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अध्याय 4. इम्मानुएल के आने का समाचार — जॉय चैन द्वारा की गई लिब्रिवॉक्स रिकॉर्डिंग के अनुसार किया गया पाठ-विभाजन। बनयन का 1682 का वृत्तान्त लगातार चलता है; ये शीर्षक केवल पुस्तक में आगे-पीछे जाने की सुविधा के लिए हैं।
अब डियाबोलस उसके लौटने की बाट जोह रहा था, क्योंकि उसने सुन लिया था कि उनके बीच खींचतान हुई है। सो जब वह राज-दरबार के कक्ष में आया, तो डियाबोलस ने उसका अभिवादन इन शब्दों से किया—‘स्वागत है, लॉर्ड महोदय। आज तुम्हारे बीच बात कैसी रही?’ तब लॉर्ड अविश्वास ने झुककर गहरा प्रणाम किया और सारा हाल उसे कह सुनाया, और बोला, ‘शद्दै के कप्तानों ने ऐसा-ऐसा कहा, और मैंने ऐसा-ऐसा कहा।’ जब यह सब डियाबोलस को बताया गया, तो वह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और बोला, ‘मेरे महापौर, मेरे विश्वासयोग्य अविश्वास, मैं दस बार से भी अधिक तेरी स्वामिभक्ति को परख चुका हूँ, परन्तु तुझे कभी भी विश्वासघाती नहीं पाया। मैं तुझसे वचन देता हूँ कि यदि हम इस संकट से पार निकल गए, तो मैं तुझे ऐसे आदर के पद पर बढ़ाऊँगा जो मनुष्यात्मा का महापौर होने से कहीं बढ़कर होगा। मैं तुझे अपना सार्वभौमिक प्रतिनिधि बनाऊँगा, और मेरे बाद सब जातियाँ तेरे हाथ के नीचे होंगी; हाँ, तू उन पर बन्धन डालेगा, ताकि वे तेरा सामना न कर सकें; और हमारी प्रजा में से कोई भी फिर स्वतन्त्र होकर न चलेगा, केवल वे ही चलेंगे जो तेरी बेड़ियाँ पहनकर चलने में सन्तुष्ट रहेंगे।’
तब महापौर डियाबोलस के पास से ऐसे निकला, मानो उसने सचमुच कोई बड़ा अनुग्रह पा लिया हो। इसलिए वह बड़ी शान से अपने निवास को गया, और सोचता रहा कि जब तक उसकी महानता बढ़ाए जाने का समय न आ जाए, तब तक वह आशाओं ही से अपना पेट भली-भाँति भरता रहेगा।
परन्तु यद्यपि महापौर और डियाबोलस में इस प्रकार अच्छा मेल हो गया था, तौभी वीर कप्तानों को इस प्रकार लौटा दिए जाने के कारण मनुष्यात्मा में विद्रोह भड़क उठा। क्योंकि जब बूढ़ा अविश्वास जो कुछ हुआ था उस पर अपने स्वामी को बधाई देने गढ़ में गया हुआ था, तब पुराना महापौर, जो डियाबोलस के नगर में आने से पहले महापौर था, अर्थात् लॉर्ड समझ, और पुराना अभिलेखक, श्रीमान विवेक, कान-फाटक पर जो कुछ हुआ था उसका समाचार पाकर (क्योंकि आपको जानना चाहिए कि उन्हें उस वाद-विवाद में उपस्थित रहने नहीं दिया गया था, कहीं ऐसा न हो कि वे कप्तानों के पक्ष में विद्रोह कर बैठें; परन्तु, मैं कहता हूँ, जो कुछ वहाँ हुआ था उसका समाचार उन्हें मिल गया, और वे उससे बहुत चिन्तित हुए), नगर के कुछ लोगों को इकट्ठा करके उनके मन में यह बात बैठाने लगे कि महान कप्तानों की माँगें कितनी उचित हैं, और बूढ़े अविश्वास, अर्थात् महापौर, के भाषण से कैसे बुरे परिणाम निकलेंगे; अर्थात् उसने उसमें कप्तानों का और उनके राजा का भी कितना कम आदर किया; और कैसे उसने परोक्ष रूप से उन पर बेईमानी और विश्वासघात का दोष लगाया। उन्होंने कहा, ‘क्योंकि उसके शब्दों का इससे कम और क्या अर्थ निकाला जा सकता है, जब उसने कहा कि वह उनके प्रस्ताव को नहीं मानेगा; और इसके अतिरिक्त यह कल्पना भी जोड़ दी कि वह हमें नष्ट कर देगा, जबकि उसने पहले ही हमें कहला भेजा था कि वह हम पर दया करेगा!’ भीड़ के मन में अब यह निश्चय बैठ गया कि बूढ़े अविश्वास ने कैसी बुराई की है, और वे मनुष्यात्मा की सड़कों के हर स्थान और हर कोने में टोलियाँ बनाकर इकट्ठे होने लगे; पहले वे बुड़बुड़ाने लगे, फिर खुलकर बातें करने लगे, और उसके बाद इधर-उधर दौड़ने लगे और दौड़ते-दौड़ते चिल्लाने लगे, ‘अहा, शद्दै के वीर कप्तान! भला होता कि हम उन कप्तानों के, और उनके राजा शद्दै के शासन के अधीन होते!’ जब महापौर को समाचार मिला कि मनुष्यात्मा में हुल्लड़ मचा है, तो वह लोगों को शान्त करने नीचे उतर आया, और उसने सोचा कि अपने चेहरे के रोब और दिखावे से वह उनके आवेश को दबा देगा; परन्तु जब उन्होंने उसे देखा, तो वे उस पर टूट पड़े, और यदि वह भागकर एक घर में न घुस जाता तो निःसन्देह वे उसकी कुछ हानि कर देते। तौभी जिस घर में वह था उस पर उन्होंने ज़ोर से धावा बोला, कि उसे उसके सिर पर ढा दें; परन्तु वह स्थान बहुत दृढ़ था, इसलिए वे उसमें सफल न हुए। तब उसने कुछ साहस बटोरकर एक खिड़की से लोगों को इस प्रकार सम्बोधित किया:
‘सज्जनो, आज यहाँ ऐसा हुल्लड़ किस कारण मचा है?’
तब लॉर्ड समझ ने उत्तर दिया, ‘इसका कारण यही है कि तूने और तेरे स्वामी ने शद्दै के कप्तानों के साथ ठीक और उचित व्यवहार नहीं किया; क्योंकि तीन बातों में तुम दोषी हो। पहली, इस बात में कि तुमने श्रीमान विवेक को और मुझे अपनी बातचीत सुनने के लिए उपस्थित नहीं होने दिया। दूसरी, इस बात में कि तुमने कप्तानों के सामने मेल की ऐसी शर्तें रखीं जो किसी भी प्रकार मानी नहीं जा सकती थीं, जब तक कि वे यह न चाहते कि उनका शद्दै केवल नाम मात्र का राजकुमार रहे, और मनुष्यात्मा को व्यवस्था के अनुसार अब भी यह अधिकार रहे कि वह उसके सामने सब प्रकार की लुचपन और व्यर्थता में जीवन बिताए, और इस प्रकार परिणामस्वरूप डियाबोलस ही यहाँ सामर्थ्य में राजा बना रहे, और वह दूसरा केवल नाम का राजा। तीसरी, इस कारण कि जब कप्तानों ने हमें दिखा दिया था कि वे किन शर्तों पर हमें दया में ग्रहण करेंगे, तो तूने स्वयं अपने बेस्वाद, बेमौके और भक्तिहीन भाषण से सब कुछ फिर से बिगाड़ दिया।’
जब बूढ़े अविश्वास ने यह भाषण सुना, तो वह चिल्ला उठा, ‘राजद्रोह! राजद्रोह! हथियार उठाओ! हथियार उठाओ! हे मनुष्यात्मा में रहनेवाले डियाबोलस के विश्वसनीय मित्रो!’
समझ—महोदय, आप मेरे शब्दों का जो चाहें अर्थ लगा लें; परन्तु मुझे निश्चय है कि उनके जैसे ऊँचे स्वामी के कप्तान आपके हाथों इससे अच्छे व्यवहार के योग्य थे।
तब बूढ़े अविश्वास ने कहा, ‘यह बात भी कुछ बहुत अच्छी नहीं। परन्तु, महोदय,’ उसने कहा, ‘जो मैंने कहा वह अपने राजकुमार के लिए, उसके शासन के लिए, और प्रजा को शान्त रखने के लिए कहा, जिसे आपने अपने अवैध कामों से आज हमारे विरुद्ध विद्रोह करने को उकसाया है।’
तब पुराने अभिलेखक ने, जिसका नाम श्रीमान विवेक था, उत्तर देकर कहा, ‘महोदय, लॉर्ड समझ ने जो कहा है, उसे आपको इस प्रकार उलटकर नहीं लौटाना चाहिए। यह स्पष्ट ही है कि उन्होंने सच कहा है, और कि आप मनुष्यात्मा के शत्रु हैं। इसलिए अपनी ढीठ और उद्दण्ड भाषा की बुराई को मान लीजिए, और उस दुःख को भी जो आपने कप्तानों को पहुँचाया है; हाँ, और उन हानियों को भी जो आपने इसके द्वारा मनुष्यात्मा को पहुँचाई हैं। यदि आपने शर्तें मान ली होतीं, तो मनुष्यात्मा नगर के चारों ओर तुरही का शब्द और युद्ध की ललकार अब तक थम गई होती; परन्तु वह भयानक शब्द बना हुआ है, और आपकी बातों में बुद्धि की कमी ही इसका कारण है।’
तब बूढ़े अविश्वास ने कहा, ‘महोदय, यदि मैं जीवित रहा, तो आपका सन्देश डियाबोलस तक पहुँचा दूँगा, और वहीं आपको अपनी बातों का उत्तर मिलेगा। इस बीच हम नगर की भलाई की चिन्ता करेंगे, और आपसे सम्मति नहीं माँगेंगे।’
समझ—महोदय, आपका राजकुमार और आप दोनों ही मनुष्यात्मा के लिए परदेशी हैं, इसके मूल निवासी नहीं; और कौन कह सकता है कि जब आप हमें और बड़े संकट में डाल देंगे (जब आप भी देखेंगे कि भाग जाने के सिवा और किसी उपाय से आप स्वयं सुरक्षित नहीं रह सकते), तो आप हमें छोड़कर अपनी-अपनी राह न लेंगे, या हमें आग लगाकर धुएँ में, या हमारे जलने के उजियाले में, चले न जाएँगे, और इस प्रकार हमें हमारे खण्डहरों में न छोड़ जाएँगे?
अविश्वास—महोदय, आप भूलते हैं कि आप एक शासक के अधीन हैं, और आपको एक प्रजा के समान आचरण करना चाहिए; और जान लीजिए, जब मेरे स्वामी राजा आज के इस काम के विषय में सुनेंगे, तो वे आपके परिश्रम के लिए आपको बहुत कम धन्यवाद देंगे।
अब जब ये सज्जन इस प्रकार एक-दूसरे को झिड़कियाँ दे रहे थे, तो नगर की दीवारों और फाटकों से लॉर्ड इच्छाप्रबल, श्रीमान पूर्वाग्रह, बूढ़ा कु-विराम, और नए बनाए गए कई नगर-पार्षद और नगर-प्रतिनिधि नीचे उतर आए, और उन्होंने इस शोर-शराबे और हंगामे का कारण पूछा; और इस पर हर एक मनुष्य अपनी-अपनी कहानी सुनाने लगा, यहाँ तक कि कुछ भी साफ़-साफ़ सुनाई न देता था। तब चुप रहने की आज्ञा दी गई, और बूढ़ी लोमड़ी अविश्वास बोलने लगा। उसने कहा, ‘लॉर्ड महोदय, यहाँ दो चिड़चिड़े सज्जन हैं, जिन्होंने अपने बुरे स्वभाव के फलस्वरूप, और, जैसा मुझे डर है, किसी श्रीमान असन्तोष की सलाह से, आज इस भीड़ को उपद्रव के साथ मेरे विरुद्ध इकट्ठा किया है, और नगर को हमारे राजकुमार के विरुद्ध विद्रोह के कामों में झोंकने का भी यत्न किया है।’
तब जितने डियाबोलोनी वहाँ उपस्थित थे, सब खड़े हो गए और पुष्टि की कि ये बातें सच हैं।
अब जो लोग लॉर्ड समझ और श्रीमान विवेक के पक्ष में थे, उन्होंने जब देखा कि उनकी हार होनेवाली है, क्योंकि बल और सामर्थ्य दूसरे पक्ष में था, तो वे उनकी सहायता और बचाव के लिए आ पहुँचे; सो दोनों ओर बड़ी भीड़ हो गई। तब अविश्वास के पक्षवाले चाहते थे कि उन दोनों बूढ़े सज्जनों को तुरन्त बन्दीगृह में डाल दिया जाए; परन्तु दूसरे पक्षवालों ने कहा कि ऐसा नहीं होगा। तब वे फिर से अपने-अपने दलों की जयजयकार करने लगे: डियाबोलोनी बूढ़े अविश्वास की, भलाई-भूल की, नए नगर-पार्षदों की, और अपने बड़े स्वामी डियाबोलस की जयजयकार करने लगे; और दूसरा दल उतनी ही तेज़ी से शद्दै की, कप्तानों की, उसकी व्यवस्थाओं की, और उनकी दयालुता की जयजयकार करता रहा, और उनकी शर्तों और रीतियों की प्रशंसा करता रहा। इस प्रकार कुछ समय तक कहा-सुनी चलती रही; अन्त में वे बातों से मारपीट पर उतर आए, और अब दोनों ओर से घूँसे चलने लगे। भले बूढ़े सज्जन श्रीमान विवेक को एक डियाबोलोनी ने, जिसका नाम श्रीमान सुन्न-करनेवाला था, दो बार मारकर गिरा दिया; और लॉर्ड समझ एक बन्दूक से मारे जाते-जाते बचे, क्योंकि जिसने गोली चलाई उसने ठीक निशाना नहीं साधा था। दूसरा पक्ष भी पूरी तरह बचा न रहा; क्योंकि एक श्रीमान उतावला-सिर, जो डियाबोलोनी था, उसका भेजा लॉर्ड इच्छाप्रबल के सेवक श्रीमान मन ने मार-मारकर बाहर निकाल दिया; और यह देखकर मुझे हँसी आई कि बूढ़े श्रीमान पूर्वाग्रह को कैसे लातें मारी गईं और कीचड़ में इधर-उधर लुढ़काया गया; क्योंकि यद्यपि कुछ ही समय पहले वह नगर की हानि और क्षति के लिए डियाबोलोनियों की एक टुकड़ी का कप्तान बनाया गया था, तौभी अब उन्होंने उसे अपने पैरों तले दबा लिया था, और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि ऊपर से लॉर्ड समझ के दल के कुछ लोगों ने उसकी खोपड़ी भी फोड़ दी। श्रीमान कुछ-भी भी इस झगड़े में बड़ा फुर्तीला बना; परन्तु दोनों पक्ष उसके विरुद्ध थे, क्योंकि वह किसी के प्रति सच्चा न था। तौभी उसकी ढिठाई के कारण उसकी एक टाँग तोड़ दी गई, और जिसने यह किया उसने चाहा कि काश उसकी गर्दन टूटी होती। दोनों ओर और भी बहुत हानि हुई, परन्तु यह बात भुलाई नहीं जानी चाहिए; उस समय यह देखकर आश्चर्य होता था कि लॉर्ड इच्छाप्रबल कितने उदासीन थे: वे किसी एक पक्ष की ओर दूसरे से अधिक झुकते दिखाई नहीं दिए, केवल यह देखा गया कि जब बूढ़ा पूर्वाग्रह कीचड़ में इधर-उधर लुढ़काया जा रहा था, तो वे मुस्कुराए। और जब कप्तान कुछ-भी लँगड़ाता हुआ उनके सामने आया, तो उन्होंने उसकी ओर बहुत कम ध्यान दिया।
अब जब हुल्लड़ समाप्त हो गया, तो डियाबोलस ने लॉर्ड समझ और श्रीमान विवेक को बुलवा भेजा, और मनुष्यात्मा में हुए इस अत्यन्त गम्भीर, उपद्रवी दंगे के मुखिया और संचालक ठहराकर उन दोनों को बन्दीगृह में डाल दिया। सो अब नगर फिर शान्त होने लगा, और बन्दियों के साथ कठोर व्यवहार किया गया; हाँ, उसने सोचा था कि उन्हें मरवा डाले, परन्तु उस समय की परिस्थिति इस काम के अनुकूल न थी, क्योंकि उनके सब फाटकों पर युद्ध छिड़ा हुआ था।
परन्तु आइए, हम फिर अपनी कहानी पर लौटें। कप्तान जब फाटक से लौटकर फिर छावनी में आए, तो उन्होंने युद्ध-परिषद् बुलाई, कि आगे उन्हें क्या करना चाहिए इस पर विचार करें। तब कुछ ने कहा, ‘आओ, हम तुरन्त चढ़ाई करें और नगर पर टूट पड़ें;’ परन्तु अधिकांश का विचार था कि उन्हें आत्मसमर्पण के लिए एक बार और बुलावा देना अधिक अच्छा होगा; और इसे सबसे अच्छा समझने का कारण यह था कि जहाँ तक दिखाई देता था, मनुष्यात्मा नगर अब पहले की अपेक्षा अधिक झुकाव रखता था। उन्होंने कहा, ‘और यदि, जब उनमें से कुछ का मन झुक रहा है, हम कठोरता से उन्हें अप्रसन्न कर दें, तो हम उन्हें अपने बुलावे को मानने से उससे भी अधिक दूर कर देंगे जितना हम चाहते हैं।’ इसलिए वे इस सम्मति पर सहमत हुए, और एक तुरही बजानेवाले को बुलाकर उसके मुँह में शब्द डाले, उसका समय ठहराया, और परमेश्वर से उसकी यात्रा की सफलता की कामना करके उसे विदा किया। अच्छा, अधिक घड़ियाँ बीतने भी न पाई थीं कि तुरही बजानेवाला अपनी यात्रा पर चल पड़ा। सो नगर की दीवार के पास पहुँचकर उसने अपना मार्ग कान-फाटक की ओर मोड़ा, और वहाँ जैसी उसे आज्ञा दी गई थी वैसे ही तुरही फूँकी। तब जो भीतर थे वे यह देखने बाहर आए कि क्या बात है, और तुरही बजानेवाले ने उनसे यह आगे दिया हुआ भाषण कहा:
‘हे कठोर-हृदय और दयनीय मनुष्यात्मा नगर, तू कब तक अपने पापमय, पापमय भोलेपन से प्रीति रखेगा, और हे मूर्खो, तुम कब तक अपने ठट्ठे से प्रसन्न रहोगे? क्या तुम अब भी मेल और छुटकारे के प्रस्तावों को तुच्छ जानते हो? क्या तुम अब भी शद्दै के सुनहरे प्रस्तावों को ठुकराओगे, और डियाबोलस के झूठ और छल पर भरोसा रखोगे? क्या तुम सोचते हो कि जब शद्दै तुम्हें जीत लेगा, तब उसके प्रति तुम्हारे इस आचरण का स्मरण तुम्हें शान्ति और सान्त्वना देगा, या कि अकड़ भरी भाषा से तुम उसे टिड्डे के समान डरा सकते हो? क्या वह तुमसे डरकर तुमसे विनती करता है? क्या तुम सोचते हो कि तुम उससे अधिक बलवान हो? आकाश की ओर दृष्टि करो, और तारों को देखो और विचार करो, वे कितने ऊँचे हैं? क्या तुम सूर्य को उसकी दौड़ पूरी करने से रोक सकते हो, और चन्द्रमा को उसका प्रकाश देने से बाधित कर सकते हो? क्या तुम तारों की गिनती कर सकते हो, या आकाश के कुप्पों को रोक सकते हो? क्या तुम समुद्र के जल को बुलाकर भूमि के ऊपर फैला सकते हो? क्या तुम एक-एक घमण्डी को देखकर उसे नीचा कर सकते हो, और उनके मुँह गुप्त स्थान में बाँध सकते हो? तौभी ये हमारे राजा के कामों में से कुछ ही काम हैं, जिसके नाम से आज हम तुम्हारे पास चढ़ आए हैं, कि तुम उसके अधिकार के अधीन लाए जाओ। इसलिए उसी के नाम से मैं तुम्हें फिर बुलावा देता हूँ कि तुम अपने आप को उसके कप्तानों के हाथ सौंप दो।’
इस बुलावे पर मनुष्यात्मा-वासी असमंजस में पड़ गए, और न जानते थे कि क्या उत्तर दें। इसलिए डियाबोलस तुरन्त प्रकट हुआ, और स्वयं उत्तर देने का भार अपने ऊपर लिया; और वह इस प्रकार आरम्भ करता है, परन्तु अपनी बात मनुष्यात्मा के लोगों की ओर मोड़ देता है।
उसने कहा, ‘सज्जनो, और मेरी विश्वासयोग्य प्रजा, यदि यह सच है जो इस बुलावा देनेवाले ने उनके राजा की महानता के विषय में कहा है, तो उसके भय से तुम सदा दासत्व में रखे जाओगे, और इस प्रकार तुम्हें दुबककर रहना पड़ेगा। हाँ, जबकि वह अभी दूर है, तब भी तुम ऐसे पराक्रमी के विषय में सोचना भी कैसे सह सकते हो? और यदि दूर रहते हुए उसके विषय में सोचना भी नहीं सह सकते, तो उसकी उपस्थिति में रहना कैसे सह सकोगे? मैं, तुम्हारा राजकुमार, तुमसे घुला-मिला हूँ, और तुम मेरे साथ वैसे ही खेल सकते हो जैसे किसी टिड्डे के साथ। इसलिए सोचो कि तुम्हारे लाभ की बात क्या है, और उन छूटों और विशेषाधिकारों को स्मरण रखो जो मैंने तुम्हें दिए हैं।
‘फिर, यदि वह सब सच है जो इस मनुष्य ने कहा है, तो ऐसा क्यों है कि शद्दै की प्रजा जहाँ-जहाँ जाती है, वहाँ-वहाँ ऐसी दासता में पड़ी रहती है? विश्व में उनके समान अभागा कोई नहीं, उनके समान पैरों तले रौंदा हुआ कोई नहीं।
‘सोच, मेरे मनुष्यात्मा: भला होता कि तू मुझे छोड़ने में उतना ही अनिच्छुक होता जितना मैं तुझे छोड़ने में अनिच्छुक हूँ। परन्तु मैं कहता हूँ, सोच, गेंद अभी तेरे ही पैरों के पास है; स्वतन्त्रता तुम्हारे पास है, यदि तुम उसका उपयोग करना जानो; हाँ, राजा भी तुम्हारे पास है, यदि तुम उससे प्रेम करना और उसकी आज्ञा मानना जानो।’
इस भाषण पर मनुष्यात्मा नगर ने शद्दै के कप्तानों के विरुद्ध अपने हृदय फिर और भी अधिक कठोर कर लिए। उसकी महानता के विचार ने उन्हें पूरी तरह कुचल दिया, और उसकी पवित्रता के विचार ने उन्हें निराशा में डुबो दिया। इसलिए थोड़ी-सी सलाह के बाद उन्होंने (वे डियाबोलोनी दल के थे) तुरही बजानेवाले के हाथ यह उत्तर लौटा भेजा, कि जहाँ तक उनकी बात है, उन्होंने ठान लिया है कि वे अपने राजा से लगे रहेंगे, परन्तु शद्दै के आगे कभी हथियार न डालेंगे; इसलिए उन्हें और बुलावा देना व्यर्थ है, क्योंकि वे हार मानने के बदले उसी स्थान पर मर जाना अधिक पसन्द करेंगे। और अब ऐसा लगता था कि बातें पूरी तरह उलटी दिशा में चली गई हैं, और मनुष्यात्मा पहुँच और पुकार से बाहर हो गया है, तौभी वे कप्तान, जो जानते थे कि उनका प्रभु क्या कर सकता है, अभी हिम्मत हारनेवाले न थे; इसलिए उन्होंने उन्हें एक और बुलावा भेजा, जो पिछले से अधिक तीखा और कठोर था; परन्तु जितनी अधिक बार उनके पास शद्दै से मेल करने के लिए सन्देश भेजा गया, उतना ही वे दूर होते गए। ‘जितना वे उनको बुलाते थे, उतना ही वे उनसे दूर भागे जाते थे—हाँ, यद्यपि वे उनको परमप्रधान की ओर बुलाते थे।’
सो उन्होंने उस रीति से उनके साथ व्यवहार करना छोड़ दिया, और किसी दूसरे उपाय के विषय में सोचने लगे। इसलिए कप्तान आपस में खुलकर परामर्श करने के लिए इकट्ठे हुए, कि जानें कि नगर को जीतने और उसे डियाबोलस के अत्याचार से छुड़ाने के लिए अब और क्या किया जाए; और एक ने इस प्रकार कहा, और दूसरे ने उस प्रकार। तब परम आदरणीय कप्तान दोष-बोध खड़ा हुआ और बोला, ‘मेरे भाइयो, मेरी राय यह है:
‘पहली, कि हम लगातार नगर पर अपने गोफन चलाते रहें, और उसे निरन्तर आतंक में रखें, और दिन-रात उन्हें सताते रहें। ऐसा करके हम उनकी उच्छृंखल आत्मा की बढ़त को रोक देंगे; क्योंकि लगातार सताए जाने से सिंह भी वश में किया जा सकता है।
‘दूसरी, यह हो जाने पर मेरी सलाह है कि इसके बाद हम सब एक मन होकर अपने प्रभु शद्दै के पास एक विनती-पत्र तैयार करें, जिसमें अपने राजा को मनुष्यात्मा की और यहाँ के मामलों की दशा बताकर, और इससे अधिक सफलता न पाने के लिए उससे क्षमा माँगकर, हम महामहिम से सहायता के लिए हृदय से विनती करें, और यह कि वह कृपा करके हमारे पास और अधिक सेना और सामर्थ्य भेजे, और उनकी अगुवाई के लिए कोई वीर और सुवक्ता सेनापति भेजे, ताकि महामहिम अपनी इस अच्छी शुरुआत का लाभ न खोएँ, वरन् मनुष्यात्मा नगर पर अपनी विजय पूरी करें।’
महान कप्तान दोष-बोध के इस भाषण पर वे सब एक मन से सहमत हुए, और यह ठहराया कि तुरन्त एक विनती-पत्र तैयार किया जाए, और किसी योग्य व्यक्ति के हाथ शीघ्रता से शद्दै के पास भेजा जाए। विनती-पत्र की बातें ये थीं:—
‘हे परम अनुग्रहकारी और महिमामय राजा, सर्वोत्तम संसार के प्रभु, और मनुष्यात्मा नगर के बनानेवाले, हे भययोग्य महाराज, हमने तेरी आज्ञा पर अपने प्राण जोखिम में डाले हैं, और तेरे कहने पर प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर से युद्ध छेड़ा है। जब हम उस पर चढ़ाई करने गए, तो हमने अपने आदेश-पत्र के अनुसार पहले उसके सामने मेल की शर्तें रखीं। परन्तु हे महान राजा, उन्होंने हमारी सम्मति को तुच्छ जाना, और हमारी ताड़ना को न माना। वे अपने फाटक बन्द करने और हमें नगर से बाहर रखने पर तुले रहे। उन्होंने अपनी तोपें भी चढ़ाईं, हम पर धावा बोलकर बाहर निकले, और जितनी हानि वे कर सके हमारी की; परन्तु हमने उनका पीछा आतंक पर आतंक से किया, और उन्हें उचित बदला दिया, और नगर पर कुछ चोट भी पहुँचाई है।
‘डियाबोलस, अविश्वास और इच्छाप्रबल हमारे विरुद्ध काम करनेवाले मुख्य लोग हैं: अब हम अपनी शीतकालीन छावनी में हैं, परन्तु ऐसे कि अब भी हम बड़े बल के साथ नगर को सताते और संकट में डालते रहते हैं।
‘हमारी समझ में, यदि नगर में हमारा एक भी ठोस मित्र होता, ऐसा जो हमारे बुलावे के शब्द का जैसा चाहिए वैसा समर्थन करता, तो एक बार लोग आत्मसमर्पण कर देते; परन्तु वहाँ शत्रुओं के सिवा कोई न था, और न कोई ऐसा था जो नगर के सामने हमारे प्रभु के पक्ष में बोलता। इसलिए, यद्यपि जो कुछ हम कर सकते थे हमने किया, तौभी मनुष्यात्मा तेरे विरुद्ध विद्रोह की दशा में बना हुआ है।
‘अब, हे राजाओं के राजा, तुझे यह भाए कि अपने सेवकों की असफलता को क्षमा करे, जो मनुष्यात्मा को जीतने जैसे इतने वांछनीय काम में इससे अधिक लाभ न पहुँचा सके। और हे प्रभु, जैसी हम अब अभिलाषा करते हैं, मनुष्यात्मा के विरुद्ध और सेनाएँ भेज, कि वह वश में किया जाए; और उनकी अगुवाई के लिए एक ऐसा पुरुष भेज, जिससे नगर प्रेम भी करे और डरे भी।
‘हम यह इसलिए नहीं कहते कि हम युद्ध छोड़ देना चाहते हैं (क्योंकि हम तो इस स्थान के विरुद्ध अपनी हड्डियाँ तक बिछा देने को तैयार हैं), वरन् इसलिए कि मनुष्यात्मा नगर महामहिम के लिए जीता जाए। हम महामहिम से यह भी विनती करते हैं कि इस काम में शीघ्रता की जाए, ताकि उन्हें जीत लेने के बाद हम तेरे अन्य अनुग्रहपूर्ण कामों पर भेजे जाने के लिए स्वतन्त्र हो जाएँ। आमीन।’
इस प्रकार तैयार किया गया विनती-पत्र उस भले मनुष्य, श्रीमान मनुष्यात्मा-प्रेमी, के हाथ शीघ्रता से राजा के पास भेजा गया।
जब यह विनती-पत्र राजा के महल में पहुँचा, तो यह राजा के पुत्र के सिवा और किसके हाथ सौंपा जाता? सो उसने उसे लेकर पढ़ा, और क्योंकि उसकी बातें उसे बहुत अच्छी लगीं, उसने स्वयं उसमें सुधार किया और कुछ बातों में उसमें कुछ जोड़ा भी। सो जब उसने अपने ही हाथ से जैसे उचित समझा वैसे सुधार और वृद्धि कर दी, तो वह उसे राजा के पास भीतर ले गया; और जब उसने दण्डवत् करके उसे उसे सौंप दिया, तो उसने अधिकार धारण किया और स्वयं उसके पक्ष में बोला।
अब राजा विनती-पत्र को देखकर प्रसन्न हुआ; परन्तु आप सोचिए, जब उसके पुत्र ने उसका समर्थन किया तो वह और कितना अधिक प्रसन्न हुआ होगा! उसे यह सुनकर भी प्रसन्नता हुई कि उसके जो सेवक मनुष्यात्मा के विरुद्ध डेरा डाले पड़े थे, वे इस काम में कितने मन से लगे हुए थे, और अपने संकल्पों में कितने दृढ़ थे, और कि उन्होंने प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर पर कुछ बढ़त भी पा ली थी।
इसलिए राजा ने अपने पुत्र इम्मानुएल को अपने पास बुलाया, जिसने कहा, ‘हे मेरे पिता, मैं यहाँ हूँ।’ तब राजा ने कहा, ‘जैसे मैं स्वयं जानता हूँ, वैसे ही तू भी मनुष्यात्मा नगर की दशा को जानता है, और यह भी कि हमने क्या ठाना है, और तूने उसे छुड़ाने के लिए क्या किया है। इसलिए अब आ, मेरे पुत्र, और युद्ध के लिए अपने आप को तैयार कर, क्योंकि तू मनुष्यात्मा के पास मेरी छावनी में जाएगा। वहाँ तू सफल भी होगा और प्रबल भी होगा, और मनुष्यात्मा नगर को जीत लेगा।’
तब राजा के पुत्र ने कहा, ‘तेरी व्यवस्था मेरे अन्तःकरण में बसी है: मैं तेरी इच्छा पूरी करने से प्रसन्न हूँ। यही वह दिन है जिसकी मैं लालसा करता रहा हूँ, और यही वह काम है जिसकी बाट मैं इतने समय से जोहता रहा हूँ। इसलिए जितनी सेना तू अपनी बुद्धि में उचित समझे, मुझे दे; और मैं जाकर तेरे नाश होते हुए मनुष्यात्मा नगर को डियाबोलस से और उसकी शक्ति से छुड़ाऊँगा। दुखी मनुष्यात्मा नगर के कारण मेरा हृदय भीतर ही भीतर बहुत बार पीड़ित हुआ है; परन्तु अब वह आनन्दित है, अब वह प्रसन्न है।’
और इसके साथ ही वह आनन्द के मारे पहाड़ों पर से कूदता-फाँदता हुआ बोला, ‘मैंने अपने मन में मनुष्यात्मा के लिए किसी वस्तु को अधिक मूल्यवान नहीं समझा: हे मेरे मनुष्यात्मा, तेरे लिए पलटा लेने का दिन मेरे मन में है: और मैं आनन्दित हूँ कि हे मेरे पिता, तूने मुझे उनके उद्धार का कप्तान ठहराया है। और अब मैं उन सब पर विपत्ति डालना आरम्भ करूँगा जो मेरे मनुष्यात्मा नगर के लिए विपत्ति बने हुए हैं, और उसे उनके हाथ से छुड़ाऊँगा।’
जब राजा के पुत्र ने अपने पिता से यह कहा, तो यह बात तुरन्त बिजली के समान दरबार में चारों ओर फैल गई; हाँ, वहाँ केवल यही चर्चा होने लगी कि इम्मानुएल प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर के लिए क्या करने जा रहा है। परन्तु आप सोच भी नहीं सकते कि दरबारी भी राजकुमार की इस योजना से कितने मोहित हो गए; हाँ, वे इस काम से और इस युद्ध के न्यायसंगत होने से इतने प्रभावित हुए, कि राज्य के सबसे ऊँचे लॉर्ड और सबसे बड़े सामन्त भी यह लालसा करने लगे कि उन्हें इम्मानुएल के अधीन पद मिलें, ताकि वे दुखी मनुष्यात्मा नगर को फिर से शद्दै के लिए प्राप्त करने में सहायता करने जाएँ।
तब यह ठहराया गया कि कुछ लोग जाकर छावनी में यह समाचार पहुँचाएँ कि इम्मानुएल मनुष्यात्मा को फिर से प्राप्त करने आनेवाला है, और कि वह अपने साथ ऐसी पराक्रमी, ऐसी अजेय सेना लाएगा कि उसका सामना कोई न कर सकेगा। परन्तु, अहा! दरबार के ऊँचे लोग मनुष्यात्मा के पास की छावनी तक यह समाचार पहुँचाने के लिए सेवकों के समान दौड़ने को कितने तत्पर थे! अब जब कप्तानों ने जाना कि राजा अपने पुत्र इम्मानुएल को भेजेगा, और कि पुत्र को भी अपने पिता महान शद्दै के द्वारा इस काम पर भेजे जाने में आनन्द है, तो उन्होंने भी यह दिखाने के लिए कि उसके आने के विचार से वे कितने प्रसन्न हैं, ऐसा जयजयकार किया कि उसके शब्द से पृथ्वी फट गई। हाँ, पहाड़ों ने प्रतिध्वनि के द्वारा फिर उत्तर दिया, और स्वयं डियाबोलस डगमगा गया और काँप उठा।
क्योंकि आपको जानना चाहिए कि यद्यपि मनुष्यात्मा नगर को स्वयं इस योजना की कुछ अधिक, या कुछ भी, चिन्ता न थी (क्योंकि, हाय उन पर! वे बुरी तरह मतवाले और मूढ़ बने हुए थे, क्योंकि वे मुख्यतः अपने सुख-विलास और अपनी अभिलाषाओं ही का ध्यान रखते थे), तौभी उनके शासक डियाबोलस को चिन्ता थी; क्योंकि उसके भेदिये लगातार बाहर घूमते रहते थे, जो उसे सब बातों का समाचार लाते थे, और उन्होंने उसे बताया कि दरबार में उसके विरुद्ध क्या हो रहा है, और कि इम्मानुएल शीघ्र ही निश्चय एक सेना लेकर उस पर चढ़ाई करने आएगा। दरबार में कोई भी मनुष्य, और राज्य का कोई भी सामन्त ऐसा न था, जिससे डियाबोलस उतना डरता जितना वह इस राजकुमार से डरता था; क्योंकि, यदि आपको स्मरण हो, मैं आपको पहले दिखा चुका हूँ कि डियाबोलस उसके हाथ का भार पहले ही सह चुका था; इसलिए, क्योंकि आनेवाला वही था, इस बात ने उसे और भी अधिक भयभीत कर दिया।
अच्छा, आप देखते हैं कि मैं आपको बता चुका हूँ कि राजा का पुत्र मनुष्यात्मा को बचाने के लिए दरबार से आने को वचनबद्ध हुआ था, और उसके पिता ने उसे सेनाओं का कप्तान ठहराया था। सो जब उसके प्रस्थान का समय आ पहुँचा, तो उसने कूच की तैयारी की, और अपनी सेना के रूप में पाँच महान कप्तानों को उनकी सेनाओं समेत अपने साथ लिया।
1. पहला वह प्रसिद्ध कप्तान था, महान कप्तान विश्वास। उसका झण्डा लाल रंग का था, और श्रीमान प्रतिज्ञा उसे उठाए हुए थे; और उसकी ढाल के चिह्न पर पवित्र मेम्ना और सोने की ढाल अंकित थी; और उसके पीछे दस हज़ार पुरुष चलते थे।
2. दूसरा वह प्रसिद्ध कप्तान था, कप्तान शुभ-आशा। उसका झण्डा नीले रंग का था; उसका झण्डा-वाहक श्रीमान प्रत्याशा था, और उसकी ढाल के चिह्न पर तीन सुनहरे लंगर अंकित थे; और उसके पीछे दस हज़ार पुरुष चलते थे।
3. तीसरा वह वीर कप्तान था, कप्तान प्रेम। उसका झण्डा-वाहक श्रीमान करुणामय था: उसका झण्डा हरे रंग का था, और उसकी ढाल के चिह्न पर तीन नंगे अनाथ बच्चे अंकित थे जिन्हें छाती से लगाकर गले लगाया गया था; और उसके पीछे दस हज़ार पुरुष चलते थे।
4. चौथा वह शूरवीर सेनापति था, कप्तान निर्दोष। उसका झण्डा-वाहक श्रीमान हानिरहित था: उसका झण्डा सफ़ेद रंग का था, और उसकी ढाल के चिह्न पर तीन सुनहरे कबूतर अंकित थे।
5. पाँचवाँ वह सच्चा स्वामिभक्त और अति प्रिय कप्तान था, कप्तान धीरज। उसका झण्डा-वाहक श्रीमान दीर्घ-सहनशील था: उसका झण्डा काले रंग का था, और उसकी ढाल के चिह्न पर सुनहरे हृदय को बेधते हुए तीन तीर अंकित थे।
ये थे इम्मानुएल के कप्तान; ये उनके झण्डा-वाहक, उनके झण्डे और उनकी ढालों के चिह्न; और ये वे पुरुष जो उनकी आज्ञा के अधीन थे। सो, जैसा कहा गया, वीर राजकुमार ने मनुष्यात्मा नगर की ओर कूच किया। कप्तान विश्वास आगे-आगे अगुवाई कर रहा था, और कप्तान धीरज सबसे पीछे की टुकड़ी सँभाले हुए था; सो बाकी तीन अपने पुरुषों के साथ मुख्य सेना बनाए हुए थे, और स्वयं राजकुमार अपने रथ पर सवार होकर उनके आगे-आगे चल रहा था।
परन्तु जब वे कूच करने निकले, तो अहा, कैसे तुरहियाँ बजीं, उनके कवच जगमगाए, और कैसे उनके झण्डे हवा में लहराए! राजकुमार का कवच पूरा सोने का था, और वह आकाशमण्डल में सूर्य के समान चमकता था; कप्तानों के कवच परखे हुए और अभेद्य थे, और देखने में जगमगाते तारों के समान थे। दरबार से भी कुछ लोग बिना किसी पद के स्वयंसेवक होकर साथ चले, क्योंकि वे राजा शद्दै से प्रेम रखते थे, और मनुष्यात्मा नगर का सुखद छुटकारा चाहते थे।
इम्मानुएल जब इस प्रकार मनुष्यात्मा नगर को फिर से प्राप्त करने आगे बढ़ा, तो उसने अपने पिता की आज्ञा से अपने साथ चौवन युद्ध-मेढ़े (दीवार तोड़ने के यन्त्र), और पत्थर घुमाकर फेंकने के लिए बारह गोफन लिए। इनमें से हर एक शुद्ध सोने का बना था, और मनुष्यात्मा की ओर जाते हुए सारे मार्ग में वे इन्हें अपनी सेना के बीचों-बीच और मुख्य भाग में लिए चलते रहे।
सो वे कूच करते-करते नगर से एक कोस से भी कम दूरी पर आ पहुँचे; वहाँ वे तब तक ठहरे रहे जब तक पहले चारों कप्तान वहाँ आकर उन्हें सब बातों की जानकारी न दे गए। तब वे मनुष्यात्मा नगर की ओर चल पड़े, और मनुष्यात्मा तक आ पहुँचे; परन्तु जब छावनी के पुराने सैनिकों ने देखा कि उनके साथ मिलने के लिए नई सेनाएँ आई हैं, तो उन्होंने मनुष्यात्मा नगर की दीवारों के सामने फिर ऐसा जयजयकार किया कि डियाबोलस फिर से भयभीत हो गया। सो उन्होंने नगर के सामने डेरा डाला, परन्तु अब वैसे नहीं जैसे पहले चार कप्तानों ने डाला था, अर्थात् केवल मनुष्यात्मा के फाटकों के सामने; वरन् उन्होंने उसे हर ओर से घेर लिया, और आगे-पीछे से उसे आ घेरा; यहाँ तक कि अब मनुष्यात्मा जिधर भी देखता, उसे अपने विरुद्ध घेरा डाले हुए बल और सामर्थ्य ही दिखाई देता। इसके अतिरिक्त, उसके विरुद्ध मोर्चे के टीले भी खड़े किए गए। एक ओर अनुग्रह-पर्वत था, और दूसरी ओर न्याय-पर्वत। फिर कई छोटे-छोटे टीले और आगे बढ़े हुए मोर्चे थे, जैसे स्पष्ट-सत्य पहाड़ी और निष्पाप टीले, जहाँ नगर के विरुद्ध बहुत-से गोफन लगाए गए थे। अनुग्रह-पर्वत पर चार गोफन लगाए गए, और न्याय-पर्वत पर भी उतने ही लगाए गए, और बाकी नगर के चारों ओर कई भागों में सुविधा के अनुसार लगाए गए। सबसे अच्छे पाँच युद्ध-मेढ़े, अर्थात् उनमें से सबसे बड़े, श्रवण पर्वत पर रखे गए, जो कान-फाटक के पास ही खड़ा किया गया एक टीला था, इस अभिप्राय से कि उस फाटक को तोड़कर खोल दिया जाए।
अब जब नगर के लोगों ने उस स्थान के विरुद्ध चढ़ आए सैनिकों की भीड़ को, और युद्ध-मेढ़ों और गोफनों को, और उन टीलों को जिन पर वे लगाए गए थे, और साथ ही कवचों की जगमगाहट और उनके झण्डों का लहराना देखा, तो उन्हें विवश होकर अपने विचार बदलने पड़े, और बदलने पड़े, और फिर बदलने पड़े; परन्तु वे शायद ही कभी अधिक साहसी विचारों की ओर बदले, वरन् अधिक दुर्बल विचारों की ओर; क्योंकि यद्यपि पहले वे अपने आप को पर्याप्त सुरक्षित समझते थे, तौभी अब वे सोचने लगे कि कोई नहीं जानता कि उनका क्या हाल और क्या भाग्य होगा।
जब भले राजकुमार इम्मानुएल ने इस प्रकार मनुष्यात्मा को घेर लिया, तो सबसे पहले उसने सफ़ेद झण्डा फहराया, जिसे उसने अनुग्रह-पर्वत पर लगे सुनहरे गोफनों के बीच खड़ा करवाया। और यह उसने दो कारणों से किया: 1. मनुष्यात्मा को यह सूचना देने के लिए कि यदि वे उसकी ओर फिरें, तो वह अब भी अनुग्रह कर सकता है और करेगा। 2. और इसलिए कि यदि वे अपने विद्रोह में बने रहें और वह उन्हें नष्ट करे, तो वह उन्हें और भी निरुत्तर छोड़ दे।
सो तीन सुनहरे कबूतरों वाला वह सफ़ेद झण्डा लगातार दो दिन तक फहराया गया, ताकि उन्हें विचार करने का समय और अवसर मिले; परन्तु उन्होंने, जैसा पहले संकेत किया गया था, मानो उन्हें कोई चिन्ता ही न हो, राजकुमार के उस कृपापूर्ण संकेत का कोई उत्तर न दिया।
तब उसने आज्ञा दी, और उन्होंने लाल झण्डा उस पर्वत पर लगाया जो न्याय-पर्वत कहलाता था। यह कप्तान न्याय का लाल झण्डा था, जिसकी ढाल का चिह्न धधकता हुआ आग का भट्ठा था; और यह भी कई दिनों तक लगातार उनके सामने हवा में लहराता रहा। परन्तु देखिए, जैसा आचरण उन्होंने सफ़ेद झण्डे के नीचे किया था जब वह फहराया गया था, वैसा ही उन्होंने तब भी किया जब लाल झण्डा फहराया गया; तौभी उसने उनसे कोई लाभ नहीं उठाया।
तब उसने फिर आज्ञा दी कि उसके सेवक उनके विरुद्ध ललकार का काला झण्डा फहराएँ, जिसकी ढाल का चिह्न तीन जलते हुए वज्र थे; परन्तु मनुष्यात्मा इससे भी उतना ही बेपरवाह रहा जितना पहलेवालों से। परन्तु जब राजकुमार ने देखा कि न दया, न न्याय, न न्याय का दण्ड मनुष्यात्मा के हृदय तक पहुँचेगा या पहुँच सकता है, तो वह बहुत करुणा से भर गया, और बोला, ‘निश्चय मनुष्यात्मा नगर का यह विचित्र आचरण हमारे प्रति किसी गुप्त ललकार और अपने ही प्राणों से घृणा के कारण नहीं, वरन् युद्ध की रीति और युद्ध-कौशल के अज्ञान के कारण है; या यदि वे अपने ही युद्ध की रीति जानते भी हों, तौभी उन युद्धों की विधियाँ और रीतियाँ नहीं जानते जिनमें हम लगे हैं, जब मैं अपने शत्रु डियाबोलस से युद्ध करता हूँ।’
इसलिए उसने मनुष्यात्मा नगर के पास सन्देश भेजा, कि उन्हें बताए कि झण्डे के उन चिह्नों और रीतियों से उसका क्या अभिप्राय था; और उनसे यह भी जाने कि वे इन बातों में से किसको चुनेंगे, अनुग्रह और दया को, या न्याय और न्याय के दण्ड को। इस पूरे समय वे अपने फाटकों को तालों, चिटकनियों और बेंड़ों से जितना कसकर हो सका बन्द किए रहे। उनके पहरे भी दुगने कर दिए गए, और उनकी चौकसी जितनी दृढ़ हो सकती थी उतनी दृढ़ कर दी गई। डियाबोलस ने भी जितना हो सका उतना साहस बटोरा, कि नगर को सामना करने के लिए उत्साहित करे।
नगरवासियों ने भी राजकुमार के दूत को सार रूप में यह आगे दिया हुआ उत्तर दिया:—
‘महामहिम,—आपने अपने दूत के द्वारा जो हमें सूचित किया है, कि हम आपकी दया को ग्रहण करेंगे या आपके न्याय से गिरेंगे, उसके विषय में हम इस स्थान की व्यवस्था और रीति से बँधे हैं, और आपको कोई निश्चित उत्तर नहीं दे सकते; क्योंकि हमारे राजा के बिना मेल या युद्ध करना उसकी व्यवस्था, उसके शासन और उसके राजकीय विशेषाधिकार के विरुद्ध है। परन्तु हम यह करेंगे,—हम विनती करेंगे कि हमारा राजकुमार दीवार पर उतर आए, और वहाँ आपके साथ ऐसा व्यवहार करे जैसा वह हमारे लिए उचित और लाभदायक समझे।’
जब भले राजकुमार इम्मानुएल ने यह उत्तर सुना, और लोगों की दासता और बन्धन को देखा, और यह भी कि वे अत्याचारी डियाबोलस की ज़ंजीरों में पड़े रहने में कितने सन्तुष्ट थे, तो इससे उसके हृदय को बड़ा दुःख हुआ; और वास्तव में, जब कभी वह देखता कि कोई उस दैत्य की दासता में सन्तुष्ट है, तो वह इससे व्याकुल हो उठता था।
परन्तु फिर अपने विषय पर लौटें। जब नगर ने यह समाचार डियाबोलस तक पहुँचाया, और इसके अतिरिक्त उसे यह भी बताया कि राजकुमार, जो दीवार के बाहर घेरे में पड़ा है, उत्तर के लिए उनकी बाट जोह रहा है, तो उसने इनकार किया, और जितना हो सका शेखी बघारी; परन्तु मन ही मन वह डरा हुआ था।
तब उसने कहा, ‘मैं स्वयं फाटकों पर जाऊँगा, और उसे ऐसा उत्तर दूँगा जैसा मैं उचित समझूँगा।’ सो वह मुँह-फाटक पर गया, और वहाँ इम्मानुएल से बात करने लगा (परन्तु ऐसी भाषा में जिसे नगर न समझता था), और उसकी बातें ये थीं:—
‘हे महान इम्मानुएल, सारे संसार के प्रभु, मैं तुझे जानता हूँ कि तू महान शद्दै का पुत्र है! तू मुझे पीड़ा देने, और मुझे मेरे अधिकार से निकालने क्यों आया है? यह मनुष्यात्मा नगर, जैसा तू भली-भाँति जानता है, मेरा है, और वह भी दोहरे अधिकार से। 1. यह विजय के अधिकार से मेरा है; मैंने इसे खुले मैदान में जीता है; और क्या वीर के हाथ से शिकार छीना जा सकता है, या न्याय से बन्दी बनाया हुआ छुड़ाया जा सकता है? 2. यह मनुष्यात्मा नगर उनकी अधीनता के कारण भी मेरा है। उन्होंने अपने नगर के फाटक मेरे लिए खोले हैं; उन्होंने मेरे प्रति स्वामिभक्ति की शपथ खाई है, और खुलेआम मुझे अपना राजा चुना है; उन्होंने अपना गढ़ भी मेरे हाथ में सौंप दिया है; हाँ, उन्होंने मनुष्यात्मा का सारा बल मेरे अधीन कर दिया है।
‘इसके अतिरिक्त, इस मनुष्यात्मा नगर ने तुझे अस्वीकार कर दिया है, हाँ, उन्होंने तेरी व्यवस्था, तेरे नाम, तेरे स्वरूप, और जो कुछ तेरा है सब को अपनी पीठ पीछे फेंक दिया है, और उनके स्थान पर मेरी व्यवस्था, मेरे नाम, मेरे स्वरूप, और जो कुछ भी मेरा है सब को ग्रहण करके स्थापित किया है। नहीं तो अपने कप्तानों से पूछ ले, और वे तुझे बताएँगे कि मनुष्यात्मा ने उनके सब बुलावों के उत्तर में मेरे प्रति प्रेम और स्वामिभक्ति दिखाई है, परन्तु तेरे और तेरे लोगों के प्रति सदा तिरस्कार, द्वेष, अवहेलना और ठट्ठा ही दिखाया है। अब, तू तो धर्मी और पवित्र है, और तुझे कोई कुटिलता नहीं करनी चाहिए। इसलिए, मैं तुझसे विनती करता हूँ, मेरे पास से चला जा, और मुझे शान्ति से मेरी न्यायपूर्ण मीरास में रहने दे।’
यह भाषण स्वयं डियाबोलस की भाषा में दिया गया था; क्योंकि यद्यपि वह हर मनुष्य से उसकी अपनी भाषा में बोल सकता है (नहीं तो वह उन सब की वैसी परीक्षा न कर सकता जैसी वह करता है), तौभी उसकी एक भाषा उसकी अपनी है, और वह नरक की गुफा, या काले गड्ढे की भाषा है।
इसलिए मनुष्यात्मा नगर (बेचारे!) उसकी बात न समझ सका; और न उन्होंने यह देखा कि जब वह उनके राजकुमार इम्मानुएल के सामने खड़ा था, तब वह कैसे दुबकता और गिड़गिड़ाता था।
हाँ, इस पूरे समय वे उसे ऐसी शक्ति और बलवाला समझते रहे जिसका किसी भी प्रकार सामना नहीं किया जा सकता। इसलिए जब वह इस प्रकार विनती कर रहा था कि उसका निवास अब भी वहीं बना रहे, और कि इम्मानुएल उसे बलपूर्वक उससे न छीने, तब नगर के निवासी उसकी वीरता की डींग मार रहे थे, और कह रहे थे, ‘कौन उससे लड़ सकता है?’
अच्छा, जब यह दिखावटी राजा जो कुछ कहना था कह चुका, तो सुनहरा राजकुमार इम्मानुएल खड़ा हुआ और बोला; उसके शब्दों की बातें ये हैं:—
उसने कहा, ‘हे धोखा देनेवाले, मुझे अपने पिता के नाम से, अपने ही नाम से, और इस अभागे मनुष्यात्मा नगर की ओर से और उसकी भलाई के लिए तुझसे कुछ कहना है। तू दयनीय मनुष्यात्मा नगर पर अधिकार का, न्यायसंगत अधिकार का दावा करता है, जबकि मेरे पिता के सारे दरबार पर यह अत्यन्त स्पष्ट है कि मनुष्यात्मा के फाटकों के भीतर तूने जो प्रवेश पाया, वह तेरे झूठ और छल के द्वारा था; तूने मेरे पिता के विषय में झूठ बोला, तूने उसकी व्यवस्था के विषय में झूठ बोला, और इस प्रकार मनुष्यात्मा के लोगों को धोखा दिया। तू दावा करता है कि लोगों ने तुझे अपना राजा, अपना कप्तान और अपना सच्चा अधिपति स्वीकार किया है; परन्तु वह भी धोखे और छल-कपट के द्वारा ही हुआ। अब, यदि झूठ, धूर्तता, पापमय चतुराई और सब प्रकार का घिनौना कपट मेरे पिता के दरबार में (जिस दरबार में तेरा न्याय होना है) न्याय और धर्म माना जाएगा, तो मैं तेरे सामने मान लूँगा कि तूने न्यायसंगत विजय पाई है। परन्तु, हाय! ऐसा कौन चोर, कौन अत्याचारी, कौन शैतान है जो इस रीति से विजय न पा सके? परन्तु हे डियाबोलस, मैं यह प्रमाणित कर सकता हूँ कि मनुष्यात्मा को जीतने के अपने सब दावों में तेरे पास कहने को सत्य की कोई बात नहीं। क्या तू इसे उचित समझता है कि तूने मेरे पिता पर झूठ का दोष मढ़ा, और उसे (मनुष्यात्मा की दृष्टि में) संसार का सबसे बड़ा धोखा देनेवाला बना दिया? और व्यवस्था के सच्चे आशय और अभिप्राय को जान-बूझकर बिगाड़ने के विषय में तू क्या कहता है? क्या यह भी अच्छा था कि तूने अब दुखी हो चुके मनुष्यात्मा नगर की निर्दोषता और भोलेपन को अपना शिकार बनाया? हाँ, तूने मनुष्यात्मा को यह प्रतिज्ञा देकर जीता कि मेरे पिता की व्यवस्था के विरुद्ध अपराध करने में उन्हें सुख मिलेगा, जबकि तू जानता था, और यदि तूने केवल अपने ही अनुभव से सलाह ली होती तो जाने बिना नहीं रह सकता था, कि वही उनके विनाश का मार्ग था। हे बैर और द्वेष के स्वामी, तूने स्वयं मनुष्यात्मा में मेरे पिता के स्वरूप को बिगाड़ दिया है, और उसके स्थान पर अपना स्वरूप स्थापित किया है, जिससे मेरे पिता का बड़ा अपमान हुआ, तेरा पाप और बढ़ गया, और नाश होते हुए मनुष्यात्मा नगर की असहनीय हानि हुई।
‘इसके अतिरिक्त, तूने (मानो ये सब तेरे लिए छोटी-छोटी बातें थीं) न केवल इस स्थान को धोखा देकर नष्ट किया है, वरन् अपने झूठ और कपटपूर्ण आचरण से उन्हें उनके अपने ही छुटकारे के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। तूने कैसे उन्हें मेरे पिता के कप्तानों के विरुद्ध भड़काया, और उन्हीं से लड़वाया जो उसके द्वारा उन्हें उनके बन्धन से छुड़ाने के लिए भेजे गए थे! ये सब बातें, और इनसे बहुत अधिक, तूने अपने ज्ञान के प्रकाश के विरुद्ध, और मेरे पिता और उसकी व्यवस्था की अवहेलना करते हुए की हैं, हाँ, और इस अभिप्राय से कि दुखी मनुष्यात्मा नगर को सदा के लिए उसके क्रोध के अधीन कर दे। इसलिए मैं उस अन्याय का पलटा लेने आया हूँ जो तूने मेरे पिता के साथ किया है, और उन निन्दाओं के लिए तुझसे निपटने आया हूँ जिनके द्वारा तूने बेचारे मनुष्यात्मा से उसके नाम की निन्दा करवाई है। हाँ, हे नरक की गुफा के राजकुमार, मैं इसका बदला तेरे ही सिर पर दूँगा।
‘जहाँ तक मेरी बात है, हे डियाबोलस, मैं न्यायसंगत अधिकार से तेरे विरुद्ध आया हूँ, कि इस मनुष्यात्मा नगर को भुजबल से तेरी जलती हुई उँगलियों में से छीन लूँ; क्योंकि हे डियाबोलस, यह मनुष्यात्मा नगर मेरा है, और वह भी निःसन्देह अधिकार से, जैसा वे सब देखेंगे जो सबसे प्राचीन और सबसे प्रामाणिक अभिलेखों को परिश्रम से जाँचेंगे, और मैं इस पर अपने अधिकार की पैरवी करूँगा, जिससे तेरा मुँह काला हो।
‘पहली बात, मनुष्यात्मा नगर के विषय में, मेरे पिता ने उसे बनाया और अपने हाथ से उसे गढ़ा। वह महल भी, जो उस नगर के बीच में है, उसने अपने ही आनन्द के लिए बनाया। इसलिए यह मनुष्यात्मा नगर मेरे पिता का है, और वह भी सबसे उत्तम अधिकार-पत्र से, और जो इस बात की सच्चाई का खण्डन करता है, उसे अपने ही प्राण के विरुद्ध झूठ बोलना पड़ेगा।
‘दूसरी बात, हे झूठ के स्वामी, यह मनुष्यात्मा नगर मेरा है।
‘1. इस कारण कि मैं अपने पिता का वारिस, उसका पहिलौठा, और उसके हृदय का एकमात्र आनन्द हूँ। इसलिए मैं अपने ही अधिकार से तेरे विरुद्ध चढ़ आया हूँ, कि अपनी ही मीरास को तेरे हाथ से फिर प्राप्त करूँ।
‘2. परन्तु इससे आगे, जैसे अपने पिता का वारिस होने के कारण मनुष्यात्मा पर मेरा अधिकार और हक़ है, वैसे ही मेरे पिता के दान के कारण भी है। वह उसका था, और उसने उसे मुझे दे दिया; और मैंने कभी भी अपने पिता को अप्रसन्न नहीं किया कि वह उसे मुझसे लेकर तुझे दे दे। न मुझे दिवालिया होकर अपने प्रिय मनुष्यात्मा नगर को तेरे हाथ बेचने या बिक्री पर रखने के लिए विवश होना पड़ा। मनुष्यात्मा मेरी अभिलाषा है, मेरा आनन्द है, और मेरे हृदय का हर्ष है। परन्तु,
‘3. मनुष्यात्मा मोल लेने के अधिकार से मेरा है। हे डियाबोलस, मैंने उसे मोल लिया है, मैंने उसे अपने लिए मोल लिया है। अब, क्योंकि वह मेरे पिता का था और मेरा भी, क्योंकि मैं उसका वारिस था, और क्योंकि मैंने एक बड़ी कीमत चुकाकर उसे अपना बना लिया है, इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हर न्यायसंगत अधिकार से मनुष्यात्मा नगर मेरा है, और कि उस पर अपना अधिकार जमाए रखने में तू एक अनधिकारी, एक अत्याचारी और एक विश्वासघाती है। अब, उसे मोल लेने का कारण यह था: मनुष्यात्मा ने मेरे पिता के विरुद्ध अपराध किया था; और मेरे पिता ने कहा था कि जिस दिन वे उसकी व्यवस्था तोड़ेंगे, उसी दिन वे मर जाएँगे। अब, मेरे पिता के अपना वचन तोड़ने से कहीं अधिक सम्भव यह है कि आकाश और पृथ्वी टल जाएँ। इसलिए जब मनुष्यात्मा ने तेरे झूठ पर कान लगाकर सचमुच पाप कर दिया, तो मैं बीच में आया और अपने पिता के सामने ज़मानत बना, देह के बदले देह, और प्राण के बदले प्राण, कि मैं मनुष्यात्मा के अपराधों का प्रायश्चित करूँगा, और मेरे पिता ने इसे स्वीकार किया। सो जब ठहराया हुआ समय आया, तो मैंने देह के बदले देह, प्राण के बदले प्राण, जीवन के बदले जीवन, लहू के बदले लहू दिया, और इस प्रकार अपने प्रिय मनुष्यात्मा को छुड़ा लिया।
‘4. और मैंने यह काम आधा-अधूरा नहीं किया: मेरे पिता की व्यवस्था और न्याय, जो दोनों अपराध पर दी गई धमकी से सम्बन्धित थे, अब दोनों सन्तुष्ट हैं, और इस बात से बहुत प्रसन्न हैं कि मनुष्यात्मा छुड़ाया जाए।
‘5. और न मैं आज अपने पिता की आज्ञा के बिना तेरे विरुद्ध निकला हूँ; उसी ने मुझसे कहा, “नीचे जा और मनुष्यात्मा को छुड़ा।”
‘इसलिए हे छल के सोते, तुझे यह मालूम हो, और मूर्ख मनुष्यात्मा नगर को भी यह मालूम हो, कि मैं आज अपने पिता के बिना तेरे विरुद्ध नहीं आया हूँ।
‘और अब,’ सुनहरे सिरवाले राजकुमार ने कहा, ‘मुझे मनुष्यात्मा नगर से एक बात कहनी है।’ परन्तु जैसे ही यह कहा गया कि उसे मूढ़ बने हुए मनुष्यात्मा नगर से एक बात कहनी है, वैसे ही फाटकों पर दुगना पहरा बिठा दिया गया, और सब लोगों को आज्ञा दी गई कि उसकी बात न सुनें। तौभी वह आगे बढ़ा और बोला, ‘हे अभागे मनुष्यात्मा नगर, मैं तुझ पर तरस और करुणा किए बिना नहीं रह सकता। तूने डियाबोलस को अपना राजा स्वीकार किया है, और अपने सच्चे प्रभु के विरुद्ध डियाबोलोनियों का पालनेवाला और सेवक बन गया है। अपने फाटक तूने उसके लिए खोल दिए हैं, परन्तु मेरे लिए उन्हें कसकर बन्द कर दिया है; तूने उसकी बात सुनी है, परन्तु मेरी पुकार पर अपने कान बन्द कर लिए हैं। वह तेरे पास तेरा विनाश लाया, और तूने उसे और उसे दोनों को ग्रहण किया: मैं तेरे पास उद्धार लेकर आया हूँ, परन्तु तू मेरी चिन्ता नहीं करता। इसके अतिरिक्त, तूने मानो अपवित्र हाथों से अपने आप को, और जो कुछ तुझमें मेरा था उस सब को ले लिया है, और सब कुछ मेरे बैरी को, और मेरे पिता के सबसे बड़े शत्रु को दे दिया है। तुमने उसके आगे सिर झुकाया और अपने आप को उसके अधीन कर दिया है, तुमने प्रण और शपथ खाई है कि तुम उसी के हो। बेचारे मनुष्यात्मा! मैं तेरे साथ क्या करूँ? क्या मैं तुझे बचाऊँ?—क्या मैं तुझे नष्ट करूँ? मैं तेरे साथ क्या करूँ? क्या मैं तुझ पर टूट पड़ूँ और तुझे पीसकर चूर-चूर कर दूँ, या तुझे सबसे समृद्ध अनुग्रह का स्मारक बनाऊँ? मैं तेरे साथ क्या करूँ? इसलिए हे मनुष्यात्मा नगर, कान लगा, मेरे वचन पर कान लगा, तो तू जीवित रहेगा। हे मनुष्यात्मा, मैं दयालु हूँ, और तू मुझे ऐसा ही पाएगा: मुझे अपने फाटकों से बाहर बन्द न कर।
‘हे मनुष्यात्मा, न तो मेरा आदेश और न मेरी इच्छा ही तेरी कुछ भी हानि करने की है। तू अपने मित्र से इतनी तेज़ी से क्यों भागता है, और अपने शत्रु से इतना चिपका क्यों रहता है? सचमुच, मैं चाहता हूँ कि तू अपने पाप के लिए दुःखी हो, क्योंकि यही तुझे शोभा देता है, परन्तु जीवन से निराश मत हो; यह बड़ी सेना तेरी हानि करने के लिए नहीं, वरन् तुझे तेरे बन्धन से छुड़ाने के लिए, और तुझे फिर से आज्ञाकारिता में लाने के लिए है।
‘मेरा आदेश, वास्तव में, तेरे राजा डियाबोलस से, और उसके साथ सब डियाबोलोनियों से युद्ध करने का है; क्योंकि वह वह बलवन्त मनुष्य है जो हथियार बाँधे हुए घर की रखवाली करता है, और मैं उसे बाहर निकालकर रहूँगा: उसकी लूट मुझे बाँटनी है, उसके हथियार मुझे उससे छीनने हैं, उसके गढ़ से मुझे उसे निकाल बाहर करना है, और उसे अपने लिए निवासस्थान बनाना है। और हे मनुष्यात्मा, डियाबोलस यह तब जानेगा जब उसे ज़ंजीरों में बाँधकर मेरे पीछे-पीछे चलाया जाएगा, और जब मनुष्यात्मा ऐसा होते देखकर आनन्द करेगा।
‘यदि मैं अभी अपना बल प्रकट करना चाहूँ, तो ऐसा कर सकता हूँ कि वह तुरन्त तुम्हें छोड़कर चला जाए; परन्तु मेरे मन में यह है कि मैं उसके साथ ऐसा व्यवहार करूँ कि जो युद्ध मैं उससे करूँगा उसका न्यायसंगत होना सब देखें और मानें। उसने मनुष्यात्मा को कपट से लिया है, और बलप्रयोग और धोखे से उसे अपने अधिकार में रखे हुए है, और मैं उसे सब देखनेवालों की आँखों के सामने उघाड़कर नंगा कर दूँगा।
‘मेरे सब वचन सच्चे हैं। मैं उद्धार करने में सामर्थी हूँ, और अपने मनुष्यात्मा को उसके हाथ से छुड़ाऊँगा।’
यह भाषण मुख्यतः मनुष्यात्मा के लिए था, परन्तु मनुष्यात्मा ने उसे सुनना न चाहा। उन्होंने कान-फाटक बन्द कर दिया, उस पर मोर्चाबन्दी कर दी, उसे ताला और चिटकनी लगाकर बन्द रखा, उस पर पहरा बिठा दिया, और आज्ञा दी कि कोई भी मनुष्यात्मा-वासी बाहर उसके पास न जाए, और न छावनी से किसी को नगर में आने दिया जाए। यह सब उन्होंने किया, क्योंकि डियाबोलस ने उन पर ऐसा भयानक जादू कर दिया था कि वे अपने सच्चे प्रभु और राजकुमार के विरुद्ध उसके लिए यह सब करें और करने का यत्न करें; इसलिए उस महिमामय सेना से सम्बन्ध रखनेवाला न कोई मनुष्य, न कोई आवाज़, न किसी मनुष्य का कोई शब्द नगर में आने पाता था।
