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यहोशू 7
यहोशू 7:1-9
1. परन्तु इस्राएलियों ने अर्पण की हुई वस्तु के विषय में विश्वासघात किया; क्योंकि यहूदा के गोत्र का आकान, जो जेरह का परपोता, जब्दी का पोता और कर्म्मी का पुत्र था, उसने अर्पण की हुई वस्तुओं में से कुछ ले लिया; और यहोवा का कोप इस्राएलियों पर भड़क उठा।
1. Transgressi autem sunt transgressione filii Israel in anathemate: quia Achan, filius Chermi filii Zabdi, filii Zerah de tribu Jehudae abstulit de anathemate: et accensa est excandescentia Jehovae contra filios Israel.
2. और यहोशू ने यरीहो से ऐ नगर के पास, जो बेतावेन के निकट बेतेल की पूर्व की ओर है, कितने पुरुषों को यह कहकर भेजा, कि जाकर देश का भेद ले आओ। और उन पुरुषों ने जाकर ऐ का भेद लिया।
2. Porro misit Josue viros e Jericho contra Hai, quae erat juxta Bethaven ad orientem Bethel, et loquutus est cum illis, dicendo, Ascendite et explorate terram. Ascenderunt itaque viri, et exploraverunt Hai.
3. और उन्होंने यहोशू के पास लौटकर उससे कहा, सब लोग वहाँ न जाएँ, कोई दो या तीन हज़ार पुरुष जाकर ऐ को मार लें; सब लोगों को वहाँ जाने का कष्ट न दे, क्योंकि वे थोड़े ही हैं।
3. Qui reversi ad Josuam, dixerunt ei, Ne ascendat totus populus; circiter duo millia virorum aut circiter tria millia virorum ascendant, et percutient Hai.
4. सो प्रजा में से कोई तीन हज़ार पुरुष वहाँ गए; परन्तु वे ऐ के पुरुषों के साम्हने से भाग आए।
4. Ascenderunt ergo illuc e populo fere fria millia virorum, et fugerunt coram viris Hai.
5. और ऐ के पुरुषों ने उनमें से कोई छत्तीस पुरुष मार डाले; क्योंकि उन्होंने फाटक के साम्हने से शबारीम तक उनका पीछा किया, और उतराई में उनको मारते गए; इस कारण लोगों का मन पिघलकर जल-सा बन गया।
5. Percusseruntque ex eis circiter triginta et sex viros, et persequuti sunt eos a porta usque ad Sebarim, et percusserunt eos in descensu; atque ita liquefactum est cor populi, fuitque velut aqua.
6. तब यहोशू ने अपने वस्त्र फाड़े, और वह और इस्राएली पुरनिये यहोवा के सन्दूक के साम्हने मुँह के बल भूमि पर गिरकर साँझ तक पड़े रहे; और उन्होंने अपने-अपने सिर पर धूल डाली।
6. Porro Josue sicidit vestimenta sua, prociditque in faciem suam in terram coram arca Jehovae usque ad vesperam, ipse et seniores Israel, et posuerunt pulverem super caput suum.
कैल्विन का लातीनी अनुवाद और फ्रांसीसी अनुवाद भी इस पद के अन्तिम उपवाक्य को छोड़ देते हैं, “सब लोगों को वहाँ जाने का कष्ट न दे, क्योंकि वे थोड़े ही हैं।” यह लोप, जिसका कोई कारण नहीं बताया गया, इसलिए और भी अधिक उल्लेखनीय है कि मूल उपवाक्य की प्रामाणिकता के विषय में कोई सन्देह प्रतीत नहीं होता, और उसका अर्थ न केवल सेप्टुआजिंट में, वरन् अन्य अनुवादों में भी, जैसे लूथर के अनुवाद में, जिससे कैल्विन भली-भाँति परिचित था, बहुत ठीक-ठीक दिया गया है। — सं.
7. और यहोशू ने कहा, हाय, प्रभु यहोवा, तू इस प्रजा को यरदन पार ले ही क्यों आया? क्या इसलिए कि हमें एमोरियों के हाथ में करके नष्ट कराए? भला होता कि हम सन्तोष करके यरदन के उस पार ही रह जाते!
7. Dixitque Josue, Ah, ah, Dominator Jehova, ut quid traduxisit populum hunc trans Jordanem, ut traderes nos in manum Amorrhaei qui perdat nos? Atque utinam libuisset nobis manere in deserto trans Jordanem!
8. हाय, प्रभु, मैं क्या कहूँ, जब इस्राएल ने अपने शत्रुओं को पीठ दिखाई है!
8. O Domine quid dicam postquam vertit Israel cervicem coram inimicis suis?
9. क्योंकि कनानी और इस देश के सब निवासी यह सुनकर हमें घेर लेंगे,
9. Audientque Channanaeus et omnes incolae terrae, et vertent se contra nos, disperdentque nomen nostrum e terra: quid vero facies nomini tuo magno? और हमारा नाम पृथ्वी पर से मिटा डालेंगे; फिर तू अपने बड़े नाम के लिए क्या करेगा?
1. “परन्तु इस्राएलियों ने विश्वासघात किया” इत्यादि। यहाँ एक व्यक्ति के अपराध का, और वह भी गुप्त अपराध का, उल्लेख है, जिसका दोष सारी प्रजा पर डाल दिया जाता है; और इतना ही नहीं, वरन् साथ ही कई निर्दोष लोगों पर दण्ड भी पड़ता है। परन्तु यह बात बहुत ही अबूझ प्रतीत होती है कि सारी प्रजा एक ऐसे निजी और छिपे अपराध के कारण दोषी ठहराई जाए जिसका उन्हें कुछ भी ज्ञान न था। मेरा उत्तर यह है कि एक अंग के पाप का दण्ड सारी देह पर पड़ना कोई नई बात नहीं है। यदि हम इसका कारण न भी खोज सकें, तो हमारे लिए इतना ही पर्याप्त से भी अधिक होना चाहिए कि अपराध इस्राएलियों पर गिना गया, जबकि दोष एक ही व्यक्ति तक सीमित था। परन्तु क्योंकि बहुधा ऐसा होता है कि जो स्वयं दुष्ट नहीं हैं, वे भी अपने भाइयों के पापों की ओर से आँखें मूँदकर उन्हें पालते-पोसते हैं, इसलिए दोष का एक भाग उचित रीति से उन सब पर डाला जाता है जो उस पर परदा डालकर साझीदारों के समान उसमें उलझ जाते हैं। इसी कारण पौलुस (1 कुरिन्थियों 5:4-6) एक व्यक्ति के निजी घोर पाप के लिए सब कुरिन्थियों को उलाहना देता है, और उनके उस घमण्ड पर बरस पड़ता है कि ऐसा कलंक लगे रहते भी वे घमण्ड करने का साहस करते थे। परन्तु यहाँ यह आपत्ति उठाना सहज है कि सब लोग उस चोरी से अनजान थे, और इसलिए यहाँ उस सूत्र के लिए कोई स्थान नहीं कि जो रोक सकने पर भी अपराध होने देता है, वही उसका कर्ता है। मैं निश्चय ही स्वीकार करता हूँ कि यह स्पष्ट नहीं है कि एक निजी अपराध सारी प्रजा पर क्यों गिना गया, सिवाय इसके कि कदाचित् उन्होंने पहले कुकर्मों को दण्ड देने में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती थी, और सम्भवतः इसी कारण इस प्रसंग का वास्तविक अपराधी अधिक ढिठाई से पाप कर बैठा। यह तो सर्वविदित है कि जंगली घास, यदि शीघ्र उखाड़ न फेंकी जाए, तो चुपके-चुपके घुस आती है, तेज़ी से बढ़ती है और हानिकारक फल लाती है। तौभी परमेश्वर जो एक गुप्त चोरी का दोष सारी प्रजा पर लगाता है, उसका कारण इससे गहरा और अधिक गूढ़ है। वह एक असाधारण प्रकटीकरण के द्वारा आनेवाली पीढ़ियों को स्मरण दिलाना चाहता था कि एक व्यक्ति के काम से वे सब के सब दोषी ठहर सकते हैं, और इस प्रकार उन्हें अपराधों को रोकने में अधिक यत्न से ध्यान देने के लिए प्रेरित करे।
इसलिए इससे उत्तम कुछ नहीं कि हम अपने मन को तब तक ठहराए रखें जब तक पुस्तकें न खोली जाएँ, जब परमेश्वर के वे न्याय, जो अब हमारे अन्धकार से धुँधले हैं, पूर्ण रूप से स्पष्ट कर दिए जाएँगे। हमारे लिए इतना ही पर्याप्त हो कि एक निजी कलंक से सारी प्रजा दूषित हो गई; क्योंकि सर्वोच्च न्यायी ने ऐसा ही घोषित किया है, जिसके सम्मुख हमें गूँगे होकर खड़ा रहना उचित है, क्योंकि एक दिन हमें उसके न्यायासन के सामने उपस्थित होना है। आकान जिस वंश से उत्पन्न हुआ था, उसका वर्णन उसकी लज्जा को बढ़ाने और मानो फैलाने के लिए किया गया है; मानो यह कहा गया हो कि वह अपने घराने और अपनी सारी जाति के लिए कलंक था। क्योंकि इतिहास का लेखक ऊपर यहूदा के गोत्र तक जाता है। इससे हमें यह सिखाया जाता है कि जब हमसे सम्बन्ध रखनेवाला कोई व्यक्ति नीचता और दुष्टता से आचरण करता है, तो उसके व्यक्तित्व में मानो हम पर भी एक कलंक की छाप लगा दी जाती है, जिससे हम दीन किए जाएँ — इसलिए नहीं कि किसी दुष्ट मनुष्य के सारे कुटुम्बियों का अपमान करना न्यायसंगत हो सकता है, परन्तु पहले इसलिए कि सब कुटुम्बी एक दूसरे को परस्पर सुधारने में अधिक सावधान रहें, और दूसरे इसलिए कि वे यह पहचानने की ओर अगुवाई पाएँ कि या तो उनकी आँख मूँद लेने का, या उनके अपने दोषों का दण्ड दिया जा रहा है।
इस बात से ठोकर का और भी बड़ा अवसर उत्पन्न हुआ, जो सब में घबराहट उत्पन्न करने योग्य था, कि यह अपराध यहूदा के गोत्र में पकड़ा गया, जो सारी जाति का पुष्प और गौरव था। निश्चय ही यह परमेश्वर की अद्भुत युक्ति के कारण था कि उस गोत्र में वह श्रेष्ठता बसी थी जो भविष्य के प्रभुत्व की आशा को पोषित करती थी। परन्तु जब बिलकुल आरम्भ के निकट ही एक व्यक्ति के काम से यह सम्मान घिनौने ढंग से कलंकित हो गया, तो यह घटना निर्बल मनों में कोई छोटी हलचल उत्पन्न न करती। तौभी कठोर दण्ड ने उस ठोकर को मिटा दिया जो अन्यथा बनी रहती; और इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जब दुष्टों को निन्दा करने का अवसर दिया गया हो, तब कलीसिया के पास उस कलंक को दूर करने का इससे अधिक उपयुक्त साधन नहीं कि वह अपराधों को उदाहरणीय दण्ड दे।
2. “और यहोशू ने यरीहो से पुरुषों को भेजा” इत्यादि। नगर की स्थिति की जाँच करना और उसके सब मार्गों का भेद लेना बुद्धिमानी का काम था, जिससे वे अनजाने स्थानों में अन्धाधुन्ध बढ़ते हुए किसी घात में न फँस जाएँ। परन्तु जब थोड़ी ही देर बाद सारी सेना के साथ आगे बढ़ना आवश्यक होता, तब नगर लेने के उद्देश्य से एक छोटी टोली को आगे भेजना युद्ध-कौशल की कमी प्रकट करता प्रतीत होता है। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात न होती कि दो या तीन हज़ार पुरुष अचानक धावा होने पर भय से घबरा जाते और पीठ दिखा देते। और निश्चय ही सारी सेना के लिए यह हितकर होता कि बीस या तीस हज़ार पुरुष लूट के लिए टोलियों में चारों ओर फैल जाते। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि यदि कोई प्रतिरोध न भी होता, तौभी केवल घात करने का काम ही एक छोटी टुकड़ी को थका डालने के लिए पर्याप्त था। इसलिए जब वे लगभग तीन हज़ार पुरुष पीछे धकेल दिए गए, तो यह उनके निश्चिन्त भरोसे और आलस्य का उचित ही प्रतिफल था। तौभी पवित्र आत्मा यह घोषित करता है कि संख्या की कमी उस पराजय का कारण नहीं थी, और उसका दोष उस पर नहीं डाला जाना चाहिए। सच्चा कारण परमेश्वर की गुप्त युक्ति थी, जो अपने क्रोध का एक चिह्न दिखाना चाहता था, परन्तु उसने संख्या को थोड़ा रहने दिया जिससे हानि कम गम्भीर हो। और निश्चय ही यह दया का एक दुर्लभ प्रदर्शन था कि उसने प्रजा को कोमलता से और किसी बड़े विनाश के बिना ताड़ना दी, इस उद्देश्य से कि वे जागकर उस बुराई का तुरन्त उपचार खोजें। कदाचित् यह भी हो कि यदि इस्राएली पूरे बल के साथ नगर पर चढ़ाई करते, तो ऐ के निवासी उन पर आक्रमण करने का साहस ही न करते। इसलिए प्रभु ने अपने न्याय के लिए मार्ग खोल दिया, तौभी उसे ऐसा संयमित किया कि उससे केवल वह छिपा अपराध प्रकट हो जाए, जिसके कारण अन्यथा प्रजा मानो किसी धीमे रोग से नष्ट हो जाती।
परन्तु यद्यपि इस्राएलियों की पराजय में कोई आश्चर्य की बात नहीं, जो नीचे की भूमि पर प्रतिकूल दशा में लड़े, तौभी यह पूरी रीति से स्पष्ट था कि आमने-सामने भिड़ने से पहले ही वे भय से और साहस के टूट जाने से हार चुके थे; क्योंकि पीठ दिखाकर उन्होंने ऊँची भूमि छोड़ दी और घाटी की ढलान की ओर हट गए। दूसरी ओर, शत्रुओं ने उस भरोसे और ढिठाई से, जिसके साथ वे भागनेवालों का पूरे वेग से उनकी छावनी की दिशा में पीछा करने का साहस कर बैठे, यह दिखा दिया कि वे उन्हें कितना तुच्छ समझते थे। स्वयं छावनी में ऐसी थरथराहट थी कि सब के मन पिघल गए। मैं मानता हूँ कि भय का कारण तो था, जब इतनी विजयें मानो खेल-खेल में पाने के बाद उन्होंने अपने को इतनी लज्जाजनक रीति से हारा हुआ देखा। असामान्य परिस्थितियों में हम अधिक सहज से घबरा जाते हैं। परन्तु यह स्वर्ग से आया हुआ आतंक था, जिसने उन्हें तीस पुरुषों की मृत्यु और तीन हज़ार के भाग जाने से कहीं अधिक व्याकुल कर दिया।
6. “तब यहोशू ने अपने वस्त्र फाड़े” इत्यादि। यद्यपि जो पराजय या अपमान सहना पड़ा था उसका दोष दूसरों पर डाल देना सहज था, और एक साहसी अगुवे को तीस पुरुषों की हानि से इतना हताश होना कदापि शोभा नहीं देता था, विशेषकर जब अपनी सेना को सौ गुना बढ़ाकर उन शत्रुओं को, जो अब अपने परिश्रम से थक चुके थे, पीछे खदेड़ देना कठिन न होता, तौभी यहोशू ने बिना कारण अत्यन्त गहरा शोक नहीं किया, और न बिना कारण निराशा की सीमा को छूनेवाली भावनाओं के वश में हुआ। यह विचार कि युद्ध के परिणाम अनिश्चित होते हैं — जो विचार पराजितों को सम्भाले रखता और उनमें फिर से प्राण फूँक देता है — उसके मन में आ ही नहीं सकता था, क्योंकि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि वे सदा विजयी रहेंगे। इसलिए जब सफलता उसकी आशाओं के अनुरूप न निकली, तो वह केवल यही निष्कर्ष निकाल सका कि वे असफल केवल इसलिए लड़े कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा की हुई सहायता से वे वंचित कर दिए गए थे।
तदनुसार उसने और पुरनियों ने न केवल अपने आप को शोक और उदासी के हवाले कर दिया, वरन् वे गम्भीर विलाप में लग जाते हैं, जैसा अत्यन्त विपत्तिपूर्ण परिस्थितियों में किया जाता था, अर्थात् अपने वस्त्र फाड़कर और अपने सिरों पर धूल डालकर। शोक प्रकट करने की यह रीति अन्यजातियों में भी प्रचलित थी, परन्तु परमेश्वर के भक्त उपासकों के लिए, जब वे गिड़गिड़ाकर उसके क्रोध को टालने की विनती करते थे, यह विशेष रूप से उपयुक्त थी। वस्त्रों का फाड़ना और उसके साथ के अन्य कार्य पश्चाताप का अंगीकार थे, जैसा उसके साथ जुड़ी प्रार्थना से भी अनुमान किया जा सकता है; तौभी वह प्रार्थना मिश्रित प्रकार की है, जो कुछ तो विश्वास और भक्ति की शुद्ध आत्मा से, और कुछ अत्यधिक व्याकुलता से प्रेरित है। तुरन्त परमेश्वर की ओर मुड़ने में, और यह स्वीकार करने में कि जिस हाथ से घाव दिया गया उसी में उपचार तैयार है, वे विश्वास से प्रेरित हैं; परन्तु उनका अत्यधिक शोक स्पष्टतः सब उचित सीमाओं से परे चला गया है। इसी कारण वे इतनी स्वतन्त्रता से वाद-विवाद करते हैं, और इसी कारण यह उलटी इच्छा प्रकट करते हैं, भला होता कि हम जंगल ही में रह जाते!
तौभी भक्त मनों के लिए यह कोई नई बात नहीं कि जब वे पवित्र उत्साह से परमेश्वर को खोजने की अभिलाषा करते हैं, तब वे अपनी भावनाओं के वेग और आवेग से विश्वास की ज्योति को धुँधला कर देते हैं। और इस प्रकार सारी प्रार्थनाएँ दूषित हो जातीं, यदि प्रभु अपनी असीम सहनशीलता से उन्हें क्षमा न करता, और उनके सब धब्बे पोंछकर उन्हें ऐसे ग्रहण न करता मानो वे शुद्ध हों। और फिर भी, जब इस प्रकार स्वतन्त्रता से वाद-विवाद करते हुए वे अपनी चिन्ताएँ परमेश्वर पर डाल देते हैं, तो यद्यपि इस रूखी सरलता को क्षमा की आवश्यकता है, तौभी यह कपटियों की उस बनावटी नम्रता से कहीं अधिक ग्रहणयोग्य है, जो अपने होंठों से कोई साहसपूर्ण बात निकलने न देने के लिए सावधानी से अपने आप को रोके रखते हुए भीतर ही भीतर हठ से फूलते और मानो फटे जाते हैं।
यहोशू संयम की सीमा का उल्लंघन करता है जब वह प्रजा को जंगल से निकाल लाने के लिए परमेश्वर को चुनौती देता है; परन्तु वह और भी अधिक असंयम की ओर बढ़ जाता है जब परमेश्वर की प्रतिज्ञा और आदेश के विरोध में वह यह अशान्त इच्छा प्रकट करता है, भला होता कि हम जंगल से कभी निकले ही न होते! यह तो परमेश्वर की वाचा को पूरी रीति से रद्द कर देना था। परन्तु क्योंकि उसका उद्देश्य परमेश्वर की महिमा को बनाए रखना और उसका समर्थन करना था, इसलिए वह आवेग क्षमा किया गया जिससे अन्यथा परमेश्वर उचित रूप से क्रुद्ध हो सकता था।
इससे हमें यह सिखाया जाता है कि पवित्र लोग, जबकि वे सही लक्ष्य पर निशाना साधते हैं, बहुधा ठोकर खाते और गिर पड़ते हैं, और यह कभी-कभी उनकी प्रार्थनाओं में भी होता है, जिनमें विश्वास की शुद्धता और आज्ञाकारिता के अनुरूप ढली हुई भावनाएँ विशेष रूप से प्रकट होनी चाहिए। यहोशू परमेश्वर की महिमा के लिए विशेष रूप से चिन्तित था, यह अगले पद से प्रकट है, जहाँ वह उस महिमा की रक्षा का भार अपने ऊपर लेता है, जो मानो उसे सौंपी गई थी। वह पूछता है, जब यह आपत्ति उठाई जाएगी कि प्रजा ने पीठ दिखाई, तब मैं क्या कहूँ? और वह उचित ही शिकायत करता है कि उसके पास कोई उत्तर नहीं रह गया, क्योंकि परमेश्वर ने उसे अपने अनुग्रह का साक्षी और प्रचारक बनाया था, जिससे लगातार विजयों के क्रम की आशा करने का आधार था। तदनुसार, उसे सौंपे गए पद को पूरा करते हुए अत्यन्त ऊँचे शब्दों में परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की बड़ाई करने के बाद, अब घटनाओं के प्रतिकूल क्रम के कारण उसके लिए लज्जा के साथ चुप रह जाना आवश्यक हो गया था। इस प्रकार हम देखते हैं कि उसे किसी बात से इतना दुःख नहीं होता जितना अपनी बुलाहट पर लाए गए अपमान से। उसे अपनी प्रतिष्ठा की चिन्ता नहीं है, परन्तु वह डरता है कि कहीं संसार की दृष्टि में परमेश्वर का सत्य संकट में न पड़ जाए। संक्षेप में, क्योंकि वह केवल परमेश्वर की आज्ञा से ही प्रजा को कनान देश में लाया था, इसलिए अब विपत्ति में वह उसी को रचयिता और पलटा लेनेवाले के रूप में पुकारता है, मानो वह कह रहा हो, क्योंकि तू ही मुझे इस संकट में ले आया है, और मुझ पर धोखेबाज़ दिखाई देने का संकट है, इसलिए तेरा ही काम है कि तू बीच में पड़े और मुझे अपने बचाव के साधन दे।
9. “क्योंकि कनानी और सब निवासी” इत्यादि। वह भय का एक और कारण बताता है। आस-पास की सब जातियाँ, जो या तो विपत्तियों से दबकर या आश्चर्यकर्मों से भयभीत होकर शान्त पड़ी थीं, अब फिर अपना भरोसा पा लेंगी और प्रजा पर अचानक आक्रमण कर देंगी। यह सचमुच सम्भावित था कि जैसे परमेश्वर की सामर्थ ने उनके साहस को कुचल डाला था और उन्हें घबराहट से भर दिया था, वैसे ही जैसे ही उन्हें पता चलेगा कि परमेश्वर इस्राएलियों का विरोधी हो गया है, वे निडर होकर युद्ध के लिए आगे बढ़ आएँगे। इसलिए वह आनेवाले संकट के विषय में परमेश्वर से विनती करता है, और उससे बिनती करता है कि वह शीघ्र उसका प्रबन्ध करे, क्योंकि कनानी इस अवसर को पकड़ लेंगे, जो अब तक भय से सुन्न पड़े थे, पर अब आक्रमणकारी बन जाएँगे और एक भयभीत प्रजा को सहज ही नष्ट करने में सफल हो जाएँगे।
तौभी अन्तिम उपवाक्य से यह प्रकट है कि वह केवल प्रजा की सुरक्षा के विषय में ही नहीं सोच रहा, परन्तु सबसे बढ़कर परमेश्वर के नाम के सम्मान के लिए चिन्तित है, कि वह अखण्ड बना रहे, और दुष्टों की ढिठाई से पाँवों तले रौंदा न जाए, जैसा तब होता यदि प्रजा उस निज भाग से निकाल दी जाती जिसकी प्रतिज्ञा इतनी बार की गई थी। हम जानते हैं कि स्वयं परमेश्वर ने कौन-सी भाषा का प्रयोग किया, जैसा मूसा के गीत में लिखा है (व्यवस्थाविवरण 32:26, 27), “मैं उन्हें कोने-कोने में तितर-बितर कर देता, मैं मनुष्यों में से उनका स्मरण तक मिटा डालता; यदि मुझे शत्रु के क्रोध (घमण्ड) का डर न होता, ऐसा न हो कि उनके द्रोही उलटा समझ बैठें, और ऐसा न हो कि वे कहें, हमारा हाथ प्रबल है, और यह सब यहोवा ने नहीं किया।”
तो जिस बात के विषय में परमेश्वर घोषित करता है कि मनुष्यों की रीति पर बोलें तो वह उससे डरता था, यहोशू अब चाहता है कि उसे समय रहते रोक दिया जाए; नहीं तो शत्रु प्रजा की पराजय से फूलकर ढीठ हो जाएगा और स्वयं परमेश्वर पर विजय पाने की डींग मारेगा।
यहोशू 7:10-18
10. तब यहोवा ने यहोशू से कहा, उठ, खड़ा हो जा; तू क्यों इस भाँति मुँह के बल पड़ा है?
10. Tunc dixit Jehova ad Josuam, Surge. Ut quid tu ita procidis super faciem tuam?
फ्रांसीसी में, “O que je voudrove que nous eussions prins a plaisir de demeurer au dela du Jordain;” “ओह, मैं कितना चाहता हूँ कि हम यरदन के उस पार रहने में प्रसन्न रहते।” — सं. फ्रांसीसी में, “Soit revoquee en doute, ou moins estimee devant le monde;” “संसार के सामने सन्देह में डाला जाए, या कम आदर पाए।” — सं.
11. इस्राएल ने पाप किया है; और जो वाचा मैंने उनको आज्ञा देकर बाँधी थी उसको उन्होंने तोड़ दिया है; उन्होंने अर्पण की हुई वस्तुओं में से ले भी लिया है, और चोरी भी की है, और छल भी किया है, और उसको अपने सामान में भी रख लिया है।
11. Peccavit Israel, atque adeo transgressi sunt pactum meum quod praecepi illis, atque etiam tulerunt de anathemate, atque etiam furati sunt, atque etiam mentiti, atque etiam reposuerunt in vasa sua.
12. इस कारण इस्राएली अपने शत्रुओं के साम्हने खड़े न रह सके, परन्तु अपने शत्रुओं को पीठ दिखाई, क्योंकि वे आप अर्पण की वस्तु बन गए हैं; और यदि तुम अपने बीच में से अर्पण की वस्तु को सत्यानाश न कर डालोगे, तो मैं आगे को तुम्हारे संग न रहूँगा।
12. Itaque non potuerunt filii Israel stare coram inimicis suis: cervicem vertent coram inimicis suis: quia sunt in anathema, non perseverabo esse vobiscum, nisi deleatis anathema e medio vestri.
13. उठ, प्रजा को पवित्र कर, और कह, कि कल के लिए अपने-अपने को पवित्र करो; क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, कि हे इस्राएल, तेरे बीच में अर्पण की वस्तु है; जब तक तुम अर्पण की वस्तु को अपने बीच में से दूर न करो, तब तक तू अपने शत्रुओं के साम्हने खड़ा न रह सकेगा।
13. Surge, sanctifica populum et dicas, Sanctificate vos in crastinum: sic enim dicit Jehova Deus Israel, Anathema est in medio tui Israel: non poteris stare coram inimicis tuis, donec abstuleris anathema e medio vestri.
अंग्रेज़ी अनुवाद क्रिया को भूतकाल में रखता है, और अनुवाद करता है “पीठ दिखाई;” कैल्विन का “vertent cervicem,” “अपनी गर्दन फेरेंगे,” जो इस अभिव्यक्ति को घटी हुई बात की घोषणा नहीं, वरन् अभी होनेवाली बात की चेतावनी बनाता है, मूल के अधिक अनुरूप है, और उसे सेप्टुआजिंट का समर्थन भी प्राप्त है, जिसमें αὐχένα ὑποστρέψουσιν है। लूथर तो यह कहकर अभिव्यक्ति के बल को और भी बढ़ा देता है, “müssen ihren Feinden den Rücken kehren;” “उन्हें अपने शत्रुओं को पीठ दिखानी ही पड़ेगी।” उसी पद में कैल्विन का विराम-चिह्न-विधान विलक्षण है। “शत्रुओं” पर कोलन लगाकर वह “quia sunt in anathema” शब्दों को पहले उपवाक्य के अन्त से अलग कर देता है, और उन्हें दूसरे उपवाक्य का आरम्भ बना देता है, जो तदनुसार इस प्रकार पढ़ा जाता है: “क्योंकि वे शापित (anathema) हैं, (उन्होंने अर्पण की हुई वस्तु में से लिया है,) मैं तुम्हारे साथ चलता न रहूँगा,” इत्यादि। — सं.
14. इसलिए बिहान को तुम गोत्र-गोत्र के अनुसार समीप लाए जाओगे; और जिस गोत्र को यहोवा पकड़े वह कुल-कुल करके समीप आए; और जिस कुल को यहोवा पकड़े वह घराना-घराना करके समीप आए; और जिस घराने को यहोवा पकड़े वह पुरुष-पुरुष करके समीप आए।
14. Accedetis ergo mane per tribus vestras, et tribus quam deprehendet Jehvoa accedet per domos: et domus quam deprehendet Jehova accedet per viros.
15. तब जो अर्पण की वस्तु रखे हुए पकड़ा जाए, वह और जो कुछ उसका हो सब आग में जला दिया जाए; क्योंकि उसने यहोवा की वाचा को तोड़ा है, और इस्राएल में मूर्खता का काम किया है।
15. Qui autem deprehensus fuerit in anathemate, comburetur igni, ipse, et omnia quae ejus sunt: quod transgressus fuerit pactum Jehovae, et quod fecerit nefas in Israel.
16. सो यहोशू बिहान को सवेरे उठकर इस्राएलियों को गोत्र-गोत्र करके समीप ले गया; और यहूदा का गोत्र पकड़ा गया।
16. Surrexit igitur Josue mane, et accedere fecit Israelem per tribus suas, et deprehensa est tribus Juda.
17. तब उसने यहूदा के परिवार को समीप किया, और जेरहवंशियों का कुल पकड़ा गया; फिर उसने जेरहवंशियों के कुल को पुरुष-पुरुष करके समीप किया, और जब्दी पकड़ा गया।
17. Tunc applicuit cognationes Juda, et deprehendit cognationem Zari, applicuit deinde familiam Zari per viros, et deprehensa est familia Zabdi.
18. तब उसने उसके घराने को पुरुष-पुरुष करके समीप किया, और यहूदा के गोत्र का आकान, जो जेरह का परपोता, जब्दी का पोता और कर्म्मी का पुत्र था, पकड़ा गया।
18. Et applicuit domum ejus per viros, et deprehensus est Achan filius Carmi, filii Zabdi, filii Zera, de tribu Juda.
10. “तब यहोवा ने यहोशू से कहा” इत्यादि। परमेश्वर यहोशू को इस बात के लिए सर्वथा नहीं डाँटता कि वह भूमि पर औंधे मुँह पड़ा प्रजा की पराजय पर विलाप कर रहा था, क्योंकि परमेश्वर से क्षमा पाने की सच्ची रीति यही थी कि उसके सामने गिड़गिड़ाते हुए गिर पड़ें; परन्तु इस बात के लिए डाँटता है कि उसने अपने आप को अत्यधिक शोक के हवाले कर दिया। तौभी इस डाँट को अतीत की अपेक्षा भविष्य से सम्बन्धित समझना चाहिए; क्योंकि वह उससे अपना विलाप समाप्त करने को कहता है, मानो वह कह रहा हो कि वह पहले ही बहुत देर तक औंधा पड़ा रह चुका है, और अब सारा आलस्य छोड़ देना चाहिए, क्योंकि एक भिन्न उपचार की आवश्यकता है। परन्तु वह पहले बुराई का कारण दिखाता है, और फिर उसे दूर करने की रीति ठहराता है। इसलिए वह उसे बताता है कि युद्ध का परिणाम विनाशकारी इसलिए हुआ कि वह प्रजा की दुष्टता से अप्रसन्न था, और उसने उनकी रक्षा करना छोड़ दिया था।
हम पहले समझा चुके हैं कि एक निजी अपवित्र-अपहरण का दण्ड सब पर क्यों डाला जाता है; क्योंकि यद्यपि वे न तो अपनी दृष्टि में और न दूसरों की दृष्टि में दोषी ठहराए गए थे, तौभी परमेश्वर के न्याय के, जिसने उन्हें उसी दण्ड-आज्ञा में सम्मिलित कर लिया, गुप्त कारण थे, जिनकी संयम से जाँच करना कदाचित् उचित हो, परन्तु जिनकी ताक-झाँक करनेवाली जिज्ञासा से खोज करना उचित नहीं। साथ ही इस बात में हमें दया का एक दुर्लभ उदाहरण मिलता है कि यद्यपि शब्दों में दण्ड-आज्ञा सब तक फैली है, तौभी दण्ड केवल एक ही घराने पर दिया गया जो वास्तव में उस अपराध से अशुद्ध हुआ था। आगे जो कहा गया है वह यह दिखाने के लिए है कि अपराध कितना घोर था, और इसी कारण निपात גם बिना बल के नहीं दोहराया गया; क्योंकि अन्यथा वे उसकी भयंकरता को हल्का कर सकते थे। इसलिए जब यह कहा गया कि उन्होंने वाचा को भी तोड़ा है, तो इसका अर्थ यह है कि उन्होंने हल्का पाप नहीं किया था। वाचा का नाम उस निषेध के लिए प्रयुक्त हुआ है जो, जैसा हमने देखा, दिया गया था; क्योंकि एक पारस्परिक ठहराव किया गया था, जिसके अनुसार सारे देश की लूट इस्राएलियों को दी गई, इस शर्त पर कि वह पहला फल पाए। तो यहाँ वह सामान्य वाचा की ओर संकेत नहीं करता, परन्तु शिकायत करता है कि जो विशेष रूप से अलग किया गया था उसमें उसके साथ छल किया गया; और इसलिए वह तुरन्त बाद व्याख्या के रूप में जोड़ता है कि उन्होंने अर्पण की हुई वस्तु में से लिया था, और वह भी अपवित्र-अपहरण के बिना नहीं, क्योंकि उन्होंने वह चुरा लिया था जिसे वह अपना होने का दावा करता था। “झूठ बोलना” शब्द यहाँ, अन्य बहुत से स्थानों के समान, किसी रखी हुई आशा को निष्फल करने, या धोखा देने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अन्तिम बात, जिसे बहुत से लोग पहली दृष्टि में तुच्छ समझ सकते हैं, बिना उचित कारण के नहीं, दोष की चरम सीमा के रूप में रखी गई है, अर्थात् यह कि उन्होंने वर्जित वस्तु को अपने पात्रों के बीच रख दिया था। जो लोग अन्यथा पूरी रीति से दुष्ट नहीं हैं, वे भी कभी-कभी लाभ के लोभ से परीक्षा में पड़ जाते हैं; परन्तु वस्तु को छिपाने और उसे अन्य सामान के बीच रख छोड़ने के कार्य में कुकर्म में अधिक हठीली दृढ़ता निहित है, क्योंकि ऐसा करनेवाला यह दिखाता है कि उसके मन पर पछतावे की किसी भावना का प्रभाव नहीं पड़ा। 12वें पद के अन्तिम भाग में anathema शब्द एक भिन्न अर्थ में, अर्थात् शाप के अर्थ में, प्रयुक्त हुआ है; क्योंकि चुराए हुए सोने के कारण ही इस्राएली शापित, और लगभग विनाश के लिए अर्पित हो गए थे।
13. “उठ, प्रजा को पवित्र कर” इत्यादि। यद्यपि शब्द קדש का अर्थ अधिक व्यापक है, तौभी क्योंकि यहाँ विषय प्रजा का प्रायश्चित है, मुझे कोई सन्देह नहीं कि वह पवित्रीकरण की एक विधिपूर्वक रीति ठहराता है। इसलिए जो लोग इसे सामान्य रूप से “तैयार करना” के समान समझते हैं, वे मेरे विचार में उसे उसका पूरा बल नहीं देते। वरन्, क्योंकि अब वे मानो परमेश्वर की उपस्थिति में लाए जानेवाले थे, शुद्धीकरण की आवश्यकता थी, जिससे वे अशुद्ध दशा में न आएँ। पवित्र करने की रीति के विषय में यह भी ध्यान देने योग्य है कि यहोशू प्रजा को व्यवस्था के अनुसार शुद्धीकरण की सूचना देता है। परन्तु यद्यपि वह विधि अपने आप में कम महत्त्व की रही हो, तौभी उसमें एक असंस्कृत प्रजा को जगाने की बड़ी शक्ति थी। बाहरी चढ़ावे ने अवश्य उनके विचारों को आत्मिक शुद्धता की ओर मोड़ा होगा, जबकि अन्यथा उचित वस्तुओं से उनके परहेज़ ने उन्हें उस अत्यन्त ऊँची और निष्कलंक पवित्रता का स्मरण दिलाया जिसकी माँग की गई थी। और जो होनेवाला है उसकी चेतावनी उन्हें पहले से दी जाती है, जिससे हर एक अपने आप को जाँचने में अधिक सावधान रहे। वरन् प्रभु एक-एक पग आगे बढ़ता है, मानो वह पश्चाताप के लिए अवकाश देना चाहता हो; क्योंकि गोत्र से कुल तक उतरने, और अन्त में एक ही व्यक्ति तक पहुँचने का कोई और कारण सोचना असम्भव है।
इन सब में हम आकान की भयंकर जड़ता देखते हैं। कदाचित् लज्जा से पराजित होकर वह अपनी ढिठाई को दुगना कर देता है, और साहसपूर्ण मुख बनाकर अपने सृष्टिकर्ता का अपमान करने में नहीं हिचकिचाता। क्योंकि जब वह अपने आप को पकड़ा जाता हुआ देखता है, तब वह अपनी इच्छा से आगे आकर अपराध मान क्यों नहीं लेता, और क्यों अपनी ढीठता में तब तक अड़ा रहता है जब तक वह अपनी इच्छा के विरुद्ध घसीटकर आगे न लाया जाए? परन्तु जो लोग अपने आप को शैतान के द्वारा अन्धा होने देते हैं, उनका यही उचित प्रतिफल है। फिर जब पहले उसके गोत्र के और फिर उसके कुल के पकड़े जाने से उसने स्पष्ट देख लिया कि परमेश्वर का हाथ उस पर दबाव डाल रहा है और उसे कसकर पकड़े हुए है, तब वह कम से कम उस समय भी आगे क्यों नहीं लपकता, और स्वेच्छा से आत्म-समर्पण करके दण्ड को टालने की विनती क्यों नहीं करता? तो यह प्रकट है कि जब उसने अपने आप को अपनी दुष्टता में कठोर कर लिया, तब उसके मन और उसकी सारी इन्द्रियों पर शैतान ने जादू कर दिया था।
यद्यपि परमेश्वर सब दोषपूर्ण कार्यों को उसी क्षण प्रकाश में नहीं लाता, और न इस काम के लिए सदा चिट्ठी डालने का प्रयोग करता है, तौभी इस उदाहरण के द्वारा उसने हमें सिखाया है कि कोई बात इतनी छिपी नहीं कि अपने समय पर प्रकट न की जाए। प्रकट करने का रूप तो निश्चय ही भिन्न होगा; परन्तु हर एक व्यक्ति स्वयं यह विचार करे कि जो बातें सारे संसार के ज्ञान से बच निकलती हैं वे परमेश्वर से छिपी नहीं हैं, और उन्हें सार्वजनिक करना केवल उसकी इच्छा पर निर्भर है। क्योंकि यद्यपि कोई पाप मानो सो गया-सा प्रतीत हो, तौभी वह द्वार पर जागता रहता है, और उस अभागे मनुष्य को तब तक घेरे रहेगा जब तक उसे पकड़कर कुचल न डाले।
यहोशू 7:19-26
19. तब यहोशू ने आकान से कहा, हे मेरे बेटे, इस्राएल के परमेश्वर यहोवा का आदर कर, और उसके आगे अंगीकार कर; और जो कुछ तूने किया है वह मुझको बता दे, और मुझसे कुछ मत छिपा।
19. Tunc dixit Josue ad Achan, Fili mi, da nunc gloriam Jehovae Deo Israel, et ede ei confessionem, atque indica mihi quid feceris, ne abscondas a me.
20. और आकान ने यहोशू को उत्तर देकर कहा, सचमुच मैंने इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के विरुद्ध पाप किया है, और इस-इस प्रकार मैंने किया है:
20. Respondit Achan ad Josuam, et ait, Vere ego peccavi Jehovae Deo Israel, et sic et sic feci.
21. जब मुझे लूट में शिनार देश का एक सुन्दर ओढ़ना, और दो सौ शेकेल चाँदी, और पचास शेकेल सोने की एक ईंट दिखाई पड़ी, तब मैंने उनका लालच करके उन्हें ले लिया; और देख, वे मेरे डेरे के भीतर भूमि में गड़े हैं, और उनके नीचे चाँदी है।
21. Vidi inter spolia pallium, Babylonicum bonum, et ducentos siclos argenteos, et ligulam auream unam, cujus pondus erat quinquaginta siclorum, quae concupivi et abstuli; et ecce abscondita sunt in terra, in medio tabernaculi mei, et argentum subtus.
22. तब यहोशू ने दूत भेजे, और वे उस डेरे की ओर दौड़े गए; और देखो, वह वस्तु उसके डेरे में छिपी थी, और चाँदी उसके नीचे थी।
22. Misit itaque Josue nuncios qui currerunt ad tabernaculum; ecce absconditum erat in tabernaculo ejus et argentum sub eo.
23. और उन्होंने उनको डेरे में से निकालकर यहोशू और सब इस्राएलियों के पास लाकर यहोवा के साम्हने रख दिया।
23. Acceperuntque ea e medio tabernaculi, et attulerunt ea ad Josuam et ad omnes filios Israel, statueruntque coram Jehova.
24. तब सब इस्राएलियों समेत यहोशू जेरह के वंशज आकान को, और उस चाँदी, और ओढ़ने, और सोने की ईंट को, और उसके बेटों और बेटियों को, और उसके बैलों, गदहों और भेड़-बकरियों को, और उसके डेरे को, अर्थात् जो कुछ उसका था सब को लेकर आकोर नामक तराई में ले गया।
24. Tollensque igitur Josue Achan filium Zera, et argentum, et pallium, et ligulam auream, et filios ejus, et filias ejus, et boves ejus, et asinos ejus, et pecudes ejus, et tabernaculum ejus, et omnia quae erant ejus, simulque universus Israel cum eo deduxerunt in vallem Achor.
25. तब यहोशू ने कहा, तूने हमें क्यों कष्ट दिया? आज के दिन यहोवा तुझी को कष्ट देगा। तब सब इस्राएलियों ने उसको पत्थरवाह किया, और उनको पत्थरवाह करने के बाद आग में जला दिया।
25. Et dixit Josue, Cur turbasti nos? Turbet te Jehova hodie, et obruerunt eum universus Israel lapidibus combusseruntque eos igni postquam lapidaverunt eos lapidibus.
26. और उन्होंने उसके ऊपर पत्थरों का एक बड़ा ढेर खड़ा किया जो आज तक बना है। तब यहोवा का भड़का हुआ कोप शान्त हो गया। इस कारण उस स्थान का नाम आज तक आकोर तराई पड़ा है।
26. Et statuerunt super eum acervum lapidum magnum usque ad hunc diem, et aversus est Jehova ab ira excandescentiae suae; ideo vocarunt nomen loci illius vallem Achor usque in hunc diem.
19. “तब यहोशू ने आकान से कहा” इत्यादि। यद्यपि आकान केवल चिट्ठी के द्वारा, जो संयोगवश पड़ती हुई प्रतीत होती है, पूरी रीति से पकड़ा गया, तौभी क्योंकि परमेश्वर ने घोषित किया था कि वह मानो उँगली से दोषी व्यक्ति को दिखा देगा, इसलिए यहोशू बिना किसी सन्देह के पूछताछ करता है, और जब बात खुल जाती है, तो आकान से उसे मान लेने का आग्रह करता है। यह सचमुच सम्भव है कि शपथ दिलाने की यही प्रचलित रीति थी, जैसा हम यूहन्ना के सुसमाचार में पढ़ते हैं (यूहन्ना 9:24) कि शास्त्रियों और याजकों ने उस अन्धे को, जिसकी दृष्टि हमारे उद्धारकर्ता ने लौटा दी थी, उस आश्चर्यकर्म के विषय में उत्तर देने के लिए शपथ दिलाते समय यही शब्द कहे। परन्तु यहोशू ने आकान को परमेश्वर की महिमा करने का जो उपदेश दिया, उसका एक विशेष कारण था, क्योंकि इनकार करके या गोलमोल बातें करके वह उस निर्णय की विश्वसनीयता को क्षति पहुँचा सकता था। बात तो चिट्ठी के द्वारा पहले ही निश्चित हो चुकी थी। इसलिए यहोशू उसे केवल यह आज्ञा देता है कि वह परमेश्वर के निर्णय पर अपनी सहमति की मुहर लगाए, और व्यर्थ इनकारों से अपराध को और भारी न बनाए।
वह उसे “बेटा” कहता है, न तो व्यंग्य से न कपट से, परन्तु सच्चाई और निष्कपटता से यह घोषित करता है कि वह उसके प्रति, जिसे वह पहले ही मृत्यु के योग्य ठहरा चुका था, पिता के समान भाव रखता था। इस उदाहरण के द्वारा न्यायियों को यह सिखाया जाता है कि अपराधों का दण्ड देते समय उन्हें अपनी कठोरता को ऐसा संयमित करना चाहिए कि वे मनुष्यत्व की भावनाओं को त्याग न दें, और दूसरी ओर, उन्हें दयालु होना चाहिए, परन्तु लापरवाह और ढीले होकर नहीं; संक्षेप में, उन्हें उन लोगों के लिए, जिन्हें वे दोषी ठहराते हैं, माता-पिता के समान होना चाहिए, परन्तु न्याय की कठोरता के स्थान पर अनुचित कोमलता को न रख दें। बहुत से लोग चापलूसी भरी दयालुता से अभागे अपराधियों को असावधान कर देते हैं, यह दिखाकर कि वे उन्हें क्षमा करना चाहते हैं, और फिर अपराध-स्वीकृति निकलवा लेने के बाद, जबकि वे दण्ड से छूट जाने की आशा से अपने मन को बहला रहे होते हैं, अचानक उन्हें जल्लाद के हाथ सौंप देते हैं। परन्तु यहोशू, अपराधी को परमेश्वर के न्यायासन के सामने बुला लेने से सन्तुष्ट होकर, क्षमा की व्यर्थ आशा देकर उसकी कुछ भी चापलूसी नहीं करता, और इस प्रकार वह उस दण्ड-आज्ञा को सुनाने के लिए अधिक स्वतन्त्र है जो परमेश्वर ने बताई है।
20. “और आकान ने यहोशू को उत्तर दिया” इत्यादि। क्योंकि वह अब विस्मय से स्तब्ध हो गया था, इसलिए वह न तो कोई बहाना बनाता है, न अपराध को हल्का करता है, न उस पर कोई रंग चढ़ाने का यत्न करता है, वरन् सारी बात खुले मन से विस्तारपूर्वक बता देता है। इस प्रकार परमेश्वर के पवित्र नाम ने अपराध-स्वीकृति निकलवाने में किसी भी यातना से अधिक प्रभावशाली काम किया। और जो सरलता उसने इस प्रकार दिखाई, वह पश्चाताप का निश्चित चिह्न न थी; मानो भय से पराजित होकर उसने वह बात खुलकर प्रकट कर दी जिसे वह प्रसन्नता से छिपाए रखता। और दुष्टों के लिए यह कोई नई बात नहीं कि कुछ समय तक बच निकलने का यत्न करने, और कुकर्म में कठोर हो जाने के बाद भी, वे अपने ही विरुद्ध स्वेच्छा से गवाह बन जाते हैं, ठीक-ठीक अपनी इच्छा से नहीं, परन्तु इसलिए कि परमेश्वर उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध घसीटता है, और मानो उन्हें सिर के बल धकेल देता है। यहाँ दिया गया खुला उत्तर उन बहुतों के कपट को दोषी ठहराएगा जो अपने बहानों से स्पष्ट प्रकाश को धुँधला कर देते हैं। यह अभिव्यक्ति बलपूर्ण है — इस-इस प्रकार मैंने किया; जिसका अर्थ है कि उस कार्य का हर एक भाग अलग-अलग और क्रम से समझाया गया। और वह केवल कार्य को ही स्वीकार नहीं करता, वरन् सारे बचाव को त्यागकर और हर बहाने को एक ओर फेंककर, वह उसकी भयंकरता के विषय में अपने आप को दोषी ठहराता है। वह कहता है, मैंने पाप किया है; यदि उसे अपवित्र-अपहरण का बोध न होता तो वह यह न कहता, और इससे प्रकट होता है कि उसने भूल या असावधानी का बहाना नहीं बनाया।
22. “तब यहोशू ने दूत भेजे” इत्यादि। यद्यपि दूतों का दौड़कर और फुर्ती करके अपनी आज्ञाकारिता प्रमाणित करना कोई अनोखी बात नहीं, तौभी यहाँ जिस फुर्ती का उल्लेख है वह यह दिखाती है कि सब लोग प्रायश्चित का काम यथाशीघ्र पूरा करवाने के लिए कितने उत्सुक थे, क्योंकि उस कठोर चेतावनी के कारण वे अत्यन्त व्याकुलता से भर गए थे — जब तक तुम शापित वस्तु से शुद्ध न हो जाओ, तब तक मैं तुम्हारे संग न रहूँगा। इसलिए वे केवल यहोशू की आज्ञाओं का पालन करने के लिए ही नहीं, वरन् उससे कहीं अधिक प्रभु को शान्त करने के लिए तेज़ी से दौड़े। चोरी से उठाई गई वस्तुएँ, जब उनकी आँखों के सामने रखी गईं, तो उन पर आए अपमान और पराजय का कारण समझाने के लिए पर्याप्त से भी अधिक थीं।
कहा गया था कि उन्होंने शत्रु को पीठ दिखाई, क्योंकि शापित वस्तु से अशुद्ध होने के कारण वे परमेश्वर की सदा की सहायता से वंचित हो गए थे; अब चुराई हुई वस्तुओं को देखकर यह निष्कर्ष निकालना सहज था कि प्रभु उचित ही उनका विरोधी हो गया था। साथ ही उन्हें यह स्मरण दिलाया गया कि परमेश्वर कनान के सारे देश के पहले फल को निष्कलंक दशा में सौंपे जाने को कितना महत्त्व देता था, जिससे उसकी उदारता उनकी स्मृति से कभी मिट न जाए। उन्होंने यह भी सीखा कि जबकि परमेश्वर का ज्ञान सबसे छिपे कोनों तक पहुँचता है, उसके न्याय से बचने के लिए छिपाव का सहारा लेना व्यर्थ है।
फ्रांसीसी में, “C'est folie de chercher couverture et deguisement pour eschapper son jugement et l'abuser;” “उसके न्याय से बचने और उसे धोखा देने के लिए आड़ और भेस खोजना मूर्खता है।” — सं.
24. “तब सब इस्राएलियों समेत यहोशू” इत्यादि। आकान को दो कारणों से छावनी के बाहर ले जाया जाता है; पहला, कि छावनी प्राणदण्ड से दूषित और अशुद्ध न हो, (क्योंकि परमेश्वर सदा यह चाहता था कि वैध दण्ड देने में भी मनुष्यत्व का कुछ चिह्न बना रहे,) और दूसरा, कि प्रजा के बीच कोई अशुद्धता न रह जाए। प्रजा के मन में लोहू बहाने के प्रति अधिक घृणा उत्पन्न करने के लिए छावनी के बाहर दण्ड देने की रीति थी: परन्तु अब देह से एक सड़ा हुआ अंग काट दिया जाता है, और छावनी अशुद्धता से शुद्ध की जाती है। हम देखते हैं कि यह उदाहरण स्मरणीय बन गया, क्योंकि उसी से उस स्थान का नाम पड़ा।
यदि कोई इस दण्ड की कठोरता से विचलित होकर ठोकर खाए, तो उसे सदा इसी बात पर वापस लाना चाहिए, कि यद्यपि हमारी बुद्धि परमेश्वर के न्यायों से असहमत हो, तौभी हमें पवित्र नम्रता और संयम की लगाम से अपनी ढिठाई को रोकना चाहिए, और जो कुछ हमें अच्छा न लगे उसे अस्वीकार नहीं करना चाहिए। यह कठोर, वरन् बर्बर और निर्दयी प्रतीत होता है कि छोटे-छोटे बच्चे, बिना किसी दोष के, क्रूर प्राणदण्ड के लिए घसीटे जाएँ, कि वे पत्थरवाह किए और जलाए जाएँ। गूँगे पशुओं के साथ ऐसा ही व्यवहार होना उतना विचित्र नहीं, क्योंकि वे मनुष्यों के लिए सृजे गए थे, और इसलिए उचित ही अपने स्वामियों की नियति के भागी होते हैं। इसलिए जो कुछ आकान के पास था वह सब सहभागी के रूप में उसके साथ नष्ट हो गया; परन्तु फिर भी पिता के अपराध के लिए बच्चों को पत्थरवाह करना और जलाना एक क्रूर पलटा प्रतीत होता है; और यहाँ परमेश्वर, उसके विपरीत जो वह यहेजकेल के द्वारा घोषित करता है, माता-पिता के कारण बच्चों को खुले रूप से दण्ड देता है। परन्तु यह कैसे है कि वह किसी निर्दोष को नष्ट नहीं करता, और फिर भी पितरों के पापों का दण्ड बच्चों को देता है, यह मैंने संक्षेप में तब समझाया था जब मैं यरीहो नगर के सामूहिक विनाश, और सब आयु के लोगों के अन्धाधुन्ध संहार के विषय में बोल रहा था। जो शिशु और बच्चे तब तलवार से मारे गए, उन पर हम ऐसे विलाप करते हैं मानो वे अनुचित रूप से मारे गए हों, क्योंकि उनका कोई प्रकट दोष न था; परन्तु यदि हम विचार करें कि परमेश्वर का ज्ञान मनुष्य की बुद्धि की किसी भी सम्भव पहुँच से कितना अधिक गहरा जाता है, तो हम ढिठाई और अत्यधिक घमण्ड के वश में होकर अपने आप को किसी खाई की ओर दौड़ाने के बदले उसके आदेश को मान लेंगे। निश्चय ही आकान के पुत्र किसी अन्धे बैर के कारण निर्दयता से नहीं मारे गए। वे न केवल परमेश्वर के हाथ की रचना थे, वरन् उनके शरीर पर लेपालकपन का अचूक चिह्न, खतना, अंकित था; तौभी वह उन्हें मृत्यु के योग्य ठहराता है। यहाँ हमारे लिए इसके सिवाय और क्या रह जाता है कि हम अपनी निर्बलता को स्वीकार करें और उसकी अगम्य युक्ति के अधीन हो जाएँ? हो सकता है कि मृत्यु उनके लिए औषधि सिद्ध हुई हो; परन्तु यदि वे त्यागे हुए थे, तो दण्ड-आज्ञा समय से पहले नहीं हो सकती थी।
यह भी जोड़ा जा सकता है कि जो जीवन परमेश्वर ने दिया है, उसे वह जब चाहे ले सकता है, और रोग के द्वारा उतना ही जितना किसी अन्य रीति के द्वारा। कोई जंगली पशु एक शिशु को पकड़कर फाड़ डालता है; एक साँप दूसरे को अपने विषैले दंश से नष्ट कर देता है; एक पानी में गिर जाता है, दूसरा आग में, तीसरा धाय के नीचे दबकर मर जाता है, चौथा गिरते हुए पत्थर से कुचल जाता है; वरन् कुछ को तो ज्योति पर आँखें खोलने तक नहीं दिया जाता। यह निश्चित है कि इन सब मृत्युओं में से कोई भी परमेश्वर की इच्छा के बिना नहीं होती। परन्तु इस विषय में उसकी कार्य-रीति पर प्रश्न उठाने का साहस कौन करेगा? यदि कोई मनुष्य ऐसा करने को इतना पागल भी हो, तो उससे क्या लाभ होगा? हमें तो यह दृढ़ता से मानना चाहिए कि उसकी आज्ञा से केवल वे ही नष्ट होते हैं जिन्हें उसने मृत्यु के लिए ठहराया था। आकान के बैलों, गदहों और भेड़-बकरियों की गिनती से हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वह पर्याप्त धनी था, और इसलिए दरिद्रता ने उसे अपराध के लिए प्रेरित नहीं किया। इसलिए इसे उसके अतृप्त लोभ का प्रमाण समझना चाहिए कि उसने चुराई हुई वस्तुओं का लालच किया, उपयोग के लिए नहीं, वरन् विलास के लिए।
25. “तब यहोशू ने कहा” इत्यादि। यह फटकार अत्यधिक कठोर प्रतीत होती है; मानो उसका अभिप्राय उस अभागे मनुष्य को उन्मत्त पागलपन तक पहुँचा देना था, जबकि उसे तो उसे धीरज धरने का उपदेश देना चाहिए था। मुझे कोई सन्देह नहीं कि उसने प्रजा के लिए ऐसा कहा, जिससे सब के लिए एक लाभदायक उदाहरण प्रस्तुत हो; और इसलिए मेरा निष्कर्ष यह है कि वह आकान को निराशा में डुबोना नहीं चाहता था, परन्तु केवल उसके व्यक्तित्व में यह दिखाना चाहता था कि परमेश्वर की कलीसिया को कष्ट देना कितना घोर अपराध है। तौभी हो सकता है कि अभिमानी आकान ने शिकायत की हो कि उसका प्रायश्चित, जिससे वह समझता था कि उसने अपने आप को भली-भाँति उऋण कर लिया है, ग्रहण नहीं किया गया, और यहोशू ने उसके हठ को सुधारने या तोड़ने के उद्देश्य से उसके विरुद्ध इतनी कटुता से फटकार की। यह प्रश्न संकेत करता प्रतीत होता है कि वह वाद-विवाद कर रहा था, और जब वह परमेश्वर को न्यायी के रूप में पुकारता है, तो वह मानो एक हठीले मनुष्य का मुँह बन्द कर रहा है। सारी प्रजा के द्वारा पत्थर फेंकना घृणा का एक सामूहिक चिह्न था, जिसके द्वारा उन्होंने घोषित किया कि जिस अपराध का वे इस प्रकार पलटा ले रहे थे उसमें उनका कोई भाग नहीं था, और कि वे उससे घृणा करते थे। पत्थरों का ढेर कुछ तो आनेवाली पीढ़ियों के लिए स्मारक के रूप में था, और कुछ इसलिए कि यदि वह स्थान खाली छोड़ दिया जाता, तो कोई असावधानी से वहाँ सोने या चाँदी के कण न बटोर ले। क्योंकि यद्यपि प्रभु ने पहले आज्ञा दी थी कि यरीहो का सोना उसे अर्पित किया जाए, तौभी वह अपने पवित्रस्थान को चोरी की कमाई से अशुद्ध होने नहीं देता।
ये उत्तम टिप्पणियाँ हर निष्पक्ष मन को सन्तुष्ट करने के लिए भली-भाँति उपयुक्त हैं, न केवल इस अत्यन्त उल्लेखनीय प्राणदण्ड के स्वरूप के विषय में, वरन् उसकी स्वीकार की हुई कठोरता के होते हुए भी उसकी उपयुक्तता और पूर्ण न्यायसंगतता के विषय में भी। तौभी कई व्याख्याकार असन्तुष्ट बने रहते हैं, और इसे अपने विचारों के अधिक अनुरूप बनाने के लिए, सूक्ष्म और खींचतान भरी आलोचना के द्वारा इसके कुछ भागों को व्याख्या से उड़ा देने का प्रयत्न करते हैं। यह प्रक्रिया बहुत सफल न पाकर, वे असाधारण अनुमानों के द्वारा उसकी कमी पूरी करने का यत्न करते हैं। पहले, आलोचना के विषय में, यह कहा जाता है कि प्रभु यहोशू को जो निर्देश देता है (पद 10-15), उनमें उसे किसी व्यक्ति को मृत्युदण्ड देने का अधिकार नहीं मिलता, सिवाय उस एक के जो वास्तव में अपराध करनेवाला पाया जाए। जब इस मत के विरोध में 15वें पद के शब्द, “वह और जो कुछ उसका हो,” उद्धृत किए जाते हैं, तो उत्तर यह दिया जाता है कि इस अभिव्यक्ति का अर्थ आवश्यक रूप से उस मनुष्य, उसके पशुओं और अन्य सम्पत्ति से अधिक नहीं है, और इसलिए सम्भव है कि उसमें उसका परिवार, ठीक अर्थ में, अर्थात् उसके घराने के लोग, सम्मिलित न रहे हों। एक और आलोचना, जो इससे भी अधिक असाधारण है, ध्यान देने योग्य भी न होती यदि उसे ग्रोशियस जैसे प्रतिष्ठित नाम का समर्थन न मिला होता, जो इस बात पर बल देता है कि केवल आकान ही वास्तव में मृत्यु को प्राप्त हुआ, यद्यपि उसके बच्चे वध-स्थान तक ले जाए गए थे और … पद, जिसमें कहा गया है कि “सब इस्राएलियों ने उसको (आकान को) पत्थरवाह किया, और उनको आग में जला दिया;” अर्थात्, जैसा वह समझाता है, केवल आकान को पत्थरवाह किया, और फिर उसके मृत शरीर को, और उसके पशुओं और अन्य वस्तुओं को, जो “उनको” शब्द से सूचित हैं, जला दिया। उस आलोचना के, जिसे इस घटना ने जन्म दिया है, ये नमूने हैं, और उनका गम्भीर खण्डन करना पाठक का लगभग अपमान होगा। जिन अनुमानों का हमने उल्लेख किया है, वे भी उतने ही असंगत हैं। उनमें से एक “साइक्लोपीडिया ऑफ़ बिब्लिकल लिटरेचर” में “आकान” लेख के अन्तर्गत दिया गया है, और क्योंकि लेखक ने उसे गढ़ा भी प्रतीत होता है और उस पर गर्व भी करता प्रतीत होता है, इसलिए उचित है कि उसे उसी के शब्दों में दिया जाए; — “हम यह अनुमान अधिक पसन्द करते हैं कि वे (आकान का परिवार) अन्धाधुन्ध जनता के पलटे के उन अचानक आवेगों में से किसी एक के द्वारा उस दण्ड में सम्मिलित कर लिए गए, जिनकी ओर यहूदी लोग अत्यधिक प्रवृत्त थे, और जिन्हें, इस प्रसंग में, यहोशू किसी भी ऐसे अधिकार से, जिसका वह ऐसी परिस्थितियों में प्रयोग कर सकता था, नियन्त्रित करने में समर्थ न होता।” — सं. फ्रांसीसी में, “Combien qu'il se peut faire, qu'Achan estant fier se soit plaint de ce qu'on ne se contentoit pas de la reparation, et payement qu'il avoit fait, par lequel il pensoit s'estre bien acquitte, et avoir grand devoir;” “यद्यपि हो सकता है कि आकान ने इस बात की शिकायत की हो कि लोग उस क्षतिपूर्ति और भुगतान से सन्तुष्ट न थे जो उसने किया था, और जिसके द्वारा वह समझता था कि उसने अपने आप को भली-भाँति उऋण कर लिया है, और एक बड़ा कर्तव्य पूरा किया है।” — सं.
