इस पुस्तक में खोजें
यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
अध्याय 5. इम्मानुएल नगर को घेरता है — यह पाठ-विभाजन जॉय चैन द्वारा की गई लिब्रिवॉक्स रिकॉर्डिंग के अनुसार है। बनयन का 1682 का वृत्तान्त लगातार चलता है; ये शीर्षक केवल पाठ में आगे-पीछे जाने की सुविधा के लिए हैं।
तब जब इम्मानुएल ने देखा कि मनुष्यात्मा इस प्रकार पाप में उलझ गया है, तो उसने अपनी सेना को एक साथ बुलाया (क्योंकि अब उसके वचन भी तुच्छ जाने गए थे), और अपनी सारी सेना में यह आज्ञा दी कि नियत समय के लिए तैयार रहें। अब, इसलिए कि मनुष्यात्मा नगर को उचित रीति से लेने का फाटकों से भीतर प्रवेश करने के सिवा — और मुख्यतः कान-फाटक से — और कोई मार्ग न था, उसने अपने कप्तानों और सेनानायकों को आज्ञा दी कि वे अपने युद्ध-मेढ़े, अपने गोफन और अपने सैनिक लाकर आँख-फाटक और कान-फाटक के सामने लगा दें, ताकि वह नगर को ले सके।
जब इम्मानुएल ने डियाबोलस से युद्ध करने के लिए सब कुछ तैयार कर लिया, तो उसने फिर मनुष्यात्मा नगर के पास यह जानने को भेजा कि क्या वे शान्तिपूर्वक अपने आप को सौंप देंगे, या क्या उन्होंने अब भी यह ठान रखा है कि उसे चरम सीमा तक आज़माने पर विवश करें? तब उन्होंने अपने राजा डियाबोलस के साथ मिलकर युद्ध-परिषद बुलाई, और कुछ प्रस्ताव तय किए जो इम्मानुएल के सामने रखे जाएँ, यदि वह उन्हें स्वीकार करे; इस पर वे सहमत हुए; और फिर अगला प्रश्न यह था कि यह सन्देश लेकर किसे भेजा जाए। उस समय मनुष्यात्मा नगर में एक बूढ़ा मनुष्य था, जो डियाबोलोनी था, और उसका नाम था श्रीमान न-झुकनेवाला; वह अपनी चाल में बड़ा हठी मनुष्य था, और डियाबोलस के लिए बड़ा काम करनेवाला था; इसलिए उन्होंने उसी को भेजा, और जो कुछ उसे कहना था वह उसके मुँह में डाल दिया। तब वह चला और इम्मानुएल की छावनी में आया, और जब वह आ पहुँचा, तो उसकी बात सुनने के लिए एक समय नियत किया गया। सो वह उस समय आया, और डियाबोलोनी ढंग के एक-दो शिष्टाचार करने के बाद उसने इस प्रकार कहना आरम्भ किया, ‘महोदय, इसलिए कि सब मनुष्यों पर प्रगट हो जाए कि मेरा स्वामी कैसा भले स्वभाव का राजकुमार है, उसने मुझे आपकी प्रभुता से यह कहने को भेजा है कि युद्ध करने के बजाय वह बड़ी प्रसन्नता से मनुष्यात्मा नगर का आधा भाग आपके हाथ में सौंप देने को तैयार है। इसलिए मुझे यह जानना है कि क्या आपकी महामहिमा इस प्रस्ताव को स्वीकार करेगी।’
तब इम्मानुएल ने कहा, ‘सारा नगर दान और मोल दोनों के द्वारा मेरा है, इसलिए मैं उसका आधा भाग भी कभी न खोऊँगा।’
तब श्रीमान न-झुकनेवाला ने कहा, ‘महोदय, मेरे स्वामी ने कहा है कि यदि वह केवल एक भाग पर अधिकार रख सके, तो वह इस बात से सन्तुष्ट रहेगा कि आप नाम के और उपाधि भर के लिए सब के स्वामी रहें।’
तब इम्मानुएल ने उत्तर दिया, ‘सारा नगर वास्तव में मेरा है, केवल नाम और कहने भर को नहीं; इसलिए मैं मनुष्यात्मा के सब का अकेला स्वामी और अधिकारी रहूँगा, या किसी का भी नहीं।’
तब श्रीमान न-झुकनेवाला ने फिर कहा, ‘महोदय, मेरे स्वामी की उदारता तो देखिए! वह कहता है कि यदि मनुष्यात्मा में उसे केवल कोई एक स्थान दे दिया जाए जहाँ वह एकान्त में रह सके, तो वह सन्तुष्ट रहेगा, और बाकी सब के स्वामी आप रहें।’
तब उस स्वर्णिम राजकुमार ने कहा, ‘जो कुछ पिता मुझे देता है वह सब मेरे पास आएगा; और जो कुछ उसने मुझे दिया है, उसमें से मैं कुछ न खोऊँगा — नहीं, एक खुर या एक बाल तक नहीं। इसलिए मैं उसे रहने के लिए मनुष्यात्मा का छोटे से छोटा कोना भी न दूँगा; मैं सब कुछ अपने ही लिए रखूँगा।’
तब न-झुकनेवाला ने फिर कहा, ‘परन्तु महोदय, मान लीजिए कि मेरा स्वामी सारा नगर आपको सौंप दे, केवल इस शर्त के साथ कि जब कभी वह इस देश में आए, तो पुरानी जान-पहचान के नाते उसे एक बटोही के समान दो दिन, या दस दिन, या एक महीने या इतने ही समय के लिए ठहराया जाए। क्या यह छोटी सी बात भी स्वीकार नहीं की जा सकती?’
तब इम्मानुएल ने कहा, ‘नहीं। वह दाऊद के पास भी एक बटोही के रूप में आया था, और उसके पास अधिक समय ठहरा भी नहीं, फिर भी उसके कारण दाऊद का प्राण जाते-जाते बचा। मैं इस बात पर कभी सहमत न होऊँगा कि उसे फिर कभी वहाँ कोई ठिकाना मिले।’
तब श्रीमान न-झुकनेवाला ने कहा, ‘महोदय, आप तो बहुत कठोर जान पड़ते हैं। मान लीजिए कि मेरा स्वामी वह सब मान ले जो आपकी प्रभुता ने कहा है, बशर्ते कि मनुष्यात्मा में रहनेवाले उसके मित्रों और कुटुम्बियों को नगर में व्यापार करने और अपने वर्तमान घरों में बने रहने की स्वतंत्रता रहे। महोदय, क्या यह स्वीकार नहीं किया जा सकता?’
तब इम्मानुएल ने कहा, ‘नहीं; यह मेरे पिता की इच्छा के विरुद्ध है; क्योंकि सब डियाबोलोनी, और हर प्रकार के डियाबोलोनी, जो अब मनुष्यात्मा में हैं या जो किसी भी समय वहाँ पाए जाएँगे, वे न केवल अपनी भूमि और स्वतंत्रता, वरन् अपने प्राण भी खोएँगे।’
तब श्रीमान न-झुकनेवाला ने फिर कहा, ‘परन्तु महोदय, यदि मेरा स्वामी और महान अधिपति सब कुछ तुझे सौंप दे, तो क्या वह पत्रों के द्वारा, आने-जानेवाले यात्रियों के द्वारा, संयोग से मिलनेवाले अवसरों के द्वारा, और ऐसे ही साधनों से मनुष्यात्मा के साथ किसी प्रकार की पुरानी मित्रता बनाए नहीं रख सकता?’
इम्मानुएल ने उत्तर दिया, ‘नहीं, किसी भी रीति से नहीं; क्योंकि ऐसी कोई भी संगति, मित्रता, घनिष्ठता या जान-पहचान, चाहे वह किसी भी मार्ग, प्रकार या ढंग से बनाए रखी जाए, मनुष्यात्मा को भ्रष्ट करने, उनके स्नेह को मुझसे हटा देने, और मेरे पिता के साथ उनके मेल को संकट में डालने की ओर ले जाएगी।’
श्रीमान न-झुकनेवाला ने इसके आगे यह भी कहा, ‘परन्तु महोदय, क्योंकि मनुष्यात्मा में मेरे स्वामी के बहुत से मित्र हैं, और वे उसे प्रिय हैं, तो यदि वह उनसे विदा हो, तो क्या वह अपनी उदारता और भले स्वभाव के कारण, जैसा उचित समझे, उन्हें अपने उस प्रेम और कृपा के कुछ चिह्न न दे सके जो उसके मन में उनके लिए था, ताकि उसके चले जाने के बाद मनुष्यात्मा अपने पुराने मित्र से कभी पाई हुई कृपा के ऐसे चिह्नों को देखकर उसे स्मरण करे जो कभी उनका राजा था, और उन आनन्द भरे दिनों को भी स्मरण करे जिनका वे कभी-कभी एक साथ आनन्द लेते थे, जब वह और वे मेल से एक साथ रहते थे?’
तब इम्मानुएल ने कहा, ‘नहीं; क्योंकि यदि मनुष्यात्मा मेरा हो जाए, तो मैं न इसकी अनुमति दूँगा और न इस पर सहमत होऊँगा कि मनुष्यात्मा में किसी को दिए गए उपहारों के चिह्न के रूप में डियाबोलस का छोटे से छोटा टुकड़ा, चिथड़ा या धूल का कण भी पीछे छोड़ा जाए, जिससे उस घृणित सहभागिता की याद ताज़ा हो जो उनके और उसके बीच थी।’
‘अच्छा, महोदय,’ श्रीमान न-झुकनेवाला ने कहा, ‘मुझे एक बात और प्रस्तुत करनी है, और तब मैं अपने सौंपे हुए काम के अन्त तक पहुँच जाऊँगा। मान लीजिए कि जब मेरा स्वामी मनुष्यात्मा से चला जाए, तब नगर में रहनेवाले किसी व्यक्ति को कोई ऐसा बड़ा आवश्यक काम आ पड़े कि यदि उसकी उपेक्षा की जाए तो वह व्यक्ति नष्ट हो जाए; और महोदय, मान लीजिए कि उस दशा में मेरे स्वामी और अधिपति के समान और कोई भी सहायता न कर सके, तो क्या ऐसे आवश्यक अवसर पर मेरे स्वामी को बुलवाया नहीं जा सकता? या यदि उसे नगर में आने की अनुमति न हो, तो क्या वह और वह व्यक्ति मनुष्यात्मा के निकट के किसी गाँव में मिलकर, वहाँ सिर जोड़कर बैठ नहीं सकते, और वहाँ उन बातों पर सलाह नहीं कर सकते?’
यह उन फँसानेवाले प्रस्तावों में से अन्तिम था जो श्रीमान न-झुकनेवाला को अपने स्वामी डियाबोलस की ओर से इम्मानुएल के सामने रखने थे; परन्तु इम्मानुएल ने उसे स्वीकार न किया; क्योंकि उसने कहा, ‘जब तेरा स्वामी चला जाएगा, तब मनुष्यात्मा में कोई ऐसा प्रसंग, या बात, या विषय उत्पन्न नहीं हो सकता जिसका समाधान मेरा पिता न कर सके; इसके अतिरिक्त, यदि मनुष्यात्मा में से किसी को सलाह के लिए डियाबोलस के पास जाने दिया जाए, तो यह मेरे पिता की बुद्धि और कौशल का बड़ा अपमान होगा, जबकि उन्हें पहले ही यह आज्ञा दी गई है कि हर एक बात में प्रार्थना और विनती के द्वारा अपने निवेदन मेरे पिता के सम्मुख उपस्थित करें। फिर, यदि यह स्वीकार किया जाए, तो इसका अर्थ यह होगा कि डियाबोलस के लिए, और मनुष्यात्मा में रहनेवाले डियाबोलोनियों के लिए एक द्वार खोल दिया जाए, जिससे वे राजद्रोह की युक्तियाँ गढ़ें, षड्यन्त्र रचें और उन्हें पूरा करें, जिससे मेरे पिता को और मुझे दुःख पहुँचे, और मनुष्यात्मा का पूरा विनाश हो जाए।’
जब श्रीमान न-झुकनेवाला ने यह उत्तर सुना, तो उसने इम्मानुएल से विदा ली और यह कहकर चला गया कि वह इस सारे मामले का समाचार अपने स्वामी के पास ले जाएगा। सो वह चला गया, और मनुष्यात्मा में डियाबोलस के पास आया, और उसे सारी बात बताई, और यह भी कि इम्मानुएल किसी भी रीति से यह स्वीकार नहीं करेगा कि डियाबोलस एक बार बाहर निकल जाने के बाद फिर कभी मनुष्यात्मा नगर में, या उस नगर के किसी भी व्यक्ति के साथ कोई भी सम्बन्ध रखे। जब मनुष्यात्मा और डियाबोलस ने यह वृत्तान्त सुना, तो उन्होंने एक मत होकर यह निश्चय किया कि इम्मानुएल को मनुष्यात्मा से बाहर रखने के लिए अपना पूरा प्रयत्न करेंगे, और बूढ़े कु-विराम को, जिसके विषय में आप पहले सुन चुके हैं, राजकुमार और उसके कप्तानों को यही कहने के लिए भेजा। तब वह बूढ़ा सज्जन कान-फाटक के ऊपर चढ़ आया, और छावनी को पुकारकर कहा कि उसकी बात सुनी जाए; और जब उन्होंने उसकी बात पर कान लगाया, तो उसने कहा, ‘मुझे मेरे महान अधिपति की ओर से यह आज्ञा मिली है कि मैं तुमसे कहूँ कि तुम अपने राजकुमार इम्मानुएल को यह बता दो कि मनुष्यात्मा और उसके राजा ने ठान लिया है कि वे साथ ही खड़े रहेंगे और साथ ही गिरेंगे; और यह कि तुम्हारे राजकुमार का यह सोचना व्यर्थ है कि मनुष्यात्मा कभी उसके हाथ में आएगा, जब तक कि वह उसे बलपूर्वक न ले सके।’ तब कुछ लोगों ने जाकर इम्मानुएल को बताया कि मनुष्यात्मा के एक डियाबोलोनी, बूढ़े कु-विराम ने क्या कहा है। तब राजकुमार ने कहा, ‘मुझे अपनी तलवार का बल आज़माना ही होगा; क्योंकि (मनुष्यात्मा ने मेरे विरुद्ध जितने भी विद्रोह किए और मुझे जितनी भी बार ठुकराया, उन सबके होते हुए भी) मैं घेरा उठाकर चला नहीं जाऊँगा, वरन् निश्चय ही अपने मनुष्यात्मा को ले लूँगा, और उसे उसके शत्रु के हाथ से छुड़ाऊँगा।’ और इसके साथ ही उसने आज्ञा दी कि कप्तान बूअनरगिस, कप्तान दोष-बोध, कप्तान न्याय और कप्तान दण्ड-निष्पादन तुरन्त तुरहियाँ फूँकते, झण्डे लहराते और युद्ध का जयघोष करते हुए कान-फाटक की ओर कूच करें। उसने यह भी चाहा कि कप्तान विश्वास उनके साथ मिल जाए। इसके अतिरिक्त इम्मानुएल ने आज्ञा दी कि कप्तान शुभ-आशा और कप्तान प्रेम आँख-फाटक के सामने मोर्चा बाँधें। उसने यह भी कहा कि उसके बाकी कप्तान और उनके सैनिक नगर के चारों ओर शत्रु के विरुद्ध जहाँ उन्हें सबसे अधिक लाभ मिले वहाँ अपना स्थान लें; और जैसा उसने आज्ञा दी थी, वैसा ही सब किया गया।
तब उसने आज्ञा दी कि संकेत-शब्द दिया जाए, और उस समय का संकेत-शब्द था, ‘इम्मानुएल।’ तब युद्ध का नगाड़ा बजाया गया, और युद्ध-मेढ़े चलाए गए, और गोफन पूरे बल से नगर में पत्थर बरसाने लगे, और इस प्रकार युद्ध आरम्भ हुआ। अब डियाबोलस स्वयं युद्ध में नगरवासियों का संचालन कर रहा था, और वह भी हर एक फाटक पर; इसलिए उनका प्रतिरोध और भी अधिक प्रबल, नारकीय और इम्मानुएल के लिए कष्टदायक था। इस प्रकार वह भला राजकुमार कई दिनों तक लगातार डियाबोलस और मनुष्यात्मा से जूझता रहा; और यह देखने योग्य दृश्य था कि इस युद्ध में शद्दै के कप्तानों ने कैसा पराक्रम दिखाया।
और सबसे पहले कप्तान बूअनरगिस (दूसरों को कम आँके बिना) — उसने कान-फाटक पर एक के बाद एक तीन अत्यन्त भयंकर आक्रमण किए, यहाँ तक कि उसके खम्भे हिल उठे। कप्तान दोष-बोध भी जितनी शीघ्रता से हो सका बूअनरगिस के साथ आ मिला, और जब दोनों ने देखा कि फाटक ढीला पड़ने लगा है, तो उन्होंने आज्ञा दी कि युद्ध-मेढ़े उस पर लगातार चलाए जाते रहें। अब कप्तान दोष-बोध फाटक के बहुत निकट चला गया, और बड़े बल से पीछे धकेल दिया गया, और उसके मुँह में तीन घाव लगे। और जो लोग बिना पद के स्वयंसेवक होकर घोड़ों पर सवार थे, वे कप्तानों का उत्साह बढ़ाते हुए इधर-उधर घूमते रहे।
पहले बताए गए उन दो कप्तानों की वीरता के कारण राजकुमार ने उन्हें अपने तम्बू में बुलवाया, और आज्ञा दी कि वे कुछ समय विश्राम करें और कुछ खा-पीकर ताज़ा हो जाएँ। कप्तान दोष-बोध की भी चिन्ता की गई कि उसके घाव भर जाएँ। राजकुमार ने उनमें से हर एक को सोने की एक-एक ज़ंजीर भी दी, और उनसे कहा कि अब भी ढाढ़स बाँधे रहें।
न कप्तान शुभ-आशा और न कप्तान प्रेम इस अत्यन्त घमासान लड़ाई में पीछे रहे, क्योंकि उन्होंने आँख-फाटक पर ऐसी वीरता दिखाई कि उसे लगभग पूरी तरह तोड़कर खोल डाला। इन्हें भी अपने राजकुमार से पुरस्कार मिला, और बाकी कप्तानों को भी, क्योंकि उन्होंने नगर के चारों ओर वीरता से युद्ध किया था।
इस मुठभेड़ में डियाबोलस के कई अधिकारी मारे गए, और कुछ नगरवासी घायल हुए। अधिकारियों में से कप्तान डींगबाज़ नाम का एक व्यक्ति मारा गया। इस डींगबाज़ का विचार था कि कोई भी कान-फाटक के खम्भों को नहीं हिला सकता, और न डियाबोलस के मन को हिला सकता है। उसके बाद कप्तान निश्चिन्त नाम का एक व्यक्ति मारा गया: यह निश्चिन्त कहा करता था कि मनुष्यात्मा के अन्धे और लँगड़े भी इम्मानुएल की सेना से नगर के फाटकों की रक्षा कर सकते हैं। इसी कप्तान निश्चिन्त का सिर कप्तान दोष-बोध ने दोनों हाथों से चलाई जानेवाली तलवार से चीर डाला, उसी समय जब उसे स्वयं मुँह में तीन घाव लगे थे।
इनके अतिरिक्त कप्तान शेखीबाज़ नाम का एक व्यक्ति था, जो बड़ा दुस्साहसी था, और वह ऐसे लोगों के एक दल का कप्तान था जो जलती लकड़ियाँ, तीर और मृत्यु फेंकते थे: उसे भी आँख-फाटक पर कप्तान शुभ-आशा के हाथ से छाती में प्राणघातक घाव लगा।
इसके अतिरिक्त श्रीमान अनुभूति नाम का एक व्यक्ति था; वह कप्तान तो नहीं था, परन्तु मनुष्यात्मा को विद्रोह के लिए उकसाने में बड़ा जोशीला था। बूअनरगिस के सैनिकों में से एक के हाथ से उसकी आँख में घाव लगा, और स्वयं कप्तान के हाथ से वह मारा भी जाता, यदि वह अचानक पीछे न हट जाता।
परन्तु मैंने अपने सारे जीवन में इच्छाप्रबल को कभी इतना हताश नहीं देखा; वह पहले की तरह कुछ न कर सका, और कुछ लोग कहते हैं कि उसके पैर में भी घाव लगा था, और यह कि राजकुमार की सेना के कुछ लोगों ने निश्चय ही उसे बाद में शहरपनाह पर चलते समय लँगड़ाते देखा।
नगर में जो सैनिक मारे गए, उनके नामों का विस्तृत विवरण मैं आपको नहीं दूँगा, क्योंकि बहुत से अपंग हुए, घायल हुए और मारे गए; क्योंकि जब उन्होंने देखा कि कान-फाटक के खम्भे हिल रहे हैं, और आँख-फाटक लगभग पूरी तरह टूटकर खुल गया है, और उनके कप्तान भी मारे गए हैं, तो इससे बहुत से डियाबोलोनियों का साहस टूट गया; वे उस गोलाबारी के बल से भी गिरे जो स्वर्णिम गोफनों से मनुष्यात्मा नगर के बीचों-बीच फेंकी जा रही थी।
नगरवासियों में भलाई-न-चाहनेवाला नाम का एक व्यक्ति था; वह नगरवासी तो था, परन्तु डियाबोलोनी था; उसे भी मनुष्यात्मा में प्राणघातक घाव लगा, परन्तु वह तुरन्त नहीं मरा।
श्रीमान कु-विराम को भी, जो वही मनुष्य था जो डियाबोलस के साथ उस समय आया था जब उसने पहले-पहल मनुष्यात्मा को लेने का प्रयत्न किया था, सिर में गहरा घाव लगा; कुछ लोग कहते हैं कि उसकी खोपड़ी चटक गई थी। मैंने यह बात ध्यान से देखी है कि इसके बाद वह मनुष्यात्मा की वैसी हानि फिर कभी न कर सका जैसी वह बीते दिनों में करता था। बूढ़ा पूर्वाग्रह और श्रीमान कुछ-भी भी भाग गए।
अब, जब युद्ध समाप्त हुआ, तो राजकुमार ने आज्ञा दी कि मनुष्यात्मा नगर के सामने अनुग्रह-पर्वत पर एक बार फिर श्वेत झण्डा खड़ा किया जाए, यह दिखाने के लिए कि इम्मानुएल के पास अब भी उस अभागे मनुष्यात्मा नगर के लिए अनुग्रह है।
जब डियाबोलस ने श्वेत झण्डे को फिर फहराया हुआ देखा, और यह जानते हुए कि वह उसके लिए नहीं, वरन् मनुष्यात्मा के लिए है, तो उसने मन में एक और चाल चलने का विचार किया, अर्थात् यह देखने का कि क्या सुधार की प्रतिज्ञा पर इम्मानुएल अपना घेरा उठाकर चला जाएगा। सो एक सन्ध्या, सूर्य डूबने के काफ़ी देर बाद, वह फाटक पर उतर आया, और इम्मानुएल से बात करने के लिए पुकारा, और वह तुरन्त फाटक पर उतर आया, और डियाबोलस ने उससे कहा:
‘इसलिए कि तू अपने श्वेत झण्डे के द्वारा यह प्रगट करता है कि तू पूरी तरह शान्ति और चैन के पक्ष में है, मैंने उचित समझा कि तुझे बता दूँ कि हम उसे ऐसी शर्तों पर स्वीकार करने को तैयार हैं जिन्हें तू मान सके।
‘मैं जानता हूँ कि तू भक्ति में लगा रहता है, और पवित्रता तुझे भाती है; हाँ, मनुष्यात्मा पर युद्ध करने में तेरा बड़ा उद्देश्य यही है कि वह एक पवित्र निवासस्थान बने। अच्छा, तू अपनी सेनाओं को नगर से हटा ले, और मैं मनुष्यात्मा को तेरे धनुष के आगे झुका दूँगा।
‘पहले तो, मैं तेरे विरुद्ध सब शत्रुता के काम छोड़ दूँगा, और तेरा प्रतिनिधि बनने को तैयार रहूँगा, और जैसे मैं पहले तेरे विरोध में था, वैसे ही अब मनुष्यात्मा नगर में तेरी सेवा करूँगा। और विशेष रूप से,
‘1. मैं मनुष्यात्मा को समझाऊँगा कि वे तुझे अपना स्वामी करके ग्रहण करें; और मैं जानता हूँ कि जब वे समझेंगे कि मैं तेरा प्रतिनिधि हूँ, तो वे ऐसा और भी शीघ्र करेंगे।
‘2. मैं उन्हें दिखाऊँगा कि उन्होंने किन बातों में भूल की है, और यह कि अपराध जीवन के मार्ग में बाधा बनकर खड़ा है।
‘3. मैं उन्हें वह पवित्र व्यवस्था दिखाऊँगा जिसके अनुरूप उन्हें चलना है, अर्थात् वही जिसे उन्होंने तोड़ा है।
‘4. मैं तेरी व्यवस्था के अनुसार सुधार की आवश्यकता पर उन्हें ज़ोर देकर समझाऊँगा।
‘5. और इसके अतिरिक्त, इसलिए कि इनमें से कोई भी बात विफल न हो, मैं स्वयं अपने ही ख़र्च और व्यय से मनुष्यात्मा में एक पर्याप्त सेवकाई स्थापित करूँगा और उसे बनाए रखूँगा, और उसके अतिरिक्त धर्म-व्याख्यानों का भी प्रबन्ध करूँगा।
‘6. तुझे हमारी अधीनता के चिह्न के रूप में साल-दर-साल वह सब मिलेगा जो तू हम पर लगाना और हमसे वसूल करना उचित समझे, हमारी अधीनता के चिह्न के रूप में।’
तब इम्मानुएल ने उससे कहा, ‘हे छल से भरे हुए, तेरी चालें कैसी बदलती रहती हैं! तूने कितनी बार अपनी बात बदली और फिर बदली, केवल इसलिए कि किसी रीति से मेरे मनुष्यात्मा पर अपना अधिकार बनाए रख सके, यद्यपि, जैसा पहले स्पष्ट रूप से कहा जा चुका है, उसका सच्चा उत्तराधिकारी मैं हूँ! तू पहले ही बहुत बार अपने प्रस्ताव रख चुका है, और यह अन्तिम प्रस्ताव उनसे रत्ती भर भी अच्छा नहीं है। और जब तू अपने काले रूप में प्रगट होकर धोखा देने में विफल रहा, तो अब तूने अपने आप को ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण कर लिया है, और धोखा देने के लिए अब धार्मिकता का सेवक बनना चाहता है।
‘परन्तु हे डियाबोलस, तू जान ले कि जो कुछ तू प्रस्तुत कर सकता है उस पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि तू जो कुछ भी करता है वह केवल धोखा देने के लिए करता है। न तो तेरे मन में परमेश्वर के प्रति विवेक है, और न मनुष्यात्मा नगर के प्रति प्रेम; तो फिर तेरी ये बातें पापमय धूर्तता और छल के सिवा और कहाँ से उत्पन्न हो सकती हैं? जो मनमाने ढंग से और अपनी इच्छा से जो चाहे प्रस्तुत कर सकता है, और ऐसी बात भी जिससे वह अपने ऊपर विश्वास करनेवालों का नाश कर सके, उसे उसकी सब बातों सहित त्याग देना चाहिए। परन्तु यदि धार्मिकता अब तेरी आँखों में ऐसी सुन्दरता की बात है, तो यह कैसे हुआ कि पहले तू दुष्टता से इतना चिपका रहा? परन्तु यह तो प्रसंगवश कही गई बात है।
‘तू अब मनुष्यात्मा में सुधार की बात करता है, और यह कि यदि मैं चाहूँ तो तू स्वयं उस सुधार का अगुवा बनेगा; और यह सब करते हुए तू भली-भाँति जानता है कि व्यवस्था और उसकी धार्मिकता में मनुष्य जितनी भी बड़ी से बड़ी उन्नति कर सके, वह मनुष्यात्मा पर से श्राप को हटाने के लिए ठीक कुछ भी नहीं के बराबर होगी; क्योंकि जब मनुष्यात्मा ने व्यवस्था तोड़ दी, जिसके लिए पहले ही, उसके तोड़े जाने की दशा में, परमेश्वर की ओर से उस पर श्राप सुनाया जा चुका था, तो वह व्यवस्था का पालन करके अपने आप को उससे कभी छुड़ा नहीं सकता (यह तो कहना ही क्या कि जब शैतान ही बुराई का सुधारक बन जाए, तब मनुष्यात्मा में कैसा सुधार स्थापित होगा)। तू जानता है कि इस विषय में तूने अभी जो कुछ कहा है वह कपट और छल के सिवा और कुछ नहीं; और जैसे वह तेरा पहला पत्ता था, वैसे ही यह तेरा अन्तिम पत्ता है जो तुझे खेलना है। बहुत से ऐसे हैं जो तुझे उस समय शीघ्र पहचान लेते हैं जब तू उन्हें अपना फटा हुआ खुर दिखाता है; परन्तु अपने श्वेत रूप में, अपने ज्योतिर्मय रूप में और अपने बदले हुए रूप में तू थोड़े ही लोगों को पहचान में आता है। परन्तु हे डियाबोलस, तू मेरे मनुष्यात्मा के साथ ऐसा न करने पाएगा; क्योंकि मैं अब भी अपने मनुष्यात्मा से प्रेम करता हूँ।
‘इसके अतिरिक्त, मैं इसलिए नहीं आया कि मनुष्यात्मा को कर्मों पर लगाऊँ कि वह उनके द्वारा जीवित रहे; यदि मैं ऐसा करूँ, तो मैं तेरे ही समान हो जाऊँगा: परन्तु मैं इसलिए आया हूँ कि मेरे द्वारा, और जो कुछ मेरे पास है और जो मैं मनुष्यात्मा के लिए करूँगा उसके द्वारा, उनका मेरे पिता से मेल हो जाए, यद्यपि उन्होंने अपने पाप के द्वारा उसे क्रोध दिलाया है, और यद्यपि वे व्यवस्था के द्वारा दया प्राप्त नहीं कर सकते।
‘तू इस नगर को भलाई के अधीन करने की बात करता है, जबकि कोई भी तेरे हाथों से यह नहीं चाहता। मुझे मेरे पिता ने भेजा है कि मैं स्वयं इस पर अधिकार करूँ, और अपने हाथों के कौशल से इसकी ऐसी अगुवाई करूँ कि यह उसके ऐसे अनुरूप हो जाए जो उसकी दृष्टि में भाए। इसलिए मैं स्वयं इस पर अधिकार करूँगा; मैं तुझे बेदख़ल करके बाहर निकाल दूँगा; मैं उनके बीच में अपना झण्डा खड़ा करूँगा; मैं नई व्यवस्थाओं, नए अधिकारियों, नई प्रेरणाओं और नए मार्गों के द्वारा उन पर शासन भी करूँगा; हाँ, मैं इस नगर को ढा दूँगा, और इसे फिर से बनाऊँगा; और यह ऐसा हो जाएगा मानो पहले था ही नहीं, और तब यह सारे विश्व की महिमा होगा।’
जब डियाबोलस ने यह सुना, और समझ गया कि उसके सब छल पकड़े गए हैं, तो वह घबरा गया, और पूरी तरह निरुत्तर हो गया; परन्तु क्योंकि उसके भीतर शद्दै और उसके पुत्र, और प्रिय मनुष्यात्मा नगर, तीनों के विरुद्ध अधर्म, रोष और द्वेष का सोता था, तो उसने और क्या किया, सिवा इसके कि जितना हो सका अपने आप को दृढ़ किया कि कुलीन राजकुमार इम्मानुएल से फिर नए सिरे से युद्ध करे? तो अब मनुष्यात्मा नगर के ले लिए जाने से पहले हमें एक और लड़ाई देखनी होगी। तो हे सैनिक कार्रवाइयाँ देखना पसन्द करनेवालो, आप पहाड़ों पर चढ़ आइए, और दोनों पक्षों को देखिए कि किस प्रकार निर्णायक प्रहार किया जाता है, जबकि एक उस प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर को अपने पास बनाए रखना चाहता है, और दूसरा उसका स्वामी बनना चाहता है।
इसलिए डियाबोलस शहरपनाह से हटकर अपनी उस सेना के पास चला गया जो मनुष्यात्मा नगर के बीचों-बीच थी, और इम्मानुएल भी छावनी को लौट गया; और दोनों ने अपने-अपने ढंग से एक-दूसरे से युद्ध करने के योग्य मोर्चा बाँधा।
डियाबोलस, प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर को अपने हाथों में बनाए रखने के विषय में निराशा से भरकर, यह निश्चय कर बैठा कि राजकुमार की सेना की और प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर की जितनी हानि कर सके, करेगा (यदि वह वास्तव में कुछ कर भी सकता); क्योंकि, हाय! डियाबोलस का उद्देश्य उस भोले मनुष्यात्मा नगर का सुख नहीं था, वरन् उसका पूरा विनाश और सर्वनाश था, जैसा कि अब भली-भाँति दिखाई दे रहा है। इसलिए उसने अपने अधिकारियों को आज्ञा दी कि जब वे देखें कि वे नगर को और अधिक समय तक नहीं रोक सकते, तब उसकी जितनी हानि और बुराई कर सकें, करें, और पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को फाड़ें और चीर डालें। ‘क्योंकि,’ उसने कहा, ‘इस स्थान को इस प्रकार छोड़ देने से कि यह इम्मानुएल का निवासस्थान बन सके, अच्छा यह होगा कि हम इसे पूरी तरह ढा दें और इसे खण्डहरों का ढेर बनाकर छोड़ें।’
इधर इम्मानुएल ने, यह जानते हुए कि अगली लड़ाई का परिणाम यह होगा कि वह उस स्थान का स्वामी बन जाएगा, अपने सब अधिकारियों, बड़े कप्तानों और योद्धाओं को एक राजकीय आज्ञा दी कि वे डियाबोलस और सब डियाबोलोनियों के विरुद्ध तो निश्चय ही अपने आप को योद्धा प्रमाणित करें; परन्तु मनुष्यात्मा के पुराने निवासियों के प्रति कृपालु, दयालु और नम्र रहें। उस कुलीन राजकुमार ने कहा, ‘इसलिए युद्ध का सबसे प्रचण्ड मोर्चा डियाबोलस और उसके लोगों के विरुद्ध मोड़ो।’
सो जब वह दिन आया, तो आज्ञा दी गई, और राजकुमार के लोग वीरता से अपने हथियारों के साथ डटे रहे, और पहले की तरह अपना मुख्य बल कान-फाटक और आँख-फाटक के विरुद्ध लगाया। उस समय संकेत-शब्द था, ‘मनुष्यात्मा जीत लिया गया!’ सो उन्होंने नगर पर धावा बोला। डियाबोलस ने भी जितनी शीघ्रता से हो सका, अपने मुख्य बल के साथ भीतर से प्रतिरोध किया; और उसके बड़े लॉर्ड और प्रमुख कप्तान कुछ समय तक राजकुमार की सेना से बड़ी क्रूरता से लड़ते रहे।
परन्तु राजकुमार और उसके कुलीन कप्तानों के तीन-चार उल्लेखनीय धावों के बाद कान-फाटक टूटकर खुल गया, और वे अर्गलाएँ और सिटकनियाँ, जिनसे वह राजकुमार के विरुद्ध कसकर बन्द रखा जाता था, टूटकर हज़ार टुकड़े हो गईं। तब राजकुमार की तुरहियाँ बजीं, कप्तानों ने जयघोष किया, नगर काँप उठा, और डियाबोलस पीछे हटकर अपने गढ़ में जा छिपा। अच्छा, जब राजकुमार की सेनाओं ने फाटक तोड़कर खोल दिया, तो वह स्वयं ऊपर आया और उसमें अपना सिंहासन स्थापित किया; उसने उसके निकट एक टीले पर अपना झण्डा भी खड़ा किया, जिसे उसके लोगों ने पहले ही उस पर बड़े-बड़े गोफन रखने के लिए बनाया था। उस टीले का नाम सुश्रवण-पर्वत था। सो राजकुमार वहीं, अर्थात् फाटक के प्रवेश-द्वार के ठीक पास, ठहरा रहा। उसने यह भी आज्ञा दी कि स्वर्णिम गोफन अब भी नगर पर चलाए जाते रहें, विशेषकर गढ़ के विरुद्ध, क्योंकि डियाबोलस शरण लेने के लिए वहीं पीछे हट गया था। अब कान-फाटक से सड़क सीधी श्रीमान अभिलेखक के घर तक जाती थी, जो डियाबोलस के नगर लेने से पहले अभिलेखक था; और उसके घर के ठीक पास वह गढ़ था, जिसे डियाबोलस ने बहुत समय से अपनी घिनौनी माँद बना रखा था। इसलिए कप्तानों ने अपने गोफनों के प्रयोग से उस सड़क को शीघ्र ही साफ़ कर दिया, जिससे नगर के बीचों-बीच तक मार्ग बन गया। तब राजकुमार ने आज्ञा दी कि कप्तान बूअनरगिस, कप्तान दोष-बोध और कप्तान न्याय तुरन्त नगर में आगे बढ़कर उस बूढ़े सज्जन के फाटक तक कूच करें। तब कप्तानों ने अत्यन्त युद्ध-सज्जित ढंग से मनुष्यात्मा नगर में प्रवेश किया, और लहराते झण्डों के साथ भीतर कूच करते हुए वे अभिलेखक के घर तक आ पहुँचे, और वह घर लगभग उस गढ़ के बराबर ही दृढ़ था। वे अपने साथ युद्ध-मेढ़े भी ले गए, ताकि उन्हें गढ़ के फाटकों के विरुद्ध लगाएँ। जब वे श्रीमान विवेक के घर पर पहुँचे, तो उन्होंने द्वार खटखटाया, और भीतर आने की माँग की। अब वह बूढ़ा सज्जन, अभी तक उनके उद्देश्य को पूरी तरह न जानने के कारण, इस सारी लड़ाई के समय अपने फाटक बन्द रखे हुए था। इसलिए बूअनरगिस ने उसके फाटकों पर प्रवेश की माँग की; और जब किसी ने उत्तर न दिया, तो उसने युद्ध-मेढ़े के सिर से उस पर एक प्रहार किया, और इससे वह बूढ़ा सज्जन काँप उठा, और उसका घर थरथराने और डगमगाने लगा। तब श्रीमान अभिलेखक नीचे फाटक पर आया, और जैसे-तैसे काँपते होंठों से उसने पूछा कि वहाँ कौन है? बूअनरगिस ने उत्तर दिया, ‘हम महान शद्दै के और उसके पुत्र, धन्य इम्मानुएल के कप्तान और सेनानायक हैं, और हम अपने कुलीन राजकुमार के उपयोग के लिए तुम्हारे घर पर अधिकार की माँग करते हैं।’ और इसके साथ ही युद्ध-मेढ़े ने फाटक को एक और झटका दिया। इससे वह बूढ़ा सज्जन और भी अधिक काँपने लगा, फिर भी फाटक खोलने के सिवा उसका और कुछ करने का साहस न हुआ: तब राजा की सेनाएँ, अर्थात् पहले बताए गए वे तीन वीर कप्तान, भीतर चली आईं। अब अभिलेखक का घर इम्मानुएल के लिए बड़ी सुविधा का स्थान था, न केवल इसलिए कि वह गढ़ के निकट और दृढ़ था, वरन् इसलिए भी कि वह बड़ा था, और गढ़ के, अर्थात् उस माँद के, ठीक सामने था जहाँ अब डियाबोलस था, क्योंकि अब वह अपने गढ़ से बाहर निकलने से डरता था। जहाँ तक श्रीमान अभिलेखक की बात है, कप्तानों ने उसके साथ बड़ा संयमित और रूखा व्यवहार रखा; अब तक वह इम्मानुएल की बड़ी योजनाओं के विषय में कुछ नहीं जानता था, इसलिए उसकी समझ में नहीं आता था कि क्या सोचे, और न यह कि ऐसे गर्जनभरे आरम्भ का अन्त क्या होगा। नगर में तुरन्त यह चर्चा भी फैल गई कि किस प्रकार अभिलेखक के घर पर अधिकार कर लिया गया है, उसके कमरे ले लिए गए हैं, और उसका भवन युद्ध का केन्द्र बना दिया गया है; और जैसे ही यह बात फैली, वैसे ही लोग बड़े जोश से घबरा उठे, और उन्होंने यह बात उसके दूसरे मित्रों तक भी पहुँचा दी; और आप जानते हैं, जैसे बर्फ़ का गोला लुढ़कने से कुछ नहीं खोता, वैसे ही थोड़े ही समय में सारे नगर के मन में यह बात बैठ गई कि उन्हें राजकुमार से विनाश के सिवा और किसी बात की आशा नहीं रखनी चाहिए; और इस सारी बात की जड़ यह थी कि अभिलेखक डरा हुआ था, अभिलेखक काँप रहा था, और कप्तान अभिलेखक के साथ अजनबियों जैसा व्यवहार कर रहे थे। सो बहुत से लोग देखने आए, परन्तु जब उन्होंने अपनी ही आँखों से कप्तानों को उस भवन में देखा, और उनके युद्ध-मेढ़ों को गढ़ के फाटकों को तोड़ गिराने के लिए लगातार उन पर चलते देखा, तो उनका भय और भी पक्का हो गया, और वे सब के सब चकित रह गए। और, जैसा मैंने कहा, घर का स्वामी यह सब और भी बढ़ा देता था; क्योंकि जो कोई उसके पास आता या उससे बात करता, वह उससे और कुछ न कहता, न कुछ बताता, न कुछ सुनता, केवल यही कि अब मनुष्यात्मा के सामने मृत्यु और विनाश खड़े हैं।
‘क्योंकि,’ उस बूढ़े सज्जन ने कहा, ‘तुम सब जानते हो कि हम सब उस राजकुमार इम्मानुएल के साथ विश्वासघात करते रहे हैं, जो कभी तुच्छ जाना गया था, परन्तु अब प्रसिद्ध विजेता और महिमामय है; क्योंकि, जैसा तुम देखते हो, अब वह न केवल हमें चारों ओर से कसकर घेरे हुए है, वरन् बलपूर्वक हमारे फाटकों में प्रवेश भी कर चुका है। इसके अतिरिक्त, डियाबोलस उसके सामने से भाग रहा है; और, जैसा तुम देख रहे हो, उसने मेरे घर को उस गढ़ के विरुद्ध, जहाँ डियाबोलस है, एक सैनिक चौकी बना दिया है। जहाँ तक मेरी बात है, मैंने बड़ा अपराध किया है, और जो शुद्ध है, उसके लिए भला है। परन्तु मैं कहता हूँ कि मैंने बड़ा अपराध किया है — जब मुझे बोलना चाहिए था तब चुप रहकर, और जब मुझे न्याय करना चाहिए था तब न्याय को बिगाड़कर। यह सच है कि राजा शद्दै की व्यवस्थाओं का पक्ष लेने के कारण मैंने डियाबोलस के हाथ से कुछ दुःख उठाया है; परन्तु, हाय! उससे क्या होगा? क्या उससे उन विद्रोहों और विश्वासघातों की क्षतिपूर्ति हो जाएगी जो मैंने किए हैं, और जिन्हें मैंने बिना विरोध किए मनुष्यात्मा नगर में होने दिया है? ओह! मैं यह सोचकर काँप उठता हूँ कि ऐसे भयानक और ऐसे क्रोध भरे आरम्भ का अन्त क्या होगा!’
अब, जब ये वीर कप्तान बूढ़े अभिलेखक के घर में इस प्रकार व्यस्त थे, तब कप्तान दण्ड-निष्पादन नगर के दूसरे भागों में पिछली गलियों और शहरपनाह को अपने अधिकार में करने में उतना ही व्यस्त था। उसने लॉर्ड इच्छाप्रबल का भी कड़ा पीछा किया; उसे किसी कोने में चैन न लेने दिया; उसने उसका इतना कड़ा पीछा किया कि उसके आदमियों को उससे अलग कर दिया, और उसकी ऐसी दशा कर दी कि वह किसी बिल में अपना सिर घुसा पाने में ही अपनी कुशल समझने लगा। इस पराक्रमी योद्धा ने लॉर्ड इच्छाप्रबल के तीन अधिकारियों को भी काटकर धरती पर गिरा दिया: उनमें से एक बूढ़ा श्रीमान पूर्वाग्रह था, वही जिसका सिर उस विद्रोह में फूटा था। इस मनुष्य को लॉर्ड इच्छाप्रबल ने कान-फाटक का रक्षक बनाया था, और वह कप्तान दण्ड-निष्पादन के हाथ से मारा गया। एक और था, श्रीमान बुराई-के-सिवा-सबमें-पिछड़ा, और वह भी लॉर्ड इच्छाप्रबल के अधिकारियों में से एक था, और उन दो तोपों का कप्तान था जो कभी कान-फाटक के ऊपर चढ़ाई गई थीं; उसे भी कप्तान दण्ड-निष्पादन ने अपने हाथों से काटकर धरती पर गिरा दिया। इन दोनों के अतिरिक्त एक और, तीसरा था, और उसका नाम था कप्तान विश्वासघाती; यह एक नीच मनुष्य था, परन्तु ऐसा व्यक्ति जिस पर इच्छाप्रबल बहुत भरोसा रखता था; परन्तु उसे भी इस कप्तान दण्ड-निष्पादन ने बाकियों के साथ काटकर धरती पर गिरा दिया।
उसने मेरे लॉर्ड इच्छाप्रबल के सैनिकों का भी बड़ा संहार किया, और बहुतों को, जो हट्टे-कट्टे और बलवन्त थे, मार डाला, और बहुतों को, जो डियाबोलस के लिए फुर्तीले और सक्रिय थे, घायल किया। परन्तु ये सब डियाबोलोनी थे; मनुष्यात्मा का एक भी मूल निवासी घायल नहीं हुआ।
दूसरे कप्तानों ने भी इसी प्रकार युद्ध के और भी पराक्रम किए, जैसे आँख-फाटक पर, जहाँ कप्तान शुभ-आशा और कप्तान प्रेम के हाथ में मोर्चा था, बड़ा संहार हुआ; क्योंकि कप्तान शुभ-आशा ने अपने ही हाथों से उस फाटक के रक्षक, कप्तान आँखों-पर-पट्टी नाम के एक व्यक्ति को मार डाला। यह आँखों-पर-पट्टी हज़ार सैनिकों का कप्तान था, और वे वही थे जो भारी मुगदरों से लड़ते थे; उसने उसके आदमियों का भी पीछा किया, बहुतों को मार डाला, और उससे भी अधिक को घायल किया, और बाकियों को कोनों में अपना सिर छिपाने पर विवश कर दिया।
उस फाटक पर श्रीमान कु-विराम भी था, जिसके विषय में आप पहले सुन चुके हैं। वह एक बूढ़ा मनुष्य था, और उसकी दाढ़ी उसके कमरबन्द तक लटकती थी: यह वही था जो डियाबोलस का वक्ता था: उसने मनुष्यात्मा नगर में बहुत बुराई की थी, और वह कप्तान शुभ-आशा के हाथ से मारा गया।
मैं और क्या कहूँ? उन दिनों डियाबोलोनी हर कोने में मरे पड़े थे, यद्यपि बहुत अधिक अब भी मनुष्यात्मा में जीवित थे।
अब बूढ़ा अभिलेखक और मेरे लॉर्ड समझ, नगर के कुछ अन्य प्रमुख लोगों के साथ, अर्थात् ऐसे लोगों के साथ जो जानते थे कि उन्हें प्रसिद्ध मनुष्यात्मा नगर के साथ ही खड़ा रहना और गिरना है, एक दिन एकत्र हुए, और परामर्श करने के बाद मिलकर यह निश्चय किया कि एक विनती-पत्र तैयार करें और उसे इम्मानुएल के पास भेजें, अब जबकि वह मनुष्यात्मा के फाटक में बैठा था। सो उन्होंने इम्मानुएल के लिए अपना विनती-पत्र तैयार किया, जिसकी विषय-वस्तु यह थी: कि वे, अब दयनीय दशा में पड़े मनुष्यात्मा नगर के पुराने निवासी, अपने पाप को मान लेते हैं, और इस बात के लिए दुःखी हैं कि उन्होंने उसकी राजकुमारोचित महिमा को ठेस पहुँचाई है, और विनती करते हैं कि वह उनके प्राण बचा ले।
इस विनती-पत्र का उसने कोई भी उत्तर न दिया, और इससे वे और भी अधिक व्याकुल हो गए। अब, इस सारे समय में, जो कप्तान अभिलेखक के घर में थे, वे गढ़ के फाटकों को तोड़ गिराने के लिए उन पर युद्ध-मेढ़े चला रहे थे। सो कुछ समय, परिश्रम और कष्ट के बाद गढ़ का वह फाटक, जिसका नाम अभेद्य था, टूटकर खुल गया, और कई टुकड़ों में बिखर गया, और इस प्रकार उस गढ़ तक ऊपर जाने का मार्ग बन गया जिसमें डियाबोलस ने अपने आप को छिपा रखा था। तब कान-फाटक पर यह समाचार भेजा गया, क्योंकि इम्मानुएल अब भी वहीं ठहरा हुआ था, ताकि उसे पता चले कि मनुष्यात्मा के गढ़ के फाटकों में होकर भीतर जाने का मार्ग बन गया है। परन्तु, ओह! यह समाचार सुनकर राजकुमार की सारी छावनी में तुरहियाँ कैसी गूँज उठीं, क्योंकि अब युद्ध अपने अन्त के इतने निकट था, और मनुष्यात्मा स्वयं स्वतंत्र होने के इतने निकट था।
तब राजकुमार अपने स्थान से उठा, और अपने योद्धाओं में से उन्हें साथ लिया जो उस अभियान के लिए सबसे योग्य थे, और मनुष्यात्मा की सड़क पर होते हुए बूढ़े अभिलेखक के घर तक कूच किया।
अब राजकुमार स्वयं सिर से पाँव तक सोने के कवच से सुसज्जित था, और इसी प्रकार वह अपने आगे-आगे अपना झण्डा उठवाए हुए नगर में आगे बढ़ा; परन्तु सारे मार्ग में जाते हुए उसने अपना मुख बहुत गम्भीर और संयत रखा, जिससे लोग उसके चेहरे को देखकर यह न समझ सके कि उसमें प्रेम पढ़ें या बैर। अब, जब वह सड़क पर आगे बढ़ रहा था, तो नगर के लोग हर द्वार से बाहर निकलकर देखने लगे, और वे उसके व्यक्तित्व और उसकी महिमा पर मोहित हुए बिना न रह सके, परन्तु उसके मुख की गम्भीरता पर अचम्भा करते थे; क्योंकि अब तक वह उनसे शब्दों या मुस्कानों की अपेक्षा अपने कार्यों और कामों के द्वारा अधिक बोल रहा था। परन्तु बेचारे मनुष्यात्मा ने भी (जैसा ऐसी दशाओं में सब करने को प्रवृत्त होते हैं) इम्मानुएल के अपने प्रति व्यवहार का अर्थ वैसे ही लगाया जैसे यूसुफ के भाइयों ने उसके अपने प्रति व्यवहार का लगाया था, अर्थात् बिलकुल उलटा। ‘क्योंकि,’ उन्होंने सोचा, ‘यदि इम्मानुएल हमसे प्रेम करता, तो वह इसे हम पर शब्द या व्यवहार के द्वारा प्रगट करता; परन्तु इनमें से वह कुछ भी नहीं करता, इसलिए इम्मानुएल हमसे बैर रखता है। अब यदि इम्मानुएल हमसे बैर रखता है, तो मनुष्यात्मा घात किया जाएगा, तो मनुष्यात्मा घूरा बन जाएगा।’ वे जानते थे कि उन्होंने उसके पिता की व्यवस्था का उल्लंघन किया है, और यह कि वे उसके विरुद्ध उसके शत्रु डियाबोलस से मिले रहे हैं। वे यह भी जानते थे कि राजकुमार इम्मानुएल यह सब जानता है; क्योंकि उन्हें निश्चय हो गया था कि वह परमेश्वर के दूत के समान है, जो पृथ्वी पर होनेवाली सब बातों को जानता है; और इससे वे सोचने लगे कि उनकी दशा दयनीय है, और वह भला राजकुमार उन्हें उजाड़ देगा।
‘और,’ उन्होंने सोचा, ‘यह करने के लिए इससे अधिक उपयुक्त समय और कौन सा होगा, जब अब मनुष्यात्मा की लगाम उसके हाथ में है?’ और मैंने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि निवासी, इन सब बातों के होते हुए भी, जब उन्होंने उसे नगर में से होकर कूच करते देखा, तो वे — नहीं, वे सचमुच — गिड़गिड़ाए, झुके और नमन किए बिना न रह सके, और उसके पाँवों की धूल चाटने को तैयार थे। उन्होंने हज़ार बार यह भी चाहा कि वह उनका राजकुमार और कप्तान बन जाए, और उनका रक्षक बन जाए। वे आपस में उसके रूप की सुन्दरता की भी चर्चा करते थे, और यह कि महिमा और पराक्रम में वह संसार के बड़े-बड़े लोगों से कितना बढ़कर है। परन्तु बेचारे हृदय! जहाँ तक उनकी अपनी बात थी, उनके विचार बदलते रहते थे, और हर प्रकार की अतियों की ओर दौड़ते थे। हाँ, उनके विचारों के आगे-पीछे डोलते रहने के कारण मनुष्यात्मा उछाली हुई गेंद के समान, और बवण्डर के आगे लुढ़कती हुई वस्तु के समान हो गया।
अब, जब वह गढ़ के फाटकों पर आ पहुँचा, तो उसने डियाबोलस को आज्ञा दी कि वह सामने आए, और अपने आप को उसके हाथों में सौंप दे। परन्तु, ओह! वह पशु सामने आने से कितना कतराता था! वह कैसे अड़ गया! वह कैसे सिकुड़ गया! वह कैसे गिड़गिड़ाया! फिर भी वह निकलकर राजकुमार के पास आया। तब इम्मानुएल ने आज्ञा दी, और उन्होंने डियाबोलस को पकड़कर ज़ंजीरों से कसकर बाँध दिया, ताकि उसे उस न्याय के लिए भली-भाँति रख छोड़ें जो उसने उसके लिए ठहराया था। परन्तु डियाबोलस खड़ा होकर अपने लिए विनती करने लगा कि इम्मानुएल उसे अथाह गड्ढे में न भेजे, वरन् उसे शान्ति से मनुष्यात्मा से निकल जाने दे।
जब इम्मानुएल ने उसे पकड़कर ज़ंजीरों से बाँध लिया, तो वह उसे चौक में ले गया, और वहाँ मनुष्यात्मा के सामने उसके उस कवच को उतार लिया जिस पर वह पहले इतना घमण्ड करता था। यह इम्मानुएल के अपने शत्रु पर विजय के कार्यों में से एक था; और जितनी देर उस दानव का कवच उतारा जा रहा था, उतनी देर स्वर्णिम राजकुमार की तुरहियाँ पूरे ज़ोर से बजती रहीं; कप्तानों ने भी जयघोष किया, और सैनिक आनन्द से गाते रहे।
तब मनुष्यात्मा को बुलाया गया कि वह इम्मानुएल की उस पर विजय का आरम्भ देखे, जिस पर उन्होंने इतना भरोसा रखा था, और जिस पर उन्होंने उन दिनों में इतना घमण्ड किया था जब वह उनकी चापलूसी करता था।
इस प्रकार मनुष्यात्मा की आँखों के सामने, और राजकुमार के सेनानायकों के सामने डियाबोलस को नंगा करने के बाद, उसने आगे आज्ञा दी कि डियाबोलस को ज़ंजीरों से उसके रथ के पहियों से बाँध दिया जाए। तब अपनी कुछ सेनाओं को, अर्थात् कप्तान बूअनरगिस और कप्तान दोष-बोध को, गढ़ के फाटकों के पहरे के लिए छोड़कर, ताकि उसकी ओर से प्रतिरोध किया जा सके (यदि वे लोग, जो पहले डियाबोलस के पीछे चलते थे, उस पर अधिकार करने का प्रयत्न करें), वह उस पर विजय मनाता हुआ पूरे मनुष्यात्मा नगर में से होकर सवारी करता गया, और इस प्रकार आँख-फाटक नामक फाटक से और उसके सामने से निकलकर उस मैदान में पहुँचा जहाँ उसकी छावनी पड़ी थी।
परन्तु आप कल्पना भी नहीं कर सकते, जब तक कि आप वहाँ न रहे हों, जैसे मैं था, कि जब इम्मानुएल की छावनी के लोगों ने उस अत्याचारी को अपने कुलीन राजकुमार के हाथ से बँधा हुआ, और उसके रथ के पहियों से जकड़ा हुआ देखा, तो वहाँ कैसा जयघोष हुआ!
और उन्होंने कहा, ‘वह बन्धुवाई को बाँध ले गया, उसने प्रधानताओं और अधिकारों को लूट लिया है। डियाबोलस उसकी तलवार की शक्ति के अधीन कर दिया गया है, और सब के उपहास का पात्र बना दिया गया है।’
जो लोग बिना पद के स्वयंसेवक होकर घोड़ों पर सवार थे, और जो युद्ध देखने के लिए उतर आए थे, उन्होंने भी इतने ऊँचे स्वर से जयघोष किया, और ऐसे मधुर स्वरों में गाया, कि जो सबसे ऊँचे लोकों में रहते हैं, उन्होंने भी अपनी खिड़कियाँ खोलीं, अपने सिर बाहर निकाले, और उस महिमा का कारण देखने के लिए झाँकने लगे।
नगरवासी भी, उनमें से जितनों ने यह दृश्य देखा, देखते-देखते मानो पृथ्वी और आकाश के बीच में लटके रह गए। यह सच है कि वे नहीं बता सकते थे कि उनके विषय में बातों का परिणाम क्या होगा; परन्तु सब कुछ ऐसी उत्तम रीति से किया गया था, और मैं नहीं बता सकता कैसे, परन्तु जिस ढंग से सब बातें की जा रही थीं उससे ऐसा लगता था मानो वे नगर की ओर मुस्कान बिखेर रही हों, यहाँ तक कि जब वे इम्मानुएल की व्यवस्था को देख रहे थे, तब उनकी आँखें, उनके सिर, उनके हृदय और उनके मन, और जो कुछ उनके पास था, सब उसी में खिंचकर बँधे रह गए।
सो जब उस वीर राजकुमार ने अपने शत्रु डियाबोलस पर अपनी विजय का यह भाग पूरा कर लिया, तो उसने उसे उसके तिरस्कार और लज्जा के बीच ही छोड़ दिया, और उसे यह आज्ञा दी कि वह फिर कभी मनुष्यात्मा का अधिकारी न बने। तब वह इम्मानुएल के पास से, और उसकी छावनी के बीच में से निकल गया, कि लोनी भूमि के सूखे स्थानों का अधिकारी हो, और विश्राम ढूँढ़ता फिरे, परन्तु न पाए।
