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यहोशू 19
यहोशू 19:1-9
1. दूसरी चिट्ठी शिमोन के नाम पर, अर्थात् शिमोनियों के कुलों के अनुसार उनके गोत्र के नाम पर निकली; और उनका भाग यहूदियों के भाग के बीच में ठहरा।
1. Egressa est autem sors secunda ipsi Simeon, tribui filiorum Simeon per familias suas: et fuit haereditas eorum in medio haereditatis filiorum Jehuda.
2. उनके भाग में ये नगर थे, अर्थात् बेर्शेबा, अथवा शेबा, और मोलादा,
2. Fuitque eis in haereditate eorum Beer-seba, et Seba, et Moladah,
3. और हसर्शूआल, और बाला, और एसेम,
3. Et Hasar-sual, et Balah, et Asen,
4. और एलतोलद, और बतूल, और होर्मा,
4. Et Eltholad, et Bethul, et Hormah,
5. और सिकलग, और बेत्मर्काबोत, और हसर्सूसा,
5. Et Siclag, et Beth-Marcaboth, et Hasarsusa,
6. और बेतलबाओत, और शारूहेन; ये तेरह नगर और इनके गाँव;
6. Et Beth-Lebaoth, et Saruhen: urbes tredecim, et villae earum.
7. ऐन, रिम्मोन, एतेर, और आशान; ये चार नगर और इनके गाँव;
7. Aim, Rimmon, et Ether, et Asan: urbes quatuor, et villae earum.
8. और इन नगरों के चारों ओर के सब गाँव, बालत्बेर तक, जो दक्षिण देश का रामा है। शिमोनियों के गोत्र का भाग उनके कुलों के अनुसार यही ठहरा। 8. Et omnes villae quae erant per circuitus urbium istarum usque ad Baalath-beer, Ramath Australem. Ista est haereditas tribus filiorum Simeon per familias suas.
9. शिमोनियों का भाग यहूदियों के अंश में से दिया गया; क्योंकि यहूदियों का भाग उनके लिये बहुत अधिक था; इस कारण शिमोनियों का भाग उन्हीं के भाग के बीच में ठहरा।
9. De portione filiorum Jehuda facta fuit haereditas filiorum Simeon: erat enim portio filiorum Jehuda major ipsis; itaque haereditatem acceperunt filii Simeon in medio haereditatis eorum.
इसके बाद शिमोन के गोत्र की चिट्ठी निकली, किसी सम्मान के चिह्न के रूप में नहीं, वरन् अपमान के चिह्न के रूप में। याकूब ने शिमोन और लेवी के विषय में यह घोषणा की थी, “मैं उन्हें याकूब में अलग-अलग और इस्राएल में तितर-बितर कर दूँगा।” (उत्पत्ति 49:7) लेवी का दण्ड तो न केवल हलका किया गया, वरन् एक उत्तम प्रतिष्ठा में बदल दिया गया, क्योंकि उसके वंशज मानो पहरे के गुम्मटों पर बैठाए गए, कि प्रजा को भक्ति के मार्गों में बनाए रखें। परन्तु शिमोन के विषय में, जिस तितर-बितर किए जाने की भविष्यद्वाणी याकूब ने की थी, वह स्पष्ट रूप से तब पूरी हुई जब यहूदा के प्रदेश के भीतर के कुछ नगर उसके वंशजों को उनके निज भाग के लिये दे दिए गए। क्योंकि यद्यपि वे दूर-दूर नहीं भेजे गए, तौभी वे बिखरे हुए, और एक ऐसे देश में जो वास्तव में दूसरे का था, परदेशियों के समान बसे। अतः उस हत्याकाण्ड के कारण, जो उन्होंने क्रूरता से कम विश्वासघात के साथ नहीं किया था, वे भिन्न-भिन्न निवासों में अलग-अलग बसाए गए। इस रीति से पिता का दोष उसकी सन्तान पर डाला गया, और प्रभु ने उस दण्डाज्ञा को, जो उसने अपने दास को लिखवाई थी, वास्तविक घटना के द्वारा पक्का कर दिया। इससे चिट्ठी की सच्चाई भी स्पष्ट रूप से प्रमाणित हुई।
यहूदा के घराने से एक निश्चित अंश के निकाल लिए जाने की इस बात में हम फिर देखते हैं कि यद्यपि बाँटनेवालों ने न्याय का पालन करने का सावधानी से प्रयत्न किया था, तौभी वे भूल में पड़ गए थे, जिसे पता चलते ही सुधारने में उन्हें लज्जा न आई। और यद्यपि वे आत्मा के द्वारा चलाए जाते थे, तौभी उनका कुछ अंश में भूल कर बैठना कोई विचित्र बात नहीं, क्योंकि परमेश्वर कभी-कभी अपने सेवकों को विवेक के आत्मा से रहित छोड़ देता है, और भिन्न-भिन्न अवसरों पर उन्हें मनुष्यों के समान काम करने देता है, ताकि वे अपनी सूझ-बूझ पर अत्यधिक घमण्ड न करें। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि प्रजा को उसकी असावधानी और आत्मविश्वासपूर्ण उतावली का दण्ड मिला, क्योंकि उन्हें आरम्भ ही में अधिक ठीक-ठीक जाँच लेना चाहिए था कि प्रत्येक को कितनी भूमि उचित रूप से दी जा सकती है। यह करने में उन्होंने उपेक्षा की। उनकी अकुशल कार्य-विधि के कारण यहूदियों ने अनुपात से अधिक प्रदेश का संचय पा लिया था, और न्याय की माँग थी कि वे उसका एक भाग छोड़ दें। स्वयं उनके लिये भी यह अच्छा होता कि उनकी सीमाएँ एक ही बार में निश्चित रूप से ठहरा दी जातीं, बजाय इसके कि बाद में उन्हें एक कष्टदायक छिनाव सहना पड़ता। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक गोत्र ने यह व्यर्थ आशा पाल रखी थी कि उसके लोग दूर-दूर तक फैलकर बसेंगे, मानो देश का विस्तार असीम हो।
9. यहूदियों के अंश में से, इत्यादि। यहूदा के गोत्र को संयम की प्रशंसा मिलनी चाहिए, क्योंकि उसने यह विवाद नहीं किया कि पहले से उसे दिए गए निज भाग में से किसी अंश का निकाल लिया जाना अन्याय है। वे सहज ही परमेश्वर का नाम आगे कर सकते थे, और यह दावा कर सकते थे कि वह बसावट उन्हें केवल उसी के अधिकार से मिली है। परन्तु जब सब गोत्रों की सामान्य सहमति से यह ठहराया जाता है कि उन्हें इतना अधिक दिया गया है जितना वे दूसरों की हानि और क्षति के बिना अपने अधिकार में नहीं रख सकते, तब वे तुरन्त इस विषय पर विवाद करने के हर बहाने से हाथ खींच लेते हैं। और यह निश्चित है कि यदि उन्होंने परमेश्वर के अधिकार की दुहाई दी होती, तो वह झूठ और दुष्टता से होता; क्योंकि यद्यपि उनकी चिट्ठी उसके स्थान के विषय में परमेश्वर ही के द्वारा ठहराई गई थी, तौभी उसके विस्तार के विषय में भूल हो गई थी, क्योंकि उनकी सीमाएँ मानवीय निर्णय के द्वारा उचित से अधिक चौड़ी ठहराई गई थीं। इसलिये यह मानकर कि उन्हें वह देना अनुचित होता जिससे दूसरों की हानि हो, वे उसे स्वेच्छा से छोड़ देते हैं, और अपने उन भाइयों का प्रेम से स्वागत करते हैं जो अन्यथा बिना निज भाग के रह जाते; वरन् जिसे वे विवाद से परे अपना प्राप्त किया हुआ समझते थे, उसमें भी उनके साथ साझा करने को तैयार हो जाते हैं।
यहोशू 19:10-31
10. तीसरी चिट्ठी जबूलूनियों के कुलों के अनुसार उनके नाम पर निकली; और उनके भाग की सीमा सारीद तक पहुँची;
10. Ascendit autem sors tertia filiis Zabulon per familias suas: et fuit terminus haereditatis eorum usque ad Sarid.
11. और उनकी सीमा समुद्र की ओर, और मरला को चढ़कर दब्बेशेत को पहुँची, और योकनाम के सामने के नाले तक पहुँच गई;
11. Ascenditque terminus eorum ad mare: et Maralah, et pertingit ad Dabbaseth: pervenitque ad flumen quod est e regione Jocneam.
12. और सारीद से पूर्व की ओर सूर्योदय की दिशा में मुड़कर किसलोत्ताबोर की सीमा तक पहुँची, और वहाँ से दाबरात में निकली, और यापी को चढ़ गई;
12. Revertiturque a Sarid ad orientem, id est, ad ortum solis, ad terminum Chisloth-Thabor, et illinc egreditur ad Dobrath, et ascendit in Japhia.
13. और वहाँ से पूर्व की ओर आगे बढ़कर गथेपेर और इत्कासीन को गई, और रिम्मोन-मेतोआर में निकलकर नेआ तक पहुँची;
13. Inde praeterea transit ad orientem, ad ortum, ad Githah-Hepher, et ad Ihtah-casin: et illinc exit in Rimmon, et gyrat ad Neah:
14. और वह सीमा उत्तर की ओर से उसे घेरती हुई हन्नातोन तक पहुँची; और उसका अन्त यिप्तहेल की तराई में हुआ;
14. Gyrat item idem terminus ab aquilone ad Hannathon: suntque egressus ejus ad vallem Iphthael.
15. और कत्तात, और नहलाल, और शिम्रोन, और यिदला, और बेतलेहेम; ये बारह नगर अपने-अपने गाँवों समेत।
15. Et Catthath, et Nahalal, et Simron, et Idalah, et Bethlehem: urbes duodecim, et villae earum.
16. जबूलूनियों का भाग उनके कुलों के अनुसार यही ठहरा, अर्थात् अपने-अपने गाँवों समेत ये ही नगर।
16. Haec est haereditas filiorum Zabulon per familias suas: urbes istae, et villae earum.
17. चौथी चिट्ठी इस्साकार के नाम पर, अर्थात् इस्साकारियों के कुलों के अनुसार उनके नाम पर निकली।
17. Ipsi Issachar egressa est sors quarta, filiis inquam, Issachar per familias suas.
18. और उनकी सीमा यिज्रेल की ओर, और कसुल्लोत, और शूनेम,
18. Et fuit terminus eorum Jezrael, et Chesuloth, et Sunem,
19. और हपारैम, और शीओन, और अनाहरत,
19. Et Hapharaim, et Sion, et Anaharath,
20. और रब्बीत, और किश्योन, और एबेस,
20. Et Rabbith, et Cicion, et Abeth,
21. और रेमेत, और एनगन्नीम, और एनहद्दा, और बेत्पस्सेस तक थी;
21. Et Remeth, et Engannin, et Enhaddah, et Beth-passes.
22. और वह सीमा ताबोर, और शहसूमा, और बेतशेमेश तक पहुँची; और उनकी सीमा का अन्त यरदन पर हुआ; ये सोलह नगर अपने-अपने गाँवों समेत।
22. Et pervenit terminus in Thabor, et Sahasima, et Beth-semes: eruntque exitus termini eorum ad Jordanem: urbes sedecim, et villae earum.
23. कुलों के अनुसार इस्साकारियों के गोत्र का भाग नगरों और उनके गाँवों समेत यही ठहरा।
23. Haec est haereditas tribus filiorum Issachar per familias suas: urbes et villae earum.
24. पाँचवीं चिट्ठी आशेरियों के गोत्र के कुलों के अनुसार उनके नाम पर निकली।
24. Egressa est autem sors quinta tribui filiorum Aser per familias suas.
25. और उनकी सीमा में हेलकत, और हली, और बेतेन, और अक्षाप,
25. Fuitque terminus eorum Helcath, et Hali, et Bethen, et Achsaph,
26. और अलाम्मेल्लेक, और अमाद, और मिशाल थे; और वह पश्चिम की ओर कर्मेल तक, और शीहोर्लिब्नात तक पहुँची;
26. Et Alamelech, et Amad, et Misal, et pervenit in Carmel ad mare, et in Sihor Libnath.
27. और सूर्योदय की ओर मुड़कर बेतदागोन को गई, और जबूलून तक, और उत्तर की ओर यिप्तहेल की तराई तक, और बेतेमेक और नीएल तक पहुँची, और बाईं ओर काबूल पर निकली,
27. Et revertitur ad ortum solis in Beth-dagon, et pervenit in Zabulon, et in vallem Iphtahel ad aquilonem, et in Beth-emec, et Neel: et exit ad Chabul a sinistra.
28. और एब्रोन, और रहोब, और हम्मोन, और काना, यहाँ तक कि बड़े सीदोन तक;
28. Et Ebron, et Rehob, et Hamon, et Canah, usque ad Sidon magnam:
29. फिर वह सीमा मुड़कर रामा को, और सोर नामक गढ़वाले नगर तक गई; फिर सीमा होसा की ओर मुड़ी; और उसका अन्त अकजीब के देश के पास समुद्र पर हुआ;
29. Revertiturque terminus in Rama, usque ad urbem munitam petrae: inde revertitur terminus in Hosah: suntque exitus ejus ad mare a funiculo Achzib,
30. उम्मा भी, और अपेक, और रहोब; ये बाईस नगर अपने-अपने गाँवों समेत।
30. Et Ummah, et Aphec, et Rehob: urbes viginti duae, et villae earum.
31. कुलों के अनुसार आशेरियों के गोत्र का भाग अपने-अपने गाँवों समेत ये ही नगर ठहरे।
31. Haec est haereditas tribus filiorum Aser per familias suas: urbes istae, et villae earum.
10. तीसरी चिट्ठी निकली, इत्यादि। जबूलून की चिट्ठी में याकूब की भविष्यद्वाणी की स्पष्ट पूर्ति दिखाई देती है, जिसने पहले से कह दिया था कि वे समुद्र के तट पर बसेंगे। एक बूढ़े, एक निर्वासित ने, जो अपनी भूमि पर एक पैर भी नहीं रख सकता था, अपने पुत्र जबूलून के वंशजों के लिये समुद्र-तटवर्ती प्रदेश ठहरा दिया।
फ्रांसीसी में, “Estant un vieillard, povre banni, qui n'avoit pas un pied de terre a luy ou il peust marcher;” “एक बूढ़ा, दीन निर्वासित होकर, जिसके पास अपनी कहलाने योग्य एक पैर भर भूमि भी न थी जिस पर वह चल सके।” — सं.
इससे बढ़कर असंगत बात और क्या हो सकती थी? परन्तु अब, जब चिट्ठी उन्हें समुद्र-तटवर्ती प्रदेश देती है, तो उसके निर्णय की इससे अधिक स्पष्ट पुष्टि की इच्छा नहीं की जा सकती। यह ठीक ऐसा था मानो परमेश्वर स्वर्ग से दो बार गरज रहा हो। अतः जबूलून का गोत्र न तो अपनी इच्छा से और न मनुष्यों के मत से तट पर अधिकार करता है, वरन् एक ईश्वरीय व्यवस्था उनका निवास समुद्र से सटा हुआ ठहराती है। इस प्रकार, यद्यपि मनुष्यों ने भूल की, तौभी ज्योति अन्धकार में सदा उज्ज्वलता से चमकती हुई दिखाई दी। याकूब इससे भी आगे बढ़ता है, और जबूलून और इस्साकार के बीच स्पष्ट भेद करता है। पहला गोत्र दूर-दूर तक यात्रा करेगा, और व्यापार और वाणिज्य चलाएगा; दूसरा अपने तम्बुओं में रहकर विश्राम और स्थिर जीवन अपनाएगा। (उत्पत्ति 49:13-15) अतः सम्भव है कि जिस समुद्र-तट पर जबूलून बसा, वह बन्दरगाहों से युक्त और व्यापारिक आदान-प्रदान के विविध रूपों के लिये भली-भाँति उपयुक्त था; जबकि इस्साकारी अपनी ही उपज से सन्तुष्ट रहते थे, और उन फलों का उपभोग करते थे जिन्हें वे घर पर अपने ही परिश्रम और खेती से उपजाते थे।
जो लोग इन देशों से भली-भाँति परिचित समझे जाते हैं, वे पुष्टि करते हैं कि आशेर के गोत्र की भूमि अन्न में उपजाऊ थी। यह याकूब की भविष्यद्वाणी के शब्द और आशय दोनों से पूर्णतः मेल खाता है। (उत्पत्ति 49:20) इस तथ्य से कि केवल थोड़े ही नगरों का नाम लेकर उल्लेख किया गया है, हम यह अनुमान कर सकते हैं कि उस समय बहुत-से उजड़े हुए नगर थे जिनकी गिनती नहीं की गई; और इस दूसरे तथ्य से कि लोग सुविधापूर्वक बसे, हम यह भी अनुमान कर सकते हैं कि उन्होंने बहुत-से नगर बनाए, जिनसे, जैसा अन्य स्थलों से स्पष्ट है, देश सुशोभित था। और यह निश्चय ही प्रकट है कि यहाँ बँटवारे का केवल सार संक्षेप में दिखाया गया है, और इस प्रकार बहुत-सी बातें छोड़ दी गईं, जिनकी खोज करने से कोई धार्मिक भावना हमें नहीं रोकती, बशर्ते हम ऐसी अत्यधिक जिज्ञासा में न पड़ें जिसका कोई लाभदायक परिणाम न हो। इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि जिन्हें बीस, वरन् केवल सत्रह ही नगर दिए गए बताए जाते हैं, उनके प्रदेश अधिक विस्तृत थे। अतः यहाँ हमारे पास बँटवारे का केवल एक संक्षिप्त वर्णन है, जैसा वह नापनेवालों की सामान्य और अस्त-व्यस्त टिप्पणियों से लिया गया था।
इसके बाद नप्ताली की चिट्ठी का उल्लेख है, और वह उस गोत्र के स्वभाव और चाल-चलन से मेल खाती जान पड़ती है। क्योंकि याकूब ने गवाही दी थी, “नप्ताली छूटी हुई हरिणी है; वह सुन्दर बातें बोलता है।” इसी कारण वे एक ओर यहूदियों से सटे हुए, और अन्य ओरों से अपने भाइयों के घेरों से घिरे हुए प्रतीत होते हैं।
जबूलून के अधिकार में तट का भाग बहुत ही सीमित विस्तार का था, परन्तु उसमें अक्का की बड़ी और सुन्दर खाड़ी सम्मिलित थी, जो उत्तर में उस अन्तरीप से आरम्भ होती है जिस पर अक्का नगर बसा है, और दक्षिण में कर्मेल पर्वत की ऊँची चोटियों पर भव्य रीति से समाप्त होती है। — सं.
उसका अधिकांश भाग एक उपजाऊ और लहरदार मैदान था, जिसमें कोमल पहाड़ियों से विविधता आती थी, जो लियोन्टीज़ तथा अन्य धाराओं से भली-भाँति सींचा जाता था जिनका जल लबानोन की हिमाच्छादित चोटियों से आता था, और जो धीरे-धीरे ढलान के साथ समुद्र-तट के उस भाग तक जाता था जिस पर सोर और सीदोन के प्रसिद्ध नगर बसे थे। क्लार्क के अनुसार आशेर और जबूलून का मैदान इंग्लैंड के दक्षिणी जिलों से काफ़ी मिलता-जुलता था। — सं.
वास्तव में, यह कहे जाने में कि दान के गोत्र ने लेशेम को ले लिया, एक मौन तुलना प्रतीत होती है; क्योंकि नप्तालियों ने अपने निज भाग में बलपूर्वक प्रवेश करने के लिये हथियारों का प्रयोग नहीं किया, वरन् एक वश में किए हुए प्रदेश में चुपचाप बने रहे, और इस प्रकार यहूदा और अन्य गोत्रों की निष्ठा, और मानो उनके संरक्षण में सुरक्षा और शान्ति का आनन्द लेते रहे। दानियों द्वारा लेशेम का लिया जाना, जो उस ईश्वरीय अनुदान के अनुसार था जो उन्हें उसके विषय में मिला था, यहोशू की मृत्यु के बाद ही हुआ। परन्तु वह घटना, जिसका न्यायियों की पुस्तक में अधिक विस्तार से वर्णन है, यहाँ प्रसंगवश उल्लिखित है, क्योंकि वे अपने उस साहस और उद्यम के लिये प्रशंसा के योग्य थे जिससे उन्होंने परमेश्वर के दिए हुए अधिकार को इस प्रकार अपनाया, और उस पर ऐसा भरोसा रखा कि वीरता से चढ़कर शत्रु को पराजित किया।
यहोशू 19:32-51
32. छठवीं चिट्ठी नप्तालियों के नाम पर, अर्थात् नप्तालियों के कुलों के अनुसार उनके नाम पर निकली।
32. Filiis Nephtali exivit sors sexta, filiis inquam, Nephtali, per familias suas.
33. और उनकी सीमा हेलेप से, और अल्लोन से सानन्नीम तक, और अदामी, नेकेब, और यब्नेल होकर लक्कूम तक थी; और उसका अन्त यरदन पर हुआ;
33. Fuitque terminus eorum ab Heleph, et ab Elon in Saanannim, et Adami, Neceb, et Jabneel, usque ad Lacum: suntque exitus ejus ad Jordanem.
यहोशू, एलीआज़र और गोत्रों के मुख्य पुरुषों के द्वारा ठहराया गया नप्ताली का गोत्र-प्रदेश उस आलंकारिक वर्णन से भली-भाँति मेल खाता है जो याकूब ने उसके विषय में दिया था, क्योंकि दृश्य-सौन्दर्य और उपजाऊपन दोनों में वह प्रतिज्ञात देश के सबसे सुन्दर भागों में से एक है; परन्तु टीका में उसे जो स्थान दिया गया है, वह विचित्र रूप से अशुद्ध है। लातीनी में कहा गया है कि नप्ताली के वंशज “Videntur contigui ab una parte fuisse filiis Juda: alibi autem cincti coste ils estoyent contigus aux enfans de Juda; et d'autrepart qu'ils estoyent environnez du secours de leurs freres;” “ऐसा प्रतीत होता है कि एक ओर से वे अपने भाइयों की सहायता से घिरे हुए थे।” परन्तु वास्तविकता यह है कि यहूदा और नप्ताली देश के विपरीत छोरों पर हैं, और एक-दूसरे से सटे होने के बदले, कम से कम पाँच गोत्रों के बीच में आ जाने से एक-दूसरे से बहुत दूर अलग हैं; ये गोत्र यहूदा की सीमाओं से आरम्भ होकर उत्तर की ओर बढ़ते हुए क्रमशः बिन्यामीन, एप्रैम, मनश्शे, इस्साकार और जबूलून हैं। फिर, क्योंकि वह गन्नेसरत की झील के तटों से उत्तर में लबानोन की तलहटी तक फैला हुआ था, इसलिये यह भली-भाँति नहीं कहा जा सकता कि वह सब ओर से अन्य गोत्रों के घेरों से घिरा हुआ था। निश्चय ही उसके दक्षिण-पश्चिम में जबूलून और पश्चिम में आशेर था, परन्तु उत्तर और पूर्व में वह प्रतिज्ञात देश की अन्तिम सीमाएँ बनाता था, और इसलिये विदेशी और शत्रु बस्तियों से लगा हुआ था। — सं.
34. फिर वह सीमा पश्चिम की ओर मुड़कर अजनोत्ताबोर को गई, और वहाँ से हुक्कोक को निकली, और दक्षिण की ओर जबूलून तक, और पश्चिम की ओर आशेर तक, और सूर्योदय की ओर यरदन के पास यहूदा तक पहुँची।
34. Postea revertitur terminus ad mare ad Aznoth-thabor: et progreditur illinc in Huccoc, et pervenit ad Zabulon a meridie, et ad Aser pervenit ab occidente, et ad Jehuda in Jordanem, ad ortum solis.
35. और गढ़वाले नगर ये हैं, अर्थात् सिद्दीम, सेर, और हम्मत, रक्कत, और किन्नेरेत,
35. Et urbes munitae, Siddim, Ser, et Hammath, Raccath, et Chinnereth.
36. और अदामा, और रामा, और हासोर,
36. Et Adamah, et Ramah, et Hasor,
37. और केदेश, और एद्रेई, और एन्हासोर,
37. Et Cedes, et Hedrei, et EnHasor,
38. और यिरोन, और मिगदलेल, होरेम, और बेतनात, और बेतशेमेश; ये उन्नीस नगर अपने-अपने गाँवों समेत।
38. Et Iron, et Migdal-el, Horem, et Beth-anath, et Bethsemes: urbes novemdecim, et villae earum.
39. कुलों के अनुसार नप्तालियों के गोत्र का भाग नगरों और उनके गाँवों समेत यही ठहरा।
39. Haec est haereditas tribus filiorum Nephtali per familias suas, urbes istae et villae earum.
40. सातवीं चिट्ठी दानियों के गोत्र के कुलों के अनुसार उनके नाम पर निकली।
40. Tribui filiorum Dan per familias suas exivit sors septima.
41. और उनके भाग की सीमा में सोरा, और एशताओल, और ईरशेमेश,
41. Fuitque terminus haereditatis eorum, Sorah, et Esthaol, et Itsemes,
42. और शालब्बीन, और अय्यालोन, और यितला,
42. Et Saalabbin, et Ajalon, et Ithlah,
43. और एलोन, और तिम्ना, और एक्रोन,
43. Et Elon, et Thimnathah, et Ecron,
44. और एलतके, और गिब्बतोन, और बालात,
44. Et Elthece, et Gibbethon, et Baalath,
45. और यहूद, और बनेबराक, और गत्रिम्मोन,
45. Et Jehud, et Bene-berak, et Gath-rimon,
46. और मेयर्कोन, और रक्कोन थे, और यापो के सामने की सीमा भी।
46. Et Mehajarcon, et Raccon, cum termino contra Japho.
47. और दानियों की सीमा उनके लिये बहुत छोटी निकली; इसलिये दानी लेशेम से लड़ने को चढ़ गए, और उसे लेकर तलवार से मारा, और उसको अपने अधिकार में करके उसमें बस गए, और अपने मूलपुरुष दान के नाम पर लेशेम का नाम दान रखा।
47. Et exivit terminus filiorum Dan ab eis ascenderuntque filii Dan, et pugnaverunt cum Lesem, ceperuntque eam, ac percusserunt eam acie gladii, et haereditate acceperunt eam, habitaveruntque in ea: et vocaverunt Lesem Dan, secundum nomen Dan patris sui.
48. कुलों के अनुसार दानियों के गोत्र का भाग अपने-अपने गाँवों समेत ये ही नगर ठहरे।
48. Haec est haereditas tribus filiorum Dan per familias suas, civitates istae, et villae earum.
49. जब वे देश को उसकी सीमाओं के अनुसार निज भाग करके बाँट चुके, तब इस्राएलियों ने नून के पुत्र यहोशू को भी अपने बीच में एक भाग दिया।
49. Quum autem finem fecissent partiendi terram ut possiderent singuli terminos suos, dederunt filii Israel haereditatem ipsi Josue filio Nun in medio sui.
50. यहोवा के कहने के अनुसार उन्होंने उसको उसका माँगा हुआ नगर दिया, अर्थात् एप्रैम के पहाड़ी देश में का तिम्नत्सेरह; और वह उस नगर को बसाकर उसमें रहने लगा।
50. Secundum sermonem Jehovae dederunt ei urbem quam petivit, Thimnath-serah in monte Ephraim, et edificavit urbem, habitavitque in ea.
51. जो-जो भाग एलीआज़र याजक, और नून के पुत्र यहोशू, और इस्राएलियों के गोत्रों के पूर्वजों के घरानों के मुख्य पुरुषों ने शीलो में, मिलापवाले तम्बू के द्वार पर, यहोवा के सामने चिट्ठी डाल-डालकर निज भाग करके बाँट दिए, वे ये ही हैं। इस प्रकार उन्होंने देश के बाँटने का काम पूरा किया।
51. Istae sunt haereditates quas tradiderunt possidendas Eleazar sacerdos, et Josue filius Nun, et principes patrum tribuum filiorum Israel per sortem in Silo coram Jehova ad ostiam tabernaculi conventionis, et finem fecerunt dividendi terram.
49. जब वे बाँट चुके, इत्यादि। यहाँ अन्त में हमें यहोशू के प्रति प्रजा की कृतज्ञता का वृत्तान्त मिलता है। क्योंकि यद्यपि अब्राहम के वंशजों में कनान देश का बँटवारा न्यायपूर्ण होना आवश्यक था, तौभी यहोशू अपने उत्तम सद्गुणों के कारण किसी सम्मानसूचक पुरस्कार के योग्य था। और कोई यह शिकायत भी नहीं कर सकता था कि उनके व्यय पर एक ही व्यक्ति को धनी बनाया गया। क्योंकि पहले तो, इस विलम्ब में परमेश्वर के इस पवित्र दास के संयम का एक उल्लेखनीय प्रमाण था। जब तक सर्वसाधारण का हित सुरक्षित न हो गया, तब तक वह अपने हित पर कोई ध्यान नहीं देता। हमें ऐसे लोग कितने कम मिलते हैं जो वीरता के एक-दो नमूने दिखा देने के बाद तुरन्त लूट की ओर न लपकें? यहोशू ऐसा नहीं है; जब तक देश बाँट न दिया गया, तब तक वह अपने विषय में सोचता ही नहीं। स्वयं पुरस्कार में भी वही संयम और मितव्ययिता प्रकट है। जो नगर वह अपने और अपने परिवार के लिये माँगता है, वह पत्थरों के ढेर मात्र था; या तो इसलिये कि वह ढा दिया जाकर खण्डहरों का ढेर बना दिया गया था, या इसलिये कि उस पर तब तक कोई नगर बना ही नहीं था।
यह अनुमान सम्भव जान पड़ता है कि अनुदान को यथासम्भव ईर्ष्या-रहित बनाने के उद्देश्य से उसने जो नगर माँगा, वह अधिक मूल्य का न था। यदि किसी को यह विचित्र लगे कि उसने अपना परिश्रम निःशुल्क नहीं दिया, तो वह यह विचार करे कि यहोशू ने उदारता से ईश्वरीय बुलाहट का पालन किया था, और इतने परिश्रम, संकट और कष्ट सहने में उसकी कोई भाड़े की भावना न थी; परन्तु स्वेच्छा से अपना कर्तव्य पूरा कर लेने के बाद, उसे परमेश्वर के अनुग्रह के स्मृति-चिह्न को ठुकराना नहीं चाहिए था, जब तक कि वह उलटे तिरस्कार के द्वारा उसकी महिमा को दबाना न चाहता। क्योंकि जो अनुदान उसके लिये ठहराया गया, वह उस ईश्वरीय सामर्थ्य की एक साधारण साक्षी के सिवाय और कुछ न था जो उसके हाथ के द्वारा प्रकट हुई थी। सचमुच यहाँ कोई महत्वाकांक्षा नहीं पाई जा सकती, क्योंकि वह अपने लिये कुछ नहीं चाहता, और लोभ की भावना से उतावली में कुछ नहीं करता, वरन् लोगों की सहमति में उस सम्मान की पुष्टि खोजता है जो परमेश्वर उसे पहले ही दे चुका था। ऐसी स्थिति में चुप रहना नम्रता से अधिक हृदयहीनता का सूचक होता। अध्याय के अन्तिम पद का यह कथन, कि यहोशू और एलीआज़र ने देश के बाँटने का काम पूरा किया, ठहराई गई सीमाओं के स्थायित्व की ओर संकेत करता है, और इस्राएलियों को चेतावनी देता है कि वे किसी भी रीति से एक अटल आज्ञप्ति को डगमगाने का प्रयत्न न करें।
