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बुद्धिमान पादरी सफल होगा
“जो आत्माओं को जीत लेता है, वह बुद्धिमान है।” नीतिवचन 11:30
पिछले शुक्रवार की शाम मैंने इसी पाठ से इस विषय पर प्रचार किया था कि साधारण मसीही लोग पापियों के साथ किस रीति से व्यवहार करें। इस समय मेरा उद्देश्य अनुग्रह के अधिक सार्वजनिक साधनों को लेना है, और विशेष रूप से इस बात के सम्बन्ध में कि
पादरियों के कर्तव्य क्या हैं।
जैसा मैंने अपने पिछले व्याख्यान में कहा था, बुद्धि का अर्थ है सबसे उत्तम लक्ष्य को चुनना और सबसे उपयुक्त साधनों के द्वारा उसे प्राप्त करने का यत्न करना। वह महान लक्ष्य, जिसके लिये मसीही सेवकाई ठहराई गई, यह है कि प्राणों के उद्धार के द्वारा परमेश्वर की महिमा हो। इस विषय पर बोलते हुए मैं यह दिखाना चाहता हूँ,
I. कि पादरी के कर्तव्यों को ठीक-ठीक पूरा करने के लिये बड़ी बुद्धि की आवश्यकता है।
II. कि अपने कर्तव्यों को पूरा करने में उसे जितनी सफलता मिलती है (यदि अन्य बातें समान हों), उसी से यह निर्णय होता है कि उसने अपने पद के कार्य में कितनी बुद्धि का प्रयोग किया है। I. मुझे यह दिखाना है कि पादरी के कर्तव्यों को ठीक-ठीक पूरा करने के लिये बड़ी बुद्धि की आवश्यकता है।
1. उस विरोध के कारण जिसका उसे सामना करना पड़ता है। जिस लक्ष्य के लिये सेवकाई ठहराई गई है, उसी के विरुद्ध स्वयं पापियों का सबसे प्रबल विरोध खड़ा है। यदि मनुष्य सुसमाचार को ग्रहण करने के लिये तैयार होते, और छुटकारे की कहानी सुना देने के सिवा और कुछ करने की आवश्यकता न होती, तो एक बालक भी यह समाचार पहुँचा सकता था। परन्तु मनुष्य सुसमाचार के विरोधी हैं। इस रीति से वे अपने ही उद्धार के विरोधी हैं। उनका विरोध प्रायः उग्र और दृढ़ होता है। मैंने एक बार एक पागल को देखा था जिसने अपने ही प्राण लेने की ठान ली थी, और अपनी इच्छा पूरी करने के लिये वह अत्यन्त चतुराई और धूर्तता से काम लेता था। वह ऐसी चालाकी करता कि उसके रखवाले यह मान लें कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है, कि उसने वह सब छोड़ दिया है, और वह बड़ा शान्त और संयमी दिखाई देता था, और जिस क्षण रखवाला असावधान होता, वह अपने ऊपर हाथ चला देता। इसी प्रकार पापी भी अपने उद्धार के लिये किए जानेवाले सब प्रयत्नों से बच निकलने में प्रायः बड़ी धूर्तता दिखाते हैं। और इस भयानक धूर्तता का सामना करने, और उस पर ऐसी विजय पाने के लिये कि मनुष्य बच जाएँ, पादरियों को बहुत अधिक बुद्धि की आवश्यकता है।
2. इस कार्य में जिन विशेष साधनों का प्रयोग करना ठहराया गया है, वे दिखाते हैं कि पादरियों में बड़ी बुद्धि का होना आवश्यक है। यदि मनुष्यों का मन-परिवर्तन किसी भौतिक सर्वशक्ति के कार्य से होता, जो कोई नई रुचि या ऐसी ही कोई वस्तु उत्पन्न कर देता, और यदि पवित्रीकरण केवल उसी भौतिक सर्वशक्ति का प्राण में से पाप की बची हुई जड़ों को उखाड़ फेंकना होता, तो आत्माओं को जीतने के लिये इतनी सूझ-बूझ और कौशल की आवश्यकता न होती। तब इस पाठ का भी कोई अर्थ न रहता। परन्तु सच तो यह है कि नया जन्म और पवित्रीकरण नैतिक साधनों के द्वारा होते हैं—तर्क के द्वारा, न कि बल के द्वारा। कभी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ और न कभी होगा जिसका उद्धार सत्य को छोड़ किसी और साधन के द्वारा हुआ हो। सत्य ही बाहरी साधन है, बाहरी प्रेरणा है, जो पहले मनुष्य के द्वारा और फिर पवित्र आत्मा के द्वारा प्रस्तुत की जाती है। स्वयं पापी के विरोध को ध्यान में रखिए, तो आप देखेंगे कि अन्ततः परमेश्वर की बुद्धि और पवित्र आत्मा की नैतिक सामर्थ से कम कोई भी वस्तु इस विरोध को तोड़कर उसे परमेश्वर के अधीन नहीं कर सकती। फिर भी साधनों का प्रयोग मनुष्यों को ही करना है, और ऐसे साधनों का जो लक्ष्य के अनुकूल हों, और जिनका प्रयोग कुशलता से किया जाए। परमेश्वर ने यह ठहराया है कि मन-परिवर्तन और पवित्रीकरण का कार्य हर दशा में उसी प्रकार के सत्य के द्वारा हो, जो उसी सन्दर्भ और सम्बन्ध में लागू किया जाए जो ऐसा परिणाम उत्पन्न करने के योग्य हो।
3. उसे पृथ्वी और नरक की शक्तियों पर विजय पानी है, और इसके लिये बुद्धि चाहिए। शैतान निरन्तर काम में लगा रहता है, पादरियों की सफलता को रोकने का यत्न करता है, धर्म के विषय से ध्यान हटाने का परिश्रम करता है, और पापी को परमेश्वर से दूर ले जाकर नरक की ओर ले जाने में लगा रहता है। समाज का लगभग सारा ढाँचा ही धर्म का शत्रु है। समाज की वर्तमान दशा में, पालने से लेकर कब्र तक मनुष्य को घेरे रहनेवाले लगभग सभी प्रभाव ऐसे हैं जो सेवकाई के उद्देश्य को विफल कर दें। तो क्या पापी के अपने विरोध के अतिरिक्त अन्धकार की शक्तियों और संसार के सारे प्रभाव से संघर्ष करने के लिये पादरी को बड़ी बुद्धि की आवश्यकता नहीं है?
4. यही बात स्वयं इस लक्ष्य के असीम महत्त्व से भी दिखाई देती है। सेवकाई का लक्ष्य प्राण का उद्धार है। जब हम इस लक्ष्य के महत्त्व और इस कार्य की कठिनाइयों पर विचार करते हैं, तो कौन है जो प्रेरित के साथ यह न कहेगा, “और इन बातों के योग्य कौन है?” 5. उसे यह समझना चाहिए कि कलीसिया को कैसे जगाए, और उसे पापियों के मन-परिवर्तन के मार्ग से कैसे हटाए। यह प्रायः पादरी के कार्य का सबसे कठिन भाग होता है, और इसमें किसी भी अन्य बात से अधिक बुद्धि और धीरज की आवश्यकता होती है। वास्तव में, इस कार्य को सफलता से कर पाना मसीही सेवकाई में एक अत्यन्त
दुर्लभ योग्यता है। यही वह बात है जिसमें लगभग सभी पादरी असफल हो जाते हैं। वे नहीं जानते कि कलीसिया को कैसे जगाएँ, और भक्ति के स्तर को कैसे ऊँचा उठाएँ, और इस प्रकार मन-परिवर्तन के कार्य के लिये मार्ग कैसे साफ़ करें। बहुत-से पादरी पापियों को बहुत अच्छा प्रचार कर सकते हैं, पर उन्हें थोड़ी ही सफलता मिलती है, क्योंकि कलीसिया का विरोधी प्रभाव उस सबका सामना करता है, और उनमें इतना कौशल नहीं होता कि वे इस कठिनाई को दूर कर सकें। पूरे देश में कहीं-कहीं ही कोई ऐसा पादरी मिलता है जो यह जानता हो कि जब कलीसिया ठण्डी और पीछे हटी हुई दशा में हो, तो उसकी ऐसी जाँच-पड़ताल कैसे करे कि वह प्रभावशाली रीति से जाग उठे और जागती रहे। कलीसिया के सदस्य इतनी ज्योति के विरुद्ध पाप करते हैं कि जब वे ठण्डे पड़ जाते हैं तो उन्हें जगाना बहुत कठिन होता है। उनमें भक्ति का एक ऐसा रूप होता है जो सत्य को दूर रखता है, और साथ ही वह ठीक उसी प्रकार की भक्ति होती है जिसमें न सामर्थ होती है न प्रभाव। ऐसे धर्म का अंगीकार करनेवालों को उनकी नींद से जगाना सबसे कठिन होता है। मेरा यह अर्थ नहीं कि वे सदा पश्चाताप न करनेवालों से अधिक दुष्ट होते हैं। वे प्रायः धर्म की मशीनरी के कामों में लगे रहते हैं, और बहुत अच्छे मसीही माने जाते हैं, परन्तु जागृति में वे किसी काम के नहीं होते।
मैं जानता हूँ कि पादरी कभी-कभी यह सुनकर चकित हो जाते हैं कि कलीसियाएँ जागी हुई नहीं हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि ऐसे पादरी नहीं जानते कि सोती हुई कलीसिया को कैसे जगाएँ। अभी उस दिन इसी नगर में एक युवा लाइसेंस-प्राप्त प्रचारक ने भाई फ़ुट को सत्य उण्डेलते और कलीसियाओं को जगाने का यत्न करते सुना, और वह इस विषय में इतना कम जानता था कि उसने सोचा कि यह कलीसियाओं का अपमान करना है। वह इतना पूरी तरह अन्धा था कि उसने सचमुच यह समझा कि न्यूयॉर्क की सब कलीसियाएँ धर्म के विषय में जागी हुई हैं। इसी प्रकार कुछ वर्ष पहले बड़ा वाद-विवाद और विरोध खड़ा हुआ था, क्योंकि कलीसियाओं के सोए होने के विषय में बहुत कुछ कहा गया था। वह सब सत्य था, फिर भी बहुत-से पादरी इसके विषय में कुछ नहीं जानते थे, और कलीसियाओं के विषय में ऐसी बातें कही जाती सुनकर चकित होते थे। जब यह दशा आ गई है कि पादरी यह भी नहीं जानते कि कलीसिया कब सोई हुई है, तो कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे यहाँ जागृतियाँ नहीं होतीं। एक बार मुझे किसी स्थान पर प्रचार करने के लिये बुलाया गया। मैंने पादरी से पूछा कि कलीसिया की दशा कैसी है। “ओह,” उसने कहा, “वे सब के सब जागे हुए हैं।” ऐसी कलीसिया में परिश्रम करने के विचार से मैं बहुत प्रसन्न हुआ, क्योंकि यह ऐसा दृश्य था जो मैंने अब तक कभी नहीं देखा था, कि जागृति में हर एक सदस्य जागा हुआ हो। परन्तु जब मैं वहाँ पहुँचा तो मैंने कलीसिया को ऊँघती हुई और ठण्डी पाया, और मुझे सन्देह है कि उनमें से एक भी जागा हुआ था।
जागृतियों को बनाए रखने में यही बड़ी कठिनाई है, कि कलीसिया को पूरी तरह जागा हुआ और काम में लगा हुआ रखा जाए। एक बात यह है कि कोई कलीसिया नींद में ही उठ खड़ी हो और शोर मचाती फिरे और एक-दूसरे पर गिरती-पड़ती रहे, और बिल्कुल दूसरी बात यह है कि उनकी आँखें खुली हों, उनके होश-हवास ठिकाने हों, और वे पूरी तरह जागे हुए हों, ताकि वे जानें कि परमेश्वर को कैसे पाएँ और मसीह के लिये कैसे काम करें।
5. उसे यह जानना चाहिए कि जब कलीसिया जाग जाए तो उसे काम में कैसे लगाए। यदि कोई पादरी अकेले ही काम करने लगे, और यह सोचे कि सब कुछ वह स्वयं ही कर लेगा, तो यह ऐसा है मानो कोई अकेले एक बड़े पत्थर को पहाड़ी पर लुढ़काकर चढ़ाने का प्रयत्न करे। कलीसिया जागृति को आगे बढ़ाने में बहुत सहायता कर सकती है। कलीसियाओं में कभी-कभी बिना किसी पादरी के भी सामर्थी जागृतियाँ हुई हैं। परन्तु जब किसी पादरी के पास ऐसी कलीसिया हो जो जागी हुई हो, और वह जानता हो कि उसे काम में कैसे लगाए, और पतवार पर बैठकर उसका मार्गदर्शन कैसे करे, तो वह अपने आप को बलवन्त अनुभव कर सकता है, और प्रायः वह पाएगा कि पापियों के मन-परिवर्तन में वे स्वयं उससे भी अधिक काम करते हैं।
6. सफल होने के लिये पादरी को यह जानने के लिये बड़ी बुद्धि चाहिए कि कलीसिया को काम में कैसे लगाए रखे। प्रायः कलीसिया बिल्कुल बच्चों के समान दिखाई देती है। आप बच्चों को काम पर लगाते हैं, और वे पूरी तरह उसमें लगे हुए दिखाई देते हैं, परन्तु जैसे ही आप पीठ फेरते हैं, वे रुक जाएँगे और खेलने लगेंगे। जागृति को जारी रखने की बड़ी कठिनाई यहीं है। और इसका सामना करने के लिये बड़ी बुद्धि की आवश्यकता है। यह जानना कि जब उनका मन इस कारण फूल उठे कि उनके यहाँ इतनी बड़ी जागृति हुई है, तो उन्हें फिर से कैसे दीन करें; जब उनका उत्साह ढीला पड़ने लगे तो उन्हें फिर से कैसे जगाएँ; उनके हृदयों को इस कार्य के लिये उत्साह से कैसे भरा रखें; ये संसार की सबसे कठिन बातों में से हैं। फिर भी यदि कोई पादरी आत्माओं को जीतने में सफल होना चाहता है, तो उसे यह जानना होगा कि वे कब घमण्ड करने लगते हैं, या कब प्रार्थना की आत्मा खोने लगते हैं, और कब उनकी जाँच-पड़ताल करनी है और उन्हें फिर से कैसे टटोलना है, और कलीसिया को प्रभु की फ़सल बटोरने के लिये खेत में कैसे लगाए रखना है।
7. उसे सुसमाचार को समझना चाहिए। परन्तु आप पूछेंगे, क्या सब पादरी सुसमाचार को नहीं समझते? मेरा उत्तर है कि निश्चय ही वे सब उसे एक-सा नहीं समझते, क्योंकि वे सब एक-सा प्रचार नहीं करते।
8. उसे यह जानना चाहिए कि उसे कैसे विभाजित करे, ताकि विशेष सत्यों को उसी क्रम में सामने लाए, और उन्हें उन्हीं बातों पर और ऐसे समयों पर लागू करे जो किसी निश्चित परिणाम को उत्पन्न करने के योग्य हों। पादरी को मानव मन के दर्शन को समझना चाहिए, ताकि वह जाने कि अपने परिश्रम की योजना और व्यवस्था बुद्धिमानी से कैसे करे। सत्य, जब मन पर लागू किया जाता है, तो वह अपने आप में उसके अनुरूप भावनाएँ उत्पन्न करने के योग्य होता है। पादरी को यह जानना चाहिए कि वह कौन-सी भावनाएँ उत्पन्न करना चाहता है, और ऐसा सत्य कैसे लागू करे जो उन भावनाओं को उत्पन्न करने के योग्य हो। उसे यह जानना चाहिए कि ऐसा सत्य कैसे प्रस्तुत करे जो मसीहियों को दीन करे, या उन्हें पापियों के लिये व्याकुल करे, या पापियों को जगाए, या उनका मन-परिवर्तन करे।
प्रायः, जब पापी जाग जाते हैं, तो वार के बाद उसे आगे बढ़ाने में बुद्धि की कमी के कारण सारी भूमि हाथ से निकल जाती है। सम्भव है कि एक झकझोर देनेवाला उपदेश दिया जाए, मसीही प्रभावित हों, और पापी कुछ अनुभव करने लगें, और अगले सब्त (विश्रामदिन) को कोई ऐसी बात सामने लाई जाए जिसका मण्डली की भावनाओं की दशा से कोई सम्बन्ध न हो, और जो मन को पश्चाताप, विश्वास या प्रेम के अभ्यास की ओर ले जाने के योग्य न हो। इससे दिखाई देता है कि यह कितना महत्त्वपूर्ण है कि पादरी यह समझे कि किसी निश्चित प्रभाव को कैसे उत्पन्न करे, यह किस समय किया जा सकता है और किया जाना चाहिए, और किस सत्य के द्वारा, और उसे कैसे आगे बढ़ाए, जब तक पापी टूटकर भीतर न आ जाए।
दिए गए बहुत-से अच्छे उपदेश यहाँ थोड़ी-सी बुद्धि की कमी के कारण व्यर्थ चले जाते हैं। वे अच्छे उपदेश होते हैं, और यदि ठीक समय पर दिए जाएँ तो बड़ी भलाई करने के योग्य होते हैं; परन्तु मण्डली की भावनाओं की वास्तविक दशा से उनका इतना कम सम्बन्ध होता है कि यदि वे जागृति उत्पन्न कर दें तो यह आश्चर्यकर्म से भी बढ़कर होगा। कोई पादरी इस बेतरतीब रीति से प्रचार करते-करते अपने आप को प्रचार करके मार डाले, फिर भी कभी कोई बड़ा परिणाम उत्पन्न न कर पाए। वह यहाँ-वहाँ कभी-कभार किसी बिखरे हुए प्राण का मन-परिवर्तन कर सकता है; परन्तु वह मण्डली के समूह को हिला नहीं सकेगा, जब तक वह यह न जाने कि अपने डाले हुए प्रभावों को आगे कैसे बढ़ाए, कार्य की एक योजना कैसे बनाए और उसे कैसे पूरा करे, ताकि जब कार्य आरम्भ हो जाए तो उसे आगे बढ़ा सके। उसे न केवल इतनी ज़ोर से तुरही फूँकने में समर्थ होना चाहिए कि पापी अपनी सुस्ती से चौंक उठे, परन्तु जब वह जाग जाए, तो उसे सबसे छोटे मार्ग से यीशु मसीह के पास ले जाना चाहिए। और ऐसा न हो कि जैसे ही किसी उपदेश से पापी जागें, वह तुरन्त किसी दूर के विषय पर प्रचार करने लगे जिसमें कार्य को आगे बढ़ाने की कोई प्रवृत्ति न हो।
10. पापियों के विभिन्न वर्गों तक सफलतापूर्वक पहुँचने के लिये पादरी की ओर से बड़ी बुद्धि की आवश्यकता है। उदाहरण के लिये, किसी विशेष विषय पर दिया गया उपदेश उसके सुननेवालों में से किसी विशेष वर्ग के लोगों को चौंका सकता है। सम्भव है वे गम्भीर दिखाई देने लगें, या उसके विषय में बातें करने लगें, या उस पर मीन-मेख निकालने लगें। अब, यदि पादरी बुद्धिमान है, तो वह इन संकेतों को पहचानना जानेगा, और इस वर्ग के अनुकूल उपदेशों के साथ सीधे आगे बढ़ता जाएगा, जब तक कि वह उन्हें परमेश्वर के राज्य में न ले आए। तब वह लौटकर किसी दूसरे वर्ग को ले, पता लगाए कि वे कहाँ छिपे हैं, उनके शरणस्थानों को ढा दे, और उनका पीछा करे, जब तक कि वह उन्हें परमेश्वर के राज्य में न ले आए। इस प्रकार उसे हर उस झाड़ी को टटोलना चाहिए जहाँ पापी छिपते हैं, जैसे परमेश्वर की वाणी ने वाटिका में आदम का पीछा किया था—“आदम, तू कहाँ है?” जब तक कि सुननेवालों का एक वर्ग के बाद दूसरा वर्ग भीतर न आ जाए, और इस प्रकार सारे समाज का मन-परिवर्तन न हो जाए। अब ऐसा करने के लिये पादरी को बहुत बुद्धिमान होना चाहिए। यह इस प्रकार तब तक कभी नहीं होगा, जब तक कोई पादरी अपनी मण्डली के पापियों के हर वर्ग को—बूढ़ों और जवानों, पुरुषों और स्त्रियों, धनियों और निर्धनों को—ढूँढ़ निकालने और भीतर लाने में न लग जाए।
11. पापियों के लिये नए छिपने के स्थान बनाए बिना उन्हें उनके वर्तमान झूठ के शरणस्थानों से निकाल लाने के लिये पादरी को बड़ी बुद्धि की आवश्यकता है। एक बार मैं एक ऐसे व्यक्ति की सेवकाई में बैठता था जिसके मन में कुपंथों के विषय में बड़ा भय समा गया था, और वह निरन्तर उनका खण्डन करने में लगा रहता था। और वह ऐसे बहुत-से कुपंथ सामने ले आता था जिनके विषय में उसके लोगों ने कभी सुना भी न था। उसे अपने विचार मुख्यतः पुस्तकों से मिलते थे, और वह लोगों के बीच बहुत कम मिलता-जुलता था कि जाने कि वे क्या सोचते हैं। और उसके परिश्रम का परिणाम प्रायः यह होता था कि लोग उसके विरुद्ध दिए गए तर्क की अपेक्षा उस कुपंथ से अधिक आकर्षित हो जाते थे। उस भ्रान्ति की नवीनता उनका ध्यान इतना खींच लेती थी कि वे उसका उत्तर भूल जाते थे। और इस रीति से उसने अपने बहुत-से लोगों को धर्म के विरुद्ध ऐसी नई आपत्तियाँ दे दीं जिनके विषय में उन्होंने पहले कभी सोचा भी न था। यदि कोई मनुष्य लोगों के बीच इतना मिलता-जुलता नहीं कि जाने कि आजकल लोग कैसे सोचते हैं, तो वह यह आशा नहीं कर सकता कि वह उनकी आपत्तियों और कठिनाइयों का सामना करने में बुद्धिमान होगा।
मैंने यूनिवर्सलिस्टों के विरुद्ध बहुत-सा ऐसा प्रचार सुना है जिसने भलाई से अधिक हानि की, क्योंकि प्रचारक यह नहीं समझते थे कि आज के यूनिवर्सलिस्ट किस प्रकार तर्क करते हैं। वे कभी यूनिवर्सलिस्टों के बीच मिले-जुले नहीं, और नहीं जानते कि वे आजकल क्या विश्वास करते हैं और कैसे तर्क करते हैं, परन्तु सार्वभौमिक-उद्धारवाद के विषय में जो कुछ वे जानते हैं वह सब उन्होंने उन पुस्तकों से पाया है जो बहुत पहले लिखी गई थीं, और जो अब स्वयं यूनिवर्सलिस्टों में पुरानी पड़ चुकी हैं। और इसका परिणाम यह होता है कि जब वे सार्वभौमिक-उद्धारवाद के विरुद्ध प्रचार करने का प्रयत्न करते हैं, तो वे घास-फूस के पुतले का विरोध करते हैं, न कि यूनिवर्सलिस्टों के उन विचारों का जो आज समाज में पाए जाते हैं। और लोग या तो उन पर हँसते हैं, या कहते हैं कि यह सब झूठ है, क्योंकि वे जानते हैं कि यूनिवर्सलिस्ट ऐसे विचार नहीं रखते जैसे प्रचारक उनके सिर मढ़ता है।
जब पादरी किसी वर्तमान कुपंथ का विरोध करने चलें, तो उन्हें यह जानना चाहिए कि वर्तमान में वह क्या है। उदाहरण के लिये, सार्वभौमिक-उद्धारवाद के विरुद्ध लिखने और प्रचार करनेवाले लगभग सभी लोग यह सोचते हैं कि उन्हें इस विचार का विरोध करना है कि परमेश्वर केवल दया ही दया है। वे मानते हैं कि यूनिवर्सलिस्ट यह सिद्धान्त रखते हैं कि परमेश्वर केवल दया ही दया है, और जब उन्होंने इस सिद्धान्त का खण्डन कर दिया, तो उन्होंने यूनिवर्सलिस्टों को पछाड़ दिया। परन्तु यह सच नहीं है। वे ऐसा सिद्धान्त नहीं रखते। वे इसका पूरी तरह इन्कार करते हैं। वे मनुष्यों के उद्धार में दया के विचार को अस्वीकार करते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि हर एक मनुष्य को उसके उचित कर्मों के अनुसार पूरा-पूरा दण्ड मिलता है। तो फिर यूनिवर्सलिस्टों के विरुद्ध यह तर्क करने से क्या लाभ कि परमेश्वर न्याय का परमेश्वर है, न कि केवल दया ही दया का परमेश्वर, जबकि वे उद्धार के आधार के रूप में केवल परमेश्वर के न्याय को ही मानते हैं, और दया के विचार को बिल्कुल स्वीकार नहीं करते? इसी प्रकार, मैंने लोगों को इस विचार के विरुद्ध प्रचार करते सुना है कि मनुष्य अपने पापों में रहते हुए उद्धार पाते हैं, और वे समझते थे कि वे यूनिवर्सलिस्ट सिद्धान्त का खण्डन कर रहे हैं। यूनिवर्सलिस्ट ऐसी किसी बात पर विश्वास नहीं करते। वे यह विश्वास करते हैं कि सब मनुष्य पवित्र बनाए जाएँगे और इसी रीति से उद्धार पाएँगे। इससे दिखाई देता है कि लोगों को उनकी भ्रान्तियों से तर्क के द्वारा निकालने का प्रयत्न करने से पहले यह जानना कितना महत्त्वपूर्ण है कि वे वास्तव में क्या मानते हैं। किसी मनुष्य के सिद्धान्तों को उसके सामने ही गलत रूप में प्रस्तुत करके फिर उसे तर्क द्वारा उनसे निकालने का प्रयत्न करना किसी काम का नहीं। आपको उसका सिद्धान्त ठीक वैसा ही बताना चाहिए जैसा वह उसे मानता है, और उसके तर्कों को ईमानदारी से प्रस्तुत करना चाहिए। अन्यथा, यदि आप उन्हें गलत रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो या तो आप उसे क्रोधित कर देते हैं, या जो लाभ आप उसे दे देते हैं उस पर वह मन ही मन हँसता है। वह कहेगा, वह मनुष्य उचित आधार पर मुझसे तर्क नहीं कर सकता; मेरा खण्डन करने के लिये उसे हमारे सिद्धान्तों को गलत रूप में प्रस्तुत करना पड़ता है। इस रीति से बड़ी हानि होती है। पादरी अपने विरोधियों को गलत रूप में प्रस्तुत करना नहीं चाहते; परन्तु इसका परिणाम यह होता है कि जो बेचारे अभागे प्राणी इन भ्रान्तियों को मानते हैं वे नरक में जाते हैं, क्योंकि पादरी इस बात की जानकारी प्राप्त करने की चिन्ता नहीं करते कि उनकी वास्तविक भ्रान्तियाँ क्या हैं। ऐसी प्रक्रिया से भ्रान्तियाँ कभी उखाड़ी नहीं जातीं। मैं ये उदाहरण यह दिखाने के लिये देता हूँ कि सामने आनेवाली परिस्थितियों का सामना करने के लिये पादरी में कितनी बुद्धि होनी चाहिए। मनुष्यों का सामना करने, और उनकी भ्रान्तियों और गलतियों को दूर करने के लिये उसे उनके वास्तविक विचारों से परिचित होना चाहिए।
12. पादरियों को यह जानना चाहिए कि कौन-से तरीके उनके पद के महान लक्ष्य, अर्थात् प्राणों के उद्धार, को पूरा करने में सहायता देने के लिये सबसे अधिक उपयुक्त हैं। कुछ तरीके स्पष्ट रूप से आवश्यक हैं। तरीकों से मेरा अर्थ है कि लोगों का ध्यान खींचने और उन्हें सत्य सुनने के लिये लाने के लिये कौन-कौन से काम किए जाने चाहिए। आराधना के लिये भवन बनाना, और घर-घर जाकर भेंट करना, इत्यादि, सब “तरीके” हैं, जिनका उद्देश्य लोगों का ध्यान सुसमाचार की ओर खींचना है। उन सब विभिन्न तरीकों को सोचने और आगे बढ़ाने के लिये, जो सुसमाचार की सफलता में सहायक होने के योग्य हैं, बहुत बुद्धि की आवश्यकता है।
राजनीतिज्ञ क्या करते हैं? वे सभाएँ आयोजित करते हैं; परचे और पुस्तिकाएँ बँटवाते हैं; समाचार-पत्रों में धुआँधार लिखते हैं; झण्डों और नाविकों के साथ पहियों पर चलनेवाले अपने जहाज़ सड़कों पर घुमाते हैं; लोगों को मतदान-केन्द्रों तक लाने के लिये परचों के साथ सारे नगर में गाड़ियाँ भेजते हैं—यह सब अपने पक्ष की ओर ध्यान खींचने और अपने उम्मीदवार को चुनवाने के लिये। ये सब उनके “तरीके” हैं, और अपने लक्ष्य के लिये वे बुद्धिमानी से सोचे गए हैं। उद्देश्य उत्तेजना उत्पन्न करना और लोगों को बाहर निकालना है। वे जानते हैं कि जब तक उत्तेजना उत्पन्न न हो, अपने लक्ष्य को आगे बढ़ाना व्यर्थ है। मेरा यह कहने का अर्थ नहीं कि उनके तरीके भक्तिपूर्ण या उचित हैं, परन्तु केवल यह कि वे इस अर्थ में बुद्धिमानी के हैं कि वे लक्ष्य के लिये साधनों का उपयुक्त प्रयोग हैं।
सेवकाई का उद्देश्य यह है कि सब लोग यह अनुभव करें कि शैतान को इस संसार पर राज्य करने का कोई अधिकार नहीं, परन्तु उन सब को अपने आप को परमेश्वर को सौंप देना चाहिए, और प्रभु यीशु मसीह को विश्व के शासक के रूप में चुनने के लिये अपना मत देना चाहिए। अब क्या किया जाए? हम कौन-से तरीके अपनाएँ? कोई कहता है, “ध्यान रहे, कोई भी नई बात न हो।” विचित्र बात है! हमारे तरीकों का उद्देश्य ध्यान खींचना है, और इसके लिये आपके पास कोई नई बात होनी ही चाहिए। जैसे ही किसी तरीके का प्रभाव एक घिसा-पिटा ढर्रा बन जाता है, निश्चय ही वह ध्यान खींचना बन्द कर देता है, और तब आपको कोई नई बात आज़मानी पड़ती है। आपको हर बात में नवीनता लाने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु जब कभी परिस्थिति ऐसी हो कि कुछ और की आवश्यकता हो, तो वह कोई नई बात ही होनी चाहिए, अन्यथा वह विफल होगी। पादरी को कभी ऐसी नवीनताएँ नहीं लानी चाहिए जिनकी आवश्यकता न हो। यदि वह ऐसा करे तो वे उसके लिये उलझन बन जाएँगी। वह सुसमाचार को नहीं बदल सकता; वह तो वैसा ही बना रहता है। परन्तु समय-समय पर ध्यान जगाने और सुसमाचार को जन-मानस पर लागू करने के लिये नए तरीके आवश्यक होते हैं। और फिर पादरी को यह जानना चाहिए कि नई बातों को इस प्रकार कैसे लाए कि कम से कम विरोध या प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। मनुष्य धर्म में बाहरी रीति को पसन्द करते हैं। वे चाहते हैं कि उनके धार्मिक कर्तव्य एक बँधे-बँधाए ढर्रे में हों, ताकि वे निश्चिन्त रह सकें; और इसलिये वे हर ऐसी नई गतिविधि का विरोध करने की ओर झुकते हैं जिसका उद्देश्य उन्हें कार्य और भावना के लिये जगाना हो। इसलिये यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि नई बातें बुद्धिमानी से लाई जाएँ, ताकि विरोध के लिये अनावश्यक अवसर या बहाना न दिया जाए।
13. कभी-कभी पादरी को यह जानने के लिये भी कम बुद्धि की आवश्यकता नहीं होती कि नए तरीकों को कब रोका जाए। जब किसी तरीके में इतनी नवीनता हो कि वह सत्य की ओर ध्यान खींच सके, तो साधारणतः कोई और नया तरीका नहीं लाना चाहिए। आपने नवीनता का बड़ा उद्देश्य प्राप्त कर लिया है। इससे अधिक कुछ भी करने में यह जोखिम है कि वह जन-मानस को उस महान उद्देश्य से हटाकर स्वयं तरीकों पर ही टिका दे। और फिर, यदि आप बिना आवश्यकता के नवीनताएँ लाते हैं, तो आप इतने बड़े क्षेत्र पर से गुज़र जाएँगे कि आगे चलकर जब आपको सचमुच किसी नई बात की आवश्यकता होगी, तो आपके पास लाने के लिये और कुछ न होगा, जब तक आप कोई ऐसा काम न करें जो जन-मानस को बहुत बड़ा धक्का पहुँचाए। बाइबल ने धर्म की जागृतियों को बढ़ाने के लिये तरीकों का कोई निश्चित क्रम नहीं ठहराया है, परन्तु इसे पादरियों पर छोड़ दिया है कि वे ऐसे तरीके अपनाएँ जो लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये बुद्धिमानी से सोचे गए हों। और हम अपनी नई बातों के विषय में जितनी अधिक किफ़ायत करेंगे, उतने ही अधिक समय तक हम उनका प्रयोग कर सकेंगे, ताकि धर्म के महान विषय की ओर जनता का ध्यान जागा रहे। बुद्धिमानी की रीति अपनाने से निस्सन्देह यह बहुत वर्षों तक किया जा सकता है, यहाँ तक कि आगे चलकर हमारे वर्तमान तरीकों में फिर से इतनी नवीनता आ जाएगी कि वे जनता का ध्यान खींचकर उसे टिका सकें। और इस प्रकार हमें कभी किसी नई बात की कमी न होगी।
14. आत्माओं को जीतने के लिये पादरी को यह जानना चाहिए कि लापरवाह, जागे हुए, और चिन्तित पापियों के साथ कैसा व्यवहार करे, ताकि उन्हें सबसे छोटे और सबसे सीधे मार्ग से ठीक मसीह के पास ले जाए। यह देखकर आश्चर्य होता है कि कितने ही ऐसे पादरी हैं जो नहीं जानते कि पापियों के साथ कैसा व्यवहार करें, या उनके मन की विभिन्न दशाओं में उनसे क्या कहें। अल्बानी की एक भली स्त्री ने मुझे बताया कि जब वह चिन्ता में थी तो वह अपने पादरी के पास गई और उससे पूछा कि छुटकारा पाने के लिये उसे क्या करना चाहिए। और उसने कहा कि परमेश्वर ने उसे इस विषय में अधिक अनुभव नहीं दिया है, और उसे सलाह दी कि वह अमुक डीकन के पास जाए, जो शायद उसे बता सके कि क्या करना चाहिए। सच्चाई यह थी कि वह नहीं जानता था कि पाप का बोध पाए हुए पापी से क्या कहे, यद्यपि उसके मामले में कोई विशेष बात नहीं थी। अब यदि आप सोचते हैं कि यह पादरी एक दुर्लभ उदाहरण है, तो आप बड़े धोखे में हैं। बहुत-से पादरी हैं जो नहीं जानते कि पापियों से क्या कहें।
एक बार एक पादरी ने चिन्तित खोजियों की सभा ठहराई, और उसमें उपस्थित होने गया, और एक-एक व्यक्ति के पास जाने के बदले, वह उनसे प्रश्नोत्तरी पूछने लगा, “मसीह याजक का पद किस प्रकार निभाता है?” उनमें से बहुतों के मन के लिये यह लगभग उतना ही प्रासंगिक था जितनी कोई और बात।
मैं एक ऐसे पादरी को जानता हूँ जिसने चिन्तित खोजियों की सभा रखी, और उसमें एक लिखित प्रवचन लेकर गया जो उसने उस अवसर के लिये तैयार किया था। यह ठीक उतनी ही बुद्धिमानी थी जितनी यह होती कि कोई चिकित्सक अपने रोगियों को देखने निकलते समय आराम से बैठकर उन्हें देखने से पहले ही सारे नुस्खे लिख डाले। इससे पहले कि पादरी यह जान सके कि कौन-सा सत्य देना उचित और उपयोगी होगा, उसे व्यक्तियों के मन की दशा जाननी चाहिए। मैं ये बातें इसलिये नहीं कहता कि मुझे ऐसा कहना अच्छा लगता है, परन्तु इसलिये कि सत्य और मेरे सामने का उद्देश्य यह माँग करते हैं कि ये कही जाएँ। और जैसे उदाहरण मैंने बताए हैं, वे किसी भी रीति से दुर्लभ नहीं हैं।
पादरी को यह जानना चाहिए कि उन सब परिस्थितियों में सत्य को कैसे लागू करे जिनमें वह नरक की ओर जाते हुए मरते पापियों को पाए। उसे यह जानना चाहिए कि प्रचार कैसे करे, प्रार्थना कैसे करे, प्रार्थना-सभाओं का संचालन कैसे करे, और परमेश्वर के सत्य को अन्धकार के राज्य पर लागू करने के लिये सब साधनों का प्रयोग कैसे करे। क्या इसके लिये बुद्धि की आवश्यकता नहीं? और इन बातों के योग्य कौन है?
II. आत्माओं को जीतने में पादरी को जितनी सफलता मिलती है (यदि अन्य बातें समान हों), उसी से सदा यह निर्णय होता है कि उसने अपने पद के कर्तव्यों को पूरा करने में कितनी बुद्धि का प्रयोग किया है।
1. यह बात इस पाठ में स्पष्ट रूप से कही गई है। “जो आत्माओं को जीत लेता है, वह बुद्धिमान है।” अर्थात्, यदि कोई मनुष्य आत्माओं को जीतता है, तो वह सचमुच साधनों को कुशलता से लक्ष्य के अनुकूल बनाता है, और यही बुद्धि का प्रयोग करना है। जितने अधिक पापियों को वह बचाता है, वह उतना ही अधिक बुद्धिमान है। यह सच है कि कोई मूर्ख भी कभी-कभार संयोग से किसी ऐसे सत्य पर, या उसे प्रस्तुत करने की किसी ऐसी रीति पर पहुँच सकता है जिससे किसी प्राण का उद्धार हो जाए। यदि किसी पादरी के उपदेशों में कभी-कभी कोई ऐसी बात न हो जो किसी व्यक्ति की दशा पर ठीक बैठे, तो यह सचमुच आश्चर्य की बात होगी। परन्तु बुद्धि की मात्रा का निर्णय, “यदि अन्य बातें समान हों,” उन मामलों की संख्या से होना चाहिए जिनमें वह पापियों का मन-परिवर्तन करने में सफल होता है।
एक चिकित्सक का उदाहरण लीजिए। न्यूयॉर्क का सबसे बड़ा नीम-हकीम भी कभी-कभार संयोग से कोई असाधारण इलाज कर बैठता है, और इस प्रकार अनपढ़ लोगों में उसका नाम हो जाता है। परन्तु समझदार और विवेकी लोग किसी चिकित्सक के कौशल का निर्णय इस बात से करते हैं कि रोग पर विजय पाने में उसकी सफलता कितनी लगातार है, वह कितने प्रकार के रोगों को सम्भाल सकता है, और कितने मामलों में वह अपने रोगियों को बचाने में सफल होता है। जो सबसे अधिक कुशल है, वही सबसे अधिक को बचाता है। यह सामान्य समझ की बात है। यह सत्य है। और प्राणों को बचाने में सफलता के विषय में भी यह ठीक उतना ही सत्य है, और ठीक उसी अर्थ में सत्य है।
2. यह सिद्धान्त केवल इस पाठ में कहा ही नहीं गया है, परन्तु यह एक तथ्य है, एक ऐतिहासिक सत्य है, कि “जो आत्माओं को जीत लेता है, वह बुद्धिमान है।” उसने वास्तव में ऐसे साधनों का प्रयोग किया है जो लक्ष्य के अनुकूल थे, और इस प्रकार किया है कि लक्ष्य प्राप्त हो जाए।
3. प्राणों को बचाने में सफलता इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य सुसमाचार को समझता है, और मानव स्वभाव को समझता है, कि वह जानता है कि साधनों को अपने लक्ष्य के अनुकूल कैसे बनाए, कि उसमें सामान्य समझ है, और उसमें वह व्यवहार-कुशलता, वह व्यावहारिक विवेक है, जिससे वह जानता है कि लोगों तक कैसे पहुँचे। और यदि उसकी सफलता व्यापक है, तो यह दिखाता है कि वह जानता है कि बहुत-सी विभिन्न परिस्थितियों में बहुत-से विभिन्न स्वभाव के लोगों के साथ, जो फिर भी सब परमेश्वर के शत्रु हैं, कैसा व्यवहार करे, और उन्हें मसीह के पास कैसे लाए। ऐसा करने के लिये बड़ी बुद्धि चाहिए। और जो पादरी ऐसा करता है, वह दिखाता है कि वह बुद्धिमान है।
4. आत्माओं को जीतने में सफलता यह दिखाती है कि पादरी न केवल यह जानता है कि उस लक्ष्य के लिये बुद्धिमानी से परिश्रम कैसे करे, परन्तु यह भी जानता है कि उसका भरोसा किस पर है। आप जानते हैं कि जो पादरी सबसे सीधे और सबसे लगन से पापियों के मन-परिवर्तन का लक्ष्य रखते हैं, उनके विषय में प्रायः आशंकाएँ प्रकट की जाती हैं। लोग कहते हैं, “अरे, यह मनुष्य तो अपने ही बल पर काम करने जा रहा है; कोई भी सोचेगा कि वह समझता है कि वह स्वयं ही मन-परिवर्तन कर सकता है।” कितनी ही बार परिणाम ने यह दिखाया है कि वह मनुष्य भली-भाँति जानता है कि वह क्या कर रहा है, और यह भी जानता है कि उसका बल कहाँ है। वह पापियों का मन-परिवर्तन करने के काम में इतनी लगन से लगा, मानो वह सब कुछ स्वयं ही कर सकता हो; परन्तु उसे ठीक इसी रीति से करना चाहिए था। उसे पापियों के साथ तर्क करना चाहिए, और उनसे विनती करनी चाहिए, इतनी विश्वासयोग्यता और पूर्णता से मानो वह परमेश्वर के आत्मा के किसी हस्तक्षेप की आशा ही न करता हो, या मानो वह जानता हो कि पवित्र आत्मा है ही नहीं। परन्तु जब कभी कोई मनुष्य ऐसा सफलतापूर्वक करता है, तो इससे दिखाई देता है कि अन्ततः वह जानता है कि सफलता के लिये उसे केवल परमेश्वर के आत्मा पर ही निर्भर रहना है।
आपत्ति।—बहुत-से लोग ऐसे हैं जो यीशु मसीह की सेवकाई के विषय में अपने दृष्टिकोण के कारण इस विषय पर आपत्ति अनुभव करते हैं। वे हमसे पूछते हैं, “यीशु मसीह की सेवकाई के विषय में आप क्या कहेंगे, क्या वह बुद्धिमान नहीं था?” मेरा उत्तर है, हाँ, असीम रूप से बुद्धिमान। परन्तु पापियों के मन-परिवर्तन में उसकी तथाकथित असफलता के विषय में, आप निम्नलिखित बातों पर ध्यान देंगे:
(1.) कि उसकी सेवकाई साधारणतः जितनी समझी जाती है उससे कहीं अधिक सफल थी। हम पवित्र लेखकों में से एक के लेख में पढ़ते हैं कि अपने पुनरुत्थान के बाद और स्वर्गारोहण से पहले “वह पाँच सौ से अधिक भाइयों को एक साथ दिखाई दिया।” यदि पाँच सौ जितने भाई एक ही स्थान पर एक साथ इकट्ठे पाए गए, तो हम देखते हैं कि देश भर में उनकी एक बड़ी संख्या बिखरी हुई रही होगी।
(2.) ध्यान देने योग्य एक और बात यह है कि उसकी सार्वजनिक सेवकाई बहुत छोटी थी, तीन वर्ष से भी कम।
(3.) उसकी सेवकाई के विशेष उद्देश्य पर विचार कीजिए। उसका मुख्य उद्देश्य संसार के पापों के लिये प्रायश्चित करना था। इसका लक्ष्य उतना जागृतियों को बढ़ाना नहीं था। “आत्मा का प्रबन्ध” अभी दिया नहीं गया था। उसने सुसमाचार का प्रचार उतनी पूर्णता से नहीं किया जितना उसके प्रेरितों ने बाद में किया। लोगों के पूर्वाग्रह इतने दृढ़ और उग्र थे कि वे उसे सह न सकते थे। कि उसने ऐसा नहीं किया, यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि उसके प्रेरित भी, जो निरन्तर उसके साथ रहते थे, प्रायश्चित को नहीं समझते थे। उनकी समझ में यह बात नहीं आई थी कि वह मरने जा रहा है, और परिणामस्वरूप, जब उन्होंने सुना कि वह सचमुच मर गया है, तो वे निराशा में डूब गए, और सोचने लगे कि सब कुछ समाप्त हो गया, और उनकी आशाएँ हवा में उड़ गईं। सच तो यह था कि उसके सामने एक और उद्देश्य था, जिसके आगे बाकी हर बात को झुकना पड़ा, और जन-मानस की बिगड़ी हुई दशा और फैले हुए हठीले पूर्वाग्रह यह दिखाते थे कि पापियों के मन-परिवर्तन में अधिक परिणाम क्यों नहीं दिखाई दिए। जनमत की दशा ऐसी थी कि अन्त में उन्होंने उसे उसी बात के लिये मार डाला जिसका उसने प्रचार किया। बहुत-से पादरी, जिन्हें थोड़ी या कोई सफलता नहीं मिलती, यीशु मसीह की सेवकाई के पीछे ऐसे छिपते हैं मानो वह एक असफल प्रचारक था। जबकि वास्तव में, जिन परिस्थितियों में उसने परिश्रम किया उन्हें ध्यान में रखते हुए, वह अत्यन्त सफल था। सारे संसार में यही अन्तिम स्थान है जहाँ किसी असफल पादरी को छिपने की बात सोचनी चाहिए।
टिप्पणियाँ।
1. कोई पादरी बहुत विद्वान हो सकता है और फिर भी बुद्धिमान न हो। बहुत-से पादरी बड़ी विद्या रखते हैं; वे सब विज्ञानों को—भौतिक, नैतिक, और धर्मवैज्ञानिक—समझते हैं; वे मृत भाषाएँ जानते हों, और सारी विद्या रखते हों, फिर भी उस महान लक्ष्य के सम्बन्ध में बुद्धिमान न हों जिसमें वे मुख्य रूप से लगे हुए हैं। तथ्य इसे स्पष्ट रूप से प्रमाणित करते हैं। “जो आत्माओं को जीत लेता है, वह बुद्धिमान है।”
2. एक असफल पादरी भक्त और विद्वान दोनों हो सकता है, और फिर भी बुद्धिमान न हो। यह निष्कर्ष निकालना अनुचित है कि क्योंकि कोई पादरी असफल है, इसलिये वह कपटी है। उसकी शिक्षा में, या किसी विषय को देखने या उसे प्रस्तुत करने की उसकी रीति में कोई कमी हो सकती है, या सामान्य समझ की ऐसी कमी हो सकती है जो उसके परिश्रम को विफल कर दे, और आत्माओं को जीतने में उसकी सफलता को रोक दे, जबकि वह स्वयं उद्धार पा सकता है—“परन्तु जलते जलते।”
3. कोई पादरी विद्वान न होने पर भी बहुत बुद्धिमान हो सकता है। सम्भव है वह मृत भाषाएँ न समझता हो, या साधारण अर्थ में धर्मविज्ञान न जानता हो; फिर भी बहुत-सी अन्य बातें जाने बिना वह ठीक वही जानता हो जो सुसमाचार के सेवक को सबसे अधिक जानने की आवश्यकता है। विद्वान पादरी और बुद्धिमान पादरी दो भिन्न बातें हैं। सब युगों में कलीसिया के इतिहास के तथ्य इसे प्रमाणित करते हैं। कलीसियाओं में यह बहुत सामान्य है कि जब वे पादरी की खोज में होती हैं, तो किसी बहुत विद्वान मनुष्य को पाने का लक्ष्य रखती हैं। यह न समझिए कि मैं विद्या को तुच्छ ठहराता हूँ। जितनी अधिक विद्या हो उतना अच्छा, यदि वह उस महान कार्य में भी बुद्धिमान हो जिसमें वह लगा हुआ है। यदि कोई पादरी आत्माओं को जीतना जानता है, तो उसके पास जितनी अधिक विद्या हो उतना ही अच्छा। परन्तु यदि उसके पास किसी और प्रकार की विद्या हो, और यह न हो, तो वह निश्चय ही अपनी सेवकाई के लक्ष्य में विफल होगा।
4. पादरी में सफलता की कमी (यदि अन्य बातें समान हों) यह प्रमाणित करती है, (1.) या तो यह कि उसे प्रचार करने के लिये कभी बुलाया ही नहीं गया था, और उसने अपने ही मन से यह काम उठा लिया है; या (2.) यह कि उसकी शिक्षा बुरी तरह हुई, और उसे वे बातें कभी सिखाई ही नहीं गईं जिन्हें जानने की उसे सबसे अधिक आवश्यकता है; या (3.) यदि उसे प्रचार करने के लिये बुलाया गया था, और वह अपना कर्तव्य करना जानता है, तो वह उसे करने के लिये बहुत आलसी और बहुत दुष्ट है।
5. सबसे अच्छी शिक्षा पाए हुए पादरी वे हैं जो सबसे अधिक आत्माओं को जीतते हैं। कभी-कभी पादरियों को नीची दृष्टि से देखा जाता है, और उन्हें बहुत अज्ञानी कहा जाता है, क्योंकि वे विज्ञान और भाषाएँ नहीं जानते; यद्यपि वे उस महान बात से कदापि अनजान नहीं हैं जिसके लिये सेवकाई ठहराई गई है। यह गलत है। विद्या महत्त्वपूर्ण है, और सदा उपयोगी है। परन्तु अन्ततः, कोई पादरी बड़ी विद्या के बिना भी यह जान सकता है कि प्राणियों को मसीह के लिये कैसे जीते, और पादरी के लिये सबसे अच्छी शिक्षा उसी की है जो सबसे अधिक प्राणियों को मसीह के लिये जीत सकता है।
6. पादरियों को शिक्षा देने की वर्तमान रीति में स्पष्ट रूप से एक बड़ी कमी है। यह एक गम्भीर तथ्य है, जिसकी ओर सारी कलीसिया का ध्यान स्पष्ट रूप से दिलाया जाना चाहिए; कि शिक्षा पाए हुए युवा पादरियों का बड़ा समूह बहुत थोड़ा ही कर पाता है। जब युवक सेमिनरियों से निकलते हैं, तो क्या वे किसी जागृति में जाने के योग्य होते हैं? किसी ऐसे स्थान को देखिए जहाँ जागृति चल रही हो, और एक पादरी की आवश्यकता हो। वे किसी धर्मवैज्ञानिक सेमिनरी को पादरी के लिये लिखें। क्या वह कार्य में प्रवेश करके उसे सम्भाले रखेगा, और आगे बढ़ाएगा? शायद ही कभी। शाऊल के हथियार पहने हुए दाऊद के समान, वह धर्मविज्ञान के ऐसे आडम्बरी बोझ से लदा हुआ आता है कि वह कुछ नहीं जानता कि क्या करे। उसे वहाँ दो सप्ताह के लिये छोड़ दीजिए, और जागृति समाप्त हो जाएगी। कलीसियाएँ जानती और अनुभव करती हैं कि इन युवकों में से अधिकांश यह नहीं जानते कि जागृति के लिये जो कुछ करने की आवश्यकता है उसमें से कुछ भी कैसे करें, और वे शिकायत करती हैं कि युवा पादरी कलीसिया से इतने पीछे हैं। आप सारे संयुक्त राज्य अमेरिका में धर्मवैज्ञानिक सेमिनरियों को लिख सकते हैं, और फिर भी बहुत थोड़े ही ऐसे युवा पादरी पाएँगे जो इस कार्य को आगे बढ़ाने के योग्य हों। कैसी दशा है!
पादरियों को शिक्षा देने में एक बड़ी कमी है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो युवकों को उस विशेष कार्य के लिये तैयार करे जिसके लिये वे ठहराए गए हैं। परन्तु इसके बदले उन्हें बाकी हर बात के लिये शिक्षा दी जाती है। बड़ी भूल यह है। वे मन को बहुत अधिक असम्बद्ध बातों की ओर लगाते हैं, जिन पर ध्यान देना आवश्यक नहीं है। अपने अध्ययन के पाठ्यक्रमों में वे मन को बहुत विस्तृत क्षेत्र पर घुमाते हैं, जिससे उनका ध्यान मुख्य बात से हट जाता है, और इस प्रकार वे धर्म में ठण्डे पड़ जाते हैं, और जब वे पढ़ाई पूरी कर लेते हैं, तो अपने कार्य के योग्य बनने के बदले उसके अयोग्य हो जाते हैं। मन को अनुशासित करने के बहाने वे वास्तव में ध्यान को बिखेर देते हैं, यहाँ तक कि जब वे अपने कार्य पर आते हैं, तो वे अनाड़ी होते हैं, और कुछ नहीं जानते कि आत्माओं को जीतने के लिये काम को कैसे पकड़ें, या कैसे कार्य करें। सब जगह ऐसा नहीं होता, परन्तु बहुत बार ऐसा ही होता है।
लोगों में एक शिक्षित सेवकाई के विषय में ऊँचे स्वर में और लम्बी-चौड़ी बातें करना आम बात है। परमेश्वर न करे कि मैं शिक्षित सेवकाई के विरुद्ध एक शब्द भी कहूँ। परन्तु सेवकाई के लिये शिक्षा से हमारा क्या अर्थ है? क्या हमारा अर्थ यह है कि उन्हें ऐसी शिक्षा दी जाए कि वे कार्य के योग्य बन जाएँ? यदि उन्हें ऐसी शिक्षा दी जाए, तो जितनी अधिक शिक्षा हो उतना अच्छा। शिक्षा सही प्रकार की हो, जो युवक को वे बातें सिखाए जिन्हें जानने की उसे आवश्यकता है, न कि ठीक वे बातें जिन्हें जानने की उसे आवश्यकता नहीं। उन्हें कार्य के लिये शिक्षा दी जाए। शिक्षा ऐसी न हो कि जब युवक छह, आठ या दस वर्ष अध्ययन में बिताकर निकलें, तो वे उससे आधे मूल्य के भी न रहें जितने वे जाने से पहले थे। मैंने ऐसे युवकों को जाना है जो उस चीज़ के बाद निकले जिसे वे “पूरा पाठ्यक्रम” कहते हैं, और जो एक प्रार्थना-सभा का भार सम्भालने के योग्य भी न थे, और जो किसी प्रार्थना-सभा का ऐसा संचालन भी न कर सकते थे कि वह लाभदायक या रोचक हो। पास के एक नगर की एक कलीसिया के एक प्राचीन ने हाल ही में मुझे ठीक ऐसा ही एक उदाहरण बताया। एक युवक ने, सेमिनरी जाने से पहले, उनके बीच एक साधारण सदस्य के रूप में परिश्रम किया था, उनकी प्रार्थना-सभाओं का संचालन किया था, और उनके बीच अत्यन्त उपयोगी रहा था। जब वह सेमिनरी हो आया, तो उन्होंने उसे बुलवाया और उसकी सहायता चाही; परन्तु हाय, वह कितना बदल गया था! वह इतना पूरी तरह बदल गया था कि उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा; कलीसिया शीघ्र ही शिकायत करने लगी कि उसके प्रभाव में तो वे मर जाएँगे, और वह चला गया, क्योंकि वह कार्य के लिये तैयार नहीं था।
जो पादरी सेमिनरियों में रहे हैं और अब उपयोगी हैं, उनके लिये यह कहना आम बात है कि वहाँ के अध्ययन से उन्हें थोड़ा या कुछ भी लाभ नहीं हुआ, और इससे पहले कि वे कुछ अधिक कर सकें, उन्हें वहाँ सीखी हुई बातों को भुलाना पड़ा। मैं यह दोष लगाने की भावना से नहीं कहता, परन्तु यह एक गम्भीर तथ्य है, और मुझे इसे प्रेम से कहना ही होगा। मान लीजिए आप किसी मनुष्य को नौसेना में शल्य-चिकित्सक बनाना चाहते हैं। क्या आप उसे शल्य-चिकित्सा सीखने के लिये चिकित्सा-विद्यालय भेजने के बदले नौ-चालन सीखने के लिये नौसैनिक विद्यालय भेजेंगे? इस रीति से आप उसे जहाज़ चलाने के योग्य तो बना सकते हैं, परन्तु वह शल्य-चिकित्सक नहीं होगा। पादरियों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए कि वे जानें कि बाइबल क्या है, और मानव मन क्या है, और यह जानें कि एक को दूसरे पर कैसे लागू करें। उन्हें मनुष्यों के मन के सम्पर्क में लाया जाना चाहिए, और समाज के सब पहलुओं से परिचित कराया जाना चाहिए। उनके एक हाथ में बाइबल होनी चाहिए, और दूसरे हाथ में मानव मन का नक्शा, और उन्हें यह जानना चाहिए कि मनुष्यों के उद्धार के लिये सत्य का प्रयोग कैसे करें।
7. सामान्य समझ की कमी प्रायः मसीही सेवकाई के लक्ष्यों को विफल कर देती है। सेवकाई में बहुत-से भले मनुष्य हैं जिनके पास विद्या है, और एक विशेष प्रकार की प्रतिभा है, परन्तु आत्माओं को जीतने के लिये उनमें सामान्य समझ नहीं है।
8. हम अपने धर्मवैज्ञानिक विद्यालयों में एक बड़ी कमी देखते हैं।—युवक अपने विद्यालयों में बन्द कर दिए जाते हैं, पुस्तकों तक सीमित रखे जाते हैं और साधारण लोगों से मेल-जोल, या साधारण मन के सम्पर्क से अलग रखे जाते हैं। इसलिये वे उस रीति से परिचित नहीं होते जिससे साधारण लोग सोचते हैं। इसी से यह बात समझ में आती है कि कुछ सीधे-सादे मनुष्य, जो व्यापार-व्यवसाय में पले-बढ़े हैं, और मानव स्वभाव से परिचित हैं, आत्माओं को जीतने के लिये उन लोगों से दस गुना अधिक योग्य हैं जो वर्तमान सिद्धान्त पर शिक्षा पाते हैं, और वास्तव में सेवकाई के उचित कार्य से दस गुना अधिक परिचित हैं। इन्हें “अशिक्षित मनुष्य” कहा जाता है। यह एक बड़ी भूल है। वे विज्ञान में विद्वान नहीं हैं, परन्तु वे ठीक उन्हीं बातों में विद्वान हैं जिन्हें पादरी होने के नाते उन्हें जानने की आवश्यकता है। वे अज्ञानी पादरी नहीं हैं, क्योंकि वे ठीक-ठीक जानते हैं कि सत्य के द्वारा मन तक कैसे पहुँचें। वे मनुष्यों के मन को समझते हैं, और यह भी कि सुसमाचार को उनकी दशा के अनुकूल कैसे बनाएँ। वे अपने कार्य के लिये उससे अधिक सुसज्जित हैं जितने वे होते यदि उनके पास विद्यालयों की सारी मशीनरी होती।
मैं चाहता हूँ कि मेरी बात ठीक समझी जाए। मैं यह नहीं कहता कि मैं किसी युवक को विद्यालय न जाने दूँगा। न ही मैं उसे विज्ञान के क्षेत्र का अध्ययन करने से निरुत्साहित करूँगा। जितना अधिक हो उतना अच्छा, यदि उसके साथ-साथ वह वे बातें भी सीखे जिन्हें आत्माओं को जीतने के लिये पादरी को जानने की आवश्यकता है—यदि वह अपनी बाइबल को समझता हो, और मानव स्वभाव को समझता हो, और यह जानता हो कि सत्य को कैसे लागू करे, और मनों का मार्गदर्शन और संचालन कैसे करे, और उन्हें पाप से दूर ले जाकर परमेश्वर के पास कैसे ले जाए।
9. धर्म की जागृति को बढ़ाने के लिये बनाए गए किसी भी तरीके की सफलता उसकी बुद्धिमानी को प्रमाणित करती है, इन अपवादों को छोड़कर:
(1.) कोई तरीका केवल प्रभाव डालने के लिये, उत्तेजना उत्पन्न करने के लिये लाया जा सकता है, और ऐसा हो सकता है कि जब बाद में उस पर पीछे मुड़कर देखा जाए, तो वह बेतुका लगे, और एक मात्र चालाकी प्रतीत हो। उस दशा में उसकी उलटी प्रतिक्रिया होगी, और उसके लाए जाने से भलाई से अधिक हानि होगी।
(2.) ऐसा हो सकता है कि तरीके लाए जाएँ, और जागृति बहुत सामर्थी हो, और सफलता का श्रेय उन तरीकों को दिया जाए, जबकि वास्तव में दूसरी बातों ने जागृति को सामर्थी बनाया हो, और ये ही तरीके एक बाधा रहे हों। मसीहियों की प्रार्थनाएँ, और प्रचार, और दूसरी बातें कार्य को आगे बढ़ाने के लिये इतनी उपयुक्त रही हों कि वह इन तरीकों के बावजूद सफल हो गया हो।
परन्तु जब आशीष स्पष्ट रूप से स्वयं उस तरीके के लाए जाने के बाद आती है, तो यह प्रमाण अकाट्य है कि वह तरीका बुद्धिमानी का है। यह कहना अपवित्र बात है कि ऐसा तरीका भलाई से अधिक हानि करेगा। परमेश्वर इसके विषय में जानता है। उसका उद्देश्य जितनी सम्भव हो उतनी अधिक भलाई करना है। और निस्सन्देह वह किसी ऐसे तरीके पर अपनी आशीष नहीं जोड़ेगा जो भलाई से अधिक हानि करे। वह कभी-कभी किसी ऐसे तरीके से अपनी आशीष रोक सकता है जो कुछ भलाई करने के योग्य हो, क्योंकि वह किसी बड़ी भलाई की कीमत पर होगी। परन्तु वह किसी हानिकारक कार्यवाही को कभी आशीष नहीं देगा। इस विषय में परमेश्वर को धोखा देने जैसी कोई बात नहीं है। वह जानता है कि कोई दिया हुआ तरीका, कुल मिलाकर, बुद्धिमानी का है या नहीं। वह कुछ अबुद्धिमानी के या हानिकारक तरीकों के होते हुए भी परिश्रम के किसी क्रम को आशीष दे सकता है। परन्तु यदि वह स्वयं उस तरीके को आशीष देता है, तो उसे अबुद्धिमानी का ठहराना परमेश्वर को डाँटना है। जो कोई ऐसा करने का बीड़ा उठाता है, वह इस बात पर ध्यान दे।
10. यह स्पष्ट है कि ऐसे तरीकों में बहुत दोष निकाला गया है जिन्हें जागृतियों को बढ़ाने के लिये परमेश्वर ने विशेष रूप से और निरन्तर आशीष दी है। हम जानते हैं कि कहा जाता है कि किसी अपवित्र गाली देनेवाले की भयानक शपथें किसी दूसरे, कम कठोर पापी को जगाने का साधन बन गई हैं। परन्तु यह एक दुर्लभ उदाहरण है। परमेश्वर साधारणतः अपवित्र बातों का ऐसा प्रयोग नहीं करता। परन्तु यदि किसी तरीके को निरन्तर या साधारणतः आशीष मिलती है, तो जो मनुष्य अपने आप को परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान समझता है, वही उस पर प्रश्न उठाए। सावधान रहिए कि आप परमेश्वर में दोष कैसे निकालते हैं!
11. मसीहियों को पादरियों के लिये प्रार्थना करनी चाहिए। भाइयो, यदि आप यह अनुभव करते कि पादरियों को अपने महान पद के कर्तव्यों को सफलता से पूरा करने के लिये कितनी बुद्धि की आवश्यकता है, और वे सब कितने अज्ञानी हैं, और अपने आप में कितने अयोग्य हैं, कि अपनी ओर से किसी बात का विचार कर सकें, तो आप जितनी प्रार्थना अब करते हैं उससे कहीं अधिक उनके लिये प्रार्थना करते; अर्थात्, यदि आपको उनके परिश्रम की सफलता की कुछ भी चिन्ता होती। लोग प्रायः पादरियों में दोष निकालते हैं, जबकि वे उनके लिये प्रार्थना नहीं करते। भाइयो, यह परमेश्वर की परीक्षा करना है, क्योंकि जब तक आप उनके लिये प्रार्थना न करें, आपको किसी अच्छे पादरियों की आशा नहीं करनी चाहिए। और जहाँ आप अपने पादरी के लिये प्रार्थना नहीं करते, वहाँ आपको न तो उसके परिश्रम पर आशीष की आशा करनी चाहिए, और न यह कि उसके प्रचार से आपके परिवारों का मन-परिवर्तन हो। और इसी प्रकार दूसरों के लिये, उजाड़ स्थानों के लिये, और अन्यजातियों के लिये, सारे समय केवल यही प्रार्थना करने के बदले कि परमेश्वर और अधिक मज़दूर भेजे, आपको यह प्रार्थना करने की आवश्यकता है कि परमेश्वर पादरियों को आत्माओं को जीतने के लिये बुद्धिमान बनाए, और जिन्हें वह भेजता है उन्हें उचित शिक्षा मिले, ताकि वे ऐसे शास्त्री हों जो परमेश्वर के राज्य के विषय में भली-भाँति शिक्षा पाए हुए हों।
12. कलीसिया के वे साधारण सदस्य जो आत्माओं को जीतना जानते हैं, बुद्धिमान गिने जाने चाहिए। उन्हें “अज्ञानी साधारण लोग” नहीं कहा जाना चाहिए। और कलीसिया के वे सदस्य जो नहीं जानते कि पापियों का मन-परिवर्तन कैसे करें, और जो प्राणियों को नहीं जीत सकते, उन्हें—मसीही होने के नाते—बुद्धिमान नहीं कहा जाना चाहिए। वे बुद्धिमान मसीही नहीं हैं; केवल “जो आत्माओं को जीत लेता है, वह बुद्धिमान है।” वे राजनीति में, सब विज्ञानों में विद्वान हो सकते हैं, या व्यापार के प्रबन्ध में, या दूसरी बातों में कुशल हो सकते हैं, और वे आत्माओं को जीतनेवालों को केवल सीधे-सादे, सरल-हृदय और अज्ञानी मनुष्य समझकर नीची दृष्टि से देख सकते हैं। यदि आप में से कोई ऐसा करने की ओर झुकता है, और आत्माओं को जीतनेवाले उन भाइयों को यह समझकर तुच्छ जानता है कि वे आपके समान बुद्धिमान और चतुर नहीं हैं, तो आप अपने आप को धोखा देते हैं। सम्भव है वे कुछ ऐसी बातें न जानते हों जो आप जानते हैं। परन्तु वे उन बातों को जानते हैं जिन्हें जानने की किसी मसीही को सबसे अधिक चिन्ता होनी चाहिए, और आप उन्हें नहीं जानते।
इसे एक ऐसे पादरी के उदाहरण से समझाया जा सकता है जो समुद्री यात्रा पर जाता है। वह विज्ञान में विद्वान हो सकता है, परन्तु वह कुछ नहीं जानता कि जहाज़ कैसे चलाया जाता है। और वह नाविकों से इस बात और उस बात के विषय में पूछने लगता है, और यह कि यह रस्सी किस काम की है, इत्यादि। “अरे,” नाविक कहते हैं, “ये रस्सियाँ नहीं हैं, जहाज़ में हमारे पास केवल एक ही रस्सी होती है, ये तो रिगिंग (पाल-रस्से) हैं, यह आदमी तो मूर्ख की तरह बातें करता है।” और इस प्रकार यह विद्वान मनुष्य शायद नाविकों के लिये हँसी का पात्र बन जाता है, क्योंकि वह नहीं जानता कि जहाज़ कैसे चलाया जाता है। परन्तु यदि वह विज्ञान के विषय में जो कुछ जानता है उसका आधा भी उन्हें बता दे, तो शायद वे उसे इतना अधिक जानने के कारण जादूगर समझें। इसी प्रकार विद्वान विद्यार्थी अपने hic, hæc, hoc को बहुत अच्छी तरह समझते होंगे, और दीन मसीही पर हँसते होंगे, और उसे अज्ञानी कहते होंगे, यद्यपि वह उनमें से पाँच सौ से भी अधिक आत्माओं को जीतना जानता हो।
एक बार मुझे यह सुनकर बड़ा दुःख और शोक हुआ कि एक पादरी एक ऐसे युवा प्रचारक पर बरस रहा था, जिसका मन-परिवर्तन असाधारण परिस्थितियों में हुआ था, और जिसे नियमित अध्ययन-क्रम पूरा किए बिना प्रचार करने का लाइसेंस दिया गया था। यह पादरी, जिसके विषय में कभी नहीं, या कम से कम शायद ही कभी, सुना गया था कि उसने किसी प्राण का मन-परिवर्तन किया हो, उस युवक पर बड़े रौब और दोष लगानेवाली रीति से बरस पड़ा, और इस कारण उसे तुच्छ ठहराने लगा कि उसे उदार शिक्षा का लाभ नहीं मिला था, जबकि वास्तव में वह उसके जैसे किन्हीं भी पाँच सौ पादरियों से अधिक प्राणियों के मन-परिवर्तन का साधन बना था।
मैं ऐसा कुछ नहीं कहूँगा जिससे पादरियों के लिये पूरी शिक्षा का मूल्य घटे, या जो आपको उसका मूल्य घटाने की ओर ले जाए। परन्तु जो शिक्षा वे हमारे कॉलेजों और सेमिनरियों में पाते हैं, उसे मैं पूरी शिक्षा नहीं कहता। वह उन्हें उनके कार्य के योग्य नहीं बनाती। मैं सारे अनुभव से पूछता हूँ कि क्या हमारी सेमिनरियों के युवक आत्माओं को जीतने के उद्देश्य से पूरी तरह शिक्षित होते हैं। क्या वे ऐसा करते हैं? सब जानते हैं कि वे नहीं करते। होम मिशनरी सोसाइटी की रिपोर्टों को देखिए। यदि मुझे ठीक स्मरण है, तो 1830 में, उस सोसाइटी के मिशनरियों के परिश्रम के सम्बन्ध में होनेवाले मन-परिवर्तनों की संख्या प्रति मिशनरी पाँच से अधिक नहीं थी। मेरा विश्वास है कि तब से यह संख्या बढ़ी है, परन्तु यदि उन्हें उनके कार्य के लिये प्रशिक्षण के सही क्रम द्वारा योग्य बनाया गया होता, तो जितनी यह होती उसकी तुलना में यह अब भी बहुत ही थोड़ी है। मैं यह उनकी निन्दा करने के लिये नहीं कहता, क्योंकि मैं हृदय से उन पर तरस खाता हूँ, और कलीसिया पर भी तरस खाता हूँ कि उसे या तो ऐसे प्रशिक्षित पादरियों का भरण-पोषण करना पड़ता है, या किसी का भी नहीं। वे सबसे अच्छे मनुष्य हैं जिन्हें मिशनरी सोसाइटी प्राप्त कर सकती है। मैं मानता हूँ कि निस्सन्देह यह कहने के लिये मेरी निन्दा की जाएगी। परन्तु यह इतना सत्य और इतना दुःखद है कि इसे छिपाया नहीं जा सकता। जिन पितरों पर हमारे युवा पादरियों के प्रशिक्षण का भार है, वे भले मनुष्य हैं, परन्तु वे पुराने मनुष्य हैं, एक दूसरे युग और दूसरे साँचे के मनुष्य, उससे भिन्न जिसकी आवश्यकता उत्तेजना के इन दिनों में है, जब कलीसिया और संसार नए विचार और कार्य की ओर उठ रहे हैं। मैं समझता हूँ कि वे प्रिय पितर यह न देखेंगे; और शायद यह कहने के लिये मेरे विषय में कठोर विचार रखेंगे; परन्तु यह मसीह का काम है। उनमें से कुछ दूसरे बचपन की ओर लौट रहे हैं, और उन्हें पद छोड़ देना चाहिए, और युवा मनुष्यों को स्थान देना चाहिए, जो आयु के कारण शारीरिक रूप से इतने असमर्थ नहीं हुए हैं कि कलीसिया की आगे बढ़ती गतिविधियों के साथ कदम न मिला सकें। और यहाँ मैं यह कहना चाहता हूँ कि मेरे अपने मन को यह स्पष्ट दिखाई देता है कि जब तक हमारे धर्मविज्ञान के प्राध्यापक बहुत प्रचार न करें, कलीसिया के साथ बहुत मिलें-जुलें, और उसकी सब गतिविधियों में उसके साथ सहानुभूति न रखें, तब तक यह नैतिक रूप से, यदि स्वाभाविक रूप से नहीं, असम्भव है कि वे युवकों को इस युग की आत्मा के अनुसार प्रशिक्षित करने में सफल हों। यह लज्जा और पाप की बात है कि धर्मविज्ञान के प्राध्यापक, जो कभी-कभार ही प्रचार करते हैं, जो सेवकाई के सक्रिय कर्तव्यों से अलग हो गए हैं, अपने अध्ययन-कक्षों में बैठकर उन पादरियों और कलीसियाओं को, जो कार्य-क्षेत्र में हैं, और जो ऐसी परिस्थिति में हैं कि निर्णय कर सकें कि क्या करने की आवश्यकता है, सलाह देनेवाले या हुक्म चलानेवाले अपने पत्र लिखें। जो मनुष्य अपना सारा, या कम से कम कुछ, समय सेवकाई के सक्रिय कर्तव्यों में बिताते हैं, वे ही ऐसे मनुष्य हैं जो समय-समय पर तरीकों के विषय में यह निर्णय कर सकते हैं कि क्या उचित है या अनुचित, क्या समझदारी है या नासमझी। हमारे धर्मविज्ञान के प्राध्यापकों को, जो संघर्ष के क्षेत्र से हट चुके हैं, कलीसिया के तरीकों और गतिविधियों के विषय में हुक्म चलाने देना उतना ही खतरनाक और हास्यास्पद है जितना किसी सेनापति का अपने शयन-कक्ष में बैठकर युद्ध का आदेश देने का प्रयत्न करना।3[3][1]
दो पादरी एक दिन एक दूसरे पादरी के विषय में बातचीत कर रहे थे जिसके परिश्रम को कुछ हज़ार प्राणियों के मन-परिवर्तन में बड़ी आशीष मिली थी। उनमें से एक ने कहा, “उस मनुष्य को अब और प्रचार नहीं करना चाहिए; उसे रुककर” एक विशेष धर्मवैज्ञानिक सेमिनरी का नाम लेकर, “वहाँ जाना चाहिए, और अध्ययन का नियमित पाठ्यक्रम पूरा करना चाहिए।” उसने कहा कि उस मनुष्य में “अच्छी बुद्धि है, और यदि उसे पूरी शिक्षा मिले, तो वह बहुत उपयोगी हो सकता है,” दूसरे ने उत्तर दिया, “क्या आप सोचते हैं कि उस सेमिनरी में जाने से वह अधिक उपयोगी हो जाएगा? मैं आपको चुनौती देता हूँ कि तथ्यों से दिखाइए कि जो वहाँ रहे हैं उनमें से कोई अधिक उपयोगी है। नहीं, महोदय, सच तो यह है कि जब से यह मनुष्य सेवकाई में है, वह उतने समय में उस सेमिनरी से आए सब युवकों से अधिक प्राणियों के मन-परिवर्तन का साधन बना है।” यह है तर्क! रुककर सेमिनरी जाए, ताकि प्राणियों का मन-परिवर्तन करने के लिये अपने आप को तैयार करे, जबकि वह अभी सेमिनरी से आनेवाले सब लोगों से अधिक का मन-परिवर्तन कर रहा है!
अन्त में।—बैठने से पहले मैं आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि आप में से कौन इस ईश्वरीय बुद्धि के होने का कोई दावा कर सकता है? आप में से कौन, साधारण सदस्यो? आप में से कौन, पादरियो? क्या आप में से कोई कर सकता है? क्या मैं कर सकता हूँ? क्या हम आत्माओं को जीतने के लिये बुद्धिमानी से काम में लगे हैं? या क्या हम अपने आप को यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न कर रहे हैं कि सफलता बुद्धि की कोई कसौटी नहीं? यह कसौटी है। यह एक सुरक्षित कसौटी है जिस पर हर पादरी अपने आप को परखे। उसकी सफलता की मात्रा, यदि अन्य बातें समान हों, उस बुद्धि की मात्रा को मापती है जिसका प्रयोग उसने अपने पद के कर्तव्यों को पूरा करने में किया है।
आप में से कितने थोड़े हैं जिनमें कभी इतनी बुद्धि भी रही हो कि एक भी पापी का मन-परिवर्तन कर सकें!
अब यह न कहिए, “मैं पापियों का मन-परिवर्तन नहीं कर सकता; मैं पापियों का मन-परिवर्तन कैसे कर सकता हूँ? केवल परमेश्वर ही पापियों का मन-परिवर्तन कर सकता है।” पाठ को देखिए, “जो आत्माओं को जीत लेता है, वह बुद्धिमान है,” और यह न सोचिए कि आप इस निर्णय से बच सकते हैं। यह सच है कि परमेश्वर पापियों का मन-परिवर्तन करता है। परन्तु एक अर्थ ऐसा भी है जिसमें पादरी उनका मन-परिवर्तन करते हैं। और आपको भी कुछ करना है; कुछ ऐसा जिसके लिये बुद्धि की आवश्यकता है; कुछ ऐसा जो, यदि आप उसे बुद्धिमानी से करें, तो प्रयोग की गई बुद्धि के अनुपात में पापियों के मन-परिवर्तन को निश्चित कर देगा। यदि आपने यह कभी नहीं किया है, तो अब समय आ गया है कि आप अपने विषय में सोचें, और देखें कि क्या आप में इतनी बुद्धि भी है कि अपने ही प्राणों को बचा सकें।
पुरुषो—स्त्रियो—आत्माओं को जीतने में बुद्धिमान होना आपका कर्तव्य है। शायद प्राण पहले ही नष्ट हो चुके हैं; शायद कोई मित्र, या कोई बच्चा नरक में है, क्योंकि उन्हें बचाने में आपने वह बुद्धि नहीं लगाई जो आप लगा सकते थे। यह नगर नरक की ओर जा रहा है। हाँ, संसार नरक की ओर जा रहा है, और
तब तक जाता ही रहेगा, जब तक कलीसिया यह न जान ले कि आत्माओं को जीतने के लिये क्या करना है। राजनीतिज्ञ बुद्धिमान हैं। इस संसार की सन्तान बुद्धिमान है, वे जानते हैं कि अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिये क्या करें, जबकि हम इधर-उधर नीरस बातें करते फिरते हैं, न जानते हुए कि क्या करें, या कार्य को कहाँ से पकड़ें, और पापी नरक की ओर जा रहे हैं।
