय के अन्त में परमेश्वर की भलाई का स्पष्ट रूप से गुणगान अकारण नहीं किया गया, क्योंकि यह प्रकट हो चुका था कि वह इस्राएल की ओर से लड़ रहा था, जब यहोशू ने एक ही समय में इतने राजाओं को उनके प्रदेशों समेत ले लिया और जीत लिया। सचमुच, यदि बाधाओं को हटाकर ईश्वरीय रीति से मार्ग न खोला गया होता, तो वह निरीक्षण के लिये यात्रा करते हुए भी एक नगर से दूसरे नगर तक इतनी शीघ्रता से कभी न पहुँच पाता। आश्चर्यकर्म और भी बढ़ गया जब गेजेर का राजा, जो दूसरों की सहायता को आया था, निःसन्देह परिणाम के विषय में पूर्ण भरोसा रखते हुए, अचानक लगभग बिना किसी प्रयत्न के भगा दिया गया, और इस्राएलियों की प्रगति को रोक भी न सका। जो लोग नगरों में मारे गए, वे मानो दर्पण में उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनका दण्ड सर्वशक्तिमान स्थगित रखता है, जबकि वह दूसरों से वास्तव में पलटा लेता है। क्योंकि यद्यपि वे इस प्रकार मिली मोहलत पर घमण्ड करते हैं, तौभी उनकी दशा उससे भी बुरी है, मानो उन्हें तुरन्त मृत्यु की ओर घसीटा जाता।

फ्रांसीसी में, “Ils pourroyentt servir de defense pour garder les villes;” “वे नगरों की रखवाली के लिये रक्षा का काम दे सकते थे।” — सं.

ऐसा प्रतीत होता है मानो युद्धभूमि में गिरना एक भयानक विपत्ति होती; और वे भाग निकलकर अपनी शहरपनाह के भीतर सुरक्षा खोजते हैं। परन्तु वहाँ जो उनकी प्रतीक्षा कर रहा था वह कहीं अधिक भयानक था। उनकी पत्नियाँ और उनके बच्चे उनकी आँखों के साम्हने काट डाले जाते हैं, और उनकी अपनी मृत्यु उससे भी अधिक अपमानजनक होती है जितनी हाथ में तलवार लिये मरने में होती। अतः तिरस्कृत लोगों से उस थोड़े-से समय के कारण, जो प्रभु कभी-कभी उन्हें देता है, ईर्ष्या करने का कोई कारण नहीं, क्योंकि जब वे अपने आपको सुरक्षा का वचन देने लगते हैं, तब उन पर अचानक विनाश आ पड़ेगा। (1 थिस्सलुनीकियों 5:3।) इसी बीच, आओ हम सीखें कि जब परमेश्वर अपने न्याय को पूरा करने में विलम्ब करता है, तब उसके धीरज का दुरुपयोग न करें; और जब हम किसी संकट से छुटकारा पाए हुए प्रतीत हों, या उससे बचने के साधन सामने आएँ, तब आत्मसन्तोष में डूबने के बदले यिर्मयाह के उन शब्दों पर विचार करें (यिर्मयाह 24:2), कि जहाँ पहले पके अंजीरों की टोकरी में कम से कम कुछ स्वाद था, वहाँ दूसरी इतनी निकम्मी थी कि वे खाए न जा सकते थे।

40. इसी प्रकार यहोशू ने उस सारे देश को मारा, इत्यादि। यहाँ ईश्वरीय अधिकार फिर से बीच में लाया गया है, ताकि यहोशू को क्रूरता के हर आरोप से पूर्णतः निर्दोष ठहराया जाए। यदि वह अपनी ही इच्छा से स्त्रियों और बच्चों का अन्धाधुन्ध संहार करने में प्रवृत्त हुआ होता, तो कोई भी बहाना उसे घृणित क्रूरता के दोष से मुक्त न कर सकता; ऐसी क्रूरता जो उस किसी भी कार्य से बढ़कर होती जिसके विषय में हम पढ़ते हैं कि वह पशुओं के स्तर से कठिनाई से ऊपर उठी हुई बर्बर जातियों ने किया हो। परन्तु जिस बात से अन्यथा सब उचित ही भयभीत होते, उसे परमेश्वर की ओर से आई हुई जानकर श्रद्धा से ग्रहण करना उन्हें उचित है। दया की उचित ही प्रमुख सद्‌गुणों में से एक के रूप में प्रशंसा की जाती है; परन्तु यह उन लोगों की दया है जो अपने प्रति अन्याय होने पर, और व्यक्तिगत रूप से लहू बहाने में न्यायसंगत होने पर भी, अपने क्रोध को संयमित करते हैं। परन्तु क्योंकि परमेश्वर ने अपनी प्रजा की तलवारें एमोरियों के संहार के लिये ठहराई थीं, इसलिये यहोशू उसकी आज्ञा मानने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता था।

अतः इस तथ्य से न केवल सब मुँह बन्द हो जाते हैं, वरन् सब मन भी निन्दा करने का दुस्साहस करने से रोके जाते हैं। जब कोई सुनता है कि यहोशू ने अपने मार्ग में आनेवाले सब लोगों को बिना भेद के घात किया, यद्यपि उन्होंने अपने हथियार डाल दिए और दीनता से दया की भीख माँगी, तब केवल इस नंगे और सरल कथन से शान्त से शान्त मन भी उत्तेजित हो उठते हैं; परन्तु जब यह जोड़ा जाता है कि परमेश्वर ने ऐसी ही आज्ञा दी थी, तब उसके विरुद्ध निन्दा का उससे अधिक कोई आधार नहीं रहता, जितना अपराधियों पर दण्डाज्ञा सुनानेवालों के विरुद्ध होता है। यद्यपि, कम से कम हमारे विचार में, बच्चे और बहुत-सी स्त्रियाँ भी निर्दोष थीं, तौभी आओ हम स्मरण रखें कि स्वर्ग का न्यायासन हमारी व्यवस्थाओं के अधीन नहीं है। वरन्, जब हम देखते हैं कि हरे पौधे इस प्रकार जलाए जाते हैं, तो आओ हम, जो सूखी लकड़ी हैं, अपने लिये और भी भारी न्याय से डरें। और निश्चय ही, जो कोई मनुष्य अपने आपको भली-भाँति जाँचेगा, वह पाएगा कि वह सौ मृत्युओं के योग्य है। तो फिर प्रभु किसी ऐसे शिशु में भी, जो अभी-अभी अपनी माता की कोख से निकला हो, एक मृत्यु का न्यायसंगत कारण क्यों न देखे? हम व्यर्थ ही कुड़कुड़ाएँगे या कोलाहल के साथ शिकायत करेंगे कि उसने एक शापित जाति की सारी सन्तान को एक ही विनाश के लिये ठहरा दिया; कुम्हार तब भी अपने बरतनों पर, वरन् अपनी मिट्टी पर, पूर्ण अधिकार रखेगा।

लातीनी में, “Quam si mox ad mortem traherentur.” फ्रांसीसी में, “Que s'ils estoyent depeschez soudainement sur le champ;” “मानो उन्हें तुरन्त उसी स्थान पर समाप्त कर दिया जाता।” — सं. मूल पाठ में सन्दर्भ 2 थिस्सलुनीकियों 5:3 दिया गया था, जो स्पष्टतः छपाई की भूल है। — fj.

लातीनी में, “Ficus praecoces.” फ्रांसीसी में, “Les figues hastives;” “अगेती अंजीर, अर्थात् बहुत जल्दी पके हुए अंजीर।” — सं.

अन्तिम पद उस बात की पुष्टि करता है जो पहले कही जा चुकी है, कि सारी प्रजा का स्थायी पड़ाव गिलगाल में था; और जो सैनिक युद्ध के लिये निकले थे वे वहीं लौट आए, कि अपनी थकान से विश्राम करें, और अपनी लूट सुरक्षित रख दें। जब तक चिट्ठी डालने से यह न दिखा दिया जाता कि हर एक का स्थायी निवास कहाँ होगा, तब तक उन्हें और अधिक दूर-दूर बिखरने देना उचित न होता।

फ्रांसीसी में, “Car cela n'empeschera point que le potier n'ait puissance de faire de ses pots tout ce qu'il luy plaira;” “क्योंकि इससे कुम्हार को अपने बरतनों से जो कुछ वह चाहे बनाने के अधिकार में कोई बाधा न होगी।” — सं.

यह पद भी सेप्टुआजिंट में छोड़ दिया गया है। — सं.

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