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अध्याय 10. इम्मानुएल नगर को नए सिरे से गढ़ता है — यह पाठ-विभाजन जॉय चैन द्वारा की गई लिब्रिवॉक्स रिकॉर्डिंग के अनुसार है। बनयन का 1682 का वृत्तान्त बिना किसी विराम के लगातार चलता है; ये शीर्षक केवल पढ़ने में सुविधा के लिए दिए गए हैं।
जब राजकुमार ने मनुष्यात्मा नगर को यहाँ तक नए सिरे से गढ़ दिया, और उन्हें उन बातों की शिक्षा दे दी जिनका जानना उनके लिए लाभदायक था, तब उसने एक और दिन ठहराया, जिसमें उसका विचार था कि जब नगरवासी इकट्ठे हों, तो वह मनुष्यात्मा नगर को सम्मान का एक और चिह्न प्रदान करे,—ऐसा चिह्न जो उन्हें विश्व के राज्य में बसनेवाले सब लोगों, कुलों और भाषाओं से अलग पहचान दे। अब ठहराया हुआ दिन आने में देर न लगी, और राजकुमार और उसकी प्रजा राजा के महल में इकट्ठे हुए, जहाँ पहले इम्मानुएल ने उनसे एक छोटा सा भाषण दिया, और फिर जैसा उसने कहा था वैसा ही उनके लिए किया, और जैसी उसने प्रतिज्ञा की थी वैसा ही उनके साथ किया।
उसने कहा, ‘हे मेरे मनुष्यात्मा, जो मैं अब करने पर हूँ, वह यह है कि संसार पर प्रगट कर दूँ कि तुम मेरे हो, और स्वयं तुम्हारी अपनी दृष्टि में भी तुम्हें उन सब झूठे विश्वासघातियों से अलग ठहराऊँ जो चुपके से तुम्हारे बीच घुस आएँ।’
तब उसने आज्ञा दी कि जो उसकी सेवा में खड़े रहते थे वे जाकर उसके भण्डार में से वे श्वेत और चमकते हुए वस्त्र निकाल लाएँ, ‘जिन्हें,’ उसने कहा, ‘मैंने अपने मनुष्यात्मा के लिए तैयार करके रख छोड़ा है।’ सो वे श्वेत वस्त्र उसके भण्डार में से निकाल लाए गए, और लोगों की आँखों के सामने फैला दिए गए। इसके अतिरिक्त उन्हें यह अनुमति दी गई कि वे उन्हें लेकर पहन लें, ‘अपने-अपने नाप और डील-डौल के अनुसार,’ उसने कहा। सो लोगों को श्वेत वस्त्र, हाँ, शुद्ध और श्वेत महीन मलमल पहनाया गया।
तब राजकुमार ने उनसे कहा, ‘हे मनुष्यात्मा, यह मेरी वर्दी है, और यही वह चिह्न है जिससे मेरे लोग दूसरों के सेवकों से अलग पहचाने जाते हैं। हाँ, यह वही है जो मैं अपने सब लोगों को देता हूँ, और इसके बिना किसी मनुष्य को मेरा मुख देखने की अनुमति नहीं। इसलिए मेरे कारण, जिसने ये तुम्हें दिए हैं, इन्हें पहने रहो; और इसलिए भी पहने रहो यदि तुम चाहते हो कि संसार तुम्हें मेरा करके पहचाने।’
पर अब! क्या आप सोच सकते हैं कि मनुष्यात्मा कैसा चमक उठा? वह सूर्य के समान सुन्दर, चन्द्रमा के समान निर्मल, और पताका फहराती हुई सेना के तुल्य भयंकर था।
राजकुमार ने आगे यह भी कहा, ‘विश्व का कोई भी राजकुमार, अधिपति या पराक्रमी, मुझे छोड़ यह वर्दी नहीं देता: इसलिए देखो, जैसा मैंने पहले कहा, इसी से तुम मेरे पहचाने जाओगे।
‘और अब,’ उसने कहा, ‘मैंने तुम्हें अपनी वर्दी दे दी है, तो मुझे इनके विषय में तुम्हें आज्ञा भी देने दो; और ध्यान रखना कि मेरी बातों पर भली-भाँति मन लगाओ।
‘पहली। इन्हें प्रतिदिन, दिन-प्रतिदिन पहने रहो, कहीं ऐसा न हो कि किसी समय तुम दूसरों को ऐसे दिखाई दो मानो तुम मेरे हो ही नहीं।
‘दूसरी। इन्हें सदा श्वेत बनाए रखो; क्योंकि यदि ये मैले हो जाएँ, तो यह मेरा अनादर है।
‘तीसरी। इसलिए इन्हें भूमि से ऊपर उठाकर कमर में बाँधे रखो, और इन्हें धूल और कीचड़ में घिसटने न दो।
‘चौथी। चौकस रहो कि ये तुमसे खो न जाएँ, कहीं ऐसा न हो कि तुम नंगे फिरो और लोग तुम्हारी लज्जा देखें।
‘पाँचवीं। परन्तु यदि तुम इन्हें मैला कर दो, यदि तुम इन्हें अशुद्ध कर दो, जो मैं कदापि नहीं चाहता कि तुम करो, और जिसे यदि तुम करो तो राजकुमार डियाबोलस प्रसन्न होगा, तो जो कुछ मेरी व्यवस्था में लिखा है उसे करने में फुर्ती करना, ताकि तुम फिर भी मेरे सामने और मेरे सिंहासन के सामने खड़े रह सको और ठीक ठहरो। यही वह मार्ग भी है जिससे ऐसा होगा कि जब तक मैं यहाँ हूँ, मैं न तुम्हें छोड़ूँ, न त्यागूँ, वरन् इस मनुष्यात्मा नगर में सदा के लिए वास करूँ।’
और अब मनुष्यात्मा और उसके निवासी इम्मानुएल के दाहिने हाथ की मुहर वाली अंगूठी के समान हो गए। अब ऐसा कौन सा नगर, कौन सी पुरी, कौन सा निगम था जिसकी तुलना मनुष्यात्मा से की जा सके! एक ऐसा नगर जो डियाबोलस के हाथ से और उसकी शक्ति से छुड़ाया गया! एक ऐसा नगर जिससे राजा शद्दै प्रेम करता था, और जिसे पाताल की गुफा के राजकुमार से फिर से जीत लेने के लिए उसने इम्मानुएल को भेजा; हाँ, एक ऐसा नगर जिसमें इम्मानुएल को वास करना प्रिय था, और जिसे उसने अपने राजकीय निवास के लिए चुन लिया; एक ऐसा नगर जिसे उसने अपने लिए गढ़वाला बनाया, और अपनी सेना के बल से दृढ़ किया। मैं और क्या कहूँ, मनुष्यात्मा के पास अब एक अति उत्तम राजकुमार है, सोने के समान कप्तान और योद्धा हैं, परखे हुए हथियार हैं, और हिम के समान श्वेत वस्त्र हैं। और इन लाभों को छोटा नहीं, वरन् बड़ा ही समझना चाहिए; क्या मनुष्यात्मा नगर उन्हें ऐसा ही आँकेगा, और उन्हें उसी उद्देश्य और प्रयोजन के लिए काम में लाएगा जिसके लिए वे उसे दिए गए हैं?
जब राजकुमार ने इस प्रकार नगर को गढ़ने का काम पूरा कर लिया, तो यह दिखाने के लिए कि वह अपने हाथों के काम से बहुत आनन्दित है, और उस भलाई से प्रसन्न है जो उसने प्रसिद्ध और फलते-फूलते मनुष्यात्मा के लिए की थी, उसने आज्ञा दी, और उन्होंने गढ़ की बुर्जियों पर उसका झण्डा खड़ा कर दिया। और तब,
पहला। वह बार-बार उनसे मिलने आता था; अब कोई दिन ऐसा न जाता कि मनुष्यात्मा के पुरनिये उसके पास उसके महल में न आएँ, या वह उनके पास न जाए। अब वे साथ-साथ चलते और उन सब बड़े-बड़े कामों की चर्चा करते जो उसने मनुष्यात्मा नगर के लिए किए थे, और जिनके आगे करने की उसने प्रतिज्ञा भी की थी। वह प्रायः महापौर, मेरे लॉर्ड इच्छाप्रबल, और ईमानदार उप-प्रचारक श्रीमान विवेक, और श्रीमान अभिलेखक के साथ ऐसा ही किया करता था। पर ओह, यह धन्य राजकुमार अब मनुष्यात्मा नगर के साथ कितने अनुग्रह से, कितने प्रेम से, कितनी शिष्टता और कोमलता से व्यवहार करता था! जिन-जिन गलियों, बगीचों, फलवाटिकाओं और अन्य स्थानों में वह जाता, वहाँ निश्चय ही कंगालों को उसकी आशीष और मंगलकामना मिलती; हाँ, वह उन्हें चूमता, और यदि वे बीमार होते तो उन पर हाथ रखकर उन्हें चंगा कर देता। कप्तानों को भी वह प्रतिदिन, हाँ, कभी-कभी तो प्रति घण्टे, अपनी उपस्थिति और भले वचनों से प्रोत्साहित करता। क्योंकि आपको जानना चाहिए कि उनकी ओर उसकी एक मुस्कान उनमें इतना जोश, इतना जीवन और इतना साहस भर देती थी, जितना आकाश के नीचे की कोई और वस्तु नहीं भर सकती थी।
राजकुमार अब उन्हें भोज भी देता, और निरन्तर उनके साथ रहता: शायद ही कोई सप्ताह ऐसा बीतता कि उसके और उनके बीच कोई भोज न हो। आपको स्मरण होगा कि कुछ पृष्ठ पहले हमने एक भोज का उल्लेख किया था जो उन्होंने साथ मिलकर खाया था; पर अब उन्हें भोज देना और भी साधारण बात हो गई थी: अब मनुष्यात्मा के लिए हर दिन भोज का दिन था। और जब वे अपने-अपने स्थानों को लौटते, तब भी वह उन्हें छूछे हाथ न भेजता, उन्हें कोई अंगूठी, सोने की जंजीर, कंगन, श्वेत पत्थर, या कुछ न कुछ अवश्य मिलता; मनुष्यात्मा अब उसे इतना प्रिय था; मनुष्यात्मा उसकी आँखों में इतना मनोहर था।
दूसरा। जब पुरनिये और नगरवासी उसके पास न आते, तब वह उनके पास बहुतायत से भोजन-सामग्री भेज देता; ऐसा भोजन जो राजदरबार से आता, ऐसा दाखमधु और रोटी जो उसके पिता की मेज़ के लिए तैयार की जाती थी; हाँ, वह उनके पास ऐसे-ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन भेजता, और उनसे उनकी मेज़ को ऐसा भर देता, कि जो कोई उसे देखता वह मान लेता कि ऐसा किसी राज्य में देखने को नहीं मिल सकता।
तीसरा। यदि मनुष्यात्मा उसके पास उतनी बार न आता जितनी बार वह चाहता था, तो वह स्वयं निकलकर उनके पास जाता, उनके द्वार खटखटाता, और भीतर आने की इच्छा प्रगट करता, ताकि उसके और उनके बीच मित्रता बनी रहे; यदि वे सुनकर उसके लिए द्वार खोल देते, जैसा कि यदि वे घर पर होते तो प्रायः खोल देते थे, तो वह अपने पहले के प्रेम को नया करता, और उसे अपनी निरन्तर कृपा के कुछ नए प्रमाणों और चिह्नों से पक्का भी करता।
और अब क्या यह देखकर आश्चर्य न होता था कि ठीक उसी स्थान पर जहाँ कभी डियाबोलस का निवास था, और जहाँ वह अपने डियाबोलोनी लोगों की आवभगत करता था जिससे मनुष्यात्मा का लगभग सर्वनाश हो गया था, वहीं राजकुमारों का राजकुमार उनके साथ बैठकर खाता-पीता था, और उसके सब पराक्रमी कप्तान, योद्धा, तुरही फूँकनेवाले, और उसके पिता के गायक और गायिकाएँ उनकी सेवा के लिए चारों ओर खड़े रहते थे! अब मनुष्यात्मा का कटोरा उमड़ रहा था, अब उसकी नालियों से मीठा दाखमधु बहता था, अब वह उत्तम से उत्तम गेहूँ खाता था, और चट्टान में से दूध और मधु पीता था! अब उसने कहा, उसकी भलाई कितनी बड़ी है! क्योंकि जब से मैंने उसकी दृष्टि में अनुग्रह पाया है, तब से मेरा कितना आदर हुआ है!
धन्य राजकुमार ने नगर में एक नया अधिकारी भी नियुक्त किया, और वह एक भला पुरुष था; उसका नाम श्रीमान परमेश्वर-की-शान्ति था: यह पुरुष मेरे लॉर्ड इच्छाप्रबल, मेरे लॉर्ड महापौर, श्रीमान अभिलेखक, उप-प्रचारक, श्रीमान मन, और मनुष्यात्मा नगर के सब मूल निवासियों के ऊपर ठहराया गया। वह स्वयं वहाँ का मूल निवासी नहीं था, वरन् राजकुमार इम्मानुएल के साथ राजदरबार से आया था। कप्तान विश्वास और कप्तान शुभ-आशा से उसकी बड़ी जान-पहचान थी; कुछ लोग कहते हैं कि वे आपस में सम्बन्धी थे, और मेरा भी यही मत है। यह पुरुष, जैसा मैंने कहा, सामान्य रूप से पूरे नगर का, और विशेष करके गढ़ का, शासक बनाया गया, और कप्तान विश्वास को वहाँ उसकी सहायता करनी थी। और मैंने इस बात पर बहुत ध्यान दिया कि जब तक मनुष्यात्मा में सब बातें इस मधुर स्वभाव वाले सज्जन की इच्छा के अनुसार चलती रहीं, तब तक नगर अति सुखी दशा में रहा। अब सारे मनुष्यात्मा नगर में न कोई कलह थी, न झिड़की, न एक-दूसरे के काम में दखल, न कोई विश्वासघात का काम; मनुष्यात्मा में हर मनुष्य अपने-अपने काम में लगा रहता था। कुलीन लोग, अधिकारी, सैनिक, और सब पदाधिकारी अपनी-अपनी मर्यादा का पालन करते थे। और रहे नगर की स्त्रियाँ और बच्चे, सो वे आनन्द से अपने-अपने काम में लगे रहते; वे भोर से रात तक काम करते और गाते, काम करते और गाते: यहाँ तक कि अब सारे मनुष्यात्मा नगर में मेल-मिलाप, शान्ति, आनन्द और स्वास्थ्य को छोड़ और कुछ न पाया जाता था। और यह दशा उस पूरी ग्रीष्म ऋतु भर बनी रही।
परन्तु मनुष्यात्मा नगर में एक मनुष्य था, और उसका नाम श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता था; इस मनुष्य ने, इस निगम पर यह सारी दया किए जाने के बाद भी, मनुष्यात्मा नगर को भारी और दुःखदायी दासत्व और बन्धन में डाल दिया। उसके और उसके कामों का संक्षिप्त वृत्तान्त इस प्रकार सुनिए:—
जब डियाबोलस ने पहले-पहल मनुष्यात्मा नगर पर अधिकार किया, तो वह अपने साथ बहुत से डियाबोलोनी, अपने ही स्वभाव के लोगों को वहाँ ले आया। इनमें एक था जिसका नाम श्रीमान आत्म-अभिमान था, और उन दिनों मनुष्यात्मा नगर पर अधिकार रखनेवालों में वह किसी से कम फुर्तीला और नामी न था। तब डियाबोलस ने इस मनुष्य को क्रियाशील और साहसी देखकर उसे बहुत सी दुस्साहसी योजनाओं पर भेजा, जिन्हें उसने उन अधिकांश लोगों से, जो उसके साथ माँदों से आए थे, कहीं अच्छी तरह और अपने स्वामी को कहीं अधिक प्रसन्न करनेवाले ढंग से पूरा किया। इसलिए उसे अपने प्रयोजन के लिए इतना उपयुक्त पाकर, उसने उसे पदोन्नति दी, और उसे उस महान लॉर्ड इच्छाप्रबल के बाद दूसरे स्थान पर रखा, जिसके विषय में हम पहले इतना कुछ लिख चुके हैं। अब लॉर्ड इच्छाप्रबल ने, जो उन दिनों उससे और उसकी उपलब्धियों से बहुत प्रसन्न था, अपनी बेटी, लेडी निडर, उसे ब्याह दी। अब मेरी लेडी निडर से इस श्रीमान आत्म-अभिमान ने इस सज्जन, श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता, को जन्म दिया। इसलिए उस समय मनुष्यात्मा में ऐसे विचित्र प्रकार के मेल-जोल होने के कारण, कुछ मामलों में उनके लिए यह पता लगाना कठिन था कि कौन मूल निवासी है और कौन नहीं, क्योंकि श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता माता की ओर से मेरे लॉर्ड इच्छाप्रबल के वंश से था, यद्यपि उसका पिता स्वभाव से डियाबोलोनी था।
खैर, यह शारीरिक-निश्चिन्तता बहुत कुछ अपने पिता और माता पर गया था; वह आत्म-अभिमानी था, वह किसी बात से न डरता था, वह बड़ा ही व्यस्त रहनेवाला मनुष्य भी था: मनुष्यात्मा में कभी कोई समाचार, कोई सिद्धान्त, कोई परिवर्तन, या परिवर्तन की कोई चर्चा ऐसी न चलती थी जिसके आगे या पीछे श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता निश्चय ही न हो: पर यह भी निश्चित था कि जिन्हें वह सबसे निर्बल समझता, उनसे वह किनारा कर लेता, और अपने ढंग से सदा उन्हीं के साथ खड़ा रहता जिन्हें वह सबसे बलवन्त पक्ष समझता था।
अब जब पराक्रमी शद्दै और उसके पुत्र इम्मानुएल ने मनुष्यात्मा को ले लेने के लिए उससे युद्ध किया, तब यह श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता नगर में ही था, और लोगों के बीच बड़ा कर्ता-धर्ता बना हुआ था, उन्हें उनके विद्रोह में उकसाता, और राजा की सेनाओं का सामना करने में अपने आप को कठोर बनाने के लिए उभारता था: पर जब उसने देखा कि मनुष्यात्मा नगर ले लिया गया है, और महिमामय राजकुमार इम्मानुएल के काम के लिए बदल दिया गया है; और जब उसने यह भी देखा कि डियाबोलस का क्या हाल हुआ, और कैसे वह अपने बसेरे से खदेड़ा गया, और अत्यन्त तिरस्कार और उपहास के साथ गढ़ छोड़ने पर विवश किया गया; और यह कि मनुष्यात्मा नगर कप्तानों, युद्ध के यन्त्रों, और योद्धाओं से, और रसद से भी भली-भाँति भरपूर है; तो वह क्या करता है कि चुपके से वह भी पलटा खा जाता है; और जैसे उसने भले राजकुमार के विरुद्ध डियाबोलस की सेवा की थी, वैसे ही उसने यह ढोंग रचा कि वह राजकुमार के शत्रुओं के विरुद्ध राजकुमार की सेवा करेगा।
और इम्मानुएल की बातों का थोड़ा-बहुत ऊपरी ज्ञान इधर-उधर से पाकर, ढीठ होने के कारण, वह साहस करके नगरवासियों की संगति में जा घुसता है, और उनके बीच बातचीत करने का प्रयत्न भी करता है। अब वह जानता था कि मनुष्यात्मा नगर की शक्ति और सामर्थ्य बड़ी है, और यदि वह उनके बल और उनकी महिमा का बखान करे तो लोगों को यह अवश्य अच्छा लगेगा। इसलिए वह अपनी बात मनुष्यात्मा की शक्ति और सामर्थ्य से आरम्भ करता है, और दृढ़ता से कहता है कि वह अजेय है; कभी उनके कप्तानों और उनके गोफनों और उनके दीवार तोड़नेवाले यन्त्रों की बड़ाई करता; फिर उनकी किलेबन्दी और गढ़ों का बखान करता; और अन्त में उन आश्वासनों का, जो उन्हें अपने राजकुमार से मिले थे, कि मनुष्यात्मा सदा सुखी रहेगा। पर जब उसने देखा कि नगर के कुछ लोग उसकी बातों से गुदगुदाए और मोहित हो गए हैं, तो उसने इसी को अपना काम बना लिया, और गली-गली, घर-घर, और मनुष्य-मनुष्य के पास जाकर, अन्त में उसने मनुष्यात्मा को अपनी बाँसुरी की धुन पर नचा दिया, और उसे लगभग अपने ही समान शारीरिक रूप से निश्चिन्त बना दिया; सो वे बातचीत से भोज पर, और भोज से रंगरलियों पर, और फिर कुछ और बातों पर उतर आए। अब इम्मानुएल अभी मनुष्यात्मा नगर में ही था, और वह बुद्धिमानी से उनके कामों पर दृष्टि रखे हुए था। मेरे लॉर्ड महापौर, मेरे लॉर्ड इच्छाप्रबल, और श्रीमान अभिलेखक भी इस बकवादी डियाबोलोनी सज्जन की बातों में आ गए, और यह भूल गए कि उनके राजकुमार ने उन्हें पहले से चेतावनी दी थी कि चौकस रहें कि किसी डियाबोलोनी चालबाज़ी से धोखा न खाएँ; उसने उनसे यह भी कहा था कि अब फलते-फूलते मनुष्यात्मा नगर की सुरक्षा उसकी वर्तमान किलेबन्दी और बल पर उतनी निर्भर नहीं, जितनी इस पर कि जो कुछ उसके पास है उसे वह ऐसे काम में लाए कि उसका इम्मानुएल उसके गढ़ में बने रहने को बाध्य हो। क्योंकि इम्मानुएल की सच्ची शिक्षा यह थी कि मनुष्यात्मा नगर चौकस रहे कि वह उसके पिता के और उसके प्रेम को न भूले; और यह भी कि वे ऐसा आचरण करें कि अपने आप को उसी प्रेम में बनाए रखें। अब ऐसा करने का यह मार्ग नहीं था, अर्थात् डियाबोलोनियों में से किसी एक पर, और वह भी श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता जैसे मनुष्य पर, मोहित हो जाना, और उसके द्वारा नाक में नकेल डालकर इधर-उधर घुमाया जाना; उन्हें चाहिए था कि वे अपने राजकुमार की सुनते, अपने राजकुमार का भय मानते, अपने राजकुमार से प्रेम करते, और इस दुष्ट टोली को पत्थरवाह करके मार डालते, और अपने राजकुमार के ठहराए हुए मार्गों पर चलने की चिन्ता करते: क्योंकि तब उनकी शान्ति नदी के समान होती, और उनकी धार्मिकता समुद्र की लहरों के समान होती।
अब जब इम्मानुएल ने देखा कि श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता की चाल के कारण मनुष्यात्मा के लोगों के हृदय उसके प्रति व्यावहारिक प्रेम में ठण्डे और मन्द पड़ गए हैं,
पहला। वह उन पर विलाप करता है, और सचिव के साथ उनकी दशा पर शोक प्रगट करता है, और कहता है, ‘भला होता कि मेरी प्रजा मेरी सुनती, और मनुष्यात्मा मेरे मार्गों पर चलता! मैं उनको उत्तम से उत्तम गेहूँ खिलाता, और चट्टान में के मधु से उनको तृप्त करता।’ यह करके उसने अपने मन में कहा, ‘मैं राजदरबार को लौटकर अपने स्थान को चला जाऊँगा, जब तक मनुष्यात्मा सोच-विचार करके अपना अपराध मान न ले।’ और उसने ऐसा ही किया, और उनके पास से उसके चले जाने का कारण और ढंग यह था कि मनुष्यात्मा उससे विमुख हो गया था, जैसा इन बातों से प्रगट है।
‘1. उन्होंने पहले की नाईं उससे मिलने जाना छोड़ दिया, वे पहले के समान उसके राजमहल में न आते थे।
‘2. वह उनसे मिलने आता या न आता, इस पर वे न ध्यान देते थे, न कुछ परवाह करते थे।
‘3. प्रेम-भोज, जो उनके राजकुमार और उनके बीच हुआ करते थे, यद्यपि वह अब भी उन्हें देता था और उन्हें उनमें बुलाता था, तौभी वे उनमें आने की, या उनसे आनन्दित होने की उपेक्षा करते थे।
‘4. वे उसकी सम्मति की बाट न जोहते थे, वरन् हठीले और आत्मविश्वासी होने लगे थे, और यह निष्कर्ष निकाल बैठे थे कि अब वे बलवन्त और अजेय हैं, और मनुष्यात्मा सुरक्षित है, और शत्रु की पहुँच से बिल्कुल बाहर है, और उसकी दशा सदा के लिए अवश्य अटल रहेगी।’
अब, जैसा कहा गया, इम्मानुएल ने जब देखा कि श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता की धूर्तता से मनुष्यात्मा नगर उस पर, और उसके द्वारा उसके पिता पर, निर्भर रहना छोड़ बैठा है, और जो कुछ उन्होंने उसे दिया था उसी पर भरोसा करने लगा है; तो जैसा मैंने कहा, पहले तो उसने उनकी दशा पर विलाप किया, फिर उसने ऐसे उपाय किए कि वे समझ जाएँ कि जिस मार्ग पर वे चल रहे हैं वह खतरनाक है: क्योंकि उसने मेरे लॉर्ड उच्च सचिव को उनके पास भेजा कि उन्हें ऐसे मार्गों से रोके; पर जब वह उनके पास गया, तो दोनों बार उसने उन्हें श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता की बैठक में भोजन करते पाया; और यह भी देखकर कि वे अपनी भलाई से सम्बन्धित बातों पर तर्क-वितर्क करने को तैयार नहीं, वह शोकित होकर अपने मार्ग चला गया; और जब उसने यह बात राजकुमार इम्मानुएल को बताई, तो वह भी अप्रसन्न और शोकित हुआ, और इस प्रकार उसने अपने पिता के दरबार को लौटने की तैयारी की।
अब उसके हट जाने के ढंग, जैसा मैं पहले कह रहा था, ये थे:—
‘1. जब वह अभी मनुष्यात्मा में उनके साथ ही था, तब भी वह अपने आप को अलग रखता, और पहले से अधिक एकान्त में रहता।
‘2. यदि वह उनकी संगति में आता भी, तो उसकी बातचीत अब पहले के समान सुहावनी और आत्मीय न होती थी।
‘3. न वह बीते दिनों के समान अपनी मेज़ से मनुष्यात्मा के पास वे स्वादिष्ट कौर भेजता था जो वह भेजा करता था।
‘4. और जब वे उससे मिलने आते, जैसा कि वे कभी-कभार आ जाते थे, तब भी उससे उतनी सरलता से बात न हो पाती थी जितनी बीते दिनों में वे पाते थे। अब वे एक बार, हाँ, दो बार भी खटखटा सकते थे, पर वह ऐसा दिखाता मानो उनकी ओर कुछ ध्यान ही नहीं देता; जबकि पहले उनके पाँवों की आहट सुनते ही वह उठकर दौड़ता, और आधे मार्ग में उनसे मिलता, और उन्हें उठाकर अपनी गोद में भी रख लेता था।’
पर अब इम्मानुएल ऐसा ही व्यवहार करता था, और अपने इस व्यवहार से वह चाहता था कि वे सोचें, और उसकी ओर लौट आएँ। पर हाय! उन्होंने विचार न किया, उन्होंने उसके मार्गों को न जाना, उन्होंने ध्यान न दिया, उन्हें न इन बातों ने छुआ, न पहले की कृपाओं के सच्चे स्मरण ने। इसलिए वह क्या करता है कि गुप्त रीति से अपने आप को हटा लेता है, पहले अपने महल से, फिर नगर के फाटक तक, और इस प्रकार वह मनुष्यात्मा से दूर चला जाता है, जब तक कि वे अपना अपराध न मान लें, और अधिक लगन से उसके दर्शन के खोजी न हों। श्रीमान परमेश्वर-की-शान्ति ने भी अपना पद त्याग दिया, और कुछ समय के लिए मनुष्यात्मा नगर में आगे कोई काम न किया।
इस प्रकार वे उसके विरुद्ध चले, और उसने भी बदले में उनके विरुद्ध चाल चली। पर हाय! इस समय तक वे अपने मार्ग में इतने कठोर हो गए थे, और श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता की शिक्षा को इतना पी चुके थे, कि उनके राजकुमार के चले जाने से उन पर कोई प्रभाव न पड़ा, न उसके चले जाने पर उन्होंने उसे स्मरण किया; और इसलिए, स्वाभाविक रूप से, उन्होंने उसकी अनुपस्थिति पर शोक भी न किया।
अब एक दिन ऐसा आया जिसमें इस बूढ़े सज्जन, श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता, ने मनुष्यात्मा नगर के लिए फिर एक भोज किया; और उस समय नगर में एक श्रीमान ईश्वर-भय था, जिसे अब बहुत कम पूछा जाता था, यद्यपि पहले उसका बड़ा मान था। इस मनुष्य को बूढ़ा शारीरिक-निश्चिन्तता, यदि हो सके तो, वैसे ही ठगना, भ्रष्ट करना और बिगाड़ना चाहता था जैसे उसने बाकी सब को किया था, और इसलिए उसने अब उसे उसके पड़ोसियों के साथ भोज में न्योता दिया। सो जब वह दिन आया, तो वे तैयारी करते हैं, और वह जाकर बाकी अतिथियों के साथ उपस्थित होता है; और जब सब मेज़ पर बैठ गए, तो उन्होंने खाया-पिया और आनन्द मनाया, केवल इस एक मनुष्य को छोड़ सब ने: क्योंकि श्रीमान ईश्वर-भय एक परदेशी के समान बैठा रहा, और उसने न खाया, न आनन्द मनाया। जब श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता ने यह देखा, तो वह तुरन्त उससे इस प्रकार बोला:—
‘श्रीमान ईश्वर-भय, क्या आपका जी अच्छा नहीं? आप तन से या मन से, या दोनों से, बीमार जान पड़ते हैं। मेरे पास श्रीमान भलाई-भूल का बनाया हुआ एक पुष्टिकारक पेय है, जिसका यदि आप, महोदय, एक घूँट भी ले लें, तो मुझे आशा है कि वह आपको हँसमुख और प्रफुल्लित कर देगा, और इस प्रकार आपको हम भोज के साथियों के अधिक योग्य बना देगा।’
इस पर उस भले बूढ़े सज्जन ने समझदारी से उत्तर दिया, ‘महोदय, सब शिष्ट और सभ्य बातों के लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूँ; परन्तु आपके पेय की मुझे कोई इच्छा नहीं। पर मनुष्यात्मा के मूल निवासियों से एक बात कहनी है: आप, जो मनुष्यात्मा के पुरनिये और प्रधान हैं, मुझे यह देखकर अचम्भा होता है कि जब मनुष्यात्मा नगर ऐसी दयनीय दशा में है, तब आप ऐसे प्रसन्न और मगन हैं।’
तब श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता ने कहा, ‘भले महोदय, मुझे सन्देह है कि आपको नींद की आवश्यकता है। यदि आप चाहें तो लेटकर एक झपकी ले लीजिए, और इस बीच हम आनन्द मनाएँगे।’
तब उस भले मनुष्य ने इस प्रकार कहा: ‘महोदय, यदि आप सच्चे हृदय से रहित न होते, तो आप वैसा न कर सकते जैसा आपने किया है और कर रहे हैं।’
तब श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता ने कहा, ‘क्यों?’
ईश्वर-भय: नहीं, कृपया मुझे टोकिए मत। यह सच है कि मनुष्यात्मा नगर दृढ़ था, और एक शर्त के साथ अजेय भी था; परन्तु आप नगरवासियों ने उसे निर्बल कर दिया है, और अब वह अपने शत्रुओं के आगे खुला पड़ा है। न यह चापलूसी करने का, न चुप रहने का समय है; आप ही हैं, श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता, जिन्होंने धूर्तता से मनुष्यात्मा को लूटकर नंगा कर दिया है, और उसकी महिमा को उससे दूर भगा दिया है; आपने उसके गुम्मटों को ढा दिया है, आपने उसके फाटकों को तोड़ डाला है, आपने उसके ताले और बेंड़े बिगाड़ दिए हैं।
और अब मैं अपनी बात स्पष्ट करूँ: जिस समय से मनुष्यात्मा के मेरे लॉर्ड लोग, और आप, महोदय, आपस में इतने घनिष्ठ हो गए, उसी समय से मनुष्यात्मा का बल अप्रसन्न हुआ है, और अब वह उठकर चला गया है। यदि कोई मेरी बातों की सच्चाई पर प्रश्न उठाए, तो मैं उसे इस और ऐसे ही प्रश्नों से उत्तर दूँगा। ‘राजकुमार इम्मानुएल कहाँ है? मनुष्यात्मा में किसी पुरुष या स्त्री ने उसे कब देखा? आपने कब उसका कोई समाचार पाया, या उसके स्वादिष्ट कौरों में से कुछ चखा?’ अब आप इस डियाबोलोनी राक्षस के साथ भोज उड़ा रहे हैं, पर वह आपका राजकुमार नहीं है। इसलिए मैं कहता हूँ, यद्यपि बाहर के शत्रु, यदि आप चौकस रहते, आपको अपना शिकार नहीं बना सकते थे, तौभी जब से आपने अपने राजकुमार के विरुद्ध पाप किया है, तब से भीतर के शत्रु आप पर भारी पड़ गए हैं।
तब श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता ने कहा, ‘छि! छि! श्रीमान ईश्वर-भय, छि!—क्या आप अपनी भीरुता को कभी न झाड़ फेंकेंगे? क्या आप डरते हैं कि कोई गौरैया आप पर झपट पड़ेगी? किसने आपको हानि पहुँचाई है? देखिए, मैं आपकी ओर हूँ; बस आप सन्देह करने के पक्ष में हैं, और मैं निश्चिन्त रहने के पक्ष में हूँ। इसके अतिरिक्त, क्या यह उदास होने का समय है? भोज तो आनन्द के लिए किया जाता है; तो फिर जब आपको खाना-पीना और आनन्द करना चाहिए, तब आप अपनी लज्जा और हमारी परेशानी के लिए ऐसी भावावेश भरी उदासी की बातें क्यों कहने लगे हैं?’
तब श्रीमान ईश्वर-भय ने फिर कहा, ‘मेरा उदास होना उचित ही है, क्योंकि इम्मानुएल मनुष्यात्मा से चला गया है। मैं फिर कहता हूँ, वह चला गया है, और आप, महोदय, वही मनुष्य हैं जिसने उसे भगा दिया है; हाँ, वह मनुष्यात्मा के प्रतिष्ठित लोगों को अपने जाने की सूचना तक दिए बिना चला गया है; और यदि यह उसके क्रोध का चिह्न नहीं, तो मैं भक्ति की रीतियों से परिचित ही नहीं।
‘और अब, मेरे लॉर्डों और सज्जनों, क्योंकि मेरी बात अब भी आप ही से है, आपके धीरे-धीरे उससे विमुख होने ने उसे धीरे-धीरे आपसे दूर चले जाने को उकसाया, और उसने कुछ समय तक ऐसा ही किया, कि शायद इससे आपको होश आ जाए, और आप अपने आप को दीन करके नए हो जाएँ; पर जब उसने देखा कि कोई ध्यान नहीं देता, और न कोई उसके क्रोध और न्याय के इन भयानक आरम्भों को मन में लाता है, तो वह इस स्थान से चला गया; और यह मैंने अपनी आँखों से देखा। इसलिए अब, जब आप डींग मार रहे हैं, आपका बल जाता रहा है; आप उस मनुष्य के समान हैं जिसने अपनी वे लटें खो दी थीं जो पहले उसके कन्धों पर लहराती थीं। आप अपने इस भोज के स्वामी के साथ अपने आप को झटक सकते हैं, और यह ठान सकते हैं कि और समयों के समान करेंगे; परन्तु जब उसके बिना आप कुछ भी नहीं कर सकते, और वह आपके पास से चला गया है, तो अपने भोज को आहों में, और अपने आनन्द को विलाप में बदल दीजिए।’
तब उप-प्रचारक, जिसका नाम बूढ़ा श्रीमान विवेक था, जो पुराने समय में मनुष्यात्मा का अभिलेखक था, जो कहा गया था उससे चौंककर, उसका समर्थन इस प्रकार करने लगा:—
‘सचमुच, मेरे भाइयो,’ उसने कहा, ‘मुझे डर है कि श्रीमान ईश्वर-भय हमसे सच कहते हैं: मैंने तो, अपनी ओर से, बहुत समय से अपने राजकुमार को नहीं देखा। मुझे तो वह दिन स्मरण नहीं; न मैं श्रीमान ईश्वर-भय के प्रश्न का उत्तर दे सकता हूँ। मुझे आशंका है, मुझे डर है कि मनुष्यात्मा के साथ सब कुछ बिगड़ गया है।’
ईश्वर-भय: नहीं, मैं जानता हूँ कि आप उसे मनुष्यात्मा में नहीं पाएँगे, क्योंकि वह यहाँ से विदा होकर चला गया है; हाँ, पुरनियों के दोषों के कारण चला गया है, और इस कारण कि उन्होंने उसके अनुग्रह का बदला असहनीय कृतघ्नता से दिया।
तब उप-प्रचारक ऐसा दिखने लगा मानो वह मेज़ पर ही मरकर गिर पड़ेगा; और घर के स्वामी को छोड़, वहाँ उपस्थित सब लोगों के मुख पीले और फीके पड़ने लगे। पर जब वे कुछ सँभले, और सब ने मिलकर श्रीमान ईश्वर-भय और उसकी बातों पर विश्वास करना ठान लिया, तो वे सम्मति करने लगे कि क्या करना सबसे अच्छा होगा, (अब श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता अपने विश्राम-कक्ष में चला गया था, क्योंकि उसे ऐसी उदासी भरी बातें अच्छी नहीं लगती थीं,) एक तो घर के उस स्वामी के विषय में, जिसने उन्हें बुराई में खींचा था, और दूसरे इम्मानुएल का प्रेम फिर से पाने के विषय में।
और इसके साथ ही उनके राजकुमार का वह वचन बड़ी तीव्रता से उनके मन में आया, जो उसने उन्हें ऐसे झूठे भविष्यद्वक्ताओं के साथ करने की आज्ञा दी थी जो मनुष्यात्मा नगर को भरमाने के लिए उठ खड़े हों। सो उन्होंने श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता को पकड़ लिया (यह निष्कर्ष निकालकर कि वही ऐसा मनुष्य होगा) और उसके घर को उसी समेत आग से जला दिया; क्योंकि वह भी स्वभाव से डियाबोलोनी था।
सो जब यह हो चुका और बीत गया, तो वे अपने राजकुमार इम्मानुएल को ढूँढ़ने में फुर्ती से लग गए; और उन्होंने उसे ढूँढ़ा, पर उसे न पाया। तब श्रीमान ईश्वर-भय की बातों की सच्चाई पर उनका विश्वास और दृढ़ हो गया, और वे अपने ऐसे नीच और भक्तिहीन कामों के कारण अपने आप को कठोरता से धिक्कारने भी लगे; क्योंकि अब उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि उन्हीं के कारण उनका राजकुमार उन्हें छोड़ गया था।
तब उन्होंने आपस में सहमत होकर मेरे लॉर्ड सचिव के पास जाने का निश्चय किया, (उसी के पास जिसकी बात सुनने से उन्होंने पहले इनकार किया था—उसी के पास जिसे उन्होंने अपने कामों से शोकित किया था,) कि उससे जानें, क्योंकि वह दर्शी था, और बता सकता था कि इम्मानुएल कहाँ है, और वे उसके पास अपनी विनती कैसे पहुँचा सकते हैं। परन्तु लॉर्ड सचिव ने इस विषय पर उन्हें भेंट-वार्ता का अवसर न दिया, न उन्हें अपने राजकीय निवास-स्थान में आने दिया, न उन्हें अपना मुख दिखाने या कोई समाचार देने के लिए बाहर आया।
और अब मनुष्यात्मा के लिए वह दिन उदासी और अन्धकार का दिन, बादलों और घोर अन्धकार का दिन था। अब उन्होंने देखा कि वे मूर्ख रहे थे, और समझने लगे कि श्रीमान शारीरिक-निश्चिन्तता की संगति और बकबक ने क्या कर डाला था, और उसकी डींग भरी बातों ने बेचारे मनुष्यात्मा को कैसी भयंकर हानि में डाल दिया था। पर इसकी आगे उन्हें और क्या कीमत चुकानी पड़ सकती थी, इससे वे अनजान थे। अब श्रीमान ईश्वर-भय का नगर के लोगों में फिर से मान होने लगा; हाँ, वे उसे एक भविष्यद्वक्ता के रूप में देखने को तैयार थे।
