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यहोशू 4
यहोशू 4:1-9
1. जब उस सारी जाति के लोग यरदन के पार उतर चुके, तब यहोवा ने यहोशू से कहा,
1. Et fuit, postquam finem fecit tota gens trajiciendi Jordanis; quia loquutus erat Jehova ad Josuam, dicendo.
2. प्रजा में से बारह पुरुष, अर्थात् गोत्र पीछे एक-एक पुरुष को चुनकर,
2. Tollite vobis e populo duodecim viros virum unum ex quaque tribu.
3. उनको यह आज्ञा दो, कि तुम यरदन के बीच में से, जहाँ याजकों ने पाँव जमाए थे, वहाँ से बारह पत्थर उठाकर अपने साथ पार ले चलो, और जहाँ आज की रात पड़ाव करोगे वहीं उनको रख देना।
3. Et praecipite illis dicendo: Tollite vobis hinc e medio Jordanis a loco ubi stant pedes sacerdotum expeditorum, duodecim lapides quos feretis vobiscum, et deponetis in loco ubi hac nocte manebitis.
4. तब यहोशू ने उन बारह पुरुषों को, जिन्हें उसने इस्राएलियों के प्रत्येक गोत्र में से एक-एक करके ठहरा रखा था, बुलवाया;
4. Tunc vocavit Josue duodecim viros quos ordinaverat e filiis Israel, singulos ex quaque tribu.
5. और यहोशू ने उनसे कहा, तुम अपने परमेश्वर यहोवा के सन्दूक के आगे यरदन के बीच में जाकर, इस्राएलियों के गोत्रों की गिनती के अनुसार एक-एक पत्थर उठाकर अपने-अपने कन्धे पर रखो,
5. Et dixit illis Josue, Transite ante arcam Jehovae Dei vestri per medium Jordanis, et tollat quisque ex vobis lapidem unum super humerum suum pro numero tribuum filiorum Israel.
6. जिससे यह तुम लोगों के बीच चिन्ह ठहरे; और आगे को जब तुम्हारे बेटे अपने पिताओं से यह पूछें, कि इन पत्थरों का क्या अर्थ है?
6. Ut sit hoc inter vos (vel, in medio vestri) signum quum interrogaverint filii vestri cras patres suos, quid sunt lapides isti apud vos?
7. तब तुम उन्हें यह उत्तर दो, कि यरदन का जल यहोवा की वाचा के सन्दूक के सामने से दो भाग हो गया था; जब वह यरदन के पार जा रहा था, तब यरदन का जल दो भाग हो गया; सो ये पत्थर इस्राएलियों के लिए सदा के लिए स्मारक ठहरेंगे।
7. Tunc respondeatis eis, quod intercisae fuerunt aquae Jordanis ante arcam foederis Jehovae, quum, interquam, transiret Jordanem, intercisae fuerunt aquae Jordanis, tunc facti fuerunt lapides iste in monumentum filiis Israel perpetuo.
8. यहोशू की आज्ञा के अनुसार इस्राएलियों ने वैसा ही किया; जैसा यहोवा ने यहोशू से कहा था, वैसा ही उन्होंने इस्राएली गोत्रों की गिनती के अनुसार यरदन के बीच में से बारह पत्थर उठा लिए, और उनको अपने साथ ले जाकर उस स्थान पर जहाँ उन्होंने पड़ाव किया, वहीं रख दिया।
8. Fecerunt itaque filii Israel sicut praeceperat Josue, et sustulerunt duodecim lapides e medio Jordanis sicut loquutus fuerat Jehova ad Josuam pro numero tribuum filiorum Israel, tuleruntque eos secum ad locum ubi pernoctaverunt, et reposuerunt illic.
9. और यरदन के बीच, जहाँ वाचा का सन्दूक उठानेवाले याजकों के पाँव खड़े थे, वहाँ यहोशू ने बारह पत्थर खड़े कराए; और वे आज तक वहीं हैं।
9. Duodecim quoque lapides erexit Josue in medio Jordanis sub statione pedum sacerdotum qui portabant arcam foederis, manseruntque ibi usque in hunc diem. 1. “ऐसा हुआ” इत्यादि। बारह पुरुषों के विषय में जो संक्षिप्त और अस्पष्ट संकेत पहले किया गया था, उसे वह अब अधिक विस्तार से समझाता है। उसने कहा था कि वे परमेश्वर की आज्ञा से, प्रत्येक अपने-अपने गोत्र में से एक-एक करके, चुने गए थे; परन्तु अपना कथन बीच में ही तोड़कर उसने यह नहीं बताया था कि किस प्रयोजन के लिए। अब वह कहता है कि यहोशू की आज्ञा से उन्होंने बारह पत्थर उठाए और उन्हें गिलगाल में रखा, ताकि आनेवाली पीढ़ियों के बीच एक सुस्पष्ट स्मारक बना रहे। फिर, क्योंकि वह केवल वही वर्णन करता है जो प्रजा के पार उतर जाने के पश्चात् किया गया, इसलिए जो बात बीच में डाली गई है उसे पूर्ण-भूतकाल के अर्थ में समझना चाहिए। यह भी बहुत स्पष्ट है कि यहाँ संयोजक अव्यय कारणवाचक अव्यय के स्थान पर प्रयुक्त हुआ है।
सारांश यह है कि इससे पहले कि याजक नदी के बीच से, जहाँ वे खड़े थे, अपना पाँव हटाएँ, उनके पाँवों के पास के पत्थर उठाकर गिलगाल में रखे गए, कि वे उस आश्चर्यकर्म के सदा के साक्षी बने रहें; और यह भी कि यहोशू ने परमेश्वर की आज्ञा को इसी प्रकार विश्वासयोग्यता से पूरा किया। अतः यहोशू ने उन पुरुषों को बुलाया जिन्हें उसने पहले चुना था, परन्तु परमेश्वर की आज्ञा के बिना नहीं, ताकि उसके द्वारा उसे अपने अधिकार की और भी दृढ़ पुष्टि प्राप्त हो। क्योंकि यदि यहोशू ने अपनी ही इच्छा से उस प्रकार का विजय-स्मारक खड़ा किया होता, तो जिस भक्ति ने उसे प्रेरित किया वह भले ही प्रशंसनीय होती, परन्तु केवल मनुष्य की इच्छा पर आधारित वह चेतावनी कदाचित् तुच्छ समझी जाती। परन्तु अब जब परमेश्वर स्वयं वह चिन्ह खड़ा करता है, तो उसकी ओर से लापरवाही से निकल जाना अधर्म है। इसलिए जब वह बच्चों को यह पूछते हुए दिखाता है कि “इन पत्थरों का क्या अर्थ है?”, तब वह संकेत करता है कि यह एक ऐसा स्मारक था जो सबसे अधिक ध्यान देने योग्य था।
7. “तब तुम उन्हें उत्तर दो” इत्यादि। यद्यपि पत्थर स्वयं बोल नहीं सकते, तौभी उस स्मारक ने माता-पिताओं को बोलने की सामग्री प्रदान की, और अपनी सन्तान पर परमेश्वर की कृपा प्रकट करने का अवसर दिया। और यहाँ वृद्ध जनों से भक्ति के प्रचार के लिए उत्साहपूर्ण प्रयत्न की अपेक्षा की गई है, और उन्हें आज्ञा दी गई है कि वे अपनी सन्तान को शिक्षा देने में परिश्रम करें। क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह थी कि यह शिक्षा प्रत्येक युग में आगे सौंपी जाती रहे; ताकि जो लोग उस समय उत्पन्न भी न हुए थे, वे बाद में अपने माता-पिताओं से शिक्षा पाकर, सुनने के द्वारा उसके साक्षी बन जाएँ, यद्यपि उन्होंने उसे अपनी आँखों से नहीं देखा था।
“यहोशू।” प्रत्यक्षतः यह “यहोवा” के स्थान पर छपाई की भूल है; जैसा कि फ्रांसीसी अनुवाद अधिक ठीक रीति से कहता है, “Le commandment de Dieu;” “परमेश्वर की आज्ञा।” — सं. फ्रांसीसी में, “Par un temps passe plus que parfait (comme parlent les Latins;)” “पूर्ण से भी अधिक भूतकाल के द्वारा (जैसा लातीनी लोग कहते हैं)।” — सं.
फ्रांसीसी में, “Et quant a ce mot Et, on peut aisement juger qu'il se prend pour Car;” “और ‘और’ इस शब्द के विषय में, हम सहज ही समझ सकते हैं कि यह ‘क्योंकि’ के अर्थ में लिया गया है।” — सं.
पत्थर गोत्रों की गिनती के अनुसार रखे गए, कि प्रत्येक गोत्र अपने-अपने प्रतीक के द्वारा कृतज्ञता के लिए उभारा जाए। यह सच है कि उन ढाई गोत्रों को, जिन्होंने यरदन के उस पार अपना निज भाग पा लिया था, यदि अन्य गोत्रों से अलग करके देखा जाए, तो उस पार उतरने का कोई कारण न था। परन्तु जैसे कनान देश अन्य गोत्रों के अधिकार में अब्राहम के सारे वंश की सामूहिक भलाई के लिए आया, वैसे ही यह उचित था कि जो सब एक ही, अर्थात् सामान्य, कार्य में लगे थे, वे एक-दूसरे से अलग न किए जाएँ। और यद्यपि अब तक केवल बारह पुरुषों का ही उल्लेख हुआ था, तौभी एक छोटे-से वाक्यांश से यह स्पष्ट है कि ईश्वरीय आज्ञा सारी प्रजा को सुनाई गई थी; क्योंकि कहा गया है कि इस्राएलियों ने यहोशू के वचनों का पालन किया। वरन् यह भी सम्भव है कि सारी प्रजा के नाम से पत्थर ढोने के लिए प्रतिनिधि मतदान के द्वारा चुने गए हों।
9. “और यहोशू ने बारह पत्थर खड़े कराए” इत्यादि। प्रत्यक्षतः जल के नीचे पत्थरों का कोई उपयोग न था, और इसलिए गहराई में पत्थरों को गाड़ देना बेतुका प्रतीत हो सकता है। जो दूसरे पत्थर गिलगाल में रखे गए, वे सबके सामने दिखाई देते थे और पूछताछ का अवसर देते थे; परन्तु जो पत्थर जल की तली में मनुष्यों की आँखों से छिपे थे, वे उनके मनों को उभारने में कोई प्रभाव नहीं डाल सकते थे। मैं मानता हूँ कि जो स्मारक पूर्णतः मौन में दबा रहता, वह व्यर्थ होता। परन्तु जब वे आपस में उस पार उतरने के उस प्रमाण की चर्चा करते थे जो वहाँ छोड़ा गया था, तब उस बात का सुनना भी, जिसे उन्होंने देखा न था, उनके विश्वास को दृढ़ करने में बहुत सहायक होता था। वाचा का सन्दूक पवित्रस्थान में बन्द था और उसके सामने टँगे हुए परदे से ढका रहता था, तौभी उसकी छिपी हुई महिमा लाभहीन न थी, जब वे व्यवस्था से यह सीखते थे कि परमेश्वर की वाचा उसमें रखी हुई है। यह भी हो सकता था कि जब नदी का जल घट जाता, तब कभी-कभी उस ढेर की चोटियाँ दिखाई दे जातीं। परन्तु जो मैं पहले कह चुका हूँ वह अधिक सम्भाव्य है, कि यद्यपि यहोशू ने पत्थरों को धारा के बीच में गाड़ दिया, तौभी उसने प्रजा की उपस्थिति में एक साक्षी स्थापित करके एक उपयोगी कार्य किया, जो आगे चलकर सर्वसाधारण की बातचीत का विषय बन जाता।
फ्रांसीसी में, “Or ce passage est pour monstrer, que les gens anciens doivent etre affectionnez a la piete;” “अब यह स्थल यह दिखाने के लिए है कि वृद्ध जनों को भक्ति से लगाव रखना चाहिए।” — सं.
फ्रांसीसी में, “Or je confesse bien que c'eust este un tesmoignage du tout inutile, si on l'eust laisse la comme enseveli sans en parler;” “अब मैं मानता हूँ कि यदि वे उसे वहाँ मानो दबा हुआ छोड़ देते और उसके विषय में कुछ न कहते, तो वह पूर्णतः व्यर्थ साक्षी होता।” — सं.
यहोशू 4:10-18
10. और याजक सन्दूक उठाए हुए उस समय तक यरदन के बीच खड़े रहे, जब तक वे सब बातें पूरी न हो चुकीं जिन्हें यहोवा ने यहोशू को लोगों से कहने की आज्ञा दी थी, ठीक उन सब बातों के अनुसार जिनकी आज्ञा मूसा ने यहोशू को दी थी; और लोग फुर्ती से पार उतर गए।
10. Sacerdotes autem portantes arcam stabant in medio Jordanis donec compleretur omnis sermo quem praeceperat Jehova ad Josuam, ut diceret populo: prorsus ut praeceperat Moses ipsi Josue: festinavit autem populus transeundo.
11. और जब सब लोग पार उतर चुके, तब यहोवा का सन्दूक और याजक भी लोगों के देखते पार हुए।
11. Quum vero transeundi finem fecisset universus populus, transivit arca Jehovae, et sacerdotes coram populo.
12. और रूबेनी, गादी, और मनश्शे के आधे गोत्र के लोग, मूसा के कहने के अनुसार, इस्राएलियों के आगे हथियार बाँधे हुए पार गए;
12. Transierunt quoque filii Reuben, et filii Gad, et dimidia tribus Manasse armati ante filios Israel: quemadmodum loquutus fuerat ad eos Moses.
13. अर्थात् कोई चालीस हज़ार पुरुष युद्ध के लिए तैयार होकर संग्राम करने को यहोवा के सामने पार उतरकर यरीहो के पास के मैदानों में पहुँचे।
13. Quadraginta millia armatorum transierunt coram Jehova ad praelium ad campestria Jericho.
14. उस दिन यहोवा ने सब इस्राएलियों के सामने यहोशू की महिमा बढ़ाई; और जैसे वे मूसा का भय मानते थे, वैसे ही यहोशू का भी भय उसके जीवन भर मानते रहे।
14. Eo die magnificavit Jehova Josuam in oculis totius Israelis: et timuerunt eum quemad modum timuerant Mosen omnibus diebus vitae ejus.
15. और यहोवा ने यहोशू से कहा,
15. Loquutus est autem Jehova ad Josuam, dicendo,
16. साक्षी का सन्दूक उठानेवाले याजकों को आज्ञा दे कि वे यरदन में से निकल आएँ।
16. Praecipe sacerdotibus portantibus arcam testimonii ut ascendant e Jordane.
17. तब यहोशू ने याजकों को आज्ञा दी, कि यरदन में से निकल आओ।
17. Et praecepit Josue sacerdotibus, dicendo, Ascendite ex Jordane.
18. और जब यहोवा की वाचा का सन्दूक उठानेवाले याजक यरदन के बीच में से निकल आए, और याजकों के पाँवों के तलवे सूखी भूमि पर पड़े, तब यरदन का जल अपने स्थान पर लौट आया, और पहले के समान अपने सब कगारों के ऊपर बहने लगा।
18. Porro quum ascendissent sacerdotes portantes arcam foederis Jehovae e medio Jordane, et translatae essent plantae pedum sacerdotum in siccum, reversae sunt aquae Jordanis ad locum suum, et fluxerunt sicut heri et nudius tertius, super omnes ripas ejus.
10. “क्योंकि याजक जो उठाए हुए थे” इत्यादि। यदि हमें रुके रहने की आज्ञा दी जाए जबकि दूसरे शीघ्रता से आगे बढ़ रहे हों, तो हम जानते हैं कि कितनी सहजता से ऊब का भाव उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि ऐसा लगता है मानो हम निचले स्थान पर हैं। इसलिए याजकों की उनके धीरज के लिए उचित ही प्रशंसा की गई है, कि जब सारी प्रजा तेज़ी से दूसरे किनारे की ओर बढ़ी जा रही थी, तब वे शान्त भाव से अकेले अपने स्थान पर बने रहे। क्योंकि उनके मन में यह शंका उठ सकती थी कि कहीं जल के वे ढेर, जो उनके सिरों के ऊपर थमे हुए थे, अचानक पिघलकर उन्हें निगल न जाएँ। अतः उन्होंने वहाँ बने रहकर भी अपनी भक्ति उतनी ही प्रकट की जितनी सामने से आती धारा में आगे बढ़ने का साहस करके की थी। इस प्रकार उन्होंने पहले तो अपनी तत्पर आज्ञाकारिता प्रदर्शित की, और दूसरे अपनी स्थिरता, जिससे यह प्रकट हो गया कि उन्होंने केवल क्षणिक आवेग से आज्ञा का पालन नहीं किया था। क्योंकि उनके संकल्प की वह दृढ़ता, जिसकी प्रशंसा की गई है, अवश्य किसी जीवित सिद्धान्त से उत्पन्न हुई होगी। यह उनकी नम्रता का प्रमाण था कि उन्होंने उतावली में कुछ भी करने का प्रयत्न न किया, वरन् अपनी सारी कार्य-विधि को मानो परमेश्वर के वचन के ठीक-ठीक अनुरूप व्यवस्थित किया।
यद्यपि यह सम्भव है कि जो कुछ करना आवश्यक था, उसके विषय में यहोशू को स्वर्ग से एक नए सन्देश के द्वारा शिक्षा दी गई थी, तौभी कहा गया है कि उसने वही किया जिसकी आज्ञा मूसा ने दी थी। इससे मैं यह समझता हूँ कि मूसा ने उसे यत्न से यह आज्ञा दी थी कि वह परमेश्वर के मुख के वचनों पर लगा रहे, कि वह उस आज्ञा का पूर्णतः पालन करनेवाला था, और इसलिए सदा इस बात का ध्यान रखता था कि परमेश्वर को क्या भाता है। संक्षेप में, यहाँ मूसा की जिस आज्ञा का उल्लेख है वह सामान्य थी, परन्तु जैसे-जैसे प्रत्येक परिस्थिति उत्पन्न होती गई, परमेश्वर यहोशू को विशेष आज्ञाएँ देता गया।
12. “और रूबेनी” इत्यादि। वह दो गोत्रों और आधे गोत्र के अभियान का उल्लेख करता है, क्योंकि वे अपने निजी हित के लिए युद्ध करने को नहीं निकले थे, वरन् अपने उन भाइयों की सहायता करने को, जिनके पराक्रम से उनका अपना निज भाग प्राप्त हुआ था, कि वे कनान देश को अधिकार में लेने में उनका साथ दें। मूसा ने उन पर यह दायित्व डाला था, और उन्होंने शपथ खाकर अपने आप को इस बात के लिए बाँधा था कि जब तक सब लोग शान्त निवास न पा लें, तब तक वे शेष प्रजा के साथ रहेंगे।
जब छावनी आगे बढ़ने को थी, तब उन्होंने फिर वही प्रतिज्ञा की, जैसा हम यहोशू 1 में देख चुके हैं। परन्तु यहाँ के वृत्तान्त से हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि केवल एक भाग ही चुना गया था, क्योंकि उनकी संख्या केवल चालीस हज़ार है, अर्थात् थोड़ी ही पहले की गई जनगणना में निश्चित संख्या का एक तिहाई, या लगभग एक तिहाई। अब, क्योंकि सर्वत्र यह कहा गया है कि उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की, इसलिए यह अनुमान करना सम्भाव्य है कि मूसा का यह अभिप्राय न था कि वह कठोरता से इस बात पर अड़े रहे कि जितनों ने सहमति दी थी वे सब के सब अपनी पत्नियों और बच्चों को छोड़कर, जब तक कनान देश पूर्णतः अधीन न हो जाए, तब तक वहाँ सैनिक सेवा करें। और निश्चय ही अनेक शत्रु जातियों के बीच एक युद्ध में असमर्थ भीड़ को असुरक्षित छोड़ देना कठोर और निर्दयी होता। और न शत्रुओं के बचे हुए लोग, पड़ोसी जातियों की सहायता पाकर, बहुत समय तक ऐसे अवसर का लाभ उठाने से चूकते कि स्त्रियों और बच्चों का संहार करके अपना बदला लें। इसलिए ऐसे देश में, जहाँ अभी पर्याप्त शान्ति स्थापित न हुई थी, आक्रमणों को रोकने के लिए पर्याप्त सेना को स्थायी रूप से रखना आवश्यक था। मूसा इतने कठोर स्वभाव का न था कि असहायों की चिन्ता न करे। वरन् उसकी बुद्धिमत्ता और न्यायप्रियता उसे कभी यह अनुमति न देतीं कि वह हाल ही में शस्त्रों द्वारा अधिकार में लिए गए प्रदेश को सैनिकों की टुकड़ी के बिना खाली छोड़ दे।
हम यह भी जोड़ सकते हैं कि इतनी विशाल भीड़ कनान देश को प्राप्त करने में सहायता करने के बदले बाधा ही डालती। इसलिए मूसा ने केवल इतना ही चाहा था कि जब उनके भाई युद्ध चलाने में लगे हों, तब रूबेनी और गादी आलस्य से घर पर न बैठे रहें और उन लोगों की कुछ भी सहायता किए बिना चैन से अपना भोजन न खाते रहें, जिनके कारण उन्हें निज भाग प्राप्त हुआ था। और उन चालीस हज़ार की विश्वासयोग्यता इस बात से प्रमाणित हुई कि जब उनके अपने गोत्रों के शेष लोग विश्राम का आनन्द ले रहे थे, तब उन्होंने युद्ध के बोझ, परिश्रम और जोखिम उठाने से इनकार न किया। वे सहज ही यह तर्क दे सकते थे कि छूट पाने का उनका भी उतना ही अधिकार है जितना दूसरों का; परन्तु सेना-भर्ती हो जाने के बाद उन्हें दी गई आज्ञाओं का पालन करने के लिए फुर्ती से आगे बढ़कर, और अपने भाइयों को दी गई छूट से डाह न करके, उन्होंने यह दिखाया कि वे स्वेच्छा से और हृदय से अपना कर्तव्य पूरा करने को तत्पर थे। साथ ही, इसमें सन्देह नहीं कि अपने गोत्रों के चुने हुए श्रेष्ठ पुरुषों को स्वीकार करने से शिकायत और झगड़े का कारण कट गया। क्योंकि यह न्यायपूर्वक नहीं कहा जा सकता था कि वृद्धों और थके-माँदों को, या अल्पवयस्कों और दुर्बलों को भी न छोड़ा जाए। कदाचित् कुछ लोग यह अनुमान करना चाहें कि सेना चुनाव के द्वारा नहीं वरन् चिट्ठी डालकर खड़ी की गई थी; तौभी मुझे यह अधिक प्रतीत होता है कि जितने सबसे अधिक हृष्ट-पुष्ट और थकावट सहने में सबसे अधिक समर्थ थे, वे सब भर्ती किए गए।
14. “उस दिन यहोवा ने महिमा बढ़ाई” इत्यादि। निःसन्देह उस आश्चर्यकर्म का मुख्य उद्देश्य यह न था कि सामर्थ्य और अधिकार में यहोशू की श्रेष्ठता की घोषणा की जाए; परन्तु क्योंकि सार्वजनिक हित के लिए यह अत्यन्त आवश्यक था कि यहोशू का शासन दृढ़ता से स्थापित हो, इसलिए इसे ईश्वरीय अनुग्रह का एक अतिरिक्त उदाहरण उचित ही गिना गया है, कि वह, यों कहें, पवित्र चिन्हों से विभूषित किया गया, जिससे वह प्रजा की दृष्टि में आदरणीय ठहरे और कोई उसे तुच्छ जानने का दुस्साहस न करे। क्योंकि मिली-जुली भीड़, जिस पर कोई प्रधान शासन न करता हो, अपने आप ही बिखरकर छिन्न-भिन्न हो जाती है। अतः प्रभु ने अपनी प्रजा की सुरक्षा का प्रबन्ध करने के लिए यहोशू को एक विशेष चिन्ह के द्वारा प्रतिष्ठित किया, जो उसकी बुलाहट की घोषणा करता था।
इस स्थल से हम यह सीख सकते हैं कि परमेश्वर उन सब लोगों को, जिनके हाथों से वह अपना उत्तम कार्य प्रकट करता है, विशेष रूप से हमारे सामने सराहता है, और हमसे अपेक्षा करता है कि हम उन्हें उचित आदर और श्रद्धा दें। जब यह कहा गया है कि प्रजा यहोशू का वैसा ही भय मानती थी जैसा वह मूसा का मानती थी, तब यदि कोई यह आपत्ति करे कि यह कथन उन अनेक विद्रोहों और उपद्रवों से खण्डित हो जाता है जो उन्होंने उसके विरुद्ध न केवल उच्छृंखलता से वरन् उग्रता से भी खड़े किए, तो इसका उत्तर देना सहज है, कि यह बात मिस्र से उनके निकलने के समय से लेकर सारी अवधि पर लागू नहीं होती, वरन् केवल उस समय की ओर संकेत करती है जब वे विपत्तियों से दबाए जाकर और नम्र किए जाकर मूसा की उचित आज्ञाकारिता करने लगे। क्योंकि यहाँ जिसका वर्णन है वह एक शान्त शासन है, मानो उन्होंने अपनी पुरानी हठधर्मिता त्याग दी हो, विशेषकर जब उपद्रवी पिता मर चुके थे और उनके स्थान पर एक उत्तम पीढ़ी आ गई थी। इसी कारण हम यह नहीं पढ़ते कि उन पर शासन करने और उन्हें मार्गदर्शन देने में कोई कठिनाई हुई। मैं अब केवल संक्षेप में उस बात की ओर संकेत करता हूँ जिसे मैं पहले ही समझा चुका हूँ। क्योंकि जब यहोशू ने आरम्भ में उन्हें आज्ञाकारिता के लिए उपदेश दिया, तब उन्होंने कहा था कि जैसे वे मूसा की आज्ञा मानते थे, वैसे ही उसकी भी मानेंगे।
16. “याजकों को आज्ञा दे” इत्यादि। यहाँ और भी स्पष्ट रूप से दिखाया गया है कि याजकों ने कितनी नम्रता और शान्ति से ईश्वरीय आज्ञा का पूर्ण पालन किया, क्योंकि जब तक यहोशू ने लौटने का संकेत देने की आज्ञा न दी, तब तक उन्होंने अपना पाँव तक न हिलाया। परन्तु जैसे इस प्रकार नम्र और आज्ञाकारी होना एक दुर्लभ सद्गुण का उदाहरण था, वैसे ही इसमें परमेश्वर की पितृतुल्य कृपा भी स्पष्ट दिखाई देती है, कि उसने उनकी यात्रा के लगभग प्रत्येक पग को अपनी ही वाणी से निर्देशित और संचालित करने की कृपा की, कहीं ऐसा न हो कि कोई उलझन आकर उन्हें रोक दे।
इसके बाद आश्चर्यकर्म की और भी स्पष्ट पुष्टि आती है; क्योंकि जैसे ही वे सामने के किनारे पर चढ़े, यरदन फिर साधारण रीति से बहने लगा। यदि वह अपनी पहली दशा में न लौटता, और वह भी अचानक, तो बहुत से लोग यह कल्पना करते कि उस परिवर्तन का कारण छिपा हुआ तो है, परन्तु आकस्मिक है। परन्तु जब परमेश्वर समय के सूक्ष्म अन्तरालों पर अपनी सामर्थ्य और अनुग्रह प्रकट करता है, तब सब सन्देह दूर हो जाता है। जिस क्षण याजकों के पाँव भीगे, यरदन पीछे हट गया; अब उनके हटते ही वह अपना स्वतन्त्र प्रवाह फिर पा लेता है, और वह भी ठीक उसी क्षण जब वे किनारे पर पहुँचे। क्योंकि यहाँ “सूखी” शब्द का अर्थ वह भाग है जो बाढ़ से ढका न था। इस प्रकार वह नदी, यद्यपि मूक थी, सबसे उत्तम घोषक थी, जो ऊँचे स्वर से यह घोषणा कर रही थी कि आकाश और पृथ्वी इस्राएल के परमेश्वर के अधीन हैं।
यहोशू 4:19-24
19. पहले महीने के दसवें दिन को प्रजा के लोगों ने यरदन में से निकलकर यरीहो के पूर्वी सिवाने पर गिलगाल में अपने डेरे डाले।
19. Populus autem ascendit e Jordane decima die primi mensis, et castramentati sunt in Gilgal ad plagam orientalem Jericho.
20. और जो बारह पत्थर यरदन में से निकाले गए थे, उनको यहोशू ने गिलगाल में खड़ा किया।
20. Ac duodecim lapides quos tulerant ex Jordane statuit Josue in Gilgal.
21. तब उसने इस्राएलियों से कहा, आगे को जब तुम्हारे लड़केबाले अपने-अपने पिता से यह पूछें, कि इन पत्थरों का क्या अर्थ है?
21. Et loquutus est ad filios Israel, dicendo: Quum interrogaverint cras filii vestri patres suos dicendo, Quid lapides isti?
22. तब तुम यह कहकर उनको बताना, कि इस्राएली इस यरदन के पार सूखी भूमि पर होकर चले आए थे।
22. Indicabitis filiis vestris dicendo, Per aridam transivit Israel Jordanem istum: कैल्विन, अब भी इसी मत पर टिके रहकर कि तत्काल किनारे से परे के मैदान का कुछ भाग जलमग्न हो गया था, यह समझता प्रतीत होता है कि याजक खड़े कगार पर चढ़ने के बाद कुछ समय तक उथले जल में चलते रहे। दूसरा मत, जो यह मानता है कि कगार केवल भर गए थे, उनके ऊपर जल नहीं बहा था, मूल पाठ से अधिक मेल खाने के अतिरिक्त, जैसा पहले दिखाया जा चुका है, यहाँ प्रयुक्त भाषा से भी अतिरिक्त पुष्टि पाता प्रतीत होता है। कहा गया है कि जिस क्षण याजकों ने अपने पाँवों के तलवों से सूखी भूमि को छुआ, उसी क्षण जल लौट आया; दूसरे शब्दों में, जब तक वे खड़े कगार पर चढ़ रहे थे, और निस्सन्देह उनके पाँव दृढ़ता से न टिके थे, तब तक जल का ढेर बना रहा, परन्तु ज्यों ही वे समतल भूमि पर पहुँचकर अपना पाँव दृढ़ता से रख सके, त्यों ही वह तुरन्त बिखर गया। — सं.
“मूक।” लातीनी में, “mutus.” फ्रांसीसी में, “une creature insensible et sans voix;” “एक निर्जीव और वाणीहीन सृष्टि।” — सं.
23. क्योंकि जैसे तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने लाल समुद्र को हमारे पार हो जाने तक हमारे सामने से हटाकर सुखा रखा था, वैसे ही उसने यरदन का जल भी तुम्हारे पार हो जाने तक तुम्हारे सामने से हटाकर सुखा रखा;
23. Quoniam siccavit Jehova Deus vester aquas Jordanis a facie vestra donec transiretis: quemadmodum fecit Jehova Deus vester mari Suph, quod siccavit a facie nostra donec transiremus.
24. इसलिए कि पृथ्वी के सब देशों के लोग जान लें कि यहोवा का हाथ बलवन्त है; और तुम सर्वदा अपने परमेश्वर यहोवा का भय मानते रहो।
24. Ut cognoscant omnes populi terrae manum Jehovae, quod fortis sit: ut timeatis Jehovam Deum vestrum cunctis diebus.
19. “और प्रजा के लोग निकल आए” इत्यादि। जिस दिन उन्होंने देश में प्रवेश किया और पहली बार उसमें डेरे डाले, उसका उल्लेख क्यों किया गया है, यह हम अगले अध्याय में देखेंगे। परन्तु पहले पड़ाव को गिलगाल नाम पूर्वानुमान से दिया गया है, क्योंकि यह नया नाम उसे बाद में यहोशू ने खतने के नवीकरण के समय दिया; उसकी व्युत्पत्ति अपने उचित स्थान पर समझाई जाएगी। फिर, यहाँ मुख्य रूप से जिस बात का वर्णन है वह बारह पत्थरों का स्मारक है; क्योंकि यद्यपि उसका उल्लेख पहले हो चुका था, तौभी अब एक प्रकार के गम्भीर समर्पण का वर्णन किया गया है, अर्थात् यह कि यहोशू ने न केवल एक ढेर खड़ा किया, वरन् प्रजा का ध्यान उसके उपयोग की ओर भी दिलाया, कि उसके द्वारा पिता अपनी सन्तान के बीच ईश्वरीय भलाई की स्मृति को जीवित रख सकें। उसके बच्चों को यह पूछते हुए प्रस्तुत करने से कि “इन पत्थरों का क्या अर्थ है?”, हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वे इस प्रकार सजाए गए थे कि देखनेवालों का ध्यान आकर्षित करें। क्योंकि यदि वे बिना किसी क्रम के मनमाने ढंग से ढेर कर दिए गए होते, तो आनेवाली पीढ़ियों के मन में उनके अर्थ के विषय में पूछने का विचार कभी न आता। अतः उनकी स्थिति में अवश्य कुछ ऐसा उल्लेखनीय रहा होगा कि उस दृश्य की उपेक्षा न की जा सके।
फिर, क्योंकि वह वाचा, जिसके द्वारा परमेश्वर ने अब्राहम के वंश को गोद लिया था, हज़ार पीढ़ियों तक अटूट उत्तराधिकार में दृढ़ बनी रही, इसलिए जो उपकार परमेश्वर ने दिवंगत पितरों पर किया था, वह देह की एकता के कारण उनकी सन्तान को, जो बहुत समय बाद उत्पन्न हुई, सामूहिक रूप से हस्तान्तरित हो जाता है। और इस निरन्तरता ने अवश्य उनका ध्यान और भी अधिक जगाया होगा, क्योंकि इस प्रकार आनेवाली पीढ़ियों को स्मरण कराया जाता था कि जो कुछ बहुत पहले उनके पूर्वजों को दिया गया था, वह उनका भी है। यदि ईश्वरीय अनुग्रह एक ही दिन तक सीमित रहता, तो माता-पिताओं का उत्तर उदासीनता से सुना जाता। परन्तु जब पुत्रों के पुत्र यह सुनते हैं कि उनके जन्म से अनेक युग पहले यरदन का जल सूख गया था, तब वे स्वीकार करते हैं कि वे वही प्रजा हैं जिनके प्रति ईश्वरीय अनुग्रह का वह अद्भुत कार्य प्रकट किया गया था। यही बात लाल समुद्र के सूखने के विषय में भी कही जानी चाहिए, यद्यपि वह घटना बहुत प्राचीन न थी। यह निश्चित है कि जो मिस्र से निकले थे, उनमें से केवल कालेब और यहोशू ही जीवित बचे थे, तौभी वह सारी प्रजा को ऐसे सम्बोधित करता है मानो वे उस आश्चर्यकर्म के प्रत्यक्षदर्शी रहे हों। “परमेश्वर ने हमारे सामने से लाल समुद्र को सुखा दिया;” दूसरे शब्दों में, यह उस लेपालकपन के बल से हुआ जो पितरों से सन्तान तक बिना किसी व्यवधान के पहुँचा। फिर, लाल समुद्र के पार उतरने को स्मरण कराना इसलिए भी सार्थक था कि न केवल आश्चर्यकर्म की समानता विश्वास उत्पन्न करे, वरन् यरदन की कथा सुनते ही वह पहला आश्चर्यकर्म भी साथ-साथ नया हो जाए, यद्यपि उसका कोई दृश्य प्रतीक आँखों के सामने उपस्थित न था।
24. “इसलिए कि पृथ्वी के सब देशों के लोग जान लें” इत्यादि। वह कहता है कि परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य का वह प्रदर्शन इसलिए किया था कि उसकी घोषणा न केवल उसकी अपनी प्रजा के बीच हो, वरन् उसका स्वरूप जातियों के बीच दूर-दूर तक फैल जाए। क्योंकि यद्यपि उसे यह भाया कि उसकी स्तुति सिय्योन में निवास करे, तौभी उसे यह भी भाया कि उसके कार्य परदेशियों पर इतने प्रकट हों कि वे यह मानने को विवश हों कि वही सच्चा परमेश्वर है, और जिसे उन्होंने स्वेच्छा से तुच्छ जाना था, उसका भय वे अनिच्छा से मानने को बाध्य हों; जैसा कि मूसा के गीत में कहा गया है, (व्यवस्थाविवरण 32:31) “हमारे शत्रु ही न्यायी हैं।” क्योंकि उसका अर्थ यह है कि अविश्वासियों से, चाहे वे चाहें या न चाहें, परमेश्वर के कार्यों के ज्ञान के द्वारा यह अंगीकार बलपूर्वक करवा लिया जाता है। परन्तु क्योंकि परमेश्वर की सामर्थ्य कितनी महान है यह जानने से उन्हें कुछ भी लाभ न हुआ, इसलिए यहोशू उन्हें इस्राएलियों से अलग करता है, जिन्हें वह एक विशेष ज्ञान का अधिकारी ठहराता है, अर्थात् वह ज्ञान जो परमेश्वर का सच्चा भय उत्पन्न करता है। वह कहता है, “कि जातियाँ जान लें;” परन्तु “कि तू अपने परमेश्वर का भय माने।” इसलिए जबकि अविश्वासी अपने अन्धकार से ज्योति को बुझा देते हैं, आओ, हम परमेश्वर के कार्यों पर विचार करके उसके भय में उन्नति करना सीखें। वह “सर्वदा” कहता है, क्योंकि जिस अनुग्रह की यहाँ चर्चा है वह अनेक पीढ़ियों तक फैला हुआ था।
