यहोशू की पुस्तक पर टीका · अध्याय 1

यहोशू 1

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यहोशू 1

यहोशू 1:1-4

1. यहोवा के दास मूसा की मृत्यु के बाद ऐसा हुआ कि यहोवा ने नून के पुत्र यहोशू से, जो मूसा का सेवक था, कहा,

1. Fuit autem post mortem Mosis, ut Jehova alloqueretur Josue, dicendo,

2. मेरा दास मूसा मर गया है; सो अब तू उठ, और इस सारी प्रजा समेत इस यरदन के पार होकर उस देश को जा जिसे मैं उनको, अर्थात् इस्राएलियों को, देता हूँ।

2. Moses servus meus mortuus est: nunc ergo surge, trajice Jordanem istum tu, et omnis hic populus, ad terram quam ego do illis, nempe filiis Israel.

3. उस वचन के अनुसार जो मैंने मूसा से कहा, जिस-जिस स्थान पर तुम्हारे पाँव का तलवा पड़ेगा वह सब मैंने तुम्हें दे दिया है।

3. Omnem locum quem calcaverit planta pedis vestri vobis dedi; quemadmodum locutus sum Mosi.

4. जंगल और इस लबानोन से लेकर परात महानद तक, अर्थात् हित्तियों का सारा देश, और सूर्यास्त की ओर महासमुद्र तक तुम्हारी सीमा ठहरेगी।

4. A desserto et Libano isto usque ad flumen magnum, flumen Euphraten, tota terra Hittaeorum usque ad mare magnum ad occasum solis, erit terminus vester.

1. “मूसा की मृत्यु के बाद” इत्यादि। यहाँ, पहले, हम परमेश्वर की वह स्थिरता देखते हैं जिससे वह अपनी प्रजा की चौकसी करता और उसकी सुरक्षा का प्रबन्ध करता है। नई आज्ञा देकर यहोशू की नए अगुवे के रूप में नियुक्ति पर जो मुहर लगाई गई, उसका अभिप्राय यह दिखाना था कि परमेश्वर का अनुग्रह बना हुआ है, और यह भी कि लोग मूसा की मृत्यु के कारण अपने आप को त्यागा हुआ न समझ बैठें। यहोशू तो पहले ही प्रजा पर शासन करने के लिए चुना जा चुका था; और न केवल उस पद पर बैठाया गया था, वरन् आत्मिक वरदानों से भी सम्पन्न किया गया था। परन्तु जैसे अत्यन्त वीर पुरुष भी, चाहे वे कितने ही सुसज्जित क्यों न हों, कार्य का समय आने पर ठिठकने या डगमगाने लगते हैं, वैसे ही यहोशू को यह उपदेश देना कि वह तुरन्त अभियान के लिए तैयार हो जाए, किसी प्रकार भी व्यर्थ न था। तौभी इस प्रकार विधिपूर्वक दी गई यह बुलाहट उतनी उसके अपने निमित्त नहीं थी, जितनी इसलिए कि प्रजा पूरे भरोसे के साथ उस अगुवे के पीछे चले जिसे वे परमेश्वर द्वारा उसके लिए ठहराए गए मार्ग पर पग-पग आगे बढ़ते देखते थे।

समुच्चयबोधक अव्यय, जिससे यह पुस्तक आरम्भ होती है और जिसका अनुवाद साधारणतः “और”, अथवा हमारे अंग्रेज़ी अनुवाद के समान “अब” किया जाता है, स्पष्ट रूप से इसे किसी पूर्ववर्ती लेख से जोड़ता है, और ऐसा प्रतीत होता है कि वह व्यवस्थाविवरण की पुस्तक के क्रम-विस्तार के रूप में कैनन में इसके स्थान को सही ठहराता है। पहले पद में कैल्विन का लातीनी अनुवाद “यहोवा का दास” और “मूसा का सेवक”, इन विशेषणों को छोड़ देता है, जो क्रमशः मूसा और यहोशू के लिए प्रयुक्त हुए हैं। इब्रानी में दोनों हैं, परन्तु पहला विशेषण सेप्टुआजिंट के साधारण पाठ में छोड़ दिया गया है, यद्यपि वह उसके पाठान्तरों में रखा गया है। — सं.

“नई आज्ञा देकर।” लातीनी में, “Repetitis mandatis.” फ्रांसीसी में, “En reiterant les articles de sa commission;” “अपने आदेश की धाराओं को दोहराकर।” — सं.

2. “मेरा दास मूसा” इत्यादि। इससे दो अर्थ निकाले जा सकते हैं — एक यह, कि क्योंकि मूसा मर गया है, इसलिए अब सारा भार तुझ पर आ पड़ा है; जिसका तू उत्तराधिकारी ठहराया गया है, उसका स्थान ग्रहण कर; दूसरा यह, कि यद्यपि मूसा मर गया है, तौभी रुक न जा, वरन् आगे बढ़। मैं पहले अर्थ को अच्छा समझता हूँ, क्योंकि उसमें यह निष्कर्ष निहित है कि उसे उत्तराधिकार के अधिकार से वह पद सम्भालना था जिसे मूसा रिक्त छोड़ गया था। मूसा के लिए प्रयुक्त “दास” का विशेषण या उपनाम प्रजा पर उसके शासन और उसके महान कार्यों से सम्बन्ध रखता है; क्योंकि उसे प्रसंग की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप ही समझना चाहिए। यहाँ संकेत व्यवस्था की ओर नहीं, वरन् उस अगुवाई की ओर है जो मूसा के देहान्त से यहोशू को प्राप्त हुई थी; और परमेश्वर इस प्रकार अपने दास को स्वीकार करता है, उसकी प्रशंसा करने के उद्देश्य से उतना नहीं, जितना यहोशू के अधिकार को दृढ़ करने के लिए, जो उसके स्थान पर नियुक्त किया गया था। और क्योंकि सम्भव था कि प्रजा केवल एक आज्ञा से भली-भाँति सन्तुष्ट न होती, इसलिए वह उन्हें यरदन पार करने की आज्ञा देते हुए यह प्रतिज्ञा भी करता है कि वह उन्हें सारे देश का, और उसके उस प्रत्येक स्थान का जिस पर वे अपना पाँव रखें, शान्तिपूर्ण अधिकार देगा। क्योंकि जैसे अविश्वास से बढ़कर कोई वस्तु हमें आलसी और निकम्मा नहीं बनाती, वैसे ही जब परमेश्वर शुभ परिणाम का वचन देता है, तब भरोसा हमें हर प्रयत्न के लिए उत्साह से भर देता है।

यह भी जोड़ा जा सकता है कि वह अब पहली बार कोई ऐसी प्रतिज्ञा करके, जिसे उन्होंने पहले कभी न सुना था, उन्हें शुभ आशाएँ देना आरम्भ नहीं करता, वरन् उन्हें वह स्मरण दिलाता है जिसकी गवाही मूसा पहले दे चुका था। इसलिए वह कहता है कि अब वह समय आ गया है जब उसने मूसा से जो प्रतिज्ञा की थी, उसे वह प्रकट करे और पूरा करे। यदि कोई यह आपत्ति करे कि यही बात मूसा के जन्म से बहुत पहले अब्राहम से कही गई थी, वरन् अब्राहम के पास धरोहर के रूप में रखी गई सदा की वाचा में वह सब कुछ सम्मिलित था जो चार सौ वर्ष बाद मूसा ने सुना; तो मेरा उत्तर यह है कि यहाँ उस प्राचीन प्रतिज्ञा का उल्लेख नहीं किया गया जो सर्वत्र जानी-मानी और प्रसिद्ध थी, और मूसा को एक ऐसे गवाह के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसकी स्मृति अधिक ताज़ी थी, और जिसकी मृत्यु से प्रजा का भरोसा डगमगा सकता था, यदि परमेश्वर यह घोषित न करता कि जो कुछ उसने कहा था, उस सब के पूरे होने का समय निकट है।

अथवा यों कहें, “जिसके विषय में वे देखते थे कि जब तक प्रभु उसके आगे न चला, तब तक उसने एक भी पग आगे न बढ़ाया।” — सं. “जिसे मूसा रिक्त छोड़ गया था।” लातीनी में, “Ex qua decesserat Moses.” फ्रांसीसी में, “De laquelle Moyse estoit sorti ayant fait son temps;” “जिसे मूसा अपना समय पूरा करके छोड़ गया था।” — सं.

“वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप।” लातीनी में, “Ad circumstantiam loci.” फ्रांसीसी में, “A la circonstance du passage;” “प्रसंग की परिस्थिति के अनुरूप।” — सं.

फ्रांसीसी अनुवाद यहाँ वही अर्थ व्याख्यात्मक रूप में देता है, “Ou mesmes qu'a parler proprement, tout ce qui a este dit a Moyse dependoit de l'alliance perpetuelle que Dieu avoit mise en garde entre les mains d'Abraham quatre cens ans auparavant.” “अथवा ठीक-ठीक कहें तो, जो कुछ मूसा से कहा गया था वह सब उस सदा की वाचा पर निर्भर था जिसे परमेश्वर ने चार सौ वर्ष पहले अब्राहम के हाथों में धरोहर के रूप में सौंपा था।” — सं.

4. “जंगल और इस लबानोन से” इत्यादि। इस प्रतिज्ञा की सच्चाई और पूर्ति ने प्रजा की दुष्टता द्वारा खड़ी की गई सब बाधाओं पर कैसे विजय पाई, यद्यपि उन्हें सारे प्रदेश का अधिकार तुरन्त न मिला, यह मैं विषय-सार में समझा चुका हूँ। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने उन्हें देश का स्वामी बनाकर अपनी भलाई के अनमोल भण्डार खोल दिए थे, तौभी इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता था कि उनके दुराचरण का दण्ड न दिया जाए। वरन् उस धमकी का पूरा होना आवश्यक था जो मूसा ने सुनाई थी, अर्थात् यदि विनाश के लिए ठहराई गई जातियों का नाश न किया गया, तो वे उनकी आँखों में काँटे और उनके पांजरों में कीलें बनेंगी। परन्तु जैसे वह प्रतिज्ञा उन चालीस वर्षों के विलम्ब से, जिनमें वे जंगल में भटकाए गए, किसी प्रकार भी टूटी या व्यर्थ नहीं हुई, वैसे ही सम्पूर्ण अधिकार ने, यद्यपि वह बहुत समय तक टला रहा, उस ठहराव की सच्चाई प्रमाणित कर दी जिसके द्वारा वह देश उन्हें दिया गया था।

प्रजा के लिए यह सम्भव था कि वह ठहराई गई सीमाओं को उचित समय पर अपने अधिकार में ले ले; उन्होंने ऐसा करना अस्वीकार किया। इसके कारण वे इस योग्य थे कि पूरी रीति से निकाल दिए जाते। परन्तु ईश्वरीय कृपा ने उन्हें इतना प्रदेश दे दिया जो उनके सुखपूर्वक बसने के लिए पर्याप्त था; और यद्यपि पहले से कहा गया था कि न्यायोचित दण्ड के रूप में, जिन जातियों को उन्होंने छोड़ दिया था उनके बचे हुए लोग उनके लिए विनाशकारी सिद्ध होंगे, तौभी उन्हें तब तक कोई कष्ट न हुआ जब तक उन्होंने अपने विश्वासघात और लगभग निरन्तर धर्मत्याग से परमेश्वर के क्रोध को न भड़काया: क्योंकि जब-जब उनकी दशा समृद्ध हुई, तब-तब वे उच्छृंखलता की ओर मुड़ गए। तौभी, परमेश्वर की अद्भुत भलाई के कारण, जब वे शत्रु की हिंसा से दबाए गए, और मानो कब्र तक धकेल दिए गए, तब भी वे मृत्यु में जीवित बने रहे; और केवल इतना ही नहीं, वरन् समय-समय पर छुड़ानेवाले उठ खड़े हुए, और सब आशा के विपरीत उन्हें विनाश से उबार लिया।

अन्तिम दो वाक्य फ्रांसीसी में केवल एक वाक्य हैं, जो इस प्रकार है, “Le peuple pouuoit du premier coup, et des l'entree s'estendre jusqu'aux bornes que Dieu lui mesme auoit marquees; il n'a pas voulu: il estoit bien digne d'en estre mis dehors, et du tout forclos.” “प्रजा पहले ही आघात में, और प्रवेश करते ही, उन सीमाओं तक फैल सकती थी जिन्हें परमेश्वर ने स्वयं ठहराया था; उन्होंने ऐसा न चाहा: वे इस योग्य थे कि बाहर निकाल दिए जाएँ और पूरी रीति से वंचित कर दिए जाएँ।” — सं.

लातीनी में, “Qui praeter spem rebus perditis succurrerent;” फ्रांसीसी में, “Qui outre toute esperance venoyent a remedier aux affaires si fort deplorez, et redresser aucunement l'estat du peuple;” “जो सब आशा के विपरीत आकर अत्यन्त शोचनीय दशा का उपचार करते, और कुछ सीमा तक प्रजा की स्थिति को फिर सुधार देते थे।” — सं.

महासमुद्र का अर्थ भूमध्य सागर है, और हित्तियों का देश उसकी विपरीत सीमा बनाता है; उसी प्रकार लबानोन परात के विपरीत रखा गया है; परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि लबानोन के अन्तर्गत जंगल भी सम्मिलित है, जैसा एक अन्य स्थल से प्रकट होता है।

यहोशू 1:5-9

5. तेरे जीवन भर कोई तेरे साम्हने ठहर न सकेगा; जैसे मैं मूसा के संग रहा वैसे ही तेरे संग भी रहूँगा; और न तो मैं तुझे धोखा दूँगा, और न तुझ को छोड़ूँगा।

5. Non consistet quisquam contra te cunctis diebus vitae tuae; quia sicuti fui cum Mose, ita ero tecum; non te deseram, neque derelinquam.

6. इसलिए हियाव बाँधकर दृढ़ हो जा; क्योंकि जिस देश के देने की शपथ मैंने इन लोगों के पूर्वजों से खाई थी, उसका अधिकारी तू इन्हें निज भाग के रूप में करेगा।

6. Confirmare, ergo, et roborare; quia tu in haereditatem divides populo huic terram, de qua juravi patribus eorum me daturum illis.

यहाँ कैल्विन की भाषा बहुत स्पष्ट नहीं है, और वह भ्रामक धारणा देती प्रतीत होती है। जंगल या मरुभूमि लबानोन के अन्तर्गत सम्मिलित होने के बदले स्पष्ट रूप से उसके विपरीत रखी गई है, और दक्षिणी सीमा बनाती है, जबकि लबानोन उत्तरी सीमा बनाता है। इस प्रकार हमें तीन बड़ी प्राकृतिक सीमाएँ मिलती हैं — उत्तर में लबानोन, दक्षिण में सीन का जंगल, और पश्चिम में भूमध्य सागर। पूर्वी सीमा अधिक कठिनाई उत्पन्न करती है। कुछ लोगों के अनुसार परात को स्पष्ट रूप से यही सीमा बताया गया है, और इस्राएलियों के वास्तविक अधिकार-क्षेत्र में, उनके इतिहास के सबसे समृद्ध काल में भी, और इस प्रकार सीमाबद्ध प्रदेश में जो विशाल अन्तर है, उसका मेल बैठाने का प्रयत्न सन्त अगस्तीन की व्याख्या का सहारा लेकर किया जाता है, जो यहोशू पर अपनी टीका 21 में यह मत देता है कि कनान की वास्तविक सीमाओं से परे पूर्व की ओर फैला हुआ देश अधिकार के लिए उतना नहीं, जितना कर लेने के लिए दिया जाना था। इस मत को उन विस्तृत विजयों से कुछ समर्थन मिलता है जो दाऊद और सुलैमान ने कीं। अन्य व्याख्याकारों के अनुसार परात को लबानोन के साथ जोड़कर समझना चाहिए, कि वह अपने किसी मोड़ या शाखा के द्वारा उत्तरी सीमा का भाग बनाए, जबकि पूर्वी सीमा अनिश्चित छोड़ दी गई है, अथवा यों कहें कि वह यरदन के द्वारा इतनी भली-भाँति निश्चित थी कि उसका अलग से उल्लेख करना आवश्यक न था। इस सामान्य अनिश्चितता में कैल्विन के विषय-सार में दिए गए इस सुझाव में बड़ी व्यावहारिक बुद्धि है, कि प्रतिज्ञात देश को दी गई सीमाओं की अनिश्चितता, उसकी वास्तविक सीमाओं की तुलना में, पुराने नियम के विश्वासियों के मन को ऊपर उठाने का काम करती थी, और उन्हें वर्तमान से परे उस काल की ओर ले जाती थी जब एक नए और अधिक महिमामय विधान के अधीन वह प्रतिज्ञा पूर्ण रूप से पूरी होगी। — सं.

7. इतना हो कि तू हियाव बाँधकर और बहुत दृढ़ होकर जो व्यवस्था मेरे दास मूसा ने तुझे दी है उस सब के अनुसार करने में चौकसी करना; और उससे न तो दाहिने मुड़ना और न बाएँ, ताकि जहाँ-जहाँ तू जाए वहाँ-वहाँ तेरा काम सफल हो।

7. Tantum confirmare et roborare vehementer: ut custodias et facias secundum totam legem quam praecepit tibi Moses servus meus; non recedes ad dextram vel ad sinistram ut prudenter (vel prospere) agas in omnibus.

8. व्यवस्था की यह पुस्तक तेरे मुँह से कभी न उतरने पाए; इसी में दिन-रात ध्यान दिए रहना, इसलिए कि जो कुछ उसमें लिखा है उस सब के अनुसार करने की तू चौकसी करे; क्योंकि तब ही तू अपने मार्ग को सफल बनाएगा, और तब ही तू बुद्धिमानी से काम करेगा।

8. Non recedat liber legis hujus ab ore tuo; sed mediteris in eo, die et nocte, ut custodias et facias, secundum id totum quod scriptum est in eo. Tunc enim secundas reddes vias tuas, et tunc prudenter ages.

9. क्या मैंने तुझे आज्ञा नहीं दी? हियाव बाँधकर दृढ़ हो जा; भय न खा, और तेरा मन कच्चा न हो; क्योंकि जहाँ-जहाँ तू जाएगा वहाँ-वहाँ तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे संग रहेगा।

9. Nonne praecepi tibi, ut te confirmes, et te robores? Ne formides, neque animo fragaris; quoniam tecum sum Jehova Deus tuus in omnibus ad quae tu pergis.

5. “कोई तेरे साम्हने ठहर न सकेगा” इत्यादि। क्योंकि असंख्य और युद्धप्रिय शत्रुओं से संग्राम छिड़ने वाला था, इसलिए आवश्यक था कि यहोशू में इस प्रकार विशेष भरोसा उत्पन्न किया जाए। ऐसा न होता, तो परमेश्वर के दिए हुए देश को उनके हाथ में कर देने की प्रतिज्ञा बार-बार धुँधली पड़ जाती; क्योंकि इतनी जातियों को उलट देना कितना विशाल कार्य था! इसलिए यह आपत्ति दूर कर दी जाती है। और उसे सब सन्देह से और भी भली-भाँति मुक्त करने के लिए उसे मूसा की उन विजयों का स्मरण दिलाया जाता है, जिनके द्वारा परमेश्वर ने प्रकट कर दिया था कि किसी भी सेना को, चाहे वह कितनी ही बड़ी और शक्तिशाली क्यों न हो, पूरी रीति से तितर-बितर कर देना उसके लिए अत्यन्त सरल है। इसलिए यहोशू को आज्ञा दी जाती है कि मूसा को दी गई सहायता में वह उन युद्धों का भावी परिणाम देखे जिन्हें उसे उसी अगुवाई और संरक्षण के अधीन लड़ना था। क्योंकि अनुग्रहों का यह क्रम उत्तराधिकारी के लिए बिना किसी व्यवधान के चलता रहता है।

आगे जो आता है उसका भी यही आशय है, यद्यपि वह इन शब्दों में अधिक पूर्णता से व्यक्त हुआ है, “न तो मैं तुझे धोखा दूँगा,” इत्यादि। इसी कारण प्रेरित (इब्रानियों 13:5), जब वह विश्वासियों को लोभ से दूर करना चाहता है, तब सब चिन्ताओं को शान्त करने और सब अत्यधिक भय को दबाने के उद्देश्य से इन शब्दों को लागू करता है। और वास्तव में, चिन्ता से उत्पन्न होनेवाला अविश्वास हम में ऐसी उथल-पुथल मचानेवाली भावनाएँ भड़का देता है कि संकट का तनिक-सा आभास होते ही हम व्याकुल हो उठते हैं और अपने आप को दयनीय रीति से तब तक सताते रहते हैं जब तक हमें यह निश्चय न हो जाए कि परमेश्वर हमारे संग रहेगा और हमारी रक्षा के लिए पर्याप्त से भी अधिक होगा। और सचमुच, जब वह हमारी भीरुता के लिए कोई दूसरा उपचार नहीं ठहराता, तब वह हमें स्मरण दिलाता है कि हमें उसकी उपस्थित सहायता से सन्तुष्ट रहना चाहिए।

6. “हियाव बाँधकर दृढ़ हो जा” इत्यादि। साहस का उपदेश जोड़ा गया है, वरन् दोहराया गया है, ताकि वह और भी गहरी छाप छोड़े। साथ ही प्रतिज्ञा भिन्न शब्दों में रखी गई है, जिनमें यहोशू को उसकी ईश्वरीय बुलाहट का निश्चय दिलाया गया है, ताकि वह उस पद को ग्रहण करने में, जो उसे परमेश्वर की ओर से सौंपा गया था, कोई हिचक न करे, और न बाधाओं से जूझने के लिए विवश होने पर बीच मार्ग में डगमगाने लगे। उसके लिए इतना ही पर्याप्त न होता कि वह आरम्भ में परिश्रम से कमर कस ले, और संघर्ष में स्थिर बने रहने के लिए भली-भाँति तैयार न हो।

यद्यपि यह विश्वास का गुण है कि वह हमें कठोर परिश्रम के लिए उत्साहित करे, ठीक वैसे ही जैसे अविश्वास कायरता या प्रयत्न छोड़ देने में प्रकट होता है, तौभी इस स्थल से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उपदेश की अतिरिक्त प्रेरणा के बिना केवल प्रतिज्ञाएँ पर्याप्त प्रभावशाली नहीं होतीं। क्योंकि यदि यहोशू को, जो सदा अपनी तत्परता के लिए प्रसिद्ध था, कर्तव्य-पालन के लिए उकसाने की आवश्यकता थी, तो हमें, जो इतने आलस्य से ग्रस्त हैं, आगे बढ़ाने के लिए अंकुश लगाना कितना अधिक आवश्यक होगा।

हम यह भी जोड़ सकते हैं कि यहोशू से बल और स्थिरता की माँग न तो एक ही बार की गई है और न एक ही शब्द में, वरन् वह बार-बार और विविध शब्दों में दृढ़ किया जाता है, क्योंकि उसे अनेक और विविध संघर्षों में जुटना था। उससे कहा जाता है कि वह दृढ़ और अजेय साहसवाला हो। यद्यपि ये दोनों विशेषण स्पष्ट कर देते हैं कि परमेश्वर एक अत्यन्त गम्भीर विषय में आज्ञा दे रहा था, तौभी इस दोहराव से सन्तुष्ट न होकर वह तुरन्त बाद उसी वाक्य को फिर कहता है, और “बहुत” क्रियाविशेषण जोड़कर उसे और भी बढ़ा देता है।

इसलिए इस स्थल से हम यह सीखें कि जब तक हम अपना पूरा-पूरा प्रयत्न न लगाएँ, तब तक हम कठिन और दुष्कर कार्यों को पूरा करने के योग्य कभी नहीं हो सकते; क्योंकि हमारी क्षमताएँ निर्बल हैं, और शैतान हम पर कठोरता से आक्रमण करता है, और हम किसी बात की ओर इतने अधिक झुके हुए नहीं हैं जितने अपने प्रयत्नों को ढीला छोड़ देने की ओर। परन्तु क्योंकि बहुत-से लोग भ्रान्त या अव्यवस्थित प्रयत्नों में अपना बल व्यर्थ लगाते हैं, इसलिए सच्चे साहस के स्रोत के रूप में यह जोड़ा गया है कि यहोशू व्यवस्था का पालन करना अपना निरन्तर अभ्यास बनाए। इससे हमें यह सिखाया जाता है कि सचमुच अजेय बनने का एकमात्र उपाय यह है कि हम परमेश्वर की विश्वासयोग्य आज्ञाकारिता करने का यत्न करें। नहीं तो उतावले दुस्साहस के साथ आगे धकेले जाने से यह अच्छा होता कि हम आलसी और निर्बल होकर पड़े रहें।

इसके अतिरिक्त, परमेश्वर न केवल यह चाहता है कि उसका दास व्यवस्था के पालन में दृढ़ हो, वरन् उसे यह आज्ञा भी देता है कि वह पुरुषार्थ से संघर्ष करे, ताकि अपने परिश्रमपूर्ण पद के बोझ तले मूर्च्छित न हो जाए। परन्तु क्योंकि सम्भव था कि वह इस विषय में सन्देह में पड़ जाए कि उलझन की बातों में अपने आप को कैसे छुड़ाए, या उसे कौन-सा मार्ग अपनाना चाहिए, इसलिए वह उसे व्यवस्था की शिक्षा की ओर भेजता है, क्योंकि उसे मार्गदर्शक मानकर उसके पीछे चलने से वह सब बातों के लिए पर्याप्त रूप से योग्य हो जाएगा। वह कहता है, यदि तू व्यवस्था को अपना गुरु बनाए, तो तू सब बातों में बुद्धिमानी से काम करेगा; यद्यपि इब्रानी शब्द שכל का अर्थ केवल बुद्धिमानी से ही नहीं, वरन् सफलता से काम करना भी है, क्योंकि दुस्साहस प्रायः विफलता का दण्ड भोगता है।

फ्रांसीसी में, “Et il ne faut qu'un rien pour nous faire perdre courage;” “और हमारा साहस खो देने के लिए एक तुच्छ-सी बात ही पर्याप्त है।” — सं.

जो भी हो, व्यवस्था की शिक्षा के पूरी रीति से अधीन होकर वह परमेश्वर की सहायता की आशा के लिए और भी निश्चित रूप से उत्साहित होता है। क्योंकि जब आनेवाले संकटों से हमारा भय जाग उठता है, तब यह निश्चय होना बहुत महत्त्व रखता है कि हम जो कुछ करते हैं उस सब में परमेश्वर की स्वीकृति हमारे साथ है, क्योंकि उसकी आज्ञाओं को मानने के अतिरिक्त हमारा कोई और उद्देश्य नहीं है। इसके अतिरिक्त, क्योंकि परमेश्वर की आज्ञा किसी भी मनमाने ढंग से मान लेना पर्याप्त न होता, इसलिए यहोशू को उपदेश दिया जाता है कि वह ऐसी नम्रता और संयम का अभ्यास करे जो उसे सरल आज्ञाकारिता की सीमाओं के भीतर बनाए रखे।

बहुत-से लोग, उचित अभिप्राय रखते हुए भी, कभी-कभी अपने आप को जितना चाहिए उससे अधिक बुद्धिमान समझ बैठते हैं, और इस कारण या तो असावधानी से बहुत-सी बातों की उपेक्षा कर देते हैं, या ईश्वरीय आज्ञाओं में अपनी सम्मतियाँ मिला देते हैं। इसलिए व्यवस्था में दिया गया वह सामान्य निषेध, जो सब मनुष्यों को उसमें कुछ जोड़ने या उसमें से कुछ घटाने से रोकता है, परमेश्वर अब विशेष रूप से यहोशू पर लागू करता है। क्योंकि यदि साधारण व्यक्तियों को भी अपने जीवन की योजना बनाने में परमेश्वर के अधीन होना उचित है, तो जो प्रजा पर शासन करते हैं उनके लिए यह कितना अधिक आवश्यक होगा। परन्तु यदि इस महान पुरुष को नम्रता की इस लगाम की आवश्यकता थी, ताकि वह अपनी सीमाओं का उल्लंघन न करे, तो यदि हम, जो उससे इतने पीछे हैं, अपने लिए अधिक स्वतन्त्रता का दावा करें, तो वह दुस्साहस कितना असहनीय होगा? परन्तु विशेष रूप से परमेश्वर ने अपने दास के लिए यह नियम इसलिए ठहराया, कि जो सम्मान में श्रेष्ठ हैं वे जान लें कि वे उसका पालन करने के लिए उतने ही बँधे हुए हैं जितने प्रजा के सबसे दीन लोग।

8. “व्यवस्था की यह पुस्तक” इत्यादि। व्यवस्था पर निरन्तर ध्यान करने की आज्ञा भी दी गई है; क्योंकि जब कभी उसे थोड़े समय के लिए भी छोड़ दिया जाता है, तब बहुत-सी भूलें सहज ही घुस आती हैं, और स्मृति पर जंग लग जाता है, यहाँ तक कि बहुत-से लोग उसका निरन्तर अध्ययन छोड़ देने के बाद व्यावहारिक कार्यों में ऐसे लगते हैं मानो वे निरे अनजान नौसिखिए हों। इसलिए परमेश्वर अपने दास को आज्ञा देता है कि वह प्रतिदिन उन्नति करे, और अपने जीवन के सारे काल में व्यवस्था में बढ़ते जाने से कभी न रुके। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जो लोग इस अध्ययन को तुच्छ समझते हैं, वे असहनीय अहंकार से अन्धे हो गए हैं।

परन्तु वह उसे व्यवस्था को अपनी आँखों से नहीं, वरन् अपने मुँह से दूर होने देने से क्यों मना करता है? कुछ व्याख्याकार समझते हैं कि यहाँ “मुँह” शब्द उपलक्षण के रूप में “चेहरे” के लिए प्रयुक्त हुआ है; परन्तु यह नीरस व्याख्या है। मुझे कोई सन्देह नहीं कि यहाँ प्रयुक्त शब्द विशेष रूप से उस व्यक्ति पर लागू होता है जिसे उक्त अध्ययन केवल अपने निजी निमित्त ही नहीं, वरन् अपने शासन के अधीन रखी गई सारी प्रजा के निमित्त करना था। इसलिए उसे आज्ञा दी जाती है कि वह व्यवस्था की शिक्षा पर ध्यान दे, ताकि उसे सौंपे गए पद के अनुसार जो कुछ उसने सीखा है उसे प्रजा के सामान्य हित के लिए प्रस्तुत करे। साथ ही उसे यह आज्ञा दी जाती है कि वह अपनी सीखने की तत्परता को दूसरों के लिए आज्ञाकारिता का आदर्श बनाए। क्योंकि बहुत-से लोग बोलने और प्रवचन करने के द्वारा व्यवस्था को अपने मुँह में तो रखते हैं, परन्तु उसका पालन बहुत बुरी रीति से करते हैं। इसलिए दोनों बातों की आज्ञा दी गई है, कि दूसरों को सिखाते हुए वह अपने आचरण और अपने सम्पूर्ण चरित्र को भी उसी नियम के अनुरूप बनाए।

फ्रांसीसी अनुवाद इतना और जोड़ता है, “Ou en quelques points;” “अथवा कुछ बातों में।” — सं.

पद के दूसरे भाग में जो आता है वह यह दिखाता है कि अधर्मी मनुष्य परमेश्वर के वचन का तिरस्कार करते हुए जो कुछ पूरा करने का यत्न करते हैं, वह सब अन्त में विफल होगा, और चाहे आरम्भ कभी-कभी कितना ही सफल क्यों न दिखाई दे, उसका परिणाम विनाशकारी होगा; क्योंकि सफल परिणामों की आशा केवल ईश्वरीय अनुग्रह से ही की जा सकती है, जो उतावली में अपनाई गई युक्तियों से, और उस सारे अहंकार से जिसके साथ प्रायः स्वयं परमेश्वर का तिरस्कार जुड़ा रहता है, न्यायपूर्वक रोक लिया जाता है। इसलिए विश्वासी, ताकि उनके कार्य उनकी इच्छा के अनुसार सफल हों, सीखने में परिश्रम और आज्ञा मानने में विश्वासयोग्यता, दोनों के द्वारा परमेश्वर की आशीष प्राप्त करें।

पद के अन्त में, क्योंकि प्रयुक्त शब्द द्विअर्थक है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, या तो वाक्य दोहराया गया है, या एक दूसरी प्रतिज्ञा जोड़ी गई है। मैं दूसरा मत ग्रहण करता हूँ। क्योंकि यह अत्यन्त उपयुक्त था कि प्रतिज्ञात सफलता के बाद यहोशू को यह स्मरण दिलाया जाए कि मनुष्य कभी कुशलता और व्यवस्थित रीति से काम नहीं करते, सिवाय उसी सीमा तक जहाँ तक वे अपने आप को परमेश्वर के वचन के द्वारा चलाए जाने देते हैं। इसलिए वह बुद्धिमानी जो विश्वासी परमेश्वर के वचन से सीखते हैं, उन लोगों के भरोसे के विपरीत है जो अपनी समझ को अपने ठीक-ठीक मार्गदर्शन के लिए पर्याप्त मानते हैं।

9. “क्या मैंने तुझे आज्ञा नहीं दी” इत्यादि। यद्यपि इब्रानी में साधारण कथन प्रायः प्रश्न के रूप में किया जाता है, और यह शैली बहुत ही बार-बार पाई जाती है, तौभी यहाँ प्रश्न में विशेष बल है, जिससे पहले सिखाई गई बात की पुष्टि हो, जबकि प्रभु अपने अधिकार को स्पष्ट रूप से आगे रखकर अपने दास को चिन्ता और हिचकिचाहट से मुक्त करता है। वह पूछता है, क्या मैं ही वह नहीं हूँ जिसने तुझे आज्ञा दी है? मैं ही तेरे संग उपस्थित भी रहूँगा। इस बल पर ध्यान दो: क्योंकि उसकी आज्ञा का विरोध करना उचित नहीं है। यह स्थल यह भी सिखाता है कि भरोसा उत्पन्न करने के लिए इससे अधिक प्रभावशाली कुछ नहीं है कि हम परमेश्वर की बुलाहट और आज्ञा पर भरोसा रखते हुए, और अपने विवेक में उसका पूरा निश्चय पाकर, जहाँ कहीं वह हमें ले जाना चाहे वहाँ उसके पीछे चलें।

फ्रांसीसी अनुवाद सारे वाक्य को इस प्रकार व्याख्यात्मक रूप में देता है: “Ainsi la prudence et sagesse que les fideles apprennent de la parole de Dieu, est opposee a l'assurance de ceux auxquels il semble bien qu'ils se gouvernent assez discretement et sagement, quand ils besongnent selon leur propre sens;” “इस प्रकार वह बुद्धिमानी और ज्ञान जो विश्वासी परमेश्वर के वचन से सीखते हैं, उन लोगों के निश्चिन्त भरोसे के विपरीत है जो समझते हैं कि जब वे अपनी ही समझ के अनुसार काम करते हैं, तब वे अपने आप को पर्याप्त विवेक और बुद्धि से चलाते हैं।” — सं.

फ्रांसीसी में, “C'est bien pour certain avec grande signifiance que ceci se dit d'autant qu'il n'est pas question de resister a son commandement;” “निश्चय ही यह बात बड़े अर्थ के साथ कही गई है, क्योंकि उसकी आज्ञा का विरोध करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।” — सं.

यहोशू 1:10-18

10. तब यहोशू ने प्रजा के सरदारों को यह आज्ञा दी,

10. Tunc praecepit Josue praefectis populi dicendo,

11. कि छावनी में इधर-उधर जाकर प्रजा के लोगों को यह आज्ञा दो, कि अपने-अपने लिए भोजन तैयार कर रखो; क्योंकि तीन दिन के भीतर तुम को इस यरदन के पार उतरकर उस देश को अपने अधिकार में लेने के लिए जाना है जिसे तुम्हारा परमेश्वर यहोवा तुम्हारे अधिकार में दे रहा है।

11. Transite per medium castrorum et praecipite populo, dicendo, Parate vobis annonam: quia post tres dies transibitis Jordanem hunc, ut intretis et possideatis terram, quam Jehova Deus vester dat vobis possidendam.

12. फिर यहोशू ने रूबेनियों, गादियों और मनश्शे के आधे गोत्र से कहा,

12. Ad Reubenitas vero et Gaditas et dimidiam tribum Manasse locutus est Josue, dicendo,

13. जो बात यहोवा के दास मूसा ने तुम से कही थी, कि तुम्हारा परमेश्वर यहोवा तुम्हें विश्राम देता है, और यह देश तुम्हें दिया है, उसकी सुधि करो।

13. Recordamini verbi quod praecepit vobis Moses servus Jehovae, dicendo, Jehova Deus vester reddidit vos quietos et dedit vobis terram hanc:

14. तुम्हारी स्त्रियाँ, बाल-बच्चे और पशु तो इस देश में रहें जो मूसा ने तुम्हें यरदन के इसी पार दिया है; परन्तु तुम सब शूरवीर पाँति बाँधे हुए अपने भाइयों के आगे-आगे पार उतर चलो, और उनकी सहायता करो;

14. Uxores vestrae, parvuli vestri, et pecora vestra residebunt in terra quam dedit vobis Moses trans Jordanem; vos autem transibitis armati ante fratres vestros, quicunque erunt viri bellicosi, juvabitisque eos.

15. जब तक यहोवा तुम्हारे भाइयों को ऐसा विश्राम न दे जैसा वह तुम्हें दे चुका है, और वे भी उस देश के अधिकारी न हो जाएँ जिसे तुम्हारा परमेश्वर यहोवा उन्हें देता है; तब तुम अपने अधिकार के देश में, जिसे यहोवा के दास मूसा ने यरदन के इस पार सूर्योदय की ओर तुम्हें दिया है, लौटकर उसके अधिकारी होगे और उसका सुख भोगोगे।

15. Donec quietem praestiterit Jehova fratribus vestris sicut vobis et possideant ipsi quoque terram quam Jehova Deus vester dat eis: et tunc redibitis ad terram haereditatis vestrae, possidebitisque eam quam dedit vobis Moses servus Jehovae ultra Jordanem ad exortum solis.

16. उन्होंने यहोशू को उत्तर दिया, जो-जो आज्ञा तू हमें देता है वह हम करेंगे, और जहाँ कहीं तू हमें भेजे वहाँ हम जाएँगे।

16. Tunc responderunt, dicendo, Omnia quae praecepisti nobis faciemus, et ad omnia ad quae miseris nos, ibimus.

17. जैसे हम सब बातों में मूसा की मानते थे, वैसे ही तेरी भी माना करेंगे; इतना हो कि तेरा परमेश्वर यहोवा जैसे मूसा के संग रहता था वैसे ही तेरे संग भी रहे।

17. Sicut in omnibus obedivimus Mosi, sic obediemus tibi: tantum sit Jehova Deus tuus tecum sicut fuit cum Mose.

18. कोई क्यों न हो जो तेरी आज्ञा के विरुद्ध बलवा करे, और जितनी आज्ञाएँ तू उसे दे उनमें तेरी बातें न माने, वह मार डाला जाए। केवल तू दृढ़ हो और हियाव बाँधे रह।

18. Quisquis fuerit qui rebellaverit ore tuo, nec verbis tuis aquieverit in omnibus quae ei mandaveris, interficiatur. Tantum confirmare et roborare.

10. “तब यहोशू ने आज्ञा दी” इत्यादि। यह सन्देह किया जा सकता है कि यह घोषणा भेदियों के भेजे जाने के बाद, और निश्चय ही उनके लौट आने पर, की गई या नहीं। और मैं इसे केवल सम्भव ही नहीं समझता, वरन् मुझे पूरा निश्चय है कि जब उनके समाचार ने उसे आवश्यक जानकारी दे दी, उसके बाद ही उसने अपनी छावनी उठाने का निश्चय किया। जब वह यह उचित समझता था कि शत्रु के प्रदेश पर पाँव रखने से पहले उसे बहुत-सी बातों की जानकारी हो जाए, तब किसी अनजाने मार्ग पर जल्दी से चल पड़ना बेतुकी उतावली होती। और समय के क्रम की उपेक्षा करके, जो छूट गया था उसे बाद में बीच में गूँथ देना कोई नई बात नहीं है। इसलिए दूसरे अध्याय को एक प्रकार का बीच में रखा गया कोष्ठक-वाक्य समझना चाहिए, जो पाठक को और अधिक पूर्णता से समझाता है कि जब यहोशू ने अन्त में प्रजा को अपना सामान इकट्ठा करने की आज्ञा दी, तब क्या-क्या हो चुका था।

जब सब आवश्यक बातों का पता लगा लिया गया, तब उसने देखा कि आगे बढ़ने का ठीक समय आ पहुँचा है, और उसने घोषणा करके प्रजा को अभियान के लिए तैयार होने की आज्ञा दी। वह अत्यन्त भरोसे के साथ घोषित करता है कि तीन दिन बीतने पर वे यरदन पार करेंगे: पवित्र आत्मा की प्रेरणा के बिना वह ऐसा करने का साहस कभी न करता। किसी ने भी पार उतरने के घाट का प्रयत्न नहीं किया था, और न ऐसी कोई आशा दिखाई देती थी कि यह किया जा सकता है। न तो पुल के द्वारा और न नावों के द्वारा पार जाने का कोई साधन था: और शत्रु के लिए पार उतरने को रोक देने से सरल कुछ न था। इसलिए एक ही बात शेष थी, कि परमेश्वर उन्हें आश्चर्यकर्म के द्वारा पार पहुँचाए। इसकी आशा यहोशू ने न तो अटकल से और न अपनी ओर से की, वरन् एक ऐसी बात के रूप में की जो परमेश्वर की ओर से प्रकट की गई थी। प्रजा का विश्वास भी उनकी आज्ञाकारिता की तत्परता में स्पष्ट दिखाई दिया: क्योंकि सामने उपस्थित बड़ी कठिनाइयों को देखते हुए, यदि उन्होंने अपनी चिन्ता परमेश्वर पर न डाल दी होती, तो वे इतनी सहजता से कभी न मानते। इसमें सन्देह नहीं हो सकता कि उसी ने उनके मनों में यह तत्परता उत्पन्न की, ताकि वे सब बाधाएँ दूर हो जाएँ जो प्रतिज्ञा की पूर्ति में विलम्ब कर सकती थीं।

12. “और रूबेनियों से” इत्यादि। उन्हें यरदन के पार इस शर्त पर निज भाग दिया गया था कि वे कनान की जातियों को निकालने में अपने भाइयों के साथ सैनिक सेवा करते रहेंगे। इसलिए यहोशू अब उन्हें उपदेश देता है कि वे अपनी प्रतिज्ञा पूरी करें, अपनी पत्नियों, अपने बच्चों और अपनी सारी सम्पत्ति को पीछे छोड़कर यरदन पार करें, और जब तक अपने भाइयों को शान्तिपूर्ण अधिकार में स्थापित न कर दें, तब तक युद्ध चलाने से न रुकें। उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करते हुए वह दो तर्कों का प्रयोग करता है, एक अधिकार से लिया गया और दूसरा न्याय-संगति से। इसलिए वह उन्हें मूसा की दी हुई आज्ञा का स्मरण दिलाता है, जिसके निर्णय से हटना उचित न था, क्योंकि सब भली-भाँति जानते थे कि उसने अपनी ओर से कुछ नहीं कहा, वरन् केवल वही कहा जो परमेश्वर ने उसके मुँह से कहलवाया था। साथ ही, स्पष्ट रूप से कहे बिना, यहोशू परोक्ष रूप से यह संकेत करता है कि वे वचनबद्धता से बँधे हुए हैं, क्योंकि उन्होंने इसी प्रकार करने का वचन दिया था। इसके बाद वह उन्हें न्याय-संगति के कारणों से प्रेरित करता है, ताकि उन लोगों की दशा में कोई असमानता न रहे जिनके लिए एक ही निज भाग सामूहिक रूप से ठहराया गया था। वह कहता है, यह बहुत ही असंगत होगा कि तुम्हारे भाई संकट उठाएँ, या कम से कम युद्ध चलाने में परिश्रम करें, और तुम शान्तिपूर्ण बसावट के सब सुखों का आनन्द लेते रहो।

इसमें सन्देह करना लगभग असम्भव है कि यहाँ अपनाया गया मत सही है; और इसकी पुष्टि में यह कहा जा सकता है कि मूल पाठ से इसे उससे अधिक समर्थन मिलता है जितना कैल्विन के अथवा हमारे अनुवाद से प्रकट होता है, जो पद का आरम्भ “तब” से करते हैं, मानो उसका अर्थ हो, “ठीक उसी समय;” जबकि इब्रानी में केवल समुच्चयबोधक ו है, जिसका अर्थ केवल “और” है, और इसी कारण सेप्टुआजिंट में यहाँ उसका अनुवाद καὶ किया गया है। इससे यह तो अवश्य निहित है कि यहोशू द्वारा सरदारों को दी गई आज्ञा उस अनुग्रहपूर्ण और उत्साहवर्धक सन्देश के बाद दी गई जो उसे मिला था, परन्तु यह नहीं कि वह तुरन्त या ठीक उसी क्षण दी गई; और इस प्रकार यह निष्कर्ष निकालने का मार्ग खुला रहता है कि बीच में कम या अधिक लम्बा समय बीता, जिसमें भेदिए अपने काम पर भेजे गए, और दूसरे अध्याय में वर्णित घटनाएँ घटीं। पवित्र लेखक ने अपने वर्णन में इस प्रकार समय के क्रम का पालन न करके केवल एक ऐसी पद्धति अपनाई है जो अपने आप में प्रायः सुविधाजनक होती है, और जिसका पालन प्राचीन और आधुनिक, दोनों कालों के सबसे प्रसिद्ध इतिहासकारों ने बार-बार किया है; और उस निष्कर्ष से अधिक बेतुका कुछ नहीं हो सकता जो मुख्यतः कुछ जर्मन तर्कवादियों ने इससे और ऐसे ही कुछ प्रत्यक्ष कालदोषों से निकालने का प्रयत्न किया है, कि यहोशू की पुस्तक एक अविच्छिन्न इतिहास नहीं, वरन् भिन्न-भिन्न लेखकों के अलग-अलग, या परस्पर विरोधी वर्णनों का जोड़-तोड़ है। — सं. इस कथन को कुछ सीमा के साथ ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि स्वयं कैल्विन के मत के अनुसार इससे पहले भेदिए जाते और लौटते समय, दोनों बार, नदी को पैदल पार कर चुके होंगे; और उनका पीछा करनेवालों ने उन्हें पकड़ने के प्रयत्न में जो दिशा पकड़ी, उससे यह भी स्पष्ट है कि जिन्हें “घाट” कहा जाता है, वे बाढ़ के मौसम में भी पार करने योग्य समझे जाते होंगे। तौभी एक-दो ऐसे स्थान, जहाँ कोई अकेला व्यक्ति किसी प्रकार पार हो सकता था, इस्राएलियों जैसे विशाल समूह के लिए सर्वथा अनुपयोगी थे; और इसलिए कैल्विन के आगे के इस कथन पर विवाद नहीं किया जा सकता कि यदि उन्हें पार होना ही था, तो मानवीय साधन व्यर्थ थे, और एक ही बात शेष थी कि स्वयं परमेश्वर उन्हें आश्चर्यकर्म के द्वारा पार पहुँचाए। — सं.

जब वह उन्हें आगे-आगे चलने या पार उतरने की आज्ञा देता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे शत्रु से सबसे पहले भिड़ें, और उन पर आनेवाले सब संकटों में अपने भाग से अधिक भार उठाएँ; वह केवल इस प्रकार उन्हें तत्परता से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है, क्योंकि पीछे रह जाना और दूसरों के पदचिह्नों पर धीरे-धीरे चलना एक प्रकार की टालमटोल होती। इसलिए “अपने भाइयों के आगे-आगे पार उतर चलो,” इस अभिव्यक्ति का अर्थ युद्ध के अग्रभाग में खड़ा होना नहीं, वरन् केवल अपनी पाँतियों में बने रहना, और इस प्रकार तत्पर उत्साह का प्रमाण देना है। क्योंकि यह निश्चित है कि जैसे वे चार दलों में व्यवस्थित थे, वैसे ही वे उसी क्रम में आगे बढ़े। क्योंकि वह उन्हें योद्धा कहता है, इसलिए हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं, जैसा अन्यत्र और अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट होगा, कि बूढ़ों और अन्य दुर्बल लोगों को सामूहिक कल्याण की देखरेख के लिए घर पर रहने की अनुमति दी गई, अथवा यदि वे किसी प्रकार उसे करने में असमर्थ थे तो सार्वजनिक कर्तव्य से पूरी रीति से मुक्त कर दिए गए।

16. “और उन्होंने उत्तर दिया” इत्यादि। वे न केवल सहमति देते हैं, वरन् जिस आज्ञाकारिता के वे ऋणी हैं, उसे स्वेच्छा से स्वीकार करते और स्पष्ट रूप से उसका विवरण देते हैं। हमारे दायित्व तभी उचित रूप से पूरे होते हैं जब हम उन्हें प्रसन्नता से पूरा करते हैं, न कि कुढ़-कुढ़कर, जैसा पौलुस कहता है (2 कुरिन्थियों 9:7)। यदि यह आपत्ति की जाए कि मूसा की आज्ञाकारिता करने का, जिसका उन्होंने बार-बार विरोध किया था, उनका यह दावा कम नम्रता का है, तो मेरा उत्तर यह है कि यद्यपि वे सदा उचित उत्साह के साथ पीछे न चले, तौभी वे आज्ञा मानने के लिए इतने तत्पर थे कि उनका संयम न केवल सहनीय, वरन् सर्वोच्च प्रशंसा के योग्य था, जब यह विचार किया जाए कि उनके पूर्वजों ने कितने घमण्ड से विद्रोह किया, और उन पर परमेश्वर की ओर से रखे गए जूए को उतार फेंकने का उन्होंने कितनी हठधर्मिता से प्रयत्न किया। क्योंकि जो लोग यहाँ बोल रहे हैं वे वे विद्रोही आत्माएँ नहीं थे जिनके विषय में परमेश्वर शिकायत करता है (भजन संहिता 95:8-11) कि उन्होंने उसे क्रोध दिलाया, वरन् वे लोग थे जिन्होंने दण्ड के उदाहरणों से दबकर चुपचाप अधीन होना सीख लिया था।

मूसा के साथ किया गया समझौता बहुत स्पष्ट था। जैसा गिनती के बत्तीसवें अध्याय में लिखा है, वह स्पष्ट शर्त रखता है कि वे “यहोवा के आगे युद्ध करने को हथियार बाँधें,” “यहोवा के आगे हथियार बाँधे यरदन के पार जाएँ, जब तक वह अपने शत्रुओं को अपने साम्हने से निकाल न दे, और देश यहोवा के वश में न आ जाए;” और वे उत्तर देते हैं, “जैसा यहोवा ने तेरे दासों से कहा है वैसा ही हम करेंगे: हम हथियार बाँधे यहोवा के आगे-आगे पार होकर कनान देश में जाएँगे, ताकि यरदन के इस पार हमारे निज भाग का अधिकार हमारा ही रहे।” — सं.

वास्तव में, जब वे यह घोषित करते हैं कि वे उसे उसी दृष्टि से देखेंगे जिस दृष्टि से वे मूसा को देखते थे, तो यह अपने गुणों का बखान करने के लिए उतना नहीं, जितना यहोशू के अधिकार को ऊँचा उठाने के लिए है। साथ ही उनके भरोसे का आधार उनकी इस इच्छा या प्रार्थना में व्यक्त होता है कि परमेश्वर अपने दास यहोशू की सहायता के लिए वैसे ही उपस्थित रहे जैसे उसने अपने दास मूसा की सहायता की थी। वे संकेत करते हैं कि वे अपने नए अगुवे के नेतृत्व में युद्ध करने को तैयार रहेंगे, क्योंकि उन्हें निश्चय है कि वह सामर्थ्य से सुसज्जित है, और यह आशा है कि वह परमेश्वर की सहायता से विजयी होगा, जैसा उन्होंने अनुभव से सीखा था कि परमेश्वर ने मूसा के हाथ से उनकी कितनी अद्भुत सहायता की थी। इसके अतिरिक्त हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वे सचमुच यह भरोसा रखते थे, क्योंकि वे अपने आप को उत्साहित करने के लिए परमेश्वर के अनुग्रह के अपने अनुभवों को स्मरण करते हैं, और क्योंकि वे सफल परिणामों के विषय में यहोशू को मूसा का उत्तराधिकारी मानते हैं।

“तेरा परमेश्वर” यह विशेषण भी महत्त्वहीन नहीं है, क्योंकि यह स्पष्ट रूप से ईश्वरीय अनुग्रह के निरन्तर क्रम की ओर संकेत करता है। अभिव्यक्ति का रूप भी विश्वास के भरोसे और प्रार्थना के बीच का है। इसलिए जहाँ वे संकेत करते हैं कि वे अपने मन में शुभ आशा रखते हैं, वहीं वे कार्य की कठिनता को समझकर प्रार्थना का सहारा भी लेते हैं। इसके तुरन्त बाद, जब वे अपनी ओर से उसे स्थिरता का उपदेश देते हैं, तब वे दिखाते हैं कि वे उसके पीछे चलने और उसके भरोसे का अनुकरण करने को तैयार हैं। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि यद्यपि यहोशू साहस का आदर्श था, और अपने कार्य और उपदेश दोनों से सबको उत्साहित करता था, तौभी उसे भी बदले में आगे बढ़ने के लिए उकसाया गया, ताकि उसकी अपनी तत्परता प्रजा की तत्परता जगाने में और भी प्रभावशाली हो।

उत्तर की नम्रता पर की गई आपत्ति उसके सच्चे अर्थ की गलत व्याख्या पर आधारित प्रतीत होती है। क्योंकि मूल पाठ में, अक्षरशः समझने पर, यह दावा नहीं है कि उन्होंने सब बातों में मूसा की आज्ञा मानी थी, जैसा कैल्विन के लातीनी और हमारे अंग्रेज़ी अनुवाद, दोनों में निहित है, वरन् उसका अर्थ केवल यह है कि “हर बात में,” अथवा “हर बात के अनुसार” (ככל, kekol), जिसमें उन्होंने मूसा की सुनी थी, वे उसकी भी सुनेंगे: दूसरे शब्दों में, कि वे उसके अधिकार को हर प्रकार से मूसा के अधिकार के बराबर मानेंगे। यह अर्थ सेप्टुआजिंट में सुरक्षित रखा गया है, जो इसका अनुवाद इस प्रकार करता है, Κατὰ πάντα ὅσα ἠκούσαμεν Μωυσῆ ἀκουσόμεθά σου. — सं.

यह बल सेप्टुआजिंट में खो जाता है, जो ὁ Θεός σου, “तेरा परमेश्वर,” नहीं, वरन् “ὁ Θεὸς ἡμῶν,” “हमारा परमेश्वर,” अनुवाद करता है। — सं.

फ्रांसीसी में, “Toutefois la maniere de parler qui est ici mise, est moyenne, et peut estre prise ou pour un glorifiement de la foy, ou pour un souhait;” “तौभी यहाँ जो बोलने की रीति प्रयुक्त हुई है वह बीच की है, और उसे या तो विश्वास के गौरव के रूप में, या एक इच्छा के रूप में लिया जा सकता है।” — सं.

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