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यहोशू 6
यहोशू 6:1-19
1. और यरीहो के सब फाटक इस्राएलियों के कारण लगातार बन्द रहे; न कोई बाहर जाता था और न कोई भीतर आता था।
1. Jericho autem erat clausa, et claudebatur propter filios Israel, nec poterat quisquam egredi, vel ingredi.
2. फिर यहोवा ने यहोशू से कहा, सुन, मैंने यरीहो को उसके राजा और शूरवीरों समेत तेरे हाथ में कर दिया है।
2. Dixitque Jehova ad Josuam, Ecce tradidi in manum tuam Jericho, et regem ejus, et virtute praestantes.
3. सो तुम सब योद्धा नगर को घेर लो, और नगर के चारों ओर एक बार घूम आओ। छः दिन तक तू ऐसा ही करना।
3. Circuibitis itaque urbem, omnes viri bellatores, circundando eam semel: sic facies sex diebus.
4. और सात याजक सन्दूक के आगे-आगे मेढ़ों के सींगों के सात नरसिंगे लिए हुए चलें; और सातवें दिन तुम नगर के चारों ओर सात बार घूमना, और याजक नरसिंगे फूँकते रहें।
4. Porro septem sacerdotes ferent septem cornua arientina ante arcam: Die autem septima circuibitis urbem septem vicibus, et sacerdotes ipsi clangent tubis.
5. और जब वे मेढ़े के सींग का नरसिंगा देर तक फूँकें, और तुम नरसिंगे का शब्द सुनो, तब सब लोग बड़ी ध्वनि से जयजयकार करें; तब नगर की शहरपनाह नींव से गिर जाएगी, और लोग अपने-अपने सामने सीधे चढ़ जाएँ।
5. Quum vero protraxerint sonitum cornu arietino: ubi primum audieritis vocem tubae, vociferabitur universus populus vociferatione magna, et concidet murus urbis sub se: populus vero ascendet quisque e regione sua.
6. सो नून के पुत्र यहोशू ने याजकों को बुलाकर उनसे कहा, वाचा के सन्दूक को उठा लो, और सात याजक यहोवा के सन्दूक के आगे-आगे मेढ़ों के सींगों के सात नरसिंगे लिए हुए चलें।
6. Vocavit ergo Josue filius Nun sacerdotes, et dixit eis, Tollite arcam foederis, et septem sacerdotes accipient septem tubas arietinas coram arca Jehovae.
7. फिर उसने लोगों से कहा, आगे बढ़ो, और नगर को घेर लो, और जो हथियारबन्द है वह यहोवा के सन्दूक के आगे-आगे चले।
7. Dixit quoque ad populum, Transite, et circuite urbem, et armatus quisque praecedat arcam Jehovae.
8. और जब यहोशू लोगों से ये बातें कह चुका, तब वे सात याजक जो मेढ़ों के सींगों के सात नरसिंगे लिए हुए थे यहोवा के आगे-आगे चले और नरसिंगे फूँकते गए; और यहोवा की वाचा का सन्दूक उनके पीछे-पीछे चला।
8. Et fuit postquam loquutus est Josue ad populum, tulerunt septem sacerdotes septem tubas arietinas, et transeuntes ante arcam Jehovae clanxerunt tubis. Arca autem foederis Jehovae sequebatur ipsos.
9. और हथियारबन्द पुरुष नरसिंगे फूँकनेवाले याजकों के आगे-आगे चले, और पीछेवाले सन्दूक के पीछे-पीछे चले, और याजक नरसिंगे फूँकते हुए चलते रहे।
9. Et armatus quisque praecedebat sacerdotes clangentes tubis, Et qui cogebat agmen sequebatur arcam eundo et clangendo tubis.
10. और यहोशू ने लोगों को आज्ञा दी थी, कि तुम न तो जयजयकार करो, न तुम्हारा कोई शब्द सुनाई दे, और न तुम्हारे मुँह से कोई बात निकले, जब तक कि मैं उस दिन तुम से जयजयकार करने को न कहूँ; तब तुम जयजयकार करना।
10. Populo autem praeceperat Josue, dicendo, Non vociferabimini, nec facietis audire vocem vestram, neque egredietur ex ore vestro verbum, usque ad diem quo dixero vobis, vociferamini: tunc vociferabimini.
11. इस प्रकार यहोवा का सन्दूक एक बार नगर के चारों ओर घुमाया गया; तब वे छावनी में आए, और छावनी ही में रात बिताई।
11. Circuivit itaque arca Jehovae urbem, circundando semel, et reversi sunt in castra: manseruntque illic.
12. और यहोशू सवेरे तड़के उठा, और याजकों ने यहोवा का सन्दूक उठा लिया।
12. Rursum surrexit Josue mane, tuleruntque sacerdotes arcam Jehovae.
13. और वे सात याजक मेढ़ों के सींगों के सात नरसिंगे लिए हुए यहोवा के सन्दूक के आगे-आगे निरन्तर चलते और नरसिंगे फूँकते गए; और हथियारबन्द पुरुष उनके आगे-आगे चले, और पीछेवाले यहोवा के सन्दूक के पीछे-पीछे चले, और याजक नरसिंगे फूँकते हुए चलते रहे।
13. Septem autem sacerdotes ferentes septem tubas arietinas praecedebant arcam Jehovae, eundo: et clangebant tubis. Armatus vero praecedebat eos, et qui cogebat agmen sequebatur arcam Jehovae, eundo, et clangendo tubis.
14. और दूसरे दिन भी वे एक बार नगर के चारों ओर घूमकर छावनी में लौट आए; और इसी प्रकार उन्होंने छः दिन तक किया।
14. Circuiverunt ergo urbem dic secundo vice alia, reversique sunt ad castra: sic fecerunt sex diebus.
15. फिर सातवें दिन ऐसा हुआ कि वे पौ फटते ही तड़के उठे, और उसी रीति से नगर के चारों ओर सात बार घूमे; केवल उसी दिन वे नगर के चारों ओर सात बार घूमे।
15. Ubi autem advenit septimus dies, surrexerunt simul ac ascendit aurora, et circuiverunt urbem secundum eundem morem septem vicibus: tantum die illa circuiverunt urbem septem vicibus.
16. और सातवीं बार जब याजक नरसिंगे फूँक रहे थे, तब यहोशू ने लोगों से कहा, जयजयकार करो; क्योंकि यहोवा ने यह नगर तुम्हें दे दिया है।
16. Septima autem vice quum clangerent sacerdotes tubis, dixit Josue ad populum, vociferamini, tradidit Jehova vobis urbem.
17. और यह नगर, और जो कुछ उसमें है, सब यहोवा के लिए अर्पण की वस्तु (शापित) ठहरेगा;
केवल राहाब वेश्या, और जितने उसके साथ घर में हों, वे जीवित रहेंगे, क्योंकि उसने हमारे भेजे हुए दूतों को छिपा रखा था। 17. Erit autem urbs anathema, ipsa et quaecunque in ea sunt, Jehovae: tantum Rahab meritrix vivet, ipsa et quicunque fuerint cum ea domi, quia abscondidit nuncios quos misimus.
18. और तुम अर्पण की हुई वस्तु से हर प्रकार से अपने आप को बचाए रखना,
ऐसा न हो कि अर्पण की हुई वस्तु में से कुछ लेकर तुम स्वयं शापित हो जाओ, और इस्राएल की छावनी को शाप के योग्य बनाकर उसे कष्ट में डाल दो। 18. Veruntamen vos cavete ab anathemate, ne forte contingatis aliquid de anathemate, tollatisque de anathemate, et ponatis castra Israel anathema, et turbetis ea.
19. परन्तु सब चाँदी, और सोना, और पीतल और लोहे के पात्र यहोवा के लिए पवित्र ठहराए गए हैं; वे यहोवा के भण्डार में जाएँगे।
19. Omne autem argentum, et aurum, et vasa aerea et ferrea, sanctitas erunt Jehovae: thesaurum Jehovae ingredientur.
1. “और यरीहो के सब फाटक बन्द रहे” इत्यादि। यरीहो के विषय में कहा गया है कि वह बन्द था, क्योंकि उसके फाटक खोले नहीं जाते थे; जैसा कि युद्ध के समय नगरों की साधारण से अधिक चौकसी के साथ रक्षा की जाती है। बल देने के लिए यह भी जोड़ा गया है कि वे मुहरबन्द, अर्थात् ताले में बन्द थे, मानो यह कहा गया हो कि नगरवासी पहरा देने में ऐसे सचेत थे कि उन पर अचानक धावा न हो सके। इसलिए, जब वह किसी युक्ति से जीता नहीं जा सकता था, तो उसे लेने की एकमात्र आशा खुले बल-प्रयोग में थी। इससे इस्राएलियों के प्रति परमेश्वर की भलाई प्रकट होती है, जो लम्बे और कठिन घेरे से थककर चूर हो जाते, यदि स्वर्ग से शीघ्र ही कोई अन्य उपाय न ठहराया जाता। साथ ही यह संकट भी था कि कहीं वे एक कोने में घिरकर अभाव और भूख से नष्ट न हो जाएँ, क्योंकि शत्रु के देश में भोजन और चारा पाने का कोई साधन न था। इसलिए प्रभु ने, ताकि वे एक ही नगर के सामने निराश होकर बैठे न रह जाएँ, एक असाधारण आश्चर्यकर्म के द्वारा उनकी सहायता की, और शहरपनाह को गिराकर उनके लिए प्रवेश का मार्ग खोल दिया, जिससे वे आगे चलकर दूसरे नगरों पर आक्रमण करने में और भी अधिक साहस रखें।
अब हम पहले दो पदों का आपसी सम्बन्ध देखते हैं, जिनमें से एक में कहा गया है कि यरीहो बन्द था, और इस प्रकार इस्राएली उसके निकट पहुँचने से रोके गए थे, जबकि दूसरे में परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह उसे उनके लिए ले लेगा। यह प्रतिज्ञा वह इस उद्देश्य से करता है कि वे चिन्ताभरे विचारों से अपने आप को पीड़ित न करें। एक शब्द में, परमेश्वर आरम्भ ही में इस सहज विजय के द्वारा इस बात का प्रबन्ध करता है कि वे भविष्य में निराशा के वश में न हों। साथ ही हम नगरवासियों की मूढ़ता को भी देखते हैं, जो अपनी शहरपनाह और फाटकों को ईश्वरीय सर्वसामर्थ्य के आगे बाधा बनाकर खड़ा करते हैं; मानो कुछ बेंड़ों और कड़ियों को तोड़ना या ढा देना यरदन को सुखा देने से अधिक कठिन हो।
3. “सो तुम नगर को घेर लो” इत्यादि। प्रतिज्ञा तो अपने आप में विजय की आशा देने के लिए उपयुक्त और पर्याप्त थी, परन्तु कार्य करने की रीति इतनी विचित्र थी कि वह उसकी विश्वसनीयता को लगभग नष्ट कर देती थी। परमेश्वर उन्हें आज्ञा देता है कि सातवें दिन तक वे प्रतिदिन नगर के चारों ओर एक बार घूमें, और सातवें दिन उन्हें नरसिंगे फूँकते और जयजयकार करते हुए उसके चारों ओर सात बार घूमने को कहा जाता है। यह सब बालकों के खेल के सिवा और कुछ न दिखाई देता था, तौभी उनके विश्वास को परखने के लिए यह अनुचित परीक्षा न थी, क्योंकि इससे यह प्रमाणित हुआ कि वे ईश्वरीय सन्देश को मान लेते थे, उस समय भी जब उन्हें उस कार्य में निरी निराशा के सिवा और कुछ न दिखाई देता था। इसी अभिप्राय से प्रभु प्रायः कुछ समय के लिए अपनी सामर्थ्य को निर्बलता के नीचे छिपा लेता है, और निरी तुच्छ बातों से खेलता हुआ जान पड़ता है, ताकि अन्त में उसकी निर्बलता सब सामर्थ्य से बढ़कर बलवन्त, और उसकी मूर्खता सब ज्ञान से श्रेष्ठ प्रकट हो।
जब इस्राएली इस प्रकार अपनी बुद्धि को त्यागकर पूर्णतः उसके वचनों पर निर्भर रहते हैं, तो वे इस खेल-सरीखे कार्य से उससे कहीं अधिक प्राप्त करते हैं जितना वे बलपूर्वक धावा बोलकर और अत्यन्त शक्तिशाली यन्त्रों की भीड़ से शहरपनाह को हिलाकर प्राप्त कर सकते थे। केवल इतना आवश्यक था कि वे थोड़े समय तक मूर्ख बने रहें, और परिणाम के विषय में चिन्ताभरी और सूक्ष्म पूछताछ करने में अधिक चतुराई न दिखाएँ; क्योंकि ऐसा करना एक प्रकार से ईश्वरीय सर्वसामर्थ्य की गति में बाधा डालना होता। इस बीच, यद्यपि शहरपनाह के चारों ओर यह परिक्रमा उपहास का कारण बन सकती थी, तौभी आगे चलकर उसके सफल परिणाम से यह जान लिया गया कि परमेश्वर व्यर्थ कोई आज्ञा नहीं देता।
सेप्टुआजिंट में συγκεκλεισμένη καὶ ὠχυρωμένη है, अर्थात् “पूरी रीति से बन्द और बेंड़ों या मोर्चाबन्दी के द्वारा सुरक्षित किया हुआ।” — सं.
एक और चिन्ता और सन्देह का विषय था, जो उनके मन में घुस सकता था। यदि नगरवासी अचानक बाहर निकल पड़ते, तो सेना, जब वह लम्बी बिखरी हुई पंक्तियों में, बिना किसी ऐसी नियमित व्यवस्था के जिससे वह शत्रु के आक्रमण को रोक सके, नगर के चारों ओर चल रही थी, बिना कठिनाई के तितर-बितर कर दी जाती। परन्तु यहाँ भी, जो कुछ भी चिन्ता उन्हें हुई हो, उसे उन्हें परमेश्वर पर डाल देना था; क्योंकि वह निश्चिन्तता पवित्र है जो उसके विधान पर टिकी रहती है। सात दिन तक नगर की परिक्रमा के दोहराए जाने में उनके विश्वास की एक और परीक्षा थी। क्योंकि छः निष्फल परिक्रमाओं से अपने आप को थकाने से अधिक असंगत और क्या जान पड़ सकता था? फिर उनके मौन का क्या लाभ था, सिवाय इसके कि वह उनकी भीरुता को प्रकट करे, और शत्रु को ललचाए कि वह बाहर निकलकर उन घेरनेवालों पर आक्रमण करे जिनमें उसका सामना करने का साहस भी दिखाई न देता था? परन्तु जैसे अधर्मी लोग प्रायः उतावले और हस्तक्षेप करनेवाले जोश से सब कुछ उलट-पुलट कर देते हैं, वैसे ही परमेश्वर यहाँ अपनी प्रजा को केवल यही भाग सौंपता है कि वह शान्त और मौन रहे, ताकि इस प्रकार वे सरलता से उसकी आज्ञाओं का पालन करने के और भी अधिक अभ्यस्त हो जाएँ।
यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि याजकों को फूँकने के लिए जो बाजे दिए गए, वे पवित्रस्थान में रखी हुई चाँदी की तुरहियाँ नहीं, वरन् केवल मेढ़ों के सींग थे। पवित्र तुरहियों का शब्द निश्चय ही अधिक भरोसा उत्पन्न करता, परन्तु जब वे साधारण चिह्न से सन्तुष्ट रहे, तब आज्ञाकारिता का कहीं अच्छा प्रमाण दिया गया। इसके अतिरिक्त, उनकी चाल की व्यवस्था ऐसी की गई थी कि अधिक संख्या, जिससे हथियारबन्द पुरुष समझे जाते हैं, सन्दूक के आगे चली, जबकि वे लोग जो साधारणतः सामान के साथ रहते थे, पीछे-पीछे चले। उनका काम यह देखना था कि पिछला भाग अव्यवस्थित न हो जाए। क्योंकि उनके लिए प्रयुक्त “एकत्र करनेवाला” शब्द अस्पष्ट था, इसलिए मैंने उसका अनुवाद उस समानार्थक शब्द से किया है जो लातीनी लोग साधारणतः प्रयोग करते थे।
कुछ लोग सोचते हैं कि दान का गोत्र इस प्रकार नियुक्त किया गया था, परन्तु यह अनिश्चित है, क्योंकि उस समय वे उस रीति से व्यवस्थित नहीं किए गए थे जो दूसरी यात्राओं में साधारण थी।
15. “फिर सातवें दिन ऐसा हुआ” इत्यादि। यहाँ भी परमेश्वर, प्रजा को बार-बार नगर के चारों ओर घुमाकर, न केवल बात को अधर में लटकाए रखता हुआ, वरन् जान-बूझकर उन लोगों के क्लेश से खेलता हुआ जान पड़ता था, जो व्यर्थ ही अपने आप को थका रहे थे। क्योंकि वह उन्हें अचानक नगर पर आक्रमण करने की आज्ञा क्यों नहीं देता? वह उन्हें थक जाने तक भी उसी पहले मौन में क्यों रखता है, और जयजयकार करने के लिए उनके मुँह क्यों नहीं खोलता? परन्तु इस धीरज का सुखद फल हमें यह सिखाता है कि इससे उत्तम और कुछ नहीं कि कार्य करने के निर्णायक क्षणों और अवसरों को उसी के अधीन छोड़ दें, और अपनी उतावली से उसके विधान से आगे न बढ़ें; क्योंकि यदि हम उस पर सन्तुष्ट होकर न टिकें, तो हम उसके कार्य की गति में बाधा डालते हैं। इसलिए, जब याजक नरसिंगे फूँक रहे थे, तब परमेश्वर ने आज्ञा दी कि प्रजा उसके अनुरूप जयजयकार करे, ताकि इस रीति से वह प्रमाणित करे कि वह मनुष्यों के उस किसी आवेग से प्रसन्न नहीं होता जो वे अपनी ही ओर से प्रकट करते हैं, वरन् सबसे बढ़कर वह एक नियमित उत्साह चाहता है, जिसका एकमात्र नियम यह है कि जब तक वह आज्ञा न दे, तब तक न जीभ, न पाँव, न हाथ हिलाए जाएँ। यहाँ मेढ़ों के सींग निःसन्देह उसके अधिकार का प्रतीक थे।
फ्रांसीसी में, “De ne dire mot, ne faire aucun bruit;” “न एक शब्द बोलना, न कोई शोर करना।” — सं.
फ्रांसीसी में, “Mais je l'ay traduit par un terme plus accoustume a la langue Francoise;” “परन्तु यहाँ मैंने उसका अनुवाद ऐसे शब्द से किया है जो फ्रांसीसी भाषा में अधिक प्रचलित है।” — सं.
17. “और यह नगर अर्पण की वस्तु (शापित) ठहरेगा” इत्यादि। यद्यपि परमेश्वर ने यह ठान लिया था कि वह अपनी प्रजा को न केवल लूट और सामग्री से धनी करेगा, वरन् उन्हें ऐसे नगरों में भी बसाएगा जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया था, तौभी पहले नगर के विषय में एक विशेष बात थी; क्योंकि यह उचित था कि वह एक प्रकार के पहले फल के रूप में अर्पित किया जाए। इसलिए वह भवनों को, और साथ ही सारी चल सम्पत्ति को, अपना ठहराता है, और उसके किसी भी भाग को निजी उपयोग में लाने से मना करता है। प्रजा के लिए यह एक अप्रिय और कष्टदायक कार्य रहा होगा कि वह स्वेच्छा से उन घरों को ढा दे जिनमें वे सुविधा से रह सकते थे, और उन वस्तुओं को नष्ट कर दे जो उपयोग के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती थीं। परन्तु जब उनसे लड़ने की माँग ही नहीं की गई थी, तो उनके लिए उचित था कि वे बिना कुड़कुड़ाए लूट को छूने से अपने आप को रोकें, और विजय के प्रतिफल स्वेच्छा से परमेश्वर को सौंप दें, क्योंकि केवल उसी के संकेत से नगर की शहरपनाह गिरी थी, और उसके साथ ही नगरवासियों का साहस भी गिर गया था। परमेश्वर कृतज्ञता की इस प्रतिज्ञा-स्वरूप भेंट से सन्तुष्ट था, बशर्ते कि प्रजा इसके द्वारा शीघ्र यह सीख ले कि जो कुछ भी वे अपना कहते थे, वह सब उसकी सेंत-मेंत उदारता का दान था। क्योंकि उसी अधिकार से अन्य सब नगर भी विनाश के लिए ठहराए जा सकते थे, यदि परमेश्वर उन्हें अपनी प्रजा को निवास-स्थान के रूप में न दे देता।
इब्रानी शब्द חרם के विषय में मैं अब केवल संक्षेप में वही दोहराऊँगा जो अन्य स्थानों में कहा जा चुका है। जब यह पवित्र भेंटों के लिए प्रयुक्त होता है, तो मनुष्यों की दृष्टि से यह मिटा देने के समान हो जाता है, क्योंकि इस रीति से अर्पित की गई वस्तुओं को वे ऐसी पूर्णता से त्याग देते हैं मानो वे नष्ट कर दी गई हों। इसका समानार्थक यूनानी शब्द ἀνάθημα, अथवा ἀνάθεμα, है, जिसका अर्थ है अलग किया हुआ, अथवा जैसा फ्रांसीसी में ठीक-ठीक कहा जाता है, वर्जित। इसी कारण यह चिताया गया है कि जो वस्तु अनाथेमा के अधीन थी उससे सावधान रहें, क्योंकि जो वस्तु केवल परमेश्वर के लिए अलग की गई थी, वह जहाँ तक मनुष्यों से सम्बन्ध है, नष्ट हो चुकी थी। अगले पद में यह भिन्न अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, जहाँ यह चेतावनी दी गई है कि इस्राएल की छावनी को अनाथेमा न बनाओ। वहाँ इसका सीधा अर्थ है, उच्छेद, विनाश, अथवा मृत्यु। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर ने धातुओं के बने पात्रों को पवित्रस्थान के उपयोग के लिए ठहराया; अन्य सब वस्तुओं के विषय में उसने आज्ञा दी कि वे आग से भस्म की जाएँ, या अन्य रीतियों से नष्ट की जाएँ।
यहोशू 6:20-27
20. तब जब याजकों ने नरसिंगे फूँके तो लोगों ने जयजयकार किया;
और जब लोगों ने नरसिंगे का शब्द सुना, और लोगों ने बड़ी ध्वनि से जयजयकार किया, तब शहरपनाह नींव से गिर पड़ी, और लोग अपने-अपने सामने सीधे नगर में चढ़ गए, और नगर को ले लिया। 20. Itaque vociferatus est populus postquam clanxerunt tubis. Quum enim audisset populus vocem tubarum, vociferatus est vociferatione maxima, et cecidit murus subtus, tum ascendit populus in urbem quisque e regione sua, et ceperunt eam.
21. और उन्होंने नगर में जो कुछ था, क्या पुरुष, क्या स्त्री, क्या जवान, क्या बूढ़े, और बैल, भेड़-बकरी और गदहे, सब को तलवार की धार से सत्यानाश कर डाला।
21. Et perdiderunt omnia quae erant in urbe, a vobis usque ad mulierem, a puero usque ad senem, ad bovem, et ovem, et asinum, acie gladii.
22. परन्तु यहोशू ने उन दोनों पुरुषों से, जो देश का भेद लेने गए थे, कहा था, उस वेश्या के घर में जाओ, और जैसी तुमने उससे शपथ खाई थी, उसके अनुसार उस स्त्री को और जो कुछ उसका है सब को वहाँ से निकाल लाओ।
22. Duobus autem viris qui exploraverant terram dixit Josue, Ingredimini domum mulieris meretricis, et inde educite eam, et quaecunque habet, quemadmodum jurastis ei.
23. तब वे जवान भेदिये भीतर जाकर राहाब को, और उसके पिता, और उसकी माता, और उसके भाइयों को, और जो कुछ उसका था सब को निकाल लाए; और उसके सब कुटुम्बियों को निकालकर इस्राएल की छावनी से बाहर ठहरा दिया।
23. Ingressi itaque exploratores eduxerunt Rahab, et patrem ejus, et matrem ejus, et fratres ejus, et quaecunque habebat, et totam cognationem ejus eduxerunt, ac locarunt extra castra Israel.
24. तब उन्होंने नगर को, और जो कुछ उसमें था, सब को आग से फूँक दिया; केवल चाँदी, और सोना, और पीतल और लोहे के पात्र उन्होंने यहोवा के भवन के भण्डार में रख दिए।
24. Urbem vero succenderunt igni, et quaecunque erant in ea: tantummodo aurum et argentum, vasa aerea et ferrea posuerunt in thesauro domus Jehovae.
25. और यहोशू ने राहाब वेश्या को, और उसके पिता के घराने को, और जो कुछ उसका था सब को जीवित छोड़ दिया; और वह आज तक इस्राएल के बीच रहती है, क्योंकि जो दूत यहोशू ने यरीहो का भेद लेने को भेजे थे, उनको उसने छिपा रखा था।
25. Itaque Rahab meretricem, et domum patris ejus, et quaecunque habebat vivere fecit Josue: habitavitque in medio Israel usque ad hunc diem, quia absconderat nuntios quos miserat Josue ad explorandum Jericho.
26. और यहोशू ने उसी समय उन्हें शपथ दिलाकर कहा, जो मनुष्य उठकर इस नगर यरीहो को फिर बनाए, वह यहोवा के सामने शापित हो; वह अपने जेठे पुत्र पर इसकी नींव डालेगा, और अपने सबसे छोटे पुत्र पर इसके फाटक खड़े करेगा।
26. Adjuravit autem Josue tempore illo, dicendo, Maledictus vir coram Jehova qui surget ut edificet urbem istam Jericho. In primogenito suo fundabit eam et in minore suo statuet portas ejus.
27. और यहोवा यहोशू के संग रहा; और उसकी कीर्ति सारे देश में फैल गई।
27. Fuit autem Jehova cum Josue, et fama ejus fuit in tota terra.
20. “तब लोगों ने जयजयकार किया” इत्यादि। यहाँ प्रजा की आज्ञाकारिता की प्रशंसा की गई है, और साथ ही परमेश्वर की सच्चाई का गुणगान किया गया है। उन्होंने जयजयकार करके अपनी निष्ठा का प्रमाण दिया, क्योंकि उन्हें निश्चय था कि जो कुछ परमेश्वर ने आज्ञा दी थी वह व्यर्थ न होगा; और उसने उनका परिश्रम व्यर्थ न जाने देकर अपने कहे हुए वचन की सच्चाई को सिद्ध किया। प्रजा ने एक और ऐसा सद्गुण भी दिखाया जिसका मूल्य कम नहीं, अर्थात् अनुचित लाभ को तुच्छ जानना, और सारी लूट की हानि को आनन्द से सह लेना। क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि बहुतों के मन में यह विचार उठा होगा, परमेश्वर सारे धन को नष्ट करना किस उद्देश्य से चाहता है? जो वस्तु उसने हमारे हाथ में दी है, उसके लिए वह हमसे डाह क्यों करता है? वह हमें धन्यवाद देने की सामग्री देकर आनन्दित क्यों नहीं करता? इन विचारों को, जो उनके कर्तव्य में बाधा डाल सकते थे, दूर करके, अपने हाथ में आई लूट को और एक पूरे नगर के धन को स्वेच्छा से फेंक देना, दुर्लभ और उत्तम आत्म-त्याग का प्रमाण था।
बिना भेद और बिना विचार का वह संहार, जिसमें न आयु का और न स्त्री-पुरुष का कोई भेद किया गया, वरन् स्त्रियों और बालकों, वृद्धों और जर्जर लोगों को समान रूप से सम्मिलित किया गया, एक अमानुषिक हत्याकाण्ड जान पड़ सकता था, यदि वह परमेश्वर की आज्ञा से न किया गया होता। परन्तु जब उसने, जिसके हाथ में जीवन और मृत्यु है, उन जातियों को न्यायपूर्वक विनाश के लिए ठहराया था, तो इससे सारा विवाद समाप्त हो जाता है। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि चार सौ वर्ष तक उन्हें सहा गया था, जब तक कि उनका अधर्म पूरा न हो गया। जब परमेश्वर ने न्याय करने में इतना विलम्ब किया, तो अब कौन अत्यधिक कठोरता की शिकायत करने का साहस करेगा? यदि कोई यह आपत्ति करे कि कम से कम बालक तो अब भी निर्दोष थे, तो इसका उत्तर देना सहज है कि वे न्यायपूर्वक नष्ट हुए, क्योंकि वह वंश शापित और त्यागा हुआ था। इसलिए यहाँ यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि यदि इस्राएली माताओं और उनके बालकों को घात करने में अपनी ही लालसा और क्रोध को तृप्त करते, तो वह बर्बर और घोर क्रूरता होती; परन्तु परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में उनकी सक्रिय भक्ति और पवित्र उत्साह के लिए उनकी उचित ही प्रशंसा की जाती है, क्योंकि परमेश्वर को यह भाया कि वह इस रीति से कनान देश को उन घिनौनी और घृणित अशुद्धताओं से शुद्ध करे जिनसे वह बहुत समय से अपवित्र होता आया था।
22. “परन्तु यहोशू ने उन दोनों पुरुषों से कहा था” इत्यादि। यहाँ जो सावधानीपूर्ण चिन्ता की गई है, उसमें प्रतिज्ञाओं को निभाने में यहोशू की सच्चाई और उसकी सामान्य खराई प्रकट होती है। परन्तु जब सारा नगर अनाथेमा के अधीन कर दिया गया था, तो एक परिवार के लिए इस अपवाद के विषय में प्रश्न उठाया जा सकता है। किसी नश्वर मनुष्य को परमेश्वर के निर्णय में कुछ भी परिवर्तन करने की स्वतन्त्रता न थी। तौभी, क्योंकि राहाब ने केवल आत्मा की प्रेरणा से ही अपने बचाव की वाचा बाँधी थी, इसलिए मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि यहोशू ने उसे बचाकर केवल वही किया जो विचारशील और बुद्धिमानी का काम था।
यहाँ इतनी उत्तम रीति से व्यक्त किए गए विचारों की पुष्टि में, इसी विषय पर सबसे गम्भीर और सबसे दार्शनिक अंग्रेज़ धर्मविज्ञानियों के विचार जोड़ना अनुचित न होगा। बिशप बटलर अपनी पुस्तक “एनालॉजी”, भाग 2, अध्याय 3 में यह कहने के बाद कि “पवित्रशास्त्र की नैतिकता का न्याय करना बुद्धि का क्षेत्र है; अर्थात् यह नहीं कि उसमें ऐसी बातें हैं या नहीं जो उन बातों से भिन्न हैं जिनकी हम एक बुद्धिमान, न्यायी और भले प्राणी से अपेक्षा करते — वरन् यह कि उसमें ऐसी बातें हैं या नहीं जो बुद्धि, न्याय या भलाई के, और उस बात के जो प्रकृति का प्रकाश हमें परमेश्वर के विषय में सिखाता है, स्पष्ट रूप से विरुद्ध हैं,” आगे इस प्रकार कहते हैं: “मैं पवित्रशास्त्र के विरुद्ध इस प्रकार की कोई आपत्ति नहीं जानता, सिवाय ऐसी आपत्तियों के जो ऐसी मान्यताओं पर आधारित हैं जिनसे समान रूप से यह निष्कर्ष निकलेगा कि प्रकृति की व्यवस्था बुद्धि, न्याय या भलाई के विरुद्ध है: जो निश्चय ही वह नहीं है। वास्तव में पवित्रशास्त्र में कुछ विशेष आज्ञाएँ हैं, जो विशेष व्यक्तियों को दी गईं, और ऐसे कार्यों की माँग करती हैं जो, यदि ऐसी आज्ञाएँ न होतीं, तो अनैतिक या दुष्ट होते। परन्तु यह देखना सहज है कि ये सब ऐसी प्रकार की हैं कि आज्ञा परिस्थिति और कार्य के सारे स्वरूप को बदल देती है: और जो बात आज्ञा से पहले अवश्य अन्यायपूर्ण या अनैतिक दिखाई देती, और वास्तव में होती, उसे अन्यायपूर्ण या अनैतिक न होने वाली ठहराती भी है और दिखाती भी है: और ऐसा भली-भाँति हो सकता है, क्योंकि इनमें से कोई भी आज्ञा अपरिवर्तनीय नैतिकता के विरुद्ध नहीं है। यदि विश्वासघात, कृतघ्नता, क्रूरता के सिद्धान्तों को पोषित करने और उनकी आत्मा से कार्य करने की आज्ञा दी जाती, तो इनमें से किसी भी उदाहरण में आज्ञा परिस्थिति या कार्य के स्वरूप को न बदलती। परन्तु उन आज्ञाओं में बात बिलकुल भिन्न है जो केवल किसी बाहरी कार्य की माँग करती हैं: उदाहरण के लिए, किसी की सम्पत्ति या प्राण ले लेना। क्योंकि मनुष्यों को न जीवन पर और न सम्पत्ति पर कोई ऐसा अधिकार है जो केवल परमेश्वर के दान से उत्पन्न न हुआ हो। जब यह दान वापस ले लिया जाता है, तो दोनों में से किसी पर भी उनका कोई अधिकार नहीं रहता: और जब यह वापसी प्रकट कर दी जाती है, जैसा कि निश्चय ही सम्भव है, तो उन्हें इनमें से किसी से भी वंचित करना अन्यायपूर्ण नहीं रहता। और यद्यपि बाहरी कार्यों का एक क्रम, जो बिना आज्ञा के अनैतिक होता, अवश्य एक अनैतिक आदत बना देगा, तौभी कुछ अलग-अलग आज्ञाओं की ऐसी कोई स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं होती। पवित्रशास्त्र की उन थोड़ी-सी आज्ञाओं के विषय में, जो दुष्ट कार्यों की नहीं, वरन् ऐसे कार्यों की माँग करती हैं जो ऐसी आज्ञाओं के न होने पर दुष्ट होते, मैंने इतना कहना उचित समझा: क्योंकि उन्हें कभी-कभी दुर्बलता से अनैतिक ठहराया जाता है, और उनसे निकाली गई आपत्तियों को बड़ा महत्त्व दिया जाता है। परन्तु मुझे इन आज्ञाओं में कोई भी कठिनाई दिखाई नहीं देती, सिवाय उसके जो उनके ठोकर के कारण होने से उत्पन्न होती है; अर्थात् इस बात से कि दुष्ट और कपटी मनुष्य उन्हें, जैसा कि वास्तव में होता है, अत्यन्त भयानक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विकृत कर सकते हैं, और सम्भवतः दुर्बल और उन्मादी लोगों को भटका सकते हैं।” — सं. फ्रांसीसी में, “Car combien qu'il y ait en cela de la severite, toutes fois c'est un bon moyen par lequel ils sont appelez a renoncer a leur vie precedente;” “क्योंकि यद्यपि इसमें कठोरता है, तौभी यह उन्हें उनके पिछले जीवन का त्याग करने के लिए बुलाने का एक अच्छा उपाय है।” — सं.
हम यह भी जोड़ सकते हैं कि दूत अब तक किसी विपरीत दायित्व से बँधे न थे, क्योंकि नगर के पूर्ण विनाश की घोषणा अभी तक नहीं हुई थी। यह सत्य है कि उन्होंने सामान्य रूप से यह सुना था कि वे सब जातियाँ नष्ट की जानी थीं, परन्तु वे अब भी एक अकेली स्त्री के साथ, जिसने स्वेच्छा से अपने देशवासियों को त्याग दिया था, वाचा बाँधने के लिए स्वतन्त्र थे। परन्तु आगे हमें इससे कहीं सहज समाधान मिलेगा, अर्थात् यह कि जब इस्राएली ईश्वरीय आज्ञा से उन सब को, जिन पर वे आक्रमण करते थे, क्षमा की आशा देकर आत्मसमर्पण करने के लिए समझाते थे, तब अन्धी की हुई जातियों ने इस प्रकार दी गई शान्ति को हठपूर्वक ठुकरा दिया, क्योंकि परमेश्वर ने उन सब को नष्ट करने की ठान ली थी। परन्तु जब सामान्य रूप से सब के सब अपने विनाश के लिए कठोर कर दिए गए थे, तो इससे यह निकलता है कि राहाब को विशेष अधिकार के द्वारा छूट दी गई थी, और जब दूसरे नष्ट हुए तब वह सुरक्षित बच सकती थी। इसलिए यहोशू ने बुद्धिमानी से यह निर्णय किया कि एक स्त्री, जो स्वेच्छा से कलीसिया की ओर आ गई थी, परमेश्वर के विशेष अनुग्रह के बिना इतने पहले नहीं छुड़ाई गई थी। पिता और सारे परिवार की बात तो वास्तव में भिन्न है, परन्तु जब वे सब स्वेच्छा से अपनी पिछली दशा को त्याग देते हैं, तो वे अपनी आज्ञाकारिता की तत्परता के द्वारा उस वाचा की पुष्टि करते हैं जो राहाब ने उनके बचाव के लिए बाँधी थी।
इसके अतिरिक्त, आइए हम यहोशू के उदाहरण से यह सीखें कि केवल जान-बूझकर और उद्देश्यपूर्वक अपनी प्रतिज्ञा भंग करने से बचे रहकर हम अपनी खराई का पर्याप्त प्रमाण नहीं देते, जब तक कि हम उसकी पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए यत्नपूर्वक प्रयास भी न करें। वह न केवल राहाब को उसके अतिथियों के द्वारा छुड़ाए जाने देता है, वरन् इस बात की भी चौकसी करता है कि पहले कोलाहल में उसे कोई हानि न पहुँचे; और दूतों को अपना कार्य पूरा करने में और भी अधिक तत्पर बनाने के लिए, वह उन्हें स्मरण दिलाता है कि उन्होंने शपथ खाकर प्रतिज्ञा की थी।
23. “तब वे जवान भेदिये भीतर गए” इत्यादि। निःसन्देह परमेश्वर चाहता था कि वे लोग सुरक्षित रहें, जिनके मन को उसने इस प्रकार छुटकारे को ग्रहण करने की ओर झुकाया। यदि ऐसा न होता, तो वे लूत के दोनों दामादों के समान ही अहंकार और उतने ही तिरस्कार के साथ उसे ठुकरा देते। परन्तु उनके लिए इससे भी उत्तम प्रबन्ध तब किया जाता है, जब छावनी से बाहर ठहराए जाकर उन्हें यह कठोर आदेश मिलता है कि वे अपने पिछले जीवन-मार्ग को त्याग दें। क्योंकि यदि वे तुरन्त भीतर ले लिए जाते और बिना भेद के प्रजा में मिल जाने दिए जाते, तो सम्भवतः उनकी अशुद्धता का विचार उनके मन में कभी न आता, और वे इस प्रकार उसमें लिप्त बने रहते। अब जब उन्हें अलग रखा जाता है, ताकि वे अपनी छूत से झुण्ड को दूषित न करें, तो उनके मन में लज्जा का भाव उत्पन्न होता है, जो उन्हें सच्चे मन-फिराव की ओर प्रेरित कर सकता है।
इसका यह अर्थ नहीं हो सकता कि उन्हें सुरक्षा के लिए इस प्रकार अलग रखा गया, कहीं ऐसा न हो कि भीड़ में से कोई उन पर हिंसा के साथ टूट पड़े; क्योंकि सब के सब उनका अत्यन्त अनुग्रह और आनन्द के साथ स्वागत करते, जबकि किसी एकान्त स्थान में उन पर अधिक सहजता से, और दण्ड के भय के बिना भी, आक्रमण किया जा सकता था। इसलिए उनकी अशुद्धता उनके सामने प्रत्यक्ष रूप से रखी गई, ताकि वे अशुद्ध दशा में उतावली करके पवित्र सभा में आगे न बढ़ें, वरन् इस आरम्भिक शिक्षा के द्वारा अपनी जीवन-रीति को बदलने के अभ्यस्त हो जाएँ। क्योंकि थोड़ा आगे यह जोड़ा गया है कि वे प्रजा के बीच रहने लगे; दूसरे शब्दों में, अपनी अशुद्धताओं से शुद्ध किए जाने के बाद वे ठीक उसी दृष्टि से देखे जाने लगे मानो वे मूल से ही अब्राहम के वंश के रहे हों। संक्षेप में, अर्थ यह है कि जब उन्होंने अपनी पिछली अशुद्धता का अंगीकार कर लिया, तब वे बिना भेद के दूसरों के साथ ग्रहण किए गए। इस ग्रहण के द्वारा राहाब ने अपने विश्वास के सबसे उत्तम फलों में से एक प्राप्त किया।
26. “और यहोशू ने उन्हें शपथ दिलाई” इत्यादि। यह शपथ केवल एक दिन के लिए प्रभावी न थी, वरन् इसलिए थी कि सब युगों में आनेवाली पीढ़ियों को चिताए कि वह नगर केवल ईश्वरीय सामर्थ्य से ही लिया गया था। इसलिए वह चाहता था कि उसके खण्डहर और उजाड़ एक प्रकार के विजय-स्तम्भ के रूप में सदा बने रहें; क्योंकि उसका फिर से बनाया जाना उस आश्चर्यकर्म को मिटा देनेवाले लोप के समान होता। इसलिए, ताकि उस स्थान का उजड़ा हुआ रूप आनेवाली पीढ़ियों में ईश्वरीय सामर्थ्य और अनुग्रह के स्मरण को जीवित रखे, यहोशू उस किसी भी मनुष्य पर भारी शाप सुनाता है जो उस उजड़े हुए नगर को फिर से बनाए। इस खण्ड से हम यह सीखते हैं कि मनुष्यों की स्वाभाविक जड़ता को उत्तेजनाओं की सहायता की आवश्यकता है, ताकि वे ईश्वरीय उपकारों को विस्मृति में न दबा दें; और इसलिए यह दृश्य, जिसमें ईश्वरीय कार्य प्रजा के सामने स्पष्ट प्रकट किया गया था, उनकी कृतघ्नता की एक प्रकार की परोक्ष भर्त्सना था।
इस शाप का सार यह है कि यदि कोई कभी यरीहो को फिर से बनाने का प्रयत्न करे, तो वह अशुभ और शोकपूर्ण परिणाम के द्वारा यह अनुभव करे कि उसने एक शापित और घृणित कार्य किया है। क्योंकि अपने जेठे पुत्र पर नींव डालना ठीक ऐसा ही था मानो वह अपने पुत्र को पत्थरों के ढेर के नीचे कुचले जाने और दबकर नष्ट होने के लिए फेंक दे; और अपने छोटे पुत्र पर फाटक खड़े करना ऐसा ही है जैसे किसी ऐसे भवन की योजना बनाना जो एक पुत्र की मृत्यु के बिना खड़ा न किया जा सके। इस प्रकार जो कोई इस उन्मत्त प्रयत्न का साहस करे, वह अपनी ही सन्तान में दण्डित ठहरता है। और यहोशू ने यह शाप अपनी ओर से नहीं सुनाया; वह केवल स्वर्गीय प्रतिशोध का दूत था।
इससे यह बात और भी अधिक भयानक हो जाती है कि परमेश्वर की प्रजा के बीच एक ऐसा मनुष्य मिला, जिसे वह भयंकर शाप, जो स्पष्ट शब्दों में कहा गया था, अपवित्र दुस्साहस से रोक न सका। अहाब के समय में (1 राजा 16:34) बेतेल का एक निवासी हीएल उठा, जिसने मानो खुलेआम इस विषय में परमेश्वर को चुनौती देने का साहस किया; परन्तु पवित्र इतिहास साथ ही यह साक्षी देता है कि जो धमकी परमेश्वर ने यहोशू के मुँह से सुनाई थी वह निष्फल न हुई; क्योंकि हीएल ने अपने जेठे पुत्र अबीराम पर नए यरीहो की नींव डाली, और अपने छोटे पुत्र सगूब पर उसके फाटक खड़े किए, और इस प्रकार अपनी सन्तान के विनाश में सीखा कि परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध और उसकी आज्ञा के विरोध में कुछ भी करने का प्रयत्न करना क्या है।
हीएल के द्वारा प्राचीन नगर के ठीक उसी स्थान पर यह पुनर्निर्माण, साधारण कालगणना के अनुसार, यहोशू के शाप सुनाने के 520 वर्ष बाद हुआ। तौभी ऐसा जान पड़ता है कि एक दूसरा यरीहो इससे बहुत पहले बनाया गया था, वास्तव में पहले स्थान पर नहीं — जिससे, जब तक शाप का स्मरण बना रहा, सम्भवतः बचा जाता था — परन्तु उससे अधिक दूरी पर भी नहीं। इस तथ्य के विषय में यहोशू 18:21 में बिन्यामीन के नगरों में से एक के रूप में यरीहो का उल्लेख निर्णायक नहीं है, क्योंकि सम्भव है कि उसका अभिप्राय केवल एक स्थान को बताना हो, न कि किसी वास्तव में विद्यमान नगर को; और न यह पूर्ण रूप से निश्चित है कि “खजूरवाला नगर,” जिसे एग्लोन ने ले लिया था (न्यायियों 3:13), फिर से बनाया हुआ यरीहो था, यद्यपि यरीहो साधारणतः उसी नाम से जाना जाता था। तौभी हीएल से कम से कम एक शताब्दी पहले उसका अस्तित्व उन निर्देशों से स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है जो दाऊद के राजदूतों को, अम्मोन के राजा के द्वारा उनका अपमान किए जाने के बाद, दिए गए थे, कि वे “यरीहो में ठहरे रहें।” (2 शमूएल 10:5) हीएल के अपवित्र नगर के बाद के इतिहास पर संक्षेप में दृष्टि डालना उपयोगी हो सकता है। मानो पुनर्निर्माण का दण्ड संस्थापक पर पड़े उदाहरणीय दण्ड के द्वारा पूरी रीति से चुका दिया गया हो, शाप हटा लिया गया जान पड़ता है, और लगभग बीस वर्ष के भीतर हम पाते हैं कि वह न केवल भविष्यद्वक्ताओं की पाठशाला के लिए चुना गया था (2 राजा 2:5), वरन् एलीशा के द्वारा उसके जल के आश्चर्यजनक रूप से ठीक किए जाने से निवास-स्थान के रूप में उसके अन्य आकर्षणों में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वृद्धि भी हुई। (2 राजा 2:18-22।) बाबुल की बन्धुआई से लौटने पर उसके निवासियों का उल्लेख यरूशलेम की शहरपनाह के पुनर्निर्माण में सहायता करनेवालों के रूप में हुआ है। (नहेम्याह 3:2) बाद के समय में सीरियाई सेनापति बक्खीदेस ने यरीहो की किलाबन्दी की, अथवा यों कहें कि उसकी पहले से विद्यमान किलाबन्दी में वृद्धि की (1 मक्काबियों 9:50), परन्तु ऐसा नहीं जान पड़ता कि हेरोदेस महान के समय तक उसने बहुत अधिक महत्त्व प्राप्त किया, जिसने उसे जीतकर और लूटकर कहीं अधिक भव्य रूप में फिर से बनाया, और उसमें एक शानदार महल खड़ा किया, जहाँ वह प्रायः रहा करता था और अन्त में वहीं मरा। वह उसके पुत्र का भी प्रिय निवास-स्थान बन गया। रोमी साम्राज्य के पिछले काल में वह फ़िलिस्तीन के प्रमुख नगरों में से एक गिना जाता था। उस साम्राज्य के विघटन पर देश के सामान्य उजाड़ ने उसका अन्तिम विनाश कर दिया, और अब उसका स्थान केवल रीहा नामक एक दरिद्र गाँव से, जिसमें 200 से 300 तक प्राणी रहते हैं, सन्दिग्ध रूप में दर्शाया जाता है। — सं.
