यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
प्रकाशक की टिप्पणी — ‘श्रीमान दुर्जन का जीवन और मृत्यु’ जॉन बनियन ने 1680 में प्रकाशित की थी, अर्थात् ‘तीर्थयात्री की यात्रा’ (द पिलग्रिम्स प्रोग्रेस) के पहले भाग के प्रथम संस्करण के दो वर्ष बाद। अपनी भूमिका के पहले ही वाक्य में वह हमें बताता है कि उसने इसे उस रूपक-कथा के जोड़ीदार या साथी-चित्र के रूप में लिखना चाहा था। परन्तु उसका अपना अभिप्राय चाहे जो रहा हो, ऐसा जान पड़ता है कि उसके अपने समय की जनता ने इस पुस्तक को इस रूप में स्वीकार करना अस्वीकार कर दिया। सच तो यह है कि एक और लेखक ने, जो अपना नाम टी. एस. लिखता है, बनियन की रूपक-कथा को उसकी ओर से पूरा करने का बीड़ा उठाया, और ऐसी पुस्तक निकाली जो आकार और छपाई में उससे बहुत मिलती-जुलती थी, और जिसका नाम था ‘तीर्थयात्री की यात्रा का दूसरा भाग . . . एक स्वप्न के दृष्टान्त में ठीक-ठीक वर्णित’। यह पोल्ट्री में ‘सन’ के चिन्हवाली दुकान पर जो. माल्थस के लिए छापी गई, और 1683 में प्रकाशित हुई। जहाँ तक ज्ञात है, इस पुस्तक की अब केवल एक ही प्रति बची है, वह प्रति जो पहले कवि साउदी के पुस्तकालय में थी और अब बैपटिस्ट यूनियन के पुस्तकालय में है। इस पर जान पड़ता है कि जहाँ तक ‘श्रीमान दुर्जन का जीवन और मृत्यु’ का सम्बन्ध था, बनियन ने अपना विचार बदल दिया, और 1 जनवरी, 1685 को क्रिस्टियाना और उसके बच्चों की कहानी को ‘तीर्थयात्री की यात्रा’ के अपने दूसरे भाग के रूप में प्रकाशित किया।
इसलिए हमारे सामने की यह रचना अब अपने आप में अलग खड़ी है। जहाँ तक इसके रूप का सम्बन्ध है, इसकी रचना में बनियन पर एक पुस्तक का बड़ा प्रभाव पड़ा जान पड़ता है, जिसे उसकी पत्नी विवाह के समय अपने साथ लाई थी, और जिसे, जैसा वह अपनी ‘ग्रेस अबाउंडिंग’ में हमें बताता है, वे दोनों मिलकर पढ़ा करते थे। उसका नाम था ‘साधारण मनुष्य का स्वर्ग का मार्ग’: लेखक आर्थर डेंट,
एसेक्स के साउथ शूबरी में परमेश्वर के वचन का प्रचारक। उसका ग्यारहवाँ संस्करण, जो अब सबसे पुराना ज्ञात है, 1609 का है। दोनों पुस्तकें संवाद के रूप में हैं, और दोनों में यह माना गया है कि संवाद एक लम्बे दिन भर चलता रहता है। बनियन का श्रीमान बुद्धिमान,
डेंट के थियोलोगस के समान, शिक्षाप्रद बातें कहता है, जबकि पहली पुस्तक का श्रीमान सावधान, दूसरी पुस्तक के फ़िलागाथस के समान, सुनता है और मित्रतापूर्ण प्रश्नों के द्वारा अपने शिक्षक से और बातें निकलवाता है।
बनियन की बातचीत में, जैसा डेंट की बातचीत में है, न तो कोई असुनेटस है, जो एक अज्ञानी मनुष्य की भूमिका निभाता है और अन्त में ज्ञान पाकर और कायल होकर निकलता है, और न कोई एन्टीलेगोन है, जो सारे मार्ग नुक्ताचीनी और कुतर्क करता रहता है; और डेंट की पुस्तक में वह बात नहीं है जो बनियन की पुस्तक में है, अर्थात् एक जीवन-वृत्तान्त जो संवाद के विभिन्न भागों को आपस में जोड़ता है; परन्तु दोनों की नींव एक ही है—अनैतिकता के विभिन्न रूपों के स्वभाव और बुराइयों का खोज-परखकर प्रकट किया जाना और उन्हें उघाड़ देना।
बनियन की पुस्तक 1680 में निकली, और उसे नथानिएल पोंडर ने प्रकाशित किया, जो ‘तीर्थयात्री की यात्रा’ का भी प्रकाशक था। इसका तीसरा संस्करण 1696 में निकला, परन्तु क्योंकि दूसरे संस्करण की कोई प्रति विद्यमान नहीं जानी जाती, इसलिए उसकी कोई तिथि निश्चित नहीं की जा सकती। 1684 में एम्स्टर्डम के एक प्रकाशक योहानेस बूखोल्ट ने राज्य से इसका डच अनुवाद निकालने की अनुमति प्राप्त की, जिसका शीर्षक था Het Leven en Sterben van Mr Quaat। यह संस्करण ताँबे की पट्टियों पर खुदी हुई पाँच नक़्क़ाशियों से सचित्र था, जिन्हें प्रसिद्ध डच नक़्क़ाश यान लाउकेन ने बनाया था, जिसने अगले वर्ष ‘तीर्थयात्री की यात्रा’ के भी चित्र बनाए। 1782 में टी. लुइस द्वारा अनुवादित एक वेल्श संस्करण लिवरपूल में इस शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ: Bywyd a Marwolaeth yr annuwiol dan enw Mr Drygddyn।
एक गेलिक संस्करण भी 1824 में इनवर्नेस में प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था Beath agus Bas Mhr Drochduine।
वर्तमान संस्करण पहले प्रकाशन की एक प्रति से पुनर्मुद्रित किया गया है, जो बेडफ़ोर्ड के बनियन चर्च के न्यासियों ने उधार दी थी, और उसके प्रूफ़ उसी प्रकाशन की एक दूसरी प्रति से मिलाकर पढ़े गए, जो ब्रिटिश म्यूज़ियम के पुस्तकालय में है। पढ़ने की सुविधा के लिए, जैसा ‘कैम्ब्रिज इंग्लिश क्लासिक्स’ की इस माला के अन्य प्रकाशनों में किया गया है, j, s, u आदि के पुराने छापे के रूपों को आजकल सामान्य रूप से प्रचलित रूपों के समान कर दिया गया है; परन्तु न तो वर्तनी (जिसमें बड़े अक्षरों और तिरछे अक्षरों 1 का प्रयोग भी सम्मिलित है) और न विराम-चिन्ह बदले गए हैं, सिवाय उसके जो बताया गया है। बनियन ने स्वयं जो भूल-सुधार बताए थे, और जो इस प्रकाशन के पृष्ठ 15 पर छपे थे, उन्हें लागू कर दिया गया है।
बनियन की ‘पवित्र युद्ध’ (द होली वॉर)2 के इस संस्करण का पाठ 1682 के प्रथम संस्करण की सावधानी से की गई प्रतिलिपि है। यह निश्चित नहीं है कि बनियन के जीवन-काल में इसका कोई और प्रामाणिक पुनर्मुद्रण हुआ था या नहीं। क्योंकि यद्यपि बोडलियन और ब्रिटिश म्यूज़ियम दोनों में एक प्रति है जो दूसरा संस्करण होने का दावा करती है, और जिस पर 1684 की तिथि है, तौभी इस धारणा से बचना कठिन है कि वे चोरी से छापी गई प्रतियाँ हैं, उन प्रतियों के समान जिनके विषय में ‘तीर्थयात्री की यात्रा’ के मामले में नथानिएल पोंडर ने इतनी कड़वाहट से शिकायत की थी। क्योंकि कागज़ और छपाई दोनों ही पहले संस्करण की तुलना में बहुत घटिया हैं; बनियन की कुछ सबसे विशिष्ट हाशिया-टिप्पणियाँ लापरवाही से छोड़ दी गई हैं;
बनियन का अपना शीर्षक—‘संसार की राजधानी को फिर से जीत लेने के लिए शद्दै द्वारा डियाबोलस पर किया गया पवित्र युद्ध’—बदलकर अधिक दुर्बल और अधिक साधारण रूप कर दिया गया है—‘मनुष्य को फिर से जीत लेने के लिए मसीह द्वारा शैतान पर किया गया पवित्र युद्ध’; और, इसके अतिरिक्त, जब 1696 में एक नया संस्करण निकाला गया, तो 1684 के परिवर्तनों और छोड़े गए अंशों की उपेक्षा की गई, और 1682 के पहले संस्करण का सीधा-सादा पुनर्मुद्रण किया गया।
1 प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग के इस ई-टेक्स्ट में तिरछे अक्षर हटा दिए गए हैं, क्योंकि वे अत्यधिक हैं, परन्तु अन्यथा पाठ—बड़े अक्षरों, विराम-चिन्हों, वर्तनी आदि सहित—वैसा ही है जैसा उस संस्करण में है जिससे यह प्रतिलिपि की गई।
2 प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग के इस ई-टेक्स्ट में सम्मिलित नहीं, क्योंकि हम “पवित्र युद्ध” पहले ही जारी कर चुके हैं।
लेखक की ओर से पाठक को — हे सुशील पाठक, जब मैं अपने मन में इस बात पर विचार कर रहा था कि मैंने इस संसार से महिमा तक तीर्थयात्री की यात्रा के विषय में क्या लिखा था; और कि वह इस देश में बहुतों को कैसी प्रिय लगी थी:
तो मेरे मन में फिर यह बात आई कि जैसे तब मैंने उसके विषय में लिखा था जो स्वर्ग को जा रहा था, वैसे ही अब भक्तिहीनों के जीवन और मृत्यु के विषय में, और इस संसार से नरक तक की उनकी यात्रा के विषय में लिखूँ। यही काम मैंने इस पुस्तक में किया है, और, जैसा आप देखते हैं, इसे श्रीमान दुर्जन के नाम और शीर्षक के अधीन रखा है, जो ऐसे विषय के लिए बहुत ही उपयुक्त नाम है: मैंने इसे संवाद का रूप भी दिया है, ताकि मैं अपने लिए अधिक सुगमता से, और पाठक के आनन्द के लिए, यह काम पूरा कर सकूँ।
और यद्यपि, जैसा मैंने कहा, मैंने इसे इस रीति से प्रस्तुत किया है, तौभी मैं जहाँ तक हो सका, वस्तुओं के विषय में अपने ही देखे-भाले के मार्ग से बहुत कम बाहर गया हूँ। हाँ, मैं समझता हूँ कि मैं सच्चाई से कह सकता हूँ कि जहाँ तक मुझे स्मरण है, जिन बातों की चर्चा मैं यहाँ करता हूँ, अर्थात् जहाँ तक घटनाओं का सम्बन्ध है, वे सब इस संसार के रंगमंच पर घटित हुई हैं, हाँ, बहुत बार मेरी आँखों के सामने।
इसलिए, हे सुशील पाठक, मैं यहाँ सचमुच श्रीमान दुर्जन का जीवन और मृत्यु आपके सामने रखता हूँ: हाँ, मैं उसके जीवन में उसके बचपन से उसकी मृत्यु तक उसका पीछा करता हूँ; ताकि आप, मानो दर्पण में, अपनी ही आँखों से वे पग देख सकें जो नरक तक पहुँचते हैं; और श्रीमान दुर्जन की मृत्यु का वृत्तान्त पढ़ते हुए यह भी परख सकें कि कहीं आप स्वयं तो उसी मार्ग पर चलते हुए वहाँ नहीं जा रहे हैं।
और मैं आपसे विनती करता हूँ कि इस बात पर कि मैं कहता हूँ श्रीमान दुर्जन मर गया है, आप चुटकियाँ लेने और ठट्ठा करने से रुके रहें; वरन् गम्भीरता से वचन के द्वारा अपने विषय में जाँच करें कि आप उसके वंश के हैं या नहीं: क्योंकि श्रीमान दुर्जन अपने पीछे अपने बहुत से सम्बन्धी छोड़ गया है; हाँ, सारा संसार ही उसके कुटुम्बियों से भरा पड़ा है। यह सच है कि उसके कुछ सम्बन्धी, उसी के समान, अपने स्थान को, और अपने सदा के घर को जा चुके हैं, परन्तु हज़ारों हज़ार पीछे रह गए हैं; जैसे भाई, बहनें,
चचेरे-ममेरे भाई-बहन, भतीजे-भाँजे, इनके अतिरिक्त उसके अनगिनत मित्र और साथी।
मैं कह सकता हूँ, और ऐसा कहने में कुछ भी नहीं, केवल बहुत ही सच्ची बात कहूँगा, कि संसार में मनुष्यों की शायद ही कोई संगति, कोई समाज, या कोई भाईचारा हो, जहाँ श्रीमान दुर्जन के
कुछ सम्बन्धी न हों: हाँ, किसी नगर में हमें कदाचित ही कोई परिवार या घराना मिलेगा, जहाँ वह अपने पीछे कोई भाई, भतीजा या मित्र न छोड़ गया हो।
इसलिए जिस निशाने पर मैं इस समय तीर चला रहा हूँ, वह चौड़ा है; और इस पुस्तक का कई परिवारों में जाना और उनमें से कुछ को न पकड़ना उतना ही असम्भव होगा, जितना राजा के दूत का गद्दारों से भरे घर में घुसना और वहाँ ईमानदार लोगों के सिवा किसी को न पाना।
मैं यह सोचे बिना नहीं रह सकता कि यह गोली बहुतों पर लगेगी, क्योंकि हमारे खेत इस शिकार से इतने भरे हुए हैं; परन्तु यह कितनों को श्रीमान दुर्जन के मार्ग के लिए मार डालेगी, और कितनों को तीर्थयात्री की
यात्रा के लिए जीवित कर देगी, यह निर्णय करना मेरे वश में नहीं है; यह भेद केवल प्रभु हमारे परमेश्वर के पास है, और वही अकेला जानता है कि वह किसके लिए इसे ऐसे भले और ऐसे धन्य परिणाम तक आशीषित करेगा। जो भी हो, मैंने बन्दूक की प्याली में आग लगा दी है, और मुझे सन्देह नहीं कि उसका धमाका शीघ्र ही सुनाई देगा।
मैंने आपसे पहले कहा था कि श्रीमान दुर्जन अपने पीछे अपने बहुत से मित्र और सम्बन्धी छोड़ गया है, परन्तु यदि मैं उनके बाद जीवित रहा (यह मेरे लिए एक बड़ा प्रश्न है) तो मैं उनके जीवन के विषय में भी लिख सकता हूँ:
जो भी हो, मेरा जीवन चाहे लम्बा हो या छोटा, इस समय मेरी प्रार्थना यह है कि परमेश्वर उनके विरुद्ध ऐसे गवाह खड़े करे, जो या तो उनका मन फिरा दें या उन्हें लज्जित कर दें; क्योंकि वे जहाँ कहीं भी रहते हैं, और अपनी दुष्टता में लोटते हैं, वहाँ वे उस देश की महामारी और विपत्ति हैं।
इंग्लैंड उस बोझ के कारण पहले ही काँप और डगमगा रहा है जो श्रीमान दुर्जन और उसके मित्रों ने दुष्टता से उस पर लाद दिया है: हाँ, हमारी पृथ्वी मतवाले की नाईं इधर-उधर डोलती और डगमगाती है, उसका अपराध उस पर भारी है।
हे सुशील पाठक, अब मैं इस घर के द्वार और डेवढ़ी पर ही आपको केवल यह समाचार देकर सत्कार करूँगा कि श्रीमान दुर्जन भीतर मरा पड़ा है। इसलिए कृपा करके (यदि आपको अवकाश हो) भीतर आइए, और उस दशा को देखिए जिसमें वह अपनी
मृत्यु-शय्या और कब्र के बीच रखा हुआ है। वह अभी तक गाड़ा नहीं गया है, और न अभी वह सड़कर दुर्गन्ध देने लगा है, जैसा ठहराया गया है कि विस्मृति में सो जाने से पहले वह देगा।
अब जैसे दूसरों की अन्त्येष्टि संसार में उनकी बड़ाई और वैभव के अनुसार धूमधाम से मनाई गई है, वैसे ही श्रीमान दुर्जन की भी (क्योंकि वह इस योग्य नहीं कि चुपचाप अपनी कब्र में उतर जाए) उसकी करनी के अनुसार अन्त्येष्टि की धूमधाम है।
बड़े लोगों की अन्त्येष्टि में चार बातें सामान्य होती हैं, और हम अनुमति लेकर, और मुझे आशा है बिना किसी को ठेस पहुँचाए, श्रीमान दुर्जन की अन्त्येष्टि में उनकी ओर संकेत करेंगे।
पहली, कभी-कभी मरने के बाद वे अपने मित्रों के सामने अपनी पूरी रीति से गढ़ी हुई मूर्तियों के द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं, जो कुशल कारीगरों के हाथों जितनी सजीव बन सकती हैं उतनी सजीव होती हैं; ताकि उनके बाद जीवित रहनेवालों के लिए उनकी स्मृति, उनकी और उनके कामों की स्मृति, ताज़ी की जा सके: और इसे मैंने श्रीमान दुर्जन के विषय में अपनी चर्चा में पूरा करने का यत्न किया है; और इसलिए मैंने उसके बचपन से उसके पके बालों तक उसके नाक-नक्श और कामों सहित उसका चित्र खींचा है। इसलिए यहाँ आप उसे मानो खुदे हुए चित्रों में सजीव रूप से चित्रित पाते हैं; उसकी आयु के लड़कपन, जवानी और बुढ़ापे, तीनों के विषय में, और उसके जीवन के उन कामों सहित भी, जिन्हें करने में वह उस समय, स्थान और बल की तत्कालीन परिस्थितियों में, और उनके अधीन, सबसे अधिक समर्थ था; और उन अवसरों सहित भी जो इन सब में उसे मिलते रहे।
दूसरी, बड़े लोगों की अन्त्येष्टि में उनके सम्मान के वे बिल्ले और कुल-चिन्ह भी सामान्य होते हैं, जो उन्होंने अपने पूर्वजों से पाए हैं, या जिनके योग्य वे अपने जीवन में किए गए कामों और पराक्रमों के कारण समझे गए हैं: और यहाँ श्रीमान दुर्जन के भी अपने हैं, परन्तु ऐसे जो सब योग्य मनुष्यों से भिन्न हैं, पर उसकी करनी की योग्यता से उतने ही अधिक मेल खाते हैं: वे सब तो प्रतिष्ठा के साथ उतरे, परन्तु वह केवल एक निकम्मी शाखा के समान। उसकी कमाई पाप की कमाई है, और इसलिए उसके पास सम्मान के जो कुल-चिन्ह हैं, वे केवल यही हैं कि वह बिना सम्मान के मरा, और अपने अन्त में मूर्ख ठहरा। तू उनके साथ कब्र में न मिलेगा।—कुकर्मियों के वंश का नाम भी कभी न लिया जाएगा।
इसलिए श्रीमान दुर्जन की अन्त्येष्टि की धूमधाम यही है कि उसकी अर्थी पर एक अपमानजनक और दुष्ट जीवन के बिल्ले लगे हों; क्योंकि उसकी हड्डियाँ उसकी जवानी के पापों से भरी हुई हैं, जो, जैसा अय्यूब कहता है, उसके साथ मिट्टी में पड़े रहेंगे: और न यह उचित है कि अब उसकी मृत्यु के समय कोई उसके साथ चलनेवाले हों, सिवाय उनके जिन्होंने उसके साथ अपने जीवन में अपने ही प्राणों के विरुद्ध षड्यन्त्र रचा; ऐसे लोग जिनके अपराधों ने उन्हें उन सब में बदनाम कर दिया है जो जानते हैं या जानेंगे कि उन्होंने क्या-क्या किया है।
इसलिए इस छोटी सी चर्चा में मैंने पाठक को उन लोगों की भी कुछ जानकारी दी है जो उसके जीवन में उसके साथी और उसकी मृत्यु के समय उसके साथ चलनेवाले थे; साथ ही या तो उनके द्वारा किए गए किसी बड़े कुकर्म का संकेत भी, और उन दण्डों का भी जो परमेश्वर के न्यायी और पलटा लेनेवाले हाथ से उन पर आ पड़े और उन्हें आ पकड़ा। ये सब ऐसी बातें हैं जिन्हें या तो मैं पूरी रीति से जानता हूँ, क्योंकि मैं उनका आँखों देखा और कानों सुना गवाह हूँ, या जिन्हें मैंने ऐसे लोगों से पाया है जिनके वर्णन पर, इस विषय में, विश्वास करना मेरा कर्तव्य है। और इसलिए कि पाठक उन्हें इसमें लिखी हुई अन्य बातों और प्रसंगों से अलग पहचान सके, मैंने हाशिये में मानो उँगली से इस प्रकार उनकी ओर संकेत किया है:
तीसरी, प्रतिष्ठित लोगों की अन्त्येष्टि किसी उपयुक्त [उपदेश] के साथ सम्पन्न की जाती रही है; [परन्तु मेरी यह चर्चा] श्रीमान दुर्जन की मृत्यु से आगे नहीं जाती: परन्तु क्योंकि उसे गाड़ा जाना अवश्य है, जब वह देखनेवालों के सामने अपना समय सड़कर दुर्गन्ध देते हुए पूरा कर ले, तो मुझे सन्देह नहीं कि कुछ वैसे लोग, जिनके विषय में हम पढ़ते हैं कि वे गोग को गाड़ने के लिए ठहराए गए हैं, मेरे स्थान पर यह काम करेंगे; ऐसे लोग जो भूमि के ऊपर उसकी न खाल छोड़ेंगे न हड्डी, वरन् उसके पास एक चिन्ह खड़ा करेंगे, जब तक गाड़नेवाले उसे हामोन्गोग की तराई में गाड़ न दें, यहेजकेल 39।
चौथी, अन्त्येष्टियों में शोक और विलाप हुआ करता है, परन्तु यहाँ भी श्रीमान दुर्जन दूसरों से भिन्न है; उसके घनिष्ठ साथी उसके जाने पर विलाप नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें उसकी विनाशकारी दशा का कुछ बोध नहीं है; वे तो मृत्यु की उस नींद में, जिसमें वह वहाँ जाता है, घण्टे बजा-बजाकर और गा-गाकर उसे नरक को विदा करते हैं। भले लोग उसे संसार के लिए कोई हानि नहीं समझते, उसका स्थान उसके बिना भली-भाँति रह सकता है, उसकी हानि केवल उसी की है, और यदि वह लहू के आँसुओं का समुद्र भी बहा सकता, तौभी उस क्षति या हानि को पूरा करने के लिए उसके लिए बहुत देर हो चुकी है। हाँ, परमेश्वर ने कहा है कि वह उसके विनाश पर हँसेगा; तो फिर कौन उसके लिए यह कहकर विलाप करेगा, हाय! मेरे भाई। वह अपने जीवन में केवल एक दुर्गन्धवाला
घास-पात था; और न वह अपनी मृत्यु में तनिक भी उससे अच्छा था: ऐसों को, जब परमेश्वर ने एक बार अपने क्रोध में उन्हें जड़ से उखाड़ दिया हो, तो बिना किसी दुःख के दीवार के ऊपर से फेंक दिया जा सकता है।
हे पाठक, यदि आप श्रीमान दुर्जन की जाति, वंश, कुल या भाईचारे के हैं, तो मैं इस पुस्तक को पढ़ने से पहले ही आपसे कह देता हूँ कि आप न तो लेखक को सह सकेंगे और न इस पुस्तक को, क्योंकि उसने श्रीमान दुर्जन के विषय में ऐसा लिखा है जैसा लिखा है। क्योंकि जो ऐसे मरनेवाले दुष्टों को दोषी ठहराता है, वह जीवित दुष्टों पर भी दण्ड की आज्ञा सुनाता है। इसलिए आपके कुटुम्बी के जीवन के इस वृत्तान्त के लिए मैं आपसे न तो किसी विश्वास की और न किसी समर्थन की आशा रखता हूँ।
क्योंकि अपने मित्र, उसकी चाल, उसके कामों आदि से आपका पुराना प्रेम, इसके विपरीत, आपके हृदय ही में मेरे विरुद्ध बैर भड़काएगा। इसलिए मैं आपके विषय में यही सोचने को झुकूँगा कि आप इसे फाड़ डालेंगे, जला देंगे, या तिरस्कार से फेंक देंगे: हाँ, और यह भी चाहेंगे कि ऐसी खुली सच्चाई लिखने के कारण मुझ पर कोई विपत्ति आ पड़े। मैं यह भी आशा रखता हूँ कि आप मुझ पर घृणा, उपहास और तिरस्कार लादेंगे; हाँ, कि आप निन्दा करते हुए और नीचा दिखाते हुए कहेंगे कि मैं झूठ बोलता हूँ, और ईमानदार लोगों के जीवन और मृत्यु पर कीचड़ उछालता हूँ। क्योंकि श्रीमान दुर्जन, जब वह स्वयं जीवित था, धूर्त गिना जाना सह नहीं सकता था (यद्यपि उसके काम पास से जानेवाले हर एक को बता देते थे कि वह सचमुच ऐसा ही था): तो फिर उसके भाई, जो उसके बाद जीवित हैं, और जो ठीक उसी के पदचिन्हों पर चलते हैं, उस दण्ड की आज्ञा को कैसे उचित मानेंगे जो इस पुस्तक के द्वारा उसके विरुद्ध सुनाई गई है? क्या वे इसके बदले
कोरह, दातान और अबीराम के मित्रों की नकल न करेंगे, और उसे दोषी ठहराने के कारण मेरी निन्दा न करेंगे, जैसे उन्होंने दण्ड देने के कारण मूसा की निन्दा की थी?
मैं जानता हूँ कि करैत के बिल में हाथ डालना बुरा है, और जो जंगली सूअर का शिकार करते हैं वे जोखिम उठाते हैं। जो मनुष्य श्रीमान दुर्जन का जीवन-वृत्तान्त लिखता है, उसे भी झिलम और भाले की छड़ से सुरक्षित रहने की आवश्यकता है, क्योंकि उसके पीछे जीवित रहनेवाले मित्र जान लेंगे कि वह क्या करता है: परन्तु मैंने यह करने का साहस किया है, और इस समय इन नागों के बिल पर खेलने का; यदि वे डसें तो डसें; यदि वे डंक मारें तो डंक मारें। मसीह अपने मेम्नों को भेड़ियों के बीच भेजता है, इसलिए नहीं कि वे उन्हीं के समान करें, परन्तु इसलिए कि उनके बुरे कामों के विरुद्ध साफ़-साफ़ गवाही देने के कारण वे उनके हाथों दुःख उठाएँ: परन्तु क्या इसके लिए मनुष्य को पहरेदारों के साथ चलने, और अपने द्वार पर एक सन्तरी खड़ा रखने की आवश्यकता न होगी?
निश्चय ही शरीर ऐसी सहायता पाकर प्रसन्न होता; हाँ, एक आत्मिक मनुष्य भी, यदि वह जानता कि उसे कैसे पाए। (प्रेरितों के काम 23)
परन्तु मुझसे ये सब छीन लिए गए हैं और मैं नंगा कर दिया गया हूँ, तौभी मुझे आज्ञा दी गई है कि मसीह के लिए अपनी सेवा में विश्वासयोग्य रहूँ। अच्छा तो, मैंने जो कहा सो कहा, और अब मुझ पर जो चाहे वह आ पड़े, अय्यूब 13:13।
यह सच है कि वचन कहता है, ठट्ठा करनेवाले को डाँट, तो वह तुझ से बैर रखेगा; और यह कि, जो दुष्ट जन को डाँटता है वह अपने ऊपर कलंक और लज्जा लाता है; परन्तु तो क्या? खुली हुई डाँट गुप्त प्रेम से उत्तम है; और जो उसे ग्रहण करता है, वह आगे चलकर ऐसा ही पाएगा।
तो फिर, चाहे श्रीमान दुर्जन के मित्र मेरे लिखे पर क्रोध करें या हँसें, मैं जानता हूँ कि लाठी का अच्छा सिरा मेरे हाथ में है। मेरा यत्न जीवन के एक नारकीय मार्ग को रोकना, और एक प्राण को मृत्यु से बचाना है (याकूब 5); और यदि ऐसा करने के कारण मुझे उन्हीं लोगों से डाह मिले, जिनसे उचित रीति से मुझे धन्यवाद मिलना चाहिए, तो मुझे स्वप्न के उस मनुष्य को स्मरण करना चाहिए, जिसने अपने हथियारबन्द शत्रुओं के बीच से अपना मार्ग काटा, और इस प्रकार उस सुन्दर महल में प्रवेश किया; मैं फिर कहता हूँ, मुझे उसे स्मरण करना चाहिए, और स्वयं भी वैसा ही करना चाहिए।
तौभी श्रीमान दुर्जन के मित्रों से मुँह मोड़ने से पहले मैं चार बातें उनके विचार के लिए रखूँगा।
1. मान लीजिए कि सचमुच एक नरक है—इसलिए नहीं कि मैं उस पर सन्देह करता हूँ, उससे बढ़कर नहीं जितना मैं इस पर सन्देह करता हूँ कि चमकने के लिए कोई सूर्य है या नहीं; परन्तु मैं श्रीमान दुर्जन के मित्रों के साथ तर्क के लिए इसे मान लेता हूँ—मैं कहता हूँ, मान लीजिए कि एक नरक है, और वह भी ऐसा जैसा पवित्रशास्त्र बताता है, एक ऐसा जो परमेश्वर और अनन्त जीवन से सबसे अधिक दूरी पर है, एक ऐसा जहाँ दोषी
विवेक का कीड़ा कभी नहीं मरता, और जहाँ परमेश्वर के क्रोध की आग नहीं बुझती।
मैं कहता हूँ, मान लीजिए कि ऐसा एक नरक है, जिसे परमेश्वर ने (जैसा सचमुच है) इस जीवन के बाद भक्तिहीन संसार के शरीर और प्राण के लिए तैयार किया है कि वे उसमें पीड़ा पाएँ: मैं कहता हूँ, आप अपने मन में केवल इसे मान लीजिए, और फिर मुझे बताइए, क्या वह आपके लिए तैयार नहीं किया गया, जब कि आप एक दुष्ट मनुष्य हैं? मैं कहता हूँ, अपने विवेक को बोलने दीजिए, क्या वह आपके लिए तैयार नहीं किया गया, जब कि आप एक भक्तिहीन मनुष्य हैं? और यदि आप अभी वहाँ होते, तो क्या आप सोचते हैं कि आप परमेश्वर के दण्ड से कुश्ती लड़ सकते हैं? तो फिर पतित स्वर्गदूत वहाँ क्यों थरथराते हैं? जिस दिन परमेश्वर आपसे निपटेगा, उस दिन न आपके हाथ दृढ़ रह सकेंगे, न आपका हृदय स्थिर रह सकेगा: यहेजकेल 22:14।
2. मान लीजिए कि कोई, जो अब पाप के कारण नरक में एक प्राण है, उसे फिर यहाँ आकर रहने की अनुमति दी जाए; और उसे यह भी छूट दी जाए कि जीवन सुधारने पर, अगली बार जब वह मरे, तो उस स्थान को बदलकर स्वर्ग और महिमा पा ले; हे दुष्ट मनुष्य, आप क्या कहते हैं? क्या (आपकी समझ में) ऐसा व्यक्ति फिर से जीवन के उसी मार्ग में दौड़ेगा जिसमें वह पहले चलता था, और उस दण्ड का जोखिम उठाएगा जिसमें वह पाप के कारण पहले ही रह चुका है? क्या वह फिर से वह शापित जीवन चुनेगा जो उस पर नरक की ज्वालाओं को नये सिरे से भड़का देगा, और जो उसे परमेश्वर के भारी क्रोध के नीचे बाँध देगा? हाय! वह ऐसा नहीं करेगा, वह ऐसा नहीं करेगा; लूका का सोलहवाँ अध्याय इसका संकेत देता है: हाँ, जागी हुई बुद्धि स्वयं इससे घिन करेगी, और ऐसे विचार पर ही काँप उठेगी।
3. फिर मान लीजिए कि आप, जो अपने पाप में जीते और लोटते हैं, और जिन्होंने अब तक उसके सुख के सिवा कुछ नहीं जाना, एक स्वर्गदूत के द्वारा किसी ऐसे स्थान पर पहुँचाए जाएँ जहाँ से आप सुविधा से स्वर्ग और नरक को देख सकें; एक के आनन्द को, और दूसरे की पीड़ाओं को; मैं कहता हूँ, मान लीजिए कि वहाँ से आप उनका ऐसा दृश्य देख सकें जो आपकी बुद्धि को कायल कर दे कि स्वर्ग और नरक दोनों ऐसी ही वास्तविकताएँ हैं जैसी वचन उन्हें बताता है; तो क्या (आपकी समझ में) फिर अपने घर लाए जाने पर, आप अपने लिए अपना पिछला जीवन चुनेंगे, अर्थात् फिर से अपनी मूर्खता की ओर लौटेंगे? नहीं; यदि जो आपने देखा उसका विश्वास आपके मन में बना रहे, तो आप पहले आग और गन्धक खा लेंगे।
4. मैं फिर एक बात रखूँगा। मान लीजिए कि हमारे बीच ऐसी एक व्यवस्था हो (और दण्ड देने के लिए ऐसा एक न्यायाधीश भी हो), कि आपके द्वारा किए गए हर एक खुले कुकर्म के लिए आपकी हड्डियों से जलते हुए चिमटों से उतना मांस नोच लिया जाए: तो क्या आप अपने झूठ बोलने, कसम खाने, पियक्कड़पन और वेश्यागमन के खुले मार्ग पर चलते रहेंगे, जैसा आप अब आनन्द से करते हैं? निश्चय, निश्चय, नहीं: दण्ड का भय आपको रोक देगा; हाँ, उस समय भी जब आपकी अभिलाषाएँ प्रबल होतीं, यह सोचकर आपको कँपा देगा कि सुख के समाप्त होते ही आपको निश्चय कैसा दण्ड सहना पड़ेगा। परन्तु हाय! श्रीमान दुर्जन के मित्रों के हृदयों में कैसी मूर्खता, कैसा पागलपन, कैसा निराशाजनक पागलपन है, जो एक पवित्र और पाप का पलटा लेनेवाले परमेश्वर की धमकियों के होते हुए भी, और सब
भले लोगों की पुकारों और चेतावनियों के होते हुए भी; हाँ, जो उन लोगों के कराहने और पीड़ाओं के होते हुए भी, जो अब पाप के कारण नरक में हैं (लूका 16:24, 28), जीवन के पापमय मार्ग पर चलते रहेंगे; हाँ, यद्यपि हर एक पाप उस नारकीय गुफा की ओर नीचे उतरने की एक सीढ़ी भी है। हाय, सुलैमान की वह बात कितनी सच्ची है, मनुष्यों के मनों में बुराई भरी हुई है, और जब तक वे जीवित रहते हैं उनके मन में बावलापन रहता है, और उसके बाद वे मरे हुओं में जा मिलते हैं, सभोपदेशक 9:3। मरे हुओं में! अर्थात् नरक के मरे हुओं में, दण्डित मरे हुओं में; उस स्थान में जहाँ वे गए हैं जो दुर्जन होकर मरे, और जहाँ वे भी जो जीते जी
दुर्जन हैं, जाने पर हैं, जब उनके पापी प्राणों ने चोरी के पानी के समान थोड़ा और पाप पी लिया हो।
जिस बात ने मुझसे यह पुस्तक प्रकाशित करवाई है, वह यह है, 1. कि दुष्टता बाढ़ के समान हमारे अंग्रेज़ी संसार को डुबाने पर है: वह अभी से पहाड़ों की चोटियों के ऊपर होने लगी है; उसने लगभग सब कुछ निगल लिया है; हमारे युवा, हमारे अधेड़, बूढ़े, सब के सब, लगभग इस बाढ़ में बह गए हैं। हे लम्पटता, लम्पटता, तूने इंग्लैंड में क्या कर डाला है! तूने हमारे जवानों को बिगाड़ दिया है, और हमारे
बूढ़ों को पशु बना दिया है; तूने हमारी कुँवारियों का कौमार्य भंग किया है, और घर की स्त्रियों को कुटनियाँ बना दिया है। तूने हमारी पृथ्वी को मतवाले की नाईं इधर-उधर डगमगा दिया है; वह मचान की नाईं हटा दी जाने के जोखिम में है, हाँ, क्योंकि अपराध उस पर इतना भारी है, वह ऐसी गिरने पर है कि फिर न उठेगी।
हाय! भला होता कि मैं इंग्लैंड के लिए, और उन पापों के लिए जो उसमें किए जाते हैं, शोक कर सकता, जब कि मैं देखता हूँ कि बिना पश्चाताप के, परमेश्वर के क्रोध के जन, अपने अपने हाथ में नाश करने का हथियार लिए, हमसे निपटने पर हैं: (यहेजकेल 9:1, 2)। अच्छा, मैंने लिख दिया है, और परमेश्वर की सहायता से प्रार्थना करूँगा कि इंग्लैंड में यह बाढ़ घटे: और यदि मैं पहाड़ों की चोटियों को इसके ऊपर देख पाता, तो मैं समझता कि ये जल घट रहे हैं।
2. जो कर सकते हैं उनका यह कर्तव्य है कि वे इस घातक महामारी के विरुद्ध पुकारें, हाँ, इसके विरुद्ध नरसिंगे का सा ऊँचा शब्द करें; ताकि मनुष्य इसके विषय में जाग उठें, और इससे ऐसे भागें जैसे सब बुराइयों में सबसे बड़ी बुराई से। पाप ने स्वर्गदूतों को स्वर्ग से खींच निकाला, वह मनुष्यों को नरक में खींच ले जाता है, और राज्यों को उलट देता है। कौन है जो किसी घर को जलते देखे और उसमें रहनेवालों को चेतावनी न दे? कौन है जो देश पर आक्रमण होते देखे और संकेत-मशालों को न जला दे? कौन है जो शैतानों को गरजनेवाले सिंहों के समान निरन्तर प्राणों को फाड़ खाते देखे और हाहाकार न मचाए? परन्तु सबसे बढ़कर, जब हम पाप को, पापमय पाप को, एक जाति को निगलते हुए, एक जाति को डुबोते हुए, और उसके निवासियों को सांसारिक, आत्मिक और अनन्त विनाश की ओर ले जाते हुए देखें, तो क्या हम न पुकारें, और यह न पुकारें, वे मतवाले हैं, परन्तु दाखमधु से नहीं; वे डगमगाते हैं, परन्तु मदिरा से नहीं; वे पाप के घातक विष से मदहोश हैं, जो, यदि उसकी घातकता हितकारी उपायों से शान्त न की जाए, तो प्राण और शरीर को, और सम्पत्ति और देश को, और सब कुछ को, विनाश और सत्यानाश तक पहुँचा देगा?
3. अपनी इस पुकार में और इसके द्वारा, मैं अपने आप को नाश होनेवालों के विनाश से छुड़ा लूँगा: क्योंकि इस विषय में कोई मनुष्य, मेरा अर्थ मेरी स्थिति के मनुष्य से है, इससे अधिक नहीं कर सकता कि दुष्टता को प्रकट करे और उसे दोषी ठहराए, कुकर्मी को दण्ड के विषय में चेतावनी दे, और स्वयं उससे भागे।
परन्तु हाय! भला होता कि मैं केवल अपने ही आप को न छुड़ाता! हाय, भला होता कि बहुत से लोग मेरी इस पुकार को सुनते, और पाप से फिर जाते! ताकि वे उस मृत्यु और दण्ड से सुरक्षित रहें जो उसके साथ-साथ चलते हैं।
मैंने इस विषय को इस रीति से क्यों लिया है, यह मैं ही सबसे अच्छी तरह जानता हूँ: और जिन व्यक्तियों के पापों या दण्डों का वर्णन मैं इस पुस्तक में यहाँ-वहाँ करता हूँ, उनमें से अधिकतर के नाम मैंने क्यों छिपाए हैं, उसका कारण यह है, 1. कि न तो सब के पाप और न सब के दण्ड एक समान खुले थे; कुछ के पाप किए गए, और उनके लिए दण्ड भी, केवल किसी कोने में दिए गए। यह नहीं कि मैं उनमें से कुछ के नाम जान नहीं सकता था; क्योंकि यदि जान भी पाता, तो इस कारण से मैं उन्हें सार्वजनिक न करता।
2. क्योंकि मैं उनके उन सम्बन्धियों को, जो उनके बाद जीवित हैं, भड़काना नहीं चाहता था; मैं उन्हें उचित कारण से भड़काना नहीं चाहता था, और तौभी, जैसा मैं समझता हूँ, मैं ऐसा ही करता, यदि मैं उनके दण्ड को उनके पापों के साथ, और दोनों को उनके नामों के साथ जोड़कर, इस प्रकार उन्हें संसार के सामने ला खड़ा करता।
3. और न मैं उन्हें अपमान और तिरस्कार के नीचे डालना चाहता था, जो, जैसा मैं समझता हूँ, यदि मैं इसके साथ उनके नाम भी लिख देता, तो अवश्य ही उन पर आ पड़ता।
रहे वे जिनके नाम मैं लेता हूँ, उनके अपराध या दण्ड प्रकट थे; लगभग उतने ही सार्वजनिक जितनी उस प्रकार की कोई भी बात हो सकती है जो मरनहार मनुष्यों पर घटती है। इसलिए ऐसों ने अपने पाप के द्वारा अपनी लज्जा स्वयं प्रकट कर दी है, और परमेश्वर ने खुला पलटा लेकर अपना क्रोध प्रकट कर दिया है।
जैसा अय्यूब कहता है, परमेश्वर ने उन्हें दुष्ट जानकर दूसरों के देखते मारा है, अय्यूब 34:26।
इसलिए मैं नहीं समझ सकता कि जब उनका पाप और दण्ड इतना प्रत्यक्ष था, तो मेरा संसार को उसके विषय में चेतावनी देना उनकी हानि का कारण कैसे बनेगा: क्योंकि इन बातों का प्रकाशित किया जाना, जहाँ तक सम्बन्धियों का सम्बन्ध है, स्मरण दिलाने के लिए है: कि वे भी सोच-विचार करें, पश्चाताप करें और परमेश्वर की ओर फिरें, ऐसा न हो कि उनके पापों के दण्ड पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलनेवाले सिद्ध हों। क्योंकि स्वर्ग के परमेश्वर ने धमकी दी है कि यदि वे उससे बैर रखें, तो वह पितरों के अधर्म का दण्ड उनके बच्चों को तीसरी और चौथी पीढ़ी तक देगा, निर्गमन 20:5।
नबूकदनेस्सर का उसके घमण्ड के लिए दिया गया दण्ड खुला होने के कारण (क्योंकि वह अपने पाप के कारण अपने राजपद से, और मनुष्यों के बीच से भी, निकाल दिया गया, कि बैल की नाईं घास खाए, और पशुओं के संग रहे), दानिय्येल ने उसके पुत्र बेलशस्सर से उसके मुँह पर यह बात कहने में संकोच नहीं किया; और न इसे प्रकाशित करने में, कि आनेवाली पीढ़ियाँ इसे पढ़ें और स्मरण रखें। यही बात यहूदा और हनन्याह आदि के विषय में भी कही जा सकती है; क्योंकि उनका पाप और दण्ड यरूशलेम के सब रहनेवालों को मालूम था, प्रेरितों के काम 1, अध्याय 5।
और यह निराशाजनक अपश्चाताप और मन की कठोरता का ही चिन्ह है, जब उन लोगों की सन्तान या सम्बन्धी, जो अपने पाप के कारण खुले, भयानक और असाधारण दण्डों से गिर पड़े हैं, अपने और अपने घराने के विरुद्ध परमेश्वर के ऐसे बड़े कार्यों को अनदेखा करें, भूल जाएँ, टाल दें, या उन पर कुछ ध्यान न दें। इसी प्रकार दानिय्येल बेलशस्सर के अपराध को और भारी ठहराता है, क्योंकि उसने अपना मन घमण्ड में कठोर कर लिया, यद्यपि वह जानता था कि ठीक उसी पाप और अपराध के कारण उसका पिता अपनी ऊँचाई से नीचे गिराया गया, और गदहों का साथी बना दिया गया। और हे
बेलशस्सर, वह कहता है, तू जो उसका पुत्र है, और यह सब कुछ जानता था, तौभी तेरा मन नम्र न हुआ। दानिय्येल 5। यह सचमुच मर्म पर चोट करनेवाली डाँट है, परन्तु खुले और निरन्तर किए जानेवाले अपराध के लिए मर्म पर चोट करनेवाली डाँट ही सबसे उपयुक्त है।
तो फिर जो लोग ऐसों की सन्तान या सम्बन्धी हैं, जिन्हें उनके अपने पाप ने और परमेश्वर के भयानक दण्डों ने एक चिन्ह बना दिया है (व्यवस्थाविवरण 16:9, 10), और जो गोबर के समान पृथ्वी पर से झाड़ दिए गए हैं, वे चौकस रहें, कहीं ऐसा न हो कि जब उनके पापों के कारण दण्ड उनके द्वार को खटखटाए, जैसा उसने पहले उनके पुरखाओं के द्वार को खटखटाया था, तो वह उन पर भी उतनी ही भारी चोट के साथ पड़े जितनी उन पर जो उनसे पहले चले गए: कहीं ऐसा न हो, मैं कहता हूँ, कि उस दिन उन्हें दया मिलने के बदले, अपने बड़े, ढीठ और दण्ड का अपमान करनेवाले पापों के कारण, बिना दया का दण्ड मिले।
अन्त में, जो श्रीमान दुर्जन की मृत्यु नहीं मरना चाहते, वे श्रीमान दुर्जन के मार्गों से सावधान रहें: क्योंकि उसके मार्ग उसके अन्त तक पहुँचाते हैं; दुष्टता उसको नहीं छुड़ाएगी जो उसमें लगा रहता है; चाहे वे सब कुछ को धर्म के अंगीकार से ढाँप भी लें।
यदि पुराने समय में पुरुष का स्त्री के वस्त्र पहनना अपराध था, तो निश्चय ही अब किसी पापी का मसीही अंगीकार को आड़ बनाकर ओढ़ना अपराध है। भेड़ों के
भेष में भेड़िए आज इंग्लैंड में झुण्ड के झुण्ड भरे हुए हैं: भेड़िए, शिक्षा के विषय में भी, और आचरण के विषय में भी।
मुझे सन्देह है कि कुछ लोग जान-बूझकर इसलिए धर्म का अंगीकार करते हैं कि वे चालाकी से किसी व्यापार में घुस जाएँ; और वहाँ से सम्पत्ति तक; हाँ, और आवश्यकता हो तो धूर्तता से, अपने पड़ोसी के विनाश के द्वारा, सम्पत्ति तक: ऐसे लोग सावधान रहें, क्योंकि जो ऐसे काम करते हैं उन्हें अधिक दण्ड मिलेगा।
हे मसीही, सुसमाचार के अनुसार चाल-चलन के द्वारा अपने अंगीकार को चमकाइए: नहीं तो आप धर्म की हानि करेंगे, अपने भाइयों पर कलंक लाएँगे, और शत्रुओं को ठोकर का कारण देंगे; और ऐसा करने से यह भला होता कि चक्की का पाट आपके गले में लटकाया जाता, और आप, इस प्रकार सजे हुए, समुद्र के तल में डाल दिए जाते।
हे मसीही, सुसमाचार के अनुसार अंगीकार इन दिनों एक दुर्लभ वस्तु है; तो उसी की खोज कीजिए, उसे पहन लीजिए, और उसे निष्कलंक रखिए; और (जैसा आपको शोभा देता है) श्वेत और स्वच्छ रखिए, और आप एक दुर्लभ मसीही होंगे।
अन्तिम समयों की भविष्यद्वाणी यह है कि अंगीकार करनेवाले लोग (क्योंकि मैं वचन को ऐसा ही समझता हूँ), उनमें से बहुत से, नीच होंगे; (2 तीमुथियुस 3) परन्तु आप उन बातों पर बने रहिए जो आपने सीखी हैं, कामुक मनुष्यों से नहीं, न स्वेच्छाचारी समयों से, परन्तु परमेश्वर के वचन और शिक्षा से, जो भक्ति के अनुसार है; और आप श्वेत वस्त्र पहने हुए मसीह के साथ चलेंगे।
अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपने लोगों को अनुग्रह दे, कि वे न तो पापियों से बैर रखें या उनका बुरा चाहें, और न उनके किसी मार्ग को चुनें, वरन् उस नाम और उन नियमों के अनुसार बोलने और करने के द्वारा, जिन्हें जानने और प्रेम करने का वे अंगीकार करते हैं, अपने आप को सब मनुष्यों के लोहू से निर्दोष रखें; यीशु मसीह के लिए।
श्रीमान दुर्जन का जीवन और मृत्यु — संसार के सामने एक घरेलू संवाद के रूप में प्रस्तुत, श्रीमान बुद्धिमान और श्रीमान [सावधान] के बीच।
शुभ प्रभात, मेरे भले पड़ोसी, श्रीमान सावधान; आज सवेरे इतनी जल्दी आप कहाँ टहलने जा रहे हैं? मुझे लगता है आप ऐसे दिखते हैं मानो किसी साधारण से बढ़कर बात के विषय में चिन्तित हों। क्या आपका कोई पशु खो गया है, या क्या बात है?
सावधान. भले महाशय, आपको भी शुभ प्रभात, मेरा अब तक कुछ खोया तो नहीं है, परन्तु तौभी आपने मेरे विषय में ठीक अनुमान लगाया है, क्योंकि जैसा आप कहते हैं, मैं अपने हृदय में चिन्तित हूँ, परन्तु वह समय की बुराई के कारण है। और महाशय, जैसा हमारे सब पड़ोसी जानते हैं, आप बड़े ध्यान से देखनेवाले मनुष्य हैं, इसलिए कृपया बताइए कि आप इस समय के विषय में क्या सोचते हैं?
बुद्धिमान. क्यों? मैं भी वही सोचता हूँ जो आप कहते हैं, अर्थात् कि यह बुरा समय है, और तब तक बुरा ही रहेगा जब तक मनुष्य अच्छे न हो जाएँ: क्योंकि बुरे मनुष्य ही बुरा समय बनाते हैं; इसलिए यदि मनुष्य सुधर जाएँ, तो समय भी सुधर जाए। जब तक पाप इतना ऊँचा है, और उसे पालने-पोसने में लगे रहनेवाले इतने बहुत हैं, तब तक अच्छे दिनों की आशा करना मूर्खता है। परमेश्वर उसे नीचे गिराए, और जो उसे पालते हैं उन्हें पश्चाताप तक पहुँचाए, और तब, मेरे भले पड़ोसी, आप चिन्तित तो होंगे, पर वैसे नहीं जैसे अब हैं: अब आप इसलिए चिन्तित हैं कि समय इतना बुरा है; परन्तु तब आप इसलिए होंगे कि समय इतना अच्छा है: अब आप ऐसे चिन्तित हैं कि व्याकुल हैं, परन्तु तब आप ऐसे चिन्तित होंगे कि जयजयकार के साथ अपना शब्द ऊँचा करेंगे; क्योंकि मैं साहस से कह सकता हूँ कि यदि आप ऐसे दिन देख पाते, तो वे आपसे जयजयकार करवाते।
सावधान. हाँ, अवश्य करवाते; ऐसे समय के लिए मैंने प्रार्थना की है, ऐसे समय की मैंने लालसा की है: परन्तु मुझे डर है कि अच्छा होने से पहले वह और भी बुरा होगा।
बुद्धिमान. भाई, कोई निष्कर्ष मत निकालिए: क्योंकि जिसके हाथ में मनुष्यों के हृदय हैं, वह उन्हें बुरे से अच्छा बदल सकता है, और इस प्रकार बुरे समय को अच्छे समय में। परमेश्वर उन्हें लम्बी आयु दे जो भले हैं, और विशेष करके उनमें से उन्हें जो संसार में उसकी सेवा करने के योग्य हैं। परमेश्वर और उसके आश्चर्यकर्मों के बाद, इस निचले संसार का आभूषण और सौन्दर्य वे मनुष्य हैं जो भक्ति में जगमगाते और चमकते हैं।
अब जब श्रीमान बुद्धिमान ने यह कहा, तो उसने एक गहरी आह भरी।
सावधान. आमीन। आमीन। परन्तु, भले महाशय, आप इतनी गहरी आह क्यों भरते हैं? क्या यह किसी और बात के लिए है, सिवाय उसके जिसके लिए, जैसा आपने भाँप लिया है, मैं स्वयं चिन्तित हूँ?
बुद्धिमान. समय की बुराई के कारण मैं आपके साथ चिन्तित हूँ; परन्तु वह उस आह का कारण नहीं था, जिस पर, जैसा मैं देखता हूँ, आपने ध्यान दिया है। मैंने उस मनुष्य की मृत्यु को स्मरण करके आह भरी जिसके लिए कल हमारे नगर में घण्टा बजा था।
सावधान. क्यों? मैं समझता हूँ, आपका पड़ोसी श्रीमान सज्जन तो नहीं मरा। हाँ, मैंने सुना अवश्य था कि वह बीमार रहा है।
बुद्धिमान. नहीं, नहीं, वह नहीं है। यदि वह होता, तो मैं चिन्तित हुए बिना न रह सकता, परन्तु तौभी वैसा नहीं जैसा अब चिन्तित हूँ। यदि वह मरता, तो मैं केवल इसलिए चिन्तित होता कि संसार ने एक ज्योति खो दी: परन्तु जिस मनुष्य के लिए मैं अब चिन्तित हूँ, वह ऐसा था जो कभी भला नहीं था, इसलिए ऐसा व्यक्ति है जो केवल मरा ही नहीं, वरन् दण्ड के योग्य ठहराया गया है। वह इसलिए मरा कि मरे, वह जीवन से मृत्यु में गया, और फिर मृत्यु से मृत्यु में, स्वाभाविक मृत्यु से
अनन्त मृत्यु में। और जब वह यह कह रहा था, तो उसकी आँखों में आँसू भर आए।
सावधान. सचमुच, मृत्यु-शय्या से नरक में जाना सोचने में भी भयानक बात है। परन्तु भले पड़ोसी बुद्धिमान, कृपा करके मुझे बताइए कि यह मनुष्य कौन था, और आप क्यों यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वह अपनी मृत्यु में इतना अभागा था?
बुद्धिमान. अच्छा, यदि आप ठहर सकें, तो मैं आपको बताऊँगा कि वह कौन था, और मैं उसके विषय में ऐसा निष्कर्ष क्यों निकालता हूँ।
सावधान. मुझे ठहरने का अवकाश है, और मैं आपकी पूरी बात सुनने को तैयार हूँ। और मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि आपकी बातें मेरे हृदय को पकड़ लें, ताकि उनके द्वारा मैं सुधर जाऊँ। तब वे एक पेड़ के नीचे बैठने को सहमत हुए: तब श्रीमान बुद्धिमान ने इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
बुद्धिमान. जिस मनुष्य की मैं बात करता हूँ, वह एक श्रीमान दुर्जन है; वह बहुत समय तक हमारे नगर में रहा है, और अब, जैसा मैंने कहा, वह मर गया है। परन्तु उसकी मृत्यु पर मेरे इतना चिन्तित होने का कारण यह नहीं कि उसका मुझसे कोई भी नाता था, या यह कि उसके साथ कोई भले गुण मर गए, क्योंकि वह उनसे बहुत दूर था, परन्तु यह कि, जैसा मुझे बड़ा डर है, वह, जैसा पहले संकेत किया गया था, एक साथ दो मृत्यु मरा है।
सावधान. एक साथ दो मृत्यु से आपका जो अर्थ है, वह मैं समझता हूँ; और सच कहूँ तो किसी के विषय में ऐसा सोचने का आधार होना भयानक बात है: क्योंकि यद्यपि भक्तिहीनों और पापियों की मृत्यु को थोड़े ही लोग मन में लाते हैं, तौभी ऐसी दशा में मरना किसी भी मनुष्य की कल्पना से अधिक भयानक और डरावना है। सचमुच यदि मनुष्य का कोई प्राण न होता, यदि उसकी दशा सचमुच अमर न होती, तो बात इतनी बड़ी न होती; परन्तु मनुष्य का अपने सृजनहार के द्वारा ऐसा ठहराया जाना कि वह सदा के लिए एक चेतन प्राणी रहे, और फिर उसका पलटा लेनेवाले न्याय के हाथों में पड़ जाना, जो सदा, उस अत्यन्त सीमा तक जिसके उसका पाप योग्य है, नरक की भयानक कालकोठरी में उसे दण्ड देता रहेगा, यह अवश्य ही कहने से बाहर दुःखद और विलाप के योग्य होगा।
बुद्धिमान. मैं समझता हूँ कि ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो एक प्राण के मूल्य का बोध रखता हो, और जब वह बिना मन-परिवर्तन के मनुष्यों की मृत्यु के विषय में सुने, तो शोक और दुःख से मारा न जाए: क्योंकि, जैसा आपने ठीक कहा, उस मनुष्य की दशा ऐसी है कि वह सदा के लिए एक चेतन प्राणी रहता है। क्योंकि चेतना ही दण्ड को भारी बनाती है। परन्तु तौभी दण्डितों के पास केवल चेतना ही नहीं है, उनके पास चेतना और बुद्धि दोनों हैं; तो फिर, जैसे चेतना दण्ड को दुःख के साथ ग्रहण करती है क्योंकि वह उसे अनुभव करती है, और उसके नीचे लहूलुहान होती है, वैसे ही बुद्धि के द्वारा, और उसके प्रयोग के द्वारा, पीड़ा के बीच में, सारा वर्तमान क्लेश बढ़ जाता है, और वह तीन प्रकार से:
1. बुद्धि अपने आप से यों विचार करेगी; मैं किस लिए इस प्रकार पीड़ित किया जा रहा हूँ? और सहज ही पाएगी कि यह और किसी बात के लिए नहीं, केवल उस नीच और गन्दी वस्तु, पाप, के लिए है; और अब दण्ड के साथ झुँझलाहट मिल जाएगी, और वह क्लेश को बहुत बढ़ा देगी।
2. बुद्धि अपने आप से यों विचार करेगी। कब तक मेरी यह दशा रहनी है? और शीघ्र ही अपने आप को यह उत्तर देगी: युगानुयुग मेरी यही दशा रहनी है। अब यह पीड़ा को बहुत बढ़ा देगा।
3. बुद्धि अपने आप से यों विचार करेगी; मैंने जो पाप किए हैं, उनके द्वारा मैंने वर्तमान चैन और शान्ति से बढ़कर क्या खोया है? और शीघ्र ही अपने आप को यह उत्तर देगी: मैंने परमेश्वर, मसीह, पवित्र लोगों और स्वर्गदूतों के साथ संगति खो दी है, और स्वर्ग और अनन्त
जीवन में अपना भाग भी: और यह भी बेचारे दण्डित प्राणों के दुःख को अवश्य ही बढ़ाता है। और यही श्रीमान दुर्जन की दशा है।
सावधान. ऐसी दशा में पहुँचने के विचार से ही मेरा हृदय काँप उठता है। नरक! जो अभी जीवित है, उसमें से कौन जानता है कि नरक की पीड़ाएँ क्या हैं? यह शब्द नरक बड़ा ही भयानक सुनाई देता है।
बुद्धिमान. हाँ, उसके कानों में तो अवश्य ऐसा ही सुनाई देता है जिसका विवेक कोमल है। परन्तु यदि, जैसा आप कहते हैं, और सच कहते हैं, नरक का नाम ही इतना भयानक है, तो वह स्थान स्वयं क्या है, और वे दण्ड क्या हैं जो वहाँ दण्डित मनुष्यों के प्राणों पर, और वह भी बिना तनिक भी विराम के, युगानुयुग दिए जाते हैं।
सावधान. अच्छा, पर इसे छोड़िए; मुझे ठहरने का अवकाश है, इसलिए कृपया मुझे बताइए कि वह क्या बात है जिससे आप सोचते हैं कि श्रीमान दुर्जन नरक में गया है।
बुद्धिमान. मैं आपको बताऊँगा। परन्तु पहले, क्या आप जानते हैं कि मैं दुर्जनों में से किसकी बात कर रहा हूँ?
सावधान. क्यों, क्या वे एक से अधिक थे?
बुद्धिमान. हाँ, बहुत से, भाई भी और बहनें भी, और तौभी वे सब एक भक्त माता-पिता की सन्तान थे, जो और भी बड़े खेद की बात है।
सावधान. तो उनमें से कौन मरा?
बुद्धिमान. सबसे बड़ा, वर्षों में भी पुराना, और पाप में भी पुराना; परन्तु जो पापी सौ वर्ष का होकर मरे, वह श्रापित ठहरेगा।
सावधान. अच्छा, परन्तु आप किस कारण सोचते हैं कि वह नरक में गया है?
बुद्धिमान. उसके दुष्ट जीवन और भयानक मृत्यु के कारण, विशेष करके इसलिए कि उसकी मृत्यु की रीति उसके जीवन से इतना मेल खाती थी।
सावधान. कृपया मुझे उसकी मृत्यु की रीति बताइए, यदि आप स्वयं उसे पूरी रीति से जानते हों।
बुद्धिमान. जब वह मरा तब मैं वहाँ था: परन्तु मैं नहीं चाहता कि (जब तक मैं जीवित रहूँ) ऐसे किसी और मनुष्य को उस रीति से मरते देखूँ जैसे वह मरा।
सावधान. तो कृपया मुझे वह सुनाइए।
बुद्धिमान. आप कहते हैं कि आपको अवकाश है और आप ठहर सकते हैं, इसलिए, यदि आप चाहें, तो हम उसके विषय में क्रम से ही बात करेंगे। पहले, हम उसके जीवन से आरम्भ करेंगे, और फिर उसकी मृत्यु की ओर बढ़ेंगे: क्योंकि पहले का वर्णन, जब आप दूसरे के विषय में सुनेंगे, आप पर और भी अधिक प्रभाव डाल सकता है।
सावधान. तो क्या आप उसके जीवन को इतनी अच्छी तरह जानते थे?
बुद्धिमान. मैं उसे बचपन से जानता था। मैं तब पुरुष था, जब वह केवल लड़का था, और मैंने आरम्भ से अन्त तक उस पर विशेष ध्यान रखा।
सावधान. तो कृपया अब मुझे उसके जीवन का वृत्तान्त सुनाइए; परन्तु जितना हो सके उतना संक्षेप में कहिए, क्योंकि मैं उसकी मृत्यु का ढंग सुनने को तरस रहा हूँ।
बुद्धिमान. मैं आपकी इच्छा पूरी करने का यत्न करूँगा; और पहले तो मैं आपको यह बताऊँगा कि वह बचपन ही से बहुत बुरा था: उसका आरम्भ ही अशुभ था, और इस बात का पूर्व-संकेत देता था कि उसके पीछे, सम्भवतः, कोई भला अन्त आनेवाला नहीं है। कई ऐसे पाप थे जिनमें वह तब भी लगा रहता था जब वह अभी छोटा ही था, और उनसे प्रगट होता था कि वह मूल भ्रष्टता से बुरी तरह ग्रस्त है; क्योंकि मैं निश्चय से कह सकता हूँ कि उनमें से एक भी पाप उसने अपने पिता या माता से नहीं सीखा था; और न उसे बाहर जाकर दूसरे नीच बच्चों के बीच अधिक घूमने दिया जाता था कि वह उनसे पाप करना सीखे: नहीं, इसके विपरीत, यदि कभी वह बाहर दूसरों के बीच पहुँच भी जाता, तो वह गन्दी बातों का गढ़नेवाला और बुरे कामों का नमूना बन जाता था। जैसा हम कहते हैं, वह बचपन ही से उन सब का सरगना और पाप करने में उस्ताद हुआ करता था।
सावधान. सचमुच यह बुरा आरम्भ था, और इससे प्रमाणित होता था कि, जैसा आप कहते हैं, वह मूल भ्रष्टता से दूषित, बहुत ही दूषित था। क्योंकि अपने मन की बात खुलकर कहूँ, तो मैं मानता हूँ कि मेरी राय यही है कि बच्चे पाप से दूषित होकर संसार में आते हैं, और उनकी जवानी के पाप, विशेषकर जब वे बहुत छोटे होते हैं, अक्सर दूसरों के द्वारा उनके सामने रखे गए उदाहरणों के कारण नहीं, बल्कि भीतर बसे हुए पाप के बल से होते हैं। यह नहीं कि वे उदाहरण से भी पाप करना नहीं सीखते, परन्तु उदाहरण जड़ नहीं है, वह तो दुष्टता की ओर केवल एक परीक्षा है। जड़ तो भीतर का पाप है; क्योंकि भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से, निकलते हैं
बुद्धिमान. मुझे यह सुनकर आनन्द हुआ कि आपकी भी यही राय है; और आपने जो कहा है उसकी पुष्टि मैं वचन से कुछ संकेतों के द्वारा करूँगा। मनुष्य की तुलना उसके जन्म की दशा में गदहे से (जो एक अशुद्ध पशु है) और अपने लहू में पड़े हुए एक अभागे शिशु से की गई है: इसके अतिरिक्त, प्राचीन काल में जितने पहिलौठे प्रभु को अर्पित किए जाते थे, उन सब को एक महीने की आयु में छुड़ाया जाना था, और यह उससे पहले होता था कि वे पापी बनें
5 दूसरों की नकल के द्वारा। पवित्रशास्त्र यह भी दृढ़ता से कहता है कि एक के पाप के द्वारा सब पर दण्ड आया; और इसका कारण यह बताता है, कि इसलिये कि सब ने पाप किया: और यह आपत्ति एक तिनके के बराबर भी मूल्य नहीं रखती कि मसीह ने अपनी मृत्यु के द्वारा मूल पाप को दूर कर दिया है। पहला, इसलिये कि इसका पवित्रशास्त्र में कोई आधार नहीं। दूसरा,
इसलिये कि यह बात उन्हें मसीह के द्वारा उद्धार पाने के अयोग्य बना देती है; क्योंकि उसके द्वारा उद्धार केवल उन्हीं को मिलना है जो अपने निज व्यक्तित्व में पापी हैं। और भी बहुत-सी बातें जोड़ी जा सकती हैं, परन्तु आप और मुझ जैसे पूरी तरह सहमत लोगों के बीच, अभी के लिये इतनी ही काफ़ी हैं: परन्तु जब कोई विरोधी इस विषय में हमसे उलझने आए, तब उसके लिये हमारे पास अक्सर और भी दृढ़
6 तर्क रहते हैं, यदि वह विरोधी ध्यान देने योग्य हो।
सावधान. परन्तु, जैसा पहले संकेत किया गया, वह दूसरे बच्चों के बीच पाप का सरगना, या शरारत का उस्ताद हुआ करता था; तौभी ये तो केवल सामान्य बातें हैं; इसलिये कृपया मुझे विस्तार से बताइए कि उसके बचपन के पाप कौन-कौन से थे।
7 बुद्धिमान. ऐसा ही करूँगा। जब वह अभी बच्चा ही था, तब वह झूठ बोलने का ऐसा आदी था कि उसके माता-पिता कठिनाई से जान पाते थे कि कब उसकी बात को सच मानें; हाँ, वह झूठ गढ़ता, कहता, और उन झूठों पर अड़ा रहता था
3 मूल पाप ही प्रत्यक्ष अपराधों की जड़ है।
5 अय्यूब 11:12। यहेजकेल 16। निर्गमन 13:13; अध्याय 34:20।
7 दुर्जन बचपन से झूठ बोलने का आदी।
जिन्हें उसने स्वयं गढ़ा और कहा था, और वह भी ऐसे ढीठ चेहरे के साथ कि इस विषय में उसके मुख ही पर एक कठोर और हताश मन के लक्षण पढ़े जा सकते थे।
सावधान. सचमुच यह बुरा आरम्भ था, और यह दिखाता है कि उसने बहुत जल्दी ही अपने आप को पाप में कठोर करना आरम्भ कर दिया। क्योंकि जानबूझकर झूठ बोलना और उस पर अड़े रहना (और मैं समझता हूँ कि झूठ बोलने में उसका यही ढंग था) तब तक सम्भव नहीं जब तक मनुष्य मानो अपने मन को ज़बरदस्ती उसमें न धकेले। हाँ, उसे
8 ऐसा करने के लिये अपने मन को कठोर और ढीठ बनाना पड़ता है: हाँ, इस प्रकार करने के लिये वह अवश्य ही दुष्टता की बहुत ऊँची सीमा तक पहुँच चुका होगा, क्योंकि यह सब उसने उस अच्छी शिक्षा के विरुद्ध किया, जो, जैसा आपने पहले संकेत किया लगता है, उसे अपने पिता और माता से मिली थी।
बुद्धिमान. जैसा आपने संकेत किया है, अच्छी शिक्षा का अभाव बहुधा इस बात का कारण होता है कि बच्चे इतनी आसानी से और इतनी जल्दी बुरे बन जाते हैं; विशेषकर जब केवल उसका अभाव ही नहीं, बल्कि बुरे उदाहरण भी भरपूर हों, जैसे कि, बड़े खेद की बात है, बहुत-से घरानों में होते हैं; जिनके कारण बेचारे बच्चे पाप ही में पाले-पोसे जाते हैं, और शैतान और नरक के लिये उसी में पलते हैं।
परन्तु श्रीमान दुर्जन के साथ ऐसा नहीं था, क्योंकि मैं जानता हूँ कि उसका यह झूठ बोलने का ढंग उसके माता-पिता के लिये बड़े दुःख का कारण था, क्योंकि अपने पुत्र के इस आरम्भ से उनके मन बहुत उदास थे; और यदि उससे वह सुधर सकता, तो उनकी ओर से उसे सलाह और ताड़ना की कोई कमी न थी। मेरे सुनते हुए उसे बार-बार, बार-बार यह बताया गया था कि सब
झूठों का भाग उस झील में होगा जो आग और गन्धक से जलती रहती है; और कि जो कोई झूठ को चाहता और गढ़ता है, उसका नये और स्वर्गीय यरूशलेम में कोई भाग न होगा:
9 परन्तु उस पर किसी बात का कोई असर न हुआ; जब झूठ बोलने की सनक या अवसर उस पर आता, तो वह अपना झूठ गढ़ता, कहता, और उस पर अड़ा रहता (ऐसी दृढ़ता से मानो वह सबसे बड़ा सत्य हो), और वह भी अपने मन और मुख को ऐसा कठोर करके कि पास खड़े लोगों को आश्चर्य होता था। नहीं, वह यह तब भी करता था जब वह ताड़ना की उस छड़ी के नीचे होता था, जो परमेश्वर ने माता-पिता के उपयोग के लिये ठहराई है, कि वे उसके द्वारा अपने बच्चों को नरक से बचाए रखें।
सावधान. सचमुच, जैसा मैंने कहा, यह बुरा आरम्भ था; उसने बहुत जल्दी शैतान की सेवा की; हाँ, वह 11 12 उसकी औलादों में से एक का धाय बन गया, क्योंकि झूठ की आत्मा शैतान की औलाद है; क्योंकि वह झूठा है, और झूठ का पिता है।
बुद्धिमान. ठीक है, सचमुच वही उसका पिता है। झूठ शैतान से, जो पिता है, उत्पन्न होता है, और दुष्ट मन से, जो माता है, जन्म लेता है: इसी कारण एक और पवित्रशास्त्र भी कहता है,
13 शैतान ने क्यों तेरे मन को भर दिया कि तू झूठ बोले, इत्यादि। हाँ, वह उस मन को, जो झूठ से गर्भवती है, ऐसा मन कहता है जिसने गर्भ धारण किया है, अर्थात् शैतान से। तू ने यह बात क्यों गर्भ में धारण की (विचारी) 8 जानबूझकर बोला गया झूठ प्रमाणित करता है कि मन बहुत ही कठोर है।
9 झूठों का भाग। प्रकाशितवाक्य 21:8, 27; अध्याय 22:15।
10 नीतिवचन 22:15; अध्याय 23:13, 14।
अपने मन में? तू मनुष्यों से नहीं, परन्तु परमेश्वर से झूठ बोला। यह सच है कि उसका झूठ सबसे ऊँचे
14 प्रकार का झूठ था, परन्तु हर झूठ का वही पिता और वही माता है जो उस अभी बताए गए झूठ के थे। क्योंकि 15 वह झूठा है, और झूठ का पिता है। तो झूठ नरक की औलाद है, और वह मन में तब तक नहीं आ सकता जब तक मनुष्य शैतान के साथ एक प्रकार का आत्मिक व्यभिचार न कर ले। इसलिये जो प्राण जानबूझकर झूठ बोलता है, वह शैतान के साथ सोया है, और झूठ के एकमात्र पिता शैतान के साथ सोने से उसने उस झूठ को गर्भ में धारण किया है। क्योंकि झूठ का केवल एक ही पिता और एक ही माता है, शैतान और मन। इसलिये कोई आश्चर्य नहीं कि जो मन झूठ को सेते और जन्म देते हैं, उनका रंग-रूप शैतान से इतना मिलता-जुलता हो। हाँ, कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर और मसीह ने अपने वचन को झूठों के विरुद्ध इतना तान रखा है: झूठा तो स्वयं शैतान से ब्याहा हुआ है।
सावधान. मेरी आँखों में यह बड़े आश्चर्य की बात लगती है कि जब झूठ शैतान की सन्तान है, और जब झूठ प्राण को ठीक शैतानों की माँद में, अर्थात् नरक की अँधेरी कालकोठरी में, ले जाता है, तब भी मनुष्य ऐसे हताश रूप से दुष्ट हों कि ऐसी भयानक बात के आदी हो जाएँ।
बुद्धिमान. मुझे भी यह आश्चर्यजनक लगता है, विशेषकर जब मैं देखता हूँ कि कितनी छोटी-सी बात के लिये कुछ लोग सोच-विचार करके, युक्ति लगाकर झूठ गढ़ते और बोलते हैं। आप ऐसे लोग पाएँगे जो बार-बार 16 झूठ बोलेंगे, और वह भी एक पैसे के लाभ के लिये। हाँ, झूठ बोलेंगे और उस पर अड़े रहेंगे, यद्यपि वे जानते हैं कि वे झूठ बोल रहे हैं: हाँ, आप ऐसे मनुष्य भी पाएँगे जो झूठ पर झूठ बोलने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते, यद्यपि उससे उन्हें स्वयं कुछ भी नहीं मिलता; वे अपने पड़ोसियों के साथ साधारण बातचीत में झूठ बोलेंगे, और उनके समाचार, उनके हँसी-ठट्ठे और उनकी कहानियाँ भी झूठ से सजाई ही जानी चाहिएँ; नहीं तो वे कानों को अच्छी नहीं लगतीं, और न उस व्यक्ति की कल्पना को अधिक भाती हैं जिससे वे कही जाती हैं। परन्तु हाय, ये झूठे तब क्या करेंगे, जब अपने झूठों के कारण वे नरक में, उसी शैतान के पास लुढ़का दिए जाएँगे जिसने उनके मन में उन झूठों को उत्पन्न किया था, और इस प्रकार उसके साथ आग और गन्धक से, और वह भी युगानुयुग, अपने झूठों के कारण पीड़ा पाएँगे?
सावधान. क्या आप झूठों पर परमेश्वर के दण्डों का कोई उदाहरण नहीं दे सकते, कि जब कोई झूठों को झूठ बोलते सुने तो उन्हें वह सुना सके, कि कदाचित् उसे सुनकर वे झूठ बोलने से डरें और लज्जित हों?
17 बुद्धिमान. उदाहरण! क्यों, हनन्याह और उसकी पत्नी सफीरा ही, कोई भी सोचेगा, उस आत्मा को रोकने के लिये पर्याप्त उदाहरण हैं जो झूठ की आदी हो; क्योंकि वे दोनों झूठ बोलने के कारण मरकर गिर पड़े, और वह भी स्वयं परमेश्वर के हाथ से, लोगों की एक भीड़ के बीच में। परन्तु यदि झूठों को नरक की आग और स्वर्ग के राज्य के खो देने की परमेश्वर की धमकी भी उन पर ऐसा प्रभाव नहीं डालती कि वे झूठ बोलना और झूठ गढ़ना छोड़ दें, तो यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि उन सांसारिक
दण्डों का वृत्तान्त, जिन्होंने पहले के समय में झूठों को संसार से झाड़कर मिटा दिया, ऐसा कर सकेगा। अब, जैसा मैंने कहा, 14 झूठ का पिता और माता।
16 कुछ लोग एक पैसे के लाभ के लिये झूठ बोलेंगे।
17 झूठों के लिये एक उदाहरण। प्रेरितों के काम 5।
यह झूठ बोलना उन पहले पापों में से एक था जिनके श्रीमान दुर्जन आदी थे, और वह झूठ भयानक रूप से गढ़ और बोल सकता था।
सावधान. उसके विषय में यह सुनकर मुझे दुःख होता है, और इसलिये और भी अधिक कि, जैसा मुझे डर है, यह पाप 18 उसमें अकेला राज्य नहीं करता था; क्योंकि जो झूठ बोलने का आदी होता है, वह प्रायः इसके अतिरिक्त दूसरी बुराइयों का भी आदी होता है; और यदि श्रीमान दुर्जन के साथ भी ऐसा न होता, तो सचमुच यह आश्चर्य की बात होती।
बुद्धिमान. आप सच कहते हैं; झूठा केवल झूठ की आत्मा ही का नहीं, और भी बातों का बन्दी दास होता है: और 19 इसलिये यह श्रीमान दुर्जन, जैसे बचपन से झूठा था, वैसे ही छोटी-मोटी चीज़ें उठाने और चोरी करने में भी बहुत लगा रहता था; यहाँ तक कि जिस चीज़ पर, जैसा हम कहते हैं, वह सफ़ाई से हाथ डाल सकता, वह उसकी अपनी गिनी जाती थी, चाहे वे उसके साथी बच्चों की चीज़ें हों; या यदि वह किसी पड़ोसी के घर में किसी चीज़ पर हाथ डाल पाता, तो उसे उठा ले जाता था; आप मेरी बात को छोटी-छोटी तुच्छ चीज़ों के विषय में समझिए; क्योंकि अभी बच्चा ही होने के कारण उसने, विशेषकर आरम्भ में, कोई बड़ा काम करने का प्रयास नहीं किया। परन्तु जैसे-जैसे वह बल में और बुद्धि की परिपक्वता में बढ़ता गया, वैसे-वैसे वह पहले से अधिक मूल्य की चीज़ें उठाने और चुराने का प्रयास करने लगा। अन्त में उसे बगीचों और फलों के बागों को लूटने में बड़ा आनन्द आने लगा;
20 और बड़े होने पर, पड़ोस से मुर्गियाँ चुराने में: हाँ, जो कुछ उसके पिता का था, वह भी उसकी उँगलियों से बच न सका; जो कुछ उसके जाल में आता, सब उसके लिये मछली ही था; अन्त में वह इस बुराई में भी इतना कठोर हो गया था।
सावधान. आप मुझे और भी अधिक आश्चर्य में डालते हैं। क्या, चोर भी बन बैठा! क्या, इतनी जल्दी चोर बन बैठा! यद्यपि वह अभी बच्चा ही था, तौभी वह यह जाने बिना नहीं रह सकता था कि जो कुछ वह दूसरों से लेता था, वह उसका अपना नहीं था। इसके अतिरिक्त, यदि उसका पिता, जैसा आप कहते हैं, एक भला मनुष्य था, तो यह हो ही नहीं सकता कि उसने उससे यह न सुना हो कि चोरी करना परमेश्वर की व्यवस्था का उल्लंघन करना है, और इस प्रकार अनन्त दण्ड के जोखिम में पड़ना है।
बुद्धिमान. उसका पिता उसे सुधारने के साधन काम में लाने से नहीं चूका; जैसा मुझे 21 बताया गया है, वह अक्सर उससे मूसा की व्यवस्था का यह वचन आग्रह से कहता था, तू चोरी न करना: और यह भी, यह वह शाप है जो सारी पृथ्वी पर निकलता है, क्योंकि जो कोई चोरी करता है वह
22 नाश किया जाएगा, इत्यादि। प्रकृति का प्रकाश भी, यद्यपि वह छोटा था, उसे अवश्य दिखाता होगा कि जो कुछ वह दूसरों से लेता था वह उसका अपना नहीं था, और कि वह स्वयं कभी न चाहता कि उसके साथ ऐसा किया जाए। परन्तु सब व्यर्थ रहा; पिता और विवेक उससे चाहे जो कहें, वह चलता ही रहता; उसने अपनी दुष्टता में आगे बढ़ते रहने की ठान ली थी।
सावधान. परन्तु, जैसा आप संकेत करते हैं, उसका पिता कभी-कभी उसकी दुष्टता के लिये उसे डाँटता भी था; कृपया बताइए, तब वह कैसा व्यवहार करता था?
18 झूठ की आत्मा के साथ दूसरे पाप भी रहते हैं।
19 दुर्जन छोटी-मोटी चोरी में लगा रहता था।
20 दुर्जन अपने पिता को भी लूट लेता था।
23 बुद्धिमान. कैसा! क्यों, पकड़े गए चोर के समान। वह घूरता हुआ, और रूठे हुए, मुँह फुलाए ढंग से सिर लटकाए खड़ा रहता (जैसा हम कहा करते हैं, उसके मुख पर अभागेपन की तस्वीर पढ़ी जा सकती थी); और जब उसका पिता उसकी बदमाशी के विषय में ऐसे प्रश्नों का उत्तर माँगता, तो वह उस पर बड़बड़ाता और भुनभुनाता, और बस इतना ही उसे उससे मिल पाता था।
सावधान. परन्तु आपने कहा कि वह अपने पिता को भी लूटता था; मुझे लगता है कि यह तो अस्वाभाविक बात थी।
बुद्धिमान. स्वाभाविक हो या अस्वाभाविक, चोर के लिये सब एक है। इसके अतिरिक्त, आपको समझना चाहिए कि उसके 24 साथी भी थे, जिनसे, उनमें देखी गई दुष्टता के कारण, वह पिता या माता से भी अधिक दृढ़ता से जुड़ा हुआ था। हाँ, यदि उसके कारण पिता और माता दुःख से मर भी जाते, तो उसे क्या परवाह होती? उनकी मृत्यु, जैसा वह गिनता, उसके लिये बड़ा छुटकारा और स्वतन्त्रता होती: क्योंकि सच तो यह है कि वे और उनकी सलाह ही उसका बन्धन थे; हाँ, और यदि मैं भूलता नहीं, तो मैंने कुछ लोगों को यह कहते सुना है कि जब वह कभी-कभी अपने 25 साथियों के बीच होता, तो यह सोचकर बहुत आनन्दित होता कि उसके माता-पिता बूढ़े हैं और अधिक दिन नहीं जी सकते, और तब, वह कहता, मैं अपना मालिक आप होऊँगा, और उनकी रोक-टोक के बिना जो चाहूँ सो करूँगा।
सावधान. तो ऐसा लगता है कि वह अपने माता-पिता को लूटने को कोई अपराध नहीं गिनता था।
बुद्धिमान. बिल्कुल नहीं; और इसलिये वह सीधे उस दण्डाज्ञा के अधीन आ गया, जो अपने माँ-बाप को लूटकर कहता है कि कुछ अपराध नहीं, वह नाश करनेवाले का संगी ठहरता है। और चूँकि वह उन्हें, उनके व्यक्तित्व और उनकी सलाह दोनों में, इतना तुच्छ समझता था, इसलिये यह इस बात का चिह्न था
26 कि उस समय वह बहुत ही घृणित आत्मा का था, और कि आनेवाले समय में कोई दण्ड उसे पकड़ने की ताक में था।
सावधान. परन्तु क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि वह क्या बात थी, मेरा अर्थ है, उसकी अपनी समझ में (क्योंकि मैं अभी शैतान के सुझावों की बात नहीं कर रहा, जिनके द्वारा निस्सन्देह उसे ये काम करने को उकसाया गया था), मैं कहता हूँ, उसकी अपनी समझ में वह क्या बात थी जिससे वह सोचता था कि उसका यह छोटी-मोटी चीज़ें उठाने और चोरी करने का ढंग कोई बड़ी बात नहीं है?
बुद्धिमान. यह इसलिये था कि जो चीज़ें वह चुराता था वे छोटी थीं; फलों के बागों और बगीचों को लूटना, 27 और मुर्गियाँ चुराना, और ऐसी ही बातें, इन्हें वह जवानी की शरारतें गिनता था; और उसके घरवाले चाहे जो कहते, वह इस विचार से हटाया नहीं जा सकता था। वे उससे कहते थे कि उसे किसी भी वस्तु का, छोटी से छोटी वस्तु का भी, जो उसके
पड़ोसी की हो, लालच या इच्छा (और इच्छा करना तो लेने से कम है) नहीं करनी चाहिए, और यदि वह ऐसा करे तो यह व्यवस्था का उल्लंघन होगा; परन्तु उसके लिये सब एक था: कुछ अपने साथियों की दुष्ट बातचीत के कारण, और कुछ अपने भ्रष्ट
23 यिर्मयाह 2:26। जब उसका पिता उसके पापों के लिये उसे डाँटता था, तब दुर्जन कैसा व्यवहार किया करता था।
24 दुर्जन अपने साथियों से पिता या माता से भी अधिक दृढ़ता से जुड़ा हुआ।
25 दुर्जन यह सोचकर आनन्दित होता कि उसके माता-पिता की मृत्यु निकट है।
27 दुर्जन अपनी चोरी को कोई बड़ी बात नहीं गिनता था।
मन के धोखे के कारण, वह अपनी चोरी की राह पर चलता ही रहा, और जहाँ वह अपने आप को सुरक्षित समझता, वहाँ काम कर चुकने के बाद उसकी चर्चा करता और उस पर हँसता था।
सावधान. अच्छा, मैंने एक बार एक मनुष्य को, जब वह गले में रस्सी डाले सीढ़ी पर खड़ा था, (जब जल्लाद उसे धकेलकर लटकाने ही वाला था) यह मानते सुना कि जिस बात ने उसे इस अन्त तक पहुँचाया, वह यह थी कि जवानी में उसने छोटी-छोटी चीज़ें उठाने और चुराने की आदत डाल ली थी।
जहाँ तक मुझे अच्छी तरह याद है, उसने हमें बताया कि उसने चोर का धन्धा पिनें और फीते चुराने से आरम्भ किया था, और इसलिये उसने उन सब जवानों को, जो उस समय उसे मरते देखने के लिये इकट्ठा हुए थे, पहले से चेतावनी दी कि वे आरम्भ करने से सावधान रहें, चाहे छोटे पापों से ही क्यों न हो, क्योंकि पहले छोटे पापों से छेड़छाड़ करने से बड़े पाप करने का मार्ग खुल जाता है।
28 बुद्धिमान. जब आप कहानियों पर आ गए हैं, तो मैं भी आपको एक कहानी सुनाता हूँ, जिसे यद्यपि 29 मैंने अपने कानों से नहीं सुना, तौभी जिससे मैंने सुनी उस पर मैं भरोसा कर सकता हूँ: यह एक बूढ़े
टॉड के विषय में है, जिसे लगभग बीस वर्ष या उससे अधिक पहले, हार्टफ़र्ड में चोर होने के कारण फाँसी दी गई थी। कहानी यह है:
हार्टफ़र्ड में ग्रीष्मकाल की सेशन अदालत में, जब न्यायाधीश अपने आसन पर बैठा था, यह बूढ़ा टॉड अदालत में आया, हरे कपड़े पहने, चमड़े का कमरबन्द हाथ में लिये, छाती खुली, और पसीने से तरबतर, मानो वह अपनी जान बचाकर दौड़ा हो; और भीतर
30 आकर, वह ऊँचे स्वर से यों बोला: हुज़ूर, उसने कहा, पृथ्वी पर साँस लेनेवाला सबसे बड़ा बदमाश यहाँ है। मैं बचपन से चोर रहा हूँ: जब मैं अभी छोटा ही था, तब मैंने अपने आप को फलों के बाग लूटने और ऐसे ही दूसरे दुष्ट काम करने में लगा दिया, और तब से मैं चोर ही बना रहा हूँ। हुज़ूर, इतने वर्षों में इस स्थान के इतने मील के भीतर कोई डकैती नहीं हुई, जिसमें या तो मैं शामिल न रहा हूँ, या जिसका मुझे भेद न रहा हो।
न्यायाधीश ने समझा कि यह व्यक्ति पागल है, परन्तु कुछ मजिस्ट्रेटों से कुछ विचार-विमर्श के बाद, उन्होंने उस पर अभियोग लगाने का निर्णय किया; और उन्होंने कई गम्भीर अपराधों के लिये ऐसा ही किया; जिन सब में उसने मन से अपना दोष स्वीकार कर लिया, और इस प्रकार उसी समय उसकी पत्नी के साथ उसे फाँसी दी गई।
सावधान. सचमुच यह एक उल्लेखनीय कहानी है; और आप समझते हैं कि यह सच्ची है।
बुद्धिमान. यह न केवल उल्लेखनीय है, बल्कि हमारे विषय के ठीक अनुकूल भी है। इस चोर ने, श्रीमान दुर्जन की तरह, अपना धन्धा जल्दी ही आरम्भ किया; और उसने वहीं से आरम्भ किया जहाँ से श्रीमान दुर्जन ने आरम्भ किया था, अर्थात् फलों के बाग लूटने और ऐसी ही दूसरी बातों से, जो, जैसा आप देख सकते हैं, उसे पाप से पाप की ओर ले गईं, यहाँ तक कि अन्त में वे उसे पाप की सार्वजनिक लज्जा तक ले आईं, जो फाँसी का तख़्ता है।
जहाँ तक इस कहानी की सच्चाई का प्रश्न है, कहानी सुनानेवाले ने मुझे बताया कि वह उस समय स्वयं अदालत में था, और बूढ़े टॉड से दो गज़ से भी कम दूरी पर खड़ा था, जब उसने उसे ऊँचे स्वर से ये शब्द कहते सुना।
सावधान. झूठ बोलने और चोरी करने के ये दोनों पाप एक बुरे अन्त के बुरे चिह्न थे।
28 बूढ़े टॉड की कहानी।
29 युवा चोर ध्यान दें।
30 बूढ़े टॉड ने फलों के बाग लूटने और ऐसे ही कामों से फाँसी के तख़्ते की ओर अपनी राह आरम्भ की।
बुद्धिमान. हाँ, थे; और तौभी श्रीमान दुर्जन का अन्त बूढ़े टॉड के समान नहीं हुआ; यद्यपि मुझे डर है कि उतना ही बुरा, नहीं, फाँसी की उस मृत्यु से भी बुरा हुआ, चाहे देखनेवालों को वह कम दिखाई दिया हो; परन्तु इसके विषय में आगे और कहूँगा। परन्तु आप इन दो पापों की ऐसी बात करते हैं मानो श्रीमान दुर्जन अपनी जवानी में केवल इन्हीं के आदी थे: हाय, हाय, वह तो पापों से ऐसा भरा था जैसे भिखारी जूँओं से भरा रहता है, और वह भी जब वह अभी लड़का ही था।
सावधान. क्यों, वह और किन पापों का आदी था, मेरा अर्थ है, जब वह अभी बच्चा ही था?
बुद्धिमान. आपको यह पूछने की आवश्यकता नहीं कि वह और किन पापों का आदी था, बल्कि यह कि वह किन पापों का आदी नहीं था, अर्थात् उन पापों में से जो उसकी आयु के योग्य थे: क्योंकि कोई भी निःसंकोच कह सकता है कि कोई भी नीच बात उसे अनुचित न लगती थी, यदि वह उसे कर भर सकता हो। वास्तव में कुछ पाप ऐसे हैं जिनसे छेड़छाड़ करना बचपन नहीं जानता; परन्तु मैं उन पापों की बात करता हूँ जिन्हें करने के वह योग्य था, जिनमें से मैं दो-तीन और के नाम बताऊँगा। और,
31 पहला, वह प्रभु के दिन को सह नहीं सकता था, उस पवित्रता के कारण जो उस दिन के साथ जुड़ी थी; उस दिन का आरम्भ उसके लिये ऐसा था मानो वह बन्दीगृह जा रहा हो, (जब तक कि वह अपने पिता और माता से निकल भागकर अपने साथियों के बीच छिपने के कोनों में दुबका न रहे, जब तक पवित्र कर्तव्य समाप्त न हो जाएँ।) पवित्रशास्त्र पढ़ना, उपदेश सुनना, भक्तिपूर्ण बातचीत, उपदेशों को दोहराना, और प्रार्थना, ये ऐसी बातें थीं जिन्हें वह सहन नहीं कर सकता था; और इसलिये यदि उसका पिता ऐसे दिनों में उसे उस दिन के पालन में कड़ाई से लगाए रखता (जैसा वह अक्सर करता था, यद्यपि कभी-कभी उसके सारे परिश्रम के होते हुए भी वह उसे चकमा दे ही देता था), तो वह अपने सारे चाल-चलन से साफ़ दिखा देता था कि वह इससे बहुत असन्तुष्ट है: वह धार्मिक कर्तव्यों के समय सो जाता, अपने भाइयों से व्यर्थ बातें करता, और मानो हर भक्तिपूर्ण अवसर को उसकी वास्तविक अवधि से सात गुना लम्बा समझता, और जब तक वह समाप्त न हो जाता, कुढ़ता रहता।
सावधान. मैं समझता हूँ कि उस दिन से उसकी यह घृणा उस दिन के लिये नहीं थी: क्योंकि जहाँ तक दिन होने का प्रश्न है, वह सप्ताह के अन्य दिनों के समान ही है: परन्तु मैं समझता हूँ कि 32 उससे घृणा करने का कारण यह था कि परमेश्वर ने उस पर पवित्रता और शुद्धता की छाप लगाई है; और इसलिये भी कि सप्ताह के सब दिनों में यही वह दिन है जो पवित्र भक्ति में, हमारे प्रभु के मरे हुओं में से जी उठने के स्मरण में, बिताया जाना चाहिए।
बुद्धिमान. हाँ, इसी कारण वह उसका ऐसा शत्रु था, अर्थात् इसलिये कि उस दिन उस पर उसकी अपनी राहों से रोकने के लिये इतना अधिक अंकुश लगाया जाता था, जितना बाकी सब दिनों में उस पर लगाया जाना सम्भव न था।
सावधान. क्या परमेश्वर पवित्र कर्तव्यों के लिये एक दिन ठहराकर इस बात की बड़ी परख नहीं करता कि बेचारे लोगों के मन और झुकाव मन की पवित्रता की ओर, और पवित्र कर्तव्यों में चाल-चलन की ओर, कैसे हैं?
31 दुर्जन प्रभु के दिन को सह नहीं सकता था।
32 दुर्जन प्रभु के दिन को क्यों सह नहीं सकता था।
33 बुद्धिमान. हाँ, निस्सन्देह; और मनुष्य अपने मन और अपने जीवन को, कि वे कैसे हैं, सप्ताह के बाकी सब दिनों की अपेक्षा एक प्रभु के दिन के द्वारा अधिक प्रगट करेगा: और इसका कारण यह है कि प्रभु के दिन मनुष्यों पर उनके विचारों और जीवन के विषय में, सप्ताह के अन्य दिनों की अपेक्षा, एक विशेष अंकुश लगाया जाता है। फिर, उस दिन मनुष्यों को अन्य दिनों की अपेक्षा पवित्र कर्तव्यों का अधिक कड़ाई से पालन करने, और सांसारिक काम-काज से रुके रहने की आज्ञा है; इसलिये, यदि उनके मन स्वभाव से भलाई की ओर झुके हुए नहीं हैं, तो अब वे इसे दिखा देंगे, अब वे जैसे हैं वैसे प्रगट हो जाएँगे। प्रभु का दिन ऊपर के स्वर्गीय विश्रामदिन का एक प्रकार का प्रतीक है, और यह इस बात को, कि मन निरन्तर पवित्रता के प्रति कैसा है, किसी क्षणिक कर्तव्य में पाए जाने की अपेक्षा कहीं अधिक प्रगट करता है।
अन्य दिनों में मनुष्य पवित्र कर्तव्यों में आ-जा सकता है, और यह सब एक चौथाई घंटे में; परन्तु अब प्रभु का दिन, मानो, ऐसा दिन है जो पवित्रता के एक निरन्तर कर्तव्य की आज्ञा देता है:
34 तू विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिये स्मरण रखना, (जिसे मसीह ने रद्द नहीं किया, पर सप्ताह के पहले दिन में बदल दिया है,) उस रूप में नहीं जैसे वह विशेष रूप से यहूदियों को दिया गया था, बल्कि जैसे उसने उसे जगत के आरम्भ से पवित्र ठहराया था; और इसलिये यह मनुष्य के मन की दशा और स्वभाव का, उसके अन्य कर्तव्यों के पालन की अपेक्षा, अधिक बड़ा प्रमाण है, और अधिक प्रगट करता है कि वह किस ओर झुका हुआ है: इसलिये परमेश्वर उन 35 लोगों के बीच, जो सचमुच इस दिन को पवित्र कहते (और उसमें चलते) हैं, और उसे आदर के योग्य मानते हैं, इस 36 कारण कि अब उन्हें यह दिखाने का अवसर मिला है कि वे उसका आदर करने में कैसा आनन्द पाते हैं, क्योंकि उनके पास इसे दिखाने के लिये केवल एक घंटा नहीं, बल्कि पूरा एक दिन है, बड़ा अन्तर करता है: मैं कहता हूँ, वह इनमें और उस दूसरे प्रकार के लोगों में, जो कहते हैं, विश्रामदिन कब बीतेगा, कि हम
37 अपने सांसारिक काम-धन्धे में लगें, बड़ा अन्तर करता है। पहले को वह धन्य मनुष्य कहता है, परन्तु दूसरे पर अपवित्र संसारी होने का दाग लगाता है। और सचमुच, उसके पवित्र दिनों में परमेश्वर की सेवा में आनन्दित होना, पवित्र किए गए स्वभाव का कहीं अच्छा प्रमाण है, इसकी अपेक्षा कि ऐसे दिनों के आने पर कुढ़ें और उनके पवित्र कर्तव्यों से ऊब जाएँ, जैसा श्रीमान दुर्जन करता था।
सावधान. आपकी बात में कुछ सार हो सकता है; क्योंकि जो परमेश्वर के लिये एक दिन को पवित्र मानना सहन नहीं कर सकता, उसने निश्चय ही इस बात का पर्याप्त प्रमाण दे दिया है कि वह अपवित्र मनुष्य है; और ऐसा होकर, वह स्वर्ग में क्या करेगा? क्योंकि वह तो वह स्थान है जहाँ परमेश्वर के लिये एक निरन्तर विश्रामदिन
38 माना जाना है; मैं कहता हूँ, युगानुयुग माना जाना है। और जहाँ तक मैं जानता हूँ, हमारे प्रभु के द्वारा सात में से एक दिन को मनुष्यों के पवित्र कर्तव्यों के लिये अलग ठहराए जाने का एक कारण यह हो सकता है कि उन्हें यह बोध कराया जाए कि पापियों के मन में स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति शत्रुता है; क्योंकि जो पवित्रता से घृणा करता है, वह स्वयं परमेश्वर से घृणा करता है। वे परमेश्वर से प्रेम करने का दिखावा करते हैं, और तौभी एक 33 परमेश्वर प्रभु के दिन को ठहराकर, और उसे अपनी सेवा के लिये अलग करके, मन को परखता है कि वह कैसा है।
34 उत्पत्ति 2:2। निर्गमन 31:13, 14, 15, 16, 17। मरकुस 16:1। प्रेरितों के काम 20:7। 1 कुरिन्थियों 16:1, 2। मरकुस 2:27, 28। प्रकाशितवाक्य 1:10।
35 यशायाह 5:8, 13। — पाठ में यह कहाँ बैठता है, यह मैं नहीं देख सका। — DP.
पवित्र दिन से प्रेम नहीं करते, और तौभी उस दिन को प्रभु के प्रति पवित्रता के एक निरन्तर कार्य में बिताना पसन्द नहीं करते:
उसे ‘हे प्रभु, हे प्रभु’ कहना और तौभी उसके कहे हुए काम न करना, कुछ भी न कहने के बराबर है। और यह श्रीमान दुर्जन ऐसा ही एक व्यक्ति था: वह न इस दिन को सह सकता था, न उसके किसी 39 कर्तव्य को। हाँ, जब वह अपने घरवालों से छूट निकलता, और इस प्रकार उस दिन को हर प्रकार के आलस्य और अपवित्रता में बिताता, तब वह भली-भाँति प्रसन्न रहता: परन्तु यह दिन को रात बना देने के सिवाय और क्या था, या यह इसके सिवाय और क्या था कि जिस समय परमेश्वर हमें अपने धन्धों में लगने से मना करता है, उस अवसर को हम अपनी अभिलाषाओं और शरीर के सुखों को बहलाने और तृप्त करने में लगाएँ। महोदय, आपने उसके विषय में जो कहा है उसके सच होने के भरोसे पर, मैं श्रीमान दुर्जन के विषय में ऐसा कहने की स्वतन्त्रता लेता हूँ।
बुद्धिमान. श्रीमान दुर्जन की निन्दा करने के लिये आपको वह सफ़ाई देने की आवश्यकता न थी, क्योंकि जो कोई उसे जानता था, वह आपकी कही हुई बात को सच प्रमाणित करेगा। वह न उस दिन को सह सकता था, न किसी और बात को जिस पर परमेश्वर की छाप या छवि हो। पाप, पाप, और जो बात निकम्मी हो उसे करना, यही वह था जिसमें वह आनन्द पाता था, और वह भी छोटे बालकपन से।
सावधान. मुझे फिर कहना पड़ता है कि यह सुनकर मुझे दुःख होता है, और वह उसके अपने लिये, और उसके सम्बन्धियों के लिये भी, जिनके मन ऐसे कामों से अवश्य ही टुकड़े-टुकड़े हो गए होंगे: क्योंकि,
40 इन ही बातों के कारण परमेश्वर का प्रकोप आज्ञा न माननेवालों पर पड़ता है: और निस्सन्देह, यदि वह बिना पश्चाताप के मरा, तो वह अवश्य नरक में गया होगा; और नरक के लिये एक बच्चे को जन्म देना, यह माता-पिता के लिये सोचने में बड़े दुःख की बात है।
बुद्धिमान. उसकी मृत्यु के विषय में, जैसा मैंने आपसे कहा, मैं आपको थोड़ी देर में वृत्तान्त सुनाऊँगा; परन्तु अभी हम उसके जीवन पर हैं, और उसके बचपन के जीवन के ढंग पर, अर्थात् उन पापों पर जो उस समय उसके साथ लगे थे, जिनमें से कुछ मैं पहले ही बता चुका हूँ; और सचमुच मैंने केवल कुछ ही बताए हैं, क्योंकि अभी और आने बाकी हैं, और वे उनसे कदापि कम नहीं जो आप सुन चुके हैं।
सावधान. कृपया बताइए, वे क्या थे?
41 बुद्धिमान. क्यों, वह भयंकर रूप से कसम खाने और शाप देने में बहुत लगा रहता था, और वह भी जब वह अभी लड़का ही था: हाँ, तब वह कसम खाने और शाप देने को उतना ही मामूली समझता था जितना मैं अपनी उँगलियाँ गिनने को।
हाँ, वह बिना किसी उकसाहट के भी ऐसा करता था। वह कसम खाने और शाप देने को अपनी शान समझता था, और यह उसके लिये उतना ही स्वाभाविक था जितना खाना, पीना और सोना।
सावधान. ओह! यह कैसा छोटा बदमाश था! यहाँ, जैसा प्रेरित कहता है, सचमुच अपने 42 अंगों को अधर्म के हथियार होने के लिये पाप को सौंपना है! यह तो खुल्लमखुल्ला बुराई से बुराई की ओर बढ़ना है; इससे प्रमाणित होता है कि वह सचमुच काले मुँहवाला एक छोटा अभागा दुष्ट था।
बुद्धिमान. वह ऐसा ही था; और तौभी, जैसा मैंने आपसे कहा, वह सबसे बढ़कर इस प्रकार के पाप को 43 अपने सम्मान का बिल्ला समझता था: जब उसने ढिठाई से कसम खाना और शाप देना सीख लिया, तो वह अपने आप को बड़े आदमियों की बराबरी का समझने लगा।
39 दुर्जन प्रभु का दिन कैसे बिताया करता था।
41 दुर्जन कसम खाने और शाप देने में लगा रहता था।
43 कसम खाना और शाप देना श्रीमान दुर्जन के सम्मान का बिल्ला।
सावधान. मुझे निश्चय है कि बहुत-से लोग, जैसा आपने कहा, यह सोचते हैं कि कसम खाना उन्हें बड़ा शोभा देता है, और जब कोई मनुष्य अपने शब्दों में अधिकार या भय भरना चाहे, तो सबसे अच्छा उपाय यह है कि वह उन्हें कसम खाने के पाप से ठूँस-ठूँसकर भर दे।
बुद्धिमान. आप ठीक कहते हैं; नहीं तो, मुझे निश्चय है, मनुष्य जैसे अपनी निन्दापूर्ण कसमें उगलते हैं, वैसे इतनी आदत से न उगलते: वे इस पर घमण्ड करते हैं; वे सोचते हैं कि कसम खाना भले घराने के लोगों का-सा काम है; और एक बार इसकी आदत डाल लेने पर, वे जीवन भर इसे कठिनाई से छोड़ते हैं।
44 सावधान. अच्छा, परन्तु अब जब हम इस विषय पर हैं, तो कृपया मुझे कसम खाने और शाप देने का अन्तर बताइए; क्योंकि अन्तर है, है न?
बुद्धिमान. हाँ: कसम खाने और शाप देने में अन्तर है। कसम खाना, अर्थात् व्यर्थ कसम खाना, 45 जैसी कि युवा दुर्जन को आदत पड़ गई थी। अब व्यर्थ और पापपूर्ण कसम खाना, परमेश्वर इत्यादि को हल्केपन और दुष्टता से पुकारना है कि वह बातों के विषय में हमारी व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण पुष्टि का गवाह हो; और वे बातें दो प्रकार की होती हैं।
1. वे बातें जिनके विषय में हम कसम खाते हैं कि वे हैं, या होंगी।
2. ऐसी बातें जिन पर कसम खाई जाती है, चाहे सच्ची हों या झूठी।
1. वे बातें जिनके विषय में हम कसम खाते हैं कि वे हैं, या होंगी। तू कसम खाता है कि तू ने अमुक काम किया है, कि अमुक बात ऐसी है, या ऐसी होगी; क्योंकि इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि मनुष्य इनमें से किस बात के विषय में कसम खाते हैं; यदि वह हल्केपन से, दुष्टता से, और बिना आधार के खाई जाए, तो वह व्यर्थ है, क्योंकि वह तीसरी आज्ञा के विरुद्ध पाप है, जो कहती है, तू अपने परमेश्वर यहोवा का
46 नाम व्यर्थ न लेना। क्योंकि यह उस पवित्र और पावन नाम का व्यर्थ उपयोग है, और इसलिये ऐसा पाप है जिसके लिये, सच्चे पश्चाताप के बिना, न तो क्षमा है, और न उचित रूप से उसकी आशा की जा सकती है।
सावधान. तो ऐसा लगता है कि यद्यपि वास्तविक तथ्य के विषय में मनुष्य सच्ची कसम खाता है, तौभी यदि वह हल्केपन से और बिना आधार के कसम खाता है, तो उसकी शपथ बुरी है, और वह उसके कारण पाप के अधीन है।
47 बुद्धिमान. हाँ; मनुष्य कह सकता है, यहोवा जीवित है, और यह सच है, और तौभी ऐसा कहने में वह झूठी शपथ खाता है; क्योंकि वह व्यर्थ, बिना आवश्यकता के, और बिना आधार के कसम खाता है। आधार के साथ और आवश्यकता से कसम खाना (जो मनुष्य तब करता है जब वह परमेश्वर की ओर से इसके लिये बुलाए जाने पर कसम खाता है), इसकी अनुमति वचन देता है: परन्तु श्रीमान दुर्जन की कसमें ऐसी न थीं, और इसलिये अभी हमें उससे कोई सरोकार नहीं।
सावधान. मैं भविष्यद्वक्ता के द्वारा समझता हूँ कि मनुष्य सच्ची बात पर कसम खाकर भी पाप कर सकता है: तो वे अवश्य ही बहुत भयानक रूप से पाप करते हैं जो अपने हँसी-ठट्ठों और झूठों की पुष्टि के लिये, और, जैसा वे सोचते हैं, अपनी मूर्खतापूर्ण बातचीत को और भी सुन्दर बनाने के लिये कसम खाते हैं।
48 बुद्धिमान. वे ढिठाई से (ऊँचे हाथ से) पाप करते हैं; क्योंकि वे यह कल्पना करने का दुस्साहस करते हैं कि परमेश्वर भी उनके समान दुष्ट है, अर्थात् कि वह झूठों को सच ठहरानेवाला है। क्योंकि, जैसा मैंने पहले कहा, कसम खाना
44 कसम खाने और शाप देने में अन्तर।
47 मनुष्य सच्ची बात पर कसम खाकर भी पाप कर सकता है। यिर्मयाह 5:2।
48 जो झूठ पर कसम खाता है, वह यह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर भी उसके समान दुष्ट है।
परमेश्वर को गवाह होने के लिये पुकारना है; और किसी झूठ पर कसम खाना, स्वयं परमेश्वर को इस बात का गवाह होने के लिये पुकारना है कि वह झूठ सच है। इसलिये यह अवश्य ही उसे अप्रसन्न करेगा; क्योंकि यह परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता का सबसे बड़ा अपमान करता है, इसलिये उसका प्रकोप उन्हें अवश्य बहा ले जाएगा। इस प्रकार की कसम को झूठ बोलने, हत्या करने, चोरी करने और व्यभिचार करने के साथ रखा गया है; और इसलिये यह अवश्य
49 बिना दण्ड के नहीं छूटेगी: क्योंकि यदि परमेश्वर उसको निर्दोष न ठहराएगा जो उसका नाम व्यर्थ लेता है, जो मनुष्य सच्ची बात पर कसम खाते हुए भी कर सकता है (जैसा मैंने पहले दिखाया है), तो यह कैसे कल्पना की जा सकती है कि वह उन्हें निर्दोष ठहराएगा, जो कसम खाकर परमेश्वर की दुहाई देते हैं मानो झूठ सच न हों, या जो अपने उन्मत्त और पागलखाने के-से पागलपन में कसम खाते हैं। यदि कोई किसी खुले झूठ पर कसम खाए, और यह दावा करे कि अमुक सज्जन उसे सच प्रमाणित करेगा, तो यह उस सज्जन व्यक्ति को दुःखी करके क्रोध दिला देगा; और तौभी मनुष्य पवित्र परमेश्वर से ऐसा ही व्यवहार करते हैं: वे अपने
हँसी-ठट्ठे, कहानियाँ और झूठ कहते हैं, और फिर परमेश्वर की कसम खाते हैं कि वे सच हैं। अब इस प्रकार की कसम खाना युवा दुर्जन के लिये उतना ही साधारण था जितना भूख लगने पर खाना, या रात होने पर सोने जाना।
सावधान. मैंने अपने मन में अक्सर सोचा है कि वह क्या बात होगी जो मनुष्यों को कसम खाने के पाप का इतना आम उपयोग करने को प्रेरित करती है, जबकि जो बुद्धिमान हैं, वे इसके कारण उनकी बात पर कुछ भी जल्दी विश्वास नहीं करेंगे।
बुद्धिमान. आप निश्चय जानिए कि वह कोई अच्छी बात नहीं हो सकती; क्योंकि वह काम स्वयं 50 घृणित है: 1. इसलिये यह उनके भीतर शैतान की आत्मा की प्रेरणा से ही होना चाहिए। 2. यह कभी-कभी नारकीय क्रोध से भी निकलता है, जब नरक की आग से जली हुई जीभ
51 सारी जीवन-गति में भी आग लगा देती है। 3. परन्तु सामान्यतः कसम खाना उस दुस्साहसी ढिठाई से निकलता है जो उस व्यवस्था को ललकारती है जो इसे मना करती है। 4. कसम खानेवाले यह भी सोचते हैं कि अपने काले और अशुद्ध मुँहों से अपनी निन्दापूर्ण कसमें उगलकर वे अपने आप को अधिक वीर मनुष्य दिखाते हैं: 5. और वे यह भी कल्पना करते हैं कि इन उग्र प्रकार की दुष्टताओं के द्वारा वे उन लोगों पर जीत पा लेंगे जिनसे उस समय उनका वास्ता पड़ता है, और उनसे अपने झूठों को सच मनवा लेंगे। 6. वे लाभ कमाने के लिये भी बार-बार कसम खाते हैं, और जब मूर्खों से भेंट होती है तो इसी ढंग से उन्हें परास्त कर देते हैं। परन्तु यदि मैं इस विषय में सलाह दे सकूँ, तो कोई भी ख़रीदार ऐसे व्यक्ति के साथ, जो अपने धन्धे में आदतन कसम खानेवाला है, एक कौड़ी भी ख़र्च न करे; विशेषकर ऐसे कसमों के उस्ताद के साथ जो कसम खा-खाकर अपना माल दूसरे के गले मढ़ने का यत्न करता है, और जो कसम खा-खाकर अपने ग्राहक का पैसा अपनी जेब में डाल लेता है।
सावधान. जहाँ तक मैं समझ सकता हूँ, कसम खाने के ये सब कारण उसी जड़ से निकलते हैं जिससे स्वयं कसमें निकलती हैं, अर्थात् एक कठोर और हताश मन से। परन्तु कृपया अब मुझे दिखाइए कि दुष्ट शाप देने को इस प्रकार की कसम खाने से कैसे अलग पहचाना जाए।
52 बुद्धिमान. कसम खाने का, जैसा मैंने कहा, सीधा सम्बन्ध परमेश्वर के नाम से है, और वह उसे पुकारती है कि जो कहा जा रहा है उसकी सच्चाई का वह गवाह हो: अर्थात्, यदि कसम खानेवाले उसकी कसम खाते हैं।
49 जकर्याह 5:3। यिर्मयाह 7:9। होशे 4:2, 3।
50 व्यर्थ कसम खाने के छः कारण।
51 याकूब 3:6, 7, 8, 9।
52 शाप देने को कसम खाने से कैसे अलग पहचाना जाता है।
कुछ लोग तो वास्तव में मूर्तियों की कसम खाते हैं, जैसे मिस्सा की, ‘हमारी माता’ कुँवारी मरियम की, संतों की, पशुओं की, पक्षियों की, और अन्य प्राणियों की; परन्तु इंग्लैण्ड में हमारे अधर्मी लोगों का सामान्य ढंग परमेश्वर की, मसीह की,
ईमान की, और ऐसी ही बातों की कसम खाना है: परन्तु वे चाहे जैसे, या चाहे जिसकी कसम खाएँ, शाप देना कसम खाने से इस प्रकार अलग पहचाना जाता है।
53 शाप देना, अधर्मपूर्वक शाप देना, यह है कि किसी दूसरे को या अपने आप को, बुराई के कारण, या बुराई के लिये, दण्ड सुना देना: या यह इच्छा करना कि जिस व्यक्ति या वस्तु पर शाप दिया गया है, उस पर अन्यायपूर्वक कोई बुराई आ पड़े।
यह किसी को बुराई के कारण या बुराई के लिये दण्ड सुनाना है (अर्थात् बिना कारण): इसी प्रकार शिमी ने दाऊद को शाप दिया था: उसने अन्यायपूर्वक उसे बुराई के कारण और बुराई के लिये दण्ड सुनाया, जब उसने उससे कहा, निकल जा, निकल जा, हे खूनी मनुष्य, हे ओछे (बलियाल के) मनुष्य! यहोवा ने शाऊल के घराने का सब खून, जिसके स्थान पर तू राजा बना है, तुझ ही पर लौटा दिया है; और यहोवा ने राज्य को तेरे पुत्र अबशालोम के हाथ कर दिया है; और देख, तू अपनी ही बुराई में फँस गया है, क्योंकि तू
इसे दाऊद भयंकर शाप कहता है। और देख, वह अपने पुत्र सुलैमान से कहता है, तेरे पास बिन्यामीनी शिमी है, जिसने उस दिन, जब मैं जा रहा था, मुझे भयंकर शाप दिया था
परन्तु यह शाप क्या था? क्यों, पहला, यह दाऊद पर सुनाया गया एक गलत दण्ड था; शिमी ने उसे खूनी मनुष्य, ओछा (बलियाल का) मनुष्य कहा, जबकि वह ऐसा नहीं था। दूसरा, उसने उसे उस बुराई का दण्ड सुनाया जो उस समय उस पर पड़ी थी, मानो वह खूनी मनुष्य होने के कारण (अर्थात् शाऊल के घराने के विरुद्ध) आई हो, जबकि वह वर्तमान बुराई दाऊद पर बिल्कुल ही किसी दूसरी बात के कारण आई थी।
56 और इसे हम अपने समय के उन अधर्मी लोगों पर इस प्रकार लागू कर सकते हैं, जिनके मुँह में, अपने क्रोध और डाह में, अपने पड़ोसी के विरुद्ध अन्यायपूर्वक बुराई के कारण और बुराई के लिये दण्ड सुनाने के सिवाय और कुछ कम ही होता है। बहुतों में यह कितना आम है कि जब वे किसी से थोड़ा-सा भी रुष्ट होते हैं, तो चिल्ला उठते हैं,
उसे फाँसी लगे, वह नरक में पड़े, बदमाश! यह उसे बुराई के कारण और बुराई के लिये दण्ड सुनाना भी है, और अपने आप में एक भयंकर शाप भी है।
2. दूसरे प्रकार का शाप देना यह इच्छा करना है कि कोई बुराई इस या उस व्यक्ति या वस्तु पर आ पड़े और उसे आ घेरे: और इस प्रकार के शाप देने को अय्यूब ने एक भयंकर पाप गिना। मैंने
57 (वह कहता है) उसके प्राण को शाप देने की इच्छा करके अपने मुँह को पाप करने नहीं दिया; और न, इसी प्रकार, उसके शरीर या सम्पत्ति को। तो यह एक दुष्ट शाप देना है, यह इच्छा करना कि बुराई किसी दूसरे पर या हम पर आ पड़े: और इस प्रकार के शाप देने की युवा दुर्जन ने आदत डाल ली थी।
58 1. वह दूसरों पर बुराई आ पड़ने की इच्छा करता था; वह चाहता था कि उनकी गर्दन टूट जाए, या उनका भेजा निकल जाए, या उन्हें चेचक या महामारी लग जाए, और ऐसी ही बातें: यह सब एक शैतानी प्रकार का शाप देना है, और हमारे युग के आम पापों में से एक बन गया है।
53 शाप देने के विषय में, कि वह क्या है।
54 2 शमूएल 16:6, 7, 8।
56 हमारे समय के अधर्मी लोग कैसे शाप देते हैं।
58 दुर्जन के शाप देने का ढंग।
2. वह उतनी ही बार अपने आप को भी शाप देता था, यह कहकर, यदि यह ऐसा न हो तो मुझे फाँसी लग जाए, या 59 मैं जल जाऊँ, या शैतान मुझे उठा ले जाए, या ऐसी ही बातें। हम ‘डैम-मी’ कहनेवाले
छैलों को बड़े कसम खानेवाले गिनते हैं; परन्तु जब वे अपने नारकीय क्रोध में कहते हैं, परमेश्वर मुझे नरक में डाले, परमेश्वर मुझे नाश करे, या ऐसी ही बातें, तो वे कसम खाने से अधिक शाप देते हैं; हाँ, अपने आप को शाप देते हैं, और वह भी इस इच्छा के साथ कि नरक-दण्ड उन्हीं पर आ पड़े; और उनकी यह इच्छा और शाप, यदि वे अपने पापों से पश्चाताप न करें, तो थोड़े ही समय में वे अपने ऊपर पूरा होता देखेंगे, अर्थात् नरक की आग में।
सावधान. परन्तु क्या इस युवा दुर्जन ने ऐसी गन्दी भाषा की आदत डाल ली थी?
बुद्धिमान. मैं समझता हूँ कि मैं कह सकता हूँ कि उसके मुँह में इससे अधिक बार आनेवाली और कोई बात न थी, और वह भी 60 थोड़ी-सी भी उकसाहट पर। हाँ, वह ऐसी भाषा में इतना निपुण था कि न पिता, न माता, न भाई, न बहन, न नौकर, नहीं, उसके पिता के पशु तक उसके इन शापों से बच न सकते थे। मैं कहता हूँ, कि जब वह पशुओं को हाँकता, या 61 उन पर सवारी करता, तब यदि वे उसकी मर्ज़ी के अनुसार न चलते, तो उन मूक पशुओं को भी अवश्य उसके शाप का भागी बनना पड़ता।
वह चाहता था कि उनकी गर्दनें टूट जाएँ, उनकी टाँगें टूट जाएँ, उनकी अँतड़ियाँ निकल आएँ, या शैतान उन्हें उठा ले जाए, या ऐसी ही बातें: और इसमें कोई आश्चर्य नहीं; क्योंकि जो अपने आप को, या अपने सबसे प्रिय सम्बन्धियों को, नरक-दण्ड या दूसरे बुरे शाप मिलने की इच्छा करने का दुस्साहस करता है, वह अपने पागलपन में उस बेचारे भोले पशु के लिये बुराई की इच्छा करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाएगा।
सावधान. अच्छा, मैं अब भी देखता हूँ कि यह दुर्जन एक हताश बदमाश था। परन्तु कृपया, महोदय, जब आप यहाँ तक आ गए हैं, तो अब मुझे दिखाइए कि शाप देने की यह बुराई कहाँ से उत्पन्न होती है, और यह परमेश्वर का क्या अनादर करती है; क्योंकि मैं सहज ही देख सकता हूँ कि यह प्राण पर नरक-दण्ड लाती है।
बुद्धिमान. शाप देने की यह बुराई साधारणतः 62 63मन की घोर दुष्टता से उत्पन्न होती है, परन्तु विशेष करके इन बातों से: 1. डाह से, जो, जहाँ तक मैं समझता हूँ, जादू-टोने की ओर ले जानेवाला प्रमुख पाप है। 2. यह घमण्ड से भी उत्पन्न होती है, जो गिरे हुए स्वर्गदूतों का पाप था; 3. यह दूसरों के प्रति तिरस्कार और घृणा से भी उत्पन्न होती है: 4. परन्तु किसी मनुष्य का अपने आप को शाप देना तो अवश्य घोर पागलपन ही से उत्पन्न होता है।
64 इससे परमेश्वर का जो अनादर होता है, वह यह है। यह उससे उसका अधिकार छीन लेता है, जिसके ही हाथ में आशीष देने और शाप देने का सामर्थ्य है; दुष्टता से शाप देने का नहीं, जैसा श्रीमान दुर्जन करता था, वरन् न्याय और धार्मिकता से, अपने शाप के द्वारा दुष्टों को उनके कामों का उचित प्रतिफल देने का।
इसके अतिरिक्त, ये दुष्ट मनुष्य अपने पड़ोसी आदि को दुष्टता से शाप देकर, वास्तव में स्वयं परमेश्वर को उसकी हस्तकृति में शाप देते हैं। मनुष्य परमेश्वर का स्वरूप है, और दुष्टता से उस स्वरूप को
60 दुर्जन अपने पिता आदि को शाप देता था।
61 दुर्जन अपने पिता के पशुओं को शाप देता था।
62 अय्यूब 15. सभोपदेशक 7:22.
63 शाप देने के चार कारण।
64 इससे परमेश्वर का जो अनादर होता है।
65जो परमेश्वर का है, शाप देना स्वयं परमेश्वर को शाप देना है। इसलिये जैसे मनुष्य जब दुष्टता से कसम खाते हैं, तो वे परमेश्वर के नाम को चीरते-फाड़ते हैं, और जहाँ तक उनके वश में है, उसे अपनी सारी दुष्टता का साक्षी और समर्थक बना देते हैं; वैसे ही जो इस रीति से अपने पड़ोसी को शाप देता और दोषी ठहराता है, या उसका बुरा चाहता है, वह परमेश्वर के स्वरूप को शाप देता, दोषी ठहराता और उसका बुरा चाहता है, और परिणामस्वरूप स्वयं परमेश्वर पर न्याय चलाता और उसे दोषी ठहराता है।
मान लीजिए कि कोई मनुष्य अपने मुँह से कहे, मैं चाहता हूँ कि राजा का चित्र जला दिया जाए; तो क्या उस मनुष्य का ऐसा कहना उसे राजा के व्यक्तित्व का शत्रु नहीं ठहराएगा? ठीक ऐसा ही उनके साथ है जो शाप देकर अपने पड़ोसी का, या अपना ही बुरा चाहते हैं; वे उस स्वरूप का, हाँ, स्वयं परमेश्वर के स्वरूप का तिरस्कार करते हैं।
सावधान. परन्तु क्या आप समझते हैं कि जो मनुष्य ऐसा करते हैं, वे सोचते हैं कि वे इतना नीच, इतना घिनौना काम कर रहे हैं?
बुद्धिमान. प्रश्न यह नहीं कि मनुष्य अपने पाप के विषय में क्या विश्वास करते हैं, वरन् यह कि परमेश्वर का वचन उसके विषय में क्या कहता है: यदि परमेश्वर का वचन कहता है कि कसम खाना और शाप देना पाप हैं, तो चाहे मनुष्य उन्हें सद्गुण ही क्यों न गिनें, उनका प्रतिफल पाप ही का प्रतिफल होगा, अर्थात् प्राण का नरकदण्ड।
66 दूसरे को शाप देना, और व्यर्थ और झूठी कसम खाना, प्रकृति की ज्योति के विरुद्ध पाप हैं।
1. शाप देना ऐसा इसलिये है, कि जो कोई दूसरे को शाप देता है, वह जानता है कि उसी समय वह स्वयं अपने साथ ऐसा व्यवहार किया जाना कदापि न चाहेगा।
2. कसम खाना भी उसी व्यवस्था के विरुद्ध पाप है: क्योंकि प्रकृति ही मुझे बताएगी कि मुझे झूठ नहीं बोलना चाहिए, और इसलिये उसे पक्का करने के लिये कसम खाना तो और भी अनुचित है। हाँ, अन्यजातियों ने भी कसम खाने को परमेश्वर की एक गम्भीर विधि माना है, और इसलिये उसे हल्केपन से या व्यर्थ
67मनुष्यों द्वारा काम में नहीं लाया जाना चाहिए, चाहे किसी सच्ची बात को पक्का करने के लिये ही क्यों न हो।
सावधान. परन्तु मुझे आश्चर्य होता है, कि जब शाप देना और कसम खाना परमेश्वर की दृष्टि में ऐसी बुराइयाँ हैं, तो वह ऐसी दुष्टता करनेवालों में से कुछ को दूसरों के लिये उदाहरण क्यों नहीं बना देता।
बुद्धिमान. हाय! उसने तो ऐसा किया है, हज़ार बार का दुगुना, जैसा कि हर युग और हर देश में ध्यान देनेवाले लोग सहज ही जान सकते हैं। मैं स्वयं आपके सामने कई उदाहरण रख सकता हूँ; परन्तु उन बहुत से उदाहरणों को, जिनका वर्णन किया जा सकता है, 68छोड़कर, मैं यहाँ आपके सामने दो रखूँगा; एक तो सरे के विम्बलडन में एन. पी. नामक एक व्यक्ति पर परमेश्वर का वह भयानक दण्ड था; जो कुछ ऐसे लोगों पर, जो उसे प्रसन्न न करते थे, कसमें खाने और उन्हें शाप देने के एक भयंकर दौरे के बाद, अचानक बीमार पड़ा, और थोड़े ही समय में बकता-झकता, शाप देता और कसमें खाता हुआ मर गया।
परन्तु सबसे बढ़कर डर्बी काउंटी के ऐशओवर की निवासी डोरथी मेटली की वह भयानक कहानी सुनिए।
66 कसम खाना और शाप देना प्रकृति की ज्योति के विरुद्ध पाप हैं।
68 कसम खानेवालों और शाप देनेवालों पर परमेश्वर के क्रोध के उदाहरण।
वर्णन करनेवाला कहता है कि यह डोरथी मेटली नगर के लोगों में बड़ी कसम खानेवाली, शाप देनेवाली, झूठी और चोर के रूप में प्रसिद्ध थी; (ठीक श्रीमान दुर्जन के समान।) और जो काम वह प्रायः किया करती थी, वह यह था कि सीसे की खानों से निकलनेवाले कचरे को धोए, और उसमें से सीसे की कच्ची धातु के कण निकाले; और किसी बात पर ज़ोर देने का उसका साधारण ढंग ऐसे-ऐसे शापभरे वचनों से था: यदि यह बात ऐसी न हो तो मैं धरती में धँस जाऊँ, या, परमेश्वर करे कि धरती फट जाए और मुझे निगल ले। अब 23 मार्च, 1660 को यह डोरथी ऐशओवर से लगभग पाव मील दूर एक खड़ी पहाड़ी की चोटी पर कच्ची धातु धो रही थी, और वहाँ एक लड़के ने उस पर यह दोष लगाया कि उसने उसकी जेब से एक-एक पेनी के दो सिक्के निकाल लिये हैं, (क्योंकि उसने अपनी पतलून उतारकर रख दी थी, और जाँघिया पहने काम कर रहा था;) परन्तु उसने बड़े ज़ोर से इन्कार किया, और कहा, कि यदि वे पैसे उसके पास हों तो धरती उसे निगल ले: उसने उस दिन और भी कई अवसरों पर यही दुष्ट शब्द कहे।
अब ऐशओवर का एक व्यक्ति जॉर्ज हॉजकिन्सन, जिसकी वहाँ अच्छी साख थी, संयोग से उधर से निकला जहाँ यह डोरथी थी, और थोड़ी देर खड़ा होकर उससे बातें करने लगा, जब वह अपनी
कच्ची धातु धो रही थी; उसके टब के पास एक छोटी बच्ची भी खड़ी थी, और कुछ दूरी पर एक और, जो ऊँचे स्वर से उसे पुकार रही थी कि चली आ; इसलिये उक्त जॉर्ज ने उस लड़की का हाथ पकड़ा कि उसे उसके पास ले जाए जो उसे पुकार रही थी: परन्तु देखो, वे डोरथी से दस गज़ से अधिक दूर न गए थे, कि उन्होंने उसे सहायता के लिये चिल्लाते सुना; तब पीछे मुड़कर उसने देखा कि वह स्त्री, और उसका टब, और छलनी, घूमते हुए धरती में धँस रहे हैं। तब उस मनुष्य ने कहा, परमेश्वर से प्रार्थना कर कि वह तेरा पाप क्षमा करे, क्योंकि अब तू फिर कभी जीवित दिखाई न देगी। सो वह और उसका टब घूमते, और घूमते रहे, यहाँ तक कि वे धरती में लगभग तीन गज़ धँस गए, और फिर थोड़ी देर के लिये ठहर गए।
तब उसने फिर सहायता के लिये पुकारा, यह सोचकर, जैसा उसने कहा, कि वह वहीं रह जाएगी। अब वह मनुष्य, यद्यपि बहुत चकित था, सोचने लगा कि किस रीति से उसकी सहायता करे, परन्तु तुरन्त एक बड़ा पत्थर, जो धरती में दिखाई दिया, उसके सिर पर आ गिरा, और उसकी खोपड़ी तोड़ दी, और फिर धरती उस पर ढह पड़ी और उसे ढाँप लिया। बाद में उसे खोदकर निकाला गया, और वह भूमि के भीतर लगभग चार गज़ नीचे मिली, और उस लड़के की दोनों पेनी उसकी जेब में थीं, परन्तु उसका टब और छलनी न मिल सके।
सावधान. आपने मुझे एक दुःखद कहानी याद दिला दी, जिसे मैं आपको सुनाऊँगा। बात यह है; जहाँ मैं एक समय रहता था, वहाँ से लगभग एक तीर के टप्पे की दूरी पर एक छिपा-छिपाया सा शराबख़ाना था, और उसे चलानेवाले मनुष्य का एक बेटा था जिसका नाम एडवर्ड था। यह एडवर्ड, मानो, अपनी बातों और अपने चाल-चलन दोनों में आधा पागल था। इस छिपे शराबख़ाने में कुछ रंगीले साथी सप्ताह में एक-दो बार आया करते थे, और इस नेड से, (क्योंकि वे उसे इसी नाम से पुकारते थे) उसका
पिता अपने मेहमानों का मनोरंजन किया करता था; अर्थात् उसे बुलवाकर, कि वह अपनी मूर्खता भरी बातों और हाव-भाव से उनका जी बहलाए। सो जब ये मौजी साथी इस मनुष्य के घर आते, तो पिता नेड को बुलवाता: इसलिये नेड बाहर आता; और वह दुष्ट शैतानी रीति से शाप देने का आदी था, हाँ, अपने पिता और माता को, और किसी को भी जो उसकी बात काटता, शाप देने का। और क्योंकि (यद्यपि वह आधा पागल था) उसने देखा कि उसकी यह आदत लोगों को भाती है, इसलिये वह और भी अधिक ढिठाई से ऐसा करता था।
अच्छा, जब ये छैल-छबीले लोग अपने नियत समयों पर इस मदिरालय में (जैसा वे उसे कहते हैं) पीकर धुत्त होने और रंगरलियाँ मनाने आते, तब नेड को बाहर बुलवाना ही पड़ता; और क्योंकि उसका पिता नेड को सबसे अच्छी तरह जानता था, और सबसे अच्छी तरह जानता था कि उसे कैसे भड़काए, इसलिये वही प्रायः उससे ऐसे प्रश्न पूछता, या उसे ऐसा काम करने की आज्ञा देता, जो उसे निश्चय ही भड़का दे। तब वह (अपनी मूर्खता की रीति से) अपने पिता को बड़ी कड़वाहट से शाप देता; जिस पर बूढ़ा हँसता, (और बाकी मेहमान भी हँसते, मानो यही बात उन्हें सबसे अधिक भाती थी) और वह पूछता ही रहता, कि नेड शाप देने के लिये भड़कता ही रहे, और वे हँसने के लिये भड़कते ही रहें। यही वह हँसी-ठट्ठा था जिससे बूढ़ा अपने मेहमानों का मनोरंजन किया करता था।
जिन शापों से यह नेड अपने पिता को शाप दिया करता था, और जिन पर बूढ़ा हँसता था, वे ये और ऐसे ही थे: शैतान तुझे ले जाए; शैतान तुझे उठा ले जाए: वह उसके लिये बहुत सी महामारियाँ और विनाश भी चाहता था। अच्छा, तो ऐसा हुआ कि परमेश्वर के धर्ममय
दण्ड के द्वारा, थोड़े ही समय में नेड की कामनाएँ और शाप उसके पिता पर पूरे हो गए; क्योंकि इस रीति से उनके बीच बहुत महीने न बीते थे, कि शैतान ने सचमुच उसे ले लिया, उसे अपने वश में कर लिया, और कुछ ही दिनों में मृत्यु के द्वारा उसे इस संसार से उठा ले गया; मैं कहता हूँ,
शैतान ने उसे ले लिया और उसे अपने वश में कर लिया: मेरा अर्थ है, उन लोगों ने ऐसा ही समझा जो उसे जानते थे, और उसकी उस दयनीय दशा में उससे वास्ता रखते थे। वह उसे अपनी देह में एक जीवित प्राणी के समान ऊपर-नीचे चलते हुए अनुभव कर सकता था, परन्तु जब यातना का समय आता (क्योंकि उसे प्रायः यातना के दौरे पड़ते थे) तब वह उसकी छाती के कोमल भाग में एक कठोर गाँठ के समान पड़ा रहता, (मेरा अर्थ है, मैंने उसे ऐसा ही देखा,) और इस प्रकार उसे चीरता-फाड़ता और उससे गर्जन करवाता, यहाँ तक कि वह अचेत होकर निढाल पड़ जाता।
मैंने आपसे पहले कहा था, कि जो कुछ मैं यहाँ कहता हूँ उसका मैं कानों सुना और आँखों देखा गवाह हूँ; और मैं था भी। मैंने नेड को उसकी शरारत में अपने पिता को शाप देते, और उसके पिता को उस पर जी खोलकर हँसते सुना है; जो नेड को शाप देने के लिये भड़काता ही रहता था, कि उसकी हँसी-खुशी बढ़े। मैंने उसके पिता को भी देखा, जब वह शैतान के वश में था, मैंने उसे उसके एक दौरे में देखा, और देखा कि उसका मांस (जैसा समझा गया) शैतान के द्वारा आधे अण्डे के बराबर एक ढेर में इकट्ठा कर दिया गया था; जिससे उस बूढ़े को अकथनीय यातना और क्लेश हुआ। वहाँ फ्रीमैन नामक एक व्यक्ति भी, (जो साधारण वैद्य से कुछ बढ़कर था) इस शैतान को निकालने के लिये बुलवाया गया; और जब उसने ऐसा करने का प्रयत्न किया तब मैं वहाँ था। उसका ढंग यह था। वे उस शैतान-ग्रस्त मनुष्य को एक बाहरी कोठरी में ले गए, और उसे एक बेंच पर पेट के बल लिटाया, ऐसे कि उसका सिर बेंच के सिरे से नीचे लटकता रहे; फिर उन्होंने उसे उस पर बाँध दिया: यह करके, उन्होंने उसके मुँह के नीचे अंगारों की एक कड़ाही रखी, और उसमें कुछ डाला जिससे बहुत धुआँ उठा; कि इस उपाय से (जैसा कहा गया) शैतान को बाहर निकालें। सो वहाँ उन्होंने उस मनुष्य को तब तक रखा जब तक धुएँ में उसका दम लगभग घुट न गया, परन्तु कोई शैतान उसमें से न निकला; जिस पर फ्रीमैन कुछ लज्जित हुआ, वह मनुष्य बहुत पीड़ित हुआ, और मैं अचम्भा करता और डरता हुआ वहाँ से चला आया। सो थोड़े ही समय में, जिसने उस मनुष्य को वश में कर रखा था, वह उसके बेटे की शापभरी कामनाओं के अनुसार उसे संसार से उठा ले गया। और यही उस नारकीय हँसी-ठट्ठे का अन्त था।
बुद्धिमान. ये सब दुःखद दण्ड थे।
सावधान. ये सचमुच भयानक दण्ड थे।
बुद्धिमान. हाँ, और वे उस वचन की धमकी के समान दिखाई देते हैं, (यद्यपि वह मुख्यतः यहूदा के विषय में था,) जैसे वह शाप देने से प्रीति रखता था, वैसे ही शाप उस पर आ पड़े; जैसे वह आशीर्वाद देने से प्रसन्न न होता था, वैसे ही आशीर्वाद उस से दूर रहे। जैसे उसने शाप को वस्त्र की नाईं पहिन लिया, वैसे ही वह 69उसके पेट में जल की नाईं, और उसकी हड्डियों में तेल की नाईं समा जाए।
सावधान. जवानों का शाप देने और कसम खाने की रीति में पाला-पोसा जाना एक भयानक बात है।
बुद्धिमान. उनमें पाला-पोसा जाना! यह मैं नहीं कह सकता कि श्रीमान दुर्जन ऐसे पाला गया था, क्योंकि उसके पिता ने बहुत बार मेरे सुनते अपने बच्चों की बुराई पर, और विशेष करके इस दुष्ट लड़के पर विलाप किया है। मैं विश्वास करता हूँ कि अपने बच्चों की दुष्टता ने (उसके विचार मात्र से) उसे कई रात भारी मन से बिस्तर पर जाने, और सवेरे वैसे ही भारी मन से उठने पर विवश किया। परन्तु उसके अनुग्रहहीन बेटे के लिये सब एक समान था, न तो हितकर सम्मति, और न पिता का शोक, उसे अपना चाल-चलन सुधारने पर ला सका।
70 सचमुच कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने बच्चों को कसम खाने, शाप देने, झूठ बोलने और चोरी करने की शिक्षा देकर पालते हैं, और उन बेचारे बच्चों का दुःख बड़ा है जिनका दुर्भाग्य यह है कि वे ऐसे भक्तिहीन माता-पिता के द्वारा संसार में लाए जाएँ, और उन्हीं की देख-रेख में भी रहें। ऐसे माता-पिता के लिये भला होता कि वे उन्हें जन्म ही न देते, और ऐसे बच्चों के लिये भला होता कि वे उत्पन्न ही न होते।
हाय! मुझे लगता है कि किसी पिता या माता का अपने बच्चे को ठीक उसी मार्ग में पालना जो नरक और सर्वनाश की ओर ले जाता है, इससे बढ़कर भयानक बात और क्या होगी! परन्तु श्रीमान दुर्जन अपने माता-पिता के द्वारा इस रीति से नहीं पाला गया था।
सावधान. परन्तु मुझे लगता है, कि जब यह जवान दुर्जन घर पर वश में न आता था, तो उसके पिता को यह आज़माना चाहिए था कि बाहर उसका क्या भला हो सकता है, अर्थात् उसे अपने किसी ऐसे जान-पहचानवाले के पास रख देना, जिसके विषय में वह जानता हो कि वह उस पर अधिकार चला सकता है, और उसे किसी काम में कड़ाई से लगाए रख सकता है: इस प्रकार कम से कम उसके पास उन दुष्टताओं को करने का समय न रहता, जो करने के लिये समय के बिना की ही नहीं जा सकतीं।
71 बुद्धिमान. हाय, उसके पिता ने ऐसा ही किया, उसने उसे समय रहते अपने ही एक परिचित के पास रख दिया, और उससे बड़े प्रेम से विनती की, कि वह उसके बेटे की देख-भाल करे, और उसे उच्छृंखल मार्गों से बचाए रखे। उसका व्यवसाय भी ईमानदारी का और लाभदायक था; इसके अतिरिक्त उसमें पूरा काम रहता था, इसलिये इस जवान दुर्जन को अपने धंधे से कोई खाली समय या निठल्ले घंटे न मिलते थे, कि उनमें बुरा करने का अवसर ढूँढ़े: परन्तु उसके लिये सब एक समान था, जैसे वह अपने पिता के घर में नीच होने लगा था, वैसे ही अपने मालिक के घर में रहते हुए भी बना रहा।
सावधान. मैंने कुछ ऐसे बच्चे देखे हैं, जो यद्यपि घर पर बहुत बुरे थे, तौभी जब उन्हें बाहर रखा गया तो वे बहुत बदल गए; विशेष करके जब वे ऐसे परिवार में जा पड़े, जिसके प्रधान उसमें परमेश्वर की आराधना और सेवा बनाए रखने को विवेक की बात समझते थे; परन्तु कदाचित् श्रीमान दुर्जन के यहाँ इस बात की कमी रही हो
70 बच्चों को दुष्टता में पालना एक दुःखदायी बात है।
71 दुर्जन को शागिर्द बनाकर रखा गया।
बुद्धिमान. सचमुच कुछ बच्चे जब दूसरों की छत के नीचे रखे जाते हैं तो बहुत सुधर जाते हैं; परन्तु, जैसा मैंने कहा, यह दुष्ट लड़का ऐसा न सुधरा; और न उसकी बुराई इसलिये बनी रही कि उसे कोई ऐसा 72मालिक न मिला जो उसे सुधार सकता और सुधारता भी: क्योंकि उसका मालिक बहुत भला मनुष्य था, बड़ा भक्त व्यक्ति; जो प्राण की भलाई के सबसे उत्तम साधनों में नियम से जाता था, जिसने अपने परिवार में परमेश्वर की आराधना स्थापित की थी, और जो स्वयं भी उसी के अनुसार चलता था। वह बहुत नम्र और दयालु मनुष्य भी था, जिसने जवान दुर्जन से काम में कभी हद से अधिक काम न लिया, और न उसे बेसमय घंटों तक काम में लगाए रखा।
सावधान. ऐसा कहते हैं आप! यह तो दुर्लभ बात है: मैं अपनी ओर से ऐसे बहुत थोड़े देखता हूँ जो इन बातों में श्रीमान दुर्जन के मालिक की बराबरी कर सकें।
73 बुद्धिमान. न मैं ही, (तौभी श्रीमान दुर्जन को ऐसा ही मालिक मिला था;) क्योंकि आजकल अधिकतर मालिक ऐसे हैं जो अपने सांसारिक कामों को छोड़ और किसी बात की चिन्ता नहीं करते, और यदि शागिर्द उन कामों में उनकी आज्ञाओं को पूरा करते रहें, तो प्राण और धर्म चाहे जहाँ जाएँ। हाँ, मुझे बहुत डर है, कि बहुत से होनहार लड़कों को उनके माता-पिता ने ऐसे मालिकों के पास रख दिया है, जिन्होंने आनेवाले संसार के विषय में उन्हें पूरी रीति से बिगाड़ दिया है।
सावधान. यह और भी खेद की बात है। परन्तु कृपा करके, जब आपने इस विषय को छेड़ ही दिया है, तो मुझे दिखाइए कि कोई मालिक अपने बेचारे शागिर्द के विनाश का कारण कितनी रीतियों से बन सकता है।
बुद्धिमान. नहीं, मैं आपको सारी रीतियाँ तो नहीं बता सकता, तौभी उनमें से कुछ का वर्णन करूँगा।
तो मान लीजिए कि किसी होनहार लड़के को ऐसे व्यक्ति के पास शागिर्द बनाकर रखा जाए जो भक्त मनुष्य कहलाता है, तौभी वह लड़का बहुत सी रीतियों से नष्ट हो सकता है; अर्थात्, यदि उसका मालिक उन सब बातों में, जो परमेश्वर और मनुष्य दोनों से सम्बन्ध रखती हैं, चौकस न हो, और वह भी अपने शागिर्द के सामने।
74 1. यदि वह अपने शागिर्द से काम लेने में संयम न रखे; यदि वह उससे उसकी शक्ति से बढ़कर काम कराए; यदि वह उसे बेसमय घंटों तक काम में लगाए रखे; यदि वह उसे वचन पढ़ने, प्रार्थना करने आदि के लिये उचित समय न दे। यह उसे नष्ट करने का मार्ग है; अर्थात्, भले विचारों के उन कोमल आरम्भों में, और आत्मिक बातों के विषय में भले आरम्भों में।
2. यदि वह अपने घर में अपवित्र और दुष्ट पुस्तकें बिखरी रहने दे, ऐसी जो कामवासना और लम्पटता को भड़काती हैं, ऐसी जो निकम्मी, लम्पट और कामुक बातचीत सिखाती हैं, और ऐसी जिनका झुकाव अपवित्र ठठोलपन और हँसी-ठट्ठे की ओर उकसाने का है; और अन्त में, ऐसी जो विश्वास और पवित्रता की शिक्षा को बिगाड़ने और भ्रष्ट करने की ओर ले जाती हैं। ये सब बातें सड़े घाव की नाईं खाती जाएँगी, और जवानों आदि में उन भले आरम्भों को जो उनमें फूट रहे हों, शीघ्र ही बिगाड़ देंगी।
3. यदि सेवक मिले-जुले हों, अर्थात्, यदि उसी स्थान में कुछ बहुत बुरे भी हों, तो यह भी ऐसे कोमल लड़कों को बिगाड़ने का मार्ग है; क्योंकि जो बुरे और नीच सेवक हैं, वे प्रायः
(और उन्हें ऐसा करने का अवसर भी रहता है) उनके सामने अपनी अपवित्र और 72 जवान दुर्जन का मालिक, और उसके गुण।
73 बुरा मालिक, एक बुरी बात।
74 कोई मालिक कितनी रीतियों से शागिर्द के विनाश का कारण बन सकता है।
दुष्ट बातों और चालों को टपकाते और भड़काते रहेंगे, और ये बातें जवानों के शरीर और मन में सहज ही चिपक जाएँगी, और उन्हें भ्रष्ट कर देंगी।
4. यदि मालिक का एक रूप बाहर के लिये हो, और दूसरा घर के लिये; अर्थात्, यदि उसका धर्म उसके घर में उसके लबादे के समान खूँटी पर टँगा रहता हो, और वह उसे कभी-कभार ही पहनता हो, केवल तब जब बाहर जाता हो; तो नए-नए आरम्भ करनेवाले इस पर ध्यान देंगे, और इससे ठोकर खाएँगे। हम कहते हैं, बाड़ों की भी आँखें होती हैं, और छोटे
75घड़ों के भी कान होते हैं; और सचमुच, बच्चे पिताओं, मालिकों आदि के जीवन को उससे कहीं अधिक ध्यान से देखते हैं जितना वे प्रायः समझते हैं: और इसलिये मालिकों को सावधान रहना चाहिए, नहीं तो वे अपने सेवकों में भले आरम्भों को शीघ्र नष्ट कर सकते हैं।
5. यदि मालिक अपने लेन-देन में बेईमान हो, और झूठी बातों से व्यापार करता हो; या यदि बुरे माल को अच्छा बताकर पक्का किया जाता हो, या यदि वह अनुचित लाभ के पीछे पड़ा हो, या ऐसा ही कुछ; तो उसका सेवक यह देखता है, और यह उसे बिगाड़ने के लिये पर्याप्त है। एली के पुत्र मण्डली के सामने बुरे थे, और इस कारण
76लोग यहोवा के बलिदानों को तुच्छ जानने लगे।
परन्तु ये बातें प्रसंगवश कही गई हैं, केवल ये मालिकों के लिये एक संकेत का काम दे सकती हैं, कि वे चौकस रहें कि कहीं वे शागिर्दों को उनके प्राणों का नाश करने के लिये न रखें। परन्तु जवान दुर्जन के मार्ग में इनमें से कोई भी
77बाधा न थी; उसके पिता ने इस विषय में उसकी चिन्ता की, और उसके लिये अच्छा प्रबन्ध किया: उसे अच्छा मालिक मिला, उसे न अच्छी पुस्तकों की घटी थी, न अच्छी शिक्षा की, न अच्छे उपदेशों की, न अच्छे
उदाहरणों की, हाँ, न अच्छे संगी-सेवकों की ही: परन्तु सब कुछ व्यर्थ रहा।
सावधान. यह आश्चर्य की बात है, कि ऐसे परिवार में, इतनी आत्मिक सहायताओं के बीच, किसी बात ने उसके हृदय को न पकड़ा! क्या! न अच्छी पुस्तकों ने, न अच्छी शिक्षाओं ने, न अच्छे उपदेशों ने, न अच्छे उदाहरणों ने, न अच्छे संगी-सेवकों ने, किसी ने भी उसका भला न किया!
78 बुद्धिमान. आप इनकी बात करते हैं, पर उसने इनमें से किसी बात पर ध्यान न दिया; नहीं, ये सब बातें उसे घिनौनी लगती थीं।
1. अच्छी पुस्तकों की बात करें, तो वे उसकी ओर से उसके मालिक के घर में सड़ जाने तक पड़ी रह सकती थीं, वह उनमें झाँकने की भी परवाह न करता था; वरन् इसके विपरीत, वह जितनी बुरी और घिनौनी
पुस्तकें पा सकता था, सब ले आता था, जैसे पशुतुल्य प्रेम-कथाएँ, और अश्लीलता से भरी पुस्तकें, हाँ, ऐसी जो सीधे सब शारीरिक अभिलाषाओं में आग लगाने की ओर ले जाती थीं। यह सच है, कि वह अपने मालिक पर यह प्रकट होने देने का साहस न करता था कि उसके पास इनमें से कोई है; इसलिये वह उन्हें कभी उसे देखने न देता, वरन् छिपे स्थानों में रखता, और उन्हें ऐसे समयों पर पढ़ता जब उसे इसके लिये उपयुक्त अवसर मिलते।
2. अच्छी शिक्षा की बात करें, तो वह उसे उतनी ही भाती थी जितनी अच्छी पुस्तकें; उसका प्रयत्न यही रहता था कि उसमें से बहुत थोड़ा सुने, और जो सुने उसे कहे जाते ही भूल जाए। हाँ, मैंने कुछ लोगों को, जो उसे उस समय जानते थे, यह कहते सुना है, कि उसके चेहरे के 79भाव और हाव-भाव से स्पष्ट दिखाई देता था कि अच्छी सम्मति उसके लिये ‘लिटल-ईज़’ (वह तंग कालकोठरी जिसमें न कोई खड़ा हो सके न लेट सके) के समान थी, हाँ, एक निरन्तर यातना
75 बड़े लोग जो करते हैं, बच्चे उसे बड़े ध्यान से देखते हैं।
77 दुर्जन को भला बनने के सब लाभ प्राप्त थे, तौभी वह दुर्जन ही बना रहा।
78 सब अच्छी बातें दुर्जन को घिनौनी लगती थीं।
79 दुर्जन के लिये अच्छी सम्मति ‘लिटल-ईज़’ के समान। नीतिवचन 9:8. अध्याय 15:12.
उसके लिये; और वह अपने आप को तभी स्वतंत्र समझता था जब वह हितकर वचनों से सबसे दूर होता।
जो उसे डाँटते उनसे वह बैर रखता, और उन्हें अपना प्राणघातक शत्रु गिनता।
3. अच्छे उदाहरण की बात करें; जो उसके मालिक द्वारा धार्मिक और सांसारिक दोनों बातों में उसके सामने बार-बार रखा जाता था; इन पर जवान दुर्जन हँसता, और जहाँ वह सुरक्षित रूप से ऐसा कर सकता, वहाँ उन्हें उपहास की कहावत भी बना देता।
4. उसका मालिक सचमुच उसे अपने साथ उपदेश सुनने ले जाता, और वह भी वहाँ जहाँ वह समझता था कि सबसे अच्छे प्रचारक हैं, परन्तु यह भक्तिहीन जवान, मैं क्या कहूँ, (मेरी समझ में) सब प्रकार की शरारत में मानो उपाधि पाया हुआ पण्डित (मास्टर ऑफ़ आर्ट्स) था; उसके पास सुनने से अपने आप को रोकने के ये दुष्ट उपाय थे, चाहे प्रचारक कितना ही ऊँचा गरजे।
80 1. उसका ढंग यह था, कि सुनने के स्थान में आकर, किसी कोने में बैठ जाए, और फिर गहरी नींद में सो जाए।
2. या फिर वहाँ किसी सुन्दर रूप पर अपनी व्यभिचारी आँखें गड़ा दे, और इस प्रकार पूरे उपदेश के समय उससे अपनी शारीरिक अभिलाषाओं को पोषित करता रहे।
3. या, यदि वह ऐसे लोगों के पास बैठ पाता जिनके विषय में उसने देखा था कि वे उसके स्वभाव के अनुकूल हैं, तो वह उपदेश समाप्त होने तक उनके साथ कानाफूसी करता, खी-खी करता, और खिलवाड़ करता रहता।
सावधान. अरे! वह तो दुष्टता की अद्भुत ऊँचाई तक पहुँच गया था।
बुद्धिमान. हाँ, ऐसा ही था, और जो बात सबको और भी भारी बना देती है, वह यह थी, कि अपने मालिक के पास आते ही उसकी यह रीति हो गई थी, वह इन सब बातों में ऐसा निपुण था, मानो अपने मालिक के पास आने से पहले उसने इन्हें सीखने के लिये शागिर्दी की हो।
सावधान. (जैसा आप उनका वर्णन करते हैं) उसके पाप में विद्रोह भी जुड़ गया था, इसके सिवा और कुछ हो ही नहीं सकता। मुझे लगता है मानो उसने कहा हो, मैं नहीं सुनूँगा, मैं ध्यान नहीं दूँगा, मैं भलाई की चिन्ता नहीं करूँगा, मैं नहीं सुधरूँगा,
मैं नहीं फिरूँगा, मैं मन नहीं फिराऊँगा।
81 बुद्धिमान. आप सच कहते हैं, और मैं नहीं जानता कि उसकी तुलना उस मनुष्य से बढ़कर किससे ठीक बैठे, जिसे जब मैंने स्वयं उसकी दुष्टता के लिये डाँटा, तो उसने बड़ी ऐंठ में उत्तर दिया;
यदि मेरे जैसे लोग न होते, तो शैतान अपनी संगति के लिये क्या करता।
सावधान. क्या! क्या आपने कभी किसी मनुष्य को ऐसा कहते सुना।
बुद्धिमान. हाँ, सुना है; और यह जवान दुर्जन उसके ऐसा ही समान था, जैसे एक अण्डा दूसरे अण्डे के समान होता है।
हाय! पवित्रशास्त्र बहुतों का वर्णन करता है जो अपने कामों से यही बात कहते हैं। वे परमेश्वर से कहते हैं, हम से दूर हो! तेरी गति जानने की हम को इच्छा नहीं; फिर, वे चित्त लगाना नहीं चाहते, और हठ से अपना कन्धा फेर लेते हैं, और अपने कान बन्द कर लेते हैं; हाँ, वे अपने हृदय को हीरे सा कठोर बना लेते हैं, ऐसा न हो कि वे उस व्यवस्था को और उन वचनों को सुनें जिन्हें सेनाओं के 82यहोवा ने भेजा है। ये सब क्या हैं, सिवाय दुर्जन के समान लोगों के, और उस जवान के समान लोगों के
80 दुर्जन उपदेशों के समय कैसा व्यवहार करता था।
81 एच. एस. नामक एक व्यक्ति के दुस्साहसी शब्द, जो एक समय मेरा साथी था। वह नेड का सगा भाई था, जिसके विषय में आप पहले पढ़ चुके हैं।
82 अय्यूब 21:14. जकर्याह 1:11, 12, 13.
जिसका वर्णन अभी किया गया? वह जवान मेरा खेल का साथी था जब मैं अपने पापों में सुख ढूँढ़ता था: मैं अपनी लज्जा के लिये उसका वर्णन कर सकता हूँ; परन्तु उसके जैसे बहुत से और भी हैं।
सावधान. जवान दुर्जन सचमुच उसके समान था, और वह उसी के पदचिह्नों पर चला, मानो उसकी दुष्टता ही उसके लिये नकल करने का आदर्श रही हो; मेरा अर्थ है, उसके दुस्साहस के विषय में: क्योंकि यदि वह ऐसा दुस्साहसी न होता, तो जब आप उसे उसके पाप के लिये डाँट रहे थे, वह आपको कभी ऐसा उत्तर न देता।
परन्तु आपने उसे यह डाँट कब दी थी?
बुद्धिमान. उस समय के कुछ बाद जब परमेश्वर ने (जैसी मुझे आशा है) अपने अनुग्रह से मुझे बुलाकर मुझे और उसे अलग कर दिया था, और उसे उसके पापों में ही छोड़ दिया था; और जहाँ तक मैं कभी जान सका, जैसा वह जिया, वैसा ही मरा, ठीक जैसे श्रीमान दुर्जन मरा: परन्तु हम उसे छोड़ें, और फिर अपनी बातचीत पर लौटें।
सावधान. आह, बेचारे हठीले पापी! क्या वे सोचते हैं कि परमेश्वर उनसे बदला नहीं ले सकता?
बुद्धिमान. मैं नहीं जानता कि वे क्या सोचते हैं, परन्तु मैं जानता हूँ कि परमेश्वर ने कहा है, कि जैसे उसने पुकारा, 83और उन्होंने न सुना, वैसे ही वे पुकारेंगे, और मैं न सुनूँगा, यहोवा का यही वचन है। निःसन्देह वह समय आ रहा है, जब श्रीमान दुर्जन इसके कारण चिल्लाएगा।
सावधान. परन्तु मुझे आश्चर्य है कि वह इतनी जल्दी दुष्टता में इतना निपुण हो गया! हाय, वह तो अभी लड़का ही था, मेरी समझ में, वह अभी बीस वर्ष का भी न था।
बुद्धिमान. नहीं, अठारह का भी नहीं: परन्तु (जैसे इश्माएल में, और उन लड़कों में जिन्होंने 84भविष्यद्वक्ता को ठट्ठों में उड़ाया) पाप के बीज उसमें जल्दी ही फूट निकले।
सावधान. अच्छा, वह ऐसा दुष्ट जवान था जैसा साधारणतः कोई सुनने में आता है।
बुद्धिमान. जब आप सब कुछ जान लेंगे, तब आप ऐसा कहेंगे।
सावधान. सब कुछ! मेरी समझ में यहाँ तो बहुत कुछ है; परन्तु यदि और भी बाकी है, तो कृपया हमें सुनाइए।
बुद्धिमान. तो सुनिए, मैं आपको बताता हूँ, कि अपने मालिक के पास रहते उसे डेढ़ 85वर्ष से कुछ ही अधिक हुआ था, कि उसकी जान-पहचान तीन जवान दुष्टों से हो गई (जिनके नाम यहाँ न लिये जाएँगे), जिन्होंने उसे अपने पाप में उसी प्रकार के और बहुत से पाप जोड़ना सिखाया; और उसने भी उनकी शिक्षाओं को बड़ी तत्परता से ग्रहण किया। उनमें से एक मुख्य रूप से अशुद्धता में लगा था, दूसरा मतवालेपन में; और तीसरा अपने मालिक का माल उड़ाने, अर्थात् चोरी करने में।
सावधान. हाय, बेचारा अभागा, वह पहले ही काफ़ी बुरा था, परन्तु मैं समझता हूँ, इन्होंने उसे और भी बहुत बुरा बना दिया।
बुद्धिमान. कि उन्होंने उसे और बुरा बनाया, इसका आप निश्चय रखिए, क्योंकि उन्होंने उसे अपने सब मार्गों में पक्का धूर्त, एक प्रधान अगुवा बनना सिखा दिया।
सावधान. यह बड़े दुर्भाग्य की बात थी कि उसकी उनसे कभी जान-पहचान हुई।
86 बुद्धिमान. आपको इसे यों कहना चाहिए। यह परमेश्वर का दण्ड था कि उसकी जान-पहचान हुई; अर्थात्, परमेश्वर के क्रोध के कारण उसकी उनसे जान-पहचान हुई। उसे एक अच्छा मालिक मिला था, और उससे पहले एक अच्छा पिता: इनके द्वारा उसे महीनों और वर्षों तक लगातार अच्छी सम्मति दी गई;
84 उत्पत्ति 21:9, 10. 2 राजाओं 2:23, 24.
85 दुर्जन की जान-पहचान।
86 परमेश्वर के क्रोध का एक चिह्न।
परन्तु उसका मन शरारत पर लगा था, उसे भलाई करने से अधिक दुष्टता प्रिय थी, यहाँ तक कि उसका अधर्म घृणित हो गया; इसलिये, परमेश्वर के क्रोध ही से ऐसा हुआ, कि उसके ये साथी और वह अन्त में इस रीति से आपस में परिचित हुए। पौलुस कहता है, उन्होंने परमेश्वर को
87अपने ज्ञान में रखना उचित न समझा; और इसके बाद क्या होता है? इस कारण परमेश्वर ने उन्हें उनके मन की अभिलाषाओं के हाथ में छोड़ दिया, या सौंप दिया। और फिर, जो मुड़कर अपने टेढ़े मार्गों में चलते हैं, उनको यहोवा
88अनर्थकारियों के संग निकाल ले जाएगा। इसलिये यह उस पर परमेश्वर का हाथ था, कि वह नष्ट हो जाए, नरकदण्ड पाए; क्योंकि उसने सत्य के प्रेम को ग्रहण नहीं किया जिससे उसका उद्धार होता। परमेश्वर ने उसके लिये उसके भ्रम और भरमानेवाले चुन दिए, अर्थात् नीच
89 90मनुष्यों की, मूर्खों की संगति, कि वह नष्ट हो जाए।
सावधान. मैं सचमुच यह सोचे बिना नहीं रह सकता, कि किसी मनुष्य का नीच लोगों की संगति में 91सौंप दिया जाना परमेश्वर का एक बड़ा दण्ड है; क्योंकि ऐसे लोग शैतान के छलावे नहीं तो और क्या हैं, जिनके द्वारा वह भोले लोगों को जाल में खींच लेता है? एक व्यभिचारी, एक पियक्कड़, एक चोर, ये शैतान के चारे नहीं तो और क्या हैं, जिनके द्वारा वह दूसरों को फँसाता है?
बुद्धिमान. आप ठीक कहते हैं; परन्तु यह जवान दुर्जन भोला नहीं था, यदि भोले से आपका अर्थ ऐसे व्यक्ति से है जिसे शिक्षा न मिली हो; क्योंकि उसे बार-बार अच्छी सम्मति दी गई थी: परन्तु यदि भोले से आपका अर्थ उससे है जो मसीह के सच्चे ज्ञान और उस पर विश्वास के विषय में मूर्ख है, तो वह सचमुच भोला था: क्योंकि उसने जीवन के बदले मृत्यु को चुना, और परमेश्वर से मेल करने के बदले उसके निरन्तर विरोध में जीना चुना; उस बुद्धिमान पुरुष के इस कथन के अनुसार; मूर्खों ने
92ज्ञान से बैर किया, और यहोवा का भय मानना न चुना: और किसी मूर्ख के लिये इससे बढ़कर भयानक दण्ड क्या हो सकता है, कि वह ऐसे मनुष्यों के हाथ में सौंप दिया जाए, जिन्हें पाप को पकाने, और उसे नरकदण्ड तक पूरा करने में शीघ्रता करने के सिवा और कुछ करना आता ही नहीं? और इसलिये मनुष्यों को परमेश्वर को अप्रसन्न करने से डरना चाहिए, क्योंकि वह इस रीति से उन्हें उनके पापों का दण्ड दे सकता है। मैं एक मनुष्य को जानता था जो एक समय, जैसा मैं समझता था, अपनी दशा के विषय में आशाजनक रीति से जाग उठा था; हाँ, मैं दो को जानता था जो ऐसे जागे थे; परन्तु समय पाकर वे पीछे हटने लगे, और फिर अपनी अभिलाषाओं की ओर झुकने लगे; इसलिये, परमेश्वर ने उन्हें तीन-चार ऐसे मनुष्यों की संगति में सौंप दिया, जो तीन वर्ष से भी कम समय में उन्हें सीधे फाँसी के तख़्ते तक ले आए, जहाँ वे
93कुत्तों की नाईं फाँसी पर लटकाए गए, क्योंकि उन्होंने ईमानदार मनुष्यों की नाईं जीना अस्वीकार किया।
सावधान. परन्तु ऐसे मनुष्य यह विश्वास नहीं करते, कि इस रीति से परमेश्वर द्वारा छोड़ दिया जाना दण्ड और क्रोध के कारण है; वरन् वे इसे अपनी स्वतंत्रता समझते हैं, और इसे अपना सौभाग्य गिनते हैं; वे प्रसन्न होते हैं कि उनकी रस्सी खुल गई है, और लगाम उनकी गर्दन पर ढीली पड़ी है; वे प्रसन्न होते हैं कि वे
89 2 थिस्सलुनीकियों 2:10, 11, 12.
91 शैतान के छलावे।
93 यह बेडफ़र्ड में हुआ था।
बिना रोक-टोक पाप कर सकते हैं, और ऐसी संगति चुन सकते हैं जो उन्हें बुरे मार्ग में और भी निपुण बना सके।
बुद्धिमान. इसलिये उनका दण्ड और भी बड़ा है, क्योंकि उसके साथ दुष्ट मार्ग में मन का अन्धापन और हृदय की कठोरता भी जोड़ दी जाती है। वे मृत्यु के मार्ग पर हाँक दिए गए हैं, परन्तु उन्हें यह देखना नहीं कि वे किस स्थान को जा रहे हैं: उन्हें ऐसे जाना है जैसे बैल 94कसाई-खाने को, और जैसे मूर्ख काठ की बेड़ी की ताड़ना पाने को जाता है, जब तक कि कोई तीर उनके
कलेजे को न बेध दे, और वे नहीं जानते कि इसमें उनके प्राण जाएँगे। मैं कहता हूँ, यह बात उनके दण्ड को दुगुना कर देती है, वे परमेश्वर के द्वारा कुछ समय के लिये छोड़ दिए जाते हैं कि उस वस्तु से अपना मन बहलाएँ जो निश्चय ही अन्त में
95उनसे विलाप कराएगी, जब उनका शरीर और उनकी देह क्षीण हो जाएँगे। ये वे ही हैं जिनके विषय में 96पतरस कहता है, कि वे अपनी ही सड़ाहट में पूरी रीति से नाश हो जाएँगे; मैं कहता हूँ, ये, जो दिन-दोपहर भोग-विलास करने को सुख समझते हैं, और जो अपने ही छल से आनन्द करते हैं, निर्बुद्धि पशुओं के समान हैं, जो पकड़े जाने और नाश होने के लिये उत्पन्न हुए हैं।
सावधान. अच्छा, परन्तु अब कृपया उन तीन दुष्टों के विषय में बताइए जो जवान दुर्जन के साथी थे: मुझे और विस्तार से बताइए कि तब उसका चाल-चलन कैसा रहा।
बुद्धिमान. उसका चाल-चलन कैसा रहा! अजी, वह भी वैसा ही करता था जैसा वे करते थे। यह बात मैंने पहले ही संकेत से कह दी थी, जब मैंने कहा था, कि उन्होंने उसे अपने मार्गों में पक्का धूर्त, एक प्रधान अगुवा बना दिया।
97 पहले, वह मधुशालाओं और मदिरालयों में आने-जाने लगा, और वहाँ तब तक ठहरा रहता जब तक पशु के समान मतवाला न हो जाता। और यदि ऐसा होता कि वह दिन में बाहर न निकल सकता, तो निश्चय ही रात को निकल जाता। हाँ, अन्त में वह ऐसा प्रसिद्ध पियक्कड़ हो गया, कि सब लोग उसे पियक्कड़ के रूप में जानने लगे।
सावधान. यह तो सूअर जैसा काम था, क्योंकि मतवालापन ऐसा पशुतुल्य पाप है, ऐसा प्रकृति-विरुद्ध पाप है, कि मुझे आश्चर्य होता है कि जिनका रूप-रंग भी मनुष्यों का है, वे ऐसी पशुतुल्य (हाँ, पशु से भी बदतर) बात के हाथ अपने आप को कैसे सौंप सकते हैं।
98 बुद्धिमान. यह सचमुच सूअर जैसी व्यर्थता है। मैं आपको एक और कहानी सुनाता हूँ। एक भद्र पुरुष का साईस पियक्कड़ था, और एक रात वह बियर के नशे में बहुत धुत्त होकर घर आया, और उसके मालिक ने यह देख लिया। अच्छा (उसके मालिक ने मन ही मन कहा,) आज रात तो मैं तुझे छोड़ देता हूँ, परन्तु कल सवेरे मैं अपने घोड़े के व्यवहार से तुझे कायल कर दूँगा कि तू पशु से भी बदतर है। सो जब सवेरा हुआ, तो उसने अपने सेवक से कहा कि जाकर उसके
घोड़े को पानी पिला ला, और उसने ऐसा ही किया; परन्तु जब वह अपने मालिक के पास लौटा, तो उसने उसे फिर से पानी पिलाने की आज्ञा दी; सो वह व्यक्ति दूसरी बार घोड़े पर चढ़कर पानी में गया, परन्तु उसके मालिक का घोड़ा अब और न पीता था, सो वह व्यक्ति लौटकर आया और अपने मालिक को बताया। तब उसके मालिक ने कहा, अरे पियक्कड़ मूर्ख, तू मेरे घोड़े से कहीं बदतर है, वह तो केवल अपने स्वभाव की आवश्यकता पूरी करने के लिये पीता है, परन्तु तू
97 दुर्जन मधुशालाओं में आने-जाने लगा।
98 एक पियक्कड़ के लिये एक कहानी।
स्वभाव का दुरुपयोग करने तक पीता है; वह तो केवल अपने को ताज़ा करने के लिये पीता है, परन्तु तू अपनी हानि और क्षति के लिये;
वह इसलिये पीता है कि अपने मालिक के और अधिक काम आ सके, परन्तु तू तब तक पीता है जब तक न परमेश्वर की, न मनुष्य की सेवा करने के योग्य रहे। अरे पशु, तू उस घोड़े से भी कितना बदतर है जिस पर तू सवारी करता है।
सावधान. सचमुच मैं समझता हूँ कि उसके मालिक ने उसके साथ ठीक ही किया; क्योंकि जैसा उसने किया, उससे उसने उसे स्पष्ट दिखा दिया, जैसा उसने कहा, कि उसका अपने ऊपर उतना भी वश न था जितना उसके घोड़े का अपने ऊपर था, और परिणामस्वरूप उसका पशु अपने स्वभाव की व्यवस्था के अनुसार उसके सेवक से कहीं बढ़कर जीता था। परन्तु कृपया आगे जो कुछ आपको कहना है वह कहते चलिए।
99 बुद्धिमान. अजी, मैं कहता हूँ, कि चार बातें ऐसी हैं, जिन पर यदि भली-भाँति विचार किया जाए, तो मनुष्य-सन्तान के विचारों में मतवालापन घृणित ठहरेगा।
1. यह मनुष्य को बहुत कंगाल और भिखारी बना देता है। सुलैमान कहता है, पियक्कड़ 100कंगाल हो जाएगा। बहुत से जिन्होंने संसार में भरपूरी के साथ आरम्भ किया था, मतवालेपन के कारण चिथड़ों में संसार से गए हैं। हाँ, बहुत से बच्चे जो अच्छी सम्पत्ति के बीच जन्मे थे, तौभी अपने माता-पिता के इस पशुतुल्य पाप के कारण दाँवने की छड़ और पाँचे तक आ पहुँचे हैं।
2. मतवालेपन का यह पाप देह पर बहुत से, बड़े, और असाध्य रोग ले आता है, जिनके द्वारा मनुष्य थोड़े ही समय में अपने अन्त को पहुँचते हैं, और कोई उनकी सहायता नहीं कर सकता। इस प्रकार, क्योंकि
101वे अत्यन्त दुष्ट हैं, इसलिये वे अपने समय से पहिले मर जाते हैं।
3. मतवालापन एक ऐसा पाप है जिसके साथ प्रायः बहुत सी और बुराइयाँ लगी रहती हैं। कौन कहता है, हाय? कौन कहता है, हाय हाय? कौन झगड़े रगड़े में फँसता है? कौन बक बक करता है? किसके अकारण घाव होते हैं? किसकी आँखें लाल हो जाती हैं? उनकी जो दाखमधु देर तक पीते हैं, और जो 102मसाला मिला हुआ दाखमधु ढूँढ़ने को जाते हैं। अर्थात्, पियक्कड़।
4. मतवालेपन के द्वारा मनुष्य प्रायः अपने दिन घटा लेते हैं; शराबख़ाने से मतवाले होकर निकलते हैं, और घर पहुँचने से पहले ही अपनी गर्दन तोड़ लेते हैं। इसके थोड़े नहीं, बहुत से उदाहरण दिए जा सकते हैं, परन्तु यह बात इतनी स्पष्ट है, कि किसी को कुछ कहने की आवश्यकता नहीं।
103 104 सावधान. परन्तु जो बात इन सबसे बुरी है, वह यह है, कि यह मनुष्यों को अनन्त दाह के लिये भी तैयार करता है।
बुद्धिमान. हाँ, और यह प्राण को ऐसा जड़ और बेसुध कर देता है, कि जो मनुष्य मतवालेपन में बहुत आगे बढ़ चुका है, वह शायद ही कभी परमेश्वर की ओर लौटाया जाता है। मुझे बताइए, आपने कब किसी बूढ़े पियक्कड़ का
105मन-परिवर्तन होते देखा? नहीं, नहीं, ऐसा व्यक्ति मरने तक सोता रहेगा, चाहे वह मस्तूल के सिरे पर ही क्यों न सोता हो, उसके संकट चाहे कितने ही बड़े हों और मृत्यु और नरकदण्ड चाहे कितने ही निकट हों, वह 99 मतवालेपन के साथ चार बुराइयाँ लगी रहती हैं।
100 नीतिवचन 23:20, 21.
102 नीतिवचन 23:29, 30.
104 पाँचवीं बुराई सबसे बुरी।
105 नीतिवचन 23:34, 35.
अपनी नींद से नहीं जागेगा। इसलिये यदि मनुष्य को अपनी साख, स्वास्थ्य, जीवन या उद्धार का कुछ भी ध्यान हो, तो वह मतवाला मनुष्य न बनेगा। परन्तु सच्चाई यह है, कि जहाँ यह पाप प्रबल हो जाता है, वहाँ मनुष्य, जैसा मैंने पहले कहा, उसके दिखावटी सुखों और मिठास से ऐसे मतवाले और मोहित हो जाते हैं; कि उनमें उस बात को सोचने का न मन रहता है न इच्छा, जो अपने आप में उत्तम है; और जिसे यदि अपनाया जाए, तो उनका भला करे।
सावधान. आपने कहा कि मतवालापन कंगाली की ओर ले जाता है, तौभी कुछ लोग मतवालेपन के सौदों से अपने आप को धनी बना लेते हैं।
106 बुद्धिमान. मैंने ऐसा इसलिये कहा, क्योंकि वचन ऐसा कहता है। और जहाँ तक कुछ लोगों के इससे कमाने की बात है, वह सचमुच दुर्लभ है, और नीच भी: हाँ, और ऐसी कमाई का अन्त भी नीच होगा। परमेश्वर का वचन ऐसे मार्गों के विरुद्ध है, और परमेश्वर का शाप ऐसे कामों का अन्त होगा। कभी-कभी इस रीति से आरम्भ में उतावली से भाग मिल जाता है, परन्तु अन्त में उस पर आशीष नहीं होती। सुनिए भविष्यद्वक्ता क्या कहता है; हाय उस पर, जो बुरे लाभ का लोभी है, ताकि वह
107अपना घोंसला ऊँचे स्थान पर बनाए। चाहे वह उसे पाने के लिये मतवालेपन को, या और किसी बात को, अपना यन्त्र और छलावा बनाए; क्योंकि वह मनुष्य केवल अपने घर की लज्जा, अपने परिवार की बरबादी, और अपने प्राण के नरकदण्ड की युक्ति करता है; क्योंकि जो कुछ वह अधर्म करके पाता है, वह नरक की युक्तियों से पाई हुई कमाई है; इसलिये जो बुरे मार्ग से कमाता है, वह न तो अपने लिये और न अपने परिवार के लिये कुछ कमानेवाला ठहर सकता है। परन्तु यह उन पापों में से एक था जिनका श्रीमान दुर्जन इन तीन लोगों से जान-पहचान होने के बाद आदी हो गया, और उसका मालिक जो कुछ भी कर सकता था, वह सब उसे इस पशुतुल्य पाप से छुड़ा न सका।
सावधान. परन्तु जब वह केवल एक शागिर्द ही था, तो वह इस आदत को निभाने के लिये पैसा कहाँ से लाता था, क्योंकि मतवालापन, जैसा आपने संकेत किया है, बहुत महँगा पाप है।
108 बुद्धिमान. सारा खर्च उसके मालिक ने भरा। क्योंकि, (जैसा मैंने आपको पहले बताया) जैसे उसने इन तीन दुष्टों से पशुतुल्य पियक्कड़ बनना सीखा; वैसे ही उसने उनसे अपने मालिक का माल उड़ाना और उसकी चोरी करना भी सीखा।
कभी-कभी वह अपने मालिक का माल बेच देता, परन्तु पैसा अपने पास रख लेता, अर्थात् जब ऐसा कर सकता; कभी-कभी वह अपने मालिक की नकदी की पेटी में से निकालकर उसे धोखा देता: और जब वह इन दोनों में से कुछ भी न कर पाता, तो वह अपने मालिक के माल में से, जिसकी कमी उसके विचार में सबसे कम पकड़ी जाती, कुछ चुपके से उठा ले जाता, और उसे ऐसे-ऐसे घरों में भेज देता या ले जाता, जहाँ वह जानता था कि वह उसके काम के लिये रख लिया जाएगा, और फिर वहाँ नियत समय ठहराता, कि इन साथियों से मिले और रंगरलियाँ मनाए।
सावधान. यह भी उतना ही बुरा था, नहीं, मेरी समझ में, पहले से भी बुरा; क्योंकि ऐसा करके, उसने न केवल अपने आप को परमेश्वर के क्रोध के नीचे डाल दिया, वरन् अपने मालिक और उसके परिवार को बरबादी के जोखिम में भी डाल दिया।
106 एक आपत्ति का उत्तर।
107 हबक्कूक 2, 9, 10, 11, 12. पद 5, 15.
108 दुर्जन के मालिक के बटुए ने उसके मतवालेपन का खर्च भरा।
बुद्धिमान. पाप अकेले नहीं चलते, वरन् एक दूसरे के पीछे ऐसे चलते हैं जैसे ज़ंजीर की कड़ियाँ; जो पियक्कड़ बनना चाहे, उसके पास पैसा होना ही चाहिए, चाहे अपना हो, या किसी दूसरे का; चाहे अपने
पिता का, माता का, मालिक का, या राजमार्ग पर डाका डालकर, या किसी और रीति से।
सावधान. मुझे डर है कि ऐसे सेवकों के कारण बहुत से ईमानदार मनुष्य बरबाद हो जाते हैं।
109 बुद्धिमान. मैं भी आपसे सहमत हूँ, परन्तु इस बात से व्यापारी को और भी सावधान हो जाना चाहिए कि वह किस प्रकार के सेवक रखता है, और किस प्रकार के शागिर्द लेता है। इससे उसे यह भी सीखना चाहिए कि वह अपनी दुकान की देख-भाल स्वयं भली-भाँति करे, और जो कुछ उसके सेवकों द्वारा खरीदा और बेचा जाता है, उस सबका कड़ा हिसाब भी ले। इसमें मालिक की लापरवाही उसके सेवक को बुरा बनने का साहस दे सकती है, और थोड़े ही समय में उसे भी चिथड़ों और रोटी के एक टुकड़े तक पहुँचा सकती है।
सावधान. मुझे डर है कि हमारे इन बुरे दिनों में सेवकों के बीच इस प्रकार की छोटी-मोटी चोरी बहुत होती है।
बुद्धिमान. अब, जब तक यह बात मेरे मन में है, मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ। जब मैं बन्दीगृह में था, तब एक स्त्री मेरे पास आई जो बड़े संकट में थी। सो मैंने उससे पूछा (क्योंकि वह मेरे लिये अपरिचित थी) कि उसे मुझसे क्या कहना है। उसने कहा, उसे डर है कि वह नरक में दण्ड पाएगी।
मैंने उससे उन डरों का कारण पूछा। उसने मुझे बताया कि कुछ समय पहले वह वेलिंगबरो में एक दुकानदार के यहाँ रहती थी, और उसने कई बार दुकान में उसकी पेटी से पैसे चुराए थे, जिनकी कीमत उससे अधिक थी जितनी मैं अभी बताना चाहता हूँ; और कृपा करके, उसने कहा, मुझे बताइए कि मैं क्या करूँ। मैंने उससे कहा, मैं चाहता हूँ कि वह अपने मालिक के पास जाए, और उसकी क्षतिपूर्ति करे: उसने कहा, वह डरती है;
मैंने उससे पूछा, क्यों? उसने कहा, उसे सन्देह था कि वह उसे फाँसी पर चढ़वा देगा। मैंने उससे कहा, कि मैं उसके प्राण के लिये बिनती करूँगा, और दूसरे मित्रों से भी ऐसा ही करवाऊँगा; परन्तु उसने मुझसे कहा, कि वह इसका जोखिम उठाने का साहस नहीं कर सकती। अच्छा, मैंने कहा, क्या मैं आपके मालिक के पास सन्देश भेजूँ, जबकि आप छिपी रहें, और उसके आपको देखने से पहले ही उससे आपका मेल करा दूँ; और यह कहकर, मैंने उससे उसके मालिक का नाम पूछा। परन्तु इसके उत्तर में उसने बस इतना ही कहा, कृपा करके इसे तब तक रहने दीजिए जब तक मैं फिर आपके पास न आऊँ।
सो वह चली गई, और उसने न तो मुझे अपने मालिक का नाम बताया, न अपना: यह कोई दस या बारह वर्ष पहले की बात है, और फिर मैंने उसे कभी नहीं देखा। मैं आपको यह कहानी इस कारण सुनाता हूँ; कि आपके इस भय की पुष्टि हो जाए, कि ऐसे सेवक बहुत अधिक हैं; और यह कि परमेश्वर कभी-कभी उन्हें बूढ़े टॉड के समान, जिसकी चर्चा पहले हो चुकी है, (उन पर डाले हुए भय के द्वारा) स्वयं ही अपना भेद खोल देने पर विवश कर देता है।
मैं आपको एक और के विषय में बता सकता हूँ, जो ऐसा ही वृत्तान्त अपने विषय में, और अपनी मालकिन को लूटने के विषय में लेकर मेरे पास आई थी; परन्तु इस समय इतना ही पर्याप्त है।
सावधान. परन्तु वह दूसरा दुष्ट किस बात का आदी था, मेरा अर्थ है, युवक दुर्जन का तीसरा साथी?
110 बुद्धिमान. अशुद्धता का। मैंने आपको पहले बताया था, पर जान पड़ता है आप भूल गए।
सावधान. ठीक है, वह अशुद्धता ही थी। अशुद्धता भी एक घिनौना पाप है।
बुद्धिमान. हाँ, है तो; फिर भी हमारे दिनों में यह सबसे अधिक राज करनेवाले पापों में से एक है।
109 मालिकों के लिये एक चेतावनी।
110 दुर्जन का तीसरा साथी अशुद्धता का आदी था।
सावधान. लोग ऐसा ही कहते हैं, और वह भी उन लोगों में जिनके विषय में कोई सोचे कि उनमें अधिक बुद्धि होगी, यहाँ तक कि बड़े लोगों में भी।
बुद्धिमान. यह और भी खेद की बात है: क्योंकि जो उदाहरण बड़े और 111 प्रधान लोगों के द्वारा रखे जाते हैं, वे साधारणतः दूसरे मनुष्यों के पापों की अपेक्षा अधिक शीघ्र और अधिक दूर-दूर तक फैलते हैं; हाँ, और जब ऐसे लोग अपराध करने में अगुवे होते हैं, तो पाप ढीठ मुँह लिये सारे देश में घूमता फिरता है। जैसा यिर्मयाह भविष्यद्वक्ताओं के विषय में कहता है, वैसा ही ऐसे लोगों के विषय में भी कहा जा सकता है, उन्हीं के कारण सारे देश में भक्तिहीनता फैल गई है; अर्थात् ढीठ और निर्लज्ज मुँह के साथ, यिर्मयाह 23:15।
सावधान. परन्तु कृपया हम फिर से श्रीमान दुर्जन और उसके साथियों की ओर लौटें। आप कहते हैं कि उनमें से एक अशुद्धता के काम करने में बहुत नीच था।
बुद्धिमान. हाँ, मैं यही कहता हूँ; यह नहीं कि वह पियक्कड़ और चोर न था, परन्तु अशुद्धता के इस पाप में वह सबसे बढ़कर चतुर था: यह दुष्टता उसकी सबसे बड़ी कारीगरी थी, क्योंकि व्यभिचार के पशु-समान पाप में वह उन सब का सरगना था। वह ऐसे घरों को भी सबसे अच्छी तरह जानता था जहाँ वे रहती थीं, और इसलिये अपने दल के बाकी लोगों को तुरन्त वहाँ ले जा सकता था। वेश्याएँ भी, क्योंकि वे इस युवा दुष्ट को जानती थीं, पहली ही बार में उन लोगों के सामने, जिन्हें वह अपने साथ लाता था, अपनी सारी वेश्यापन की चालें खोलकर दिखा देती थीं।
सावधान. यह तो प्राणघातक बात है: मेरा अर्थ है, जवानों के लिये यह प्राणघातक बात है, जब ऐसी पशु-समान कुलटाएँ ऐसे वचनों और ऐसे चाल-चलन से, जो खुल्लमखुल्ला लुभानेवाले हों, अपने आप को उन पर प्रगट करती हैं; ऐसे लोगों के लिये उनके फन्दे से बचना कठिन है।
बुद्धिमान. यह सच है, इसलिये बुद्धिमान पुरुष की सम्मति ही सबसे अच्छी है: उसके घर के द्वार 112 के पास भी न जाना; क्योंकि वे (जैसा आप कहते हैं) बहुत लुभानेवाली होती हैं, जैसा नीतिवचन में उस स्त्री के द्वारा दिखाई देता है।
मैंने (बुद्धिमान पुरुष कहता है) अपनी खिड़की से झाँका, और भोले लोगों के बीच देखा, तो मुझे एक निर्बुद्धि जवान दिखाई पड़ा; वह उस स्त्री के कोने के पास की सड़क से होकर जा रहा था, और उसने उसके घर का मार्ग लिया: दिन ढलते समय, संध्या को, रात के काले और घोर अन्धकार में।
113 और देखो, एक स्त्री उससे मिली, जिसका भेष वेश्या का सा था, और जो मन की बड़ी धूर्त थी; ( वह बकबक करनेवाली और हठीली है, उसके पाँव घर में नहीं टिकते। कभी वह बाहर, कभी सड़क पर होती है, और हर एक कोने पर घात में बैठी रहती है।) तब उसने उसको पकड़कर चूमा, और निर्लज्ज मुँह से उससे कहा: मेरे पास मेलबलि हैं; आज ही मैंने अपनी मन्नतें पूरी की हैं।
इसी कारण मैं तुझ से भेंट करने को निकली, कि यत्न से तेरा मुँह ढूँढ़ूँ, और मैंने तुझे पा लिया है। मैंने अपने पलंग पर बेलबूटेवाले बिछौने, नक्काशी के काम, और मिस्र के महीन सन के कपड़े बिछाए हैं:
मैंने अपने बिछौने पर गन्धरस, अगर और दालचीनी छिड़की है; आ, हम भोर तक 114 प्रेम से जी भरकर तृप्त हों, हम परस्पर की प्रीति से आनन्द मनाएँ। यह थी एक ढीठ पशु-समान स्त्री: और सचमुच, ऐसी स्त्रियों की आँखें, हाथ, बातें और चालें, सब की सब, जवान और कामुक लोगों के लिये फन्दे और बन्धन हैं: और इन्हीं में युवक दुर्जन बुरी तरह फँस गया था।
111 बड़े लोगों के पाप भयानक होते हैं।
113 वेश्या के लक्षण।
114 अध्याय 7:6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18।
115 सावधान. अशुद्धता के इस पाप के विरुद्ध मूसा ने, भविष्यद्वक्ताओं ने, मसीह ने, और उसके प्रेरितों ने, सब ने बड़े ज़ोर से पुकार उठाई है; और फिर भी, जैसा हम देखते हैं, इन सब के होते हुए भी, लोग कैसे सिर के बल उसकी ओर दौड़ते हैं!
बुद्धिमान. आपने सच कहा है, और मैं इतना और जोड़ूँगा, कि परमेश्वर ने मनुष्यों को ऐसे घिनौने पाप से रोके रखने के लिये, उस पर अपने क्रोध की ऐसी छाप लगा दी है, और ऐसे बुरे परिणामों को उसके पीछे आने की आज्ञा दी है, कि यदि इसे करनेवाले परमेश्वर के सारे भय से, और अपने स्वास्थ्य के सारे प्रेम से खाली न हो गए होते, तो वे अवश्य रुक जाते और उसे करने से डरते। क्योंकि, उस अनन्त दण्ड के अतिरिक्त जो अगले संसार में ऐसे लोगों की बाट जोहता है, (क्योंकि मसीह और परमेश्वर के राज्य में इनकी कोई मीरास नहीं, इफिसियों 5) इस संसार में भी उसके बुरे परिणाम भयानक हैं।
सावधान. कृपया मुझे उनमें से कुछ दिखाइए, कि जैसे-जैसे अवसर मिले, मैं उन्हें दूसरों को उनकी भलाई के लिये दिखा सकूँ।
116 बुद्धिमान. ऐसा ही करूँगा। 1. यह मनुष्य को (जैसा पिछले पाप के विषय में कहा गया था) तंगी और कंगाली में पहुँचा देता है; क्योंकि वेश्यागमन के कारण मनुष्य टुकड़ों का भिखारी हो जाता है। इसका कारण यह है, कि वेश्या बिना दाम लिये हाथ नहीं आती; और मनुष्य, जब उनमें शैतान और कामवासना होती है, और परमेश्वर और उसका भय उनसे दूर होता है, तो अपनी इच्छा पूरी करने के लिये इस बात से भी नहीं हिचकिचाते,
117 कि अपनी मुहर, अपने बाजूबन्द, और अपनी छड़ी तक गिरवी रख दें, बजाय इसके कि उनकी अभिलाषाएँ पूरी होने से रह जाएँ। 2. फिर, इस पाप के द्वारा मनुष्य अपना बल घटाते हैं, और अपने ऊपर, हाँ, अपनी देह पर भी, बहुत से रोग ले आते हैं। इसी के विषय में राजा लमूएल की माता ने उसे चेतावनी दी थी। क्या, हे मेरे पुत्र, उसने कहा, क्या, हे मेरे गर्भ के पुत्र, और क्या, हे मेरी
118 मन्नतों के पुत्र: अपना बल स्त्रियों को न देना, न अपनी चाल उसको देना जो राजाओं का नाश करती है।
119 यह पाप देह के लिये नाशकारी है। मुझे आपको एक और कहानी सुनाने की अनुमति दीजिए। मैंने एक बड़े मनुष्य के विषय में सुना है जो बहुत ही अशुद्ध व्यक्ति था, और वह इतने लम्बे समय तक उस पाप में जीता रहा था, कि उसकी आँखों की ज्योति लगभग जाती रही। तब उसके वैद्य बुलाए गए, और उसने उन्हें अपना रोग बताया; परन्तु उन्होंने उससे कहा, कि जब तक वह अपनी स्त्रियों को न छोड़ेगा, तब तक वे उसका कुछ भला नहीं कर सकते।
तब तो, उसने कहा, विदा हो प्यारी ज्योति! इससे देखिए, कि यह पाप, जैसा मैंने कहा, देह के लिये नाशकारी है; और यह भी, कि कुछ मनुष्य इससे इतना प्रेम करते हैं, कि चाहे यह उनकी देह को नाश कर दे, तौभी वे इसे छोड़ेंगे नहीं।
सावधान. पौलुस भी कहता है, कि जो यह पाप करता है, वह अपनी ही देह के विरुद्ध पाप करता है। परन्तु इससे क्या? जो मनुष्य अपने प्राण के अनन्त दण्ड का जोखिम उठा लेगा, पर यह पाप अवश्य करेगा, वह उसके लिये अपनी देह के नाश होने का जोखिम भी उठा लेगा। यदि युवक दुर्जन अपने प्राण के अनन्त दण्ड से नहीं डरा, तो क्या आप सोचते हैं कि अपनी देह के बिगड़ जाने का विचार उसे इससे रोक सकता था?
115 अशुद्धता के पाप के विरुद्ध पुकार।
116 इस पाप के साथ कौन-कौन सी बुराइयाँ लगी रहती हैं। नीतिवचन 6:26।
119 अशुद्ध लोगों के ध्यान देने योग्य एक कहानी।
बुद्धिमान. आप सच कहते हैं। परन्तु फिर भी, मुझे लगता है, इसके करने के बाद अक्सर ऐसे बुरे परिणाम अब भी होते हैं, कि यदि मनुष्य उन पर विचार करें, तो कम से कम उस मार्ग में उनकी दौड़ तो रुक ही जाए।
सावधान. इस पाप के साथ और कौन-कौन से बुरे परिणाम लगे रहते हैं?
120 बुद्धिमान. बाहरी लज्जा और अपमान, और वह इन बातों में:
पहली, इस गंदे पाप के पीछे अक्सर वह गंदा रोग आता है, जिसे अब हम आतशक (पॉक्स) कहते हैं। एक ऐसा रोग जो इतना घिनौना और दुर्गन्धवाला, सारी देह में इतना फैलनेवाला है (और इस पाप के साथ इतना बँधा हुआ है) कि अशुद्ध स्त्रियों के पास आने-जानेवालों में शायद ही कोई हो जिसे अपनी लज्जा के लिये थोड़ा-बहुत उसका स्पर्श न लगा हो।
सावधान. वह तो सचमुच गंदा रोग है: मैं एक मनुष्य को जानता था जो उससे सड़-सड़कर मर गया; और एक और को, जिसकी नाक उससे गल गई थी, और उसका मुँह लगभग पूरी तरह सिल सा गया था।
बुद्धिमान. यह एक ऐसा रोग है, कि जहाँ यह होता है, वहाँ साधारणतः यह प्रगट कर देता है, कि इसका कारण अशुद्धता है। यह उन सब पर, जो ऐसे मनुष्य को देखते हैं, प्रगट कर देता है, कि वह एक घृणित, पशु-समान, अशुद्ध व्यक्ति है। यही वह अनोखा दण्ड है जिसकी चर्चा अय्यूब करता है, जो 121 इन अनर्थकारियों को पकड़ने के लिये ठहराया गया है।
सावधान. तो ऐसा जान पड़ता है कि आप समझते हैं कि वह अनोखा दण्ड जिसकी चर्चा अय्यूब वहाँ करता है, यही गंदा रोग होगा।
बुद्धिमान. हाँ, मैंने सचमुच ऐसा सोचा है, और इस कारण से: हम देखते हैं कि यह रोग, जैसा मैं कह सकता हूँ, इस अत्यन्त पशु-समान पाप के साथ बँधा हुआ है, और कोई दूसरा रोग किसी दूसरे पाप के साथ ऐसा बँधा हुआ नहीं है, जैसा यह इसके साथ। कि यही वह पाप है जिसके साथ वह अनोखा दण्ड बँधा हुआ है, यह आप पाठ को पढ़ते ही सहज में समझ जाएँगे। मैंने अपनी आँखों के विषय वाचा बाँधी है, अय्यूब ने कहा, फिर मैं किसी कुँवारी पर क्यों ध्यान लगाऊँ? क्योंकि (उस पाप के लिये) ऊपर से कौन सा भाग है, और ऊँचे पर से
सर्वशक्तिमान की ओर से कौन सी मीरास है? और तब वह आप ही उत्तर देता है; क्या दुष्टों के लिये विनाश, और अनर्थकारियों के लिये अनोखा दण्ड नहीं है? यह अनोखा दण्ड आतशक है।
मैं यह भी समझता हूँ कि यही गंदा रोग वह है जिसकी ओर सुलैमान संकेत करता है, जब वह (इस अशुद्ध और पशु-समान प्राणी के विषय में बोलते हुए) कहता है, उसको घाव और अपमान मिलेगा, और 122 उसकी नामधराई कभी न मिटेगी। अय्यूब इसे दण्ड कहता है, सुलैमान इसे घाव और अपमान कहता है; और वे दोनों इसे इस पाप पर एक चिह्न के रूप में लगाते हैं; अय्यूब इसे अनोखा दण्ड कहता है, और सुलैमान एक ऐसी नामधराई जो उन लोगों पर से कभी न हटेगी जो इसमें लिप्त रहते हैं।
सावधान. इस पशु-समान पाप को करने के बाद और क्या-क्या बातें होती हैं?
बुद्धिमान. अजी, अक्सर इसके साथ हत्या लगी रहती है, उस बालक की हत्या जो अशुद्ध बिछौने पर उत्पन्न हुआ। नाजायज़ सन्तान उत्पन्न करनेवाले और नाजायज़ सन्तान जननेवाली का,
120 इस पाप के साथ और भी बुराइयाँ लगी रहती हैं।
आपस में मिलकर अपने बच्चों की हत्या करने के लिये सहमत हो जाना कितना आम है, यह न्याय के दिन और भी अच्छी तरह प्रगट होगा; तौभी कुछ-कुछ अभी भी प्रगट है।
मैं आपको एक और कहानी सुनाता हूँ। एक बूढ़े मनुष्य की, जो मेरी जान-पहचान का था, और हमारे प्रदेश में अच्छी साख रखता था, माता एक दाई थी: जो अधिकतर बड़े घरानों की स्त्रियों की जचगी कराने के लिये बुलाई जाती थी। एक समय इस स्त्री के घर पर एक सजा-धजा जवान रईस घोड़े पर सवार होकर आया, कि उसे एक जवान महिला की जचगी कराने के लिये ले जाए। सो वह उसके साथ जाने को तैयार हुई; इसलिये, उसने उसे अपने पीछे घोड़े पर बिठा लिया, और वे रात ही में चल पड़े। अभी वे बहुत दूर नहीं गए थे, कि वह भद्र पुरुष अपने घोड़े से उतरा, और उस बूढ़ी दाई को घोड़े पर से अपनी बाहों में उठाकर, उसके साथ कई बार चक्कर घूमा, और फिर उसे घोड़े पर बिठा दिया; तब वह आप चढ़ा, और वे चल पड़े, यहाँ तक कि एक आलीशान घर के पास पहुँचे, जिसमें वह उसे ले गया, और फिर एक कोठरी में जहाँ वह जवान महिला प्रसव-पीड़ा में थी: तब उसने दाई से अपना काम करने को कहा, और उसने सहायता माँगी, परन्तु उसने अपनी तलवार खींच ली और उससे कहा, कि यदि वह बिना किसी सहायता के अपना काम शीघ्र न करेगी, तो उसे मृत्यु के सिवाय और किसी बात की आशा न रखनी चाहिए। अच्छा, संक्षेप में कहूँ तो, इस बूढ़ी
दाई ने उस जवान महिला की जचगी कराई, और उसके एक सुन्दर प्यारा बालक उत्पन्न हुआ; अब पास ही के एक कमरे में बहुत बड़ी आग जलाई गई थी: सो उस भद्र पुरुष ने बालक को उठाया, वहाँ गया और अँगीठी में से अंगारे हटाए, बच्चे को उसमें डाल दिया, और उसे ढाँप दिया, और उसका अन्त हो गया। फिर जब दाई अपना काम पूरा कर चुकी, तो उसने उसे उसके परिश्रम की अच्छी मज़दूरी दी, परन्तु दिन भर उसे एक अँधेरे कमरे में बन्द रखा, और जब रात हुई, तो फिर उसे अपने पीछे घोड़े पर बिठाया, और उसे ले चला, यहाँ तक कि वह लगभग अपने घर के पास आ पहुँची; तब उसने उसे पहले की तरह चक्कर पर चक्कर घुमाया, और उसे उसके घर ले आया, उसे उतारा, उससे विदा ली, और चला गया: और वह कभी न बता सकी कि वह कौन था।
यह कहानी उस दाई के पुत्र ने, जो एक पादरी था, मुझे सुनाई; और दृढ़ता से यह भी कहा कि उसकी माता ने उसे यह बात सच्ची करके बताई थी।
सावधान. सचमुच हत्या अक्सर इसके पीछे आती है, मानो वह इस पाप का फल हो: परन्तु कभी-कभी परमेश्वर ऐसे व्यभिचारियों और व्यभिचारिणियों को लज्जाजनक अन्त तक भी पहुँचाता है। मैंने एक (मेरे विचार में, एक चिकित्सक) और उसकी वेश्या के विषय में सुना, जिनके आपस में तीन या चार नाजायज़ बच्चे हुए थे, और उन्होंने उन सब की हत्या कर दी थी, परन्तु अन्त में वे स्वयं इसके लिये कॉलचेस्टर में या उसके पास फाँसी पर लटकाए गए। यह बात इस प्रकार खुली: वह वेश्या इस विषय में अपने विवेक में इतनी दुःखी हुई, कि जब तक उसने इसे प्रगट न कर दिया, तब तक उसे चैन न मिला: इस प्रकार परमेश्वर बहुत बार दुष्टता करनेवालों को स्वयं अपना ही दोष लगानेवाला बना देता है, और उनकी अपनी ही जीभ के द्वारा उन्हें उनके अपने पापों के उचित दण्ड तक पहुँचाता है।
बुद्धिमान. ऐसे बहुत से उदाहरण हुए हैं, परन्तु हम उसे जाने दें। मैं एक बार एक स्त्री के पास उपस्थित था, एक विवाहित स्त्री, जो उसी बीमारी में पड़ी थी जिससे वह मर गई; और अशुद्धता के उस पाप के कारण, जो उसने अक्सर दूसरे पुरुषों के साथ किया था, अपने विवेक में घायल होकर, मैंने उसे (जब वह अपने बिछौने पर पड़ी थी) इस प्रकार चिल्लाते सुना: मैं वेश्या हूँ, और मेरे सब बच्चे नाजायज़ हैं: और मुझे अपने पाप के कारण नरक में जाना होगा; और देखो, वह शैतान मेरे बिछौने के पैताने खड़ा है कि जब मैं मरूँ तो मेरे प्राण को ले ले।
सावधान. ये दुःखभरी कहानियाँ हैं, अब इनमें से और न सुनाइए, परन्तु यदि आपकी इच्छा हो तो इस पशु-समान पाप के कुछ और बुरे परिणाम मुझे दिखाइए।
बुद्धिमान. यह पाप प्राण के लिये ऐसा फन्दा है, कि जब तक अनुग्रह का कोई आश्चर्यकर्म उसे न रोके, वह इसके मोहनेवाले और जादू भरे सुखों में निश्चय नाश हो जाता है। यह इन और ऐसे ही पदों से प्रगट है।
व्यभिचारिणी अनमोल जीवन का अहेर करती है। जो किसी स्त्री के साथ व्यभिचार करता है, वह 123 निरा निर्बुद्धि है, और जो ऐसा करता है वह अपने ही प्राण को नाश करता है। वेश्या गहरा गड्ढा है, और पराई स्त्री सकरा कुआँ है। उसका घर मृत्यु की ओर झुका है, और उसकी डगरें मरे हुओं की ओर। जो उसके पास जाते हैं उनमें से कोई लौटकर नहीं आता, और न वे जीवन का मार्ग पकड़ पाते हैं। उसने बहुतों को घायल करके गिरा दिया है; हाँ, बहुत से बलवन्त पुरुष उसके द्वारा घात किए गए हैं, उसका
124 घर नरक का मार्ग है, जो मृत्यु की कोठरियों में उतर जाता है।
सावधान. ये भयानक वचन हैं, और उन लोगों की भयानक दशा दिखाते हैं जो इस पाप के दोषी हैं।
बुद्धिमान. सचमुच वे ऐसा ही दिखाते हैं। परन्तु जो बात इस सब को और भी भयानक बनाती है, वह यह है, कि मनुष्य इस पाप के वश में छोड़ दिए जाते हैं, क्योंकि परमेश्वर उनसे घृणा करता है, और क्योंकि वह उनसे घृणा करता है, इसलिये वे इसे करने में जा गिरेंगे; और उसी में जीते रहेंगे। पराई स्त्री का मुँह (अर्थात् चिकनी-चुपड़ी बातें करनेवाले होंठ) गहरा गड्ढा है, जिससे यहोवा घृणा करता है वही
125 उसमें गिरेगा। इसलिये फिर ऐसे लोगों के विषय में कहा गया है, कि मसीह और परमेश्वर के राज्य में 126 उनकी कोई मीरास नहीं।
सावधान. सब को मिलाकर देखें, तो इस अपराध में जीना और मरना एक भयानक बात है।
बुद्धिमान. सच है। परन्तु मान लीजिए, कि इन सब दण्डों के बदले, इस पाप के साथ इस जीवन के सारे सुख लगे होते, और उसमें कोई कड़वाहट, लज्जा, या अपमान मिला न होता, तौभी नरक का एक घण्टा सब कुछ बिगाड़ देगा। हाय! यह नरक, नरक की आग, नरक में अनन्त दण्ड, यह ऐसा अकल्पनीय दण्ड है, कि यदि इस पर पूरी रीति से विश्वास किया जाता, तो यह इस पाप को, और दूसरे पापों को भी, आरम्भ ही में कुचल डालता। परन्तु यहीं तो विपत्ति है, कि जो लोग अपने आप को इन बातों के वश में कर देते हैं, वे उन बातों के विषय में, अर्थात् उन दण्डों के विषय में जिन्हें परमेश्वर ने इनके करनेवालों पर डालने की धमकी दी है, अपने आप को अविश्वास और नास्तिकता में ऐसा कठोर कर लेते हैं, कि अन्त में वे लगभग इस पूर्ण और दृढ़ विश्वास तक पहुँच जाते हैं कि आगे को कोई न्याय होनेवाला ही नहीं: नहीं तो वे ऐसी घिनौनी भाषा के साथ, जैसी कुछ लोग बोलते हैं, इस पाप को करना न चाहते, न कर सकते, नहीं, उसका प्रयत्न तक न करते।
मैंने एक के विषय में सुना कि जब वह अपनी प्रेमिका को यह पाप करने के लिये फुसला रहा था, तो उससे 127 बोला, यदि तू अपनी देह को जोखिम में डालेगी, तो मैं अपने प्राण को जोखिम में डालूँगा। और मैंने स्वयं एक और को यह कहते सुना, जब वह एक कुँवारी को अपने साथ अशुद्धता करने के लिये फुसला रहा था, (यह ओलिवर के
124 अध्याय 23:27। नीतिवचन 2:18, 19। अध्याय 7:25, 26, 27।
दिनों की बात है) कि यदि वह गर्भवती हो जाए, तो वह उसे बताएगा कि वह दण्ड से कैसे बच सकती है,
(और वह दण्ड उस समय कुछ कड़ा था,) कहना (उसने कहा) जब तुम न्यायी के सामने आओ, कि तुम पवित्र आत्मा से गर्भवती हो। मैंने उसे ऐसा कहते सुना, और इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ; मेरे मन में आया कि किसी न्यायाधीश के सामने उस पर इसका दोष लगाऊँ; परन्तु वह बड़ा आदमी था, और मैं गरीब और जवान था: सो मैंने उसे रहने दिया, परन्तु इस बात ने मुझे बहुत व्याकुल किया।
सावधान. यह सबसे भयानक बात थी जो मैंने अपने जीवन में कभी सुनी। परन्तु ये लोग उस आत्मा और अनुग्रह से कितनी दूर हैं जो यूसुफ में वास करता था!
128 बुद्धिमान. ठीक है; जब यूसुफ की स्वामिनी ने उसे लुभाया, हाँ, प्रतिदिन लुभाया; हाँ, उसने उसे पकड़ लिया, और अपने वेश्या के से ढीठ माथे से कहा, मेरे साथ सो, परन्तु उसने इन्कार किया: उसने उसकी न मानी कि उसके पास लेटे या उसके संग रहे। श्रीमान दुर्जन होता तो उस अवसर को हाथ से न जाने देता।
129 और यूसुफ की इस बात पर थोड़ी सी व्याख्या करें।
1. यहाँ एक स्त्री है, एक बड़ी स्त्री, अंगरक्षकों के प्रधान की पत्नी, कोई सुन्दर महिला, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ।
2. यहाँ एक स्त्री है जो जीत ली गई, और अपने वेश्या के से अनुराग में यूसुफ की ओर खिंच आई, बिना इसके कि उसने एक शब्द भी कहा हो।
3. यहाँ उसकी अशुद्ध अभिलाषा प्रगट की गई है; मेरे साथ सो, उसने कहा।
4. यहाँ एक उपयुक्त अवसर था। घर के सेवकों में से कोई भी वहाँ भीतर न था।
5. यूसुफ एक जवान पुरुष था, बल से भरपूर, और इसलिये उसके फँस जाने का खतरा और भी अधिक था।
6. यह उसके लिये उसकी ओर से एक ऐसी परीक्षा थी, जो दिनों तक चलती रही।
7. और फिर भी यूसुफ ने इन्कार किया, 1. उसकी प्रतिदिन की परीक्षा का; 2. उसके प्रतिदिन के आग्रह का: 3. उसके प्रतिदिन के उकसाने का, और वह भी हृदय से, दृढ़ता से और लगातार। क्योंकि जब उसने उसका वस्त्र पकड़कर कहा, मेरे साथ सो, तो वह अपना वस्त्र उसके हाथ में छोड़कर बाहर निकल भागा। हाँ, और यद्यपि इसके पीछे तिरस्कार, विश्वासघात, निन्दा, झूठा दोष, बन्दीगृह, और मृत्यु का खतरा आया, (क्योंकि जब वेश्या अपना मतलब पूरा नहीं कर पाती, तो उसे परवाह नहीं कि वह कैसी हानि करती है) तौभी यूसुफ अपने आप को अशुद्ध न करेगा, परमेश्वर के विरुद्ध पाप न करेगा, और अपने अनन्त उद्धार को जोखिम में न डालेगा।
सावधान. धन्य यूसुफ! काश तेरे और भी साथी होते!
बुद्धिमान. यूसुफ की अपेक्षा श्रीमान दुर्जन के साथी अधिक हैं, नहीं तो इतनी वेश्याएँ न होतीं जितनी हैं: क्योंकि यद्यपि मुझे इसमें सन्देह नहीं कि उस जाति की स्त्रियाँ इस मार्ग में काफ़ी बुरी हैं, तौभी मैं सचमुच विश्वास करता हूँ कि उनमें से बहुत सी पहले-पहल दुर्जन के साथियों की चापलूसी के द्वारा ही वेश्या बनाई जाती हैं।
130 हाय! बहुत सी स्त्रियाँ पहले-पहल विवाह के वचनों के द्वारा ही इस पाप में डुबो दी जाती हैं।
मैं कहता हूँ, इन्हीं वचनों के द्वारा उनकी चापलूसी की जाती है, हाँ, उन्हें इन दुष्ट कामों के लिये सहमति देने पर विवश किया जाता है, और इस प्रकार एक बार उसमें पड़कर, और अपने मनों में कठोर होती जाकर, वे अन्त में अपने आप को सौंप देती हैं, ठीक
129 पवित्र चालचलनवाले यूसुफ के विषय में।
130 बहुत सी स्त्रियाँ विवाह के वचनों के द्वारा वेश्या बनाई जाती हैं, &c.
जैसे दुष्ट मनुष्य करते हैं, कि इस प्रकार की दुष्टता लालसा के साथ करें। परन्तु यूसुफ, आप देखते हैं, दूसरे ही मन का था, क्योंकि उसमें परमेश्वर का भय था।
इस बात को छोड़ने से पहले, मैं आपको यहाँ दो उल्लेखनीय कहानियाँ सुनाऊँगा; और मेरी इच्छा है कि श्रीमान दुर्जन के साथी भी उन्हें सुनें। वे क्लार्क की पुस्तक ‘पापियों के लिये दर्पण’ में पाई जाती हैं; और वे ये हैं।
श्रीमान क्लीवर (श्रीमान क्लार्क कहते हैं) एक ऐसे मनुष्य के विषय में बताते हैं जिसे वे जानते थे, जिसने अशुद्धता का काम किया था, जिसके बाद वह विवेक के ऐसे भय में पड़ गया कि उसने फाँसी लगा ली; और एक कागज़ पर यह लिखा छोड़ गया। सचमुच, (उसने कहा) मैं मानता हूँ कि मनुष्य के लिये अपने आप को मार डालना बिल्कुल अनुचित है, परन्तु मैं न्यायाधीश का काम करने के लिये बाध्य हूँ, क्योंकि इस पाप का दण्ड
131 मृत्यु है।
क्लार्क उसी पृष्ठ पर दो और लोगों का भी उल्लेख करता है, जो लंदन में व्यभिचार कर रहे थे, और तुरन्त स्वर्ग से आई आग से मारे गए, ठीक
उसी काम के बीच। उनकी देहें इसी दशा में पाई गईं, आधी जली हुई, और उनमें से अत्यन्त घिनौनी दुर्गन्ध निकल रही थी।
सावधान. ये सचमुच उल्लेखनीय कहानियाँ हैं।
बुद्धिमान. हाँ, हैं, और मैं समझता हूँ कि वे जितनी उल्लेखनीय हैं उतनी ही सच्ची भी हैं।
सावधान. अच्छा, परन्तु मुझे आश्चर्य है, कि यदि युवक दुर्जन का मालिक उसे ऐसा अभागा दुष्ट जानता था, तो उसने उसे अपने घर में कैसे रहने दिया।
132 बुद्धिमान. वे एक दूसरे को वैसे ही पसन्द करते थे जैसे आग और पानी करते हैं। युवक दुर्जन की चाल उसके मालिक को घृणित लगती थी, और उसके मालिक की चाल ऐसी थी जिसे युवक दुर्जन सह न सकता था। इस प्रकार इन दोनों में पवित्र आत्मा का यह कथन पूरा हुआ: अन्यायी मनुष्य धर्मियों के लिये 133 घृणित है, और जो सीधी चाल चलता है वह दुष्टों के लिये घृणित है।
उस भले मनुष्य की चाल श्रीमान दुर्जन सह न सकता था, और न वह भला मनुष्य अपने नीच शागिर्द की बुरी चाल सह सकता था। तौभी उसका मालिक, यदि उससे हो सकता, तो उसे अपने पास रखता, और उसे अपना काम-धन्धा भी सिखाता।
सावधान. यदि उससे हो सकता! अजी, यदि वह चाहता तो रख सकता था, क्या नहीं रख सकता था?
134 बुद्धिमान. हाय, दुर्जन एक बार और दो बार उसके पास से भाग गया, और किसी भी रीति से वश में न रहता था। सो अगली बार जब वह उसके पास से भागा, तो उसने सचमुच उसे जाने दिया। क्योंकि उसने उसे भागने का कोई कारण नहीं दिया था, सिवाय इसके कि वह जितना हो सकता था (और वह बहुत थोड़ा ही कर सकता था) उसे जीवन के भले और सच्चे नियमों पर थामे रखता था। और यदि यह किसी का अपना मामला होता, तो वह भी उसे जाने देता। क्योंकि जो मनुष्य अपनी शान्ति का, या अपने बच्चों की भलाई का, या अपने बाकी सेवकों को बुराई से बचाए रखने का कुछ भी ध्यान रखता हो, वह उसे जाने देने के सिवाय और क्या करे?
यदि वह रुका रहता, तो सुधार-गृह ही उसके लिये सबसे उपयुक्त होता, परन्तु वहाँ भेजने से उसका मालिक 131 क्लार्क की ‘पापियों के लिये दर्पण’, अध्याय 2, पृष्ठ 12।
132 दुर्जन और उसका मालिक एक दूसरे से घृणा करते हैं।
134 युवक दुर्जन अपने मालिक के पास से भाग जाता है।
हिचकिचाता था, उस प्रेम के कारण जो वह उसके पिता से रखता था। मैं कहता हूँ, सुधार-गृह ही उसके लिये सबसे उपयुक्त स्थान होता, परन्तु उसके मालिक ने उसे जाने दिया।
सावधान. आप कहते हैं कि वह भाग गया, परन्तु वह भागकर कहाँ गया?
135 बुद्धिमान. अजी, अपने ही धन्धे के एक मनुष्य के पास, जो उसी के समान भी था। इस प्रकार दुष्टों ने हाथ में हाथ मिलाया, और वहीं उसने अपनी शागिर्दी का समय पूरा किया।
सावधान. तब तो, निश्चय, उसके मन की इच्छा पूरी हो गई, जब वह अपने ही समान एक मनुष्य के साथ था।
बुद्धिमान. हाँ। उसकी इच्छा पूरी तो हुई, परन्तु परमेश्वर ने उसे यह अपने क्रोध में दिया।
सावधान. आपका क्या अर्थ है?
बुद्धिमान. मेरा अर्थ वही है जो पहले था, कि किसी दुष्ट मनुष्य का परमेश्वर के विधान से एक भले मनुष्य के द्वार से निकालकर एक दुष्ट मनुष्य के घर में रहने को भेजा जाना, परमेश्वर के क्रोध का चिह्न है।
136 क्योंकि परमेश्वर इसके द्वारा, और ऐसे ही दण्डों के द्वारा, ऐसे मनुष्य से यों कहता है: हे दुष्ट, तू न मुझ से, न मेरे मार्गों से, न मेरे लोगों से प्रेम रखता है; तू मेरी व्यवस्था और भली सम्मति को अपनी पीठ पीछे फेंक देता है: आ, मैं अपने कोप में तेरा प्रबन्ध करूँगा; तू भक्तिहीनों के हाथ सौंप दिया जाएगा, तू शैतान की पाठशाला में भेजा जाएगा, मैं तुझे पाप में डूबने-उतराने के लिये छोड़ दूँगा, जब तक कि मैं मृत्यु और न्याय के साथ तेरी सुधि न लूँ। इसलिये यह एक और दण्ड था जो इस युवक दुर्जन पर आया।
सावधान. आपने सच कहा है, क्योंकि परमेश्वर ऐसे दण्ड के द्वारा, वास्तव में सचमुच यही कहता है; क्योंकि वह उन्हें धर्मी के हाथ से निकाल लेता है, और उन्हें दुष्ट के हाथ में बाँध देता है, और तब वे कहाँ ले जाए जाएँगे, इसकी कल्पना कोई भी सहज में कर सकता है।
बुद्धिमान. ऐसे लोगों पर होनेवाले परमेश्वर के क्रोध के चिह्नों में यह सबसे दुःखद चिह्नों में से एक है:
137 और यह कई कारणों से।
1. ऐसा मनुष्य, इस दण्ड के द्वारा, उस मार्ग से, और उन साधनों के नीचे से हटा दिया जाता है, जो साधारणतः प्राण की भलाई करने के लिये काम में लाए जाते हैं। क्योंकि वह परिवार जहाँ भक्ति का अंगीकार और आचरण होता है, परमेश्वर की ठहराई हुई विधि है, वह स्थान जिसे उसने ठहराया है कि
138 जवानों को परमेश्वर का मार्ग और भय सिखाया जाए। अब ऐसे परिवार में से निकालकर किसी बुरे, दुष्ट परिवार में डाल दिया जाना, जैसा श्रीमान दुर्जन के साथ हुआ, अवश्य ही दण्ड के रूप में है, और परमेश्वर के क्रोध का चिह्न है।
क्योंकि भक्तिहीन परिवारों में मनुष्य परमेश्वर को भूलना, भलाई से घृणा करना, और भले लोगों के मार्गों से अपने आप को अलग रखना सीखते हैं।
2. बुरे परिवारों में, उनके सामने लगातार बुराई के नए-नए उदाहरण, और उकसावे भी, और उसके लिये नए-नए प्रोत्साहन भी रहते हैं। हाँ, इसके अतिरिक्त, ऐसे स्थानों में बुराई की सराहना की जाती है, उसकी प्रशंसा होती है, उसके विषय में अच्छा कहा जाता है, और जो उसे करते हैं उनकी वाहवाही होती है; और यह, निश्चय ही, डुबा देनेवाली बात है
135 उसे अपने ही समान एक नया मालिक मिल जाता है।
136 युवक दुर्जन पर परमेश्वर के क्रोध का एक चिह्न।
137 उसके प्रति परमेश्वर के क्रोध का प्रमाण।
3. ऐसे स्थान नरक की आत्माओं के अड्डे और घूमने-फिरने की जगहें ही हैं, जो ऐसे परिवारों में किसी न किसी के विचारों और मनों को लगातार विषैला करती रहती हैं, कि वे दूसरों को विषैला कर सकें। इसलिये इस पर ध्यान दीजिए, साधारणतः दुष्ट परिवारों में, कोई एक या दो जन वहाँ के बाकी सब लोगों से अधिक दुष्टता में चतुर होते हैं। अब ऐसे लोग शैतान की नालियाँ हैं; क्योंकि उनके द्वारा, उनके दुष्टता में धूर्त होने के कारण, वह नरक की सन्तान को उनके साथियों के कानों और प्राणों में पहुँचाता है। हाँ, और जब वे एक बार दुष्टता का गर्भ धारण कर लेते हैं, तो वे उसके लिये ऐसे पीड़ा भोगते हैं, जैसे गर्भवती स्त्री, जब तक कि वे उसे जन्म न दे दें;
देखो, उसको अनर्थ काम की पीड़ाएँ हो रही हैं, उसको उत्पात का गर्भ है, और उससे झूठ का जन्म हुआ है।
139 कुछ मनुष्यों का, जैसा यहाँ पाठ में संकेत किया गया है, और जैसा पहले भी संकेत दिया गया था, शैतान के साथ एक प्रकार का रहस्यमय, परन्तु नारकीय संयोग होता है, जो पाप और दुष्टता का पिता है, और उनका प्राण उसकी माता; और वे, ज्योंही उसके द्वारा गर्भ धारण करते हैं, त्योंही 140 पाप को जन्म देकर, उसे भी, और अपने अनन्त दण्ड को भी, पूरा कर डालते हैं।
141 सावधान. तब तो उन माता-पिताओं के लिये जो अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, यह कितनी ध्यान देने की बात है, कि यदि बच्चे उनके पास से कहीं जाएँ, तो वे ऐसे परिवारों में रखे जाएँ जो भले हों, कि वहाँ वे समय रहते बुराई से बचना, और भलाई के पीछे चलना सीखें?
142 बुद्धिमान. सचमुच यह उनके लिये ध्यान देने की बात है; और यह उनके लिये भी ध्यान देने की बात है जो बच्चों को अपने परिवारों में रखते हैं, कि वे चौकस रहें कि वे किन बच्चों को रखते हैं। क्योंकि एक बुरे लड़के के द्वारा मनुष्य को शीघ्र ही अपने नाम, अपनी सम्पत्ति, और अपने परिवार में हानि पहुँच सकती है, और उसकी शान्ति में, तथा परमेश्वर और भक्ति के पीछे उसके शान्त प्रयत्न में भी बाधा पड़ सकती है; मैं कहता हूँ, ऐसे ही एक कीड़े के द्वारा, जैसा कोई दुष्ट और गंदा
सावधान. सच है, क्योंकि एक पापी बहुत भलाई का नाश करता है, और निर्धन जन झूठ बोलनेवाले से उत्तम है।
परन्तु बहुत बार मनुष्य इससे बच नहीं सकता; क्योंकि जो आरम्भ में बहुत अच्छी आशा दिलाते हैं, वे थोड़े ही समय में पक्के बदमाश सिद्ध होते हैं, युवक दुर्जन के समान।
बुद्धिमान. यह भी सच है, परन्तु जब मनुष्य इससे बचने के लिये जितना अच्छा कर सकता है उतना कर चुका हो, तो वह और भी अधिक भरोसे के साथ परमेश्वर की आशीष के पीछे आने की आशा रख सकता है, या यदि बातें उसकी इच्छा के विपरीत हों, तो उसे और भी अधिक शान्ति रहेगी।
सावधान. अच्छा, परन्तु क्या श्रीमान दुर्जन और उसके मालिक में बहुत अच्छी बनती थी? मेरा अर्थ उसके बाद वाले मालिक से है, क्योंकि वे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे थे, मेरा अर्थ है, क्योंकि दुष्टता के लिये उनकी जोड़ी खूब मिली थी।
बुद्धिमान. यह दूसरा मालिक, जैसा मैंने आपको पहले बताया, काफ़ी बुरा था, तौभी वह अक्सर अपने सेवक युवक दुर्जन से 143 झगड़ पड़ता था, और उसके बुरे कामों के लिये उसे डाँटता, हाँ, और कभी-कभी मारता भी था।
141 माता-पिताओं को चाहिए कि अपने बच्चों को भले परिवारों में रखें।
142 मालिकों को भी चौकस रहना चाहिए कि वे किन सेवकों को रखते हैं।
143 युवक दुर्जन और उसके दूसरे मालिक में नहीं बनती।
सावधान. क्या! जबकि वह आप इतना बुरा था! यह तो उस कहावत के समान है, शैतान ताड़ना देता है
बुद्धिमान. मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, बात वैसी ही है जैसी मैं कहता हूँ। क्योंकि आपको जानना चाहिए, कि दुर्जन की चाल उसके मालिक के 144 लाभ से मेल नहीं खाती थी। यदि वह उस दासी के समान कर सकता जिसके विषय में हम प्रेरितों के काम 16 में पढ़ते हैं, अर्थात् अपनी बुराई से अपने मालिक की थैली भर सकता, तो वह निश्चय उसका लाड़ला होता, परन्तु युवक दुर्जन के साथ ऐसा न था; और इसलिये, यद्यपि उसकी और उसके मालिक की
145 मुख्य बातों में काफ़ी बनती थी, तौभी इस बात और उस बात में उनमें मतभेद था। युवक दुर्जन अपने मालिक के काम की उपेक्षा करने, वेश्यालय जाने, अपने मालिक को धोखा देने, उसकी बेटियों को भ्रष्ट करने का प्रयत्न करने, और ऐसे ही कामों के पक्ष में था: तो कोई आश्चर्य नहीं कि इन बातों में उनमें न बनती थी। इसलिये नहीं कि उसके मालिक को उस काम से ही कोई घृणा थी, क्योंकि जब वह शागिर्द था तब वह स्वयं ऐसा कर सकता था; परन्तु इसलिये कि उसका सेवक अपने पाप के द्वारा उसके
माल आदि को बिगाड़ देता था, &c. और इस प्रकार अपने मालिक की हानि करता था।
यदि (जैसा मैंने पहले कहा) युवक दुर्जन की दुष्टता का झुकाव केवल उसके मालिक के लाभ की ओर होता; जैसे यदि वह अपने मालिक के लिये कसम खाता, झूठ बोलता, ठगी करता, छल करता, और ग्राहकों को धोखा देता, (और सचमुच कभी-कभी वह ऐसा करता भी था) परन्तु यदि बस इतना ही होता जो उसने किया, तो उसे अपने मालिक से, नहीं, एक टेढ़ा शब्द भी न सुनना पड़ता: परन्तु श्रीमान दुर्जन की चाल सदा ऐसी न थी।
सावधान. यह अच्छी तरह लाया गया, अर्थात् वह दासी जिसके विषय में हम प्रेरितों के काम में पढ़ते हैं, और सेवकों की एक दुष्टता और दूसरी दुष्टता के बीच का अन्तर भी वैसा ही स्पष्ट था।
बुद्धिमान. हाय! जो मनुष्य स्वयं दुष्ट हैं, वे भी दूसरों में दुष्टता से बहुत घृणा करते हैं, केवल इसलिये नहीं कि वह दुष्टता है, परन्तु इसलिये कि वह उनके स्वार्थ के विरुद्ध जाती है। क्या आप सोचते हैं कि उस दासी का स्वामी उसके खो जाने से दुःखी होता, यदि उसके साथ-साथ उसका लाभ भी न खो जाता: नहीं,
मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ; उसकी ओर से तो वह शैतान के पास चली जाती: परन्तु जब उसके स्वामी ने देखा कि 146 उसके लाभ की आशा जाती रही, तब, तब वह पौलुस को सताने लगा। परन्तु श्रीमान दुर्जन के मालिक की कभी-कभी श्रीमान दुर्जन के पापों से हानि होती थी, और तब दुर्जन और उसके मालिक में अनबन हो जाती थी।
सावधान. हाय बेचारे दुर्जन! तो ऐसा जान पड़ता है कि तू हर समय अपने ही जैसे को भी प्रसन्न न कर सका।
बुद्धिमान. नहीं, वह न कर सका, और इसका कारण मैं आपको बता चुका हूँ।
सावधान. परन्तु क्या बुरे मालिक अपने सेवकों की बुराई को दोषी ठहराकर अपने आप को ही दोषी नहीं ठहराते? 148 बुद्धिमान. हाँ; इस बात में कि वे दूसरे में उसी बात को दोषी ठहराते हैं जो या तो उनमें स्वयं है, या जिसे वे अपने आप में होने देते हैं। और वह समय आएगा, जब वही दण्ड-वाक्य जो दूसरों के पापों के विरुद्ध उनके अपने मुँह से निकला है, जबकि वे स्वयं उन्हीं पापों में जीते और उनसे आनन्दित होते हैं,
145 उनके मतभेद के कारण।
146 प्रेरितों के काम 16:17, 18, 19, 20।
148 बुरे मालिक जब अपने बुरे सेवकों को बुराई के लिये मारते हैं, तो अपने आप को ही दोषी ठहराते हैं।
बड़े वेग से उन्हीं के सिरों पर लौट आएगा। प्रभु ने बाशा के विरुद्ध दण्ड की घोषणा की, जैसे उसकी सारी बुराइयों के कारण सामान्य रूप से, वैसे ही विशेष करके इस बात के कारण, कि वह 149 यारोबाम के घराने के समान था, और फिर भी उसने उसे मार डाला। यही श्रीमान दुर्जन के मालिक की दशा है, वह अपने सेवक के समान है, और फिर भी उसे मारता है। वह अपने सेवक के समान है, और फिर भी उसके बुरे होने के कारण उसे कोसता है।
सावधान. परन्तु युवक दुर्जन इस मालिक के पास से क्यों नहीं भागा, जैसे वह दूसरे के पास से भाग गया था?
150 बुद्धिमान. वह नहीं भागा। और यदि मैं भूल नहीं करता, तो इसका कारण यह था। पहले मालिक के घर में भक्ति थी, और उसे युवक दुर्जन सह न सकता था। क्योंकि भोजन, रहने की जगह, काम, और समय के विषय में, उसे इस मालिक की ओर से जितना मिलता था, उससे अच्छा और अधिक उसे अपने बाद वाले मालिक के यहाँ कभी न मिला था; परन्तु यह सब उसे सन्तुष्ट न कर सका, क्योंकि वहाँ भक्ति को बढ़ावा दिया जाता था।
वह यह प्रार्थना करना, यह पवित्रशास्त्र का पढ़ना, और उपदेशों का सुनना और दोहराना सह न सकता था: वह यह सह न सकता था कि गम्भीर और भक्तिपूर्ण रीति से उसे उसके अपराध बताए जाएँ।
सावधान. डाँटने की रीति में बहुत कुछ होता है, दुष्ट मनुष्य अपने अपराधों के विरुद्ध कही गई बातों को सुनना सह भी सकते हैं, और नहीं भी सह सकते।
बुद्धिमान. सचमुच इसमें बहुत बड़ा अन्तर है। श्रीमान दुर्जन का यह बाद वाला मालिक, श्रीमान दुर्जन को उसके पाप श्रीमान दुर्जन की अपनी ही बोली में बताता था; जब वह उसे उसके पाप बताता, तो कसम खाता, और शाप देता, और 151 सत्यानाश की गालियाँ देता था, और इसे वह भक्तिपूर्ण रीति से अपने पाप बताए जाने की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह सह सकता था। इसके अतिरिक्त, वह बाद वाला मालिक, जब उसका आवेश और क्रोध उतर जाता, तो अपने सेवक दुर्जन के पापों पर हँसता और उनका मज़ा लेता था: और यह बात युवक
दुर्जन को खूब भाती थी। दुर्जन को मार के सिवाय और किसी बात से ठेस न पहुँचती थी, और अब वह मार भी उसे कम ही पड़ती थी, क्योंकि वह काफ़ी बड़ा हो गया था। अधिकतर जब उसका मालिक क्रोध करता और कसमें खाता, तो वह भी उसे कसम के बदले कसम, और शाप के बदले शाप देता, कम से कम मन ही मन, वह चाहे जितनी देर तक बकता रहे।
सावधान. यह तो नारकीय जीवन था।
बुद्धिमान. सचमुच यह नारकीय जीवन था: और कोई कह सकता है, कि इस मालिक के साथ रहकर, युवक 152 दुर्जन ने अपने धन्धे के साथ-साथ दुष्टता में भी अपने आप को और भी अधिक पूरा कर लिया: क्योंकि जब तक उसकी शागिर्दी का समय पूरा हुआ, तब तक, कुछ तो पाप की ओर अपने ही झुकाव के कारण, कुछ अपने तीन साथियों की संगति के कारण, और कुछ इस बाद वाले मालिक और उसमें देखी हुई दुष्टता के कारण; वह पक्का पापी बन गया। मैं समझता हूँ कि उसकी शागिर्दी का समय पूरा होने से पहले ही उस पर एक नाजायज़ सन्तान का दोष लगाया गया था।
153 सावधान. अच्छा, परन्तु ऐसा जान पड़ता है कि वह अपनी शागिर्दी का समय पूरा होने तक जीवित रहा, परन्तु तब उसने क्या किया?
150 युवक दुर्जन इस मालिक के पास से क्यों नहीं भागा, यद्यपि वह उसे मारता था।
151 दुर्जन अपने बाद वाले मालिक की डाँट को पहले मालिक की डाँट की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह क्यों सह सकता था।
152 किन साधनों के द्वारा दुर्जन अपनी दुष्टता में पूरा हो गया।
153 दुर्जन की शागिर्दी का समय पूरा हुआ।
बुद्धिमान. अजी, वह अपने पिता के घर गया, और उसने एक प्रेमी और कोमल-हृदय पिता के समान उसे अपने घर में ग्रहण किया।
सावधान. और वहाँ उसका चालचलन कैसा रहा?
154 बुद्धिमान. अजी, उसके घर जाने का कारण यह था, कि अपना निज का काम-धन्धा जमाने के लिये पैसा मिले, वह 155 घर पर थोड़े ही दिन रहा, परन्तु जितने थोड़े दिन वह रहा, उनमें उसने जहाँ तक हो सका अपने आप को रोके रखा, और अपने आप को इतना नीच प्रगट न किया, इस डर से कि कहीं उसके पिता को अरुचि न हो जाए, और वह उसे पैसा देने से इन्कार न कर दे, या कुछ समय तक देने से रुक न जाए।
फिर भी उस समय भी उसके अपने अवसर, और अपने साथी, और उनके साथ अपनी अभिलाषाओं की तृप्ति होती ही थी, परन्तु वह इस बहाने से सब पर परदा डाल देता था, कि वह अपने पुराने परिचितों से मिलकर प्रसन्न है, और वे भी उससे मिलकर उतने ही प्रसन्न हैं, और शिष्टाचार के नाते वह उनकी सेवा में दाखमधु की एक-दो बोतलें, या मदिरा के एक-दो दर्जन प्याले रखे बिना नहीं रह सकता।
सावधान. और क्या उस बूढ़े ने उसे काम-धन्धा जमाने के लिये पैसा दिया?
बुद्धिमान. हाँ, दो सौ पाउंड से भी अधिक।
सावधान. इसमें, मेरे विचार में, वह बूढ़ा चूक गया। यदि मैं उसका पिता होता, तो मैं उसे थोड़ा दूरी पर रखता, जब तक कि मुझे उसके चालचलन के अच्छे होने का कहीं अधिक अच्छा प्रमाण न मिल जाता; (क्योंकि मैं देखता हूँ कि उसका पिता जानता था कि वह कैसा दुष्ट लड़का रहा था, कुछ तो उन कामों से जो वह घर पर किया करता था, और कुछ इस कारण कि उसने एक भले मालिक को छोड़कर एक बुरे को अपनाया था, &c.) इसलिये उसे इतनी जल्दी पैसा नहीं देना चाहिए था। क्या होता यदि वह थोड़ी तंगी सहता, और कुछ समय तक दिहाड़ी की मज़दूरी करने जाता, कि कमाकर जान लेता कि एक पैसा क्या होता है? तब, सम्भवतः, वह यह अच्छी तरह जान लेता कि उसे कैसे खर्च करना चाहिए: हाँ, और तब तक शायद वह अपने मन में और अच्छी तरह विचार कर लेता कि संसार में कैसे जीना चाहिए। हाँ, और कौन जाने कि वह उस उड़ाऊ पुत्र के समान अपने होश में आ जाता, और परमेश्वर से और अपने पिता से
156 उन दुष्ट कामों के लिये क्षमा माँगता जो उसने उनके विरुद्ध किए थे।
बुद्धिमान. यदि उसका पिता उसके साथ व्यवहार की इस रीति पर आशीष भी दे सकता, और इसे उन उद्देश्यों के लिये प्रभावशाली बना सकता जो आपने सामने रखे हैं; तो मैं भी आपके समान ही सोचता। परन्तु हाय, हाय, आप ऐसे बोलते हैं मानो आप कभी जानते ही न थे, या इस समय भूल गए हैं कि पिता का हृदय और करुणा क्या होती है। आपने अपने पुत्र के साथ ऐसा क्यों नहीं किया? परन्तु यह तो स्पष्ट ही है, कि हम स्वयं अच्छी सलाह मानने की अपेक्षा दूसरों को अच्छी सलाह देने में
157 अधिक निपुण हैं। परन्तु मेरे सच्चे पड़ोसी, मान लीजिए कि श्रीमान दुर्जन के पिता ने वैसा ही किया होता जैसा आप कहते हैं, और ऐसा करके अपने पुत्र को बुरे मार्गों पर धकेल दिया होता, तो ऐसा करके उसने अपना या अपने पुत्र का क्या भला किया होता?
154 वह अपने पिता के घर जाता है।
155 पैसे के लिये वह अपने आप को रोके रखता है।
156 कठोरता किस ओर ले जाती है।
157 हम अच्छी सलाह मानने की अपेक्षा देने में अधिक निपुण हैं।
सावधान. यह सच है, परन्तु इससे यह परिणाम नहीं निकलता, कि यदि पिता वैसा करता जैसा मैंने कहा, तो पुत्र वैसा ही करता जैसा आप मानते हैं। परन्तु यदि वह वैसा करता भी जैसा आपने माना है, तो उसने
158 उससे बुरा क्या किया होता जो वह पहले ही कर चुका है?
बुद्धिमान. उसने काफ़ी बुरा किया होता, यह सच है। परन्तु मान लीजिए उसका पिता उसे कोई पैसा न देता, और मान लीजिए कि युवक दुर्जन इस पर रूठ जाता, और क्रोध में आकर समुद्र पार चला जाता, और उसका पिता फिर न उसे देखता, न उसके विषय में कुछ सुनता। या मान लीजिए कि पागलपन और हठीले स्वभाव के कारण वह पैसे के लिये राजमार्ग पर डाका डालने लगता, और इस प्रकार अपने आप को फाँसी के तख्ते तक, और अपने पिता और परिवार को बड़े अपमान तक पहुँचा देता, या यदि ऐसा करके वह अपने आप को उस अन्त तक न भी पहुँचाता, तौभी वह अपनी सारी दुष्टता में ऐसी-ऐसी और बुराइयाँ जोड़ लेता: तो इसमें उसके पिता को क्या सान्त्वना मिलती?
इसके अतिरिक्त, जब उसके पिता ने उसे एक सच्चा मनुष्य बनाने की इच्छा से उसके लिये जो कुछ कर सकता था कर दिया, तब, चाहे उसका पुत्र सच्चा निकले या न निकले, वह आपकी सलाह मानने की अपेक्षा कहीं अधिक शान्ति के साथ अपना सिर रख सकता था।
सावधान. नहीं, मैं समझता हूँ कि इस विषय में मुझे सलाह देने में इतनी उतावली नहीं करनी चाहिए थी; परन्तु सच तो यह है कि आपने मुझे उसके दुष्ट कामों का ऐसा वृत्तान्त सुनाया है, कि उसे सुनकर मुझे उस पर क्रोध आ गया है।
बुद्धिमान. क्रोध की दशा में हम शीघ्र ही अपनी सीमा से आगे बढ़ जाते हैं, परन्तु वह बेचारा अभागा, जैसा भी वह है, अपने स्थान को जा चुका है। परन्तु, जैसा मैंने कहा, जब एक भला पिता अपने बुरे
बच्चे के लिये जो कुछ कर सकता है कर चुका हो, और वह बच्चा फिर भी ज़रा भी न सुधरे, तो वह उस दशा की अपेक्षा कहीं अधिक शान्ति के साथ लेटेगा, जब उसने कठोरता के द्वारा उसे विपत्तियों में धकेल दिया होता।
मुझे स्मरण है कि मैंने एक भली स्त्री के विषय में सुना है, जिसका (इस बूढ़े के समान) एक बुरा और 159 भक्तिहीन पुत्र था, और वह कई वर्षों तक लगातार उसके लिये प्रार्थना करती रही, उसे समझाती रही, और उसके साथ माता का सा व्यवहार करती रही; परन्तु वह फिर भी बुरा ही बना रहा। अन्त में, एक समय, जब वह अपनी रीति के अनुसार उसके मन फिराने के लिये प्रार्थना कर चुकी थी, तो वह उसके पास आई, और इस प्रकार, या इसी आशय से, फिर से उसे समझाने लगी। बेटा, उसने कहा, तू दुष्ट बालक रहा है और अब भी है, तेरे कारण मुझे बहुत सी प्रार्थनाएँ और आँसू बहाने पड़े हैं, और फिर भी तू दुष्ट ही बना हुआ है। अच्छा, मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है, तुझे बचाने के लिये मुझसे जो कुछ हो सकता था वह मैंने किया है; अब मुझे सन्तोष है, कि यदि मैं न्याय के दिन तुझे दण्ड पाते देखूँ, तो मैं तेरे लिये दुःखी होने से इतनी दूर रहूँगी, कि उस दिन तेरे अनन्त दण्ड का दण्ड-वाक्य सुनकर मैं आनन्द करूँगी: और इस बात से उसका मन फिर गया।
मैं आपसे कहता हूँ, कि यदि माता-पिता अपने बच्चों के साथ प्रेम से व्यवहार करें, अपनी दया में प्रेमभरी डाँट मिलाएँ, और अपनी प्रेमभरी डाँट में पिता और माता की करुणा मिलाएँ, तो उनके साथ रूखे और कठोर होने की अपेक्षा, इस रीति से उनके अपने बच्चों को बचा लेने की सम्भावना अधिक है: परन्तु यदि वे उन्हें न भी बचा सकें, यदि उनकी दया से उनका कुछ भला न भी हो, तौभी मृत्यु के दिन यह सोचना उन्हें बड़ी शान्ति देगा; कि मैंने प्रेम के द्वारा अपने बच्चे को नरक से बचाने और छुड़ाने के लिये जितना मुझसे हो सका उतना किया।
158 इस बात पर विचार करना चाहिए।
159 एक भली स्त्री और उसका बुरा पुत्र।
सावधान. अच्छा, मैं मान गया। परन्तु कृपा करके हम फिर श्रीमान दुर्जन की ओर लौटें: आप कहते हैं कि उसके पिता ने उसे कुछ धन दिया था, कि वह अपना निज का काम-धन्धा आरम्भ करे।
160 बुद्धिमान. हाँ, उसके पिता ने उसे कुछ धन दिया था, और उसने अपना काम खड़ा भी किया, और लगभग उतनी ही जल्दी फिर बैठ भी गया: क्योंकि उसे काम खड़ा किए बहुत दिन न हुए थे कि घर में अपने कामकाज के बुरे प्रबन्ध के कारण, और साथ ही बाहर अपने अन्धाधुन्ध खर्चों के कारण, वह इतने कर्ज़ में डूब गया, और उसकी दुकान में चुकाने के लिये इतना थोड़ा रह गया, कि अपने आप को बन्दीगृह से बाहर रखना उसके लिये कठिन हो गया। परन्तु जब उसके लेनदारों ने समझा कि वह विवाह करनेवाला है, और एक धनी पत्नी पाने की अच्छी आशा में है, तो उन्होंने आपस में कहा, हम उसके साथ उतावली न करेंगे; यदि उसे धनी पत्नी मिल गई तो वह हम सब का चुका देगा।
सावधान. परन्तु वह इतनी जल्दी सब कुछ कैसे उड़ा बैठा? क्योंकि आपकी बातों से मैं समझता हूँ कि यह थोड़े ही समय में हुआ।
बुद्धिमान. सचमुच थोड़े ही समय में हुआ; मेरी समझ में ऐसा करने में उसे ढाई वर्ष से अधिक न लगे 161: परन्तु इसका कारण स्पष्ट है; क्योंकि वह एक उच्छृंखल जवान था, और अब लगाम उसके आगे ढीली छूट गई थी, और वह पूरी रीति से अपनी अभिलाषाओं और बुराइयों के वश में था; इसलिये उसने अपने आप को अपने मन की चाल और अपनी आँखों की दृष्टि के हवाले कर दिया, और यह भूल गया कि इन सब बातों के कारण परमेश्वर
162 उसका न्याय करेगा; और जो ऐसा करता है, आप निश्चय जानिए, वह अधिक समय तक अपने पाँवों पर खड़ा न रह सकेगा।
163 इसके अतिरिक्त, अब उसके नये-नये साथी भी जुड़ गए थे; ऐसे साथी, आप समझ ही सकते हैं, जो चाल-चलन में बहुत कुछ उसी के समान थे, और ऐसे थे कि उन्हें इसकी कुछ चिन्ता न थी कि कौन डूबता है, बस वे आप तैरते रहें। ये लोग प्राय: उसके पीछे लगे रहते थे, और जब वह न होता तब उसकी दुकान पर भी मँडराते रहते थे। वे साधारणत: उसे उकसाकर शराबखाने ले जाते, परन्तु सारा खर्च उसी के सिर डालते; वे उससे धन भी उधार लेते रहते, परन्तु लौटाने की कोई चिन्ता न करते, सिवाय इसके कि उसे अपनी और अधिक संगति दे दें, जो उसे बहुत ही अच्छी लगती थी; और इस प्रकार उसका कंगालपन बटमार की नाईं, और उसकी घटी हथियारबन्द के समान आ पड़ी।
164 परन्तु इस सारे समय वे उसके स्वभाव को परखते रहे; उसे अपनी चापलूसी और प्रशंसा कराना, और अपनी बुद्धि, मर्दानगी और रूप-रंग की सराहना सुनना अच्छा लगता था; और यह मानो उसके मुँह पर प्यार से हाथ फेरने के समान था।
इस प्रकार वे उससे मीठी-मीठी बातें करके साँठ-गाँठ करते रहे, और उसमें और भी गहरे घुसते गए, और यों (जोंकों के समान) उन्होंने वह थोड़ा सा धन भी चूस लिया जो उसके पिता ने उसे दिया था, और उसे शीघ्र ही इतना नीचे गिरा दिया कि वह लगभग भिखारी का पड़ोसी हो गया।
सावधान. तब तो बुद्धिमान पुरुष का यह वचन पूरा हुआ, जो 165 वेश्याओं की संगति करता है, और मूर्खों का साथी है, वह नाश हो जाएगा।
160 श्रीमान दुर्जन अपना निज का काम आरम्भ करता है, और शीघ्र ही धरती के छोर तक जा पहुँचता है।
161 उसके सब कुछ उड़ा देने का कारण।
164 श्रीमान दुर्जन का स्वभाव।
165 नीतिवचन 29:3; अध्याय 13:20।
166 बुद्धिमान. हाँ, और यह भी, कि उड़ाऊ लोगों का संगी अपने पिता का मुँह काला करता है; क्योंकि उस बेचारे को दु:ख भी हुआ और लज्जा भी, यह देखकर कि उसका पुत्र (जो अब अपने ही हाथ में था) उन अच्छी वस्तुओं के उपभोग में कैसा व्यवहार करता था, जिनके उचित उपयोग में और जिनके सहारे वह परमेश्वर की महिमा के लिये, अपनी शान्ति के लिये, और अपने पड़ोसियों के बीच प्रतिष्ठा के साथ जीवन बिता सकता था। परन्तु जो
167 निकम्मे लोगों के पीछे लगा रहता है, वह कंगालपन से घिरा रहेगा। जो मार्ग उसने पकड़ा, वह उसे सीधा इसी दशा में ले गया; क्योंकि जो ऐसी चाल चलता है उससे कोई और क्या आशा कर सकता है?
इसके अतिरिक्त, जब वह अपनी दुकान में होता, तब उससे काम करते न बनता था; वह स्वभाव ही से आलसी था: उसे ठाठ-बाट से रहना अच्छा लगता था, परन्तु उसके हाथ परिश्रम करने से इनकार करते थे; और ऐसे मनुष्य का अन्त इसके सिवाय और क्या हो सकता है, जो बुद्धिमान पुरुष कहता है? पियक्कड़ और खाऊ
168 कंगाल हो जाएंगे, और ऊँघनेवाले को चिथड़े पहिनने पड़ेंगे।
सावधान. परन्तु अब, मेरी समझ में, जब वह इतना नीचे गिरा दिया गया, तब उसे परमेश्वर के उस हाथ पर विचार करना चाहिए था जो उसके विरुद्ध उठा था, और छाती पीटकर लौट आना चाहिए था।
बुद्धिमान. विचार, भला विचार तो उससे कोसों दूर था; वह अब भी वैसा ही हठीला और घमण्डी था जैसा अपने जीवन भर रहा था, और अपने पाप के पीछे दौड़ने में भी अब वैसा ही बढ़-चढ़कर था जैसा 169 अपनी भरपूरी के बीच में था; अन्तर केवल इतना था कि अब वह थके-माँदे टट्टू के समान चलता था, क्योंकि शैतान ने उस पर सवारी करके उसे लगभग उसके पाँवों से गिरा दिया था।
सावधान. अच्छा, परन्तु जब लगभग सब कुछ जाता रहा तब उसने क्या किया?
170 बुद्धिमान. अब दो बातें उसका खेल बन गईं। 1. वह कसमें खा-खाकर, डींगें मार-मारकर और झूठ बोल-बोलकर सब को यह विश्वास दिलाता रहा कि उसकी दशा वैसी ही अच्छी है जैसी उस पहिले दिन थी जब उसने अपना काम आरम्भ किया था; वरन उसने खोया नहीं, कुछ कमाया ही है; और उसके इशारे पर उसके कुछ ऐसे साथी भी रहते थे जो उसकी बात को पक्का करने के लिये उतनी ही फुर्ती से कसम खा लेते थे जितनी फुर्ती से वह स्वयं।
सावधान. यह तो दोहरी दुष्टता थी; ऐसा कहना एक पाप था, और उस पर कसम खाना दूसरा।
बुद्धिमान. यह सच है; परन्तु जो मनुष्य परमेश्वर द्वारा छोड़ दिया गया हो, जैसा मैं उसे समझता हूँ, वह कौन सी बुराई है जो वह न करेगा? सावधान. और दूसरी बात क्या थी?
171 बुद्धिमान. यही, जिसका संकेत मैं पहिले कर चुका हूँ, कि वह एक धनी पत्नी की खोज में था: और अब मैं उसकी कुछ और गढ़ी हुई, सोची-समझी, योजना बनाकर की गई और घिनौनी धूर्तता की चर्चा पर आ पहुँचा हूँ, ऐसी धूर्तता जो उसे और भी अधिक एक महा दुस्साहसी पापी प्रगट करेगी।
बात यह थी: उसे पत्नी चाहिए थी, वरन धन चाहिए था; क्योंकि जहाँ तक स्त्री की बात है, उसकी एक सीटी पर उसके पास बहुतेरी वेश्याएँ आ सकती थीं। परन्तु, जैसा मैंने कहा, उसे धन चाहिए था, और वह धन मिल सकता था 166 नीतिवचन 28:7।
169 अपनी गिरती दशा में उसका व्यवहार।
170 उसने अपनी गिरती दशा को कैसे छिपाया।
171 दुर्जन धनी पत्नी की खोज में है।
केवल एक पत्नी के द्वारा, और किसी रीति से नहीं; और पत्नी भी उसे इतनी सहज में न मिल सकती थी, जब तक कि वह कपट करने की कला में निपुण न हो जाए; और कपट भी उन लोगों के बीच काम न आता जो उसी के समान
172 कपट कर सकते थे। परन्तु उससे थोड़ी ही दूर एक कुँवारी कन्या रहती थी, जो भक्त भी थी और जिसके पास 173 अच्छी-खासी सम्पत्ति भी थी; परन्तु उसे कैसे पाया जाए, सारी चतुराई इसी में थी। अच्छा, उसने अपने कुछ 174 सब से भरोसेमन्द और धूर्त साथियों की एक सभा बुलाई, और अपने मन की बात उनके सामने खोली; अर्थात् यह कि उसका मन विवाह करने का है; और उसने उन्हें यह भी बताया कि किससे; परन्तु, उसने कहा, मैं अपना उद्देश्य कैसे पूरा करूँ? वह धार्मिक है, और मैं नहीं हूँ। तब उनमें से एक ने उत्तर देकर कहा,
जब वह धार्मिक है, तो तुम्हें भी वैसा ही होने का ढोंग करना पड़ेगा, और यह उसके पास जाने से कुछ समय पहिले से ही: इसलिये ध्यान रखो कि वह प्रतिदिन उपदेश सुनने कहाँ जाती है, और तुम भी वहीं जाया करो; परन्तु वहाँ तुम्हें निश्चय गम्भीरता से व्यवहार करना होगा, और ऐसा दिखाना होगा मानो वचन तुम्हें अत्यन्त ही अच्छा लगता है; ऐसी जगह खड़े भी होना जहाँ वह तुम्हें देख सके; और जब घर लौटो, तो ध्यान रखना कि गली में बड़ी गम्भीरता से चलो, और उसकी आँखों के सामने से होकर जाओ: कुछ समय तक ऐसा करने के बाद उसके पास जाना, और पहिले यह बात करना कि तुम्हें अपने पापों का कितना दु:ख है, और उस धर्म के प्रति बड़ा प्रेम दिखाना जिसकी वह है; उसके उपदेशकों और उसके भक्त परिचितों की बराबर प्रशंसा करते रहना, और अपने कठोर भाग्य पर विलाप करना कि तुम्हारे भाग्य में उससे और उसके संगी अंगीकार करनेवालों से पहिले परिचय होना न लिखा था; और उसे पाने का यही मार्ग है। तुम्हें उपदेश भी लिखने होंगे, पवित्रशास्त्र की बातें करनी होंगी, और शपथपूर्वक कहना होगा कि तुम उससे विवाह का प्रस्ताव करने केवल इसलिये आए हो कि वह भक्त है, और इसलिये कि यदि तुम्हें ऐसी कोई मिल जाए तो तुम उसे अपना सब से बड़ा सौभाग्य समझोगे: और उसके धन को तुच्छ जानना, वह इससे तुमसे कुछ दूर न होगा; उस तक सब से जल्दी पहुँचने का यही मार्ग है, क्योंकि पहिले पहिल उसे यह शंका होगी कि तुम उसके धन के लिये आए हो; तुम जानते हो कि उसके पास क्या है, परन्तु उसके विषय में एक शब्द भी न कहना। ऐसा करो, और फिर देखना कि तुम उस लड़की को फँसा लेते हो कि नहीं।
इस प्रकार इस बेचारी सीधी-सच्ची कन्या के लिये फन्दा बिछाया गया, और वह शीघ्र ही उसके गड़हे में फँस गई।
सावधान. क्यों, क्या उसने यह सम्मति मान ली?
175 बुद्धिमान. मान ली? हाँ, और कुछ समय बाद वह बड़े साहस के साथ उसके पास गया, और वह भी धर्म का मुखौटा लगाकर, मानो वह ईमानदारी और भक्ति के पक्ष में इंग्लैंड के सब से सच्चे और सीधे मनवाले लोगों में से एक हो। उसने सब बातों का ध्यान रखा, और अपने सलाहकारों की सम्मति के अनुसार चला, और शीघ्र ही उसे पा भी लिया; क्योंकि स्वाभाविक गुण उसमें थे, वह लम्बा और सुन्दर था, और उसकी पीठ पर सादे परन्तु बहुत अच्छे कपड़े थे; और धर्म का रूप तो उसने और भी सहज में धारण कर लिया; क्योंकि उसने अपने पिता के घर में और अपने पहिले मालिक के घर में कुछ देखा था, इसलिये वह और भी आसानी से उसके रूप और दिखावे में अपने आप को ढाल सकता था।
सो उसने अपना दिन ठहराया, और उसके पास गया, जो वह सहज में कर सकता था, क्योंकि रोकने के लिये उसके न पिता थे न माता। अच्छा, जब वह पहुँचा, और उसे शिष्टाचार की एक सुन्दर अभिवादन-बात कह चुका,
172 दुर्जन की आँख एक भक्त कुँवारी पर है।
173 वह उसे पाने का यत्न करता है, क्यों और कैसे।
174 वह अपने साथियों को इकट्ठा करता है, और वे उसे सम्मति देते हैं कि उसे कैसे पाए।
175 दुर्जन अपनी सलाह के अनुसार उस कुमारी के पास जाता है।
176 कि उसे समझा दे कि वह क्यों आया है, तब उसने बात आरम्भ की और उससे कहा, कि उसने अपने मन में उसके प्रति बहुत प्रेम पाया है; और कि संसार की सब कुमारियों में से उसने उसी को चुना है, यदि वह उचित समझे, कि उसे अपनी प्रिय पत्नी बनाए। उसे चुनने के कारण, जैसा उसने उससे कहा, उसकी धार्मिक और निजी उत्तमताएँ थीं; और इसलिये उसने उससे विनती की कि वह उसकी दशा पर कोमलता और प्रेम से विचार करे। रही संसार की बात, उसने कहा, मेरा व्यापार बहुत अच्छा है, और मैं अपना और अपने परिवार का भली भाँति पालन कर सकता हूँ, और मेरी पत्नी आराम से अपने आसन पर बैठी रहेगी; मैंने अब तक इतना-इतना कमा लिया है, और प्रतिदिन धन आता हुआ देखता हूँ; परन्तु मेरा लक्ष्य यह नहीं है, मेरा लक्ष्य तो एक ईमानदार और भक्त पत्नी है। फिर वह उसे एक-दो अच्छी पुस्तकें भेंट करता, और यह ढोंग करता कि उसने स्वयं उनसे कितना लाभ पाया है। वह भक्त सेवकों की भी, विशेषकर उनकी जिन्हें वह जानता था कि वह सब से अधिक पसन्द करती और प्रेम करती है, बार-बार प्रशंसा करता रहता। इसके अतिरिक्त, वह उससे बार-बार यह कहता रहता कि उसका पिता कैसा भक्त था, और वह स्वयं भी अब कैसा नया मनुष्य बन गया है; और इस प्रकार इस विश्वासघाती व्यवहारी ने इस सीधी-सच्ची और भली लड़की के साथ व्यवहार किया, जिससे उसे बड़ा दु:ख और शोक हुआ, जैसा आप आगे सुनेंगे।
सावधान. परन्तु क्या उस कन्या का कोई हितैषी न था जो उसकी देखभाल करता?
बुद्धिमान. उसके माता-पिता मर चुके थे, और यह वह भली भाँति जानता था, और इसलिये वह उसकी दुष्ट झूठी जीभ से और भी सहज में हार गई। परन्तु यदि उसके कितने ही हितैषी होते, तौभी वह उसके धोखे में आ सकती थी। आजकल जवान लोगों में यह रीति बहुत ही चल पड़ी है कि वे अपने आप को अपना चुनाव आप करने के लिये पर्याप्त बुद्धिमान समझते हैं, और सोचते हैं कि उन्हें उन लोगों से सम्मति लेने की कोई आवश्यकता नहीं
177 जो उनसे बड़े और अधिक बुद्धिमान भी हैं: परन्तु यह उनका एक बड़ा दोष है, और उनमें से बहुतों ने इसका भारी मूल्य चुकाया है। अच्छा, संक्षेप में कहूँ, तो थोड़े ही समय में श्रीमान दुर्जन ने अपनी
178 मनोकामना पा ली; इस सीधी-सच्ची लड़की को और उसके धन को पा लिया, उससे विवाह कर लिया, उसे घर ले आया, भोज दिया, उसका राजसी ठाठ से सत्कार किया, परन्तु सब का खर्च उसी की सम्पत्ति को चुकाना था।
सावधान. यह तो अद्भुत रीति से कपटपूर्ण काम था; ऐसी बात मनुष्य कदाचित ही कभी सुनता है।
179 बुद्धिमान. अपने इस काम से उसने दिखा दिया कि वह परमेश्वर का कितना कम भय मानता था, और उसके दण्डों का उसे कितना कम डर था। क्योंकि यह सारा आचरण और ये सारी बातें उसकी पहिले से सोची हुई बुराई थीं; वह जानता था कि वह झूठ बोल रहा है, वह जानता था कि वह कपट कर रहा है; वरन वह जानता था कि वह परमेश्वर के नाम को, धर्म को, भले मनुष्यों को और अच्छी पुस्तकों को केवल शिकार की आड़ के घोड़े के समान काम में ला रहा है, कि उसके द्वारा अपने शिकार को और अच्छी रीति से पकड़ सके। धर्म के इस अपने सारे भड़कीले दिखावे में वह केवल एक भड़कीला, रंगा-पुता
कपटी था; और कपट वह सब से ऊँचा पाप है जिस तक एक बेचारा शारीरिक अभागा पहुँच सकता है; यह वह पाप भी है जो परमेश्वर को सब से अधिक ललकारता है, और जो सब से भारी दण्ड भी लाता है। अब वह
180 चूना फिरी हुई दीवार था, अब वह रंगी-पुती कब्र था; अब वह ऐसी कब्र था जो दिखाई नहीं देती; 176 दुर्जन का अभिवादन, उसका झूठा अभिवादन।
177 विवाह के विषय में सम्मति की उपेक्षा करना खतरनाक है।
178 दुर्जन अपनी मनोकामना पा लेता है, उसका विवाह हो जाता है, इत्यादि।
179 उसका आचरण भक्तिहीन और दुष्ट ठहराया गया।
क्योंकि इस बेचारी सीधी-सच्ची, भक्त कुमारी ने तनिक भी न सोचा था कि जब वह श्रीमान दुर्जन से विवाह करने जा रही थी, तब उसकी शान्ति, और सुख, और 181 सम्पत्ति, और स्वतन्त्रता, और स्वयं उसका शरीर, और सब कुछ, अपनी कब्र की ओर जा रहे थे; और फिर भी ऐसा ही हुआ; उसके बाद उसे बहुत थोड़ा ही सुख मिला; जो सुख वह पहिले भोगती थी, उसकी तुलना में वह ऐसी थी मानो मरकर गाड़ दी गई हो।
सावधान. निश्चय ही परमेश्वर का कोई अद्भुत दण्ड ऐसे दुष्ट मनुष्यों के पीछे लगा रहता होगा और उन्हें आ पकड़ता होगा।
बुद्धिमान. आप निश्चय जानिए कि जब न्याय का दिन आएगा, तब इन सब बातों के कारण उन्हें पूरा-पूरा दण्ड मिलेगा। परन्तु जहाँ तक इस जीवन में उन पर दण्ड आने की बात है, वह सदा नहीं आता, नहीं, उन पर भी नहीं जो उसके योग्य हैं। जो परमेश्वर की परीक्षा करते हैं, वे बच जाते हैं,
182 और जो दुष्टता करते हैं, वे बढ़ते जाते हैं: परन्तु वे क्रोध के दिन के लिये रख छोड़े गए हैं, और 183 तब उनकी दुष्टता के कारण परमेश्वर उनके देखते उन्हें बदला देगा। दुष्ट मनुष्य विपत्ति के दिन के लिये रख छोड़ा जाता है; वे क्रोध के दिन के लिये निकाले जाएंगे; उसकी चाल उसके मुँह पर कौन कहेगा? और उसने जो किया है, उसका पलटा उसे कौन देगा? तौभी वह 184 कब्र को पहुँचाया जाएगा, और समाधि में पड़ा रहेगा। अर्थात्, साधारणत: वे इस जीवन में परमेश्वर के हाथ से बच निकलते हैं; केवल थोड़े से उदाहरण बनाए जाते हैं, कि उनके द्वारा दूसरे लोग सावधान हों और चेतावनी पाएँ:
परन्तु न्याय के दिन उन्हें उनकी बुराई के लिये भस्म करनेवाली आग के कोड़ों से डाँटा जाएगा।
सावधान. क्या आप मुझे उन मनुष्यों पर परमेश्वर के क्रोध के कोई उदाहरण नहीं दे सकते, जिन्होंने श्रीमान दुर्जन के समान यह दु:खद दुष्ट काम किया हो?
185 बुद्धिमान. हाँ; हमोर और शकेम, और उनके नगर के सब पुरुष, इसलिये कि उन्होंने याकूब की बेटियों को ब्याह में पाने के लिये परमेश्वर और धर्म को आड़ का घोड़ा बनाने का यत्न किया, सब के सब एक साथ तलवार की धार से घात किए गए। निस्सन्देह यह उस विषय में उनके कपट के कारण उन पर परमेश्वर का दण्ड था। हर प्रकार का झूठ और कपट भयानक है, परन्तु परमेश्वर और धर्म को भेस बनाकर, उसके द्वारा अपने कपट को दूसरों की आँखों से छिपाना, ईश्वरीय प्रताप को अत्यन्त क्रोध दिलानेवाली बात है।
मैं एक मनुष्य को जानता था जो हमारे नगर से अधिक दूर नहीं रहता था, जिसने अपने लिये वैसे ही पत्नी पाई थी जैसे श्रीमान दुर्जन ने पाई; परन्तु वह बहुत दिन तक उसका सुख न भोग सका: क्योंकि एक रात जब वह घोड़े पर सवार होकर (अपने साथियों के पास से, जहाँ वह पास के एक नगर में गया था) घर लौट रहा था, तो उसके घोड़े ने उसे भूमि पर पटक दिया, और पौ फटने पर वह वहाँ मरा हुआ पाया गया; गिरने से उसका शरीर भयानक और दयनीय रीति से क्षत-विक्षत हो गया था, और वह अपने ही लहू में लथपथ था।
सावधान. अच्छा, परन्तु कृपा करके फिर श्रीमान दुर्जन की ओर लौटिए; उससे विवाह करने के बाद उसने अपनी पत्नी के साथ कैसा व्यवहार किया?
181 वह बड़ा परिवर्तन जो शीघ्र ही दुर्जन की पत्नी पर आ पड़ा।
183 ऐसी बातों के लिये दण्ड की प्रतीक्षा है।
184 अय्यूब 21:30, 31, 32।
185 उन पर परमेश्वर के क्रोध का एक उदाहरण जिन्होंने पहिले श्रीमान दुर्जन का यह पाप किया है। उत्पत्ति 34।
बुद्धिमान. नहीं, हम बातों को जैसे-जैसे आगे बढ़ें वैसे-वैसे साथ लेते चलें। उसका विवाह हुए थोड़ा ही समय हुआ था,
186 कि उसके लेनदार अपने धन के लिये उस पर आ चढ़े: उसने उन्हें थोड़े दिन टाला, परन्तु अन्त में बात यहाँ तक आ पहुँची कि या तो उसे चुकाना ही था, या इससे भी बुरा कुछ करना था; सो उसने उनके लिये एक समय ठहराया, और वे अपना धन लेने आए, और उसने उसी की आँखों के सामने उसी के धन से उन्हें गिन-गिनकर चुका दिया, उन वस्तुओं के बदले जो वह बहुत पहिले अपनी वेश्याओं के बीच अन्धाधुन्ध उड़ा चुका था, (उस सम्पत्ति के अतिरिक्त जो उसके पिता ने उसे दी थी) जिनका मूल्य दो सौ पाउंड था।
सावधान. यह आरम्भ बुरा था; परन्तु मैं क्या कहूँ? यह श्रीमान दुर्जन ही के योग्य था।
बेचारी स्त्री, उसके लिये यह तो बुरा ही आरम्भ था; मुझे डर है कि इसने उसे बहुत दु:ख से भर दिया होगा, जैसा मैं समझता हूँ कि ऐसा आरम्भ किसी को भी कर देता, चाहे वह उससे कहीं अधिक दृढ़ क्यों न होती।
187 बुद्धिमान. दु:ख, हाँ, आप इसका निश्चय रखिए; परन्तु अब पछताने का समय निकल चुका था; उसे अपनी चिन्ता तब अच्छी रीति से करनी चाहिए थी जब सावधानी उसका भला कर सकती थी; उसकी हानियाँ दूसरों के लिये लाभ का कारण हो सकती हैं, जो उनसे सावधान रहना सीखेंगे; परन्तु जहाँ तक उसकी अपनी बात है, जो कुछ आगे आए उसे वही सहना होगा, अर्थात् अब वैसा ही जीवन जैसा उसका पति श्रीमान दुर्जन उससे बिताने देगा, और वह पर्याप्त बुरा होगा।
सावधान. यह आरम्भ बुरा था, और फिर भी मुझे डर है कि यह बुराई का केवल आरम्भ ही था।
बुद्धिमान. आप निश्चय जानिए कि यह बुराई का आरम्भ मात्र था, क्योंकि और बुराइयाँ 188 तेज़ी से आती गईं; उदाहरण के लिये: उसके विवाह को थोड़ा ही समय हुआ था कि उसने अपना
धर्म बाड़े पर टाँग दिया, या यों कहिए कि उसके साथ वैसा ही किया जैसा लोग अपने पुराने कपड़ों के साथ करते हैं, जो उन्हें उतार फेंकते हैं, या दूसरों के पहिनने के लिये छोड़ देते हैं; जहाँ तक उसकी बात है, वह अब और धार्मिक न रहना चाहता था।
सो अब उसने अपना मुखौटा उतार दिया, और अपने पुराने रूप में दिखाई देने लगा, एक नीच, दुष्ट, दुराचारी व्यक्ति, (और अब उस बेचारी स्त्री ने देखा कि उसके साथ सचमुच विश्वासघात हुआ है;) अब उसके पुराने साथी भी उसके चारों ओर झुण्ड बाँधकर आने लगे, और पहिले की नाईं उसके घर और दुकान पर मँडराने लगे: और उनके साथ श्रीमान दुर्जन के सिवाय और कौन? और फिर उसके साथ उनके सिवाय और कौन?
अब वे भले लोग जो उसकी पत्नी की संगति में आया करते थे, घबराने और 189 हियाव छोड़ने लगे; वह उन पर त्योरी चढ़ाता और घूरता, मानो उसे उनकी सूरत से घृणा हो: यहाँ तक कि थोड़े ही समय में उसने सारी भली संगति को उससे दूर भगा दिया, और उसे
190 अकेली बैठे रहने पर विवश कर दिया। वह अब रात को उन कुलटाओं के पास भी जाने लगा जो पहिले उसकी परिचित थीं, और उनके साथ कभी आधी रात तक और कभी लगभग भोर तक रहता, और फिर सूअर के समान मतवाला होकर घर आता; और यही श्रीमान दुर्जन की चाल थी।
186 विवाह के बाद दुर्जन के लेनदार उस पर आ चढ़ते हैं, और उसकी पत्नी की सम्पत्ति उसका मूल्य चुकाती है जिससे विवाह से पहिले उसकी वेश्याओं को भोज खिलाए गए थे।
187 अब वह अपनी असावधानी का फल काटती है।
188 अब जबकि दुर्जन ने धर्म के द्वारा अपने लिये पत्नी पा ली, वह उसे बेकार वस्तु के समान टाँग देता है, और अपने पुराने का सत्कार करता है 189 वह भली संगति को अपनी पत्नी से दूर भगा देता है।
190 वह अपनी वेश्याओं के पास जाता है।
अब, जब वह इस दशा में घर आता, और यदि उसकी पत्नी उससे इस विषय में एक शब्द भी कहती कि वह कहाँ था, और उसने अपनी ऐसी दुर्दशा क्यों की, चाहे उसकी बातें 191 कितनी ही नम्रता और प्रेम से क्यों न कही गई हों, तो वह वेश्या, और कुतिया, और छिनाल कहलाती; और यदि वह उसकी उँगलियों और एड़ियों से बच जाती तो भी गनीमत थी। कभी-कभी वह अपनी रखैलों को भी अपने घर ले आता, और उनके चले जाने के बाद उसकी पत्नी पर हाय, यदि उसने हर प्रकार की सम्भव वस्तुओं से उनका सत्कार न किया हो, और उनके साथ प्रेम से व्यवहार न किया हो।
इस प्रकार इस भली स्त्री को उसके पति दुर्जन ने ऐसा बना दिया कि जो कुछ उसने उससे प्रतिज्ञा की थी, या जो कुछ वह उसके हाथों पाने की आशा रखती थी, उन सब में उसके पल्ले निराशा के सिवाय और कुछ न पड़ा।
परन्तु जिस बात ने उसके सारे दु:ख पर दबानेवाला बोझ और बढ़ा दिया, वह यह थी, कि जैसे उसने स्वयं सारा 192 धर्म फेंक दिया था, वैसे ही उसने यत्न किया कि, हो सके तो, वह भी ऐसा ही करे। वह उसे मसीह के वचन के प्रचार में जाने न देता, न उसकी अन्य विधियों में, जो उसके प्राण के कल्याण और उद्धार के लिये ठहराई गई हैं: वह अब उसके 193 उपदेशकों पर ताने मारता, और उन पर कटाक्ष करके बोलता; और उनके विषय में निन्दा की बातें ग्रहण करता, वरन स्वयं भी गढ़ता, जिससे उसे बहुत ही बड़ा दु:ख और क्लेश होता।
अब वह किसी ईमानदार पड़ोसी के घर जाने, या हाथ में कोई अच्छी पुस्तक लेने का साहस मुश्किल से ही कर पाती थी; विशेषकर जब उसके साथी उसके घर में होते, या जब थोड़ी सी शराब उसके
194 सिर पर चढ़ी होती। जब वह देखता कि वह उदास है, तब अपने साथियों के सामने उससे ताने और ठट्ठे की बातें करता, और उसे अपनी धार्मिक पत्नी, अपनी भोली-भाली सती, और ऐसे ही नामों से पुकारता; वह बाहर अपने लम्पट संगियों के बीच भी उसकी हँसी उड़ाता।
यदि वह उससे (जैसा वह कभी-कभी करती थी) उपदेश सुनने जाने की अनुमति माँगती, तो वह कुत्ते की नाईं झिड़ककर उत्तर देता, घर में रहो, घर में रहो, और अपना काम देखो; हम उपदेश
195 सुनकर जीवित नहीं रह सकते। यदि वह फिर भी आग्रह करती कि वह उसे जाने दे, तो वह उससे कहता, जाओ यदि साहस है तो। वह उस पर यह दोष भी लगाता कि वह उसका धन अपने
सेवकों को देती है, जबकि, वह नीच अभागा, उसे पहिले ही अपने निकम्मे साथियों पर उड़ा चुका होता था।
यह वह जीवन था जो श्रीमान दुर्जन की भली पत्नी ने उससे विवाह होने के कुछ ही महीनों के भीतर बिताया।
सावधान. यह तो सचमुच निराशा थी।
बुद्धिमान. सचमुच ऐसी निराशा, जैसी, मेरी समझ में, किसी बेचारी स्त्री को कभी मिली होगी। कोई सोचेगा कि वह धूर्त उसे थोड़ी सी अपनी इच्छा पूरी करने देता, क्योंकि वह इच्छा केवल ईमानदार रहने की थी, और क्योंकि वह उसके लिये इतनी मीठी, इतनी भारी सम्पत्ति लाई थी, क्योंकि वह उसके घर में सैकड़ों लाई थी: मैं कहता हूँ, कोई सोचेगा कि उसे उसकी इच्छा थोड़ी सी तो पूरी करने देनी चाहिए थी, क्योंकि वह
191 वह अपनी पत्नी को गालियाँ देता है।
192 वह अपनी पत्नी को बलपूर्वक उसके धर्म से हटाने का यत्न करता है।
193 वह उसके उपदेशकों का ठट्ठा करता है।
194 वह अपनी पत्नी की उदासी में उसका ठट्ठा करता है।
195 वह उसे भली संगति में जाने से मना करता है।
यह केवल परमेश्वर की सेवा और आराधना के लिये चाहती थी: परन्तु क्या वह उससे यह बात मनवा सकी? नहीं, तनिक भी नहीं, चाहे इससे उसका प्राण ही क्यों न बच जाता। यह सच है कि कभी-कभी, जब वह घर से बाहर होता, किसी यात्रा पर, या अपने मतवाले साथियों के बीच, तब वह चुपके से निकल जाती, परन्तु जितनी
196 गुप्त रीति से हो सकता था उतनी गुप्त रीति से; और, बेचारी स्त्री, उसे यह लाभ था कि उसने अपने सब पड़ोसियों के साथ ऐसा व्यवहार रखा था कि, यद्यपि उनमें से बहुतेरे शारीरिक ही थे, तौभी वे उसके साथ विश्वासघात न करते, और यदि उसे वचन सुनने जाते देखते तो उसके विषय में न बताते, वरन इसके विपरीत उसे स्वयं श्रीमान दुर्जन से छिपाने का यत्न करते।
सावधान. उसके प्रति उसका यह व्यवहार उसका हृदय तोड़ देने के लिये पर्याप्त था।
बुद्धिमान. सचमुच यह ऐसा करने के लिये पर्याप्त था, वरन इसने सचमुच ऐसा कर दिया। समय आने पर इसने उसे मार डाला, वरन यह सारे समय उसे मारता ही रहा। वह प्राय: जब अकेली बैठी होती, तब इस प्रकार
197 शोक के साथ अपनी दशा पर विलाप करती: हाय, हाय, क्योंकि मुझे मेशेक में परदेशी होकर रहना पड़ा, और 198 केदार के तम्बुओं में बसना पड़ा है! बहुत समय से मुझ को मेल के बैरी के साथ बसना पड़ा है। हे छली जीभ, तुझ को क्या दिया जाए? और हे झूठी जीभ, तेरे साथ क्या किया जाए? मैं मन की दुखिया स्त्री हूँ, मेरे पति ने अपनी अभिलाषाओं के लिये मुझे मोल लिया और बेच दिया: उसे मैं नहीं, मेरा धन चाहिए था: भला होता कि वह उसे ले लेता, और मुझे मेरी स्वतन्त्रता मिल जाती!
यह वह उसके व्यक्तित्व के प्रति घृणा के कारण नहीं, परन्तु उसकी दशा के कारण कहती थी, और इसलिये कि उसने देखा कि अपनी कपटी जीभ के द्वारा वह उसे न केवल लगभग भिखारिन बना चुका था, वरन उससे परमेश्वर का वचन भी छीन चुका था।
सावधान. मैं देखता हूँ कि अविश्वासियों के साथ असमान जूए में जुतना एक घातक बात है। यदि इस स्त्री को एक भला पति मिला होता, तो वे कितने आनन्द से एक साथ रह सकते थे! ऐसा पति उसके लिये प्रार्थना करता, उसे सिखाता, और विश्वास में और परमेश्वर के मार्गों में उसे उत्साहित भी करता: परन्तु अब, बेचारी, इसके स्थान पर ठीक इसका उलटा ही है।
बुद्धिमान. सचमुच यह एक घातक बात है, और इसलिये परमेश्वर के वचन के द्वारा उसकी प्रजा को मना किया गया है 199 कि वे उनके साथ विवाह में जुड़ें। वह कहता है, अविश्वासियों के साथ असमान जूए में न जुतो; क्योंकि धार्मिकता और अधर्म का क्या मेल-जोल? या ज्योति और अन्धकार की क्या संगति? और मसीह का बलियाल के साथ क्या लगाव? या विश्वासी के साथ अविश्वासी का क्या नाता? और मूरतों के साथ परमेश्वर के मन्दिर का क्या 200 सम्बन्ध? जहाँ ऐसे जोड़े बनाए जाते हैं, वहाँ कोई मेल नहीं हो सकता; स्वयं परमेश्वर ने संसार के आरम्भ ही से इसके उलटे की घोषणा की है। मैं (वह कहता है) तेरे और इस स्त्री के बीच में
201 202 और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा। इसलिये वह एक और 196 वह कभी-कभी चुपके से निकल जाती है।
197 उसका पछतावा और विलाप।
199 असमान जूए में एक साथ जुतने की बुराई।
202 व्यवस्थाविवरण 2:43। (यह पद मौजूद नहीं है, परन्तु मूल पाठ में ऐसा ही दिया गया है। DP) स्थान पर कहता है, वे लोहे और मिट्टी से बढ़कर आपस में मेल नहीं खा सकते। मैं कहता हूँ, उनमें मेल नहीं हो सकता, वे एक नहीं हो सकते, और इसलिये उन्हें आरम्भ ही में सावधान रहना चाहिए, और ऐसों को हलके मन से अपने स्नेह में स्थान न देना चाहिए। परमेश्वर ने ऐसे जोड़ों को प्राय: कड़वा बना दिया है, विशेषकर अपने लोगों के लिये। ऐसे जोड़े, जैसा परमेश्वर ने एली के उन पुत्रों के विषय में कहा था जो छोड़ दिए जाएंगे, आँखों को फोड़ने और मन को शोकित करने के लिये होते हैं। ओह, वह विलाप और रोना-पीटना जो उन्होंने किया है जो इस प्रकार जोते गए हैं, विशेषकर यदि वे ऐसे थे जिन्होंने अपनी समझ के, और इसके विरुद्ध दी गई भली सम्मति के विरुद्ध, इस प्रकार जुतना चाहा!
सावधान. हाय! उसने अपनी जीभ से और बनावटी सुधार से उसे धोखा दिया।
203 बुद्धिमान. अच्छा, अच्छा; उसे और अधिक सावधानी से काम लेना चाहिए था: क्या ही अच्छा होता यदि वह अपने सब से अच्छे, सब से समझदार और भक्त मित्रों को इसकी सूचना देती? क्या ही अच्छा होता यदि वह एक-दो भक्त सेवकों से श्रीमान दुर्जन के साथ बातचीत करवाती? और क्या ही अच्छा होता यदि वह उसके चारों ओर घात लगाकर यह पता लगाती कि कहीं वह उसकी पीठ पीछे उससे भिन्न तो नहीं जैसा उसके सामने था? और इसके अतिरिक्त, मैं सचमुच सोचता हूँ (क्योंकि सम्मति देनेवालों की बहुतायत के कारण बचाव होता है) कि यदि वह कलीसिया को इसकी सूचना देती, और उनसे विनती करती कि वे इस विषय में कुछ समय परमेश्वर से प्रार्थना में बिताएँ, और यदि उसे उसी से विवाह करना था, तो उसकी भक्ति के विषय में उसे अपनी नहीं वरन दूसरों की परख के आधार पर स्वीकार करती, (यह जानते हुए कि वे भक्त, विवेकी और निष्पक्ष लोग हैं) तो उसे अपने बाद के सारे जीवन में अधिक शान्ति मिलती; इसकी अपेक्षा कि वह अपनी ही कमज़ोर, कच्ची, स्त्री-सुलभ परख पर भरोसा करे, जैसा उसने किया। प्रेम अन्धा होता है, और जहाँ दूसरे सौ दोष देख सकते हैं, वहाँ वह कुछ भी दोष नहीं देखता। इसलिये मैं कहता हूँ, उसकी भलाई के विषय में उसे अपने ही विचारों पर भरोसा न करना चाहिए था।
जहाँ तक उसके व्यक्तित्व की बात थी, वहाँ वह परखने के लिये सब से उपयुक्त थी, क्योंकि प्रसन्न तो उसी को होना था; परन्तु जहाँ तक उसकी भक्ति की बात थी, वहाँ वचन सब से उपयुक्त न्यायी था, और वे लोग जो उसे सब से अच्छी रीति से 204 समझ सकते थे, क्योंकि उसमें परमेश्वर को प्रसन्न होना था। मैं चाहता हूँ कि सब जवान कुमारियाँ चापलूसी के शब्दों से, बनावटी और झूठी बातों से धोखा खाने से सावधान रहें, और अपने आप को दुष्ट मनुष्यों के हाथों मोल लिए और बेचे जाने से बचाने का सब से अच्छा मार्ग अपनाएँ, जैसे वह बेची गई थी; ऐसा न हो कि वे भी उसके साथ पछताएँ, जब (इस विषय में) पश्चाताप उनका कुछ भला न करेगा, वरन अपनी असावधानी के कारण वे शोक करती हुई अपनी कब्रों में उतरें।
सावधान. अच्छा, इस बेचारी स्त्री के साथ जो हुआ सो हो चुका, और वह लौटाया नहीं जा सकता; दूसरे लोग 205 उसके दुर्भाग्य से सावधान हो जाएँ, ऐसा न हो कि वे भी उसके संकट में पड़ें।
बुद्धिमान. यही तो मैं कहता हूँ, वे सावधान रहें, ऐसा न हो कि अपनी असावधानी के कारण वे भी दु:ख भोगें, जैसा इस बेचारी स्त्री ने भोगा है। और आह! मेरी समझ में, जो लोग अभी अविवाहित हैं, और जिन्हें श्रीमान दुर्जन जैसों से विवाह करने की परीक्षा होती है, वे यदि इस विषय में अपने आप को समझाने और चिताने के लिये, अपने आप को फँसाने से पहिले, केवल उन लोगों के पास जाएँ जो पहिले से फन्दे में हैं, और उनसे पूछें कि उनके विवाह के उपयुक्त या अनुपयुक्त होने के विषय में उनका क्या हाल है, और उनसे सम्मति माँगें, तो निश्चय वे उनके कानों में असमानता के विषय में ऐसा घण्टा बजाएँगे,
203 उन भक्त कुमारियों के लिये अच्छी सम्मति जिनका विवाह होनेवाला है।
204 जवान स्त्रियों के लिये एक चेतावनी।
205 श्रीमान दुर्जन की पत्नी को अपना उदाहरण बनाइए।
और उस अनुपयुक्तता, हानियों, अशान्तियों और पापों के विषय में जो ऐसे विवाहों के साथ लगे रहते हैं, कि वे जीवन भर सावधान रहेंगे। परन्तु आकाश में उड़नेवाली चिड़िया फन्दे में फँसी चिड़िया के स्वर को तब तक नहीं समझती, जब तक वह स्वयं वहाँ न पहुँच जाए: इसके अतिरिक्त, ऐसे विवाहों को रचने में
शैतान का, और शारीरिक तर्क का, और अभिलाषा का, या कम से कम बिना विचारे काम करने का सब से बड़ा हाथ होता है; और जहाँ इन बातों का बोलबाला होता है, वहाँ योजनाएँ, चाहे कितनी ही विनाशकारी क्यों न हों, सिर के बल आगे बढ़ती जाती हैं: और इसलिये मुझे डर है कि जवान लड़कियाँ श्रीमान दुर्जन की पत्नी के क्लेश से बहुत थोड़ी ही चेतावनी लेंगी।
सावधान. परन्तु क्या ऐसे लोगों के सामने रखने के लिये कोई रोकनेवाले तर्क नहीं हैं, जिससे उनका आनेवाला दु:ख टल जाए?
बुद्धिमान. हाँ: परमेश्वर की व्यवस्था है, जो अविश्वासियों से विवाह करने को मना करती है। इस प्रकार के विवाहों को बुद्धिहीन प्राणी भी दोषी ठहराते हैं। 1. यह परमेश्वर की व्यवस्था के द्वारा पुराने नियम और नये नियम दोनों में मना किया गया है। 1. पुराने नियम में। तू उनसे
ब्याह-शादी न करना; न तो अपनी बेटी उसके बेटे को ब्याह देना, और न उसकी बेटी को 206 अपने बेटे के लिये ब्याह लेना, व्यवस्थाविवरण 7:4, 5। 2. नये नियम में यह मना किया गया है। अविश्वासियों के साथ असमान जूए में न जुतो; वे जिससे चाहें विवाह करें, परन्तु केवल 207 प्रभु में।
208 सो यहाँ एक निषेध है, जो विश्वासी को अविश्वासी से विवाह करने से स्पष्ट रीति से मना करता है, इसलिये उन्हें ऐसा न करना चाहिए। फिर, ये अनुचित विवाह, यदि मैं ऐसा कहूँ, बुद्धिहीन प्राणियों के द्वारा भी दोषी ठहराए जाते हैं, जो अपनी ही जाति को छोड़ और किसी से जोड़ा नहीं बाँधते: क्या भेड़ कुत्ते से जोड़ा बाँधेगी, तीतर कौवे से, या चकोर उल्लू से? नहीं, वे अपने आप को केवल अपनी ही जाति के साथ कड़ाई से बाँधे रखते हैं: वरन जब वे इसके विपरीत कुछ देखते या सुनते हैं, तो सारा संसार अचम्भा करने लगता है। केवल मनुष्य ही स्त्री-पुरुषों के इन अवैध मेलों को अनदेखा करने और स्वीकार कर लेने के लिये सब से अधिक झुका रहता है; क्योंकि केवल मनुष्य ही पापी पशु, पापी पक्षी है, इसलिये वह, सब से बढ़कर, अपने विद्रोही कामों के द्वारा अपने परमेश्वर और सृष्टिकर्ता की व्यवस्था का उत्तर देने का, वरन उसका विरोध करने और उसे तोड़ने का साहस करता है; और न वह इन या अन्य प्रश्नों को, [कैसा मेल-जोल? कैसा लगाव? कैसा सम्बन्ध? ऐसे विवाहों में कैसी संगति हो सकती है?] कुछ महत्त्व का गिनेगा, या उत्तर देने के योग्य समझेगा।
209 परन्तु और भी। जिन खतरों में ऐसे लोग प्राय: अपने आप को डाल देते हैं, वे दूसरों के लिये ऐसा करने से रुकने का रोकनेवाला तर्क होने चाहिए: क्योंकि श्रीमान दुर्जन की पत्नी के क्लेशों के अतिरिक्त, बहुतेरे जिनका स्वर्ग की ओर बहुत आशाजनक आरम्भ हुआ था, इन अवैध विवाहों के साथ आनेवाली बुराइयों के कारण दयनीय और भयानक रीति से भटककर नष्ट हो गए हैं। ऐसे विवाहों के तुरन्त बाद, पाप का बोध (स्वर्ग की ओर पहिला कदम) बन्द हो गया है;
प्रार्थना (स्वर्ग की ओर अगला कदम) बन्द हो गई है; उद्धार के लिये भूख और प्यास 206 व्यवस्थाविवरण 7:4, 5। (कुछ अनावश्यक पाद-टिप्पणी। DP) 207 1 कुरिन्थियों 7:39। 2 कुरिन्थियों 6:14, 15, 16।
208 उनके लिये नियम जिनका विवाह होनेवाला है।
209 यदि आप अपने प्राणों से प्रेम करते हैं तो सावधान रहिए।
(स्वर्ग के राज्य की ओर एक और कदम) बन्द हो गई है। एक शब्द में, ऐसे विवाहों ने उन्हें वचन से, उनके भक्त और विश्वासयोग्य मित्रों से दूर कर दिया है, और उन्हें फिर से शारीरिक संगति में, शारीरिक मित्रों के बीच, और शारीरिक सुख-विलासों में भी ला डाला है, जहाँ और जिनके साथ वे अन्त में पाप में बने रहे, और दयनीय रीति से नाश हो गए।
और यह एक कारण है कि परमेश्वर ने इस प्रकार के असमान विवाहों को मना किया है। क्योंकि वह कहता है, वे (अर्थात् भक्तिहीन) तेरे बेटे को मेरे पीछे चलने से बहकाएंगे, कि वे दूसरे देवताओं की उपासना करें; और इस कारण प्रभु का कोप तुम पर भड़क उठेगा, और वह तुम्हारा
210 शीघ्र सत्यानाश कर डालेगा। अब ध्यान दीजिए, इस्राएल में कुछ ऐसे थे जो इस निषेध के होते हुए भी, अन्यजातियों और अविश्वासियों से विवाह करने का साहस करते थे: परन्तु उसका परिणाम क्या हुआ? वे उनकी मूरतों की उपासना करने लगे, उन्होंने अपने बेटे-बेटियों को पिशाचों के लिये बलिदान किया। इस प्रकार वे अपने ही कामों के द्वारा अशुद्ध हो गए, और अपने ही कार्यों के द्वारा व्यभिचारी बन गए। इसलिये प्रभु का क्रोध अपनी प्रजा पर भड़का, यहाँ तक कि उसको अपने निज भाग से घृणा आई।
सावधान. परन्तु आइए, फिर श्रीमान दुर्जन की ओर लौटें; क्या उसकी पत्नी से उसके कोई बच्चे हुए?
सावधान. मुझे सन्देह है कि उनका पालन-पोषण बुरी रीति से ही हुआ होगा।
बुद्धिमान. उनमें से एक अपनी माता से बहुत प्रेम करता था, और सदा उसकी बात ध्यान से सुनता था।
212 सो उस बच्चे को उसे मसीही धर्म के सिद्धान्तों की शिक्षा देने का अवसर मिला, और वह एक बहुत ही अनुग्रहपूर्ण बच्चा बन गया। परन्तु उस बच्चे को श्रीमान दुर्जन सह न सकता था; वह उससे कदाचित ही कभी एक मीठा शब्द बोलता, वरन उस पर भौंहें चढ़ाता और त्योरी बदलता, उससे रूखेपन और कटुता से बोलता; और यद्यपि स्वभाव से वह सातों में सब से दुर्बल था, तौभी अपने पिता की उँगलियों का बोझ सब से अधिक वही सहता था। उसके तीन बच्चे सीधे उसके पदचिह्नों पर चले, और उतने ही नीच बनने लगे जितना वह स्वयं (अपनी जवानी में) था। जो बाकी रहे वे एक प्रकार के दोगले अंगीकार करनेवाले बन गए, न अपने पिता जितने बुरे, न अपनी माता जितने भले, परन्तु उन दोनों के बीच के थे। उनके विचार उनकी माता के थे, और उनके काम उनके पिता के; और वे बहुत कुछ उन लोगों के समान थे जिनके विषय में आप नहेम्याह की पुस्तक में पढ़ते हैं; ये बच्चे आधी अशदोदी भाषा बोलते थे, और यहूदी भाषा न बोल सकते थे, परन्तु भाषा के अनुसार
सावधान. इस विषय में आप जो कहते हैं, वह ध्यान देने योग्य है; और यदि मैं अपने निशाने से नहीं चूकता, तो जहाँ ऐसे अवैध विवाह किए जाते हैं वहाँ प्राय: ऐसा ही होता है।
बुद्धिमान. कभी-कभी ऐसा होता है, और माता-पिता के सम्बन्ध में इसका कारण यह है: जहाँ माता-पिता में से एक भक्त हो, और दूसरा भक्तिहीन और नीच, (यद्यपि वे 214 बच्चे उत्पन्न करने में तो एक मत हो सकते हैं, तौभी) बच्चों के उत्पन्न होने पर वे उनके लिये आपस में खींचतान करते हैं। भक्त
211 भजन संहिता 106:35, 36, 37, 38, 39, 40।
212 दुर्जन के बच्चे जो इस भली स्त्री से उसे हुए।
214 भक्तिहीन पिता और भक्त माता उन बच्चों के लिये कैसे खींचतान करते हैं जिन्हें परमेश्वर उन्हें देता है।
जन बच्चे के लिये यत्न करता है, और प्रार्थनाओं, सम्मति और अच्छे उदाहरणों के द्वारा परिश्रम करता है कि वह शरीर और प्राण में पवित्र बने, और इस प्रकार स्वर्ग के राज्य के योग्य हो; परन्तु भक्तिहीन चाहता है कि वह उसी के समान दुष्ट, नीच और पापी हो; और इस प्रकार दोनों अपने-अपने मन के अनुसार शिक्षा देते हैं: क्या मैंने शिक्षा कहा? हाँ, और उदाहरण भी, अपने-अपने मन के अनुसार। इस प्रकार भक्त जन, हन्ना के समान, अपने शमूएल को प्रभु को अर्पण कर रहा होता है: परन्तु भक्तिहीन, अपने से पहिले के लोगों के समान, अपने बच्चों को मोलेक को, मूरत को, पाप को, शैतान को, और नरक को चढ़ाने पर तुला रहता है।
इस प्रकार एक अपनी माता की शिक्षा पर कान लगाता है, और विनाश से बचा रहता है; परन्तु दूसरों के विषय में, जैसा उनके पुरखा करते थे, वैसा ही वे भी करते हैं। इस प्रकार श्रीमान दुर्जन और उसकी पत्नी ने अपने कुछ बच्चों को आपस में बाँट लिया; परन्तु बाकी तीन, जो मानो दोनों के बीच के दोगले थे, वे उन लोगों के समान थे जिनके विषय में आप राजाओं की पुस्तक में पढ़ते हैं, वे प्रभु का भय तो मानते थे, परन्तु 215 अपनी मूरतों की उपासना भी करते थे। उनके पास, जैसा मैंने कहा, अपनी माता के विचार थे, और मैं इतना और जोड़ूँगा, कि अंगीकार भी; परन्तु अपने पिता की अभिलाषाएँ, और कुछ-कुछ उसका जीवन भी। अब उनका पिता उन्हें पसन्द नहीं करता था, क्योंकि उनकी जीभ उनकी माता की सी थी; और माता उन्हें पसन्द नहीं करती थी, क्योंकि उनका हृदय और जीवन अब भी उनके पिता का सा था; और सचमुच वे न भलों की संगति के योग्य थे न बुरों की।
भले उन पर भरोसा न करते थे क्योंकि वे बुरे थे, बुरे उन पर भरोसा न करते थे क्योंकि वे भले थे, अर्थात्, भले उन पर भरोसा न करते थे क्योंकि वे अपने जीवन में बुरे थे, और बुरे उन पर भरोसा न करते थे क्योंकि वे अपनी बातों में भले थे: सो उन्हें एसाव के साथ इश्माएल से नाता जोड़ने पर विवश होना पड़ा; अर्थात्, अपने ही समान कपटी लोगों को ढूँढ़ना पड़ा, और उन्हीं के साथ उन्होंने विवाह किया, और जीए और मरे।
सावधान. बेचारी स्त्री, उसे बहुत उलझन हुए बिना कैसे रह सकती थी।
बुद्धिमान. हाँ, और बेचारे बच्चे, कि वे कभी उसकी कोख के फल होकर, और श्रीमान दुर्जन जैसे पिता के शासन के अधीन संसार में भेजे गए।
सावधान. आप ठीक कहते हैं, क्योंकि ऐसे बच्चे लगभग हर प्रकार की हानि के नीचे पड़े रहते हैं: परन्तु हमें कुछ न कहना चाहिए, क्योंकि यह भी परमेश्वर की प्रभुतापूर्ण इच्छा है।
बुद्धिमान. हम किसी भी रीति से परमेश्वर के विरुद्ध आपत्ति नहीं कर सकते: तौभी हम उन लाभों और हानियों की चर्चा कर सकते हैं जो बच्चों को इस बात से होती हैं कि उनके माता-पिता भक्त हैं, या उसके विपरीत।
सावधान. आप ठीक कहते हैं, हम ऐसा कर सकते हैं; और कृपा करके अब, जब हम इस विषय पर हैं, इसके विषय में संक्षेप में कुछ कहिए, अर्थात् इस विषय में: कि जिन बच्चों के माता-पिता सचमुच भक्त हैं, उन्हें दूसरों से बढ़कर क्या लाभ है।
216 बुद्धिमान. मैं ऐसा ही करूँगा, केवल मुझे पहिले ये दो-तीन बातें कह देनी हैं।
1. उन्हें अपने पिताओं के कारण चुनाव का लाभ नहीं मिलता।
2. यद्यपि वे भक्त माता-पिता से उत्पन्न होते हैं, तौभी वे दूसरों के समान क्रोध की सन्तान ही जन्म लेते हैं।
3. भक्त माता-पिता होने के कारण अनुग्रह उन्हें मीरास के रूप में नहीं मिलता।
इन बातों को पहिले कह देने के बाद अब मैं आगे बढ़ूँगा।
216 वे लाभ जो उन बच्चों को मिलते हैं जिनके माता-पिता दोनों भक्त हैं।
1. भक्त माता-पिता के बच्चे बहुत सी प्रार्थनाओं के बच्चे होते हैं: उनके जन्म से पहिले उनके लिये प्रार्थना की जाती है, और जन्म के बाद भी उनके लिये प्रार्थना की जाती है; और भक्त पिता और भक्त
2. जिन बुराइयों की ओर उनके माता-पिता उन्हें झुकते हुए देखते हैं, उनसे जितना सम्भव हो उतना रोके जाने का लाभ उन्हें मिलता है, और यह दूसरी दया है।
3. उन्हें भक्तिपूर्ण शिक्षा का लाभ मिलता है, और यह बताए जाने का कि प्रभु के सीधे मार्ग कौन से हैं और कौन से नहीं।
4. जो मार्ग भले हैं, उनकी सिफ़ारिश भी उनसे की जाती है, और उनके सुनते उनकी प्रशंसा की जाती है।
5. ऐसे बच्चे, जहाँ तक हो सके, बुरी संगति से, बुरी पुस्तकों से, और कसम खाने, झूठ बोलने और ऐसी ही बातों के सिखाए जाने से, जैसे सब्त तोड़ने और भले मनुष्यों और भली बातों का ठट्ठा करने से, दूर भी रखे जाते हैं; और यह एक बहुत बड़ी दया है।
6. उन्हें यह लाभ भी मिलता है कि उनके माता-पिता शिक्षा के द्वारा एक भक्तिपूर्ण जीवन उनके सामने रखते हैं, और उस शिक्षा को एक भक्तिपूर्ण और पवित्र उदाहरण से पुष्ट करते हैं: और ये सब बहुत बड़े लाभ हैं।
217 अब भक्तिहीन माता-पिता के बच्चे इन सब लाभों से वंचित रहते हैं; और इसलिये उनके दुष्टों के भ्रम में बह जाने का खतरा अधिक रहता है। क्योंकि भक्तिहीन माता-पिता न तो अपने बच्चों के लिये प्रार्थना करते हैं, न वे उन्हें हृदय से शिक्षा देते हैं, न दे सकते हैं; वे भक्तिपूर्ण रीति से उन्हें बुराई से नहीं रोकते, न वे उन्हें बुरी संगति से दूर रखते हैं। वे ऐसे बुरे कामों पर दु:खी नहीं होते, और न अपने बच्चों को पहिले से चिताते हैं कि वे उनसे सावधान रहें, जो परमेश्वर और सब भले मनुष्यों की दृष्टि में घृणित हैं। वे अपने बच्चों को सब्त तोड़ने, कसम खाने, झूठ बोलने, दुष्ट और व्यर्थ बनने देते हैं। वे अपने बच्चों से पवित्र जीवन की सिफ़ारिश नहीं करते, न उनकी आँखों के सामने कोई अच्छा उदाहरण रखते हैं। नहीं, वे सब बातों में उलटा ही करते हैं: जन्म लेते ही, जहाँ तक उनसे हो सकता है, अपने बच्चों को परमेश्वर के प्रेम से और सब भले मनुष्यों से दूर करते हैं। इसलिये बच्चों पर परमेश्वर का यह एक बहुत बड़ा दण्ड है कि वे नीच और भक्तिहीन
सावधान. अच्छा, परन्तु श्रीमान दुर्जन की पत्नी और बच्चों की बात छोड़ने से पहिले, यदि आप चाहें, तो मेरा मन है कि एक बात के विषय में थोड़ा और पूछूँ, जिसके विषय में मुझे निश्चय है कि आप मेरा समाधान कर सकते हैं।
सावधान. आपने थोड़ी देर पहिले कहा था कि यह श्रीमान दुर्जन अपनी पत्नी को ऐसे भक्त सेवकों का उपदेश सुनने जाने न देता था जो उसे अच्छे लगते थे, परन्तु कहता था कि यदि वह गई, तो अच्छा होगा कि वह फिर कभी घर न लौटे। क्या वह प्राय: उसके साथ ऐसा ही व्यवहार करता था?
बुद्धिमान. उसने ऐसा कहा था, वह प्राय: ऐसा कहता था। यह मैंने आपको तब बताया था, और तभी और भी बताता, परन्तु दूसरी बातों ने मुझे भटका दिया।
सावधान. अच्छा कहा; तो कृपा करके अब आगे कहिए।
217 वे हानियाँ जो भक्तिहीन माता-पिता के बच्चों को होती हैं।
बुद्धिमान. मैं ऐसा ही करूँगा। एक बार, प्रभु के दिन, वह उपदेश सुनने जाना चाहती थी, और 219 श्रीमान दुर्जन नहीं चाहता था कि वह जाए: परन्तु उस समय, जैसा जान पड़ता है, उसने जितना साहस वह सदा दिखाती थी उससे अधिक साहस धारण किया; और इसलिये, जब वह उससे बहुत सी मीठी बातें और विनतियाँ कर चुकी, कि कदाचित उनके द्वारा उसकी बात मान ली जाए, परन्तु सब व्यर्थ रहा: तो अन्त में उसने कहा कि वह जाएगी, और इसका यह कारण बताया; मेरा एक पति है, परन्तु एक परमेश्वर भी है; मेरे परमेश्वर ने मुझे आज्ञा दी है, और वह भी नरक-दण्ड के भय के साथ, कि मैं निरन्तर
उसकी आराधना करनेवाली बनूँ, और वह भी उसी की ठहराई हुई विधियों के अनुसार: मेरा एक पति है, परन्तु मेरा एक प्राण भी है, और मेरा प्राण मेरे लिए सारे संसार से बढ़कर होना चाहिए। अपने इस प्राण की मैं सुधि लूँगी, इसकी चिन्ता करूँगी, और (यदि मुझसे हो सके तो) इसके निवास के लिए एक स्वर्ग का प्रबन्ध करूँगी। आपको
220 आज्ञा दी गई है कि जैसे आप अपनी देह से प्रेम रखते हैं, वैसे ही मुझसे प्रेम रखें, और मैं भी आपसे प्रेम रखती हूँ; परन्तु मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं अपने प्राण को सारे संसार से बढ़कर मानती हूँ, और उसके उद्धार की खोज मैं अवश्य करूँगी।
221 इस पर पहले तो उसने उसे एक भद्दी बद्दुआ दी, और फिर भयंकर क्रोध में भर गया, और इसके ऊपर कसम खाकर कहा कि यदि वह गई, तो वह उसे भी और उसकी सारी धिक्कारी हुई बिरादरी को भी
(क्योंकि उन्हें यही नाम देना उसे अच्छा लगता था) वहाँ आने पर पछताने को विवश कर देगा।
सावधान. परन्तु इससे उसका क्या अभिप्राय हो सकता था?
बुद्धिमान. आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि उसका क्या अभिप्राय था: उसका अभिप्राय यह था कि वह मुखबिर बन जाएगा, और इस प्रकार या तो जिनसे वह प्रेम रखती थी उन्हें परमेश्वर की आराधना के लिए इकट्ठे होने से थका-थकाकर रोक देगा; या उन्हें ऐसा करने का भारी दाम चुकाने पर विवश करेगा; और यदि वह ऐसा करता, तो वह जानता था कि इससे उसके कोमल हृदय की एक-एक नस दुखेगी।
सावधान. परन्तु क्या आप सोचते हैं कि श्रीमान दुर्जन इतना नीच हो सकता था?
बुद्धिमान. सच तो यह है कि उसके हृदय में ऐसा करने के लिए द्वेष और बैर पर्याप्त था, केवल बात यह थी कि वह एक व्यापारी था; और वह यह भी जानता था कि उसे अपने पड़ोसियों के सहारे ही जीविका चलानी है, इसलिए अपने क्रोध में भी उसमें इतनी थोड़ी-सी बुद्धि बची रही कि उसने अपने आप को रोका, और ऐसा नहीं किया। परन्तु, जैसा मैंने कहा, उसके हृदय में इतना द्वेष और डाह
222 भरा था कि वह यह कर डालता, केवल उसने सोचा कि इससे उसके व्यापार की हानि होगी: फिर भी ये तीन काम वह करता ही रहता था।
1. वह दूसरों को उसके मित्रों को सताने और उनका अपमान करने के लिए उकसाता रहता था।
2. जब वह सुनता कि उन पर कोई विपत्ति आ पड़ी है, तो वह प्रसन्न होता था।
3. और जब वह उसे उनके लिए दुःखी देखता, तो उसकी हँसी उड़ाता था। और अब मैं आपको इस विषय में श्रीमान दुर्जन का ढंग बता चुका।
सावधान. परन्तु क्या वह परमेश्वर के उन दण्डों से नहीं डरता था, जो उस समय चारों ओर उड़ते फिरते थे?
बुद्धिमान. वह न परमेश्वर के दण्ड की परवाह करता था और न उसकी दया की; क्योंकि यदि वह इनकी तनिक भी परवाह करता, तो वैसा नहीं कर सकता था जैसा उसने किया। परन्तु आप किन दण्डों की बात कर रहे हैं?
219 श्रीमान दुर्जन और उसकी पत्नी के बीच एक विवाद।
221 दुर्जन किन हथियारों से अपनी पत्नी से निपटता था।
222 श्रीमान दुर्जन का हृदय प्रकट हुआ कि वह अपनी पत्नी के मित्रों से कैसा बैर रखता था।
सावधान. ऐसे दण्ड, कि यदि स्वयं श्रीमान दुर्जन ने भी उन पर थोड़ा-सा भी गम्भीरता से ध्यान दिया होता, तो वे उसके कान नीचे लटका देते।
बुद्धिमान. क्यों, क्या आपने ऐसे किन्हीं लोगों के विषय में सुना है जिन्हें परमेश्वर के दण्डों ने आ पकड़ा हो?
सावधान. हाँ, और मेरा विश्वास है कि आपने भी सुना है, यद्यपि आप इसके विषय में ऐसे अनजान बन रहे हैं।
बुद्धिमान. हाँ, सचमुच सुना है, और सुनकर मुझे बड़ा अचम्भा और आश्चर्य हुआ।
सावधान. तो कृपा करके, यदि आप चाहें, मुझे बताइए कि इस विषय में आप क्या जानते हैं; और तब शायद मैं भी आपको इसी प्रकार की कोई बात सुनाऊँ।
223 बुद्धिमान. हमारे नगर में डब्ल्यू. एस. नाम का एक मनुष्य था, जिसका जीवन बहुत दुष्ट था; और जब ऐसा लगने लगा कि इस काम को बढ़ावा मिल रहा है, तो वह हठ करके मुखबिर बन बैठा। अच्छा, वह बन गया, और अपने इस काम में उतना ही परिश्रमी था जितना उनमें से अधिकांश हो सकते थे; वह रातों को चौकसी करता, पेड़ों पर
चढ़ता, और दिन में जंगलों में घूमता-फिरता, ताकि यदि हो सके तो सभा करनेवालों का पता लगाए, क्योंकि उस समय वे खेतों में इकट्ठे होने को विवश थे: हाँ, वह उन्हें कड़वे शाप देता, और बड़ी भयानक कसमें खाकर कहता कि जब वे उसके हाथ लगेंगे तो वह उनके साथ क्या-क्या करेगा। अच्छा, जब वह कुछ समय तक पागलखाने के पागल के समान अपनी इस राह पर चलता रहा, और लोगों की कुछ हानि कर चुका, तब परमेश्वर के हाथ ने उसे मारा, और वह इस प्रकार।
1. यद्यपि स्वभाव से उसकी जीभ उसके पूरे वश में थी, अब उसकी बोली लड़खड़ाने लगी, और हफ़्तों तक वह ठीक किसी मतवाले मनुष्य के समान ही बोल पाता था, और किसी प्रकार नहीं।
2. फिर उसके मुँह से लार टपकने, या राल बहने लगी, और वह राल कभी-कभी उसके मुँह से लटककर भूमि की ओर लगभग आधी दूरी तक पहुँच जाती थी।
3. फिर उसकी गर्दन के पिछले पुट्ठों में ऐसी कमज़ोरी आ गई कि बहुधा वह अपने सामने ऊपर की ओर देख नहीं पाता था, जब तक कि वह अपना हाथ ज़ोर से अपने माथे पर न जमाता, और इस प्रकार हाथ के बल से अपना सिर ऊपर न थामे रहता।
4. इसके बाद उसकी बोली पूरी तरह जाती रही, और वह किसी सूअर या भालू से बढ़कर न बोल सकता था। इसलिए उन्हीं में से एक के समान वह गुर्राता और भद्दी आवाज़ निकालता था, जैसे-जैसे वह अप्रसन्न होता, या प्रसन्न होता, या कोई काम करवाना चाहता, इत्यादि।
इसी दशा में वह लगभग आधे वर्ष तक रहा, और इस पूरे समय वह और बातों में भला-चंगा था, और अपना काम-धन्धा कर सकता था, केवल एक बार वह हमारे गिरजे के घंटाघर में टँगे हुए घंटे पर से गिर पड़ा, और यह अचम्भे की बात थी कि उससे वह मरा नहीं: परन्तु उसके बाद भी वह घूमता-फिरता रहा, जब तक कि परमेश्वर ने उसे उसके पाप के कारण अपने दण्ड का पर्याप्त तमाशा न बना दिया, और तब अचानक वह मारा गया और बड़ी दुर्दशा से मर गया: और इस प्रकार उसका और उसके कामों का अन्त हो गया।
मैं आपको एक और के विषय में बताता हूँ। सेंट नीट्स से लगभग चार मील दूर एक भद्र पुरुष का एक नौकर था, और वह भी हठ करके मुखबिर बन बैठा, और वह एक हट्टा-कट्टा जवान था। अच्छा, वह मुखबिर तो था ही, और उसने कुछ लोगों को बहुत सताया, और कुछ लोगों के विरुद्ध अपनी सूचनाएँ इतने प्रभावशाली ढंग से पूरी कर ली थीं
कि अब और कुछ करना बाकी न था, सिवाय इसके कि सिपाही लोगों का माल कुर्क करें, ताकि उसे रुपया या माल मिल जाए; और जैसा मैंने सुना, वह उन्हें ऐसा करने के लिए बहुत जल्दी मचाता था। अब जब वह अपने काम के पूरे जोश में था, तो एक दिन जब वह आग के पास खड़ा था, तो (ऐसा जान पड़ता है कि) उसका मन कड़ाही के रस में डुबोया हुआ रोटी का एक टुकड़ा खाने को हुआ (क्योंकि उस समय सीख़ आग पर चढ़ी थी), सो वह अपने लिए एक टुकड़ा तैयार करने गया; परन्तु देखो, एक कुत्ते ने (कुछ कहते हैं, उसी का अपना कुत्ता था) किसी बात पर चिढ़कर अपने मालिक की टाँग में काट लिया; और वह काटा हुआ घाव, उसे चंगा करने के लिए किए गए सब उपायों के होते हुए भी, (जैसा कहा गया) सड़कर गैंग्रीन बन गया; जो भी हो, वही घाव उसकी मृत्यु का कारण हुआ, और मृत्यु भी भयानक: क्योंकि मुझे यह बात बतानेवाले ने कहा, कि इस काटने के कारण (जो आरम्भ था) वह ऐसी दशा में पड़ा रहा कि संसार से जाने से पहले ही उसका माँस सड़-सड़कर उसके शरीर से गिर गया।
परन्तु मुझे अलग-अलग व्यक्तियों के उदाहरण देने की क्या आवश्यकता है, जब इस प्रकार के लोगों के विरुद्ध परमेश्वर का दण्ड, मैं समझता हूँ कि कह सकता हूँ, यदि इंग्लैंड की सब काउंटियों में नहीं, तो उनमें से अधिकांश में प्रकट हुआ, जहाँ-जहाँ ऐसे अभागे प्राणी थे। परन्तु यदि परमेश्वर की इच्छा होती, तो मैं चाहता कि न मैं और न कोई और आपको ऐसी और कहानियाँ सुना सकता: सच्ची कहानियाँ, जो न तो
सावधान. अच्छा, मैंने भी स्वयं इन दोनों के विषय में सुना है, और इनके अतिरिक्त और भी कई के विषय में, जो अपनी तरह में इन्हीं के समान उल्लेखनीय हैं, यदि मैं उन्हें सुनाना चाहूँ: परन्तु जो बचे हैं उन्हें हम दूसरों पर, या मसीह के आगमन पर छोड़ दें, जो तब उनके कामों की योग्यता के अनुसार उन्हें धर्मी ठहराएगा या दोषी ठहराएगा; या यदि उन्होंने पश्चाताप किया, और दया पाई, तो यह जानकर मुझे आनन्द होगा, क्योंकि मैं अपने शत्रु के प्राण के लिए भी शाप नहीं चाहता।
बुद्धिमान. ऐसी कहानियाँ सुनाने में कोई आनन्द नहीं हो सकता, यद्यपि उन्हें सुनने से हमारा भला हो सकता है: वे हमें स्मरण दिला सकती हैं कि परमेश्वर है जो पृथ्वी पर न्याय करता है, और जो दीन-दरिद्र की दोहाई को न तो सदा भूलता है और न उसे सुनने में देर करता है; वे अपने साथ ऐसे लोगों के बाद जीवित बचे रहनेवालों के लिए चेतावनी और सम्मति दोनों लेकर आती हैं। आइए, हम परमेश्वर के दण्डों से काँपें, और उसके विरुद्ध पाप करने से डरें, और यही हमारी रक्षा होगी। जो परमेश्वर से डरते हैं और उसको अपने सम्मुख जानकर भय से चलते हैं, उनका भला ही होगा।
सावधान. अच्छा महोदय, जैसा आपने संकेत किया है, मैं भी सोचता हूँ कि इस स्थान पर हम इस प्रकार के मनुष्यों के विषय में पर्याप्त कह चुके; यदि आपकी इच्छा हो, तो आइए, फिर से स्वयं श्रीमान दुर्जन की ओर लौटें, यदि आपको उसके विषय में और कुछ कहना हो।
बुद्धिमान. और! जो कुछ हमने कहा है, उसमें से किसी बात को भी हमने अभी ठीक से आरम्भ ही नहीं किया। सब बातें अपने आप में बुराई से इतनी भरी हुई हैं कि हमने उनके विषय में सचमुच कुछ कहा हो, इसके बजाय केवल उनमें झाँका भर है: परन्तु हम उन्हें छोड़कर आगे बढ़ेंगे। आपने उसकी जवानी के पापों के विषय में, उसकी शागिर्दी के विषय में सुना है, और यह कि उसने कैसे अपना कारोबार जमाया, और विवाह किया, और अपनी पत्नी को कैसा जीवन
224 जीने पर विवश किया; और अब मैं आपको उसकी कुछ और करतूतें बताऊँगा। उसमें धूर्तता का पूरा हुनर था; जैसा मैंने पहले कहा, यदि उसे इन सब बातों की शागिर्दी करने के लिए बाँध भी दिया गया होता, तो भी वह इससे अधिक चालाक न हो सकता था, इससे अधिक निपुण न हो सकता था।
224 श्रीमान दुर्जन के विषय में नई बातचीत।
सावधान. और शायद इतनी निपुणता से भी नहीं। क्योंकि जैसे भलाई को स्वयं परमेश्वर के समान कोई नहीं सिखा सकता, वैसे ही पाप और धूर्तता के विषय में, शैतान के समान कोई मनुष्य को नहीं सिखा सकता, जिसकी पाठशाला में, जैसा मैं देखता हूँ, श्रीमान दुर्जन अपने बचपन से लेकर अपने जीवन के अन्त तक पढ़ने जाता रहा। परन्तु कृपा करके
महोदय, आरम्भ कीजिए।
बुद्धिमान. अच्छा, मैं करता हूँ। आपको स्मरण होगा कि मैंने आपको बताया था कि विवाह से पहले रुपये के मामले में उसकी क्या दशा थी, और कैसे उसने एक धनी पत्नी पाई, जिसके रुपये से उसने अपने
225 कर्ज़ चुकाए: अब जब उसने अपने कर्ज़ चुका दिए, और उसके पास कुछ रुपया बच रहा, तो वह फिर से पहले की तरह ही फुर्ती से अपना कारोबार जमाता है, एक बड़ी दुकान रखता है, बड़ा व्यापार चलाता है, और फिर बहुत अधिक कर्ज़ में डूब जाता है; परन्तु अब एक-दो लोगों का नहीं, बल्कि बहुतों का कर्ज़दार हो जाता है, यहाँ तक कि अन्त में वह कई हज़ार का कर्ज़दार हो गया; और इस प्रकार वह काफ़ी समय तक चलता रहा। और अपने उद्देश्यों को और अच्छी तरह पूरा करने के लिए, अब वह सब मनुष्यों को प्रसन्न करने का, और हर प्रकार की संगति के अनुसार अपने आप को ढालने का अभ्यास करने लगा; अब वह जैसे वे थे वैसा ही बन सकता था, जो वे कहते वही कह सकता था, अर्थात् यदि वह चाहता; और वह तब चाहता, जब वह देखता कि ऐसा करने से वह उन्हें या तो अपना ग्राहक बना सकता है, या अपने माल के लिए अपना लेनदार बना सकता है। यदि उसका लेन-देन ईमानदार लोगों से होता (और कुछ ईमानदार लोगों से उसका लेन-देन था भी), तो वह उन्हीं के जैसा बन जाता; उन्हीं के जैसी बातें करता, उन्हीं के समान संयमी दिखाई देता, उन्हीं के समान न्याय और धर्म की बातें करता, और उन्हीं के समान लम्पटता के विरुद्ध बोलता; हाँ, और वह उन लोगों के प्रति अरुचि दिखाने का भी दिखावा करता जो ईमानदारी के विपरीत कुछ कहते, करते, या होते थे।
फिर, जब वह बुरे लोगों के बीच जा पड़ता, तो वह उन्हीं के जैसा बन जाता, परन्तु तब भी अधिक छिपकर और सावधानी से, जब तक कि उसे अपनी संगति का पक्का भरोसा न हो जाता: तब वह खुलकर वैसा ही व्यवहार करता, उन्हीं के जैसा बन जाता; उन्हीं के समान कहता, सत्यानाश हो उनका, डूब मरें वे। यदि वे भले लोगों की निन्दा करते, तो वह भी कर
226 सकता था; यदि वे धर्म की निन्दा करते, तो वह भी कर सकता था: यदि वे पशुओं जैसी, व्यर्थ, निकम्मी बातें करते, तो वह भी करता; यदि वे पियक्कड़ी, कसम खाने, वेश्यागमन, या ऐसे ही किसी दुष्कर्म के पक्ष में होते, तो वह भी होता। अब यही वह मार्ग था जिस पर वह चलता था, और वह यह सब किसी भी जीवित मनुष्य के समान निपुणता से कर सकता था। और अब वह अपने आप को एक सिद्ध मनुष्य समझता था, वह सोचता था कि अब तक तो वह निरा बालक ही था। अब आप श्रीमान दुर्जन के विषय में क्या सोचते हैं?
सावधान. सोचूँ! अरे, मैं सोचता हूँ कि वह नास्तिक था: क्योंकि नास्तिक के सिवाय कोई मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता। मैं कहता हूँ, ऐसा हो ही नहीं सकता कि जो मनुष्य इस श्रीमान दुर्जन के जैसा हो, वह पक्का और सड़ा हुआ नास्तिक न हो; क्योंकि जो यह विश्वास करता है कि परमेश्वर या शैतान, स्वर्ग या नरक, या मृत्यु, और उसके बाद न्याय है, वह वैसा नहीं कर सकता जैसा श्रीमान दुर्जन ने किया; मेरा अभिप्राय है, यदि वह ये काम बिना हिचकिचाहट और विवेक की रोक-टोक के कर सकता था; हाँ, यदि उसे ऐसे घिनौने पापों के लिए दुःख और पछतावा नहीं होता था।
बुद्धिमान. नहीं, इन बातों के लिए विवेक की हिचकिचाहट और पछतावे से वह इतना दूर था, कि वह उन्हें अपनी उपलब्धियों की श्रेष्ठता, अपनी बुद्धि का सार, अपने दुर्लभ और अनोखे गुण समझता था, ऐसे गुण जिनमें उसके सिवाय बहुत थोड़े लोग निपुण हो सकते थे।
इसलिए, जहाँ तक उन लोगों की बात है जो बातों पर हिचकते और ठिठक जाते थे, और जो विवेक के कारण, 225 श्रीमान दुर्जन एक नई करतूत करता है।
226 श्रीमान दुर्जन की सिद्धता।
और मृत्यु और न्याय के भय से, उसके जैसे काम नहीं कर सकते थे; उन्हें वह मूर्ख और बुद्धू कहता, और उन पर यह दोष लगाता कि वे अनदेखे हौवों की बातों से डर गए हैं; और यदि वे सचमुच मर्द बनना चाहते, तो वह उन्हें अपनी इस उत्कृष्ट 227 कला को प्राप्त करने का परिश्रम करने के लिए उकसाता। वह बहुधा यह सोच-सोचकर अपने आप को प्रसन्न करता कि इस विषय में वह क्या-क्या कर सकता है, और मन ही मन कहता; मैं धार्मिक भी हो सकता हूँ और अधार्मिक भी, मैं कुछ भी हो सकता हूँ, या कुछ भी नहीं; मैं कसम खा सकता हूँ, और कसम खाने के विरुद्ध बोल भी सकता हूँ; मैं झूठ बोल सकता हूँ, और झूठ बोलने के विरुद्ध बोल भी सकता हूँ; मैं पी सकता हूँ, स्त्रियों के पीछे भटक सकता हूँ, अशुद्ध हो सकता हूँ, और छल कर सकता हूँ, और इसके लिए मुझे कोई व्याकुलता नहीं होती: अब मैं अपने आप का आनन्द लेता हूँ, और अपनी चाल-चलन का स्वामी मैं हूँ, वह मेरी स्वामी नहीं। यह मैंने बहुत अध्ययन, बड़ी सावधानी, और उससे भी अधिक परिश्रम से प्राप्त किया है। परन्तु उसकी यह बातचीत केवल अपने आप से होती, या अपनी पत्नी से, जिसके विषय में वह जानता था कि वह इसे प्रकट करने का साहस नहीं करेगी; या अपने घनिष्ठ साथियों के बीच, जिनसे वह जानता था कि वह कुछ भी कह सकता है।
सावधान. क्या मैंने पहले उसे नास्तिक कहा था? अब तो मैं उसे एक शैतान कह सकता हूँ, या ऐसा मनुष्य जिसमें एक दुष्टात्मा समाई हो, यदि बहुत-सी नहीं। मैं सोचता हूँ कि हर कोने में ऐसा कोई नहीं मिल सकता। यह सच है कि राजा आहाज के विषय में कहा गया है कि वह और भी अधिक पाप करता गया; और अहाब के विषय में कि उसने दुष्टता करने के लिए अपने आप को बेच डाला; और सदोम के लोगों के विषय में कि वे बड़े पापी थे
बुद्धिमान. वह नास्तिक था, इसमें कोई सन्देह नहीं, यदि संसार में नास्तिक नाम की कोई वस्तु है; परन्तु अपनी दुष्टता में सिद्धता और निश्चिन्तता की उसकी सारी डींगों के होते हुए भी, मेरा विश्वास है कि परमेश्वर कभी-कभी स्वर्ग से उसके विवेक में आग उतार देता था। यह सच है, मेरा विश्वास है कि वह उसे शीघ्र ही फिर बुझा देता, और उसके बाद और भी अधिक हठी और दुष्ट हो जाता, परन्तु यह भी उसके विनाश 229 का कारण बना, जैसा आप आगे सुनेंगे।
परन्तु मैं आपकी इस राय से सहमत नहीं कि संसार में ऐसे लोग थोड़े ही हैं; जब तक कि आपका अभिप्राय उस दुष्टता की मात्रा से न हो जिस तक वह पहुँच गया था। क्योंकि अन्यथा, निःसन्देह,
230 उसके जैसे बहुत-से लोग हैं: उसी मन के, उन्हीं सिद्धान्तों के, और उन्हें व्यवहार में लाने के लिए उसी विवेक के मनुष्य। हाँ, मेरा विश्वास है कि बहुत-से लोग दुष्टता की उसी ऊँचाई तक पहुँचने का प्रयत्न कर रहे हैं; और व्यवस्था के न्याय में वे सब उसी के समान हैं; और वहाँ तक पहुँचने के लिए नारकीय बुद्धि की उनकी कमी न्याय के दिन उन्हें निर्दोष नहीं ठहराएगी। आप जानते हैं कि हर विद्या में कुछ लोग दूसरों से अधिक प्रवीण होते हैं; और दुष्टता की कला में भी, और उसके व्यवहार में भी ऐसा ही है: कुछ लोग दूसरों से दुगुने, और कुछ सातगुने अधिक नरक की सन्तान हैं (और फिर भी सब के सब नरक की सन्तान हैं), नहीं तो दुष्टता की पाठशाला में सब के सब गुरु होते, और कोई शिष्य न होता। परन्तु गुरु भी होने चाहिए, और सीखनेवाले भी; श्रीमान दुर्जन इस कला में गुरु था, और इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि उस भेद में वह एक प्रवीण और मुख्य गुरु रहा होगा।
227 श्रीमान दुर्जन अपने आप का आनन्द कैसे लेने लगा।
228 2 इतिहास 28:22; 1 राजाओं 21:25; उत्पत्ति 13:13।
230 श्रीमान दुर्जन के जैसे बहुत-से लोग हैं।
सावधान. आप ठीक कहते हैं, क्योंकि मैं देखता हूँ कि कुछ लोग, यद्यपि वे चाहते हैं, फिर भी उसके व्यवहार में दूसरों के समान प्रवीण नहीं हो पाते, बल्कि बाकियों की तुलना में (जैसा मैं समझता हूँ, लोग उन्हें कहते हैं) मूर्ख और मन्दबुद्धि होते हैं; उनके सिर और उनकी क्षमताएँ इतनी दुष्टता से काम करने और चलने में उनका साथ नहीं देतीं।
परन्तु श्रीमान दुर्जन में अपनी दुष्टता की युक्ति रचने के लिए दुष्ट दिमाग़ की भी कमी न थी, और उसे कर डालने के लिए दुष्ट हृदय की भी नहीं।
बुद्धिमान. सच है, परन्तु फिर भी मैं कहता हूँ, ऐसे मनुष्यों का न्याय के दिन केवल इस बात के लिए न्याय नहीं होगा कि वे क्या हैं, बल्कि इस बात के लिए भी कि वे क्या बनना चाहते थे। क्योंकि यदि मूर्खता का विचार भी पाप है,
231 तो निःसन्देह मूर्खता की अभिलाषा उससे बड़ा पाप है: और यदि अभिलाषा बड़ा पाप है, तो उसके लिए 232 प्रयत्न करना तो अवश्य ही और भी बड़ा पाप होगा। तो जो मनुष्य कुशल नास्तिक और अपराधी नहीं है, फिर भी यदि वह ऐसा बनना चाहता है, यदि वह ऐसा बनने का प्रयत्न करता है, तो वैसे ही मनुष्य के रूप में उसका न्याय होगा और वह नरक का दण्ड पाएगा। क्योंकि व्यवस्था, जैसा मैंने कहा, मनुष्यों का न्याय इस बात के अनुसार करती है कि वे क्या बनना चाहते हैं। जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्टि डाले, वह अपने मन में
233 उससे व्यभिचार कर चुका। इसी नियम से, जो चोरी करना चाहता है, वह चोरी करता है; जो छल करना चाहता है, वह छल करता है; जो कसम खाना चाहता है, वह कसम खाता है; और जो व्यभिचार करना चाहता है, वह व्यभिचार करता है। क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों का न्याय उनके मन की क्रिया के अनुसार करता है, और कहता है; जैसा वह अपने मन में विचार करता है, वैसा वह आप है। अर्थात्, वह अपने हृदय में, अपने इरादों में, अपनी अभिलाषाओं में, अपने प्रयत्नों में वैसा ही है; और मैं कहता हूँ, परमेश्वर की व्यवस्था अभिलाषाओं, इरादों और प्रयत्नों को वैसे ही पकड़ती है, जैसे 234 वह स्वयं दुष्टता के काम को पकड़ती है। तो जो मनुष्य श्रीमान
दुर्जन के समान बुरा बनना चाहता है (और बहुत-से लोगों के हृदय में ऐसा दुष्ट बनने की अभिलाषा है), यद्यपि वह दुष्टता में उसके जितनी निपुणता कभी प्राप्त नहीं करता, फिर भी उसका न्याय उसी के जैसे बुरे मनुष्य के रूप में होगा, क्योंकि
उसकी अभिलाषा ऐसा ही दुष्ट बनने की थी।
सावधान. परन्तु श्रीमान दुर्जन की दुष्टता की यह ऊँचाई अब भी मेरे मन से नहीं निकलती। हृदय की यह कठोर, हताश, या मैं इसे क्या कहूँ, शैतानी दशा, उसमें सब बुरे कामों और करतूतों की नींव, उनका आधार थी।
बुद्धिमान. हृदय, और उसकी भयंकर दुष्टता ही सब की नींव और आधार है। नास्तिकता, चाहे मुँह से मानी हुई हो या व्यवहार में, दोनों हृदय से ही उपजती हैं, हाँ, और इनके अतिरिक्त हर प्रकार की 235 बुराइयाँ भी। क्योंकि बुरे काम किसी मनुष्य को बुरा नहीं बनाते, बल्कि जो बुरे काम करता है, वह पहले से ही बुरा
236 मनुष्य है। दुष्टता करने से पहले मनुष्य को दुष्ट होना पड़ता है।
दुष्टता दुष्टों से होती है। बुरा पेड़ ही बुरा फल लाता है, लोग झाड़ियों से अंगूर नहीं तोड़ते; इसलिए मनुष्य के बुराई करने से पहले उसका हृदय बुरा होना चाहिए, और मनुष्य के भलाई करने से पहले उसका हृदय भला होना चाहिए।
232 जो बुरा बनना चाहता है, वह बुरा है।
234 नीतिवचन 23:7; मत्ती 5; रोमियों 7:7।
235 बुरा हृदय बुरा मनुष्य बनाता है।
236 1 शमूएल 24:13; मत्ती 7:16, 17, 18।
सावधान. अब मैं समझता हूँ कि श्रीमान दुर्जन इतना नीच क्यों था कि उसने कपट करके पत्नी पाई, और उसे पाने के बाद एक दुष्ट के समान उसके साथ दुर्व्यवहार किया; इसका कारण यह था कि दुष्ट हृदय के द्वारा वह पहले से ही दुष्टता करने के लिए तैयार था।
बुद्धिमान. आप इसका निश्चय जानिए; क्योंकि भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से, बुरी बुरी चिन्ता, परस्त्रीगमन, व्यभिचार, हत्या, चोरी, लोभ, दुष्टता, छल,
लुचपन, कुदृष्टि, निन्दा, अभिमान, और मूर्खता निकलती हैं। ये सब बातें 237 भीतर ही से निकलती हैं और मनुष्य को अशुद्ध करती हैं। और मनुष्य, जैसा उसका बुरा मन उसे झुकाता है, इनका, या इनमें से किसी का, उपयोग अपनी वासना को तृप्त करने, अपनी युक्तियों को आगे बढ़ाने, अपने द्वेष का बदला लेने, धनी बनने, या इस जीवन के मूर्खतापूर्ण सुख-विलासों और मनोरंजनों में लोटने के लिए करता है: और ये सब काम श्रीमान दुर्जन ने किए, हाँ, पूरी सीमा तक, जहाँ कहीं अवसर, या थैली, या विश्वासघात उसके उद्देश्य की प्राप्ति में उसकी सहायता कर सकते थे।
सावधान. थैली! अरे, उसके पास तो लगभग जो कुछ वह चाहता उसे करने के लिए थैली होनी ही थी, क्योंकि उसने इतने अधिक धनवाली पत्नी से विवाह किया था।
बुद्धिमान. वहीं ठहरिए; श्रीमान दुर्जन के कुछ पाप महँगे थे, जैसे उसका पीना, और वेश्यागमन, और दूसरी बुरी संगति रखना; यद्यपि वह ऐसा मनुष्य था जिसके पास रुपया कमाने के भी बहुत अधिक तरीके थे, और उसे उड़ाने के भी बहुत अधिक तरीके।
सावधान. तो क्या इतना बुरा मनुष्य होते हुए भी उसका व्यापार इतना अच्छा था? या क्या उसका धन्धा उसके लिए इतना लाभदायक था कि उसकी थैली का पेट सदा भरा रहता, यद्यपि वह स्वयं बहुत खर्चीला था?
बुद्धिमान. नहीं: यह उसके व्यापार के कारण नहीं था, यद्यपि उसका व्यापार भी अच्छा-खासा था। उसके पास रुपया पाने का एक और तरीका था, और वह भी एक बार में टोपियाँ भर-भरकर और जेबें भर-भरकर।
सावधान. क्यों, मैं समझता हूँ वह कोई राहज़न डाकू तो नहीं था, था क्या?
बुद्धिमान. इस विषय में मैं अपनी बातों में संयम रखूँगा, यद्यपि कुछ लोग ऐसे बुदबुदाते रहे हैं मानो वह कभी-कभी रात को घोड़े पर सवार होकर बाहर निकल जाता था, किस काम से, यह उसके सिवाय कोई नहीं जानता था, और अगली सुबह कीचड़ से सना और थका-माँदा घर लौटता था। परन्तु जिस बात की ओर मेरा संकेत है वह यह नहीं है।
सावधान. कृपया मुझे वह बताइए, यदि आप उचित समझते हैं कि मैं उसे जानूँ।
238 बुद्धिमान. मैं आपको बताता हूँ: वह यह था, उसके पास दिवाला निकालने की, और दिवाला निकालकर टोपियाँ भर-भरकर रुपया पाने की कला थी।
सावधान. परन्तु श्रीमान दुर्जन के दिवाला निकालने से आपका क्या अभिप्राय है? आप पहेली में बोल रहे हैं, है न?
बुद्धिमान. नहीं, नहीं, मैं साफ़-साफ़ बोल रहा हूँ। या, यदि आप इसे और भी सरल भाषा में सुनना चाहें, तो बात यह है: जब श्रीमान दुर्जन ने अपनी पत्नी के दहेज का अधिकांश भाग अकड़बाज़ी और वेश्यागमन में उड़ा दिया, तो उसे लगने लगा कि जीवन के इस ढर्रे में वह बहुत दिनों तक अपने पाँवों पर खड़ा नहीं रह सकेगा, और संसार में अपना
व्यापार और अपनी साख (जैसी भी वह थी) बनाए न रख सकेगा; सिवाय दिवाला निकालने की इस नई युक्ति के द्वारा।
239 इसलिए, एक समय वह अचानक बड़े ज़ोर से कई लोगों के कर्ज़ में कूद पड़ता है, 237 मरकुस 7:20, 21, 22, 23।
238 श्रीमान दुर्जन के पास दिवाला निकालने की, और इस रीति से रुपया पाने की कला थी।
239 अपने दिवाले की तैयारी में उसने बातों का प्रबन्ध कैसे किया।
लगभग चार या पाँच हज़ार पाउंड के मूल्य तक, और उसी समय बहुत बड़ा व्यापार चलाता है, बहुत-सी चीज़ें अपनी लागत से कम दाम पर बेचता है, ताकि ग्राहक बनाए, और इस प्रकार अपने
लेनदारों की आँखों में धूल झोंके। इसलिए उसके लेनदारों ने यह देखकर कि उसका कारोबार बड़ा है, और यह सपना देखकर कि अन्त में यह उनके लिए अवश्य बहुत लाभदायक सिद्ध होगा, बिना किसी सन्देह के खुलकर उस पर भरोसा किया, और दूसरों ने भी ऐसा ही किया, उस मूल्य तक जिसका उल्लेख ऊपर हुआ। अच्छा, जब श्रीमान
दुर्जन ने दूसरों के माल और रुपये से अपना घोंसला अच्छी तरह भर लिया, तो थोड़े समय बाद 240 उसका दिवाला निकल जाता है। और शीघ्र ही चारों ओर यह चर्चा फैल जाती है कि श्रीमान दुर्जन ने दुकान बन्द कर दी है, चला गया है, और अब व्यापार नहीं कर सकता। अब, जब तक उसके दिवाले की बात उसके लेनदारों के कानों तक पहुँची, तब तक उसने चतुराई और धूर्तता से अपनी सम्पत्ति को ऐसा सुरक्षित कर लिया था कि उसके लेनदार एक पैसा भी न छू सके। अच्छा, जब वह यह कर चुका, तो वह अपने
लेनदारों को अपनी शोक भरी, मिश्री में घुली चिट्ठियाँ भेजता है, ताकि उन्हें समझा दे कि उस पर क्या बीती है, और उनसे विनती करता है कि वे उसके साथ 241 कठोरता न करें; क्योंकि वह सब मनुष्यों के प्रति ईमानदार मन रखता है, और जहाँ तक
242 उससे हो सकेगा, चुकाएगा। अब वह अपनी चिट्ठियाँ अपने साथ मिले हुए एक मनुष्य के हाथ भेजता है, जो श्रीमान दुर्जन के मामले को सबसे बुरा भी और सबसे अच्छा भी बना सकता था: श्रीमान दुर्जन के लिए सबसे अच्छा, और उसके लेनदारों के लिए सबसे बुरा। सो जब वह उनके पास आता है, तो वह उनके लिए भी दुःख प्रकट करता है, और श्रीमान दुर्जन की दशा पर भी शोक जताता है: उनसे कहता है कि यदि मामले को शीघ्र किसी निष्कर्ष पर न पहुँचाया गया, तो श्रीमान
दुर्जन उन्हें कुछ भी न चुका सकेगा, परन्तु इस समय वह चुका भी सकता है, और चुकाएगा भी, और वह भी अपनी पूरी शक्ति भर: और इसी लिए उसने चाहा कि वे उसके पास आएँ। अच्छा, उसके लेनदार उसके लिए एक समय ठहराते हैं, और आते हैं; और वह, इसी बीच, किसी दूसरे को उनसे बातचीत करने का अधिकार देता है, परन्तु स्वयं दिखाई नहीं देता, सिवाय रविवार के दिन के, कहीं ऐसा न हो कि वे गिरफ़्तारी का परवाना लेकर उसे धर दबोचें। सो उसका ठहराया हुआ मित्र श्रीमान दुर्जन के साथ उनके मामले के विषय में उनसे बातचीत करता है; पहले उन्हें बताता है कि जो कुछ श्रीमान दुर्जन पर उनका और सब मनुष्यों का देना था, उसके लिए जहाँ तक उससे हो सका, उन्हें सन्तुष्ट करने की उसने कितनी चिन्ता की, और कुछ समय पहले तक उसने कितना कम सोचा था कि वह इस गिरी हुई दशा में पहुँच जाएगा। उसने उसके भारी खर्चों, करों के भारीपन, समय की खराबी, और उन बड़ी हानियों की भी दुहाई दी जो उसे अपने बहुत-से ग्राहकों से उठानी पड़ीं, जिनमें से कुछ उसके कर्ज़दार रहते हुए ही मर गए, कुछ भाग गए, और जो बहुत-से जीवित थे उनसे भी उसे एक फ़ार्दिंग पाने की आशा न थी। फिर भी वह अपने आप को ईमानदार मनुष्य दिखाएगा, और जहाँ तक उससे हो सकेगा चुकाएगा; और यदि वे समझौते के लिए तैयार हों, तो वह उनसे समझौता कर लेगा (क्योंकि वह उन सब को पूरा चुकाने में असमर्थ था)। 243 लेनदारों ने पूछा कि वह क्या देगा? उत्तर मिला, हर पाउंड पर आधा क्राउन। इस पर वे भड़क उठे, और वह फिर से अपनी शिकायत और विनती दोहराने लगा; परन्तु लेनदार सुनने को तैयार न थे, और इस प्रकार उस समय उनकी सभा बिना सफलता के भंग हो गई। परन्तु जब उसके लेनदारों का खून ठण्डा हुआ, और उन्होंने दोबारा सोच-विचार किया, और डरने लगे कि कहीं देरी के कारण
241 श्रीमान दुर्जन के अपने लेनदारों से मीठे-मीठे शब्द।
243 श्रीमान दुर्जन अपने लेनदारों के सामने क्या प्रस्ताव रखता है।
उनका सब कुछ न डूब जाए, तो वे दूसरी बार बातचीत के लिए तैयार हुए, फिर इकट्ठे हुए, और बहुत-सी बातों और 244 बड़ी खींचतान के बाद, उन्होंने हर पाउंड पर पाँच शिलिंग प्राप्त किए। सो रुपया सामने लाया गया, रिहाई-पत्र और बेबाकी-पत्र लिखे गए, उन पर हस्ताक्षर हुए, और मुहर लगाई गई, बही-खातों में हिसाब काट दिए गए, और सब बातें पक्की कर दी गईं; और तब श्रीमान दुर्जन फिर से अपना सिर दरवाज़े से बाहर निकाल सकता है, और जब उसने दुकान बन्द की थी उससे कई हज़ार पाउंड अधिक धनी मनुष्य बन जाता है।
सावधान. और क्या उसने सचमुच ऐसा किया?
बुद्धिमान. हाँ, एक बार, और फिर दोबारा। मेरे विचार में उसने दो या तीन बार दिवाला निकाला।
सावधान. और क्या उसने आवश्यकता पड़ने से पहले ही ऐसा किया?
बुद्धिमान. आवश्यकता! आवश्यकता से आपका क्या अभिप्राय है? किसी मनुष्य के लिए धूर्त 245 बनने की कभी कोई आवश्यकता नहीं होती। उसने यह दुष्ट मन से किया, अपने लेनदारों को ठगने और धोखा देने के लिए: उसके पास अपने पिता से, और अपनी पत्नी के द्वारा भी, इतना था कि वह एक ईमानदार मनुष्य के समान, उचित परिश्रम के साथ, उस पर जीवन बिता सकता था। जब उसने यह दुष्ट दिवाला निकाला, तब भी (यद्यपि वह बहुत फ़िज़ूलखर्च और उड़ाऊ रहा था) उसके पास इतना था कि वह अपने लेनदारों का उनका अपना धन एक-एक फ़ार्दिंग तक चुका सकता था। परन्तु यदि वह ऐसा करता, तो वह अपने जैसा, श्रीमान दुर्जन के जैसा काम न करता; मैं कहता हूँ, यदि वह एक ईमानदार मनुष्य के समान व्यवहार करता, तो वह श्रीमान दुर्जन के मार्ग से बाहर चला जाता। इसलिए उसने यह बेईमान मन से, और एक दुष्ट उद्देश्य से किया; अर्थात् इसलिए कि उसके पास, चाहे कितनी ही अनुचित रीति से पाया गया हो, इतना हो कि वह अपने प्यालों और वेश्याओं के पीछे लगा रहे, और अपनी वासनाओं की पूरी झोंक में जीवन बिताए, ठीक जैसे वह पहले करता था।
सावधान. अरे, यह तो निरी ठगी थी।
बुद्धिमान. सचमुच यह ठगी ही थी। दिवाला निकालने का यह तरीका और कुछ नहीं, केवल चोरी करने का, जेब काटने का, दुकानों में सेंध लगाने का, और मनुष्यों से वह ले लेने का, जिस पर अपना कोई अधिकार नहीं, एक अधिक सफ़ाईदार तरीका है। परन्तु यद्यपि यह सहज दिखाई देता है, इसे सीखना कठिन है; कोई भी मनुष्य जिसके मन में परमेश्वर या मनुष्य के प्रति विवेक है, इस नारकीय कला में कभी उस्ताद नहीं बन सकता।
सावधान. ओह! महोदयो! यह कैसा दुष्ट मनुष्य था?
बुद्धिमान. सचमुच दुष्ट मनुष्य। इस कला के द्वारा वह जानता था कि लोगों से अपना माल उसकी दुकान पर कैसे भिजवाए, और फिर उन्हें उस वस्तु के बदले एक पेनी लेने पर भी प्रसन्न कर दे, जिसके लिए उसने उसके वहाँ पहुँचने से पहले एक ग्रोट देने की प्रतिज्ञा की थी: मैं कहता हूँ, वह उन्हें एक पाउंड के माल के बदले एक क्राउन लेने पर प्रसन्न कर सकता था, और जिस वस्तु के लिए उसने पहले उन्हें चार हज़ार पाउंड देने की प्रतिज्ञा की थी, उसके बदले एक हज़ार लेने पर।
सावधान. इससे प्रकट होता है कि श्रीमान दुर्जन में विवेक बहुत थोड़ा था।
बुद्धिमान. इससे प्रकट होता था कि श्रीमान दुर्जन में विवेक बिलकुल न था; क्योंकि विवेक, भले विवेक की छोटी-सी चिंगारी भी इसे सह नहीं सकती।
सावधान. श्रीमान दुर्जन के मामलों में और आगे बढ़ने से पहले, मैं आपसे विनती करता हूँ कि यदि आपकी इच्छा हो, तो 246 मुझे इन दो प्रश्नों का उत्तर दीजिए।
244 अन्त में वे सहमत हो जाते हैं, और श्रीमान दुर्जन दिवाला निकालकर लाभ उठाता है।
245 उसकी बेईमानी के लिए कोई बहाना नहीं।
246 दो प्रश्नों का उत्तर।
1. श्रीमान दुर्जन के इस काम जैसे व्यवहार के विरुद्ध आप परमेश्वर के वचन में क्या पाते हैं? 2. जो मनुष्य अपने लेनदार का कर्ज़दार है, और न तो उसे वह चुका सकता है जो उसका उस पर देना है, और न आगे व्यापार चला सकता है, उससे आप क्या करवाना चाहेंगे?
बुद्धिमान. मुझसे जितना अच्छा हो सके, मैं आपको उत्तर दूँगा। और पहले आपके पहले प्रश्न का। अर्थात्, श्रीमान दुर्जन के इस काम जैसे व्यवहार के विरुद्ध मैं परमेश्वर के वचन में क्या पाता हूँ।
उत्तर. परमेश्वर का वचन इस दुष्टता को मना करता है; और इसे हमारी आँखों में और भी घृणित ठहराने के लिए, वह इसे चोरी और लूट के साथ जोड़ता है: परमेश्वर कहता है, तू अपने पड़ोसी को
248 न ठगना, और न उसे लूट लेना। न ठगना, अर्थात् धोखा न देना या छल न करना। अब इस प्रकार दिवाला निकालना ठगना, धोखा देना और छल करना है; जिसे, जैसा आप देखते हैं, स्वर्ग के परमेश्वर ने मना किया है: तू अपने पड़ोसी को न ठगना, और न उसे लूट लेना। इस प्रकार ठगना और छल करना एक प्रकार की चोरी और लूट
249 है। यह चालाकी से उसकी दुकान लूटना, और उसकी जेब काटना है: एक ऐसी बात जो बुद्धि और विवेक को घृणित लगती है, और स्वभाव के नियम के विरुद्ध है। यह जान-बूझकर रची गई दुष्टता है, और इसलिए दुगुना पाप है। कोई मनुष्य यह बड़ी दुष्टता अचानक, और शैतान के किसी प्रचण्ड आक्रमण में नहीं कर सकता। जो यह पाप करेगा, उसे सोच-विचार करने के लिए समय चाहिए, ताकि वह युक्ति से इसे सशक्त बनाए, और वह भी झूठों और बड़े-बड़े कपटों के साथ। जो यह दुष्टता करता है, उसे पहले इसे अपने बिछौने पर सेना पड़ता है, इसके लिए अपना सिर खपाना पड़ता है, और अपनी युक्ति पक्की बाँधनी पड़ती है: सो ऐसी दुष्टता को पूरा करने के लिए, उसके साथ बहुत-से पाप जोड़ने पड़ते हैं, और वे भी, जब तक वह पूरी न हो जाए, हाथ में हाथ डाले चलते हैं।
250 251 परन्तु पवित्रशास्त्र क्या कहता है? कि किसी बात में कोई अपने भाई के साथ सीमा न लाँघे, और न उसे ठगे, क्योंकि प्रभु इन सब बातों का पलटा लेनेवाला है। परन्तु इस प्रकार का दिवाला निकालना अपने भाई के साथ सीमा लाँघना है; यह उसे चारों ओर से घेरना है ताकि मैं उसे अपने जाल में फँसा लूँ; और जैसा मैंने कहा, यह अपने भाई को लूटने और उसकी जेब काटने की कला है, और वह भी उसकी सहमति से। यह बात इसलिए अपराध को हल्का नहीं करती, बल्कि उसे और भी बड़ा और घृणित बना देती है।
क्योंकि जो लोग इस प्रकार चालाकी से ठगे जाते हैं वे अपनी सहायता नहीं कर सकते, वे छल के जाल में फँस जाते हैं। परन्तु परमेश्वर यहाँ स्वयं इस मामले को अपने हाथ में लेगा, वह पलटा लेनेवाला होगा, वह ऐसे सब लोगों का पलटा लेनेवाला होगा, चाहे यहाँ चाहे दूसरे लोक में।
252 और प्रेरित फिर से इसकी गवाही देता है, जहाँ वह कहता है; परन्तु जो अन्याय करता है, वह अपने किए हुए 253 अन्याय का फल पाएगा; और वहाँ किसी का पक्षपात नहीं। अर्थात्, कोई भी मनुष्य, चाहे वह कोई भी हो, यदि वह इस पाप का, अर्थात् सीमा लाँघने का, अपने भाई को छलने
249 इस पाप की घोर भयंकरता।
253 फिर से स्पष्ट चेतावनी।
का, और उसके साथ अन्याय करने का दोषी होगा, तो परमेश्वर उससे इसका लेखा लेगा, और इसके लिए उसे पलटा भी चुकाएगा; क्योंकि वहाँ किसी का पक्षपात नहीं।
मैं यह भी जोड़ सकता हूँ, कि अपने पड़ोसी के साथ अन्याय करने, सीमा लाँघने, और उसे ठगने का यह पाप, 254 उस पहली करतूत के समान है जो शैतान ने हमारे पहले माता-पिता के साथ की थी (जैसे वह वेदी जो ऊरिय्याह ने आहाज के लिए बनाई, दमिश्क में खड़ी वेदी की बनावट से ली गई थी, ताकि ठीक उसी का नमूना हो)। हव्वा कहती है, सर्प ने मुझे बहका दिया; श्रीमान दुर्जन अपने लेनदारों को बहकाता है।
सर्प ने लाभ की झूठी प्रतिज्ञाओं से हव्वा को बहकाया; और श्रीमान दुर्जन ने भी अपने लेनदारों को ऐसे ही बहकाया। जब सर्प ने हव्वा को बहकाया, तो उसने कहा कुछ और, और उसका अभिप्राय कुछ और था; और ऐसा ही
श्रीमान दुर्जन ने किया जब उसने अपने लेनदारों को बहकाया।
इसलिए जो मनुष्य इस प्रकार अपने पड़ोसी को धोखा देता और बहकाता है, वह शैतान का अनुकरण करता है; वह अपने उदाहरण उससे लेता है, न कि परमेश्वर से, वचन से, या भले मनुष्यों से: और श्रीमान दुर्जन ने यही किया।
और अब आपके दूसरे प्रश्न पर: अर्थात्, जो मनुष्य अपने 255 लेनदार का कर्ज़दार है, और न तो उसे चुका सकता है, और न आगे व्यापार चला सकता है, उससे मैं क्या करवाना चाहूँगा?
उत्तर. सबसे पहले। यदि उसकी यह दशा है, और वह इसे जानता है, तो वह अपने लेनदार का एक पेनी भी और कर्ज़ न चढ़ाए। क्योंकि यह अच्छे विवेक के साथ नहीं किया जा सकता। जो जानता है कि वह चुका नहीं सकता, और फिर भी कर्ज़ लेता जाता है, वह जान-बूझकर अपने पड़ोसी के साथ अन्याय करता और उसे ठगता है, और परमेश्वर के वचन के इस वाक्य के अधीन आ जाता है, दुष्ट ऋण लेता है, और भरता नहीं। हाँ, इससे भी बुरा, वह ठीक उसी समय ऋण लेता है जब वह जानता है कि वह उसे लौटा नहीं सकता। वह चालाकी से वह भी छीन लेता है जो उसके पड़ोसी का है। इसलिए ऐसे लोगों के सामने मैं पहली बात यह रखूँगा: वह अपने लेनदार का और कर्ज़ न चढ़ाए।
257 दूसरे, इसके बाद, वह विचार करे कि वह किस प्रकार, और किन कारणों से ऐसी दशा में पहुँचा कि अपने उचित कर्ज़ न चुका सका। अर्थात्, क्या यह उसके अपने धन्धे में उसकी ढिलाई के कारण हुआ, भोजन या वस्त्र में बहुत ऊँचे ठाट से रहने के कारण, जो उसका अपना नहीं था उसे बहुत खुले हाथ से उधार देकर अपनी हानि करने के कारण; या फिर परमेश्वर के सीधे हाथ और दण्ड के कारण।
यदि खोज करके वह पाता है कि यह उस पर उसके धन्धे में ढिलाई, अपने परिवार में फ़िज़ूलखर्ची, या ऐसी ही किसी बात के कारण आया है; तो वह अपने पाप और दुष्टता का बोध पाने के लिए परिश्रम करे,
258 क्योंकि उसने प्रभु के विरुद्ध पाप किया है: पहले, व्यापार में आलसी होकर, और अपने माथे के पसीने से, या अन्य ईमानदार तरीकों से, अपनी कमाई में से, अपने
259 घराने के लोगों के लिए प्रबन्ध न करके। और दूसरे, परिवार में भोजन और वस्त्र पर अंधाधुंध खर्च करके, या दूसरों को 254 जो जान-बूझकर यह पाप करता है वह शैतान के समान है।
256 जिनका दिवाला निकल गया है, उन्हें अपने विवेक से कैसे निपटना चाहिए।
वह उधार देकर जो उसका अपना नहीं था। यह अच्छे विवेक के साथ नहीं किया जा सकता: यह बुद्धि और स्वभाव दोनों के विरुद्ध है, और इसलिए अवश्य ही परमेश्वर के विरुद्ध पाप है। इसलिए मैं कहता हूँ, यदि इस कर्ज़दार ने ऐसा किया है, और यदि वह कभी भी अपने विवेक में शान्ति से, और भविष्य में अपनी दशा में सुख से जीना चाहता है, तो वह परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन करे, और अपनी इस
260 दुष्टता से पश्चाताप करे। क्योंकि जो काम में आलस करता है, वह बड़े बिगाड़नेवाले का भाई ठहरता है।
आलसी भी होना और बिगाड़नेवाला भी होना, मानो दुगुना पापी होना है।
परन्तु फिर, जैसे इस मनुष्य को इन बातों की छानबीन करनी चाहिए, वैसे ही इस बात की भी। मैं लेन-देन के इस तरीके में कैसे आया, जिसमें अब मैं असफल हो गया हूँ? क्या यह वह तरीका है जिसमें मेरे माता-पिता ने मुझे पाला-पोसा, जिसमें उन्होंने मुझे शागिर्द बनाकर रखा, या जिसमें परमेश्वर के प्रबन्ध से मैं पहले-पहल डाला गया? या यह ऐसा तरीका है जिसमें मैंने अपने आप को घुसा लिया, क्योंकि मैं अपने उस पहले भाग से सन्तुष्ट न था, जिसमें 261 परमेश्वर और मेरे माता-पिता ने मुझे डाला था? इस पर भली-भाँति विचार करना चाहिए। और यदि खोज करने पर, कोई मनुष्य यह पाए कि वह उस स्थान और धन्धे से बाहर है जिसमें उसे उसके
माता-पिता ने, या परमेश्वर के प्रबन्ध ने रखा था, और एक नए मार्ग में असफल हुआ है, जिसे उसने घमण्ड और अपनी पहली दशा से अरुचि के कारण अपनाना अधिक पसन्द किया; तो उसकी असफलता उसका पाप है, उसके घमण्ड का फल है, और अपनी पहली दशा को छोड़ने के कारण उस पर परमेश्वर के दण्ड का चिह्न है।
और इसके लिए, पहली बात के समान ही, उसे प्रभु के सामने दीन और पश्चातापी होना चाहिए।
262 परन्तु यदि खोज करके वह पाता है कि उसकी दरिद्रता इनमें से किसी भी कारण से नहीं आई; यदि ईमानदारी से खोज करके वह ऐसा ही पाता है, और अच्छे विवेक से कह सकता है, मैं अपने उस स्थान और दशा से बाहर नहीं गया जिसमें परमेश्वर ने अपने प्रबन्ध से मुझे रखा था; बल्कि जिस बुलाहट में मैं बुलाया
गया था, उसी में परमेश्वर के साथ बना रहा हूँ, और कड़ा परिश्रम किया है, और रूखा-सूखा खाया है, सादे पर शिष्ट वस्त्र पहने हैं, और न सीधे और न टेढ़े ढंग से अपने लेनदारों का माल उड़ाया है: तो उसका पतन परमेश्वर के सीधे हाथ के द्वारा उस पर आया है, चाहे दिखाई देनेवाले तरीकों से या न दिखाई देनेवाले। क्योंकि कभी-कभी यह दिखाई देनेवाले तरीकों से आता है, अर्थात् आग से, चोरों से, पशुओं की हानि से, या पापी व्यापारियों की दुष्टता से, इत्यादि। और कभी-कभी न दिखाई देनेवाले साधनों से, और तब कोई नहीं जानता कि कैसे; हम केवल यह देखते हैं कि चीज़ें जा रही हैं, परन्तु यह नहीं देख सकते कि वे किस मार्ग से जाती हैं। अच्छा, अब मान लीजिए कि कोई मनुष्य परमेश्वर के सीधे हाथ के द्वारा रोटी के एक टुकड़े तक आ पहुँचा है, तो अब उसे क्या करना चाहिए?
263 264 265 मैं उत्तर देता हूँ: उसके लिए सबसे सुरक्षित मार्ग यह है कि वह फिर भी यही सोचे कि यह किसी पाप का फल है, चाहे शायद अपने धन्धे के प्रबन्ध में किया हुआ पाप न हो, फिर भी कोई और पाप। परमेश्वर दुष्टों की सम्पत्ति को दूर फेंक देता है। इसलिए वह फिर भी अपने परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन करे, क्योंकि उसका हाथ उस पर है, और कहे, यह कौन-सा पाप है, जिसके कारण परमेश्वर का यह हाथ मुझ पर है? और 260 नीतिवचन 18:9।
261 फिर से अच्छी सम्मति।
262 यह कैसे जानें कि आपकी गिरावट परमेश्वर के दण्ड से आई, या आपकी अपनी भूल से।
263 एक और प्रश्न।
264 नीतिवचन 10:3; 1 पतरस 5:6।
वह उसे खोज निकालने में परिश्रम करे, क्योंकि इस दण्ड का कारण कोई न कोई पाप है; क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों को अपने मन से न तो दबाता है और न दुःख देता है। या तो हृदय संसार पर बहुत अधिक लगा है, या आपके परिवार में धर्म की बहुत उपेक्षा होती है, या कोई और बात है। घास में कोई साँप छिपा है, रेंड़ के पेड़ में कोई कीड़ा है; आपकी छाती में कोई पाप है, जिसके कारण परमेश्वर आपके साथ ऐसा व्यवहार करता है।
तीसरे, यह करने के बाद, वह मनुष्य फिर अपने मन में इस प्रकार विचार करे: शायद परमेश्वर अब संसार में मेरी दशा और स्थिति को बदल रहा है; उसने मुझे ठाट-बाट में, भरपूरी में, और सांसारिक वैभव की बहुतायत में रहने दिया, और मैंने, जैसा मुझे करना चाहिए था, उसकी महिमा के लिए उसके
266 उस भले प्रबन्ध का सदुपयोग नहीं किया। परन्तु जब मैं भरी और हरी-भरी चराई में रहता था, तब मैंने वहाँ लात उठाई: इसलिए अब वह मुझे रूखी-सूखी चराई में हाँक देगा, ताकि मैं अपने शेष दिन दुबलेपन, और भूख, और हीनता, और अभाव में बिताऊँ। परन्तु वह यह बिना कुड़कुड़ाए और बिना शिकायत किए करे; वह इसे भक्तिपूर्ण रीति से करे, और परमेश्वर के 267 दण्ड के अधीन अपने आप को सौंप दे। धनवान अपनी नीच दशा पर आनन्द करे।
जो परमेश्वर के इस हाथ के नीचे हैं, उनके लिए यह कर्तव्य है, और हो सकता है कि यह सौभाग्य भी हो। और इस कठिन काम में आपके प्रोत्साहन के लिए (क्योंकि यह कठिन काम है), इन चार बातों पर विचार कीजिए।
1. यह परमेश्वर के हाथ के नीचे ठीक रीति से झुक जाना है, और परमेश्वर के ठहराए समय में ऊँचा उठाए जाने का मार्ग है: जब परमेश्वर चाहता था कि अय्यूब घूरे को गले लगाए, तो उसने उसे गले लगाया, और कहा, यहोवा ने दिया,
269 और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।
2. विचार कीजिए, कि दीन दशा के साथ भी आशीषें जुड़ी होती हैं, जितना सारा संसार जानता है उससे कहीं अधिक। दरिद्र दशा के साथ पाप से रोकनेवाली दया जुड़ी होती है। दरिद्र लोग, दरिद्र होने के कारण, परमेश्वर के विरुद्ध वैसे पाप करने में समर्थ नहीं होते जैसे धनी मनुष्य करता है।
3. दरिद्र मनुष्य अपने आप को परमेश्वर के प्रबन्ध के द्वारा सुरक्षित रखा जाता हुआ उतनी स्पष्टता से देख सकता है जितना 270 धनी नहीं देख सकता, क्योंकि वह अपने धन की बहुतायत पर भरोसा रखता है।
4. हो सकता है कि परमेश्वर ने आपको इसलिए दरिद्र बनाया है, क्योंकि वह आपको धनी बनाना चाहता है। हे मेरे प्रिय भाइयो, सुनो; क्या परमेश्वर ने इस जगत के कंगालों को नहीं चुना कि विश्वास में धनी, और उस 271 राज्य के अधिकारी हों, जिसकी प्रतिज्ञा उसने उनसे की है जो उससे प्रेम रखते हैं?
मुझे निश्चय है, कि जिन मनुष्यों पर परमेश्वर का यह हाथ है, यदि वे इस प्रकार शान्ति से झुक जाएँ, और उसके नीचे अपने आप को दीन करें, तो वे इसमें अपने साथ अधिक शान्ति, हाँ, परमेश्वर की अधिक आशीष पाएँगे, जितना अधिकांश मनुष्य जानते हैं। परन्तु यह एक कठिन अध्याय है, और 266 फिर से अच्छी सलाह। व्यवस्थाविवरण 32:15।
268 चार बातों पर विचार कीजिए।
269 अय्यूब 1:21; अध्याय 2:8।
इसलिये मैं यह आशा नहीं रखता कि बहुत से लोग इसे प्रसन्नता से पढ़ेंगे, या मेरी सलाह मानना चाहेंगे।
इस प्रकार दिवाला निकाले हुए मनुष्य से उसके अपने विषय में बात करके, अब मैं उससे इस सम्बन्ध में बात करूँगा कि उसका अपने लेनदारों से क्या नाता है।
272 तो इसके बाद वह अपने लेनदारों के साथ व्यवहार करने का सबसे ईमानदार मार्ग अपनाए, और मेरी समझ में वह मार्ग यह होना चाहिए।
पहला, वह समय रहते उन्हें अपनी दशा से परिचित करा दे, और उनके साथ ये तीन काम भी करे।
1. जो अन्याय उसने उनके साथ किया है, उसके लिये वह सच्चे मन से और बिना कपट के उनसे क्षमा माँगे।
2. जो कुछ संसार में उसके पास है, वह सब का सब, पूरा का पूरा उनके सामने रख दे; कुछ भी न छिपाए, उनके लिये अपने पहनने के कपड़ों तक अपने आप को खाली कर दे; एक अँगूठी, एक चम्मच, या कोई भी वस्तु उनसे बचाकर न रखे।
3. यदि इन दोनों में से कोई भी बात उन्हें सन्तुष्ट न करे, तो वह अपना शरीर उनके हाथ में सौंप दे कि वे जैसा चाहें करें, अर्थात या तो जब तक उनकी इच्छा हो तब तक वह बन्दीगृह में पड़ा रहे, या उनकी सेवा में रहे, जब तक कि वह परिश्रम और कष्ट उठाकर उनकी इतनी भरपाई न कर दे जितनी वे उचित रीति से ठीक समझें, (केवल अपने परिश्रम में से अपने गरीब और दुखी परिवार के भरण-पोषण के लिये कुछ बचा रखे, क्योंकि बुद्धि, विवेक और स्वभाव के अनुसार उनकी देखभाल करना भी उसका कर्तव्य है:) इस प्रकार उसने उनकी सम्पत्ति को उड़ाकर और खर्च करके जो अन्याय उनके साथ किया है, उसकी जितनी भरपाई वह कर सकता है, करेगा।
ऐसा करने से वह परमेश्वर की छड़ी के अधीन हो जाता है, और अपने आप को उसके विधान के हाथ में सौंप देता है; हाँ, ऐसा करने से वह अपनी वर्तमान और भविष्य की दशा की चिट्ठी 273अपने लेनदारों की गोद में डाल देता है, और उसका सारा निपटारा प्रभु पर छोड़ देता है, कि जैसा वह उनके मनों को ठहराए और झुकाए वैसा ही वे उसके साथ करें। और चाहे वह यह हो कि वे उसे क्षमा कर दें; या जो कुछ उसके पास है उसे भरपाई के रूप में ले लें; या व्यवस्था के अनुसार इस रीति या उस रीति से उसके शरीर को क्लेश में डालें; मैं कहता हूँ, यदि वह इस प्रकार सारा निपटारा परमेश्वर पर छोड़ सके, तो परिणाम चाहे जो हो, उस मनुष्य के मन में बाद में शान्ति रहेगी। और उस दशा की शान्तियाँ,
(जो ऐसी शान्तियाँ होंगी जो न्याय, खराई और कर्तव्य के साथ चलती हैं,) उसके लिये उन शान्तियों से कहीं बढ़कर होंगी जो अन्याय,
धोखाधड़ी और छल के फल हैं, क्योंकि वे भक्ति के कहीं अधिक अनुकूल हैं। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर को इस बात के लिये प्रेरित करने का यही मार्ग है कि वह उसके लेनदारों के निर्णय के द्वारा उस पर कृपा करे; (क्योंकि वह उनसे विनती कर सकता है कि वे उसके साथ भलाई से व्यवहार करें,) और जब उसके चालचलन उसकी दृष्टि में भाते हैं तब वह ऐसा करेगा भी: जब किसी मनुष्य का चालचलन प्रभु को भाता है, तब उसके शत्रु भी उससे 274मेल रखेंगे; और निश्चय ही, जो अन्याय किए गए हैं उनकी भरपाई करने का यत्न करना, 272 लेनदारों के साथ ईमानदार व्यवहार।
274 यिर्मयाह 15:10, 11। नीतिवचन 16:7।
अपनी पूरी सामर्थ भर, अपने अस्तित्व, अपनी सम्पत्ति, और इस संसार में जो कुछ वह भोगता है उस सब के द्वारा, यही सबसे अच्छा मार्ग है, उस दशा में और उस बात के सम्बन्ध में, जिसमें कोई मनुष्य इस समय लगा हुआ पाया जा सकता है।
परन्तु जो इसके विपरीत करता है, वह अपने पाप में बना रहता है, परमेश्वर के विधान के द्वारा ठहराए जाने से इन्कार करता है, और ऊँची दशा को चुनता है, चाहे वह परमेश्वर के मार्ग से प्राप्त न हुई हो; जबकि परमेश्वर की इच्छा यह है कि वह नीची दशा में उतर आए: हाँ, वह हठ करके अपने मन में और अपने कामों से कहता है, मैं आप ही अपना चुननेवाला बनूँगा, और वह भी अपने ही ढंग से, चाहे उसका जो भी परिणाम हो या उसके बाद जो भी हो।
सावधान. मेरी समझ में आपने ठीक कहा है। परन्तु मान लीजिए कि श्रीमान दुर्जन यहाँ होता, तो क्या वह आपकी कही बात पर यह आपत्ति न करता, कि जाकर यह पाठ अपने उन भाइयों को सिखाइए जो
धर्म का अंगीकार करनेवाले हैं, क्योंकि जैसे मैं, वैसे ही वे भी दिवाला निकालने के दोषी हैं; हाँ, मैं तो यह भी सोचता हूँ, कि उसी दिवाले के दोषी हैं जिसे आप मेरा धूर्त दिवाला कहते हैं; अर्थात दिवाला निकालने की आवश्यकता पड़ने से पहले ही 275दिवाला निकाल देना। परन्तु यदि ऐसा न भी हो, तौभी वे अपने काम-धन्धे में लापरवाही के दोषी हैं, और खाने-पीने तथा पहनावे दोनों में उससे ऊँचा जीवन जीने के दोषी हैं जितना उनका व्यापार या आमदनी सँभाल सकती है। इसके अतिरिक्त, वे दिवाला निकालते हैं, यह सारा संसार भली-भाँति जानता है, और समझौते के लिये गिड़गिड़ाने की कला उनके पास है, यह लोगों को भली-भाँति मालूम है; और यह कि वे प्रायः अपने कपड़े-लत्ते, अपने चाँदी के बर्तन, अपने
गहने, और (ऐसा समझा जाता है कि कभी-कभी इनके अतिरिक्त रुपया और माल भी) छिपा लेते हैं, यह बात उतनी ही आम है जितना एक पैसे के चार अण्डे। और इस प्रकार वे लोगों को छलते हैं, अपने विवेक को भ्रष्ट करते हैं, अपने अंगीकार के विरुद्ध पाप करते हैं, और डर है कि इन सब बातों में अपनी अभिलाषाओं को, और उनकी पूर्ति को, अपना लक्ष्य बना लेते हैं।
मैं कहता हूँ, यदि श्रीमान दुर्जन यहाँ होता और आपके सामने यह आपत्ति रखता, तो आपका उत्तर क्या होता?
बुद्धिमान. क्या! मैं तो यही कहता, कि मुझे आशा है कि कोई भला मनुष्य, कोई शुद्ध विवेकवाला मनुष्य, कोई ऐसा मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता हो, धर्म की प्रतिष्ठा का, परमेश्वर के लोगों की शान्ति का, या अपने प्राण के उद्धार का ध्यान रखता हो, ऐसा नहीं करेगा।
धर्म का अंगीकार करनेवाले ऐसे लोग शायद हों, और पृथ्वी पर इसे कौन रोक सकता है? निकम्मे टट्टू 276हर रंग के होते हैं। यदि लोग अंगीकार करें, और अपने अंगीकार को अपने पड़ोसियों की सम्पत्ति ठगने के लिये आड़ का घोड़ा बना लें, जैसा स्वयं श्रीमान दुर्जन ने किया, जब उसने उस स्त्री को छला जो अब दुःख के साथ उसकी पत्नी है, तो इसे कौन रोक सकता है? पुराने समय की कलीसियाएँ भी ऐसे लोगों से परेशान थीं, इसलिये यदि ये भयानक और कठिन समय भी ऐसे हों तो कोई अचम्भा नहीं। परन्तु देखिए प्रेरित इसे किन शब्दों में कहता है: वरन तुम अन्याय करते और हानि पहुँचाते हो, और वह भी भाइयों को: क्या तुम नहीं जानते, कि अन्यायी लोग परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे? धोखा न खाओ, न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्चे, न पुरुषगामी, न चोर, न लोभी, न पियक्कड़, न गाली देनेवाले, न अन्धेर करनेवाले परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे।
इनमें से कोई भी इस दशा में उद्धार न पाएगा, और जब उनका ऐसा होना प्रगट हो जाएगा, तब उनका अंगीकार उन्हें भक्त लोगों की निन्दा से भी न बचाएगा। परन्तु उनके अंगीकार को हम रोक नहीं सकते: यदि लोग अपने आप को पवित्र जन, भक्त
275 धर्म पर एक भारी कलंक।
276 यदि धूर्त लोग अंगीकार को नीचता का लबादा बना लें, तो इसे कौन रोक सकता है?
277 1 कुरिन्थियों 6:8, 9, 10। 2 तीमुथियुस 3:1, 2, 3, 4, 5।
जन, उत्साही जन, आत्म-त्यागी जन, या ऐसी ही कोई और महिमामय उपाधि दें, तो हम इसे कैसे रोक सकते हैं? और जब वे अपने आप को इस प्रकार कहलाते हों, और साथ ही हर बुराई, पाप और कल्पनीय दुष्टता के लिये सबसे बड़े बदमाश हों, तो इसे कौन रोक सकता है? यह सच है कि वे धर्म के लिये कलंक हैं, सच्चे मनवालों के लिये शोक हैं, संसार के लिये ठोकर का कारण हैं, और निर्बलों के लिये ठोकर का पत्थर हैं, और ये ठोकरें आई हैं, आती हैं, और आएँगी, चाहे सारा संसार कुछ भी करे; परन्तु हाय उन पर जिनके द्वारा वे
278आती हैं; इसलिये सब सच्चे मसीही ऐसे अंगीकार करनेवालों को अपना मानने से इन्कार करें, और उन्हें संसार के उन नीच लोगों में गिना जाए जिनसे वे ऐसे कामों के द्वारा सबसे अधिक मिलते-जुलते हैं:
वे श्रीमान दुर्जन के कुटुम्बी हैं।
279 क्योंकि वे धर्म के लिये लज्जा का कारण हैं, मैं कहता हूँ, ये धूर्त, दुकान-लुटेरे, जेबकतरे लोग, धर्म के लिये लज्जा का कारण हैं, और धार्मिक लोगों को उन पर लज्जित होना चाहिए। परमेश्वर ऐसे मनुष्य को संसार के मूर्खों में रखता है, इसलिये मसीही लोग उन्हें उन लोगों में न रखें जो स्वर्ग के लिये बुद्धिमान हैं। जैसे तीतर अण्डों पर बैठता है और उन्हें सेता नहीं, वैसे ही जो अन्याय से धन बटोरता है, वह अपनी आधी आयु में ही उसे छोड़ जाएगा, और अपने अन्त में
280मूर्ख ही ठहरेगा। और जिस मनुष्य की हम चर्चा कर रहे हैं वह इन्हीं में से एक है, और इसलिये उसे इसी दण्ड के द्वारा गिरने की आशा रखनी चाहिए।
धर्म का अंगीकार करनेवाला! और ऐसी दुष्टताएँ करे! ऐसा मनुष्य अब उस नाम को धारण करने के योग्य नहीं। हम ऐसों से वही कह सकते हैं जो भविष्यद्वक्ता ने उनके समान लोगों से कहा था, अर्थात इस्राएल के घराने के बलवाइयों से। जाओ, तुम में से हर एक अपनी अपनी मूरतों की उपासना करे:—यदि तुम परमेश्वर की व्यवस्था और वाचा को नहीं सुनोगे कि उसके अनुसार अपना जीवन बिताओ: परन्तु परमेश्वर के
281पवित्र नाम को अपनी भेंटों और अपनी मूरतों के द्वारा फिर अपवित्र न करना।
जाओ, अंगीकार करनेवालो, जाओ; अंगीकार करना छोड़ दो, जब तक कि तुम अपने अंगीकार के अनुसार जीवन न बिताओ। अंगीकार को पाप, छल, शैतान और नरक के लिये आड़ का घोड़ा बनाने से कहीं अच्छा है कि कभी अंगीकार ही न करो।
धर्म की नींव और उसके नियम ऐसी किसी बात की अनुमति नहीं देते: प्रेरित कहता है, हमें ग्रहण करो, 282हम ने न किसी से अन्याय किया, न किसी को बिगाड़ा, और न किसी को ठगा। इससे यह संकेत मिलता है कि जो लोग किसी के साथ अन्याय करने, किसी को बिगाड़ने या किसी को ठगने के दोषी हैं, उन्हें पवित्र लोगों की संगति में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए, नहीं, उनके साथ भाइयों की साधारण सूची में भी नहीं।
न ही लोग अपनी सारी वाक्पटुता और लच्छेदार बातों से अपने आप को 283स्वर्ग के राज्य के योग्य, या पृथ्वी पर शुद्ध विवेकवाले मनुष्य सिद्ध कर सकते हैं। ओह, शमूएल की वह भक्तिपूर्ण दलील: वह कहता है, देखो, मैं यहाँ हूँ, प्रभु के सामने और उसके
278 मत्ती 18:6, 7, 8।
279 सब भले लोग ऐसों को अपना मानने से इन्कार करें।
281 यहेजकेल 20:38, 39।
अभिषिक्त के सामने मुझ पर साक्षी दो, मैं ने किसका बैल ले लिया, या किसका गदहा ले लिया, या किसको मैं ने ठगा, 284किस पर मैं ने अन्धेर किया, इत्यादि? यह सचमुच शुद्ध विवेकवाले मनुष्य के समान काम करना था। और अपनी इस दुहाई में वह सारी मण्डली के विवेक में ऐसा निर्दोष ठहरा, कि वे एक स्वर से, मानो एक मुँह से, मिलकर यह कहे बिना न रह सके, तू ने न तो
285हमें ठगा, और न हम पर अन्धेर किया।
धर्म का अंगीकार करनेवाला, और ठगे, दूर करो उसे! अंगीकार करनेवाले को प्रेम को छोड़ किसी का कुछ भी कर्जदार नहीं रहना चाहिए। अंगीकार करनेवाले को ऐसी वस्तुओं का प्रबन्ध करना चाहिए जो दूसरों की नहीं, वरन उसकी अपनी हों, उसकी अपनी ईमानदार कमाई की हों, और वह भी न केवल परमेश्वर की दृष्टि में, वरन सब मनुष्यों की दृष्टि में भी; ताकि वह सब बातों में हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर के उपदेश की शोभा बढ़ाए।
286 सावधान. परन्तु मान लीजिए कि परमेश्वर किसी अंगीकार करनेवाले की सम्पत्ति और काम-धन्धे पर फूँक मार दे, और इससे पहले कि उसे पता चले, उसका सब कुछ चुक जाए, तो क्या उसे भी श्रीमान दुर्जन के समान गिना जाए, और उस पर भी वैसी ही निन्दा पड़े जैसी उस पर?
287 बुद्धिमान. नहीं: यदि उसने इससे बचने के लिये कर्तव्य समझकर जो कुछ वह कर सकता था, किया हो। आकाश के नीचे के सबसे कुशल माँझी के सबसे विश्वासयोग्य यत्न के होते हुए भी, जहाज़ का समुद्र में डूब जाना सम्भव है। और मेरी समझ में, उस भविष्यद्वक्ता के साथ भी ऐसा ही हुआ था जिसने अपनी पत्नी को इतने कर्ज़ में छोड़ा कि लेनदारों के द्वारा 288उसके बच्चों के दास बनाए जाने का जोखिम आ पड़ा। वह कोई फिजूलखर्च मनुष्य नहीं था, न ठगी करनेवाला था, क्योंकि पवित्रशास्त्र कहता है कि वह परमेश्वर का भय मानता था; तौभी, जैसा मैंने कहा, वह इतने कर्ज़ में डूब गया था जितना वह चुका नहीं सकती थी।
289 यदि परमेश्वर किसी मनुष्य पर फूँक मारे, तो कौन उसे रोक सकता है? और वह कभी-कभी ऐसा करता भी है, क्योंकि 290वह मनुष्यों के साथ अपने व्यवहार का ढंग बदलना चाहता है, और क्योंकि वह उनके अनुग्रह के वरदानों को परखना चाहता है। हाँ, और इसलिये भी कि वह अपने दण्डों के द्वारा दुष्टों को उलट देना चाहता है; और ये सब बातें अय्यूब में देखी जाती हैं। परन्तु इस बात पर विचार करके मनुष्यों को सावधान रहना चाहिए कि वे ईमानदार रहें, ऐसा न हो कि यह उनके पाप के कारण उन पर आ पड़े: इससे उन्हें यह भी चेतावनी मिलनी चाहिए कि वे संसार में उससे अधिक आगे न बढ़ें जितना कि वे ईमानदारी से, साधारण साधनों के द्वारा, भक्ति के साथ पीछे लौट सकें; क्योंकि जितना भीतर आगे बढ़ोगे, उतना ही बड़ा पतन होगा। इससे उन्हें यह भी सीखना चाहिए कि वे अपने यत्नों पर, अपने ईमानदार और उचित यत्नों पर, परमेश्वर से उसकी आशीष माँगें। और इससे उन्हें अपने पैरों पर ध्यान से नज़र रखने की प्रेरणा मिलनी चाहिए, ताकि यदि चलते-चलते उन्हें बर्फ़ के चटकने की आवाज़ सुनाई दे, तो वे समय रहते फिर से पीछे लौट सकें।
इन बातों पर विचार करके, और उन्हें ठीक-ठीक व्यवहार में लाकर भी, यदि परमेश्वर किसी मनुष्य पर फूँक मारे, तो वह सन्तुष्ट रहे, और अय्यूब के साथ राख के ढेर को गले लगाए; वह सबको उनका हक दे, और 284 1 शमूएल 12:3।
290 परमेश्वर कभी-कभी अपने ही लोगों पर फूँक मारता है। उस समय उन्हें क्या करना चाहिए।
परमेश्वर के विधान से न लड़े, (वरन उसके बलवन्त हाथ के नीचे अपने आप को दीन करे,) जो उसे नंगा और खाली करने आता है: क्योंकि जो इसके विपरीत करता है, वह परमेश्वर से लड़ता है; और प्रगट करता है कि वह पौलुस की इस बात से अनजान है; मैं दीन होना भी जानता हूँ, और बढ़ना भी जानता हूँ; हर जगह और सब बातों में मैं ने तृप्त होना और भूखा रहना भी सीखा है,
291बढ़ना और घटी सहना भी।
सावधान. परन्तु मेरा विश्वास है कि श्रीमान दुर्जन बनावटी बातों और आवश्यकता से आ पड़नेवाली बातों के बीच यह भेद न करता।
बुद्धिमान. यदि वह न करे, तो परमेश्वर करेगा, विवेक करेगा; और केवल तेरा अपना ही नहीं, वरन उन सब के विवेक भी जिन्होंने उसका चालचलन देखा है, और जिन्होंने ऐसे मनुष्य की दशा की सच्चाई को जाना है।
सावधान. अच्छा: इस समय इस विषय को यहीं छोड़ दें, और फिर श्रीमान दुर्जन की ओर लौटें।
बुद्धिमान. मैं पूरे मन से आगे बढ़कर आपको उसके जीवन का वह वृत्तान्त सुनाऊँगा जो अभी बाकी है, ताकि फिर हम उसकी मृत्यु की चर्चा करें।
सावधान. परन्तु कृपया जितना हो सके उतना संक्षेप में कहिए।
बुद्धिमान. क्यों? क्या आप मेरी बातें सुनते-सुनते थक गए हैं?
सावधान. नहीं। परन्तु थोड़े शब्दों में बहुत कुछ सुनना मुझे अच्छा लगता है।
बुद्धिमान. मैं उस कला में निपुण होने का दावा तो नहीं करता, परन्तु फिर भी जितना संक्षेप में हो सके, मैं उसके जीवन का बचा हुआ भाग सुना दूँगा; और फिर मैं उसके कपटपूर्ण व्यवहार से आरम्भ करूँगा (जैसे पहले मैंने लेनदारों के साथ उसका व्यवहार दिखाया, वैसे ही अब) उसके ग्राहकों के साथ, और उनके साथ जिनसे उसका किसी और प्रकार से लेन-देन था।
292 वह छल के बटखरों और नापों से व्यवहार करता था। उसके पास खरीदने के बटखरे अलग थे, और बेचने के बटखरे अलग; खरीदने के नाप अलग थे, और बेचने के नाप अलग: जिनसे वह खरीदता था वे बहुत बड़े थे, जिनसे वह बेचता था वे बहुत छोटे थे।
इसके अतिरिक्त, यदि उसे दूसरों के बटखरों और नापों से काम पड़ता, तो वह हाथ की सफ़ाई नामक चाल चल सकता था, और उसके द्वारा, चाहे वह खरीदता हो या बेचता हो, हाँ, चाहे उसका ग्राहक या व्यापारी सामने देख ही क्यों न रहा हो, उन्हें अपने ही लाभ की ओर मोड़ लेता था।
इसके अलावा, उसके पास लोगों के हिसाब में, चाहे तौल का हो, या नाप का, या पैसे का, गलत गिनती करने की कला भी थी, और वह प्रायः अपने सांसारिक लाभ और उनकी हानि के लिये ऐसा करता था: अब आप श्रीमान दुर्जन के विषय में क्या कहते हैं?
और यदि उसके ईमानदार व्यवहार पर कोई प्रश्न उठता, तो उसके सेवक तैयार रहते थे, जिन्हें उसने अपने मतलब के लिये पाला-पोसा था, जो उसकी बही या उसकी बात की पुष्टि करते और उस पर कसम खा लेते थे: यह था
श्रीमान दुर्जन का चलन; अब आप श्रीमान दुर्जन के विषय में क्या सोचते हैं?
सावधान. सोचूँ! मैं तो इसके सिवा कुछ नहीं सोच सकता कि वह ऐसा मनुष्य था जिसे उसी के हाल पर छोड़ दिया गया था, एक दुष्ट मनुष्य; क्योंकि उसकी दूसरी बातों के समान ये भी दुष्ट बातें थीं; यदि पेड़ को, जैसा कि सचमुच हो सकता है, उसके फलों से परखा जाना चाहिए कि वह क्या है; तो श्रीमान दुर्जन निश्चय ही एक बुरा पेड़ था। परन्तु कृपया, मेरे
292 श्रीमान दुर्जन के कपटपूर्ण व्यवहार का और वर्णन। वह छल के बटखरे और तराजू काम में लाता था।
और अधिक सन्तोष के लिये, अब मुझे परमेश्वर के वचन से उसके इस चलन की बुराई दिखाइए: और पहले उसके झूठे बटखरों और नापों के उपयोग की।
बुद्धिमान. उसकी बुराई! अरे, उसकी बुराई तो हर आँख को दिखाई देती है: अन्यजाति लोग भी, जो बहुत सी बातों में पशुओं और जानवरों के समान जीते हैं, ऐसी दुष्टता से घृणा करते और उसे बुरा मानते हैं।
कोई मनुष्य आते-जाते इन बातों पर केवल एक नज़र डाले, तो वह स्वभाव के प्रकाश से ही उनमें इतना कुछ देख लेगा कि ऐसे नीच चलन से उसे घिन आने लगे; यद्यपि श्रीमान दुर्जन को यह प्रिय था।
सावधान. परन्तु मुझे इसके विरोध में वचन में से कुछ दिखाइए, दिखाएँगे न?
293 बुद्धिमान. मैं प्रसन्नता से दिखाऊँगा। और पहले हम पुराने नियम में देखेंगे: वहाँ परमेश्वर कहता है, तुम न्याय में, और लम्बाई के नाप में, और तौल में, और परिमाण में कुटिलता न करना,
294सच्चा तराजू, धर्म के बटखरे, सच्चा एपा, और सच्चा हीन तुम्हारे पास रहें। यह परमेश्वर की व्यवस्था है, और वह बात है जिसे सब मनुष्यों को देश के कानून के अनुसार भी मानना चाहिए। फिर इसी प्रकार:
295तुम्हारा तराजू सच्चा हो, और तुम्हारा एपा भी सच्चा हो, इत्यादि।
अब आपको व्यवस्था दिखाकर, मैं यह भी दिखाऊँगा कि उससे भटक जाने को परमेश्वर किस दृष्टि से देखता है।
296छल का तराजू अच्छा नहीं; छल का तराजू प्रभु की दृष्टि में घृणित है। कुछ लोगों के बटखरे तो सच्चे होते हैं परन्तु तराजू झूठे, और उन झूठे तराजुओं के बल से, अपने सच्चे बटखरों के द्वारा,
297वे देश के लोगों को धोखा देते हैं: इसलिये परमेश्वर सबसे पहले यह आज्ञा देता है कि तराजू सच्चा बनाया जाए: तेरा तराजू सच्चा हो। नहीं तो वे अपने सच्चे बटखरों के होते हुए भी धोखेबाज़ हो सकते हैं, हाँ, हैं भी।
अब, यह आज्ञा देकर कि लोगों के पास सच्चा तराजू हो, और यह गवाही देकर कि झूठा तराजू प्रभु की दृष्टि में घृणित है, वह बटखरे और नाप की ओर भी बढ़ता है।
298 अपनी थैली में भाँति-भाँति के, अर्थात घटती-बढ़ती बटखरे न रखना; अर्थात एक खरीदने के लिये, और दूसरा बेचने के लिये, जैसे श्रीमान दुर्जन के पास थे। अपने घर में भाँति-भाँति के, अर्थात घटती-बढ़ती नपुए न रखना, (और ये भी श्रीमान दुर्जन के पास थे) परन्तु तेरे बटखरे पूरे और धर्म के हों; तेरे नपुए भी पूरे और धर्म के हों, इसलिये कि जो देश प्रभु तेरा परमेश्वर तुझे देता है उसमें तेरी आयु बहुत हो। क्योंकि ऐसे काम करनेवाले सब, (अर्थात जो झूठे बटखरे और नाप काम में लाते हैं) और कुटिलता करनेवाले सब, प्रभु की दृष्टि में घृणित हैं। अब देखिए कि इस विषय में पवित्रशास्त्र कितना भरपूर भी है और कितना ठीक-ठीक भी। परन्तु शायद यह आपत्ति की जाए कि यह सब पुरानी व्यवस्था है, और इसलिये नये नियम के अधीन हम से इसका कोई सम्बन्ध नहीं। (यह नहीं कि मैं समझता हूँ, पड़ोसी, कि आप ऐसी आपत्ति करेंगे:) अच्छा, इस मूर्खतापूर्ण आपत्ति का हम उत्तर दें। पहला, जो यह आपत्ति करता है, यदि वह
299उन वचनों के अधिकार को उलट देने के लिये ऐसा करता है, तो वह प्रगट करता है कि वह स्वयं सगा चचेरा भाई है 293 लैव्यव्यवस्था 19:35, 36।
294 सच्चे बटखरों और नापों के विषय में।
296 नीतिवचन 20:23; अध्याय 11:1।
297 छल के तराजुओं, बटखरों और नापों की बुराई।
298 व्यवस्थाविवरण 25:13, 14, 15, 16।
299 पुरानी और नई व्यवस्था दोनों सब मनुष्यों को आज्ञा देती हैं कि वे अपने बटखरों और नापों में ईमानदार और खरे रहें।
श्रीमान दुर्जन का: क्योंकि धर्मी मनुष्य उन आज्ञाओं के विषय में आदर से बोलने को तैयार रहता है। इसलिये मुझे सन्देह है कि जो मनुष्य इस प्रकार पवित्रशास्त्र के वचन के विरुद्ध आपत्ति करता है, उसमें विवेक बहुत थोड़ा है, यदि कुछ भला विवेक है भी: परन्तु आइए, हम नये नियम में देखें, और वहाँ हम देखेंगे कि मसीह उसी बात की पुष्टि कैसे करता है: जहाँ वह आज्ञा देता है कि लोग दूसरों को पूरा नाप दें, जिसमें यह भी सम्मिलित है कि वे पूरी तौल दें; और ऐसा करनेवालों को, या जो ऐसा नहीं करते उनको, बताता है, ताकि उन्हें ऐसा करने का प्रोत्साहन मिले; लोग पूरा नाप दबा-दबाकर और हिला-हिलाकर और उभरता हुआ तुम्हारी गोद में डालेंगे; क्योंकि जिस नाप से तुम
300नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा: अर्थात परमेश्वर की ओर से भी और मनुष्य की ओर से भी। क्योंकि जैसे परमेश्वर झूठे मनुष्य से वह भी छीनकर जो उसके पास है, उस पर अपना कोप प्रगट करेगा, वैसे ही वह उस झूठे मनुष्य को अन्धेर करनेवाले के हाथ में सौंप देगा, और अन्धेर करनेवाला उससे वैसे ही झपट लेगा जैसे उसने अपने पड़ोसी से झपटा था; इसलिये पवित्रशास्त्र का एक और वचन कहता है, जब तू विश्वासघात करना छोड़ देगा, तब वे तुझ से विश्वासघात करेंगे। नया नियम भी लोगों के व्यापार पर, हाँ, उनके बटखरों और नापों पर भी दृष्टि रखता है, यह
301इन साधारण उपदेशों से प्रगट है। ठगी न करो; एक दूसरे से झूठ मत बोलो; इस बात में कोई अपने भाई पर दाँव न चलाए, क्योंकि परमेश्वर इन सब बातों का पलटा लेनेवाला है: जो कुछ तुम करो, तन मन से करो, यह समझकर कि प्रभु के लिये करते हो, सब कुछ उसके नाम से, उसकी महिमा के लिये करो; और इसी प्रकार की बातें। ये सब आदेश और आज्ञाएँ मनुष्यों के बीच हमारे जीवन और चालचलन से, हमारे लेन-देन और व्यापार के सम्बन्ध में, सम्बन्ध रखती हैं, और इसलिये वे झूठे, कपटपूर्ण, हाँ, सब भ्रष्ट कामों को मना करती हैं।
इस प्रकार एक-दो शब्दों में आपको यह दिखाकर कि ये बातें बुरी हैं; अब मैं इन्हें काम में लानेवालों को 302कायल करने के लिये आपको यह दिखाऊँगा कि परमेश्वर के कहे अनुसार ये कहाँ पाई जाती हैं।
1. ये भले और भक्त मनुष्य के घर में नहीं पाई जातीं, क्योंकि वह अपने परमेश्वर के समान 303इनसे घृणा करता है; परन्तु ये कुकर्मियों के घर में पाई जाती हैं, जैसा श्रीमान दुर्जन का घर है। भविष्यद्वक्ता कहता है, क्या अब तक दुष्ट के घर में दुष्टता से पाया हुआ धन,
304और छोटा एपा जो घृणित है, पाया जाता है? क्या वे अब तक वहाँ हैं, परमेश्वर के मना करने के होते हुए भी, ऐसे काम करनेवालों के विरुद्ध परमेश्वर के कोप के चिन्हों के होते हुए भी? ओह, जब दुष्ट मनुष्य किसी मीठे, लाभदायक पाप को पकड़ लेता है, तब उसे छोड़ने को वह कितना अनिच्छुक होता है! वे छल को पकड़े रहते हैं, उसे छोड़ने से इन्कार करते हैं।
2. ये छल के बटखरे और नाप दयालु के घर में नहीं पाए जाते, 305परन्तु क्रूर के घर में; उन लोगों के घर में जिन्हें अन्धेर करना प्रिय है। छल का
306तराजू उसके हाथ में है, अन्धेर करना उसे भाता है। वह अन्धेर और क्रूरता में लगा रहता है, 301 हमारे विषय के लिये ठीक बैठनेवाले पवित्रशास्त्र के वचन।
302 झूठे बटखरे और नाप कहाँ पाए जाते हैं।
303 1. कुकर्मियों के पास।
305 2. निर्दयी और अन्धेर करनेवालों के पास।
इसलिये वह अपने काम-धन्धे में ऐसी दुष्ट वस्तुएँ काम में लाता है। हाँ, वह पक्का ठग है, और जैसा पहले श्रीमान दुर्जन के दिवाला निकालने के विषय में संकेत किया गया था, वैसे ही अब मैं उसके इन छल के बटखरों और नापों के उपयोग के विषय में कहता हूँ, कि यह उतना ही बुरा और उतना ही नीच है जितना किसी का बटुआ छीन लेना, या किसी की जेब काटना; क्योंकि यह खुली लूट है, यह मनुष्य से वह छीन लेता है जो उसका अपना है, अर्थात उसके पैसे का मोल।
3. छल के बटखरे और नाप उन लोगों के घर में नहीं पाए जाते जो कंगालों का पेट भरते और उनकी कमर ढाँकते हैं, परन्तु उनके घर में जो वास्तव में उन्हें
307निगल जाना चाहते हैं। यह सुनो, तुम जो दरिद्रों को निगल जाते हो, और देश के कंगालों को मिटा देते हो, और कहते हो, नया चाँद कब बीतेगा कि हम अन्न बेच सकें, और विश्रामदिन कब बीतेगा कि हम गेहूँ के खत्ते खोलें, और एपा को छोटा और शेकेल को भारी कर दें, (अर्थात नाप को छोटा और दाम को भारी कर दें) और छल से तराजू को झूठा बनाएँ, कि हम कंगालों को रुपया देकर, और दरिद्रों को एक जोड़ी जूतियाँ देकर मोल लें, और गेहूँ का निकम्मा अन्न बेचें। 308प्रभु ने याकूब के गौरव की शपथ खाई है, निश्चय मैं उनके किसी काम को कभी न भूलूँगा।
परमेश्वर की दृष्टि में यह ऐसी घृणित और नीच बात है।
4. जो लोग झूठे बटखरे और नाप काम में लाते हैं, उन्हें किसी और नाम से पुकारने के विचार से भी परमेश्वर घृणा करता है, 309सिवाय इसके कि वे अशुद्ध लोग हैं, या ऐसा ही कुछ: क्या मैं उन्हें शुद्ध गिनूँ,
310(वह कहता है) जिनके पास छल के बटखरों की थैली है? कदापि नहीं, वे अशुद्ध लोग हैं, उनके हाथ अशुद्ध हैं, छल की कमाई उनके घरों में है, जो कुछ उनके पास है उसे उन्होंने बुरे लोभ का लालच करके पाया है, और इसलिये उन्हें अशुद्ध लोगों में, संसार के दुष्टों में, गिना ही जाना चाहिए और गिना भी जाएगा।
इस प्रकार आप देखते हैं कि परमेश्वर का वचन इस पाप के विरुद्ध, और इसे करनेवालों के विरुद्ध कितना भरपूर और स्पष्ट है। और इसलिये श्रीमान दुर्जन, इस कारण कि वह इन वस्तुओं के द्वारा इस प्रकार अपने पड़ोसियों को लूटता और ठगता था, ठीक ही इस योग्य नहीं ठहरा कि उसका नाम भक्तों की सूची में, और उनके बीच, हो।
सावधान. परन्तु मुझे निश्चय है कि कुछ लोग इन वस्तुओं के उपयोग को, और इनके द्वारा इस प्रकार छल करने को, इतनी बड़ी बुराई नहीं गिनते।
बुद्धिमान. मनुष्य इसे बुराई गिनें या सद्गुण, इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता; आप पवित्रशास्त्र से देखते हैं कि इस पर परमेश्वर का निर्णय क्या है। श्रीमान दुर्जन इसे बुराई नहीं गिनता था, और न वे गिनते हैं जो अब भी उसके पदचिन्हों पर चल रहे हैं। परन्तु मैं कहता हूँ, मनुष्य बातों को कैसा आँकते हैं इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता, हम परमेश्वर के निर्णय पर दृढ़ रहें। और इसलिये और भी, क्योंकि जब हम स्वयं दूसरों के लिये तौलना और नापना समाप्त कर चुकेंगे, तब परमेश्वर हमको और हमारे कामों को तौलेगा और नापेगा। और जब वह ऐसा करेगा, जैसा वह शीघ्र ही करेगा, तब हाय उस पर जिसके विषय में, और जिसके कामों के विषय में, वह यह कहेगा: तकेल, तू तराजू में तौला गया,
307 3. उनके पास जो कंगालों को निगल जाना चाहते हैं।
308 आमोस 8:4, 5, 6, 7।
309 4. अशुद्ध लोगों के पास।
311और हलका पाया गया। तब परमेश्वर उनके छल की बुराई का बदला उन्हीं के सिर पर डालेगा, जब वह उन्हें युगानुयुग के लिये अपनी उपस्थिति, अपनी कृपा और अपने राज्य से बाहर निकाल देगा।
सावधान. परन्तु यह अचम्भे की बात है कि जब श्रीमान दुर्जन का साधारण चलन ऐसा ही करने का था, तो किसी एक या अधिक व्यक्ति ने उसे पकड़ा नहीं, और उसकी इस दुष्टता के लिये उसे दोष नहीं दिया।
बुद्धिमान. अधिकांश लोगों के सामने तो वह अपनी धूर्तता के साथ साफ़ बच निकलता था। क्योंकि कुछ तो अपने तराजू के द्वारा, अपने झूठे तराजू और सच्चे बटखरे के द्वारा, और कुछ ऊपर से अपनी हाथ की सफ़ाई के द्वारा, वह जिन लोगों से लेन-देन करता था उनमें से अधिकतर को कभी थोड़ा और कभी अधिक छल लेता था: इसके अतिरिक्त, जो लोग यह दुष्ट धन्धा करते हैं, वे या तो ऐसे होते हैं जो धर्म का दिखावा करके लोगों की आँखों में धूल झोंकते हैं, या ऐसे जो धौंस भरी बातों से खरीदार को दबा देते हैं। मुझे मानना पड़ता है कि श्रीमान दुर्जन पहली रीति में, 312अर्थात धर्म के दिखावे के द्वारा ऐसा करने में, इतना चतुर नहीं था; क्योंकि अब उसका वह लबादा घिसने लगा था, (यद्यपि उसके कुछ भाई इस रीति में काफ़ी चतुर हैं, हाँ, और उसकी कुछ बहनें भी, क्योंकि मैंने आपको आरम्भ में बताया था कि उनमें से बहुत से लोग हैं, और उनमें भले दिखनेवाले भी:) परन्तु धौंस जमाने, कसम खाने, और झूठ बोलने की बात हो, तो यदि इन बातों से तौल और नाप पूरा हो सकता, तो श्रीमान दुर्जन के ग्राहकों के लिये इनकी कोई कमी न होती।
सावधान. तो ऐसा लगता है कि वह बटखरे तो सच्चे रखता था, और तराजू झूठा; खैर, यह इससे तो अच्छा था कि दोनों ही झूठे हों।
313 बुद्धिमान. बिल्कुल नहीं। उसके छल की गहराई तो इसी में थी: क्योंकि यदि कभी कोई दोष निकालता, कि उसने उनके साथ कठोरता की है, और उन्हें वस्तुओं की पूरी तौल नहीं मिली; तो वह उत्तर देता: तुमने उन्हें तौलते हुए देखा क्यों नहीं? क्या तुम अपनी ही आँखों पर विश्वास नहीं करोगे: यदि तुम्हें मेरे बटखरों पर सन्देह है, तो कृपया उन्हें जहाँ चाहो ले जाओ, मैं उन्हें सच्चा और ठीक सिद्ध करूँगा। यही बात वह अपने तराजू के पलड़ों के विषय में कहता। इस प्रकार वह अपने तराजू के द्वारा सब की आँखों में धूल झोंक देता था।
सावधान. यह सचमुच बड़ी चतुराई है: परन्तु जैसा आप कहते हैं, इसके साथ आँखों में धूल झोंकने के लिये कुछ किया या कहा भी जाना चाहिए, और मैं देखता हूँ कि यह श्रीमान दुर्जन के पास था।
बुद्धिमान. हाँ। उसके पास आँखों में धूल झोंकने के बहुत से तरीके थे, परन्तु धर्म का दिखावा करके ऐसा करने में वह कभी निपुण न था, (यद्यपि उसने इसी के द्वारा अपनी पत्नी को छला था:) क्योंकि वह, विशेषकर अपने पास रहनेवालों के बीच, इतना अधिक पहचाना हुआ था कि ऐसा न कर सके, यद्यपि वह जितना हो सकता था उतना इसमें भोंडेपन से हाथ-पाँव मारता था। परन्तु कुछ लोग ऐसे हैं जो इस रीति में पक्के दुष्ट हैं; वे देखने में सारा जीवन धार्मिकता से बिताएँगे, और फिर भी इन अत्यन्त भयानक पापों के दोषी होंगे: और फिर भी धर्म अपने आप में इससे कुछ भी बुरा नहीं ठहरता, और न उसके सच्चे अंगीकार करनेवाले। परन्तु जैसा लूथर कहता है, परमेश्वर के नाम से ही सब अनर्थ आरम्भ होता है। क्योंकि कपटियों के पास अपनी बुराइयों को पकाने का इसके सिवा कोई और मार्ग नहीं, कि वे परमेश्वर और धर्म के नाम को
314काम में लाएँ और उसे उनके साथ मिला दें। इस प्रकार वे चूना फिरी हुई भीतें बन जाते हैं; 315 क्योंकि इस सफ़ेदी से, अर्थात धर्म की सफ़ेदी से, उनके कामों की गन्दगी छिप जाती है। इसी प्रकार वे
312 श्रीमान दुर्जन कैसे ठगता था, और अपनी ठगी को कैसे छिपाता था।
313 सच्चे बटखरे और झूठा तराजू, धूर्तता की एक गहरी चाल।
314 श्रीमान ठग की धूर्तता पर पर्दा डालने के लिये धर्म का लबादा।
ऐसी कब्रें भी बन जाते हैं जो दिखाई नहीं देतीं, और जो लोग उन पर से होकर चलते हैं, (अर्थात जिनका उनसे लेन-देन होता है) वे उनसे अनजान रहते हैं, और अपने आप को उनके द्वारा भरमाए जाने देते हैं। हाँ, यदि, जैसा कभी-कभी होता भी है, खरीदार के मन में उस तौल और नाप के विषय में कोई सन्देह उठे जो उसे मिलना चाहिए था, तो वह अपने
व्यापारी के धर्म को स्मरण करके अपनी इन्द्रियों को भी भरमाए जाने देता है, और सचमुच यही सोचता है कि उसका भला व्यापारी नहीं, वरन वह स्वयं भूल में है; क्योंकि उसे सपने में भी यह विचार नहीं आता कि उसका व्यापारी धोखा दे सकता है। परन्तु यदि खरीदार इसे पकड़ ले, और यह प्रगट कर दे कि वह छला गया है; तब उसकी भरपाई करके उसे मना लिया जाएगा, और शायद दोष सेवकों पर डाल दिया जाएगा, इत्यादि; और इस प्रकार मालिक ठग अपने ग्राहक की दृष्टि में एक खरा ईमानदार मनुष्य बना रहेगा, यद्यपि अगली बार वह फिर उसकी जेब काटेगा।
316 कुछ लोग अपनी ठगी के पक्ष में रीति-रिवाज की दुहाई देते हैं, मानो वह उन्हें परमेश्वर के न्यायासन के सामने निर्दोष ठहरा सकता हो: और दूसरे कहते हैं, यह उन्हें इतने में ही मिला था, इसलिये दूसरे को भी इसे इतने में ही लेना होगा, चाहे तौल और नाप दोनों में कमी हो: परन्तु इन सब बातों में
317चालबाज़ियाँ होती हैं; या यदि न भी हों, तो ऐसों को जानना चाहिए कि जो पूरी रीति से ठीक है, वही उन्हें करना है। मान लीजिए कि मैं स्वयं पीतल के एक नकली आधे-क्राउन से ठगा गया, तो क्या इस कारण मुझे उससे किसी दूसरे को ठगना चाहिए? यदि यह पूरे में बुरा है, तो इसके अंशों में भी बुरा है। इसलिये तेरी खरीद में तेरे साथ चाहे जैसा भी व्यवहार किया गया हो, तौभी तुझे बेचने में न्याय से व्यवहार करना होगा, नहीं तो तू अपने ही प्राण के विरुद्ध पाप करता है, और श्रीमान दुर्जन के समान बन गया है। और जान ले कि रीति-रिवाज का बहाना कुछ भी मोल का नहीं। परमेश्वर के न्यायासन के सामने रीति-रिवाज नहीं, वरन शुद्ध विवेक ही काम आएगा।
सावधान. परन्तु मुझे निश्चय है कि जो कुछ लोग इस रीति से कमाते हैं, उससे उनका भला बहुत ही थोड़ा होता है।
बुद्धिमान. इस विषय में मैं आपसे सहमत हूँ, परन्तु जो लोग ऐसे मन के हैं वे इस पर विचार नहीं करते। क्योंकि यदि वे इसे पा सकें, चाहे अपनी कमाई के द्वारा, जैसा कि हम कहते हैं, शैतान और सब कुछ ही क्यों न पाएँ, तौभी वे सन्तुष्ट रहते हैं, और अपनी कमाई को बहुत समझते हैं।
थोड़ा भला! क्यों, क्या आप समझते हैं कि वे इस पर विचार करते हैं? नहीं: उतना भी नहीं जितना वे इस पर विचार करते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के दिन, न्याय में, जो कुछ उन्होंने कमाया है उसे अन्याय से
318कमाने के कारण वे क्या करेंगे, और वह ठीक कुछ भी नहीं है।
परन्तु मैं आपको और सीधा उत्तर देता हूँ। इस प्रकार की कमाई उनका थोड़ा भला करने से इतनी दूर है, कि वह उनका कुछ भी भला नहीं करती; क्योंकि इसके द्वारा वे अपने ही प्राण खो देते हैं; यदि मनुष्य
319सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा? तो जो इस ढंग से कमाता है, वह खोता है, वह बहुत बड़ी हानि उठाता है। यही वह मनुष्य है जो पैसे में सयाना और रुपये में मूर्ख है; यही वह है जो आधे पैसे के तारकोल के लिये अपनी अच्छी भेड़ खो देता है; जो संसार की थोड़ी सी वस्तु के लिये एक प्राण खो देता है। और तब इसके द्वारा उसे हानि और नुकसान के सिवा और क्या मिलता है?
320 इस प्रकार वह आनेवाले संसार के विषय में कमाता है, या यूँ कहें कि खोता है: परन्तु इस 316 कुछ लोग ठगी के लिये रीति-रिवाज की दुहाई देते हैं।
318 जो छलते और ठगते हैं उन्हें कुछ नहीं मिलता।
320 नीतिवचन 10:3। यिर्मयाह 15:13; अध्याय 17:3।
संसार में उसे परिश्रम और दुःख, मन के कुढ़ने, और निराशा के सिवा और क्या मिलता है? लोग कमाने में धन्यता का लक्ष्य रखते हैं, मेरा अर्थ है, सांसारिक धन्यता का; परन्तु जो मनुष्य इस प्रकार कमाता है, वह उसे न पाएगा। क्योंकि यद्यपि इस रीति से कोई भाग आरम्भ में उतावली से मिल जाए, तौभी अन्त में उस पर आशीष न होगी। वे उसे बटोरते तो हैं, और उसे रख छोड़ने की भी सोचते हैं, परन्तु सुलैमान क्या कहता है? परमेश्वर उसे फेंक देता है। धर्मी को प्रभु भूखा मरने नहीं देता, परन्तु दुष्टों की सम्पत्ति को वह फेंक देता है।
जैसा मैंने कहा, जितने समय तक वे उसे भोगते हैं, वह उनका कुछ भी भला नहीं करेगा; परन्तु निश्चय जानिए कि वह उनके पास बहुत समय तक नहीं रहेगा। क्योंकि परमेश्वर या तो उसे उनके जीवनकाल में ही छीन लेगा, या फिर अगली पीढ़ी में, अय्यूब के उस वचन के अनुसार: वह, अर्थात दुष्ट, उसे तैयार कर ले, परन्तु धर्मी
321उसे पहिन लेगा, और उसका रुपया निर्दोष लोग आपस में बाँटेंगे।
नीतिवचन में जो लिखा है उस पर भी विचार कीजिए: भला मनुष्य अपने नाती-पोतों के लिये 322भाग छोड़ जाता है, और पापी की सम्पत्ति धर्मी के लिये रखी जाती है। तो जो बेईमानी के साधनों से कमाता है, उसे इससे क्या मिलता है? अरे, उसे पाप और कोप, नरक और दण्ड की आज्ञा मिलती है: अब मुझे बताइए कि उसे कितना मिलता है।
मैं कहता हूँ, यही उसकी कमाई है; इसलिये जैसा दाऊद कहता है, हम भी साहस से कह सकते हैं: मैं ने दुष्ट को बड़ी समृद्धि में देखा, और तुरन्त मैं ने उसके वासस्थान को धिक्कारा: क्योंकि उसका भला हो ही नहीं सकता। थोड़ी देर तक वह भले ही हड़बड़ाए, अकड़े और धूम मचाए, परन्तु परमेश्वर ने ठान लिया है कि वह और उसकी सम्पत्ति दोनों चर्बी के समान पिघल जाएँगे, और कोई भी ध्यान देनेवाला मनुष्य इसे ऐसा ही होते देख सकता है। देखो, अधर्मी मनुष्य अन्याय के मार्ग पर चलकर बहुत कमाता है, और अपने ऊपर गाढ़ी मिट्टी लाद लेता है, परन्तु थोड़े ही समय में वह मुरझा जाता है, वह घट जाता है, और वह स्वयं, या अगली पीढ़ी, गिरकर फिर भिखारीपन में जा पहुँचती है।
और यह श्रीमान दुर्जन, पैसा कमाने की अपनी सारी चतुराई और धूर्त चालों के होते हुए भी, ऐसी दशा में मरा कि कोई नहीं बता सकता कि उसके पास एक कौड़ी भी थी या नहीं।
सावधान. मेरी समझ में, पैसा कमाने के लिये जितनी बुरी चालें किसी मनुष्य के पास हो सकती थीं, वे सब उसके पास थीं; कोई तो यही सोचेगा कि उसे धनी हो जाना चाहिए था।
बुद्धिमान. यदि आप इन्हें ही पैसा कमाने की उसकी सारी बुरी चालें गिनते हैं, तो आप बहुत जल्दी गिनती कर रहे हैं: क्योंकि उसके पास यह भी था: यदि उसके ग्राहक उसकी बही में होते (और यह कठिन ही होता कि वह उन्हें वहाँ न रखे; कम से कम, यदि वह सोचता कि वह उनसे कोई लाभ उठा सकता है,) तो, तब तो वह निश्चय ही अपना सबसे खराब, हाँ, बहुत ही बुरा माल उनके माथे मढ़ता, फिर भी उसके लिये वही दाम लिखता जिस पर सबसे अच्छा माल बिकता था: उन लोगों के समान जो निकम्मा गेहूँ, या गेहूँ का सबसे खराब भाग बेचते थे; और
324 325शेकेल को भारी करते थे, फिर भी दाम ऊँचा चढ़ाते थे: यही श्रीमान दुर्जन का ढंग था। वह 323 श्रीमान दुर्जन की और बुरी चालें।
325 ठगने की एक और कला।
ऐसा माल, जिसकी लागत उसे सबसे अच्छे दाम से कहीं कम पड़ी थी, उतने ही में बेचता जितने में वह सबसे अच्छा माल बेचता था।
उसके पास अपने माल को मिलाने की भी एक चाल थी, ताकि जो बुरा हो वह कम सन्देह के साथ निकल जाए।
इसके अतिरिक्त, यदि उसके ग्राहक कभी उसे पैसा चुकाते, तो वे अपनी और अपनी रसीदों की चौकसी करें, क्योंकि वह प्रायः उस भुगतान को फिर से माँगने का यत्न करता था, विशेषकर यदि वह सोचता कि इससे कुछ हाथ लगने की आशा है, और तब, निश्चय ही, यदि वे भुगतान का अच्छा और पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत न कर पाते, तो सौ में से निन्यानवे बार वे उसे फिर से चुकाते थे। कभी-कभी ईमानदार व्यापारी पैसा चुकाने के प्रमाण के लिये उसके सेवकों की दुहाई देता, परन्तु उन्हें उसने ऐसा सिखा रखा था कि वे, ठीक हो या गलत, उसी के मन की बात कहें: इसलिये उस मार्ग से उसे कोई सहायता न मिल पाती थी।
सावधान. किसी मनुष्य का ऐसे सेवक रखना बुरी, हाँ, घृणित बात है। क्योंकि ऐसे साधनों से एक गरीब ग्राहक बर्बाद हो सकता है और उसे समझ नहीं आता कि अपनी सहायता कैसे करे। हाय! यदि मालिक ऐसा विवेकहीन हो, जैसा मैं देखता हूँ कि श्रीमान दुर्जन था, कि अपना पैसा दो बार माँगे, और यदि उसका सेवक कसम खाकर कहे कि यह उचित कर्ज़ है, तो ऐसे मनुष्य के लिये कहाँ कोई सहायता है? उसे डूबना ही पड़ेगा, कोई उपाय नहीं।
बुद्धिमान. यह बहुत बुरा है, परन्तु यह चलन रहा है, और वह भी सैकड़ों वर्ष पहले से।
परन्तु परमेश्वर का वचन क्या कहता है? मैं उन सब को दण्ड दूँगा जो डेवढ़ी को लाँघते, और 326 327अपने स्वामियों के घरों को उपद्रव और छल से भर देते हैं।
श्रीमान दुर्जन के पास यह कला भी थी; यदि वह किसी मनुष्य को दबाव में पकड़ पाता, अर्थात यदि उसका व्यापारी उसे छोड़कर जाने का साहस न करता, या जो माल उसे चाहिए था वह उस समय कहीं और सुविधा से न मिल सकता; तो वह अपनी चौकसी करे, क्योंकि वह निश्चय ही उसकी थैली की डोरियाँ चटका देता; वह बिना किसी दया या विवेक के उससे वसूली करता।
सावधान. यह तो अन्धेर से वसूली थी, है न? कृपया मुझे अन्धेर से वसूली के विषय में अपना निर्णय सुनाइए, कि वह क्या है, और कब की जाती है?
328 बुद्धिमान. अन्धेर से वसूली का अर्थ है लोगों से उससे अधिक ऐंठ लेना जितना परमेश्वर की या मनुष्यों की व्यवस्था के अनुसार उचित है; और यह कभी-कभी पद पर बैठे लोगों के द्वारा शुल्क, इनाम और ऐसी ही बातों के विषय में किया जाता है: परन्तु सबसे अधिक यह व्यापारियों के द्वारा किया जाता है, जो बिना किसी विवेक के, जब उन्हें अवसर मिलता है, अपने पड़ोसी को अपना शिकार बना लेते हैं। और इस प्रकार श्रीमान दुर्जन अन्धेर करनेवाला था; क्योंकि यद्यपि वह उस प्रकार वसूली नहीं करता था और ज़बरदस्ती नहीं छीनता था जैसे कारिन्दे और मुंशी किया करते थे; तौभी उसके पास अपने अवसर थे, और उनका उपयोग करने की ऐसी क्रूरता थी, कि वह प्रायः अपने ढंग से अन्धेर करके अपने पड़ोसियों की जेब से ज़बरदस्ती पैसा निकालता रहता था।
क्योंकि हर वह मनुष्य जो अपने पड़ोसियों की आवश्यकताओं का लाभ उठाकर उन्हें अपना शिकार बनाता है, ताकि उनसे उससे अधिक ऐंठ ले जितना बुद्धि और विवेक के अनुसार, वस्तुओं के उस समय के भावों के हिसाब से,
327 सेवको, इन वचनों पर ध्यान दो।
वह माल मोल का है; उसे भली-भाँति अन्धेर करनेवाला कहा जा सकता है, और ऐसा व्यक्ति ठहराया जा सकता है जिसका 329परमेश्वर के राज्य में कोई भाग नहीं।
सावधान. अच्छा, यह दुर्जन तो सचमुच एक अभागा दुष्ट था।
बुद्धिमान. यह आप पहले भी अक्सर कह चुके हैं। परन्तु अब जब हम इस विषय की चर्चा कर रहे हैं, तो मुझे थोड़ा आगे बढ़ने की अनुमति दीजिए। हमारे देहात में भी बहुत से लोग हैं जो अपना सारा जीवन अन्धेर से वसूली के चलन में, और इसलिये उसके दोष के अधीन, बिताते हैं: हाय! ऐसे लोग जो ऐसा गिने जाने को अपना अपमान समझते हैं।
330 उदाहरण के लिये: मान लीजिए कि एक गरीब मनुष्य बाज़ार से इतने मील दूर रहता है; और उस मनुष्य को अपने लिये, अपनी पत्नी और गरीब बच्चों के लिये एक बुशल पिसाई का अनाज, एक पाउण्ड मक्खन, या एक पनीर चाहिए: परन्तु बाज़ार से इतनी दूर रहने के कारण, यदि वह वहाँ जाए, तो उसकी एक दिन की मज़दूरी मारी जाएगी, जिससे उसे आठ पेन्स या दस पेन्स की हानि होगी, और एक गरीब मनुष्य के लिये यह भी कुछ है। इसलिये वह जो कुछ उसे चाहिए उसके लिये अपने किसी मालिक या मालकिन के पास जाता है, और उनसे विनती करता है कि ऐसी वस्तु देकर उसकी सहायता करें: हाँ, वे कहते हैं, तुम इसे ले सकते हो; परन्तु साथ ही वे उसे निचोड़ लेंगे, शायद उससे घर पर ही उसके लिये उतना (या उससे अधिक) दाम वसूल करेंगे जितना वे उसे पाँच मील दूर बाज़ार ले जाकर पा सकते हैं, हाँ, और वह भी अपने माल के निकम्मे भाग के लिये। परन्तु इस बात में स्त्रियाँ विशेष रूप से दोषी हैं, अपने
मक्खन और पनीर इत्यादि के बेचने में। अब यह एक प्रकार का अन्धेर से वसूली है, यह कंगालों की आवश्यकता को अपना शिकार बनाना है, यह उनके मुँह पीसना है, यह उन्हें खरीदना और बेचना है।
331 परन्तु सबसे बढ़कर तो आपके फेरीवाले छोटे व्यापारी, जो गरीब मनुष्य की खाने-पीने की वस्तुएँ थोक में खरीद लेते हैं, और उन्हें फुटकर में, और जैसा हम कहते हैं, थोड़ा-थोड़ा करके, अनुचित लाभ के साथ फिर उसी को बेचते हैं; वे ऐसे मार्ग पर चल पड़े हैं कि डंक मारनेवाले भाव पर, अन्धेर से वसूली के द्वारा, ऐसे लोगों के साथ अपना खेल खेलते हैं: मेरा अर्थ उनसे है जो मक्खन, पनीर, अण्डे, सूअर का सूखा माँस इत्यादि थोक में खरीदते हैं, और बाज़ार बीत जाने के बाद सारे सप्ताह भर गरीबों को (जैसा वे कहते हैं) एक पैसे भर, दो पैसे भर, आधे पैसे भर, या ऐसे ही थोड़ा-थोड़ा करके फिर बेचते हैं।
यद्यपि मैं इन सब को दोषी नहीं ठहराऊँगा, तौभी इनमें से बहुत से इस प्रकार के बुरे व्यवहार के द्वारा गरीबों को काटते और नोचते हैं। ये कंगाल को इसलिये नष्ट करते हैं कि वह कंगाल है, और यह एक गम्भीर पाप है। जो अपना धन बढ़ाने के लिये कंगाल पर अन्धेर करता है, और जो धनी को देता है, वह निश्चय
332घटी में पड़ेगा। इसलिये वह फिर कहता है, कंगाल को इस कारण न लूटना कि वह कंगाल है, और न दीन जन को फाटक पर पीसना; क्योंकि प्रभु उनका मुकद्दमा लड़ेगा, और जो लोग उनको लूटते हैं, उनके प्राण को वह लूट लेगा।
ओह, कि जो कंगालों को निचोड़ता और उनके मुँह पीसता है, वह पवित्रशास्त्र के इन दो वचनों पर ध्यान देता! यहाँ कंगालों पर अन्धेर करनेवालों की सम्पत्ति के, हाँ, और उनके प्राण के भी विनाश की धमकी दी गई है। उनका प्राण कहाँ है, और किस दशा में है, यह हम तब और अच्छी तरह देखेंगे 329 1 कुरिन्थियों 6:9, 10।
330 अन्धेर से वसूली करनेवाले कौन हैं।
जब न्याय का दिन आएगा; परन्तु ऐसों की सम्पत्ति तो प्रायः शीघ्र ही गल-सड़ जाती है; और कभी-कभी सब लोग जानते हैं कैसे, और कभी-कभी कोई नहीं जानता कैसे।
इसके अतिरिक्त, ये ब्याजखोर हैं, हाँ, वे भोजनवस्तु पर ब्याज लेते हैं, जिस बात को प्रभु ने 333मना किया है। और क्योंकि वे बाज़ार के दिन ऐसा उतनी अच्छी तरह नहीं कर सकते, इसलिये, जैसा मैंने कहा, वे बाज़ार समाप्त होने पर ऐसा करते हैं; क्योंकि तब गरीब उनके मुँह में आ पड़ते हैं, और अपनी आवश्यकता के लिये जैसे-तैसे लेने को विवश होते हैं, और इन्होंने ठान लिया है कि वे इसके लिये भरपूर दाम चुकाएँगे। शायद कुछ लोग मुझ पर दोष लगाएँगे कि मैं इस प्रकार दूसरे लोगों के मामलों में हाथ डालता हूँ, और इस प्रकार उनके अधर्म के भेदों की टोह लेता हूँ। परन्तु ऐसों से मैं यह कहूँगा, कि क्योंकि ऐसे काम बुरे हैं, इसलिये समय आ गया है कि उन्हें धिक्कार कर संसार से बाहर निकाल दिया जाए। क्योंकि जो कोई ऐसे काम करते हैं, वे परमेश्वर के विरुद्ध अपराध करते हैं, अपने पड़ोसी के साथ अन्याय करते हैं, और श्रीमान दुर्जन के समान परमेश्वर को दण्ड देने के लिये भड़काते हैं। परमेश्वर जानता है, संसार में कितना अधिक छल है!
बुद्धिमान. छल! हाँ, पर मैंने तो आपको उसका हज़ारवाँ भाग भी नहीं बताया; और न इस समय मेरा यह काम है कि उस घूरे को तले तक कुरेदूँ। यदि मैं उन नीच अभागों में से कुछ की चीर-फाड़ करके दिखाऊँ, जिन्हें गिरवी रखनेवाले साहूकार कहते हैं, तो आप क्या कहेंगे? ये उन कंगाल लोगों को रुपया और माल उधार देते हैं जो आवश्यकता के मारे ऐसी कठिनाई में पड़ने को विवश होते हैं; और ये किसी न किसी चाल से, जो कुछ वे इस प्रकार उधार देते हैं उसका ब्याज बढ़ाकर वर्ष भर में तीस, चालीस, हाँ, कभी-कभी पचास पाउंड तक कर लेते हैं; यद्यपि मूलधन पर्याप्त गिरवी के द्वारा सुरक्षित रहता है; और अन्त में वे उस गिरवी को भी रख लेंगे, यदि उन्हें उस दुखिया उधार लेनेवाले को ठगने का कोई भी उपाय मिल जाए।
सावधान. क्या कहूँ! ऐसे दुष्ट तो प्रजा-राज्य की महामारी और कीड़े-मकोड़े हैं, मनुष्यों की संगति के योग्य नहीं; परन्तु मुझे ऐसा लगता है कि जो बातें आपने पहले कहीं, उनमें से कुछ से आप यह जताते हुए प्रतीत होते हैं कि मनुष्य के लिये अपनी वस्तु का अधिक से अधिक लाभ उठाना उचित नहीं है।
बुद्धिमान. यदि अधिक से अधिक लाभ उठाने से आपका अर्थ यह है कि वह अपनी वस्तु को उतने में बेचे जितना वह किसी भी भले-बुरे उपाय से पा सके; तो मैं कहता हूँ, यह उचित नहीं है। और यदि मैं इसके विपरीत कहूँ, तो मैं श्रीमान दुर्जन को और उस टोली के बाकी सब लोगों को निर्दोष ठहराऊँगा; परन्तु ऐसा मैं कभी न करूँगा, क्योंकि परमेश्वर का वचन उन्हें दोषी ठहराता है। परन्तु यह कि मनुष्य के लिये हर समय अपनी वस्तु को
334उतने में बेचना, जितने में वह बेच सके, उचित नहीं है, इसे मैं इन कारणों से प्रमाणित करता हूँ।
पहला, यदि मेरे लिये यह उचित हो कि मैं अपनी वस्तु को सदा जितनी महँगी हो सके, या जितने में बेच सकूँ, बेचूँ, तो मेरे लिये यह भी उचित है कि दूसरों के साथ व्यवहार करते समय मैं उनके प्रति और परमेश्वर के प्रति अच्छे विवेक को एक ओर रख दूँ: परन्तु मेरे लिये यह उचित नहीं कि दूसरों के साथ व्यवहार करते समय अच्छे विवेक को एक ओर रख दूँ,
इत्यादि। इसलिये मेरे लिये यह उचित नहीं कि मैं अपनी वस्तु को सदा जितनी महँगी हो सके, या जितने में बेच सकूँ, बेचूँ।
335 यह कि अपने व्यवहारों में अच्छे विवेक को एक ओर रख देना उचित नहीं, यह तो हमारी बातचीत के पहले भाग में प्रमाणित हो चुका है: परन्तु यह कि जो मनुष्य अपनी वस्तु को सदा जितनी महँगी हो सके, या जितने में बेच सके, बेचना चाहता है, उसे अच्छे विवेक को एक ओर रखना ही पड़ेगा, यह इस प्रकार स्पष्ट प्रगट है।
334 क्या मनुष्य के लिये अपनी वस्तु का अधिक से अधिक लाभ उठाना उचित है। 8 कारणों से इसका नकारात्मक उत्तर प्रमाणित किया गया।
335 बेचने में अच्छे विवेक से काम लेना आवश्यक है।
1. जो मनुष्य (जैसा पहले कहा गया) अपनी वस्तु को जितनी महँगी हो सके बेचना चाहता है, उसे 336कभी-कभी अपने ग्राहक की अनजानता को अपना शिकार बनाना पड़ेगा: परन्तु यह वह अच्छे विवेक के साथ नहीं कर सकता (क्योंकि यह तो अपने ग्राहक पर दाँव चलाना और उसे ठगना है, और यह वर्जित है,
1 थिस्सलुनीकियों 4:6।) इसलिये जो मनुष्य, जैसा पहले कहा, अपनी वस्तु को जितनी महँगी हो सके, या जितने में बेच सके, बेचना चाहता है, उसे अवश्य ही अच्छे विवेक को एक ओर रख देना पड़ेगा।
2. जो मनुष्य अपनी वस्तु को सदा जितनी महँगी हो सके बेचना चाहता है, उसे कभी-कभी अवश्य ही 337अपने पड़ोसी की आवश्यकता को अपना शिकार बनाना पड़ेगा; परन्तु यह वह अच्छे विवेक के साथ नहीं कर सकता, (क्योंकि यह तो अपने पड़ोसी पर दाँव चलाना और उसे ठगना है, जो 1 थिस्सलुनीकियों 4:6 के विरुद्ध है।) इसलिये जो मनुष्य, जैसा पहले कहा, अपनी वस्तु को जितनी महँगी हो सके, या जितने में बेच सके, बेचना चाहता है, उसे अवश्य ही अच्छे विवेक को त्यागकर एक ओर रख देना पड़ेगा।
3. जो मनुष्य (जैसा पहले कहा) अपनी वस्तु को जितनी महँगी हो सके, या जितने में बेच सके, बेचना चाहता है, उसे आवश्यकता पड़ने पर अपने पड़ोसी की चाहत को भी अपना शिकार बनाना पड़ेगा; परन्तु यह मनुष्य अच्छे
338विवेक के साथ नहीं कर सकता, (क्योंकि यह भी उस पर दाँव चलाना ही है, जो 1 थिस्सलुनीकियों 4:6 के विरुद्ध है।) इसलिये जो मनुष्य अपनी वस्तु को जितनी महँगी हो सके, या जितने में बेच सके, बेचना चाहता है, उसे अवश्य ही अच्छे विवेक को त्यागकर एक ओर रख देना पड़ेगा।
यही बात मोल लेने के विषय में भी कही जा सकती है; कोई मनुष्य सदा जितना सस्ता हो सके उतने में मोल नहीं ले सकता, परन्तु 339उसे मोल लेने में भी अच्छे विवेक से काम लेना चाहिए; और यदि वह सदा जितना सस्ता हो सके उतने में मोल ले, तो वह किसी भी रीति से उस विवेक से काम नहीं ले सकता और न उसे बनाए रख सकता है, और यह उन्हीं कारणों से जो पहले दिए जा चुके हैं। क्योंकि ऐसे लोग अपने सौदा करनेवाले की अनजानता, आवश्यकता और चाहत को अपना शिकार बनाएँगे, और यह वे अच्छे विवेक के साथ नहीं कर सकते।
जब अब्राहम हित्तियों से कब्रिस्तान के लिये भूमि मोल लेना चाहता था, तो उसने उनसे यों कहा।
मेरे लिये सोहर के पुत्र एप्रोन से बिनती करो, कि वह अपनी मकपेलावाली गुफा, जो उसकी भूमि की सीमा पर है, मुझे दे दे; उसका पूरा दाम लेकर वह उसे मुझे दे। उत्पत्ति 23।
3408, 9। वह उसे कम दाम में लेना नहीं चाहता था, उसने ऐसा करना तुच्छ जाना, उसने उससे घृणा की: यह न उसके धर्म के, न उसकी प्रतिष्ठा के, और न उसके विवेक के अनुकूल था। इसी प्रकार जब दाऊद यबूसी ओर्नान से एक खेत मोल लेना चाहता था, तब उसने उससे यों कहा: इस खलिहान का स्थान मुझे दे दे, कि मैं
341इस पर यहोवा की एक वेदी बनाऊँ; उसका पूरा दाम लेकर उसे मुझे दे। उसने भी अब्राहम के समान इस प्रकार के व्यवहार में विवेक से काम लिया: वह घात लगाकर किसी पर दाँव चलाना नहीं चाहता था, यबूसी पर भी नहीं, परन्तु वह उसके खेत का पूरा दाम उसे देगा। क्योंकि वह जानता था कि जैसे बहुत महँगा बेचने में दुष्टता है, वैसे ही बहुत सस्ता मोल लेने में भी दुष्टता है, इसलिये उसने ऐसा नहीं किया।
336 हमें अपने पड़ोसी की अनजानता को अपना शिकार नहीं बनाना चाहिए।
337 न अपने पड़ोसी की आवश्यकता को।
338 न हमारी वस्तु के प्रति उसकी चाहत को।
339 हमें मोल लेने में अच्छे विवेक से काम लेना चाहिए।
341 1 इतिहास 21:22, 24।
इसलिये जैसे बेचने में, वैसे ही मोल लेने में भी अच्छे विवेक से काम लेना चाहिए; क्योंकि मोल लेने में भी अपने पड़ोसी पर दाँव चलाना या उसे ठगना मनुष्य के लिये अनुचित है; हाँ, किसी भी बात में ऐसा करना अनुचित है, और परमेश्वर उस अन्याय का भरपूर पलटा लेगा: जैसा कि मैंने भी पहले
342चिताकर गवाही दी है। हाशिये में दिया गया पद भी देखिए। परन्तु, दूसरा, यदि मेरे लिये यह उचित हो कि मैं अपनी वस्तु को सदा जितनी महँगी हो सके, या जितने में 343बेच सकूँ, बेचूँ, तो मेरे लिये यह भी उचित है कि मैं अपने पड़ोसी के साथ प्रेम से काम लिये बिना व्यवहार करूँ: परन्तु मेरे लिये यह उचित नहीं कि मैं प्रेम को एक ओर रख दूँ, या प्रेम से काम लिये बिना अपने पड़ोसी के साथ व्यवहार करूँ, इसलिये मेरे लिये यह उचित नहीं कि मैं अपनी वस्तु को सदा अपने पड़ोसी के हाथ जितने में बेच सकूँ, बेचूँ। मनुष्य को व्यवहार करते समय जितनी सच्चाई से अपनी भलाई, अपने लाभ और अपने हित की योजना करनी चाहिए, उतनी ही सच्चाई से अपने पड़ोसी की भलाई, लाभ और हित की भी: क्योंकि यही अपने व्यवहार में प्रेम को काम में लाना है।
यह कि मुझे अपने पड़ोसी के साथ मोल लेने और बेचने इत्यादि में इस प्रकार प्रेम से काम लेना या प्रेम को काम में लाना चाहिए, यह उस सामान्य आज्ञा से स्पष्ट है: [जो कुछ करते हो 344प्रेम से करो:] परन्तु यह कि जो मनुष्य, जैसा पहले कहा, जितना महँगा हो सके बेचता है, या जितना सस्ता हो सके मोल लेता है, वह प्रेम को काम में लाते हुए नहीं जी सकता, यह इन कारणों से स्पष्ट है।
1. जो मनुष्य अपनी वस्तु को (सदा) जितनी महँगी हो सके, या जितने रुपये में बेच सके, बेचता है, वह 345अपना ही, और केवल अपना ही भला चाहता है; (परन्तु प्रेम अपनी भलाई नहीं चाहता, न केवल अपनी ही भलाई चाहता है :) सो जो मनुष्य अपना ही, और केवल अपना ही भला चाहता है, जैसा वह करता है जो (पहले कहे अनुसार) जितना महँगा हो सके बेचता है; वह अपने इस व्यवहार में न प्रेम से काम लेता है, और न प्रेम को काम में लाता है।
2. जो मनुष्य अपनी वस्तु को (सदा) जितने में पा सके उतने में बेचता है, वह ग्राहक की सब उचित बिनतियों के विरुद्ध अपना मन कठोर कर लेता है। परन्तु जो ऐसा करता है, वह अपने व्यवहार में प्रेम को काम में नहीं ला सकता; इसलिये मनुष्य के लिये यह उचित नहीं कि वह, जैसा पहले कहा, अपनी वस्तु को जितनी महँगी हो सके बेचे।
तीसरा, यदि मेरे लिये यह उचित हो कि मैं, जैसा पहले कहा, अपनी वस्तु को जितनी महँगी हो सके बेचूँ, तो मेरे व्यापार में कोई पाप हो ही नहीं सकता, चाहे मैं अपना धन्धा कितनी ही अनुचित रीति से क्यों न चलाऊँ, चाहे झूठ बोलकर, कसम खाकर, शाप देकर, या ठगकर; क्योंकि यह सब तो केवल अपनी वस्तु को जितनी महँगी हो सके बेचना ही है: परन्तु इन बातों में पाप है, यह स्पष्ट है, इसलिये मैं अपनी वस्तु को सदा 346 347जितनी महँगी हो सके नहीं बेच सकता।
चौथा, जो मनुष्य, जैसा पहले कहा, जितना महँगा हो सके बेचता है, वह प्रकृति की व्यवस्था का बलपूर्वक उल्लंघन करता है:
348 349 क्योंकि वह कहती है, जो कुछ तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी सब मनुष्यों के साथ वैसा ही करो।
343 हमारे व्यवहारों में प्रेम से काम लेना आवश्यक है।
347 व्यापार में पाप हो सकता है, और होता भी है।
348 व्यापार करते समय मनुष्य को प्रकृति की व्यवस्था का बलपूर्वक उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
अब, यदि बेचनेवाला स्वयं मोल लेनेवाला होता, तो वह नहीं चाहता कि जिससे वह मोल लेता है वह उसे सदा जितना महँगा हो सके बेचे; इसलिये जब बेचने की उसकी बारी हो, और दूसरों की उससे मोल लेने की, तब उसे भी स्वयं इस प्रकार नहीं बेचना चाहिए।
पाँचवाँ, जो मनुष्य, जैसा पहले कहा, जितना महँगा हो सके बेचता है, वह उस समझ का, जो 350परमेश्वर ने दूसरों को नहीं दी परन्तु उसी के हाथ में मुहरबन्द करके रखी है, उपयोग परमेश्वर की व्यवस्था का दुरुपयोग करने और उसके द्वारा
351अपने पड़ोसी का अहित करने में करता है: और यह सचमुच परमेश्वर के विरुद्ध है। परमेश्वर ने तुझे अपनी वस्तु के विषय में उससे अधिक कौशल, अधिक ज्ञान और समझ दी है, जितनी उसने उसे दी है जो तुझसे मोल लेना चाहता है। पर यह क्या! क्या तू सोच सकता है कि परमेश्वर ने तुझे यह इसलिये दिया है कि तू इसके द्वारा अपने पड़ोसी को अपना शिकार बनाए? कि तू इसके द्वारा अपने पड़ोसी पर दाँव चलाए और उसे छले? नहीं, कदापि नहीं; परन्तु उसने यह तुझे उसकी सहायता के लिये दिया है; कि तू इस बात में अन्धे के लिये आँखें बने, और अपने पड़ोसी को उस हानि से बचाए, जिसके हाथों में उसकी अनजानता, या आवश्यकता, या चाहत उसे पकड़वा देती।
352 छठा, मनुष्य जो कुछ भी करे, उसमें उसकी दृष्टि परमेश्वर की महिमा पर होनी चाहिए, परन्तु जो अपनी वस्तु को सदा जितने में बेच सके बेचता है, उसकी दृष्टि उस पर नहीं हो सकती, उन्हीं कारणों से जो पहले दिए गए।
353 सातवाँ, मनुष्य जो कुछ भी करे, उसे प्रभु यीशु मसीह के नाम से करना चाहिए; अर्थात् इस भाव से कि उसने उसे ऐसा करने की आज्ञा और अधिकार दिया है: परन्तु जो सदा जितना महँगा हो सके बेचता है, वह उस नाम की भयानक निन्दा किए बिना इसका बहाना तक नहीं कर सकता, क्योंकि उसने उसे इसके विपरीत करने की आज्ञा दी है।
आठवाँ, और अन्तिम, मनुष्य जो कुछ भी करे, उसमें उसकी दृष्टि न्याय के दिन पर होनी चाहिए, 354 355और इस विचार पर कि उस दिन उसके कामों को कैसा आँका जाएगा। इसलिये कोई भी मनुष्य सदा जितना महँगा हो सके नहीं बेच सकता, और न उसे ऐसा करना चाहिए: जब तक कि वह ऐसा करते हुए यह न कहे, हाँ, उसे यह कहना ही पड़ेगा, कि मैं उस दिन की परख का जोखिम उठाऊँगा। यदि तुम अपने
356पड़ोसी के हाथ कुछ बेचो, या अपने पड़ोसी से कुछ मोल लो, तो तुम एक दूसरे पर अन्धेर न करना।
सावधान. परन्तु आप ये सावधानी भरे शब्द क्यों जोड़ते हैं? कि वे [सदा] जितना महँगा हो सके न बेचें, और न [सदा] जितना सस्ता हो सके मोल लें: क्या आप इससे यह संकेत नहीं करते कि मनुष्य कभी-कभी ऐसा कर सकता है?
बुद्धिमान. हाँ, मैं सचमुच यह संकेत करता हूँ कि कभी-कभी बेचनेवाला जितना महँगा हो सके बेच सकता है, और मोल लेनेवाला जितना सस्ता हो सके मोल ले सकता है; परन्तु यह केवल इन दशाओं में उचित है: जब बेचनेवाला धूर्त हो, और बेचने में सारे अच्छे विवेक को एक ओर रख दे; या जब मोल लेनेवाला धूर्त हो, और मोल लेने में
351 पृथ्वी की वस्तुओं के ज्ञान का जो वरदान हमें मिला है, उसका हमें दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।
352 1 कुरिन्थियों 10:13। (समझ में नहीं आता कि यह पाठ में कहाँ बैठता है। DP) 353 हमें सब बातों में परमेश्वर की महिमा पर दृष्टि रखनी चाहिए।
355 प्रेरितों के काम 24:15, 16।
सारे अच्छे विवेक को एक ओर रख दे। इसलिये यदि मोल लेनेवाले का किसी धूर्त से पाला पड़े, या बेचनेवाले का किसी धूर्त से पाला पड़े, तो वे अपनी चौकसी करें: परन्तु फिर भी ऐसे, कि विवेक को एक ओर न रखें, केवल इसलिये कि जिससे तेरा लेन-देन है वह ऐसा करता है: परन्तु तेरा सौदा करनेवाला चाहे कितना ही नीच या ओछा क्यों न हो, तू अपनी वस्तु का दाम उचित ही रख: या यदि तू मोल लेता है, तो जो वस्तु तू चाहता है उसके लिये उचित लाभ देने को तैयार रह: और यदि इससे मोल लेनेवाला या बेचनेवाला न माने, तो अपने लिये कोई अधिक ईमानदार सौदा करनेवाला ढूँढ़ ले: यदि तू यह आपत्ति करे, कि मुझमें यह पहचानने का कौशल नहीं कि कब उचित मोल का सौदा मेरे सामने है: तो ऐसे लोगों को ढूँढ़ ले जिनमें उस विषय में तुझसे अधिक कौशल हो, और उस बात में उन्हीं को अपने रुपये का प्रबन्ध करने दे। परन्तु यदि संसार में धूर्त न होते, तो इन आपत्तियों को उठाने की आवश्यकता ही न होती।
और इस प्रकार, मेरे बहुत भले पड़ोसी, मैंने आपको अपने कुछ कारण बताए हैं कि क्यों जिस मनुष्य के पास वस्तु हो, उसे न सदा बहुत महँगा बेचना चाहिए, और न जितना सस्ता हो सके मोल लेना चाहिए: परन्तु दोनों में उसे परमेश्वर के प्रति अच्छे
विवेक से, और अपने पड़ोसी के प्रति प्रेम से काम लेना चाहिए।
सावधान. परन्तु यदि यहाँ कुछ लोग आपकी बातें सुनते, तो मुझे विश्वास है कि वे आपकी हँसी उड़ाते।
357 बुद्धिमान. इसमें मुझे तनिक भी सन्देह नहीं, क्योंकि जब कोई मनुष्य श्रीमान दुर्जन को उसके दोष बताता, तो वह भी ऐसा ही किया करता था: वह अपने आप को सबसे अधिक बुद्धिमान समझा करता था, और, जैसा मैं पहले संकेत कर चुका हूँ, वह यह मानता था कि जो किसी भी दुष्टता से ठिठकता या हिचकिचाता है, वह अभी पुरुषोचित साहस तक नहीं पहुँचा।
परन्तु श्रीमान दुर्जन और उसके साथी हँसें, मैं इसे सह लूँगा, और फिर भी उन्हें अच्छी सम्मति देता रहूँगा।
परन्तु अपनी और भी अधिक राहत और शान्ति के लिये मैं यह भी स्मरण रखूँगा कि प्राचीन काल के लोभी लोगों ने स्वयं परमेश्वर के पुत्र के साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया था। अभी उनका हँसने का समय है, जिससे कि वे 358आनेवाले समय में शोक करें। और मैं फिर कहता हूँ, जब वे अपनी हँसी हँस चुकें; तब भी, जो मनुष्य मोल लेने और बेचने में परमेश्वर के प्रति अच्छे विवेक से, और अपने पड़ोसी के प्रति प्रेम से काम नहीं लेता, वह अविश्वासी का पड़ोसी है, और श्रीमान दुर्जन का निकट सम्बन्धी है।
359 सावधान. अच्छा, परन्तु इस प्रश्न के विषय में आप क्या कहेंगे? (आप जानते हैं कि सूर्य के नीचे जो भी वस्तु मोल ली या बेची जाती है, उस पर परमेश्वर ने कोई निश्चित दाम ठहराया नहीं है; परन्तु जितनी वस्तुएँ हम मोल लेते और बेचते हैं, उनके दाम ज्वार-भाटे के समान घटते-बढ़ते रहते हैं:) (तो) कोमल विवेकवाला मनुष्य वस्तुओं को मोल लेने और बेचने में क्या करे, कि न बेचनेवाले का, न मोल लेनेवाले का, और न अपना अहित करे?
बुद्धिमान. जो लोग श्रीमान दुर्जन की राह पर चलते हैं, वे सब इस प्रश्न को व्यर्थ समझते हैं; यह 360अपने आप में कठिन भी है: फिर भी मैं आपको इसका उत्तर देने का यत्न करूँगा, और पहले प्रश्न के विषय पर; अर्थात्, कि व्यापारी को व्यापार करते समय अच्छा विवेक कैसे बनाए रखना चाहिए;
(चाहे वह मोल लेनेवाला हो या बेचनेवाला।) दूसरा, कि उसे इस काम के लिये अपने आप को कैसे तैयार करना चाहिए, और इसके अभ्यास में कैसे जीना चाहिए।
357 जो लोग दुर्जन को उसके दोष बताते थे, वह उनकी हँसी उड़ाया करता था।
358 लूका 16:13, 14, 15। अध्याय 6:25।
361 पहली बात के विषय में: उसे वह ध्यान में रखना चाहिए जो पहले कहा जा चुका है, अर्थात्, उसमें परमेश्वर के प्रति विवेक, अपने पड़ोसी के प्रति प्रेम होना चाहिए; और मैं इसमें इतना और जोड़ूँगा, कि व्यवहार में बहुत संयम भी होना चाहिए।
इसलिये वह उन आठ कारणों के सकारात्मक पक्ष की सीमाओं के भीतर रहे, जो पहले यह प्रमाणित करने के लिये दिए गए थे कि मनुष्यों को अपने व्यवहार में, मनुष्य और मनुष्य के बीच, केवल न्याय
और दया से ही काम करना चाहिए; और तब बेचनेवाले का, मोल लेनेवाले का, या अपना अहित करने का कोई बड़ा भय न रहेगा।
परन्तु विशेष रूप से मनुष्य को इस काम के लिये तैयार करने, या सिखाने के लिये:
1. व्यापारी, या और लोग, यह विचार करें कि बड़ी कमाई और बहुतायत में वह बात नहीं है जो अधिकांश मनुष्य समझते हैं: क्योंकि मनुष्य के पास जो कुछ उसकी वर्तमान आवश्यकता और निर्वाह से अधिक है, वह केवल आँखों की अभिलाषा को भोजन देने के काम आता है। क्योंकि
362उसके स्वामियों को इससे और क्या लाभ है, सिवाय इसके कि वे उसे अपनी आँखों से देखें? मनुष्य 363भी बहुधा धन कमाते हुए उसके साथ अपने प्राण के लिये एक फन्दा भी कमा लेते हैं: परन्तु धन कमाकर भलाई पानेवाले थोड़े ही हैं। परन्तु यह विचार श्रीमान दुर्जन को बिल्कुल न सुहाता था।
2. विचार कर, कि बेईमानी से धन कमाना (जैसा वह करता है, जो अच्छे विवेक के बिना और अपने पड़ोसी के प्रति प्रेम के बिना उसे कमाता है,) परमेश्वर के विरुद्ध बड़ा अपराध है। इसी कारण वह
364कहता है, जो लाभ तू ने अन्याय से उठाया है, उस पर मैंने हाथ पर हाथ दे मारा है। यह ऐसी बोली है जो उस अपराध का उल्लेख करते समय ही क्रोध प्रगट करती है। इसलिये,
3. विचार कर, कि ईमानदारी से कमाया हुआ थोड़ा धन, चाहे उससे तुझे एक समय का सागपात का भोजन ही मिले, उसके साथ उस पले हुए बैल से अधिक शान्ति देगा जो बुरी रीति से पाया गया हो। अन्याय के बड़े लाभ से
365न्याय से थोड़ा ही प्राप्त करना उत्तम है।
4. तू इस बात का निश्चय रख, कि परमेश्वर की आँखें तेरे सब मार्गों पर लगी हैं, और वह तेरी सारी चाल को तौलता है, और यह भी कि वह उन्हें चिह्नित करता है, लिख लेता है, और एक थैली में मुहर लगाकर रख छोड़ता है,
366आनेवाले समय के लिये।
5. तू यह स्मरण रखने का निश्चय कर ले, कि तू अपनी मृत्यु का दिन नहीं जानता। यह भी स्मरण रख, कि जब मृत्यु आएगी, तब परमेश्वर तेरी सम्पत्ति, जिसके लिये तू ने परिश्रम किया, और जिसके लिये कदाचित् तू ने अपने प्राण को भी जोखिम में डाला, किसी ऐसे को दे देगा जिसे तू नहीं जानता, और न यह जानता है कि वह बुद्धिमान होगा या मूर्ख। और तब, जो वायु के लिये परि367श्रम करता है उसे क्या लाभ?
361 अच्छा व्यवहार करनेवाला बनने की तैयारियाँ।
362 सभोपदेशक 5:10, 11।
363 1 तीमुथियुस 6:7, 8, 9।
365 नीतिवचन 15:17। अध्याय 16:8। 1 शमूएल 2:5। नीतिवचन 5:21।
367 सभोपदेशक 5:13, 14, 15।
इसके अतिरिक्त, तेरे पास ऐसा कुछ भी न रहेगा जिसे तू अपने हाथ में ले जा सके।
यदि तू ने उसे बेईमानी से कमाया है, तो दोष तेरे साथ जाएगा, और जिनके लिये तू उसे छोड़ जाएगा, वे भी उसे अपनी हानि के लिये पाएँगे।
इन बातों पर ठीक-ठीक विचार करके, और मोल लेने या बेचने के अपने धन्धे के लिये अपने मन को तैयार करने में इनका उपयोग करके; अब मैं आगे तुझे यह दिखाता हूँ कि इस कला के व्यावहारिक भाग में तुझे कैसे जीना चाहिए। क्या तुझे मोल लेना है या बेचना है?
1. यदि तू बेचता है, तो बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा न कर; यदि तू मोल लेता है, तो निन्दा न कर, सिवाय इसके कि जिस वस्तु से तेरा काम है उसका ठीक-ठीक मोल और मूल्य बताए; क्योंकि जान-बूझकर इसके विपरीत तू लोभी और दुष्ट मन के बिना नहीं कर सकता। नहीं तो बेचनेवाला वस्तुओं का मोल बढ़ाकर और मोल लेनेवाला घटाकर क्यों आँकते हैं? यह निकम्मी है, यह निकम्मी है, कहता है
368मोल लेनेवाला, परन्तु जब उसे अपना सौदा मिल जाता है तो वह उस पर बड़ाई मारता है। इस मनुष्य ने अब अपने सौदे की निन्दा करके झूठ बोलने के सिवाय और क्या किया? और उसने उसकी निन्दा क्यों की, सिवाय इसके कि लोभी मन से बेचनेवाले का अहित करे और उसे छले?
2. क्या तू बेचनेवाला है, और वस्तुएँ महँगी हो रही हैं? तो उन्हें और ऊँचा चढ़ाने या ऊँचा थामे रखने में हाथ न लगा; यह भी दुष्टता के बिना नहीं हो सकता; क्योंकि यह शेकेल को
369भारी करना है: क्या तू मोल लेनेवाला है, और वस्तुएँ महँगी हो रही हैं? तो उन्हें नीचे गिराने के लिये कोई चालाकी या छल की बोली काम में न ला: क्योंकि यह भी दुष्टता के बिना नहीं हो सकता। तो फिर हम क्या करें? आप कहेंगे। तो मैं उत्तर देता हूँ: वस्तुओं को परमेश्वर के विधान पर छोड़ दे, और तू संयम के साथ उसके हाथ के अधीन हो जा। परन्तु जब वस्तुएँ महँगी हो रही होती हैं, तब जो हाथ दाम को ऊँचा थामे रहता है, वह उस समय उस हाथ से अधिक बलवन्त होता है जो उसे नीचे गिराना चाहता है; क्योंकि वह बेचनेवाले का हाथ है, जो दाम को ऊँचा रखना पसन्द करता है, विशेषकर जब दाम उसी के हाथ में बढ़े: इसलिये मैं कहता हूँ, तू चौकस रह, और उसमें तेरा हाथ न हो। और तेरा हाथ उसमें अपनी और अपने पड़ोसी की हानि के लिये इन तीन रीतियों से हो सकता है:
1. सच्चाई और वस्तुओं की वास्तविक दशा से बढ़कर अकाल, अकाल की दुहाई देकर: विशेषकर 370आनेवाले समय के विषय में भविष्यवाणी के रूप में ऐसा करने से चौकस रह। इसी कारण वह मनुष्य शोमरोन के फाटक में कुचलकर मार डाला गया, जिसके विषय में आप राजाओं की पुस्तक में पढ़ते हैं। इस पाप में दोहरी बुराई है। 1. यह हमारे बीच परमेश्वर की वर्तमान आशीष को झुठलाता है: और, 2. यह उसकी भलाई के धन को तुच्छ आँकता है, जो सब अच्छी वस्तुओं को हमारे लिये बहुतायत से बढ़ा सकता है।
2. यह दुष्ट काम तब भी किया जा सकता है जब कंगालों की भूख और आवश्यकता किसी वस्तु की माँग करती हो, और उसे जमा करके रख छोड़ा जाए। अब इसलिये कि परमेश्वर इसके प्रति अपनी अप्रसन्नता प्रगट करे, वह मानो लोगों को ऐसे जमाखोर को शाप देने की छूट देता है। जो अपना अनाज रख छोड़ता है, उसको लोग
371शाप देते हैं, परन्तु जो उसे बेच देता है, उसके सिर पर आशीष होती है।
370 परमेश्वर का एक दण्ड। 2 राजाओं 7।
3. परन्तु यदि वस्तुओं के दाम चढ़ ही जाएँ, तो तू दुःखी हो; और अपनी सारी बिक्री में संयम रख, और
372यह निश्चय कर ले कि कंगाल को उचित मोल का सौदा मिले, और अपना अनाज उन्हें बेच जो आवश्यकता में हैं: और यह तू तब करेगा, जब तू कंगाल के हाथ बेचते समय उस पर दया दिखाएगा, और जब तू उसके कारण, इसलिये कि वह कंगाल है, बाज़ार के भाव से कम में बेचेगा। यही अच्छे विवेक के साथ मोल लेना और बेचना है: तू न अपने ग्राहक का अहित करता है, न अपने विवेक का अहित करता है, न अपना ही अहित करता है, क्योंकि परमेश्वर निश्चय तुझे इसका प्रतिफल देगा।
मैंने अनाज के विषय में कहा है, परन्तु तेरा कर्तव्य यह है कि तेरा संयम सब बातों में 373सब मनुष्यों पर प्रगट हो; प्रभु निकट है।
सावधान. अच्छा, महोदय, अब मैं श्रीमान दुर्जन की दुष्टता के विषय में बहुत कुछ सुन चुका हूँ, कृपया अब उसकी मृत्यु के विषय में आगे बढ़िए।
बुद्धिमान. क्यों महोदय, सूर्य अभी इतना नीचे नहीं ढला, रात होने में अभी तीन घंटे बाकी हैं।
सावधान. नहीं; मुझे कोई बड़ी जल्दी नहीं है, पर मैंने सोचा था कि आप अभी-अभी उसके जीवन का वर्णन समाप्त कर चुके। बुद्धिमान. समाप्त! नहीं, मुझे अभी बहुत कुछ और कहना है।
सावधान. तब तो उसमें उससे कहीं अधिक दुष्टता है, जितनी मैं समझता था।
बुद्धिमान. ऐसा हो सकता है। परन्तु आइए, आगे बढ़ें: इस श्रीमान दुर्जन ने अपनी सारी दुष्टता में 374यह और जोड़ दिया, कि वह बड़ा घमण्डी मनुष्य था, बहुत ही घमण्डी मनुष्य। वह मन में अत्यन्त घमण्डी और अहंकारी था; वह यह चाहता था कि जो कुछ वह कहे, उसका खण्डन या विरोध न होना चाहिए, न होने पाए। वह अपने आप को देश के सबसे बुद्धिमान के समान बुद्धिमान, सबसे भले के समान भला, और जिसमें सबसे अधिक सुन्दरता हो उसके समान सुन्दर समझता था। उसे अपनी प्रशंसा आप करने में बड़ा आनन्द आता था, और उतना ही उस प्रशंसा में भी जो दूसरे उसकी करते थे। उससे यह सहा नहीं जाता था कि कोई अपने आप को
375उससे बढ़कर समझे, या दूसरे लोग किसी की बुद्धि या व्यक्तित्व को उसके आगे रखें। अपने बराबरवालों के साथ भी उसका व्यवहार कठिनाई से ही मित्र-भाव का होता था। परन्तु जो लोग नीचे दर्जे के थे, उन्हें वह बड़े तिरस्कार से देखता था, मानो उनके ऊपर से देख रहा हो। और यदि कभी उसे उनसे काम पड़ने का कोई दूर का भी अवसर आ जाता, तो वह बड़ी ऐंठ और बहुत ही रोब जमानेवाला स्वभाव दिखाता था। इसलिये इस विषय में कहा जा सकता है कि सुलैमान ने उसका एक पहचान-चिह्न बता दिया, जब उसने कहा: जो अभिमान से रोष में आकर काम करता है, उसका नाम अभिमानी और 376अहंकारी ठट्ठा करनेवाला पड़ता है। उसने कभी न समझा कि उसका भोजन पर्याप्त अच्छी तरह पकाया गया है, उसके वस्त्र पर्याप्त बढ़िया बनाए गए हैं, या उसकी प्रशंसा पर्याप्त निखारी गई है।
सावधान. मेरी समझ में यह घमण्ड ऐसा पाप है जो अधिकांश पापों के समान ही स्वभाव से कसकर चिपका रहता है। एक अशुद्धता है और एक घमण्ड, मैं ऐसे कोई दो घोर पाप नहीं जानता जो मनुष्यों से इनसे अधिक कसकर चिपके रहते हों।
मैं कहूँ तो, स्वभाव में उनका एक भाग है; स्वभाव उन्हें पसन्द करता है क्योंकि वे उसकी अभिलाषाओं से सबसे अधिक मेल खाते हैं 372 यशायाह 58:6, 7, 8।
374 श्रीमान दुर्जन एक बहुत घमण्डी मनुष्य।
375 सामान्य रूप से घमण्ड के विषय में।
और कल्पनाओं से: और इसलिये कोई अचम्भे की बात नहीं कि श्रीमान दुर्जन घमण्ड से दूषित था, क्योंकि उसने इतनी दुष्टता से अपने आप को लालसा के साथ सब प्रकार के अधर्म के काम करने को सौंप दिया था।
377 बुद्धिमान. आप ठीक कहते हैं; घमण्ड ऐसा पाप है जो स्वभाव से कसकर चिपका रहता है, और उन पहली मूर्खताओं में से एक है जिनमें स्वभाव अपने आप को अशुद्ध प्रगट करता है। क्योंकि बचपन में ही, छोटे-छोटे बच्चों में भी,
घमण्ड सबसे पहले अपने आप को प्रगट करता है; यह प्राण के पाप का एक उतावला, एक आरम्भिक प्रगटीकरण है। मैं कहूँ तो, यह वह भ्रष्टता है जो मन में प्रधानता पाने के लिये संघर्ष करती है, और इसलिये प्रायः सबसे पहले बाहर निकलती है। परन्तु यद्यपि बच्चे इसके इतने वश में होते हैं, फिर भी मुझे लगता है कि अधिक आयुवालों को इससे लज्जित होना चाहिए। मैं आरम्भ में ही श्रीमान दुर्जन के घमण्ड से शुरू कर सकता था, पर मेरी समझ में बचपन का घमण्ड वह बात नहीं जो एक मनुष्य और दूसरे के बीच भेद करने लगती है, जैसे वे बातें करती थीं और करती हैं जिनसे मैंने उसके जीवन का वर्णन आरम्भ किया था: इसलिये मैंने उसे छोड़ दिया था, पर अब, इसलिये कि उसने सयाना होकर भी अपने विषय में, और अपनी नीच और पापमय दशा के विषय में, कुछ विचार न किया, वरन् घमण्ड ही करता रहा; मैंने इस स्थान पर उसके घमण्ड का उल्लेख करने का अवसर लिया है।
सावधान. परन्तु कृपया, यदि आपको स्मरण हो, तो मुझे पवित्रशास्त्र के कुछ ऐसे स्थान बताइए जो घमण्ड के विरुद्ध बोलते हैं। मैं यह इसलिये और भी चाहता हूँ कि घमण्ड आजकल राज करनेवाला पाप है, और कभी-कभी मैं ऐसे लोगों की संगति में पड़ जाता हूँ जो मेरे विवेक में बहुत ही घमण्डी हैं, और मेरा मन भी है कि मैं उन्हें उनका पाप बताऊँ; अब जब मैं उन्हें यह बताता हूँ, तो यदि मैं परमेश्वर का वचन भी साथ न लाऊँ, तो मुझे डर है कि वे मेरी हँसी उड़ाएँगे।
बुद्धिमान. आपकी हँसी उड़ाएँगे! घमण्डी मनुष्य आपकी हँसी उड़ाएगा, आप उसके सामने चाहे जो पद ले आएँ, जब तक कि परमेश्वर वचन के द्वारा उसके विवेक को न मारे: जो लोग श्रीमान दुर्जन को उसका घमण्ड बताते थे, उनके साथ वह ऐसा ही किया करता था: और इसके अतिरिक्त, जब आप जो कुछ कह सकते हैं कह चुकेंगे, तो वे आपसे कहेंगे कि वे घमण्डी नहीं हैं, वरन् घमण्डी मनुष्य तो आप हैं, नहीं तो आप न दोष लगाते, और न इतनी ढिठाई से दूसरे लोगों के कामों में टाँग अड़ाते जैसे आप अड़ाते हैं। फिर भी, इसलिये कि आप यह चाहते हैं, मैं दो-तीन पदों का उल्लेख करूँगा: वे ये हैं। घमण्ड और अहंकार से मैं बैर रखता हूँ। मनुष्य को गर्व के कारण नीचा देखना पड़ता है। और वह उनके गर्व को तोड़ देगा। और सब अभिमानी और सब दुराचारी लोग अनाज की खूँटी बन जाएँगे, और उस आनेवाले दिन में वे ऐसे भस्म
378हो जाएँगे। यह अन्तिम पद तो भयानक है; यह घमण्डी मनुष्य को कँपा देने के लिये पर्याप्त है: परमेश्वर, वह कहता है, घमण्डियों को खूँटी के समान बना देगा; अर्थात्, आग के ईंधन के समान, और आनेवाला दिन जलते भट्ठे के समान होगा, और वह दिन उन्हें भस्म कर देगा, यहोवा का यही वचन है। परन्तु श्रीमान दुर्जन से यह कभी सहा नहीं जाता था कि घमण्ड के विरुद्ध कुछ कहा जाए, और न यह कि कोई उसके विषय में कहे कि वह घमण्डी है।
सावधान. इसका क्या कारण हो सकता है?
बुद्धिमान. उसने मुझे इसका कारण नहीं बताया; परन्तु मैं समझता हूँ कि यह वही है जो सब 379नीच लोगों में पाया जाता है। वे इस दुर्गुण से प्रेम करते हैं, परन्तु उसका नाम धारण करना पसन्द नहीं करते। मतवाला 377 घमण्ड स्वभाव से कसकर चिपका रहता है।
378 नीतिवचन 8:13। अध्याय 29:23। यशायाह 25:11। मलाकी 4:1।
379 घमण्डी मनुष्य घमण्डी कहलाना पसन्द नहीं करते।
पाप से प्रेम करता है, परन्तु मतवाला कहलाना पसन्द नहीं करता। चोर को चोरी करना अच्छा लगता है, परन्तु उससे चोर कहलाना सहा नहीं जाता, वेश्या को अशुद्धता करना अच्छा लगता है, परन्तु उसे वेश्या कहलाना अच्छा नहीं लगता;
और इसी प्रकार श्रीमान दुर्जन को घमण्ड करना अच्छा लगता था, परन्तु उससे घमण्डी मनुष्य कहलाना सहा नहीं जाता था। पाप का मीठापन अशुद्ध और भ्रष्ट मनुष्य को मनभावना लगता है, परन्तु उसका नाम उसके कुल-चिह्न पर एक धब्बा है।
सावधान. आपने जो कहा वह सच है: परन्तु कृपया बताइए, घमण्ड कितने प्रकार का होता है?
380 बुद्धिमान. घमण्ड दो प्रकार का होता है; आत्मा का घमण्ड, और देह का घमण्ड। इनमें से पहले का उल्लेख पवित्रशास्त्र में इस प्रकार किया गया है। सब मन के घमण्डियों से यहोवा घृ381णा करता है। चढ़ी आँखें, घमण्डी मन, और दुष्टों की खेती, पापमय हैं।
धीरजवन्त आत्मावाला घमण्डी आत्मावाले से उत्तम है। देह के घमण्ड का उल्लेख ये पवित्रशास्त्र के पद करते हैं।
उस दिन प्रभु उनके पाँवों के छमछमाते घुंघरुओं की शोभा को, और उनकी जालियों को, और चन्द्रमा के समान गोल चन्द्रहारों को, और झुमकों को, और कड़ों को, और घूंघटों को, और पगड़ियों को, और पैकरियों को, और पटुकों को, और सुगन्धपात्रों को,
382और बालियों को, और अंगूठियों को, और नथों को: बदल-बदलकर पहनने के सुन्दर वस्त्रों को, और कुर्तियों को, और चद्दरों को, और बाल घुँघराले करने की सुइयों को, और दर्पणों को, और मलमल के वस्त्रों को, और दुपट्टों को, और घूंघटों को दूर कर देगा। इन वचनों से यह स्पष्ट है कि जैसे आत्मा का घमण्ड है, वैसे ही देह का घमण्ड भी है, और दोनों पाप हैं, और इसलिये यहोवा को घृणित हैं। परन्तु इन पदों को श्रीमान
दुर्जन कभी पढ़ना सह न सकता था, वे उसके लिये वैसे ही थे जैसे मीकायाह अहाब के लिये था, वे उसके विषय में कभी भलाई की नहीं, परन्तु सदा बुराई ही की बात कहते थे।
सावधान. मेरी समझ में यह केवल श्रीमान दुर्जन ही की दशा न थी कि वह उन पदों से द्वेष रखे जो उनके दुर्गुणों के विरुद्ध बोलते हैं: क्योंकि मेरा विश्वास है कि अधिकांश भक्तिहीन मनुष्य, (जहाँ पवित्रशास्त्र है वहाँ) परमेश्वर के उन वचनों से भीतर ही भीतर बैर रखते हैं जो उनके पापों के लिये उन्हें सबसे स्पष्ट और पूरी रीति से
383डाँटते हैं।
बुद्धिमान. इसमें कोई सन्देह नहीं, और उस बैर के द्वारा वे यह दिखाते हैं कि पाप और शैतान उन्हें जीवन और भक्ति की हितकारी शिक्षाओं से अधिक प्रिय हैं।
सावधान. अच्छा, परन्तु श्रीमान दुर्जन के विषय में अपनी बातचीत से हटे बिना, आप कहते हैं कि वह घमण्डी था: तो क्या आप अब मुझे घमण्डी मनुष्य के कुछ लक्षण बताएँगे?
384 बुद्धिमान. हाँ, अवश्य बताऊँगा: और पहले मैं आपको मन के घमण्ड के कुछ लक्षण बताऊँगा।
मन का घमण्ड बाहरी बातों से दिखाई देता है, जैसे सामान्य रूप से देह का घमण्ड मन के घमण्ड का चिह्न है; क्योंकि देह की सब घमण्ड भरी चेष्टाएँ मन के घमण्ड ही से निकलती हैं: इसलिये सुलैमान कहता है;
385एक पीढ़ी के लोग ऐसे हैं, अहा, उनकी आँखें क्या ही ऊँची हैं, और उनकी पलकें ऊपर उठी रहती हैं: और 380 घमण्ड के दो प्रकार।
381 नीतिवचन 16:5। अध्याय 21:4। सभोपदेशक 7:8।
382 यशायाह 3:17, 18, 19, 20, 21, 22।
383 दुष्ट मनुष्य उस वचन से बैर रखते हैं जो उनके दुर्गुण को डाँटता है।
384 सामान्य रूप से घमण्डी मनुष्य के चिह्न।
386फिर; कोई ऐसा है जो अपने फाटक को, अपनी चाल को ऊँचा करता है। अब ये ऊँची आँखें, और चाल को यह ऊँचा करना, घमण्डी मन का चिह्न है: क्योंकि ये दोनों काम मन से निकलते हैं: क्योंकि 387मन ही से घमण्ड निकलता है, अपने सब दिखाई देनेवाले रूपों में। परन्तु और अधिक विस्तार से:
388 1. मन का घमण्ड तानी हुई गर्दन से, और चलते समय ठुमुक-ठुमुक चलने से प्रगट होता है। क्योंकि दुष्टों की, घमण्डियों की, गर्दन घमण्डी होती है, पाँव घमण्डी होता है, जीभ घमण्डी होती है, जिनके द्वारा उनकी यह चाल ऊँची की जाती है। यही वह बात है जिसके कारण वे अपने पड़ोसियों के बीच तिरस्कार से देखते, रूखाई से बोलते, और अकड़ के साथ व्यवहार करते हैं।
2. घमण्डी मन सतानेवाला मन होता है: दुष्ट अपने अहंकार के कारण 389दीन को सताता है।
390 3. प्रार्थना न करनेवाला मनुष्य घमण्डी मनुष्य है।
391 4. झगड़ालू मनुष्य घमण्डी मनुष्य है।
392 5. तिरस्कार करनेवाला मनुष्य घमण्डी मनुष्य है।
393 6. जो मनुष्य अपने पड़ोसी पर अन्धेर करता है, वह घमण्डी मनुष्य है।
394 7. जो परमेश्वर के वचन को आदर और भय के साथ नहीं सुनता, वह घमण्डी मनुष्य है।
8. और जो घमण्डियों को धन्य कहता है, वह, निश्चय जानिए, घमण्डी मनुष्य है। ये सब मन में 395 396घमण्डी हैं, और उनका यह मन का घमण्ड इसी प्रकार अपने आप को प्रगट करता है।
397 जहाँ तक देह के घमण्ड की बात है, वह उन सब बातों से प्रगट होता है, अर्थात् उसका कुछ अंश, जिनका उल्लेख पहले किया गया है; क्योंकि यद्यपि उन्हें मन के घमण्ड के लक्षण कहा गया है, फिर भी वे उस घमण्ड के लक्षण इसी प्रकार हैं कि वे देह में अपने आप को प्रगट करते हैं। आप जानते हैं कि जो रोग भीतर होते हैं, वे बहुधा बाहरी और दिखाई देनेवाले चिह्नों से दिखाई देते हैं, फिर भी उन्हीं चिह्नों से बाहरी भाग भी दूषित हो जाता है। इसी प्रकार मन के घमण्ड के वे सब दिखाई देनेवाले चिह्न देह के घमण्ड के भी चिह्न हैं।
परन्तु और अधिक बाहरी चिह्नों पर आएँ: सोना, और मोती, और बहुमूल्य वस्त्र पहनना; बाल गूँथना, फैशनों के पीछे चलना, चेष्टाओं के द्वारा घमण्डियों की नकल करने का यत्न करना, चाहे बोली से, चाहे चितवन से, चाहे पहनावे से, चाहे चाल से, या मूर्खों के दूसरे खिलौनों से, (जिनसे इस समय
397 बाहरी घमण्ड के विषय में।
संसार भरा पड़ा है) ये सब, और बहुत सी और बातें, जैसे घमण्डी मन के, वैसे ही देह के घमण्ड के भी चिह्न हैं
400 परन्तु श्रीमान दुर्जन किसी भी रीति से यह मानने को तैयार न था कि इसे घमण्ड कहा जाए, वरन् वह इसे सफ़ाई-सुथराई, सुन्दरता, शोभा, स्वच्छता इत्यादि कहता था; और न वह यह मानता था कि फैशनों के पीछे चलना और कुछ है, सिवाय इसके कि वह घमण्डी, अनोखा, और अपने पड़ोसियों की दृष्टि में सनकी न समझा जाए।
सावधान. परन्तु मुझसे कहा गया है कि जब कुछ लोगों को उनके घमण्ड के लिये डाँटा गया, तो उन्होंने उलटकर उन्हीं लोगों की बिरादरी पर बात डाल दी जिन्होंने उन्हें डाँटा था: यह कहकर,
हे वैद्य, अपने मित्रों को चंगा कर, अपने घर में देखो, अपनी बिरादरी में, हाँ, अपने सबसे बुद्धिमानों में भी देखो, और देखो कि क्या तुम स्वयं निर्दोष हो, हाँ, तुम धर्म का अंगीकार करनेवाले भी: क्योंकि तुम धर्म का अंगीकार करनेवालों से अधिक घमण्डी कौन है? कदाचित् स्वयं शैतान भी नहीं।
401 बुद्धिमान. इस उत्तर से मेरा मन दुखता है, क्योंकि इसका बहुत अधिक कारण है। यही उत्तर श्रीमान दुर्जन अपनी पत्नी को देता था, जब वह (जैसा वह कभी-कभी करती थी) उसके घमण्ड के लिये उसे डाँटती थी: वह कहता, अब तो हमारे जीवन में बड़े सुधार होंगे, क्योंकि शैतान दुर्गुणों का सुधारक बन बैठा है: क्योंकि, वह कहता, संसार में धर्म का अंगीकार करनेवालों के घमण्ड से बढ़कर और कोई पाप राज नहीं करता। और कौन उसका खण्डन कर सकता है? शैतान को भी उसका हक़ दें, यह बात इतनी प्रगट है कि कोई मनुष्य इसे झुठला नहीं सकता।
और मुझे सन्देह नहीं कि यही उत्तर श्रीमान दुर्जन के मित्रों के मुँह में भी तैयार रहता है; क्योंकि वे धर्म का अंगीकार करनेवालों के पहनावे और चाल-ढाल में घमण्ड को अपना प्रदर्शन करते हुए देख सकते हैं और देखते भी हैं; कोई कह सकता है, लगभग उतना ही जितना देश के किसी भी लोगों में, और यह बड़े खेद की बात है। हाँ, और मुझे डर है कि इस विषय में उनकी फ़िज़ूलख़र्ची और सीमा से बाहर जाने ने बहुतों के मन को कठोर कर दिया है, जैसा कि मैं देखता हूँ कि इसने कुछ हद तक स्वयं श्रीमान दुर्जन के मन को भी कठोर किया।
जहाँ तक मेरी बात है, मैंने स्वयं बहुतों को देखा है, और वे भी कलीसिया के सदस्य, जो अपनी नई-नई सनकों और खिलौनों से ऐसे सजे-धजे और लिपे-पुते थे, और वह भी जब वे परमेश्वर की आराधना की रीति में उसके गम्भीर
ठहराए हुए अवसरों पर उपस्थित होते थे, कि मुझे अचम्भा हुआ कि ऐसे रंगे-पुते लोग किस मुँह से उस स्थान पर जहाँ वे थे, बिना मूर्छित हुए बैठ सकते थे। परन्तु निश्चय ही परमेश्वर की पवित्रता, और पाप के द्वारा उनकी अपनी अशुद्धता भी, ऐसे लोगों के मन से बहुत दूर होगी, चाहे वे कैसा ही अंगीकार क्यों न करें।
402 मैंने वेश्या के माथे के विषय में पढ़ा है, और मैंने मसीही लज्जाशीलता के विषय में पढ़ा है; मैंने बहुमूल्य वस्त्रों के विषय में पढ़ा है, और उसके विषय में भी जो भक्ति का अंगीकार करनेवाली स्त्रियों को शोभा देता है, अर्थात् 398 1 तीमुथियुस 2:2। (समझ में नहीं आता कि यह पाठ में कहाँ बैठता है।—DP)
399 1 पतरस 3:3, 4, 5।
400 श्रीमान दुर्जन नहीं चाहता था कि घमण्ड को घमण्ड कहा जाए।
401 धर्म का अंगीकार करनेवाले घमण्ड के पाप के दोषी।
403 404भले काम; परन्तु यदि मैं बोल सकूँ, तो मैं जो जानता हूँ सो जानता हूँ, और ऐसी बात कह सकता हूँ, और फिर भी कोई 405अन्याय न करूँ, जिससे कुछ धर्म का अंगीकार करनेवाले अपने स्थानों में दुर्गन्ध देने लगें; परन्तु अभी मैं रुक जाता हूँ।
सावधान. महोदय, आप इस बात से बहुत चिन्तित जान पड़ते हैं, परन्तु मैं और क्या कहूँ? कानाफूसी होती है कि कुछ भले पादरियों ने अपने लोगों को उनके छिछोरे और चंचल पहनावे में बढ़ावा दिया है, हाँ, उनके सोने, और मोतियों, और बहुमूल्य वस्त्रों इत्यादि का पक्ष भी लिया है।
बुद्धिमान. मैं नहीं जानता कि उन्होंने किस बात का पक्ष लिया है, परन्तु यह सहज ही दिखाई देता है कि वे ऐसी बातों को सहते हैं, या कम से कम, अपनी पत्नियों और बच्चों दोनों में उन्हें देखकर आँख मूँद लेते और अनदेखा कर देते हैं। और इस प्रकार 406यरूशलेम के भविष्यद्वक्ताओं के कारण सारे देश में भक्तिहीनता फैल गई है। और जब हाकिमों का हाथ ही किसी अपराध में मुख्य हो, तो कौन उनके लोगों को उस अपराध में डूबने से रोक सकता है?
सावधान. यह तो विलाप की बात है, और विलाप ही बनी रहेगी।
बुद्धिमान. हाँ, ऐसा ही है, और ऐसा ही रहेगा। और मैं इतना और जोड़ूँगा, कि यह लज्जा की बात है, यह निन्दा की बात है, यह अन्धों के लिये ठोकर का 407पत्थर है; क्योंकि चाहे मनुष्य स्वयं श्रीमान दुर्जन के समान अन्धे हों, फिर भी वे उस मूर्खता भरे छिछोरेपन को देख सकते हैं जो इन सब बन्दरों जैसी और चंचल फ़िज़ूलियों की जड़ में अवश्य ही होगा। परन्तु बहुतों के बहाने तैयार रहते हैं; अर्थात्, उनके माता-पिता, उनके पति, और उनकी परवरिश इसकी माँग करती है, इत्यादि: हाँ, भले लोगों के उदाहरण उन्हें इसके लिये उकसाते हैं: परन्तु ये सब मकड़ी के जाले से बढ़कर कुछ न ठहरेंगे, जब महान
परमेश्वर के वचन का गर्जन स्वर्ग से उनके विरुद्ध कड़केगा, जैसा कि वह मृत्यु के समय या न्याय के समय कड़केगा; परन्तु मेरी इच्छा है कि वह उससे पहले ही ऐसा करे। परन्तु हाय! ये बहाने तो केवल खोखले बहाने हैं, ये घमण्डी लोग इसे ऐसा ही रखना पसन्द करते हैं। एक बार मैंने एक कुमारी से, उसके चटकीले और भड़कीले वस्त्र के लिये उसे डाँटते हुए, बात की।
परन्तु उसने मुझसे कहा, दर्ज़ी ने ही उसे ऐसा बना दिया: जबकि, हाय, बेचारी घमण्डी लड़की, उसी ने दर्ज़ी को ऐसा बनाने का आदेश दिया था। बहुत से लोग माता-पिता, और पतियों, और दर्ज़ियों इत्यादि को दूसरों की आँखों पर पर्दा बनाते हैं, परन्तु उनके बुरे मन, और उनका उसके आगे झुक जाना, यही इन सब बुराइयों का मूल कारण है।
सावधान. अब जब आप घमण्ड के कारण की बात कर रहे हैं, तो कृपया मुझे और आगे यह भी बताइए कि घमण्ड 408आजकल इतना प्रचलित क्यों है?
बुद्धिमान. मैं आपको बताऊँगा कि मेरी समझ में इसके क्या कारण हैं।
409 1. पहला यह है, कि ऐसे लोग परमेश्वर के वचन के द्वारा नहीं, परन्तु अपने ही मन के द्वारा चलाए जाते हैं। मैंने आपसे पहले कहा था कि घमण्ड का मूल सोता मन ही है। क्योंकि मन ही से घमण्ड निकलता है; इसलिये यह इस कारण है कि वे अपने मन के द्वारा चलाए जाते हैं, जो स्वभाव ही से
404 1 पतरस 3:1, 2, 3।
407 धर्म का अंगीकार करनेवालों में घमण्ड संसार के लिये लज्जा और ठोकर का पत्थर है।
408 घमण्ड इतना प्रचलित क्यों है।
409 पहला कारण। मरकुस 7:22, 23।
उन्हें घमण्ड में ऊँचा उठाने की ओर झुकता है। मन का यह घमण्ड उनकी परीक्षा करता है, और अपने छल से उन पर
410जय पाता है; हाँ, यह उनके मोर-पंखों में एक मोहित करनेवाला गुण डाल देता है, और तब वे उनकी व्यर्थता में निगल लिये जाते हैं।
2. धर्म का अंगीकार करनेवाले इतने घमण्डी क्यों हैं, इसका दूसरा कारण (क्योंकि अभी हम उन्हीं की बात कर रहे हैं) यह है, कि वे सचमुच के पवित्र लोगों से उदाहरण लेने की अपेक्षा संसार के लोगों से उदाहरण लेने को अधिक तत्पर रहते हैं। घमण्ड संसार का है। क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात् शरीर की अभिलाषा, और आँखों की अभिलाषा, और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु 411संसार ही की ओर से है। इसलिये धर्म का अंगीकार करनेवाले संसार से घमण्डी होना सीखते हैं। परन्तु उन्हें उनको अपना उदाहरण नहीं बनाना चाहिए। आपत्ति की जाएगी, नहीं, और न तुम्हारे पवित्र लोगों को भी, क्योंकि तुम भी दूसरों के समान घमण्डी हो: अच्छा, जो दोषी हैं वे लज्जित हों। परन्तु जब मैं कहता हूँ कि धर्म का अंगीकार करनेवालों को अपने जीवन के लिये उनसे उदाहरण लेना चाहिए जो सचमुच पवित्र लोग हैं, तो मेरा अर्थ वही है जो पतरस कहता है: उन्हें उनसे उदाहरण लेना चाहिए जो पूर्वकाल में थे, अर्थात् पवित्र लोग; क्योंकि पूर्वकाल के पवित्र लोग सबसे उत्तम थे, इसलिये वह हमें उन्हीं को अपना आदर्श बनाने के लिये उनकी ओर संकेत करता है। पत्नियों का चालचलन पवित्र हो, और भय सहित भी हो। पतरस कहता है, तुम्हारा सिंगार दिखावटी न हो, अर्थात् बाल गूँथने, और सोने के गहने, या भाँति-भाँति के कपड़े पहनना: वरन् तुम्हारा छिपा हुआ और गुप्त मनुष्यत्व, नम्रता और मन की दीनता की अविनाशी सजावट से सुसज्जित रहे, क्योंकि परमेश्वर की दृष्टि में इसका मूल्य बड़ा है। क्योंकि पूर्वकाल में पवित्र स्त्रियाँ भी, जो परमेश्वर पर आशा रखती थीं, अपने आप को इसी रीति से सँवारती और अपने-अपने पति के अधीन रहती थीं
413 3. एक और कारण यह है, कि वे अपने स्वभाव की अशुद्धता को भूल गए हैं। क्योंकि उसका स्मरण अवश्य ही हमें दीन बनाए रखेगा, और दीन बने रहकर हम घमण्ड से दूर रहेंगे। घमण्डी और दीन एक दूसरे के विरोध में रखे गए हैं; (परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है, पर दीनों पर अनुग्रह करता है।) और क्या यह कल्पना की जा सकती है कि अपनी दशा को समझनेवाला मसीही घमण्डी हो? अपनी नीचता का बोध हमें नीचे झुकाता है, घमण्ड से ऊपर नहीं उठाता; न मन के घमण्ड से, न जीविका के घमण्ड से: परन्तु जब मनुष्य यह भूलने लगता है कि वह क्या है, तब, यदि कभी, वह घमण्डी होने लगता है।
मुझे तो यह संसार की सबसे मूर्खता भरी और हास्यास्पद बातों में से एक लगती है, कि मनुष्य उस वस्तु पर घमण्ड करे जो उसे इसी उद्देश्य से दी गई है कि वह उससे अपने नंगेपन की लज्जा को ढाँके।
414 4. जो लोग घमण्डी हैं, उन्होंने परमेश्वर और उसकी पवित्रता को अपनी दृष्टि से ओझल कर दिया है। यदि परमेश्वर उनके सामने होता, जैसे वह उनकी पीठ के पीछे है; और यदि वे उसे उसकी पवित्रता में देखते, जैसे वह उन्हें उनके पापों और लज्जा में देखता है, तो उन्हें अपनी बन्दरों जैसी सजावट की वस्तुओं में बहुत थोड़ा ही आनन्द मिलता।
412 1 पतरस 3:1, 2, 3, 4, 5।
परमेश्वर की पवित्रता स्वर्गदूतों से उनके मुँह ढँकवाती है, और मसीहियों को, जब वे 415उसे देखते हैं, चूर-चूर करके धूल और राख बना देती है: और जैसा उसका प्रताप है, वैसा ही उसका वचन है; इसलिये जो लोग उसे घमण्ड के पक्ष में लाते हैं, वे उसका दुरुपयोग करते हैं।
416 अन्त में, परन्तु उन लोगों का उद्देश्य क्या हो सकता है जो अपने विचित्र ढंग से अपने आप को सजाने में घमण्डी हैं? वे क्यों बैल के माथे जैसे उभरे हुए बालों के साथ, नंगे कन्धों के साथ, और गाय के थन के समान बाहर लटकती छातियों के साथ घूमना चाहते हैं? वे क्यों अपने चेहरों को रंगना, अपनी गर्दनें तानना, और अपने आप को उन सब दिखावटी रीतियों में ढालना चाहते हैं जिनकी ओर घमण्डी
कल्पना उन्हें ले जाती है? क्या इसलिये कि वे परमेश्वर का आदर करना चाहते हैं? इसलिये कि वे सुसमाचार की शोभा बढ़ाना चाहते हैं? इसलिये कि वे धर्म को सुन्दर बनाना, और पापियों को उनके अपने उद्धार से प्रेम करनेवाला बनाना चाहते हैं? नहीं, नहीं। यह तो इसलिये है कि वे अपनी अभिलाषाओं को प्रसन्न करें, अपनी जंगली और बेलगाम कल्पनाओं को तृप्त करें; और मेरी इच्छा है कि कोई यह इसलिये न करता हो कि दूसरों में कामवासना भड़काए, जिससे वे उनके साथ अशुद्धता करें। मेरा विश्वास है कि उनका उद्देश्य चाहे जो हो, यह शैतान की बड़ी युक्तियों में से एक है: और मैं यह भी मानता हूँ कि शैतान ने बढ़िया वस्त्रों के चमचमाते दिखावे के द्वारा जितनों को अशुद्धता के पाप में खींचा है, उतनों को वह उनके बिना कदापि न खींच पाता। मैं सोचता हूँ कि वह क्या था जिसे प्राचीन काल में वेश्या का पहनावा कहा जाता था: निश्चय वह आज के बहुत से धर्म का अंगीकार करनेवालों के वस्त्रों से अधिक मोहनेवाला और लुभानेवाला न हो सकता था।
सावधान. आप जो कहते हैं वह मुझे बहुत अच्छा लगता है, और मेरी इच्छा है कि इंग्लैण्ड की वे सब घमण्डी स्त्रियाँ जो धर्म का अंगीकार करती हैं, आपके शब्दों की पहुँच और आवाज़ के भीतर होतीं।
बुद्धिमान. जो मैंने कहा है, मैं मानता हूँ कि वह सत्य है, परन्तु जहाँ तक इंग्लैण्ड की उन घमण्डी स्त्रियों की बात है जो धर्म का अंगीकार करती हैं, उनके पास मूसा और भविष्यद्वक्ता हैं, और यदि वे उनकी नहीं सुनतीं, तो हम कैसे आशा कर सकते हैं कि वे मुझ जैसे भोंथरे स्वरवाले मेढ़े के सींग से कोई भलाई पाएँगी? फिर भी,
मैंने अपने मन की बात कह दी है, और अब यदि आप चाहें, तो हम श्रीमान दुर्जन के कुछ और कामों की ओर बढ़ें।
सावधान. नहीं: कृपया श्रीमान दुर्जन की कोई और बात दिखाने से पहले, मुझे घमण्ड के इस पाप के बुरे परिणाम और भी विस्तार से दिखाइए।
417 बुद्धिमान. सारे मन से, मैं आपका अनुरोध पूरा करूँगा।
418 1. तो: घमण्ड ही बेचारे मनुष्य को नरक के शैतान के ऐसा समान बना देता है, कि उसमें यह पहचाना ही नहीं जा सकता कि वह परमेश्वर का स्वरूप और समानता है। स्वर्गदूत जब शैतान बने,
तो यह घमण्ड से ऊँचे उठाए जाने या फूल जाने के कारण हुआ। घमण्ड ही पापी के मन को भी ऊँचा उठाता या फुला देता है, और इस प्रकार उसे ठीक शैतान का स्वरूप धारण करा देता है।
419 2. घमण्ड मनुष्य को परमेश्वर की दृष्टि में इतना घृणित बना देता है, कि वह उसके प्रताप के निकट नहीं आएगा, न आने पाएगा। यद्यपि यहोवा महान है, तौभी वह नम्र मनुष्य की ओर दृष्टि करता है; परन्तु अहंकारी को
417 घमण्ड के पाप के बुरे परिणाम।
418 बुरा परिणाम 1। 1 तीमुथियुस 3:6।
419 बुरा परिणाम 2। भजन संहिता 138:9।
वह दूर ही से पहचानता है। घमण्ड परमेश्वर और प्राण के बीच दूरी डाल देता है; घमण्ड मनुष्य को परमेश्वर के निकट आने नहीं देता, और न परमेश्वर किसी घमण्डी मनुष्य को अपने निकट आने देता है: अब यह एक भयानक बात है।
420 3. जैसे घमण्ड परमेश्वर और प्राण के बीच दूरी डालता है, वैसे ही वह उस दूरी को बनाए भी रखता है। परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है; विरोध करता है, अर्थात्, वह उसके विरुद्ध खड़ा होता है, उसे अपने से दूर धकेल देता है, उसको और उसके सब कामों को तुच्छ जानता है। घमण्डी मनुष्य परमेश्वर की विधियों में आ तो सकता है; परन्तु उसकी उपस्थिति में आना, उसके साथ संगति रखना, या उससे आशीष पाना, यह उसे न मिलेगा। क्योंकि महान परमेश्वर
422 4. वचन कहता है, कि यहोवा अहंकारियों के घर को ढा देगा। वह उसके घर को नष्ट करेगा; इसका अर्थ यह समझा जा सकता है, कि वह उसे और उसके लोगों को नष्ट करेगा। इसी प्रकार उसने घमण्डी फ़िरौन को नष्ट किया, इसी प्रकार उसने घमण्डी कोरह को, और बहुत से औरों को नष्ट किया।
423 5. घमण्ड, जहाँ आता है और जहाँ उसकी आवभगत होती है, वहाँ वह किसी ऐसे दण्ड का निश्चित अग्रदूत होता है जो बहुत पीछे नहीं रहता। जब घमण्ड आगे-आगे चलता है, तो लज्जा और विनाश उसके पीछे-पीछे आते हैं।
जब अभिमान होता, तब अपमान भी होता है। विनाश से पहले गर्व, और ठोकर खाने से पहले घमण्ड होता है।
424 6. घमण्ड में बने रहना बेचारे मनुष्य की दशा को उतना ही असाध्य बना देता है जितनी स्वयं शैतानों की दशा है।
और मुझे डर है कि यही श्रीमान दुर्जन की दशा थी, और यही कारण था कि वह जिस प्रकार मरा, उस प्रकार मरा; जैसा मैं आपको अभी आगे दिखाऊँगा।
परन्तु मुझे इस प्रकार अलग-अलग कामों की, या यूँ कहें कि उन भयंकर पापों की, बात करने की क्या आवश्यकता है, जो श्रीमान
दुर्जन ने किए, जबकि उसका सारा जीवन और उसके सारे काम मानो मिलकर पाप का एक भारी-भरकम 425पिण्ड बनाते थे? यह विश्वास करने के बदले कि कोई परमेश्वर है, उसका मुँह, उसका जीवन और उसके काम यह प्रगट करते थे कि वह ऐसी किसी बात पर विश्वास नहीं करता। उसका अपराध मेरे मन के भीतर कहता था, कि
426 427परमेश्वर का भय उसकी आँखों के सामने नहीं है। परमेश्वर का आदर करने, और उसकी किसी दया के लिये, या अपने प्रति उसके किसी भले विधान के अधीन रहते हुए, उसकी महिमा करने के बदले (क्योंकि परमेश्वर सब के लिये भला है, और अपना सूर्य कृतघ्नों और अपवित्रों पर भी चमकाता, और अपना मेंह उन पर भी बरसाता है,) वह महिमा का श्रेय दूसरे कारणों को देता था। यदि वे दयाएँ होतीं, तो वह उनका श्रेय (यदि विधान का खुला रूप ही उसे झूठा न ठहरा देता) अपनी बुद्धि, परिश्रम, चिन्ता, उद्यम, चतुराई, या ऐसी ही किसी बात को देता था: यदि वे क्लेश होते, तो वह उनका दोष मढ़ता, या उन्हें उपज गिनता
422 बुरा परिणाम 4। नीतिवचन 16:25।
423 बुरा परिणाम 5। नीतिवचन 11:2। नीतिवचन 16:8।
424 बुरा परिणाम 6। 1 तीमुथियुस 3:6।
425 श्रीमान दुर्जन का एक सामान्य चरित्र-चित्रण।
427 श्रीमान दुर्जन की चाल-चलन का एक संक्षिप्त वर्णन।
भाग्य की, दुर्भाग्य की, संयोग की, कामकाज के बुरे प्रबन्ध की, पड़ोसियों की दुर्भावना की, या इस बात की कि उसकी पत्नी धार्मिक थी, और, जैसा वह कहता था, पढ़ने, प्रार्थना करने, या ऐसे ही कामों में बहुत अधिक समय गँवाती थी। परमेश्वर को मानना, (अर्थात्, अनुग्रहपूर्वक) या बातों में उसका हाथ स्वीकार करना, उसके स्वभाव में न था। परन्तु, जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है; दुष्ट पर चाहे दया भी की जाए, तौभी वह
428धार्मिकता को न सीखेगा। और फिर, वे अपने मारनेवाले की ओर नहीं फिरे, और न उन्होंने सेनाओं के 429यहोवा को ढूँढ़ा। यही श्रीमान दुर्जन का स्वभाव था, न दयाएँ न दण्ड उसे प्रभु को ढूँढ़ने के लिये प्रेरित कर सकते थे। हाँ, जैसा पवित्रशास्त्र का एक और वचन कहता है, वह न तो परमेश्वर के 430 431 432कामों को देखता, और न उसके हाथों के कार्यों पर ध्यान देता था, न दयाओं में, न दण्डों में।
433 परन्तु इससे भी बढ़कर, जब विधान के द्वारा उसे अपने प्राण के लिये उत्तम से उत्तम साधनों के बीच रखा गया, (क्योंकि, जैसा पहले दिखाया गया, उसे एक भला मालिक मिला था, और उससे पहले एक भला पिता, और इन सब के बाद एक भली पत्नी, और कभी-कभी यात्रा में होते हुए, उसे किसी अच्छे उपदेश को सुनने का अवसर मिल जाता, क्योंकि वह कभी-कभी नयेपन की खातिर किसी अच्छे प्रचारक को सुनने चला जाता था;) तौभी उसका मन उनसे लाभ उठाने को कभी न हुआ: धार्मिकता के इस देश में भी वह कुटिलता करता, और यहोवा का माहात्म्य उसे सूझ न पड़ता था।
434 जब वह वचन का प्रचार होते, उसे पढ़े जाते, या उस पर चर्चा होते सुनता, तो उसका आदर करने के बदले वह सो जाता, दूसरे कामकाज की बातें करने लगता, या फिर पवित्रशास्त्र के अधिकार, उसके सामंजस्य, और उसकी बुद्धि के विरुद्ध आपत्तियाँ उठाता। वह कहता, तुम कैसे जानते हो कि यह परमेश्वर का वचन है? तुम कैसे जानते हो कि ये बातें सच हैं? वह कहता था, पवित्रशास्त्र तो मोम की नाक के समान है, और मनुष्य उसे जिधर चाहे उधर मोड़ सकता है: एक वचन एक बात कहता है, और दूसरा ठीक उसका उलटा कहता है; इसके अतिरिक्त, उनमें हज़ारों असम्भव बातों का वर्णन है; देश में जितने फूट और झगड़े हैं, उन सब का कारण यही हैं: इसलिये (वह कहता) तुम चाहे जो सोचते रहो, पर मेरी समझ में वे ही सबसे अधिक चैन से हैं जिनका उनसे सबसे कम वास्ता है।
जो लोग अपने माथों पर मसीह का नाम, 435और अपने जीवन में उसका स्वरूप लिये फिरते थे, उनसे प्रेम करने और उनका आदर करने के बदले, वे उसके गीत का विषय, उसके ठट्ठों की सामग्री, और उसकी निन्दाओं के निशाने बनते थे। वह या तो उनके संयमी आचरण, उनकी अनुग्रहपूर्ण बोली, और शान्त व्यवहार का ठट्ठा उड़ाता, या फिर बेधड़क कसम खाकर कहता कि वे यह सब छल और कपट से करते हैं। वह भक्त लोगों को जितना हो सके उतना घृणित और तुच्छ ठहराने का यत्न करता; उनकी बदनामी के लिये किसी ने भी जो झूठ गढ़े हों, उन्हें वह सच कहकर दृढ़ता से दोहराता,
431 भजन संहिता 29:5। (पाठ में यह कहाँ बैठता है, दिखाई नहीं देता।—DP) 432 नीतिवचन 17:6। (पाठ में यह कहाँ बैठता है, दिखाई नहीं देता।—DP)
434 पवित्रशास्त्र के विषय में श्रीमान दुर्जन का मत।
435 भले लोग श्रीमान दुर्जन के गीत का विषय।
और रोक-टोक सहना उसे स्वीकार न था। वह उन लोगों के समान था जिनकी चर्चा भविष्यद्वक्ता करता है,
436जो बैठे-बैठे अपनी सगी माँ के बेटे की चुगली खाते हैं; हाँ, वह अपनी पत्नी के विषय में भी निन्दा की बातें कहता था, यद्यपि उसका विवेक उससे कहता था, और बहुत से लोग गवाही देते, कि वह एक बड़ी सद्गुणी स्त्री थी। वह स्वयं अपनी पत्नी के मित्रों पर भी झूठे दोष गढ़ता, यह दावा करते हुए कि उनकी शिक्षा लुचपन की ओर ले जाती है, और कि वे अपनी सभाओं में ऐसे काम करते हैं जो स्त्री-पुरुषों को शोभा नहीं देते, कि वे अशुद्धता करते हैं, इत्यादि। वह उन लोगों के समान था जिन्होंने यह दावा किया कि
437प्रेरित ने कहा, आओ हम बुराई करें कि भलाई निकले: या उनके समान जिनके विषय में 438यों लिखा है: वे कहते हैं, दोष लगाओ, और हम भी उस पर दोष लगाएँगे। और यदि उसे कोई ऐसी बात हाथ लग जाती जिसमें कलंक हो, यदि वह केवल धर्म का अंगीकार करनेवालों को छूती हो, चाहे वह कितनी ही झूठी क्यों न फैलाई गई हो; ओह! तब वह घमण्ड करता, हँसता, और आनन्दित होता, और उसे सारे दल पर डाल देता: यह कहते हुए, फाँसी चढ़ें ये
बदमाश, इस सारे पवित्र भाईचारे के पीपे में एक भी हेरिंग मछली दूसरी से अच्छी नहीं: जैसे को तैसा, शैतान ने कोयलेवाले से कहा, यही है तुम्हारा नियम-पक्का टोला। और फिर वह एक शाप के साथ सब को घर विदा कर देता।
सावधान. यदि धर्म का अंगीकार करनेवाले बुद्धिमान हों, तो श्रीमान दुर्जन की ताक-झाँक और बातें उन्हें सब बातों में और भी अधिक चौकस और सावधान बना देंगी।
बुद्धिमान. आप सच कहते हैं। क्योंकि जब हम देखते हैं कि लोग हमारे लड़खड़ाने की ताक में रहते हैं, और 439हमें ठोकर खाते और गिरते देखकर आनन्दित होते हैं, तो इससे हमें और भी कहीं अधिक सावधान हो जाना चाहिए।
मैं सचमुच सोचता हूँ कि जो लोग प्रभु का भय मानते हैं, उनके विषय में झूठ और झूठी कहानियाँ सुनना, गढ़ना, और सुनाना श्रीमान दुर्जन को उतना ही सुहावना लगता था, जितना थक जाने पर बिस्तर पर जाना। परन्तु इस समय हम इन बातों को जाने देंगे। क्योंकि जैसे वह इन बातों में काफ़ी बुरा था, वैसे ही उसने इनके साथ ऐसी ही और बहुत सी बुराइयाँ जोड़ दीं।
440 वह एक क्रोधी, कोपी, डाह करनेवाला मनुष्य था, ऐसा मनुष्य जो नहीं जानता था कि नम्रता या कोमलता का क्या अर्थ है, और न वह सीखना चाहता था। उसका स्वाभाविक मिज़ाज रूखा, चिड़चिड़ा, और अक्खड़ था, बल्कि उससे भी बुरा; और उसने इस विषय में अपने मिज़ाज को इतनी छूट दे दी, कि वह उसे सब बातों में उग्र और उपद्रवी बना देता था, विशेषकर स्वयं भलाई के विरुद्ध, और दूसरी
441बातों के विरुद्ध भी, जब वह अप्रसन्न होता था।
सावधान. सुलैमान कहता है, जो क्रोध से भड़कता है वह मूर्ख है।
442 बुद्धिमान. वह ऐसा ही कहता है; और इसके अतिरिक्त यह भी कहता है, कि क्रोध मूर्खों ही के हृदय में रहता है। और सचमुच, यदि किसी के हृदय में क्रोध का बसे रहना उसके मूर्ख होने का चिह्न है, तो श्रीमान दुर्जन, अपनी योग्यताओं के विषय में अपने सारे घमण्ड के होते हुए भी, कोई छोटा-मोटा मूर्ख नहीं था।
436 भजन संहिता 50:19, 20।
439 जब दुष्ट ताक में रहें, तब परमेश्वर के लोगों को चौकस रहना चाहिए।
440 दुर्जन एक क्रोधी, डाह करनेवाला मनुष्य।
सावधान. मूर्ख प्रायः अपनी ही दृष्टि में सबसे अधिक बुद्धिमान होते हैं।
बुद्धिमान. सच है। परन्तु मैं कह रहा था, कि यदि मनुष्य के हृदय में क्रोध का बसना उसके मूर्ख होने का चिह्न है; तो आप क्या सोचते हैं, जब द्वेष और डाह वहाँ बसते हैं, तो वह किस बात का चिह्न है? क्योंकि जहाँ तक मैं जानता हूँ, श्रीमान दुर्जन उतना ही द्वेषी और डाही मनुष्य था जितने के विषय में आप साधारणतः सुन सकते हैं।
443 सावधान. निश्चय ही, द्वेष और डाह घमण्ड और अहंकार से निकलते हैं, और वे फिर अज्ञानता से, और अज्ञानता शैतान से; और मैंने सोचा था, कि चूँकि आपने पहले श्रीमान दुर्जन के घमण्ड की बात की थी, तो बात समाप्त करने से पहले हमें इनके विषय में भी कुछ सुनने को मिलेगा।
बुद्धिमान. डाह सचमुच अज्ञानता से निकलती है। और यह श्रीमान दुर्जन, जिसके विरुद्ध हो जाता, उसके प्रति ऐसा डाही था, कि वह उससे ऐसा फूल जाता था, जैसे, कहावत के अनुसार, भेक विष से फूल जाता है।
जिससे वह बैर रखता था, वह जब कभी उससे मिलता, या जिस किसी बात में उसका उससे काम पड़ता, वह उसके चेहरे पर डाह को साफ़ पढ़ सकता था।
उसकी डाह ऐसी सड़ी हुई और प्रबल थी, कि यदि वह कभी किसी मनुष्य के विरुद्ध अपना सिर उठाती, तो फिर मुश्किल से ही कभी वापस खींची जाती: वह उस मनुष्य को हानि पहुँचाने के लिये उसकी ऐसी ताक में रहता, जैसे बिल्ली चूहे को मारने के लिये उसकी ताक में रहती है; हाँ, वह सात वर्ष तक प्रतीक्षा करता, पर उसे हानि पहुँचाने का अवसर पाकर ही रहता, और जब उसे अवसर मिल जाता, तो वह उसे अपनी डाह का बोझ महसूस करा देता।
डाह एक शैतानी वस्तु है, पवित्रशास्त्र संकेत करता है कि कोई उसके सामने ठहर नहीं सकता। पत्थर तो भारी है और बालू में बोझ है, परन्तु मूढ़ का क्रोध उन दोनों से भारी है। क्रोध तो क्रूर,
444 445और प्रकोप धारा के समान होता है, परन्तु डाह के सामने कौन ठहर सकता है?
446 यह डाह, अपनी गन्दगी के कारण, सबसे घिनौनी दुष्टताओं में गिनी जाती है, जैसे व्यभिचार, हत्या, मतवालापन, लीलाक्रीड़ा, टोना, विधर्म, फूट, इत्यादि। हाँ, यह ऐसी घातक भ्रष्टता है, कि जिसमें यह बसती है उसकी हड्डियों तक को सड़ा देती है। शान्त मन
447तन का जीवन है, परन्तु डाह हड्डियों की सड़न है।
सावधान. यह डाह तो बहुत सी घिनौनी और भयंकर 448दुष्टताओं का ठीक पिता और माता है: मैं कहता हूँ, यह उनका ठीक पिता और माता है; यह उन्हें उत्पन्न भी करती है, और उनका पालन-पोषण भी करती है, जब तक कि वे उस मनुष्य के हृदय में जो उन्हें पालता है अपनी शापित परिपक्वता तक न पहुँच जाएँ।
बुद्धिमान. आपने इसे बहुत सी दूसरी भयंकर दुष्टताओं का पिता और माता कहकर, इसका बिलकुल ठीक वर्णन किया है: क्योंकि यह ऐसी विषैली और नीच वस्तु है, कि यह प्रकृति के सारे क्रम को बिगाड़ देती है, और उसे गड़बड़ी के सिवा और किसी काम का नहीं छोड़ती,
443 डाह कहाँ से निकलती है।
445 चारों में डाह सबसे बुरी।
448 डाह बहुत सी दुष्टताओं का पिता और माता है।
और उसे हर बुरी वस्तु का अड्डा बना देती है। क्योंकि जहाँ डाह और विरोध होता है, वहाँ बखेड़ा और हर प्रकार का
449दुष्कर्म भी होता है। इसलिये, मैं कहता हूँ, आपने इसे ठीक ही बहुत से दूसरे पापों का पिता और माता कहा है। और अब हमारी और अधिक उन्नति के लिये, मैं डाह की कुछ सन्तानों को गिनाऊँगा।
450 1. डाह, जैसा मैंने आपसे पहले कहा, उसे पालनेवाले की हड्डियों तक को सड़ा देती है। और, 2. जैसा आपने भी संकेत किया है, यह पत्थर से, बालू से भी भारी है; हाँ, और मैं यह जोड़ूँगा, कि यह सिर पर चक्की के पाट के समान गिरती है। इसलिये,
3. यह उसे भी मार डालती है जो इसे फेंकता है, और उसे भी जिस पर यह फेंकी जाती है। डाह भोले को मार डालती है।
451 अर्थात्, उसे जिसमें यह बसती है, और उसे जो इसका निशाना है।
4. इसी ने स्वयं यीशु मसीह को भी मार डाला; क्योंकि उसके विरोधियों ने 452 453अपनी डाह के कारण उसे सताया।
454 5. डाह ही के कारण यूसुफ को उसके भाइयों ने मिस्र में बेच दिया:
455 456 6. परमेश्वर के पवित्र लोगों में फूट डालने में डाह ही का हाथ होता है।
7. पापियों के मन की डाह ही उन्हें परमेश्वर के सेवकों को अपने सिवानों से निकाल देने के लिये उकसाती है।
8. मैं और क्या कहूँ? डाह ही कानाफूसियों, झगड़ों, पीठ पीछे की बुराइयों, निन्दाओं, अपमानों, हत्याओं, इत्यादि की ठीक पौधशाला है।
इस पापमय जड़ के सब अलग-अलग फलों को गिनाना सम्भव नहीं। इसलिये, इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि श्रीमान दुर्जन ऐसे बुरे स्वभाव का मनुष्य था, क्योंकि हर प्रकार की दुष्टता की बड़ी-बड़ी जड़ें उसमें थीं, बिना मारी हुई, बिना घायल हुई, बिना छुई हुई।
457 सावधान. परन्तु श्रीमान दुर्जन का यह मामला तो सचमुच अनोखा है, कि अपने सारे जीवन में उसे अपने बुरे ढंग से बिताए जीवन के लिये कभी पछतावा न हुआ।
बुद्धिमान. पछतावा, मैं नहीं कह सकता कि उसे कभी हुआ, यदि पछतावे से आपका अर्थ अपनी 458बुराइयों के लिये पश्चाताप है। फिर भी मुझे स्मरण है कि दो बार वह अपनी दशा के विषय में कुछ मानसिक व्याकुलता में पड़ा था:
एक बार जब वह शराबखाने से मतवाला होकर घर आते हुए अपनी टाँग तोड़ बैठा; और दूसरी बार जब वह बीमार पड़ा, और सोचा कि वह मर जाएगा: इन दो बारों के सिवा, मुझे और कोई बार स्मरण नहीं।
450 डाह की कुछ सन्तानें।
456 प्रेरितों के काम 13:14। (पाठ में यह कहाँ बैठता है, दिखाई नहीं देता।—DP) 457 एक अनोखी बात।
458 श्रीमान दुर्जन कुछ मानसिक व्याकुलता में।
सावधान. तो क्या उसने अपनी टाँग तोड़ी थी?
बुद्धिमान. हाँ: एक बार, जब वह शराबखाने से मतवाला होकर घर आ रहा था।
सावधान. कृपया बताइए, उसने उसे कैसे तोड़ा?
बुद्धिमान. क्यों, एक बार वह एक शराबखाने में था, उस दुष्ट घर में, जो उसके घर से कोई दो-तीन मील दूर था, और वहाँ दिन का अधिकांश भाग जमकर पीने के बाद, जब रात आई, तो वह और न ठहरा, पर अपना घोड़ा मँगवाता है, उस पर चढ़ता है, और एक पागल के समान (जैसे मतवाले लोग प्रायः सवारी करते हैं) चल पड़ता है, जितनी तेज़ी से घोड़ा ज़मीन पर पाँव रख सकता था।
इस प्रकार वह सवारी करता रहा, यहाँ तक कि एक कीचड़ भरे स्थान पर पहुँचा, जहाँ उसका घोड़ा छटपटाता हुआ घुसा, गिर पड़ा, अपने मालिक को फेंक दिया, 459 460और उसके गिरने से उसकी टाँग टूट गई: सो वह वहीं पड़ा रहा। परन्तु आप सोच भी नहीं सकते कि पहले-पहल उसने कैसी कसमें खाईं। परन्तु कुछ देर बाद, जब वह होश में आया, और अपनी पीड़ा से, और अपनी टाँग के बेकार हो जाने से, यह अनुभव किया कि वह किस दशा में है, और यह भी डरा कि यह घटना कहीं उसकी मृत्यु न बन जाए;
461तो वह ऐसे लोगों की रीति के अनुसार चिल्लाने लगा; हे प्रभु मेरी सहायता कर, हे प्रभु मुझ पर दया कर, हे भले परमेश्वर मुझे छुड़ा, इत्यादि। सो वह वहीं पड़ा रहा, जब तक कि कुछ लोग उधर से न निकले, जिन्होंने उसे उठाया, और घर ले गए, जहाँ वह कुछ समय तक पड़ा रहा, इससे पहले कि वह फिर बाहर जा सके।
सावधान. और तब, आप कहते हैं, उसने परमेश्वर को पुकारा।
बुद्धिमान. वह अपनी पीड़ा में चिल्लाया, और कहता था, हे परमेश्वर, और हे प्रभु, मेरी सहायता कर: परन्तु यह इसलिये था कि उसका पाप क्षमा हो, और उसका प्राण उद्धार पाए, या इसलिये कि 462उसकी पीड़ा से छुटकारा मिले, यह मैं निश्चित रूप से नहीं कहूँगा; यद्यपि मुझे डर है कि यह केवल बाद वाली बात के लिये था; क्योंकि, जब उसकी पीड़ा चली गई, और उसे अच्छे होने की आशा हो गई, बाहर जा सकने से भी पहले, उसने प्रार्थना को त्याग दिया, और अपना पुराना खेल आरम्भ कर दिया; अर्थात्, वैसा ही बुरा बनना जैसा वह पहले था। तब वह अपने पुराने साथियों को बुलवा भेजता; उसकी कुलटाएँ भी उसे देखने उसके घर आतीं, और उनके साथ वह, अपनी लँगड़ी टाँग के रहते जितना हो सकता था, उतना ही दुराचारी होता जितनी वे जी भरकर हो सकती थीं।
सावधान. आश्चर्य है कि उसकी गर्दन न टूटी।
बुद्धिमान. उसकी टाँग के बदले उसकी गर्दन चली जाती, यदि परमेश्वर उसके प्रति धीरज न धरता; वह दस हज़ार बार इसके योग्य ठहर चुका था। जैसा मैंने सुना है, और जैसा मैं पहले आपसे संकेत कर चुका हूँ, बहुत से ऐसे हुए हैं, जो उसके समान मतवाले होकर अपने घोड़ों पर चढ़े; परन्तु वे प्याले से सीधे कब्र में गए; क्योंकि शराबखाने और घर के बीच उनकी गर्दनें टूट गईं। हमारे पास ही का एक मनुष्य भी पी-पीकर मर गया; वह पीता रहा, और अपने नशे ही में मर गया।
सावधान. मतवालेपन में मरना बड़े दुःख की बात है।
बुद्धिमान. हाँ, ऐसा ही है: परन्तु फिर भी मुझे आश्चर्य है कि और अधिक लोग ऐसे नहीं मरते। क्योंकि जब मैं 463उस पाप की घोरता पर विचार करता हूँ, और यह कि उसके साथ कितने और पाप लगे रहते हैं, जैसे कसमें, ईशनिन्दा,
459 श्रीमान दुर्जन ने अपनी टाँग तोड़ी।
462 इसका उस पर कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता।
463 मतवालेपन के साथ कितने पाप लगे रहते हैं।
झूठ, लीलाक्रीड़ा, वेश्यागमन, मारपीट, इत्यादि, तो मुझे आश्चर्य होता है, कि जो कोई उस पाप में जीते हैं वे स्वर्ग से ऐसी मार से कैसे बच जाते हैं जो उन्हें लुढ़काकर उनकी कब्रों में डाल दे। इसके अतिरिक्त, जब मैं यह भी सोचता हूँ कि वे, पशुओं के समान मतवाले होकर, ख़तरे के किसी भी डर के बिना, पागलख़ाने के बावलों और उन्मत्तों के समान घोड़ा दौड़ाते हैं, मानो वे परमेश्वर को चुनौती देते हों कि उनके मतवालेपन के लिये, यदि उसमें साहस हो, तो उनसे उलझकर दिखाए: मैं कहता हूँ, मुझे आश्चर्य होता है कि वह उन पर से अपने रक्षा करनेवाले विधान क्यों नहीं हटा लेता, और उन्हें उन ख़तरों और विनाशों के हाथ क्यों नहीं छोड़ देता जिनके योग्य वे अपने पाप के कारण ठहरे हैं, और जिनमें वे अपने पागलपन के कारण स्वयं कूद पड़ना चाहते हैं:
464केवल मैं फिर यह सोचता हूँ, कि उसने एक दिन ठहराया है जिसमें वह उनसे लेखा लेगा, और वह सामान्यतः कुछ लोगों को उदाहरण भी बना देता है, यह दिखाने के लिये कि वह उनके पाप पर ध्यान देता है, उनकी चाल से घृणा करता है, और ठहराए हुए समय पर उसके लिये उनसे हिसाब लेगा।
सावधान. यह हमारे ध्यान देने योग्य है, कि परमेश्वर, मनुष्यों के पापों के प्रति अपनी अप्रसन्नता दिखाने के लिये, उनमें से कुछ को एक ही मार से कैसे गिरा देता है; जैसे श्रीमान दुर्जन की टाँग का टूटना, क्योंकि निःसन्देह वह स्वर्ग से एक मार थी।
बुद्धिमान. यह सचमुच ध्यान देने योग्य है। यह एक खुली मार थी, यह उस पर तब पड़ी जब वह अपने पाप के चरम पर था: और यह अय्यूब के उस वचन से बहुत मेल खाती है; इसलिये वह उनके कामों को भली भाँति जानता है, और वह उन्हें रात में ऐसा उलट देता है कि वे चूर-चूर हो जाते हैं। वह उन्हें
465दुष्ट जानकर दूसरों के खुले देखते मारता है: या जैसा हाशिये में पढ़ा जाता है, देखनेवालों के स्थान में। 466वह अपनी मार से उन्हें देखनेवालों के स्थान में गिरा देता है। वहाँ श्रीमान दुर्जन पड़ा था, उसकी मार पर हर एक का ध्यान गया: उस समय उसकी टूटी टाँग सारे नगर की चर्चा थी। श्रीमान दुर्जन ने अपनी टाँग तोड़ ली है, एक कहता है: उसने उसे कैसे तोड़ा? दूसरा कहता है: अमुक शराबखाने से मतवाला होकर घर आते हुए, तीसरे ने कहा; उस पर परमेश्वर का दण्ड है, चौथे ने कहा। इस प्रकार उसका पाप, उसकी लज्जा, और उसका दण्ड, सब उसके आस-पास के सब लोगों पर प्रगट कर दिए गए। मैं यहाँ आपको एक-दो कहानियाँ और सुनाऊँगा।
467 मैंने श्रीमान क्लार्क की पापियों के लिये दर्पण में पढ़ा है; कि एक बार, एक मतवाले व्यक्ति ने अपने नशे में डींग मारी, कि न तो स्वर्ग है न नरक; उसने यह भी कहा,
कि वह मानता है, कि मनुष्य में कोई प्राण नहीं, और कि जहाँ तक उसकी अपनी बात है, वह अपना प्राण किसी को भी बेच देगा जो उसे मोल ले। तब उसके साथियों में से एक ने एक प्याला दाखमधु के बदले उसे उससे मोल ले लिया; और तुरन्त मनुष्य के रूप में शैतान ने उसी दाम पर उसे उस मनुष्य से फिर मोल ले लिया; और इस प्रकार उन सब के सामने इस प्राण-बेचनेवाले को पकड़ लिया, और उसे हवा में उड़ा ले गया, यहाँ तक कि फिर कभी उसका कुछ पता न चला।
पृष्ठ 148 में, वह हमें यह भी बताता है: कि सैलिसबरी में एक मनुष्य था, जो एक मदिरालय में जाम पर जाम पीते और रंगरलियाँ मनाते हुए, शैतान के नाम का जाम पी गया, यह कहते हुए, कि यदि शैतान आकर उसके जाम का उत्तर न दे, तो वह विश्वास न करेगा कि कोई परमेश्वर या 464 प्रेरितों के काम 17:30, 31, 32।
465 अय्यूब 34:24, 25, 26।
शैतान भी है। इस पर उसके साथी भय से घबराकर, जल्दी से कमरे से बाहर निकल गए: और तुरन्त बाद, एक भयानक शोर सुनकर, और एक दुर्गन्ध सूँघकर, मदिरालय का मालिक दौड़कर ऊपर कमरे में गया; और भीतर आकर, उसने अपने अतिथि को न पाया, और देखा कि खिड़की टूटी हुई है, उसमें लगी लोहे की छड़ मुड़ी हुई और लहू से सनी है: परन्तु उस मनुष्य का फिर कभी कुछ पता न चला।
फिर, पृष्ठ 149 में वह हमें हेडली के एक बेलिफ़ के विषय में बताता है: जो एक प्रभु के दिन मेलफ़ोर्ड में मतवाला होकर, सड़कों पर से सवारी करने को अपने घोड़े पर चढ़ा, यह कहते हुए, कि उसका घोड़ा उसे शैतान के पास ले जाएगा: और तुरन्त उसके घोड़े ने उसे फेंक दिया, और उसकी गर्दन टूट गई। ये बातें श्रीमान दुर्जन की टाँग टूटने से भी बुरी हैं, और उसके सब जीवित मित्रों के लिये चेतावनी होनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि वे भी अपने पाप के कारण परमेश्वर के इन दुःखद दण्डों में पड़ जाएँ।
परन्तु, जैसा मैंने कहा, श्रीमान दुर्जन ने शीघ्र ही सब कुछ भुला दिया, उसकी टाँग ठीक होने से पहले ही उसका विवेक घुट गया। और इसलिये, एक पाप के फल से अभी पूरी तरह ठीक भी न हुआ था, कि वह परमेश्वर की परीक्षा करता है कि वह उसे पकड़ने के लिये एक और दण्ड भेजे: और उसने शीघ्र ही ऐसा किया भी। क्योंकि उसकी टाँग ठीक होने के बहुत महीने बाद नहीं, उसे एक बहुत ही ख़तरनाक बीमारी का दौरा पड़ा, यहाँ तक कि अब वह
468सोचने लगा कि वह सचमुच मर ही जाएगा।
सावधान. अच्छा, तब उसने क्या सोचा और क्या किया?
बुद्धिमान. उसने सोचा कि उसे नरक जाना पड़ेगा; यह मैं जानता हूँ, क्योंकि वह ऐसा कहे बिना रह न सका।
469 जहाँ तक मुझे ठीक-ठीक स्मरण है, वह सारी एक रात डर के मारे चिल्लाता पड़ा रहा, और बीच-बीच में वह 470ऐसा काँपता, कि उसके नीचे का बिस्तर तक हिल जाता। परन्तु, ओह! मृत्यु के, नरक की आग के, और अनन्त न्याय के विचार तब उसके विवेक को कैसी यातना देते थे। डर उसके चेहरे पर, और उसके इधर-उधर करवटें बदलने में दिखाई देता था: वह उसकी बातों में भी सुनाई देता था, और उसकी भारी कराहों से समझा जा सकता था। वह बार-बार चिल्लाता, मैं नष्ट हो गया, मैं नष्ट हो गया; मेरे नीच जीवन ने मुझे नष्ट कर दिया।
सावधान. तो उसके पहले के नास्तिक विचार और सिद्धान्त अब इतने निर्बल थे कि उसे अनन्त नरक-दण्ड के भय से सम्भाल न सके।
बुद्धिमान. आह! वे सचमुच बहुत निर्बल थे। वे विवेक को दबाने के काम आ सकते हैं, जब मनुष्य अपनी समृद्धि के बीच होता है, और मन को सब अच्छी सलाह के विरुद्ध कठोर कर सकते हैं जब 471मनुष्य परमेश्वर द्वारा छोड़ दिया जाता है, और अपने निकम्मे मन के वश में सौंप दिया जाता है: परन्तु हाय, नास्तिक विचार,
धारणाएँ और मत, तब अवश्य सिकुड़कर पिघल जाते हैं, जब परमेश्वर ऐसे पापी के प्राण की, उसके पाप के कारण, सुधि लेने के लिये बीमारी भेजता है, हाँ, बीमारी लेकर आता है। हमसे कोई 12 मील दूर एक मनुष्य रहता था, जिसने अपने आप को अपनी नास्तिक धारणाओं में ऐसा ढाल लिया था, कि अन्त में उसने यीशु मसीह के विरुद्ध, और पवित्रशास्त्र के ईश्वरीय अधिकार के विरुद्ध एक पुस्तक लिखने का प्रयत्न किया। (परन्तु मैं समझता हूँ कि वह छपी नहीं थी:) अच्छा, बहुत दिनों के बाद परमेश्वर ने उसे बीमारी से मारा, जिससे वह मर गया।
सो, बीमार पड़े हुए, और अपने पहले के कामों पर सोच-विचार करते हुए, वह पुस्तक जो उसने लिखी थी 468 श्रीमान दुर्जन बीमार पड़ा।
469 उसका विवेक घायल हुआ।
470 वह अपनी बीमारी में चिल्लाता है।
471 उसकी नास्तिकता अब उसकी सहायता न करेगी।
उसके मन में आई, और उसके साथ उसे लिखने की अपनी बुराई का ऐसा बोध हुआ, कि उसने उसके विवेक को ऐसा फाड़ डाला जैसे 472सिंह बकरी के बच्चे को फाड़ डालता है। इसलिये वह अपनी मृत्यु-शय्या पर दुःखद दशा में, और विवेक की बड़ी पीड़ा में पड़ा रहा: मेरे कुछ मित्र भी उसे देखने गए; और एक दिन जब वे उसके कमरे में थे, उसने जल्दी से कलम, स्याही और कागज़ माँगा, और जब वह उसे दिया गया, तो उसने उसे लेकर इस आशय से लिखा। मैं, अमुक व्यक्ति, अमुक नगर का, यीशु मसीह के विरुद्ध, और पवित्रशास्त्र के विरुद्ध एक पुस्तक लिखने के कारण, नरक की आग में जाने को हूँ: और वह अपने घर की खिड़की से कूदकर आत्महत्या भी कर लेता, परन्तु उन्होंने उसे ऐसा करने से रोक लिया: सो वह अपने बिस्तर पर मरा, वह मृत्यु जैसी भी थी। भला होगा यदि दूसरे उससे चेतावनी लें।
सावधान. यह एक उल्लेखनीय कहानी है।
बुद्धिमान. यह जितनी उल्लेखनीय है उतनी ही सच्ची भी है; मैंने इसे उन लोगों से सुना है जिन पर मैं विश्वास करने का साहस करता हूँ, जो स्वयं भी आँखों देखे और कानों सुने गवाह थे; और जिन्होंने उसे अपनी बाहों में थाम लिया, और उसे बचा लिया जब वह अपने कमरे की खिड़की से कूदकर अपना नाश करना चाहता था।
सावधान. अच्छा, आपने मुझे बताया है कि श्रीमान दुर्जन के (अब बीमार होने पर) अपनी दशा के विषय में क्या विचार थे; कृपया मुझे यह भी बताइए कि जब वह बीमार था तब उसने क्या किया?
बुद्धिमान. किया! उसने बहुत से ऐसे काम किए, जिनके करने का, मुझे निश्चय है, उसने कभी सोचा भी न था, और जिनकी, निश्चय ही, उसकी पत्नी और बच्चों को आशा न थी।
बीमारी के इस दौरे में, अपनी पत्नी के विषय में उसके विचार बिलकुल बदल गए; मैं कहता हूँ उसके विचार, 473जहाँ तक उसकी बातों और उसके प्रति उसके व्यवहार से अनुमान लगाया जा सकता था। क्योंकि अब वह उसकी भली पत्नी, उसकी भक्त पत्नी, उसकी ईमानदार पत्नी, उसकी मैना, और उसकी प्यारी, और सब कुछ थी। अब उसने उससे कहा, कि उसका भाग सबसे अच्छा है, क्योंकि उसका भला जीवन उसके साथ खड़ा है, जबकि उसका अपना लम्पटपन और भक्तिहीन
जीवन सदा उसकी आँखों के सामने घूरता रहता था। अब उसने उससे कहा, कि जो सलाह वह उसे प्रायः देती थी, वह अच्छी थी; यद्यपि वह ऐसा बुरा था कि उसे मानता न था।
अब वह उसकी बातें सुनता था, और जब वह ऐसा करती, तो वह उसके पास आहें भरता पड़ा रहता।
474अब वह उससे कहता कि वह उसके लिये प्रार्थना करे, कि वह नरक से छुड़ाया जाए।
अब वह इस बात पर भी राज़ी हो जाता, कि उसके कुछ भले पादरी उसे शान्ति देने के लिये उसके पास आएँ; और जब वे आते तो वह उनके प्रति कृपा दिखाता सा जान पड़ता, क्योंकि वह उनसे मीठी बातें करता, और जो कुछ वे कहते उसे ध्यान से सुनता, केवल वह यह न चाहता था कि वे उसके बुरे ढंग से बिताए जीवन की बहुत चर्चा करें, क्योंकि उसका विवेक पहले ही उससे बोझिल था; अब उसे अपने पुराने साथियों को देखने की इच्छा न थी, उनका विचार ही उसके लिये यातना था: और अब वह अपने उस बच्चे से भी प्रेम से बोलता जो अपनी माता के पदचिह्नों पर चलता था, यद्यपि पहले वह उसे बिलकुल सह न सकता था।
उसने भले लोगों से प्रार्थनाओं की भी विनती की, कि परमेश्वर अपनी दया से उसे थोड़े दिन और जीवित रहने दे, यह प्रतिज्ञा करते हुए कि यदि परमेश्वर उसे इस बार केवल चंगा हो जाने दे, तो वह परमेश्वर के प्रति कैसा नया, कैसा पश्चातापी मनुष्य बनेगा, और अपनी
472 परमेश्वर के क्रोध का एक भयानक उदाहरण।
473 बीमार होने पर श्रीमान दुर्जन ने और क्या किया।
474 श्रीमान दुर्जन में बड़ा परिवर्तन हुआ।
पत्नी के प्रति कैसा प्रेमी पति बनेगा: वह उसे कैसी स्वतन्त्रता देगा, हाँ वह स्वयं उसके साथ उसके
पादरियों को सुनने कैसे जाएगा, और कैसे वे दोनों हाथ में हाथ डाले स्वर्ग के मार्ग में साथ-साथ चलेंगे।
सावधान. यह तो बातों का बड़ा सुन्दर दिखावा था; मैं दावे से कहता हूँ, उसकी पत्नी इससे प्रसन्न हुई होगी।
बुद्धिमान. उसकी पत्नी! हाँ, और उसके अतिरिक्त बहुत से भले लोग भी: सारे नगर में इसकी चर्चा फैल गई, 475 कि श्रीमान दुर्जन में कैसा बड़ा परिवर्तन हुआ है; वह अपने पापों के लिये कितना दुःखी है, वह कैसे अपनी पत्नी से प्रेम करने लगा है, वह कैसे चाहता है कि भले लोग परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह उसे जीवित रहने दे; और उसने अपनी बीमारी में परमेश्वर से अब क्या-क्या प्रतिज्ञाएँ कीं, कि यदि वह कभी उसे बीमारी की खाट से उठाकर फिर स्वस्थ कर दे, तो वह परमेश्वर के प्रति कैसा नया पश्चातापी मनुष्य बनेगा, और अपनी भली पत्नी के लिये कैसा प्रेमी पति।
अच्छा, पादरियों ने प्रार्थना की, और भले लोग आनन्दित हुए, यह सचमुच सोचकर कि अब उन्होंने एक मनुष्य को शैतान से छीन लिया है; हाँ, कुछ दुर्बल प्रकार के लोग तो यह कहने से भी न हिचके कि परमेश्वर ने
476उसके हृदय में अनुग्रह का काम आरम्भ कर दिया है; और उसकी पत्नी, बेचारी स्त्री, आप सोच भी नहीं सकते कि वह इसे ऐसा ही मान लेने को कितनी तत्पर थी; वह आनन्दित हुई, और उसने वैसी ही आशा की जैसा वह चाहती थी। परन्तु, हाय! हाय! थोड़े ही समय में सब बातें कुछ और ही निकलीं।
कुछ समय तक बिस्तर पर पड़े रहने के बाद, उसका रोग घटने लगा, और वह अपने आप को अच्छा महसूस करने लगा, सो थोड़े ही समय में वह इतना अच्छा हो गया कि घर में इधर-उधर चल-फिर सकता था, और 477उसे भोजन की बड़ी अच्छी भूख भी लगने लगी: और अब उसकी पत्नी और उसके भले मित्र मुँह बाए खड़े थे, यह देखने को कि श्रीमान दुर्जन परमेश्वर के प्रति नया और अपनी पत्नी के प्रति प्रेमी बनने की अपनी प्रतिज्ञा पूरी करता है: परन्तु केवल उलटा ही दिखाई दिया। क्योंकि ज्योंही उसे अच्छे होने की आशा हुई, और उसने पाया कि उसकी शक्ति लौटने लगी है, त्योंही उसकी व्याकुलता उसके मन से जाने लगी, और वह अपने भयों और डरों से ऐसा अनजान हो गया, मानो वे उसे कभी हुए ही न थे।
परन्तु सचमुच, मैं यह सोचने को प्रवृत्त हूँ, कि बीमारी की खाट पर के अपने भयों पर फिर ध्यान न देने, या उन्हें स्मरण न रखने, और उनसे कुछ भी अच्छा न बनने का एक कारण, वे कुछ शब्द थे जो उस वैद्य ने, जो उसे दवा देता था, उससे तब कहे जब वह अच्छा हो रहा था। क्योंकि ज्योंही श्रीमान दुर्जन अच्छा होने लगा, वैद्य आता है और उसके घर में उसके पास बैठ जाता है, और वहाँ उससे उसके रोग के स्वभाव के विषय में बातचीत करने लगा; और दूसरी बातों के साथ उन्होंने दुर्जन की व्याकुलता की भी चर्चा की, और यह कि वह कैसे चिल्लाता, काँपता, और नरक जाने के अपने भय प्रगट करता था
478जब उसकी बीमारी उस पर बहुत भारी थी। इस पर वैद्य ने उत्तर दिया: कि वे भय और चीख़-पुकार उसके रोग की तीव्रता से उत्पन्न हुए थे, क्योंकि उस रोग के साथ प्रायः सिर का हल्कापन रहता है, इस कारण कि रोगी सो नहीं पाता, और इस कारण कि वाष्पें मस्तिष्क को अशान्त कर देती हैं: परन्तु आप देखते हैं महोदय, उसने कहा, कि ज्योंही आपको नींद आई और आपने विश्राम किया, आप शीघ्र अच्छे हो गए, और आपका सिर ठिकाने आ गया, और इस प्रकार वे उन्माद आपको छोड़ गए।
475 श्रीमान दुर्जन के परिवर्तन की नगर-चर्चा।
476 उसकी पत्नी को शान्ति मिलती है।
477 श्रीमान दुर्जन अच्छा हो जाता है और अपनी पुरानी चाल पर लौट आता है।
478 अज्ञानी वैद्य शरीरों को चंगा करते हुए प्राणों को मार डालते हैं।
क्या सचमुच ऐसा था, श्रीमान दुर्जन ने सोचा; क्या मेरी व्याकुलताएँ केवल मेरे रोग का परिणाम थीं, और इसलिये थीं कि बुरी वाष्पें मेरे मस्तिष्क में चढ़ गई थीं? तो निश्चय, जब मेरा वैद्य ही मेरा उद्धारकर्ता था, तो मेरी वासना फिर से मेरा परमेश्वर होगी। सो उसने फिर कभी धर्म की परवाह न की, परन्तु फिर से संसार, अपनी वासनाओं और दुष्ट साथियों की ओर लौट गया: और इस प्रकार श्रीमान दुर्जन के मन-परिवर्तन का अन्त हो गया।
सावधान. मैंने सोचा था, (जैसे-जैसे आप मुझे उसके विषय में बता रहे थे) कि सब का परिणाम यही होगा; क्योंकि आपके बातें वर्णन करने से मैंने पहचान लिया था, कि मन-परिवर्तन के सच्चे लक्षण उसमें नहीं थे, और जो कुछ उनके जैसा दिखाई देता था, वह केवल ऐसा था जैसा त्यागे हुए लोगों में भी हो सकता है।
बुद्धिमान. आप ठीक कहते हैं, क्योंकि उसमें, जब वह सबसे अधिक सचेत था, तब भी अपने स्वभाव की मलिनता का बोध नहीं था; उसे केवल अपने पापपूर्ण कामों का दोष-बोध था, जो कैन, और फ़िरौन,
479और शाऊल, और यहूदा, इन त्यागे हुए लोगों को, उससे पहले भी हुआ था।
इसके अतिरिक्त, जिन बड़ी बातों की वह इच्छा करता था, वे ये थीं, कि वह नरक जाने से बचाया जाए, (और कौन अपनी इच्छा से जाएगा?) और कि इस संसार में उसकी आयु बढ़ाई जाए। उसने जो कुछ कहा या किया, उस सब में हम यह नहीं पाते, कि उसने उद्धारकर्ता यीशु मसीह की इच्छा इस बोध से की हो कि उसे
480उसकी धार्मिकता की आवश्यकता है कि वह उसे पहनाए, और उसके आत्मा की कि वह उसे पवित्र करे।
उसकी अपनी शक्ति उसमें ज्यों की त्यों बनी थी, उसने अपने मन के विश्वासघात को कुछ भी न देखा; क्योंकि यदि देखता, तो वह परमेश्वर से सुधार की प्रतिज्ञाएँ करने में कभी ऐसा उदार न होता। वह तो इस बात से डरता, कि यदि वह अच्छा हो गया, तो कहीं कुत्ते के समान अपनी छाँट की ओर फिर न लौट जाए, और इसी कारण वह पवित्र लोगों से प्रार्थनाओं की, और स्वर्ग से सहायता की भीख माँगता, कि वह ऐसा करने से बचाया जाए।
यह सच है कि उसने भले लोगों से प्रार्थनाओं की भीख माँगी, और ऐसा ही फ़िरौन ने मूसा और हारून से, 481और शमौन जादूगर ने शमौन पतरस से किया था।
उसका मन भी अपनी पत्नी और बच्चे की ओर फिरा हुआ जान पड़ा; परन्तु हाय! यह इस कारण अधिक था कि परमेश्वर ने उसे यह क़ायल कर दिया था कि उनकी दशा उसकी दशा से कहीं अधिक सुखी है, न कि इस कारण कि उनमें जो परमेश्वर का काम था उससे उसे कोई सच्चा प्रेम था। सच है, उनके प्रति उसमें कृपा के कुछ दिखावे जान पड़ते थे, और ऐसे ही धनी डाइव्स में भी थे, जब वह नरक में था, अपने उन पाँच भाइयों के प्रति जो अभी संसार में थे; हाँ उसमें ऐसा प्रेम था, कि वह चाहता था कि वे स्वर्ग में हों, ताकि वे
482वहाँ पीड़ा पाने को न आएँ।
सावधान. बीमारी की खाट पर का पश्चाताप शायद ही कभी किसी काम का होता है।
483 बुद्धिमान. आप सच कहते हैं, यह सचमुच बहुत ही कम किसी काम का होता है। मृत्यु स्वभाव को अप्रिय लगती है, और प्रायः जब बीमारी और मृत्यु पापी के पास आती हैं; पहली उसे 479 उत्पत्ति 4:13, 14। निर्गमन 9:27। 1 शमूएल 15:24। मत्ती 27:3, 4, 5।
480 श्रीमान दुर्जन के सारे पाप-बोध और दया की इच्छाओं में मन-परिवर्तन के सच्चे लक्षण नहीं थे।
481 निर्गमन 19:28। प्रेरितों के काम 8:24।
483 बीमारी की खाट पर के पश्चाताप के विषय में, और यह कि उस पर सन्देह किया जाना चाहिए।
कन्धे से पकड़ती है, और दूसरी उसे ले जाने के लिये शयनकक्ष के द्वार पर खड़ी रहती है; तब पापी चारों ओर देखने लगता है, और अपने मन में सोचने लगता है, ये मुझे परमेश्वर के सामने ले जाएँगे; और मैं जानता हूँ कि मेरा जीवन वैसा नहीं रहा जैसा होना चाहिए था, मैं परमेश्वर के सामने कैसे उपस्थित होऊँगा!
या यदि यह अधिकतर दण्ड का, और पापियों के दण्ड के स्थान का बोध हो, तो वह भी अशुद्ध विवेक को, जो अब द्वार पर मृत्यु की धमक से जाग उठा है, चौंका देनेवाला होता है।
और इसी से प्रायः बीमारी की खाट पर का पश्चाताप, और उसका विषय होता है: अर्थात्, नरक से, और मृत्यु से बचाया जाना, और कि परमेश्वर उन्हें फिर से स्वस्थ कर दे जब तक वे सुधर न जाएँ; यह मानते हुए कि सुधरना उनके अपने वश में है, जैसा कि ऐसा करने की उनकी बड़ी-बड़ी और खुले हाथ की प्रतिज्ञाओं से प्रगट है।
मैंने बहुतों को जाना है, जिनमें, जब वे बीमार हुए, इस प्रकार का पश्चाताप बड़ी मात्रा में था, और जब तक यह रहा, इसके शोर और आवाज़ से नगर गूँज उठा: परन्तु हाय! यह कितने समय तक रहा? प्रायः उतने समय तक भी मुश्किल से, जितने में वह बीमार व्यक्ति अच्छा हुआ। यह कुहरे या भाप के समान उड़ गया, यह कोई टिकनेवाली वस्तु न थी। परन्तु इस प्रकार के पश्चाताप की तुलना परमेश्वर ने कुत्ते के हुआँ-हुआँ करने से की है। और 484उन्होंने मन से मेरी दोहाई नहीं दी, जब वे अपने बिछौने पर पड़े हुए हाय, हाय, करते थे।
485 सावधान. फिर भी इससे मनुष्य के मन की असाध्य दुष्टता देखी जा सकती है: क्योंकि यह असाध्य दुष्टता नहीं तो और क्या है, कि परमेश्वर से सुधार की प्रतिज्ञा करना, यदि वह उन्हें केवल जीवित रहने दे; और फिर भी ज्योंही वे चंगे हों (या उसके थोड़ी ही देर बाद,) वैसे ही पाप में लग जाना जैसे पहले करते थे, और अपनी प्रतिज्ञा पर फिर कभी ध्यान न देना।
बुद्धिमान. यह सचमुच असाध्य दशा का चिह्न है; हाँ, असाध्य पागलपन का। क्योंकि निश्चय, उन्हें यह तो सोचना ही चाहिए, कि परमेश्वर ने उनकी प्रतिज्ञा पर ध्यान दिया, कि उसने वे शब्द सुने जो उन्होंने
486कहे, और उसने उन्हें आनेवाले समय के लिये रख छोड़ा है; और तब वह उन्हें निकालकर, उनके मुँह पर गवाही देगा, कि उन्होंने अपने मुँह से उसकी चापलूसी की, और अपनी 487जीभ से उससे झूठ बोले, जब वे, अपनी समझ में, अपनी मृत्यु-शय्या पर बीमार पड़े थे, और उससे प्रतिज्ञा की कि यदि वह उन्हें चंगा कर दे तो वे पश्चाताप करेंगे और अपनी चाल सुधारेंगे। परन्तु, जैसा मैंने आपसे कहा है, श्रीमान दुर्जन ने ऐसा ही किया। उसने बड़ी-बड़ी प्रतिज्ञाएँ कीं कि वह एक नया मनुष्य बनेगा, कि वह अपने पाप छोड़ देगा, और मन फिराया हुआ बनेगा, कि वह प्रेम करेगा, इत्यादि, अपनी भक्त पत्नी से, इत्यादि।
हाँ, श्रीमान दुर्जन के पास अपनी बीमारी में बहुत सी सुन्दर बातें थीं, परन्तु जब वह चंगा हुआ तो कोई अच्छे काम नहीं।
सावधान. और जब उसकी भली पत्नी ने देखा कि उसमें कोई सुधार नहीं हुआ, परन्तु वह कुत्ते के समान अपनी छाँट की ओर, अपनी पुरानी चाल पर फिर लौट गया, तो उसने इसे कैसे सहा?
488 बुद्धिमान. क्यों, इससे उसका हृदय टूट गया, यह उसके लिये उस धोखे से भी बुरी निराशा थी जो उसने विवाह में उसे दिया था: कम से कम उसने इसे अधिक मन पर लिया, और इससे इतनी अच्छी तरह
485 मनुष्य के मन की असाध्य दशा का एक चिह्न।
487 भजन संहिता 78:34, 35, 36, 37।
488 श्रीमान दुर्जन की पत्नी का हृदय टूट गया।
जूझ न सकी। आप सोच सकते हैं कि उसने पहले भी उसके लिये परमेश्वर से बहुत सी प्रार्थनाएँ की थीं, उस सारे समय में भी जब वह उसके साथ इतना बुरा व्यवहार करता रहा था, और अब जब वह अपनी बीमारी में इतना डर गया था, और इतना चाहता था कि वह जीवित रहे और सुधर जाए, बेचारी स्त्री, उसने सोचा कि परमेश्वर के उसकी प्रार्थनाओं का उत्तर देने का समय आ गया है; हाँ, उसने आनन्द के साथ अपने मित्रों में यह फुसफुसाकर कहने में संकोच न किया, कि ऐसा ही है: परन्तु जब उसने अपने पति के फिर से विद्रोही बन जाने से अपने आप को निराश पाया, तो वह इसके नीचे खड़ी न रह सकी, पर एक घुलानेवाले रोग में पड़ जाती है, और कुछ ही सप्ताहों में उसने प्राण त्याग दिए।
सावधान. कृपया बताइए, वह कैसे मरी?
बुद्धिमान. मरी! वह वीरता से मरी; मसीह में अपने भाग के, और उसके द्वारा आनेवाले संसार के विश्वास की शान्ति से भरी हुई: अपनी बीमारी में उसने बहुत सी उत्तम बातें कहीं, और जो उसे देखने आते थे उन्हें अपने उद्धार के बहुत से चिह्न दिए; कब्र के विचार, परन्तु विशेषकर अपने फिर से जी उठने के विचार, उसके लिये मीठे विचार थे। वह मृत्यु की लालसा करती थी, क्योंकि वह जानती थी कि वह उसकी मित्र होगी। उसने अपने आप को उन लोगों के समान चलाया जो अपने आप को
489अपने दूल्हे से मिलने को तैयार हो। फिर उसने कहा, अब मैं अपने दुःखों, अपनी आहों, अपने आँसुओं, अपने विलाप और अपनी शिकायतों से विश्राम पाने जा रही हूँ: मैं पहले पवित्र लोगों के बीच रहने को तरसती थी, परन्तु मुझे किसी भी रीति से जाने नहीं दिया जाता था; पर अब मैं जा रही हूँ, (और कोई मनुष्य मुझे रोक नहीं सकता) उस बड़ी सभा में, पहिलौठों की साधारण सभा और कलीसिया में, जिनके नाम 490स्वर्ग में लिखे हुए हैं। वहाँ मेरे मन की अभिलाषा पूरी होगी; वहाँ मैं बिना परीक्षा और बिना किसी दूसरी बाधा के आराधना करूँगी; वहाँ मैं अपने यीशु का मुख देखूँगी, जिससे मैंने प्रेम किया है,
491जिसकी मैंने सेवा की है, और जो अब, मैं जानती हूँ, मेरे प्राण का उद्धार करेगा। मैंने अपने पति के लिये बहुत बार प्रार्थना की है, कि उसका मन फिरे, परन्तु इस विषय में परमेश्वर की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला;
क्या मेरी प्रार्थनाएँ व्यर्थ गईं? क्या वे भुला दी गईं? क्या वे कटघरे के पार फेंक दी गईं? नहीं; वे सोने की वेदी के सींगों पर टँगी हुई हैं, और जिस क्षण मैं उन फाटकों में प्रवेश करूँगी, जिनमें से होकर सच्चाई का पालन करनेवाली धर्मी जाति प्रवेश करेगी, उसी क्षण मुझे स्वयं उनका लाभ मिलेगा: मैं कहती हूँ, मुझे उनका लाभ मिलेगा। मैं पवित्र दाऊद के समान कह सकती हूँ; मैं कहती हूँ, जैसा वह अपने शत्रुओं के विषय में कह सका, वैसा ही मैं अपने पति के विषय में कह सकती हूँ। जब वे रोगी थे तब मैं 492टाट पहिने रही, और उपवास कर करके अपने प्राण को दीन किया, और मेरी प्रार्थना मेरी ही गोद में लौट आई। मेरी प्रार्थनाएँ व्यर्थ नहीं गईं, मेरे आँसू अब भी परमेश्वर की कुप्पी में रखे हैं; मैं तो चाहती थी कि मेरे पति के लिये, और मेरे उन बच्चों के लिये भी जो उसके पदचिह्नों पर चलते हैं, मुकुट और महिमा मिले; परन्तु जहाँ तक मैं अभी देख पाती हूँ, मुझे इसी आशा में विश्राम करना होगा कि वह सब मैं स्वयं ही पाऊँ।
सावधान. क्या वह इस प्रकार खुलकर बातें करती थी?
बुद्धिमान. नहीं; यह बात उसने केवल अपनी एक-दो सबसे घनिष्ठ सहेलियों से कही थी, जिन्हें उस समय उससे मिलने आने दिया जाता था जब वह अपनी मृत्यु-शय्या पर पड़ी घुल रही थी।
489 उसकी मसीही बातचीत।
490 इब्रानियों 12:22, 23, 24।
491 अपनी सहेलियों से उसकी बातचीत। (समझ में नहीं आता कि इसका पाठ से क्या सम्बन्ध है। DP) 492 भजन संहिता 35:13।
सावधान. अच्छा, पर कृपया अपना वृत्तान्त आगे सुनाइए, यह बहुत अच्छा है: इसे सुनकर मुझे आनन्द होता है; जब हम इस पेड़ के नीचे बैठकर इस प्रकार बातें कर रहे हैं, तो यह मेरे मन के लिये मानो एक पुष्टिकारक औषधि के समान है।
बुद्धिमान. जब उसका अन्त निकट आया, तो उसने अपने पति को बुलवाया, और जब वह 493उसके पास आया, तो उसने उससे कहा, कि अब हमें और तुम्हें बिछुड़ना होगा; और उसने कहा, परमेश्वर जानता है, और तुम भी जानोगे, कि मैं तुम्हारी प्रेम करनेवाली, विश्वासयोग्य पत्नी रही हूँ; मैंने तुम्हारे लिये बहुत प्रार्थनाएँ की हैं; और तुम्हारे हाथ से जितने भी दुर्व्यवहार मैंने सहे हैं, उन सबको मैं सेंत-मेंत और सच्चे मन से क्षमा करती हूँ, और जब तक इस संसार में मेरी साँस चलेगी, तब तक तुम्हारे मन फिराने के लिये प्रार्थना करती रहूँगी। परन्तु हे मेरे पति, मैं वहाँ जा रही हूँ जहाँ कोई दुष्ट मनुष्य नहीं आएगा, और यदि तुमने मन न फिराया, तो तुम मुझे फिर कभी शान्ति के साथ न देखोगे; मेरी खरी बातों से बुरा न मानना: मैं तुम्हारी मरती हुई पत्नी हूँ, और तुम्हारे प्रति अपनी विश्वासयोग्यता के कारण यह उपदेश तुम्हारे पास छोड़ जाना चाहती हूँ: अपने पापों को छोड़ दो, जब तक दया का फाटक खुला है, दया के लिये परमेश्वर की ओर भागो; स्मरण रखो, कि वह दिन आ रहा है, जब तुम्हें भी, चाहे तुम अभी हट्टे-कट्टे और भले-चंगे हो, मेरी ही तरह मृत्यु के फाटकों पर पड़ा रहना होगा: और यदि तुम नंगे प्राण के साथ पाए गए, और तुम्हें अपनी ज्वालामय तलवारें लिये हुए करूबों का सामना करना पड़ा, तो तब तुम क्या करोगे? हाँ, यदि मृत्यु और नरक तुम्हारे पास आ पहुँचें, और तुम अपने पापों में, और व्यवस्था के शाप के अधीन पड़े हो, तो तब तुम क्या करोगे?
सावधान. यह तो सच्ची और खरी बात थी: परन्तु श्रीमान दुर्जन ने उससे क्या कहा?
494 बुद्धिमान. उसने बीच-बीच में दूसरी बातें छेड़कर उसकी बातचीत को मोड़ने का भरसक यत्न किया; उसने अब उस पर कुछ दया भी दिखाई, और उससे पूछता, कि उसे क्या चाहिए? और तरह-तरह की बातें करके उसकी बात का सिलसिला तोड़ देता था; क्योंकि जब उसने देखा कि उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया जा रहा, तो उसने एक गहरी आह भरी, और चुपचाप लेट गई। तब वह नीचे चला गया, और फिर उसने अपने बच्चों को बुलवाया,
495और उनसे बातें करने लगी। और पहले उसने उन बच्चों से बात की जो उद्दण्ड थे, और उन्हें बताया कि अपने मन में अनुग्रह पाने से पहले मर जाना कितना भयानक है। उसने उनसे यह भी कहा, कि मृत्यु उनके जितना वे समझते हैं उससे कहीं अधिक निकट हो सकती है; और उनसे कहा कि जब वे फिर से कब्रिस्तान में से होकर जाएँ, तो देखें कि क्या वहाँ छोटी-छोटी कब्रें नहीं हैं। और उसने कहा, आह, मेरे बच्चो, क्या यह तुम्हारे लिये भयानक न होगा, यदि हम केवल न्याय के दिन ही मिलें, और फिर बिछुड़ जाएँ, और फिर कभी एक दूसरे को न देखें? और यह कहकर वह रो पड़ी, बच्चे (भी) रो पड़े; तब उसने अपनी बात जारी रखी: उसने कहा, मेरे बच्चो, मैं तुम्हारे पास से जा रही हूँ, मैं यीशु मसीह के पास जा रही हूँ,
496और उसके पास न शोक है, न आहें, न पीड़ा, न आँसू, न मृत्यु।
मैं चाहती हूँ कि तुम भी वहीं जाओ, परन्तु मैं न तो तुम्हें वहाँ ले जा सकती हूँ, और न वहाँ बुला ला सकती हूँ; परन्तु यदि तुम अपने पापों से फिरकर परमेश्वर की ओर लौटो, और यीशु मसीह के द्वारा उसके हाथ से दया की भीख माँगो, तो तुम मेरे पीछे आओगे, और जब तुम मरोगे, तो उसी स्थान में पहुँचोगे जहाँ मैं जा रही हूँ, उस धन्य विश्राम के स्थान में: और तब हम सदा एक साथ रहेंगे, और अपने छुड़ानेवाले का मुख देखते रहेंगे, जिससे हम सबको परस्पर और अनन्त आनन्द मिलेगा। तब उसने उनसे कहा कि वे एक मरती हुई माँ की बातें उस समय स्मरण रखें जब
493 अपने पति से उसकी बातचीत।
494 वह उसकी बातचीत को मोड़ देता है।
495 अपने उद्दण्ड बच्चों से उसकी बातें।
496 प्रकाशितवाक्य 7:16; अध्याय 21:3, 4।
वह अपनी कब्र में ठण्डी पड़ी हो, और वे स्वयं अपने पापों में गरम हों, कि कदाचित उसकी बातें उनके दुराचार पर रोक लगा दें, और वे स्मरण करके परमेश्वर की ओर फिरें।
497 तब वे सब नीचे चले गए; केवल उसका दुलारा, अर्थात् वह बच्चा जिससे वह सबसे अधिक प्रेम करती थी, क्योंकि वह उसकी चाल पर चलता था, वहीं रह गया। तब उसने उससे बात की। उसने कहा, मेरे पास आ, मेरे प्यारे बच्चे, तू मेरे आनन्द की सन्तान है: मैं जीते जी तुझे परमेश्वर का दास बनते देख चुकी हूँ; तू अनन्त जीवन पाएगा। मेरे प्यारे, मैं आगे जाती हूँ, और तू पीछे आएगा; यदि तू
498अपने प्रथम भरोसे पर अन्त तक दृढ़ता से स्थिर रहे। जब मैं चली जाऊँ, तब भी तू मेरी बातें स्मरण रखना, अपनी बाइबल से प्रेम रखना, मेरे पास्टरों के पीछे चलना, भक्तिहीनता का इन्कार करते रहना, और यदि संकट के दिन आएँ, तो सारे संसार की अपेक्षा मसीह को, उसके वचन और उसके मार्गों को, और अच्छे विवेक की गवाही को अधिक मूल्यवान समझना। अपने पिता के साथ दया और आज्ञाकारिता का व्यवहार करना, परन्तु उसकी चालों में से एक को भी न अपनाना। यदि हो सके, तो कहीं नौकरी पर चले जाना, घर पर रहने की अपेक्षा यही चुनना; परन्तु तब ध्यान रखना कि ऐसी नौकरी चुनना जहाँ स्वर्ग के मार्ग में आगे बढ़ने में तेरी सहायता हो सके; और ऐसी नौकरी पाने के लिये मेरे पास्टर से बात करना, वह, यदि सम्भव हो, ऐसी जगह दिलाने में तेरी सहायता करेगा।
मेरे प्यारे बच्चे, मैं यह भी चाहती हूँ कि तू अपने भाइयों और बहनों से प्रेम रखे, परन्तु उनकी बुरी आदतों में से एक भी न सीखे। अन्धकार के निष्फल कामों में सहभागी न होना, वरन्
499उन पर उलाहना देना। तुझ पर अनुग्रह है, उन पर नहीं: इसलिये तू भक्तिपूर्ण जीवन के द्वारा, और परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा के अनुरूप चालचलन के द्वारा, उनकी आँखों के सामने उद्धार के मार्ग को सुन्दर बना, कि तेरे भाई और बहनें प्रभु के भले मार्गों को देखें और उनसे अधिक प्रसन्न हों।
यदि तू जीवित रहकर विवाह करे, तो सावधान रहना कि तेरे साथ वैसा न हो जैसा मेरे साथ हुआ; अर्थात् मीठी बातों और झूठी जीभ की चापलूसी से धोखा न खा जाना। परन्तु पहले भक्ति के विषय में निश्चय कर लेना। हाँ, उतना निश्चय जितना इस संसार में किसी के लिये सम्भव है: न अपनी आँखों पर भरोसा करना, न अपनी
समझ पर; मेरा अर्थ उस व्यक्ति की भक्ति के विषय में है जिससे विवाह करने के लिये तुझे बुलाया जाए। भले लोगों से सलाह लेना, और यदि मेरा पास्टर जीवित हो, तो उसकी सलाह के बिना इस विषय में कुछ न करना। मैंने स्वयं भी उससे विनती की है कि वह तेरी देखभाल करे। इस प्रकार उसने अपने बच्चों से बातें कीं, और उन्हें सलाह दी, और इस बच्चे से कुछ देर और बातें करने के बाद, उसने उसे चूमा, और उसे नीचे जाने को कहा।
500 अच्छा, संक्षेप में, उसका समय निकट आ गया, और वह दिन भी जब उसे मरना था। तब वह अनुग्रह से भरे प्राण, और शान्ति से भरे मन के साथ मर गई, और अपनी मृत्यु से संकटों से भरे एक जीवन का अन्त किया। उसके पति ने उसके लिये अन्तिम संस्कार का आयोजन किया, कदाचित इसलिये कि वह प्रसन्न था कि उससे पीछा छूटा; परन्तु इस बात को हम न्याय के दिन प्रकट होने के लिये छोड़ देंगे।
सावधान. यह स्त्री अच्छी मृत्यु मरी: और अब जब हम मसीहियों की मृत्यु की बात कर रहे हैं, तो मैं आपको एक व्यक्ति की कहानी सुनाता हूँ जो कुछ समय पहले हमारे नगर में मरा। वह मनुष्य एक भक्त बूढ़ा
497 अपने दुलारे बच्चे से उसकी बातें।
प्यूरिटन था, क्योंकि पुराने समय में भक्त लोग इसी नाम से पुकारे जाते थे। यह मनुष्य एक लम्बा और भक्तिपूर्ण जीवन बिताने के बाद बीमार पड़ा, उसी बीमारी से जिससे वह मर गया। और जब वह अन्तिम घड़ी की ओर जा रहा था, तो जो स्त्री उसकी देखभाल करती थी, उसे ऐसा लगा कि उसने संगीत सुना, और ऐसा मधुर संगीत जैसा उसने अपने जीवन में कभी नहीं सुना था, और वह तब तक होता रहा जब तक उसने प्राण न त्याग दिए: फिर जब उसका प्राण उसमें से निकल गया, तो संगीत पीछे हटता हुआ और घर से दूर, और दूर जाता हुआ लगा, और ऐसे ही होता रहा जब तक उसकी ध्वनि सुनाई देनी बिलकुल बन्द न हो गई।
बुद्धिमान. आपके विचार में वह क्या रहा होगा?
सावधान. जहाँ तक मैं जानता हूँ, वह स्वर्गदूतों के मधुर स्वर थे, जिन्हें परमेश्वर ने उसे स्वर्ग में ले जाने के लिये भेजा था।
बुद्धिमान. मैं यह नहीं कह सकता कि परमेश्वर कभी-कभी हम दीन मरनहार मनुष्यों के साथ अपने साधारण मार्ग से हटकर काम नहीं करता। मैं इस स्त्री के विषय में ऐसा नहीं कह सकता, फिर भी उसके मन में उससे कहीं उत्तम संगीत था जो उस स्त्री के कानों में गूँजा था।
सावधान. मैं भी ऐसा ही मानता हूँ; पर कृपया मुझे बताइए, क्या उसके दूसरे बच्चों में से किसी ने उसकी बातों पर ऐसा ध्यान दिया कि उससे उसके प्राण का भला हुआ?
501 बुद्धिमान. उनमें से एक ने दिया, और वह एक बहुत आशाजनक युवक बन गया: परन्तु बाकियों के विषय में मैं कुछ नहीं कह सकता।
सावधान. और अपनी पत्नी के मरने के बाद दुर्जन ने क्या किया?
बुद्धिमान. क्यों, ठीक वैसा ही जैसा वह पहले करता था; उसने मुश्किल से एक पखवाड़ा उसके लिये शोक मनाया, और तब भी, मुझे सन्देह है, उसका शोक मन से कम और दिखावे के लिये अधिक था।
सावधान. क्या उसके मरने के बाद वह कभी-कभी अपनी पत्नी की चर्चा नहीं करता था?
बुद्धिमान. हाँ, जब उस पर ऐसी सनक सवार होती, तो वह उसकी बहुत बढ़-चढ़कर प्रशंसा भी कर सकता था; कहता, कि वह एक अच्छी, भक्त और सद्गुणी स्त्री थी। परन्तु यह कोई आश्चर्य की बात नहीं: दुष्ट मनुष्यों की यह आम रीति है, कि परमेश्वर के सेवकों से उनके जीते जी घृणा करें, और उनके मरने के बाद उनकी प्रशंसा करें। फरीसियों ने भविष्यद्वक्ताओं के साथ ऐसा ही किया: भविष्यद्वक्ताओं में से जो मर चुके थे, उनकी वे
502प्रशंसा करते थे; और उनमें से जो जीवित थे, उन्हें वे दोषी ठहराते थे।
सावधान. परन्तु क्या श्रीमान दुर्जन ने जल्दी ही दूसरा विवाह नहीं कर लिया?
बुद्धिमान. नहीं, बहुत समय बाद तक नहीं: और जब उससे इसका कारण पूछा जाता, तो वह यह ओछा उत्तर देता, कि जब एक 503पैसे में सेर भर दूध मिल सकता है, तो कौन अपनी गाय पालेगा? अर्थात्, जब मनुष्य जब चाहे वेश्या पा सकता है, तो कौन पत्नी रखने का खर्च उठाए? अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद भी वह ऐसा ही नीच, ऐसा ही घिनौना बना रहा। फिर भी अन्त में एक स्त्री उस पर भारी पड़ गई। क्योंकि एक बार उसे अपने पास बुलाकर, और उसे खूब मतवाला करके, उसने ऐसी चतुराई की कि उससे विवाह का वचन ले 504लिया, और उसे उसी पर अड़ाए रखा, और उसे विवश किया कि उससे विवाह करे। और वह, जैसी कहावत है,
501 उसके बच्चों में से एक उसके मरते समय के वचनों से परिवर्तित हुआ।
503 श्रीमान दुर्जन की नीच भाषा।
504 वह फिर विवाह करता है, और उसे यह अन्तिम पत्नी कैसे मिली।
505उसकी सारी नीच और उद्दण्ड चालों में उसके बराबर की ही थी: जैसे उसके साथी थे, वैसे ही उसके भी साथी थे, और वह भी उनसे मधुशाला और शराबखाने में मिलती थी, उससे कहीं अधिक बार जितना उसे पता था। साफ़-साफ़ कहूँ, तो वह पूरी वेश्या थी, और जहाँ समय और स्थान ठहराया जाता, वहाँ उसके पास भी उतने ही लोग आते थे जितने उनमें से किसी के पास। हाँ, और उसे इसकी गन्ध भी लग गई थी, परन्तु वह नहीं जानता था कि इसका क्या उपाय करे। क्योंकि यदि वह कुछ कहने लगता, तो वह उसके सामने उन वेश्याओं का नाम रख देती जिनके पास वह जानती थी कि वह जाया करता था, और वह शाप देने और कसम खाने में भी उसकी बराबरी कर लेती थी, क्योंकि वह उसे कसम के बदले कसम, और शाप के बदले शाप देती थी।
सावधान. वह किस प्रकार की कसमें खाती थी?
बुद्धिमान. क्यों, “मैं नरक में जाऊँ”, “मैं डूब मरूँ”, और ऐसी ही बातें।
सावधान. ये बातें तो परमेश्वर को क्रोध दिलानेवाली हैं।
बुद्धिमान. हाँ, हैं तो: परन्तु परमेश्वर ऐसी बातों को इस जीवन में भी पूरी तरह बिना दण्ड के नहीं छोड़ता। इसका कुछ भाग मैं आपको पहले ही दिखा चुका हूँ, और यहाँ आपको एक-दो उदाहरण और देता हूँ।
506 एक लेखक कहता है, कि सन् 1551 में सेवॉय के एक नगर में एक मनुष्य रहता था जो भयंकर रूप से शाप देनेवाला और कसम खानेवाला था, और यद्यपि उसे इसके लिये बार-बार चिताया गया और डाँटा गया, फिर भी वह किसी रीति से अपना चालचलन सुधारने को तैयार न हुआ। अन्त में जब नगर में एक बड़ी महामारी फैली, तो वह एक बगीचे में चला गया, और वहाँ जब उसे फिर से अपनी दुष्टता छोड़ने को चिताया गया, तो उसने अपना मन और भी कठोर कर लिया, और कसमें खाने लगा, परमेश्वर की निन्दा करने लगा, और अपने आप को शैतान को सौंपने लगा: और तुरन्त शैतान ने अचानक उसे उठा लिया, जबकि उसकी पत्नी और उसकी एक सम्बन्धी स्त्री देख रही थीं, और उसे पूरी तरह उठा ले गया। जब न्यायाधीशों को इसकी सूचना दी गई, तो वे उस स्थान पर गए और उस स्त्री से पूछताछ की, जिसने इस बात के सच होने की पुष्टि की।
इसी प्रकार मागालापोल के डची में ओस्टर नामक स्थान पर, (श्रीमान क्लार्क कहते हैं) एक दुष्ट स्त्री शाप देते समय अपने आप को शरीर और प्राण समेत शैतान को सौंप दिया करती थी, और इसके लिये डाँटे जाने पर भी वैसा ही करती रही; यहाँ तक कि (जब वह एक विवाह-भोज में थी) शैतान स्वयं आया, और अत्यन्त भयानक चीख-पुकार और गर्जन के साथ उसे उठाकर आकाश में ले गया: और इसी प्रकार उसे नगर के चारों ओर घुमाता रहा, यहाँ तक कि नगर के निवासी भय के मारे मरने पर थे: और थोड़ी ही देर में उसने उसके चार टुकड़े कर डाले, और उसके चारों भाग चार अलग-अलग राजमार्गों पर छोड़ दिए; और फिर उसकी अँतड़ियाँ विवाह-भोज में लाकर नगर के महापौर के सामने मेज़ पर फेंक दीं, और कहा,
देख, भोजन के ये पकवान तेरे हैं, और यदि तू अपना दुष्ट जीवन न सुधारे, तो ऐसा ही विनाश तेरी भी बाट जोह रहा है।
सावधान. यद्यपि परमेश्वर उन सब मनुष्यों से, जो इस प्रकार उसके नाम को फाड़ते और चीरते हैं, इस प्रकार का व्यवहार करने से रुका रहता है, और तुरन्त दण्ड उन पर नहीं आ पड़ते; फिर भी वह दूसरे
दण्डों के द्वारा उनके जीवन को उनके लिये कड़वा बना देता है, है न?
बुद्धिमान. हाँ, हाँ। और इसके प्रमाण के लिये मुझे इस दुर्जन और उसकी पत्नी से आगे जाने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि उनका गाली-गलौज, और शाप देना, और कसम खाना केवल शब्दों पर समाप्त नहीं होता था: वे एक दूसरे से लड़ते और एक दूसरे पर 505 वह कैसी थी, और वे कैसे रहते थे।
506 क्लार्क की ‘पापियों के लिये दर्पण’।
झपटते थे, और वह भी कुत्ते-बिल्लियों की तरह। परन्तु इसे उसकी नीचता के कारण उस पर परमेश्वर का हाथ और दण्ड समझना चाहिए; उसके पास पहले एक सच्ची स्त्री थी, परन्तु वह उसके काम की न थी, और इसलिये परमेश्वर ने उसे उठा लिया, और उसे अपने ही जैसी एक बुरी स्त्री दे दी। इस प्रकार जिस नाप से उसने अपनी पहली पत्नी के लिये नापा था, उसी नाप से इस अन्तिम ने उसके लिये फिर नापा। और यह एक ऐसा दण्ड है, जिससे परमेश्वर कभी-कभी दुष्ट मनुष्यों को दण्ड देता है। आमोस ने अमस्याह से ऐसा ही कहा: तेरी
507स्त्री नगर में वेश्या हो जाएगी। इस अन्तिम पत्नी के साथ श्रीमान दुर्जन काफ़ी समय तक रहा; परन्तु, जैसा मैं आपको पहले बता चुका हूँ, अत्यन्त दुःखद और नरक जैसी रीति से। और अब वह अपनी पहली पत्नी की मृत्यु पर विलाप करता था: इस कारण नहीं कि उसे उसकी भक्ति से प्रेम था, क्योंकि उसे तो वह कभी सह ही नहीं सका, परन्तु इस कारण कि वह सदा घर पर रहा करती थी, जबकि यह बाहर घूमा करती थी; उसकी पहली पत्नी सच्ची भी थी, और उस सम्बन्ध के प्रति विश्वासयोग्य थी, परन्तु यह अन्तिम अपनी देह से वेश्या थी: पहली स्त्री वस्तुओं को सँभालकर रखना पसन्द करती थी, परन्तु यह अन्तिम उसी की तरह उन्हें उड़ा देती थी: पहली, जब वह डाँटता, तो चुप रहती, और जब वह उससे दुर्व्यवहार करता, तो धीरज से सह लेती, परन्तु यह उसे बात के बदले बात, मार के बदले मार, शाप के बदले शाप देती थी; इस प्रकार अब श्रीमान दुर्जन को
508अपना जोड़ मिल गया था: परमेश्वर चाहता था कि वह अपनी पत्नी की 509दुष्टता में अपने ही जीवन की नीचता देखे। परन्तु श्रीमान दुर्जन पर किसी बात का असर न हुआ, वह श्रीमान दुर्जन ही बना रहा: इस दण्ड से उसमें कोई सुधार नहीं हुआ, नहीं, न परमेश्वर के प्रति और न मनुष्य के प्रति।
सावधान. मैं निश्चय से कहता हूँ कि जब उसकी पत्नी मर गई, तो श्रीमान दुर्जन ने सोचा होगा कि अगली बार वह कहीं अच्छा जोड़ पाएगा।
बुद्धिमान. उसने क्या सोचा, यह मैं नहीं बता सकता, परन्तु इस विवाह में वह ऐसी आशा नहीं कर सकता था। क्योंकि यहाँ वह जानता था कि वह फँस गया है, वह जानता था कि इस स्त्री ने उसे उलझा लिया है, और इसलिये वह पीछे हटना चाहता था, पर हट न सका। मैं कहता हूँ, वह पहले से जानता था कि वह वेश्या है, और इसलिये उसके साथ सुखी जीवन की आशा नहीं कर सकता था। क्योंकि जो पुरुष या स्त्री अपने ही प्राण के प्रति सच्चा नहीं, वह न पति के प्रति सच्चा होगा न पत्नी के प्रति। और वह जानता था कि वह अपने ही प्राण के प्रति सच्ची नहीं थी, और इसलिये उससे यह आशा नहीं कर सकता था कि वह उसके प्रति सच्ची होगी; परन्तु सुलैमान कहता है, वेश्या गहिरा गड़हा है, और श्रीमान दुर्जन ने इसे सच पाया। क्योंकि जब उसने उसे अपने गड़हे में फँसा लिया, तो उसने तब तक उसका पीछा न छोड़ा जब तक उससे विवाह का वचन न ले लिया; और जब वह उसे यहाँ तक ले आई, तो उसने उसे सचमुच विवाह करने पर विवश कर दिया। और उसके बाद वे वही जीवन जीते रहे जो मैं आपको बता चुका हूँ।
सावधान. परन्तु क्या पड़ोसियों ने श्रीमान दुर्जन के इस बदलाव पर ध्यान नहीं दिया?
510 बुद्धिमान. हाँ; और उसके बहुत से पड़ोसियों ने, हाँ, उनमें से बहुतों ने भी जो शारीरिक मनुष्य थे, कहा, कि यह उस पर परमेश्वर का धर्मी दण्ड है, क्योंकि उसने अपनी
508 अपनी पहली पत्नी के साथ बुरे व्यवहार के कारण उसे अपनी अन्तिम पत्नी के द्वारा दण्ड मिलता है।
509 वह तनिक भी नहीं सुधरता।
510 किसी ने उसके दुःख पर उस पर दया नहीं की, वरन् सबने इसे उचित प्रतिफल समझा।
दूसरी पत्नी के साथ गाली-गलौज भरा व्यवहार और भाषा रखी थी: क्योंकि वे सब इस बात से कायल थे कि वह एक सद्गुणी स्त्री थी, और उसने, उस नीच अभागे ने, उसे मार डाला था; मैं यह नहीं कहूँगा कि निर्दयता से, परन्तु दया के अभाव से।
सावधान. और कृपया बताइए, वे इस प्रकार कितने समय तक साथ रहे?
बुद्धिमान. कोई चौदह या सोलह वर्ष, यहाँ तक कि (यद्यपि वह भी अपने साथ कुछ 511लाई थी) उन्होंने सब कुछ पाप में उड़ा दिया, और उल्लुओं के समान कंगाल होकर अलग हुए। और सोचिए, इसके सिवा और हो भी क्या सकता था? उसे अपनी मनमानी करनी थी, और उसे अपनी; वह अपने साथियों के बीच, और वह अपनों के बीच; वह अपनी वेश्याओं के साथ, और वह अपने लुच्चों के साथ; और इस प्रकार उन्होंने अपने रुपये को घटाकर कौड़ी बना दिया।
सावधान. कृपया बताइए कि श्रीमान दुर्जन किस रोग से मरा, क्योंकि अब मैं देखता हूँ कि हम उसकी मृत्यु तक आ पहुँचे हैं?
512 बुद्धिमान. मैं ठीक-ठीक यह नहीं कह सकता कि वह किसी एक रोग से मरा, क्योंकि बहुत से रोग थे जिन्होंने आपस में सहमत होकर, और सिर जोड़कर, उसका अन्त करने की ठानी थी। उसे जलोदर था, उसे क्षयरोग था, वह अति-भोग से रोगी था, उसे गठिया था, और, जैसा कुछ लोग कहते हैं, उसकी अँतड़ियों में उपदंश का भी कुछ असर था। फिर भी मृत्यु के इन सब योद्धाओं का सेनापति, जो उसे उठा ले जाने के लिये उस पर चढ़ आए थे, क्षयरोग ही था, क्योंकि उसी ने उसे कब्र तक पहुँचाया।
सावधान. यद्यपि मैं यह नहीं कहूँगा कि उत्तम से उत्तम मनुष्य भी क्षयरोग, जलोदर या अति-भोग के रोग से नहीं मर सकते; हाँ, कि ये सब किसी मनुष्य पर एक साथ आकर उसका अन्त न कर दें: फिर भी मैं फिर कहूँगा, कि बहुत बार ये रोग मनुष्य द्वारा वस्तुओं के अनुचित उपयोग से आते हैं। अधिक पीना जलोदर, क्षयरोग, अति-भोग के रोग, और बहुत से दूसरे रोग लाता है; और मुझे सन्देह है, कि श्रीमान दुर्जन की मृत्यु उचित और अनुचित वस्तुओं के उपयोग में अपने आप का दुरुपयोग करने से ही हुई। मैं अपना यह निर्णय उसके जीवन के उस वृत्तान्त पर आधारित करता हूँ जो आपने मुझे विस्तार से सुनाया है।
बुद्धिमान. मैं सचमुच समझता हूँ कि आपको अपना निर्णय वापस लेने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि बहुतों का यही विचार है, कि अपने प्यालों और अपनी कुलटाओं के द्वारा उसने अपने आप को इस विनाश तक पहुँचाया: जब वह मरा तब वह बूढ़ा नहीं था, और न स्वभाव से बहुत दुर्बल था, वरन् बलवान, और स्वस्थ शरीर का था: फिर भी, जैसा मैंने कहा, वह घुलता चला गया, और जब एक बार ढलने लगा, तो सड़ा हुआ अपनी कब्र में चला गया।
और जिस बात ने मरने के बाद उसे दुर्गन्धमय बना दिया, मेरा अर्थ है, जिस बात ने उसके नाम और यश को दुर्गन्धमय बना दिया, वह यह थी, कि वह उस घिनौने रोग का कुछ अंश अपने ऊपर लिये हुए मरा: एक ऐसा मनुष्य जिसका जीवन पाप से भरा था, और जिसकी मृत्यु बिना पश्चाताप के हुई।
सावधान. ये कलंक सचमुच उसे दुर्गन्धमय बनाने के लिये पर्याप्त थे।
बुद्धिमान. हाँ थे, और उन्होंने ऐसा किया भी। उसके 513चले जाने के बाद कोई मनुष्य उसके विषय में अच्छा नहीं कह सकता था। जैसे उसकी लोथ भूमि के नीचे सड़ी, वैसे ही उसका नाम भूमि के ऊपर सड़ गया। और यह उस बुद्धिमान पुरुष के कथन के अनुसार है: धर्मी का स्मरण धन्य है, परन्तु दुष्टों का नाम सड़ जाता है।
511 दुर्जन और यह अन्तिम पत्नी उल्लुओं के समान कंगाल होकर अलग होते हैं।
512 श्रीमान दुर्जन की बीमारी और वे रोग जिनसे वह मरा।
513 मरने के बाद दुर्जन का नाम दुर्गन्ध देता है।
यह वचन, अपने दोनों भागों में, उस पर और उस स्त्री पर पूरा हुआ जिससे उसने पहले विवाह किया था। क्योंकि उसका नाम अब भी फल-फूल रहा था, यद्यपि उसे मरे लगभग सत्रह वर्ष हो चुके थे; परन्तु उसका नाम उसे गाड़े जाने के सत्रह दिन पूरे होने से पहले ही दुर्गन्ध देने और सड़ने लगा।
सावधान. जो मनुष्य पाप से भरे जीवन, और पश्चाताप से खाली मन के साथ मरता है, चाहे वह सबसे सुनहरे रोग से ही क्यों न मरे (यदि कोई रोग ऐसा कहलाने योग्य हो)
मैं निश्चय से कहता हूँ कि उसका नाम दुर्गन्ध देगा, और वह भी स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में।
बुद्धिमान. आप सच कहते हैं; और इसी कारण कैन, फ़िरौन, शाऊल, यहूदा और फरीसियों का नाम, यद्यपि उन्हें मरे हज़ारों वर्ष हो गए, संसार की नाक में आज भी ऐसी ताज़ी दुर्गन्ध देता है मानो वे अभी-अभी मरे हों।
सावधान. इस बात में मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। परन्तु, महोदय, जब आपने उस पर यह दोष लगाया है कि वह 515बिना पश्चाताप के मरा, तो कृपया मुझे दिखाइए कि आप इसे कैसे प्रमाणित करेंगे: इसलिये नहीं कि मुझे इसमें पूरा सन्देह है, क्योंकि आपने इसे दृढ़ता से कहा है, परन्तु ऐसे गम्भीर विषयों में लोग जो कहते हैं, उसका प्रमाण पाना मुझे अच्छा लगता है।
बुद्धिमान. जब मैंने कहा, कि वह बिना पश्चाताप के मरा, तो मेरा अर्थ यह था, कि जहाँ तक उसे जाननेवाले लोग, उसके जीवन, वचन और उसकी मृत्यु को आपस में मिलाकर देखने पर, परख सकते थे।
सावधान. ठीक कहा, उन्होंने यह जानने का सही मार्ग अपनाया कि उसमें पश्चाताप था या नहीं, अर्थात् उसने यह प्रकट किया या नहीं कि उसमें पश्चाताप था। तो अब मुझे दिखाइए कि उन्होंने यह कैसे प्रमाणित किया कि उसमें पश्चाताप नहीं था?
516 बुद्धिमान. अवश्य दिखाऊँगा: और पहले, इसे प्रमाणित करने के लिये यह बात रखी गई। अपनी बीमारी के सारे समय में उसे अपने पापों का न तो दर्शन था और न बोध, वरन् वह ऐसा निश्चिन्त, और ऐसा चैन से था, मानो उसने अपने सारे जीवन में कभी पाप किया ही न हो।
सावधान. मुझे मानना ही पड़ेगा कि यह इस बात का चिह्न है कि उसमें पश्चाताप नहीं था। क्योंकि मनुष्य उस बात से कैसे पश्चाताप कर सकता है जिसका उसे न दर्शन है न बोध? परन्तु यह विचित्र बात है कि अब उसे पाप का न दर्शन था न बोध, जबकि पहले उसे अपनी बुराई का ऐसा दर्शन और बोध हुआ था: मेरा अर्थ है, जब वह पहले बीमार पड़ा था।
बुद्धिमान. जैसा मैंने कहा, वह अब ऐसा निश्चिन्त था, मानो वह किसी स्वर्गदूत के समान निष्पाप हो; यद्यपि सब लोग जानते थे कि वह कैसा पापी था, क्योंकि वह अपने पापों को अपने माथे पर लिये फिरता था। उसका लुच्चा
जीवन सब लोगों ने पढ़ा और जाना था; परन्तु उसका पश्चाताप किसी ने न पढ़ा न जाना; क्योंकि, जैसा मैंने कहा, उसमें था ही नहीं। और जहाँ तक मैं जानता हूँ, अब उसे अपने पापों का बोध न होने का कारण यह था, कि उसने पहले उनके बोध से कोई लाभ न उठाया था। उसे तब परमेश्वर का वह ज्ञान अपने मन में रखना अच्छा न लगा, जिससे उसके पाप उसे स्मरण आते थे: इसलिये
परमेश्वर ने अब उसे निकम्मे मन पर, आत्मा की कठोरता और जड़ता पर छोड़ दिया; और इस प्रकार उस पर पवित्रशास्त्र का यह वचन पूरा हुआ, उसने उनकी आँखें अन्धी कर दी हैं। और यह भी, उनकी आँखों पर
517अन्धेरा छा जाए ताकि न देखें। ओह! किसी मनुष्य का पाप में जीना, और उसके लिये पश्चाताप किए बिना संसार से चले जाना, सबसे दुःखद दण्ड है जो किसी मनुष्य पर आ सकता है।
515 यह प्रमाणित किया जाता है कि श्रीमान दुर्जन बिना पश्चाताप के मरता है।
516 1 इस बात का प्रमाण कि वह बिना पश्चाताप के मरा।
518 सावधान. परन्तु, महोदय, यद्यपि आप और मैं दोनों इस पर सहमत हुए हैं कि पाप के दर्शन और बोध के बिना कोई पश्चाताप नहीं हो सकता, फिर भी यह केवल हमारा कहना भर है; इसलिये आइए अब देखें कि क्या हम पवित्रशास्त्र से इसे सिद्ध कर सकते हैं।
बुद्धिमान. यह तो सहज से हो जाता है। वे तीन हज़ार जिनका मन फिरा, (प्रेरितों के काम दूसरा अध्याय,) 519उन्होंने तब तक पश्चाताप नहीं किया, जब तक उन्हें अपने पापों का दर्शन और बोध न हुआ: पौलुस ने तब तक पश्चाताप नहीं किया जब तक उसे अपने पापों का दर्शन और बोध न हुआ: दारोगा ने तब तक पश्चाताप नहीं किया जब तक उसे अपने पापों का दर्शन और बोध न हुआ: और वे कर भी नहीं सकते थे। क्योंकि मनुष्य किस बात का पश्चाताप करे? उत्तर है, पाप का। पाप का पश्चाताप
520करना क्या है? उत्तर है, उसके लिये शोकित होना, उससे फिरना। परन्तु जिस मनुष्य को पाप का न दर्शन है न बोध, वह उसके लिये शोकित कैसे हो सकता है? दाऊद ने न केवल पाप किए, वरन् उनके विषय में बिना पश्चाताप के बना रहा, जब तक कि परमेश्वर की ओर से नातान भविष्यद्वक्ता उसे उनका दर्शन और बोध
521कराने को न भेजा गया; और तब, पर उससे पहले नहीं, उसने सचमुच उनके लिये पश्चाताप किया। अय्यूब, अपने पश्चाताप के लिये, परमेश्वर की दोहाई देता है, मुझे बता दे कि तू किस कारण मुझसे मुकद्दमा लड़ता है। और फिर, जो कुछ 522मुझे नहीं सूझ पड़ता, वह तू मुझे सिखा दे; मैंने दण्ड सहा, अब मैं फिर बुराई न करूँगा:
अर्थात्, न उसमें जो मैं जानता हूँ, क्योंकि मैं उसका पश्चाताप करूँगा; और न उसमें जो मैं नहीं जानता, जब तू मुझे वह दिखाएगा।
इसी प्रकार एप्रैम का पश्चाताप भी तब हुआ जब वह अपने पापों के दर्शन और बोध की ओर फेरा गया, 523और जब उसे उनकी बुराई के विषय में शिक्षा दी गई।
सावधान. ये इस सत्य के अच्छे प्रमाण हैं, और (यदि वे बातें जिनका दोष श्रीमान दुर्जन पर लगाया गया है, सच हैं) सचमुच यह प्रमाणित करते हैं कि उसने पश्चाताप नहीं किया, वरन् जैसे वह जीया, वैसे ही अपने पाप में मरा: क्योंकि पश्चाताप के बिना मनुष्य निश्चय अपने पाप में मरता है; क्योंकि वे उसके साथ
524मिट्टी में लेटेंगे, न्याय के दिन उसके साथ उठेंगे, जब वह परमेश्वर के न्यायासन के कटघरे में खड़ा होगा तब रस्सियों और ज़ंजीरों के समान उसके गले में लटके रहेंगे, और जब वह न्याय-आसन से इस वचन के साथ चला जाएगा, कि हे स्रापित लोगो, मेरे सामने से उस अनन्त आग में चले जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है, तब भी उसके साथ जाएँगे; और वहाँ उसके विवेक को कुतरते और खाते रहेंगे,
525क्योंकि वे उसके लिये कभी न मरनेवाला कीड़ा होंगे।
बुद्धिमान. आप ठीक कहते हैं, और मैंने जो कहा है उसमें एक-दो बातें और जोड़ता हूँ: पश्चाताप, जैसे पाप के दर्शन और बोध के बिना उत्पन्न नहीं होता, वैसे ही पाप का हर दर्शन और बोध उसे
526उत्पन्न नहीं कर सकता: मेरा अर्थ है, पाप का हर दर्शन और बोध वह पश्चाताप उत्पन्न नहीं कर सकता, जो 518 पाप का बोध नहीं, तो पश्चाताप नहीं, यह प्रमाणित किया गया।
519 प्रेरितों के काम 2; अध्याय 9; अध्याय 16।
522 अय्यूब 10:2; अध्याय 34:32।
523 यिर्मयाह 31:18, 19, 20।
524 अय्यूब 20:11; नीतिवचन 5:22।
525 मत्ती 25; यशायाह 66:24; मरकुस 9:44।
526 पाप का हर दर्शन और बोध पश्चाताप उत्पन्न नहीं कर सकता।
उद्धार के लिये पश्चाताप है; ऐसा पश्चाताप जिससे फिर कभी पछताना न पड़े। क्योंकि यह अभी हमारे सामने ताज़ा है, कि श्रीमान दुर्जन को अपनी उस पहली बीमारी के दौरे में पाप का दर्शन और बोध हुआ था, परन्तु वह बिना ऐसा कोई भक्तिपूर्ण फल उत्पन्न किए मर गया; जैसा उसके इतनी जल्दी कुत्ते के समान अपनी छाँट की ओर लौट जाने से प्रकट हुआ। बहुत से लोग यह भी सोचते हैं कि पश्चाताप केवल पाप के अंगीकार में है, परन्तु वे बड़ी भूल में हैं: क्योंकि पश्चाताप, जैसा पहले कहा गया, अपराध के लिये शोकित होना, और यीशु मसीह के द्वारा उससे फिरकर परमेश्वर की ओर आना है। अब, यदि यह सच है, कि पाप का हर दर्शन और बोध पश्चाताप उत्पन्न नहीं करता, तो जहाँ पाप का कोई दर्शन और बोध ही नहीं, वहाँ पश्चाताप उत्पन्न हो ही नहीं सकता। कि पाप का हर दर्शन और बोध पश्चाताप उत्पन्न नहीं करता, अर्थात् वह भक्तिपूर्ण पश्चाताप जिसकी हम बात कर रहे हैं, यह कैन, फ़िरौन, शाऊल और यहूदा में प्रकट है, जिन सबको पाप का बोध, बड़ा बोध हुआ, परन्तु उनमें से किसी को भी जीवन के लिये पश्चाताप न मिला।
अब मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ, कि श्रीमान दुर्जन सचमुच बिना पश्चाताप के मरा, और इस प्रकार अत्यन्त दयनीय मृत्यु मरा।
सावधान. परन्तु कृपया अब, श्रीमान दुर्जन के विषय में अपनी बातचीत समाप्त करने से पहले, मुझे उसके अपने पापों में मरने का एक और प्रमाण दीजिए।
527 बुद्धिमान. एक और प्रमाण यह है। उसने अपने पापों का दर्शन और बोध पाने की इच्छा नहीं की, कि उनके लिये पश्चाताप कर सके। क्या मैंने कहा कि उसने इसकी इच्छा नहीं की? मैं यह भी जोड़ता हूँ, कि वह अपनी निश्चिन्तता में बने रहने की बड़ी इच्छा रखता था: और इसे मैं आगे की बातों से प्रमाणित करूँगा। पहले, वह अब यह सह नहीं सकता था कि कोई मनुष्य उससे उसके पापमय जीवन की बात करे, और फिर भी यही वह मार्ग था जिससे उसके प्राण में पाप का दर्शन और बोध, और इस प्रकार उससे पश्चाताप उत्पन्न होता। परन्तु, मैं कहता हूँ, वह ऐसी बातचीत सह नहीं सकता था। जो लोग उससे उसके व्यर्थ बिताए हुए जीवन के विषय में बात करना चाहते थे, वे उसकी अन्तिम बीमारी के समय उसे उतने ही अप्रिय थे, जितना एलिय्याह अहाब को अप्रिय था जब वह उससे मिलने गया, जब अहाब नाबोत की दाख की बारी को अपने अधिकार में लेने जा रहा था। अहाब ने कहा, हे मेरे शत्रु, क्या तूने मेरा पता
528लगाया है? श्रीमान दुर्जन भी अपने मन में उन लोगों से और उनके विषय में ऐसा ही कहता जो इस प्रकार उसके पास आते थे, यद्यपि वे सचमुच प्रेम ही के कारण आते थे, कि उसे उसके बुरे जीवन के विषय में कायल करें, जिससे वह उसके लिये पश्चाताप करे, और दया पाए।
सावधान. तो क्या भले लोग उसकी अन्तिम बीमारी में उसे देखने जाते थे?
बुद्धिमान. हाँ: जो उसकी पहली पत्नी के परिचित थे, वे उसे देखने, और उसके साथ और उससे बातें करने जाते थे, कि कदाचित वह अब, अन्त में, सचेत हो, और दया के लिये परमेश्वर की दोहाई दे।
सावधान. उन्होंने अच्छा किया कि अब अन्त में यह यत्न किया कि क्या वे उसके प्राण को नरक से बचा सकते हैं: परन्तु कृपया बताइए, आप यह कैसे जानते हैं कि उसे ऐसे लोगों की संगति की परवाह नहीं थी?
बुद्धिमान. उस भिन्न व्यवहार के कारण जो वह उनके साथ करता था, उस व्यवहार की तुलना में जो वह तब करता था जब उसके पुराने शारीरिक साथी उसे देखने आते थे: जब उसके पुराने साथी उसे देखने आते, तो वह जितना हो सकता अपने आप को सँभालता, और बातों और चेहरे दोनों से यह जताता कि उनका स्वागत है; वह उनसे खुलकर बातें भी करता, और उन्हें प्रसन्न दृष्टि से देखता, यद्यपि
527 2 इस बात का प्रमाण कि वह बिना पश्चाताप के मरा।
528 1 राजा 21:17, 18, 19, 20, 21।
ऐसे लोगों की बातें वैसी ही हो सकती थीं जैसी दाऊद ने कहा कि शारीरिक मनुष्य उससे करते थे, जब वे उसकी बीमारी में उसे देखने आते थे: वह कहता है, और जब वह मुझसे मिलने को आता है, तब व्यर्थ बातें बकता है,
529और उसका मन अपने अन्दर अधर्म की बातें संचय करता है। परन्तु, मैं कहता हूँ, इस प्रकार की बातें श्रीमान दुर्जन को भले लोगों की संगति से अधिक भाती थीं।
530 परन्तु मैं आपको और विशेष रूप से बताता हूँ कि जब भले लोग (और भली बातें) उसे देखने आते थे तो उनके प्रति उसका व्यवहार कैसा होता था।
1. जब वे आते, तो उन्हें देखते ही वह ऐसा दिखाता मानो उसके प्राण शिथिल हो रहे हों।
2. वे बीच-बीच में उससे जो प्रश्न पूछते, यह परखने के लिये कि उसे पाप, मृत्यु, नरक और न्याय का कितना बोध है, उनमें से किसी का भी उत्तर देने की वह परवाह न करता: वरन् या तो कुछ न कहता, या टालमटोल करके उत्तर देता, या फिर उनसे यह कह देता कि वह इतना निर्बल और थका हुआ है कि अधिक बोल नहीं सकता।
3. वह उनसे बोलने या बातें करने की कभी तत्परता न दिखाता, वरन् जब वे चुप हो जाते तो प्रसन्न होता। वह उनसे अपनी दशा और परलोक के विषय में, या उस नरक-दण्ड से कैसे बचे जिसके वह योग्य था, कोई प्रश्न न पूछता।
4. अन्त में उसने यह आदत बना ली थी कि जब ये भले लोग उसे देखने आने का यत्न करते, तो वह अपनी पत्नी और देखभाल करनेवाली से कहता कि उनसे कह दें कि वह सो रहा है या उसे नींद आ रही है, या नींद न आने के कारण इतना निर्बल है कि कोई शोर सह नहीं सकता। और इस प्रकार वे बार-बार उनके साथ ऐसा ही करतीं, यहाँ तक कि अन्त में वे निराश होकर उसे देखने आना छोड़ बैठे।
5. वह अब, अपनी बीमारी के इस समय में, ऐसा कठोर हो गया था, कि जब उसके साथी उसके पास आते, तो वह उन भले लोगों की (और उनकी भली शिक्षा की भी) निन्दा की बातें करता, जो प्रेम के कारण उसे देखने आते थे, और उसका मन फिराने का परिश्रम करते थे।
6. जब ये भले लोग उसके पास से जाते, तो वह कभी यह न कहता, कृपया फिर कब आने का कष्ट करेंगे, क्योंकि मैं आपकी और संगति चाहता हूँ, और आपकी भली शिक्षा और सुनना चाहता हूँ? नहीं, इसका एक शब्द भी नहीं, वरन् जब वे जाने लगते तो वह मुश्किल से उन्हें कुछ पीने को कहता, या यह कहता, आपकी अच्छी संगति और अच्छी शिक्षा के लिये धन्यवाद।
7. अपनी बीमारी में अपने साथियों से उसकी बातें संसार की होती थीं, जैसे व्यापार, मकान, ज़मीनें, बड़े लोग, बड़ी उपाधियाँ, बड़े पद, बाहरी समृद्धि, या बाहरी विपत्ति, या ऐसी ही कोई शारीरिक बात।
इन सब बातों से मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ, कि उसने अपने पाप का बोध और दर्शन पाने की इच्छा नहीं की, कि वह पश्चाताप करे और उद्धार पाए।
सावधान. यदि ये बातें सच हैं जो आपने उसके विषय में दृढ़ता से कही हैं, तो अवश्य ही वैसा ही होगा जैसा आप कहते हैं। और मैं इन पर और भी अधिक विश्वास करता हूँ, क्योंकि मैं समझता हूँ कि आप किसी मरे हुए के विषय में झूठ बोलने का साहस नहीं करेंगे।
बुद्धिमान. मैं भी उनमें से एक था जो उसके पास गए, और जिन्होंने उसका व्यवहार और उसका ढंग देखा, और जो वृत्तान्त मैंने आपको दिया है वह उसका सच्चा वर्णन है।
530 जब भले लोग उसकी अन्तिम बीमारी में उसे देखने आए तो दुर्जन ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया।
सावधान. मैं सन्तुष्ट हूँ। परन्तु कृपया, यदि आप कर सकें, तो अब मुझे वचन से दिखाइए कि ऐसे मनुष्यों पर परमेश्वर का कौन सा दण्ड-निर्णय होता है?
बुद्धिमान. क्यों, जो मनुष्य इस प्रकार पश्चाताप से विमुख है, जो अपने पापों के विषय में सुनना नहीं चाहता, कि वह पश्चाताप करे और उद्धार पाए; उसके विषय में कहा गया है कि वह ऐसा मनुष्य है जो परमेश्वर से कहता है, मुझसे दूर 531हो! तेरी गति जानने की मुझे इच्छा नहीं। वह ऐसा मनुष्य है जो अपने मन में और अपने कामों से कहता है, मैं तो पराए (पापों) से प्रीति रखता हूँ, और उन्हीं के पीछे चलता रहूँगा। वह ऐसा मनुष्य है जो अपनी आँखें मूँद लेता है, अपने कान बन्द कर लेता है, और जो अपनी आत्मा को परमेश्वर के विरुद्ध फेर देता है। हाँ, वह वही मनुष्य है जो 532परमेश्वर से बैर रखता है, और जो अपने प्राण से उससे घृणा करता है।
सावधान. आप मुझे और कौन सा चिह्न दे सकते हैं कि श्रीमान दुर्जन बिना पश्चाताप के मरा?
533 बुद्धिमान. क्यों, अपने क्लेश के सारे समय में उसने कभी सच्चे मन से दया के लिये परमेश्वर की दोहाई नहीं दी।
यह सच है, कि जब मूर्छा के दौरे, टीसें, या पीड़ाएँ उसे पकड़ लेतीं, तब वह दूसरे शारीरिक मनुष्यों की रीति के अनुसार कहता, हे प्रभु मेरी सहायता कर, हे प्रभु मुझे बल दे, हे प्रभु मुझे छुड़ा, और ऐसी ही बातें: परन्तु दया के लिये परमेश्वर की दोहाई देना, यह उसने नहीं किया, वरन्, जैसा मैंने पहले संकेत किया, ऐसे पड़ा रहा मानो उसने कभी पाप किया ही न हो।
सावधान. यह सचमुच एक और बुरा चिह्न है; क्योंकि दया के लिये परमेश्वर की दोहाई देना पश्चाताप के पहले चिह्नों में से एक है। जब पौलुस अपने बिछौने पर अपने पाप के लिये पश्चाताप करता पड़ा था, तो पवित्र आत्मा ने
534उसके विषय में कहा, देख, वह प्रार्थना कर रहा है। परन्तु जिसमें पश्चाताप के पहले चिह्न नहीं, यह इस बात का चिह्न है कि उसमें दूसरे चिह्नों में से भी कोई नहीं, और इस प्रकार सचमुच पश्चाताप है ही नहीं। मैं इस बात से इन्कार नहीं करता कि जहाँ पश्चाताप का कोई चिह्न न हो, वहाँ भी दोहाई हो सकती है। दाऊद कहता है, उन्होंने यहोवा की दोहाई दी, परन्तु उसने
535उन्हें उत्तर न दिया; परन्तु यदि उनकी दोहाई पश्चाताप का फल होती, तो वह उत्तर देता। परन्तु, मैं कहता हूँ, यदि मनुष्य दोहाई दें, और फिर भी उनमें पश्चाताप न हो, तो निश्चय जानिए, कि जो 536दोहाई देते ही नहीं उनमें पश्चाताप नहीं है। अय्यूब में कहा गया है, जब वह उनको बाँधता है, तब भी वे दोहाई नहीं देते; अर्थात्, क्योंकि उनमें पश्चाताप नहीं; पश्चाताप नहीं, तो दोहाई नहीं; झूठा पश्चाताप, तो झूठी दोहाई; सच्चा पश्चाताप, तो सच्ची दोहाई।
बुद्धिमान. मैं जानता हूँ कि जिस मनुष्य में पश्चाताप है उसके लिये दोहाई न देना उतना ही सम्भव है, जितना घातक पीड़ा अनुभव करनेवाले मनुष्य के लिये कराहना रोक लेना। जो भजन संहिता की पुस्तक में देखता है, (जहाँ पश्चाताप का, उसके सच्चे और उचित प्रभावों समेत, अत्यन्त सजीव वर्णन है,) वह वहाँ पाएगा, कि दोहाई देना, ऊँचे शब्द से दोहाई देना, सच्चे मन से दोहाई देना, बड़ी दोहाई देना, और निरन्तर दोहाई देना, पश्चाताप के फल रहे हैं: (परन्तु इनमें से कुछ भी इस श्रीमान दुर्जन में नहीं था, इसलिये वह अपने पापों में मरा।) कि दोहाई देना पश्चाताप का एक अलग न होनेवाला प्रभाव है, यह पवित्रशास्त्र के इन वचनों में देखा जाता है। हे परमेश्वर, अपनी करुणा के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर; अपनी बड़ी दया के अनुसार मेरे
532 यिर्मयाह 2:25; जकर्याह 7:11, 12; प्रेरितों के काम 28:26, 27।
533 3 इस बात का प्रमाण कि वह बिना पश्चाताप के मरा।
अपराधों को मिटा दे। हे यहोवा, तू मुझे अपने क्रोध में न डाँट, और न झुँझलाहट में मुझे ताड़ना दे। हे यहोवा, मुझ पर अनुग्रह कर, क्योंकि मैं कुम्हला गया हूँ। हे यहोवा, मुझे चंगा कर, क्योंकि मेरी हड्डियों में बेचैनी है।
मेरा प्राण भी बहुत खेदित है, परन्तु तू, हे यहोवा, कब तक? लौट आ, हे यहोवा, और मेरे प्राण बचा: अपनी करुणा के निमित्त मेरा उद्धार कर। हे यहोवा, क्रोध में आकर मुझे झिड़क न दे, और न जलजलाहट में आकर मेरी ताड़ना कर; क्योंकि तेरे तीर मुझ में लगे हैं, और मैं तेरे हाथ के नीचे दबा हूँ। तेरे क्रोध के कारण मेरे शरीर में कुछ भी आरोग्यता नहीं, और मेरे पाप के कारण मेरी हड्डियों में कुछ भी चैन नहीं। क्योंकि मेरे अधर्म के कामों में मेरा सिर डूब गया, और वे भारी बोझ के समान मेरे सहने से बाहर हो गए हैं। मेरी मूढ़ता के कारण मेरे घाव सड़ गए और उनसे दुर्गन्ध आती है। मैं बहुत दुःखी हूँ
और बहुत झुक गया हूँ; दिन भर मैं शोक का पहिरावा पहिने हुए चलता फिरता हूँ। क्योंकि मेरी कमर में घिनौना रोग भरा है, और मेरे शरीर में आरोग्यता नहीं। मैं निर्बल और बहुत ही चूर हो गया हूँ; मैं अपने
537मन की घबराहट से कराहता हूँ।
मैं आपको भले मनुष्यों के और भी बहुत से पवित्र कथन दे सकता हूँ, जिनमें वे यह प्रकट करते हैं कि जब उनमें पश्चाताप उत्पन्न किया गया, तब वे कैसे थे, उन्होंने क्या अनुभव किया, और उन्होंने दोहाई दी या नहीं। हाय, हाय, जब किसी मनुष्य पर दोष की पीड़ा हो, तब उसके लिये प्रार्थना करना रोक लेना उतना ही सम्भव है, जितना प्रसव की पीड़ा में पड़ी स्त्री के लिये चिल्लाना रोक लेना। यदि सारा संसार मुझसे कहे कि अमुक मनुष्य में पश्चाताप है, फिर भी यदि वह प्रार्थना करनेवाला मनुष्य नहीं है, तो मुझे उस पर विश्वास करने के लिये मनाया न जा सकेगा।
सावधान. मैं कोई कारण नहीं जानता कि आप क्यों विश्वास करें: क्योंकि ऐसी कोई बात नहीं जो यह प्रमाणित कर सके कि ऐसे मनुष्य में पश्चाताप है। परन्तु कृपया, महोदय, आपके पास और कौन सा चिह्न है, जिससे आप प्रमाणित कर सकें कि श्रीमान
दुर्जन अपने पापों में, और इस प्रकार नरक-दण्ड की दशा में मरा?
538 बुद्धिमान. इसे प्रमाणित करने के लिये मेरे पास यह है। जो लोग उसके स्वस्थ रहने के समय में उसके पुराने पापी साथी थे, उन्हीं की संगति और शारीरिक बातचीत में वह अपनी बीमारी के समय में सबसे अधिक आनन्द पाता था। इसका संकेत मैं पहले भी प्रसंगवश कर चुका हूँ, परन्तु अब मैं इसे उसमें अनुग्रह के अभाव का एक प्रमाण बनाता हूँ: क्योंकि जहाँ सचमुच मन में अनुग्रह का काम होता है, वहाँ वह काम न केवल मन, विचारों और अभिलाषाओं को बदलता है, वरन् चालचलन को भी; हाँ, चालचलन और संगति दोनों को। जब पौलुस के प्राण में अनुग्रह का काम हुआ, तो उसने चेलों के साथ मिल जाने का यत्न किया। वह अब अपने पुराने साथियों के साथ उनके घिनौने कामों में न रहा: वह अब एक चेला था, और चेलों की संगति चाहता था। और वह उनके साथ यरूशलेम में आता 539जाता रहा।
सावधान. जब मैंने आपको पहले इसका उल्लेख करते सुना, तब मैंने भी कुछ सोचा था। मैंने सोचा, यह इस बात का पक्का चिह्न है कि उसके मन में अनुग्रह नहीं था। मैंने सोचा, एक ही पंख के पक्षी एक साथ झुण्ड बनाते हैं: यदि यह मनुष्य परमेश्वर की सन्तानों में से एक होता, तो वह परमेश्वर की सन्तानों के साथ झुण्ड में रहता, उसका आनन्द परमेश्वर की सन्तानों के साथ, और उनकी संगति में होता। जैसा दाऊद ने कहा, जितने तेरा भय मानते और तेरे उपदेशों पर चलते हैं, उन सबका मैं 540संगी हूँ।
537 भजन संहिता 51:1। भजन संहिता 6:1, 2, 3, 4। भजन संहिता 38।
538 4 प्रमाण, कि वह बिना पश्चाताप के मरा।
बुद्धिमान. आप ठीक कहते हैं, क्योंकि विश्वासी के साथ अविश्वासी का क्या नाता? और यद्यपि यह सच है कि जितने भक्तों के साथ मिल जाते हैं वे सब भक्त नहीं होते, तौभी जो लोग भक्तों की संगति की अपेक्षा भक्तिहीनों और खुले अधर्मियों की संगति को मन से चुनते हैं, जैसा श्रीमान दुर्जन ने किया, वे निश्चय भक्त मनुष्य नहीं, परन्तु अधर्मी हैं। जैसा मैंने आपको बताया, जब भले लोग उससे मिलने आते थे, तब वह मानो अपने स्वभाव से बाहर होता था; परन्तु जब उसके व्यर्थ साथी उसके आसपास होते, तब वह वहीं होता जहाँ वह होना चाहता था। हाय! जैसा मैंने कहा, अनुग्रह सब कुछ बदल देता है—मन, जीवन, संगति, सब कुछ; क्योंकि उसके द्वारा मन और मनुष्य नया बनाया जाता है; और नये मन, नये मनुष्य को आनन्द की ऐसी वस्तुएँ चाहिए जो नई हों, और उसी के समान हों: पुरानी बातें बीत गई हैं; क्यों? क्योंकि सब
541बातें नई हो गई हैं। अब यदि सब बातें नई हो गई हैं, अर्थात् मन, बुद्धि, विचार, इच्छाएँ और आनन्द, तो इसका परिणाम यह निकलता है कि संगति भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए: इसी कारण कहा गया है, कि जिन्होंने विश्वास किया वे इकट्ठे रहते थे; कि वे अपने साथियों के पास गए;
542कि वे कलीसिया में मिला दिए गए; कि वे एक मन और एक चित्त के थे; इत्यादि। अब यदि यह आपत्ति की जाए कि श्रीमान दुर्जन बीमार था, और इसलिये भक्तों के पास नहीं जा सकता था, तौभी उसके मुँह में जीभ तो थी, और यदि उसमें वैसा मन होता, तो वह किसी से कह सकता था कि भक्तों को बुला ले, या उन्हें अपने पास आने का सन्देश भेज दे। हाँ, वह ऐसा ही करता; हाँ, तब दूसरे सब लोगों की, विशेषकर उसके संगी पापियों की संगति, उनके उसके सामने आने पर हर बार, उसके लिये बोझ और दुःख का कारण होती। यदि उसका मन और स्नेह भलाई की ओर झुका होता, तो भले साथी ही उसे सबसे अधिक भाते। परन्तु उसके साथी उसके पुराने संगी ही थे, उसका आनन्द उन्हीं में था, इसलिये उसका मन और प्राण अब भी भक्तिहीन ही थे।
सावधान. कृपया बताइए, जब वह अपने अन्त के निकट पहुँचा तब वह कैसा था? क्योंकि मैं देखता हूँ कि जो कुछ आप अब उसके विषय में कह रहे हैं, उसका सम्बन्ध उससे और उसके कामों से, उसकी बीमारी के आरम्भ के समय से है? उस समय तो वह संगति और बहुत बातचीत सह सकता था; इसके अतिरिक्त, कदाचित् तब वह सोचता था कि वह चंगा हो जाएगा और न मरेगा, जबकि बाद में, जब वह घुलानेवाली बीमारी से बिलकुल क्षीण हो गया, जब वह कब्र के मुँह पर था, तब उसके पास दूसरा ही सोचने का कारण था। परन्तु मैं फिर पूछता हूँ, जब वह (जैसा हम कहते हैं) कब्र के मुँह पर था, मृत्यु से केवल एक कदम दूर, तब वह कैसा था? जब उसने देखा, और जाना, और जाने बिना रह न सका, कि उसे शीघ्र ही मरना और परमेश्वर के न्याय के सामने उपस्थित होना है?
543 बुद्धिमान. उसमें कोई और परिवर्तन न हुआ, केवल वही जो उसके रोग ने उसकी देह पर किया: आप जानते हैं, बीमारी देह को बदल देती है, और पीड़ाएँ और चुभनें भी मनुष्यों को कराहने पर विवश करती हैं; परन्तु जहाँ तक उसके मन की बात है, उसमें कोई परिवर्तन न हुआ। उसका मन वैसा ही था, उसका हृदय वैसा ही था। वह अब भी वही का वही श्रीमान दुर्जन था: केवल नाम में ही नहीं, परन्तु स्वभाव में भी, और यह उसकी मृत्यु के दिन तक; हाँ, जहाँ तक जाना जा सका, ठीक उस क्षण तक जिसमें वह मरा।
सावधान. कृपया बताइए, अपनी मृत्यु में वह कैसा था? क्या मृत्यु उस पर कठोरता से प्रबल हुई? या वह सहज में, शान्ति से मरा?
542 प्रेरितों के काम 4:32, 33। अध्याय 2:44, 45, 46, 47।
543 अपने अन्त के निकट श्रीमान दुर्जन कैसा था।
544 बुद्धिमान. मेम्ने के समान शान्ति से। पास खड़े लोगों को उसमें प्रकृति का कोई कड़ा संघर्ष भी दिखाई न पड़ा: और जहाँ तक उसके मन की बात है, वह पूरी तरह शान्त प्रतीत होता था। परन्तु कृपया बताइए, आप मुझसे यह प्रश्न क्यों पूछते हैं?
545 सावधान. अपने लिये नहीं, परन्तु दूसरों के लिये। क्योंकि अज्ञानियों में ऐसी एक धारणा है: कि यदि कोई मनुष्य, जैसा वे कहते हैं, मेम्ने के समान मरे, अर्थात् शान्ति से, और मन की उस घबराहट के बिना जो दूसरे अपनी मृत्यु में दिखाते हैं, तो वे यह निष्कर्ष निकालते हैं, और वह भी बिना किसी सन्देह के, कि ऐसा व्यक्ति स्वर्ग चला गया है, और निश्चय आनेवाले क्रोध से बच निकला है।
बुद्धिमान. शान्त मृत्यु के द्वारा इस प्रकार मरनेवाले की अनन्त दशा के विषय में कोई निर्णय नहीं किया जा सकता। मान लीजिए, एक मनुष्य शान्ति से मरे, दूसरा अचानक मरे, और तीसरा आत्मा की बड़ी घबराहट में मरे; इन में से किसी भी प्रकार की मृत्यु के ढंग से कोई मनुष्य उनकी अनन्त दशा का न्याय नहीं कर सकता। जो शान्ति से, अचानक, या आत्मा की घबराहट में मरता है, वह स्वर्ग जा सकता है, या नरक जा सकता है; मृत्यु के किसी ऐसे ढंग से कोई नहीं बता सकता कि 546मनुष्य कहाँ जाता है। इसलिये मनुष्य की अनन्त दशा के विषय में जो निर्णय हम करते हैं, वह किसी और बात पर विचार करके निकाला जाना चाहिए: अर्थात्, क्या वह मनुष्य अपने पापों में मरा? क्या वह अविश्वास में मरा? क्या वह नया जन्म पाने से पहले मरा? तो वह शैतान और नरक के पास चला गया है, चाहे वह कितनी भी शान्ति से क्यों न मरा हो। फिर, क्या वह मनुष्य भला मनुष्य था? क्या उसमें विश्वास और पवित्रता थी? क्या वह परमेश्वर के वचन के अनुसार, मसीह के द्वारा परमेश्वर से प्रेम करनेवाला और उसकी आराधना करनेवाला था? तो वह परमेश्वर और स्वर्ग के पास चला गया है, चाहे वह कितना भी अचानक, या मन की कैसी भी घबराहट में क्यों न मरा हो: परन्तु श्रीमान दुर्जन निकम्मा था, उसका जीवन बुरा था, उसकी चाल बुरी थी; अपने अन्त तक बुरी: इसलिये वह नरक और शैतान के पास गया, चाहे वह कितनी भी शान्ति से क्यों न मरा।
सचमुच कुछ दशाओं में मनुष्य की अनन्त दशा का निर्णय 547उस मृत्यु के ढंग से किया जा सकता है जिससे वह मरता है। जैसे, मान लीजिए कोई मनुष्य अपनी ही हत्या कर ले, या दुष्ट जीवन बिताए और उसके बाद पूरी निराशा में मरे; ये दोनों मनुष्य निःसन्देह नरक जाते हैं। और यहाँ मैं अवसर लेकर श्रीमान दुर्जन के दो भाइयों के विषय में, (क्योंकि आप जानते हैं, मैंने आपको पहले बताया था कि उसके भाई थे,) और उनकी मृत्यु के ढंग के विषय में कुछ कहूँगा। उनमें से एक ने अपने आप को मार डाला, और दूसरा दुष्ट जीवन के बाद पूरी निराशा में मरा। अब इन दोनों के विषय में यह निष्कर्ष निकालने में मुझे कोई भय न होगा, कि वे अपनी मृत्यु के द्वारा, और उसी में से होकर, नरक गए।
सावधान. कृपया पहले के विषय में मुझे बताइए, उसने अपने आप को कैसे मिटा डाला?
बुद्धिमान. उसने एक छुरी लेकर अपना ही गला काट डाला, और तुरन्त प्राण छोड़कर मर गया। अब ऐसे मनुष्य की दशा के विषय में हम क्या निर्णय कर सकते हैं, जबकि पवित्रशास्त्र कहता है, किसी हत्यारे में अनन्त जीवन नहीं रहता, इत्यादि; सिवाय इसके कि यही निष्कर्ष निकाला जाए कि ऐसा व्यक्ति नरक गया है। वह हत्यारा था, आत्म-हत्यारा; और वह सबसे बुरा हत्यारा है, वह जो अपने
544 वह मेम्ने के समान मरा।
545 उसके मरने के ढंग के विषय में अज्ञानियों की धारणा।
546 हमें कैसे निर्णय करना चाहिए कि मनुष्य अच्छी रीति से मरते हैं या नहीं।
547 कब हम मनुष्य की मृत्यु के ढंग से उसकी अनन्त दशा का निर्णय कर सकते हैं।
ही शरीर और प्राण को घात करता है: और ऐसे काम करनेवालों में हम शापित लोगों को छोड़ और किसी का उल्लेख नहीं पाते। मैं कहता हूँ, पवित्र वचन में ऐसों को छोड़ और किसी का उल्लेख नहीं, जो अपनी ही हत्या करते हैं।
और यह मनुष्यों पर परमेश्वर का भारी दण्ड है, जब परमेश्वर ऐसों के पापों के कारण उन्हें इस बात के लिये छोड़ देता है कि वे अपने ही जल्लाद बनें, या यों कहें कि अपने ऊपर उसके दण्ड और क्रोध को आप ही पूरा करें। और मैं पापियों को यह चेतावनी बड़े आग्रह से देना चाहता हूँ। महाशयो, सावधान रहिए, अपने पापों को छोड़ दीजिए, कहीं ऐसा न हो कि परमेश्वर आपके साथ वैसा ही करे जैसा उसने श्रीमान दुर्जन के भाई के साथ किया: अर्थात्, कहीं ऐसा न हो कि वह आपको छोड़ दे कि आप अपने ही हत्यारे बनें।
सावधान. अब जब आप इसकी चर्चा कर रहे हैं, तो मैं एक बार एक मनुष्य को जानता था, एक नाई, जिसने अपना ही उस्तरा लेकर अपना गला काट डाला, और फिर अपनी कोठरी की खिड़की से अपना सिर बाहर निकाला, कि पड़ोसियों को दिखाए कि उसने क्या किया है, और थोड़ी देर बाद मर गया।
बुद्धिमान. मैं आपको इससे भी भयानक बात बता सकता हूँ: मेरा तात्पर्य उस 548काम को करने के ढंग से है। लगभग बारह वर्ष हुए, नॉर्थैम्पटन के पास ब्रेफ़ील्ड में एक मनुष्य रहता था,
(जिसका नाम जॉन कॉक्स था) जिसने अपनी ही हत्या कर ली; और उसके ऐसा करने का ढंग यह था। वह एक कंगाल मनुष्य था, और कुछ समय से बीमार था (और उसकी बीमारी का समय घास-कटाई के मौसम के आरम्भ के लगभग था;) और यह सोच-सोचकर कि यदि उसके काम का यह वर्तमान मौसम हाथ से निकल गया तो आगे वह कैसे जीएगा, वह संसार की बातों के विषय में गहरी निराशा में पड़ गया, और जिस दिन उसने अपने आप को मारा, उस दिन सबेरे उसने अपनी पत्नी से चिल्लाकर कहा, हम नष्ट हो गए। परन्तु थोड़ी ही देर बाद उसने अपनी पत्नी से कहा कि कोठरी से चली जाए, क्योंकि, उसने कहा, मैं देखूँगा कि मुझे कुछ विश्राम मिल सकता है या नहीं; सो वह बाहर चली गई: परन्तु वह सोने के बदले, तुरन्त अपना उस्तरा लेकर उससे अपनी बगल में एक बड़ा छेद काट बैठा, जिसमें से उसने अपनी कुछ अँतड़ियाँ खींचकर काट डालीं, और उन्हें लहू समेत कोठरी में इधर-उधर फेंक दिया। परन्तु जब इससे वह उतनी शीघ्रता से न मरा जितनी वह चाहता था, तो उसने वही उस्तरा लेकर उससे अपना गला काट डाला। तब उसकी पत्नी उसे आहें भरते और उखड़ी-उखड़ी साँसें लेते सुनकर, फिर कोठरी में उसके पास आई, और यह देखकर कि उसने क्या कर डाला है, बाहर दौड़ी और कुछ पड़ोसियों को बुला लाई, जो उसके पास आए जहाँ वह लहू-लुहान पड़ा था, ऐसी दशा में कि देखने से भय लगता था। तब उनमें से एक ने उससे कहा, आह! जॉन, तुमने यह क्या किया? क्या तुम्हें अपने किए पर खेद नहीं? उसने रूखाई से उत्तर दिया, अब खेद करने के लिये बहुत देर हो चुकी है।
तब उसी व्यक्ति ने उससे फिर कहा, आह! जॉन, परमेश्वर से प्रार्थना करो कि वह तुम्हारे इस खूनी काम को क्षमा करे। इस उपदेश को सुनकर वह बहुत चिढ़ गया, और क्रोध में बोला, प्रार्थना! और इसके साथ ही झटके से दीवार की ओर मुँह फेर लिया, और यों कुछ हाँफने के बाद निराशा में मर गया। जब उसने दीवार की ओर करवट लेकर अपनी पीठ फेर ली, तो उसके पेट से लहू ऐसा बहा जैसे किसी कटोरे से, और बिछौने में से होकर नीचे तख्तों तक पूरा भीग गया, और तख्तों की दरारों में से होकर धार बनकर भूमि पर बहने लगा। कुछ लोगों ने कहा, कि जब पड़ोसी उसे देखने आए, तब वह अपना हाथ अपनी अँतड़ियों में डाले टटोल रहा था, और ऊपर की ओर हाथ बढ़ा रहा था, जैसा समझा गया, कि अपना हृदय खींचकर या काटकर निकाल ले। यह भी कहा गया, कि उसके
कलेजे का कुछ भाग उसने फाड़कर निकाला और तख्तों पर फेंक दिया था, और उसकी बहुत सी अँतड़ियाँ 548 जॉन कॉक्स की कहानी।
बिछौने के किनारे से बाहर लटक रही थीं। परन्तु मैं सब ब्योरों की पुष्टि नहीं कर सकता; परन्तु कहानी का सार, ऊपर बताई गई इन परिस्थितियों के साथ, सच है; मैंने इसे एक गम्भीर और विश्वासयोग्य व्यक्ति से सुना है, जो स्वयं उन लोगों में से एक था जिन्होंने उसे इस लहू-लुहान दशा में देखा, और जिसने उससे बातें कीं, जैसा पहले संकेत किया गया।
ऐसी और भी बहुत सी भयानक बातें आपको बताई जा सकती हैं, परन्तु ये पर्याप्त हैं, हाँ, बहुत अधिक भी, यदि परमेश्वर ने अपनी बुद्धि में उन्हें रोकना आवश्यक समझा होता।
सावधान. यह भयानक कहानी है: और मैं परमेश्वर से चाहता हूँ कि यह दूसरों के लिये चेतावनी हो, कि उन्हें सिखाए कि वे परमेश्वर के सामने भय मानें, और प्रार्थना करें, कहीं ऐसा न हो कि वह उन्हें छोड़ दे कि वे भी वैसा ही करें जैसा जॉन कॉक्स ने किया। क्योंकि निश्चय आत्म-हत्यारे स्वर्ग नहीं जा सकते: और इसलिये, जैसा आपने कहा, जो अपने ही हाथों से मरता है, वह निश्चय नरक गया है। परन्तु उस दूसरे मनुष्य के विषय में भी, जिसका आपने उल्लेख किया, एक-दो बातें कहिए।
बुद्धिमान. क्या? निराशा में मरनेवाले दुष्ट मनुष्य के विषय में?
सावधान. हाँ, निराशा में मरनेवाले दुष्ट मनुष्य के विषय में।
549 बुद्धिमान. अच्छा तो सुनिए: श्रीमान दुर्जन का यह दूसरा भाई मन और जीवन दोनों में बड़ा दुष्ट मनुष्य था; मैं कहता हूँ मन में, क्योंकि वह जीवन में ऐसा था; और कोई भी बात उसे सुधार न सकी; न भले मनुष्य, न अच्छी पुस्तकें, न अच्छे उदाहरण, न परमेश्वर के दण्ड। अच्छा, बहुत समय तक अपने पापों में जीवन बिताने के बाद, परमेश्वर ने उसे एक बीमारी से मारा जिससे वह मर गया। अब अपनी बीमारी में उसका विवेक जागने लगा, और वह अपने बुरी तरह बिताए हुए जीवन के कारण गरजने-चिल्लाने लगा, यहाँ तक कि सारे नगर में उसकी चर्चा गूँजने लगी। जब यह बात फैल गई, तो बहुत से पड़ोसी उसे देखने, और उसके पास बैठकर पढ़कर सुनाने आए, जैसी कुछ लोगों की साधारण रीति है; परन्तु वे जो कुछ कर सके, उससे उसका भय घट न सका, परन्तु वह अपने बिछौने पर दाँत पीसता, और अपनी कलाइयाँ मरोड़ता पड़ा रहता, और अपने प्राण के नरक-दण्ड का निश्चय कर बैठता; और उसी भय और निराशा में वह मर गया; परमेश्वर को न पुकारते हुए, परन्तु उसकी दया पर अविश्वास करते हुए, और उसके नाम की निन्दा करते हुए।
सावधान. इससे मुझे एक मनुष्य की याद आती है जिसके विषय में मेरे एक मित्र ने मुझे बताया था। वह दुष्ट जीवन बितानेवाला था; सो जब वह मरने पर आया, तो निराशा में पड़ गया, और यह निश्चय करके कि परमेश्वर के पास उसके लिये कोई दया नहीं, उसने शैतान से कृपा माँगी, और कहा, भले शैतान, मुझ पर भला कर।
बुद्धिमान. यह लगभग शाऊल के समान है, जो परमेश्वर से त्यागा जाकर एन्दोर की भूतसिद्धि करनेवाली स्त्री के पास, 550 551और इस प्रकार शैतान के पास सहायता के लिये गया। परन्तु हाय, यदि मैं इन भयानक
कहानियों को इकट्ठा करने में लग जाऊँ, तो थोड़े ही समय में आपके सामने उनमें से सैकड़ों रखना सहज होगा: परन्तु जैसे मैंने आरम्भ किया था, वैसे ही समाप्त करूँगा; जो अपने ही हत्यारे होते हैं, या जो दुष्टता का जीवन बिताने के बाद निराशा में मरते हैं, वे निश्चय नरक जाते हैं।
549 निराशा में मरने के विषय में।
551 भजन संहिता 73:4। (समझ में नहीं आता कि यह पाठ में कहाँ बैठता है।—DP) और यहाँ मैं एक चेतावनी जोड़ना चाहता हूँ: हर एक जो आत्मा की घबराहट में, अर्थात् विस्मय और बड़े भय में मरता है, वह इस कारण निराशा में नहीं मरता: क्योंकि एक भले मनुष्य को अपनी मृत्यु में यही उसका बन्धन मिल सकता है, और तौभी वह स्वर्ग और महिमा में जा सकता है। क्योंकि, जैसा मैंने पहले कहा,
जो भला मनुष्य है, ऐसा मनुष्य जिसमें विश्वास और पवित्रता है, जो परमेश्वर के वचन के अनुसार, मसीह के द्वारा परमेश्वर से प्रेम करनेवाला और उसकी आराधना करनेवाला है, वह आत्मा की घबराहट में मर सकता है: क्योंकि शैतान भले मनुष्यों पर उनकी मृत्यु-शय्या पर आक्रमण करने से नहीं चूकेगा, परन्तु वे परमेश्वर के वचन और सामर्थ के द्वारा सुरक्षित रहते हैं; हाँ, और उनकी सहायता भी की जाती है, कि आत्मा की बड़ी वेदना के बीच भी वे विश्वास और प्रार्थना में लगे रहें; जो वह, जो निराशा में मरता है, किसी भी रीति से नहीं कर सकता।
परन्तु आइए, हम श्रीमान दुर्जन की ओर लौटें, और उसकी मृत्यु के ढंग के विषय में आगे बातचीत करें।
सावधान. मैं समझता हूँ कि आप और मैं दोनों एक ही मन के हैं; क्योंकि अभी-अभी मैं भी सोच रहा था कि आपको उसी की ओर फिर बुला लाऊँ। और अब, जब कि उसकी ओर फिर लौटना आपका ही प्रस्ताव है, तो कृपया आइए, उसकी शान्त और निश्चल मृत्यु के विषय में थोड़ी और बातचीत करें।
बुद्धिमान. पूरे मन से। आप जानते हैं कि हम पहले श्रीमान
552दुर्जन की मृत्यु के ढंग के विषय में बातें कर रहे थे: कि वह कैसे बहुत निश्चलता और शान्ति से मरा; जिस पर आपने यह बात ध्यान में दिलाई, कि साधारण लोग यह निष्कर्ष निकालते हैं, कि यदि कोई मनुष्य शान्ति से, और जैसा वे कहते हैं, मेम्ने के समान मरे, तो वह निश्चय स्वर्ग गया है: जबकि हाय, यदि कोई दुष्ट मनुष्य शान्ति से मरे, यदि कोई मनुष्य जिसने अपने सारे दिन कुख्यात पाप में बिताए हैं, शान्ति से मरे; तो उसका शान्ति से मरना उसके उद्धार पाने का चिह्न होना तो दूर रहा, वह उसके नरक-दण्ड का अकाट्य प्रमाण है। यही
श्रीमान दुर्जन की दशा थी, वह अन्त तक दुष्टता से जीता रहा, और फिर शान्ति से संसार से चला गया: इसलिये श्रीमान दुर्जन नरक गया है।
सावधान. अच्छा, परन्तु जब आप इस विषय पर हैं, और इस बात पर इतने निश्चित भी हैं, अर्थात् यह कि जो मनुष्य मरते दम तक दुष्ट जीवन बिताता है, और फिर शान्ति से मरता है, वह नरक गया है; तो मुझे दिखाइए कि अपनी इस धारणा के लिये आपके पास कौन सा प्रमाण है।
बुद्धिमान. मेरा पहला तर्क पश्चाताप की आवश्यकता से लिया गया है: कोई मनुष्य बिना पश्चाताप किए उद्धार नहीं पा सकता, और न वह पश्चाताप कर सकता है जो यह नहीं देखता, नहीं जानता कि वह पापी है; और जो अपने आप को पापी जानता है, मैं उसके विषय में दावे से कहता हूँ, वह उस समय
553उस ज्ञान के कारण व्याकुल होगा। यह बात, जैसे सारा पवित्रशास्त्र इसकी गवाही देता है, वैसे ही मसीही अनुभव भी इसकी गवाही देता है। जो अपने विषय में जानता है कि वह पापी है, वह व्याकुल होता है, विशेषकर यदि यह ज्ञान उसे तब तक न मिले जब तक वह मृत्यु-शय्या पर न डाल दिया जाए; मैं कहता हूँ, शान्ति से मर सकने से पहले वह व्याकुल होता है। हाँ, वह व्याकुल, उदास और गिरा हुआ होता है, और वह चिल्लाने पर, और मसीह के द्वारा दया के लिये भूखा और प्यासा होने पर भी विवश किया जाता है; और यदि अन्त में वह सचमुच शान्ति से मरने पाए, मेरा तात्पर्य उस शान्ति से है जो परमेश्वर की दया पर विश्वास और आशा से उत्पन्न होती है (जिससे श्रीमान दुर्जन और उसके भाई बिलकुल अपरिचित थे), तो उसकी शान्ति को सब विवेकी देखनेवाले पहचान लेते हैं—उससे जो उसके पहले हुआ, उससे जिससे वह निकलती है, और उससे भी जो उसका फल है।
552 श्रीमान दुर्जन की मृत्यु के विषय में आगे की बातचीत।
553 जो पापमय जीवन के बाद शान्ति से, अर्थात् बिना पश्चाताप के, मरता है, वह नरक जाता है। 1 प्रमाण मुझे मानना पड़ता है कि मैं बीमारी की खाट पर किए गए पश्चाताप का प्रशंसक नहीं हूँ, क्योंकि मैं सचमुच समझता हूँ कि वह विरले ही
554 किसी काम का होता है: परन्तु मैं कहता हूँ, जिसने अपने सारे दिन पाप और अधर्म में बिताए हैं, जैसा श्रीमान दुर्जन ने किया, और तौभी शान्ति से मरता है, अर्थात् उसके जीवन और मृत्यु के बीच पश्चाताप आकर खड़ा नहीं होता, वह निश्चय नरक गया है, और उस पर नरक-दण्ड पड़ चुका है।
सावधान. यह तो सचमुच तर्क के समान दिखता है; क्योंकि पश्चाताप को आना ही चाहिए, नहीं तो हमें नरक की आग में जाना होगा: और यदि कोई लुच्चा जीवन बितानेवाला (मेरा तात्पर्य उससे है जो अपनी मृत्यु के दिन तक ऐसा ही बना रहता है) तौभी शान्ति से संसार से चला जाए, तो यह इस बात का चिह्न है कि वह बिना पश्चाताप के मरा, और इस प्रकार इस बात का चिह्न है कि उस पर नरक-दण्ड पड़ चुका है।
बुद्धिमान. जहाँ तक मेरी बात है, मैं इससे सन्तुष्ट हूँ, और वह पश्चाताप की आवश्यकता और स्वभाव के कारण। वह आवश्यक है, क्योंकि परमेश्वर उसकी माँग करता है, और उसके बिना पाप क्षमा न करेगा: यदि तुम मन न फिराओगे तो तुम सब भी इसी रीति से नाश होगे। यह वह है जो परमेश्वर ने कहा है, और वह मनुष्य केवल दुस्साहसी मूर्ख ठहरेगा जो तौभी उसके बिना स्वर्ग और महिमा में जाने की सोचे। मन फिराओ, क्योंकि कुल्हाड़ा पेड़ों की जड़ पर रखा हुआ है, इसलिये जो जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, (परन्तु जहाँ सच्चा पश्चाताप नहीं वहाँ कोई अच्छा फल नहीं हो सकता) वह काटा और
555आग में झोंका जाएगा। यही श्रीमान दुर्जन की दशा थी, पापमय जीवन उसके साथ लगा रहा, और वह भी ठीक अन्त तक, और तौभी वह शान्ति से, अर्थात् बिना पश्चाताप के मरा; वह नरक गया है और उस पर नरक-दण्ड पड़ चुका है। पश्चाताप के स्वभाव के विषय में, मैं उसकी चर्चा पहले कर चुका हूँ, और दिखा चुका हूँ, कि जहाँ शान्त मृत्यु पापमय जीवन की ठीक पीछे-पीछे चलनेवाली संगिनी हो, वहाँ वह कभी नहीं था; और इसलिये
श्रीमान दुर्जन नरक गया है।
556 दूसरा, मेरा दूसरा तर्क मसीह के उस धन्य वचन से लिया गया है, जब बलवन्त मनुष्य हथियार बाँधे हुए अपने घर की रखवाली करता है, तो उसकी संपत्ति शान्ति से बची रहती है, जब तक कि उससे बढ़कर कोई बलवन्त न आए: परन्तु हथियारबन्द बलवन्त मनुष्य ने श्रीमान दुर्जन के घर की, अर्थात् उसके मन, और प्राण, और देह की रखवाली की, क्योंकि वह पापमय जीवन से शान्ति के साथ इस संसार से चला गया: उस अधिक बलवन्त ने उसके पापमय जीवन और उसकी शान्त मृत्यु के बीच सच्चे पश्चाताप के द्वारा आड़े आकर उसमें बाधा नहीं डाली: इसलिये श्रीमान
दुर्जन नरक गया है।
हथियारबन्द बलवन्त मनुष्य शैतान है, और शान्ति उसकी सुरक्षा है। यदि शैतान पापी को बस शान्त रख सके, तो उसे पापी के खो जाने का कभी भय नहीं होता: यदि वह उसे पापमय जीवन में शान्त और उसकी मृत्यु में शान्त रख सके, तो वह उसी का है। इसलिये वह कहता है, उसकी संपत्ति शान्ति से बची रहती है; अर्थात्, संकट से बाहर। मैं कहता हूँ, ऐसे प्राण को शैतान के खो देने का कोई भय नहीं, क्योंकि मसीह, जो इस विषय में सबसे अच्छा न्यायी है, कहता है, उसकी संपत्ति शान्ति में, चैन में, और संकट से बाहर है।
557 सावधान. यह भी अच्छा तर्क है; क्योंकि निःसन्देह, पाप के साथ शान्ति और चैन, नरक-दण्ड के योग्य दशा के सबसे बड़े चिह्नों में से एक है।
554 बीमारी की खाट पर का पश्चाताप विरले ही किसी काम का होता है।
555 लूका 13:1, 2, 3, 4, 5, 6, 7।
557 पापमय दशा में शान्ति नरक-दण्ड का चिह्न है।
बुद्धिमान. ऐसा ही है। इसलिये जब परमेश्वर एक ही शब्द में पाप 558और पापियों के विरुद्ध अपने क्रोध की महानता दिखाना चाहता है, तब वह कहता है, वे मूरतों के संगी हो गए हैं, उन्हें रहने दो। उन्हें रहने दो, अर्थात्, उन्हें न छेड़ो; उन्हें बिना रोक-टोक चलते रहने दो; शैतान को उन्हें चैन से भोगने दो, उसे उन्हें बिना मन फिराए शान्ति से संसार से ले जाने दो। यह सबसे भारी दण्डों में से एक है, और पापी मनुष्यों के विरुद्ध परमेश्वर के भड़कते क्रोध को प्रगट करता है। जब आप घर पहुँचें, तो उस अध्याय का चौदहवाँ पद भी देखिए, जिसका उल्लेख अभी हाशिये में हुआ है: जब तुम्हारी बेटियाँ छिनाला करें, तब मैं उनको दण्ड न दूँगा। मैं उन्हें रहने दूँगा, वे अपने पापों में जीएँगी और मरेंगी। परन्तु, 559 तीसरा, मेरा तीसरा तर्क मसीह के इस कथन से लिया गया है: उसने उनकी आँखें अन्धी, और उनका मन कठोर किया है; कहीं ऐसा न हो, कि वे आँखों से देखें, और
560मन से समझें, और फिरें, और मैं उन्हें चंगा करूँ।
इन शब्दों से मैं तीन बातों पर ध्यान दिलाऊँगा।
1. पहली यह, कि जहाँ आँख अन्धकारमय और मन कठोर हो, वहाँ परमेश्वर की ओर कोई मन-परिवर्तन नहीं हो सकता। पहले आँख को देखने योग्य, और मन को पाप के नीचे और पाप के कारण टूटने और पिघलने योग्य बनाया जाना चाहिए, नहीं तो कोई मन-परिवर्तन नहीं हो सकता। उसने उनकी आँखें अन्धी, और उनका मन कठोर किया है, कहीं ऐसा न हो कि वे देखें, और समझें, और (इस प्रकार) फिरें। और यह स्पष्ट रूप से
श्रीमान दुर्जन की दशा थी, उसने दुष्ट जीवन बिताया, और अपनी आँखें बन्द और मन कठोर किए हुए मरा भी, जैसा इससे प्रगट है कि पापमय जीवन के साथ शान्त मृत्यु जुड़ी हुई थी; और यह सब इसलिये कि उसका मन न फिरे, परन्तु वह नरक की आग में अपने पापमय जीवन का फल भोगे।
2. दूसरी बात जिस पर मैं इन शब्दों से ध्यान देता हूँ, यह है, कि यह मनुष्य के पाप के कारण उसके विरुद्ध परमेश्वर के क्रोध का विधान और प्रगटीकरण है। जब परमेश्वर मनुष्यों से क्रुद्ध होता है,
मेरा तात्पर्य है, जब वह उनसे इतना क्रुद्ध होता है, तो बहुत से दण्डों में से एक यह है जिसके वश में वह उन्हें छोड़ देता है, अर्थात् मन के अन्धेपन और हृदय की कठोरता के वश में, जिसे वह तब तक उनके साथ बने रहने देता है जब तक वे मृत्यु के फाटकों में प्रवेश न कर लें। और तब, और वहीं, और उस समय और उस स्थान से पहले नहीं, उनकी आँखें खुलती हैं। इसी कारण उस धनी
561मनुष्य के विषय में जिसका उल्लेख लूका में है, कहा गया है, वह मर गया, और नरक में उसने अपनी आँखें उठाईं: जिसका अर्थ यह है कि उसने उन्हें पहले नहीं उठाया था: उसने न तो यह देखा कि उसने क्या किया है, न यह कि वह कहाँ जा रहा है, जब तक वह दण्ड के स्थान पर, अर्थात् नरक में, न पहुँच गया। वह अपने प्राण में सोया हुआ ही मर गया; वह बेसुध और जड़ बना हुआ मरा, और इसलिये शान्ति में एक बालक या मेम्ने के समान, ठीक जैसे श्रीमान दुर्जन मरा: यह परमेश्वर के क्रोध का चिह्न था; वह उसे उसके पापों के लिये नरक-दण्ड देना चाहता था, और इसलिये न तो उसे देखने देता था, न उनके लिये पश्चाताप करने का मन देता था, कहीं ऐसा न हो कि वह फिर जाए, और उसका नरक-दण्ड, जो परमेश्वर ने ठहराया था, व्यर्थ हो जाए: कहीं ऐसा न हो कि वे फिरें, और मैं उन्हें चंगा करूँ।
3. तीसरी बात जिस पर मैं यहाँ से ध्यान देता हूँ, यह है, कि पापमय जीवन और उसके साथ जुड़ी शान्त मृत्यु नरक का तैयार, खुला, रौंदा हुआ, साधारण राजमार्ग है: किसी मनुष्य के लिये पापमय जीवन के बाद शान्ति से मरने से बढ़कर नरक-दण्ड का कोई निश्चित चिह्न नहीं। मैं यह नहीं कहता कि वे सब दुष्ट मनुष्य, जो अपनी मृत्यु के समय पाप के बोध और नरक के भय से व्याकुल होते हैं, इस कारण स्वर्ग जाते हैं, (क्योंकि कुछ को देखने भी दिया जाता है, और निराशा में छोड़ दिया जाता है (देखने से उनका मन नहीं फिरता), कि वे गरजते-चिल्लाते इस संसार से अपने स्थान को जाएँ:) परन्तु मैं कहता हूँ, पापमय जीवन के बाद शान्ति से मरने से; पाप करने और आँखें बन्द किए हुए मरने से; पाप करने और ऐसे मन के साथ मरने से जो पश्चाताप नहीं कर सकता, बढ़कर किसी मनुष्य के नरक-दण्ड का कोई निश्चित चिह्न नहीं। उसने उनकी आँखें अन्धी, और उनका मन कठोर किया है, कि वे आँखों से न देखें, और न मन से समझें; (नहीं, जब तक वे इस संसार में हैं तब तक नहीं) कहीं ऐसा न हो कि वे अपनी
562आँखों से देखें, और मन से समझें, और फिरें, और मैं उन्हें चंगा करूँ।
परमेश्वर के पास दुष्ट मनुष्यों के लिये एक दण्ड है; परमेश्वर दुष्ट मनुष्यों से पूरा हिसाब चुकाएगा: परमेश्वर 563भक्तिहीनों को न्याय के दिन तक दण्ड पाने के लिये रख छोड़ना जानता है: और यह उसके उन मार्गों में से एक है जिनके द्वारा वह ऐसा करता है। श्रीमान दुर्जन के साथ ऐसा ही हुआ।
564 4. चौथा, भजन संहिता की पुस्तक में दुष्टों के विषय में कहा गया है, उनकी मृत्यु में कोई बन्धन नहीं होते, परन्तु उनका बल अटूट रहता है। बन्धन न होने से उसका अर्थ है, कोई कष्ट नहीं, कोई अनुग्रहपूर्ण ताड़ना नहीं, पाप के लिये ऐसी कोई ताड़ना नहीं जैसी परमेश्वर के लोगों के भाग में उनके पापों के लिये पड़ती है; हाँ, जो बहुधा उनकी मृत्यु के समय उनके भाग में पड़ती है। इसलिये वह दुष्टों के विषय में आगे कहता है, उन्हें (तब) दूसरे मनुष्यों के समान कष्ट नहीं होता, और न दूसरे मनुष्यों के समान उन पर विपत्ति पड़ती है; परन्तु वे ऐसे निश्चिन्त होकर संसार से चले जाते हैं, मानो उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध कभी पाप नहीं किया, और अपने प्राणों को नरक-दण्ड के संकट में नहीं डाला। उनकी मृत्यु में कोई बन्धन नहीं। वे इस संसार से बिना बंधे, और स्वतन्त्र किए हुओं के समान जाते दिखाई देते हैं, यद्यपि उन्होंने इसमें अपने सारे दिन कुख्यात दुष्टता में बिताए हैं। जो बन्दी अपनी दुष्टता के कारण फाँसी पर मरनेवाला है, पहले उसके पाँवों की बेड़ियाँ ठोककर खोल दी जाती हैं; सो वह सबसे अधिक स्वतन्त्र जाता दिखाई देता है, जबकि वास्तव में वह अपने अपराधों के लिये प्राणदण्ड पाने जा रहा होता है। दुष्ट मनुष्यों की मृत्यु में भी कोई बन्धन नहीं होते, वे अपने पापमय जीवन के ठीक समापन पर किसी भी और समय से अधिक स्वतन्त्र दिखाई देते हैं।
इसी कारण आप उन्हें, जब वे मृत्यु-शय्या पर पड़े होते हैं, परमेश्वर की दया में अपने विश्वास और आशा की डींग मारते पाएँगे; हाँ, आप उन्हें अपने उद्धार के विषय में ऐसे भरोसे से बोलते पाएँगे, मानो उन्होंने अपने सारे दिन परमेश्वर की सेवा की हो: जबकि सच्चाई यह है, कि उनकी इस डींग की जड़ यह है, कि उनकी मृत्यु में कोई बन्धन नहीं।
उनका पाप और नीच जीवन उन्हें सुधारने, और पश्चाताप तक पहुँचाने के लिये उनके मन में नहीं आता; परन्तु ढीठ विचार, और मकड़ी की (अर्थात् शैतान की)
565बनाई हुई आशा और विश्वास, उनके अपने अनन्त विनाश के लिये उनके प्राण पर अधिकार कर लेते हैं।
562 रोमियों 2:1, 2, 3, 4, 5। प्रेरितों के काम 28:26, 27।
564 4 प्रमाण। भजन संहिता 73:4, 5, 6।
इसी कारण दुष्ट मनुष्यों की आशा के विषय में कहा गया है कि वह उनसे पहले नहीं, परन्तु उनके साथ मरती है; वे दोनों एक साथ प्राण छोड़ते हैं। और श्रीमान दुर्जन के साथ ऐसा ही हुआ। उसके पाप और उसकी आशा फाटक तक उसके साथ गए, परन्तु वहाँ उसकी आशा ने उसे छोड़ दिया, क्योंकि वह वहीं मर गई; परन्तु उसके पाप उसके साथ भीतर चले गए, कि युगानुयुग उसके विवेक में कीड़ा बनकर उसे कुतरते रहें।
566 इसलिये इस प्रकार के मरने के विषय में साधारण लोगों की धारणा ओछी और व्यर्थ है; क्योंकि श्रीमान दुर्जन मेम्ने के समान, या जैसा वे कहते हैं, अबोध शिशु के समान, शान्ति से और बिना भय के मरा। मैं यह प्रकृति के मृत्यु से संघर्ष के सम्बन्ध में नहीं कहता, परन्तु परमेश्वर के न्याय के साथ विवेक के संघर्ष के सम्बन्ध में कहता हूँ। मैं जानता हूँ कि प्रकृति मृत्यु से संघर्ष करेगी। मैंने कुत्ते और भेड़ को भी कठिनाई से मरते देखा है: और ऐसा ही दुष्ट मनुष्य भी कर सकता है, क्योंकि प्रकृति और मृत्यु के बीच बैर है। परन्तु उसी समय भी, ठीक तभी, जब
मृत्यु और प्रकृति प्रभुता के लिये संघर्ष कर रहे होते हैं, प्राण, विवेक, अपनी दुर्दशा के विषय में उतना ही बेसुध, उतना ही सुन्न, उतना ही संवेदनहीन और अनजान हो सकता है, जितना वह लकड़ी का कुन्दा या खाट जिस पर वह बीमार पड़ा है: और इस प्रकार वे दिखने में तो अबोध शिशु के समान मर सकते हैं, परन्तु वास्तव में ऐसे व्यक्ति के समान जो परमेश्वर के दण्ड के द्वारा अनन्त नरक-दण्ड के लिये बाँधकर सौंप दिया गया है; और जिसे उसी
दण्ड के द्वारा यह देखने से भी रोका जाता है कि वे क्या हैं, और कहाँ जा रहे हैं, जब तक वे लपटों के बीच नीचे न गिर पड़ें।
और जैसे यह उन दुष्ट मनुष्यों पर जो इस प्रकार मरते हैं, परमेश्वर का बहुत बड़ा दण्ड है, (क्योंकि यह उन्हें पश्चाताप की, और इस प्रकार उद्धार की, सारी सम्भावना से 567काट देता है) वैसे ही यह उनके उन साथियों पर भी उतना ही बड़ा दण्ड है जो उनके बाद जीवित रहते हैं। क्योंकि उनकी मृत्यु के ढंग से, उनके इतनी शान्ति से, जैसा वे कहते हैं, इतने अबोध शिशुओं के समान मरने से, वे कठोर हो जाते हैं, और अपनी चाल पर चलते रहने का साहस पाते हैं।
क्योंकि उनके जीवन की उनकी मृत्यु से, उनके पापमय शापित जीवन की उनकी बालक जैसी, मेम्ने जैसी मृत्यु से तुलना करके, वे सोचते हैं कि सब कुछ ठीक है, कि उन पर कोई नरक-दण्ड नहीं पड़ा; यद्यपि वे देहधारी शैतानों के समान जीए, तौभी वे निर्दोषों के समान मरे। उनकी मृत्यु में न कोई बवंडर था, न आँधी, न बन्धन, न विपत्ति: वे उन सब में सबसे भक्त लोगों के समान शान्ति से मरे, और उन्हें उद्धार का उतना ही बड़ा विश्वास और आशा थी, और वे उद्धार के विषय में ऐसे साहस से बातें करते थे मानो उन्हें उसका पूरा निश्चय हो। परन्तु जैसी जीवन में उनकी आशा थी, वैसी ही उनकी मृत्यु थी: उनकी आशा बिना परख के थी, क्योंकि वह परमेश्वर का किया हुआ काम न थी, और उनकी मृत्यु बिना व्याकुलता के थी, क्योंकि उनके विषय में परमेश्वर का दण्ड ऐसा ही था।
परन्तु मैं कहता हूँ, इसी पर उनके बाद जीवित रहनेवाले उनके पदचिह्नों पर चलने, और परमेश्वर की व्यवस्था को तोड़ते हुए जीवन बिताते रहने का साहस पाते हैं; हाँ, वे अपनी दुष्टताओं में बड़ी शान से चलते हैं; क्योंकि भजन में आगे ऐसा ही लिखा है। उनकी मृत्यु में कोई बन्धन नहीं होते, परन्तु उनका बल अटूट रहता है, इत्यादि। इस कारण अहंकार
568जंजीर की नाईं उन्हें (जीवित बचे हुओं को) घेरे रहता है, उपद्रव वस्त्र की नाईं उन्हें ढाँपे रहता है।
इसलिये वे बुराई करने का साहस करते हैं, इसलिये वे अपने अधर्म पर घमण्ड करते हैं।
566 एक ओछी धारणा।
567 जब कोई दुष्ट मनुष्य अपने पापों में शान्ति से मरता है, तो यह उसके दुष्ट देखनेवाले पर परमेश्वर का दण्ड है।
इसलिये, किस लिये? क्यों, इसलिये कि उनके साथी बहुत समय तक अत्यन्त अधर्मी और दुष्ट जीवन बिताने के बाद, ऐसी शान्ति से और मेम्नों के समान मरे, मानो वे निर्दोष रहे हों।
हाँ, यह देखकर वे यह निष्कर्ष निकालने का साहस करते हैं कि परमेश्वर या तो उनके पापों पर ध्यान नहीं देता, या ध्यान नहीं देगा। वे दुष्टता से बोलते हैं, वे ऊँचे बोल बोलते हैं। वे पाप के विषय में दुष्टता से बोलते हैं, क्योंकि वे उसे उससे अच्छा ठहराते हैं जैसा वचन उसे घोषित करता है। वे अन्धेर के विषय में दुष्टता से बोलते हैं, कि उसकी सराहना करते हैं, और उसे चतुराई का काम गिनते हैं। वे ऊँचे बोल भी बोलते हैं: वे अपना मुँह आकाश के विरुद्ध लगाते हैं, इत्यादि। और वे कहते हैं, ईश्वर कैसे जानता है? क्या परमप्रधान को कुछ ज्ञान है? और जहाँ तक मैं देख सकता हूँ, यह सब उनके
569मनों में अपने साथियों की शान्त और मेम्ने जैसी मृत्यु को देखने से उत्पन्न होता है।
570 देखो, ये भक्तिहीन हैं जो संसार में फलते-फूलते हैं, (अर्थात् दुष्ट उपायों से) वे धन-सम्पत्ति में बढ़ते जाते हैं।
इसलिये यह परमेश्वर का बड़ा दण्ड है, उस मनुष्य पर भी जो अपने पापों में मरता है, और उसके उस साथी पर भी जो उसे इस प्रकार मरते देखता है। वह पाप करता है, वह अपने पापों में मरता है, और तौभी शान्ति से मरता है। इस पर उसका साथी क्या कहेगा? अपने साथी की मेम्ने जैसी मृत्यु को देखकर वह क्या निर्णय करेगा कि परमेश्वर उसके साथ कैसा व्यवहार करेगा? निश्चय जानिए, ऐसा दृश्य देखकर वह यह नहीं कह सकता, हाय मुझ पर, क्योंकि न्याय उसके सामने है: वह श्रीमान दुर्जन की बालक जैसी मृत्यु से यह नहीं समझ सकता कि पाप भयानक और कड़वी वस्तु है। परन्तु यदि वह जो देखता है उसके अनुसार, या अपनी बिगड़ी हुई बुद्धि के अनुसार न्याय करे, तो उसे पुराने समय के दुष्टों के साथ यही निष्कर्ष निकालना पड़ेगा, कि जो कोई बुरा करता है, वह 571यहोवा की दृष्टि में अच्छा लगता है, और वह ऐसे लोगों से प्रसन्न रहता है; नहीं तो न्यायी परमेश्वर कहाँ है?
हाँ, यह बात सबसे बुद्धिमान मनुष्य को भी उलझन में डालने के लिये पर्याप्त है। दाऊद स्वयं भक्तिहीन मनुष्यों की शान्त मृत्यु को देखकर ठिठक गया था। वह कहता है, निश्चय, मैंने अपने हृदय को व्यर्थ शुद्ध किया, और अपने हाथों को निर्दोषता में धोया है। भजन संहिता 73:13। वे देखने में मुझसे कहीं अधिक सुख से रहते हैं: उनकी आँखें चर्बी से झलकती हैं, उनके पास मन की इच्छा से भी अधिक है; परन्तु मैं दिन भर मार खाता आया हूँ, और प्रति भोर को मेरी ताड़ना होती आई है। मैं कहता हूँ, इसी बात ने दाऊद को, हाँ, और अय्यूब और यिर्मयाह को भी अचम्भे में डाला: परन्तु वह पवित्रस्थान में जाता है, और तब उनके अन्त को समझता है, और उससे पहले वह उसे समझ न सका। मैं परमेश्वर के पवित्रस्थान में गया: वह कौन सा स्थान था? वही जहाँ वह परमेश्वर से पूछ सकता था, और उसके द्वारा इस बात का समाधान पा सकता था:
तब, वह कहता है, मैंने उनके अन्त को समझा। तब मैंने देखा, कि तू उन्हें फिसलनेवाले स्थानों में रखता है, और गिराकर सत्यानाश कर देता है। गिराकर, अर्थात् अचानक, या जैसा अगले शब्द कहते हैं, मानो क्षण भर में वे भय के मारे पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं: जिस भय ने उन्हें उनकी बीमारी की खाट पर नहीं पकड़ा, क्योंकि उनकी मृत्यु में कोई बन्धन न थे। इसलिये उस भय ने उन्हें वहाँ पकड़ा, जहाँ वे उसमें सदा के लिये जकड़े भी रहते हैं। यह बात उसने जान ली,
569 पद 8, 9, 10, 11।
मैं कहता हूँ, परन्तु बड़ी पीड़ा, शोक और अपने अन्तःकरण के छिदने के बिना नहीं: इस विषय में ठीक-ठीक निर्णय पर पहुँचना उसे इतना गहरा, इतना कठिन और इतना दुष्कर लगा।
और सचमुच, भक्तिहीन पापियों के प्रति परमेश्वर का यह एक गहरा दण्ड है; यह सारे संसार को डगमगा देने के लिये पर्याप्त है, केवल संसार में जो भक्त लोग हैं उनके पास जाने के लिये एक पवित्रस्थान है, जहाँ परमेश्वर की वाणी और वचन है, जिसके द्वारा उसके दण्ड, और उनमें से बहुतों का कारण, उन पर प्रगट किए जाते हैं, और वे उन्हें समझते हैं।
सावधान. सचमुच यह डगमगा देनेवाला विधान है। यह परमेश्वर की बुद्धि और क्रोध से भरा है।
और जैसा आपने कहा, मैं विश्वास करता हूँ कि यह संसार के लिये दण्ड से भरा है। जिसने श्रीमान दुर्जन को न जाना हो, और तौभी उसे मरते देखा हो, वह यह छोड़ और क्या सोचता कि वह पवित्र जीवन और चाल-चलन का मनुष्य था, क्योंकि वह इतनी निश्चलता से, इतनी शान्ति से, इतना मेम्ने या अबोध शिशु के समान मरा? मैं कहता हूँ, क्या वे यह निष्कर्ष न निकालते कि वह धर्मी मनुष्य था? या यदि वे उसे और उसके जीवन को जानते भी, तौभी उसे इतनी शान्ति से मरते देखकर, क्या वे यह निष्कर्ष न निकालते कि उसने परमेश्वर से मेल कर लिया था? वरन इससे भी आगे, यदि कुछ लोग जानते कि वह अपने पापों में मरा, और तौभी वह इतना मेम्ने के समान मरा, तो क्या वे यह निष्कर्ष न निकालते, कि या तो परमेश्वर हमारे पापों को नहीं जानता, या वह उन्हें पसन्द करता है; या उसमें उन्हें दण्ड देने की सामर्थ, या इच्छा, या मन, या कौशल की कमी है; क्योंकि श्रीमान दुर्जन स्वयं पापमय जीवन से इतनी शान्ति से, इतने चैन से, और इतना मेम्ने के समान चला गया?
बुद्धिमान. निःसन्देह, यह दुष्ट मनुष्यों पर परमेश्वर का भारी दण्ड है; (अय्यूब 21:23) कोई शान्ति में नरक जाता है, कोई क्लेश में नरक जाता है; कोई अपने ही हाथों से वहाँ भेजा जाकर नरक जाता है; कोई अपने साथी के हाथ से वहाँ भेजा जाकर नरक जाता है; कोई आँखें बन्द किए वहाँ जाता है, और कोई आँखें खोले वहाँ जाता है; कोई गरजता-चिल्लाता वहाँ जाता है, और कोई सारे मार्ग स्वर्ग और सुख की डींग मारता हुआ वहाँ जाता है: कोई स्वयं श्रीमान दुर्जन के समान वहाँ जाता है, और दूसरे उसके
भाइयों के समान वहाँ जाते हैं। परन्तु सबसे बढ़कर, मरने के ढंग के विचार से, श्रीमान दुर्जन की मृत्यु दुष्ट मनुष्यों के लिये फन्दों और जालों से सबसे अधिक भरी है; इसलिये जो उसके समान मरते हैं, वे संसार के लिये सबसे बड़ी ठोकर हैं: वे चलते जाते हैं, चलते जाते हैं, वे जवानी से बुढ़ापे तक, और वहाँ से कब्र तक, और इस प्रकार नरक तक, चैन से, बिना किसी शोर के चले जाते हैं: वे ऐसे जाते हैं जैसे बैल वध होने को, और जैसे मूर्ख काठ में ठोंके जाने की ताड़ना को; अर्थात्, बेसुधी से भी और निश्चिन्तता से भी। ओह! परन्तु नरक के फाटकों पर पहुँचकर! ओह! परन्तु जब वे उन फाटकों को अपने लिये खुला देखते हैं: ओह! परन्तु जब वे देखते हैं कि वही उनका घर है, और उन्हें वहीं भीतर जाना है, तब उनकी शान्ति और चैन सदा के लिये उड़ जाते हैं: तब वे सिंहों के समान गरजते, अजगरों के समान चिल्लाते, कुत्तों के समान हूकते हैं, और अपने दण्ड के कारण वैसे ही काँपते हैं जैसे स्वयं दुष्टात्माएँ काँपती हैं। ओह! जब वे देखते हैं कि उन्हें नरक की खाई और गले में होकर उतरना है! जब वे देखेंगे कि नरक ने अपने भयानक जबड़े उन पर बन्द कर लिए हैं! जब वे अपनी आँखें खोलेंगे, और अपने आप को नरक के पेट और अँतड़ियों के भीतर पाएँगे! तब वे विलाप करेंगे, और रोएँगे, और हिचकियाँ लेंगे, और पीड़ा के मारे दाँत पीसेंगे। परन्तु यह (या यदि होना ही हो, तौभी बहुत विरले) तब तक नहीं होता, जब तक वे उन नश्वर मनुष्यों की आँखों और कानों की पहुँच से बाहर न चले जाएँ जिन्हें वे अपने पीछे संसार में जीवित छोड़ जाते हैं।
सावधान. अच्छा, मेरे भले पड़ोसी बुद्धिमान, मैं देखता हूँ कि सूर्य ढल रहा है, और आप श्रीमान दुर्जन के जीवन और मृत्यु की बात समाप्त कर चुके हैं; और इसलिये अब मैं आपसे विदा लूँगा। केवल पहले मुझे यह कहने दीजिए, कि मैं आनन्दित हूँ कि आज आपसे मेरी भेंट हुई, और हमारा संयोग ऐसा हुआ कि हम श्रीमान दुर्जन की दशा की चर्चा पर आ पहुँचे। मैं आपका धन्यवाद भी करता हूँ कि आपने मेरे साथ खुलकर बातें कीं, और मेरे सब प्रश्नों का उत्तर देने की कृपा की: मैं केवल आपकी प्रार्थनाओं की विनती करता हूँ; कि परमेश्वर मुझे बहुत अनुग्रह दे, कि मैं न तो वैसा जीऊँ और न वैसा मरूँ जैसा श्रीमान दुर्जन।
बुद्धिमान. मेरे भले पड़ोसी सावधान, मैं प्राण और देह दोनों में आपकी भलाई चाहता हूँ; और श्रीमान दुर्जन के जीवन और मृत्यु के विषय में जो कुछ मैंने कहा है, यदि उसमें से कुछ भी आपके लिये लाभदायक हो, तो मुझे हृदय से आनन्द होगा; केवल मैं चाहता हूँ कि आप उसके लिये परमेश्वर का धन्यवाद करें, और मेरे लिये हृदय से प्रार्थना करें, कि मैं आपके साथ परमेश्वर की सामर्थ से, विश्वास के द्वारा, उद्धार के लिये सुरक्षित रखा जाऊँ।
सावधान. आमीन। विदा।
बुद्धिमान. मैं हृदय से आपको विदा कहता हूँ।
हाशिये की टिप्पणियाँ सामान्य टिप्पणी। जब ‘श्रीमान दुर्जन’ छपी थी, तब उसके पाठ के बहुत से भाग पर हाशियों में टिप्पणियाँ दी गई थीं। ये हमारी आधुनिक पाद-टिप्पणियों से इस बात में भिन्न हैं कि ये किसी एक स्थान पर नहीं, परन्तु पाठ के किसी पूरे अंश पर लागू हो सकती हैं। परन्तु प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग के इस ई-पाठ में हाशिये की टिप्पणियों को उसी रूप में प्रस्तुत करना सम्भव नहीं हुआ, और इसलिये उन्हें पाद-टिप्पणियों में बदल दिया गया है।—DP.
