व्याख्यान 15 (22 में से) · 1868

जागृतियों में बाधाएँ

चार्ल्स जी. फ़िन्नी · 1868

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    जागृतियों में बाधाएँ

    “मैं तो भारी काम में लगा हूँ, वहाँ नहीं जा सकता; मेरे इसे छोड़कर तुम्हारे पास जाने से वह काम क्यों बन्द रहे?” नहेम्याह 6:3

    परमेश्वर का यह दास बाबुल से इसलिए आया था कि यरूशलेम में, जो उसके पुरखाओं की कब्रों का नगर था, मन्दिर को फिर से बनाए और परमेश्वर की आराधना को फिर से स्थापित करे। जब सम्बल्लत और उसके कुछ साथियों ने, जो बहुत समय से सिय्योन की उजाड़ दशा पर प्रसन्न होते आए थे, यह जाना कि अब मन्दिर और पवित्र नगर फिर से बनने ही वाले हैं, तो उन्होंने बड़ा विरोध खड़ा किया। सम्बल्लत और दूसरे अगुवों ने कई प्रकार से प्रयत्न किया कि नहेम्याह और उसके साथियों का ध्यान भटका दें और उन्हें अपने काम में आगे बढ़ने से रोक दें; एक समय उन्होंने उन्हें धमकाया, और फिर यह शिकायत की कि वे राजा से बलवा करने पर हैं। फिर उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि उनका उद्देश्य भक्ति का नहीं, बल्कि राजनैतिक है; इस पर नहेम्याह ने सीधे और तुरन्त इनकार करते हुए उत्तर दिया, “जैसा तू कहता है, वैसा तो कुछ भी नहीं हुआ, तू ये बातें अपने मन से गढ़ता है।” अन्त में सम्बल्लत ने नहेम्याह के पास सन्देश भेजा और उससे विनती की कि वह ओनो के मैदान में आकर उससे मिले, ताकि सारे मामले पर मेल-मिलाप से बातचीत हो और कठिनाई सुलझा ली जाए; परन्तु उसकी मनसा उसकी हानि करने की थी। वे देख चुके थे कि नहेम्याह को डराया नहीं जा सकता, और अब वे चालाकी और छल से उसे अपने वश में करना चाहते थे, और उसे अपने काम को पूरे उत्साह से आगे बढ़ाने से खींचकर अलग कर देना चाहते थे। परन्तु उसने उत्तर दिया, “मैं तो भारी काम में लगा हूँ, वहाँ नहीं जा सकता; मेरे इसे छोड़कर तुम्हारे पास जाने से वह काम क्यों बन्द रहे?”

    सदा से ऐसा ही होता आया है कि जब कभी परमेश्वर के दास उसके कार्य के लिए कुछ करते हैं, और ऐसा दिखाई देता है कि वे सफल होंगे, तब शैतान अपने कार्यकर्ताओं के द्वारा नियमित रूप से यह प्रयत्न करता है कि उनके मन को भटका दे और उनके परिश्रम को निष्फल कर दे। पिछले दस वर्षों में भी ऐसा ही हुआ है, जिनमें देश की लम्बाई-चौड़ाई में ऐसी उल्लेखनीय जागृतियाँ हुई हैं। ये जागृतियाँ बहुत बड़ी, बहुत सामर्थी और दूर-दूर तक फैली हुई रही हैं। अनुमान लगाया गया है कि इस अवधि में कम से कम दो लाख लोग मन फिराकर परमेश्वर की ओर आए हैं।

    और शैतान अपनी युक्तियों में लगा रहा है कि परमेश्वर के लोगों का ध्यान भटकाए और उन्हें उलझाए, और उनकी शक्ति को उद्धार के महान कार्य को आगे बढ़ाने से हटा दे। इस विषय पर विचार करते हुए, मैं यह दिखाना चाहता हूँ:

    I. कि धर्म की जागृति एक महान कार्य है।

    II. उन कई बातों का उल्लेख करूँगा जो इसे रोक सकती हैं।

    III. यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि इस महान जागृति को जारी रखने के लिए क्या किया जाना आवश्यक है।

    I. मुझे यह दिखाना है कि धर्म की जागृति एक महान कार्य है।

    यह एक महान कार्य है, क्योंकि इसमें बड़े-बड़े हित जुड़े हुए हैं। धर्म की जागृति में परमेश्वर की महिमा भी—जहाँ तक उसका सम्बन्ध इस संसार के शासन से है—और मनुष्यों का उद्धार भी, दोनों जुड़े हुए हैं। इसमें दो ऐसी बातें जुड़ी हैं जिनका महत्त्व अनन्त है। किसी कार्य की महानता का अनुमान उन परिणामों की महानता से लगाया जाना चाहिए जो उस पर निर्भर हैं। और यही उसके महत्त्व का माप है।

    II. मुझे उन कई बातों का उल्लेख करना है जो किसी जागृति को रोक सकती हैं।

    कुछ लोगों ने इस विषय पर बड़ी मूर्खता की बातें कही हैं, मानो कोई भी वस्तु सच्ची जागृति को हानि नहीं पहुँचा सकती। वे कहते हैं, “यदि आपकी जागृति परमेश्वर का कार्य है, तो उसे रोका नहीं जा सकता; क्या कोई सृजा हुआ प्राणी परमेश्वर को रोक सकता है?” अब मैं पूछता हूँ, क्या यह सामान्य समझ की बात है? पहले यह एक स्थापित धारणा हुआ करती थी कि जागृति को रोका नहीं जा सकता, क्योंकि वह परमेश्वर का कार्य है। और इसलिए वे समझते थे कि उसे रोकने के लिए चाहे कुछ भी किया जाए, कलीसिया के भीतर हो या बाहर, वह चलती ही रहेगी। परन्तु किसान भी ठीक इसी प्रकार तर्क कर सकता है, और सोच सकता है कि वह जाकर अपने गेहूँ को काट डाले तो भी फसल को कोई हानि न होगी, क्योंकि अनाज को उगानेवाला तो परमेश्वर है। जागृति परमेश्वर का कार्य है, और गेहूँ की फसल भी; और परमेश्वर एक दशा में भी साधनों के उपयोग पर उतना ही निर्भर है जितना दूसरी दशा में। और इसलिए जागृति को भी उतनी ही आसानी से हानि पहुँच सकती है जितनी गेहूँ के खेत को।

    1. जब भी कलीसिया यह विश्वास करने लगती है कि जागृति समाप्त होनेवाली है, तो जागृति रुक जाएगी। कलीसिया वे साधन हैं जिनके द्वारा परमेश्वर यह कार्य आगे बढ़ाता है, और उन्हें इसमें अपनी इच्छा से और पूरे मन से काम करना है। किसी जागृति के लिए इससे अधिक घातक कुछ भी नहीं कि उसके मित्र ही यह भविष्यद्वाणी करने लगें कि वह रुकने वाली है। इस कार्य के शत्रु उसके विषय में चाहे जो कहें, चाहे यह भविष्यद्वाणी करें कि यह सब ठण्डा पड़ जाएगा और कुछ भी हाथ न आएगा, इत्यादि, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। वे इस प्रकार उसे रोक नहीं सकते; परन्तु मित्रों को उसे आगे बढ़ाने के लिए विश्वास के साथ परिश्रम और प्रार्थना करनी ही होगी। यह कहना परस्पर विरोधी बात है कि वे इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए विश्वास के साथ परिश्रम और प्रार्थना कर रहे हैं, और साथ ही यह विश्वास भी करते हैं कि यह रुकने वाला है। यदि वे अपना विश्वास खो दें, तो निश्चय ही यह रुक जाएगा। जब कभी जागृतियों के मित्र यह भविष्यद्वाणी करने लगें कि जागृति रुकने वाली है, तो उन्हें प्रभु के नाम से तुरन्त डाँटा जाना चाहिए। यदि यह विचार एक बार फैलने लगे, और आप उसका प्रतिकार करके उसे जड़ से न उखाड़ सकें, तो जागृति अवश्य ही समाप्त हो जाएगी; क्योंकि इस कार्य के लिए यह अनिवार्य है कि मसीही उसे बढ़ाने के लिए विश्वास के साथ परिश्रम और प्रार्थना करें, और यह कहना परस्पर विरोधी बात है कि वे उसके जारी रहने के लिए विश्वास के साथ परिश्रम कर सकते हैं, जबकि वे यह विश्वास करते हैं कि वह समाप्त होने पर है।

    2. जब मसीही इस बात पर सहमत हो जाते हैं कि जागृति समाप्त हो जाए, तो वह समाप्त हो जाएगी। कभी-कभी मसीही देखते हैं कि जागृति के थम जाने का खतरा है, और यदि कोई प्रभावशाली कदम न उठाया गया तो वह रुक जाएगी। यदि यह बात उन्हें व्याकुल करती है, और उन्हें प्रार्थना और नए प्रयत्नों की ओर प्रेरित करती है, तो कार्य नहीं रुकेगा। जब मसीही परमेश्वर के कार्य से और प्राणों के उद्धार से इतना प्रेम करते हैं कि उसके घटने की आशंका मात्र से वे व्याकुल हो उठते हैं, तो यह बात उन्हें प्रार्थना और प्रयत्न की तीव्र वेदना में ले जाएगी। यदि यह उन्हें उसके रुकने को रोकने के लिए वेदना और प्रयत्न की ओर नहीं ले जाती; यदि वे खतरे को देखते हैं, और न उसे टालने का प्रयत्न करते हैं और न कार्य को फिर से जगाने का, तो वे इस बात पर सहमत हैं कि वह रुक जाए। इस समय सारे देश में बहुत से लोग हैं जो जागृतियों को घटते हुए देख रहे हैं, और यह भी देख रहे हैं कि वे पूरी तरह समाप्त हो जाने के बड़े खतरे में हैं, फिर भी वे बहुत थोड़ी व्याकुलता प्रकट करते हैं, और मानो उन्हें इसकी बहुत कम चिन्ता है। पूरी की पूरी कलीसियाएँ अपनी दशा देख रही हैं, और देख रही हैं कि यदि जाग उठना न हुआ तो क्या आने वाला है, फिर भी वे निश्चिन्त बैठी हैं, और परमेश्वर से यह प्रार्थना करते हुए कराहती और तड़पती नहीं कि वह अपने कार्य को फिर से जिलाए। कुछ लोग तो यह भविष्यद्वाणी भी कर रहे हैं कि अब एक बड़ी प्रतिक्रिया होने वाली है, और कलीसिया पर एक बड़ा अकाल आने वाला है, जैसा व्हाइटफ़ील्ड और एडवर्ड्स के दिनों के बाद आया था। फिर भी वे अपनी ही अशुभ आशंकाओं से चौंकते नहीं; वे इस विषय में ठण्डे बने रहते हैं, और तुरन्त दूसरी बातों की ओर मुड़ जाते हैं। वे इस पर सहमत हैं। ऐसा लगता है मानो वे शैतान के तुरही फूँकनेवाले हों, जो परमेश्वर के चुने हुओं की पंक्तियों में घबराहट फैलाने के लिए भेजे गए हों।

    3. जब भी मसीही जागृति को बढ़ाने के अपने प्रयत्नों में यन्त्रवत् हो जाते हैं, तो जागृति समाप्त हो जाएगी। जब उनका विश्वास दृढ़ होता है, और उनके हृदय गर्म और कोमल होते हैं, और उनकी प्रार्थनाएँ पवित्र भावनाओं से भरी होती हैं, और उनके वचनों में सामर्थ होती है, तब कार्य आगे बढ़ता रहता है। परन्तु जब उनकी प्रार्थनाएँ ठण्डी और भावनाहीन होने लगती हैं, और उनकी गहरी भावना जाती रहती है, और वे यन्त्रवत् परिश्रम करने लगते हैं, और बिना भावना के शब्दों का प्रयोग करने लगते हैं, तब जागृति समाप्त हो जाएगी।

    4. जब भी मसीही यह धारणा बना लेते हैं कि कार्य उनकी सहायता के बिना भी चलता रहेगा, तो जागृति समाप्त हो जाएगी। जागृति को बढ़ाने में कलीसिया परमेश्वर के सहकर्मी हैं, और कार्य उतना ही आगे बढ़ सकता है जितना कलीसिया उसे आगे बढ़ाएगी, उससे आगे नहीं। परमेश्वर अठारह सौ वर्षों से प्रयत्न कर रहा है कि कलीसिया इस कार्य में लग जाए। वह बुलाता और आग्रह करता, आज्ञा देता, विनती करता, दबाव डालता और प्रोत्साहित करता आया है, ताकि वे इसे हाथ में लें। वह इस सारे समय उनके साथ मिलकर कार्य को आगे बढ़ाने के लिए अपनी भुजा प्रगट करने को तैयार खड़ा रहा है। परन्तु कलीसिया अपना भाग पूरा करने को तैयार नहीं रही। ऐसा लगता है कि उन्होंने ठान लिया है कि संसार का मन-परिवर्तन अकेले परमेश्वर पर छोड़ दें, और वे कहते हैं, “यदि वह चाहता है कि संसार का मन-परिवर्तन हो, तो वह स्वयं करे।” उन्हें जानना चाहिए कि यह असम्भव है। जहाँ तक हम जानते हैं, कलीसिया के सहयोग के बिना न तो परमेश्वर और न मनुष्य संसार का मन-परिवर्तन कर सकता है। पापियों का मन-परिवर्तन उनके अपने कर्तृत्व के बिना नहीं हो सकता, क्योंकि मन-परिवर्तन इसी में है कि वे अपनी इच्छा से परमेश्वर की ओर फिरें। न ही पापियों का मन-परिवर्तन उन उपयुक्त नैतिक प्रभावों के बिना हो सकता है जो उन्हें फिराते हैं; अर्थात् सत्य के बिना, और वस्तुओं की वास्तविकता को उनके मन के सामने पूरी रीति से रखे बिना, चाहे यह सीधे प्रकाशन के द्वारा हो या मनुष्यों के द्वारा। परमेश्वर भौतिक सर्वशक्ति के द्वारा संसार का मन-परिवर्तन नहीं कर सकता, परन्तु वह कलीसिया के नैतिक प्रभाव पर निर्भर है।

    5. जब कलीसिया परमेश्वर के काम की अपेक्षा अपने निजी कामों में लगे रहना अधिक पसन्द करती है, तो कार्य रुक जाएगा। मैं यह नहीं मानता कि मनुष्यों का कोई भी काम ठीक-ठीक उनका अपना है, परन्तु वे ऐसा समझते हैं, और वास्तव में जिसे वे अपना काम समझते हैं उसे परमेश्वर के लिए काम करने से अधिक पसन्द करते हैं। वे सोचने लगते हैं कि वे अपने सांसारिक धन्धों से इतना समय नहीं निकाल सकते कि जागृति को आगे बढ़ाएँ। और वे बहाना बनाते हैं कि धर्म की ओर ध्यान देना छोड़ देना उनकी विवशता है, और अपने हृदयों को फिर से संसार के पीछे जाने देते हैं। और तब निश्चय ही कार्य रुक जाता है।

    6. जब मसीही अपनी बड़ी जागृति पर घमण्ड करने लगते हैं, तो वह समाप्त हो जाएगी। मेरा अभिप्राय उन मसीहियों से है जो पहले उसे बढ़ाने में साधन रहे हैं। जागृति में लगभग सदा ऐसा होता है कि कलीसिया का एक भाग इतना घमण्डी या इतना सांसारिक होता है कि कार्य में कोई भाग नहीं लेता। वे ठान लेते हैं कि अलग खड़े रहकर प्रतीक्षा करेंगे, और देखेंगे कि इसका क्या होता है, और यह कैसे निकलती है। कलीसिया के इस भाग का घमण्ड जागृति को नहीं रोक सकता, क्योंकि जागृति कभी उन पर टिकी ही नहीं थी। वह उनके बिना आरम्भ हुई, और उनके बिना चल सकती है। वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रह सकते हैं और देखते रहने और दोष निकालने के सिवा कुछ न करें; फिर भी कार्य आगे बढ़ सकता है। परन्तु जब कलीसिया का वह भाग जो काम करता है, यह सोचने लगता है कि उनकी जागृति कितनी बड़ी रही है, और उन्होंने कितना परिश्रम और कितनी प्रार्थना की है, और वे कितने साहसी और कितने उत्साही रहे हैं, और उन्होंने कितनी भलाई की है, तब कार्य के घटने की सम्भावना होती है। सम्भव है अखबारों में छप गया हो कि उस कलीसिया में कैसी जागृति हुई है, और सदस्य कितनी लगन से लगे रहे हैं, और वे सोचते हैं कि सारे देश की दूसरी कलीसियाओं की दृष्टि में वे कितने ऊँचे ठहरेंगे, क्योंकि उनके यहाँ इतनी बड़ी जागृति हुई है। और इस प्रकार वे फूल जाते हैं और अहंकारी हो जाते हैं, और तब वे परमेश्वर की उपस्थिति का आनन्द फिर नहीं ले सकते, और आत्मा उनसे हट जाता है, और जागृति समाप्त हो जाती है।

    7. जब कलीसिया परिश्रम से थक कर चूर हो जाती है, तो जागृति रुक जाएगी। जागृति के समय बहुत से मसीही इस विषय में बड़ी भूल करते हैं। वे इतने बेपरवाह होते हैं, और उनमें इतनी कम समझ होती है, कि वे अपने जीवन की सारी नियमित आदतें तोड़ डालते हैं, उचित समय पर खाने और सोने की उपेक्षा करते हैं, और उत्तेजना को अपने ऊपर इतना हावी होने देते हैं कि अपने शरीर पर हद से अधिक बोझ डाल देते हैं, और इतने नासमझ होते हैं कि वे शीघ्र ही थक कर चूर हो जाते हैं, और उनके लिए कार्य में लगे रहना असम्भव हो जाता है। जागृतियाँ प्रायः इसी कारण समाप्त हो जाती हैं, और उनके बाद गिरावट आती है, कि उन्हें आगे बढ़ाने में लगे हुए लोग इस विषय में लापरवाही और नासमझी करते हैं।

    8. जब कलीसिया ऐसे अमूर्त सिद्धान्तों पर तर्क-वितर्क करने लगती है जिनका व्यवहार से कोई सम्बन्ध नहीं, तो जागृति समाप्त हो जाएगी। यदि कलीसिया अपना ध्यान उद्धार की बातों से हटा ले, और अमूर्त बातों का अध्ययन करने या उन पर विवाद करने लगे, तो निश्चय ही जागृति समाप्त हो जाएगी। 9. जब मसीही दूसरों को अपने पन्थ में मिलाने में लग जाते हैं। जब बैपटिस्ट प्रेस्बिटेरियनों के, या प्रेस्बिटेरियन बैपटिस्टों के इतने विरोधी हो जाते हैं, या दोनों मेथोडिस्टों के, या एपिस्कोपेलियन बाकी सबके, कि वे नए विश्वासियों को अपनी कलीसिया में मिलाने के प्रयत्न करने लगते हैं, तो आप शीघ्र ही जागृति का अन्त देख लेते हैं। सम्भव है कि जागृति कुछ समय तक चलती रहे, और सारे साम्प्रदायिक झगड़े दूर रहें, जब तक कि कोई व्यक्ति चुपके से, लोगों को अपने पन्थ में मिलाने के लिए, कोई पुस्तक न बाँटने लगे। सम्भव है कोई अति-उत्साही डीकन, या कोई उपद्रव करनेवाली स्त्री, या अपने पन्थ में लोग मिलानेवाला कोई पादरी, और अधिक चुप न रह सके, और लोगों को अपने पन्थ में मिलाने का प्रयत्न करके शैतान का काम करने लगे, और इस प्रकार कड़वाहट भड़का दे, और स्वार्थपूर्ण झगड़ा खड़ा करके आत्मा को शोकित करके दूर कर दे, और मसीहियों को दलों में बाँट दे। फिर वहाँ और जागृति नहीं होती।

    10. जब मसीही पाए हुए उपकारों के अनुसार प्रभु को बदला देने से इनकार करते हैं। धार्मिक गिरावटों का यह एक बड़ा स्रोत है। परमेश्वर ने किसी कलीसिया के लिए आकाश के झरोखे खोलकर उस पर आशीष उण्डेली है, और तब वह उचित रूप से यह आशा करता है कि वे सारे दशमांश उसके भण्डार में ले आएँ, और सिय्योन के लिए उदारता की युक्तियाँ निकालें और उन्हें पूरा करें; और देखो! उन्होंने इनकार कर दिया है; उन्होंने मसीह के कार्य को बढ़ाने के लिए उसके अनुसार अपने आप को नहीं लगाया, और इस प्रकार आत्मा शोकित हुआ है और आशीष हटा ली गई है, और कुछ स्थानों पर एक बड़ी प्रतिक्रिया हो गई है, क्योंकि जब परमेश्वर इतना उदार रहा, तब कलीसिया उदार नहीं होना चाहती थी। मैं ऐसी कलीसियाओं को जानता हूँ जो ऐसे आचरण के कारण स्पष्ट रूप से बाँझपन के शाप से ग्रस्त हो गईं। उनमें एक महिमामय जागृति हुई थी, और उसके बाद कदाचित् उनके सभा-भवन की मरम्मत की आवश्यकता पड़ी, या कोई और वस्तु चाहिए थी जिसमें थोड़ा पैसा लगता, और उन्होंने उसे करने से इनकार कर दिया, और इस प्रकार उनकी कंजूस आत्मा के कारण परमेश्वर ने उन्हें छोड़ दिया।

    11. जब कलीसिया किसी भी प्रकार से पवित्र आत्मा को शोकित करती है।

    (1.) जब वे आत्मा पर अपनी निर्भरता को अनुभव नहीं करते। जब कभी मसीही अपने ही बल में बलवन्त हो जाते हैं, तो परमेश्वर उनकी आशीषों को शाप देता है। बहुत से उदाहरणों में मसीही अपनी ही आशीषों के विरुद्ध पाप करते हैं, क्योंकि वे अपनी सफलता से फूल जाते हैं, और श्रेय स्वयं ले लेते हैं, और सारी महिमा परमेश्वर को नहीं देते। जैसा वह कहता है, “यदि तुम इसे न सुनो, और मन लगाकर मेरे नाम का आदर न करो, तो सेनाओं का यहोवा यों कहता है कि मैं तुम को शाप दूँगा, और जो वस्तुएँ मेरी आशीष से तुम्हें मिली हैं, उन पर मेरा शाप पड़ेगा, वरन तुम जो मन नहीं लगाते हो इस कारण मेरा शाप उन पर पड़ चुका है।” निस्सन्देह इस देश में ऐसा बहुत कुछ हुआ है। मैंने अखबारों में ऐसी बहुत सी बातें देखी हैं जो इसी प्रकार की लगती थीं, जहाँ मनुष्यों में जागृतियों को बढ़ाने की सफलता का श्रेय स्वयं लेने की प्रवृत्ति दिखाई देती थी। निस्सन्देह इसके लिए बड़ी परीक्षा होती है, और पादरियों और कलीसियाओं की ओर से इससे बचे रहने के लिए, और मनुष्यों पर व्यर्थ घमण्ड करके आत्मा को शोकित करके दूर न करने के लिए, अत्यन्त चौकसी की आवश्यकता है।

    (2.) जागृति के विषय में डींग मारने की आत्मा से आत्मा शोकित हो सकता है। कभी-कभी जैसे ही कोई जागृति आरम्भ होती है, आप देखेंगे कि अखबारों में उसका ढिंढोरा पीटा जाने लगता है। और बहुधा यह बात जागृति को मार डालती है। पड़ोस के एक राज्य में ऐसा हुआ कि एक जागृति आरम्भ हुई, और तुरन्त पास्टर का एक पत्र छप गया जिसमें बताया गया था कि उसके यहाँ जागृति हुई है। मैंने वह पत्र देखा और मन ही मन कहा, इस जागृति के विषय में यह अन्तिम समाचार है जो हम सुनेंगे। और ऐसा ही हुआ। कुछ ही दिनों में कार्य पूरी तरह रुक गया। और ऐसी बातें असामान्य नहीं हैं। मैं ऐसे उदाहरणों और स्थानों का उल्लेख कर सकता हूँ जहाँ लोगों ने ऐसी बातें छापीं कि कलीसिया फूल गई, और इतनी घमण्डी हो गई कि जागृति के लिए आगे बहुत थोड़ा या कुछ भी नहीं किया जा सका।

    कुछ लोगों ने परमेश्वर की स्तुति और महिमा के लिए बातें छापने के बहाने ऐसी बातें छापी हैं जिनसे अपने आप को ऊँचा उठाने की प्रवृत्ति की तीव्र गन्ध आती थी; उन्होंने अपने कर्तृत्व को ऐसी प्रमुखता से उभारा कि उससे स्पष्ट रूप से बुरा प्रभाव पड़ना ही था। पिछले से पिछले वर्ष की पतझड़ में इस कलीसिया में जो लगातार चलनेवाली सभाएँ हुईं, उनमें पाँच सौ लोगों का, आशा के अनुसार, मन-परिवर्तन हुआ, जिनके नाम और निवास-स्थान हमें ज्ञात थे। उनमें से अच्छी संख्या इस कलीसिया में सम्मिलित हुई। उनमें से बहुत से दूसरी कलीसियाओं में सम्मिलित हो गए। अखबारों में इसके विषय में कुछ भी नहीं कहा गया। मुझसे कई बार पूछा गया है कि हम इस विषय पर इतने चुप क्यों रहे। मैं केवल यही उत्तर दे सका कि कलीसियाओं में अपने आप को ऊँचा उठाने की ऐसी प्रवृत्ति थी कि मैं इस विषय पर कुछ भी छापने से डरता था। कदाचित् मैंने भूल की। परन्तु मैंने समय से पहले छापी गई बातों से इतनी बार हानि होते देखी है कि मैंने इसके विषय में कुछ न कहना ही उचित समझा। चार वर्ष पहले इस नगर में जो जागृति हुई, उसमें अखबारों में इतना कुछ कहा गया जो अपने आप को ऊँचा उठाने जैसा दिखाई देता था, कि मैं छापने से डरता था। मैं जागृतियों के वृत्तान्त छापने की प्रथा के विरुद्ध नहीं बोल रहा हूँ। परन्तु उसे करने की रीति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यदि वह इस प्रकार किया जाए कि घमण्ड भड़के, तो वह जागृति के लिए सदा घातक होता है।

    (3.) इसी प्रकार ऐसी बातें कहने या छापने से भी आत्मा शोकित होता है जो परमेश्वर के कार्य को घटाकर आँकने वाली हों। जब परमेश्वर के किसी धन्य कार्य के विषय में हल्केपन से बात की जाती है, और परमेश्वर को उसके नाम के योग्य महिमा नहीं दी जाती, तो आत्मा शोकित होता है। यदि किसी जागृति के विषय में कुछ कहा जाए, तो केवल सादे और नंगे तथ्य, जैसे वे हैं ठीक वैसे ही, बताइए, और उन्हें उतना ही मूल्य पाने दीजिए जितने के वे योग्य हैं।

    12. जब मसीही भाईचारे के प्रेम की आत्मा खो देते हैं, तब यह आशा की जा सकती है कि जागृति समाप्त हो जाएगी। यीशु मसीह जागृति में लोगों के साथ उससे अधिक समय तक नहीं रहेगा जितने समय तक वे भाईचारे के प्रेम का व्यवहार करते रहते हैं। जब मसीही जागृति की आत्मा में होते हैं, तो वे इस प्रेम को अनुभव करते हैं, और तब आप उन्हें बड़े स्नेह से एक दूसरे को भाई और बहन कहकर पुकारते सुनेंगे। परन्तु जब वे ठण्डे पड़ने लगते हैं, तो वे एक दूसरे के प्रति स्नेह की यह गर्मी और यह उमंग खो देते हैं, और तब यह भाई और बहन कहना उन्हें मूर्खतापूर्ण और तुच्छ लगेगा, और वे इसे छोड़ देंगे। कुछ कलीसियाओं में वे एक दूसरे को कभी ऐसा नहीं कहते, परन्तु जहाँ जागृति होती है, वहाँ मसीही स्वाभाविक रूप से ऐसा करते हैं। मैंने कभी कोई ऐसी जागृति नहीं देखी, और कदाचित् कभी हुई भी नहीं, जिसमें वे ऐसा न करते हों। परन्तु जैसे ही यह घटने लगता है, परमेश्वर का आत्मा शोकित होता है, और उनके बीच से चला जाता है।

    13. जब तक मसीहियों का बार-बार फिर से मन-परिवर्तन न हो, जागृति घटेगी और समाप्त हो जाएगी। इससे मेरा अभिप्राय यह है कि मसीहियों को, जागृति की आत्मा में बने रहने के लिए, साधारणतः बार-बार पाप के बोध में आने, दीन होने, परमेश्वर के सामने टूट जाने, और फिर से मन-परिवर्तन करने की आवश्यकता होती है। जब हम किसी मसीही के फिर से मन-परिवर्तन की बात करते हैं, तो यह ऐसी बात है जिसे बहुत से लोग नहीं समझते। परन्तु तथ्य यह है कि जागृति में मसीही के हृदय पर पपड़ी जम जाने, और ईश्वरीय बातों के लिए उसकी गहरी रुचि जाती रहने की सम्भावना रहती है; उसका अभिषेक और प्रार्थना में उसकी प्रबलता घट जाती है, और तब उसका फिर से मन-परिवर्तन होना आवश्यक है। उसे ऐसी दशा में रखना असम्भव है कि वह कार्य को हानि न पहुँचाए, जब तक कि वह हर कुछ दिनों में इस प्रक्रिया से होकर न निकले। मैंने जागृतियों में कभी किसी ऐसे व्यक्ति के साथ परिश्रम नहीं किया जो कार्य में बना रहता और निरन्तर जागृति को सँभालने के योग्य रहता, और जो कम से कम हर दो या तीन सप्ताह में एक बार टूटने की इस प्रक्रिया से होकर न निकलता हो। जागृतियाँ साधारणतः इसलिए घटती हैं क्योंकि कलीसिया को उसके दोष और उसकी निर्भरता का ऐसा अनुभव कराना असम्भव पाया जाता है कि वह परमेश्वर के सामने टूट जाए। यह महत्त्वपूर्ण है कि पादरी इस बात को समझें, और सीखें कि कलीसिया को कैसे तोड़ें, और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं को कैसे तोड़ें, नहीं तो मसीही शीघ्र ही अपने काम में यन्त्रवत् हो जाएँगे, और अपना उत्साह और परमेश्वर के साथ प्रबल होने की अपनी सामर्थ खो देंगे। यही वह प्रक्रिया थी जिससे पतरस होकर निकला, जब उसने उद्धारकर्ता का इनकार किया था, और इसी टूटने के द्वारा प्रभु ने उसे पिन्तेकुस्त के दिन के महान कार्य के लिए तैयार किया। कुछ वर्ष पहले मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि “टूट जाना” यह शब्द कुछ पादरियों और धर्म का अंगीकार करनेवालों के लिए ठोकर का कारण था। उन्होंने अपने आप को उस डाँट का पात्र बना लिया जो नीकुदेमुस को दी गई थी, “क्या तू इस्राएलियों का गुरु होकर भी इन बातों को नहीं समझता?” मुझे पूरा विश्वास है कि जब तक उनमें से कुछ यह न जान लें कि “टूट जाना” क्या होता है, तब तक वे जागृतियों के कार्य के लिए कभी बहुत अधिक नहीं करेंगे।

    14. जब मसीही आत्म-त्याग का अभ्यास नहीं करेंगे, तो जागृति जारी नहीं रह सकती। जब कलीसिया ने जागृति का आनन्द लिया हो और उस पर मोटी होने लगे, और भोग-विलास में पड़ जाए, तो जागृति शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी। जब तक वे परमेश्वर के पुत्र के साथ सहानुभूति न रखें, जिसने पापियों को बचाने के लिए सब कुछ त्याग दिया; जब तक वे अपने विलास और अपने आराम को त्यागने, और अपने आप को कार्य में लगा देने को तैयार न हों, तब तक उन्हें यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि परमेश्वर का आत्मा उन पर उण्डेला जाएगा। निस्सन्देह यह व्यक्तिगत गिरावट के मुख्य कारणों में से एक है। जागृति में लगे मसीही सावधान रहें, जब वे पहली बार यह अनुभव करें कि उनमें आत्म-त्याग से पीछे हटने, और एक के बाद एक किसी न किसी प्रकार के भोग-विलास के आगे झुक जाने की प्रवृत्ति चुपके से घर कर रही है। यह शैतान की युक्ति है, कि उन्हें चारा दिखाकर परमेश्वर के कार्य से दूर ले जाए, और उन्हें सुस्त और स्थूल, और आलसी, और भयभीत, और निकम्मा, और विषयी बना दे, और आत्मा को दूर भगा दे और जागृति को नष्ट कर दे।

    15. नए तरीकों के विषय में विवादों से जागृति रुक जाएगी। जागृति को उलट देने में इससे अधिक निश्चित कुछ भी नहीं। परन्तु चूँकि मेरा पिछला व्याख्यान नए तरीकों के विषय पर था, इसलिए मुझे अभी इस विषय पर और अधिक ठहरने की आवश्यकता नहीं।

    16. ओल्ड स्कूल (पुराने पक्ष) के लगातार विरोध के साथ न्यू स्कूल (नए पक्ष) में बुरी आत्मा मिल जाए, तो जागृतियाँ दबाई जा सकती हैं। यदि वे लोग जो जागृतियों को बढ़ाने के लिए कुछ नहीं करते, अपना विरोध जारी रखें, और यदि वे लोग जो उन्हें बढ़ाने के लिए परिश्रम कर रहे हैं, अपने आप को अधीर होने दें, और बुरी आत्मा में पड़ जाएँ, तो जागृति समाप्त हो जाएगी। जब ओल्ड स्कूल के लोग अखबारों में जागृतियों या जागृति के लोगों के विरुद्ध अपने पत्र लिखते हैं, और न्यू स्कूल के लोग उनके विरुद्ध क्रोधित, झगड़ालू और कड़वी आत्मा में उत्तर में पत्र लिखते हैं, और एक कलहपूर्ण विवाद में उलझ जाते हैं, तो जागृतियाँ समाप्त हो जाएँगी। वे अपने काम में लगे रहें, और न विरोध की चर्चा करें, न उसके विषय में प्रचार करें, न छापें। यदि दूसरे अपनी बकवास और ऊटपटाँग बातें छापना चाहें, तो प्रभु के दास अपने काम में लगे रहें, और तब सारे लेख और सारी निन्दा भी जागृति को नहीं रोक सकेगी, जब तक कि उसमें लगे हुए लोग अपने काम पर ध्यान देते हैं, और अपने काम में लगे रहते हैं। यह आश्चर्य की बात है कि वास्तव में यह बात कहाँ तक सच ठहरती है।

    एक स्थान पर जहाँ जागृति हो रही थी, कुछ पादरियों ने उस कलीसिया के पास्टर के विरुद्ध एक गुट बना लिया, और उसे नष्ट करने की एक योजना चलाई गई, और उन्होंने वास्तव में उसकी प्रेस्बिटरी के सामने उस पर अभियोग चलवाया, और ठीक जागृति के बीच छः सप्ताह तक चलनेवाला मुकद्दमा हुआ, फिर भी कार्य चलता रहा। कलीसिया के प्रार्थना करनेवाले सदस्यों ने अपने आप को कार्य में ऐसा लगा दिया कि वह इस सारे दृश्य के दौरान विजय के साथ जारी रहा। पास्टर को अपने मुकद्दमे में उपस्थित होने के लिए बुला लिया गया, परन्तु एक दूसरा पादरी था जो लोगों के बीच परिश्रम करता रहा, और सदस्य साधारणतः मुकद्दमे में जाते तक नहीं थे, परन्तु प्राणों के लिए प्रार्थना और परिश्रम करते रहे, और जागृति उस आँधी को पार कर गई। बहुत से दूसरे स्थानों में कलीसिया में विरोध उठ खड़ा हुआ है, परन्तु कुछ दीन जन अपने काम में लगे रहे, और अनुग्रहकारी परमेश्वर ने अपनी भुजा प्रगट करके सारे विरोध के होते हुए भी जागृति को आगे बढ़ाया है।

    परन्तु जब कभी वे लोग जो जागृति को बढ़ाने में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं, विरोध की अनुचितता और हठ पर उत्तेजित हो जाते हैं, और ऐसा अनुभव करते हैं मानो वे इसे ऐसे ही नहीं रहने दे सकते, और अपना धीरज खो बैठते हैं, और ऐसा अनुभव करते हैं मानो उन्हें विरोधियों की नुक्ताचीनी का उत्तर देना और उनकी निन्दा का खण्डन करना ही होगा, तब वे नीचे ओनो के मैदानों में उतर जाते हैं, और कार्य का रुकना निश्चित है।

    17. जनता के मन का किसी भी प्रकार से भटकना जागृति में बाधा डालेगा। कोई भी बात जो जनता का ध्यान भटकाने में सफल हो जाए, जागृति को रोक देगी। जिस उदाहरण का मैंने उल्लेख किया है, जहाँ पादरी पर उसकी प्रेस्बिटरी के सामने मुकद्दमा चलाया गया, उसमें जागृति के नष्ट न होने का कारण यह था कि कलीसिया के प्रार्थना करनेवाले सदस्यों ने अपना ध्यान भटकने नहीं दिया। वे मुकद्दमे में उपस्थित तक नहीं हुए, परन्तु प्राणों के लिए प्रार्थना और परिश्रम करते रहे, और इस प्रकार शैतान के सारे प्रयत्नों के होते हुए भी जनता का ध्यान इसी विषय पर लगा रहा।

    परन्तु जब कभी वह जनता का ध्यान किसी और विषय में लीन करने में सफल हो जाता है, तो वह जागृति का अन्त कर देगा। विषय चाहे कुछ भी हो, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि स्वर्ग से कोई स्वर्गदूत उतर आए, और प्रचार करे, या सड़कों पर घूमे, तो यह जागृति के लिए संसार की सबसे बुरी बात हो सकती है, क्योंकि यह पापियों का ध्यान उनके अपने पापों से पूरी तरह हटा देगी, और कलीसिया का ध्यान प्राणों के लिए प्रार्थना करने से हटाकर उसे इस महिमामय प्राणी के पीछे चलने और उसे निहारने में लगा देगी, और जागृति समाप्त हो जाएगी।

    18. मद्यनिषेध (संयम) सुधार-आन्दोलन का विरोध किसी कलीसिया में जागृतियों को रोक देगा। अब वह समय आ गया है कि किसी कलीसिया के लिए इस महिमामय सुधार से अलग खड़े रहना निर्दोष नहीं ठहर सकता। एक समय था जब यह अज्ञानता में किया जा सकता था। एक समय ऐसा भी रहा है जब पादरी और मसीही, अपने बीच तेज़ शराब के प्रयोग के होते हुए भी, जागृतियों का आनन्द ले सकते थे। परन्तु जब से इस विषय पर प्रकाश डाला गया है, और यह पाया गया है कि इसका प्रयोग केवल हानिकारक है, तब से कलीसिया का कोई भी सदस्य या पादरी इस आन्दोलन में तटस्थ रहकर निर्दोष नहीं ठहर सकता। उन्हें खुलकर बोलना और पक्ष लेना ही होगा। और यदि वे एक पक्ष में खड़े नहीं होते, तो उनका प्रभाव दूसरे पक्ष में है। मुझे कोई ऐसा पादरी दिखाइए जिसने मद्यनिषेध सुधार के विरुद्ध पक्ष लिया हो और जिसके यहाँ जागृति हुई हो। मुझे कोई ऐसा दिखाइए जो अब इससे अलग खड़ा है और जिसके यहाँ जागृति हो रही है। मुझे कोई ऐसा दिखाइए जो अब इस विषय में ढुलमुल नीति अपनाता है, जो खुलकर सामने आकर मद्यनिषेध के पक्ष में खड़ा नहीं होता, और जिसके यहाँ जागृति हो रही है? पहले ऐसा नहीं था। परन्तु अब जबकि यह विषय सामने आ चुका है, और इस पर चर्चा हो चुकी है, और इसे समझ लिया गया है, कोई भी मनुष्य सत्य की ओर से आँखें बन्द नहीं कर सकता। जो मनुष्य मद्यनिषेध के कार्य से अलग खड़ा रहता है, उसके हाथ लहू से लाल हैं। और क्या उसके यहाँ जागृति हो सकती है?

    19. जब पादरी और कलीसियाएँ मानव अधिकारों से सम्बन्धित किसी भी प्रश्न के विषय में गलत पक्ष लेते हैं, तो जागृतियों में बाधा पड़ती है। उदाहरण के लिए दासप्रथा के विषय को लीजिए। एक समय था जब यह विषय जनता के मन के सामने नहीं था। जॉन न्यूटन अपने मन-परिवर्तन के बाद भी दास-व्यापार में लगा रहा। और उसका मन इतना बिगड़ गया था, और इस अत्यन्त घृणित व्यापार के विषय में उसका विवेक इतना पूरी तरह सुन्न हो गया था, कि परमेश्वर की सन्तान बनने के कुछ समय बाद तक इसकी पापमयता का विचार तक उसके मन में नहीं आया। यदि उसके मन-परिवर्तन से पहले उसके मन पर प्रकाश डाला गया होता, तो वह पहले इस पाप को छोड़े बिना कभी मन-परिवर्तन नहीं पा सकता था। और अपने मन-परिवर्तन के बाद, जब उसे इसकी अधर्मता का निश्चय हो गया, तो वह इस पाप को सदा के लिए छोड़े बिना परमेश्वर की उपस्थिति का आनन्द फिर नहीं ले सकता था। इसी प्रकार, निस्सन्देह, हमारे अपने देश में बहुत से दास-व्यापारियों और दास-स्वामियों का, इस घृणित कार्य में भागी होने के होते हुए भी, मन-परिवर्तन हुआ है, क्योंकि इसकी पापमयता उनके मन पर प्रकट नहीं थी। इसी प्रकार सारे देश में बड़ी सीमा तक पादरी और कलीसियाएँ चुप रहे हैं, और उन्होंने कलीसिया में और राष्ट्र में विद्यमान इस घृणित से घृणित कार्य के विरुद्ध कोई गवाही नहीं दी। परन्तु हाल ही में यह विषय चर्चा के लिए सामने आया है, और परमेश्वर के विधान ने इसे स्पष्ट रूप से सब मनुष्यों की आँखों के सामने ला दिया है। अब इस विषय पर प्रकाश डाला गया है, जैसे मद्यनिषेध के कार्य पर डाला गया है। तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं, और सिद्धान्त स्थापित किए गए हैं, और मनुष्यों के मन पर प्रकाश डाला गया है, और इस राक्षस को उसकी भयानक माँद से घसीटकर निकाला गया है, और कलीसिया के सामने प्रदर्शित किया गया है, और उनसे माँग की गई है, “क्या यह पाप है?” इस विषय पर उन्हें अपनी गवाही देनी ही होगी। वे परमेश्वर के गवाह हैं। उन्होंने शपथ खाई है कि वे “सत्य, सम्पूर्ण सत्य, और सत्य के सिवा और कुछ नहीं” बताएँगे। यह असम्भव है कि उनकी गवाही एक या दूसरे पक्ष में न दी जाए। उनकी चुप्पी का कारण अब अज्ञानता को, या इस बात को नहीं ठहराया जा सकता कि उनका ध्यान कभी इस विषय की ओर नहीं गया। फलस्वरूप, इस विषय पर मसीहियों की चुप्पी वास्तव में यही कहती है कि वे दासप्रथा को पाप नहीं मानते। सच्चाई यह है कि यह ऐसा विषय है जिस पर वे दोषी ठहरे बिना चुप नहीं रह सकते। परमेश्वर के विधान में वह समय आ गया है जब दक्षिण से आनेवाली हर बयार विलाप, शोक और हाय-हाय की पुकारों से लदी हुई है। हमारे अपने देश में बीस लाख पतित किए गए अन्यजाति लोग अपने हाथ, जो सब बेड़ियों में जकड़े और लहूलुहान हैं, फैलाते हैं, और परमेश्वर की कलीसिया की ओर सहायता के लिए वेदना-भरी पुकार भेजते हैं। और क्या कलीसिया, संसार को फिर से प्राप्त करने और बचाने के अपने प्रयत्नों में, वेदना और निराशा की इस आवाज़ की ओर से अपने कान बन्द कर लेगी? परमेश्वर न करे। कलीसिया इस प्रश्न से मुँह नहीं मोड़ सकती। यह ऐसा प्रश्न है जिसका निर्णय कलीसिया और राष्ट्र को करना है, और परमेश्वर इसे निर्णय तक पहुँचाकर ही रहेगा।

    कलीसियाओं का बिखराव, विवाद और झगड़े के भय से इसका विरोध करना व्यर्थ है। संकट की इस पुकार को सुनने से कान फेर लेने को भक्ति का कार्य समझना व्यर्थ है।

    कलीसिया को इस विषय पर गवाही देनी ही होगी, और “सत्य, सम्पूर्ण सत्य, और सत्य के सिवा और कुछ नहीं” की गवाही देनी होगी, नहीं तो वह झूठी शपथ खानेवाली ठहरेगी, और परमेश्वर का आत्मा उसे छोड़कर चला जाएगा। वह गवाही देने की शपथ के अधीन है, और जो पादरी और कलीसियाएँ इसे पाप नहीं कहते, वे परमेश्वर के लिए झूठी गवाही देते हैं। निस्सन्देह यह सच है कि वर्तमान समय में धर्म की गिरी हुई दशा का एक कारण यह है कि बहुत सी कलीसियाओं ने दासप्रथा के विषय में गलत पक्ष लिया है, पूर्वाग्रह को सिद्धान्त पर प्रबल होने दिया है, और इस घृणित कार्य को उसके सच्चे नाम से पुकारने से डरती रही हैं।

    20. जागृतियों में बाधा डालनेवाली एक और बात मिशनों के दावों की उपेक्षा करना है। यदि मसीही अन्यजातियों के लिए कोई भावना नहीं रखते, मासिक प्रार्थना-सभा (मंथली कंसर्ट) की उपेक्षा करते हैं, और अपना ध्यान अपनी ही कलीसिया तक सीमित रखते हैं, मिशनरी हेराल्ड तक नहीं पढ़ते, या संसार के दावों के विषय में अपने आप को जानकारी देने के लिए किसी और साधन का उपयोग नहीं करते, और उस प्रकाश को अस्वीकार करते हैं जो परमेश्वर उनके सामने डाल रहा है, और इस कार्य में वह नहीं करेंगे जिसके लिए परमेश्वर उन्हें बुलाता है, तो परमेश्वर का आत्मा उनसे हट जाएगा।

    21. जब कोई कलीसिया सेवकाई के लिए जवानों को शिक्षा देने के विषय में अपने ऊपर परमेश्वर की पुकारों को अस्वीकार करती है, तो वह जागृति में बाधा डालेगी और उसे नष्ट करेगी। प्रेस्बिटेरियन कलीसिया को देखिए, दस वर्षों के भीतर जिन 200,000 प्राणों का मन-परिवर्तन हुआ उन्हें देखिए, और इतने साधनों को देखिए जो संसार को पादरियों से भर देने के लिए पर्याप्त हैं, फिर भी सेवकों की संख्या उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ रही जितनी तेज़ी से हमारे अपने देश की जनसंख्या बढ़ रही है, और जब तक पादरियों का प्रबन्ध करने के लिए कुछ और अधिक न किया जाए, हम स्वयं अन्यजाति बन जाएँगे। कलीसियाएँ जवानों पर सेवकाई में जाने के कर्तव्य पर ज़ोर नहीं देतीं। परमेश्वर कलीसियाओं पर अपना आत्मा उण्डेलता है, और लाखों प्राणों का मन-परिवर्तन करता है, और यदि तब भी मज़दूर कटनी के लिए आगे न आएँ, तो इसके सिवा और क्या आशा की जा सकती है कि परमेश्वर का शाप कलीसियाओं पर आएगा, और उसका आत्मा हटा लिया जाएगा, और जागृतियाँ समाप्त हो जाएँगी। इस विषय पर किसी भी पादरी, किसी भी कलीसिया को चुप या निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए।

    22. जागृतियों की निन्दा करना बहुधा उन्हें दबा देगा। प्रेसिडेंट एडवर्ड्स के दिनों की बड़ी जागृति को इस विषय में कलीसिया के आचरण से बहुत हानि उठानी पड़ी। यह तो आशा की ही जानी चाहिए कि परमेश्वर के शत्रु जागृतियों की बुराई करेंगे, उन्हें गलत रूप में प्रस्तुत करेंगे और उनकी निन्दा करेंगे। परन्तु जब कलीसिया स्वयं इस काम में लग जाती है, और उसके बहुत से सबसे प्रभावशाली सदस्य परमेश्वर के एक महिमामय कार्य पर कलंक लगाने और उसे गलत रूप में प्रस्तुत करने में सहायता और प्रोत्साहन देते हैं, तो यह उचित ही है कि आत्मा शोकित होकर दूर चला जाए। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसा दुःखद और परमेश्वर का अनादर करनेवाली सीमा तक किया गया है। अनुमान लगाया गया है कि जब से यह जागृति आरम्भ हुई, तब से एक वर्ष में संयुक्त राज्य अमेरिका में एक लाख प्राण मन फिराकर परमेश्वर की ओर आए। निस्सन्देह यह उन लोगों की सबसे बड़ी संख्या थी जिनका जगत के आरम्भ से कभी एक वर्ष में मन-परिवर्तन हुआ हो।[5] यह आशा नहीं की जा सकती थी कि मनुष्यों के बीच इतने विस्तार की उत्तेजना में खेद करने योग्य कुछ भी न हो। ऐसे विस्तारवाले, और मानवीय साधनों के द्वारा चलाए जानेवाले ऐसे कार्य में सिद्धता की आशा करना पूरी तरह अनुचित और बेतुका है। निस्सन्देह बुराइयाँ थीं और रही हैं। उनकी आशा तो स्वाभाविक रूप से की ही जानी चाहिए थी, और जहाँ तक सम्भव हो उनसे बचाव किया जाना चाहिए था। और मैं नहीं मानता कि संसार का इतिहास एक भी ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है जिसमें विस्तार और प्रभाव में इसके निकट पहुँचनेवाली किसी जागृति के साथ इतनी कम बुराइयाँ, और ईमानदारी से खेद करने योग्य इतनी कम बातें जुड़ी रही हों।

    परन्तु परमेश्वर के इस धन्य कार्य के साथ कैसा व्यवहार किया गया है? यदि उन सब बुराइयों को, जिनकी शिकायत की गई है, वास्तविक भी मान लिया जाए, जो कि सच होने से बहुत दूर है, तो भी वे महिमामय सूर्य के मण्डल पर धब्बों के समान ही होतीं; कार्य की अनन्त महानता और उत्तमता की तुलना में ऐसी बातें जिन पर मुश्किल से ही ध्यान दिया जाए। फिर भी प्रेस्बिटेरियन कलीसिया के एक बड़े भाग ने परमेश्वर के इस धन्य कार्य को कैसे ग्रहण किया और उसके साथ कैसा व्यवहार किया? जनरल असेम्बली में, मनुष्यों की उस गम्भीर सभा में जो इस महान कार्य के बीच प्रेस्बिटेरियन कलीसिया का प्रतिनिधित्व करती है, धन्यवाद का दिन ठहराने के बदले, परमेश्वर के कार्य की महानता के लिए उसकी स्तुति और महिमा करने के बदले, हम उनसे डाँट का स्वर सुनते हैं। वहाँ दिए गए भाषणों की जो रिपोर्टें दी गईं, उनसे ऐसा प्रतीत होता है कि सभा-भवन शिकायतों से भरा हुआ था। कार्य को आगे बढ़ाने के उपाय सोचने के बदले, उनका ध्यान उन तुलनात्मक रूप से तुच्छ बुराइयों में लगा हुआ प्रतीत होता था जो उसके साथ प्रसंगवश जुड़ी हुई थीं। और बहुत शिकायत करने के बाद, उन्होंने सचमुच एक समिति नियुक्त की, और कलीसियाओं के पास एक “पास्टरीय पत्र” भेजा, जो सन्देह उत्पन्न करने, परमेश्वर के लोगों के उत्साह को बुझाने, और उन्हें आशीष की महानता के लिए परमेश्वर की महिमा करने से हटाकर बुराइयों के विषय में दोष निकालने और नुक्ताचीनी करने में लगाने वाला था। जब मैंने सुना कि उस जनरल असेम्बली में क्या किया गया, जब मैंने उनके भाषण पढ़े, जब मैंने उनका पास्टरीय पत्र देखा, तो मेरा प्राण व्याकुल हो गया, मेरे मन पर अकथनीय पीड़ा की भावना छा गई, और मैंने अनुभव किया कि परमेश्वर ऐसे आचरण के लिए प्रेस्बिटेरियन कलीसिया की “सुधि लेगा”। और तब से महिमा जाती रही है, और जागृतियाँ कम और कम होती गई हैं—कम और कम सामर्थी होती गई हैं।[6]

    और अब मैं चाहता हूँ कि यह जाना जा सके कि जिन पादरियों ने जनरल असेम्बली के मंच पर वे शिकायतें उण्डेलीं, और जो उस पास्टरीय पत्र को तैयार करवाने में साधन बने, क्या तब से उन्हें धर्म की जागृतियों को बढ़ाने में आशीष मिली है—क्या परमेश्वर का आत्मा उन पर रहा है, और क्या उनकी कलीसियाएँ इस बात की गवाही दे सकती हैं कि उनके पास उस पवित्र की ओर से अभिषेक है।

    23. कलीसियाई झगड़े आत्मा को शोकित करके दूर करने और जागृतियों को नष्ट करनेवाले हैं। शैतान की सदा यही नीति रही है कि पादरियों का ध्यान प्रभु के कार्य से हटाकर विवादों और कलीसियाई मुकद्दमेबाज़ियों में लगा दे। प्रेसिडेंट एडवर्ड्स को बहुत समय तक कलीसियाई परिषदों के सामने विवादों में उलझे रहना पड़ा; और हमारे दिनों में, और धर्म की इन बड़ी जागृतियों के बीच, ये झगड़े चिन्ताजनक और लज्जाजनक रूप से बढ़ गए हैं। कलीसिया के कुछ सबसे प्रभावशाली पादरियों को, प्राणों को मसीह के लिए जीतने के उनके प्रत्यक्ष प्रयत्नों से हटाकर, दिन पर दिन, और कुछ उदाहरणों में सप्ताह पर सप्ताह, उन आरोपों का सामना करने के लिए बुलाया गया है जो उन पर, या सेवकाई में उनके सहकर्मियों पर लगाए गए, और जो कभी सिद्ध नहीं किए जा सकते थे।

    फ़िलाडेल्फ़िया को देखिए: उस नगर में, और देश की लम्बाई-चौड़ाई में, कैसे अन्तहीन और लज्जाजनक झगड़ों ने परमेश्वर की कलीसिया को विचलित और शोकित किया है। और सारी प्रेस्बिटेरियन कलीसिया में इन कलीसियाई झगड़ों ने इतनी बुराइयाँ उत्पन्न की हैं कि सृष्टि रो उठे। भाई बीमन को लज्जाजनक और दुष्टतापूर्ण रीति से जागृतियों को बढ़ाने से हटाकर अपनी ही प्रेस्बिटरी के सामने ऐसे आरोपों पर मुकद्दमे में उपस्थित होने के लिए बुलाया गया, जिनमें से अधिकांश, यदि सच भी होते, तो हास्यास्पद ही थे, परन्तु जो कभी सिद्ध नहीं किए जा सकते थे। और उस समय से उनके समय का एक बड़ा भाग, जैसा प्रतीत होता है विवशता से, कलीसियाई झगड़ों को सुलझाने में लगा रहा है। कार्लाइल के भाई डफ़ील्ड, फ़िलाडेल्फ़िया के भाई बार्न्स, और परमेश्वर के दूसरे अत्यन्त सफल सेवक, वर्षों से इन झगड़ों के कारण अपने समय के एक बड़े भाग में बाधित रहे हैं। हाय, गत में यह न बताओ! कब वे पादरी और धर्म का अंगीकार करनेवाले, जो स्वयं बहुत थोड़ा या कुछ भी नहीं करते, दूसरों को छोड़ देंगे, और उन्हें परमेश्वर के लिए काम करने देंगे?

    24. एक और बात जिससे जागृतियों में बाधा पड़ सकती है, वह है किसी भी पक्ष की ओर से दोष लगाने की प्रवृत्ति, और विशेष करके उन लोगों में जो जागृति को आगे बढ़ाने में लगे रहे हैं। यह तो आशा की ही जानी चाहिए कि कार्य के विरोधी उसके मित्रों के लड़खड़ाने की ताक में रहेंगे, और अवश्य ही

    उनके आचरण में जो कुछ गलत है उस सब के लिए, और बहुधा उसके लिए भी जो ठीक है, उनकी आलोचना करेंगे। विशेष करके यह आशा की जानी चाहिए कि जो लोग कार्य को बढ़ाने में सबसे प्रमुख साधन हैं, उनके विषय में बहुत सी दोष लगानेवाली और मसीहियत के विरुद्ध टिप्पणियाँ की जाएँगी। फिर भी कार्य के विरोधियों की ओर से यह दोष लगाने की प्रवृत्ति, चाहे वे कलीसिया के भीतर हों या बाहर, अपने आप में जागृति को नहीं रोकेगी। जब तक उसके बढ़ानेवाले दीन बने रहते हैं, और प्रार्थना की आत्मा में रहते हैं, जब तक वे बदला नहीं लेते, परन्तु धीरज से अपने प्राणों को बचाए रखते हैं, जब तक वे अपना ध्यान भटकने नहीं देते, उलटा आरोप नहीं लगाते, और प्रार्थना की आत्मा को शोकित करके दूर नहीं करते, तब तक कार्य आगे बढ़ता रहेगा; जैसा उस उदाहरण में हुआ जिसका उल्लेख किया गया, जहाँ जागृति के बीच एक पादरी पर छः सप्ताह तक मुकद्दमा चलता रहा। वहाँ लोग धूल में पड़े रहे, और प्रार्थना करते रहे—अपने पादरी के लिए उतना नहीं, क्योंकि उसे तो वे परमेश्वर पर छोड़ चुके थे—परन्तु ऊँचे शब्द से पुकार पुकारकर और आँसू बहा बहाकर पापियों के लिए परमेश्वर से विनती करते रहे। और परमेश्वर ने उनकी सुनी और उन्हें आशीष दी, और कार्य आगे बढ़ता रहा। कार्य के विरोधियों में दोष लगाने की प्रवृत्ति से बहुत कम डरने की आवश्यकता है, क्योंकि उनके पास आत्मा नहीं है, और कुछ भी उन पर निर्भर नहीं है, और वे कार्य में केवल उतनी ही बाधा डाल सकते हैं जितना उनका अपना व्यक्तिगत प्रभाव है। परन्तु दूसरों के पास पवित्र आत्मा की सामर्थ है, और कार्य इस पर निर्भर है कि वे सही मनोभाव में बने रहें। यदि वे गलत हो जाएँ और आत्मा को शोकित करके दूर कर दें, तो कोई उपाय नहीं, कार्य का रुकना निश्चित है। इसलिए इस धन्य कार्य के बढ़ानेवालों को चाहे कितना भी उकसाया गया हो, यदि यह रुक जाए, तो उत्तरदायित्व उन्हीं का होगा। और इस विषय में सबसे चिन्ताजनक तथ्यों में से एक यह है कि बहुत से उदाहरणों में, जो लोग कार्य को आगे बढ़ाने में लगे रहे हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने आत्मा को खो दिया है। उनका ध्यान भटकने लगा है, वे सोचने लगे हैं कि विरोध को अब और सहा नहीं जा सकता, और उन्हें सामने आकर अखबारों में विरोधियों की बातों का उत्तर देना ही होगा। यह बात जान ली जानी चाहिए और सर्वत्र समझ ली जानी चाहिए कि जब कभी इस सबसे बड़ी जागृति के मित्र और बढ़ानेवाले अपने आप को अखबारी झगड़ों में खिंच जाने देंगे, और अपना बचाव करने, और अपने विरुद्ध लिखनेवालों को उत्तर देने का प्रयत्न करेंगे, तो प्रार्थना की आत्मा पूरी तरह शोकित होकर दूर हो जाएगी, और कार्य रुक जाएगा। धर्म की जागृतियों के लिए इससे अधिक हानिकारक कुछ भी नहीं, और सदा से ऐसा ही पाया गया है, कि उसके बढ़ानेवाले विरोध की ओर कान लगाएँ और उत्तर देने लगें। प्रेसिडेंट एडवर्ड्स के दिनों में भी यह सच पाया गया था, जैसा कि आप में से वे लोग भली-भाँति जानते हैं जो जागृतियों पर उनकी पुस्तक से परिचित हैं।

    III. अब मैं कुछ ऐसी बातों का उल्लेख करने जा रहा हूँ जो धर्म की इस महान और महिमामय जागृति को, जो पिछले दस वर्षों से चल रही है, जारी रखने के लिए की जानी चाहिए।

    1. पादरियों की ओर से बड़ा और गहरा पश्चाताप होना चाहिए। मेरे भाइयो, हमें परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन करना चाहिए। हमारा यह समझ बैठना ठीक नहीं होगा कि लोगों को पश्चाताप के लिए बुलाना ही पर्याप्त है। हमें पश्चाताप करना चाहिए, हमें पश्चाताप करने में अगुवाई करनी चाहिए, और तब कलीसियाओं को पीछे चलने के लिए बुलाना चाहिए।

    विशेष करके उन्हें पश्चाताप करना चाहिए जिन्होंने जागृतियों के विषय में विरोध और अविश्वास की भावनाएँ उत्पन्न करने में अगुवाई की है। कुछ पादरियों ने जागृतियों और जागृति के तरीकों के विरुद्ध अपने विरोध को अपनी ही मण्डलियों तक सीमित रखा है, और अपने ही लोगों में ऐसे सन्देह उत्पन्न कर दिए हैं कि कार्य उनके बीच फैलने और प्रबल होने से रुक गया है। ऐसे पादरियों के लिए अच्छा होगा कि वे इस विषय पर प्रेसिडेंट एडवर्ड्स की टिप्पणियों पर विचार करें। “यदि पादरी चाहे कितना ही अच्छा सिद्धान्त प्रचार करें, और अपने काम में चाहे कितना ही कष्ट उठानेवाले और परिश्रमी हों, फिर भी यदि ऐसे दिन में वे अपने लोगों पर यह प्रकट करें कि वे इस कार्य के प्रति अच्छा भाव नहीं रखते, बल्कि उसके विषय में बहुत शंकालु और सन्देही हैं, तो बहुत सम्भव है कि वे अपने लोगों की भलाई की अपेक्षा कहीं अधिक हानि करेंगे; क्योंकि परमेश्वर के ऐसे महान और असाधारण कार्य की ख्याति मात्र, यदि उनके लोगों को उसे परमेश्वर का कार्य मानने दिया जाता, और दूसरे नगरों का उदाहरण, और साथ में वह प्रचार जो वे कभी-कभी सुन लेते, उनके लोगों के मन पर, उन्हें धर्म में जगाने और उत्साहित करने के लिए, उनके सारे परिश्रम की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभाव डालने की सम्भावना रखते: और इसके अतिरिक्त उनके पादरी की राय न केवल उनमें उस कार्य के प्रति सन्देह उत्पन्न करेगी जिसके विषय में वे बाहर से सुनते हैं, जिससे उसमें प्रकट होनेवाला परमेश्वर का सामर्थी हाथ उनके मन पर अपना प्रभाव खो देता है, बल्कि वह उनके अपने बीच प्रकट होनेवाली उसी प्रकार की हर बात के प्रति भी यह सन्देह उत्पन्न करने की प्रवृत्ति रखेगी कि वह भी उसी रोग की कोई बात है जो देश में इतना महामारी जैसा फैल गया है; और इसका वास्तविक अर्थ है सारे जीवित धर्म के प्रति सन्देह उत्पन्न करना, और लोगों को उसके विरुद्ध बोलने, और जहाँ कहीं वह प्रकट हो वहाँ उसे हतोत्साहित करने, और जैसे ही वह उठे वैसे ही उसके सिर पर प्रहार करके उसे गिरा देने में लगा देना। और हम जो पादरी हैं, वर्ष पर वर्ष इस कार्य को अप्रसन्न मुख से देखते रहकर, भेड़ों की चरवाही करके उनके प्रति चरवाहों का भाग पूरा करने के बदले, प्रभावी रूप से भेड़ों को उनकी चराई से दूर रखेंगे; और ऐसे दिन में हमारे लोगों के लिए यही कहीं अच्छा होगा कि उनका कोई स्थायी पादरी हो ही न।”

    दूसरे लोग अधिक खुलकर सामने आए हैं, और उनका उद्देश्य अधिक व्यापक प्रभाव डालना रहा है। कुछ ने सार्वजनिक समाचार-पत्रों के लिए लेख लिखे हैं। कलीसिया में ऊँची प्रतिष्ठा रखनेवाले कुछ लोगों ने ऐसे पत्र घुमाए हैं जो कभी छपे नहीं। दूसरों ने अपने पत्र छपवाकर बँटवाए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि देश भर में पत्र-लेखन की एक पूरी व्यवस्था चलती रही है जिसका उद्देश्य अविश्वास उत्पन्न करना था। प्रेसिडेंट एडवर्ड्स के दिनों में भी लगभग यही मार्ग अपनाया गया था, जिसे देखते हुए वे जागृतियों पर अपनी पुस्तक में कहते हैं:

    “बड़ी सावधानी रखी जानी चाहिए कि छापेखाने का उपयोग किसी ऐसे उद्देश्य के लिए न किया जाए जो इस कार्य के हित के विरुद्ध हो। हम पढ़ते हैं कि जब परमेश्वर ने अपनी सताई हुई कलीसिया के छुटकारे के लिए सीसरा के विरुद्ध युद्ध किया, तब वे लोग जो लेखक की कलम चलाते हैं, उस मामले में प्रभु की सहायता को आए।—न्यायियों 5:14। इस्राएल में उनसे चाहे जिस प्रकार के लोग अभिप्रेत रहे हों, फिर भी चूँकि ये शब्द उस आत्मा के द्वारा रचे गए जिसके सामने संसार के अन्त तक की सब घटनाएँ पूर्ण रूप से खुली थीं, और जिसकी इस गीत में अन्तिम दिनों में परमेश्वर की कलीसिया के छुटकारे की उस महान घटना पर विशेष दृष्टि थी, जिसका इस्राएल का यह छुटकारा एक प्रतिरूप था, इसलिए यह असम्भव नहीं कि उनका संकेत लेखकों की ओर हो, अर्थात् उन लोगों की ओर जो अपनी कलमों से शैतान के राज्य के विरुद्ध लड़ेंगे। इसलिए जो लोग इस कार्य की हानि के लिए ऐसी पुस्तिकाएँ प्रकाशित करते हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस पर सन्देह उत्पन्न करने, और इसे हतोत्साहित करने या इसमें बाधा डालने की ओर प्रवृत्त हैं, वे भली-भाँति यह विचार करें कि कहीं यह सचमुच परमेश्वर का कार्य तो नहीं है; और यदि है, तो क्या यह सम्भव नहीं कि परमेश्वर आग के समान निकलकर उन सबको भस्म कर दे जो उसके मार्ग में खड़े हैं, और इस प्रकार उन पुस्तिकाओं को जला डाले; और क्या इस बात का खतरा नहीं कि जो आग उनमें सुलगाई गई है वह उनके लेखकों को ही झुलसा दे।” इन सब को पश्चाताप करना होगा। जब तक वे पश्चाताप न करें, परमेश्वर उन्हें कभी क्षमा न करेगा, न वे कभी अपने प्रचार पर उसकी आशीष का आनन्द उठाएँगे, और न उन्हें जागृतियों में परिश्रम करने का सम्मान मिलेगा। प्रेसिडेंट एडवर्ड्स ने अपने दिनों में पादरियों पर यह कर्तव्य अत्यन्त प्रबल शब्दों में दबाव डालकर रखा था। निःसन्देह जैसे तब दोनों ओर दोष थे, वैसे ही अब भी रहे हैं। और दोनों ओर गहरा पश्चाताप और दोषों का परस्पर अंगीकार होना आवश्यक है।

    “दोनों ओर से दोषों के अंगीकार का बहुत सा काम होना आवश्यक है; क्योंकि निःसन्देह हाल में जो झगड़े और गड़बड़ियाँ, और ज्योति और अन्धकार की मिलावट हुई है, उसमें बहुत से और बड़े दोष किए गए हैं। शायद ही कोई कर्तव्य हमारे भ्रष्ट स्वभाव के इतना विरुद्ध और मनुष्य के घमण्ड को इतना मारनेवाला हो; परन्तु इसे करना ही होगा। जब स्वर्ग का राज्य निकट हो, या जब हम विशेष रूप से उसके आने की आशा या इच्छा करते हों, तब दोषों का पश्चाताप एक विशेष रीति से उचित कर्तव्य है, जैसा यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के प्रचार से प्रकट होता है। और यदि परमेश्वर अब ऊँचे स्वर से हमें पश्चाताप करने के लिए बुला रहा है, तो वह हमें अपने पश्चाताप को उचित रीति से प्रकट करने के लिए भी बुलाता है। मुझे निश्चय है कि जिन्होंने खुलेआम इस कार्य का विरोध किया है, या समय-समय पर इसके विषय में हल्की बातें कही हैं, वे उसमें अपना दोष खुलेआम स्वीकार किए बिना परमेश्वर की दृष्टि में निर्दोष नहीं ठहराए जा सकते, विशेषकर यदि वे पादरी हों। यदि उन्होंने किसी भी रीति से, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, इस कार्य का विरोध किया है, या अपने सार्वजनिक कार्यों अथवा निजी बातचीत में ऐसा व्यवहार किया है जिससे उनके लोगों के मन इस कार्य के विरुद्ध हो गए हैं, तो यदि आगे चलकर उन्हें उस बात की भलाई और ईश्वरीयता का निश्चय हो जाए जिसका उन्होंने विरोध किया था, तो उन्हें किसी भी दशा में बात को लीपा-पोती करके अपने को निर्दोष नहीं ठहराना चाहिए, और यह बहाना नहीं करना चाहिए कि वे सदा से ऐसा ही सोचते थे, और उन्होंने केवल अमुक-अमुक असावधानियों पर ही आपत्ति की थी; बल्कि उन्हें खुलेआम अपने इस निश्चय की घोषणा करनी चाहिए, और जो उन्होंने किया है उसके लिए अपने आप को दोषी ठहराना चाहिए; क्योंकि इस कार्य के विषय में हल्की बातें कहने और दूसरों के मन इसके विरुद्ध करने में उन्होंने मसीह के विरुद्ध बात कही है; हाँ, उससे भी बढ़कर, पवित्र आत्मा के विरुद्ध। और यद्यपि उन्होंने यह अज्ञानता और अविश्वास में किया है, फिर भी जब उन्हें पता चल जाए कि वह कौन है जिसका उन्होंने विरोध किया है, तो निःसन्देह परमेश्वर उन्हें इस बात के लिए बाध्य ठहराएगा कि वे सबके सामने इसे स्वीकार करें।

    “और दूसरी ओर, यदि जो लोग इस कार्य को बढ़ाने में उत्साही रहे हैं, उन्होंने पहले बताए गए किसी भी उदाहरण में खुलेआम मार्ग से बहुत भटककर ऐसा कुछ किया है जो मसीही नियमों के विरुद्ध है, जिससे उन्होंने खुलेआम दूसरों को हानि पहुँचाई है, या अच्छी व्यवस्था का बड़ा उल्लंघन किया है, और इस प्रकार ऐसा कुछ किया है जिससे धर्म को चोट पहुँची है, तो उन्हें सबके सामने इसे स्वीकार करना और अपने आप को दीन करना होगा, मानो वे पत्थर बीनकर परमेश्वर के लोगों के लिए मार्ग सुधार रहे हों। जिन्होंने अपने खुले अपराध के द्वारा दूसरों के मार्ग में बड़े ठोकर के पत्थर रखे हैं, वे अपने खुले पश्चाताप के द्वारा उन्हें हटाने के लिए बाध्य हैं।”

    हमारे दिनों में ऐसे पादरी हैं—और यह मैं निर्दयता से नहीं बल्कि विश्वासयोग्यता से कहता हूँ, और मैं चाहता हूँ कि यह कहते समय वे सब यहाँ मेरे सामने होते—जो वर्षों से अपना अधिकांश समय कुछ और नहीं, बस ऐसा आचरण करने, ऐसी बातें कहने और ऐसा लिखने में लगाते दिखाई देते हैं जिससे जागृतियों के विषय में सन्देह उत्पन्न हो। और मुझे इसमें सन्देह नहीं कि, जैसा प्रेसिडेंट एडवर्ड्स कहते हैं, उनकी कलीसियाओं के लिए यही अच्छा होगा कि उनका कोई पादरी हो ही न, जब तक वे पश्चाताप करके फिर से परमेश्वर की आशीष प्राप्त न कर लें। 2. जिन कलीसियाओं ने जागृतियों का विरोध किया है, उन्हें अपने आप को दीन करके पश्चाताप करना होगा। जो कलीसियाएँ इस कार्य से अलग खड़ी रही हैं या जिन्होंने इसमें बाधा डाली है, उन्हें अपने पाप से पश्चाताप करना होगा, नहीं तो परमेश्वर उनके साथ न चलेगा। उन कलीसियाओं को अब देखिए जो जागृतियों पर सन्देह डालती रही हैं। क्या वे जागृतियों का आनन्द उठाती हैं? क्या पवित्र आत्मा उन पर उतरता है कि उन्हें बढ़ाए और उनकी उन्नति करे? इस नगर की कलीसियाओं में से एक ऐसी है जिसका सत्र (सेशन) समाचार-पत्रों में वह प्रकाशित करता रहा है जिसे वे अपना “ऐक्ट ऐंड टेस्टिमनी” (अधिनियम और गवाही) कहते हैं, जो उन बहुत से पादरियों के विरुद्ध एक अनुचित और निराधार सन्देह भड़काने के लिए रचा गया है जो जागृतियों को बढ़ाने में सफलतापूर्वक परिश्रम कर रहे हैं। और उस कलीसिया की दशा क्या है? क्या उनमें जागृति हुई है? जनरल असेम्बली को दी गई आधिकारिक रिपोर्ट से तो यह प्रकट होता है कि एक ही वर्ष में वह सत्ताईस प्रतिशत घट गई है। और ऐसी सब कलीसियाएँ, चाहे और कुछ भी किया जाए, घटती ही जाएँगी, जब तक वे पश्चाताप न करें और उनमें जागृति न हो। वे बड़े भक्त होने और परमेश्वर के आदर के लिए जलन रखने का दिखावा कर सकती हैं, परन्तु परमेश्वर यह विश्वास न करेगा कि वे सच्ची हैं। और वह अपना आत्मा न उण्डेलकर अपनी अप्रसन्नता प्रकट करेगा। यदि मेरा स्वर पर्याप्त ऊँचा होता, तो मैं चाहता कि इन कलीसियाओं और पादरियों में से, जिन्होंने जागृतियों की निन्दा की है, हर एक मेरी बात सुने, जब मैं यह कहता हूँ कि मेरा विश्वास है कि उन्होंने कलीसिया पर मृत्यु का कफ़न डालने में सहायता की है, और परमेश्वर का शाप उन पर पहले से है, और जब तक वे पश्चाताप न करें तब तक बना रहेगा। परमेश्वर उनके प्राणों को पहले ही सुखा चुका है, और उनमें से बहुत से यह जानते हैं।

    3. जो लोग इस कार्य को बढ़ाने में लगे रहे हैं, उन्हें भी पश्चाताप करना होगा। उन्होंने जो कुछ भी गलत किया है उसके लिए पश्चाताप करना होगा, नहीं तो जागृतियाँ बीते दिनों के समान लौटकर न आएँगी। जहाँ कहीं गलत आत्मा प्रकट हुआ है, या वे विरोध से चिढ़ और भड़क गए और अपना आपा खो बैठे, या उन्होंने कठोर शब्दों और गलत आत्मा को ही मसीही विश्वासयोग्यता समझ लिया, तो उन्हें पश्चाताप करना होगा। विरोध करनेवाले अकेले कभी किसी जागृति को नहीं रोक सकते, जब तक उसे बढ़ानेवाले स्वयं गलत न हो जाएँ। इसलिए यदि हमने ऐसी बातें कही हैं जो दोष लगानेवाली, या घमण्ड भरी, या अहंकारपूर्ण, या कठोर थीं, तो हमें पश्चाताप करना होगा। ऐसा समय अपने आप को सही ठहराते खड़े रहने का समय नहीं है। हमारी पहली पुकार पश्चाताप करने की है। हर एक अपने पापों से पश्चाताप करे, और आपस में न झगड़े और इस पर विवाद न करे कि सबसे अधिक दोषी कौन है।

    4. कलीसिया को राजनीति के विषय में सही पक्ष लेना होगा। अब यह न समझिए कि मैं कोई राजनीतिक उपदेश देने जा रहा हूँ, या मैं चाहता हूँ कि आप मिलकर राजनीति में एक मसीही दल खड़ा करें। नहीं, मैं उसमें विश्वास नहीं करता। परन्तु अब वह समय आ गया है कि मसीहियों को ईमानदार लोगों को ही मत देना होगा, और राजनीति में सुसंगत पक्ष लेना होगा, नहीं तो प्रभु उन्हें शाप देगा। उन्हें स्वयं ईमानदार होना चाहिए, और किसी व्यक्ति को केवल इसलिए मत देने के बदले कि वह उनके दल का है—चाहे बैंक-समर्थक हो या बैंक-विरोधी, जैक्सन-समर्थक हो या जैक्सन-विरोधी—उन्हें यह पता लगाना चाहिए कि वह ईमानदार और खरा है या नहीं, और भरोसे के योग्य है या नहीं। उन्हें संसार को यह दिखा देना चाहिए कि कलीसिया किसी ऐसे व्यक्ति को पद पर बनाए रखने का समर्थन न करेगी जो धूर्त, या व्यभिचारी, या सब्त तोड़नेवाला, या जुआरी, या पियक्कड़ के रूप में जाना जाता है। हमारे देश में ज्ञान का प्रसार और संचार की सुविधा ऐसी है कि हर व्यक्ति जान सकता है कि वह किसे अपना मत दे रहा है। और यदि वह केवल ईमानदार लोगों को ही मत देगा, तो देश को विवश होकर खरे शासक रखने पड़ेंगे। सब दलों को विवश होकर ईमानदार लोगों को ही उम्मीदवार बनाना पड़ेगा। मसीही इस विषय में अत्यन्त दोषी रहे हैं। परन्तु अब वह समय आ गया है जब उन्हें अलग रीति से काम करना होगा, नहीं तो परमेश्वर इस राष्ट्र को शाप देगा और अपना आत्मा हटा लेगा। जैसे दासता और मद्यनिषेध (संयम) के विषय में, वैसे ही इस विषय में भी कलीसिया को सही काम करना होगा, नहीं तो देश नष्ट हो जाएगा। परमेश्वर इस स्वतन्त्र और धन्य देश को, जिससे हम प्रेम करते हैं और जिसके लिए हम प्रार्थना करते हैं, तब तक सम्भाले नहीं रख सकता जब तक कलीसिया सही पक्ष न ले। ऐसे देश में राजनीति धर्म का एक भाग है, और मसीहियों को परमेश्वर के प्रति अपने कर्तव्य के एक भाग के रूप में देश के प्रति अपना कर्तव्य पूरा करना होगा। कभी-कभी ऐसा लगता है मानो राष्ट्र की नींव सड़ती जा रही है, और मसीही ऐसा व्यवहार करते दिखाई देते हैं मानो वे सोचते हों कि राजनीति में वे जो करते हैं उसे परमेश्वर नहीं देखता। परन्तु मैं आप से कहता हूँ, वह उसे देखता है, और यह राष्ट्र जो मार्ग अपनाएगा उसके अनुसार वह इसे आशीष या शाप देगा।

    5. कलीसियाओं को दासता के विषय में सही पक्ष लेना होगा। और यहाँ यह प्रश्न उठता है कि सही पक्ष क्या है? और पहले मैं कुछ ऐसी बातें बताऊँगा जिनसे बचना चाहिए।

    (1.) सबसे पहले, बुरी आत्मा से बचना चाहिए। मसीहियों का इस विषय पर क्रोधभरे विवाद में पड़ जाना जितना धर्म को, और स्वयं दासों को, हानि पहुँचाता है, उतना और कुछ नहीं। यह ऐसा विषय है जिस पर मसीहियों के बीच किसी क्रोधभरे विवाद की आवश्यकता ही नहीं। दास रखनेवाले धर्म का अंगीकार करनेवाले, शराब बेचनेवाले धर्म का अंगीकार करनेवालों के समान, अपने आप को सही ठहराने का प्रयत्न कर सकते हैं, और उन लोगों से क्रोधित हो सकते हैं जो उनके विवेक पर दबाव डालते हैं और उनसे अपने पाप छोड़ने को कहते हैं। वे घमण्डी धर्म का अंगीकार करनेवाले जो किसी मनुष्य को काली चमड़ी के लिए दोषी समझते हैं, या काली चमड़ी होना लज्जा की बात समझते हैं, अपने पूर्वाग्रहों को इतना हावी होने दे सकते हैं कि अपने कान बन्द कर लें, और उन लोगों से झगड़ने को तैयार हो जाएँ जो उनके सामने इस विषय पर ज़ोर देते हैं। परन्तु मैं फिर कहता हूँ, दासता का विषय ऐसा विषय है जिस पर मसीहियों को, प्रार्थना करनेवाले लोगों को, मतभेद रखने की न आवश्यकता है और न उन्हें मतभेद रखना चाहिए।

    (2.) दूसरी बात जिससे बचना है, वह इस विषय पर तटस्थ रहने का प्रयत्न है। जब से यह विषय चर्चा के लिए सामने आया है, तब से मसीही इस विषय पर उतना ही तटस्थ नहीं रह सकते जितना वे सब्त को पवित्र मानने के विषय पर तटस्थ नहीं रह सकते। यह एक बड़ा राष्ट्रीय पाप है। यह कलीसिया का पाप है। कलीसियाएँ अपनी चुप्पी के द्वारा, और दास रखनेवालों को अपनी संगति में रहने देकर, इसमें सहमति देती रही हैं। सब सम्प्रदाय कम या अधिक दोषी रहे हैं, यद्यपि क्वेकरों ने हाल के वर्षों में इससे अपने हाथ धो लिए हैं। कलीसियाओं का यह बहाना करना व्यर्थ है कि यह केवल एक राजनीतिक पाप है। मैं फिर कहता हूँ, यह कलीसिया का पाप है, जिसमें सब सम्प्रदायों ने सहमति दी है। उन्होंने वास्तव में यह घोषित कर दिया है कि यह उचित है। दास रखनेवालों को चुपचाप अपनी कलीसियाओं में अच्छी प्रतिष्ठा के साथ बने रहने देना ही उनके इस विचार की सबसे प्रबल और सबसे सार्वजनिक अभिव्यक्ति है कि यह पाप नहीं है। इसलिए कलीसिया का इस विषय पर तटस्थ रहने का बहाना करना पूर्णतया बेतुका है। सच्चाई यह है कि वह तटस्थ भूमि पर है ही नहीं। जब तक वह दास रखनेवालों को अपनी संगति में सहती है, तब तक वह इस प्रथा को उचित ठहराती है। और इसी प्रकार परमेश्वर का कोई शत्रु भी यह बहाना कर सकता है कि वह न तो संत है न पापी, कि वह तटस्थ रहनेवाला है, और यह प्रार्थना करे, “भले प्रभु और भले शैतान,” क्योंकि वह नहीं जानता कि कौन सा पक्ष अधिक लोकप्रिय होगा।

    (3.) दोनों ओर दोष लगाने की आत्मा से बचने की बड़ी सावधानी रखनी चाहिए। यह ऐसा विषय है जिस पर इस प्रश्न को निपटाने की सबसे अच्छी रीति के विषय में मसीहियों में मतभेद रहा है, और सम्भवतः आगे कुछ समय तक रहेगा। और दोनों ओर से इसके साथ बड़ी सहनशीलता का व्यवहार होना चाहिए। निन्दा करने की आत्मा, जो एक-दूसरे की नीयत पर दोष लगाती है, मसीही नहीं है; वह परमेश्वर के आत्मा को शोकित करनेवाली और जागृतियों को दबानेवाली है, और कलीसिया के लिए और स्वयं दासों के लिए समान रूप से हानिकारक है।

    दूसरे, मैं कई ऐसी बातें बताऊँगा जिन्हें करने के लिए, मेरे विचार में, कलीसिया इस विषय पर अनिवार्य रूप से बुलाई गई है:

    (1.) सब सम्प्रदायों के मसीहियों को पूर्वाग्रह छोड़कर, बिना किसी देर के, इस विषय की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। धर्म का अंगीकार करनेवालों की विशाल भीड़ ने पूर्वाग्रह को इस सीमा तक पनपने दिया है कि वे इस विषय पर पढ़ने और सुनने, और इसकी सही समझ तक पहुँचने को तैयार नहीं। परन्तु मसीही मन की इस दशा में प्रार्थना नहीं कर सकते। मैं किसी को भी चुनौती देता हूँ कि वह प्रार्थना की आत्मा रखकर दिखाए, जबकि वह इतना पूर्वाग्रह से भरा हो कि इस प्रश्न की, या कर्तव्य के किसी और प्रश्न की, जाँच न करे। यदि ज्योति न चमकती, तो मसीही इस विषय में अन्धकार में रहते हुए भी प्रार्थना की आत्मा रख सकते थे। परन्तु यदि वे ज्योति के पास आने से इनकार करते हैं, तो वे प्रार्थना नहीं कर सकते। अब मैं आप सब से जो यहाँ उपस्थित हैं, और जिन्होंने इस विषय की जाँच इसलिए नहीं की कि आप उसकी जाँच करने को इच्छुक नहीं थे, यह कहने को कहता हूँ कि क्या आप में प्रार्थना की आत्मा है। जहाँ पादरी, व्यक्तिगत मसीही, या पूरी की पूरी कलीसियाएँ अब इस विषय पर सत्य का विरोध करती हैं, जबकि वह इतनी दूर तक फैल चुका है और जनता के मन के सामने है, वहाँ मैं विश्वास नहीं करता कि वे धर्म की जागृति का आनन्द उठाएँगे या उठा सकते हैं।

    (2.) ऐसे लेख, जिनमें इस विषय पर संयत और विवेकपूर्ण चर्चा हो, और ऐसे तथ्यों का विवरण हो जो जनता के सामने हैं, शान्ति से और व्यापक रूप से फैलाए जाने चाहिए, और सारी कलीसिया को उनकी ध्यान से और प्रार्थना के साथ जाँच करनी चाहिए। इससे मेरा यह अर्थ

    नहीं कि कलीसिया का ध्यान इसमें इतना डूब जाए कि वह अपने बीच आत्माओं के उद्धार के मुख्य प्रश्न की उपेक्षा करने लगे। मेरा यह अर्थ नहीं कि इस विषय पर ऐसे उतावले कदम उठाए जाएँ जिनसे मसीही समाज स्तब्ध रह जाए और झगड़े में फँस जाए; परन्तु यह कि प्रार्थना करनेवाले लोग विवेक से काम करें, और जैसे ही समाज में पर्याप्त जानकारी फैल जाए, कलीसियाएँ नम्रता से, परन्तु दृढ़ता से, इस विषय पर निश्चित पक्ष लें, और सारे राष्ट्र और संसार के सामने इस पाप के प्रति अपनी घृणा प्रकट करें।

    कुछ वर्ष पहले जो मेसन-विरोधी उत्तेजना फैली थी, उसने कलीसियाओं में ऐसा उजाड़ मचाया, और पादरियों और लोगों के बीच कुछ समय के लिए इतना मनमुटाव और द्वेष उत्पन्न किया, और इस विषय के पहली बार सामने आने के साथ भी ऐसी हलचलें हुईं, कि बहुत से अच्छे पादरी, जो स्वयं दासता के पूरी तरह विरोधी हैं, अपने लोगों के बीच इस विषय को उठाने से डरते हैं, इस भय से कि उनकी कलीसियाओं में इतना धर्म नहीं कि वे इसे उठाएँ, और शान्ति से इस पर विचार करें, और सुसमाचार की आत्मा में इस पर निर्णय लें। मैं जानता हूँ कि इसका खतरा है। फिर भी यह विषय कलीसियाओं के सामने रखा ही जाना चाहिए। और यदि इसे विवेक के साथ और बहुत प्रार्थना के साथ उठाया जाए, तो ऐसी बहुत कम कलीसियाएँ होंगी जिन्होंने जागृतियों का आनन्द उठाया है, और जो इस समय जागृति की आत्मा के कहीं आस-पास भी हैं, जिन्हें इस विषय पर सत्य को ग्रहण करने तक न लाया जा सके। यहाँ कोई भूल न हो। विलियम मॉर्गन द्वारा फ़्रीमेसनरी का भंडाफोड़ 1826 में प्रकाशित हुआ। उसके फलस्वरूप उत्तेजना और चर्चा 1830 तक चलती रही। इस बीच कलीसियाओं ने बहुत व्यापक रूप से फ़्रीमेसनरी के विरुद्ध अपनी गवाही दी थी, और यह निश्चय किया था कि वे मेसन-संघ से जुड़े रहनेवालों के साथ संगति नहीं रख सकतीं। परिणामस्वरूप मेसनिक लॉजें साधारणतः भंग हो गईं और उन्होंने अपने अधिकार-पत्र लौटा दिए। धर्म का अंगीकार करनेवाले मसीही बड़ी संख्या में लॉजों को छोड़कर भाग निकले। इसने मार्ग तैयार किया, और 1830 में उस समय तक संसार की देखी हुई सबसे बड़ी जागृति मेसन-विरोधी क्षेत्र के केन्द्र में आरम्भ हुई, और उस पूरे क्षेत्र में फैल गई जहाँ कलीसिया ने यह कदम उठाया था, यहाँ तक कि उसके नए विश्वासियों की संख्या 1,00,000 आत्माओं तक पहुँच गई।

    सम्भवतः इस देश की किसी कलीसिया को इस विषय पर इस कलीसिया से अधिक कठिन परीक्षा से नहीं गुज़रना पड़ा। वे युवा और अधिकांश में अनुभवहीन मसीहियों की कलीसिया थे। और मेरी अनुपस्थिति में बहुत सी परिस्थितियाँ मिलकर उनके बीच गड़बड़ी और गलत भावनाएँ उत्पन्न करने का कारण बनीं। परन्तु जहाँ तक मैं अब इस कलीसिया की भावनाओं की दशा से परिचित हूँ, मैं इस विषय पर उनके बीच किसी द्वेष को नहीं जानता। प्रभु ने हमें आशीष दी है, आत्मा हम पर ओस के समान टपका है, और मेरे लौटने के बाद से हर महीने काफ़ी संख्या में लोग हमारी संगति में जोड़े गए हैं। निःसन्देह इस कलीसिया में ऐसे लोग हैं जो इस विषय पर बहुत भिन्न-भिन्न मात्रा में भावना रखते हैं। फिर भी मैं ईमानदारी से कह सकता हूँ कि मुझे उनके बीच विचार में ज़रा भी भिन्नता का पता नहीं। विदेश यात्रा पर जाने से पहले, आरम्भ से ही, हमने दासता के विषय पर वही पक्ष लिया है जो मद्यनिषेध के विषय पर लिया है। हमने दास रखनेवालों को, और इस व्यापार से सम्बन्ध रखनेवाले सब लोगों को, अपनी संगति से अलग रखा है। इस कलीसिया के बाहर के कुछ लोगों ने इस मार्ग की अनुचित और प्रेमरहित कहकर निन्दा की है, और मैं किसी भी दशा में अपने निर्णय को, या इस कलीसिया के उदाहरण को, दूसरे पादरियों और कलीसियाओं के संचालन का नियम नहीं बनाना चाहता। फिर भी, मैं विवेकपूर्वक विश्वास करता हूँ कि वह समय दूर नहीं जब कलीसियाएँ इस पाप के प्रति घृणा की इस अभिव्यक्ति में एक हो जाएँगी। यदि मैं दासता को किसी कोमल और मसीही नाम से बपतिस्मा न दूँ, यदि मैं उसे पाप कहूँ, तो सुसंगति और विवेक दोनों ही इस अनिवार्य निष्कर्ष पर पहुँचाते हैं कि जब तक इस पाप में लगे रहा जाता है, तब तक उसके करनेवाले मसीही संगति और सहभागिता के योग्य नहीं हो सकते।

    इस पर यह आपत्ति की जाती है कि प्रेस्बिटेरियन कलीसिया में बहुत से पादरी हैं जो दास रखते हैं। और कहा जाता है कि यह बड़ी असंगत बात है कि हम किसी दास रखनेवाले को अपनी संगति में आने न दें, और फिर भी उनके साथ एक ही कलीसिया के सदस्य रहें, कलीसियाई सभाओं में उनके साथ बैठें, और उन्हें पादरी के रूप में स्वीकार करें। इसका मैं यह उत्तर देता हूँ कि उन पादरियों के विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार मेरे पास नहीं है, और निश्चय ही मुझे कलीसिया से केवल इसलिए अलग नहीं होना है कि उसके कुछ पादरी या सदस्य दास रखनेवाले हैं। मेरा कर्तव्य है कि मैं कलीसिया से जुड़ा रहूँ, चाहे शैतान भी उसका सदस्य हो। जहाँ मेरे पास अधिकार है, वहाँ मैं दास रखनेवालों को प्रभु-भोज की संगति से अलग रखता हूँ, और जब तक जीवित हूँ सदा रखूँगा। परन्तु जहाँ मेरे पास अधिकार नहीं है, वहाँ यदि मसीह की मेज़ बिछाई गई है, तो मैं उसकी आज्ञा का पालन करते हुए उस पर बैठूँगा, चाहे और कोई भी बैठे या दूर रहे।

    मेरा यह अर्थ कदापि नहीं कि मैं दास रखनेवाले उन सब पादरियों और धर्म का अंगीकार करनेवालों को कपटी ठहराऊँ और कहूँ कि वे मसीही नहीं हैं। परन्तु इतना मैं कहता हूँ कि जब तक वे उस स्थिति में बने रहते हैं, तब तक मसीह का और मानवता का हित यह माँग करता है कि उन्हें मसीही के रूप में मान्यता न दी जाए, जब तक कि हम दूसरों के पापों में भागी होना न चाहें। दास रखनेवालों को इस आधार पर अलग रखना कि वे प्रेस्बिटेरियन कलीसिया के सदस्य हैं, उससे अधिक असंगत नहीं जितना उन लोगों को अलग रखना जो तेज़ शराब पीते या बेचते हैं। क्योंकि प्रेस्बिटेरियन कलीसिया में बहुत से शराब बेचनेवाले भी हैं। मेरा विश्वास है कि वह समय आ गया है—और यद्यपि मैं कोई भविष्यद्वक्ता नहीं, फिर भी मेरा विश्वास है कि यह प्रमाणित होगा कि वह समय आ गया है—कि संयुक्त राज्य अमेरिका में जागृति उतनी ही दूर तक और उतनी ही तेज़ी से चलेगी और प्रबल होगी, जितनी दूर तक और जितनी तेज़ी से कलीसिया इस विषय पर सही पक्ष लेगी, उससे अधिक नहीं। कलीसिया परमेश्वर की गवाह है। सच्चाई यह है कि दासता विशेष रूप से कलीसिया का पाप है। यही तथ्य कि भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के पादरी और धर्म का अंगीकार करनेवाले दास रखते हैं, भक्तिहीन लोगों की दृष्टि में इस सारे घृणित काम को पवित्र ठहरा देता है। कौन नहीं जानता कि मद्यनिषेध के विषय में देश का हर पियक्कड़ किसी शराब बेचनेवाले डीकन या दाखमधु पीनेवाले पादरी की आड़ में छिप जाता है? असंयमियों और संयम से पीनेवालों की सबसे आम आपत्ति और शरण यही है कि धर्म का अंगीकार करनेवाले भी ऐसा करते हैं। यही बात तेज़ शराब का व्यापार करनेवालों और शराब पीनेवालों को प्रभु-भोज की संगति से अलग रखने की अनिवार्य आवश्यकता उत्पन्न करती है। सब सम्प्रदायों की कलीसियाएँ मद्यनिषेध के विषय पर खुलकर बोलें; वे अपने द्वार उन सब के लिए बन्द कर दें जिनका इस प्राणघातक घृणित वस्तु से कुछ भी सम्बन्ध है, तो मद्यनिषेध का कार्य विजयी हो जाएगा। कुछ ही वर्ष इस व्यापार को मिटा देंगे। ठीक यही बात दासता के साथ भी है।

    मुख्यतः कलीसिया ही इस पाप को सहारा देती है। इस विषय पर उसकी एकजुट गवाही इस प्रश्न का निपटारा कर देगी। सब सम्प्रदायों के मसीही नम्रता से परन्तु दृढ़ता से आगे आएँ और अपना निर्णय सुनाएँ; वे अपनी संगतियों को शुद्ध करें, और इस बात से अपने हाथ धो लें; वे इस महान घृणित काम के सिर और माथे पर यह शब्द घोषित करके लिख दें—पाप! और तीन वर्ष में ऐसा जनमत बन जाएगा जो सब कुछ अपने साथ बहा ले जाएगा, और इस देश में न कोई बेड़ियों में जकड़ा दास रहेगा, न कोई तना हुआ, क्रूर दास-हाँकनेवाला।

    फिर भी यह कहा जा सकता है कि बहुत सी कलीसियाओं में यह विषय गड़बड़ी और द्वेष उत्पन्न किए बिना उठाया नहीं जा सकता। ऐसा हो सकता है। मद्यनिषेध के विषय में भी ऐसा ही हुआ है, और जागृतियों के विषय में भी। कुछ कलीसियाओं में न तो मद्यनिषेध और न जागृतियाँ ही फूट उत्पन्न किए बिना लाई जा सकती हैं। सब्त-स्कूलों, और मिशनरी कार्यों, और इस प्रकार की हर बात का विरोध किया गया है, और उनसे बहुत सी कलीसियाओं में फूट पड़ी है। परन्तु क्या यह इन विषयों को बाहर रखने का पर्याप्त कारण है? और जहाँ कलीसियाओं ने विवाद के डर से इन विषयों को बाहर रखा है, क्या वहाँ उन्हें जागृतियों की आशीष मिली है? हर कोई जानता है कि नहीं मिली। परन्तु जहाँ कलीसियाओं ने इन विषयों पर

    दृढ़ पक्ष लिया है, वहाँ यद्यपि कुछ व्यक्तियों ने, और कभी-कभी बहुत से लोगों ने, विरोध किया है, फिर भी उन्हें जागृतियों की आशीष मिली है। जहाँ इनमें से कोई भी विषय सावधानी से और प्रार्थना के साथ उठाया जाता है; जहाँ उन्हें सही आत्मा के साथ सामने लाया जाता है, और हर एक को उसका सच्चा सापेक्ष महत्व दिया जाता है; वहाँ यदि ऐसे लोग हैं जो गड़बड़ी मचाएँगे और विरोध करेंगे, तो दोष वहीं पड़े जहाँ उसे पड़ना चाहिए। कुछ ऐसे व्यक्ति हैं जो स्वयं इस विषय से झगड़ने को प्रवृत्त हैं, और जो सदा यह चिल्लाने को तैयार रहते हैं, “इन बातों को कलीसिया में मत लाओ, इनसे विरोध उत्पन्न होगा।” और यदि पादरी और प्रार्थना करनेवाले लोग इस बात को सामने लाना अपना कर्तव्य समझते हैं, तो वे स्वयं गड़बड़ी खड़ी कर देंगे, और फिर कहेंगे, “देखो, मैंने तुमसे कहा था न; अब देखो, तुम्हारे इस विषय को उठाने से क्या हुआ; यह कलीसिया को टुकड़े-टुकड़े कर देगा।” और जब वे स्वयं फूट डालने के लिए जो कुछ कर सकते हैं कर रहे होते हैं, तब वे फूट का दोष अपने ऊपर नहीं, बल्कि उस विषय पर लगाते हैं। हमारी बहुत सी कलीसियाओं में कुछ ऐसे लोग हैं। और न सब्त-स्कूल, न मिशन, न जागृतियाँ, न दासता-विरोध, न और कोई ऐसी बात जो परमेश्वर का आदर करती या मनुष्यों के प्राणों का भला करती है, कलीसियाओं में इन सावधान आत्माओं को ठेस पहुँचाए बिना आगे बढ़ाई जा सकेगी।

    फिर भी ये बातें एक-एक करके लाई गई हैं और आगे बढ़ाई गई हैं, किसी कलीसिया में अधिक विरोध के साथ, किसी में कम के साथ, और सम्भवतः कुछ कलीसियाओं में बिना किसी विरोध के। और जितना सच यह है कि परमेश्वर कलीसिया का परमेश्वर है, जितना निश्चित यह है कि संसार का मन-परिवर्तन होना ही है, उतना ही निश्चित यह है कि कलीसिया को इस विषय पर विचार करना होगा और इसे पाप घोषित करना होगा। इससे तो अनन्त गुना अच्छा होता कि संसार में कोई कलीसिया होती ही नहीं, बजाय इसके कि वह दासता जैसे इतने महत्त्वपूर्ण विषय पर तटस्थ रहने का प्रयत्न करे या झूठी गवाही दे; विशेषकर जब से यह विषय सामने आया है, और बात के स्वभाव से ही यह असम्भव है कि उसकी गवाही तराज़ू के किसी न किसी पलड़े में न पड़े।

    क्या आप पूछते हैं, “क्या किया जाए—क्या हम इसे बातचीत का सबको डुबो देनेवाला विषय बना लें, और अपने बीच आत्माओं के उद्धार के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विषय से ध्यान हटा दें?” मैं उत्तर देता हूँ, नहीं। कलीसिया इस विषय पर अपनी राय प्रकट कर दे, और शान्ति से रहे। जहाँ तक मैं जानता हूँ, इस विषय पर हम पूरी तरह शान्ति में हैं। हमने अपनी राय प्रकट कर दी है; हमने दास रखनेवालों के लिए अपनी संगति के द्वार बन्द कर दिए हैं, और दूसरी बातों पर ध्यान दे रहे हैं। मुझे इस विषय पर हमारे बीच किसी अस्वस्थ उत्तेजना का ज़रा भी पता नहीं। और जहाँ किसी स्थान पर यह बातचीत का सबको डुबो देनेवाला विषय बन गया है, वहाँ अधिकांश उदाहरणों में, मेरा विश्वास है, इसका कारण कुछ व्यक्तियों का वह हठीला और अनुचित विरोध रहा है जो इस विषय की सुनवाई तक होने देना नहीं चाहते थे।

    6. यदि कलीसिया जागृतियों को बढ़ाना चाहती है, तो उसे सब्त को पवित्र मानना होगा। देश में बहुत बड़े पैमाने पर सब्त तोड़ा जाता है। व्यापारी उसे तोड़ते हैं, यात्री उसे तोड़ते हैं, सरकार उसे तोड़ती है। कुछ वर्ष पहले इस राज्य के पश्चिमी भाग में सब्त माननेवाली नावों और घोड़ागाड़ियों की एक सेवा स्थापित करने और चलाए रखने का प्रयत्न किया गया था। परन्तु यह पाया गया कि कलीसिया उस उद्यम को सहारा न देगी। धर्म का अंगीकार करनेवाले बहुत से लोग उन घोड़ागाड़ियों में यात्रा नहीं करते थे, और अपना माल उन नहर-नावों से नहीं भेजते थे जो सब्त के दिन यात्रा से रुकी रहती थीं। एक समय मसीही कांग्रेस से सब्त के दिन डाक बन्द करने की याचिका करने में बड़े लगे हुए थे, और अब वे उस पर लज्जित से दिखाई देते हैं। परन्तु एक बात अत्यन्त निश्चित है, कि यदि कलीसिया के द्वारा सब्त को पवित्र मानने को बढ़ाने के लिए कुछ न किया गया, और शीघ्र न किया गया, और प्रभावी रूप से न किया गया, तो सब्त मिट जाएगा, और न केवल सब्त के दिन हमारी डाक चलेगी और डाकघर खुले रहेंगे, बल्कि आगे चलकर हमारे न्यायालय और विधान-सभाएँ भी सब्त के दिन खुली रहेंगी। और तब कलीसिया क्या कर सकेगी, यह राष्ट्र क्या करेगा, बिना किसी सब्त के?

    7. कलीसिया को मद्यनिषेध और नैतिक सुधार के विषय पर, और व्यावहारिक नैतिकता के उन सब विषयों पर जो समय-समय पर निर्णय के लिए सामने आते हैं, सही पक्ष लेना होगा।

    कलीसियाओं में ऐसे लोग हैं जो नैतिक सुधार के विषय से अलग खड़े हैं, और जो डरते हैं कि मंच से व्यभिचार के विरुद्ध कुछ कहा जाए। इस विषय पर कलीसिया यह आशा न रखे कि उसे तटस्थ रहने दिया जाएगा। परमेश्वर के विधान में यह चर्चा के लिए सामने है। बुराइयाँ प्रकट की जा चुकी हैं, सुधार की पुकार उठ चुकी है। और मनुष्यजाति को सुधारने के लिए सत्य के सिवाय और क्या है? और यदि कलीसिया और सेवकाई सत्य को प्रस्तुत न करें, तो कौन करेगा? दूर हो यह विचार कि मसीही तटस्थ रहकर और चुप रहकर भी परमेश्वर की स्वीकृति और आशीष का आनन्द उठा सकते हैं।

    ऐसे सब मामलों में, जो पादरी चुप रहता है, वह दूसरे पक्ष के लोगों में गिना जाता है। हर कोई जानता है कि जागृति के समय ऐसा ही होता है। किसी व्यक्ति के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह कार्य के विरुद्ध निन्दा की बौछार करे। यदि वह केवल चुप रहे और तटस्थ बना रहे, तो जागृति के सब शत्रु उसे अपने ही पक्ष का समझेंगे। ठीक यही बात मद्यनिषेध के विषय में है। पियक्कड़ों और संयम से पीनेवालों के साथ सबसे अच्छे सम्बन्ध रखने के लिए यह आवश्यक नहीं कि कोई व्यक्ति ठण्डे-पानीवाली संस्था (मद्यत्यागी संघ) की निन्दा करे। बस वह दाखमधु के संयमित उपयोग की वकालत करे, बस वह विलासिता के रूप में उसे पीता रहे, तो सब पियक्कड़ उसे अपने पक्ष का मानते हैं। यदि वह मद्यनिषेध के कार्य को अपना प्रभाव देने से इनकार करता है, तो स्वाभाविक रूप से दूसरा पक्ष उसे अपना मित्र होने का दावा करता है। इन सब विषयों पर, जब वे सामने आएँ, कलीसियाओं और पादरियों को सही पक्ष लेना होगा, और उसे खुलकर लेना होगा और उस पर डटे रहना होगा, और उसे पूरा करके दिखाना होगा, यदि वे जागृतियों में परमेश्वर की आशीष का आनन्द उठाने की आशा रखते हैं। उन्हें अपनी संगतियों से ऐसे सदस्यों को निकाल देना होगा जो उन पर डाली गई ज्योति का तिरस्कार करते हुए तेज़ शराब पीते या उसका व्यापार करते रहते हैं।

    8. मसीही परोपकार के सब बड़े उद्देश्यों के लिए अधिक किया जाना चाहिए। मिशन, और शिक्षा, और बाइबल, और धार्मिक उद्यम की सब दूसरी शाखाओं के लिए कहीं अधिक प्रयत्न होने चाहिए, नहीं तो कलीसिया परमेश्वर को अप्रसन्न करेगी। इस पर दृष्टि कीजिए। उन दयाओं के विषय में सोचिए जो हमें मिली हैं, कलीसिया के धन, संख्या और समृद्धि के विषय में सोचिए। क्या हमने अपने पाए हुए उपकारों के अनुसार परमेश्वर को लौटाया है, जिससे यह प्रकट हो कि कलीसिया उदार है, और अपना धन देने और परमेश्वर के लिए काम करने को तैयार है? नहीं। उससे बहुत दूर। क्या कलीसिया की बढ़ती के अनुपात में हमने अपने साधन बढ़ाए हैं और अपनी योजनाएँ विस्तृत की हैं? जो कुछ किया गया है क्या उससे परमेश्वर सन्तुष्ट है, या क्या उसके सन्तुष्ट होने का कोई कारण है? पिछले दस वर्षों में अमेरिका की कलीसियाओं ने कैसी जागृति का आनन्द उठाया है! हमें मिशनों, बाइबलों, शिक्षा, ट्रैक्टों, निःशुल्क कलीसियाओं के लिए, और धर्म को बढ़ाने और आत्माओं को बचाने के लिए बनाई गई सब रीतियों में, जितना किया है उससे दस गुना अधिक करना चाहिए था। यदि कलीसियाएँ इस विषय पर नहीं जागतीं, और अपने आप को बड़े पैमाने पर नहीं लगातीं, तो वे आशा रख सकती हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका में जागृति रुक जाएगी।

    9. यदि संयुक्त राज्य अमेरिका के मसीही यह आशा रखते हैं कि जागृतियाँ फैलें और प्रबल हों, यहाँ तक कि संसार का मन-परिवर्तन हो जाए, तो उन्हें जागृतियों के विषय में सन्देह और जलन भड़कानेवाले पत्र लिखना और लेख प्रकाशित करना छोड़ना होगा, और स्वयं इस कार्य में हाथ लगाना होगा। यदि सारी कलीसिया एक देह होकर दस वर्ष पहले काम में लग गई होती, और उसे वैसे ही चलाए रखती जैसे कुछ व्यक्तियों ने, जिनके नाम मैं बता सकता हूँ, किया है, तो आज देश में एक भी पश्चाताप न करनेवाला पापी न होता। आज से पहले ही संयुक्त राज्य अमेरिका में सहस्राब्दी का राज्य पूरी रीति से आ चुका होता। चुपचाप खड़े रहने और बर्कशायर से पत्र लिखने के बदले, जो पादरी सोचते हैं कि हम गलत मार्ग पर जा रहे हैं, वे ज़रा कमर कसकर आगे बढ़ें, और हमें सब से उत्तम मार्ग दिखाएँ। वे अपने उदाहरण से हमें सिखाएँ कि इससे अच्छा कैसे किया जाए। मैं इनकार नहीं करता कि हमसे भूलें हुई हैं और हमने त्रुटियाँ की हैं। मैं इनकार नहीं करता कि जागृतियों में कुछ लोगों के द्वारा बहुत सी गलत बातें की जाती हैं। परन्तु भाइयो, क्या उन्हें सुधारने का यही तरीका है? पौलुस ने ऐसा नहीं किया। उसने अपने भाइयों को प्रेम से यह कहकर सुधारा कि वह उन्हें सब से उत्तम मार्ग दिखाएगा। हमारे भाई हाथ लगाएँ और आगे बढ़ें। उनके सब मंचों से यह पुकार सुनाई दे: काम में लगो! वे वहाँ अगुवाई करें जहाँ प्रभु उनके साथ चलेगा और अपनी भुजा प्रगट करेगा, और मैं, कम से कम मैं तो, पीछे चलूँगा। बस वे आगे बढ़ते चलें, और हम संयुक्त राज्य अमेरिका को परमेश्वर की ओर फिरा हुआ देखें, और सब छोटे-मोटे प्रश्न समाप्त हो जाएँ।

    यदि नहीं, और यदि इस देश में जागृतियाँ सचमुच रुक जाएँ, तो उसके परिणामस्वरूप जितनी आत्माएँ नरक में जाएँगी उन सब के लहू के दोषी पादरी और कलीसियाएँ होंगे। कार्य के रुकने की कोई आवश्यकता नहीं। यदि कलीसिया अपना सारा कर्तव्य पूरा करे, तो इस देश में तीन वर्ष में सहस्राब्दी का राज्य आ सकता है। परन्तु यदि यह पत्र-लेखन चलता ही रहा, और देश सन्देहों और जलन से भरता रहा, यदि सदा ऐसा ही होता रहा कि जागृति के समय कलीसिया के दो-तिहाई लोग पीछे हटे रहें और दोष निकालने के सिवा कुछ न करें, तो इस राष्ट्र पर परमेश्वर का शाप पड़ेगा, और वह भी शीघ्र।

    टिप्पणियाँ।

    1. अब बहुत समय हो चुका कि मसीहियों और पादरियों के बीच मन की बड़ी जाँच-परख हो। भाइयो, यह सत्य का विरोध करने का, या इसलिए मीन-मेख निकालने और दोष ढूँढ़ने का समय नहीं कि सत्य साफ़-साफ़ कह दिया गया है। यह एक-दूसरे पर उलटा दोष लगाने या झगड़ने का समय नहीं, परन्तु हमें अपने ही मनों को जाँचना चाहिए, और परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन करना चाहिए।

    2. हमें पश्चाताप करके अपने पापों को छोड़ना होगा, और अपनी चाल और अपने कामों को सुधारना होगा, नहीं तो जागृति रुक जाएगी। हमारी कलीसियाई कठिनाइयाँ अवश्य समाप्त होनी चाहिए, और सब छोटे-मोटे मतभेद अलग रखकर छोड़ देने चाहिए, ताकि हम धर्म के महान हितों को बढ़ाने में एक हो सकें। यदि नहीं, तो हमारे बीच से जागृतियाँ समाप्त हो जाएँगी, और खोए हुए लाखों लोगों का लहू हमारे वस्त्रों के छोर पर पाया जाएगा।

    3. यदि कलीसिया अपना सारा कर्तव्य पूरा करे, तो वह शीघ्र ही संसार में धर्म की विजय पूरी कर देगी। परन्तु यदि यह “ऐक्ट ऐंड टेस्टिमनी” वाला युद्ध चलता रहा, और जासूसी, और इशारेबाज़ी, और निन्दा की यह व्यवस्था चलती रही, तो न केवल जागृतियाँ रुक जाएँगी, बल्कि उन लाखों लोगों का लहू, जो कलीसिया के इस आघात से उबरने से पहले ही नरक में चले जाएँगे, उन लोगों के वस्त्रों के छोर पर पाया जाएगा जिन्होंने यह भयानक विवाद खड़ा किया और चलाया है।

    4. जिन्होंने जागृतियों के विषय में निन्दा भरी अफ़वाहें फैलाई हैं, उन्हें पश्चाताप करना होगा। विधर्म के विषय में, और कुछ लोगों के आत्मा के प्रभाव का इनकार करने के विषय में बहुत कुछ कहा गया है, जो पूरी तरह निराधार है और शून्य से गढ़ा गया है। और जिन्होंने ये अफ़वाहें गढ़ी हैं, और जिन्होंने इन्हें अपने भाइयों के विरुद्ध फैलाया है, उन्हें पश्चाताप करना होगा और परमेश्वर से प्रार्थना करनी होगी कि वे उसकी क्षमा पाएँ।

    5. हम देखते हैं कि मसीहियों में गिरावट और पीछे हटने की कैसी निरन्तर प्रवृत्ति रहती है। यह सब जागृतियों के सब नए विश्वासियों के विषय में सच है। प्रेसिडेंट एडवर्ड्स के दिनों की जागृति को देखिए। कार्य तब तक चलता रहा जब तक 30,000 आत्माओं का मन-परिवर्तन न हो गया, और इस समय तक बहुत से पादरी और मसीही, एक ओर और दूसरी ओर पुस्तकें और पुस्तिकाएँ लिखकर, ऐसी दशा में पहुँच गए कि उन्होंने सब कुछ डुबो दिया, और जागृति रुक गई। जिन्होंने कार्य का विरोध किया था वे हठीले और उग्र हो गए, और जो उसे बढ़ाते थे उन्होंने अपनी नम्रता खो दी, और चिड़चिड़े हो गए, और फिर उन्हीं बुराइयों में जा पड़े जिनका दोष उन पर झूठ-मूठ लगाया गया था। और अब हम क्या करें? परमेश्वर का यह महान और महिमामय कार्य घटने के लक्षण दिखाता प्रतीत होता है। जागृति मरी नहीं है—इसके लिए परमेश्वर धन्य हो—वह मरी नहीं है! नहीं, देश के सब भागों से हम सुनते हैं कि मसीही इस विषय पर पढ़ रहे हैं और जागृति के विषय में पूछताछ कर रहे हैं। कुछ स्थानों में इस समय सामर्थी जागृतियाँ हो रही हैं। और हम क्या करें कि झण्डा ऊँचा करें, इस सारे राष्ट्र को हिलाएँ और इस सारी बड़ी प्रजा को प्रभु की ओर फेरें? हमें सही करना होगा। हम सब में अच्छी आत्मा होनी चाहिए, हमें धूल में झुकना होगा, हमें एक होकर काम करना होगा, हमें अपने सारे मन से इस महान कार्य में हाथ लगाना होगा, और तब परमेश्वर हमें आशीष देगा, और कार्य आगे बढ़ेगा।

    इस राष्ट्र की दशा क्या है? निःसन्देह परमेश्वर इस राष्ट्र के सिर पर युद्ध की छड़ी उठाए हुए है। अपने न्याय-दण्ड छोड़ने से पहले वह ठहरकर देख रहा है कि कलीसिया सही करेगी या नहीं। राष्ट्र उसकी अप्रसन्नता के अधीन है, क्योंकि कलीसिया ने जागृतियों के विषय में ऐसा आचरण किया है। और अब मान लीजिए कि युद्ध छिड़ जाए, तो हमारी जागृतियाँ कहाँ रहेंगी? युद्ध कितनी शीघ्रता से जागृति की आत्मा को निगल जाएगा! युद्ध की आत्मा जागृतियों की आत्मा के सिवा और कुछ भी हो सकती है। जब जनता का मन युद्ध के सबको डुबो देनेवाले विषय में डूबा होगा, तब धर्म के दावों पर कौन ध्यान देगा? अब देखिए, यह राष्ट्र कैसे एकाएक युद्ध के किनारे पर ला खड़ा किया गया है। परमेश्वर हमारे सिरों पर अपनी धधकती तलवार घुमा रहा है। क्या कलीसिया पश्चाताप करेगी? परमेश्वर की दृष्टि मुख्यतः कलीसिया पर है। हम युद्ध के शाप से कैसे बचें? केवल कलीसिया में सुधार के द्वारा। युद्ध टालने के लिए राजनीतिज्ञों की ओर देखना व्यर्थ है। सम्भवतः वे साधारणतः युद्ध के पक्ष में ही होंगे। बहुत सम्भव है कि उसे टालने के लिए वे जो कुछ करें वही हमें सीधे उसमें धकेल दे। यदि कलीसिया अनुभव न करे, न जागे, न कुछ करे, तो हम सहायता के लिए कहाँ देखें? यदि कलीसिया किसी भी दशा में न हिले, और हमारे सिरों पर लटके परमेश्वर के धर्ममय न्याय-दण्डों को देखकर न काँपे, तो एक राष्ट्र के रूप में हम निश्चय ही स्रापित होने पर हैं।

    6. जो कुछ किया जाए, वह शीघ्र किया जाए। तराज़ू बराबर तुला हुआ है। यदि हम आगे नहीं बढ़ते, तो हमें पीछे जाना ही होगा। बातें जैसी हैं वैसी नहीं रह सकतीं। यदि कलीसिया ऊपर न उठे, यदि हमारी जागृति अब तक की जागृति से अधिक सामर्थी न हो, तो बहुत शीघ्र हमारी कोई जागृति रहेगी ही नहीं। हमारी ऐसी बड़ी जागृति हो चुकी है कि अब छोटी जागृतियाँ जनता के मन में रुचि उत्पन्न नहीं करतीं। आपको व्यक्तिगत रूप से काम करना होगा। अपना कर्तव्य पूरा कीजिए। आप पर उत्तरदायित्व है। शीघ्र पश्चाताप कीजिए। अगले वर्ष तक प्रतीक्षा मत कीजिए। परमेश्वर के सिवा कौन जानता है कि यदि एक और वर्ष बिना किसी बड़ी और व्यापक धर्म की जागृति के यों ही बीत गया, तो इन कलीसियाओं की दशा क्या होगी?

    7. जब कलीसिया में सब कुछ बिगड़ जाता है, तब साधारणतः हर व्यक्ति कलीसिया में और अपने भाइयों में दोष निकालता है, और दोष में अपने भाग को अनदेखा कर देता है। कोई भी अपना समय उस अमूर्त वस्तु, “कलीसिया,” में दोष निकालने में न बिताए। बल्कि मसीह की कलीसिया के व्यक्तिगत सदस्यों के रूप में हर एक काम करे, और सही काम करे, और धूल में झुक जाए, और कभी घमण्ड से या दोष लगाते हुए न बोले। आगे बढ़ो। कौन ऐसे कार्य को छोड़कर पत्र लिखने में लगेगा, और ओनो के मैदान में उतरकर यह देखेगा कि क्या ये सब छोटे-छोटे विवाद सुलझाए नहीं जा सकते, और कार्य को रुक जाने देगा? हम अपने काम पर ध्यान दें, और बाकी की चिन्ता प्रभु पर छोड़ दें। अपना कर्तव्य पूरा करें, और परिणाम परमेश्वर पर छोड़ दें। जब से ये व्याख्यान दिए गए, तब से इस देश में सब परोपकारी उद्यमों में बड़ी प्रगति हुई है। समय ने उन जागृतियों की शुद्धता और अनमोल मूल्य के प्रश्न का निपटारा कर दिया है, जिनके विरुद्ध प्रेस्बिटेरियन कलीसिया में इतना भ्रान्त विरोध था। अब यह ज्ञात है कि विरोधियों ने जिस बड़ी और विनाशकारी प्रतिक्रिया की भविष्यद्वाणी की थी, वह देखने में नहीं आई। अब यह मानना ही पड़ेगा कि उन जागृतियों के नए विश्वासी ही कलीसियाओं का बल रहे हैं, और उनका मसीही प्रभाव सारे देश में अनुभव किया गया है। कोई भी ऐसी जागृति कभी नहीं हुई जिसकी सामर्थ और शुद्धता समय और अनुभव के द्वारा परमेश्वर के उस महान और धन्य कार्य से अधिक पूरी तरह प्रमाणित हुई हो, जिसके विरुद्ध विरोध का ऐसा तूफ़ान उठाया गया था। वह विरोध स्पष्ट रूप से एक बड़ी भूल थी। यह न कहा जाए कि उस कार्य के साथ जुड़ी बड़ी बुराइयों के कारण वह विरोध आवश्यक था, और कि उन बुराइयों और त्रुटियों को विरोध ने रोका और सुधारा। सच्चाई यह है कि जिन कथित त्रुटियों और बुराइयों को विरोध का औचित्य बनाया गया, वे कभी इतनी सीमा तक विद्यमान ही नहीं थीं कि उनसे चिन्ता या विरोध उचित ठहरे। मैंने उन जागृतियों का एक वृत्तान्त लिखा है जिसमें मैंने इस प्रश्न पर अधिक विस्तार से विचार किया है। कलीसियाओं ने मद्यनिषेध और सुधार की दूसरी शाखाओं को इतनी दूर तक अपनाया कि वे उन बुराइयों से बच गईं जिनके विषय में उन्हें चेतावनी दी गई थी। दासता के प्रश्न पर कलीसिया ने अपनी गवाही देने में इतनी देर कर दी कि युद्ध को टाला न जा सका। परन्तु उत्तर के उस सारे क्षेत्र में, जहाँ जागृति का प्रभाव अनुभव किया गया था, अपनी प्रथा के प्रति निरन्तर बढ़ते विरोध से दास रखनेवाले बहुत भयभीत और क्रुद्ध हो गए थे। उन्होंने उस घृणित प्रथा की रक्षा करने और उसे स्थायी बनाने के लिए हथियार उठाए, और ऐसा करके उसे समाप्त कर दिया।

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