यहोशू की पुस्तक पर टीका · अध्याय 17

यहोशू 17

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यहोशू 17

यहोशू 17:1-10

1. फिर मनश्शे के गोत्र का भी भाग चिट्ठी डालकर ठहरा, क्योंकि वह यूसुफ का जेठा था; अर्थात् मनश्शे के जेठे पुत्र गिलाद के पिता माकीर के लिये; वह योद्धा था, इस कारण उसको गिलाद और बाशान मिला।

1. Fuit quoque sors tribui Manasse (ipse enim fuit primogenitus Joseph) ipsi Machir primogenito Manasse patri Gilead (ipse enim fuit vir bellicosus), fuit inquam, ei Gilead et Basan.

2. फिर दूसरे मनश्शेइयों के लिये भी उनके कुलों के अनुसार भाग ठहरा, अर्थात् अबीएजेर, हेलेक, अस्रीएल, शेकेम, हेपेर और शमीदा की सन्तान के लिये; यूसुफ के पुत्र मनश्शे के वंश में अपने अपने कुलों के अनुसार यही पुरुष थे।

2. Fuit item filiis Manasse reliquis per familias suas, filiis Abiezer, et filiis Abiezer, et filiis Helec, et filiis Hepher, et filiis Semida. Isti sunt filii Manasse, filii Joseph mares per familias suas.

3. परन्तु हेपेर जो गिलाद का पुत्र, माकीर का पोता और मनश्शे का परपोता था, उसके पुत्र सलोफाद के बेटे नहीं, बेटियाँ ही हुईं; और उसकी बेटियों के नाम ये हैं, महला, नोआ, होग्ला, मिल्का और तिर्सा।

3. Porro Selphead filio Hephner, filii Gilead, filii Machir, filii Manasse non fuerunt filii sed filiae: quarum ista sunt nomina, Mahala, et Noa, Hogla, Melcha, et Thirza.

4. तब वे एलीआज़र याजक, नून के पुत्र यहोशू, और प्रधानों के पास जाकर कहने लगीं, यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी कि वह हम को हमारे भाइयों के बीच निज भाग दे। तब यहोशू ने यहोवा की आज्ञा के अनुसार उन्हें उनके पिता के भाइयों के बीच निज भाग दिया।

4. Hae accesserunt in conspectum Eleazar sacerdotis, et in conspectum Josue filii Nun, atque in conspectum principum, dicendo, Jehova praecepit Mosi ut daret nobis haereditatem in medio fratrum nostrorum. Itaque dedit eis juxta sermonem Jehovae, haereditatem in medio fratrum patris earum.

5. तब मनश्शे को, यरदन पार के गिलाद देश और बाशान को छोड़, दस भाग मिले;

5. Et ceciderunt haereditates Manasse decem, praeter terram Gilead et Basan, quae erant trans Jordanem.

6. क्योंकि मनश्शे की बेटियों को उसके पुत्रों के बीच निज भाग मिला; और दूसरे मनश्शेइयों को गिलाद देश मिला।

6. Filiae enim Manasse sortitae sunt hereditatem in medio filiorum ejus: terra autem Gilead fuit filiis Manasse reliquis.

7. और मनश्शे की सीमा आशेर से लेकर मिकमतात तक पहुँची, जो शकेम के साम्हने है; फिर वह सीमा दाहिनी ओर बढ़कर एनतप्पूह के निवासियों तक पहुँची।

7. Fuit autem terminus Manasse ab Aser ad Michmethah, quae est coram Sechem, et pergit terminus ad dextram ad habitatores Enthappua.

8. तप्पूह की भूमि तो मनश्शे को मिली, परन्तु तप्पूह नगर, जो मनश्शे की सीमा पर बसा था, एप्रैमियों का ठहरा।

8. Ipsius Manasse fuit terra Thappua: ab Thappua quae erat ad terminum Manasse, est filiorum Ephraim.

9. फिर वहाँ से वह सीमा काना के नाले तक उतरकर उस नाले की दक्खिन ओर तक पहुँची; ये नगर, यद्यपि मनश्शे के नगरों के बीच में थे, तौभी एप्रैम के ठहरे; और मनश्शे की सीमा उस नाले की उत्तर ओर से होकर समुद्र पर निकली;

9. Descenditque terminus ad torrentem arundinis ad meridiem ipsius torrentis: civitates istae tribus Ephraim sunt in medio civitatum Manasse: at terminus Manasse est ab aquilone ipsius torrentis, suntque exitus ejus ad mare.

10. दक्खिन की ओर का देश तो एप्रैम का, और उत्तर की ओर का मनश्शे का ठहरा, और उसकी सीमा समुद्र है; और वे उत्तर की ओर आशेर से, और पूर्व की ओर इस्साकार से जा मिले।

10. Ad meridiem est ipsius Ephraim, et ad aquilonem ipsius Manasse, estque terminus ejus, et in Aser occurrunt inter se ab aquillone, et in Issachar ab oriente.

इतिहास-लेखक मनश्शे के गोत्र की ओर इस अभिप्राय से लौटता है कि जो बात हम पहले सलोफाद की बेटियों के विषय में देख चुके हैं, उसकी पुष्टि करे। क्योंकि यद्यपि स्त्रियों का बिना भेद-भाव के पुरुषों के साथ उत्तराधिकारी होना एक नई बात थी, तौभी जब उनमें से पाँच अपने पिता के पीछे जीवित बची रहीं, तब उन्होंने यह प्रमाणित किया कि उनका किसी भाग में सम्मिलित किया जाना न्यायसंगत है, ऐसा न हो कि वह निर्दोष होते हुए भी निःसन्तान मरने की निन्दा के नीचे पड़ा रहे। परमेश्वर ने अपनी दिव्य वाणी के द्वारा मूसा को उत्तर दिया था कि उत्तराधिकार के विषय में वे एक ही व्यक्ति गिनी जाएँ। अब वे माँग करती हैं कि प्रभु के मुँह से इस प्रकार दिया गया निर्णय कार्य में परिणत किया जाए। जहाँ तक जेठे की उस पदवी का सम्बन्ध है जो अब भी मनश्शे को दी गई है, उसे ऐसे समझना चाहिए कि वह याकूब की भविष्यद्वाणी के विरुद्ध न पड़े; वरन् यों कहें कि यहाँ उसका जेठापन एक प्रकार से गाड़ दिया गया है, और उसकी प्रतिष्ठा बीते हुए समय तक सीमित कर दी गई है। तौभी यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि मनुष्य इतने हठीले और अपने ही स्वार्थ में इतने लीन रहते हैं कि दूसरों को उनका प्राप्य देना उन्हें कदाचित् ही सूझता है। सलोफाद की बेटियों ने स्वर्गीय आज्ञा के द्वारा एक भाग प्राप्त कर लिया था; और किसी ने उसके विरुद्ध एक शब्द भी कहने का साहस न किया था; तौभी यदि वे चुप रहतीं, तो उनकी ओर कोई ध्यान न दिया जाता। इसलिये, ऐसा न हो कि विलम्ब उनके लिये हानिकारक सिद्ध हो, वे यहोशू और एलीआज़र के पास जाती हैं, और आग्रह करती हैं कि उन्हें उनके न्यायसंगत उत्तराधिकार से वंचित न किया जाए। यहोशू की ओर से कोई विलम्ब नहीं होता जो उन्हें तुरन्त अपना न्यायोचित अंश पाने से रोके, और न प्रजा की ओर से कोई कुड़कुड़ाहट होती है। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि सब के सब न्याय से व्यवहार करने को तैयार थे; परन्तु हर कोई अपने ही हित में लगा रहता है, और दूसरों के हित की ओर से लापरवाही से आँख मूँद लेने को बहुत तत्पर रहता है।

5. “तब मनश्शे को दस भाग मिले” इत्यादि। इस स्थल में मनश्शे की सन्तान सात शाखाओं में बाँटी गई है। जेठा माकीर अलग रखा गया है; शेष छः उसके पीछे आते हैं। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि निज भाग दस भागों में कैसे बाँटा गया? कुछ व्याख्याकार चतुराई से इस कठिनाई को छिपा जाते हैं; दूसरे, क्योंकि वे उसे सुलझा नहीं सकते, निरी व्यर्थ बातों में लग जाते हैं। निश्चय ही यह अत्यन्त बेतुकी बात है कि पाँच बेटियों को चार भाग दिए जाएँ; और यह भी तनिक अधिक संगत नहीं कि उनका अंश इसलिये दुगुना कर दिया गया कि उनका पिता जेठा था। यह बात सब विवाद से परे है कि माकीर के पुत्र गिलाद ने, जो उन स्त्रियों का, जिनके विषय में हम अभी कह रहे हैं, परदादा था, अपना निवास गिलाद पहाड़ और बाशान में चुना। इसलिये, जब कि वह चिट्ठी के बिना विशेषाधिकार के द्वारा पहले ही निज भाग पा चुका था, तो उसे कनान देश में चिट्ठी के द्वारा फिर भाग नहीं मिलना चाहिए था, सिवाय इसके कि कदाचित् उसने अपने घराने के केवल एक भाग को यरदन के पार बसाया हो। क्योंकि हेपेर उसके पुत्रों में से एक था, परन्तु अकेला नहीं; और इसी प्रकार पाँच अन्य भाइयों की सन्तान भी अनेक शाखाओं में बाँटी जा सकती थी, जिनकी गिनती के अनुसार चिट्ठी द्वारा बँटवारा किया जा सकता था। क्योंकि यह ज्ञात नहीं कि जिन घरानों का भाग कनान देश में पड़ा, वे किस पीढ़ी के अनुसार लिये गए। और यहाँ हम केवल इतना ही पढ़ते हैं कि उस देश के अतिरिक्त, जिसे उन्होंने पहले ही यरदन के पार अपने लिये प्राप्त कर लिया था, मनश्शे के पुत्रों के लिये दस चिट्ठियाँ डाली गईं। अतः उस संख्या के विषय में विवाद करना व्यर्थ है, जो वर्तमान वृत्तान्त से निश्चित रूप से जानी नहीं जा सकती, क्योंकि जानने योग्य पहली बात यह है कि ठीक-ठीक कितने घरानों में वह बँटवारा साझा था। वरन् यह भी असम्भव नहीं कि सलोफाद की बेटियों ने अपनी पैतृक सम्पत्ति वहीं पाई हो। यह तो कहा गया है कि वे अपने पिता के भाइयों के बीच रहीं; परन्तु स्थान नहीं बताया गया। जो भी हो, मुझे कोई सन्देह नहीं कि परस्पर न्याय का पालन किया गया, और दूसरों के लिये प्रबन्ध हो जाने के बाद, जो भूमि चिट्ठी के अधीन की गई थी, वह उन दस घरानों में बाँटी गई जिनके नाम यहाँ छोड़ दिए गए हैं।

यहोशू 17:11-18

11. और इस्साकार और आशेर में मनश्शे को अपने अपने नगरों समेत बेतशान और यिबलाम, और अपने नगरों समेत दोर के निवासी, और अपने नगरों समेत एनदोर के निवासी, और अपने नगरों समेत तानाक के निवासी, और अपने नगरों समेत मगिद्दो के निवासी मिले, अर्थात् तीन प्रदेश।

11. Fuitque ipsi Manasse in Issachar, et in Aser, Beth-sean, et oppida ejus: et Ibleam, et oppida ejus: et habitatores Dor, et oppida ejus: et habitatores Endor, et oppida ejus: et habitatores Thaanach, et oppida ejus: et habitatores Magiddo, et oppida ejus, tres regiones.

लातीनी में, “Quidam astute hunc scrupulum dissimulant.” फ्रांसीसी में, “Aucuns y vent a la finesse ne faisans nulle mention de ceste difficulte;” “कुछ लोग चतुराई का सहारा लेते हैं, और इस कठिनाई का कोई उल्लेख ही नहीं करते।” — सं.

12. परन्तु मनश्शेई उन नगरों के निवासियों को निकाल न सके; और कनानी उस देश में बसे ही रहने पर अड़े रहे।

12. Et non potuerunt filii Manasse expellere habitatores urbium istarum, sed coepit Chananaeus habitare in terra ipsa.

13. तौभी जब इस्राएली सामर्थी हो गए, तब वे कनानियों से कर तो लेने लगे, परन्तु उनको पूरी रीति से निकाल बाहर न किया।

13. Quum autem roborati essent filii Israel, posuerunt Chananaeum tributarium, nec expellendo expulerunt eum.

14. ¶ यूसुफ की सन्तान यहोशू से कहने लगी, तू ने हमारे निज भाग के लिये चिट्ठी डालकर क्यों एक ही भाग और एक ही अंश दिया है, जब कि हम गिनती में बहुत हैं, क्योंकि अब तक यहोवा हमें आशीष ही देता आया है?

14. Loquui sunt autem filii Joseph ad Josue, dicendo, Cur dedisti mihi in haereditatem sortem unam, et haereditatem unam, quum ego sim populus multus, ita quod hucusque benedixerit mihi Jehova?

15. यहोशू ने उनसे कहा, यदि तुम गिनती में बहुत हो, और एप्रैम का पहाड़ी देश तुम्हारे लिये सकेत है, तो जंगल में चढ़ जाओ, और वहाँ परिज्जियों और रपाइयों के देश में अपने लिये पेड़ों को काटकर भूमि साफ़ कर लो।

15. Dixitque ad eos Josue, Si populus multus es, ascende in sylvam, et succide tibi illic in terra Perizaei, et Rephaim, si angustus est tibi mons Ephraim.

16. यूसुफ की सन्तान ने कहा, वह पहाड़ी देश हमारे लिये काफ़ी नहीं है; और नीचे के देश में रहनेवाले सब कनानियों के पास, क्या बेतशान और उसके नगरों में रहनेवाले, क्या यिज्रेल की तराई में रहनेवाले, सभों के पास लोहे के रथ हैं।

16. Cui responderunt filii Joseph, Non sufficiet nobis mons ille: et currus ferrei sunt in omni Chananaeo qui habitat in terra vallis, et ei qui habitat in Beth-sean et oppidis ejus, et ei qui habitat in valle Jezrael.

17. तब यहोशू ने यूसुफ के घराने से, अर्थात् एप्रैम और मनश्शे से कहा, तुम तो गिनती में बहुत हो, और तुम्हारी सामर्थ्य भी बड़ी है; इसलिये तुम को केवल एक ही भाग न मिलेगा;

17. Dixitque Josue ad domum Joseph, nempe ad Ephraim et Manasse, dicendo, Populus multus es, et fortitudo magna est tibi: non erit tibi sors unica.

18. वरन् वह पहाड़ी देश भी तुम्हारा होगा; क्योंकि वह जंगल है, और तुम उसके पेड़ काट डालोगे; और उसके दूर दूर तक के छोर भी तुम्हारे होंगे; क्योंकि चाहे कनानी सामर्थी हों, और उनके पास लोहे के रथ भी हों, तौभी तुम उन्हें निकाल दोगे।

18. Mons enim erit tibi, quia sylva est: succides ergo eam, et erunt tibi exitus ejus: quia expelles Chananaeum, quanquam currus ferrei sint ei, quanquam fortis sit.

11. “और इस्साकार में मनश्शे को मिले” इत्यादि। वे इस प्रकार कैसे मिल गए कि आशेर और इस्साकार के भाग में कुछ नगरों के अधिकारी हुए, जब कि एप्रैम का गोत्र उनकी सीमाओं के बीच में बसा था, इसका अनुमान लगाना सहज नहीं; सिवाय इसके कि कदाचित् यह समझ लिया गया कि अधिक सुविधाजनक निवास अनेक शिकायतों का कारण न बनेगा; अथवा कदाचित् सारे देश के अधिक निश्चित रूप से जान लिये जाने के बाद, पहले के बँटवारे में न्याय के सिद्धान्तों पर कुछ परिवर्तन किया गया। अतः ऐसा जान पड़ता है कि यह एक नई प्राप्ति थी, जो यह पता चलने के बाद हुई कि मनश्शे की सन्तान दूसरों की हानि किए बिना अधिक विस्तृत प्रदेश पर अधिकार कर सकती है। और जो निवास उन्हें दिया गया वह कोई अधीन किया हुआ प्रदेश न था जिसका वे तुरन्त भोग कर सकें, वरन् वह आशा में संचित रखा हुआ निज भाग था, जो वास्तविक अधिकार की अपेक्षा स्वर्गीय प्रतिज्ञा पर कहीं अधिक आधारित था। तौभी उन नगरों पर उनका अधिकार न कर पाना उन्हीं के दोष पर डाला गया है, क्योंकि जिस चिट्ठी ने वे नगर उन्हें सौंपे थे, वह विजय की निःसन्देह बयाना थी। इसलिये वे निवासियों को निकाल न सके, इसका कारण यह था कि वे अपने मन में पूरी रीति से इस बात के निश्चय में न थे कि परमेश्वर सच्चा है, और उन्होंने अपने आलस्य से उसके कार्य को दबा दिया। परन्तु उन्होंने एक और भी कम क्षमायोग्य अपराध तब किया, जब सब को सहज ही नष्ट कर देना उनके वश में होते हुए भी, वे न केवल परमेश्वर की आज्ञा पूरी करने में आलसी रहे, वरन् नीच लाभ के लोभ में पड़कर उन्होंने उन लोगों को जीवित रख छोड़ा जिन्हें परमेश्वर ने विनाश के लिये ठहराया था। क्योंकि जिन लोगों पर हम कर लगाते हैं, उन्हें हम एक प्रकार से अपने वचन और संरक्षण में ले लेते हैं। परमेश्वर ने उन्हें अपने प्रतिशोध का सेवक ठहराया था, और उसे पूरा करने के लिये वह उन्हें बल भी देता है; वे न केवल विलम्ब करते हैं, वरन् ठीक-ठीक काम करने की स्वतन्त्रता से अपने आप को वंचित कर लेते हैं। इसलिये यह कोई अचम्भे की बात नहीं कि परमेश्वर ने इस हठीली हृदयहीनता का कठोर दण्ड दिया, अर्थात् उन जातियों को, जिन्हें उन्होंने स्पष्ट निषेध के होते हुए भी क्षमा कर दिया था, उनकी आँखों में चुभनेवाले काँटे और उनके पाँजरों में गड़नेवाले पैने अंकुश बना दिया।

लातीनी में, “Nisi quia forte perspectum est; nec habitatio commodior obnoxia esset multis querimoniis.” फ्रांसीसी में, “Sinon possible qu'on voulust avoir esgard que s'ils eussent este plus a leur aise, cela eust engendre des complaintes;” “सिवाय इसके कि सम्भवतः उन्होंने इस बात पर ध्यान देना उचित समझा हो कि यदि वे अधिक सुख-सुविधा में होते, तो उससे शिकायतें उत्पन्न हो सकती थीं।” — सं.

लातीनी में, “Turpi lucro adduti.” फ्रांसीसी में, “Sous couleur de quelque gain vilain et infame;” “किसी नीच और लज्जाजनक लाभ के बहाने।” — सं.

यहाँ फिर एक प्रश्न उठता है कि आशेर और इस्साकार के गोत्र में उन्हें नगर कैसे दिए गए, जब कि उन दोनों के भाग अभी तक अज्ञात थे? अतः यहाँ जो बात अभी घटी न थी, वह पूर्वकथन के रूप में बताई गई है। जो भी हो, हम इससे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि स्थानों से अनभिज्ञ होने के कारण अलग अलग भाग इतनी ठीक-ठीक रीति से नहीं बाँटे गए थे कि बाद में, जो कुछ कमोबेश निर्धारित किया जा चुका था, उसे सुधारने की आवश्यकता ही न पड़े।

और एप्रैम के गोत्र तथा अन्य गोत्रों, दोनों के विषय में हमें सामान्यतः यह मानना चाहिए कि जो नगर उन्होंने प्राप्त किए, उनमें से बहुतेरे उजाड़ के कारण किसी गिनती में न थे। मुझे सन्देह नहीं कि यहाँ बहुत से खण्डहर दबे पड़े हैं। दूसरी ओर, हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि उपजाऊ स्थानों में, अथवा अन्य सुविधाओं से युक्त स्थानों में, जहाँ केवल छोटे-छोटे गाँव थे, उनके प्रसिद्ध नगर बसाए गए। यह निश्चित है कि शकेम इतना महत्त्वपूर्ण था कि उसका नाम और पद दोनों थे, तौभी यहाँ उसका कोई उल्लेख नहीं है। यही बात शोमरोन के विषय में भी है, जो, जैसा सब जानते हैं, जब वह इस्राएल के राज्य की राजधानी थी, तब उसी एप्रैम के गोत्र की थी। इसलिये स्पष्ट है कि हर एक गोत्र के अधिकार में अनेक नगर थे, जिनके विषय में यहाँ मौन रखा गया है।

14. “यूसुफ की सन्तान यहोशू से कहने लगी” इत्यादि। यद्यपि वे अपनी शिकायत को बहाने का कुछ रंग चढ़ाते हैं, तौभी वे बेईमानी से इस तथ्य को छिपाते हैं कि एक ही चिट्ठी में उससे अधिक भूमि सम्मिलित थी जितनी एक गोत्र के लिये उचित थी। तौभी मैं नहीं जानता कि यूसुफ के पुत्रों के लिये चिट्ठी अनिश्चित रूप से डाली गई थी या नहीं: निश्चय ही ऐसा होना संगत प्रतीत नहीं होता। यहोशू और बाँटनेवाले अन्य लोग इस बात से अनजान न थे कि एप्रैम और मनश्शे दो मूल, अथवा दो शाखाएँ थे: और पहले बार-बार कहा जा चुका है कि देश दस गोत्रों में बाँटा गया, और यह संख्या तब तक ठीक न होती जब तक मनश्शे का गोत्र एप्रैम के गोत्र से अलग न गिना जाता। इसलिये यह निश्चित है कि वे ऐसी भारी भूल में नहीं पड़े थे कि दोनों नामों को एक ही चिट्ठी में डाल दें। अब, यूसुफ के नाम के नीचे दो गोत्रों को छिपाकर उन्हें उनके आधे अधिकार से वंचित करना असहनीय अन्याय होता। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि हर एक का प्रदेश उसकी उचित सीमाओं के द्वारा अलग से समझाया और वर्णन किया गया था।

अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जब दोनों गोत्रों के लिये चिट्ठियाँ डाली गईं, तब परमेश्वर की अद्‌भुत युक्ति ने ऐसा प्रबन्ध किया कि वे भाई, जिनका पिता एक ही था, एक दूसरे से सटे हुए और पड़ोसी हों। इसलिये उनका यह शिकायत करना और यह तर्क देना अनुचित है कि उन्हें केवल एक ही निज भाग दिया गया, क्योंकि यहोशू में न तो इतनी हृदयहीनता थी और न इतना द्वेष कि वह असावधानी या ईर्ष्या के कारण उन्हें किसी स्पष्ट अधिकार से वंचित करे। परन्तु सकेत सीमाओं के विषय में उनकी शिकायत का झूठ इसी में था कि जो कुछ अभी युद्ध के पराक्रम से प्राप्त करना शेष था, उसे वे कुछ भी नहीं गिनते थे; मानो चिट्ठी ने दूसरे गोत्रों को केवल अधीन किए हुए प्रदेश में ही भाग दिए हों। तदनुसार यहोशू एक ही वाक्य में उनके तर्क का खण्डन करके उसे निपटा देता है, और जिस आरोप के द्वारा वे उस पर कलंक लगाने का प्रयत्न कर रहे थे, वही उलटकर उन पर लगा देता है। वह पूछता है, यदि तुम्हारे साधन और तुम्हारी गिनती इतनी बड़ी है, तो तुम उस शत्रु पर, जिसका देश तुम्हें दिया गया है, चढ़ाई क्यों नहीं करते? और यदि तुम परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा रखकर उस निज भाग की ओर साहस से बढ़ो जो उसने तुम्हें प्रदान किया है, तो परिणाम तुम्हें निराश न करेगा। हम देखते हैं कि यद्यपि उनके लिये उचित प्रबन्ध किया गया था, तौभी वे आलस्य से ऐसे अन्धे हो गए थे कि स्थान की सकेती की शिकायत करने लगे, क्योंकि वे अपने निज भाग का पूरा अधिकार पाने के लिये उँगली तक हिलाना नहीं चाहते थे। इसलिये यह स्थल हमें सिखाता है कि यदि कभी हमें ऐसा लगे कि जितना हमारा प्राप्य है उससे कम हमारे लिये किया गया है, तो हमें सब विलम्ब को यत्न से झाड़ फेंकना चाहिए, और जो दोष हम में ही है, उसे उतावली से दूसरों पर नहीं डालना चाहिए।

फ्रांसीसी में टीका का यह खण्ड यहीं रुक जाता है, और लातीनी में जो कुछ इसके बाद है, वह सब छोड़ दिया गया है। तौभी यह केवल स्थानान्तरण भर है, क्योंकि छोड़ा गया अनुच्छेद यहोशू 17:14 के खण्ड के अन्तर्गत, एक टिप्पणी द्वारा संकेतित स्थान पर, सम्मिलित किया गया है। — सं.

यहोशू 17:11 के खण्ड का छोड़ा गया अनुच्छेद यहाँ सम्मिलित किया गया है। — सं.

यह तो स्पष्ट ही है कि यहोशू के सम्मान और खराई के विरुद्ध कोई भी अनुमान लगाना असम्भव है, और इसलिये यह मानना ही होगा कि यूसुफ की सन्तान के लिये चिट्ठी चाहे जिस रीति से डाली गई हो, कठोरतम न्याय का पालन किया गया। परन्तु क्या इन दो विकल्पों में से एक को अपनाना आवश्यक है — या तो यह कि एप्रैम और मनश्शे के लिये अलग अलग चिट्ठियाँ डाली गईं, या यह कि यहोशू ने उन्हें धोखा दिया? यद्यपि वे दो गोत्र गिने जाते थे, तौभी उनका पूर्वज एक ही कुलपिता था, और इसलिये यह सबसे उपयुक्त रहा होगा कि, भाई होने के कारण, उनकी बस्तियाँ एक दूसरे से सटी हों। यह कदाचित् अलग अलग चिट्ठियाँ डालकर भी प्राप्त किया जा सकता था, क्योंकि हम कई अवसरों पर देख चुके हैं कि चिट्ठी, यद्यपि ऊपर से संयोगाधीन दिखाई देती थी, तौभी परमेश्वर के विधान के द्वारा ऐसी नियन्त्रित थी कि उसके परिणाम एक साथ प्राचीन भविष्यद्वाणियों की पुष्टि करते थे और सार्वजनिक भलाई में सहायक होते थे; और इसलिये हम मान सकते हैं कि यदि अलग अलग चिट्ठियाँ डाली भी जातीं, तौभी परिणाम यही हो सकता था कि दोनों सम्बन्धी गोत्र अगल-बगल रखे जाते। परन्तु यह केवल सम्भावना की बात थी, और विषय को सन्देह से परे करने का एकमात्र उपाय यह था कि एक ही चिट्ठी दोनों के लिये काम आए। और इसमें कोई अनिवार्य अन्याय न था, क्योंकि, जैसा बार-बार कहा जा चुका है, चिट्ठी केवल स्थान निश्चित करती थी, उसकी ठीक-ठीक सीमाएँ निर्धारित नहीं करती थी, और इस प्रकार जनसंख्या के विस्तार के अनुसार उन्हें बढ़ाने या घटाने का मार्ग खुला छोड़ देती थी। यदि यूसुफ की सन्तान के साथ अन्याय हुआ होता, तो वह केवल इसलिये न होता कि उन्हें एक ही चिट्ठी में रखा गया, वरन् इसलिये कि यह चिट्ठी, यद्यपि वास्तव में दो गोत्रों के लिये ठहराई गई थी, ऐसी छोटी छोड़ दी गई मानो वह केवल एक ही के लिये ठहराई गई हो। अतः इस दृष्टिकोण के अनुसार, उस शिकायत की अनुचितता और बेईमानी इस बात में थी कि वे इस तथ्य पर तो ज़ोर देते थे कि केवल एक ही चिट्ठी डाली गई, और साथ ही उस दूसरे, उतने ही महत्त्वपूर्ण तथ्य को आँख से ओझल रखते थे कि उसकी सीमाएँ निर्धारित करते समय उनकी गिनती का उचित ध्यान रखा गया था, और हर एक को पर्याप्त विस्तार की अलग अलग बस्तियाँ दी गई थीं। कि केवल एक ही चिट्ठी डाली गई, इसकी पुष्टि सारे वृत्तान्त के आशय से दृढ़ता से होती है: पहले, जब सन्तान ने यहोशू से स्पष्ट रूप से यह प्रश्न किया, “तू ने हमारे निज भाग के लिये क्यों एक ही भाग और एक ही अंश दिया है?” तब वह यह उत्तर देकर उन्हें तुरन्त चुप नहीं कर देता कि जो दावा उन्होंने प्रश्न के रूप में इतनी खुलकर किया, वह सच न था। इसके विपरीत, उसके उत्तर की परोक्षता से यह संकेत मिलता प्रतीत होता है कि उस दावे की सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता था। दूसरे, यहोशू 16 का वृत्तान्त, एप्रैम और मनश्शे के बँटवारों का वर्णन करते हुए, उन्हें केवल एक ही चिट्ठी के रूप में प्रस्तुत करता है। इस प्रकार कहा गया है (यहोशू 16:1), “फिर यूसुफ की सन्तान का भाग चिट्ठी डालने से ठहराया गया, उनकी सीमा यरीहो के पास की यरदन नदी से, अर्थात् पूर्व की ओर यरीहो के जल से आरम्भ हुई;” और (यहोशू 16:4), “तब मनश्शे और एप्रैम नाम यूसुफ के दोनों पुत्रों की सन्तान ने अपना अपना निज भाग लिया।” — सं.

16. “यूसुफ की सन्तान ने कहा” इत्यादि। यह बहुत ही स्पष्ट है कि वे केवल अपने ही विषय में सोच रहे थे, क्योंकि वे यहोशू के सुझाव का पालन करने से बचने के लिये, जिससे अधिक युक्तिसंगत तो कुछ भी न था, जितना हो सके उतने बहाने गढ़ते हैं। वे आपत्ति करते हैं कि वह पहाड़ ऊबड़-खाबड़ है और जंगल से कुछ ही अच्छा है, और इसलिये यदि वह उन्हें दे भी दिया जाए, तौभी उससे उन्हें बहुत थोड़ा लाभ होगा। जहाँ तक मैदान का सम्बन्ध है, जो जोता-बोया हुआ और उपजाऊ था, वे आपत्ति करते हैं कि शत्रु की भयानक सैन्य-सज्जा के कारण वे उससे बाहर रखे गए और रोके गए हैं। तदनुसार वे उनके लोहे के रथों का उल्लेख करते हैं, मानो उन्होंने अनुभव से पहले ही यह न सीख लिया हो कि प्रभु बिना किसी कठिनाई के घोड़ों और रथों दोनों को रौंद डालने में समर्थ है। परन्तु यहोशू एक सरल और सीधे मन के उत्तर के द्वारा उनके लोभ को, और साथ ही उनकी स्त्रैणता और जड़ता को, उचित ताड़ना देता है। यदि वह वन, जैसा अब है, पर्याप्त उपज नहीं देता, तो पेड़ों को काट डालो और उसे अच्छे खेतों में बदल दो; यदि तुम अपने परिश्रम में कंजूसी न करो, तो तुम्हें अपने निवास से असन्तुष्ट होने का कोई कारण न रहेगा। इसके अतिरिक्त, लोहे के रथ प्रभु को वह पूरा करने से नहीं रोक सकते जिसकी उसने तुम से प्रतिज्ञा की है। निज भाग तुम्हारा है; तुम केवल उचित भरोसे के साथ उस पर अधिकार करने के लिये आगे बढ़कर अपना भाग पूरा करो।

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