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अनुग्रह में बढ़ना
“पर हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ते जाओ।” 2 पतरस 3:18
मुझे व्याख्यानों की इस शृंखला को नए विश्वासियों को अनुग्रह में बढ़ने के विषय पर शिक्षा देकर समाप्त करना है। मैं निम्नलिखित क्रम अपनाऊँगा:
I. यहाँ जिस अर्थ में यह शब्द प्रयोग हुआ है, उसमें अनुग्रह क्या है?
II. “अनुग्रह में बढ़ते जाने” की आज्ञा का क्या अर्थ नहीं है।
III. उसका क्या अर्थ है।
IV. अनुग्रह में बढ़ने की शर्तें।
V. अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण क्या नहीं है।
VI. अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण क्या है।
VII. अनुग्रह में कैसे बढ़ें।
I. यहाँ जिस अर्थ में यह शब्द प्रयोग हुआ है, उसमें अनुग्रह क्या है?
1. अनुग्रह कृपा है। बाइबल में यह शब्द प्रायः सेंत-मेंत के दान के अर्थ में प्रयोग होता है। परमेश्वर का अनुग्रह परमेश्वर की कृपा है, उसके सेंत-मेंत के दान हैं।
II. “अनुग्रह में बढ़ते जाने” की आज्ञा का क्या अर्थ नहीं है। 1. यह पाप को धीरे-धीरे छोड़ने की आज्ञा नहीं देती। कहते हुए अचरज होता है, पर ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोगों ने इसे इसी अर्थ में समझा है; परन्तु बाइबल में कहीं भी हमें पाप को धीरे-धीरे छोड़ने की आज्ञा नहीं दी गई, बल्कि हर जगह हमें आज्ञा दी गई है कि हम उसे तुरन्त और पूरी तरह छोड़ दें।
III. उसका क्या अर्थ है।
1. यह हम पर यह कर्तव्य ठहराती है कि हम परमेश्वर की कृपा में बढ़ते जाएँ, उसकी दृष्टि में अधिक आदर पाते जाएँ, उसकी कृपा के अधिक योग्य बनते जाएँ, और हमारे प्रति उसके प्रसन्नता के प्रेम में बढ़ते जाएँ।
IV. अनुग्रह में बढ़ने की शर्तें।
1. किसी भी वस्तु में बढ़ोतरी या वृद्धि एक आरम्भ को मानकर चलती है। परमेश्वर की कृपा में बढ़ने का अर्थ यह है कि हम उसकी दृष्टि में पहले ही अनुग्रह पा चुके हैं, कि हम पाए हुए अनुग्रह के लिए पहले ही उसके ऋणी हैं, और कि हम पहले ही अनुग्रह में हैं, इस अर्थ में कि उसके कृपापात्रों के बीच हमें स्थान मिल चुका है।
2. फलस्वरूप, अनुग्रह में बढ़ने का अर्थ यह है कि हम अपने पाप से पहले ही पश्चाताप कर चुके हैं, और हर जाने-पहचाने पाप को वास्तव में और व्यवहार में छोड़ चुके हैं। यह हो नहीं सकता कि हम परमेश्वर की कृपा में हों, जबकि हम अब भी उसके विरुद्ध जाने-पहचाने पाप में लिप्त हों। परमेश्वर की कृपा में होने का अर्थ,
निश्चय ही, यह है कि हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के निमित्त उसने हमें क्षमा किया है और हम पर कृपा की है। क्षमा कृपा है, और इसमें परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह का त्याग सम्मिलित है। जैसा बाइबल में प्रगट किया गया है, ईश्वरीय कृपा की शर्तें ये हैं: पश्चाताप और हर जाने-पहचाने पाप का त्याग, और हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास। मैंने कहा कि अनुग्रह में बढ़ने की शर्त के रूप में अनुग्रह का आरम्भ हो चुका होना आवश्यक है; दूसरे शब्दों में, हमें पहले से मसीही होना चाहिए, परमेश्वर के यहाँ ग्रहणयोग्य अवस्था में होना चाहिए, जहाँ तक मसीह को समझा गया है वहाँ तक उसे ग्रहण कर चुके होना चाहिए, और परमेश्वर की समस्त पहचानी हुई इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता की अवस्था में होना चाहिए। इसके बिना हम न तो अनुग्रह की अवस्था में हो सकते हैं, न परमेश्वर की कृपा में। परन्तु इस अवस्था में होने पर अनन्त काल तक बढ़ते रहने का अवसर है। जैसे-जैसे हम परमेश्वर को अधिक जानेंगे, वैसे-वैसे हम उससे अधिक प्रेम करने के, और उस पर अधिक व्यापक और निःशंक भरोसा रखने के योग्य होते जाएँगे। और जब तक हमारा अस्तित्व है, चाहे इस संसार में हो या किसी और संसार में, इसका कोई अन्त नहीं हो सकता। जहाँ तक हम उसे जानते हैं, वहाँ तक उसके प्रति हमारा प्रेम और भरोसा पूर्ण हो सकता है। यह प्रेम और भरोसा उसकी कृपा को सुनिश्चित करेगा; परन्तु उसके विषय में हमारे ज्ञान की बढ़ोतरी का कोई अन्त न होगा, और इसलिए अनुग्रह में अनन्त काल तक बढ़ते रहने का अवसर है। हम जितना अधिक प्रेम करते हैं, जितना अधिक विश्वास करते हैं, जितना अधिक परमेश्वर को जानते हैं, यदि हम इस सारे ज्ञान के अनुरूप चलें, तो परमेश्वर उतना ही अधिक हम से प्रसन्न होगा, हम उसकी कृपा में उतने ही ऊँचे स्थान पर होंगे, और वह हमें उतने ही अधिक और बड़े दान देता रहेगा।
3. निश्चय ही, परमेश्वर के ज्ञान में बढ़ना उसकी कृपा में बढ़ने की एक शर्त है। हो सकता है कि हम ज्ञान में तो बढ़ें, पर उसकी कृपा में न बढ़ें, क्योंकि सम्भव है कि हम इस बढ़े हुए ज्ञान के अनुसार उससे प्रेम और उस पर भरोसा न करें। परन्तु जब तक हम उससे अधिक पूर्ण रूप से परिचित न हो जाएँ, तब तक हम उससे अधिक सिद्ध रीति से प्रेम और उस पर अधिक सिद्ध रीति से भरोसा नहीं कर सकते। यदि हमारा प्रेम और विश्वास हमारे बढ़ते हुए ज्ञान के साथ-साथ चलता रहे, तो हम निश्चय ही उसकी कृपा में बढ़ेंगे। परन्तु ज्ञान में बढ़ना, प्रेम और विश्वास में बढ़ने की एक शर्त अवश्य है।
4. परमेश्वर के उस ज्ञान में बढ़ना, जो मसीह यीशु में प्रगट हुआ है, उसकी कृपा में बढ़ने की एक शर्त अवश्य है। मसीह यीशु में और उसी के द्वारा परमेश्वर अपने आप को मनुष्य पर प्रगट करता है। मसीह यीशु में ही हमें अनन्त परमेश्वर के व्यक्तित्व का सच्चा विचार मिला है। इसीलिए पद कहता है, “हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ते जाओ।”
5. अनुग्रह में बढ़ना इस बात पर निर्भर है कि परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण समर्पण में जो कुछ सम्मिलित है, उसका हमारा ज्ञान बढ़ता जाए।
परमेश्वर की ओर सच्चे मन-परिवर्तन में यह सम्मिलित है कि हम अपने आप को और अपना सब कुछ उसे समर्पित कर दें, जहाँ तक हम समझते हैं कि इसमें क्या-क्या निहित है। परन्तु आरम्भ में नए विश्वासी इस बात से बिल्कुल अवगत नहीं होते कि समर्पण के सबसे ऊँचे रूपों में क्या-क्या सम्मिलित है। वे शीघ्र ही जान लेंगे कि कुछ बातें ऐसी हैं जिनके विषय में उन्होंने सोचा ही नहीं था, और जिन्हें उन्होंने परमेश्वर को नहीं सौंपा था। आरम्भ में, कदाचित, उनके विचार में बस इतना ही था कि अपने निरावरण प्राण को वेदी पर रख दें, और अपना सारा हृदय परमेश्वर को दे दें। परन्तु शीघ्र ही उन्हें पता चल सकता है कि उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति और हर उस वस्तु के विषय में नहीं सोचा था जो उन्हें प्रिय थी; उन्होंने सब कुछ समर्पित नहीं किया था, और एक खुर तक पीछे न छोड़ने की बात पूरी नहीं की थी। उस समय जिन बातों का उन्हें ध्यान आया, उन सब को उन्होंने समर्पित कर दिया, परन्तु वे पूरी तरह प्रकाशित नहीं थे; उस समय उन्होंने न तो हर भूख, हर वासना, हर प्रवृत्ति, हर इच्छा और हर लगाव के विषय में, और न सारी सृष्टि में उस हर वस्तु के विषय में सोचा जिसे वे अपना कहते हैं और जो उन्हें प्रिय है, और न ही वे सोच सकते थे, कि उन सब को पूरी रीति से परमेश्वर को सौंपकर उसके हवाले कर दें। ऐसा ज्ञान प्राप्त करना समय का काम है; और परमेश्वर की कृपा में बढ़ना इस शर्त पर निर्भर है कि जो कुछ हम हैं, और जो कुछ हमारे पास है, और जिसकी हम इच्छा करते हैं, और जिससे हम प्रेम करते हैं, वह सब जितनी शीघ्रता से हमारे विचार के सामने आता जाए, उतनी ही शीघ्रता से हम उसे पूरी रीति से परमेश्वर को सौंपें और समर्पित करें। जब तक हमारा अस्तित्व है और ज्ञान बढ़ता जाता है, इसमें सन्देह नहीं कि हमसे अपेक्षा की जाएगी कि हम अनुग्रह में बढ़ें, अर्थात् ज्ञान, इच्छा और लगाव की हर उस नई वस्तु को परमेश्वर को समर्पित करें जिसे हम अनन्त काल तक जानने, चाहने और प्रेम करने लगें। जैसे-जैसे आपको नया प्रकाश मिलता है, आपको दिन-प्रतिदिन और घड़ी-घड़ी अपने समर्पण को विस्तृत करना होगा, नहीं तो आप अनुग्रह में बढ़ना छोड़ देंगे। जब कभी आप बीच में ही रुक जाते हैं, और जो कुछ आप हैं, जो कुछ आपके पास है, या जिससे आप प्रेम करते हैं, उस सब को समर्पण की वेदी पर रखकर वहीं छोड़ नहीं देते, उसी क्षण आप अनुग्रह में बढ़ना छोड़ देते हैं। मैं आपसे विनती करता हूँ कि इस बात को अपने हृदय में गहराई तक उतर जाने दें।
6. अनुग्रह में बढ़ने की एक और शर्त यह है कि पवित्र आत्मा के प्रकाशन के द्वारा अधिक धार्मिक प्रकाश पाने के लिए अत्यन्त लगन और निरन्तरता के साथ खोज की जाए। पवित्र आत्मा के भीतरी प्रकटीकरण और शिक्षा के बिना आपको कोई प्रभावकारी धार्मिक प्रकाश नहीं मिलेगा। और यह आपको तब तक नहीं मिलेगा जब तक आप मसीह के चेले की सच्ची स्थिति में बने न रहें। स्मरण रखिए, वह कहता है, “जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे, वह मेरा चेला नहीं हो सकता।” जब तक आप अपने आप का इन्कार न करें, और उसके प्रति निरन्तर समर्पण की अवस्था में न रहें, तब तक वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा आपका ईश्वरीय शिक्षक नहीं बनेगा। उसके पवित्र आत्मा के द्वारा मसीह की शिक्षाएँ पाने और उन्हें बनाए रखने के लिए आपको उसकी ईश्वरीय शिक्षा के लिए निरन्तर और लगन से प्रार्थना करनी होगी, और चौकस रहना होगा कि आप उसका विरोध न करें और उसे शोकित न करें।
7. अनुग्रह में बढ़ने की एक और शर्त यह है कि पवित्र आत्मा की सारी शिक्षाओं के अनुरूप निरन्तर चलते रहें, और कर्तव्य के विषय में अपने दृढ़ बोध तथा परमेश्वर की इच्छा के विषय में अपने बढ़ते हुए ज्ञान के साथ-साथ कदम मिलाकर चलें। 8. परमेश्वर पर अधिकाधिक निःशंक विश्वास अनुग्रह में बढ़ने की एक शर्त है। निःशंक से मेरा अर्थ है तर्क न करनेवाला विश्वास, परमेश्वर के चरित्र पर इतना गहरा भरोसा कि हम अन्धकार में भी उस पर उतना ही भरोसा रखें जितना उजियाले में; जब हम उसके हमारे साथ किए गए व्यवहारों के, या उसकी माँगों के, कारणों को नहीं समझते, तब भी उतना ही भरोसा रखें जितना तब, जब हम उन्हें समझते हैं। अब्राहम के समान विश्वास, जिसने अविश्वास के कारण प्रतिज्ञा पर सन्देह नहीं किया, यद्यपि प्रतिज्ञा की हुई बात अत्यन्त तर्कहीन और असम्भव प्रतीत होती थी। निःशंक विश्वास एक अडिग, बिना प्रश्न किए रहनेवाला विश्वास है, मन की वह अवस्था जो परमेश्वर में, उसकी प्रतिज्ञाओं में, उसकी विश्वासयोग्यता में, उसके प्रेम में विश्राम करती है, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी दिखाई दें, और चाहे उसकी आज्ञाएँ या उसके विधान के व्यवहार कितने भी कठिन और देखने में तर्कहीन क्यों न हों। बाइबल में अब्राहम के विश्वास की बार-बार सराहना की गई है। परमेश्वर ने उससे एक पुत्र की प्रतिज्ञा की थी, परन्तु प्रतिज्ञा का वंश उसे तब तक नहीं दिया जब तक वह सौ वर्ष का न हो गया, और सारा नब्बे वर्ष की न हो गई। परन्तु यद्यपि सारा की अवस्था ढल चुकी थी, और वह स्वयं मानो मरा हुआ-सा था, तौभी उसने विश्वास किया कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने में समर्थ है; और जब उसे अपना प्रिय पुत्र इस आश्वासन के साथ मिल गया कि यही उसका वारिस होगा, और इसी के द्वारा वह प्रतिज्ञा सब पीढ़ियों में पूरी होगी, तब परमेश्वर ने उसे आज्ञा देकर कि वह अपने इसहाक को होमबलि करके चढ़ाए, उसके विश्वास की कठोर परीक्षा ली। उसने बिना तनिक भी हिचकिचाए आज्ञा मानी, यह विश्वास करते हुए कि परमेश्वर उसे मरे हुओं में से जिलाने में समर्थ है। उसने इस कठिन आज्ञा को मानने की सारी तैयारी इतनी शान्ति से की कि न सारा को और न इसहाक को सन्देह हुआ कि ऐसी कोई बात सोची जा रही है। यह निःशंक विश्वास के प्रयोग का एक उदाहरण था। अनुग्रह में, अर्थात् परमेश्वर की कृपा में बढ़ना, उस पर निःशंक भरोसे में बढ़ने पर निर्भर है।
9. अधिक पूर्ण रूप से पवित्र की गई संवेदन-शक्ति परमेश्वर की कृपा में बढ़ने की एक शर्त है। संवेदन-शक्ति से मेरा अर्थ है हमारे स्वभाव का वह भाग जो अनुभव करता है, इच्छा करता है, और जिससे वह सब सम्बन्ध रखता है जिसे हम कामना, लगाव, भावावेग, भावना, भूख, वासना, प्रवृत्ति और अभिलाषा कहते हैं। संवेदन-शक्ति एक अनैच्छिक शक्ति है, और कड़ाई से कहें तो नैतिक कार्य और नैतिक गुण उस पर आरोपित नहीं किए जा सकते। संवेदन-शक्ति की अवस्थाओं में नैतिक चरित्र केवल उतना ही होता है जितना वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इच्छा-शक्ति के कार्य से प्राप्त करती हैं। मनुष्य का स्वभाव, समग्र रूप से, अपनी भ्रष्ट दशा में, बड़ी ही अप्रिय अवस्था में है; और यद्यपि इच्छा-शक्ति परमेश्वर को सौंपी जा चुकी हो, फिर भी संवेदन-शक्ति ऐसी अवस्था में हो सकती है कि उस व्यक्ति की दृष्टि में अत्यन्त अप्रिय हो जो उस पर सीधे दृष्टि डालता है, और हर भड़की हुई इच्छा, वासना, प्रवृत्ति और अभिलाषा को भली-भाँति जानता है। मुख्यतः संवेदन-शक्ति के द्वारा ही हम पर परीक्षाओं का आक्रमण होता है। इसी के कारण मसीही युद्ध चलता रहता है। मसीही युद्ध इच्छा-शक्ति की इन विविध भूखों, वासनाओं, प्रवृत्तियों और अभिलाषाओं के साथ लड़ाई है, ताकि उन्हें परमेश्वर की इच्छा के अधीन रखा जाए। यदि इच्छा-शक्ति अपनी खराई बनाए रखे, और परमेश्वर की इच्छा से लिपटी रहे, तो संवेदन-शक्ति की भड़की हुई अवस्थाओं के साथ अपनी लड़ाई में प्राण पाप नहीं करता। परन्तु ये विद्रोही प्रवृत्तियाँ इच्छा-शक्ति को उस सेवा में उलझा देती हैं जो वह परमेश्वर की करती है। उन्हें दबाकर रखने में बहुत समय, विचार और बल लगता है। इसलिए जब प्राण इन प्रवृत्तियों को वश में करने के लिए इच्छा-शक्ति का पूरा बल लगा रहा होता है, तब वह परमेश्वर की उतनी पूर्ण सेवा नहीं कर पाता जितनी वह अन्यथा कर सकता और करता। ये भूखें, वासनाएँ और प्रवृत्तियाँ, यद्यपि अपने आप में पापमय नहीं हैं, फिर भी इन्हें भीतर बसा हुआ पाप माना और कहा गया है। कड़ाई से कहें तो ये पाप नहीं हो सकतीं, क्योंकि ये अनैच्छिक हैं। परन्तु प्रायः ये परमेश्वर की कृपा में हमारे बढ़ने में बड़ी बाधा बनती हैं। “क्योंकि शरीर आत्मा के विरोध में, और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करता है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं; इसलिए कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ।” इसका अर्थ यह है कि हम परमेश्वर के लिए वह नहीं कर पाते जो अन्यथा करते, क्योंकि संवेदन-शक्ति की अवस्थाओं को दबाकर रखने के लिए हमें उनसे बहुत लड़ना पड़ता है। जैसे-जैसे संवेदन-शक्ति अधिकाधिक वश में होती जाती है और परमेश्वर के प्रति इच्छा-शक्ति की भक्ति के साथ मेल में आती जाती है, वैसे-वैसे हम परमेश्वर की अधिक निर्बाध सेवा करने के लिए स्वतंत्र होते जाते हैं। इसलिए संवेदन-शक्ति का पवित्रीकरण जितना अधिक पूर्ण होगा, हम परमेश्वर की कृपा में उतने ही अधिक पूर्ण रूप से होंगे।
10. आत्मा, प्राण और देह के समर्पण की बढ़ती हुई पूर्णता और सर्वव्यापकता परमेश्वर की कृपा में अधिकाधिक बढ़ने की शर्त है। आरम्भ में यह सामान्य बात है कि परमेश्वर के प्रति इच्छा-शक्ति की भक्ति की दृढ़ता भड़की हुई भूखों, वासनाओं और प्रवृत्तियों के कोलाहल से, या संवेदन-शक्ति की विविध अवस्थाओं से, पराजित हो जाती है। जब कभी इच्छा-शक्ति इन भड़की हुई अवस्थाओं के आगे झुक जाती है, आप पाप करते हैं। परन्तु ऐसी स्थितियों में पाप जान-बूझकर किया हुआ नहीं होता, इस अर्थ में कि वह सोचा-समझा और इरादतन हो; वह तो एक फिसलन है, एक असावधानी है, अत्यन्त भड़की हुई भावना के दबाव में क्षण भर का झुक जाना है। तौभी यह झुक जाना पाप है। संवेदन-शक्ति की अवस्थाएँ चाहे कितनी भी भड़की हुई हों, यदि इच्छा-शक्ति नहीं झुकती, तो कड़ाई से कहें तो कोई पाप नहीं है। फिर भी, जब इच्छा-शक्ति दृढ़ है, अपने समर्पण को, परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता को बनाए रखती है, तब भी देह से उत्पन्न होनेवाली भूखें, और प्राण की विविध प्रवृत्तियाँ जो संवेदन-शक्ति में बसी हैं, इतनी बेसुरी, इतनी अव्यवस्थित, और इतनी रुग्ण विकास की अवस्था में हो सकती हैं कि प्राण स्वर्ग के कामों और आनन्दों के योग्य न रहे।
11. अतः ईश्वरीय स्वभाव की अधिक परिपूर्णता को धारण करना परमेश्वर की कृपा में बढ़ने की एक शर्त है। परमेश्वर की इच्छा-शक्ति और संवेदन-शक्ति दोनों परम सिद्धता और सामंजस्य की अवस्था में होनी चाहिए। उसकी सारी इच्छाएँ और भावनाएँ उसकी बुद्धि और उसकी इच्छा के साथ पूर्ण सामंजस्य में होनी चाहिए। हमारी दशा ऐसी नहीं है, क्योंकि हम शारीरिक भ्रष्टता की अवस्था में हैं। संवेदन-शक्ति की भ्रष्टता शारीरिक ही होगी, क्योंकि वह अनैच्छिक है। फिर भी वह भ्रष्टता है; वह संवेदन-शक्ति की गिरी हुई या पतित अवस्था है। हमारे स्वभाव के इस गिरे हुए भाग को पुनः प्राप्त किया जाना, पवित्र किया जाना, या समर्पित इच्छा-शक्ति और प्रकाशित बुद्धि के साथ पूर्ण सामंजस्य में लौटाया जाना आवश्यक है, नहीं तो हम कभी स्वर्ग के योग्य नहीं बनते। जैसे-जैसे हम ईश्वरीय स्वभाव के और ईश्वरीय पवित्रता के अधिकाधिक सहभागी होते जाते हैं, वैसे-वैसे हम आत्मा, प्राण और देह में अधिक पूर्ण रूप से पवित्र किए जाते हैं, और निश्चय ही परमेश्वर की कृपा में अधिकाधिक बढ़ते जाते हैं।
12. पवित्र आत्मा के निवास की अधिक बड़ी और अधिक सर्वव्यापी परिपूर्णता परमेश्वर की कृपा में बढ़ने की एक और शर्त है। यह बात आपके मन पर जितनी भी गहराई से अंकित हो, कम है कि मसीही जीवन का हर कदम पवित्र आत्मा के प्रभाव में उठाया जाना है। प्राप्त करने योग्य बात यह है कि पवित्र आत्मा की शिक्षा और अगुवाई हर बात में हो, ताकि आप सब बातों में परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलें। “यदि तुम आत्मा के चलाए चलते हो, तो शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे।” “यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे, तो जीवित रहोगे।” “आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है, परन्तु शरीर पर मन लगाना मृत्यु है।” इसलिए सदा स्मरण रखिए कि अनुग्रह में बढ़ने के लिए आपको अपने हृदय में पवित्र आत्मा की परिपूर्णता को अधिकाधिक प्राप्त करते जाना होगा।
13. प्रभु यीशु मसीह के साथ, उसके सारे पदीय कार्य और सम्बन्धों में, अधिक गहरा व्यक्तिगत परिचय अनुग्रह में बढ़ने की एक शर्त है। उसका स्वभाव, उसका कार्य और उसके सम्बन्ध ही बाइबल का विषय हैं। बाइबल उसे हमारे सामने बहुत प्रकार के सम्बन्धों में प्रस्तुत करती है। अपनी ‘क्रमबद्ध धर्मविज्ञान’ (सिस्टमैटिक थियोलॉजी) में मैंने मानवजाति के साथ मसीह के इन पदीय सम्बन्धों में से लगभग साठ या उससे भी अधिक पर विचार किया है, और ये हमारे साथ उसके सम्बन्धों के पूरे क्षेत्र को समेटने के बजाय नमूनों और उदाहरणों के रूप में ही प्रस्तुत किए गए हैं। अब, मसीह को केवल कागज़ पर, और जैसा बाइबल में उसके विषय में कहा गया है, मसीह के विषय में पढ़कर या सुनकर जानना एक बात है, और इन सम्बन्धों में उसे व्यक्तिगत रूप से जानना बिल्कुल दूसरी बात है। बाइबल उसके साथ व्यक्तिगत परिचय कराने का माध्यम है। उसमें उसके विषय में जो कहा गया है, उसका उद्देश्य हमें उसके साथ व्यक्तिगत परिचय की खोज की ओर ले जाना है। उसके साथ इसी व्यक्तिगत परिचय के द्वारा हम उसके समान बनाए जाते हैं। उसके ईश्वरीय मन के साथ प्रत्यक्ष,
व्यक्तिगत, निजी संगति के द्वारा ही हम उसका स्वरूप धारण करते हैं। “हम सब, मानो दर्पण में प्रभु का प्रताप देखते हुए, प्रभु के आत्मा के द्वारा उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश करके बदलते जाते हैं।” “विश्वास सुनने से होता है,” और विश्वास हमें मसीह के साथ व्यक्तिगत परिचय दिलाता है। मसीह ने प्रतिज्ञा की है कि जो उससे प्रेम करते और उसकी आज्ञा मानते हैं, उन पर वह अपने आप को व्यक्तिगत रूप से प्रगट करेगा। मेरे प्रिय बच्चो, अपने प्राणों पर मसीह के इस व्यक्तिगत प्रकटीकरण को प्राप्त किए बिना बीच में ही न रुकें। आपका अनुग्रह में बढ़ना इसी पर निर्भर होगा। मसीह को व्यक्तिगत रूप से जानने से पहले रुक जाने की बात सोचिए भी नहीं, न केवल इन सब सम्बन्धों में, वरन इन सम्बन्धों की परिपूर्णता में। इस तथ्य को अनदेखा न करें कि इनमें से हर सम्बन्ध में मसीह को अपनाना विश्वास का एक व्यक्तिगत कार्य है। यह प्रभु यीशु मसीह को पहिन लेना है, इनमें से हर सम्बन्ध में उसे अपना करके ग्रहण करना है: अपने ज्ञान, धार्मिकता, पवित्रीकरण और छुटकारे के रूप में; अपने भविष्यद्वक्ता के रूप में, जो आपको सिखाए; अपने राजा के रूप में, जो आप पर शासन करे; अपने महायाजक के रूप में, जो आपके लिए प्रायश्चित करे; अपने मध्यस्थ, अपने सहायक, अपने बल, अपने उद्धारकर्ता, अपने छिपने के स्थान, अपने ऊँचे गढ़, अपने प्रधान और अगुवे, अपनी ढाल, अपने बचाव, और अपने अत्यन्त बड़े प्रतिफल के रूप में। इनमें से हर सम्बन्ध में, और उसके अन्य सब पदीय सम्बन्धों में, आपको विश्वास के द्वारा उसे अपनाने की आवश्यकता है, ताकि इन सम्बन्धों में आपको उसके साथ व्यक्तिगत संगति प्राप्त हो। स्मरण रखिए, इन सम्बन्धों में उसके साथ व्यक्तिगत परिचय में बढ़ते जाना उसकी कृपा में बढ़ने की एक अनिवार्य शर्त है।
V. अब मुझे कुछ ऐसी बातों पर ध्यान दिलाना है जो अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण नहीं हैं।
1. ज्ञान में बढ़ना अनुग्रह में बढ़ने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। परमेश्वर की कृपा में होने के लिए कुछ मात्रा में ज्ञान अनिवार्य है; और जैसा मैं दिखा चुका हूँ, ज्ञान में बढ़ना अनुग्रह में बढ़ने की एक शर्त है; परन्तु ज्ञान अनुग्रह नहीं है, और ज्ञान में बढ़ना अनुग्रह में बढ़ना नहीं कहलाता। कोई व्यक्ति ज्ञान में चाहे कितना भी बढ़ जाए, और फिर भी उसमें अनुग्रह बिल्कुल न हो। नरक में लोग ज्ञान में बढ़े बिना रह नहीं सकते, क्योंकि वे अनुभव में और परमेश्वर के न्याय के ज्ञान में बढ़ते जाते हैं। परन्तु वहाँ उनका ज्ञान में बढ़ना नरक के दोष और दुःख को और भी बढ़ा देता है। वे परमेश्वर और उसकी व्यवस्था के विषय में, और अपने दोष के विषय में अधिकाधिक जानते जाते हैं, और वे जितना अधिक जानते हैं, उतने ही अधिक दुःखी होते हैं। अपने बढ़े हुए ज्ञान से वे कभी भक्ति नहीं सीखते।
2. यदि कोई व्यक्ति वरदानों में बढ़ता है, तो यह इस बात का निश्चित प्रमाण नहीं कि वह अनुग्रह में बढ़ रहा है।
धर्म का अंगीकार करनेवाला कोई व्यक्ति वरदानों में बढ़ सकता है, अर्थात् वह प्रार्थना में अधिक धाराप्रवाह, और प्रचार में अधिक वाक्पटु, या उपदेश देने में अधिक मर्मस्पर्शी हो सकता है, और फिर भी तनिक भी अधिक पवित्र न हो। जिस बात का हम अभ्यास करते हैं, उसमें हम स्वाभाविक रूप से बढ़ते जाते हैं। और यदि कोई व्यक्ति बार-बार उपदेश देने का अभ्यास करता है, तो यदि वह कुछ भी प्रयत्न करे या उसमें अपने आप को लगाए, तो वह स्वाभाविक रूप से धाराप्रवाह और तीक्ष्णता में बढ़ेगा। परन्तु वह यह सब कर सकता है, और फिर भी उसमें अनुग्रह बिल्कुल न हो। वह चाहे कितनी भी तल्लीनता से प्रार्थना करे, और धाराप्रवाह तथा दिखाई देनेवाली करुणा में बढ़ता जाए, और फिर भी उसमें अनुग्रह न हो। जिन लोगों में अनुग्रह नहीं है, वे प्रायः ऐसा करते हैं। यह सच है कि यदि उसमें अनुग्रह है, और वह इन बातों का अभ्यास करता है, तो जैसे-जैसे वह अनुग्रह में बढ़ेगा, वैसे-वैसे वह वरदानों में भी बढ़ेगा। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की आज्ञा मानने का अभ्यास करते हुए उन अभ्यासों में उन्नति किए बिना नहीं रह सकता। यदि वह वरदानों में उन्नति नहीं करता, तो यह इस बात का सच्चा चिह्न है कि वह अनुग्रह में नहीं बढ़ रहा। परन्तु दूसरी ओर, केवल इसलिए कि वह कुछ अभ्यासों में उन्नति करता है, यह निश्चित प्रमाण नहीं कि वह अनुग्रह में बढ़ रहा है; क्योंकि चाहे वह मसीही हो या कपटी, अभ्यास से वह स्वाभाविक रूप से उन्नति करेगा ही।
3. कोई व्यक्ति यह सोचता है कि वह अनुग्रह में बढ़ रहा है, तो यह इस बात का प्रमाण नहीं कि वह सचमुच बढ़ रहा है। हो सकता है कि कोई व्यक्ति धर्म में अपनी उन्नति के विषय में बड़ी अच्छी धारणा रखे, जबकि दूसरों को स्पष्ट दिखाई देता हो कि वह न केवल कोई उन्नति नहीं कर रहा, वरन वास्तव में गिरता जा रहा है। जो व्यक्ति बद से बदतर होता जा रहा है, उसे साधारणतः इस तथ्य का भली-भाँति पता नहीं होता। पश्चाताप न करनेवाले पापियों और मसीहियों, दोनों का यह सोचना असामान्य नहीं कि वे बेहतर होते जा रहे हैं, जबकि वे तनिक भी बेहतर नहीं हो रहे होते। यह बात की प्रकृति से ही उत्पन्न होता है। यदि कोई व्यक्ति बदतर होता जा रहा है, तो जैसे-जैसे वह अपने विवेक का गला घोंटता और प्रकाश का विरोध करता है, वैसे-वैसे उस समय उसका विवेक अधिकाधिक सुन्न और उसका मन अधिकाधिक अन्धकारमय होता जाएगा। तब वह सोच सकता है कि वह बेहतर होता जा रहा है, केवल इसलिए कि उसे पाप का बोध कम होता है; और जब तक उसका विवेक सोया रहता है, वह एक घातक भ्रम में पड़ा रह सकता है। मनुष्य अपनी आत्मिक दशा का मूल्यांकन इस बात के अनुसार करेगा कि वह अपनी तुलना किसी ऊँचे मानदण्ड से करता है या नीचे से। यदि वह मसीह को उसकी परिपूर्णता में अपने मानदण्ड के रूप में अपने सामने रखता है, तो निस्सन्देह वह सदा, कम से कम अस्तित्व की इस अवस्था में, अपनी उपलब्धियों का बहुत नीचा आकलन करेगा। जबकि उसी समय, यदि वह कलीसिया को, या कलीसिया के किसी सदस्य को, मानदण्ड के रूप में अपने सामने रखता है, तो बहुत सम्भव है कि वह धर्म में अपनी उन्नति का बड़ा ऊँचा आकलन करे, और अपने आप से बहुत सन्तुष्ट रहे। यही कारण है कि अपनी दशा और कलीसिया की दशा के विषय में लोगों के विचारों में इतना अन्तर होता है। वे अपनी और कलीसिया की दशा की तुलना अलग-अलग मानदण्डों से करते हैं। इसलिए एक व्यक्ति अपनी दशा के विषय में बड़ा दीन करनेवाला दृष्टिकोण रखता है, और कलीसिया की दशा की शिकायत करता है; दूसरा कलीसिया के विषय में ऐसी शिकायतों को दोष ढूँढ़नेवाली समझता है। उसे कलीसिया बहुत अच्छा करती हुई दिखाई देती है। वह कलीसिया को ठण्डी और गिरी हुई दशा में क्यों नहीं समझता, इसका कारण यह है कि मसीह उसकी तुलना का मानदण्ड नहीं है। यदि कोई मनुष्य अपनी आँखें बन्द कर ले, तो वह अपने ऊपर लगी मलिनता को नहीं देखेगा, और सोच सकता है कि वह शुद्ध है, जबकि आसपास के सब लोगों को वह घिनौना दिखाई देता है।
VI. अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण क्या है।
1. परमेश्वर पर अधिक निःशंक और सर्वव्यापी भरोसे का प्रगट होना अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है। जैसा मैं कह चुका हूँ, अधिक बड़े और अधिक निःशंक भरोसे का प्रयोग परमेश्वर की कृपा में बढ़ने की शर्त है। यहाँ मैं कहता हूँ कि इस निःशंक और सर्वव्यापी भरोसे का प्रगट होना इस बात का प्रमाण है कि यह बढ़ता हुआ भरोसा विद्यमान है, और इसलिए यह परमेश्वर की कृपा में बढ़ने का सन्तोषजनक प्रमाण है। यदि आप अपने प्राण में यह अनुभव करते हैं कि आप सचमुच परमेश्वर पर अधिक निःशंक और सर्वव्यापी भरोसा रखते हैं, तो यह आपके लिए निर्णायक प्रमाण है कि आप अनुग्रह में बढ़ रहे हैं; और जैसे-जैसे आप अपने जीवन में, अपने स्वभाव में और अपनी आत्मा में इस बढ़ते हुए भरोसे को प्रगट करते हैं, वैसे-वैसे आप अपने आप को और दूसरों को यह प्रमाणित करते हैं कि आप परमेश्वर की कृपा में बढ़ रहे हैं। क्योंकि जैसे-जैसे आप उस पर निःशंक भरोसे में बढ़ते हैं, वैसे-वैसे आप अवश्य ही उसकी कृपा में बढ़ते हैं। 2. अनुग्रह में बढ़ने का एक और प्रमाण संसार से बढ़ती हुई विरक्ति है। हो सकता है कि इच्छा-शक्ति परमेश्वर के प्रति भक्ति की स्थिति में हो, जबकि संसार के लुभावने आकर्षण मसीही जीवन की स्वस्थ गतिविधि में बहुत बाधा डालते हों। जैसे-जैसे सारा प्राण संसार के लिए क्रूस पर चढ़ाया और मरा हुआ होता जाता है, वैसे-वैसे वह परमेश्वर की कृपा में बढ़ता जाता है।
3. जब आत्म-त्याग करने के लिए बुलाया जाए, तब भावनाओं में कम अनिच्छा का होना अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है। यह दिखाता है कि भावनाएँ कम से कम निरंकुश होती जा रही हैं, कि इच्छा-शक्ति उन पर अधिक प्रभुत्व पाती जा रही है, कि संवेदन-शक्ति इच्छा-शक्ति की भक्ति और बुद्धि के निर्देशों के साथ अधिक मेल में आती जा रही है।
4. भूल-चूक के पापों की ओर कम परीक्षा होना अनुग्रह में बढ़ने का एक और प्रमाण है; उदाहरण के लिए, क्रूस से कतराने की कम परीक्षा, अप्रिय कर्तव्यों की उपेक्षा करने की कम परीक्षा, आलस्य की कम परीक्षा, उत्तरदायित्व से बचने की कम परीक्षा, प्रार्थना, पवित्रशास्त्र पढ़ने, और व्यक्तिगत तथा पारिवारिक उपासना की उपेक्षा करने की कम परीक्षा; संक्षेप में, किसी भी कर्तव्य को पूरा करने से कतराने की कम से कम परीक्षा होना अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है। ये परीक्षाएँ संवेदन-शक्ति की भड़की हुई अवस्थाओं में ही होती हैं। जैसे-जैसे इनकी शक्ति और बारम्बारता घटती जाती है, हम जान लेते हैं कि हमारी संवेदन-शक्ति बुद्धि की व्यवस्था और इच्छा-शक्ति के निर्णयों के अधिक पूर्ण रूप से अधीन होती जा रही है, और परिणामस्वरूप आत्मा, प्राण और देह के पवित्रीकरण का कार्य आगे बढ़ रहा है, और इसलिए हम परमेश्वर की कृपा में बढ़ रहे हैं।
5. परमेश्वर के कार्य को आगे बढ़ाने में उत्साह की बढ़ती हुई तीव्रता और स्थिरता परमेश्वर की कृपा में बढ़ने का प्रमाण है। कभी-कभी मसीही उत्साह अपेक्षाकृत ठण्डा होता है, और कभी गहरा और तीव्र; कभी वह स्थिर होता है, और कभी रुक-रुककर उठनेवाला और क्षणभंगुर। जैसे-जैसे मसीही भक्ति में बढ़ते हैं, उनका उत्साह गहरा, तीव्र और स्थिर होता जाता है; और जैसे-जैसे आप इसका अनुभव करते हैं, और अपने जीवन और आत्मा में दूसरों को इसका प्रमाण देते हैं, वैसे-वैसे आपके पास यह प्रमाण होता है, और आप यह प्रमाण देते हैं, कि आप परमेश्वर की कृपा में बढ़ रहे हैं।
6. जीवन के हर कार्य में अपने आप के प्रति सजगता और अपने आप के प्रति ध्यान को अधिकाधिक खोते जाना परमेश्वर की कृपा में बढ़ने का प्रमाण है। कुछ लोगों में हर बात में अपने आप के प्रति इतनी सजगता होती है, और जो कुछ वे कहते और करते हैं, उस सब में अपने आप का इतना ध्यान रहता है, कि जब कभी वे दूसरों की उपस्थिति में कुछ करने या बोलने का प्रयत्न करते हैं, तब उनका सारा मसीही जीवन संकोच में पड़ जाता है। जैसे-जैसे वे इस आत्म-सजगता को खोते जाते हैं, और अपने आप का कम ध्यान रखते हैं, वैसे-वैसे परमेश्वर की उनकी सेवा अधिक स्वतंत्र और निःसंकोच होती जाती है; और वे अपने विषय में जितना कम सोचते हैं, उतने ही अच्छे सेवक होते हैं। कभी-कभी नए विश्वासी न तो बोल सकते हैं, न प्रार्थना कर सकते हैं, न कोई सार्वजनिक कर्तव्य पूरा कर सकते हैं, बिना या तो घमण्ड किए या लज्जित हुए, इस बात के अनुसार कि वे समझते हैं कि उन्होंने वे कर्तव्य अपने आसपास के लोगों को अधिक या कम भाने की रीति से पूरे किए हैं। जब तक ऐसा है, तब तक उनकी भक्ति दुर्बल अवस्था में है। परमेश्वर के यहाँ ग्रहणयोग्य ठहरने के लिए उन्हें अपनी महिमा से दृष्टि हटानी होगी, और केवल परमेश्वर की महिमा पर ही अपनी दृष्टि लगाए रखनी होगी। परन्तु जैसे-जैसे वे अपने आप से दृष्टि हटाते हैं, और परमेश्वर को सदा अपने सामने रखते हैं, और केवल उसकी महिमा पर दृष्टि लगाए रखते हैं, वैसे-वैसे वे उसकी कृपा में अधिकाधिक बढ़ते जाते हैं।
7. फलस्वरूप, मनुष्यों की चापलूसी या निन्दा के प्रति बढ़ती हुई मृतता अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है। पौलुस अनुग्रह में इतना बढ़ गया था कि वह मनुष्यों के द्वारा परखे जाने को बहुत छोटी बात समझता था; वह केवल परमेश्वर के सामने अपने आप को ग्रहणयोग्य ठहराना चाहता था। जैसे-जैसे आप अपने आप को मनुष्यों की चापलूसी या निन्दा के प्रति इस मृतता की अवस्था में बढ़ता हुआ पाते हैं, वैसे-वैसे आपके पास प्रमाण है कि आप अनुग्रह में बढ़ रहे हैं।
8. परमेश्वर की सम्पूर्ण इच्छा को ग्रहण करने में बढ़ती हुई हार्दिकता उसकी कृपा में बढ़ने का प्रमाण है। कुछ लोग उसकी उस इच्छा के विरुद्ध विद्रोह करते हैं जो उसके वचन में और उसके विधान में प्रगट की गई है। दूसरे लोग कठिन परिस्थितियों में उसकी उस इच्छा को, जो उसके वचन में और उसके विधान में प्रगट की गई है, बस किसी तरह सह लेते हैं; परन्तु जो अनुग्रह में बढ़ रहे हैं, उन्हें उसकी सम्पूर्ण प्रगट की हुई इच्छा को अधिकाधिक हार्दिकता से गले लगाना अधिक स्वाभाविक लगता है।
9. बड़े क्लेशों में बढ़ती हुई शान्ति और स्थिरता परमेश्वर की कृपा में बढ़ने का प्रमाण है। यह अधिक व्यापक और अधिक निःशंक विश्वास को, और इन क्लेशों में प्रगट की गई परमेश्वर की इच्छा की अधिक पूर्ण और अधिक हार्दिक स्वीकृति को प्रगट करता है, और दिखाता है कि प्राण अपनी चट्टान, मसीह, पर अधिक स्थिरता और दृढ़ता से लंगर डाले हुए है।
10. अचानक और कुचल देनेवाली विपत्तियों और शोकों में बढ़ती हुई प्रशान्ति अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है। जब परमेश्वर के विधान की अचानक आँधियाँ प्राण पर आती हैं, उसके प्रियजनों को बहा ले जाती हैं, और उसकी सांसारिक आशाओं को झुलसा देती हैं, तब प्राण जितना अधिक प्रशान्त बना रह सकता है, उतना ही बड़ा उसके पास यह प्रमाण होता है कि वह परमेश्वर की विशेष कृपा के अधीन है। यह प्रशान्ति परमेश्वर की कृपा का परिणाम भी है और प्रमाण भी।
11. बहुत उत्तेजित किए जाने पर भी बढ़ता हुआ धीरज परमेश्वर की कृपा में बढ़ने का प्रमाण है।
12. “आनन्द के साथ सहनशीलता” परमेश्वर की कृपा में बढ़ने का प्रमाण है। जब आप पाते हैं कि आप परमेश्वर की उस इच्छा को, जो आपको दुःख उठाने के लिए बुलाने में प्रगट होती है, केवल सह ही नहीं सकते, वरन ग्रहण भी कर सकते हैं; और विशेष रूप से, जब आप इन दुःखों को ग्रहण कर सकते हैं, और उन्हें लम्बे समय तक और आनन्द के साथ सह सकते हैं, तब आपके पास प्रमाण है कि आप परमेश्वर की कृपा में बढ़ रहे हैं।
13. क्रूसों और निराशाओं में, और कठोर पीड़ा में बढ़ती हुई हार्दिकता और आनन्द परमेश्वर की कृपा में बढ़ने का प्रमाण है।
14. जो कुछ संसार दे सकता है, या जिसकी वह धमकी दे सकता है, उस सब के प्रति बढ़ती हुई मृतता परमेश्वर की कृपा में बढ़ने का प्रमाण है।
15. परमेश्वर के विधान के सारे ठहराए हुए भागों में बढ़ता हुआ विश्राम और सन्तोष अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है।
16. परमेश्वर के विधान के किसी भी ठहराए हुए भाग पर कुड़कुड़ाने या खेद करने की कम परीक्षा अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है।
17. जब किसी भी बात में हमारी इच्छा के विरुद्ध कुछ होता है या हमें निराशा मिलती है, तब झुँझलाने की कम परीक्षा अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है।
18. जब किसी भी प्रकार से हमारा अपमान या दुर्व्यवहार किया जाता है, तब क्रोध और बदला लेने की आत्मा की कम से कम परीक्षा इस बात का प्रमाण है कि संवेदन-शक्ति अधिकाधिक पूर्ण रूप से वश में होती जा रही है, और परिणामस्वरूप हम परमेश्वर की कृपा में बढ़ रहे हैं। 19. अपनी परीक्षाओं और कष्टों पर मन लगाए रहने और उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर देखने, उनके विषय में सोचते रहने और दूसरों से उनकी चर्चा करने की कम परीक्षा इस बात का प्रमाण है कि हम अपने विषय में कम से कम सोचते हैं, और अपनी परीक्षाओं और कष्टों को परमेश्वर में अधिकाधिक सन्तोष के साथ स्वीकार करते हैं। कुछ ऐसे लोगों को, जो भले होने का अंगीकार करते हैं, सदा अपने ही कष्टों और परीक्षाओं पर मन लगाए रहते और उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर बताते सुनना दुःखद है। परन्तु यदि वे अनुग्रह में बढ़ें, तो वे इनके विषय में कम से कम सोचेंगे, और इन्हें “हलका-सा क्लेश” समझने की ओर अधिक झुकेंगे। हम अनुग्रह में जितना अधिक बढ़ते हैं, मार्ग में मिलनेवाली बुराइयों पर उतना ही कम बल देते हैं। एक भले मनुष्य ने, जो वास्तव में ऐसी परीक्षाओं और क्लेशों में से होकर गुज़र रहा था जिन्हें संसार बहुत कठोर कहेगा (उसकी प्रिय पत्नी का देहान्त हो गया था, और उसके बच्चे एक के बाद एक मर गए थे), एक बार मुझसे कहा, “मुझ पर दयाएँ बहुत हैं, और क्लेश थोड़े।” जब ऐसी परिस्थितियों में कोई मनुष्य कह सकता है, “मेरे लिए माप की डोरी मनभावने स्थान में पड़ी, और मेरा भाग मनभावना है,” तो उसके पास इस बात का सबसे सन्तोषजनक प्रमाण है कि वह परमेश्वर की कृपा में बढ़ रहा है। क्योंकि मन की यह अवस्था परमेश्वर की कृपा का परिणाम भी है और प्रमाण भी।
20. अपनी परीक्षाओं को हलका समझने और अपनी आशिषों को बड़ा मानने की बढ़ती हुई प्रवृत्ति इस बात का प्रमाण है कि हम परमेश्वर की कृपा में बढ़ रहे हैं।
21. परमेश्वर के विधान की घटनाओं के विषय में, और विशेष रूप से उन बातों के विषय में जो हमें निकट से और गहराई से प्रभावित करती हैं, कम से कम चिन्ता और फिक्र करना अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है। यह अधिक व्यापक और अधिक निःशंक विश्वास का, अधिक अधीन इच्छा का, और स्वार्थ-साधन की घटती हुई प्रवृत्ति का प्रमाण है; और इसलिए परमेश्वर की बढ़ती हुई कृपा का प्रमाण है।
22. जीवन की घटनाओं से, विशेष रूप से उनसे जो हमारी अपनी योजनाओं, आशाओं, अपेक्षाओं और इच्छाओं के विपरीत जाती हैं, और जो हमारे सबसे प्रिय लक्ष्यों को विफल कर देती हैं, कम से कम व्याकुल और परेशान होना अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है।
23. परमेश्वर के विधान की बुद्धि, भलाई और सर्वव्यापकता पर बढ़ता हुआ और सजीव अनुभव किया हुआ भरोसा, मन की वह अवस्था जो हर बात में परमेश्वर को देखती है, अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है। कुछ मन इतने आत्मिक हो जाते हैं कि वे मानो देह में निवास करते ही नहीं दिखते, और निरन्तर हर घटना में परमेश्वर की उपस्थिति का अनुभव करते हुए प्रतीत होते हैं, लगभग मानो वे देह-रहित हों और परमेश्वर को आमने-सामने देखते हों। वे स्वाभाविक जगत की अपेक्षा आत्मिक जगत में ही बसते, जीते, चलते-फिरते और स्थिर रहते हुए प्रतीत होते हैं। वे ईश्वरीय उपस्थिति, कार्य और सुरक्षा के ऐसे बोध में निरन्तर रहते हैं कि पृथ्वी के निवासी जैसे दिखाई ही नहीं देते। जिन लोगों के बीच वे रहते हैं, उनके लिए वे एक जीता-जागता, चलता-फिरता रहस्य हैं। उनकी सक्रियता के स्रोत इतने ईश्वरीय हैं, उनका जीवन इतना परमेश्वर में छिपा हुआ है, वे संसार से इतने ऊपर के प्रभावों के अधीन कार्य करते हैं, कि उन्हें अन्य मनुष्यों के मानदण्डों से नहीं परखा जा सकता। शारीरिक मन उन्हें समझ नहीं सकते। उनका छिपा हुआ जीवन उन लोगों के लिए, जो अपने आत्मिक जीवन में उनसे बहुत नीचे हैं, इतना अज्ञात और इतना अज्ञेय है कि उन्हें अनिवार्य रूप से बड़ा सनकी, रहस्यवादी या एक ही धुन के पागल, बड़े विचित्र धार्मिक विचारोंवाले, भावुक उत्साही, और कदाचित धर्मोन्मादी समझा जाता है। ये लोग संसार में तो हैं, परन्तु संसार से ऊपर जीते हैं। वे संसार में की अशुद्धताओं से इतना बच निकले हैं कि वे पौलुस के साथ सच्चाई से और समझ-बूझकर गलातियों 6:14 में कह सकते हैं, “पर ऐसा न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का, जिसके द्वारा संसार मेरे लिए और मैं संसार के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ।” ऐसे लोग स्पष्ट रूप से परमेश्वर के अनुग्रह में बढ़ रहे हैं।
24. दूसरों के दोषों और कमज़ोरियों पर मन लगाए रहने की कम से कम इच्छा होना अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है।
25. दूसरों के विषय में व्यंग्य से या कठोरता से बोलने, या उनका प्रेमरहित न्याय करने की कम से कम इच्छा होना; और उनकी पीठ पीछे उनके वास्तविक या कल्पित दोषों की चर्चा करने में बढ़ती हुई कोमलता या सावधानी, अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है।
26. किसी को भी शत्रु मानने या उसके साथ शत्रु जैसा व्यवहार करने में बढ़ती हुई अनिच्छा, और उनके साथ दया का व्यवहार करने, हृदय से उनके लिए प्रार्थना करने, और उनका भला करने के प्रयत्नों में बढ़ती हुई सहजता और स्वाभाविकता, अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है।
27. किसी की की हुई हानि को स्मरण रखने की कम से कम परीक्षा, और हानि पहुँचाए जाने पर बदला लेने की हर इच्छा का शान्त हो जाना, अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है।
28. किसी की की हुई हानि को क्षमा करने और उसे दृष्टि से ओझल करके गाड़ देने की बढ़ती हुई तत्परता और हार्दिकता, और एक प्रकार की नैतिक असमर्थता कि जिन्होंने हमें सबसे गहरी हानि पहुँचाई है, उनकी सर्वोच्च भलाई खोजने के सिवाय हम और कुछ कर ही न सकें, अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है।
29. जब हम अपने अनुभव में पाते हैं, और दूसरों के सामने प्रगट करते हैं, कि सब मनुष्यों को अपने भाई मानना हमारे लिए अधिकाधिक स्वाभाविक होता जा रहा है, विशेष रूप से सारे सम्प्रदायगत भेदभावों को, जाति और रंग के, निर्धनता और धन के, रक्त-सम्बन्ध के, और आत्मिक के बजाय स्वाभाविक बन्धनों के सारे विचारों और पूर्वाग्रहों को दृष्टि से हटा देना, और सब मनुष्यों का, शत्रुओं और मित्रों का समान रूप से, भला करने के लक्ष्य में परमेश्वर के साथ एक होकर काम करना हमारे लिए अधिकाधिक स्वाभाविक होता जा रहा है, तब हमारे अपने पास परमेश्वर की कृपा में बढ़ने का सबसे ऊँचा प्रमाण होता है, और हम दूसरों को भी यही प्रमाण देते हैं।
30. विशेष रूप से यह तब सच है, जब हम अपने आप को उन लोगों के लिए, जो हमसे घृणा करते हैं, बड़े बलिदान करने में बहुत हार्दिक और पूरे मन से तत्पर पाते हैं, और उनके अनन्त उद्धार को आगे बढ़ाने के लिए अपने प्राण तक देने को तैयार रहते हैं, तब हमारे पास अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण होता है।
31. और भी अधिक विशेष रूप से, जब हम पाते हैं कि जो कुछ हम परमेश्वर के लिए, या मनुष्यों के प्राणों के लिए कर सकते हैं, उसमें से किसी भी बात को बलिदान समझने की ओर हमारा झुकाव कम से कम होता जा रहा है; जब, यदि शत्रुओं के प्राणों को बचाने के लिए अपने प्राण देने को बुलाए जाएँ, तो हम अपने प्राणों को प्रिय नहीं समझते; जब “उन्हें बचाने के आनन्द” के लिए “हम लज्जा की कुछ चिन्ता न करके क्रूस का दुःख सह सकते हैं,” या कोई भी बलिदान जिसके लिए हम बुलाए जाते हैं; तब हमारे पास प्रमाण है कि हम परमेश्वर की कृपा में बढ़ रहे हैं।
32. फिर, जब हम अपने आप को इस ओर अधिकाधिक झुका हुआ पाते हैं कि “जब हम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ें, तो इसको पूरे आनन्द की बात समझें,” और जब हम अपनी परीक्षाओं, झुँझलाहटों, हानियों और क्रूसों को ऐसी दृष्टि से देखने लगते हैं कि उन पर कम से कम बल दें, तब हमारे पास प्रमाण है कि हम धीरज में, और इसलिए परमेश्वर की कृपा में, बढ़ रहे हैं।
33. जब जिन लोगों को हमने हानि पहुँचाई है, उनके सामने पूरा अंगीकार करने में हमें कम से कम अनिच्छा होती है; जब बढ़ती हुई तत्परता और हार्दिकता के साथ हम अपने हृदय को जाँचे जाने के लिए खोल देते हैं, अपने अनुचित काम का बोध अपने हृदय पर लेते हैं; और जब ऐसी स्थितियों में हम तब तक चैन नहीं पाते जब तक अपनी सामर्थ भर पूरा अंगीकार और क्षतिपूर्ति न कर लें; जब स्वीकार करना, अंगीकार करना, और पूरी भरपाई करना हमारे लिए परीक्षा और क्रूस होने के बजाय आनन्द की बात हो; तब हमारे पास प्रमाण है कि हम परमेश्वर की कृपा में बढ़ रहे हैं।
34. जब हम परमेश्वर की दयाओं से, और अपने संगी मनुष्यों और आसपास के लोगों की कृपाओं से अधिकाधिक प्रभावित और द्रवित होते हैं; जब हम परमेश्वर में, या किसी और में, दया के प्रगटीकरण की अधिक गहराई से और अधिक पूर्ण रूप से कद्र करते हैं; जब हम इन कृपाओं से अधिकाधिक दीन और द्रवित होते हैं, और “नम्रता से चलना, कृपा से प्रीति रखना, और न्याय से काम करना,” और कृतज्ञता से जीना हमें अधिकाधिक स्वाभाविक लगता है; तब हमारे पास प्रमाण है कि हम परमेश्वर की कृपा में बढ़ रहे हैं।
35. जब हम अपने आप को प्रभु को और अधिक जानने के लिए यत्न करते रहने की ओर बढ़ती हुई लगन के साथ खिंचा हुआ पाते हैं, तब हमारे पास अनुग्रह में बढ़ने का प्रमाण है।
36. जब हम अपने आप को धार्मिक सत्य से अधिकाधिक शीघ्रता से प्रभावित और द्रवित, जागृत और प्रेरित होता हुआ पाते हैं; और जब हम परमेश्वर की सम्पूर्ण इच्छा और उसके विधान को, चाहे वे इस समय कितने भी दुःखदायी क्यों न हों, ग्रहण करने और उनमें विश्राम करने में अपनी सब शक्तियों, बौद्धिक, इच्छात्मक और संवेदनात्मक, के कार्य में बढ़ता हुआ सामंजस्य पाते हैं; तब हमारे पास प्रमाण है कि हम अनुग्रह में बढ़ रहे हैं।
37. परमेश्वर के आदर के लिए, उसकी कलीसिया की पवित्रता और आदर के लिए, परमेश्वर के अधिकारों के लिए, और सब मनुष्यों के अधिकारों के लिए बढ़ती हुई जलन इस बात का प्रमाण है कि हम परमेश्वर के अनुरूप होते जा रहे हैं, और निश्चय ही उसकी कृपा में बढ़ रहे हैं।
VII. अनुग्रह में कैसे बढ़ें।
1. इस व्याख्यान के चौथे शीर्षक के अन्तर्गत बताई गई शर्तों को पूरा कीजिए। उन्हें दोहराने की आवश्यकता नहीं।
2. स्मरण रखिए कि उन्नति का हर कदम विश्वास के द्वारा उठाया जाना चाहिए, कर्मों के द्वारा नहीं। इस विषय में कुछ भले मनुष्यों ने जो भूल की है, वह सचमुच आश्चर्यजनक है। डॉ. चाल्मर्स दृढ़ता से कहते हैं कि पवित्र किए जाने का मार्ग उसके लिए कर्म करना है। कुछ वर्ष पहले डॉ. पॉन्ड ने एक पुस्तिका प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने इस विषय पर डॉ. चाल्मर्स का पक्ष लिया, और दृढ़ता से कहा कि विश्वास के द्वारा पवित्र किए जाने का विचार एक बेतुकी बात है। वास्तव में यह प्रथा लगभग सर्वत्र रही है कि अनुग्रह में बढ़ने को परमेश्वर की आज्ञाकारिता की आदतें बनाने के रूप में प्रस्तुत किया जाए। अब, यह बड़े आश्चर्य की बात है कि इतने अधिक भले मनुष्य इस भूल में पड़ गए हैं। सच्चाई यह है कि मसीही जीवन में उन्नति का हर कदम विश्वास के द्वारा मसीह को नए सिरे से और अधिक पूर्ण रूप से अपनाने से, पवित्र आत्मा के अधिक पूर्ण बपतिस्मे से उठाया जाता है। जिन परीक्षाओं की परिस्थितियों में से हम गुज़रते हैं, उनके द्वारा जैसे-जैसे हमारी दुर्बलताएँ, निर्बलताएँ, उलझानेवाले पाप और आवश्यकताएँ हम पर प्रगट होती हैं, वैसे-वैसे हमारी एकमात्र प्रभावकारी सहायता मसीह में ही मिलती है; और हम केवल उतना ही बढ़ते हैं जितना हम कदम-कदम करके, किसी न किसी सम्बन्ध में, उसे अधिक पूर्ण रूप से अपनाते हैं, और अधिक पूर्ण रूप से “उसे पहिन लेते हैं।” जैसे-जैसे हम आत्म-निर्भरता से अधिकाधिक खाली किए जाते हैं, जैसे-जैसे हम अपनी किसी आज्ञाकारिता के द्वारा पवित्र आदतें बनाने की हर आशा को अधिकाधिक त्यागते और दूर फेंकते हैं, और जैसे-जैसे हम विश्वास के द्वारा पवित्र आत्मा के अधिकाधिक गहरे बपतिस्मे प्राप्त करते हैं, और प्रभु यीशु मसीह को अधिकाधिक पूर्ण रूप से, और उसके अधिक पदीय सम्बन्धों में, पहिन लेते हैं, ठीक उतनी ही तेज़ी से हम परमेश्वर की कृपा में बढ़ते हैं। पवित्र आदतें बनाने के द्वारा अनुग्रह में बढ़ने का सामान्य रूप से माना जानेवाला विचार जितना भ्रामक और खतरनाक है, उतना और कुछ नहीं हो सकता। केवल विश्वास के कार्यों के द्वारा ही हम मसीह को अपनाते हैं, और हम विश्वास के द्वारा उतने ही सच्चे रूप से पवित्र किए जाते हैं जितने सच्चे रूप से विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हैं। अपनी ‘क्रमबद्ध धर्मविज्ञान’ (सिस्टमैटिक थियोलॉजी) में, सम्पूर्ण या स्थायी पवित्रीकरण की शर्तें बताते हुए, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, मैंने मसीह के लगभग साठ पदीय सम्बन्धों पर ध्यान दिलाया है, और वहाँ इस बात पर बल दिया है, जैसे यहाँ बल देता हूँ, कि पवित्रता में, और परिणामस्वरूप परमेश्वर की कृपा में, बढ़ना केवल इन सब पदीय सम्बन्धों में मसीह को नए सिरे से, अधिक पूर्ण रूप से, और अधिक गहराई से अपनाने के द्वारा ही सुनिश्चित होता है। यदि आप अनुग्रह में बढ़ना चाहते हैं, तो आपको यह विश्वास के द्वारा ही करना होगा। आपको पवित्र आत्मा के लिए विश्वास से प्रार्थना करनी होगी। आपको पवित्र आत्मा के द्वारा मसीह को अपनाना और पहिन लेना होगा। अपनी उन्नति के हर अगले कदम पर आपको विश्वास के द्वारा पवित्र आत्मा का नया अभिषेक प्राप्त करना होगा।
टिप्पणियाँ
1. इस विषय से हम देखते हैं कि नए विश्वासियों को सही शिक्षा देना कितना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। बहुत-से मामलों में उन्हें ऐसी शिक्षा बहुत कम मिलती है जो उनके अनुभव और उनकी मसीही समझ के स्तर के अनुकूल हो। कुछ लोग पवित्र लोगों के स्थिर बने रहने के विषय में ऐसे विचार रखते हैं कि
यह मान लिया जाता है कि मसीह में बालक बिना पालन-पोषण के, और वचन के उस निर्मल दूध के बिना, जिसके द्वारा उन्हें बढ़ना है, अपने आप बढ़ जाएँगे। कुछ लोग यह मानकर कि उन्हें शिक्षा की आवश्यकता है, अनजाने में उन्हें झूठी शिक्षा देते हैं; वे उन्हें बाहरी रूप से और उत्साह के साथ काम में लगा देते हैं, और उनके भीतरी जीवन को दृढ़ और विकसित करने की ओर अधिक ध्यान नहीं देते। वे उन्हें यह नहीं सिखाते कि मसीह को अपने जीवन के रूप में कैसे अपनाएँ और उसी पर कैसे जीएँ, बल्कि निरन्तर उन पर दबाव डालते रहते हैं कि अपना कर्तव्य करें, परमेश्वर के लिए परिश्रम करें, और प्राणों के लिए परिश्रम करें; और उनके मन पर यह विचार पर्याप्त रूप से अंकित नहीं करते कि उनके कार्य का कोई मूल्य नहीं, जब तक वह उनके अपने प्राणों में परमेश्वर के जीवन से न निकले। इसका परिणाम भागदौड़ भरी बाहरी सक्रियता होता है, जबकि भीतरी आत्मिक जीवन क्षीण होता जाता है। इसका अन्त अपने ही हृदय की कमी पर घृणा में, और उदासीनता और लापरवाही में लौट जाने में होना निश्चित है।
2. कभी-कभी इसके विपरीत दिशा में भूल की जाती है। उन्हें मसीह में इस अर्थ में विश्राम करना सिखाया जाता है कि वे एक प्रकार के निष्क्रियतावाद (क्वायटिज़्म) और व्यवस्था-विरोधी (एन्टिनोमियन) निठल्लेपन का रूप धारण कर लेते हैं। उन्हें विश्वास करने के लिए उपदेश दिया जाता है, परन्तु उनके मन पर लगन के साथ यह दृढ़ बोध अंकित नहीं किया जाता कि वह ऐसा विश्वास होना चाहिए जो कार्य करता है, और प्रेम के द्वारा कार्य करता है, जो हृदय को शुद्ध करता है, और संसार पर जय पाता है। परिणाम यह होता है कि वे धर्म में कुछ नहीं करते। पापियों को उनके बीच में सोते रहने और नरक में जाने दिया जाता है, और वे उन्हें बचाने का कोई प्रयत्न नहीं करते।
3. हम पवित्र आत्मा से अभिषिक्त सेवकाई का महत्व देखते हैं। कलीसिया की बड़ी आवश्यकता एक ऐसी सेवकाई है जो पवित्र आत्मा से इतनी पूर्ण रूप से अभिषिक्त हो कि वह जानती हो कि कलीसिया को मसीही भक्ति के पूर्णतम विकास की ओर आगे और ऊपर कैसे ले जाए। नए विश्वासियों को शिक्षा देने, और कलीसिया को पवित्रता में उन्नति करती हुई बनाए रखने के लिए, पादरी को स्वयं उन्नति करनी होगी। उसे सचमुच जीवित, बढ़ता हुआ मसीही होना चाहिए। मेरे पास यह जानने का अच्छा कारण है कि बहुत-से स्थानों में कलीसियाएँ अपने पादरियों में जीवित भक्ति और बढ़ोतरी की कमी से गहरी पीड़ा में हैं। उनके पादरी अपनी शिक्षा में बौद्धिक, साहित्यिक, दार्शनिक, धर्मवैज्ञानिक तो हैं, परन्तु अभिषेक में दुःखद रूप से कमज़ोर हैं। उनके पास परमेश्वर के साथ या मनुष्य के साथ बहुत थोड़ी सामर्थ है। वे कुछ सीमा तक बुद्धि को शिक्षा देते हैं, परन्तु हृदय की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते। उनके प्रचार के अधीन नए विश्वासी भूखे मरते हैं। वे आत्मिक सुसमाचार के बजाय एक बौद्धिक सुसमाचार का प्रचार करते हैं। वे धर्म का प्रचार एक सिद्धान्त, एक मत, एक दर्शन के रूप में करते हैं, न कि एक वास्तविक जीवित अनुभव के रूप में। ऐसे पादरियों का प्रचार सुनना प्रायः अत्यन्त पीड़ादायक होता है जो स्पष्ट रूप से नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं, या किस बात को दृढ़ता से बता रहे हैं। वे धर्म के विषय में ऐसे बोलते हैं मानो वह परमेश्वर के प्रति हृदय की भक्ति के बजाय एक भीतरी भावना हो; मानो वह सब कुछ समेटनेवाले और प्रभावकारी प्रेम, मन की एक स्वैच्छिक अवस्था और स्थिति, जिससे अनिवार्य रूप से पवित्र जीवन निकलता है, के बजाय केवल एक भावावेग, एक भावना हो। वे विश्वास के विषय में ऐसे बोलते हैं मानो वह केवल एक बौद्धिक अवस्था या धारणा हो, न कि भरोसे का, और परमेश्वर की सारी इच्छा को पूरा करने और उसके लिए सब दुःख सहने के लिए सम्पूर्ण अस्तित्व को सौंप देने का एक कार्य। वे पश्चाताप के विषय में ऐसे बोलते हैं मानो वह पाप के लिए केवल एक अनैच्छिक शोक हो। वे यह नहीं सिखाते कि पश्चाताप परमेश्वर के प्रति मन का परिवर्तन है, स्वार्थ-साधन की आत्मा का त्याग है, और सारे मन का परमेश्वर की ओर फिर जाना है। वे पवित्रता के विषय में ऐसे बोलते हैं मानो वह इस जीवन में सर्वथा अप्राप्य अवस्था हो। वास्तव में, मैं यह दुःख के साथ कहता हूँ, परन्तु मुझे कहना ही होगा, कि बहुत-से पादरियों की शिक्षा कलीसिया के लिए ठोकर का कारण ही है। उनकी शिक्षा के अधीन नए विश्वासी अनुग्रह में इतने स्थिर नहीं होते, और न हो सकते हैं, कि वे बहुत उपयोगी हों, या ऐसा जीवन जीएँ जो मसीह के लिए आदर की बात हो। ज़रा सोचिए, उन्नीसवीं शताब्दी में पादरी नए विश्वासियों को यह प्रचार करते हैं कि उन्हें कर्मों के द्वारा अनुग्रह में बढ़ना है। इस पर आकाश और पृथ्वी चकित हों! ऐसे शिक्षक स्वयं नहीं जानते कि अनुग्रह में कैसे बढ़ें। यदि मैं कहूँ, “वे अन्धे मार्ग दिखानेवाले हैं,” तो क्या मुझे कठोर समझा जाएगा?
4. हम इतने अधिक पीछे हटने का कारण देखते हैं। जिन नए विश्वासियों की अगुवाई झूठी शिक्षा के द्वारा की जाती है, वे निश्चय ही पीछे हट जाएँगे। यदि एक ओर उन्हें कर्मों के द्वारा पवित्रीकरण प्राप्त करने के काम में लगा दिया जाता है, तो उनके कर्म शीघ्र ही मरे हुए कर्म बन जाएँगे, और उस विश्वास का फल न होंगे जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है। यदि दूसरी ओर उनमें अमूर्त धारणाएँ और मत ठूँस दिए जाते हैं, और उन्हें व्यवस्था-विरोधी (एन्टिनोमियन) विश्वास में विश्राम करना सिखाया जाता है, तो वे सुस्ती और निष्क्रियता में डूब जाएँगे। मैं पूरी तरह विश्वास करता हूँ कि लगभग उन सब मामलों में जहाँ किसी जागृति के बाद विनाशकारी प्रतिक्रिया हुई है, उसका कारण समय पर और उचित शिक्षा का अभाव रहा है। परन्तु समय पर और उचित होने के लिए, वह अभिषिक्त शिक्षा होनी चाहिए।
5. धर्मविज्ञान विद्यालयों (सेमिनरियों) को अपने विद्यार्थियों के अनुग्रह में बढ़ने की ओर कहीं अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्हें अनुभवात्मक धर्म के एक ऐसे प्रोफ़ेसर की आवश्यकता है जिसके पास इतना अनुभव और सामर्थ हो कि वह उन्हें मसीही अनुभव के उन ऊँचे क्षेत्रों में आगे बढ़ा सके, जो कलीसिया को विजय की ओर ले जाने के योग्य होने के लिए उनके लिए अनिवार्य हैं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि सेवकाई के लिए अध्ययन करनेवाले युवकों के हृदय को विकसित करने के लिए कितना कम प्रयत्न किया जाता है। इस विषय में हमें परिवर्तन चाहिए। पादरी-पद पर नियुक्ति (ऑर्डिनेशन) की शर्त के रूप में मसीही अनुभव का कहीं अधिक ऊँचा स्तर माँगा जाना चाहिए। यह देखना पीड़ादायक है कि लोगों की बौद्धिक उपलब्धियों के विषय में कितनी सावधानी से जाँच की जाती है, जबकि वे अपने मसीही अनुभव का जो विवरण देते हैं, उससे मुश्किल से यह आशा की जा सकती है कि उनका मन-परिवर्तन हुआ है। ऐसे युवकों को परमेश्वर की कलीसिया की रखवाली करने के लिए लगा देना कितनी दुःखद बात है। पुराने मसीही कितना विलाप करते हैं जब वे देखते हैं कि परमेश्वर की कलीसिया में नियुक्त अगुवे आत्मिक बालक ही हैं।
6. मैं कभी भी पादरी-पद पर नियुक्ति (ऑर्डिनेशन) के किसी उम्मीदवार की ऐसी जाँच में उपस्थित नहीं रहा जिसमें उससे मन-परिवर्तन के साधारण प्रमाण से अधिक कुछ माँगा गया हो। मैंने कभी नहीं सुना कि उनसे मसीही अनुभव में उनकी उन्नति के विषय में, और परमेश्वर के झुण्ड को हरी-हरी चराइयों में और सुखदाई जल के पास ले जाने की उनकी आत्मिक योग्यता के विषय में प्रश्न पूछे गए हों। मैंने कभी उनसे ऐसी रीति से प्रश्न पूछे जाते नहीं सुना जिससे इस बात की तनिक भी समझ प्रगट हो कि उस मनुष्य की अनिवार्य आत्मिक योग्यताएँ क्या हैं जिसे परमेश्वर की कलीसिया के अगुवे और आत्मिक शिक्षक के रूप में सामने खड़ा होना है। किसी उम्मीदवार की बौद्धिक उपलब्धियों का पता लगाने में जितने घण्टे लगाए जाते हैं, उतने मिनट भी उसकी आत्मिक और अनुभवात्मक उपलब्धियों का पता लगाने में नहीं लगाए जाते। सारी जाँच स्पष्ट रूप से दिखा देगी कि नियुक्त करनेवाली संस्था पादरी की शिक्षा के इस भाग पर बहुत कम बल देती है। क्या यह कोई आश्चर्य की बात है कि परमेश्वर की कलीसिया इतनी दुर्बल और अप्रभावी है, जबकि उसके अगुवों और शिक्षकों में से बहुत-से आत्मिक ज्ञान में निरे बालक हैं, और जबकि परिपक्व मसीही अनुभव को पादरी की अनिवार्य शिक्षा का कोई भाग नहीं बनाया जाता? अरे, यह तो इससे भी असीम रूप से अधिक खतरनाक और हास्यास्पद है कि युद्धभूमि में सेना की अगुवाई ऐसे लोगों को सौंप दी जाए जो केवल गणित समझते हैं, और जिन्हें सैनिक विषयों में कभी कोई प्रशिक्षण या अनुभव नहीं मिला।
इस विषय में भी बड़ा परिवर्तन होना चाहिए। कलीसियाओं को तब तक पास्टरों को नियुक्त करने और ग्रहण करने से इन्कार करना चाहिए, जब तक वे इस बात से पूरी तरह सन्तुष्ट न हों कि उन्होंने मसीही अनुभव में बहुत उन्नति की है, ताकि वे कलीसिया को आगे ले जा सकें और उसे जागृत रख सकें।
उन्हें इस बात पर बल देना चाहिए कि पास्टर के सिर के साथ-साथ उसके हृदय की भी शिक्षा हुई हो; कि उसमें यह योग्यता हो कि वह नए विश्वासियों को लेकर उन्हें उन गहरे अनुभवों तक पहुँचाए जो उन्हें परमेश्वर के कार्य में स्थिर और प्रभावी कार्यकर्ता बना दें। ज़रा उन धर्मविज्ञान विद्यालयों के विषय में सोचिए, जैसे वे जिनकी अध्यक्षता डॉ. चाल्मर्स और डॉ. पॉन्ड ने की है, जहाँ परमेश्वर की कलीसिया के अगुवों को यह सिखाया जाता है कि पवित्रीकरण या अनुग्रह में बढ़ना विश्वास के द्वारा नहीं, बल्कि कर्मों के द्वारा प्राप्त होता है। गत में यह न बताओ। हाय सिय्योन, जब उसके बड़े और भले लोग ऐसी भूलों में पड़ जाते हैं!
अनुक्रमणिकाएँ पवित्रशास्त्र के सन्दर्भों की अनुक्रमणिका उत्पत्ति 13:9 निर्गमन 17:11-13 न्यायियों 5:14 नहेम्याह 6:4 एस्तेर 4:1 अय्यूब 21:34 भजन संहिता 15:4 19:53 85:6 103:17 119:136 नीतिवचन 11:30 11:30 11:30 14:14 28:13 यशायाह 22:4 43:10 65:24 यिर्मयाह 4:19 9:1 13:17 19:11 29:13 यहेजकेल 36:37 दानिय्येल 9:2 9:3 12:3 होशे 10:12 हबक्कूक 3:2 मत्ती 5:48 18:19 18:19 26:38 26:39 26:40 मरकुस 11:14 11:22 11:23 11:23 11:24 11:24 11:24 11:24 11:24 11:24 11:25 11:26 लूका 11:13 14:11 18:7 18:22 22:42 यूहन्ना 3:10 11:42 17:9 21:15 21:15 प्रेरितों के काम 16:20 16:21 16:30 26:25 रोमियों 7:1-25 8:1-39 8:9 8:14 8:26 8:26 8:26 8:26 8:26-27 8:27 8:27 8:27 9:1-3 1 कुरिन्थियों 4:15 14:8 14:19 2 कुरिन्थियों 12:8 12:9 13:5 गलातियों 5:17 6:14 इफिसियों 5:18 इब्रानियों 5:7 याकूब 1:5-6 5:16 5:16 5:19 5:20 2 पतरस 3:18 प्रकाशितवाक्य 12:2
