व्याख्यान 2 (22 में से) · 1868

जागृति की आशा कब की जा सकती है

चार्ल्स जी. फ़िन्नी · 1868

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    जागृति की आशा कब की जा सकती है

    “क्या तू हम को फिर न जिलाएगा, कि तेरी प्रजा तुझ में आनन्द करे?” भजन संहिता 85:6

    ऐसा प्रतीत होता है कि यह भजन इस्राएल के लोगों के बाबुल की बँधुआई से लौटने के कुछ ही समय बाद लिखा गया था; जैसा कि आप इसके आरम्भ की भाषा से सहज ही देख लेंगे। भजनकार ने अनुभव किया कि परमेश्वर अपने लोगों पर बहुत कृपालु रहा है, और जब वह प्रभु की इस भलाई पर मनन कर रहा था कि वह उन्हें उस देश से लौटा लाया जहाँ वे बन्दी बनाकर ले जाए गए थे, और जब वह उनके सामने की सम्भावनाओं पर दृष्टि कर रहा था, तब वह धर्म की जागृति के लिये प्रार्थना कर उठता है। “क्या तू हम को फिर न जिलाएगा, कि तेरी प्रजा तुझ में आनन्द करे?” क्योंकि परमेश्वर ने अपने विधान से उनके बीच अपने भवन की विधियों को फिर से स्थापित कर दिया था, इसलिये वह प्रार्थना करता है कि उस कार्य को पूर्णता का मुकुट पहनाने के लिये धर्म की जागृति भी हो।

    पिछले शुक्रवार की शाम मैंने यह दिखाने का प्रयत्न किया था कि धर्म की जागृति क्या नहीं है; जागृति क्या है; और उसे बढ़ाने में किन माध्यमों को काम में लाया जाना है। आज रात जिन विषयों की ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ, वे ये हैं,

    I. धर्म की जागृति की आवश्यकता कब होती है।

    II. जब जागृति की आवश्यकता हो, तब उसका महत्त्व।

    III. धर्म की जागृति की आशा कब की जा सकती है।

    I. धर्म की जागृति की आवश्यकता कब होती है?

    1. जब धर्म का अंगीकार करनेवालों के बीच भाईचारे के प्रेम और मसीही भरोसे की कमी हो, तब जागृति की आवश्यकता होती है। तब परमेश्वर से अपने काम को फिर से जिलाने की ऊँची पुकार होती है। जब मसीही लोग गिरकर निम्न और पीछे हटी हुई दशा में पहुँच जाते हैं, तब न तो उनमें एक दूसरे के प्रति वैसा प्रेम और भरोसा होता है, न होना चाहिए, और न होने का कोई कारण है, जैसा तब होता है जब वे सब जीवित, सक्रिय और पवित्र जीवन बितानेवाले होते हैं। शुभचिन्तना का प्रेम वैसा ही रह सकता है, परन्तु प्रसन्नता का प्रेम नहीं। परमेश्वर सब मनुष्यों से शुभचिन्तना का प्रेम रखता है, परन्तु प्रसन्नता का प्रेम वह केवल उन्हीं के प्रति अनुभव करता है जो पवित्र जीवन बिताते हैं। मसीही लोग एक दूसरे से प्रसन्नता का प्रेम केवल उनकी पवित्रता के अनुपात में ही रखते हैं, और इससे अधिक रख भी नहीं सकते। यदि मसीही प्रेम मसीह के लोगों में मसीह के स्वरूप से प्रेम है, तो वह केवल वहीं प्रकट हो सकता है जहाँ वह स्वरूप वास्तव में या प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान हो। इससे पहले कि दूसरे मसीही किसी व्यक्ति से प्रसन्नता का प्रेम रख सकें, उसे मसीह के स्वरूप को प्रतिबिम्बित करना और मसीह का आत्मा प्रकट करना होगा। जब मसीही लोग जड़ता में डूबे हुए हों, तब उनसे यह कहना व्यर्थ है कि वे मसीहियों के नाते एक दूसरे से प्रसन्नता का प्रेम रखें। उन्हें एक दूसरे में ऐसा कुछ दिखाई ही नहीं देता जिससे यह प्रेम उत्पन्न हो। यह लगभग असम्भव है कि वे एक दूसरे के प्रति उससे भिन्न कुछ अनुभव करें जो वे पापियों के प्रति अनुभव करते हैं। केवल यह जान लेना कि वे कलीसिया के सदस्य हैं, या कभी-कभी उन्हें प्रभु-भोज की मेज़ पर देख लेना, मसीही प्रेम उत्पन्न नहीं करेगा, जब तक वे उनमें मसीह का स्वरूप न देखें।

    2. जब धर्म का अंगीकार करनेवालों के बीच फूट, ईर्ष्या और बुराई की बातें हों, तब जागृति की बड़ी आवश्यकता होती है। ये बातें दिखाती हैं कि मसीही लोग परमेश्वर से बहुत दूर चले गए हैं, और अब समय है कि जागृति के विषय में गम्भीरता से सोचा जाए। जब तक कलीसिया में ऐसी बातें हों, धर्म फल-फूल नहीं सकता, और जागृति के समान कोई भी वस्तु उनका अन्त नहीं कर सकती।

    3. जब कलीसिया में सांसारिक आत्मा हो। जब आप देखते हैं कि मसीही लोग पहनावे, ठाट-बाट की सवारियों, दावतों में, सांसारिक मनोरंजन खोजने में, उपन्यास पढ़ने में, और वैसी ही दूसरी पुस्तकें पढ़ने में जैसी संसार के लोग पढ़ते हैं, संसार के अनुरूप बन जाते हैं, तब यह प्रकट है कि कलीसिया गिरकर निम्न और पीछे हटी हुई दशा में पहुँच गई है। यह दिखाता है कि वे परमेश्वर से दूर हैं, और धर्म की जागृति की बड़ी आवश्यकता है। 4. जब कलीसिया अपने सदस्यों को घोर और लज्जाजनक पापों में गिरते देखती है, तब समय है कि कलीसिया जागे और धर्म की जागृति के लिये परमेश्वर की दोहाई दे। जब ऐसी बातें हो रही हों जो धर्म के शत्रुओं को निन्दा करने का अवसर देती हैं, तब समय है कि कलीसिया परमेश्वर से पूछे, “तेरे बड़े नाम का क्या होगा?”

    5. जब कलीसिया में या देश में विवाद की आत्मा हो, तब जागृति आवश्यक है। धर्म की आत्मा विवाद की आत्मा नहीं है। जहाँ विवाद की आत्मा प्रबल हो, वहाँ धर्म में कोई उन्नति नहीं हो सकती।

    6. जब दुष्ट लोग कलीसिया पर जयवन्त होकर इतराते हैं, और उसकी निन्दा करते हैं, तब धर्म की जागृति की खोज करने का समय है।

    7. जब पापी लापरवाह और जड़ हों, और बिना किसी चिन्ता के नरक में डूबते जा रहे हों, तब समय है कि कलीसिया उठकर सक्रिय हो। कलीसिया का जागना उतना ही उसका कर्तव्य है, जितना किसी बड़े नगर में रात को आग लगने पर आग बुझानेवालों का जागना उनका कर्तव्य है। कलीसिया को नरक की उन आगों को बुझाना चाहिए जो दुष्टों को पकड़ रही हैं। सोना! यदि आग बुझानेवाले सोते रहें, और सारा नगर जलकर राख हो जाने दें: तो ऐसे आग बुझानेवालों के विषय में क्या सोचा जाएगा? और फिर भी उनका दोष उन मसीहियों के दोष की तुलना में कुछ भी नहीं होगा जो उस समय सोते रहते हैं जब उनके चारों ओर पापी जड़ अवस्था में नरक की आग में डूबते जा रहे हैं।

    II. अब मुझे यह दिखाना है कि ऐसी परिस्थितियों में धर्म की जागृति का क्या महत्त्व है।

    1. धर्म की जागृति ही एकमात्र सम्भव वस्तु है जो उस कलंक को मिटा सकती है जो कलीसिया पर छाया हुआ है, और धर्म को जनता की दृष्टि में वह स्थान फिर से दिला सकती है जो उसे मिलना चाहिए। जागृति के बिना यह कलंक कलीसिया पर अधिकाधिक छाता जाएगा, यहाँ तक कि वह सर्वत्र घृणा के नीचे दब जाएगी। आप और जो कुछ चाहें कर सकते हैं, और कुछ बातों में समाज का रूप-रंग भी बदल सकते हैं, परन्तु आप कोई वास्तविक भलाई नहीं करेंगे; धर्म की जागृति के बिना आप स्थिति को केवल और बिगाड़ देते हैं। आप जाकर आराधना का एक शानदार नया भवन बना सकते हैं, अपनी बैठकों पर रेशमी दमिश्की कपड़ा मढ़वा सकते हैं, एक बहुमूल्य मंच खड़ा कर सकते हैं, और एक भव्य ऑर्गन मँगवा सकते हैं, और दिखावा और ठाट करने के लिये इसी प्रकार की सब वस्तुएँ जुटा सकते हैं, और इस रीति से दुष्टों के बीच धर्म के लिये एक प्रकार का आदर भी प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु वास्तव में इससे कोई भलाई नहीं होती। उलटे इससे हानि ही होती है। यह उन्हें धर्म के वास्तविक स्वरूप के विषय में भटका देता है; और उनका मन-परिवर्तन करना तो दूर, यह उन्हें उद्धार से और भी दूर ले जाता है। जहाँ कहीं उन्होंने मसीही धर्म की वेदी को वैभव से घेर दिया है, वहाँ दृष्टि कीजिए, और आप पाएँगे कि जो प्रभाव उत्पन्न होता है वह धर्म के सच्चे स्वरूप के विपरीत है। मसीहियों की ओर से शक्ति का जागना, और परमेश्वर के आत्मा का उण्डेला जाना अवश्य होना चाहिए, नहीं तो संसार कलीसिया पर हँसेगा।

    2. कलीसिया के सदस्यों के बीच मसीही प्रेम और भरोसे को और कोई वस्तु फिर से स्थापित नहीं करेगी। धर्म की जागृति के सिवा और कुछ उसे फिर से स्थापित नहीं कर सकता, और न ही किसी और वस्तु को उसे फिर से स्थापित करना चाहिए। मसीहियों के एक दूसरे के प्रति उस प्रेम को जगाने का और कोई मार्ग नहीं है जो कभी-कभी अनुभव किया जाता है, जब उनमें ऐसा प्रेम होता है जिसे वे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते। भरोसे के बिना आप ऐसा प्रेम नहीं रख सकते; और भक्ति के ऐसे प्रमाण के बिना जैसा जागृति में दिखाई देता है, आप भरोसे को फिर से स्थापित नहीं कर सकते। यदि कोई पादरी पाता है कि उसने किसी भी मात्रा में अपने लोगों का भरोसा खो दिया है, तो उसे उनका भरोसा फिर से पाने के एकमात्र साधन के रूप में जागृति के लिये परिश्रम करना चाहिए। मेरा यह अर्थ नहीं कि जागृति के लिये परिश्रम करने में उसका उद्देश्य यही हो कि वह अपने लोगों का भरोसा फिर से पाए, परन्तु यह कि उसके द्वारा होनेवाली जागृति, और साधारणतः उसके सिवा और कुछ नहीं, उसे उसके लोगों में से प्रार्थना करनेवाले भाग का भरोसा फिर से दिलाएगी। इसी प्रकार यदि कलीसिया का कोई प्राचीन या साधारण सदस्य पाता है कि उसके भाई उसके प्रति ठण्डे हैं, तो इसका केवल एक ही उपाय है। वह यह है कि वह स्वयं जागृत हो, और अपनी आँखों से और अपने जीवन से मसीह के स्वरूप का तेज उण्डेले। यह आत्मा कलीसिया में लगकर फैल जाएगा, और भरोसा नया हो जाएगा, और भाईचारे का प्रेम फिर से प्रबल हो जाएगा।

    3. ऐसे समय में कलीसिया पर से परमेश्वर के दण्डों को टालने के लिये धर्म की जागृति अनिवार्य है। यदि जागृतियाँ केवल आश्चर्यकर्म ही हों, और उन्हें उत्पन्न करने में कलीसिया का उससे अधिक हाथ न हो जितना आँधी-तूफ़ान लाने में है, तो यह विचित्र प्रचार होगा। तब कलीसिया से यह कहना कि यदि जागृति न हो तो आप दण्डों की आशा कर सकते हैं, उतना ही हास्यास्पद होगा जितना यह कहना कि, यदि आँधी-तूफ़ान न आए तो आप दण्डों की आशा कर सकते हैं। सच तो यह है कि मसीही लोग जागृत न होने के लिये उससे अधिक दोषी हैं जितना पापी मन-परिवर्तन न होने के लिये। और यदि वे जागृत नहीं होते, तो वे निश्चय जान लें कि परमेश्वर अपने दण्डों के साथ उन पर आएगा। परमेश्वर ने कितनी बार यहूदी कलीसिया पर दण्ड भेजे, क्योंकि वे उसके भविष्यद्वक्ताओं की पुकार पर न तो पश्चाताप करते थे और न जागृत होते थे! हमने कितनी बार कलीसियाओं को, और यहाँ तक कि पूरे-पूरे सम्प्रदायों को, शाप से शापित होते देखा है, क्योंकि वे न तो जागते थे, न प्रभु को खोजते थे, और न यह प्रार्थना करते थे, “क्या तू हम को फिर न जिलाएगा, कि तेरी प्रजा तुझ में आनन्द करे?”

    4. धर्म की जागृति के सिवा और कुछ ऐसी कलीसिया को मिट जाने से नहीं बचा सकता। इस प्रकार पतन की ओर जाती हुई कलीसिया जागृति के बिना बनी नहीं रह सकती। यदि उसमें नए सदस्य आते भी हैं, तो वे अधिकतर भक्तिहीन लोग ही होंगे। जागृतियों के बिना साधारणतः एक वर्ष में उतने लोगों का भी मन-परिवर्तन नहीं होगा जितने मर जाएँगे। इस देश में ऐसी कलीसियाएँ रही हैं जहाँ सदस्य मरते गए, और उनके स्थान पर दूसरों का मन-परिवर्तन करने के लिये कोई जागृतियाँ नहीं हुईं, यहाँ तक कि कलीसिया समाप्त हो गई, और उसका संगठन भंग कर दिया गया।

    एक पादरी ने मुझे बताया कि एक बार उसने वर्जीनिया में एक मिशनरी के रूप में उसी भूमि पर परिश्रम किया जहाँ कभी सैमुएल डेविस जैसा व्यक्ति एक धधकती मशाल के समान चमका और प्रकाशित हुआ था; और यह कि डेविस की कलीसिया इतनी घट गई थी कि उसमें केवल एक ही पुरुष सदस्य रह गया था, और वह भी, यदि मुझे ठीक याद है, एक अश्वेत व्यक्ति था। कलीसिया घमण्डी हो गई थी, और बिलकुल समाप्त हो चुकी थी। मैंने पेन्सिलवेनिया की एक कलीसिया के विषय में सुना है जो पहले फलती-फूलती थी, परन्तु उसने जागृतियों की उपेक्षा की, और वह इतनी घट गई कि जब पास्टर प्रभु-भोज करवाता था तो उसे एक शासक प्राचीन के लिये पड़ोस की एक कलीसिया में सन्देश भेजना पड़ता था।

    5. धर्म की जागृति के सिवा और कुछ भी अनुग्रह के साधनों को भक्तिहीनों की बड़ी हानि करने से नहीं रोक सकता। जागृति के बिना वे प्रचार के अधीन अधिकाधिक कठोर होते जाएँगे, और उससे कहीं अधिक भयानक दण्ड भोगेंगे जितना वे भोगते यदि उन्होंने सुसमाचार कभी सुना ही न होता। यदि उन्हें परमेश्वर की ओर फेरने के लिये कोई जागृतियाँ न हों, तो आपकी सन्तान और आपके मित्र अनुग्रह के साधनों के परिणामस्वरूप नरक में कहीं अधिक भयानक दशा में उतरेंगे। उनके लिये

    कहीं भला होता कि कोई अनुग्रह के साधन न होते, न कोई पवित्रस्थान, न बाइबल, न प्रचार, और उन्होंने सुसमाचार कभी सुना ही न होता, इसकी अपेक्षा कि वे वहाँ जीएँ और मरें जहाँ कोई जागृति नहीं है। यदि सुसमाचार जीवन के निमित्त जीवन की सुगन्ध न बनाया जाए, तो वह मरने के निमित्त मृत्यु की गन्ध है।

    6. और कोई मार्ग नहीं है जिससे कलीसिया पवित्र की जा सके, अनुग्रह में बढ़ सके, और स्वर्ग के योग्य बनाई जा सके। अनुग्रह में बढ़ना क्या है? क्या यह उपदेश सुनना और धर्म के विषय में कुछ नई धारणाएँ प्राप्त कर लेना है? नहीं—बिलकुल नहीं। जो मसीही यह करता है, और इससे अधिक कुछ नहीं, वह बद से बदतर होता जा रहा है, अधिकाधिक कठोर होता जा रहा है, और हर सप्ताह उसे कर्तव्य के लिये जगाना और कठिन होता जाता है।

    III. अब मुझे यह दिखाना है कि धर्म की जागृति की आशा कब की जा सकती है।

    1. जब परमेश्वर का विधान संकेत करे कि जागृति निकट है। परमेश्वर के विधान के संकेत कभी-कभी इतने स्पष्ट होते हैं कि वे उसकी इच्छा के प्रकाशन के बराबर होते हैं। घटनाएँ मिलकर मार्ग खोलती हैं, परिस्थितियाँ जागृति के अनुकूल तैयार की जाती हैं, यहाँ तक कि जो लोग ध्यान से देख रहे हैं वे उतनी ही स्पष्टता से देख सकते हैं कि जागृति निकट है, मानो यह स्वर्ग से प्रकट किया गया हो। इस देश में ऐसे उदाहरण हुए हैं, जहाँ विधान के प्रकटीकरण इतने स्पष्ट थे कि जो लोग सावधान देखनेवाले थे, उन्हें यह कहने में कोई संकोच नहीं हुआ कि परमेश्वर अपना आत्मा उण्डेलने और धर्म की जागृति देने आ रहा है। परमेश्वर के पास किसी जाति पर अपनी इच्छा प्रकट करने के विभिन्न मार्ग हैं—कभी उन्हें विशेष साधन देकर, कभी विशेष और चौंका देनेवाली घटनाओं के द्वारा, कभी साधनों के उपयोग को असाधारण रूप से अनुकूलता देकर, मौसम, स्वास्थ्य आदि के द्वारा।

    2. जब दुष्टों की दुष्टता मसीहियों को दुःखी, दीन और व्याकुल करती है। कभी-कभी मसीही लोग अपने चारों ओर की दुष्टता की कुछ भी परवाह करते नहीं दिखाई देते। या यदि वे उसकी चर्चा करते भी हैं, तो ठण्डे, कठोर और संवेदनहीन ढंग से, मानो वे सुधार की आशा छोड़ चुके हों: वे पापियों को डाँटने-फटकारने को तैयार रहते हैं—न कि उनके लिये परमेश्वर के पुत्र की सी करुणा अनुभव करने को। परन्तु कभी-कभी दुष्टों का आचरण मसीहियों को प्रार्थना की ओर धकेल देता है, और उन्हें तोड़ देता है, और उन्हें शोकित और कोमल-हृदय बना देता है, यहाँ तक कि वे दिन-रात रो सकते हैं, और उन्हें डाँटने और उनकी निन्दा करने के बदले वे उनके लिये उत्सुकता से प्रार्थना करते हैं। तब आप जागृति की आशा कर सकते हैं। वास्तव में यह तो जागृति का आरम्भ हो ही चुका है। कभी-कभी दुष्ट लोग धर्म का विरोध खड़ा कर देते हैं। और जब यह बात मसीहियों को घुटनों पर लाकर बड़े शब्द से पुकार पुकारकर और आँसू बहा बहाकर परमेश्वर से प्रार्थना करने को विवश करती है, तो आप निश्चित हो सकते हैं कि जागृति होनेवाली है। दुष्टता का फैला होना इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि जागृति नहीं होनेवाली है। प्रायः वही परमेश्वर के काम करने का समय होता है। जब शत्रु महानद की नाईं चढ़ाई करता है, तब प्रभु का आत्मा उसके विरुद्ध झण्डा खड़ा करता है। प्रायः जागृति का पहला संकेत यह होता है कि शैतान विरोध में कोई नई बात खड़ी कर देता है। उसका सदा दो में से एक परिणाम होगा। या तो वह मसीहियों को परमेश्वर की ओर धकेल देगा, या उन्हें परमेश्वर से और भी दूर, किसी न किसी शारीरिक चाल की ओर धकेल देगा जो बातों को केवल और बिगाड़ देगी। बहुधा भक्तिहीनों की सबसे घोर दुष्टता के बाद जागृति आती है। यदि मसीहियों को यह अनुभव कराया जाए कि परमेश्वर के सिवा उनकी कोई आशा नहीं, और यदि उनमें इतनी भावना शेष हो कि वे परमेश्वर के सम्मान की और पश्चाताप न करनेवालों के प्राणों के उद्धार की चिन्ता करें, तो निश्चय जागृति होगी। यदि नरक उफनना चाहे तो उफन जाए, और सड़कों के पत्थरों जितने शैतान उगल दे, यदि वह केवल मसीहियों को प्रार्थना में परमेश्वर की ओर धकेल दे—तो वे जागृति को रोक नहीं सकते। शैतान को उपद्रव खड़ा करने दीजिए, और अपना नरसिंगा जितने ज़ोर से चाहे फूँकने दीजिए; यदि मसीही केवल दीन होकर प्रार्थना करें, तो वे शीघ्र ही धर्म की जागृति में परमेश्वर की उघड़ी हुई भुजा देखेंगे। मैंने ऐसे उदाहरण देखे हैं जहाँ जागृति शत्रु की पंक्तियों पर लगभग बिजली की कड़क के समान अचानक टूट पड़ी, और उन्हें तितर-बितर कर दिया—उनके मुखियाओं को ही विजय-चिह्न के रूप में पकड़ लिया, और क्षण भर में उनके दल को तोड़ दिया।

    3. जागृति की आशा तब की जा सकती है जब मसीहियों में जागृति के लिये प्रार्थना की आत्मा हो। अर्थात् जब वे ऐसे प्रार्थना करें मानो उनका मन जागृति पर लगा हो। कभी-कभी मसीही लोग जागृति के लिये प्रार्थना में लगे नहीं होते, तब भी नहीं जब वे प्रार्थना में उत्साही होते हैं। उनका मन किसी और बात पर होता है; वे किसी और बात के लिये प्रार्थना कर रहे होते हैं—अन्यजातियों के उद्धार और ऐसी ही बातों के लिये—और अपने बीच जागृति के लिये नहीं। परन्तु जब वे जागृति की कमी अनुभव करते हैं, तब वे उसके लिये प्रार्थना करते हैं; वे अपने परिवारों और पड़ोस के लिये चिन्ता अनुभव करते हैं, और उनके लिये ऐसे प्रार्थना करते हैं मानो उन्हें इनकार किया ही न जा सकता हो। प्रार्थना की आत्मा किससे बनती है? क्या बहुत-सी प्रार्थनाओं और उत्साह भरे शब्दों से? नहीं। प्रार्थना हृदय की दशा है। प्रार्थना की आत्मा पापियों के उद्धार के लिये मन की निरन्तर लालसा और व्याकुलता की दशा है। यह कुछ ऐसा है जो उन्हें दबाए रखता है। जहाँ तक मन के विज्ञान का सम्बन्ध है, यह वैसा ही है जैसे जब कोई मनुष्य किसी सांसारिक हित के लिये चिन्तित होता है। जिस मसीही में यह प्रार्थना की आत्मा होती है, वह प्राणों के लिये चिन्तित रहता है। यह हर समय उसके विचारों का विषय रहता है, और उसे ऐसा दिखने और करने को विवश करता है मानो उसके मन पर कोई बोझ हो। वह दिन को उसके विषय में सोचता है, और रात को उसके स्वप्न देखता है। यही वास्तव में निरन्तर प्रार्थना करना है। उस मनुष्य की प्रार्थनाएँ उसके हृदय से जल के समान बहती प्रतीत होती हैं—“हे प्रभु, अपने काम को फिर से जिला।” कभी-कभी यह भावना बहुत गहरी होती है; लोग इतने झुक गए हैं कि वे न खड़े हो सकते थे और न बैठ सकते थे। मैं इस दशा में पड़े ऐसे पुरुषों के नाम बता सकता हूँ, जो दृढ़ स्नायुओं वाले हैं, जिनका चरित्र बहुत ऊँचा माना जाता है, और जो पापियों की दशा के शोक से बिलकुल कुचल गए हैं। उन्होंने पापियों के लिये वास्तव में प्राण की प्रसव-पीड़ा सही है, यहाँ तक कि वे बालकों के समान असहाय हो गए। यह भावना सदा इतनी तीव्र नहीं होती, परन्तु ऐसी बातें जितना समझा जाता है उससे कहीं अधिक सामान्य हैं। 1826 की बड़ी जागृतियों में वे सामान्य थीं। यह किसी भी रीति से धर्मोन्माद नहीं है। यह ठीक वही है जो पौलुस ने अनुभव किया, जब वह कहता है, “हे मेरे बालको, जिनके लिये मैं जच्चा की सी पीड़ाएँ सहता हूँ।” मैंने इस राज्य की एक स्त्री के विषय में सुना जो पापियों के लिये प्रार्थना करती थी, और अन्त में उसके मन की दशा ऐसी हो गई कि वह प्रार्थना के बिना जी नहीं सकती थी। वह न दिन को और न रात को चैन पा सकती थी, जब तक कोई प्रार्थना न कर रहा हो। तब वह शान्त हो जाती; परन्तु यदि वे रुक जाते, तो वह तब तक वेदना में चीखती रहती जब तक फिर से प्रार्थना न होने लगे। और यह दो दिन तक चलता रहा, जब तक वह प्रार्थना में प्रबल न हुई, और उसके प्राण को चैन न मिला। प्राण की यह प्रसव-पीड़ा वह गहरी वेदना है जो लोग तब अनुभव करते हैं जब वे किसी ऐसी आशीष के लिये परमेश्वर को पकड़ लेते हैं, और जब तक उसे पा न लें तब तक उसे जाने नहीं देते। मेरा यह आशय न समझा जाए कि प्रार्थना की आत्मा के लिये यह आवश्यक है कि व्याकुलता इतनी बड़ी हो। परन्तु पापियों के उद्धार के लिये यही गहरी, निरन्तर, उत्सुक लालसा जागृति के लिये प्रार्थना की आत्मा है। जहाँ तक यह प्रार्थना की आत्मा फैली है, वहाँ तक जागृति आरम्भ हो चुकी है।

    जब किसी कलीसिया में यह भावना विद्यमान हो, तो जब तक पाप के द्वारा आत्मा शोकित होकर दूर न कर दिया जाए, तब तक मसीहियों में सामान्य रूप से जागृति अवश्य होगी, और उसमें पापियों का परमेश्वर की ओर मन-परिवर्तन भी सम्मिलित होगा। यह चिन्ता और व्याकुलता तब तक बढ़ती जाती है जब तक जागृति आरम्भ न हो जाए। व——न के एक पादरी ने मुझे अपने लोगों के बीच हुई एक जागृति के विषय में बताया, जो कलीसिया की एक उत्साही और समर्पित स्त्री से आरम्भ हुई। वह पापियों के विषय में चिन्तित हो गई, और उनके लिये प्रार्थना करने लगी, और वह प्रार्थना करती रही और उसकी व्याकुलता बढ़ती गई; और अन्त में वह अपने पादरी के पास आई, और उससे बात की, और उससे विनती की कि वह चिन्तित खोजियों की एक सभा ठहराए, क्योंकि उसे लगता था कि उसकी आवश्यकता है। पादरी ने उसे टाल दिया, क्योंकि उसे इस विषय में कुछ भी अनुभव नहीं होता था। अगले सप्ताह वह फिर आई, और उससे गिड़गिड़ाकर विनती की कि वह

    चिन्तित खोजियों की सभा ठहराए; वह जानती थी कि कोई न कोई आएगा, क्योंकि उसे ऐसा लगता था कि परमेश्वर अपना आत्मा उण्डेलने पर है। उसने उसे फिर टाल दिया। और अन्त में उसने उससे कहा, “यदि आप चिन्तित खोजियों की सभा नहीं ठहराएँगे तो मैं मर जाऊँगी, क्योंकि जागृति निश्चय होनेवाली है।” अगले सब्त को उसने एक सभा ठहराई, और कहा कि यदि कोई अपने प्राणों के उद्धार के विषय में उससे बातचीत करना चाहे, तो वह अमुक शाम को उनसे मिलेगा। उसे एक का भी पता नहीं था, परन्तु जब वह उस स्थान पर गया, तो उसने बड़े आश्चर्य के साथ बहुत से चिन्तित खोजियों को वहाँ पाया। अब क्या आप नहीं सोचते कि वह स्त्री जानती थी कि जागृति होनेवाली है? आप इसे जो चाहें कहें, एक नया प्रकाशन, या एक पुराना प्रकाशन, या कुछ और। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर का आत्मा ही था जिसने उस प्रार्थना करनेवाली स्त्री को सिखाया कि जागृति होनेवाली है। “यहोवा का भेद” उसके पास था, और वह उसे जानती थी। वह जानती थी कि परमेश्वर उसके हृदय में रहा है, और उसने उसे इतना भर दिया था कि वह उसे और रोक नहीं सकती थी।

    कभी-कभी पादरियों को अपनी मंडलियों के विषय में ऐसी व्याकुलता हुई है कि उन्हें लगा कि यदि वे जागृति न देख सकें तो जी न सकेंगे। कभी-कभी प्राचीनों और डीकनों में, या कलीसिया के साधारण सदस्यों में, पुरुषों या स्त्रियों में, धर्म की जागृति के लिये प्रार्थना की ऐसी आत्मा होती है कि वे परमेश्वर को थामे रहेंगे और उस पर प्रबल होंगे, जब तक वह अपना आत्मा न उण्डेले। 1825 की पतझड़ में ओनाइडा काउंटी की कलीसियाओं पर छाई आधी रात में जो प्रकाश की पहली किरण फूटी, वह दुर्बल स्वास्थ्यवाली एक स्त्री की ओर से थी, जो, मेरा विश्वास है, कभी किसी सामर्थी जागृति में सम्मिलित नहीं हुई थी। उसका प्राण पापियों के विषय में व्याकुल था। वह देश के लिये वेदना में थी। वह नहीं जानती थी कि उसे क्या हो गया है, परन्तु वह अधिकाधिक प्रार्थना करती रही, यहाँ तक कि ऐसा लगने लगा मानो उसकी वेदना उसकी देह को नष्ट कर देगी। अन्त में वह आनन्द से भर गई, और पुकार उठी, “परमेश्वर आ गया है! परमेश्वर आ गया है! इसमें कोई भूल नहीं, काम आरम्भ हो गया है, और सारे क्षेत्र में फैलता जा रहा है।” और सचमुच, काम आरम्भ हो गया, और उसके परिवार के लगभग सब लोगों का मन-परिवर्तन हो गया, और वह काम देश के उस सारे भाग में फैल गया। अब, क्या आप सोचते हैं कि वह स्त्री धोखे में थी? मैं आपसे कहता हूँ, नहीं। वह जानती थी कि वह प्रार्थना में परमेश्वर पर प्रबल हुई है। उसने प्राणों के लिये प्रसव-पीड़ा सही थी, और वह इसे जानती थी। उस क्षेत्र में मैं जितने उदाहरण जानता था, उनमें से यह केवल एक ही नहीं था, ऐसे बहुत से थे।

    साधारणतः धर्म का अंगीकार करनेवालों में से बहुत थोड़े ही प्रार्थना की उस आत्मा के विषय में कुछ जानते हैं जो परमेश्वर पर प्रबल होती है। मैं जागृतियों के विषय में प्रायः प्रकाशित होनेवाले ऐसे विवरण देखकर चकित हुआ हूँ, मानो जागृति बिना किसी कारण के आ गई हो—किसी को पता नहीं कि क्यों और किस कारण। मैंने कभी-कभी ऐसे मामलों की छानबीन की है; जब यह प्रचारित किया गया था कि किसी को इसके विषय में कुछ पता नहीं था, जब तक कि एक सब्त को उन्होंने मंडली के चेहरों पर न देखा कि परमेश्वर वहाँ है, या उन्होंने इसे अपने सभा-कक्ष में, या प्रार्थना-सभा में देखा, और वे परमेश्वर की उस रहस्यमय प्रभुता पर चकित हुए, कि उसने साधनों से किसी प्रत्यक्ष सम्बन्ध के बिना जागृति ला दी। अब मेरी बात ध्यान से सुनिए। जाइए और कलीसिया के गुमनाम सदस्यों के बीच पूछताछ कीजिए, और आप सदा पाएँगे कि कोई न कोई जागृति के लिये प्रार्थना करता रहा था, और उसकी आशा कर रहा था—कोई पुरुष या स्त्री पापियों के उद्धार के लिये प्रार्थना में वेदना सहता रहा था, जब तक उन्होंने आशीष प्राप्त न कर ली। हो सकता है उसने पादरी को और कलीसिया के अधिकांश लोगों को गहरी नींद में पाया हो, और वे अचानक जाग उठे हों, उस मनुष्य के समान जो अभी-अभी आँखें मलकर खोल रहा हो, और कमरे में इधर-उधर दौड़ता हुआ वस्तुओं को गिरा रहा हो, और आश्चर्य कर रहा हो कि यह सारी उत्तेजना कहाँ से आई। परन्तु चाहे थोड़े ही लोग इसे जानते हों, आप निश्चित रह सकते हैं कि कोई न कोई पहरे के गुम्मट पर रहा है; आशीष आने तक निरन्तर प्रार्थना में लगा रहा है। साधारणतः जागृति उतनी ही कम या अधिक व्यापक होती है, जितने कम या अधिक लोगों में प्रार्थना की आत्मा होती है। परन्तु इस समय मैं इस विषय पर और अधिक नहीं ठहरूँगा, क्योंकि प्रार्थना का विषय व्याख्यानों की इस श्रृंखला में फिर आएगा।

    4. एक और चिह्न कि जागृति की आशा की जा सकती है, यह है कि जब पादरियों का ध्यान विशेष रूप से इसी विशेष उद्देश्य की ओर लगा हो, और जब उनका प्रचार और उनके दूसरे प्रयत्न विशेष रूप से पापियों के मन-परिवर्तन को लक्ष्य करके किए जाते हों। ऐसा लगता है कि अधिकांश समय पादरियों के परिश्रम दूसरे उद्देश्यों की ओर लगे रहते हैं। वे पापियों का तुरन्त मन-परिवर्तन कराने के किसी विशेष अभिप्राय के बिना प्रचार और परिश्रम करते दिखाई देते हैं। और तब यह आशा करने की आवश्यकता नहीं कि उनके प्रचार के अधीन जागृति होगी। जब तक कोई इस उद्देश्य के लिये विशेष प्रयत्न न करे, तब तक जागृति कभी नहीं होगी। परन्तु जब किसी पादरी का ध्यान उसकी मंडली के परिवारों की दशा की ओर लगा हो, और उसका हृदय जागृति की आवश्यकता की भावना से भरा हो, और जब वह इस उद्देश्य के लिये उचित प्रयत्न करे, तब आप जागृति की आशा करने के लिये तैयार हो सकते हैं। जैसा मैंने पिछले सप्ताह समझाया था, जागृति के लिये साधनों के उचित उपयोग और जागृति के बीच का सम्बन्ध उतना ही वैज्ञानिक रूप से निश्चित है जितना अनाज उगाने के लिये साधनों के उचित उपयोग और गेहूँ की फ़सल के बीच। वास्तव में मेरा विश्वास है कि यह उससे भी अधिक निश्चित है, और इसमें असफलता के उदाहरण कम हैं। परिणाम का आना अधिक निश्चित है। आत्मिक बातों का सर्वोपरि महत्त्व इसे युक्तिसंगत बनाता है कि ऐसा ही हो। बाइबल को, विषय के स्वभाव को, और कलीसिया के इतिहास को सब मिलाकर लीजिए, और आप पाएँगे कि जागृति के लिये साधनों के उपयोग में खेती, या किसी भी दूसरे सांसारिक व्यवसाय की अपेक्षा कम असफलताएँ होती हैं। सांसारिक व्यवसाय में कभी-कभी ऐसे मामले होते हैं जहाँ विरोधी कारण मनुष्य के सारे किए-धरे को मिटा देते हैं। उदाहरण के लिये अनाज उगाने में ऐसे मामले होते हैं जो मनुष्य के वश से बाहर हैं, जैसे सूखा, कड़ा जाड़ा, कीड़े, इत्यादि। इसी प्रकार जागृति को बढ़ाने के परिश्रम में भी ऐसी बातें हो सकती हैं जो उसका विरोध करें, कोई न कोई बात उठ खड़ी हो जो जनता का ध्यान धर्म से हटा दे, और जो हर प्रयत्न को विफल कर दे। परन्तु मेरा विश्वास है कि प्राकृतिक जगत की अपेक्षा नैतिक जगत में ऐसे मामले कम होते हैं। मैंने बहुत कम किसी व्यक्ति को असफल होते देखा है, जब उसने परमेश्वर के वचन में बताई गई रीति से गम्भीरता के साथ जागृति बढ़ाने के साधनों का उपयोग किया। मेरा विश्वास है कि कोई मनुष्य जागृति बढ़ाने के काम में उतनी ही युक्तिसंगत सफलता की आशा के साथ लग सकता है, जितनी सफलता की आशा के साथ वह किसी भी दूसरे काम में लग सकता है; उसी आशा के साथ जो किसान को फ़सल की होती है जब वह अपना अनाज बोता है। मैंने कभी-कभी इसे ऐसी परिस्थितियों में आज़माया जाते और सफल होते देखा है जो कल्पना की जा सकनेवाली सबसे प्रतिकूल परिस्थितियाँ थीं।

    रॉचेस्टर की बड़ी जागृति ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में आरम्भ हुई जिनकी कल्पना करना भी कठिन है। ऐसा लगता था मानो शैतान ने जागृति के मार्ग में हर सम्भव बाधा डाल दी हो। तीनों कलीसियाओं में आपस में मनमुटाव था; एक का कोई पादरी नहीं था, एक में फूट पड़ी हुई थी और वह अपने पादरी को हटाने पर थी। तीसरी प्रेस्बिटेरियन कलीसिया के एक प्राचीन ने पहली कलीसिया के पास्टर पर अमसीही आचरण का आरोप लगाया था, और प्रेस्बिटरी के सामने उनका मुकदमा होनेवाला ही था। काम आरम्भ होने के बाद पहली बातों में से एक यह थी कि पत्थर का बड़ा गिरजाघर धँसक गया, और उससे भगदड़ मच गई। फिर कलीसियाओं में से एक ने ठीक उसी बीच अपने पादरी को हटा दिया। एक और कलीसिया लगभग टूट गई। और भी बहुत सी बातें हुईं, यहाँ तक कि ऐसा लगता था मानो शैतान ने ठान लिया हो कि वह जनता का ध्यान धर्म के विषय से हटा देगा। परन्तु प्रार्थना की आत्मा के कुछ असाधारण उदाहरण थे, जिन्होंने हमें निश्चय दिलाया कि परमेश्वर वहाँ है, और हम आगे बढ़ते गए: और शैतान ने जितना अधिक विरोध किया, प्रभु के आत्मा ने झण्डे को उतना ही ऊँचा और ऊँचा उठाया, यहाँ तक कि अन्त में उद्धार की एक लहर उस स्थान पर उमड़ पड़ी।

    5. धर्म की जागृति की आशा तब की जा सकती है जब मसीही एक दूसरे के सामने अपने पापों को मान लेने लगते हैं। दूसरे समयों में वे सामान्य ढंग से पाप मानते हैं, मानो वे केवल आधे मन से ऐसा कर रहे हों। वे इसे सुन्दर भाषा में कर सकते हैं, परन्तु उसका कोई अर्थ नहीं होता। परन्तु जब सच्चे मन से टूटना होता है, और अपने पापों को मान लेने में हृदय उण्डेल दिया जाता है, तब शीघ्र ही जल के फाटक खुल जाएँगे, और उद्धार उस स्थान पर बह निकलेगा।

    6. जागृति की आशा तब की जा सकती है जब कभी मसीही उसे आगे बढ़ाने के लिये आवश्यक त्याग करने को तैयार पाए जाएँ। उन्हें काम को आगे बढ़ाने में सहायता करने के लिये अपनी भावनाओं, अपने व्यवसाय, अपने समय का त्याग करने को तैयार रहना होगा। पादरियों को अपनी शक्ति लगा देने, और अपने स्वास्थ्य और प्राण को जोखिम में डालने को तैयार रहना होगा। उन्हें स्पष्ट और विश्वासयोग्य व्यवहार के द्वारा पश्चाताप न करनेवालों को अप्रसन्न करने, और सम्भवतः कलीसिया के ऐसे बहुत से सदस्यों को भी अप्रसन्न करने को तैयार रहना होगा जो काम में साथ नहीं आएँगे। उन्हें जागृति के पक्ष में दृढ़ता से खड़ा होना होगा, परिणाम चाहे जो हों। उन्हें काम में आगे बढ़ते रहने को तैयार रहना होगा, चाहे वे सब पश्चाताप न करनेवालों का, और कलीसिया के सारे ठण्डे भाग का स्नेह खो बैठें। यदि परमेश्वर की इच्छा हो, तो पादरी को उस स्थान से निकाल दिए जाने के लिये भी तैयार रहना होगा। उसे सीधे आगे बढ़ते जाने, और सारा परिणाम परमेश्वर पर छोड़ देने का दृढ़ निश्चय करना होगा।

    मैं एक पादरी को जानता था जिसके साथ एक जागृति में एक युवक परिश्रम कर रहा था। वह युवक काफ़ी स्पष्ट प्रचार करता था, और दुष्ट लोग उसे पसन्द नहीं करते थे। उन्होंने कहा, हमें अपना पादरी पसन्द है, और हम चाहते हैं कि वही प्रचार करे। अन्त में उन्होंने इतना कुछ कहा कि पादरी ने उस युवक से कहा, “श्रीमान अमुक, जो मेरे भरण-पोषण के लिये इतना देते हैं, ऐसा-ऐसा कहते हैं। श्रीमान क. भी ऐसा कहते हैं, और श्रीमान ख. भी ऐसा कहते हैं। वे सोचते हैं कि यदि आप प्रचार करते रहे तो संस्था टूट जाएगी, और मैं सोचता हूँ कि अच्छा होगा कि आप अब और प्रचार न करें।” वह युवक चला गया, परन्तु परमेश्वर का आत्मा तुरन्त उस स्थान से हट गया, और जागृति एकाएक रुक गई। पादरी ने दुष्टों की दुष्ट इच्छाओं के आगे झुककर उसे भगा दिया। उसे डर था कि शैतान उसे उसके लोगों से दूर भगा देगा, और शैतान को सन्तुष्ट करने का बीड़ा उठाकर उसने परमेश्वर को अप्रसन्न कर दिया। और परमेश्वर ने घटनाओं को ऐसा ठहराया कि थोड़े ही समय में आखिरकार उसे अपने लोगों को छोड़ना ही पड़ा। उसने शैतान और परमेश्वर के बीच चलने का प्रयत्न किया, और परमेश्वर ने उसे हटा दिया।

    लोगों को भी जागृति चाहने के लिये तैयार होना होगा, त्याग चाहे जो भी हो। उनके लिये यह कहना काम न देगा, “हम इतनी सभाओं में आने को तैयार हैं, परन्तु इससे अधिक में नहीं आ सकते।” या, “हम जागृति चाहने को तैयार हैं, यदि वह हमारे व्यवसाय के प्रबन्धों में बाधा न डाले, या हमें पैसा कमाने से न रोके।” मैं आपसे कहता हूँ, ऐसे लोगों में कभी जागृति नहीं होगी, जब तक वे कुछ भी करने, और कुछ भी त्यागने को तैयार न हों, जिसे परमेश्वर उनका कर्तव्य बताए। मसीही व्यापारियों को इस बात के लिये तैयार रहना चाहिए कि यदि जागृति को आगे बढ़ाने के लिये आवश्यक हो तो वे छः महीने के लिये अपनी दुकानों पर ताला लगा दें। मेरा यह कहना नहीं है कि ऐसी किसी बात की माँग है, या ऐसा करना उनका कर्तव्य है। परन्तु यदि भावना की ऐसी दशा हो जाए कि उसकी माँग हो, तो यह उनका कर्तव्य होगा, और उन्हें ऐसा करने को तैयार रहना चाहिए। यदि परमेश्वर बुलाए तो उन्हें ऐसा करने को तैयार रहना चाहिए, और यदि वे न करें तो वह सहज ही उनकी दुकानों को जलाकर राख कर सकता है। वास्तव में, मुझे न्यूयॉर्क में ऐसी जागृति देखकर दुःख न होगा, जो नगर के हर व्यापारी को वसन्त तक अपनी दुकान पर ताला लगाने और यह कहने को विवश कर दे कि उसने बहुत माल बेच लिया है, और अब वह अपना सारा समय पापियों को मसीह के पास ले आने में लगाएगा।

    7. जागृति की आशा तब की जा सकती है जब पादरी और धर्म का अंगीकार करनेवाले इस बात के लिये तैयार हों कि परमेश्वर जिन माध्यमों से चाहे उनके द्वारा उसे बढ़ाए। कभी-कभी पादरी जागृति नहीं चाहते, जब तक उसका प्रबन्ध उनके हाथ में न हो, या जब तक उसे बढ़ाने में उनकी भूमिका प्रमुखता से दिखाई न दे। वे परमेश्वर को निर्देश देना चाहते हैं कि वह किस बात का मार्गदर्शन करे और किसे आशीष दे, और किन मनुष्यों को आगे लाए। उन्हें कोई नए तरीके नहीं चाहिए। उन्हें यह ‘नई रोशनी’ वाला प्रचार, या ये सुसमाचार-प्रचारक जो देश भर में घूम-घूमकर प्रचार करते हैं, बिलकुल स्वीकार नहीं। उनके पास यह कहने को बहुत कुछ है कि परमेश्वर प्रभुतासम्पन्न है, और वह जागृतियों को अपने ही ढंग से और अपने ही समय पर लाएगा। परन्तु तब उसे ठीक उन्हीं के ढंग से लाना चुनना होगा, नहीं तो उनका उससे कोई लेना-देना नहीं होगा। ऐसे लोग बिना जागृति के तब तक सोते रहेंगे जब तक न्याय की तुरही उन्हें न जगा दे, जब तक वे इस बात के लिये तैयार न हों कि परमेश्वर अपने ही ढंग से आए—जब तक वे इस बात के लिये तैयार न हों कि कोई भी वस्तु या कोई भी व्यक्ति काम में लाया जाए, जिससे सबसे अधिक भलाई हो।

    8. ठीक-ठीक कहूँ तो जब ऊपर बताई गई बातें होती हैं, तो उसी मात्रा में जागृति पहले से विद्यमान होती है। सच तो यह है कि जब कभी जागृति की आवश्यकता हो, तब उसकी आशा की जानी चाहिए। यदि हमें जागृत किए जाने की आवश्यकता है तो जागृत होना हमारा कर्तव्य है। यदि यह कर्तव्य है तो यह सम्भव है, और हमें स्वयं जागृत होने में लग जाना चाहिए, और मसीह की इस प्रतिज्ञा पर भरोसा रखकर कि वह चेले बनाने में सदा और सर्वत्र हमारे साथ रहेगा, हमें सफलता की दृढ़ आशा के साथ मसीहियों को जागृत करने और पापियों का मन-परिवर्तन कराने के लिये परिश्रम करना चाहिए। इसलिये, जब कभी कलीसिया को जागृत किए जाने की आवश्यकता हो, तब उन्हें जागृत किए जाने, और पापियों को मसीह की ओर फिरते देखने की आशा करनी चाहिए, और वे कर भी सकते हैं। जब वे बातें दिखाई दें जिनका उल्लेख ऊपर के शीर्षकों के अन्तर्गत किया गया है, तो मसीही और पादरी उत्साहित हों और जान लें कि एक भला काम आरम्भ हो चुका है। उसे आगे बढ़ाइए।

    टिप्पणियाँ।

    1. भाइयो, आप हमारे विषय से बता सकते हैं कि यहाँ, इस कलीसिया में, और इस नगर में आपको जागृति की आवश्यकता है या नहीं; और आपके बीच जागृति होनेवाली है या नहीं। कलीसिया के प्राचीनो, पुरुषो, स्त्रियो, आप में से कोई भी, और आप सब—आप क्या कहते हैं?

    क्या आपको यहाँ जागृति की आवश्यकता है?

    क्या आप जागृति की आशा करते हैं?

    क्या आपके पास उसकी आशा करने का कोई कारण है?

    आपको इसके विषय में कोई धुंध फैलाने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि आप जानते हैं, या यदि चाहें तो जान सकते हैं, कि यहाँ जागृति की बाट जोहने का आपके पास कोई कारण है या नहीं।

    2. आप देखते हैं कि आपके बीच जागृति क्यों नहीं है। केवल इसलिये कि आप उसे चाहते ही नहीं। क्योंकि आप उसके लिये प्रार्थना नहीं कर रहे हैं; न उसके लिये चिन्तित हैं, न उसके लिये प्रयत्न कर रहे हैं। मैं आपके अपने विवेक से पूछता हूँ। क्या आप इस समय जागृति को बढ़ाने के लिये ये प्रयत्न कर रहे हैं? भाइयो, आप जानते हैं कि इस विषय में सच्चाई क्या है। क्या आप खड़े होकर यह कहेंगे कि आपने जागृति के लिये प्रयत्न किए और निराश हुए—कि आपने परमेश्वर की दोहाई दी, “क्या तू हम को फिर न जिलाएगा?” और परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया?

    3. क्या आप जागृति की इच्छा रखते हैं? क्या आप जागृति चाहेंगे? यदि परमेश्वर इसी क्षण स्वर्ग से सुनाई देनेवाली वाणी से आपसे पूछे, “क्या तुम जागृति चाहते हो?” तो क्या आप हाँ कहने का साहस करेंगे? “क्या तुम त्याग करने को तैयार हो?” तो क्या आप उत्तर देंगे, हाँ? “वह कब आरम्भ हो?” तो क्या आप उत्तर देंगे, वह आज रात आरम्भ हो—वह यहीं आरम्भ हो—वह मेरे हृदय में अभी आरम्भ हो? यदि आप आज रात उसकी वाणी सुनें, तो क्या आप परमेश्वर से ऐसा कहने का साहस करेंगे?

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