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विश्वास की प्रार्थना
“इसलिये मैं तुम से कहता हूँ, कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।” मरकुस 11:24
इन वचनों के विषय में कुछ लोगों ने यह मान लिया है कि ये केवल आश्चर्यकर्मों के विश्वास से ही सम्बन्ध रखते हैं। परन्तु इसका लेशमात्र भी प्रमाण नहीं है। हमारे उद्धारकर्ता का यह अभिप्राय नहीं था कि यह पद केवल आश्चर्यकर्मों के विश्वास पर ही लागू हो, यह बात उस प्रसंग से सिद्ध होती है जिसमें यह आया है। यदि आप यह अध्याय पढ़ें, तो आप देखेंगे कि मसीह और उसके प्रेरित उस समय अपने काम में बहुत अधिक लगे हुए थे, और बहुत प्रार्थनाशील थे; और जब वे भोर को अपने एकान्त स्थानों से थके-माँदे और भूखे लौट रहे थे, तो उन्होंने कुछ दूरी पर एक अंजीर का पेड़ देखा। वह बहुत सुन्दर दिखाई देता था, और निःसन्देह उस पर फल होने के लक्षण दिखाई देते थे; परन्तु जब वे उसके पास आए, तो उन्होंने उस पर पत्तों को छोड़ और कुछ न पाया। और यीशु ने कहा, “अब से कोई तेरा फल कभी न खाए।
“फिर भोर को जब वे उधर से जाते थे तो उन्होंने उस अंजीर के पेड़ को जड़ तक सूखा हुआ देखा।
“पतरस को वह बात स्मरण आई, और उसने उससे कहा, हे रब्बी, देख! यह अंजीर का पेड़ जिसे तू ने श्राप दिया था सूख गया है।
“यीशु ने उनको उत्तर दिया, कि परमेश्वर पर विश्वास रखो।
“मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो कोई इस पहाड़ से कहे, कि तू उखड़ जा, और समुद्र में जा पड़, और अपने मन में सन्देह न करे, वरन् प्रतीति करे, कि जो कहता हूँ वह हो जाएगा, तो उसके लिये वही होगा।”
इसके बाद पाठ के वचन आते हैं:
“इसलिये मैं तुम से कहता हूँ, कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।”
हमारा उद्धारकर्ता अपने चेलों को प्रार्थना के स्वभाव और सामर्थ्य के विषय में, और परमेश्वर पर दृढ़ विश्वास की आवश्यकता के विषय में शिक्षा देना चाहता था। इसलिये उसने एक बहुत ही प्रबल उदाहरण रखा, एक आश्चर्यकर्म—इतना बड़ा कि एक पहाड़ समुद्र में जा पड़े। और वह उनसे कहता है कि यदि वे परमेश्वर पर उचित विश्वास रखें, तो वे ऐसे काम कर सकते हैं। परन्तु उसकी बातों को केवल आश्चर्यकर्म करने के विषय के विश्वास तक सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह आगे कहता है,
“और जब कभी तुम खड़े हुए प्रार्थना करते हो, तो यदि तुम्हारे मन में किसी की ओर से कुछ विरोध हो, तो क्षमा करो: इसलिये कि तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा करे।
“और यदि तुम क्षमा न करो तो तुम्हारा पिता भी जो स्वर्ग में है, तुम्हारा अपराध क्षमा न करेगा।” क्या इसका सम्बन्ध आश्चर्यकर्मों से है? जब आप प्रार्थना करते हैं, तो आपको क्षमा करना ही होगा। क्या यह केवल उसी समय आवश्यक है जब कोई मनुष्य आश्चर्यकर्म करना चाहता हो? बाइबल में और भी बहुत-सी प्रतिज्ञाएँ हैं जो इससे निकट सम्बन्ध रखती हैं, और लगभग यही भाषा बोलती हैं, और उन सब को इसी संक्षिप्त ढंग से यह कहकर टाल दिया गया है कि वे आश्चर्यकर्मों में काम आनेवाले विश्वास से सम्बन्ध रखती हैं। मानो आश्चर्यकर्मों का विश्वास परमेश्वर पर विश्वास से कोई भिन्न वस्तु हो!
अपने पिछले व्याख्यान में मैंने “प्रबल प्रार्थना” के विषय पर विस्तार से बात की थी; और आपको स्मरण होगा कि प्रार्थना में विश्वास के विषय को मैंने बहुत संक्षेप में छोड़ दिया था, क्योंकि मैं उसे एक अलग चर्चा के लिये रखना चाहता था। आज रात का विषय है,
विश्वास की प्रार्थना।
मैं यह प्रस्ताव करता हूँ,
I. यह दिखाना कि विश्वास प्रबल प्रार्थना की एक अनिवार्य शर्त है।
II. यह दिखाना कि जब हम प्रार्थना करते हैं तो हमें किस बात पर विश्वास करना है।
III. यह दिखाना कि हम कब इस विश्वास का प्रयोग करने के लिये, अर्थात् यह विश्वास करने के लिये बाध्य हैं कि जो वस्तु हम माँगते हैं वह हमें मिलेगी।
IV. यह कि प्रार्थना में इस प्रकार का विश्वास सदा वह आशीष प्राप्त कर ही लेता है जिसे खोजा जाता है।
V. यह समझाना कि हम मन की उस दशा में कैसे आएँ, जिसमें हम ऐसे विश्वास का प्रयोग कर सकें।
VI. उन कई आपत्तियों का उत्तर देना, जो प्रार्थना के विषय में इन विचारों के विरुद्ध कभी-कभी उठाई जाती हैं।
I. इस बात पर गम्भीरता से सन्देह नहीं किया जाएगा कि विश्वास प्रबल प्रार्थना की एक अनिवार्य शर्त है। भलाई की ऐसी इच्छाएँ प्रकट करना भी एक बात है जो अपने आप में परमेश्वर को ग्रहणयोग्य होती हैं, परन्तु जिनमें उन आशीषों के वास्तव में मिलने के विषय में विश्वास का प्रयोग सम्मिलित नहीं होता। परन्तु ऐसी इच्छाएँ प्रबल प्रार्थना, अर्थात् विश्वास की प्रार्थना नहीं हैं। परमेश्वर चाहे तो इच्छित वस्तुएँ कृपा और प्रेम के कार्य के रूप में दे दे, परन्तु वह ठीक-ठीक प्रार्थना के उत्तर में नहीं होगा। मैं अभी उस प्रकार के विश्वास के विषय में बोल रहा हूँ जो आशीष को निश्चित कर देता है। मुझे ऐसा न समझिए कि मैं यह कह रहा हूँ कि प्रार्थना में ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हो, या जो कभी-कभी इस प्रकार के विश्वास के बिना भी आशीष प्राप्त कर ले। परन्तु मैं उस विश्वास के विषय में बोल रहा हूँ जो ठीक वही आशीष प्राप्त कर लेता है जिसे वह खोजता है। यह सिद्ध करने के लिये कि विश्वास प्रबल प्रार्थना के लिये अनिवार्य है, केवल उस बात को दोहराना ही पर्याप्त है जो याकूब प्रेरित हमें स्पष्ट रूप से बताता है: “पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उसको दी जाएगी। पर विश्वास से माँगे, और कुछ सन्देह न करे; क्योंकि सन्देह करनेवाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है।”
II. अब हमें यह जाँचना है कि जब हम प्रार्थना करते हैं तो हमें किस बात पर विश्वास करना है।
1. हमें परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करना है—“परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है”—और प्रार्थना का उत्तर देने की उसकी इच्छा पर भी—“कि वह है; और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।” बहुत-से लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर के अस्तित्व पर तो विश्वास करते हैं, परन्तु प्रार्थना के प्रभावशाली होने पर विश्वास नहीं करते। वे परमेश्वर पर विश्वास करने का दावा तो करते हैं, परन्तु प्रार्थना की आवश्यकता या उसके प्रभाव का इनकार करते हैं।
2. हमें यह विश्वास करना है कि हमें कुछ मिलेगा—पर क्या? कोई भी वस्तु नहीं, या जो कुछ संयोग से मिल जाए वह नहीं, परन्तु कोई विशेष वस्तु जिसे हम माँगते हैं। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि परमेश्वर ऐसा है कि यदि हम मछली माँगें, तो वह हमें साँप देगा, या यदि हम रोटी माँगें, तो वह हमें पत्थर देगा। परन्तु वह कहता है, “जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।” आश्चर्यकर्मों के विश्वास के विषय में यह स्पष्ट है कि वे यह विश्वास करने के लिये बाध्य थे कि जो कुछ उन्होंने माँगा ठीक वही उन्हें मिलेगा—कि वही बात पूरी होगी। उन्हें इसी पर विश्वास करना था। अब अन्य आशीषों के विषय में मनुष्यों को किस बात पर विश्वास करना चाहिए? क्या यह केवल एक ढीला-ढाला विचार है कि यदि कोई मनुष्य किसी विशेष आशीष के लिये प्रार्थना करे, तो परमेश्वर किसी रहस्यमय प्रभुता से उसे कुछ न कुछ दे देगा, या कहीं किसी और को कुछ दे देगा? जब कोई मनुष्य अपने बच्चों के मन-परिवर्तन के लिये प्रार्थना करता है, तो क्या उसे यह विश्वास करना है कि या तो उसके बच्चों का मन-परिवर्तन होगा, या किसी और के बच्चों का, और यह बिलकुल अनिश्चित है कि किसका? यह सब निरी मूर्खता है, और परमेश्वर का बड़ा अनादर करनेवाली बात है। नहीं, हमें यह विश्वास करना है कि जो वस्तुएँ हम माँगते हैं ठीक वही हमें मिलेंगी।
III. हम कब यह प्रार्थना करने के लिये बाध्य हैं? हम कब यह विश्वास करने के लिये बाध्य हैं कि जिन वस्तुओं के लिये हम प्रार्थना करते हैं ठीक वही हमें मिलेंगी? मेरा उत्तर है: जब हमारे पास उसका प्रमाण हो। विश्वास के पास सदा प्रमाण होना चाहिए। मनुष्य किसी बात पर तब तक विश्वास नहीं कर सकता, जब तक वह कोई ऐसी बात न देखे जिसे वह प्रमाण समझता हो। जब तक उसके पास प्रमाण न हो, तब तक वह यह विश्वास करने के लिये न तो बाध्य है और न उसे यह विश्वास करने का अधिकार है कि कोई बात होगी। बिना प्रमाण के विश्वास करना कट्टर धर्मोन्माद की पराकाष्ठा है। मनुष्य के पास जिस प्रकार के प्रमाण हो सकते हैं वे ये हैं:
1. मान लीजिए कि परमेश्वर ने उस बात की विशेष रूप से प्रतिज्ञा की है। उदाहरण के लिये, परमेश्वर कहता है कि जितना माता-पिता अपने बच्चों को रोटी देने के लिये तैयार रहते हैं, उससे कहीं बढ़कर वह अपने माँगनेवालों को अपना पवित्र आत्मा देने के लिये तैयार है। यहाँ हम यह विश्वास करने के लिये बाध्य हैं कि जब हम उसके लिये प्रार्थना करेंगे तो वह हमें मिलेगा। आपको इसमें “यदि” जोड़कर यह कहने का कोई अधिकार नहीं है, “हे प्रभु, यदि तेरी इच्छा हो, तो हमें अपना पवित्र आत्मा दे।” ऐसा करना परमेश्वर का अपमान करना है। परमेश्वर की प्रतिज्ञा में, जहाँ परमेश्वर ने कोई “यदि” नहीं रखा, वहाँ “यदि” जोड़ना परमेश्वर पर कपटी होने का दोष लगाने के बराबर है। यह ऐसा कहने के समान है, “हे परमेश्वर, यदि तू ये प्रतिज्ञाएँ करने में सच्चे मन से है, तो जिस आशीष के लिये हम प्रार्थना करते हैं वह हमें दे।”
मैंने एक घटना के विषय में सुना जिसमें एक नई विश्वासी प्रार्थना के विषय में एक पादरी को एक गम्भीर सत्य सिखाने का साधन बनी। वह एक बहुत ही दुष्ट परिवार से थी, और एक पादरी के यहाँ रहने चली गई। वहाँ रहते हुए, आशा के अनुसार उसका मन-परिवर्तन हो गया, और उसका चाल-चलन अच्छा दिखाई देता था। एक दिन वह पादरी के अध्ययन-कक्ष में आई, जब वह उसमें था—ऐसा करना उसकी आदत नहीं थी; और पादरी ने सोचा कि अवश्य कोई बात होगी। इसलिये उसने उसे बैठने को कहा, और प्रेम से उसकी धार्मिक भावनाओं की दशा के विषय में पूछा; उसने कहा कि कलीसिया के पुराने सदस्य जिस ढंग से आत्मा के लिये प्रार्थना करते हैं, उससे वह व्याकुल है। वे पवित्र आत्मा के आने के लिये प्रार्थना करते, और बहुत सच्चे मन से प्रार्थना करते दिखाई देते, और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को सामने रखकर बिनती करते, और फिर कहते, “हे प्रभु, यदि तेरी इच्छा हो, तो मसीह के निमित्त हमें ये आशीषें दे।” उसका विचार था कि जब परमेश्वर ने उस बात की स्पष्ट प्रतिज्ञा की है, तब “यदि तेरी इच्छा हो” कहना इस बात पर प्रश्न उठाना है कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं में सच्चा है या नहीं। पादरी ने तर्क करके उसे इस विचार से हटाने का प्रयत्न किया, और निश्चय ही वह उसे निरुत्तर करने में सफल हो गया। परन्तु वह व्याकुल और शोक से भरी हुई थी, और बोली, “श्रीमान, मैं आपसे इस बात पर वाद-विवाद नहीं कर सकती, परन्तु मेरे मन में यह बात बैठ गई है कि यह गलत है, और परमेश्वर का अनादर करना है।” और वह पीड़ा से रोती हुई चली गई। पादरी ने देखा कि उसे सन्तोष नहीं हुआ था, और इस बात ने उसे इस विषय पर फिर से विचार करने को प्रेरित किया, और अन्त में उसने देखा कि यह वहाँ “यदि” जोड़ना था जहाँ परमेश्वर ने कोई “यदि” नहीं रखा था, और जहाँ उसने अपनी इच्छा स्पष्ट रूप से प्रकट कर दी थी, और यह परमेश्वर का अपमान था। और उसने जाकर अपनी कलीसिया से कहा कि वे यह विश्वास करने के लिये बाध्य हैं कि जब परमेश्वर ने उनसे प्रतिज्ञा की, तो वह सच्चे मन से की। और उस कलीसिया पर प्रार्थना की आत्मा उतरी, और उसके बाद एक अत्यन्त सामर्थी जागृति हुई।
2. जहाँ पवित्रशास्त्र में कोई सामान्य प्रतिज्ञा हो जिसे आप अपने सामने की विशेष परिस्थिति पर उचित रूप से लागू कर सकें। यदि उसके वास्तविक अर्थ में वह विशेष वस्तु सम्मिलित हो जिसके लिये आप प्रार्थना करते हैं, या यदि आप उस प्रतिज्ञा के सिद्धान्त को उस परिस्थिति पर उचित रूप से लागू कर सकें, तो वहाँ आपके पास प्रमाण है। उदाहरण के लिये, मान लीजिए कि ऐसा समय है जब दुष्टता बहुत बढ़ गई है, और आप परमेश्वर के हस्तक्षेप के लिये प्रार्थना करने को प्रेरित होते हैं? आपके पास कौन-सी प्रतिज्ञा है? अरे, यह: “ यशायाह 59:19 जब शत्रु महानद की नाईं चढ़ाई करेगा तब यहोवा का आत्मा उसके विरुद्ध झण्डा खड़ा करेगा।” यहाँ आप देखते हैं कि यह एक सामान्य प्रतिज्ञा है जो परमेश्वर के शासन का एक सिद्धान्त स्थापित करती है, जिसे आप प्रार्थना में विश्वास का प्रयोग करने के आधार के रूप में अपने सामने की परिस्थिति पर लागू कर सकते हैं। और यदि यह प्रश्न उठे कि परमेश्वर प्रार्थना के उत्तर में किस समय आशीषें देगा, तो आपके पास यह प्रतिज्ञा है: “उनके माँगते ही मैं उनकी सुन लूँगा।”
बाइबल में सामान्य प्रतिज्ञाओं और सिद्धान्तों का एक विशाल भण्डार रखा गया है, जिनका मसीही लोग उपयोग कर सकते हैं, यदि वे केवल सोचें। जब कभी आप ऐसी परिस्थितियों में हों जिन पर वे प्रतिज्ञाएँ या सिद्धान्त लागू होते हैं, तो वहाँ आपको उनका उपयोग करना है। एक माता या पिता को यह प्रतिज्ञा मिलती है: “परन्तु यहोवा की करुणा उसके डरवैयों पर युग युग, और उसका धर्म उनके नाती-पोतों पर भी प्रगट होता रहता है, अर्थात् उन पर जो उसकी वाचा का पालन करते और उसके उपदेशों को स्मरण करके उन पर चलते हैं।” अब, यह एक प्रतिज्ञा है जो उन लोगों से की गई है जिनका एक विशेष चरित्र है। यदि किसी माता-पिता को यह बोध है कि उसका चरित्र ऐसा ही है, तो उसके पास इसे अपने और अपने परिवार पर लागू करने का उचित आधार है। यदि आपका चरित्र ऐसा है, तो आप प्रार्थना में इस प्रतिज्ञा का उपयोग करने, और इस पर विश्वास करने के लिये बाध्य हैं, यहाँ तक कि अपने नाती-पोतों तक के लिये भी।
यदि आज रात मेरे पास समय होता, तो मैं बाइबल के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाकर ऐसे पदों की आश्चर्यजनक विविधता प्रस्तुत कर सकता था जो प्रतिज्ञाओं के रूप में लागू होते हैं; इतने कि यह सिद्ध हो जाए कि परमेश्वर की सन्तान चाहे किसी भी परिस्थिति में क्यों न रखी जाए, परमेश्वर ने बाइबल में कोई न कोई प्रतिज्ञा, चाहे सामान्य हो या विशेष, दे रखी है जिसे वह लागू कर सकता है, और जो ठीक उसकी दशा के अनुकूल है। परमेश्वर की बहुत-सी प्रतिज्ञाएँ जान-बूझकर बहुत व्यापक रखी गई हैं ताकि वे बहुत बड़े क्षेत्र को ढाँप लें। पाठ की इस प्रतिज्ञा से अधिक व्यापक और क्या हो सकता है: “जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो”? ऐसा कौन-सा प्रार्थना करनेवाला मसीही है जो परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की लम्बाई, और चौड़ाई, और परिपूर्णता पर चकित न हुआ हो, जब आत्मा ने उन्हें उसके हृदय पर लागू किया? प्रार्थना का जीवन बितानेवाला ऐसा कौन है जिसने, परमेश्वर के आत्मा के प्रकाश में उन प्रतिज्ञाओं को देखकर, अपने अन्धेपन पर आश्चर्य न किया हो कि उसने पहले कभी उनके अर्थ के विस्तार और उनकी समृद्धि को न देखा और न अनुभव किया? ऐसे समयों में वह अपनी अज्ञानता पर चकित हुआ है, और उसने पाया है कि आत्मा बाइबल की प्रतिज्ञाओं और घोषणाओं को एक ऐसे अर्थ में लागू कर रहा है जिसमें उनके लागू होने की उसने पहले कभी कल्पना भी नहीं की थी। जिस रीति से प्रेरितों ने पुराने नियम की प्रतिज्ञाओं, और भविष्यद्वाणियों, और घोषणाओं को लागू किया, वह परमेश्वर के वचन के अर्थ की व्यापकता, और परिपूर्णता, और समृद्धि को तेज प्रकाश में रख देती है। जो परमेश्वर के मुख के प्रकाश में चलता है, और जैसा उसे होना चाहिए वैसा परमेश्वर के आत्मा से परिपूर्ण है, वह अक्सर प्रतिज्ञाओं को अपने लिये ऐसे अपनाएगा, और उन्हें अपनी परिस्थितियों पर, और उन लोगों की परिस्थितियों पर जिनके लिये वह प्रार्थना करता है, ऐसे लागू करेगा, जिसकी कोई अन्धा धर्म का अंगीकार करनेवाला कभी कल्पना भी नहीं करेगा।
3. जहाँ कोई भविष्यद्वाणी की घोषणा हो कि जिस वस्तु के लिये प्रार्थना की जा रही है वह परमेश्वर की इच्छा के अनुकूल है। जब भविष्यद्वाणी से यह स्पष्ट हो कि वह घटना निश्चय ही होनेवाली है, तो आप उस पर विश्वास करने, और प्रार्थना में अपने विशेष विश्वास का आधार बनाने के लिये बाध्य हैं। यदि बाइबल में समय निर्धारित नहीं किया गया है, और अन्य स्रोतों से कोई प्रमाण नहीं है, तो आप यह विश्वास करने के लिये बाध्य नहीं हैं कि वह अभी, या तुरन्त हो जाएगी। परन्तु यदि समय निर्धारित किया गया है, या यदि भविष्यद्वाणियों के अध्ययन से समय जाना जा सकता है, और ऐसा प्रतीत होता है कि वह समय आ पहुँचा है, तो मसीही लोग उसे समझने और विश्वास की प्रार्थना करके उसे लागू करने के लिये कर्तव्यबद्ध हैं। उदाहरण के लिये, यहूदियों के बन्धुआई से लौटने के विषय में दानिय्येल का उदाहरण लीजिए। वह क्या कहता है? “मुझ दानिय्येल ने शास्त्र के द्वारा उन वर्षों की गिनती समझ ली, जिनके विषय में यहोवा का वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के पास पहुँचा था, कि यरूशलेम की उजड़ी हुई दशा सत्तर वर्ष में पूरी हो जाएगी।” यहाँ उसने पुस्तकों से सीखा, अर्थात् उसने अपनी बाइबल का अध्ययन किया, और इस प्रकार समझ लिया कि बन्धुआई की अवधि सत्तर वर्ष होनी थी। तब वह क्या करता है? क्या वह प्रतिज्ञा पर हाथ पर हाथ धरे बैठ जाता है, और कहता है, “परमेश्वर ने सत्तर वर्ष में बन्धुआई का अन्त करने की प्रतिज्ञा की है, और समय पूरा हो चुका है, और कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है”? ओह नहीं; वह कहता है, “तब मैं अपना मुख प्रभु परमेश्वर की ओर करके गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करने लगा, और उपवास कर, टाट पहिन, राख में बैठकर वरदान माँगने लगा।” उसने तुरन्त अपने आपको इस बात के लिये प्रार्थना करने में लगा दिया कि वह बात पूरी हो जाए। उसने विश्वास से प्रार्थना की। परन्तु उसे किस बात पर विश्वास करना था? उस बात पर जो उसने भविष्यद्वाणी से सीखी थी। बाइबल में बहुत-सी भविष्यद्वाणियाँ अब तक पूरी नहीं हुई हैं, जिन्हें समझने के लिये मसीही लोग, जहाँ तक वे समझने में समर्थ हों, बाध्य हैं, और फिर उन्हें विश्वासयुक्त प्रार्थना का आधार बनाने के लिये भी। ऐसा मत सोचिए, जैसा कुछ लोग सोचते दिखाई देते हैं, कि क्योंकि किसी बात की भविष्यद्वाणी की गई है इसलिये उसके लिये प्रार्थना करना आवश्यक नहीं है, या कि वह तो आएगी ही, चाहे मसीही उसके लिये प्रार्थना करें या न करें। इसमें कोई सच्चाई नहीं है। परमेश्वर इसी प्रकार की घटनाओं के विषय में, जो भविष्यद्वाणी में प्रकट की गई हैं, कहता है, “तौभी इन सब बातों के लिये इस्राएल का घराना मुझ से बिनती करेगा कि मैं उनके लिये यह करूँ।”
4. जब समय के चिह्न, या परमेश्वर का विधान, यह संकेत करें कि कोई विशेष आशीष दी जानेवाली है, तो हम उस पर विश्वास करने के लिये बाध्य हैं। प्रभु यीशु मसीह ने यहूदियों को दोषी ठहराया, और उन्हें कपटी कहा, क्योंकि वे परमेश्वर के विधान के संकेतों को नहीं समझते थे। वे मौसम के लक्षणों को समझ सकते थे, और देख सकते थे कि कब वर्षा होनेवाली है, और कब मौसम साफ रहेगा; परन्तु वे समय के चिह्नों से यह नहीं देख सकते थे कि मसीहा के प्रगट होने, और परमेश्वर के घर को बनाने का समय आ पहुँचा है। धर्म का अंगीकार करनेवाले बहुत-से ऐसे हैं जो जब कभी कोई काम करने का प्रस्ताव रखा जाता है, तो सदा ठोकर खाते और पीछे हटते रहते हैं। वे सदा यही कहते हैं, समय नहीं आया—समय नहीं आया; जबकि दूसरे ऐसे भी हैं जो समय के चिह्नों पर ध्यान देते हैं, और जिनके पास उन्हें समझने की आत्मिक परख है। ये लोग उस आशीष के लिये विश्वास से प्रार्थना करते हैं, और वह आ जाती है। 5. जब परमेश्वर का आत्मा आप पर हो, और किसी आशीष के लिये प्रबल इच्छाएँ उत्पन्न करे, तो आप उसके लिये विश्वास से प्रार्थना करने के लिये बाध्य हैं। जब आप परमेश्वर के आत्मा द्वारा उत्पन्न ऐसे पवित्र भावों में रहते हुए अपने आपको किसी वस्तु की इच्छा करने की ओर खिंचता हुआ पाएँ, तो आप इस तथ्य से यह निष्कर्ष निकालने के लिये बाध्य हैं कि ये इच्छाएँ आत्मा का कार्य हैं। जब तक परमेश्वर का आत्मा उन्हें उभारे नहीं, तब तक लोग सही प्रकार की इच्छाओं के साथ इच्छा करने की प्रवृत्ति नहीं रखते। प्रेरित आत्मा के द्वारा उभारी गई इन इच्छाओं का उल्लेख रोमियों के नाम अपनी पत्री में करता है, जहाँ वह कहता है—“इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, क्योंकि हम नहीं जानते कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए; परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर, जो बयान से बाहर हैं, हमारे लिये बिनती करता है। और मनों का जाँचनेवाला जानता है कि आत्मा की मनसा क्या है, क्योंकि वह पवित्र लोगों के लिये परमेश्वर की इच्छा के अनुसार बिनती करता है।” तो यहाँ, यदि आप अपने आपको किसी आशीष की इच्छा करने की ओर प्रबलता से खिंचता हुआ पाएँ, तो आपको इसे एक संकेत समझना है कि परमेश्वर वह विशेष आशीष देने के लिये तैयार है, और इसलिये आप उस पर विश्वास करने के लिये बाध्य हैं। परमेश्वर अपनी सन्तानों के साथ खिलवाड़ नहीं करता। वह ऐसा नहीं करता कि उनमें एक आशीष की इच्छा उत्पन्न करे, और फिर उन्हें कुछ और देकर टाल दे। परन्तु वह ठीक वही इच्छाएँ उत्पन्न करता है जिन्हें वह पूरी करने के लिये तैयार है। और जब वे ऐसी इच्छाएँ अनुभव करें, तो वे उनका तब तक अनुसरण करते रहने के लिये बाध्य हैं जब तक उन्हें आशीष न मिल जाए।
IV. अब मैं यह दिखाने आगे बढ़ता हूँ कि इस प्रकार का विश्वास सदा अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। यहाँ पाठ यह दिखाने में स्पष्ट है कि जिस वस्तु के लिये प्रार्थना की गई है ठीक वही आपको मिलेगी। वह यह नहीं कहता, “प्रतीति करो कि तुम्हें मिलेगा, और तुम्हें या तो वही मिलेगा या उसके बराबर कुछ और।” यह सिद्ध करने के लिये कि यह विश्वास ठीक वही आशीष प्राप्त करता है जो माँगी गई है, मैं यह ध्यान दिलाता हूँ,
1. कि अन्यथा हम कभी नहीं जान सकते थे कि हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर मिला या नहीं। और हम प्रार्थना पर प्रार्थना करते रहते, जबकि उस प्रार्थना का उत्तर कब का किसी और ऐसी आशीष के द्वारा मिल चुका होता जो माँगी गई आशीष के बराबर हो।
2. यदि हम ठीक उसी वस्तु की आशा करने के लिये बाध्य नहीं हैं जो हम माँगते हैं, तो अवश्य परमेश्वर का आत्मा हमें धोखा देता है। जब उसका अभिप्राय कुछ और देने का है, तो वह हममें किसी विशेष आशीष की इच्छा क्यों उभारे?
3. इस वचन का क्या अर्थ है, “यदि कोई रोटी माँगे, तो क्या वह उसे पत्थर देगा?” क्या हमारा उद्धारकर्ता इस विचार को नहीं झिड़कता कि प्रार्थना का उत्तर कुछ और देकर दिया जा सकता है? यदि हमें माँगना एक वस्तु है और मिलनी दूसरी, तो किसी भी विशेष वस्तु के लिये प्रार्थना करने का हमें क्या प्रोत्साहन है? मान लीजिए कोई मसीही यहाँ जागृति के लिये प्रार्थना करे—तो उसका उत्तर चीन में जागृति के द्वारा दिया जाएगा। या वह जागृति के लिये प्रार्थना करे, और परमेश्वर हैजा, या भूकम्प भेज दे। कलीसिया का सारा इतिहास दिखाता है कि जब परमेश्वर प्रार्थना का उत्तर देता है, तो वह अपने लोगों को ठीक वही वस्तु देता है जिसके लिये उनकी प्रार्थनाएँ की जाती हैं। परमेश्वर पवित्र लोगों और पापियों दोनों को और भी आशीषें देता है, जिनके लिये वे बिलकुल प्रार्थना नहीं करते। वह धर्मियों और अधर्मियों दोनों पर मेंह बरसाता है। परन्तु जब वह प्रार्थना का उत्तर देता है, तो वह वही करके देता है जो वे उससे करने को कहते हैं। निश्चय ही, वह अक्सर प्रार्थना से बढ़कर उत्तर देता है। वह उन्हें न केवल वह देता है जो वे माँगते हैं, परन्तु अक्सर उसके साथ और आशीषें भी जोड़ देता है।
4. शायद यहाँ आपको यीशु मसीह की प्रार्थनाओं के विषय में कोई कठिनाई अनुभव हो। लोग अक्सर पूछते हैं, “क्या उसने बारी में यह प्रार्थना नहीं की थी कि कटोरा टल जाए, और क्या उसकी प्रार्थना का उत्तर मिला?” मेरा उत्तर है कि यह कोई कठिनाई है ही नहीं, क्योंकि उस प्रार्थना का उत्तर मिला। जिस कटोरे से छुटकारा पाने के लिये उसने प्रार्थना की थी, वह हटा दिया गया। प्रेरित इसी का उल्लेख करता है, जब वह कहता है—“उसने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊँचे शब्द से पुकार पुकारकर, और आँसू बहा बहाकर उससे जो उसको मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएँ और बिनती की और भक्ति के कारण उसकी सुनी गई।” अब मैं पूछता हूँ, यदि इस अवसर पर नहीं, तो और किस अवसर पर वह मृत्यु से बचाया गया? क्या वह क्रूस की मृत्यु से छुटकारा पाने के लिये प्रार्थना कर रहा था? बिलकुल नहीं। परन्तु बात यह थी। पकड़वाए जाने से थोड़ी देर पहले, हम उसे अपने चेलों से यह कहते सुनते हैं, “मेरा जी बहुत उदास है, यहाँ तक कि मेरे प्राण निकला चाहते हैं।” मन की पीड़ा उस पर लहरों की नाईं उमड़ती चली आई, यहाँ तक कि वह मरने ही पर था, और वह प्रार्थना करने के लिये बारी में गया, और अपने चेलों से जागते रहने को कहा, और फिर वह अकेले जाकर प्रार्थना करने लगा; उसने कहा, “हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।” अपनी वेदना में वह घुटनों से उठा, और बारी में चलता रहा, यहाँ तक कि वहाँ आया जहाँ उसके चेले थे, और वहाँ उसने उन्हें गहरी नींद में सोते देखा। उसने उन्हें जगाया और कहा, “क्या तुम मेरे साथ एक घड़ी भी न जाग सके?” और तब वह फिर चला गया, क्योंकि वह ऐसी व्यथा में था कि स्थिर खड़ा न रह सकता था, और उसने फिर अपना प्राण उण्डेल दिया। और तीसरी बार वह जाकर प्रार्थना करता है, “हे पिता, यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले, तौभी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो।” और अब, तीसरी बार की प्रार्थना पर, स्वर्ग से एक स्वर्गदूत उसको दिखाई दिया जो उसे सामर्थ्य देता था। और उसका मन स्थिर, और शान्त हो गया, और कटोरा टल गया। तब तक वह ऐसी वेदना में था कि उसका पसीना मानो लहू की बड़ी बड़ी बूँदों के समान था, परन्तु अब वह सब समाप्त हो गया।
कुछ लोगों ने यह मान लिया है कि वह क्रूस के विरुद्ध प्रार्थना कर रहा था, और क्रूस पर मरने से छुटकारा पाने के लिये गिड़गिड़ा रहा था! क्या मसीह कभी क्रूस से पीछे हटा? कभी नहीं। वह तो जान-बूझकर क्रूस पर मरने के लिये ही संसार में आया था, और वह उससे कभी पीछे नहीं हटा। परन्तु उसे यह डर था कि कहीं वह क्रूस तक पहुँचने से पहले ही बारी में न मर जाए। उसके प्राण पर बोझ इतना भारी था, और उससे ऐसी वेदना उत्पन्न हुई थी, कि उसे ऐसा लगा मानो वह मरने ही पर है, उसका जी यहाँ तक उदास था कि मानो प्राण निकलने पर हों। परन्तु स्वर्गदूत के उसे दिखाई देने के बाद, हम उसके प्राण की वेदना के विषय में और कुछ नहीं सुनते। उसने उस कटोरे से छुटकारे के लिये प्रार्थना की थी, और उसकी प्रार्थना का उत्तर मिला। वह शान्त हो गया, और ठीक प्राण छोड़ने के समय तक उसे फिर कोई मानसिक पीड़ा न हुई। इसलिये यह उदाहरण कोई अपवाद नहीं है। उसने ठीक वही वस्तु पाई जिसके लिये उसने माँगा था, जैसा वह कहता है, “मैं जानता था कि तू सदा मेरी सुनता है।”
परन्तु एक और उदाहरण अक्सर सामने लाया जाता है, जहाँ प्रेरित पौलुस ने शरीर के काँटे के विरुद्ध प्रार्थना की। वह कहता है, “मैंने प्रभु से तीन बार बिनती की, कि मुझ से यह दूर हो जाए।” और परमेश्वर ने उसे उत्तर दिया, “मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है।” डॉ. क्लार्क और अन्य लोगों का मत है कि पौलुस की प्रार्थना का उत्तर ठीक उसी बात में मिला जिसके लिये उसने प्रार्थना की थी। कि “शरीर में काँटा, शैतान का एक दूत,” जिसका वह उल्लेख करता है, एक झूठा प्रेरित था जिसने कुरिन्थुस की कलीसिया में फूट डाल दी थी और उसे भटका दिया था। कि पौलुस ने उसके प्रभाव के विरुद्ध प्रार्थना की, और प्रभु ने उसे यह निश्चय दिलाकर उत्तर दिया, “मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है।” कौन नहीं जानता कि वह बहुत था, और अन्त में पौलुस का प्रभाव ही विजयी हुआ?
परन्तु यदि यह मान भी लिया जाए कि पौलुस की प्रार्थना का उत्तर वह विशेष वस्तु देकर नहीं दिया गया जिसके लिये उसने प्रार्थना की थी, तो इस उदाहरण को विश्वास की प्रार्थना के नियम का अपवाद सिद्ध करने के लिये, उन्हें ठीक उसी बात को पहले से मान लेना पड़ता है जिसे सिद्ध करना है; और वह यह है कि प्रेरित ने विश्वास से प्रार्थना की थी। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि पौलुस सदा विश्वास से ही प्रार्थना करता था, जैसे किसी अन्य मसीही के विषय में भी यह मानने का कारण नहीं है। जिस रीति से परमेश्वर ने उसे उत्तर दिया, वही दिखाती है कि वह प्रार्थना विश्वास से नहीं थी। वह वास्तव में उससे यह कहता है, “वह काँटा तुम्हारे पवित्रीकरण के लिये, और तुम्हें अत्यन्त फूल जाने से बचाए रखने के लिये आवश्यक है। मैंने उसे प्रेम से, और विश्वासयोग्यता से तुम पर भेजा है, और तुम्हें यह प्रार्थना करने का कोई काम नहीं कि मैं उसे हटा लूँ।—उसे रहने दो।”
इस बात का न केवल कोई प्रमाण नहीं है कि उसने विश्वास से प्रार्थना की, बल्कि इस बात की प्रबल सम्भावना है कि उसने विश्वास से प्रार्थना नहीं की। वृत्तान्त से यह स्पष्ट है कि उसके पास ऐसा कुछ नहीं था जिस पर वह विश्वास टिका सके। न कोई स्पष्ट प्रतिज्ञा थी, न कोई सामान्य प्रतिज्ञा जो लागू हो सके, न परमेश्वर का कोई विधान, न कोई भविष्यद्वाणी, न आत्मा की कोई शिक्षा कि परमेश्वर इस काँटे को हटा देगा; बल्कि अनुमान यही था कि परमेश्वर उसे नहीं हटाएगा। उसने उसे एक विशेष उद्देश्य से दिया था। उसकी प्रार्थना स्वार्थपूर्ण प्रतीत होती है, या कम से कम केवल एक व्यक्तिगत प्रभाव के विरुद्ध प्रार्थना। यह कोई ऐसा व्यक्तिगत कष्ट नहीं था जो उसकी उपयोगिता में बाधा डालता हो, बल्कि इसके विपरीत वह उसे दीन बनाए रखकर उसकी उपयोगिता बढ़ाने के लिये दिया गया था; और क्योंकि किसी कारण से उसे वह असुविधाजनक और अपमानजनक लगा, इसलिये वह अपने ही मन से प्रार्थना करने लगा, स्पष्टतः परमेश्वर के आत्मा द्वारा उसकी ओर प्रेरित हुए बिना। परन्तु क्या पौलुस ने परमेश्वर के आत्मा के बिना किसी भी अन्य मनुष्य से अधिक विश्वास से प्रार्थना की? और क्या कोई यह कहने का साहस करेगा कि परमेश्वर के आत्मा ने उसे यह प्रार्थना करने को प्रेरित किया कि यह हटा दिया जाए, जबकि स्वयं परमेश्वर ने उसे एक विशेष उद्देश्य से दिया था, और वह उद्देश्य तभी पूरा हो सकता था जब वह काँटा उसके साथ बना रहे?
तो फिर इसे पाठ में दिए गए इस सामान्य नियम का अपवाद क्यों बनाया जाता है कि मनुष्य जो कुछ विश्वास से माँगेगा वह उसे मिलेगा? एक बार एक धर्मविज्ञान विद्यालय (थियोलॉजिकल सेमिनरी) की एक सार्वजनिक परीक्षा में, इस विषय पर उन्हें अज्ञानता की बातें कहकर युक्ति को बिगाड़ते सुनकर मैं चकित और दुःखी हुआ। पौलुस का यह उदाहरण, और मसीह का वह उदाहरण जिसका अभी उल्लेख किया गया, दोनों ही अपने विद्यार्थियों को यह सिद्ध करने के लिये उदाहरणों के रूप में प्रस्तुत किए गए कि विश्वास की प्रार्थना का उत्तर उस विशेष वस्तु में नहीं मिलेगा जिसके लिये उन्होंने प्रार्थना की। अब ऐसे विचार धर्मविज्ञान विद्यालय के भीतर या बाहर सिखाना, परमेश्वर के वचन से खिलवाड़ करना, और मसीही सेवकाई की सामर्थ्य को तोड़ देना है। क्या बात यहाँ तक पहुँच गई है कि हमारे विद्यालयों के हमारे गम्भीर विद्वान सिय्योन के पहरुओं को यह सिखाने के लिये नियुक्त किए गए हैं कि वे यह विश्वास करें और सिखाएँ कि यह आशा नहीं की जानी चाहिए कि विश्वास की प्रार्थना का उत्तर उस वस्तु को देकर दिया जाएगा जिसके लिये हम प्रार्थना करते हैं? ओह, गत में यह न बताओ, और न अश्कलोन तक इसका शब्द पहुँचे! जब कलीसिया के सबसे गम्भीर और सबसे प्रभावशाली सेवकों के ऐसे विचार हों, तो कलीसिया का क्या होगा? मैं कठोर या निन्दक नहीं होना चाहता, परन्तु यीशु मसीह के सेवकों में से एक होने के नाते, मैं परमेश्वर के वचन के ऐसे विकृतीकरण के विरुद्ध गवाही देने के लिये अपने आपको बाध्य अनुभव करता हूँ।
5. यह स्पष्ट है कि विश्वास की प्रार्थना आशीष प्राप्त कर लेगी, इस तथ्य से कि हमारा विश्वास इस प्रमाण पर टिका है कि उस वस्तु को देना परमेश्वर की इच्छा है। इस बात का प्रमाण नहीं कि कुछ और दिया जाएगा, परन्तु इस बात का कि यही विशेष वस्तु दी जाएगी। परन्तु तब, यदि कोई दूसरी वस्तु दी जानी है, तो हमारे पास इस बात का प्रमाण कैसे हो सकता है कि यह वस्तु दी जाएगी? लोगों को अक्सर जितना वे प्रार्थना में माँगते हैं उससे अधिक मिलता है। सुलैमान ने बुद्धि के लिये प्रार्थना की, और परमेश्वर ने उसे उसके अतिरिक्त धन और महिमा भी दी। इसी प्रकार कभी-कभी कोई पत्नी अपने पति के मन-परिवर्तन के लिये प्रार्थना करती है, और यदि वह विश्वास की प्रार्थना करती है, तो परमेश्वर न केवल वह आशीष दे सकता है, बल्कि उसके बच्चे का, और उसके सारे परिवार का भी मन-परिवर्तन कर सकता है। कभी-कभी आशीषें आपस में ऐसी जुड़ी हुई दिखाई देती हैं कि यदि कोई मसीही एक पा ले तो उसे सब मिल जाती हैं। V. अब मुझे यह दिखाना है कि हम मन की इस दशा में कैसे आएँ, जिसमें हम ऐसी प्रार्थना कर सकें। लोग कभी-कभी पूछते हैं, “मैं ऐसी प्रार्थना कैसे करूँ? क्या मैं यह कहूँ, अब मैं अमुक-अमुक आशीष के लिये विश्वास से प्रार्थना करूँगा?” नहीं, मनुष्य का मन इस रीति से नहीं चलता। आप उतनी ही सहजता से यह भी कह सकते हैं, “अब मैं अथाह कुंड से एक आत्मा को बुला लाऊँगा।” मेरा उत्तर है,
1. आपको पहले यह प्रमाण प्राप्त करना होगा कि परमेश्वर वह आशीष देगा। दानिय्येल ने विश्वास की प्रार्थना किस प्रकार की? उसने पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ा। अब, आपको ऐसा नहीं करना चाहिए कि अपनी बाइबल को ताक पर पड़ी रहने दें, और यह आशा करें कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाएँ आप पर प्रकट करेगा। पवित्रशास्त्र में ढूँढ़िए, और देखिए कि आपको कहाँ कोई सामान्य या विशेष प्रतिज्ञा, या कोई भविष्यद्वाणी मिलती है, जिस पर आप प्रार्थना करते समय अपने पाँव जमा सकें। पूरी बाइबल पढ़ जाइए, और आप उसे ऐसी बातों से भरी हुई पाएँगे—बहुमूल्य प्रतिज्ञाएँ, जिन्हें सामने रखकर आप विश्वास से बिनती कर सकते हैं। यदि आप वैसा करें जैसा दानिय्येल ने किया, तो आपको प्रार्थना के विषयों की कभी घटी न होगी। लोग इस विषय पर डगमगा जाते हैं, क्योंकि वे बाइबल का कभी उचित उपयोग नहीं करते।
इस राज्य के पश्चिमी भाग के एक नगर में एक विचित्र घटना हुई। वहाँ एक जागृति हो रही थी। एक पादरी उस स्थान को देखने आया, और उसने विश्वास की प्रार्थना के विषय में बहुत-सी बातें सुनीं। जो कुछ वे कहते थे उससे वह डगमगा गया, क्योंकि उसने उस विषय को कभी उस प्रकाश में नहीं देखा था जिसमें वे देखते थे। उसने वहाँ परिश्रम करनेवाले पादरी से इसके विषय में पूछा। उस पादरी ने प्रेमपूर्ण भाव से उससे अनुरोध किया कि वह घर जाए, और अपना नया नियम लेकर प्रार्थना से सम्बन्ध रखनेवाले पदों को ढूँढ़े, और अपने सबसे अधिक प्रार्थना करनेवाले लोगों के पास जाकर उनसे पूछे कि वे इन पदों को कैसे समझते हैं। उसने कहा कि वह ऐसा करेगा, क्योंकि यद्यपि ये विचार उसके लिये नए थे, फिर भी वह सीखने को तैयार था। उसने ऐसा ही किया, और अपने प्रार्थना करनेवाले पुरुषों और स्त्रियों के पास गया, और बिना किसी टिप्पणी या व्याख्या के वे पद पढ़कर सुनाए, और पूछा कि वे क्या सोचते हैं। उसने पाया कि उनकी सीधी-सादी सामान्य समझ ने उन्हें इन पदों को ऐसे समझने, और यह विश्वास करने तक पहुँचाया था कि उनका अर्थ ठीक वही है जो वे कहते हैं। इसका उस पर प्रभाव पड़ा, और फिर उसके घूम-घूमकर उनके मन के सामने प्रतिज्ञाएँ रखने से उनमें प्रार्थना की आत्मा जाग उठी, और उसके बाद एक जागृति हुई।
मैं ऐसे बहुत-से लोगों के नाम बता सकता हूँ जिन्होंने इस विषय पर बाइबल की जाँच करने की ठानी, और अभी आधी भी पूरी न कर पाए थे कि वे प्रार्थना की आत्मा से भर गए। उन्होंने पाया कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं का अर्थ ठीक वही है जो एक सीधा-सादा, सामान्य समझवाला मनुष्य उनका अर्थ समझेगा। मैं आपको सलाह देता हूँ कि इसे आज़माइए। आपके पास बाइबलें हैं; उन्हें पढ़िए, और जब कभी आपको कोई ऐसी प्रतिज्ञा मिले जिसका आप उपयोग कर सकें, तो आगे बढ़ने से पहले उसे अपने मन में दृढ़ता से बैठा लीजिए; और मैं यह भविष्यवाणी करने का साहस करता हूँ कि आप उस पुस्तक को पूरा करने से पहले ही यह जान लेंगे कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं का अर्थ ठीक वही है जो वे कहती हैं।
2. जो अच्छी इच्छाएँ आपमें हैं उन्हें सँजोकर रखिए। मसीही लोग इस पर ध्यान न देने के कारण अक्सर अपनी अच्छी इच्छाएँ खो देते हैं; और तब उनकी प्रार्थनाएँ बिना किसी इच्छा या उत्सुकता के केवल शब्द ही रह जाती हैं। इच्छा की छोटी से छोटी लालसा को भी सँजोकर रखना चाहिए। यदि आपका शरीर ठण्ड से जम जाने पर होता, और आपके पास आग की छोटी-सी चिंगारी भी होती, तो आप उसे कैसे सँजोकर रखते! इसी प्रकार यदि आपमें किसी आशीष की छोटी से छोटी इच्छा भी हो, वह चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो, तो उसे व्यर्थ में न गँवाइए। आत्मा को शोकित न कीजिए। भटकिए मत। हल्केपन से, दूसरों की निन्दा करने की आदत से, सांसारिक मनोवृत्ति से अच्छी इच्छाओं को न खोइए। जागते रहिए और प्रार्थना कीजिए, और उसका पीछा करते रहिए, नहीं तो आप कभी विश्वास की प्रार्थना नहीं कर पाएँगे। 3. विश्वास की प्रार्थना के लिये परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण अनिवार्य है। आपको पवित्र जीवन जीना होगा, और सब कुछ परमेश्वर को समर्पित करना होगा—अपना समय, अपनी योग्यताएँ, अपना प्रभाव—जो कुछ आपके पास है, और जो कुछ आप हैं, सब कुछ, कि वह पूरी रीति से उसी का हो जाए। भक्त पुरुषों की जीवनियाँ पढ़िए, और आप इस तथ्य से प्रभावित होंगे: कि वे अपनी वाचा को नया करने, और अपने आपको फिर से परमेश्वर को समर्पित करने के लिये समय अलग रखा करते थे; और जब कभी उन्होंने ऐसा किया, तो तुरन्त उसके बाद सदा आशीष आई। यदि आज रात एडवर्ड्स यहाँ मेरे पास होता, तो मैं ऐसे अंश पढ़कर सुना सकता था जो दिखाते हैं कि उसके दिनों में यह कैसे होता था।
4. आपको लगे रहना होगा। आपको ऐसा नहीं करना है कि किसी वस्तु के लिये एक बार प्रार्थना करें, और फिर रुक जाएँ, और उसे विश्वास की प्रार्थना कहें। दानिय्येल को देखिए। उसने इक्कीस दिन तक प्रार्थना की, और जब तक उसे आशीष न मिल गई तब तक नहीं रुका। उसने अपना मन और अपना मुख प्रभु की ओर लगाया कि गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करे, और उपवास कर, टाट पहिन, राख में बैठकर माँगे: और वह तीन सप्ताह तक लगा रहा, और तब उत्तर आया। और वह पहले क्यों नहीं आया? परमेश्वर ने सन्देश पहुँचाने के लिये एक प्रधान स्वर्गदूत को भेजा था, परन्तु इस सारे समय शैतान ने उसे रोके रखा। देखिए कि मसीह अन्यायी न्यायी के दृष्टान्त में, और रोटियों के दृष्टान्त में क्या कहता है। वह उनके द्वारा हमें क्या सिखाता है? अरे, यही कि जब प्रार्थना हठपूर्वक की जाती है तो परमेश्वर उसका उत्तर देगा। “सो क्या परमेश्वर अपने चुने हुओं का न्याय न चुकाएगा, जो रात-दिन उसकी दुहाई देते रहते हैं?”
5. यदि आप विश्वास से प्रार्थना करना चाहते हैं, तो निश्चय कर लीजिए कि आप प्रतिदिन परमेश्वर के साथ चलें। यदि आप ऐसा करें, तो वह आपको बताएगा कि किस बात के लिये प्रार्थना करें। उसके आत्मा से परिपूर्ण होइए, और वह आपको प्रार्थना करने के लिये बहुत विषय देगा। जितना आपकी देह में सहने की शक्ति है, उतनी ही प्रार्थना की आत्मा वह आपको देगा।
एक भले मनुष्य ने मुझसे कहा, “ओह, मैं प्रार्थना करने की शक्ति की कमी से मरा जा रहा हूँ। मेरी देह कुचली हुई है, संसार का बोझ मुझ पर है, और मैं प्रार्थना करने से कैसे रुक सकता हूँ!” मैंने उस मनुष्य को उस बोझ के दबाव के नीचे कमज़ोरी और मूर्छा के कारण सचमुच बीमार होकर बिस्तर पर जाते देखा है। और मैंने उसे ऐसे प्रार्थना करते देखा है मानो वह स्वर्ग पर बलपूर्वक अधिकार कर लेगा, और फिर मैंने उसकी प्रार्थना के उत्तर में आशीष को इतनी स्पष्टता से आते देखा है मानो वह प्रकट कर दी गई हो, यहाँ तक कि कोई भी उस पर उतना ही सन्देह न करता जितना इस बात पर कि मानो परमेश्वर ने स्वर्ग से बोला हो। क्या मैं आपको बताऊँ कि उसकी मृत्यु कैसे हुई? वह अधिक से अधिक प्रार्थना करता गया, और वह संसार का मानचित्र अपने सामने रखकर प्रार्थना किया करता था, और विभिन्न देशों पर दृष्टि डालकर उनके लिये प्रार्थना करता था, यहाँ तक कि वह अपने कमरे में प्रार्थना करते-करते ही सचमुच चल बसा। धन्य मनुष्य! वह भक्तिहीनों और शारीरिक, अविश्वासी धर्म का अंगीकार करनेवालों की निन्दा का पात्र था, परन्तु वह स्वर्ग का प्रिय था, और प्रार्थना में एक प्रबल राजकुमार था।
VI. अब मैं कुछ आपत्तियों का उल्लेख करूँगा जो इस शिक्षा के विरुद्ध उठाई जाती हैं।
1. “यह कट्टर धर्मोन्माद की ओर ले जाती है और एक नए प्रकाशन के बराबर है।” यह ठोकर का कारण क्यों हो? विश्वास की प्रार्थना करने से पहले उनके पास विश्वास करने के लिये प्रमाण होना ही चाहिए। और यदि परमेश्वर इन्द्रियों के अतिरिक्त कोई और प्रमाण देता है, तो इसमें आपत्ति कहाँ है? सच है, एक अर्थ में यह एक नया प्रकाशन है; यह उसके आत्मा के द्वारा किसी बात को प्रकट करना है। परन्तु यह ठीक वही प्रकाशन है जिसे देने की परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है। यदि बाइबल सत्य है, तो यह ठीक वही है जिसकी हमें आशा करनी चाहिए; कि जब हम नहीं जानते कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हमें किस बात के लिये प्रार्थना करनी चाहिए, तो उसका आत्मा हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, और हमें ठीक वही बात सिखाता है जिसके लिये प्रार्थना करनी है। क्या हम आत्मा की शिक्षा का इनकार करें? 2. अक्सर यह पूछा जाता है, “क्या सब मनुष्यों के उद्धार के लिये विश्वास की प्रार्थना करना हमारा कर्तव्य है?” मेरा उत्तर है, नहीं; क्योंकि यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं है। यह उसकी प्रकट की हुई इच्छा के बिलकुल विपरीत है। हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है कि सब उद्धार पाएँगे। हमें सबके प्रति भलाई की भावना रखनी चाहिए, और अपने आप में देखा जाए तो उनके उद्धार की इच्छा करनी चाहिए। परन्तु परमेश्वर ने हम पर यह प्रकट कर दिया है कि मानव जाति में से बहुत-से लोग दण्ड की आज्ञा पाएँगे। और इसके विपरीत प्रकाशन के होते हुए भी यह विश्वास करना कर्तव्य नहीं हो सकता कि वे सब उद्धार पाएँगे। यूहन्ना के सत्रहवें अध्याय में मसीह की प्रार्थना में, उसने स्पष्ट रूप से कहा, “मैं संसार के लिये बिनती नहीं करता हूँ परन्तु उन्हीं के लिये जिन्हें तू ने मुझे दिया है।”
3. परन्तु कुछ लोग कहते हैं, “यदि हम सब मनुष्यों के लिये यह प्रार्थना करें, तो क्या सब मनुष्य उद्धार न पा लेंगे?” मेरा उत्तर है, हाँ, और इसी प्रकार यदि वे सब पश्चाताप करें तो वे उद्धार पा लेंगे। परन्तु वे पश्चाताप नहीं करेंगे। और न ही मसीही लोग सबके लिये विश्वास की प्रार्थना करेंगे, क्योंकि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिस पर यह विश्वास आधारित किया जा सके कि परमेश्वर का अभिप्राय सब मनुष्यों का उद्धार करने का है।
4. परन्तु आप पूछते हैं, “हम किनके लिये यह प्रार्थना करें? हम यह जानना चाहते हैं कि हमें किन दशाओं में, किन व्यक्तियों, और स्थानों के लिये, और किन समयों पर, इत्यादि, विश्वास की प्रार्थना करनी है।” मेरा उत्तर वही है जो मैं पहले दे चुका हूँ: जब आपके पास प्रतिज्ञाओं, या भविष्यद्वाणियों, या परमेश्वर के विधानों, या आत्मा की अगुवाई से यह प्रमाण हो कि जिन बातों के लिये आप प्रार्थना करते हैं उन्हें परमेश्वर करेगा।
5. “ऐसा क्यों है कि भक्त माता-पिता की अपने बच्चों के लिये की गई इतनी सारी प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं मिलता? क्या आपने नहीं कहा था कि एक ऐसी प्रतिज्ञा है जिसे भक्त माता-पिता अपने बच्चों पर लागू कर सकते हैं? तो फिर ऐसा क्यों है कि इतने सारे भक्त, प्रार्थना करनेवाले माता-पिता के बच्चे पश्चाताप न करनेवाले रहे, और अपने पापों में मर गए?” मान लिया कि ऐसा है, तो इससे क्या सिद्ध होता है? परमेश्वर सच्चा और हर एक मनुष्य झूठा ठहरे। हम किस बात पर विश्वास करें, कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा विफल हो गई, या कि इन माता-पिता ने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया? शायद उन्होंने प्रतिज्ञा पर विश्वास नहीं किया, या यह विश्वास नहीं किया कि विश्वास की प्रार्थना जैसी कोई वस्तु है भी। जहाँ कहीं आपको ऐसा धर्म का अंगीकार करनेवाला मिले जो ऐसी किसी प्रार्थना पर विश्वास नहीं करता, वहाँ आप सामान्यतः यह पाएँगे कि उसके बच्चे और घर के सेवक अब तक अपने पापों में हैं। और इसमें कोई आश्चर्य नहीं, जब तक कि किसी और की प्रार्थनाओं के उत्तर में उनका मन-परिवर्तन न हो जाए।
6. “क्या ये विचार कट्टर धर्मोन्माद की ओर नहीं ले जाएँगे? क्या बहुत-से लोग यह नहीं सोचेंगे कि वे विश्वास की प्रार्थना कर रहे हैं जबकि वे नहीं कर रहे होते?” यह वही आपत्ति है जो यूनिटेरियन लोग नए जन्म की शिक्षा के विरुद्ध उठाते हैं—कि बहुत-से लोग सोचते हैं कि उनका नया जन्म हुआ है जबकि वास्तव में नहीं हुआ। यह तो हर प्रकार के आत्मिक धर्म के विरुद्ध एक तर्क है। कुछ लोग सोचते हैं कि यह उनके पास है जबकि नहीं होता, और वे धर्मोन्मादी होते हैं। परन्तु ऐसे लोग भी हैं जो जानते हैं कि विश्वास की प्रार्थना क्या है, ठीक वैसे ही जैसे ऐसे लोग हैं जो जानते हैं कि आत्मिक अनुभव क्या है, चाहे इससे उन ठण्डे मनवाले धर्म का अंगीकार करनेवालों को ठोकर लगे जो इसे नहीं जानते। पादरी भी अक्सर अपने आपको उस झिड़की के योग्य बना लेते हैं जो मसीह ने नीकुदेमुस को दी थी: “तू इस्राएलियों का गुरु होकर भी क्या इन बातों को नहीं समझता?”
टिप्पणियाँ।
1. जिन लोगों ने अनुभव से यह नहीं जाना कि यह क्या है, उनके पास अपनी भक्ति पर सन्देह करने का बड़ा कारण है। यह किसी भी प्रकार से अनुदार बात नहीं है। वे अपने आपको जाँचें। डर इस बात का है कि वे प्रार्थना को वैसे ही समझते हैं जैसे नीकुदेमुस ने नए जन्म को समझा था। वे परमेश्वर के साथ नहीं चले हैं, और आप उन्हें इसका वर्णन नहीं कर सकते, ठीक वैसे ही जैसे आप किसी ऐसे अन्धे मनुष्य को, जो रंग नहीं देख सकता, किसी सुन्दर चित्र का वर्णन नहीं कर सकते। धर्म का अंगीकार करनेवाले बहुत-से लोग विश्वास की प्रार्थना के विषय में उतना ही समझ सकते हैं जितना एक अन्धा मनुष्य रंगों के विषय में समझता है।
2. यह विश्वास करने का कारण है कि लाखों लोग नरक में हैं क्योंकि धर्म का अंगीकार करनेवालों ने विश्वास की प्रार्थना नहीं की। जब प्रतिज्ञाएँ उनकी आँखों के सामने थीं, तब भी उनमें उनका उपयोग करने के लिये पर्याप्त विश्वास नहीं था। इस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों को, यहाँ तक कि बपतिस्मा पाए हुए बच्चों को भी, नरक में जाने देते हैं क्योंकि वे परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास नहीं करते थे। निःसन्देह बहुत-सी स्त्रियों के पति नरक में चले गए हैं, जबकि वे प्रार्थना में परमेश्वर से प्रबल होकर उन्हें बचा सकती थीं। शायद समय के चिह्न और परमेश्वर के विधान के संकेत अनुकूल थे, और परमेश्वर के आत्मा ने उनके उद्धार के लिये इच्छाएँ उत्पन्न की थीं, और उनके पास यह विश्वास करने के लिये पर्याप्त प्रमाण था कि परमेश्वर आशीष देने को तैयार है, और यदि उन्होंने केवल विश्वास से प्रार्थना की होती, तो परमेश्वर वह आशीष दे देता; परन्तु परमेश्वर ने उसे फेर दिया क्योंकि उन्होंने समय के चिह्नों को पहचानना नहीं चाहा।
3. आप कहते हैं, “इससे तो कलीसिया पर दोष का बड़ा भारी बोझ आ पड़ता है।” सच है, ऐसा ही है; और निःसन्देह बहुत बड़ी भीड़ परमेश्वर के सामने उन प्राणों के लहू से पूरी तरह ढँपी हुई खड़ी होगी जो उनके विश्वास की कमी के कारण नाश हो गए हैं। उनकी बाइबलों में संचित परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ उनके मुँह पर घूरेंगी और उन्हें दबाकर नरक में ले जाएँगी।
4. धर्म का अंगीकार करनेवाले बहुत-से लोग परमेश्वर से इतनी दूर जीवन बिताते हैं कि उनसे विश्वास की प्रार्थना के विषय में बात करना उनकी समझ से बिलकुल बाहर है। बहुत बार उनके लिये सबसे बड़ी ठोकर की बात यही होती है कि इस प्रकार की प्रार्थना के विषय में प्रचार किया जाए।
5. मैं यहाँ उपस्थित धर्म का अंगीकार करनेवालों से कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूँ। क्या आप जानते हैं कि विश्वास से प्रार्थना करना क्या है? क्या आपने कभी इस रीति से प्रार्थना की है? क्या आपने कभी तब तक प्रार्थना की है जब तक आपके मन को यह निश्चय न हो गया कि आशीष आएगी—जब तक आपने परमेश्वर में वह विश्राम, वह भरोसा अनुभव न किया, जो इतना पूर्ण हो मानो आपने परमेश्वर को स्वर्ग से उतरकर आपको वह देते हुए देखा हो? यदि नहीं, तो आपको अपनी नींव की जाँच करनी चाहिए। आप विश्वास से बिलकुल प्रार्थना किए बिना कैसे जी सकते हैं? अपने बच्चों को देखते हुए आप कैसे जीते हैं, जबकि आपको कोई भी निश्चय नहीं है कि उनका मन-परिवर्तन होगा? कोई तो सोचेगा कि आप पागल हो जाएँगे। मैं पश्चिम में एक पिता को जानता था; वह एक भला मनुष्य था, परन्तु विश्वास की प्रार्थना के विषय में उसके विचार गलत थे; और उसके सब बच्चे बड़े हो गए थे और उनमें से एक का भी मन-परिवर्तन नहीं हुआ था। अन्त में उसका पुत्र बीमार पड़ा और ऐसा लगा कि वह मरने पर है। पिता ने प्रार्थना की, परन्तु पुत्र की दशा बिगड़ती गई और ऐसा लगा कि वह बिना आशा के कब्र में उतरता जा रहा है। पिता ने तब तक प्रार्थना की जब तक उसकी पीड़ा वर्णन से बाहर न हो गई। अन्त में वह गया और प्रार्थना की—(उसके पुत्र के जीवित रहने की कोई आशा दिखाई नहीं देती थी)—परन्तु उसने अपना प्राण ऐसे उण्डेल दिया मानो वह इनकार सुनेगा ही नहीं, यहाँ तक कि अन्त में उसे यह निश्चय मिल गया कि उसका पुत्र न केवल जीवित रहेगा, बल्कि उसका मन-परिवर्तन भी होगा; और न केवल इसी का, बल्कि उसके सारे परिवार का मन-परिवर्तन होकर वे परमेश्वर की ओर फिरेंगे। वह घर में आया और अपने परिवार से कहा कि उसका पुत्र नहीं मरेगा। वे उस पर चकित हुए। वह कहता है, “मैं तुमसे कहता हूँ, वह नहीं मरेगा। और मेरी कोई भी सन्तान कभी अपने पापों में नहीं मरेगी।” उस मनुष्य के सब बच्चों का वर्षों पहले मन-परिवर्तन हो चुका है।
इसके विषय में आप क्या सोचते हैं? क्या वह धर्मोन्माद था? यदि आप ऐसा मानते हैं, तो इसका कारण यह है कि आप इस विषय में कुछ नहीं जानते। क्या आप ऐसी प्रार्थना करते हैं? क्या आप इस रीति से जीते हैं कि अपने बच्चों के लिये ऐसी प्रार्थना कर सकें? मैं जानता हूँ कि धर्म का अंगीकार करनेवालों के बच्चों का मन-परिवर्तन कभी-कभी किसी और की प्रार्थनाओं के उत्तर में भी हो सकता है। परन्तु क्या आपको ऐसे जीना चाहिए? जब परमेश्वर आपको अपने बच्चों के प्रति इस अत्यन्त महत्वपूर्ण सम्बन्ध को निभाने के लिये बुलाता है, तब क्या आप दूसरों की प्रार्थनाओं पर भरोसा रखने का साहस करते हैं?
अन्त में—देखिए कि बाइबल को ठिकाने लगाने के लिये कैसा मिला-जुला प्रयत्न किया जा रहा है। दुष्ट लोग बाइबल की चेतावनियों को फेंक देना चाहते हैं, और कलीसिया उसकी प्रतिज्ञाओं को। और फिर बचता क्या है? दोनों मिलकर बाइबल को कोरा पन्ना बना छोड़ते हैं। मैं यह प्रेम से कहता हूँ: यदि हम अपनी बाइबलों की बहुमूल्य प्रतिज्ञाओं को थामे न रहें, और परमेश्वर की आशीष के लिये प्रार्थना करते समय उन्हें अपने विश्वास का आधार न बनाएँ, तो हमारी बाइबलें किस काम की हैं? यदि आप उन पर विश्वास करने और उनका उपयोग करने वाले नहीं हैं, तो अच्छा होगा कि आप अपनी बाइबलें अन्यजातियों के पास भेज दें, जहाँ वे कुछ भला करेंगी। मेरे पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि इस समय इस कलीसिया में या इस नगर में इस प्रकार की प्रार्थना अधिक होती है। और तब इसका क्या होगा? आपके बच्चों का क्या होगा? आपके पड़ोसियों का? दुष्टों का?
