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अध्याय 9. अविश्वास का भाग निकलना — जॉय चैन की लिब्रिवॉक्स रिकॉर्डिंग के अनुसार किया गया पाठ-विभाजन। बनयन का 1682 का वृत्तान्त लगातार चलता है; ये शीर्षक केवल मार्गदर्शन के लिए हैं।
अब जब दारोगा श्रीमान सच्चा-मनुष्य ने देखा कि उसका बन्दी हाथ से निकल गया है, तो वह बड़ी घबराहट में पड़ गया, क्योंकि वह बन्दी, कहने को, उस सारे गिरोह में सबसे बुरा था; इसलिए पहले तो वह जाकर महापौर, श्रीमान अभिलेखक और लॉर्ड इच्छाप्रबल को इस बात की सूचना देता है, और उनसे यह आज्ञा लेता है कि मनुष्यात्मा नगर भर में उसकी खोज की जाए। सो उसे आज्ञा मिल गई, और खोज की गई, परन्तु अब सारे मनुष्यात्मा नगर में ऐसा कोई मनुष्य कहीं न मिला।
बस इतना ही पता चल सका कि वह कुछ समय तक नगर के बाहरी भाग में छिपा-छिपा फिरता रहा, और यहाँ-वहाँ किसी-किसी ने उसकी एक झलक देखी थी जब वह मनुष्यात्मा से भाग निकल रहा था; एक-दो ने यह भी दृढ़ता से कहा कि उन्होंने उसे नगर के बाहर, मैदान के पार तेज़ी से जाते हुए देखा था। अब जब वह पूरी तरह चला गया, तो एक श्रीमान आँखों-देखा ने यह पुष्टि की कि वह सूखे स्थानों में इधर-उधर भटकता फिरा, यहाँ तक कि वह अपने मित्र डियाबोलस से जा मिला; और वे दोनों एक-दूसरे से कहाँ मिले? ठीक नरक-द्वार पहाड़ी पर।
परन्तु हाय! उस बूढ़े सज्जन ने डियाबोलस को कैसी विलापभरी कथा सुनाई कि इम्मानुएल ने मनुष्यात्मा में कैसा दुःखद परिवर्तन कर दिया है!
जैसे, पहले तो यह कि मनुष्यात्मा ने कुछ टालमटोल के बाद इम्मानुएल के हाथ से सार्वजनिक क्षमा पा ली है, और उन्होंने उसे नगर में आमन्त्रित किया है, और गढ़ उसके अधिकार में दे दिया है। उसने यह भी कहा कि उन्होंने उसके सैनिकों को नगर में बुला लिया है, और आपस में होड़ लगाई है कि कौन उनमें से अधिक-से-अधिक को अपने यहाँ ठहराए; उन्होंने डफ, गीत और नृत्य के साथ उसका सत्कार भी किया है। अविश्वास ने कहा, ‘परन्तु जो बात मुझे सबसे अधिक खलती है वह यह है कि, हे पिता, उसने तेरी मूर्ति गिरा दी है और अपनी खड़ी कर दी है; तेरे अधिकारियों को हटा दिया है और अपने नियुक्त कर दिए हैं। हाँ, और वह विद्रोही इच्छाप्रबल, जिसके विषय में कोई भी सोचता कि वह हमसे कभी न फिरेगा, अब इम्मानुएल का उतना ही कृपापात्र है जितना कभी तेरा था। परन्तु इन सब के अलावा, इस इच्छाप्रबल को अपने स्वामी से एक विशेष आज्ञापत्र मिला है कि मनुष्यात्मा में जितने भी, और जिस किसी भी प्रकार के डियाबोलोनी उसे मिलें, उन सब को ढूँढ़े, पकड़े और मार डाले; हाँ, और यह इच्छाप्रबल मनुष्यात्मा में मेरे स्वामी के आठ सबसे भरोसेमन्द मित्रों को पकड़कर बन्दीगृह में डाल भी चुका है। इतना ही नहीं, मेरे स्वामी, मैं दुःख के साथ कहता हूँ, उन सब पर मुकद्दमा चलाया गया है, वे दोषी ठहराए गए हैं, और मुझे डर है कि अब तक मनुष्यात्मा में उन्हें प्राणदण्ड भी दे दिया गया होगा। मैंने अपने स्वामी को आठ के विषय में बताया, और नौवाँ मैं स्वयं था, जिसे निश्चय ही उसी कटोरे में से पीना पड़ता, परन्तु, जैसा तू देखता है, मैं चतुराई से उनके हाथ से बच निकला हूँ।’
जब डियाबोलस ने यह विलापभरी कथा सुनी, तो वह चिल्लाया और अजगर के समान हवा को सूँघने लगा, और अपनी गर्जना से आकाश को अँधेरा-सा कर दिया; उसने शपथ भी खाई कि वह इसके लिए मनुष्यात्मा से पलटा लेने का प्रयत्न करेगा। सो उन्होंने, अर्थात् उसने और उसके पुराने मित्र अविश्वास ने, निश्चय किया कि वे बड़ी मन्त्रणा करेंगे कि मनुष्यात्मा नगर को फिर से कैसे प्राप्त करें।
अब इससे पहले ही वह दिन आ पहुँचा था जिसमें मनुष्यात्मा के बन्दियों को प्राणदण्ड दिया जाना था। सो वे क्रूस के पास लाए गए, और वह भी मनुष्यात्मा के द्वारा, बड़ी गम्भीर रीति से; क्योंकि राजकुमार ने कहा था कि यह काम मनुष्यात्मा नगर के ही हाथ से किया जाए। उसने कहा, ‘ताकि मैं देखूँ कि मेरा अब छुड़ाया हुआ मनुष्यात्मा मेरे वचन को मानने और मेरी आज्ञाओं पर चलने में कितना तत्पर है; और ताकि इस काम को करने में मैं मनुष्यात्मा को आशीष दूँ। सच्चाई का प्रमाण मुझे बहुत भाता है; इसलिए मनुष्यात्मा ही पहले इन डियाबोलोनियों पर हाथ डाले कि उन्हें नष्ट करे।’
सो मनुष्यात्मा नगर ने अपने राजकुमार के वचन के अनुसार उन्हें घात किया; परन्तु जब बन्दी मरने के लिए क्रूस के पास लाए गए, तो आप कठिनाई से ही विश्वास करेंगे कि डियाबोलोनियों को मार डालने में मनुष्यात्मा को कितना कष्टदायक परिश्रम करना पड़ा; क्योंकि वे लोग, यह जानते हुए कि उन्हें मरना ही है, और उनमें से हर एक के मन में मनुष्यात्मा के प्रति ऐसा बैर था जो कभी शान्त न हो सके, और क्या करते? उन्होंने क्रूस के पास हिम्मत बाँधी, और वहीं मनुष्यात्मा नगर के लोगों का सामना करने लगे। इसलिए मनुष्यात्मा के लोगों को विवश होकर कप्तानों और योद्धाओं को सहायता के लिए पुकारना पड़ा। अब महान शद्दै का नगर में एक सचिव था, और वह मनुष्यात्मा के लोगों से बहुत प्रेम रखता था, और वह भी प्राणदण्ड के स्थान पर उपस्थित था; सो जब उसने मनुष्यात्मा के लोगों को बन्दियों की छटपटाहट और उपद्रव के विरुद्ध चिल्लाते सुना, तो वह अपने स्थान से उठा, और आकर मनुष्यात्मा के लोगों के हाथों पर अपने हाथ रख दिए। सो उन्होंने उन डियाबोलोनियों को क्रूस पर चढ़ा दिया जो मनुष्यात्मा नगर के लिए विपत्ति, दुःख और ठोकर का कारण रहे थे।
अब जब यह भला काम हो चुका, तो राजकुमार मनुष्यात्मा के लोगों को देखने, उनसे भेंट करने, और उनसे शान्ति की बातें करने, और ऐसे काम में उनके हाथ दृढ़ करने के लिए नीचे आया। और उसने उनसे कहा कि उनके इस काम के द्वारा उसने उन्हें परखा है, और पाया है कि वे उसके व्यक्तित्व से प्रेम रखनेवाले, उसकी व्यवस्था का पालन करनेवाले, और उसके सम्मान का आदर करनेवाले भी हैं। उसने यह भी कहा (यह दिखाने के लिए कि इससे उनकी कोई हानि न होगी, और न उन बन्दियों के मरने से उनका नगर निर्बल होगा) कि वह उनके लिए एक और कप्तान बनाएगा, और वह भी उन्हीं में से एक को। और यह कप्तान अब फलते-फूलते मनुष्यात्मा नगर की भलाई और लाभ के लिए हज़ार जनों का अधिपति होगा।
सो उसने एक को, जिसका नाम प्रतीक्षा था, अपने पास बुलाया, और उससे कहा, ‘फुर्ती से गढ़ के फाटक पर जा, और वहाँ एक श्रीमान अनुभव को पूछ, जो उस कुलीन कप्तान, कप्तान विश्वास की सेवा में रहता है, और उससे कह कि मेरे पास यहाँ आए।’ सो वह दूत, जो भले राजकुमार इम्मानुएल की सेवा में रहता था, गया और जैसी आज्ञा मिली थी वैसा ही कहा। उस समय वह युवा सज्जन गढ़ के आँगन में कप्तान को अपने जवानों का अभ्यास कराते और उनकी हाज़िरी लेते देखने की प्रतीक्षा में था। तब श्रीमान प्रतीक्षा ने उससे कहा, ‘महोदय, राजकुमार चाहते हैं कि आप तुरन्त नीचे उनके पास आएँ।’ सो वह उसे इम्मानुएल के पास नीचे ले आया, और उसने आकर उसके सामने दण्डवत् किया। अब नगर के लोग श्रीमान अनुभव को भली-भाँति जानते थे, क्योंकि वह मनुष्यात्मा में ही जन्मा और पला-बढ़ा था; वे यह भी जानते थे कि वह सदाचारी, वीर, और कामकाज में बुद्धिमान मनुष्य है; वह सुन्दर रूपवाला, अच्छा बोलनेवाला, और अपने कामों में बहुत सफल भी था।
इसलिए जब नगरवासियों ने देखा कि स्वयं राजकुमार श्रीमान अनुभव से इतना प्रसन्न है कि वह उसे अवश्य ही जवानों के एक दल पर कप्तान बनाएगा, तो उनके हृदय आनन्द से भर उठे।
सो उन्होंने एक मन होकर इम्मानुएल के सामने घुटने टेके, और जयजयकार करके कहा, ‘इम्मानुएल सदा जीवित रहे!’ तब राजकुमार ने उस युवा सज्जन से, जिसका नाम श्रीमान अनुभव था, कहा, ‘मुझे यह अच्छा लगा है कि मैं अपने इस मनुष्यात्मा नगर में तुझे भरोसे और सम्मान का एक पद दूँ।’ तब उस युवक ने सिर झुकाकर दण्डवत् किया। इम्मानुएल ने कहा, ‘वह यह है कि तू कप्तान हो, मेरे प्रिय मनुष्यात्मा नगर में हज़ार जनों पर कप्तान।’ तब कप्तान ने कहा, ‘राजा जीवित रहे!’ सो राजकुमार ने तुरन्त राजा के सचिव को आज्ञा दी कि वह श्रीमान अनुभव के लिए एक आज्ञापत्र तैयार करे, जिससे वह हज़ार जनों पर कप्तान बनाया जाए। उसने कहा, ‘और वह मेरे पास लाया जाए, कि मैं उस पर अपनी मुहर लगाऊँ।’ सो जैसी आज्ञा दी गई थी, वैसा ही किया गया। आज्ञापत्र तैयार किया गया, इम्मानुएल के पास लाया गया, और उसने उस पर अपनी मुहर लगा दी। तब उसने उसे श्रीमान प्रतीक्षा के हाथ कप्तान के पास भेज दिया।
अब ज्यों ही कप्तान को अपना आज्ञापत्र मिला, उसने स्वयंसेवकों के लिए अपनी तुरही फूँकी, और युवक फुर्ती से उसके पास आने लगे; हाँ, नगर के सबसे बड़े और प्रधान लोगों ने अपने बेटों को भेजा कि वे उसकी अधीनता में भरती किए जाएँ। इस प्रकार कप्तान अनुभव मनुष्यात्मा नगर की भलाई के लिए इम्मानुएल की अधीनता में आया। उसका लेफ्टिनेंट एक श्रीमान कुशल था, और उसका ध्वजवाहक एक श्रीमान स्मृति। उसके छोटे अधिकारियों के नाम बताने की मुझे आवश्यकता नहीं। मनुष्यात्मा नगर के लिए उसके झण्डे श्वेत झण्डे थे; और उसकी ढाल का चिह्न मरा हुआ सिंह और मरा हुआ भालू था। सो राजकुमार फिर अपने राजमहल को लौट गया।
अब जब वह वहाँ लौट आया, तो मनुष्यात्मा नगर के पुरनिए, अर्थात् महापौर, अभिलेखक और लॉर्ड इच्छाप्रबल, उसे बधाई देने गए, और विशेष रीति से उस प्रेम, चिन्ता और कोमल करुणा के लिए उसका धन्यवाद करने गए जो उसने अपने सदा के ऋणी मनुष्यात्मा नगर पर दिखाई थी। सो कुछ समय के बाद, और उनके बीच कुछ मधुर संगति के पश्चात्, नगरवासी अपना समारोह गम्भीरता से समाप्त करके फिर अपने स्थान को लौट गए।
इम्मानुएल ने इसी समय उनके लिए एक दिन भी ठहराया जिसमें वह उनके अधिकार-पत्र को नया करेगा, हाँ, जिसमें वह उसे नया करेगा और बढ़ाएगा, और उसकी कई त्रुटियों को सुधारेगा, ताकि मनुष्यात्मा का जूआ और भी सहज हो जाए। और यह उसने उनकी किसी इच्छा के बिना, केवल अपनी उदारता और कुलीन मन से किया। सो जब उसने उनका पुराना अधिकार-पत्र मँगवाकर देखा, तो उसे एक ओर रख दिया, और कहा, ‘जो वस्तु पुरानी और जीर्ण हो जाती है उसका मिट जाना अनिवार्य है।’ उसने यह भी कहा, ‘मनुष्यात्मा नगर को दूसरा, उससे उत्तम, एक नया अधिकार-पत्र मिलेगा, जो कहीं अधिक स्थिर और दृढ़ होगा।’ उसका सार इस प्रकार समझिए:—
‘मैं, इम्मानुएल, शान्ति का राजकुमार, और मनुष्यात्मा नगर से बड़ा प्रेम रखनेवाला, अपने पिता के नाम से, और अपनी करुणा से, अपने प्रिय मनुष्यात्मा नगर को यह देता हूँ, प्रदान करता हूँ और सौंपता हूँ।
‘पहला। उन सब अन्यायों, हानियों और अपराधों की सेंत-मेंत, पूरी और अनन्त क्षमा जो उन्होंने मेरे पिता के, मेरे, अपने पड़ोसी के, या स्वयं अपने विरुद्ध किए हैं।
‘दूसरा। मैं उन्हें पवित्र व्यवस्था और अपना नियम-पत्र (वसीयतनामा), और उसमें जो कुछ लिखा है वह सब, उनकी अनन्त शान्ति और सान्त्वना के लिए देता हूँ।
‘तीसरा। मैं उन्हें उसी अनुग्रह और भलाई का एक भाग भी देता हूँ जो मेरे पिता के और मेरे हृदय में वास करती है।
‘चौथा। मैं उन्हें संसार और जो कुछ उसमें है, उनकी भलाई के लिए, सेंत-मेंत देता हूँ, प्रदान करता हूँ और सौंपता हूँ; और उन पर उनका उतना अधिकार होगा जितना मेरे पिता के सम्मान, मेरी महिमा और उनकी शान्ति के अनुकूल हो: हाँ, मैं उन्हें जीवन और मृत्यु के, और वर्तमान और भविष्य की वस्तुओं के लाभ प्रदान करता हूँ। यह विशेषाधिकार किसी दूसरे महानगर, नगर या नगर-निगम को नहीं, केवल मेरे मनुष्यात्मा को ही मिलेगा।
‘पाँचवाँ। मैं उन्हें यह अनुमति देता और प्रदान करता हूँ कि वे हर समय मेरे महल में मेरे पास बेरोक-टोक आ सकें—ऊपर के या नीचे के मेरे महल में—और वहाँ अपनी आवश्यकताएँ मुझ पर प्रकट करें; और इसके अलावा मैं उन्हें यह प्रतिज्ञा भी देता हूँ कि मैं उनकी सब शिकायतें सुनूँगा और उनका निवारण करूँगा।
‘छठा। मैं मनुष्यात्मा नगर को पूरा सामर्थ्य और अधिकार देता, प्रदान करता और सौंपता हूँ कि जितने भी, और जिस किसी भी प्रकार के डियाबोलोनी, किसी भी समय, कहीं से भी आकर, मनुष्यात्मा नगर के भीतर या उसके आस-पास भटकते हुए पाए जाएँ, उन सब को ढूँढ़ निकाले, पकड़े, दास बनाए और नष्ट करे।
‘सातवाँ। मैं अपने प्रिय मनुष्यात्मा नगर को यह भी प्रदान करता हूँ कि उन्हें यह अधिकार होगा कि वे किसी विदेशी, या परदेशी, या उनके वंश को इस धन्य मनुष्यात्मा नगर में और उसके स्वतन्त्र नागरिक न बनने दें, और न उसके उत्तम विशेषाधिकारों में भागी होने दें। परन्तु वे सब अनुदान, विशेषाधिकार और छूटें जो मैं प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर को देता हूँ, उसके पुराने मूल निवासियों और सच्चे रहनेवालों के लिए होंगी; मैं कहता हूँ, उन्हीं के लिए, और उनके पश्चात् उनके सच्चे वंश के लिए।
‘परन्तु सब डियाबोलोनी, चाहे वे किसी भी प्रकार, जन्म, देश या राज्य के हों, उसमें भाग पाने से वर्जित रहेंगे।’
सो जब मनुष्यात्मा नगर ने इम्मानुएल के हाथ से अपना अनुग्रहपूर्ण अधिकार-पत्र पा लिया (जो अपने आप में उस रूप से अनन्त गुना अधिक विस्तृत है जिस रूप में इस दुबले-पतले सार के द्वारा आपके सामने रखा गया है), तो वे उसे सभा में, अर्थात् बाज़ार के चौक में, ले गए, और वहाँ श्रीमान अभिलेखक ने सब लोगों के सामने उसे पढ़कर सुनाया। यह हो जाने पर वह गढ़ के फाटकों पर वापस ले जाया गया, और वहाँ उसके किवाड़ों पर सुन्दरता से खोदा गया, और सोने के अक्षरों में जड़ा गया, ताकि मनुष्यात्मा नगर, अपने सब लोगों समेत, उसे सदा अपनी आँखों के सामने रख सके, या ऐसे स्थान पर जा सके जहाँ वे देख सकें कि उनके राजकुमार ने उन्हें कैसी धन्य स्वतन्त्रता प्रदान की है, जिससे उनके भीतर उनका आनन्द बढ़े, और अपने महान और भले इम्मानुएल के प्रति उनका प्रेम नया हो जाए।
परन्तु आप क्या सोचते हैं, अब मनुष्यात्मा के लोगों के हृदयों में कैसा आनन्द, कैसी शान्ति, कैसी सान्त्वना छा गई! घण्टे बजे, बजानेवालों ने बाजे बजाए, लोग नाचे, कप्तानों ने जयजयकार किया, झण्डे हवा में लहराए, और चाँदी की तुरहियाँ फूँकी गईं; और डियाबोलोनी अब अपने सिर छिपाने में ही भलाई समझते थे, क्योंकि वे उन लोगों के समान दिखते थे जो बहुत दिन से मरे हुए हों।
जब यह सब हो चुका, तो राजकुमार ने फिर मनुष्यात्मा नगर के पुरनियों को बुलवाया, और उनसे एक सेवकाई के विषय में बातचीत की जिसे वह उनके बीच स्थापित करना चाहता था; ऐसी सेवकाई जो उनके लिए बातों को खोलकर समझाए, और उन्हें उन बातों की शिक्षा दे जो उनकी वर्तमान और भावी दशा से सम्बन्ध रखती थीं।
उसने कहा, ‘क्योंकि जब तक तुम्हारे पास शिक्षक और मार्गदर्शक न हों, तुम अपने आप से मेरे पिता की इच्छा को न तो जान सकोगे, और यदि न जान सकोगे, तो निश्चय ही उसे पूरा भी न कर सकोगे।’
जब मनुष्यात्मा के पुरनिए यह समाचार लोगों के पास ले गए, तो सारा नगर दौड़कर इकट्ठा हो गया (क्योंकि यह बात उन्हें बहुत अच्छी लगी, जैसे राजकुमार अब जो कुछ करता था वह सब लोगों को अच्छा लगता था), और सब ने एक मन होकर महामहिम से विनती की कि वह तुरन्त उनके बीच ऐसी सेवकाई स्थापित करे जो उन्हें व्यवस्था और न्याय, विधि और आज्ञा, दोनों सिखाए; ताकि वे सब भली और हितकारी बातों में शिक्षित किए जाएँ। सो उसने उनसे कहा कि वह उनकी विनती पूरी करेगा, और उनके बीच दो को स्थापित करेगा; एक जो उसके पिता के दरबार का था, और एक जो मनुष्यात्मा का मूल निवासी था।
उसने कहा, ‘जो दरबार से है, वह पद और प्रतिष्ठा में मेरे पिता और मुझसे किसी प्रकार कम नहीं है; और वह मेरे पिता के घराने का लॉर्ड मुख्य सचिव है: क्योंकि वह मेरे पिता की सब व्यवस्थाओं का मुख्य लिखानेवाला है, और सदा से रहा है; वह सब भेदों में, और भेदों के ज्ञान में, पूरी तरह निपुण है, जैसा मेरा पिता है, या जैसा मैं स्वयं हूँ। वास्तव में वह स्वभाव में हमारे साथ एक है, और मनुष्यात्मा नगर से प्रेम रखने में, और उसके प्रति विश्वासयोग्य रहने में, और उसकी अनन्त चिन्ताओं में भी हमारे साथ एक है।
राजकुमार ने कहा, ‘और यही वह है जिसे तुम्हारा मुख्य शिक्षक होना है; क्योंकि वही, और केवल वही, सब ऊँची और अलौकिक बातों में तुम्हें स्पष्ट रीति से सिखा सकता है। वही, और केवल वही है जो दरबार में मेरे पिता की रीतियों और विधियों को जानता है; और न कोई उसके समान यह दिखा सकता है कि मेरे पिता का हृदय हर समय, हर बात में, हर अवसर पर मनुष्यात्मा के प्रति कैसा है; क्योंकि जैसे मनुष्यों में से कोई किसी मनुष्य की बातें नहीं जानता, केवल मनुष्य की आत्मा जो उसमें है, वैसे ही मेरे पिता की बातें कोई नहीं जानता, केवल उसका यह ऊँचा और पराक्रमी सचिव। और न कोई उसके समान मनुष्यात्मा को यह बता सकता है कि अपने आप को मेरे पिता के प्रेम में बनाए रखने के लिए उन्हें कैसे और क्या करना चाहिए। वही है जो खोई हुई बातें तुम्हें स्मरण करा सकता है, और आनेवाली बातें तुम्हें बता सकता है। इसलिए इस शिक्षक को तुम्हारे स्नेह और तुम्हारी समझ, दोनों में, तुम्हारे दूसरे शिक्षक से अवश्य ही प्रधानता मिलनी चाहिए; उसकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, उसकी शिक्षा की उत्तमता, और साथ ही वह बड़ी निपुणता जो उसमें है कि तुम्हारी सहायता के लिए, और मेरे पिता की प्रसन्नता के अनुसार, मेरे पिता के पास विनतियाँ बनाने और लिखने में तुम्हारी सहायता करे, ये सब तुम पर यह दायित्व डालें कि तुम उससे प्रेम करो, उसका भय मानो, और चौकस रहो कि तुम उसे शोकित न करो।
‘यह व्यक्ति अपनी हर बात में जीवन और बल डाल सकता है; हाँ, और उसे तुम्हारे हृदय में भी डाल सकता है। यह व्यक्ति तुम्हें दर्शी बना सकता है, और तुम्हें यह बताने योग्य बना सकता है कि आगे क्या होगा। इसी व्यक्ति के द्वारा तुम्हें मेरे पिता से और मुझसे अपनी सब विनतियाँ करनी होंगी; और पहले उसकी सलाह और परामर्श लिए बिना मनुष्यात्मा के नगर या गढ़ में किसी भी वस्तु को प्रवेश न करने दो, क्योंकि उससे यह कुलीन व्यक्ति अप्रसन्न और शोकित हो सकता है।
‘मैं कहता हूँ, चौकस रहो कि तुम इस सेवक को शोकित न करो; क्योंकि यदि तुम ऐसा करोगे, तो वह तुम्हारे विरुद्ध लड़ सकता है; और यदि कभी तुम्हारे कारण उसने तुम्हारे विरुद्ध युद्ध के लिए पाँति बाँध ली, तो वह तुम्हें उससे भी अधिक संकट में डालेगा जितना यदि मेरे पिता के दरबार से बारह पलटनें तुमसे युद्ध करने को भेजी जाएँ।
‘परन्तु, जैसा मैंने कहा, यदि तुम उसकी सुनोगे, और उससे प्रेम करोगे; यदि तुम अपने आप को उसकी शिक्षा के लिए समर्पित करोगे, और उससे वार्तालाप करने और उसके साथ संगति बनाए रखने का यत्न करोगे, तो तुम उसे किसी के लिए भी सारे संसार से दस गुना उत्तम पाओगे; हाँ, वह मेरे पिता का प्रेम तुम्हारे हृदयों में डालेगा, और मनुष्यात्मा सब लोगों में सबसे बुद्धिमान और सबसे धन्य होगा।’
तब राजकुमार ने उस बूढ़े सज्जन को, जो पहले मनुष्यात्मा का अभिलेखक रहा था, जिसका नाम श्रीमान विवेक था, अपने पास बुलाया, और उससे कहा कि इसलिए कि वह मनुष्यात्मा नगर की व्यवस्था और शासन में भली-भाँति निपुण है, और अच्छा बोलनेवाला भी है, और सब सांसारिक और घरेलू बातों में अपने स्वामी की इच्छा उन्हें उचित रीति से सुना सकता है, इसलिए वह उसे भी उस सुन्दर मनुष्यात्मा नगर के लिए, उसमें, और उसके प्रति, प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर की सब व्यवस्थाओं, विधियों और नियमों में एक सेवक ठहराएगा। राजकुमार ने कहा, ‘और तुझे अपने आप को नैतिक सद्गुणों की, और नागरिक तथा स्वाभाविक कर्तव्यों की शिक्षा तक ही सीमित रखना होगा; परन्तु तुझे उन ऊँचे और अलौकिक भेदों को प्रकट करनेवाला बनने का दुस्साहस करने का प्रयत्न नहीं करना है जो मेरे पिता शद्दै की गोद में छिपे रखे गए हैं: क्योंकि उन बातों को कोई मनुष्य नहीं जानता, और न कोई उन्हें प्रकट कर सकता है, केवल मेरे पिता का सचिव।
‘तू मनुष्यात्मा नगर का मूल निवासी है, परन्तु लॉर्ड सचिव मेरे पिता के साथ का निवासी है; इसलिए जैसे तुझे इस नगर-निगम की व्यवस्थाओं और रीतियों का ज्ञान है, वैसे ही उसे मेरे पिता की बातों और इच्छा का ज्ञान है।
‘इसलिए, हे श्रीमान विवेक, यद्यपि मैंने तुझे मनुष्यात्मा नगर का सेवक और प्रचारक ठहराया है, तौभी उन बातों के विषय में जिन्हें लॉर्ड सचिव जानता है, और इन लोगों को सिखाएगा, वहाँ तुझे उसका शिष्य और सीखनेवाला होना होगा, ठीक वैसे ही जैसे मनुष्यात्मा के शेष लोग हैं।
‘इसलिए तुझे सब ऊँची और अलौकिक बातों में जानकारी और ज्ञान के लिए उसी के पास जाना होगा; क्योंकि यद्यपि मनुष्य में आत्मा तो है, तौभी इसी व्यक्ति की प्रेरणा उसे समझ देती है। इसलिए, हे श्रीमान अभिलेखक, नीचे बना रह और दीन रह, और स्मरण रख कि जिन डियाबोलोनियों ने अपने पहले पद को स्थिर न रखा, वरन् अपने निज स्थान को छोड़ दिया, वे अब गड्ढे में बन्दी बनाए गए हैं। इसलिए अपने पद से सन्तुष्ट रह।
‘मैंने तुझे पृथ्वी पर अपने पिता का प्रतिनिधि ठहराया है, उन बातों में जिनका उल्लेख मैं पहले कर चुका हूँ: और तू, उन्हें मनुष्यात्मा को सिखाने का अधिकार ले, हाँ, और यदि वे स्वेच्छा से तेरी आज्ञाओं को मानने के लिए न सुनें, तो कोड़ों और ताड़नाओं के साथ उन्हें उन पर लागू कर।
‘और, श्रीमान अभिलेखक, क्योंकि तू बूढ़ा है, और बहुत से दुर्व्यवहारों के कारण निर्बल हो गया है; इसलिए मैं तुझे अनुमति और अधिकार देता हूँ कि जब चाहे मेरे सोते के पास, मेरी जल-नाली के पास जाए, और वहाँ मेरे दाख के लहू में से सेंत-मेंत पीए, क्योंकि मेरी नाली में सदा दाखमधु बहता है। ऐसा करने से तू अपने हृदय और पेट से सब गन्दे, स्थूल और हानिकारक विकारों को निकाल देगा। इससे तेरी आँखों में ज्योति भी आएगी, और तेरी स्मरण-शक्ति दृढ़ होगी, कि जो कुछ राजा का परम कुलीन सचिव सिखाता है, उस सब को ग्रहण कर सके और सँभालकर रख सके।’
जब राजकुमार ने इस प्रकार श्रीमान अभिलेखक को (जो एक समय ऐसा था) मनुष्यात्मा के लिए एक सेवक के स्थान और पद पर नियुक्त कर दिया, और उस मनुष्य ने धन्यवाद के साथ उसे स्वीकार कर लिया, तब इम्मानुएल ने स्वयं नगरवासियों को एक विशेष भाषण में सम्बोधित किया।
राजकुमार ने मनुष्यात्मा से कहा, ‘देखो, तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम और मेरी चिन्ता; जो कुछ बीत चुका है, उस सब में मैंने यह दया और जोड़ दी है कि तुम्हारे लिए प्रचारक ठहराए हैं; परम कुलीन सचिव को कि वह तुम्हें सब ऊँचे और महान भेदों में सिखाए; और यह सज्जन,’ श्रीमान विवेक की ओर संकेत करते हुए, ‘तुम्हें सब मानवीय और घरेलू बातों में सिखाएगा, क्योंकि उसका काम उन्हीं में है। मैंने जो कहा है उससे वह इस बात से वर्जित नहीं है कि जो कुछ उसने लॉर्ड उच्च सचिव के मुँह से सुना और पाया है, उसे मनुष्यात्मा को बताए; केवल वह स्वयं उन ऊँचे भेदों को प्रकट करनेवाला होने का ढोंग करने का दुस्साहस न करे; क्योंकि उन्हें खोलना, और उन्हें मनुष्यात्मा पर प्रकट करना केवल लॉर्ड उच्च सचिव के ही सामर्थ्य, अधिकार और कौशल में है। उनकी चर्चा वह कर सकता है, और मनुष्यात्मा नगर के शेष लोग भी कर सकते हैं; हाँ, और जैसे-जैसे अवसर मिले, सब की भलाई के लिए एक-दूसरे पर उन्हें ज़ोर देकर लागू भी कर सकते हैं। इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम इन बातों को मानो और करो, क्योंकि यह तुम्हारे जीवन के लिए, और तुम्हारी आयु बढ़ाने के लिए है।
‘और मेरे प्रिय श्रीमान अभिलेखक से, और सारे मनुष्यात्मा नगर से, एक बात और: जहाँ तक अगले संसार के विषय में तुम्हारे भरोसे और आशा का प्रश्न है, तुम्हें उस पर न टिकना है, न ठहरना है जो कुछ सिखाने का अधिकार उसे सौंपा गया है; (मैं कहता हूँ, अगले संसार के विषय में, क्योंकि मेरी इच्छा है कि जब यह संसार उनके लिए घिस जाए, तब मैं मनुष्यात्मा को दूसरा संसार दूँ;) परन्तु उसके लिए तुम्हें पूरी तरह और केवल उसी की शिक्षा का सहारा लेना और उसी पर टिकना होगा जो प्रथम श्रेणी का तुम्हारा शिक्षक है। हाँ, स्वयं श्रीमान अभिलेखक को भी उससे जीवन की आशा नहीं करनी है जिसे वह स्वयं प्रकट करता है; उसके लिए उसका भरोसा दूसरे प्रचारक की शिक्षा पर ही आधारित होना चाहिए। श्रीमान अभिलेखक यह भी चौकसी करे कि वह कोई ऐसी शिक्षा, या शिक्षा की कोई बात, ग्रहण न करे जो उसके श्रेष्ठ शिक्षक के द्वारा उसे न दी गई हो, और न ही उसके अपने औपचारिक ज्ञान की सीमाओं के भीतर हो।’
अब जब राजकुमार ने प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर में इस प्रकार सब बातें व्यवस्थित कर दीं, तो उसने नगर-निगम के पुरनियों को एक आवश्यक चेतावनी दी, अर्थात् यह कि उन्हें उन ऊँचे और कुलीन कप्तानों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए जिन्हें वह अपने पिता के दरबार से प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर में भेज चुका था या अपने साथ लाया था।
उसने कहा, ‘ये कप्तान मनुष्यात्मा नगर से प्रेम रखते हैं, और ये चुने हुए लोग हैं, बहुतों में से चुनकर निकाले गए हैं, ऐसे लोग जो सबसे अधिक उपयुक्त हैं, और जो मनुष्यात्मा नगर की रक्षा के लिए डियाबोलोनियों के विरुद्ध शद्दै के युद्धों में सबसे अधिक विश्वासयोग्यता से सेवा करेंगे। ‘इसलिए, हे अब फलते-फूलते मनुष्यात्मा नगर के निवासियो,’ उसने कहा, ‘मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम मेरे कप्तानों या उनके जवानों के साथ रूखा या बेढंगा व्यवहार न करो; क्योंकि, जैसा मैंने कहा, वे चुने हुए और उत्तम लोग हैं—मनुष्यात्मा नगर की भलाई के लिए बहुतों में से चुने गए लोग। मैं कहता हूँ, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम उनके साथ बेढंगा व्यवहार न करो: क्योंकि यद्यपि, जब कभी उन्हें राजा के बैरियों और मनुष्यात्मा नगर के शत्रुओं से भिड़ने और लड़ने को बुलाया जाता है, तब उनके हृदय और मुख सिंहों के से होते हैं; तौभी मनुष्यात्मा नगर की ओर से उन पर डाली गई थोड़ी-सी भी अप्रसन्नता उनके मुख उतार देगी और उन्हें उदास कर देगी, उनके साहस को निर्बल कर देगी और छीन लेगी। इसलिए, हे मेरे प्रियो, मेरे वीर कप्तानों और साहसी योद्धाओं के साथ निर्दयता का व्यवहार न करो, वरन् उनसे प्रेम करो, उनका पालन-पोषण करो, उनकी सहायता करो, और उन्हें अपनी छाती से लगाए रखो; और वे न केवल तुम्हारे लिए लड़ेंगे, वरन् उन सब डियाबोलोनियों को भी तुम्हारे सामने से भगा देंगे जो तुम्हारा सर्वनाश चाहते हैं, और यदि सम्भव हो तो कर भी डालेंगे।
‘इसलिए, यदि उनमें से कोई कभी बीमार या निर्बल हो जाए, और इस कारण प्रेम का वह काम करने के योग्य न रहे, जिसे वे अपने पूरे हृदय से करने को तैयार रहते हैं (और जब भले-चंगे और स्वस्थ होंगे तब करेंगे भी), तो उनकी उपेक्षा न करना, न उन्हें तुच्छ जानना, वरन् उन्हें बल देना और उनका ढाढ़स बँधाना, चाहे वे निर्बल हों और मरने पर हों, क्योंकि वे तुम्हारा बाड़ा हैं, और तुम्हारा पहरा, तुम्हारी शहरपनाह, तुम्हारे फाटक, तुम्हारे ताले और तुम्हारे बेंड़े हैं। और यद्यपि जब वे निर्बल होते हैं तो थोड़ा ही कर सकते हैं, वरन् उस समय तुमसे बड़ी-बड़ी बातों की आशा किए जाने के बदले उन्हें स्वयं तुम्हारी सहायता की आवश्यकता होती है, तौभी जब वे स्वस्थ होते हैं, तब तुम जानते हो कि वे कैसे पराक्रम, कैसे करतब और कैसे युद्ध-कौशल के काम कर सकते हैं, और तुम्हारे लिए करेंगे।
‘इसके अलावा, यदि वे निर्बल हैं, तो मनुष्यात्मा नगर बलवान नहीं हो सकता; यदि वे बलवान हैं, तो मनुष्यात्मा निर्बल नहीं हो सकता; इसलिए तुम्हारी सुरक्षा उनके स्वास्थ्य में, और तुम्हारे द्वारा उनका साथ देने में है। यह भी स्मरण रखो कि यदि वे बीमार होते हैं, तो वह रोग उन्हें स्वयं मनुष्यात्मा नगर से ही लगता है।
‘ये बातें मैंने तुमसे इसलिए कही हैं कि मैं तुम्हारा कल्याण और तुम्हारा सम्मान चाहता हूँ: इसलिए, हे मेरे मनुष्यात्मा, जो कुछ मैंने तुम्हें सौंपा है उन सब बातों में ठीक-ठीक चलने का ध्यान रखो, और यह केवल एक संगठित नगर के रूप में, और इस प्रकार अपने अधिकारियों और पहरुओं और प्रधान मार्गदर्शकों के प्रति ही नहीं, वरन् तुम्हारे लिए ऐसे लोगों के रूप में भी, जिनका व्यक्तिगत रूप से एक-एक का कल्याण अपने प्रभु की आज्ञाओं और आदेशों के पालन पर निर्भर है।
‘आगे, हे मेरे मनुष्यात्मा, मैं तुम्हें उस बात से सावधान करता हूँ जिसके विषय में, उस सुधार के होते हुए भी जो इस समय तुम्हारे बीच किया गया है, तुम्हें सावधान किए जाने की आवश्यकता है: इसलिए ध्यान से मेरी सुनो। मैं अब निश्चित हूँ, और तुम आगे चलकर जान लोगे, कि मनुष्यात्मा नगर में अभी भी डियाबोलोनी बचे हुए हैं, ऐसे डियाबोलोनी जो हठीले और कभी शान्त न होनेवाले बैरी हैं, और जो अभी भी, जब मैं तुम्हारे साथ हूँ, और जब मैं तुमसे दूर होऊँगा तब और भी अधिक, सोच-विचार करते हैं, षड्यन्त्र रचते हैं, युक्तियाँ गढ़ते हैं, उपाय निकालते हैं, और मिलकर यत्न करते हैं कि तुम्हें उजाड़ दें, और इस प्रकार मिस्र की दासता से भी कहीं बुरी दशा में पहुँचा दें; वे डियाबोलस के खुले मित्र हैं, इसलिए चौकस रहो। पहले वे अपने राजकुमार के साथ गढ़ में रहा करते थे, जब अविश्वास इस नगर का महापौर था; परन्तु मेरे यहाँ आने के बाद से वे अधिकतर बाहरी भागों और शहरपनाह में पड़े रहते हैं, और उनमें उन्होंने अपने लिए माँदें, और गुफाएँ, और बिल, और गढ़ बना लिए हैं। इसलिए, हे मनुष्यात्मा! इस विषय में तेरा काम उतना ही अधिक कठिन और कड़ा होगा; अर्थात् मेरे पिता की इच्छा के अनुसार उन्हें पकड़ना, उन्हें मारना और मृत्यु के घाट उतारना। और तुम उनसे पूरी तरह छुटकारा नहीं पा सकते, जब तक कि तुम अपने नगर की शहरपनाह ही न ढा दो, जो मैं किसी भी रीति से नहीं चाहता कि तुम करो। क्या तुम मुझसे पूछते हो, तो फिर हम क्या करें? अरे, तुम परिश्रमी बनो, और पुरुषार्थ करो; उनके बिलों पर दृष्टि रखो; उनके अड्डों का पता लगाओ; उन पर आक्रमण करो, और उनसे मेल न करो। जहाँ कहीं वे आते-जाते, छिपते या रहते हों, और मेल की चाहे जो भी शर्तें वे तुम्हारे सामने रखें, उनसे घृणा करो, और तुम्हारे और मेरे बीच सब कुछ भला रहेगा। और इसलिए कि तुम उन्हें मनुष्यात्मा के मूल निवासियों से भली-भाँति पहचान सको, मैं तुम्हें उनमें से प्रधान लोगों के नामों की यह छोटी-सी सूची देता हूँ; और वे ये हैं:—लॉर्ड व्यभिचार, लॉर्ड परस्त्रीगमन, लॉर्ड हत्या, लॉर्ड क्रोध, लॉर्ड कामुकता, लॉर्ड छल, लॉर्ड कु-दृष्टि, श्रीमान मतवालापन, श्रीमान रंगरेलियाँ, श्रीमान मूर्तिपूजा, श्रीमान टोना, श्रीमान बैर, श्रीमान डाह, श्रीमान कोप, श्रीमान झगड़ा, श्रीमान फूट, और श्रीमान विधर्म। हे मनुष्यात्मा! ये उनमें से कुछ प्रधान हैं जो तुझे सदा के लिए उलट देने का यत्न करेंगे। मैं कहता हूँ, ये मनुष्यात्मा में छिपे फिरनेवाले हैं; परन्तु तू अपने राजा की व्यवस्था में भली-भाँति देख, और वहाँ तुझे उनकी मुखाकृति, और उनके ऐसे अन्य विशेष लक्षण मिल जाएँगे, जिनसे वे निश्चय ही पहचाने जा सकते हैं।
‘हे मेरे मनुष्यात्मा, ये (और मैं बड़ी प्रसन्नता से चाहता हूँ कि तुम इसे निश्चय जान लो), यदि इन्हें नगर में अपनी इच्छा के अनुसार दौड़ने और घूमने-फिरने दिया गया, तो ये शीघ्र ही साँपों के समान तुम्हारी अंतड़ियाँ खा जाएँगे; हाँ, तुम्हारे कप्तानों को विष दे देंगे, तुम्हारे सैनिकों की नसें काट डालेंगे, तुम्हारे फाटकों के बेंड़े और चटखनियाँ तोड़ डालेंगे, और तुम्हारे अब अत्यन्त फलते-फूलते मनुष्यात्मा को एक बंजर और उजाड़ जंगल, और खण्डहरों का ढेर बना देंगे। इसलिए, कि तुम इन दुष्टों को, जहाँ कहीं वे मिलें, पकड़ने के लिए हियाव बाँधो, मैं तुम्हें, मेरे महापौर, मेरे लॉर्ड इच्छाप्रबल, और श्रीमान अभिलेखक को, मनुष्यात्मा नगर के सब निवासियों समेत, पूरा सामर्थ्य और आज्ञापत्र देता हूँ कि जितने भी, और जिस किसी भी प्रकार के डियाबोलोनी, जब कभी और जहाँ कहीं तुम्हें मनुष्यात्मा नगर की शहरपनाह के भीतर छिपे या बाहर घूमते मिलें, उन सब को ढूँढ़ निकालो, पकड़ो, और क्रूस के द्वारा मरवा डालो।
‘मैंने तुमसे पहले कहा था कि मैंने तुम्हारे बीच एक स्थायी सेवकाई ठहराई है; यह नहीं कि तुम्हारे साथ केवल यही हैं, क्योंकि मेरे पहले चार कप्तान, जो डियाबोलोनियों के उस स्वामी और लॉर्ड के विरुद्ध आए थे जो मनुष्यात्मा में था, वे न केवल निजी रूप से समझा सकते हैं, वरन्, यदि आवश्यकता हो और यदि उनसे माँगा जाए, तो नगर-निगम को खुले में भली और हितकारी शिक्षा का प्रचार भी करेंगे, ऐसी शिक्षा जो तुम्हें मार्ग पर ले चलेगी। हाँ, वे तुझमें, हे मनुष्यात्मा! एक साप्ताहिक, हाँ, यदि आवश्यकता हो, तो दैनिक प्रवचन भी आरम्भ करेंगे, और तुझे ऐसे लाभदायक पाठ सिखाएँगे जो, यदि उन पर ध्यान दिया जाए, तो अन्त में तेरा भला करेंगे। और भली-भाँति चौकस रहो कि तुम उन लोगों को न छोड़ो जिन्हें पकड़ने और क्रूस पर चढ़ाने का आज्ञापत्र तुम्हें मिला है।
‘अब, जैसे मैंने उन आवारों और भगोड़ों को नाम लेकर तुम्हारी आँखों के सामने रख दिया है, वैसे ही मैं तुम्हें यह भी बताऊँगा कि तुम्हारे ही बीच उनमें से कुछ तुम्हें बहकाने के लिए चुपके से घुस आएँगे, हाँ, ऐसे लोग जो धर्म के लिए बड़े उत्सुक और जोशीले दिखाई देंगे, और दिखने में हैं भी। और यदि तुम चौकस न रहे, तो वे तुम्हारी ऐसी हानि करेंगे जिसकी तुम इस समय कल्पना भी नहीं कर सकते।
‘ये, जैसा मैंने कहा, अपने आप को तुम्हारे सामने उन लोगों से भिन्न रंग में प्रकट करेंगे जिनका वर्णन पहले किया गया है। इसलिए, हे मनुष्यात्मा, जागता और सचेत रह, और अपने आप को धोखा खाने न दे।’
