यहोशू की पुस्तक पर टीका · अध्याय 2

यहोशू 2

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यहोशू 2

यहोशू 2:1-24

1. Miserat autem Josue filius Nun viros duos exploratores clam, dicendo: Ite, considerate terram et Jericho. Profecti sunt igitur et ingressi sunt domum mulieris meretricis, cujus nomen erat Rahab, et dormierunt illic.

1. तब नून के पुत्र यहोशू ने दो भेदियों को शित्तीम से चुपके से भेज दिया, और उनसे कहा, जाकर उस देश और यरीहो को देखो। तब वे चल दिए, और राहाब नाम किसी वेश्या के घर में जाकर वहाँ टिक गए।

कैल्विन का “miserat,” “भेज चुका था,” उसके इस मत के अनुकूल है कि भेदिये उन घटनाओं के वास्तव में घटित होने से कुछ समय पहले ही भेजे जा चुके थे जिनके साथ पहला अध्याय समाप्त होता है; परन्तु यह न तो इब्रानी से उचित ठहरता है और न सेप्टुआजिंट से, जिसमें केवल ἀπέστειλεν है। तौभी यह उल्लेखनीय है कि लूथर का जर्मन अनुवाद कैल्विन से सहमत है, और इसका अनुवाद यों करता है, “hatte zween funtidchafter heimlich ausgefaubt von Gittim;” “सित्तीम से दो भेदियों को चुपके से भेज चुका था।” इस स्थान, सित्तीम अथवा शित्तीम, का उल्लेख फ्रांसीसी अनुवाद में आता है, परन्तु कैल्विन के लातीनी में बिना किसी स्पष्टीकरण के छोड़ दिया गया है। यह स्थान यरदन के बाएँ तट के निकट मोआब के मैदानों में स्थित था, और गिनती 25 में विशेष रूप से इस्राएलियों के निवास-स्थान के रूप में उसका उल्लेख है, जब उन्होंने अपने आप को मोआब की पुत्रियों के द्वारा घोर मूर्तिपूजा में फुसलाए जाने दिया था, और परिणामस्वरूप कठोर दण्ड पाया था। — सं.

2. तब किसी ने यरीहो के राजा से कहा, देख, आज की रात कई एक इस्राएली इस देश का भेद लेने को यहाँ आए हुए हैं।

2. Dictum autem fuit regi Jericho, Ecce venerunt huc viri nocte hac e filiis Israel ad explorandum terram.

3. तब यरीहो के राजा ने राहाब के पास यों कहला भेजा, कि जो पुरुष तेरे पास आकर तेरे घर में घुसे हैं उन्हें बाहर ले आ; क्योंकि वे सारे देश का भेद लेने को आए हैं।

3. Tunc misit rex Jericho ad rahab, dicendo; Educ viros qui ingressi sunt ad te, qui venerunt domum tuam; quia ad explorandum totam terram venerunt.

4. उस स्त्री ने उन दोनों पुरुषों को ले जाकर छिपा रखा था; और उसने इस प्रकार कहा, कि मेरे पास कई पुरुष आए तो थे, परन्तु मैं नहीं जानती थी कि वे कहाँ के थे;

4. Sumpserat autem mulier duos viros, et absconderat eos: Tunc ait, Venerunt quidem ad me viri, sed non noveram undenam essent.

5. और ऐसा हुआ कि जब अन्धेरा हुआ, और फाटक बन्द होने का समय आया, तब वे पुरुष निकल गए; मुझे मालूम नहीं कि वे कहाँ गए; तुम फुर्ती करके उनका पीछा करो, तो उन्हें जा पकड़ोगे।

5. Fuit autem dum porta clauderetur in tenebris, egressi sunt viri; nec cognovi quo abierint. Sequimini cito eos quia comprehendetis eos.

6. परन्तु उसने उनको घर की छत पर चढ़ाकर सन की उन डंठलों के नीचे छिपा दिया था जो उसने छत पर सजाकर रखी थीं।

6. Ipsa autem ascendere fecerat eos in tectum, et absconderat eos sub culmis lini ab ea ordinatis super tectum.

यह शब्द “clam” (चुपके से) या तो भेदियों को भेजने में यहोशू की गुप्तता की ओर संकेत कर सकता है, या उस गुप्तता की ओर जिसे उन्हें अपनी छानबीन करने में बरतना था। दोनों ही अर्थ उचित प्रतीत होते हैं। दूसरे अर्थ का समर्थन सेप्टुआजिंट करता है, जो गुप्तता और भेद लेने, दोनों को एक ही समासयुक्त शब्द κατασκοπεῦσαι में जोड़ देता है; परन्तु अनुवाद और टीका, दोनों से स्पष्ट है कि कैल्विन पहले अर्थ को अधिक उचित मानता है। — सं.

7. तब वे पुरुष यरदन का मार्ग लेकर घाटों तक उनकी खोज में चले गए; और ज्योंही उनको खोजनेवाले फाटक से निकले, त्योंही फाटक बन्द कर दिया गया।

7. Viri autem persequuti sunt eos itinere Jordanis usque ad vada: portam vero clauserunt, simul ac egressi sunt qui eos persequebantur.

8. और वे लेटने भी न पाए थे कि वह स्त्री छत पर उनके पास चढ़ आई;

8. Antequam vero dormirent, ipsa ascendit super tectum ad eos.

9. और उन पुरुषों से कहने लगी, मुझे निश्चय है कि यहोवा ने तुम लोगों को यह देश दिया है, और तुम्हारा भय हम लोगों पर छा गया है, और इस देश के सब निवासी तुम्हारे कारण घबरा रहे हैं।

9. Et ait ad viros: Novi quod Jehova dederit vobis terram, eo quod cecidit terror vester super nos, et quod defluxerunt omnes habitatores terrae a facie vestra.

10. क्योंकि हमने सुना है कि जब तुम मिस्र से निकले, तब यहोवा ने तुम्हारे सामने लाल समुद्र का जल सुखा दिया; और तुम लोगों ने सीहोन और ओग नामक यरदन पार रहनेवाले एमोरियों के दोनों राजाओं से क्या किया, जिनका तुमने सत्यानाश कर डाला।

10. Audivimus enim quomodo arefecerit Jehova aquas maris Supli a facie vestra dum exiistis ex Aegypto; et quae fecistis duobus regibus Aemorrhaei, qui erant trans Jordanem: Sihon et Og quos interemistis.

11. और यह सुनते ही हमारा मन पिघल गया, और तुम्हारे कारण किसी के जी में जी न रहा; क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर यहोवा ऊपर के आकाश का और नीचे की पृथ्वी का परमेश्वर है।

11. Audivimus, et dissolutum est cor nostrum, neque constitit ultra spiritus a facie vestra. Jehova enim Deus vester Deus est in coelo sursum et super terram deorsum.

12. अब इसलिए, मैं तुमसे विनती करती हूँ, कि मुझसे यहोवा की शपथ खाओ, क्योंकि मैंने तुम पर दया की है, कि तुम भी मेरे पिता के घराने पर दया करोगे, और इसकी सच्ची चिह्नानी मुझे दो;

12. Nunc ergo jurate mihi, quaeso, per Jehovam (feci enim vobiscum misericordiam) quod facietis etiam vos cum domo patris mei misericordiam, et dabitis mihi signum verum,

13. और कि तुम मेरे पिता और मेरी माता, मेरे भाइयों और मेरी बहिनों को, और जो कुछ उनका है उन सब को जीवित रख छोड़ोगे, और हमारे प्राणों को मृत्यु से बचाओगे।

13. Quod vivos servabitis fratrem meum, et matrem meam, et fratres meos, et sorores meas, et omnes qui sunt eorum, eruetisque animas nostras a morte.

14. उन पुरुषों ने उससे कहा, यदि तुम हमारी यह बात किसी पर प्रगट न करो, तो तुम्हारे प्राण के बदले हमारा प्राण जाए; और जब यहोवा हमको यह देश देगा, तब हम तेरे साथ कृपा और सच्चाई से बर्ताव करेंगे।

14. Dixerunt ei viri: Anima nostra pro vobis ad moriendum: modo non prodideris sermonem nostrum hunc: tunc erit, ubi tradiderit Jehova nobis terram, faciemus tecum misericordiam et veritatem.

15. तब उसने उनको खिड़की से रस्सी के बल उतार दिया; क्योंकि उसका घर शहरपनाह पर बना था, और वह शहरपनाह पर ही रहती थी।

15. Demisit itaque eos fune per fenestram: domus enim ejus erat in pariete muri, et in muro ipsa habitabat.

16. और उसने उनसे कहा, पहाड़ को चले जाओ, ऐसा न हो कि खोजनेवाले तुमसे आ मिलें; और जब तक खोजनेवाले लौट न आएँ तब तक, अर्थात् तीन दिन, वहीं छिपे रहना; उसके बाद अपना मार्ग लेना।

16. Dixit autem eis: Ad montem pergite, ne forte occurrant vobis qui insequuntur, et latitate illic tribus diebus, donec redeant qui insequuntur, et postea ibitis per viam vestram.

17. उन पुरुषों ने उससे कहा, जो शपथ तूने हमको खिलाई है, उसके विषय में हम निर्दोष रहेंगे:

17. Tunc dixerunt ei viri, Innoxii erimus a juramento tuo hoc quo nos adjurasti.

18. सुन, जब हम लोग इस देश में आएँगे, तब जिस खिड़की से तूने हमको उतारा है उसमें यही लाल रंग के सूत की डोरी बाँध देना; और अपने पिता और अपनी माता, अपने भाइयों, वरन् अपने पिता के सारे घराने को अपने पास इसी घर में इकट्ठा कर रखना।

18. Ecce, quum ingrediemur terram, funiculum hunc fili coccinei ligabis in fenestra, per quam demiseris nos: patrem vero tuum et matrem tuam congregabis ad te in domum, et omnem familiam patris tui.

19. तब जो कोई तेरे घर के द्वार से बाहर गली में निकले, उसके खून का दोष उसी के सिर पड़ेगा, और हम निर्दोष ठहरेंगे; परन्तु जो कोई तेरे संग घर में रहे, यदि उस पर किसी का हाथ पड़े, तो उसके खून का दोष हमारे सिर पर पड़ेगा।

19. Erit autem, quicunque egressus fuerit e valvis domus tuae foras, sanguis ejus erit in caput ejus, nos vero innoxii: quicunque vero tecum fuerit in domo, sanguis illius in caput nostrum, si manus injecta fuerit in eum.

20. फिर यदि तू हमारी यह बात किसी पर प्रगट करे, तो जो शपथ तूने हमको खिलाई है उससे हम निर्बन्ध ठहरेंगे।

20. Si vero prodideris sermonem hunc nostrum, erimus innoxii a juramento quo adjurasti nos.

21. उसने कहा, तुम्हारे वचनों के अनुसार हो। तब उसने उनको विदा किया, और वे चले गए; और उसने लाल रंग की डोरी को खिड़की में बाँध दिया।

21. Respondit illa: Ut loquuti estis, ita sit. Tunc dimisit eos, et abierunt, ligavitque filum coccineum in fenestra.

22. और वे जाकर पहाड़ तक पहुँचे, और वहाँ खोजनेवालों के लौटने तक, अर्थात् तीन दिन तक रहे; और खोजनेवाले उनको सारे मार्ग में ढूँढ़ते रहे, परन्तु कहीं न पाया।

22. Profecti venerunt ad montem, et manserunt ibi tribus diebus, donec reverterentur qui insequuti fuerant, qui quaesierunt per omnem viam, nec invenerunt.

23. तब वे दोनों पुरुष पहाड़ से उतरे, और लौटकर पार गए, और नून के पुत्र यहोशू के पास पहुँचकर जो कुछ उन पर बीता था उसका वर्णन किया।

23. Reversi ergo duo illi, postquam descenderunt e monte, transierunt, veneruntque ad Josue filium Nun, et narraverunt ei quaecunque acciderant sibi.

24. और उन्होंने यहोशू से कहा, निःसन्देह यहोवा ने वह सारा देश हमारे हाथ में कर दिया है; क्योंकि उस देश के सारे निवासी भी हमारे कारण घबरा रहे हैं।

24. Dixeruntque ad Josue, Tradidit Jehova in manus nostras totam terram. Dissoluti enim sunt omnes habitatores terrae a facie nostra.

1. “और नून के पुत्र यहोशू ने भेजा” इत्यादि। जिस भेद लेने की बात अब हो रही है, उसका उद्देश्य उस पहले वाले से भिन्न था, जब यहोशू अन्य ग्यारह पुरुषों के साथ इसलिए भेजा गया था कि वह देश के सारे प्रदेशों का निरीक्षण करे, और सारी प्रजा के पास उसकी स्थिति, स्वरूप, उपजाऊपन और अन्य गुणों के विषय में, नगरों के आकार और गिनती के विषय में, तथा निवासियों और उनके चाल-चलन के विषय में समाचार लाए। वर्तमान उद्देश्य यह था कि जो लोग आलसी होने की प्रवृत्ति रखते हों, उन्हें और अधिक तत्परता के साथ इस अभियान में लगने के लिए तैयार किया जाए। और यद्यपि व्यवस्थाविवरण के पहले अध्याय से (व्यवस्थाविवरण 1:22) प्रकट होता है कि मूसा ने प्रजा के निवेदन पर चुने हुए पुरुषों को देश का भेद लेने के लिए भेजा, तौभी वह अन्यत्र बताता है (गिनती 13:4) कि उसने यह परमेश्वर की आज्ञा से किया। इसलिए वे बारह पुरुष परमेश्वर की ओर से नियुक्त होकर निकले थे, और कुछ भिन्न उद्देश्य से, अर्थात् यह कि वे देश का पूरा-पूरा निरीक्षण करें, और उसकी उत्तमता के घोषक बनकर प्रजा का साहस जगाएँ।

अब यहोशू चुपके से दो जनों को यह पता लगाने के लिए भेजता है कि यरदन के पार स्वतन्त्र मार्ग मिल सकता है या नहीं, और यरीहो के नागरिक निश्चिन्तता में डूबे हुए हैं, या सावधान और सामना करने को तैयार हैं। संक्षेप में, वह ऐसे भेदिये भेजता है जिनके समाचार के आधार पर वह सब संकटों से बचाव का प्रबन्ध कर सके। अतः यहाँ एक दोहरा प्रश्न उठाया जा सकता है — क्या हमें उसकी दूरदर्शिता को सराहना चाहिए? या उसे अत्यधिक चिन्ता के लिए दोषी ठहराना चाहिए, विशेषकर इसलिए कि ऐसा प्रतीत होता है कि उसने उचित से अधिक अपनी ही बुद्धि पर भरोसा किया, जब वह परमेश्वर से पूछे बिना संकट के विरुद्ध सावधानियाँ बरतने में इतना यत्नशील रहा? परन्तु, यद्यपि यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि प्रजा को अपनी सामग्री इकट्ठी करने की आज्ञा देने और यरदन पार करने के विषय में अपनी घोषणा प्रकाशित करने के लिए उसे स्वर्ग से कोई सन्देश मिला था, तौभी यह पूर्णतः स्पष्ट है कि यदि परमेश्वर ने आज्ञा न दी होती तो वह छावनी को आगे बढ़ाने का विचार कभी न करता; इसलिए यह भी सम्भव है कि भेदियों को भेजने में उसने इस विषय में परमेश्वर की इच्छा जानने के लिए उससे पूछा हो, या परमेश्वर ने स्वयं, यह जानते हुए कि इस अतिरिक्त पुष्टि की कितनी आवश्यकता थी, अपनी ओर से ही यह बात अपने दास के मन में डाल दी हो। जो भी हो, जब यहोशू अपने दूतों को यरीहो का भेद लेने की आज्ञा देता है, तब वह उसे घेरने की तैयारी कर रहा है, और इसलिए यह जानना चाहता है कि किस दिशा से उसके पास सबसे सरलता और सुरक्षा के साथ पहुँचा जा सकता है।

“वे एक वेश्या के घर में आए” इत्यादि। कुछ लोग “वेश्या” नाम से क्यों बचना चाहते हैं, और זונה का अर्थ सराय चलानेवाली स्त्री क्यों करते हैं, यह मेरी समझ में नहीं आता, सिवाय इसके कि वे किसी वेश्या के अतिथि बनने को लज्जाजनक समझते हैं, या उस स्त्री पर से कलंक मिटाना चाहते हैं जिसने न केवल दूतों को कृपापूर्वक ग्रहण किया, वरन् अद्भुत साहस और बुद्धिमानी से उनकी सुरक्षा भी सुनिश्चित की। वास्तव में रब्बियों की यह नियमित रीति है कि जब वे अपनी जाति के सम्मान की रक्षा करना चाहते हैं, तब वे ढिठाई से पवित्रशास्त्र को तोड़-मरोड़ देते हैं, और जो कुछ पूर्णतः प्रतिष्ठाजनक न लगे, उसे अपनी कल्पनाओं से भिन्न रूप दे देते हैं। परन्तु सम्भावना यह है कि जब दूत गुप्त रहने का यत्न कर रहे थे, और लोगों की दृष्टि से तथा सार्वजनिक आवाजाही के सब स्थानों से बच रहे थे, तब वे एक ऐसी स्त्री के पास आए जो एक एकान्त स्थान में रहती थी। उसका घर नगर की शहरपनाह से सटा हुआ था, वरन् उसका बाहरी भाग वास्तव में शहरपनाह ही में बना था। इससे हम यह अनुमान कर सकते हैं कि वह आम रास्ते से दूर कोई अप्रसिद्ध कोना था; ठीक वैसे ही जैसे उसकी जैसी स्त्रियाँ प्रायः तंग गलियों और गुप्त स्थानों में रहा करती हैं। किसी भी संगति के साथ यह नहीं माना जा सकता कि वह कोई साधारण सराय थी जो बिना भेद-भाव सबके लिए खुली रहती थी, क्योंकि तब वे स्वतन्त्रता से घुल-मिलकर बातचीत न कर पाते, और ऐसी परिस्थितियों में छिपे रहना कठिन होता।

इसलिए मेरा निष्कर्ष यह है कि वे चुपके से भीतर पहुँच गए, और तुरन्त किसी छिपने के स्थान में चले गए। इसके अतिरिक्त, इस तथ्य में कि एक स्त्री, जिसने वेश्यावृत्ति के द्वारा लज्जाजनक जीविका कमाई थी, थोड़े ही समय पश्चात् चुनी हुई प्रजा के समाज में ग्रहण की गई और कलीसिया की सदस्य बनी, हमें परमेश्वर के अनुग्रह का एक अद्भुत प्रदर्शन मिलता है, जो इस प्रकार लज्जा के स्थान में भी प्रवेश कर सका, और वहाँ से न केवल राहाब को, वरन् उसके पिता और उसके परिवार के अन्य सदस्यों को भी निकाल लाया। निश्चय ही, जबकि शब्द זונה का अर्थ लगभग सदा वेश्या ही होता है, यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमें प्रचलित अर्थ से हटने को विवश करे।

2. “और राजा को बताया गया” इत्यादि। सम्भव है कि सन्देहजनक परदेशियों पर दृष्टि रखने के लिए पहरेदार नियुक्त किए गए थे, जैसा अनिश्चित संकट के समय में, या युद्ध की आशंका होने पर, प्रायः किया जाता है। इस्राएली निकट आ पहुँचे थे; उन्होंने एदोमियों और मोआबियों से खुलकर कह दिया था कि वे कनान देश में बसने का स्थान ढूँढ़ रहे हैं; वे अपनी गिनती के कारण भयानक थे; वे दो पड़ोसी राजाओं को मारकर पहले ही बड़ा प्रदेश जीत चुके थे; और, जैसा हम शीघ्र ही देखेंगे, लाल समुद्र से होकर उनके प्रसिद्ध पार जाने की चर्चा दूर-दूर तक फैल चुकी थी। इसलिए ऐसे प्रत्यक्ष संकट में किसी भी परदेशी को यरीहो नगर में से, जो सीमा पर स्थित था, बेरोक-टोक आने-जाने देना अत्यन्त लापरवाही का प्रमाण होता।

इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जो पुरुष अपरिचित थे और जो अनेक परिस्थितियों से शत्रुतापूर्ण अभिप्राय से आए हुए प्रतीत होते थे, उनकी सूचना राजा को दी गई। तौभी साथ ही हम यह अनुमान कर सकते हैं कि अपने फाटकों की और अधिक सावधानी से रखवाली न करने में वे अलौकिक रूप से अन्धे कर दिए गए थे; क्योंकि साधारण चौकसी से भी दूत, एक बार भीतर आ जाने के बाद, सरलता से रोके जा सकते थे। वरन् तुरन्त खोज आरम्भ की जानी चाहिए थी, और इस प्रकार वे निश्चय ही पकड़े जाते। यरीहो के नागरिक ऐसे भयभीत थे और ईश्वरीय दण्ड के रूप में ऐसे स्तब्ध कर दिए गए थे, कि वे हर बात में बिना किसी विधि या परामर्श के काम करते रहे। इस बीच वे दोनों दूत ऐसी संकटपूर्ण दशा में पहुँच गए कि ऐसा प्रतीत होता था कि वे दण्ड के लिए सौंप दिए जाने ही वाले हैं। राजा उन्हें बुलवाता है; वे घर में छिपे हैं; उनका जीवन एक स्त्री की जीभ पर लटका है, मानो किसी धागे से लटका हो। कुछ लोगों ने सोचा है कि इसमें यहोशू के अविश्वास का दण्ड था, जिसे परमेश्वर के मार्गदर्शन पर भरोसा रखकर साहस के साथ यरदन पार कर जाना चाहिए था। परन्तु परिणाम हमें इससे भिन्न निष्कर्ष निकालने की ओर ले जाता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने दूतों को अत्यन्त संकट से छुड़ाकर प्रजा को नया साहस दिया; क्योंकि अपनी सामर्थ्य के उस प्रकाशन में उसने स्पष्ट दिखा दिया कि वह उनकी सुरक्षा पर दृष्टि रखे हुए है, और प्रतिज्ञा किए हुए देश में उनके सकुशल प्रवेश का प्रबन्ध कर रहा है।

प्रस्तुत प्रसंग में तो वे अपनी मनमानी कल्पनाओं की कोई सीमा ही नहीं रखते, और गम्भीरता से हमें बताते हैं कि वह कुकर्म का जीवन बिताने के बदले केवल एक सराय चलानेवाली या “आतिथ्य करनेवाली” स्त्री थी, और बाद में उसे यहोशू की पत्नी होने का सम्मान मिला। — सं.

4. “और उस स्त्री ने उन दोनों पुरुषों को लिया” इत्यादि। हम यह मान सकते हैं कि राहाब को उन्हें बाहर लाने की आज्ञा मिलने से पहले ही उनके आने की चर्चा फैल चुकी थी, और इस प्रकार उन्हें छिपाने के लिए कुछ थोड़ा समय मिल गया था। और वास्तव में, राजा की आज्ञा पाने पर, यदि छिपाने का प्रबन्ध भली-भाँति न कर लिया गया होता, तो इनकार करने का कोई अवसर ही न रहता; और इतनी शान्ति से झूठ बोलने का साहस तो वह और भी कम करती। परन्तु जब वह अपने अतिथियों को इस प्रकार छिपा चुकी, और खोज करना कठिन हो गया होता, तब वह निडर होकर आगे आती है और एक चतुराई-भरे उत्तर से बच निकलती है।

अब यहाँ जो प्रश्न उठते हैं वे ये हैं: पहला, क्या अपने देश के साथ विश्वासघात क्षम्य था? दूसरा, क्या उसका झूठ दोष से मुक्त हो सकता था? हम जानते हैं कि अपने देश का प्रेम, जो मानो हमारी सामान्य माता है, स्वभाव ही से हममें रोपा गया है। इसलिए जब राहाब जानती थी कि अभिप्राय उस नगर का विनाश था जिसमें वह जन्मी और पली-बढ़ी थी, तब भेदियों को सहायता और परामर्श देना अमानवता का घृणित कार्य प्रतीत होता है। यह कहना एक बचकाना बहाना है कि वे अभी घोषित शत्रु नहीं थे, क्योंकि युद्ध की घोषणा नहीं हुई थी; क्योंकि यह भली-भाँति स्पष्ट है कि उन्होंने उसके सह-नागरिकों के विनाश का षड्यन्त्र रचा था। इसलिए केवल वह ज्ञान, जो परमेश्वर ने उसके मन को दिया था, उसे दोष से मुक्त करता था, क्योंकि वह सामान्य नियम से स्वतन्त्र कर दी गई थी। उसके विश्वास की प्रशंसा दो प्रेरित करते हैं, जो साथ ही यह घोषित करते हैं (इब्रानियों 11:31; याकूब 2:25) कि जो सेवा उसने भेदियों की की, वह परमेश्वर को ग्रहणयोग्य थी।

इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जब प्रभु ने एक परदेशी स्त्री को अपनी प्रजा में ले आने और उसे कलीसिया के देह में साटने की कृपा की, तब उसने उसे एक अपवित्र और शापित जाति से अलग कर दिया। इसलिए, यद्यपि वह उसी दिन तक अपने देशवासियों से बँधी हुई थी, तौभी जब वह कलीसिया के देह में गोद ली गई, तब उसकी नई दशा मानो उस सामान्य व्यवस्था से एक प्रकार की दासत्व-मुक्ति थी जिसके द्वारा नागरिक एक-दूसरे के प्रति बँधे होते हैं। संक्षेप में, विश्वास के द्वारा एक नई प्रजा में जाने के लिए उसे अपने देशवासियों का त्याग करना आवश्यक था। और क्योंकि इसमें उसने केवल परमेश्वर के न्याय को स्वीकार किया, इसलिए उनको छोड़ देने में कोई अपराध नहीं था।

इसका अर्थ या तो यह हो सकता है कि “उन्होंने” (इस्राएलियों ने) “षड्यन्त्र रचा था,” जैसा यहाँ अनुवाद किया गया है, या, जैसा फ्रांसीसी में है, कि “राहाब ने षड्यन्त्र रचा था।” — सं.

यदि वर्ष का वह ऋतु, जिसमें ये घटनाएँ हुईं, अन्य स्रोतों से ज्ञात न होता, तो राहाब ने छिपाने का जो उपाय अपनाया, वही उसे निश्चित करने में बहुत सहायक होता। “सन की डंठलें,” जिनसे उसने उन्हें ढाँका, स्पष्टतः सन की वह फसल थी जो पक जाने के पश्चात् भूमि से उखाड़ ली गई थी, और जिसे, आज भी प्रचलित रीति के अनुसार, खुली हवा में सूखने के लिए फैला दिया गया था, इससे पहले कि उसकी लकड़ीदार छाल अलग करने के लिए उसे कूटने-झाड़ने की प्रक्रिया से गुज़ारा जाए। सितम्बर के अन्त के लगभग बोया गया सन मार्च के अन्त या अप्रैल के आरम्भ में उखाड़ा जाता था, और यही वह समय था जब इस्राएलियों ने अपनी छावनी आगे बढ़ानी आरम्भ की। — सं.

जहाँ तक झूठ का प्रश्न है, हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि यद्यपि वह अच्छे उद्देश्य से किया गया, तौभी वह दोष से मुक्त नहीं था। क्योंकि जो लोग उसे, जिसे कर्तव्यजन्य झूठ कहा जाता है, पूर्णतः क्षम्य मानते हैं, वे पर्याप्त रूप से विचार नहीं करते कि परमेश्वर की दृष्टि में सत्य कितना बहुमूल्य है। इसलिए, यद्यपि हमारा उद्देश्य अपने भाइयों की सहायता करना, उनकी सुरक्षा का प्रबन्ध करना और उन्हें राहत देना हो, तौभी झूठ बोलना कभी उचित नहीं हो सकता, क्योंकि जो परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध है वह ठीक नहीं हो सकता। और परमेश्वर सत्य है। तौभी राहाब का कार्य सद्गुण की प्रशंसा से रहित नहीं है, यद्यपि वह निष्कलंक रूप से शुद्ध नहीं था। क्योंकि प्रायः ऐसा होता है कि जब पवित्र लोग सही मार्ग पर चलने का यत्न करते हैं, तब वे टेढ़े-मेढ़े रास्तों में भटक जाते हैं।

रिबका (उत्पत्ति 27), अपने पुत्र याकूब के लिए आशीष प्राप्त कराने में, भविष्यद्वाणी का अनुसरण करती है। इस प्रकार की आज्ञाकारिता में एक भक्तिपूर्ण और प्रशंसनीय उत्साह दिखाई देता है। परन्तु इसमें सन्देह नहीं किया जा सकता कि एसाव के स्थान पर अपने पुत्र याकूब को रख देने में वह कर्तव्य के मार्ग से भटक गई। इसलिए उसकी यह छलपूर्ण युक्ति उस कार्य को, जो अपने आप में प्रशंसनीय था, इस सीमा तक दूषित कर देती है। तौभी यह विशेष दोष उस कार्य को पवित्र उत्साह के गुण से पूर्णतः वंचित नहीं कर देता; क्योंकि परमेश्वर की कृपा से वह दोष दबा दिया जाता है और गिना नहीं जाता। राहाब भी अनुचित करती है जब वह झूठ बोलकर कहती है कि दूत चले गए, तौभी मुख्य कार्य परमेश्वर को ग्रहणयोग्य था, क्योंकि भले के साथ मिली हुई बुराई उस पर आरोपित नहीं की गई। कुल मिलाकर, परमेश्वर की इच्छा यह थी कि भेदिये छुड़ाए जाएँ, परन्तु उसने झूठ के द्वारा उनके प्राण बचाने को स्वीकार नहीं किया।

लातीनी में, “Mendacium officiosum.” फ्रांसीसी में, “Le mensonge qui tend au profit du prochain;” “वह झूठ जो हमारे पड़ोसी के लाभ के लिए हो।” mendacium officiosum नीतिशास्त्रीय विवेचकों (कैज़ुइस्टों) में बहुधा प्रयुक्त होनेवाली अभिव्यक्ति है, और इसका ठीक अर्थ है, “ऐसा झूठ जिसे बोलना कर्तव्य का कार्य हो सकता है।” इसका सबसे सामान्य उदाहरण वह स्थिति है जिसमें सत्य का सीधा कथन किसी ऐसे व्यक्ति के हित को, या कदाचित् उसके प्राण को, गम्भीर संकट में डाल सकता है, जिसकी हर हानि से रक्षा करने के लिए हम स्वाभाविक या सामाजिक दायित्व से बँधे हैं। उदाहरण के लिए, हत्यारे एक पुत्र का पीछा कर रहे हैं; वह पिता के घर में शरण लेता है; उसकी माता उसे छिपा ही पाई है कि हत्यारे आ पहुँचते हैं। क्या उसे उनके प्रश्नों का झूठा उत्तर देने का अधिकार है? यह उन प्रश्नों में से एक है जो उठाए जा सकनेवाले सबसे कठिन और नाज़ुक प्रश्न हैं; परन्तु निःसन्देह कैल्विन ने उचित निर्णय दिया है जब वह यह व्यापक सिद्धान्त स्थापित करता है कि जो लोग किसी भी झूठ को क्षम्य मानते हैं, वे “पर्याप्त रूप से विचार नहीं करते कि परमेश्वर की दृष्टि में सत्य कितना बहुमूल्य है।” यदि हमें इस निर्णय से सहमत कराने के लिए किसी बात की आवश्यकता हो, तो हम उसे उस विनाश में सरलता से पा सकते हैं जो इसके विपरीत सिद्धान्त पर चलने से सारी नैतिकता का हुआ है, जैसा विशेषकर जेसुइट और अन्य रोमी कैज़ुइस्टों के उदाहरण में प्रकट हुआ है। — सं.

मूल पाठ में सन्दर्भ उत्पत्ति 28 दिया गया था, जो स्पष्टतः मुद्रण की भूल है। — fj.

लातीनी में, “Nullum in proditione fuit crimen;” अक्षरशः, “विश्वासघात में कोई अपराध नहीं था।” फ्रांसीसी में, “Il n'y a point eu de crime de trahison en ce faict;” “इस कार्य में विश्वासघात का कोई अपराध नहीं था।” इनमें से कोई भी कैल्विन के अभिप्राय को ठीक-ठीक प्रकट नहीं करता। आगे जो आता है उससे स्पष्ट है कि वह हर प्रकार के विश्वासघात को अपराध मानता था, क्योंकि उसमें सत्य से विचलन निहित है; साथ ही वह यह भी मानता था कि उन विशेष परिस्थितियों में राहाब अपने देशवासियों से अपनी निष्ठा हटाकर उसे इस्राएलियों को सौंप देने में न्यायसंगत थी। इसलिए वह कार्य को तो उचित ठहराता है, परन्तु उसकी रीति का समर्थन नहीं करता। यह दृष्टिकोण “छोड़ देना” शब्द से ठीक-ठीक प्रकट होता प्रतीत होता है, और इसलिए अनुवाद में यही शब्द रखा गया है। — सं.

7. “और वे पुरुष पीछा करते गए” इत्यादि। उनकी बड़ी सरल-विश्वासिता यह दिखाती है कि परमेश्वर ने उन्हें अन्धा कर दिया था। यद्यपि राहाब ने उन्हें धोखा देकर बहुत कुछ पा लिया था, तौभी चिन्ता का एक नया कारण आ खड़ा होता है; क्योंकि फाटक बन्द हो जाने से नगर ने बन्दीगृह के समान बच निकलने की आशा को रोक दिया। इसलिए वे एक गम्भीर परीक्षा के द्वारा फिर से परमेश्वर को पुकारने के लिए जगाए गए। क्योंकि जब यह इतिहास उन्हीं के वृत्तान्त के आधार पर लिखा गया, तो यह असम्भव है कि वे उस समय जो कुछ हो रहा था उससे अनजान रहे हों, विशेषकर इसलिए कि परमेश्वर ने अपने अनुग्रह की महिमा बढ़ाने के उद्देश्य से जान-बूझकर उन्हें एक के बाद एक संकटों में डाला। और अब जब उन्हें बताया गया कि उनकी खोज हो रही है, तो उनके अब तक जागते रहने के तथ्य से हम यह अनुमान करते हैं कि वे चिन्ता और भय में थे। जब उन्हें बताया गया कि उनके निकलने का मार्ग बन्द हो चुका है, तब उनकी घबराहट निश्चय ही कुछ कम नहीं बढ़ी होगी।

तौभी ऐसा प्रतीत होता है कि राहाब तनिक भी विचलित नहीं हुई, क्योंकि वह इतनी सूझ-बूझ और इतनी शान्ति के साथ अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए वाचा बाँधती है। और इस धीरज और दृढ़ता में उसका विश्वास, जिसकी अन्यत्र प्रशंसा की गई है, स्पष्ट रूप से चमकता है। क्योंकि मानवीय सिद्धान्तों के आधार पर वह राजा और प्रजा के क्रोध का कभी सामना न करती, और भय से अधमरे अतिथियों के सामने विनती करनेवाली न बनती। बहुत से लोग, वास्तव में, सोचते हैं कि सन्त याकूब और इब्रानियों के पत्र के लेखक, दोनों के द्वारा उसकी जो प्रशंसा की गई है (याकूब 2:25; इब्रानियों 11:31), जब वे उसे विश्वासियों की सूची में रखते हैं, उसमें कुछ हास्यास्पद है। परन्तु जो कोई सब परिस्थितियों को सावधानी से तौलेगा, वह सरलता से देख लेगा कि वह एक जीवित विश्वास से सम्पन्न थी।

पहला, यदि पेड़ अपने फलों से पहचाना जाता है, तो हम यहाँ कोई साधारण प्रभाव नहीं देखते, वरन् ऐसे प्रभाव जो विश्वास के उतने ही प्रमाण हैं। दूसरा, उसके इस दृढ़ विश्वास का मूल अवश्य ही भक्ति का कोई सिद्धान्त रहा होगा कि पड़ोसी जातियाँ एक प्रकार से पहले ही पराजित और भूमि पर गिरा दी गई थीं, क्योंकि ऊपर से भेजे गए भय ने सबके मन को घबराहट से भर दिया था। यह सच है कि अधर्मी लेखकों में भी हमें ऐसे ही कथन मिलते हैं, जिन्हें परमेश्वर ने उनसे बलपूर्वक कहलवाया, ताकि वह मनुष्यों के हृदयों पर शासन करने और उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी ओर फेरने की अपनी सामर्थ्य को प्रमाणित करे। परन्तु जहाँ ये लेखक तोतों के समान बकबक करते हैं, वहाँ राहाब, हृदय की सच्चाई से यह घोषित करती हुई कि परमेश्वर ने यह देश इस्राएलियों के लिए ठहरा दिया है, क्योंकि सब निवासी उनके सामने मूर्च्छित-से हो गए हैं, उसके लिए मनुष्यों के हृदयों पर वह सर्वोच्च शासन ठहराती है, जिसे संसार का घमण्ड अस्वीकार करता है।

क्योंकि यद्यपि सब युगों के अनुभव ने यह दिखाया है कि शत्रु के बल और पराक्रम की अपेक्षा अचानक और अप्रत्याशित भय से कहीं अधिक सेनाएँ गिरीं या तितर-बितर हुई हैं, तौभी इस सत्य की छाप तुरन्त मिट गई है; और इसी कारण विजेताओं ने सदा अपनी ही वीरता की बड़ाई की है, और किसी भी सफल परिणाम पर अपने ही परिश्रम और युद्ध-कौशल पर घमण्ड किया है। मैं मानता हूँ कि उन्होंने यह अनुभव किया है कि साहस और हिम्मत कभी-कभी किसी बाहरी कारण से दी या रोकी जाती है, और इसलिए मनुष्य स्वीकार करते हैं कि युद्ध में भाग्य बहुत कुछ करता है, वरन् सर्वोच्च होकर राज्य करता है। इसी से अकस्मात् भय के विषय में उनकी प्रचलित कहावत निकली, और वे मन्नतें भी जो वे पावोर (भय) को और जुपिटर स्टेटर को मानते थे। परन्तु उनके मनों में यह बात कभी गम्भीर और गहरी छाप नहीं बनी कि हर मनुष्य उतना ही वीर होता है जितना परमेश्वर उसमें उस समय साहस फूँकता है, या उतना ही कायर होता है जितना वह उसकी हिम्मत को दबा देता है। परन्तु राहाब कनान की जातियों को घबराहट से मारने में, और इस प्रकार उन्हें मानो पहले ही से अपने विनाश की घोषणा करने पर विवश करने में, परमेश्वर के हाथ के कार्य को पहचानती है; और वह यह निष्कर्ष निकालती है कि इस्राएलियों ने जो भय उत्पन्न किया है वह विजय का पूर्व-संकेत है, क्योंकि वे परमेश्वर को अपना अगुवा मानकर उसके अधीन लड़ते हैं।

इस तथ्य में कि जब सबका साहस इस प्रकार पिघल गया था, तौभी वे निराशा के हठ के साथ सामना करने को तैयार हुए, हम देखते हैं कि जब दुष्ट परमेश्वर के हाथ से तोड़े और कुचले जाते हैं, तब वे ऐसे वश में नहीं होते कि जूआ उठा लें, वरन् अपने भय और चिन्ता में वश में किए जाने के अयोग्य हो जाते हैं। यहाँ हमें यह भी देखना है कि एक ही समान भय में विश्वासी अविश्वासियों से कैसे भिन्न होते हैं, और राहाब का विश्वास कैसे प्रकट होता है। वह स्वयं भी प्रजा के किसी अन्य जन के समान डरी हुई थी; परन्तु जब वह विचार करती है कि उसका सम्बन्ध परमेश्वर से है, तब वह यह निष्कर्ष निकालती है कि उसका एकमात्र उपाय यह है कि नम्रता और शान्ति से झुककर विपत्ति से बचे, क्योंकि विरोध करना सर्वथा व्यर्थ होगा। परन्तु देश के सब अभागे निवासी कौन-सा मार्ग अपनाते हैं? यद्यपि वे भय से मारे हुए हैं, तौभी उनका हठ इतना भी नहीं टूटता, वरन् वे एक-दूसरे को संघर्ष के लिए उकसाते हैं।

10. “क्योंकि हमने सुना है कि कैसे” इत्यादि। वह घबराहट के विशेष कारण के रूप में यह बताती है कि अब तक अभूतपूर्व आश्चर्यकर्मों की दूर-दूर तक फैली चर्चा ने सबके मन पर यह छाप डाल दी थी कि परमेश्वर इस्राएलियों की ओर से युद्ध कर रहा है। क्योंकि इसमें सन्देह करना असम्भव था कि लाल समुद्र में से मार्ग आश्चर्यकर्म के द्वारा खोला गया था, क्योंकि यदि स्वभाव के रचयिता परमेश्वर ने ऐसा ठहराया न होता, तो जल अपना स्वभाव बदलकर कभी ठोस ढेरों के रूप में खड़ा न होता। इसलिए उस तत्त्व के रूपान्तर ने स्पष्ट दिखा दिया कि परमेश्वर उस प्रजा की ओर था, जिसे उसने समुद्र की गहराइयों में से सूखा मार्ग दिया था।

फ्रांसीसी में, “Et y a eu un proverbe commun entre eux, pour signifier les frayeurs soudaines dont le cause n'apparoit point; (car ils les appeloyent Epouvantemens Paniques;) aussi ils faisoyent voeus a un Juppiter qu'ils appeloyent Stator, c'est a dire Arrestant; et a une deesse qu'ils nommoyent Pavor, c'est a dire Peur afin que les armees tinssent bon, et ne s'en fuissent de peur;” “और उनमें उन अचानक भयों को सूचित करने के लिए एक प्रचलित कहावत थी जिनका कारण प्रकट नहीं होता; क्योंकि वे उन्हें ‘पैनिक’ भय (आकस्मिक आतंक) कहते थे; इसी प्रकार वे एक जुपिटर की, जिसे वे स्टेटर अर्थात् ‘रोकनेवाला’ कहते थे, और एक देवी की, जिसे वे पावोर अर्थात् ‘भय’ कहते थे, मन्नतें मानते थे, ताकि सेनाएँ डटी रहें और भय से भाग न जाएँ।” — सं.

ओग और बाशान पर प्राप्त की गई उल्लेखनीय विजयों को भी उचित ही इस्राएलियों के प्रति परमेश्वर की कृपा की गवाहियाँ माना गया। यह दूसरा निष्कर्ष, वास्तव में, केवल अनुमान पर आधारित था, जबकि समुद्र को पार करना एक पूर्ण और अखण्डनीय प्रमाण था, ठीक वैसा ही मानो परमेश्वर ने स्वर्ग से अपना हाथ बढ़ाया हो। इसलिए सबके मनों में यह दृढ़ धारणा बैठ गई कि इस्राएली प्रजा के अभियान में परमेश्वर ही प्रधान अगुवा था; इसी से उनका भय और घबराहट थी। साथ ही, सम्भव है कि वे इस व्यर्थ कल्पना से भी धोखा खा गए हों कि इस्राएल का परमेश्वर संघर्ष में मिस्र के देवताओं से श्रेष्ठ सिद्ध हुआ है; ठीक वैसे ही जैसे कवि कल्पना करते हैं कि हर देवता ने किसी न किसी जाति को अपनी सुरक्षा में ले रखा है, और दूसरों से युद्ध करता है, और इस प्रकार अपने प्रियजनों की रक्षा करते हुए देवताओं में आपस में ही संघर्ष होते हैं।

परन्तु राहाब का विश्वास इससे ऊँची उड़ान भरता है, जब वह सर्वोच्च सामर्थ्य और सनातनता केवल इस्राएल के परमेश्वर को ही देती है। यही यहोवा के सच्चे गुण हैं। वह सामान्य धारणा के अनुसार यह स्वप्न नहीं देखती कि देवताओं की भीड़ में से कोई एक इस्राएलियों की सहायता कर रहा है, वरन् वह स्वीकार करती है कि जिसकी कृपा उन्हें प्राप्त होना ज्ञात था, वही सच्चा और एकमात्र परमेश्वर है। तो हम देखते हैं कि ऐसे प्रसंग में, जहाँ सबको एक ही समाचार मिला था, वह उसे लागू करने में अपने देशवासियों से कितनी आगे बढ़ गई।

11. “तुम्हारा परमेश्वर यहोवा, वही परमेश्वर है” इत्यादि। यहाँ राहाब के विश्वास का प्रतिबिम्ब मानो दर्पण में दिखाई देता है, जब वह सब मूर्तियों को गिराकर आकाश और पृथ्वी का शासन केवल इस्राएल के परमेश्वर को देती है। क्योंकि यह पूर्णतः स्पष्ट है कि जब आकाश और पृथ्वी को इस्राएल के परमेश्वर के अधीन घोषित किया जाता है, तब उन सब अन्यजातीय कल्पनाओं का त्याग हो जाता है जिनके द्वारा परमेश्वर का प्रताप, सामर्थ्य और महिमा भिन्न-भिन्न देवताओं में बाँट दी जाती है; और इसलिए हम देखते हैं कि दो प्रेरितों ने अकारण ही राहाब के आचरण को विश्वास की उपाधि से सम्मानित नहीं किया। कुछ घमण्डी और तिरस्कार करनेवाले लोग इसकी हँसी उड़ाते हैं; परन्तु मैं चाहता हूँ कि वे विचार करें कि एकमात्र सच्चे परमेश्वर को सब कल्पित देवताओं से अलग पहचानना, और साथ ही उसकी सामर्थ्य की ऐसी बड़ाई करना कि यह घोषित किया जाए कि सारा संसार उसकी इच्छा के अनुसार चलाया जाता है, क्या अर्थ रखता है। राहाब हिचकिचाते हुए नहीं बोलती, वरन् निरपेक्ष शब्दों में घोषित करती है कि जो भी सामर्थ्य है वह केवल इस्राएल के परमेश्वर में ही निवास करती है, कि वह सब तत्त्वों को आज्ञा देता है, कि वह ऊपर और नीचे की सब बातों का प्रबन्ध करता है, और मनुष्यों के मामलों का निर्णय करता है। तौभी मैं इसका इनकार नहीं करता कि उसका विश्वास पूर्ण रूप से विकसित नहीं था; वरन् मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ कि वह भक्ति का केवल एक अंकुर था, जो उस समय तक उसके अनन्त उद्धार के लिए अपर्याप्त होता। तौभी हमें यह मानना चाहिए कि उस स्त्री के पास परमेश्वर का ज्ञान चाहे कितना ही दुर्बल और अल्प क्यों न रहा हो, तौभी उसकी सामर्थ्य के आगे अपने आप को सौंपकर वह अपने चुनाव का प्रमाण देती है, और यह कि उसी बीज से एक ऐसा विश्वास अंकुरित हो रहा था जो बाद में अपनी पूरी बढ़ती को पहुँचा।

फ्रांसीसी में, “Que Dieu estoit le principal conducteur de l'entreprise du peuple d'Israel, et qu'il marchoit avec iceluy;” “कि परमेश्वर इस्राएल की प्रजा के उस उद्यम का प्रधान संचालक था, और वह उसके साथ-साथ चल रहा था।” — सं.

12. “अब इसलिए, मैं तुमसे विनती करती हूँ, शपथ खाओ” इत्यादि। यह विश्वास का एक और प्रकाशन है कि वह अब्राहम की सन्तान को कनान देश का निश्चित अधिकारी ठहराती है, और इसका आधार इसके सिवाय और कोई तर्क नहीं कि उसने सुना था कि यह देश परमेश्वर की ओर से उनसे प्रतिज्ञा किया गया है। क्योंकि उसने यह नहीं समझा कि परमेश्वर ऐसे अधर्मी घुसपैठियों का पक्ष ले रहा है जो अन्यायपूर्ण हिंसा और निरंकुश स्वेच्छाचार के साथ दूसरों के प्रदेशों में बलपूर्वक घुसे चले आ रहे हैं, वरन् उसने यह निष्कर्ष निकाला कि वे कनान देश में इसलिए आ रहे हैं कि परमेश्वर ने उसका प्रभुत्व उन्हें सौंप दिया है। यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि जब उन्होंने एदोमियों और दूसरों से मार्ग माँगा, तब उन्होंने इसके विषय में कुछ न कहा कि वे कहाँ जा रहे हैं। वरन् वे जातियाँ उस प्रतिज्ञा से परिचित थीं जो अब्राहम से की गई थी, और जिसकी स्मृति एसाव के त्यागे जाने के द्वारा फिर से नई हो गई थी।

इसके अतिरिक्त, राहाब की भाषा में हम विश्वास का वह विशिष्ट गुण देखते हैं जिसका वर्णन इब्रानियों के पत्र का लेखक करता है, जब वह उसे अनदेखी वस्तुओं का दर्शन या प्रत्यक्ष देखना कहता है (इब्रानियों 11:1)। राहाब अपनी प्रजा के साथ एक गढ़वाले नगर में रहती है; तौभी वह अपना जीवन अपने भयभीत अतिथियों को सौंप देती है, मानो वे देश पर अधिकार कर चुके हों और उनके पास अपनी इच्छा के अनुसार बचाने या नाश करने का पूरा अधिकार हो। यह स्वेच्छा से किया गया आत्म-समर्पण, वास्तव में, ठीक वैसा ही था जैसे परमेश्वर की प्रतिज्ञा को ग्रहण करना और अपने आप को उसकी सुरक्षा पर छोड़ देना। इसके अतिरिक्त, वह शपथ भी माँगती है, क्योंकि नगरों पर धावा बोलते समय संघर्ष की गर्मी और कोलाहल प्रायः कर्तव्य की स्मृति को झटक देते थे। इसी प्रकार वह उस दया का भी उल्लेख करती है जो उसने उन पर की थी, ताकि कृतज्ञता उन्हें अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए और भी अधिक प्रेरित करे। क्योंकि यद्यपि शपथ का बन्धन अपने आप में प्रभावी होना चाहिए था, तौभी उस आतिथ्य करनेवाली स्त्री के प्रति कृतज्ञता न दिखाना, जिसके कारण उन्हें छुटकारा मिला था, दुगुनी नीचता और अमानवता होती। राहाब अपने माता-पिता और कुटुम्बियों के विषय में अपनी चिन्ता में अपने स्वभाव की कोमलता प्रकट करती है। यह वास्तव में स्वाभाविक है; परन्तु बहुत से लोग अपने आप में ऐसे लीन होते हैं कि सन्तान अपने माता-पिता को बचाने के लिए साहस और उत्साह दिखाने के बदले, उनकी मृत्यु के द्वारा अपने प्राण छुड़ाने में भी नहीं हिचकिचाती।

14. “तुम्हारे प्राण के बदले हमारा प्राण” इत्यादि। वे अपने ऊपर मृत्यु का शाप लेते हैं, यदि वे राहाब को बचाने को विश्वासयोग्यता से अपना काम न बनाएँ। क्योंकि कुछ लोगों द्वारा अपनाई गई यह व्याख्या, “हम अपने प्राण गिरवी रखेंगे,” दूर की कौड़ी, या अत्यधिक संकुचित, प्रतीत होती है, क्योंकि उनका अभिप्राय केवल परमेश्वर के सामने अपने आप को बाँधना था। इसलिए यदि उनकी लापरवाही से राहाब पर कोई विपत्ति आए, तो वे अपने आप को एक प्रकार की प्रायश्चित-बलि ठहराते हैं। “तुम्हारे बदले” इस अभिव्यक्ति को निःसन्देह माता-पिता, भाइयों और बहिनों तक भी विस्तृत किया जाना चाहिए। इसलिए वे अपने प्राणों को इस अर्थ में उत्तरदायी ठहराते हैं कि यदि राहाब का परिवार सुरक्षित न रहे, तो खून का लेखा उनसे लिया जाए। और शपथ की पवित्रता इसी में है कि यद्यपि उसका उल्लंघन, जहाँ तक मनुष्यों का सम्बन्ध है, दण्ड से बच सकता है, तौभी परमेश्वर, साक्षी के रूप में बीच में लाया जाने के कारण, उस विश्वासघात का लेखा लेगा। इब्रानी में, “दया और सच्चाई करना,” मानवता के कर्तव्य को विश्वासयोग्यता, सच्चाई और दृढ़ता से पूरा करने के समान है।

तौभी एक शर्त जोड़ी गई है, — कि राहाब उनकी कही हुई बात को प्रकट न करे। यह, जैसा प्रायः समझाया जाता है, अविश्वास के कारण नहीं जोड़ी गई, वरन् केवल इसलिए कि राहाब स्वयं अपने ही हित में और अधिक सावधान रहे। इसलिए यह चेतावनी सच्चे मन से दी गई थी, और शुद्ध सद्भावना से निकली थी; क्योंकि संकट यह था कि राहाब कुछ प्रकट करके स्वयं को फँसा न दे। एक शब्द में, वे दिखाते हैं कि यह कितना आवश्यक है कि यह बात मानो दबी रहे, ऐसा न हो कि वह स्त्री बिना विचारे वाचा की चर्चा करके अपने आप को प्राणदण्ड के संकट में डाल दे। इसमें वे दिखाते हैं कि वे सच्चे मन से उसकी सुरक्षा के लिए चिन्तित थे, क्योंकि वे इतने पहले ही उसे ऐसा कुछ भी करने से सावधान करते हैं जिससे उसकी सेवा करना उनकी सामर्थ्य से बाहर हो जाए। और जब वे आगे स्पष्ट रूप से यह शर्त रखते हैं कि कोई भी घर से बाहर न निकले, नहीं तो वे निर्दोष ठहरेंगे, तो इससे हम यह महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि शपथ खाने में संयम का सावधानी से ध्यान रखना चाहिए, ताकि हम किसी भी विषय पर व्यर्थ प्रतिज्ञाएँ करके परमेश्वर के नाम को अपवित्र न करें।

राहाब का यह परामर्श, कि वे पहाड़ की ओर मुड़ जाएँ और वहाँ तीन दिन चुपचाप रहें, यह दिखाता है कि विश्वास और उन सावधानियों के बीच कोई विरोध नहीं है जो प्रत्यक्ष संकटों से बचाव का प्रबन्ध करती हैं। इसमें सन्देह नहीं कि दूत बड़े भय के साथ चुपके से पहाड़ की ओर खिसक गए, तौभी वह भरोसा, जो उन्होंने अपने पक्ष में परमेश्वर के अद्भुत हस्तक्षेप से प्राप्त किया था, उनके पगों का मार्गदर्शन करता रहा, और उन्हें अपनी सूझ-बूझ खोने न दिया।

कुछ लोगों ने यह प्रश्न उठाया है कि जब शहरपनाह को लाँघना अपराध है, तो क्या खिड़की से नगर के बाहर निकलना उचित हो सकता था? परन्तु पहले तो यह ध्यान देना चाहिए कि नगरों की शहरपनाहें सब कहीं पवित्र नहीं मानी जाती थीं, क्योंकि हर नगर का कोई रोमुलस नहीं था जो शहरपनाह लाँघने को अपने भाई को मार डालने का बहाना बना सके; और दूसरे, जैसा सिसरो हमें स्मरण दिलाता है, उस व्यवस्था को न्याय-भावना से नरम किया जाना था, क्योंकि जो व्यक्ति शत्रु को पीछे हटाने के उद्देश्य से शहरपनाह पर चढ़े, वह दण्ड की अपेक्षा पुरस्कार के अधिक योग्य होगा। व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि शहरपनाह की सुरक्षा के द्वारा नागरिकों को सुरक्षित रखा जाए। इसलिए जो व्यक्ति शहरपनाह को लाँघे, न तिरस्कार से, न उद्दण्डता से, न छल से, न उपद्रवी रीति से, वरन् आवश्यकता के दबाव में, उस पर इस कारण न्यायपूर्वक प्राणदण्ड के योग्य अपराध का दोष नहीं लगाया जा सकता। यदि यह आपत्ति की जाए कि यह बात बुरा उदाहरण थी, तो मैं इसे मानता हूँ; परन्तु जब उद्देश्य अपने प्राण को हानि, हिंसा या लूट से बचाना हो, तो बशर्ते यह किसी को ठेस या हानि पहुँचाए बिना किया जाए, आवश्यकता उसे क्षम्य ठहराती है। पौलुस पर यह अपराध नहीं लगाया जा सकता कि जब दमिश्क में उसके प्राण संकट में थे, तब वह टोकरे में उतारा गया, क्योंकि परमेश्वर की ओर से उसे यह अनुमति थी कि वह बिना उपद्रव के दुष्ट मनुष्यों की हिंसा और क्रूरता से बच निकले।

यह उस शान्त और लगभग चुटीले विनोद का एक उदाहरण है जो कैल्विन के अन्य लेखों में भी कभी-कभी झलक जाता है, और यह दिखाता है कि यदि यह उसके चरित्र की सामान्य गम्भीरता के अनुकूल होता, तो वह उन अन्य हथियारों में, जिनसे उसने विश्वास की लड़ाइयाँ लड़ीं, सरलता से व्यंग्य-बुद्धि को भी जोड़ सकता था। बेज़ा के कथन के अनुसार, निजी जीवन में, जहाँ अधिक स्वतन्त्रता की अनुमति थी, इसने बहुधा उसकी बातचीत के आकर्षण को बढ़ाया प्रतीत होता है। — सं.

24. “और उन्होंने यहोशू से कहा” इत्यादि। यह अंश दिखाता है कि यहोशू ने अपने भेदियों के चुनाव में भूल नहीं की थी; क्योंकि उनकी भाषा प्रमाणित करती है कि वे दुर्लभ खराई से सम्पन्न, सीधे मनवाले पुरुष थे। दूसरे लोग, कदाचित्, उस भय से न उबरकर जिसमें वे एक बार डाल दिए गए थे, सारी छावनी को व्याकुल कर देते; परन्तु ये, संकट से अपने बच निकलने में और अपनी यात्रा के सुखद परिणाम में प्रकट हुई परमेश्वर की अद्भुत करुणा पर विचार करते हुए, यहोशू और प्रजा को साहस के साथ आगे बढ़ने का उपदेश देते हैं। और यद्यपि देश के अधिकार की केवल प्रतिज्ञा ही पर्याप्त होनी चाहिए थी, तौभी प्रभु उनकी दुर्बलता के प्रति इतना सहनशील है कि सब सन्देह दूर करने के लिए वह अपनी प्रतिज्ञा की हुई बात को अनुभव के द्वारा पुष्ट करता है। कि प्रभु ने व्यर्थ नहीं कहा था, यह जातियों की उस घबराहट से प्रमाणित हुआ, जब वह उन्हें पहले ही भगाने और खदेड़ने लगी थी, मानो उन पर बर्रें भेज दी गई हों। क्योंकि वे उसी प्रकार तर्क करते हैं जैसे राहाब ने किया था, कि देश उन्हें दे दिया गया है, क्योंकि निवासी भय से लगभग मूर्च्छित हो गए थे। इसलिए मैंने कारणवाचक अव्यय “क्योंकि” का प्रयोग किया है, यद्यपि शाब्दिक अर्थ “और भी” है। परन्तु यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट है कि दूसरी रीति से भी, उन्होंने जो कहा था उसकी पुष्टि होती है। और वास्तव में सबका साहस पिघल गया, मानो उन्होंने अनुभव किया हो कि परमेश्वर के हाथ से वे तितर-बितर कर दिए गए हैं।

शहरपनाह लाँघने के विषय में यह सारी आपत्ति अपने आप में इतनी हास्यास्पद है, और उस समय सब पक्षों की परिस्थितियों पर इतनी अनुपयुक्त है, कि यह समझना कठिन है कि कैल्विन ने उस पर ध्यान देने की कृपा ही क्यों की, या कम से कम उसका खण्डन करने में इतना परिश्रम क्यों किया। यदि कोई अनुमान लगाने का साहस करे, तो वह यह होगा कि जिनेवा की शहरपनाह के विषय में भी इसी प्रकार का कोई प्रश्न उठाया गया था, जिसने उस चर्चा को, जो अन्यथा कुछ असंगत प्रतीत होती है, एक स्थानीय रोचकता दे दी थी। — सं.

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