यहोशू की पुस्तक पर टीका · अध्याय 16

यहोशू 16

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यहोशू 16

यहोशू 16:1-10

1. फिर यूसुफ की सन्तान का भाग चिट्ठी डालने से ठहराया गया; उसकी सीमा यरीहो के पास की यरदन नदी से, अर्थात् पूर्व की ओर यरीहो के जल से आरम्भ होकर उस जंगल तक पहुँची जो यरीहो से बेतेल के पहाड़ी देश में होकर ऊपर जाता है;

1. Egressa est autem sors filiis Joseph a Jordane Jericho, ad aquas Jericho ad orientem, ad desertum quod ascendit a Jericho in montem Beth-el.

2. फिर वह बेतेल से निकलकर लूज को गई, और एरेकियों की सीमा होते हुए अतारोत पर जा पहुँची;

2. Egrediturque a Beth-el in Luz, et hinc pertransit ad terminum ArchiAtoroth.

3. और पश्चिम की ओर यपलेतियों की सीमा तक उतरकर नीचेवाले बेथोरोन की सीमा तक, और गेजेर तक पहुँची; और उसका अन्त समुद्र पर हुआ।

3. Postea ascendit ad mare, ad terminum Japhleti usque ad terminum Beth-horon inferiorem et usque ad Gazer, suntque exitus ejus ad mare.

4. इस प्रकार मनश्शे और एप्रैम नामक यूसुफ की सन्तान ने अपना अपना भाग लिया।

4. Itaque haereditatem acceperunt ilii Joseph, Manasses et Ephraim.

5. एप्रैमियों की सीमा उनके कुलों के अनुसार यह ठहरी; अर्थात् उनके भाग की सीमा पूर्व की ओर अत्रोतदार से आरम्भ होकर ऊपरवाले बेथोरोन तक पहुँची;

5. Fuit autem terminus filiorum Ephraim per familias suas: fuitinquam, terminus haereditatis eorum ad orientem ab Atroh-Addar, usque ad Beth-horon superiorem.

6. और वह सीमा उत्तर की ओर के मिकमतात से होकर समुद्र की ओर निकली; और पूर्व की ओर मुड़कर तानतशीलो तक पहुँची, और उसके पास से पूर्व की ओर होते हुए यानोह तक गई;

6. Et exit terminus ille ad mare, ad Michmethah ab aquilone: et circumit terminus ad orientem, ad Thaanath-siloh, et transit illam ab oriente ad Janoah.

7. फिर यानोह से वह अतारोत और नारा को उतरी, और यरीहो के पास पहुँचकर यरदन पर निकली।

7. Et descendit a Janoah in Ataroth, et Naarath, et pervenit in Jericho, egrediturque ad Jordanem.

8. फिर वह सीमा तप्पूह से निकलकर पश्चिम की ओर काना के नाले तक गई, और उसका अन्त समुद्र पर हुआ। एप्रैमियों के गोत्र का भाग उनके कुलों के अनुसार यही ठहरा।

8. A Thappuah pergit terminus ad mare ad torrentem arundinis, suntque exitus ejus ad mare, haec est hereditas tribus filiorum Ephraim per familias suas.

9. और मनश्शेइयों के भाग के बीच भी कितने नगर, सब के सब अपने अपने गाँवों समेत, एप्रैमियों के लिये अलग किए गए थे।

9. Et urbes separatae filiis Ephraim in medio haereditatis filiorum Manasse, omnes urbes, et villae earum.

10. परन्तु जो कनानी गेजेर में बसे थे उनको उन्होंने नहीं निकाला; इसलिये वे कनानी आज के दिन तक एप्रैमियों के बीच में बसे हैं, और कर देकर दास के समान सेवा करते हैं।

10. Neque expulerunt Chananaeum habitantem in Gazer. Itaque habitavit Chananaeus in medio Ephraim usque ad diem hanc, et fuit tributo serviens.

1. “फिर यूसुफ की सन्तान का भाग चिट्ठी डालने से ठहराया गया” इत्यादि। पवित्र लेखक पहले यह बताता है कि यूसुफ की दोनों सन्तानों को कौन-सा भाग मिला, और फिर एप्रैम के भाग का वर्णन करता है। तौभी यह विचित्र बात है कि जब मनश्शे का आधा गोत्र पहले ही यरदन के पार बसाया जा चुका था, तब शेष आधे के वर्णन में एप्रैम गोत्र के सारे भाग के वर्णन से अधिक शब्द लगाए गए हैं, यद्यपि एप्रैम की जनसंख्या अधिक थी, और वह उचित रूप से अपने लिए बड़े देश का दावा करता था। परन्तु मनश्शे के वंशजों के विषय में जो अधिक विस्तृत वर्णन दिया गया है, उसका कारण विशेष परिस्थितियाँ हैं। पहले, लेखक दोहराता है कि किस प्रकार उन्हें बाशान देश में बिना चिट्ठी के बसने का स्थान दिया गया था। दूसरे, वह उल्लेख करता है कि यहोशू ने उस आज्ञा की पुष्टि की जो मूसा ने ईश्वरीय अधिकार से सलोफाद की बेटियों के विषय में दी थी। अतः जब एप्रैम की सीमाओं के विषय में कोई सन्देह न था, और किसी विवाद का कोई भय न था, तब उनके बँटवारे का केवल संक्षेप में उल्लेख कर दिया गया है।

परन्तु यहाँ एक नया प्रश्न उठता है। जब पहिलौठे का अधिकार मनश्शे से हटकर एप्रैम को मिल गया था, तब उस गोत्र के वंशजों ने, जिसे पद में प्रधानता प्राप्त थी, मनश्शे की सन्तान के बीच अपने नगर कैसे पाए? क्योंकि इस रीति से तो उनकी दशा हीनतर प्रतीत होती है। मेरा स्पष्टीकरण यह है: जब मनश्शे का भाग उसकी जनसंख्या के अनुपात में बहुत अधिक विस्तृत था, तब हिसाब लगाया गया, और एप्रैम गोत्र के उचित भाग को पूरा करने के लिए कुछ नगर उसमें से घटा दिए गए; इसका अर्थ यह नहीं कि वे मनश्शे की सन्तान के साथ मिला दिए गए, कि उनके बीच मानो माँगे हुए अधिकार से अपने निवास रखें, वरन् उनकी सीमाएँ केवल मनश्शेइयों की ओर बढ़ा दी गईं, जिनके लिए इससे छोटा अधिकार-क्षेत्र पर्याप्त हो सकता था।

अध्याय के अन्त में एप्रैम की इस कायरता के लिए कड़ी भर्त्सना की गई है कि उसने गेजेर से कनानियों को नहीं निकाला। क्योंकि यदि वे उस देश पर, जो चिट्ठी के द्वारा उनके भाग में आया था, अपना अधिकार स्थापित करने के लिए वीरता और पूरे मन से आगे बढ़ते, तो विजय उनके हाथ में थी। इस प्रयत्न में कोई दुस्साहस न होता, क्योंकि चिट्ठी का निर्णय उतना ही मान्य था मानो स्वयं प्रभु ने स्वर्ग से अपना हाथ बढ़ाया हो। परन्तु उनका लज्जाजनक आलस्य और भी स्पष्ट रूप से प्रकट होता है, और उनका दोष इस बात से बहुत बढ़ जाता है कि उन्होंने उन लोगों को कर देनेवाले बना लिया जिनके साथ किसी भी प्रकार का समझौता करना उचित न था। अतः जब परमेश्वर ने अपनी प्रजा को स्पष्ट रूप से मना किया था कि वे उन जातियों के साथ किसी प्रकार का लेन-देन न करें, और सबसे बढ़कर उनके साथ ऐसी सन्धियाँ न करें जिनमें उनके क्षमादान और सुरक्षा की शर्तें ठहराई जाएँ, तब एप्रैमियों ने कर वसूल करके उससे कहीं अधिक गम्भीर पाप किया, जितना यदि वे बिना किसी सन्धि के उन्हें सह लेते।

लातीनी में, "Quasi precario." फ्रांसीसी में, "Comme par emprunt ou par prieres;" “मानो उधार से अथवा विनती से।” — सं.

यहाँ सेप्टुआजिंट (यूनानी अनुवाद) में एक लम्बा वाक्यांश जोड़ा गया है, जिसका आशय यह है कि कनानी एप्रैम में तब तक बसे रहे जब तक मिस्र का राजा फ़िरौन चढ़ न आया और उसने उस नगर को लेकर कनानियों, परिज्जियों और गेजेर के निवासियों को निकाल न दिया, और उसे अपनी बेटी को, (जिसका विवाह सुलैमान से हुआ था,) दहेज में न दे दिया। — सं.

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