यहोशू की पुस्तक पर टीका · अध्याय 5

यहोशू 5

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यहोशू 5

यहोशू 5:1-9

1. जब यरदन के पश्चिम की ओर रहनेवाले एमोरियों के सब राजाओं ने,

1. Fuit autem quum audissent omnes reges Aemorrhaei qui erant trans Jordanem ad Occidentem, et omnes reges Chananaei, qui juxta mare, quod siccasset Jehova aquas Jordanis a facie filiorum Israel donec transirent, liquefactum fuit cor eorum neque fuit amplius in eis, Spiritus a facie filiorum Israel. और समुद्र के पास रहनेवाले कनानियों के सब राजाओं ने यह सुना कि यहोवा ने इस्राएलियों के सामने से यरदन का जल तब तक सुखा रखा जब तक हम पार न हो गए, तब इस्राएलियों के कारण उनका मन पिघल गया, और उनके जी में जी न रहा।

2. उस समय यहोवा ने यहोशू से कहा, तेज़ छुरियाँ बनवाकर दूसरी बार इस्राएलियों का फिर से खतना करा दे।

2. Eo tempore dixit Jehova ad Josuam, Fac tibi cultros acutos, et iterum circuncide filios Israel secundo.

3. तब यहोशू ने तेज़ छुरियाँ बनवाकर खलड़ियों नामक टीले पर इस्राएलियों का खतना कराया।

3. Et fecit sibi Josue cultros acutos, circunciditque filios Israel in colle praeputiorum.

4. और यहोशू ने जो खतना कराया, उसका कारण यह है: जितने लोग मिस्र से निकले थे, अर्थात् जितने पुरुष, वरन् सब योद्धा, वे सब मिस्र से निकलने के बाद जंगल में मार्ग ही में मर गए थे।

4. Haec autem est causa cur circunciderit Josue: Universus populus qui egressus fuerat ex Aegypto, masculi omnes viri bellatores mortui erant in deserto in itinere posteaquam egressi erant ex Aegypto.

5. जो लोग मिस्र से निकले थे उन सब का तो खतना हो चुका था; परन्तु जितने लोग जंगल में

5. Nam circuncisus fuerat totus populus qui egressus est, at totum populum, qui natus fuerat in deserto in itinere, postquam egressi erant ex Aegypto, non circunciderant. मार्ग में, मिस्र से निकलने के बाद, उत्पन्न हुए थे, उनका खतना उन्होंने नहीं किया था।

6. क्योंकि इस्राएली चालीस वर्ष तक जंगल में फिरते रहे, जब तक कि सारे योद्धा लोग, जो मिस्र से निकले थे, नष्ट न हो गए, क्योंकि उन्होंने यहोवा की बात न मानी थी; उनसे यहोवा ने शपथ खाकर कहा था कि जो देश देने की शपथ यहोवा ने उनके पूर्वजों से खाई थी कि वह हमें देगा, अर्थात् जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, वह देश वह उन्हें नहीं दिखाएगा।

6. Nam quadraginta annis ambulaverunt filii Israel per desertum, donec consumeretur universa gens virorum bellatorum, qui egressi fuerant ex Aegypto, qui non audierant vocem Jehovae, quibus juraverat Jehova quod non ostenderet terram de qua juraverat Jehova patribus eorum, se daturum illis terram fluentem lacte et melle.

7. और उनके पुत्र, जिन्हें उसने उनके स्थान पर खड़ा किया था, उनका खतना यहोशू ने किया; क्योंकि वे खतनारहित थे, इसलिए कि मार्ग में उनका खतना नहीं किया गया था।

7. Filios itaque eorum quos substituit in locum ipsorum circuncidit Josue, quia incircuncisi erant: neque enim eos circunciderat in itinere.

8. और जब वे सारी प्रजा का खतना कर चुके, तब वे चंगे हो जाने तक छावनी में अपने-अपने स्थान पर रहे।

8. Quum autem fuit circuncisus universus populus, manserunt in loco suo in castris donec sanarentur.

9. और यहोवा ने यहोशू से कहा, आज मैंने मिस्र की नामधराई को तुम पर से लुढ़का दिया है। इस कारण उस स्थान का नाम

9. Dixit Jehova ad Josuam, Hodie devolvi opprobrium Aegypti a vobis. Et vocavit nomen loci illius Gilgal, usque in hunc diem. आज के दिन तक गिलगाल कहलाता है।

1. “और जब ऐसा हुआ” इत्यादि। परमेश्वर की भयानक सामर्थ्य के बोध का उन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे चकित हो गए और आतंक से मूर्छित-से हो गए; परन्तु उसने उनके मन को इस ओर नहीं झुकाया कि वे उस विपत्ति का कोई उपाय खोजें। उनका मन इस अर्थ में पिघल गया कि युक्ति और बल से रहित होकर वे हाथ-पाँव न हिला सके; परन्तु हठ के विषय में वे पहले के समान ही कठोर-हृदय बने रहे। हम अन्यत्र देख चुके हैं कि अविश्वासी, भय से मारे जाने पर भी, परमेश्वर से जूझना नहीं छोड़ते, और गिरते-गिरते भी स्वर्ग पर उग्रता से आक्रमण करते रहते हैं। इसलिए जिस भय को उन्हें सावधानी की ओर प्रेरित करना चाहिए था, उसका इसके सिवा और कोई फल न हुआ कि वह उन्हें सिर के बल आगे धकेलता गया। तौभी प्रजा के निमित्त वे ऊपर से भयभीत किए गए, ताकि विजय अधिक सहजता से प्राप्त हो, और इस्राएली यह देखकर हियाव बाँधें कि उनका पाला ऐसे शत्रु से पड़ा है जो पहले ही टूट चुका और घबराहट से मारा हुआ है। इस प्रकार परमेश्वर ने उनकी दुर्बलता पर दया की, मानो उसने बाधाएँ हटाकर मार्ग खोल दिया हो, क्योंकि वे पहले ही प्रमाणित कर चुके थे कि वे अन्यथा उचित से कहीं अधिक आलसी और कायर हैं। अतः सारांश यह है कि संग्राम आरम्भ होने से पहले ही शत्रु उस आतंक के द्वारा तितर-बितर हो चुके थे जो उस आश्चर्यकर्म की चर्चा ने उनमें उत्पन्न किया था।

2. “उस समय यहोवा ने कहा” इत्यादि। यह बहुत ही विचित्र, वरन् लगभग अनर्थ-सा प्रतीत होता है कि खतना इतने लम्बे समय तक छोड़ा रहा, विशेषकर इसलिए कि जिन लोगों को प्रतिदिन चेतावनियाँ मिल रही थीं, उन्हें भक्ति के अभ्यासों को साधारण से अधिक यत्न के साथ बनाए रखना उचित था। वह उस लेपालकपन का चिह्न था जिसके कारण उन्हें अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त हुई थी। और यह निश्चित है कि जब वे अत्यन्त संकट में पड़े थे और अत्याचार के नीचे कराह रहे थे, तब भी वे सदा अपने बालकों का खतना करते रहे। हम यह भी जानते हैं कि परमेश्वर ने कितनी कठोरता से धमकी दी थी कि जो कोई आठवें दिन को बीत जाने देगा, उससे वह पलटा लेगा। यदि मिस्र में इस विधि की उपेक्षा हुई होती, तो उनकी असावधानी किसी सीमा तक क्षमा के योग्य होती, क्योंकि उस समय परमेश्वर की वाचा मानो पुरानी पड़कर लुप्त-सी हो गई प्रतीत होती थी। परन्तु अब, जब वाचा को स्थिर करने में परमेश्वर की सच्चाई फिर से जगमगा उठी है, तब अपनी ओर से यह गवाही न देने का कि वे परमेश्वर की प्रजा हैं, उनके पास क्या बहाना हो सकता था?

टीकाकार जो सफ़ाई प्रस्तुत करते हैं, वह सर्वथा निःसार है। मैं मानता हूँ कि वे निरन्तर हथियारबन्द रहते थे, और उन्हें कभी निश्चित नहीं होता था कि कब कूच करना पड़ेगा। परन्तु मैं इससे यह निष्कर्ष निकालना भूल समझता हूँ कि उन्हें एक दिन का भी अवकाश न था, और कि कोमल शिशुओं का खतना करना क्रूरता होती जबकि थोड़े ही समय बाद छावनी को उठाना पड़ता। कोई भी बात उनके लिए इतनी भारी नहीं होनी चाहिए थी कि वे अब्राहम से कही गई बात की तिरस्कारपूर्वक अवहेलना करें (उत्पत्ति 17:14): जिस प्राणी का खतना न हुआ हो, वह अपने लोगों में से नाश किया जाए। परन्तु यदि खतने में प्राण का जोखिम था, तो सबसे अच्छा और एकमात्र उपाय यही था कि परमेश्वर के पितृवत् प्रबन्ध पर भरोसा रखा जाए, जो निश्चय ही अपनी आज्ञा को शिशुओं के लिए प्राणघातक न होने देता। संक्षेप में, संकट के भय से इसका छोड़ा जाना अविश्वास के सिवा और किसी कारण से उत्पन्न नहीं हो सकता था। परन्तु यदि यह निश्चित भी होता कि शिशु संकट में पड़ेंगे, तौभी परमेश्वर की आज्ञा माननी ही चाहिए थी, क्योंकि वाचा की वह मुहर, जिसके द्वारा वे कलीसिया में ग्रहण किए जाते थे, सौ प्राणों से भी अधिक बहुमूल्य थी। और यदि किसी भिन्न कारण से प्रेरित न हुआ होता, तो मूसा ऐसा कायरतापूर्ण आचरण कभी सहन न करता। इसके अतिरिक्त, यद्यपि यह बात सन्देहपूर्ण है, तौभी मेरा अनुमान है कि उन्होंने प्रस्थान के ठीक पहले ही दिन से अपने बालकों का खतना करना नहीं छोड़ा, वरन् तब छोड़ा जब उन्हें अपनी ही हठधर्मिता के कारण अपने पग पीछे लौटाने पड़े। और इस रीति से धर्मत्याग और दण्ड, दोनों ठीक-ठीक व्यक्त हो जाते हैं। क्योंकि यह नहीं कहा गया कि खतना इसलिए फिर से आरम्भ किया गया कि भटकने के दिनों में स्थान के निरन्तर बदलते रहने से पहले यह असम्भव था, वरन् इसलिए कि चालीस वर्ष बीतने आवश्यक थे, जब तक वे दुष्ट धर्मत्यागी, जिन्होंने स्वयं को प्रतिज्ञा किए हुए निज भाग से काट डाला था, नष्ट न हो जाएँ।

यहाँ दिए गए कारण पर ध्यान देना चाहिए, अर्थात् यह कि इस्राएली तब तक जंगल में भटकते रहे जब तक वह सारी पीढ़ी, जिसने परमेश्वर के पीछे चलने से इन्कार किया था, मिट न गई। मेरी समझ में इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उस सारी अवधि में खतने का प्रयोग शाप अथवा त्याग के चिह्न के रूप में बन्द रहा। यह सच है कि दण्ड निर्दोषों पर पड़ा, परन्तु यह उचित था कि पिता उन्हीं के व्यक्तित्व में ताड़ना पाएँ, मानो परमेश्वर आनेवाले समय के लिए उन्हें त्याग रहा हो। जब उन्होंने देखा कि उनकी सन्तान अपवित्र लोगों और परदेशियों से किसी बात में भिन्न नहीं, तब उन्हें इस बात का स्पष्ट प्रमाण मिल गया कि वे स्वयं किस योग्य थे।

तौभी यहाँ एक असंगति उठती प्रतीत होती है: पहली, यह कि जबकि वे दोषी ठहराए गए थे, उनकी सन्तान तुरन्त अनुग्रह में ग्रहण कर ली गई; और दूसरी, यह कि स्वयं उनके लिए भी क्षमा की आशा छोड़ी गई; और विशेषकर यह कि वे उन अन्य संस्कारों से वंचित नहीं किए गए, जिनके भागी वे इसी आधार पर हो सकते थे कि वे अपवित्र जातियों से अलग किए गए हैं।

मैं मानता हूँ कि प्रभु उन्हें त्यागते हुए साथ ही यह भी घोषित करता है कि वह उनकी सन्तान पर कृपालु होगा; परन्तु जब तक वे सब स्वयं नष्ट न हो गए, तब तक अपनी सन्तान में त्याग का चिह्न देखते रहना एक हितकारी ताड़ना थी। क्योंकि परमेश्वर ने अपने अनुग्रह के प्रतिज्ञा-चिह्न को केवल कुछ समय के लिए वापस ले लिया, और उसे मानो उनकी मृत्यु तक ताले में बन्द रखा। इसलिए यह दण्ड ठीक-ठीक उन बालकों पर नहीं डाला गया जो बाद में उत्पन्न हुए, वरन् उसका प्रभाव एक स्थगन के समान था, मानो परमेश्वर यह प्रकट कर रहा हो कि उसने खतने को कुछ समय के लिए टाल दिया है, ताकि वह अपवित्र न किया जाए, परन्तु वह उसे नया करने के अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था।

यदि कोई यह आपत्ति करे कि खतनारहित दशा में फसह मनाना अनुचित था, तो मैं मानता हूँ कि सामान्य व्यवस्था के अनुसार ऐसा ही था। क्योंकि फसह और बलिदानों में केवल वे ही सम्मिलित किए जाते थे जो परमेश्वर की उपासना में दीक्षित हो चुके थे; ठीक वैसे ही जैसे आज प्रभु-भोज की विधि केवल उन्हीं के लिए सामान्य है जो बपतिस्मा के द्वारा कलीसिया में ग्रहण किए जा चुके हैं। परन्तु प्रभु कुछ समय के लिए सामान्य नियम को बदल सकता था, और जिनसे उसने खतना ले लिया था, उन्हें अन्य पवित्र विधियों का भागी होने दे सकता था। इस प्रकार प्रजा एक बात में तो बहिष्कृत की गई, और तौभी इस बीच उसे ऐसी उपयुक्त सहायताएँ दी गईं जो उसे निराशा में गिरने से रोकें; ठीक वैसे ही जैसे कोई पिता अपने पुत्र से अप्रसन्न होकर मानो उसे भगा देने के लिए मुट्ठी उठाए, और साथ ही दूसरे हाथ से उसे थामे रहे, — धमकियों और मार से उसे डराए, और तौभी उससे अलग होना न चाहे। मुझे यही कारण प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने प्रजा को लेपालकपन के विशेष प्रतिज्ञा-चिह्न से वंचित करते हुए भी उन्हें अन्य विधियों से वंचित करना न चाहा।

यदि यह आपत्ति की जाए कि स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रस्थान करने के बाद मार्ग में किसी का खतना नहीं किया गया, तो मेरा उत्तर यह है कि संक्षेप के विचार से सब बातें ठीक-ठीक नहीं कही गईं, और तौभी प्रसंग से यह समझा जा सकता है कि खतनारहित केवल वे ही रहे जो उस विद्रोह के बाद उत्पन्न हुए थे। क्योंकि कहा गया है कि उनके पुत्रों का, जिन्हें परमेश्वर ने उनके स्थान पर खड़ा किया था, यहोशू ने खतना किया। इससे प्रकट होता है कि उस समय हठीले विद्रोहियों का स्थान भरने के लिए एक नई प्रजा रची गई। इसके अतिरिक्त यह एक दुःखद और कठोर परीक्षा थी कि परमेश्वर ने प्रजा का खतना तब तक कराना न चाहा जब तक वे चारों ओर से शत्रुओं से घिर न गए। निश्चय ही यरदन पार करने से पहले बाशान देश में, जो वहाँ के निवासियों के विनाश से शान्त कर दिया गया था, यह विधि पूरी करना अधिक सुरक्षित और अधिक सुविधाजनक होता। परन्तु प्रभु तब तक ठहरा रहता है जब तक वे शत्रुओं के बीच बन्द न हो जाएँ और उनकी लालसा और हिंसा के आगे खुले न पड़ जाएँ, मानो वह जान-बूझकर उन्हें मृत्यु के मुँह में डाल रहा हो; क्योंकि घाव से दुर्बल हुए वे सब तुरन्त हार जाते, और लगभग बिना प्रतिरोध के घात किए जाते। क्योंकि यदि ऐसी ही परिस्थितियों में (उत्पत्ति 34) याकूब के दो पुत्र शकेम नगर में बलपूर्वक घुसकर उसके नागरिकों को घात करने के बाद उसे लूट सके, तो पड़ोसी जातियों के लिए इस्राएलियों पर, जब वे इस प्रकार घायल थे, आक्रमण करना और उनका सर्वसंहार करना कितना अधिक सहज होता!

अतः, जैसा मैं कह चुका हूँ, यह एक अत्यन्त कठोर परीक्षा थी, और इसीलिए जिस तत्परता से इसे स्वीकार किया गया, वह और भी अधिक प्रशंसा के योग्य है। तौभी ऐसा प्रतीत होता है कि यह स्थान ईश्वरीय बुद्धि ने जान-बूझकर चुना था, ताकि वे आज्ञा मानने को अधिक तत्पर हों। यदि यही आज्ञा यरदन के उस पार दी जाती, तो यह भय था कि वे हताश हो जाएँ, और इस प्रकार बीच में पड़े विलम्ब के कारण फिर से देश में प्रवेश करने से पीछे हट जाएँ। परन्तु अब, जब वे मानो परमेश्वर के हाथ से शुभ लक्षणों के साथ अधिकार में पहुँचा दिए गए थे, और इस एक बाधा के हट जाने से उन्होंने सफलतापूर्वक युद्ध करने की दृढ़ आशा बाँध ली थी, तो यह आश्चर्य की बात नहीं कि वे उससे कहीं अधिक स्वेच्छा से आज्ञा मानते हैं जितनी वे तब मानते जब उन्हें ऐसा अनुपम बल न मिला होता। प्रतिज्ञा किए हुए देश का दर्शन मात्र ही उन्हें और अधिक प्रेरणा देता होगा, जब उन्होंने समझा कि वे फिर से परमेश्वर के लिए पवित्र किए गए हैं, ताकि उनकी खतनाहीनता उस पवित्र देश को अशुद्ध न करे।

9. “और यहोवा ने यहोशू से कहा” इत्यादि। कुछ लोग मिस्र की नामधराई का अर्थ यह बताते हैं कि खतने के अभाव ने उन्हें मिस्रियों के समान बना दिया था, अर्थात् अपवित्र और कलंक से चिह्नित; मानो यह कहा गया हो कि जब उन पर फिर से यह चिह्न अंकित किया गया, जिससे वे अशुद्ध जातियों से अलग पहचाने जाएँ, तब वे फिर से परमेश्वर की निज सम्पत्ति बना दिए गए। अन्य लोग इसे कर्तृवाच्य अर्थ में समझते हैं, कि अब मिस्री उनका ठट्ठा न करेंगे, मानो परमेश्वर ने उन्हें धोखा दिया हो। इस अर्थ को बहुत दूर की कौड़ी समझकर मैं बिना संकोच अस्वीकार करता हूँ। कुछ और लोग यह समझते हैं कि अब उन पर उस जाति के देवताओं की उपासना करने का झूठा आरोप न रहेगा। मैं तो इसका अर्थ यह समझता हूँ कि वे एक घृणित दोषारोपण से मुक्त किए गए, जिसके बोझ तले वे अन्यथा दबे रहते। जिस राजा के शासन में वे रहते थे, उसका जूआ उतार फेंकना और उससे विद्रोह करना अपमानजनक बात थी। इसके अतिरिक्त, जब वे यह कहते थे कि परमेश्वर अन्यायपूर्ण अत्याचार का पलटा लेनेवाला है, तब उन पर यह ताना कसना सहज था कि वे अपने आचरण पर परदा डालने के लिए परमेश्वर के नाम का बहाना मात्र बनाते हैं। अतः वे भगोड़े समझे जा सकते थे, यदि यह कलंक खतने की दुहाई के द्वारा मिटाया न जाता, जिसके द्वारा मिस्र में उतरने से पहले ही ईश्वरीय चुनाव उनके शरीर में मुहरबन्द किया गया था। इसलिए प्राचीन वाचा के नवीनीकरण से यह स्पष्ट कर दिया गया कि वे वैध अधिकार के विरुद्ध विद्रोही नहीं थे, और न उतावली में अपनी ही मनमानी से निकल भागे थे, वरन् उनकी स्वतन्त्रता परमेश्वर ने लौटाई थी, जिसने बहुत पहले ही उन्हें अपनी विशेष रक्षा में ले लिया था।

नामधराई के दूर किए जाने से ही उस स्थान को उसका नाम मिला। क्योंकि जो यह सोचते हैं कि काटी गई खलड़ी को गिलगाल कहा गया, क्योंकि वह एक प्रकार का घेरा था, वे शाब्दिक अर्थ को छोड़कर एक अत्यन्त अनावश्यक कल्पना का सहारा लेते हैं; जबकि यह पूर्णतया स्पष्ट है कि वह स्थान “लुढ़काना” कहलाया, क्योंकि वहाँ परमेश्वर ने अपनी प्रजा पर से उस नामधराई को लुढ़का दिया जो अन्यायपूर्वक उन पर लगी हुई थी। योसेफ़स ने जो “स्वतन्त्रता” का अर्थ अपनाया है, वह व्यर्थ और हास्यास्पद है, और यह प्रकट करता है कि वह इब्रानी भाषा से भी उतना ही अनजान था जितना न्यायशास्त्र से।

यहोशू 5:10-15

10. और इस्राएलियों ने गिलगाल में डेरे डाले, और महीने के चौदहवें दिन को साँझ के समय यरीहो के मैदानों में फसह माना।

10. Itaque castrametati sunt filii Israel in Gilgal, et fecerunt Paesah quartadecima die mensis ad vesperum in campestribus Jericho.

11. और फसह के दूसरे दिन उन्होंने उस देश के पुराने अन्न में से अखमीरी रोटियाँ और उसी दिन भुना हुआ अन्न खाया।

11. Et comederunt e fructu terrae postridie Paesah infermentata, et polentam ipsomet die.

12. और जिस दिन उन्होंने उस देश का पुराना अन्न खाया, उसके दूसरे दिन मन्ना बन्द हो गया; और इस्राएलियों को फिर कभी मन्ना न मिला, परन्तु उस वर्ष उन्होंने कनान देश की उपज में से खाया।

12. Et cessavit man postridie postquam comederunt e frumento terrae; neque fuit ultra filiis Israel man, sed comederunt e fructu terrae Chanaan eo anno.

13. जब यहोशू यरीहो के पास था, तब उसने अपनी आँखें उठाकर क्या देखा कि हाथ में नंगी तलवार लिए हुए एक पुरुष उसके सामने खड़ा है; और यहोशू ने उसके पास जाकर उससे पूछा, क्या तू हमारी ओर का है, या हमारे बैरियों की ओर का?

13. Contigit autem quum esset Josue apud Jericho, ut levaret oculos suos ac aspiceret: et ecce vir stabat contra eum, in cujus manu erat gladius evaginatus: et ivit Josue ad eum, dixitque illi, Ex nostris es? An ex adversariis nostris?

14. उसने उत्तर दिया, नहीं; परन्तु मैं यहोवा की सेना का प्रधान होकर अभी आया हूँ। तब यहोशू ने पृथ्वी पर मुँह के बल गिरकर दण्डवत् किया, और उससे कहा, अपने दास के लिए मेरे प्रभु की क्या आज्ञा है?

14. Et dixit Non: sed sum princeps exercitus Jehovae: nunc veni. Et cecidit Josue in faciem suam ad terram, et adoravit, dixitque ei: Quid Dominus meus loquitur ad servum suum?

15. यहोवा की सेना के प्रधान ने यहोशू से कहा, अपनी जूती पाँव से उतार डाल, क्योंकि जिस स्थान पर तू खड़ा है वह पवित्र है। तब यहोशू ने वैसा ही किया।

15. Et dixit princeps exercitus Jehovae ad Josuam: Solve calceamentum tuum e pedibus tuis: quia locus super quem stas, sanctitas est. Et ita fecit Josue.

10. “और इस्राएलियों ने फसह माना” इत्यादि। यहाँ कहा गया है कि फसह नियत दिन पर मनाया गया, यद्यपि कुछ लोग ऐसे हैं जो यह सोचते हैं कि प्रयुक्त शब्द इस बात का संकेत करते हैं कि यह प्रथा असामान्य थी। इससे वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि खतने के समान वह भी चालीस वर्ष की अवधि तक बाधित रहा, क्योंकि खतनारहित लोगों का किसी पवित्र पर्व में भाग लेना अनुचित होता। इस मत की पुष्टि के लिए वे यह बताते हैं कि दूसरे वर्ष के आरम्भ के बाद फसह मनाए जाने का वर्णन हम कहीं नहीं पढ़ते। परन्तु यह सम्भव नहीं जान पड़ता कि जिसे परमेश्वर ने हाल ही में सदा के लिए ठहराया था (निर्गमन 12:42), वह अचानक त्याग दिया गया हो। क्योंकि उनसे कहा गया था, यह वह रात है जिसे इस्राएली अपनी पीढ़ी-पीढ़ी में मानें। तो यह कितनी असंगत बात होती कि यह प्रथा, जिसे सब युगों में माना जाना था, दो ही वर्षों में पुरानी पड़कर लुप्त हो जाती! और फिर, इतने थोड़े समय में एक हाल के उपकार की स्मृति को गाड़ देना कितनी निर्दयता होती!

परन्तु यह कहा जाता है कि खतने के अभाव ने बड़ी संख्या में लोगों को अवश्य ही रोके रखा होगा, ताकि वह भेद अपवित्र न हो; क्योंकि उसकी स्थापना के समय यह घोषित किया गया था, कोई खतनारहित पुरुष उसमें से न खाने पाए। इसका उत्तर मैं पहले ही दे चुका हूँ कि यह एक असाधारण विशेषाधिकार था, क्योंकि इस्राएली व्यवस्था से मुक्त कर दिए गए थे। क्योंकि यह निश्चित है कि वे बलिदान चढ़ाते और व्यवस्था के अनुसार उपासना के अन्य अंगों का पालन करते रहे, यद्यपि यह अवैध था, जब तक कि व्यवस्था द्वारा ठहराई गई रीति में से कुछ ईश्वरीय अधिकार से छूट न दी गई हो। यह निश्चित है कि अशुद्ध लोगों को निवास-स्थान के आँगन में प्रवेश करने से मना किया गया था, और तौभी इस्राएली, खतनारहित रहते हुए, वहाँ बलिदान चढ़ाते थे, और इस प्रकार वही करते थे जो फसह के पशु के बलि किए जाने के तुल्य था। इसलिए उन्हें सहनशीलता के कारण वह करने की अनुमति दी गई जो व्यवस्था के नियम के अनुसार करना उचित न था।

“व्यवस्था से मुक्त।” लातीनी में, “Lege soluti.” फ्रांसीसी में, “Ont este exemptez et dispensez de ce a quoy la Loy les assujettissoit;” “जिस बात के अधीन व्यवस्था उन्हें करती थी, उससे वे छूट और रियायत पा चुके थे।” — सं.

मूसा ने फसह के दूसरी बार मनाए जाने का जो उल्लेख किया है (गिनती 9), वह एक भिन्न उद्देश्य से है, अर्थात् प्रजा की असावधानी और आलस्य की परोक्ष रूप से भर्त्सना करने के लिए, जो यदि स्मरण न दिलाई जाती तो पहले वर्ष के अन्त में उस पवित्र वार्षिक पर्व को न मनाती। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने यह घोषित किया था कि वे सब युगों में प्रति वर्ष अपने छुटकारे की स्मृति को नया करते रहें, तौभी वर्ष के अन्त से पहले ही वे इतने भुलक्कड़ हो गए थे कि उस कर्तव्य को पूरा करने में ढीले पड़ गए थे। अकारण नहीं कि उन्हें एक नई सूचना के द्वारा प्रेरित किया जाता है, क्योंकि वे अपनी ओर से पर्याप्त ध्यान नहीं देते थे। इसलिए वह स्थल यह प्रमाणित नहीं करता कि बाद में फसह का प्रयोग बाधित रहा; इसके विपरीत, उससे कुछ सम्भावना के साथ यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह प्रति वर्ष मनाया जाता था; क्योंकि प्रभु वर्ष के अन्त के निकट उसके पालन को पहले से ही स्मरण कराता है, और उनसे कहता है कि वे भविष्य में उसके लिए सावधानी से प्रबन्ध करें, और जो आज्ञा उन्हें दी गई थी उससे कभी न हटें।

11. “और उन्होंने पुराना अन्न खाया” इत्यादि। उन्होंने तभी पहली बार गेहूँ की रोटी खाना आरम्भ किया या नहीं, यह बहुत स्पष्ट नहीं है। क्योंकि वे ऐसे देश में रह चुके थे जो बंजर नहीं था, और पर्याप्त उपजाऊ था। कम से कम उन दो राजाओं के प्रदेशों में निवासियों के निर्वाह के लिए पर्याप्त अन्न था। यह मानना युक्तिसंगत नहीं लगता कि इस्राएलियों ने वहाँ पाए गए अन्न को केवल व्यर्थ पड़े-पड़े सड़ने और नष्ट होने दिया। और मुझे कोई सन्देह नहीं कि उन्होंने बलिदानों का बचा हुआ मांस खाया। अतः यह पूर्णतया सम्भव है कि उन्होंने गेहूँ की रोटी से पूरी तरह परहेज़ नहीं किया, और तौभी अपना अभ्यस्त भोजन नहीं छोड़ा। क्योंकि जो देश दसवें भाग को दिया गया था, वह सारी भीड़ के लिए पर्याप्त भोजन नहीं दे सकता था, क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि जब मूसा ने उसमें केवल ढाई गोत्रों को बसाया, तब उचित अनुमान लगाया गया था। इसलिए अब तक बारहों गोत्रों को पर्याप्त भोजन नहीं मिला था, विशेषकर इसलिए कि देश युद्ध से उजड़ चुका था, और इस्राएली, जिनके लिए छावनी छोड़ना सुरक्षित न था, खेती-बारी में मन नहीं लगा सकते थे। इस प्रकार जब तक अधिक भरपूर आपूर्ति प्राप्त न हो जाए, तब तक उनका पेट भरने के लिए मन्ना आवश्यक था। यह कनान देश में हुआ, और तब, उसी के अनुसार, वे साधारण भोजन पर लौट आए। परन्तु उन्होंने उस दिन तक इसे क्यों टाला, यह ज्ञात नहीं, सिवाय इसके कि सम्भवतः उनका घाव भरने के बाद कुछ दिन अन्न बटोरने में बिताने पड़े, जबकि धर्म उन्हें रोटी पकाने की अनुमति नहीं देता था, कहीं ऐसा न हो कि वे सब्त को तोड़ें। परन्तु यद्यपि वह विश्राम पवित्र था, तौभी इन परिस्थितियों से कि उन्होंने उतावली की, हम यह समझते हैं कि आटा पहले से ही तैयार किया गया होगा, क्योंकि वे एक ही दिन में उसे पीसकर पका नहीं सकते थे।

ये टिप्पणियाँ कैल्विन के मत को उसके सबसे अनुकूल प्रकाश में रखती हैं; परन्तु दूसरी ओर इसके विरुद्ध दृढ़ता से ये तर्क दिए जाते हैं: 1. कि खतनारहित व्यक्ति के द्वारा फसह खाया जाना स्पष्ट रूप से वर्जित था (निर्गमन 12:48)। 2. कि जंगल में भटकने के समय उसके पालन से, कम से कम अप्रत्यक्ष रूप से, इन शब्दों में छूट दी गई है: “जब तुम उस देश में जिसे यहोवा अपने कहने के अनुसार तुम को देगा प्रवेश करो, तब वह काम किया करना।” (निर्गमन 12:25)। 3. कि सीनै पर्वत पर फसह का मनाया जाना एक विशेष आज्ञा के पालन में था, और उसके बिना वह न होता। 4. यह धारणा कि जंगल में बलिदान चढ़ाए गए, आमोस 5:25 के साथ असंगत होने के कारण संदिग्ध ठहराई जाती है। यह भी जोड़ा जा सकता है कि खतना करने की आज्ञा, जो स्पष्ट रूप से निकट आनेवाले फसह के उत्सव की तैयारी के रूप में दी गई थी, यह संकेत करती प्रतीत होती है कि पहले दोनों विधियों की एक-सी उपेक्षा हुई थी। यह भी निश्चय ही कठिन, यदि असम्भव नहीं, रहा होगा कि जंगल में रहते हुए सारी प्रजा के लिए फसह की अखमीरी रोटी बनाने के निमित्त पर्याप्त मात्रा में आटा प्राप्त किया जाए। — सं.

जो भी हो, जब तक उनकी आवश्यकता की पूर्ति अपेक्षित थी, तब तक प्रभु ने उन्हें भोजन-सामग्री दी। अचानक, और ठीक उसी क्षण मन्ना का बन्द हो जाना परमेश्वर की करुणा का एक और प्रमाण बन गया होगा, क्योंकि इससे यह प्रकट हुआ कि मन्ना एक अस्थायी प्रबन्ध था, जो बादलों से इतना नहीं जितना पितृवत् प्रबन्ध से उतरा था। इसके अतिरिक्त यह स्पष्ट है कि इसे पिछले वर्ष की उपज के विषय में समझना चाहिए, और इसके सम्बन्ध में कोई प्रश्न उठाना अनावश्यक है; क्योंकि चालू वर्ष की उपज पर, जबकि वह अभी ठीक से पकी भी न हो, टूट पड़ना अत्यधिक उतावली होती, और इतनी बड़ी भीड़ की आपूर्ति के लिए पर्याप्त अन्न बटोरने को पूरा एक महीना भी कठिनाई से पर्याप्त होता। मैं नहीं समझ पाता कि व्याख्याकार इतने स्पष्ट विषय पर इतना परिश्रम क्यों करते हैं।

13. “जब यहोशू” इत्यादि। यहाँ हमें एक उल्लेखनीय दर्शन का वृत्तान्त मिलता है, जिसके द्वारा यहोशू को बड़ा प्रोत्साहन और साहस मिला। क्योंकि यद्यपि वह अपने पद का निर्वाह पूरे उत्साह से कर रहा था, तौभी एक अतिरिक्त प्रेरणा का दिया जाना निरर्थक न था। तौभी स्वर्गदूत केवल उसी के निजी हित के लिए प्रकट नहीं हुआ, वरन् सारी प्रजा की पुष्टि के लिए; वरन् प्रभु ने और आगे दृष्टि की, ताकि वह आनेवाली पीढ़ियों को उस करुणा के और भी दृढ़ प्रमाण दे, जिस पर कभी उचित रूप से विचार नहीं किया गया। क्योंकि यद्यपि वे बड़े ऊँचे शब्दों में घमण्ड करते थे कि परमेश्वर के हाथ ने उन्हें एक पवित्र देश में लगाया है, तौभी सब आश्चर्यकर्मों के द्वारा भी वे कठिनाई से यह सच्चे मन से स्वीकार करने को प्रेरित होते थे कि वे वहाँ परमेश्वर के आश्रित प्रजाजनों के रूप में बसाए गए हैं। इसलिए यह दर्शन, प्रदान की गई ईश्वरीय करुणा के विषय में कोई सन्देह न छोड़कर, सब युगों के लिए लाभदायक रहा होगा। यह कहा जाना कि उसने अपनी आँखें उठाईं, दर्शन की निश्चितता को दृढ़ करने के लिए है, ताकि कोई यह न समझे कि उसकी आँखें किसी क्षणिक छाया-रूप से मात्र चौंधिया गई थीं।

जब वह दृश्य पहली बार सामने आया, तब उसने अवश्य भय उत्पन्न किया होगा; क्योंकि सम्भव है कि यहोशू उस समय अकेला था, चाहे वह प्रार्थना करने के लिए लोगों की दृष्टि से हटकर एकान्त में गया हो, चाहे नगर का भेद लेने के लिए। मैं दूसरी बात की ओर अधिक झुकता हूँ, कि वह यह जाँचने के लिए अलग गया था कि नगर पर कहाँ से आक्रमण किया जाए, ताकि कठिनाई दूसरों को हतोत्साहित न कर दे। यह निश्चित प्रतीत होता है कि उसके साथ कोई अनुचर न था, क्योंकि दर्शन को केवल वही देखता है; और इसमें कोई सन्देह नहीं कि यदि उसकी भेंट किसी शत्रु से होती, तो वह लड़ने को तैयार था। परन्तु वह अपना प्रश्न ऐसे पूछता है मानो किसी मनुष्य से बात कर रहा हो, क्योंकि उत्तर से ही उसे ज्ञात होता है कि यह एक स्वर्गदूत है। यह सन्देह दर्शन को और अधिक विश्वसनीय बनाता है, क्योंकि जिस मनुष्य से वह बात करता है उसे देखने से वह धीरे-धीरे स्वर्गदूत को पहचानने तक पहुँचाया जाता है। साथ ही ये शब्द संकेत करते हैं कि वह कोई साधारण स्वर्गदूत नहीं, वरन् विशेष श्रेष्ठता वाला था। क्योंकि वह अपने को यहोवा की सेना का प्रधान कहता है, यह ऐसा शब्द है जिसे केवल उसकी चुनी हुई प्रजा ही नहीं, वरन् स्वर्गदूतों को भी सम्मिलित करनेवाला समझा जा सकता है।

तौभी पहला मत अधिक ठीक है, क्योंकि परमेश्वर कोई अनोखी बात उत्पन्न नहीं करता, वरन् वही ठहराता है जो हम पहले पढ़ चुके हैं कि उसने मूसा के लिए किया था। और हम जानते हैं कि स्वयं मूसा ने इस अनुग्रह को और सब अनुग्रहों से बढ़कर माना; और ठीक ही माना, क्योंकि वहाँ परमेश्वर ने अपनी महिमा खुले और घनिष्ठ रूप से प्रकट की। इसी कारण उसे बिना भेद के स्वर्गदूत भी कहा गया है, और सनातन परमेश्वर की उपाधि से भी विभूषित किया गया है। इस तथ्य का एक योग्य साक्षी पौलुस है, जो स्पष्ट घोषित करता है कि वह मसीह था (1 कुरिन्थियों 10:4)। और स्वयं मूसा ने मध्यस्थ के व्यक्तित्व में परमेश्वर को उपस्थित जानकर ग्रहण किया। क्योंकि जब बछड़ा बनाए जाने के बाद परमेश्वर घोषित करता है (निर्गमन 33:2-3) कि वह अब प्रजा का अगुवा न रहेगा, तब साथ ही वह प्रतिज्ञा करता है कि वह अपने स्वर्गदूतों में से एक को देगा, परन्तु केवल एक को, मानो स्वर्गदूतों की सेना के सामान्य समूह में से लिया गया हो। मूसा इससे बचने के लिए गिड़गिड़ाकर विनती करता है, स्पष्टतः इसलिए कि यदि मध्यस्थ हटा लिया जाता, तो उसे यह आशा न रहती कि परमेश्वर कृपालु होगा। इस प्रकार यह ईश्वरीय अनुग्रह का एक विशेष प्रतिज्ञा-चिह्न था कि कलीसिया का वह प्रधान और सिर, जिसका मूसा अभ्यस्त था, अब सहायता करने को उपस्थित था। और वास्तव में ईश्वरीय लेपालकपन मध्यस्थ के हाथ के सिवा और किसी रीति से पक्का नहीं किया जा सकता था।

14. “उसने कहा, नहीं; परन्तु प्रधान होकर” इत्यादि। यद्यपि यह इन्कार प्रश्न के दोनों भागों पर समान रूप से लागू होता है, अर्थात् यह कि वह न इस्राएली था, न कनानी, और इस प्रकार यह उसके नश्वर मनुष्य होने के इन्कार के तुल्य था, तौभी यह दूसरे भाग पर, अर्थात् प्रश्न के उस भाग पर जिसमें यहोशू ने पूछा था कि क्या वह शत्रुओं में से है, अधिक उचित रूप से लागू होता प्रतीत होता है। तौभी यह थोड़े महत्त्व की बात है; मुख्य बात यह समझना है कि वह उस चुनी हुई प्रजा की अध्यक्षता करने आया था जिसे वह आदरपूर्वक यहोवा की सेना कहता है। उसका अपने को परमेश्वर से भिन्न बताना व्यक्तिगत भेद को सूचित करता है, परन्तु तत्त्व की एकता को नष्ट नहीं करता।

हम कह चुके हैं कि मूसा की पुस्तकों में यहोवा का नाम प्रायः उस अध्यक्ष स्वर्गदूत को दिया गया है, जो निःसन्देह परमेश्वर का एकलौता पुत्र था। वह वास्तव में सच्चा परमेश्वर है, और तौभी व्यवस्था के प्रबन्ध के अनुसार मध्यस्थ के व्यक्तित्व में वह परमेश्वर से छोटा है। इस विषय पर प्राचीन लेखक जो शिक्षा देते हैं, उसे मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ, — कि जब मसीह प्राचीन काल में मानव रूप में प्रकट हुआ, तो वह उस भेद की पूर्वझलक थी जो बाद में तब प्रकट हुआ जब परमेश्वर देह में प्रकट हुआ। तौभी हमें यह कल्पना करने से सावधान रहना चाहिए कि मसीह ने उस समय देहधारण किया; क्योंकि पहली बात तो यह है कि हम कहीं नहीं पढ़ते कि परमेश्वर ने समय पूरा होने से पहले अपने पुत्र को देह में भेजा; और दूसरी यह कि मसीह को, जहाँ तक वह मनुष्य था, दाऊद का पुत्र होना आवश्यक था। परन्तु जैसा यहेजकेल में कहा गया है (यहेजकेल 1), वह केवल मनुष्य का-सा रूप था। वह वास्तविक शरीर था या केवल बाहरी आकार, इस पर विवाद करना अनावश्यक है, क्योंकि इस विषय पर किसी विशेष मत पर आग्रह करना अनुचित प्रतीत होता है।

मूल पाठ में निर्गमन 32:37 का सन्दर्भ दिया गया था, जो अमान्य है। निश्चय ही अब जिस स्थल का सन्दर्भ दिया गया है, उसमें स्वर्गदूत का उल्लेख है, और यह भी कि परमेश्वर अब इस्राएल की प्रजा के “आगे-आगे न चलेगा”; परन्तु यदि कैल्विन के मन में केवल स्वर्गदूत ही था, तो सन्दर्भ निर्गमन 32:34 का अभिप्रेत हो सकता था। तौभी यह अध्याय 32 भर में घटी घटनाओं का एक सामान्य सन्दर्भ भी हो सकता है (पद 2-3 में बछड़े का बनाया जाना, पद 10 में परमेश्वर का यह कहना कि वह उनका अगुवा न रहेगा, और पद 34 में स्वर्गदूत का उल्लेख)। — fj, sg.

फ्रांसीसी में, “Mais comme le premier qui se rencontrera;” “परन्तु मानो जो कोई पहला सामने आ जाए।” — सं.

फ्रांसीसी अनुवाद यह जोड़ता है, “C'est a dire d'Eternel;” “अर्थात् सनातन का।” — सं.

अब केवल यह प्रश्न शेष रहता है कि यहोवा की सेना का प्रधान अभी आने की बात कैसे कह सकता है, जबकि उसने अपने को सौंपी गई प्रजा को त्यागा नहीं था, और हाल ही में यरदन के पार उतरने में अपनी उपस्थिति का अनुपम प्रदर्शन किया था। परन्तु पवित्रशास्त्र की सामान्य रीति के अनुसार कहा जाता है कि परमेश्वर हमारे पास आता है जब हमें वास्तव में उसकी सहायता का अनुभव कराया जाता है, जो अनुभव से प्रकट न होने पर दूर प्रतीत होती है। इसलिए यह ठीक ऐसा है मानो वह आनेवाले संग्रामों में अपनी सहायता प्रस्तुत कर रहा हो, और अपने आगमन के द्वारा यह प्रतिज्ञा कर रहा हो कि युद्ध का परिणाम शुभ होगा। जो दण्डवत् यहोशू ने किया, उससे निश्चितता के साथ यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यहोशू ने मसीह को स्पष्ट रूप से पहचानकर उसे ईश्वरीय आदर दिया; परन्तु यह पूछकर कि “अपने दास के लिए मेरे प्रभु की क्या आज्ञा है?” वह उसे वह सामर्थ्य और अधिकार देता है जो केवल परमेश्वर ही का है।

आधुनिक टीकाकारों में से कई ने, जिनमें ग्रोशियस भी है, यह मत रखा है कि जो व्यक्ति इस प्रकार प्रकट हुआ, वह केवल एक सृजा हुआ स्वर्गदूत था। इसमें उन्होंने केवल यहूदी रब्बियों के पदचिह्नों का अनुसरण किया है, जो यह मानने से सन्तुष्ट न होकर कि वह एक स्वर्गदूत था, इससे भी आगे बढ़कर यह निश्चित कर बैठे कि वह कौन-सा विशेष स्वर्गदूत था। लगभग एकमत होकर वे घोषित करते हैं कि वह मीकाएल था, यद्यपि वे अपने मत के समर्थन में दानिय्येल के बारहवें अध्याय के पहले पद [दानिय्येल 12:1] से अधिक दृढ़ कुछ प्रस्तुत नहीं कर पाते, जिसमें कहा गया है कि “उसी समय मीकाएल नाम बड़ा प्रधान, जो तेरे जाति-भाइयों का पक्ष करने को खड़ा रहता है, उठेगा।” यहाँ कैल्विन द्वारा समर्थित और आरम्भिक मसीही कलीसियाई पिताओं द्वारा सामान्यतः अपनाया गया अधिक ठोस मत ओरिजेन ने भली-भाँति व्यक्त किया है, जो इस पुस्तक पर अपने छठे प्रवचन में कहता है, “यहोशू न केवल यह जानता था कि वह परमेश्वर की ओर से है, वरन् यह भी कि वह परमेश्वर है। क्योंकि यदि उसने उसे परमेश्वर न पहचाना होता, तो वह दण्डवत् न करता। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह के सिवा यहोवा की सेना का प्रधान और कौन है?” यदि यह स्वीकार किया जाए कि जो दण्डवत् यहोशू यहाँ करता है, उसे एक सृष्ट प्राणी दूसरे से उचित रूप से ग्रहण कर सकता है, वरन् यों कहें कि अधिकारपूर्वक माँग सकता है, तो ईश्वरीय उपासना के विषय में हमारी धारणाएँ बुरी तरह छिन्न-भिन्न हो जाएँगी। — सं.

मूल पाठ में उत्पत्ति 26:17 का सन्दर्भ था, जो छपाई की स्पष्ट भूल है। — fj.

15. “अपनी जूती पाँव से उतार डाल” इत्यादि। दर्शन को और अधिक पवित्रता प्रदान करने के लिए वह महान स्वर्गदूत श्रद्धा और भय के चिह्न के रूप में माँग करता है कि यहोशू अपनी जूतियाँ उतारे। मूसा बताता है (निर्गमन 3:5) कि यही आज्ञा उसे सीनै पर्वत पर दी गई थी, और इसका और कोई कारण न था सिवाय इसके कि वहाँ प्रभु ने अपनी महिमा प्रकट की। क्योंकि एक स्थान दूसरे से अधिक पवित्र नहीं हो सकता, जब तक परमेश्वर विशेष रूप से उसे ऐसा बनाने की कृपा न करे। इसी प्रकार याकूब पुकार उठता है (उत्पत्ति 28:17) कि जिस स्थान पर उसने परमेश्वर को अधिक निकटता से जाना, वह परमेश्वर का भवन है, एक भयानक स्थान, और स्वर्ग का फाटक। इसलिए यहाँ जब परमेश्वर अपने पवित्र दास को जूतियाँ उतारने की आज्ञा देता है, तो वह इस विधि के द्वारा अपनी उपस्थिति की वास्तविकता की साक्षी देता है, और दर्शन को और अधिक महत्त्व देता है; इसलिए नहीं कि पाँवों का नंगा होना अपने आप में परमेश्वर की उपासना में कोई मूल्य रखता है, वरन् इसलिए कि मनुष्यों की दुर्बलता को इस प्रकार की सहायताओं से सहारा पाने की आवश्यकता होती है, ताकि वे श्रद्धा के लिए अपने को और भली-भाँति जागृत और तैयार कर सकें। इसके अतिरिक्त, जैसे परमेश्वर अपनी उपस्थिति से उन स्थानों को पवित्र करता है जिनमें वह प्रकट होता है, वैसे ही मुझे यह सम्भव प्रतीत होता है कि “पवित्र भूमि” यह अभिव्यक्ति अंशतः कनान देश की श्रेष्ठता की प्रशंसा करती है, जिसे परमेश्वर ने अपने निवास और अपनी शुद्ध उपासना के स्थान के लिए चुना था। इसीलिए अनेक स्थलों में उसे “उसका विश्रामस्थान” कहा गया है (भजन संहिता 95:11, और भजन संहिता 132:14)। पद के अन्त में यहोशू की आज्ञाकारिता की प्रशंसा की गई है, ताकि आनेवाली पीढ़ियाँ उसके उदाहरण से उस देश में शुद्ध भक्ति को बनाए रखना सीखें। इस प्रकार यहाँ एक प्रकार की मौन तुलना या विरोधाभास प्रतीत होता है, जिसके द्वारा कनान देश की सब अन्य देशों से बढ़कर महिमा की गई है।

मूल पाठ में भजन संहिता 132:11 का सन्दर्भ था, जो छपाई की स्पष्ट भूल है। — fj.

यहाँ वर्णित घटना उन प्रमुख कारणों में से एक है जिनसे फ़िलिस्तीन के लिए सामान्यतः प्रयुक्त “पवित्र देश” नाम निकला है। — सं.

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