अध्याय 18 · कु-प्रश्न

अध्याय 18: कु-प्रश्न

जॉन बनयन · पवित्र युद्ध, 1682

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    अध्याय 18. कु-प्रश्न — जॉय चैन की लिब्रिवॉक्स रिकॉर्डिंग के अनुसार किया गया एक पाठ-विभाजन। बनयन का 1682 का वृत्तान्त लगातार चलता है; ये शीर्षक केवल मार्ग ढूँढ़ने की सुविधा के लिए हैं।

    परन्तु उनमें से जो सन्देह देश से आए थे, तीन ऐसे थे जो कुछ समय तक देश में भटकने और मारे-मारे फिरने के बाद, और यह देखकर कि वे बच निकले हैं, इतने ढीठ हो गए कि यह जानते हुए कि नगर में अब भी डियाबोलोनी हैं, अपने आप को घुसा दिया,—मैं कहता हूँ, वे इतने ढीठ हो गए कि उन्होंने अपने आप को मनुष्यात्मा में उनके बीच घुसा दिया। (तीन, क्या मैंने कहा? मेरे विचार में वे चार थे।) अब, ये डियाबोलोनी सन्देही और किसके घर जाते, सिवाय मनुष्यात्मा में रहनेवाले एक बूढ़े डियाबोलोनी के घर के, जिसका नाम कु-प्रश्न था, जो मनुष्यात्मा का बहुत बड़ा शत्रु था, और वहाँ के डियाबोलोनियों में एक बड़ा कर्ता-धर्ता था। अच्छा, जैसा कहा गया, इसी कु-प्रश्न के घर ये डियाबोलोनी आए (आप निश्चय जानिए कि उन्हें वहाँ तक का मार्ग ढूँढ़ने के निर्देश मिले हुए थे), सो उसने उनका स्वागत किया, उनके दुर्भाग्य पर तरस खाया, और अपने घर में जो सबसे अच्छा था उससे उनकी सहायता की। अब, थोड़ी-सी जान-पहचान के बाद (और उसके होने में देर न लगी), इस बूढ़े कु-प्रश्न ने सन्देहियों से पूछा कि क्या वे सब एक ही नगर के हैं (वह जानता था कि वे सब एक ही राज्य के हैं), और उन्होंने उत्तर दिया: ‘नहीं, और एक ही प्रान्त के भी नहीं; क्योंकि मैं,’ एक ने कहा, ‘चुनाव-सन्देही हूँ:’ ‘मैं,’ दूसरे ने कहा, ‘बुलाहट-सन्देही हूँ:’ तब तीसरे ने कहा, ‘मैं उद्धार-सन्देही हूँ:’ और चौथे ने कहा कि वह अनुग्रह-सन्देही है। ‘अच्छा,’ उस बूढ़े सज्जन ने कहा, ‘तुम किसी भी प्रान्त के हो, मुझे निश्चय है कि तुम हमारे ही ढर्रे के हो, लड़को: तुम ठीक मेरे पाँव की नाप के हो, मेरे मन से एक हो, और मेरे यहाँ तुम्हारा स्वागत रहेगा।’ सो उन्होंने उसका धन्यवाद किया, और आनन्दित हुए कि उन्हें मनुष्यात्मा में एक शरण-स्थान मिल गया है।

    तब कु-प्रश्न ने उनसे कहा: ‘तुम्हारे दल के कितने लोग रहे होंगे जो तुम्हारे साथ मनुष्यात्मा की घेराबन्दी में आए थे?’ और उन्होंने उत्तर दिया: ‘कुल मिलाकर केवल दस हज़ार सन्देही थे, क्योंकि सेना के बाकी लोग पन्द्रह हज़ार रक्त-पुरुष थे। ये रक्त-पुरुष,’ उन्होंने कहा, ‘हमारे देश की सीमा से लगे रहते हैं; परन्तु, बेचारे! जैसा हम सुनते हैं, वे सब के सब इम्मानुएल की सेनाओं के द्वारा पकड़ लिए गए।’ ‘दस हज़ार!’ उस बूढ़े सज्जन ने कहा; ‘मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ, यह तो अच्छा-खासा दल है। परन्तु यह कैसे हुआ कि जब तुम इतनी बड़ी गिनती में थे, तो तुम्हारा साहस टूट गया, और तुम अपने शत्रुओं से लड़ने का हियाव न कर सके?’ ‘हमारा सेनापति,’ उन्होंने कहा, ‘सबसे पहला मनुष्य था जो भाग खड़ा हुआ।’ ‘कृपया बताओ,’ उनके मेज़बान ने कहा, ‘वह कौन था, तुम्हारा वह डरपोक सेनापति?’ ‘वह कभी मनुष्यात्मा का महापौर था,’ उन्होंने कहा: ‘परन्तु कृपया उसे डरपोक सेनापति न कहिए; क्योंकि पूर्व से पश्चिम तक किसी ने भी हमारे राजकुमार डियाबोलस की लॉर्ड अविश्वास से बढ़कर सेवा की है या नहीं, इसका उत्तर देना आपके लिए कठिन प्रश्न होगा। परन्तु यदि वे उसे पकड़ लेते, तो निश्चय ही उसे फाँसी पर लटका देते; और हम आपको विश्वास दिलाते हैं, फाँसी पर लटकना तो बड़ा बुरा काम है।’ तब उस बूढ़े सज्जन ने कहा, ‘भला होता कि वे सब दस हज़ार सन्देही इस समय मनुष्यात्मा में भली-भाँति हथियारबन्द होते, और मैं स्वयं उनके आगे-आगे होता; तब मैं देखता कि मैं क्या कर सकता हूँ।’ ‘हाँ,’ उन्होंने कहा, ‘यदि हम वह देख पाते तो अच्छा होता; परन्तु हाय! इच्छाएँ, वे क्या हैं?’ और ये शब्द ऊँचे स्वर में कहे गए। ‘अच्छा,’ बूढ़े कु-प्रश्न ने कहा, ‘सावधान रहो कि तुम बहुत ऊँचे स्वर में बात न करो; तुम्हें दुबककर और छिपकर रहना होगा, और जब तक तुम यहाँ हो अपनी चौकसी करनी होगी, नहीं तो, मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ, तुम धर लिए जाओगे।’ ‘क्यों?’ सन्देहियों ने कहा। ‘क्यों!’ उस बूढ़े सज्जन ने कहा; ‘क्यों! इसलिए कि राजकुमार और लॉर्ड सचिव दोनों, और उनके कप्तान और सैनिक, सब के सब इस समय नगर में हैं; हाँ, नगर उनसे इतना भरा है जितना वह भर सकता है। और इसके अतिरिक्त, एक है जिसका नाम इच्छाप्रबल है, जो हमारा सबसे क्रूर शत्रु है, और राजकुमार ने उसे फाटकों का रखवाला ठहराया है, और उसे आज्ञा दी है कि वह पूरे परिश्रम के साथ सब डियाबोलोनियों को, और हर प्रकार के डियाबोलोनियों को, ढूँढ़े, खोज निकाले, और नष्ट करे। और यदि वह तुम पर आ पड़ा, तो तुम्हारा काम तमाम, चाहे तुम्हारे सिर सोने के ही क्यों न बने हों।’

    और अब देखिए यह कैसे हुआ, कि लॉर्ड इच्छाप्रबल के विश्वासयोग्य सैनिकों में से एक, जिसका नाम श्रीमान परिश्रम था, इस पूरे समय बूढ़े कु-प्रश्न की ओलती के नीचे खड़ा सुन रहा था, और उसने वह सारी बातचीत सुन ली जो उसके और उन सन्देहियों के बीच हुई थी जिन्हें उसने अपनी छत के नीचे ठहराया था।

    वह सैनिक ऐसा मनुष्य था जिस पर मेरे लॉर्ड को बड़ा भरोसा था, और जिससे वह बहुत प्रेम करता था; और यह दोनों कारणों से, क्योंकि वह साहसी मनुष्य था, और ऐसा मनुष्य भी था जो डियाबोलोनियों को पकड़ने के लिए उन्हें ढूँढ़ने में कभी थकता न था।

    अब इस मनुष्य ने, जैसा मैंने आपको बताया, वह सारी बातचीत सुनी जो बूढ़े कु-प्रश्न और इन डियाबोलोनियों के बीच हुई थी; इसलिए वह और क्या करता, सिवाय इसके कि अपने लॉर्ड के पास जाकर जो कुछ उसने सुना था उसे बता दे। ‘क्या तू सचमुच ऐसा कहता है, मेरे विश्वासयोग्य?’ मेरे लॉर्ड ने कहा। ‘हाँ,’ परिश्रम ने कहा, ‘निश्चय कहता हूँ; और यदि आप मेरे साथ चलने की कृपा करें, तो आप वैसा ही पाएँगे जैसा मैंने कहा है।’ ‘और क्या वे वहाँ हैं?’ मेरे लॉर्ड ने कहा। ‘मैं कु-प्रश्न को भली-भाँति जानता हूँ, क्योंकि हमारे धर्मत्याग के समय वह और मैं गहरे मित्र थे: परन्तु अब मैं नहीं जानता कि वह कहाँ रहता है।’ ‘परन्तु मैं जानता हूँ,’ उसके सेवक ने कहा, ‘और यदि आप चलें, तो मैं आपको उसकी माँद तक का मार्ग दिखाऊँगा।’ ‘चलूँ!’ मेरे लॉर्ड ने कहा, ‘अवश्य चलूँगा। आ, मेरे परिश्रम, चलें और उन्हें ढूँढ़ निकालें।’

    सो मेरे लॉर्ड और उसका सेवक एक साथ सीधे उसके घर की ओर चले। उसका सेवक मार्ग दिखाने के लिए आगे-आगे चला, और वे चलते-चलते ठीक बूढ़े श्रीमान कु-प्रश्न की दीवार के नीचे जा पहुँचे। तब परिश्रम ने कहा, ‘सुनिए! मेरे लॉर्ड, जब आप उस बूढ़े सज्जन की बोली सुनते हैं तो क्या उसे पहचानते हैं?’ ‘हाँ,’ मेरे लॉर्ड ने कहा, ‘मैं उसे भली-भाँति पहचानता हूँ, परन्तु मैंने उसे बहुत दिनों से नहीं देखा। इतना मैं जानता हूँ कि वह धूर्त है; मैं चाहता हूँ कि वह हमें चकमा देकर निकल न जाए।’ ‘यह मुझ पर छोड़ दीजिए,’ उसके सेवक परिश्रम ने कहा। ‘परन्तु हम द्वार कैसे ढूँढ़ेंगे?’ मेरे लॉर्ड ने कहा। ‘यह भी मुझ पर छोड़ दीजिए,’ उसके सेवक ने कहा। सो वह मेरे लॉर्ड इच्छाप्रबल को घुमाकर ले गया, और उसे द्वार का मार्ग दिखाया। तब मेरे लॉर्ड ने, बिना और कुछ किए, द्वार तोड़ डाला, घर में धड़धड़ाते हुए घुस गया, और उन पाँचों को एक साथ पकड़ लिया, ठीक जैसा उसके सेवक परिश्रम ने उसे बताया था। सो मेरे लॉर्ड ने उन्हें बन्दी बनाया, और उन्हें ले जाकर दारोगा श्रीमान सच्चा-मनुष्य के हाथ सौंप दिया, और आज्ञा दी, और उसने उन्हें पहरे में डाल दिया। यह हो जाने पर, भोर को महापौर महोदय को बताया गया कि मेरे लॉर्ड इच्छाप्रबल ने रात में क्या किया था, और महोदय इस समाचार से बहुत आनन्दित हुए, केवल इसलिए नहीं कि सन्देही पकड़े गए थे, वरन् इसलिए कि बूढ़ा कु-प्रश्न पकड़ा गया था; क्योंकि वह मनुष्यात्मा के लिए बहुत बड़ी परेशानी, और स्वयं महापौर महोदय के लिए बड़ा क्लेश बना हुआ था। उसे अक्सर ढूँढ़ा भी गया था, परन्तु अब तक कभी कोई उस पर हाथ न डाल सका था।

    अच्छा, अगला काम यह था कि इन पाँचों पर मुकद्दमा चलाने की तैयारी की जाए जिन्हें मेरे लॉर्ड ने पकड़ा था, और जो दारोगा श्रीमान सच्चा-मनुष्य के हाथों में थे। सो दिन ठहराया गया, और न्यायालय बुलाया गया और इकट्ठा हुआ, और बन्दी कटघरे में लाए गए। मेरे लॉर्ड इच्छाप्रबल को यह अधिकार था कि जब उसने उन्हें पहले-पहल पकड़ा था, तभी बिना और कुछ किए उन्हें मार डालता; परन्तु उसने इस समय यह अधिक उचित समझा कि राजकुमार के सम्मान, मनुष्यात्मा की शान्ति, और शत्रु का साहस तोड़ने के लिए उन्हें सार्वजनिक न्याय के लिए सामने लाया जाए।

    परन्तु, मैं कहता हूँ, श्रीमान सच्चा-मनुष्य उन्हें ज़ंजीरों में जकड़कर कटघरे में लाया; नगर-भवन में, क्योंकि न्याय का स्थान वही था। सो, संक्षेप में, पंचों की सूची बनाई गई, गवाहों को शपथ दिलाई गई, और बन्दियों पर उनके प्राणों का मुकद्दमा चला: पंच वही थे जिन्होंने श्रीमान असत्य, निर्दयी, घमण्डी, और उनके बाकी साथियों का मुकद्दमा सुना था।

    और, पहले, स्वयं बूढ़ा प्रश्न कटघरे में खड़ा किया गया, क्योंकि वह इन सन्देहियों का, जो जाति से परदेशी थे, आश्रय देनेवाला, अतिथि-सत्कार करनेवाला और ढाढ़स देनेवाला था: तब उससे कहा गया कि वह अपने ऊपर लगाया गया आरोप सुने, और उसे बताया गया कि यदि उसे अपने पक्ष में कुछ कहना हो तो आपत्ति करने की उसे स्वतन्त्रता है। सो उसका अभियोग-पत्र पढ़ा गया: उसका ढंग और रूप नीचे दिया जाता है।

    ‘श्रीमान प्रश्न, तुझ पर यहाँ कु-प्रश्न के नाम से, मनुष्यात्मा नगर में घुस आनेवाले के रूप में, यह अभियोग लगाया जाता है कि तू स्वभाव से डियाबोलोनी है, और राजकुमार इम्मानुएल से बैर रखनेवाला भी है, और ऐसा व्यक्ति है जिसने मनुष्यात्मा नगर के विनाश की युक्ति सोची है। तुझ पर यहाँ यह भी अभियोग लगाया जाता है कि इसके विरुद्ध हितकारी नियम बन जाने के बाद भी तूने राजा के शत्रुओं को प्रश्रय दिया: क्योंकि, 1. तूने उसकी शिक्षा और स्थिति की सच्चाई पर प्रश्न उठाया है: 2. यह कामना करने में कि दस हज़ार सन्देही उसमें होते: 3. उसके उन शत्रुओं को ग्रहण करने, उनकी आवभगत करने, और उनका साहस बढ़ाने में, जो उनकी सेना से निकलकर तेरे पास आए थे। इस अभियोग-पत्र के विषय में तू क्या कहता है? तू दोषी है या निर्दोष?’

    ‘महोदय,’ उसने कहा, ‘मैं इस अभियोग-पत्र का अर्थ नहीं जानता, क्योंकि मैं वह मनुष्य नहीं हूँ जिसका इससे सम्बन्ध है; जो मनुष्य इस आरोप के अनुसार इस न्यायपीठ के सामने अभियुक्त खड़ा है, वह कु-प्रश्न के नाम से पुकारा जाता है, और इस नाम को मैं अपना मानने से इन्कार करता हूँ, क्योंकि मेरा नाम सच्ची-जिज्ञासा है। एक सचमुच दूसरे जैसा सुनाई देता है; परन्तु, मेरी समझ में, आप महोदय लोग जानते हैं कि इन दोनों में बड़ा अन्तर है; क्योंकि मुझे आशा है कि एक मनुष्य, सबसे बुरे समय में भी, और वह भी सबसे बुरे मनुष्यों के बीच, मृत्यु के संकट में पड़े बिना बातों के विषय में सच्ची जिज्ञासा कर सकता है।’

    तब मेरे लॉर्ड इच्छाप्रबल बोले, क्योंकि वह गवाहों में से एक था: ‘महोदय, और आप, मनुष्यात्मा नगर के आदरणीय न्यायपीठ और हाकिमो, आप सब ने अपने कानों से सुना है कि कटघरे में खड़े बन्दी ने अपने नाम से इन्कार किया है, और इस प्रकार अभियोग-पत्र के आरोप से बच निकलने की सोचता है। परन्तु मैं जानता हूँ कि यही वह मनुष्य है जिससे इसका सम्बन्ध है, और इसका असली नाम कु-प्रश्न है। महोदय, मैं इसे तीस वर्ष से अधिक समय से जानता हूँ, क्योंकि यह और मैं (मेरे लिए यह कहना लज्जा की बात है) उस समय गहरे परिचित थे, जब वह अत्याचारी डियाबोलस मनुष्यात्मा पर शासन करता था; और मैं गवाही देता हूँ कि यह स्वभाव से डियाबोलोनी, हमारे राजकुमार का शत्रु, और धन्य मनुष्यात्मा नगर से बैर रखनेवाला है। महोदय, विद्रोह के दिनों में यह मेरे घर आता रहा है और लगातार कम से कम बीस रातें वहाँ ठहरा है, और तब हम भी सार रूप में वैसी ही बातें किया करते थे जैसी यह और इसके सन्देही हाल ही में करते रहे हैं: यह सच है कि मैंने इसे बहुत दिनों से नहीं देखा। मैं समझता हूँ कि इम्मानुएल के मनुष्यात्मा में आने ने इसे अपना ठिकाना बदलने पर विवश कर दिया है, जैसे इस अभियोग-पत्र ने इसे अपना नाम बदलने पर विवश कर दिया है; परन्तु महोदय, यही वह मनुष्य है।’

    तब न्यायालय ने उससे कहा, ‘क्या तुझे और कुछ कहना है?’

    ‘हाँ,’ उस बूढ़े सज्जन ने कहा, ‘अवश्य है; क्योंकि अब तक मेरे विरुद्ध जो कुछ भी कहा गया है, वह केवल एक ही गवाह के मुँह से कहा गया है; और प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर के लिए यह उचित नहीं कि एक ही गवाह के कहने से किसी मनुष्य को मार डाले।’

    तब श्रीमान परिश्रम आगे आकर खड़े हुए, और कहा, ‘महोदय, जब मैं अमुक रात को इस नगर की बुरी गली के सिरे पर पहरा दे रहा था, तो संयोग से मुझे इस सज्जन के घर के भीतर से कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी। तब मैंने सोचा, यहाँ क्या हो रहा है? सो मैं सुनने के लिए पास, परन्तु बहुत दबे पाँव, घर की बगल तक गया, यह सोचकर, जैसा कि सचमुच हुआ भी, कि वहाँ मुझे डियाबोलोनियों की कोई गुप्त सभा मिल सकती है। सो, जैसा मैंने कहा, मैं निकट से निकट खिसकता गया; और जब मैं दीवार से सटकर पहुँच गया, तो थोड़ी ही देर में मुझे पता चल गया कि घर में परदेशी लोग हैं; परन्तु मैं उनकी बोली भली-भाँति समझता था, क्योंकि मैं स्वयं भी यात्री रह चुका हूँ। अब, जिस टूटी-फूटी झोंपड़ी में यह बूढ़ा सज्जन रहता था उसमें ऐसी भाषा सुनकर, मैंने खिड़की के एक छेद से अपना कान सटा दिया, और वहाँ उन्हें इस प्रकार बातें करते सुना। इस बूढ़े श्रीमान प्रश्न ने इन सन्देहियों से पूछा कि वे कौन हैं, कहाँ से आए हैं, और इन भागों में उनका क्या काम है; और उन्होंने उसे इन सब प्रश्नों के उत्तर दिए, फिर भी उसने उन्हें ठहराया। उसने यह भी पूछा कि उनकी गिनती कितनी थी; और उन्होंने उसे बताया, दस हज़ार मनुष्य। तब उसने उनसे पूछा कि उन्होंने मनुष्यात्मा पर और अधिक मर्दानगी से आक्रमण क्यों नहीं किया; और उन्होंने उसे बताया: तब उसने उनके सेनापति को डरपोक कहा, क्योंकि वह उस समय चल दिया जब उसे अपने राजकुमार के लिए लड़ना चाहिए था। इसके अतिरिक्त, इस बूढ़े कु-प्रश्न ने कामना की, और मैंने उसे यह कामना करते सुना, कि भला होता कि वे सब दस हज़ार सन्देही इस समय मनुष्यात्मा में होते, और वह स्वयं उनके आगे-आगे होता। उसने उनसे यह भी कहा कि सावधान रहें और दुबककर पड़े रहें; क्योंकि यदि वे पकड़े गए तो उन्हें मरना पड़ेगा, चाहे उनके सिर सोने के ही क्यों न हों।’ तब न्यायालय ने कहा: ‘श्रीमान कु-प्रश्न, अब आपके विरुद्ध यह दूसरा गवाह भी है, और उसकी गवाही पूरी है: 1. वह शपथ खाकर कहता है कि आपने इन मनुष्यों को अपने घर में ग्रहण किया, और वहाँ उनका पालन-पोषण किया, यद्यपि आप जानते थे कि वे डियाबोलोनी और राजा के शत्रु हैं। 2. वह शपथ खाकर कहता है कि आपने कामना की कि उनमें से दस हज़ार मनुष्यात्मा में होते। 3. वह शपथ खाकर कहता है कि आपने उन्हें सलाह दी कि वे दुबककर और छिपकर रहें, कहीं ऐसा न हो कि राजा के सेवक उन्हें पकड़ लें। इन सब से प्रकट होता है कि तू डियाबोलोनी है; क्योंकि यदि तू राजा का मित्र होता, तो तू उन्हें पकड़वा देता।’

    तब कु-प्रश्न ने कहा: ‘इनमें से पहली बात का मैं यह उत्तर देता हूँ, जो मनुष्य मेरे घर में आए वे परदेशी थे, और मैंने उन्हें ठहरा लिया; और क्या अब मनुष्यात्मा में किसी मनुष्य के लिए परदेशियों का अतिथि-सत्कार करना अपराध हो गया है? यह भी सच है कि मैंने उनका पालन-पोषण किया; और मेरे परोपकार को दोष क्यों दिया जाए? रही बात उस कारण की कि मैंने क्यों कामना की कि उनमें से दस हज़ार मनुष्यात्मा में होते, वह मैंने न तो गवाहों को बताया, न स्वयं उन्हें। हो सकता है मैंने चाहा हो कि वे पकड़े जाएँ, और इस प्रकार, जहाँ तक किसी को अब तक मालूम है, मेरी कामना मनुष्यात्मा की भलाई के लिए ही रही हो। मैंने उनसे यह भी कहा था कि वे सावधान रहें कि कप्तानों के हाथ न पड़ें; परन्तु यह इसलिए हो सकता है कि मैं नहीं चाहता कि कोई भी मनुष्य मारा जाए, न कि इसलिए कि मैं चाहता था कि राजा के शत्रु, शत्रु होने के नाते, बच निकलें।’

    तब महापौर महोदय ने उत्तर दिया: ‘कि यद्यपि परदेशियों का अतिथि-सत्कार करना सद्गुण है, तौभी राजा के शत्रुओं का अतिथि-सत्कार करना राजद्रोह है। और जो कुछ और तूने कहा है, उसमें तू केवल बातों के द्वारा न्याय के पालन से बचने और उसे टालने का परिश्रम करता है। परन्तु यदि तेरे विरुद्ध इसके सिवा और कुछ भी सिद्ध न होता कि तू डियाबोलोनी है, तौभी व्यवस्था के अनुसार तुझे इसी कारण मृत्यु-दण्ड मिलना चाहिए; परन्तु उनमें से दूसरों को ग्रहण करनेवाला, उनका पालन-पोषण करनेवाला, उनका पक्ष लेनेवाला, और उन्हें शरण देनेवाला होना, हाँ, परदेशी डियाबोलोनियों को, हाँ, उन्हें जो जान-बूझकर दूर से हमारे मनुष्यात्मा को काट डालने और नष्ट करने के लिए आए थे—यह सहा नहीं जाना चाहिए।’

    तब कु-प्रश्न ने कहा: ‘मैं देखता हूँ कि खेल किधर जाएगा: मुझे अपने नाम के लिए, और अपने परोपकार के लिए मरना होगा।’ और यह कहकर वह चुप हो गया।

    तब उन्होंने परदेशी सन्देहियों को कटघरे में बुलाया, और उनमें से पहला जिस पर अभियोग लगाया गया, वह चुनाव-सन्देही था। सो उसका अभियोग-पत्र पढ़ा गया; और क्योंकि वह परदेशी था, इसलिए उसका सार एक दुभाषिये के द्वारा उसे बताया गया; अर्थात्, ‘कि उस पर यह आरोप है कि वह राजकुमार इम्मानुएल का शत्रु, मनुष्यात्मा नगर से बैर रखनेवाला, और उसकी अत्यन्त हितकारी शिक्षा का विरोधी है।’

    तब न्यायी ने उससे पूछा कि क्या वह अपना पक्ष रखेगा? परन्तु उसने केवल इतना कहा—कि वह मानता है कि वह चुनाव-सन्देही है, और यही वह धर्म है जिसमें वह सदा पाला-पोसा गया है। और उसने यह भी कहा, ‘यदि मुझे अपने धर्म के लिए मरना ही है, तो मेरी समझ में, मैं शहीद होकर मरूँगा, और इसलिए मुझे कम चिन्ता है।’

    न्यायी। तब यह उत्तर दिया गया: ‘चुनाव पर प्रश्न उठाना सुसमाचार की एक बड़ी शिक्षा को, अर्थात् परमेश्वर की सर्वज्ञता, और सामर्थ्य, और इच्छा को उलट देना है; अपनी सृष्टि के साथ परमेश्वर की स्वतन्त्रता को छीन लेना, मनुष्यात्मा नगर के विश्वास को ठोकर खिलाना, और उद्धार को अनुग्रह पर नहीं, वरन् कर्मों पर निर्भर बना देना है। इसने वचन को भी झुठलाया, और मनुष्यात्मा के लोगों के मनों को व्याकुल किया; इसलिए सर्वोत्तम व्यवस्था के अनुसार उसे मरना होगा।’

    तब बुलाहट-सन्देही बुलाया गया, और कटघरे में खड़ा किया गया; और उसका अभियोग-पत्र सार में दूसरे के समान ही था, केवल उस पर विशेष रूप से यह आरोप लगाया गया कि वह मनुष्यात्मा की बुलाहट का इन्कार करता है।

    न्यायी ने उससे भी पूछा कि उसे अपने पक्ष में क्या कहना है?

    सो उसने उत्तर दिया: ‘कि उसने कभी विश्वास नहीं किया कि मनुष्यात्मा के लिए परमेश्वर की कोई स्पष्ट और सामर्थी बुलाहट जैसी वस्तु है; सिवाय वचन की सामान्य वाणी के, और उसके द्वारा भी नहीं, सिवाय इसके कि वह उन्हें बुराई से रुकने, और भलाई करने का उपदेश देता है, और ऐसा करने पर सुख की एक प्रतिज्ञा जुड़ी हुई है।’

    तब न्यायी ने कहा: ‘तू डियाबोलोनी है, और तूने मनुष्यात्मा नगर के राजकुमार के सबसे अधिक अनुभव किए जानेवाले सत्यों में से एक के बड़े भाग का इन्कार किया है; क्योंकि उसने बुलाया है, और उसने अपने इम्मानुएल की अत्यन्त स्पष्ट और सामर्थी बुलाहट सुनी है, जिसके द्वारा वह जिलाई गई, जगाई गई, और स्वर्गीय अनुग्रह से भर दी गई कि वह अपने राजकुमार के साथ संगति रखने, उसकी सेवा करने, और उसकी इच्छा पूरी करने की, और अपना सुख केवल उसकी सुइच्छा से पाने की आशा रखने की लालसा करे। और इस अच्छी शिक्षा से तेरी घृणा के कारण तुझे मृत्यु-दण्ड भोगना होगा।’

    तब अनुग्रह-सन्देही बुलाया गया, और उसका अभियोग-पत्र पढ़ा गया, और उसने उसका यह उत्तर दिया: ‘कि यद्यपि वह सन्देह देश का था, तौभी उसका पिता एक फरीसी की सन्तान था, और अपने पड़ोसियों के बीच अच्छी रीति से रहता था, और उसने उसे यह विश्वास करना सिखाया था, और मैं इसका विश्वास करता हूँ, और करता रहूँगा, कि मनुष्यात्मा का उद्धार अनुग्रह से सेंत-मेंत कभी नहीं होगा।’

    तब न्यायी ने कहा: ‘अरे, राजकुमार की व्यवस्था तो स्पष्ट है: 1. नकारात्मक रूप में, “न कर्मों के कारण:” 2. सकारात्मक रूप में, “अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।” और तेरा धर्म शरीर के कामों में और उन्हीं पर टिका है; क्योंकि व्यवस्था के काम शरीर के काम हैं। इसके अतिरिक्त, जैसा तूने कहा है वैसा कहकर तूने परमेश्वर की महिमा को छीन लिया है, और उसे एक पापी मनुष्य को दे दिया है; तूने मसीह से उसके उस कार्य को अपने ऊपर लेने की आवश्यकता, और उसकी पर्याप्तता, छीन ली है, और ये दोनों शरीर के कामों को दे दी हैं। तूने पवित्र आत्मा के कार्य को तुच्छ जाना है, और शरीर की इच्छा को, और व्यवस्थावादी मन को बढ़ाया है। तू डियाबोलोनी है, एक डियाबोलोनी का पुत्र; और अपने डियाबोलोनी सिद्धान्तों के कारण तुझे मरना होगा।’

    तब न्यायालय ने, उनके साथ यहाँ तक कार्यवाही कर लेने के बाद, पंचों को बाहर भेजा, जिन्होंने तुरन्त उन्हें मृत्यु के योग्य दोषी ठहराया। तब अभिलेखक खड़े हुए, और बन्दियों को सम्बोधित करके कहा: ‘तुम, कटघरे में खड़े बन्दियो, तुम पर यहाँ अभियोग लगाया गया है, और तुम हमारे राजकुमार इम्मानुएल के विरुद्ध, और प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर के कल्याण के विरुद्ध, ऐसे बड़े अपराधों के दोषी सिद्ध हुए हो, जिनके लिए तुम्हें मृत्यु-दण्ड दिया जाना अवश्य है, और तुम उसी के अनुसार मरो।’ सो उन्हें क्रूस की मृत्यु का दण्ड सुनाया गया। उनके वध के लिए वही स्थान ठहराया गया जहाँ डियाबोलस ने मनुष्यात्मा के विरुद्ध अपनी अन्तिम सेना पाँति में खड़ी की थी; केवल बूढ़े कु-प्रश्न को बुरी गली के सिरे पर, ठीक उसके अपने द्वार के सामने, फाँसी पर लटकाया गया।

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