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यहोशू 18
यहोशू 18:1-10
1. फिर इस्राएलियों की सारी मण्डली ने शीलो में इकट्ठी होकर वहाँ मिलापवाले तम्बू को खड़ा किया; और देश उनके वश में आ गया था।
1. Congregata est autem universa multitudo filiorum Israel in Silo, et collocaverunt ibi tabernaculum conventionis, postquam terra subjecta erat coram eis.
2. और इस्राएलियों में से सात गोत्र रह गए थे, जिनका निज भाग अभी तक बँटा न था।
2. Remanserunt autem e filiis Israel quibus non diviserant haereditatem suam, septem tribus.
3. तब यहोशू ने इस्राएलियों से कहा, जो देश तुम्हारे पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा ने तुम्हें दिया है, उसे अपने अधिकार में कर लेने को जाने में तुम कब तक ढिलाई करते रहोगे?
3. Dixitque Josue ad filios Israel, Usquequo cessatis ingredi, ut possideatis terram quam dedit vobis Jehova Deus patrum vestrorum?
4. अब प्रति गोत्र पीछे अपने में से तीन मनुष्य ठहरा लो; और मैं उन्हें भेजूँगा, और वे उठकर देश में घूमें फिरें, और अपने अपने निज भाग के अनुसार उसका हाल लिखकर मेरे पास लौट आएँ।
4. Tradite ex vobis tres viros per tribum, quos mittam: surgentque et ambulabunt per terram, describentque eam juxta haereditatem suam, postea revertentur ad me.
5. और वे उसके सात भाग करें: यहूदा तो दक्खिन की ओर अपनी सीमा में, और यूसुफ का घराना उत्तर की ओर अपनी सीमा में रहे।
5. Et parientur eam in septem portiones: Judas stabit in finibus suis a meridie: et familia Joseph stabunt in finibus suis ab aquilone.
6. इसलिये तुम देश के सात भाग लिखकर उसका वर्णन यहाँ मेरे पास ले आओ, ताकि मैं
6. Vosque describatis terram in septem partes, et afferatis ad me huc: tum projiciam vobis sortem hic coram Jehova Deo nostro. यहाँ हमारे परमेश्वर यहोवा के साम्हने तुम्हारे लिये चिट्ठी डालूँ।
7. परन्तु लेवियों का तुम्हारे मध्य में कोई भाग नहीं, क्योंकि यहोवा का याजकपद ही उनका निज भाग है; और गाद, रूबेन और मनश्शे के आधे गोत्र के लोग यरदन के पार पूर्व की ओर अपना वह निज भाग पा चुके हैं, जो यहोवा के दास मूसा ने उन्हें दिया था।
7. Non est enim pars Levitis in medio vestri, quia sacerdotium Jehovae est haereditas ejus: Gad autem et Ruben, et dimidia tribus Manasse acceperunt haereditatem suam citra Jordanem ad orientem, quam dedit ei Moses servus Jehovae.
8. तब वे पुरुष उठकर चल दिए; और जो देश का हाल लिखने को चले, उन्हें यहोशू ने यह आज्ञा दी, कि जाकर देश में घूमो फिरो, और उसका हाल लिखकर मेरे पास लौट आओ; और मैं यहाँ शीलो में यहोवा के साम्हने तुम्हारे लिये चिट्ठी डालूँगा।
8. Surrexeruntque viri illi, atque abierunt, praecepitque Josue istis qui ibant, ut describerent terram, dicendo: Ite, et ambulate per terram, ac describite eam: postea revertemini ad me, et hic projiciam vobis sortem coram Jehova in Silo.
9. तब वे पुरुष चल दिए, और देश में से होकर गए, और उसके नगरों के अनुसार उसके सात भाग करके उसका हाल एक पुस्तक में लिखा; और शीलो की छावनी में यहोशू के पास लौट आए।
9. Abierunt itaque viri, et transierunt per terram, atque descriperunt eam per urbes in septem partes, in libro: reversique sunt ad Josuam ad castra in Silo.
10. तब यहोशू ने शीलो में यहोवा के साम्हने उनके लिये चिट्ठियाँ डालीं; और वहीं यहोशू ने इस्राएलियों को उनके भागों के अनुसार देश बाँट दिया।
10. Misit autem eis Josua sortem in Silo coram Jehova: partitusque est ibi Josua terram filiis Israel secundum partes eorum.
1. “फिर इस्राएलियों की सारी मण्डली ने” इत्यादि। यहाँ हमें शीलो में हुई उस प्रसिद्ध सभा का वृत्तान्त मिलता है, जहाँ शेष चिट्ठियाँ डालने के विषय में विचार किया गया। क्योंकि यद्यपि उन्होंने भक्तिपूर्ण उत्साह से चिट्ठियाँ डालने का कार्य आरम्भ किया था, तौभी वह कार्यवाही बीच में रुक गई थी, मानो उस बँटवारे से पहले, जो केवल परमेश्वर के मुँह पर निर्भर था, विजय का होना आवश्यक हो। इसलिये वे यह निश्चित करने के लिये शीलो में इकट्ठे होते हैं कि आगे क्या करना आवश्यक है। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि यहोशू ने उन्हें उनकी सुस्ती से जगाने के लिये यह सभा बुलाई। क्योंकि वे अपनी ओर से कोई प्रस्ताव लेकर आगे नहीं आते, वरन् वह उन्हें यह उलाहना देकर आरम्भ करता है कि जो निज भाग परमेश्वर ने उन्हें प्रदान किया था, उसमें प्रवेश करने में वे आलसी और ढीले रहे हैं। उसके वचनों से यह अनुमान लगाना सहज है कि आरम्भ में उन्होंने बड़ी तत्परता दिखाई थी, परन्तु उसमें स्थिरता न रही थी।
तौभी वह आज्ञाकारिता, जो थोड़े ही समय बाद शिथिल पड़ गई, पवित्र आत्मा की सराहना से सम्मानित की गई। ध्यान देने योग्य है कि प्रजा को चिट्ठी डालने की उपेक्षा करने के लिये नहीं, वरन् उस निज भाग पर अधिकार न करने के लिये दोषी ठहराया गया है जो परमेश्वर की ओर से उन्हें दिया गया था। और निश्चय ही, जैसे चिट्ठी के द्वारा बँटवारा भरोसे का चिह्न था, वैसे ही हर एक को जो प्रदेश मिला, वह भावी अधिकार की निश्चित और विश्वासयोग्य बयाना था; क्योंकि हर एक को उसका भाग सौंपने में प्रभु उन्हें किसी प्रकार भी छल नहीं रहा था।
रपाह (רפה) शब्द, जिसका अनुवाद मैंने “रुक जाना” किया है, ढीला या निर्बल होने का भी अर्थ रखता है। इसलिये वह उन पर नीच हृदयहीनता का दोष लगाता है, क्योंकि जब शत्रु को खदेड़ने का पूरा समय आ पहुँचा था, तब वे अपने विलम्बों के द्वारा परमेश्वर की भलाई के प्रभाव को रोकते और टालते हैं। क्योंकि यदि वे केवल चिट्ठी से ही सन्तुष्ट होकर उसके दिए हुए परिणामों को विश्वास से ग्रहण करते, तो निःसन्देह वे युद्ध चलाने में तत्पर और फुर्तीले होते, वरन् विजेताओं के समान विजयोत्सव की ओर दौड़े चले जाते।
कहा गया है कि सन्दूक शीलो में रखा गया, न केवल इसलिये कि परमेश्वर की उपस्थिति में होने के कारण विचार-विमर्श अधिक गम्भीर और पवित्र हो, वरन् इसलिये भी कि वह स्थान पूर्ण रूप से अधीन किया जा चुका था, और सब बाहरी उपद्रव और हानि से सुरक्षित था। क्योंकि उनकी विशेष चिन्ता यह होनी चाहिए थी कि वह अचानक आक्रमण के लिये खुला न रहे। निःसन्देह परमेश्वर का हाथ किसी भी ओर से होनेवाले शत्रु के आक्रमणों को रोकने के लिये बढ़ाया जाता; तौभी, यद्यपि परमेश्वर उनके बीच वास करता था, उन्हें उसके रक्षक और सेवक समझा जाना था।
परन्तु यद्यपि उस समय सन्दूक के लिये एक स्थान चुना गया, तौभी वह कोई स्थायी निवास नहीं, केवल अस्थायी डेरा था। क्योंकि जिस स्थान में परमेश्वर वास करे, उसे निश्चित करना प्रजा की इच्छा या मतों पर नहीं छोड़ा गया था, वरन् उन्हें उस समय की बाट जोहनी थी जिसका व्यवस्था में बार-बार उल्लेख हुआ है, जब वह अपने नाम का स्मारक किसी अन्य स्थान पर स्थापित करनेवाला था। यह अन्त में तब पूरा हुआ जब सिय्योन पर्वत मन्दिर के लिये अलग किया गया। इसी कारण भजन में कहा गया है, “हे यरूशलेम, तेरे फाटकों के भीतर हम खड़े हुए हैं!” (भजन संहिता 122:2)
ये शब्द संकेत करते हैं कि उस समय तक सन्दूक परदेशी के समान इधर-उधर ठहरता फिरता था। अन्त में शीलो के विनाश और उजाड़ ने यह दिखा दिया कि कोई भी पद या प्रतिष्ठा उन लोगों को उसके प्रतिशोध से नहीं बचा सकती जो परमेश्वर की आशीषों को भ्रष्ट करते हैं। एली की मृत्यु तक परमेश्वर ने वहाँ अपने पवित्र नाम की आराधना होने दी; परन्तु जब याजकों की अभक्ति से सारा धर्म अशुद्ध हो गया, और प्रजा की कृतघ्नता से लगभग मिट गया, तब वह स्थान आनेवाली पीढ़ियों के लिये दण्ड का एक प्रत्यक्ष स्मारक बन गया। तदनुसार यिर्मयाह यरूशलेम के निवासियों से, जो अपने मन्दिर पर घमण्ड से डींग मार रहे थे, कहता है कि वे उस उदाहरण की ओर अपनी आँखें फेरें। प्रभु के नाम से बोलते हुए वह कहता है, “मेरा जो स्थान शीलो में था, जहाँ मैं ने पहले अपने नाम का निवास ठहराया था, वहाँ जाकर देखो कि मैं ने अपनी प्रजा इस्राएल की बुराई के कारण उसकी क्या दशा कर दी है।” (यिर्मयाह 7:12)
यह स्थान, जो बाद में यहोशू के शेष जीवन-काल और न्यायियों के शासन-काल में, एली की करुण मृत्यु तक, सन्दूक और तम्बू के स्थायी ठिकाने के रूप में इतना प्रसिद्ध हुआ, न्यायियों 21:19 में इस प्रकार वर्णित है, “बेतेल की उत्तर ओर, और उस सड़क की पूर्व ओर जो बेतेल से शकेम को चली गई है, और लबोना की दक्खिन ओर।” यह सूक्ष्म वर्णन उस स्थान से मेल खाता है जो अब सैलून कहलाता है, जो यरूशलेम से उत्तर-उत्तर-पूर्व की ओर लगभग बीस मील पर स्थित है, और जहाँ अनेक खण्डहर हैं जो किसी प्राचीन बस्ती के सूचक हैं। यदि यही वह स्थान था, तो वह देश के लगभग मध्य में था, और इस प्रकार वह सबसे सुविधाजनक स्थान था जो चुना जा सकता था। जहाँ एक ओर उसकी स्थिति के कारण वह सब ओर से सहज ही पहुँचने योग्य था, वहाँ दूसरी ओर उसका स्थल, जो पहाड़ियों से पूर्णतः घिरी हुई एक घाटी के बीच में था — केवल दक्खिन की ओर एक सकरी तराई एक मैदान में खुलती है — धार्मिक उपासना के शान्त और गम्भीर अनुष्ठान के लिये उसे अत्यन्त उपयुक्त बनाता था। — सं.
4. “अपने में से तीन मनुष्य ठहरा लो” इत्यादि। कालेब और यहोशू उन प्रदेशों का पहले ही निरीक्षण कर चुके थे, और प्रजा ने पूछताछ के द्वारा बहुत कुछ जान लिया था; तौभी यहोशू चाहता है कि देश ऐसे बाँटा जाए मानो प्रत्यक्ष निरीक्षण के अनुसार हो, और वह आज्ञा देता है कि सात गोत्रों में से हर एक के लिये तीन नापनेवाले ठहराए जाएँ, ताकि दो या तीन व्यक्तियों के मुँह से हर एक विवाद का निपटारा हो। परन्तु इक्कीस मनुष्यों को भेजने से अधिक असंगत कुछ प्रतीत नहीं होता, जिन्हें न केवल एक शत्रु देश में से सीधे होकर जाना था, वरन् उसके सब विभिन्न मोड़ों और घुमावों में उसका ऐसा पता लगाना था कि एक भी कोना बिना जाँचे न छूटे, उसकी लम्बाई और चौड़ाई का हिसाब लगाना था, और उसकी ऊँच-नीच का भी उचित ध्यान रखना था। जो कोई भी उन्हें मिलता, वह तुरन्त सन्देह कर लेता कि वे कौन हैं, और किस कारण इस यात्रा पर लगाए गए हैं। संक्षेप में, हज़ार मृत्युओं से होकर निकलने के सिवा उनके लिये लौटने का कोई खुला मार्ग न था। निश्चय ही वे किसी अन्धे और अविवेकी आवेग से इतने संकट का सामना न करते, और न यहोशू उन्हें ऐसे प्रत्यक्ष संकट में डालता, यदि वे यह न जानते होते कि वे सब जातियाँ, स्वर्ग से आतंकित होकर, शान्ति के सिवा और कुछ इतना नहीं चाहती थीं। क्योंकि यद्यपि वे इस्राएलियों से घृणा करती थीं, तौभी इतनी पराजयों से दब जाने के कारण वे उनके विरुद्ध उँगली उठाने का भी साहस न करती थीं; और इस प्रकार नापनेवाले, मानो किसी शान्त प्रदेश में से होकर, कुशलपूर्वक आगे बढ़ते गए, या तो व्यापार के बहाने से, या कम से कम किसी निर्दोष भेंट के बहाने से। यह भी सम्भव है कि उन्होंने अपने आप को अलग अलग टोलियों में बाँट लिया हो, और इस प्रकार यात्रा अधिक गुप्त रूप से की हो। यह तो निश्चित ही है कि यह सारा साहस और भरोसा उन्हें केवल एक ही स्रोत से मिल सकता था, अर्थात् सर्वशक्तिमान के पंखों की छाया में भरोसा रखने से, और इस प्रकार अन्धे और मूढ़ मनुष्यों से तनिक भी न डरने से। इसी कारण यहाँ उनकी तत्पर इच्छा की प्रशंसा की गई है। क्योंकि यदि उन्हें यह निश्चय न होता कि उन जातियों के हाथ ऊपर की सामर्थ्य से बाँध दिए गए हैं, तो उनके पास इनकार करने का एक न्यायसंगत और उचित कारण होता।
लातीनी में, “Quasi ex praesenti aspectu.” फ्रांसीसी में, “Comme s'ils eussent este presens sur le lieu;” “मानो वे उस स्थान पर उपस्थित रहे हों।” — सं.
लातीनी में, “Innoxii hospites.” फ्रांसीसी में, “Estrangers innocens qui passent leur chemin;” “अपने मार्ग से जाते हुए निर्दोष परदेशी।” — सं.
ये टिप्पणियाँ इस धारणा पर की गई हैं कि इस अवसर पर किया गया निरीक्षण अत्यन्त सूक्ष्म था, जिसमें, जैसा कैल्विन यहाँ कहता है, सब “विभिन्न मोड़ और घुमाव” सम्मिलित थे, ताकि एक भी कोना बिना जाँचे न छूटे, और वह उतनी ही सूक्ष्मता से न केवल वास्तव में जीते हुए देशों तक, वरन् उन देशों तक भी फैला था जो अब भी मूल निवासियों के निर्विवाद अधिकार में थे। यदि इसे तथ्य मान लिया जाए, तो नापनेवालों को जिन संकटों का सामना करना पड़ा, उनका यहाँ दिया गया अत्यन्त सजीव वर्णन निश्चय ही अतिरंजित नहीं है, और आश्चर्यकर्मों के रूप में हस्तक्षेपों की एक शृंखला के सिवा और कुछ उन्हें बचा न सकता था। तौभी यह सुझाव दिया जा सकता है कि नापनेवालों का उद्देश्य केवल ऐसी सामान्य नाप प्राप्त करना था जो, पहले समझाई गई रीति से, चिट्ठी डालने के लिये पर्याप्त हो, और ऐसी नाप सम्भवतः वास्तविक निवासियों का सन्देह जगाने या उनकी शत्रुता भड़काने के अधिक संकट के बिना ली जा सकती थी। कि निरीक्षण सूक्ष्म की अपेक्षा सरसरी था, इसका संकेत यहोशू 18:9 में उसके दिए गए वर्णन से मिलता प्रतीत होता है, “तब वे पुरुष चल दिए, और देश में से होकर गए, और उसके नगरों के अनुसार उसका हाल लिखा।” — सं.
9. “तब वे पुरुष चल दिए, और देश में से होकर गए” इत्यादि। यहाँ न केवल उस तत्पर आज्ञाकारिता की प्रशंसा की गई है जिसके द्वारा उनका सद्गुण प्रत्यक्ष रूप से चमक उठा, वरन् प्रभु भक्त यहोशू और प्रजा के उत्साह को उल्लेखनीय सफलता प्रदान करने की कृपा करके अपने अनुग्रह का एक विशिष्ट प्रदर्शन करता है। यदि वे भूमि के नीचे की सुरंगों में से रेंगते हुए भी चलते, तौभी अनगिनत संकटों से कठिनाई से ही बच पाते; परन्तु अब जब वे नगरों और उनकी स्थितियों का, खेतों का, प्रदेशों की विविध बनावट का, और सारे सिवानों का लेखा लेते हैं, और बिना किसी प्रतिकूल घटना से भेंट किए, कुशल से अपने देशवासियों के पास लौट आते हैं, तो कौन सन्देह कर सकता है कि हज़ार मृत्युओं के बीच परमेश्वर की सामर्थ्य के अद्भुत प्रयोग के द्वारा उनका जीवन सुरक्षित रखा गया था? तदनुसार बल देकर कहा गया है कि वे परमेश्वर के अनुग्रह का गुणगान करने के लिये लौटे, जो ठीक यह कहने के तुल्य है कि वे परमेश्वर के हाथ के द्वारा लौटाए गए। इसी से प्रजा अधिक स्वेच्छा से चिट्ठी डालने की ओर बढ़ी। क्योंकि यदि वे उस यात्रा में परमेश्वर के अनुग्रह का एक विशिष्ट प्रदर्शन न देखते, जो उन्हें यह प्रतिज्ञा देता था कि अन्तिम परिणाम उनकी इच्छा के अनुसार होगा, तो उनके मन अब तक भी अरुचि से भली-भाँति शुद्ध न हुए होते। इसलिये कहा गया है कि यहोशू ने हर एक के निज भाग के अनुसार बाँटा, मानो वह उन्हें किसी शान्त अधिकार में प्रवेश करने को भेज रहा हो, यद्यपि उसका फल परमेश्वर की उपस्थिति पर निर्भर था; क्योंकि उनके लिये इतना ही पर्याप्त होना चाहिए था कि सारा कार्य परमेश्वर के अधिकार से चलाया गया, जो अपनी प्रजा को कभी धोखा नहीं देता, तब भी नहीं जब वह उनसे खेल करता हुआ प्रतीत होता है। वाचा का सन्दूक किस अर्थ में परमेश्वर, अथवा परमेश्वर का मुख कहलाता है, यह मैं अनेक स्थलों में पहले ही समझा चुका हूँ।
यहोशू 18:11-28
11. और बिन्यामीनियों के गोत्र की चिट्ठी उनके कुलों के अनुसार निकली; और उनके भाग की सीमा यहूदियों और यूसुफियों के बीच में पड़ी।
11. Ascendit autem sors tribus filiorum Benjamin per familias suas, et exivit terminus sortis eorum inter filios Jehuda, et filios Joseph:
12. और उनकी उत्तरी सीमा यरदन से आरम्भ हुई, और वह सीमा यरीहो की उत्तर अलंग से चढ़ती हुई पश्चिम की ओर पहाड़ी देश में होकर गई; और बेतावेन के जंगल में निकली;
12. Fuitque eis terminus ad latus Aquilonis a Jordane: et ascendit terminus ad latus Jericho ab Aquilone, ascenditque in montem ad mare, ac exitus ejus sunt ad desertum Bethaven.
13. वहाँ से वह सीमा लूज को, अर्थात् लूज की दक्खिन अलंग को पहुँची (जो बेतेल भी कहलाता है), और वह सीमा निचले बेथोरोन की दक्खिन ओर के पहाड़ के पास होकर अत्रोतद्दार को उतर गई।
13. Illinc autem pertransit terminus in Luz ad latus Luz Australe, (ipsa est Beth-el) et descendit terminus in Ateroth-Adar, juxta montem, qui est a meridie ipsi Bethhoron inferiori.
14. फिर वहाँ से वह सीमा खींची गई, और मुड़कर
14. Et designatur terminus, circuitque ad latus maris ad meridiem, a monte qui est e regione Bethhoron ad meridiem: suntque exitus ejus ad Cirjath-Baal, (ipsa est Cirjath-Jearim,) urbem filiorum Jehuda, hoc est latus maris. समुद्र की ओर के कोने से होती हुई दक्खिन की ओर गई, अर्थात् बेथोरोन के साम्हने के दक्खिनी पहाड़ से होकर; और यहूदियों के एक नगर किर्यत्बाल पर, जो किर्यत्यारीम भी कहलाता है, निकली; पश्चिमी अलंग यही थी।
15. और दक्खिनी अलंग किर्यत्यारीम के सिरे से आरम्भ हुई, और वह सीमा पश्चिम की ओर निकलकर नेप्तोह के सोते तक पहुँची;
15. Latus autem ad meridiem, ab extremo Cirjath-Jearim: itaque exit terminus ad mare, exit, inquam, ad fontem aquarum Nephthoah.
16. और वह सीमा उस पहाड़ के सिरे पर उतरी, जो हिन्नोम के पुत्र की तराई के साम्हने, और रपाईम नाम तराई की उत्तर ओर है; और वहाँ से वह हिन्नोम की तराई में, अर्थात् यबूस की दक्खिन अलंग होकर एनरोगेल को उतरी;
16. Et descendit terminus ad extremum montis, qui est e regione vallis Benhinnom, quique est in valle Rephaim ad aquilonem, descenditque ad vallem Hinnom ad latus Jebusi, ad meridiem, et illinc descendit ad Enrogel.
17. फिर वह उत्तर की ओर से घूमकर एनशेमेश को निकली, और वहाँ से गलीलोत की ओर गई, जो अदुम्मीम की चढ़ाई के साम्हने है, और फिर रूबेन के पुत्र बोहन के पत्थर तक उतरी;
17. Et circuit ab aquilone, et exit ad En-semes, atque egreditur ad Geliloth, quae est e regione contra ascensum Adummim: et descendit Eben Bohan filii Ruben.
18. और वहाँ से उत्तर की ओर जाकर अराबा के साम्हने की अलंग से होती हुई अराबा को उतरी;
18. Illinc pertransit ad latus quod est e regione planitiei ad aquilonem, et descendit in Arabah.
19. वहाँ से वह सीमा बेथोग्ला की उत्तर अलंग से होकर गई; और उस सीमा का अन्त खारे ताल की उत्तरी खाड़ी पर, यरदन के दक्खिनी सिरे पर हुआ; दक्खिन की सीमा यही थी।
19. Inde pertransit terminus ad latus Beth-hogla ad aquilonem: suntque exitus termini ad limitem maris salis ad aquilonem, ad extremum Jordanis ad meridiem: iste est terminus austri.
20. और पूर्व की ओर उसकी सीमा यरदन ही ठहरी। बिन्यामीनियों का निज भाग, चारों ओर की सीमाओं सहित, उनके कुलों के अनुसार यही था।
20. Et Jordanes terminat eum ad latus orientis. Ista est haereditas filiorum Benjamin per terminos suos in circuitu per familias suas.
21. और बिन्यामीनियों के गोत्र के नगर उनके कुलों के अनुसार ये थे, अर्थात् यरीहो, बेथोग्ला, एमेक्कसीस,
21. Fueruntque urbes istae tribus filiorum Benjamin per familias suas Jericho, et Beth-hoglah, et vallis Cesis,
22. बेतराबा, समारैम, बेतेल,
22. Et Beth-araba, et Semaraim, et Beth-el,
23. अव्वीम, पारा, ओप्रा,
23. Et Avim, et Parah, et Ophrah,
24. कपरम्मोनी, ओप्नी और गेबा; ये बारह नगर और इनके गाँव;
24. Et villa Haamonai, et Ophni, et Gaba: civitates duodecim, et villae carum.
25. गिबोन, रामा, बेरोत,
25. Gibon, et Ramah, et Beeroth,
26. मिस्पे, कपीरा, मोसा,
26. Et Mispeh, et Chephirah, et Mosah,
27. रेकेम, यिर्पेल, तरला,
27. Et Recem, et Irpeel, et Tharalah,
28. सेला, एलेप, यबूस (जो यरूशलेम है), गिबत और किर्यत; ये चौदह नगर और इनके गाँव। बिन्यामीनियों का निज भाग उनके कुलों के अनुसार यही था।
28. Et Sela, Eleph, et Jebusi (ipsa est Jerusalem,) Gibath, Cirjath: civitates quatuordecim, et villae earum. Ista est haereditas filiorum Benjamin per familias suas.
बिन्यामीन की चिट्ठी में विशेष ध्यान देने योग्य कुछ नहीं मिलता, सिवाय इसके कि एक छोटा गोत्र दूसरों से पहले स्थान पाता है। मैं मानता हूँ कि उसकी सीमाएँ उसकी थोड़ी जनसंख्या के अनुपात में सकेत कर दी गईं, क्योंकि उसे केवल छब्बीस नगर मिले; तौभी केवल इसी बात में उसे एक सम्मान दिया गया कि उसने अधिक प्रतिष्ठित गोत्रों से पहले अपना निज भाग पाया। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि इस रीति से वे यूसुफ की सन्तान से, जिनके साथ उनका सम्बन्ध अधिक निकट का था, जोड़े गए और उनके पड़ोसी बनाए गए। क्योंकि वे एक ओर एप्रैम और मनश्शे की सन्तान के, और दूसरी ओर यहूदा की सन्तान के बीच में रखे गए। उन्हें यह विशिष्ट सम्मान भी मिला कि यरूशलेम उनके निज भाग में सम्मिलित था, यद्यपि बाद में उन्होंने उसे एक प्रकार के अस्थायी अधिकार के रूप में यहूदा की सन्तान को राजधानी बनाने के लिये सौंप दिया।
तौभी यह विचित्र बात है कि ऐसा शान्त स्थान पाकर भी वे अपने पड़ोसियों के साथ शान्ति और मित्रता से न रहे। परन्तु हमारे पास याकूब की यह भविष्यद्वाणी है, “बिन्यामीन फाड़नेहारा हुँडार है, सबेरे तो वह अहेर भक्षण करेगा, और साँझ को लूट बाँट लेगा।” (उत्पत्ति 49:27)
लातीनी में, “Reliquis filiis.” फ्रांसीसी में, “Des autres enfans;” “दूसरी सन्तान से,” — यह स्पष्टतः एक चूक है, मानो बिन्यामीन यूसुफ का भाई नहीं, वरन् पुत्र रहा हो। — सं.
लातीनी में, “Postea filiis Juda quasi precario sedem regiam concederent.” फ्रांसीसी में, “Depuis ils la baillerent aux enfans de Juda comme par emprunt, pour en faire le siege royal;” “बाद में उन्होंने उसे मानो उधार के रूप में यहूदा की सन्तान को राजधानी बनाने के लिये दे दिया।” इन शब्दों से ऐसा संकेत मिलता प्रतीत होता है कि किसी न किसी समय इस आशय का कोई नियमित समझौता किया गया था, परन्तु ऐसे किसी समझौते का उल्लेख हमें कहीं नहीं मिलता। बल्कि यहोशू 15:63, और न्यायियों 1:8, 21 से ऐसा प्रतीत होता है कि यहूदा के लोगों ने यरूशलेम को यबूसियों से छीन लेने के परिणामस्वरूप उस पर अधिकार पाया। — सं.
इसलिये या तो वे स्वभाव से लोभी और उपद्रवी प्रवृत्ति के रहे होंगे, या किसी ऐसी आवश्यकता से, जो अब हमें ज्ञात नहीं, लूट पर जीवन बिताने को विवश हुए होंगे। लूज नगर के विषय में उसका दूसरा नाम जोड़ा गया है (“जो बेतेल भी कहलाता है”), क्योंकि याकूब का दिया हुआ नाम तभी सामान्य प्रयोग में आया। (उत्पत्ति 28:19) वह बेतावेन से बहुत दूर न था, जिसका नाम, निन्दनीय और कुख्यात होने के कारण, स्वयं बेतेल पर लागू कर दिया गया, जब वह अभक्तिपूर्ण अन्धविश्वासों से भ्रष्ट और अशुद्ध हो गया। सम्भव है कि किर्यत्बाल को किर्यत्यारीम इसलिये कहा गया कि उस मूरत का नाम मिटा दिया जाए, जो उसकी सच्ची भक्ति पर कलंक होता। क्योंकि यह निश्चय ही नीच और लज्जाजनक बात होती कि प्रजा के होंठ ऐसे रक्षक के नाम से अशुद्ध हों, जो सच्चे परमेश्वर का शत्रु था।
यह यारोबाम के द्वारा सोने के बछड़ों की स्थापना की ओर संकेत करता है, और जो मूर्तिपूजा उसके द्वारा इस प्रकार अभक्ति से आरम्भ हुई, उसे उसके उत्तराधिकारी बहुत समय तक करते रहे। देखिए 1 राजा 12:28-33; 1 राजा 13; 2 राजा 10:29-31; 2 राजा 23:15; आमोस 4:4; आमोस 5:4-6; होशे 4:15; होशे 10:5,8। बेतेल, अर्थात् “परमेश्वर का भवन”, जिसे याकूब ने अपने अद्भुत दर्शन के बाद सबेरे उठकर यह नाम दिया था, वहाँ किए गए घृणित कामों के कारण अपना नाम खोकर बाद में बेतावेन, अर्थात् “मूरतों का भवन”, अथवा व्यर्थता और अधर्म का भवन, के नाम से जाना जाने लगा। — सं.
